पूर्व राज्यपाल, एमएलए, एमएलसी, मंत्री, लेखक माता प्रसाद जी नहीं रहें

 राजनीति में सादगी के प्रतीक, पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार माता प्रसाद जी का बीती रात (मंगलवार, 19 जनवरी 2021) परिनिर्वाण हो गया। वह तकरीबन 97 वर्ष के थे। वह बढ़ती उम्र के कारण लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे और पीजीआई लखनऊ में उनका इलाज चल रहा था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। आम तौर पर उन्हें अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल के रूप में जाना-जाता था। वह नारायण दत्त तिवारी की सरकार में 1988 से 1989 तक राजस्व मंत्री भी रहे।

राजनीति में सादगी के प्रतीक, पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार माता प्रसाद के निधन की खबर मिलते ही देश भर में मौजूद उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौर गई। उनका जन्म जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्तूबर 1924 को हुआ। उनके पिता का नाम जगरूप राम था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वर्ष 1942-43 में मछलीशहर से हिंदी-उर्दू में मीडिल परीक्षा पास की थी। गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल से ट्रेनिंग के बाद जिले के मड़ियाहूं ब्लॉक क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गोविंद, विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की।

 अध्यापन काल में ही ये लोकगीत लिखना और गाना इनका शौक हो गया था। इनकी कार्य कुशलता को देखते हुए इन्हें 1955 में उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया। वो जिले के शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधायक रहे। 1980 से 1992 तक 12 वर्ष तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे।

देश की नरसिंह राव सरकार ने 21 अक्तूबर 1993 को इन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया और 31 मई 1999 तक ये राज्यपाल रहे। राज्यपाल पद पर रहे। उनके बारे में एक बात विख्यात है। जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे, तो उन्होंने माता प्रसाद जी से पद छोड़ने को कहा लेकिन उन्होंने आडवाणी की मांग को दरकिनार कर दिया था।

सादगी की प्रतिमूर्ति रहे माता प्रसाद ने राजनेताओं को आईना दिखाया है आज के दौर में जहां एक बार विधायक या मंत्री बनते ही नेतागण गाड़ी बंगले के साथ लाखों-करोड़ों में खेलने लगते हैं। वही पांच बार विधायक, दो बार एमएलसी, नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में उत्तरप्रदेश के राजस्व मंत्री और राज्यपाल रहे माता प्रसाद पैदल या रिक्शे पर बैठे बाजार से सामान खरीदते देखे जाते थे। पैदल चलना उनको बहुत पसंद था।

 साहित्यकार के रूप में थी खास पहचान

माता प्रसाद जी की पहचान साहित्यकार के रूप में भी थी। उन्होंने अपने जीवन में कई रचनाएं की। एकलव्य खंडकाव्य, भीम शतक प्रबंध काव्य, राजनीति की अर्थ सतसई, परिचय सतसई, दिग्विजयी रावण जैसी काव्य कृतियों की रचना की। साथ ही उन्होंने अछूत का बेटा, धर्म के नाम पर धोखा, वीरांगना झलकारी बाई, वीरांगना उदा देवी पासी, तड़प मुक्ति की, धर्म परिवर्तन प्रतिशोध, जातियों का जंजाल, अंतहीन बेड़ियां, दिल्ली की गद्दी पर खुसरो भंगी जैसे नाट्य भी लिखे थे। उन्होंने अपने जीवन में तकरीबन 50 पुस्तकें लिखी। इनकी आत्मकथा “झोपड़ी से राजभवन तक” है।

(फोटो क्रेडिट- सम्यक प्रकाशन)

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