महिला सशक्तिकरण की प्रतीक मायावती : संघर्ष और चुनौतियाँ

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mayawati  भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की संख्या गिनी-चुनी ही हैं। उनमें से एक नाम सुश्री मायावती का आता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस उम्र में महिलाएं अपना जीवन ठीक से नहीं चला पाती हैं उस उम्र में मायावती सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारत में जाति व्यवस्था के दुष्चक्र से बाहर आ पाना पत्थर पर सर मारने जैसा है। मायावती एक दलित समुदाय से आती हैं ऐसे में वह जातीय संघर्ष करते हुए अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं। उनके शासनकाल में उत्तरप्रदेश में दलितों व महिलाओं की स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई देता था। वह अपने छोटे-बड़े कार्यकाल को मिलाकर कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं।

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देश की सियासत में कई बार किंगमेकर की भूमिका निभाने वाली मायावती एक सशक्त महिला की मिसाल हैं। एक ऐसी नेत्री, जिसे कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने ‘लोकतंत्र का चमत्कार (miracle of Democracy)’ कहा था। जिसने सियासी रूप से देश के सबसे ताकतवर सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के तमाम स्थापित समीकरणों को ध्वस्त करके रख दिया था जिसके बाद देश की राजनीति में दलित चेतना के नए युग का सूत्रपात हुआ। मायावती पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 1995 में गठबंधन की सरकार बनाते हुए मायावती मुख्यमंत्री बनीं थी, उस समय तक मायावती राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनी थीं। मायावती ने अपना पहला चुनाव साल 1984 में उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। इसके बाद दूसरी बार साल 1985 में उन्होंने बिजनौर और फिर 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा। साल 1989 में मायावती को बिजनौर से जीत हासिल हुई। मायावती पहली बार साल 1994 में राज्यसभा सांसद बनीं। उन्होंने अपने जीवन में उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे कार्य किये, जिसके कारण उनके फॉलोवर उन्हें ‘आयरन लेडी’ के नाम से बुलाते हैं।

   बहन मायावती ने अपने करियर की शुरुआत 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से LL.B की डिग्री लेकर किया। उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन का कार्य भी किया था। सन् 2003 में मायावती को मुख्यमंत्री के रूप में, पोलियो उन्मूलन में उनकी पहल के लिए यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और रोटरी इंटरनेशनल द्वारा पॉल हैरिस फेलो पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। मायावती को राजर्षि शाहू मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा राजर्षि शाहू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 2008 में, फोर्ब्स ने मायावती को दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में 59 वें स्थान पर रखा। वह 2007 में न्यूज़ वीक की शीर्ष महिला की सूची में शामिल की गईं। 2009 में न्यूज़ वीक के एक लेख ने उन्हें बराक ओबामा के रूप में वर्णित किया गया और प्रधान मंत्री के लिए एक संभावित उम्मीदवार बताया गया। टाइम पत्रिका ने मायावती को 2007 के लिए भारत की 15 सबसे प्रभावशाली शख्सियत की सूची में शामिल किया।

      इन सबके बावजूद भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण के तौर पर मायावती का नाम बहुत कम लिया जाता है। मायावती को सिर्फ इस रूप में ही नहीं देखना चाहिए कि वह एक महिला मुख्यमंत्री थी। अथवा कई बार कि राज्यसभा सदस्य रही थीं। मायावती उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो अपने पैरों पर खड़े होने कि जद्दोजहद में लगी हैं। मायावती का जन्म एक बेहद सामान्य से दलित (उपजाति जाटव चमार) परिवार में हुआ था। उनके पिता पोस्ट ऑफिस में कर्मचारी थे और माताजी गृहणी थीं। ऐसे सामान्य से घर से निकलकर मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक कार्य था। अपने जीवनकाल में मायावती को अनेकों जातिगत भेदभावों व अन्य प्रकार कि सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होने उत्तर प्रदेश में दलितों व महिलाओं के सशक्तिकरण के अनेकों कार्य किए। कई जगह बालिका विद्यालय व अनेकों योजनाएं चलाकर महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया।

