बहुजन बनाएंगे रिकार्ड, सौ फीट की बुद्ध प्रतिमा लगाने की तैयारी

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 दुनिया भर के बुद्ध प्रेमियों के लिए 30 जनवरी को कोलकाता से एक बड़ी खबर आई है। भारत की पहचान के सबसे बड़े प्रतीक भगवान बुद्ध के सबसे पवित्र मंदिर स्थल पर उनकी विशालाकाय मूर्ति स्थापित होने वाली है। बुद्ध की यह प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में है, जिसकी लंबाई 100 फुट है। इसका निर्माण कोलकाता में किया जा रहा है। इस बुद्ध प्रतिमा को इसी साल बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर 26 मई को स्थापित किया जाना है। यह प्रतिमा बिहार की बोध गया पवित्र नगरी में बुद्ध इंटरनेशनल वेलफेयर मिशन के मंदिर में स्थापित की जाएगी। लेटी हुई बुद्ध की मूर्ति विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसी लेटी हुई मुद्रा में भगवान बुद्ध का परिनिर्वारण हुआ था।

इस विशाल प्रतिमा का निर्माण कोलकाता के बदनगर के घोषापाड़ा इलाके में ‘नैनान बांधाब समिति’ मैदान में चल रहा है। मूर्ति बनाने वाले मुख्य शिल्पी श्री मिंटू पाल बताते हैं- “हमने मार्च 2019 में काम शुरू किया था लेकिन उसके बाद हमें कोविड-19 महामारी के कारण इसे रोकना रखना पड़ा। इस तरह चार महीने हमारा काम रुका रहा… हमने पिछले साल नवंबर में एक बार फिर से यह काम शुरू किया और हमें उम्मीद है कि प्रतिमा 26 मई से पहले तैयार हो जाएगी। इस समय कम से 22 कारीगर इस काम में लगे हुए हैं।’

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें निर्माण एवं स्थापना की सुविधा के लिए बुद्ध की मूर्ति का प्रत्येक हिस्सा अलग से बनाया जा रहा है और उन्हें बोधगया ले जाया जाएगा और फिर उन्हें जोड़कर भगवान बुद्ध की प्रतिमा को साकार किया जाएगा। भारत की सबसे बड़ी लेटी हुई बुद्ध की प्रतिमा के निर्माण की खबर से पूरे देश के ही नहीं दुनिया भर के बुद्ध प्रेमियों में खुशी की लहर है।

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5 फरवरी यानी हिंदू कोड बिल दिवस, इसी दिन भारतीय महिलाओं की मुक्ति की शुरूआत हुई

 डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल (5 फरवरी 1951) के माध्यम से महिलाओं की मुक्ति और समानता का रास्ता खोलने की कोशिश किया था। उन्होंने ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को पूरी तरह से तोड़ देने का कानूनी प्रावधान प्रस्तुत किया। इसके तहत उन्होंने यह प्रस्ताव किया था कि कोई भी बालिग लड़का-लड़की बिना अभिवावकों की अनुमति के आपसी सहमति से विवाह कर सकता है। इस बिल में लड़का-लड़की दोनों को समान माना गया था। इस बिल का मानना था कि विवाह कोई जन्म भर का बंधन नहीं है, तलाक लेकर पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो सकते हैं। विवाह में जाति की कोई भूमिका नहीं होगी। कोई किसी भी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर सकता है। शादी में जाति या अभिवावकों की अनुमति की कोई भूमिका नहीं होगी। शादी पूरी तरह से दो लोगों के बीच का निजी मामला है। इस बिल में डॉ. आंबेडकर ने लड़कियों को सम्पत्ति में भी अधिकार दिया था।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें इस बिल को विरोध मे तत्कालिन राष्ट्रपति राजेंन्द्र प्रसाद, संघ परिवार और उसके संगठन सभी एकजुट हो गए और कहने लेकिन कि इससे तो हिंदुओं की सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, हिंदू संस्कृति का विनाश हो जायेगा। हिंदू संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और विरोध शुरू हो गया। नेहरू भी पीछे हट गए। आखिर आंबेडकर ने निराश होकर विधि मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