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 मायावती की एक खासियत यह भी है कि इन्होंने मान्यवर कांशीराम के सानिध्य और मार्गदर्शन में राजनीति में अपनी पहचान स्वयं बनाई। इनका पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। पिताजी का सपना था कि बेटी एक आईएएस ऑफिसर या वकील बनकर देश की सेवा करे। लेकिन मायावती कि दृढ़ इच्छा, स्पष्ट वाक्पटुता और मान्यवर कांशीराम के मार्गदर्शन में वो राजनीति की ओर आईं। इस बारे में मायावती ने कहा था ‘मैंने राजनीति में आने का जो फ़ैसला किया तो मुझे दूसरे नेताओं की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली। हमारे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है, दूर-दूर तक हमारे रिश्ते नातों में भी कोई राजनीति में नहीं है।’ लेकिन बिना राजनीतिक विरासत के भी मायावती ने देश की सियासत खलबली मचा दी।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम इनकी भाषण कला से इतने प्रभावित हुए थे कि इन्हें राजनीति में आने की सलाह दे डाली। मायावती और कांशीराम के के रिश्ते बेहद विनम्र थे। कांशीराम ने उनके प्रथम भाषण को सुनकर ही उनके राजनीतिक जीवन की भविष्यवाणी कर दी थी। दरअसल इस मुलाक़ात से एक दिन पहले मायावती दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में भाषण दे रही थीं… मायावती ने मंच से ही कांग्रेसी नेता राजनारायण को दलितों को बार-बार ‘हरिजन’ कहने पर बुरी तरह लताड़ा था। एक 21 साल की लड़की का ऐसा रुख़ देखकर ही मान्यवर कांशीराम साहब मायावती से इतने प्रभावित हो गए थे कि सीधे उनके घर जाकर उनसे अपने साथ साथ काम करने का अनुरोध किया।

उन दोनों के संबंधों का ज़िक्र पत्रकार नेहा दीक्षित ने ‘कारवां’ पत्रिका में मायावती पर छपे अपने लेख में किया है। दीक्षित लिखती हैं, “जब कांशीराम अपने हुमायूं रोड वाले घर में आए तो मायावती को वहां रहने के लिए कोई कमरा नहीं दिया गया। जब कांशीराम भारतीय राजनीति के दिग्गजों से अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर मंत्रणा कर रहे होते थे, तो मायावती घर के पिछवाड़े के आंगन में दरी पर बैठ कर ग्रामीण इलाकों से आने वाले कार्यकर्ताओं के साथ बात कर रही होती थीं। कांशीराम अपने घर के फ़्रिज को ‘लॉक’ कर चाबी अपने पास रखते थे। उन्होंने मायावती और अपने दूसरे सहयोगियों को निर्देश दे रखे थे कि फ़्रिज से उन लोगों को ही कोल्ड ड्रिंक ‘सर्व’ किया जाए जिनसे वो अपने ड्राइंग रूम में मिलते हैं।” मायावती और कांशीराम साहब के रिश्ते को लेकर भी सवाल उठते रहे। अक्सर उनके चरित्र पर भी दाग़ लगाने की कोशिश की गई। लेकिन इससे मायावती विचलित नहीं हुईं। एक इंटरव्यू में मायावती ने इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था ‘जब कोई त्याग करके आगे बढ़ता है तो विरोधियों के पास एक ही मुद्दा होता है, कैरेक्टर को लेकर बदनाम करना। मान्यवर कांशीराम जी को मैं अपना गुरु मानती हूँ और वो मुझे अपना शिष्य मानते हैं।’

आज के समय में महिलाओं को मायावती को अपने आइकन के तौर देखने की जरूरत है। मायावती ने अपने शासनकाल में उन तमाम दलित, बहुजन नायकों की तस्वीरों व मूर्तियों को स्थापित किया जो नेपथ्य से पीछे थे या गुमशुदा थे। उन्होंने बहुजन राजनीति की नई इबारत लिखी। पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन नायकों को दुबारा स्थापित करने का श्रेय मायावती को ही जाता है। वैसे तो बहुजन राजनीति में पुरे देश में मायावती के नाम के बिना अधूरा है लेकिन बात उत्तरप्रदेश की राजनीति की करें तो वो मायावती के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती है। उस समय मायावती को यूपी में दलितों के लिए आइकन के रूप देखते थे जो आज भी बरकरार है।

 भारत में आरक्षण एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत विश्वविद्यालयों में सरकारी पदों और सीटों का एक प्रतिशत पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, मायावती ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आरक्षण का समर्थन किया, जिसमें कोटा और धार्मिक अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों जैसे समुदायों को शामिल किया गया। अगस्त 2012 में एक बिल को मंजूरी दी गई थी जो संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करती है ताकि राज्य की नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण प्रणाली का विस्तार किया जा सके। जाति के दंश को इस रूप में भी समझा सकता है कि आप बहुत अच्छे हैं, कोई कमी नहीं है आपमें। जाति पता चलते ही आप बुरे हो जाते हैं। आप कामचोर हो जाते हैं, आपकी सारी ‘मेरिट’ ख़त्म हो जाती है और आप आरक्षण का फ़ायदा लेकर हर जगह घुसपैठ करने वाले बन जाते हैं। मायावती ने इन सबको धता बताते हुए अपनी पहचान स्वयं बनाई। मायावती के करियर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा “लोकतंत्र का चमत्कार” कहा गया है। लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें ‘बहन जी’ के रूप में संदर्भित करते हैं।50 बहुजन नायक पुस्तक खरीदें