 आंबेडकर का मानना है कि हिंदू महिलाओं की दासता, दोयम दर्जे की स्थिति और गरिमाहीन अपमानजनक जीवन के लिए ब्राह्मणवाद जिम्मेवार है। महिलाओं के प्रति हिंदुओं के नजरिये का सबसे गहन और व्यापक अध्ययन डॉ. आंबेडकर ने किया है। 24 वर्ष की उम्र में 1916 में अपना पहला निबंध ‘भारत में जातियां: उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ (कॉस्ट इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट) शीर्षक से कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया था। इस निबंध में उन्होंने यह स्थापित किया था कि जाति को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त यह है कि स्त्रियों की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण कायम किया जाय। इसके लिए जरूरी था कि स्त्रियों को पूरी तरह पुरूषों की अधीनता में रखा जाय। इस निबंध में आंबेडकर ने लिखा है कि सजातीय विवाह की व्यवस्था के बिना जाति की रक्षा नहीं की जा सकती है, इसीलिए जाति से बाहर विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया। विशेषकर प्रतिलोम विवाह के संदर्भ में।  सती प्रथा, विधवा प्रथा और बाल विवाह जैसी क्रूर प्रथाओं के जन्म के पीछे भी मुख्य वजह जाति की शुद्धता की रक्षा थी। जो कोई भी भारत में स्त्रियों के दोयम दर्जे के स्थिति को समझा चाहता है, उसका प्रस्थान बिन्दु यही निबंध हो सकता है। आंबेडकर अपने इस निबंध में यह स्थापित करते हैं कि जाति और स्त्री पर पुरूष का प्रभुत्व एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। आगे चलकर आंबेडकर ने इस विषय पर एक मुकम्मिल किताब लिखी कि भारत में महिलाओं की दासता और दोयम दर्जे की स्थिति के लिए ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार है। उस किताब का नाम है- ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’। इस किताब विस्तार से आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी शास्त्रों को उद्धृत करके बताते हैं कि कैसे हिंदू धर्मशास्त्र स्त्रियों की दासता और गरिमाहीन अपमानजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें

इस किताब में आंबेडकर लिखते हैं कि “भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक ऐसा युग था,जिसमें स्त्रियां सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थीं।….जनक और सुलभा, याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी आदि के संवाद यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति से पहले के युग में स्त्रियां ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी थीं।”

मनु और अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने स्त्रियों की पूरी तरह मूक पशु में बदल दिया। मनु का आदेश है कि पुरूषों को अपने घर की सभी महिलाओं को स्त्रियों को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए- अस्वतंत्रा: स्त्रिया : कार्या: पुरूषौ: स्वैर्दिवनिशम्। विषयेषु च सज्ज्न्त्य: संस्थाप्यात्मनों वशे।। ( 9,2 ) तुलसी दास भी कहते हैं कि नारी स्वतंत्र होकर विगड जाती है- ‘जिमि स्वतंत्र होई,बिगरहि नारी” मनु स्त्रियों से इस कदर अविश्वास करते हैं, घृणा करते हैं कि वे लिखते हैं – “पुरूषों में स्त्रिया न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती हैं। सुरूप हो या कुरूष, जैसा भी पुरूष मिल जाय, उसी के साथ भोगरत हो जाती हैं” (मनु, 9,14 )।

यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। राम सीता के चरित्र पर विश्वास नहीं करते हैं और सीता से कहते हैं कि रावण ने अवश्य ही तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाय होगा (इसके विस्तार के लिए बाल्मिकि रामायण का उत्तरकांड देख लें।)

‘हिंदू नारी उत्थान और पतन शीर्षक’ अपनी इसी किताब में आंबेडकर यह भी प्रमाणों के साथ स्थापित करते हैं कि बौद्ध धम्म मे स्त्रियों को समानता का अधिकार प्राप्त था। इसके लिए वे थेरी गाथों का उद्धरण देते है और अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। 1916 के अपने पहले निबंध से लेकर हिंदू कोड बिल पेश करते समय तक डॉ. आबेडकर, महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे। उनका यह मानना पूरी तरह सही था कि जैसे जाति के विनाश के साथ ही स्त्री मुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ होता है और इसके लिए ब्राह्मणवाद से पूरी तरह से मुक्ति अनिवार्य है। जाति और स्त्री की मुक्ति का प्रश्न एक दूसरे से जुड़ा है, यह सीख डॉ. आंबेडकर को अपने गुरू जाोतराव फुले से भी मिली थी। दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए ध्यान रहे, इस कानून का व्यवहार में सर्वाधिक फ़ायदा सवर्ण महिलाओं को मिलना था, और मिला। भले ही उन्हें उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में अम्बेडकर के योगदान का कोई अहसास न हो। वर्तमान समय में बहुत सारी महिला अध्येता फुले और आंबेडकर के विचारों के आलोक में भारतीय पितृसत्ता को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहने लगी हैं। इनमें उमा चक्रवर्ती और शर्मिला रेगे ( अब नहीं रहीं) जैसी अध्येता शामिल हैं। इस विषय पर शर्मिला रेेगे की किताब ‘मनु का पागलपन’ ( मैडनेस ऑफ मनु ) जरूर ही पढ़ना चाहिए।

 किसान आंदोलन के पक्ष में यूपी के दौरे पर प्रियंका गांधी

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 कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने किसान आंदोलन के बीच किसानों को नैतिक समर्थन देने का फैसला लिया है। वे आज 4 फरवरी सुबह ही किसान आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसान समर्थक एवं प्रदर्शनकारी श्री नवरीत के घर उत्तर प्रदेश के रामपुर जा रही हैं। नवरीत की मौत ट्रैक्टर परेड के दौरान के दौरान हो गयी थी। नवरीत किसान आंदोलन का समर्थन करने के लिए आस्ट्रेलिया से भारत आए थे।

किसान पक्ष का कहना है की उनकी मौत गोली लगने से हुई है लेकिन पुलिस का कहना है कि नवरीत की मौत ट्रैक्टर पलटने से लगी चोट के कारण हुई है। इस मुद्दे पर किसानों में भारी गुस्सा है और वे न्याय की मांग कर रहे हैं। इसी मुद्दे पर किसानों का दर्द साझा करने के लिए प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में रामपुर ज़िले के बिलासपुर के गांव डिबडिबा गाँव की तरफ निकल चुकी हैं। प्रियंका की इस अचानक होने वाली यात्रा के गहरे राजनीतिक मतलब निकाले जा रहे हैं।

बीते कुछ दिनों में किसान नेता राकेश टिकैत की भावुक अपील के बाद किसान आंदोलन में नई जान आ गयी है। टिकैत के आंसुओं से न केवल आंदोलन को संजीवनी मिल गयी है बल्कि एक सर्वमान्य नेता भी मिल गया है। इस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद अचानक हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लाखों-लाख किसान सरकार के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं। इस सबके बीच कांग्रेस ने राजनीतिक वातावरण में संभावित बदलाव को भांप लिया है।

जींद में मंगवार (3 फरवरी) को हुई किसान महापंचायत में हजारों किसानों को संबोधित करते हुए टिकैत ने कहा है कि ‘कानून वापसी नहीं हुई तो गद्दी वापसी होगी’। टिकैत की इस धमकी के बड़े राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के किसानों में सत्तारूढ़ केंद्र एवं राज्य सरकार के खिलाफ रुझान बन रहा है। राजनीतिक विश्लेषक यह कयास लगा रहे हैं कि इसी रुझान का लाभ लेने के लिए प्रियंका ने नवरीत की मौत के मुद्दे पर जमीन पर उतरने का फैसला लिया है।