      मायावती स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने एकबार अपने पिता से पूछ लिया था कि क्या मैं भी बाबा साहब की तरह काम करूँ तो मेरी भी पुण्यतिथि उनकी तरह मनाई जाएगी। यह सुनकर उनके पिता हतप्रभ रह गए थे। गौरतलब है कि उनके पिताजी ने बाबा साहब कि जीवनी मायावती को पढ़ने के लिए दिया था। यहीं से मायावती बाबा साहब को अपना आदर्श मनाने लगी थी। राजनीति में आने के बाद उनके पिताजी ने उनसे दूरियाँ बना ली थी। मायावती ने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था ताकि वह बहुजन समाज की सेवा कर सकें।

      मायावती को अपने जीवनकाल में यहाँ तक की सांसद बन जाने के बाद भी जातीय भेदभाव सहने पड़े। अजय बोस ‘बहनजी : अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावती’ में लिखते हैं, “जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित सभ्रांत महिला सांसदों के लिए मज़े की चीज़ हुआ करते थे। वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है। उनमें से एक ने एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा ‘परफ़्यूम’ लगा कर सदन में आया करें।” सफाई को लेकर उनका व्यवहार धीरे-धीरे बदल गया। मायावती के नज़दीकी लोगों के अनुसार बार-बार उनकी जाति का उल्लेख और उनको ये आभास दिलाने की कोशिश कि दलित अक्सर गंदे होते हैं, का उन पर दीर्घकालीन असर पड़ा। उन्होंने हुक्म दिया कि ‘उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा।’ मायावती की जीवनी लिखने वाली कारंवा पत्रिका की पत्रकार नेहा दीक्षित ने भी अपने लिखे एक लेख ‘द मिशन – इनसाइड मायावतीज़ बैटल फ़ॉर उत्तर प्रदेश’ में लिखा था, “मायावती में सफ़ाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोछा लगवाती हैं।”

      मायावती होना एक गर्व की निशानी भी है। मायावती भारतीय महिला राजनीति में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी लाई हैं। अपने कार्यकाल में हमेशा कड़े फैसले लेने व उसको क्रियान्वित करके दिखने की क्षमता सुश्री मायावती में थी। मायावती का मुख्यमंत्री बनना इस बात का संकेत भी है कि हाशिये कि महिलाओं को यदि अवसर दिया जाए तो वह समाज व देश कि सेवा में आमूलचूल परिवर्तन लाने में सक्षम हैं। मायावती द्वारा किया गया कार्य हाशिये के समाज के लिए एक इतिहास बन गया है। आज भारत की कोई भी हाशिये के वर्ग की महिला मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकती है। यह ताकत उसे मायावती से मिलती है। अपने राजनीतिक जीवन में तमाम असहमतियों व सफलता-असफलता के बावजूद मायावती भारतीय राजनीति की एकमात्र दलित राजनेता हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नकार नहीं सकते हैं। विरोध के बावजूद उनके किए कार्यों का बखान तो करना ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की दलित महिलाएं जो कभी पुरुषों के आज्ञा के बगैर घर से बाहर नहीं निकलती थी वह मायावती के राजनीतिक रैलियों में बड़े आदर के साथ मायावती का कटाउट या उनका मुखौटा लिए हिस्सा लेती हैं।

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मायावती के होने से हाशिये के समाज की महिलाओं के अंदर एक चेतना आई है। मायावती अपने शासनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया और अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है। जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है। मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके किये कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है। हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए। मायावती ने अपनी चौथे कार्यकाल में बहुजन इतिहास को जीवित करने के लिए भी काफ़ी काम किया। मायावती ने बहुजन नायक-नायिकाओं के सम्मान में ऐतिहासिक काम कर दिखाया। जिन बहुजन नायक-नायिकाओं को इतिहास में कभी उचित सम्मान नहीं मिला था, मायावती ने उनकी शानदार प्रतिमाएँ लगाकर बहुजन समाज से उनका परिचय कराया।

प्रो. विवेक कुमार द्वारा संपादित, राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पुस्तक खरीदें

      मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते। वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे। मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है। जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है। वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं। अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है। दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है। भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक बहुजन महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।’

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