बजट 2021 : मौत और अकाल के आहट पर चुप्पी

 भारत सरकार का बजट 2021 कोविड महामारी के साये में आया है। पिछले एक साल से दुनिया के अन्य देशों की तरह ही भारत का जन-जीवन लगभग थमा हुआ है। ग़रीब और मध्यम आय-वर्ग के लोगों में हाहाकार मचा हुआ है। करोड़ों लोग पूरी तरह बेरोज़गार हो गये हैं तथा लाखों-लाख लोगों को आय में भारी कमी का सामना करना पड़ा है। लॉकडाउन के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी भूख से संबंधित आँकड़ों के आधार पर ऑक्सफैम ने अनुमान लगाया था कि लॉकडाउन के कारण 2020  का अंत आते-आते  दुनिया में हर दिन 6 से 12 हजार अतिरिक्त लोगों की मौत होने लगेगी। मौत का यह तांडव शुरू हो चुका है और दिनों-दिनो चुपचाप यह अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है। ये लोग पिछले एक साल में बढ़ी ग़रीबी के कारण मर रहे हैं। जो कोविड से होने वाली मौतों के आधिकारिक आँकड़ों से भी बहुत ज़्यादा है।

दुनिया पर भयावह अकाल का काला साया मँडरा रहा है। इसे कोविड-19 अकाल कहा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य राहत एजेंसी (WEP) इस बारे में लगातार चेतावनी जारी कर रही है। कहा जा रहा है कि यह पिछली एक सदी के सबसे भयावह अकालों में से एक होगा, जो दुनिया के ग़रीब और विकासशील देशों  तथा युद्धग्रस्त इलाक़ों पर क़हर की तरह बरपेगा। इस अकाल में भूख के एक नये एपिक सेंटर के रूप में भारत के उभरने की आशंका है। भारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक  सर्वेक्षण  से लगता है। इस  सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं। लेकिन इन सूचनाओं से  भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्राय: निरपेक्ष है। भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया व शहरी पब्लिक स्फीयर्स में ग़रीबों की सड़ती हुई लाशों की बदबू नहीं पहुँच रही है। संभवत: सदियों से मौजूद सामाजिक असमानता की हमारी विरासत ने भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक असमानता और सामाजिक-अलगाव की खाइयों को इतना चौड़ा कर दिया है कि हम एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग व बेज़ार बने रह सकते हैं।

इस अलगाव की मौजूदगी भारत सरकार के इस साल के बजट और उस पर मीडिया में होने वाली चर्चाओं में भी दिख रही है। एक फरवरी को पेश किए गये बजट में भारत सरकार का ज़ोर इस पर है कि किस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को कोविड से हुए नुक़सान से उबारा जाए। इसके लिए देश की अनेक परिसंपत्तियों और संस्थाओं को निजी पूँजीपतियों के पास बेचने के प्रावधान किए गये हैं। सरकार के इन प्रावधानों पर ही मीडिया की चर्चाएँ केन्द्रित हैं। कुछ लोग इसे उचित, आवश्यक और पहले से चल रहे ‘आर्थिक सुधारों’ की अगली कड़ी मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इस सरकार को ‘देश बेच देने वाली सरकार’ कह रहे हैं। वित्त मंत्री ने अपने बजट-भाषण में कोविड-टीका की उपलब्धता तथा इसके लिए बजट में किए गये प्रावधानों का विस्तार से ज़िक्र किया और देश को डिज़िटल बनाने पर ख़ास बल दिया। चर्चा इसके भी पक्ष-विपक्ष में हो रही है। लेकिन इस बीच यह सवाल पूरी तरह ग़ायब है कि बजट में लॉकडाउन से उपजी भुखमरी और आसन्न अकाल का कोई ज़िक्र तक क्यों नहीं है?

इस बजट के आने से कुछ ही दिन पहले ऑक्सफेम ने ‘असमानता का वायरस’ (The Inequality Virus) नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कोविड-19 ने दुनिया के सभी देशों में असमानता को बहुत तेज़ी से बढ़ाया है। दुनिया के 1,000 धनकुबेरों (सुपर-रिच) की संपत्ति में इस दौरान बेहतहाशा वृद्धि हुई। दुनिया में जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई तो उन दिनों शेयर बाज़ार तेज़ी से लुढ़का, जिससे इन धनकुबेरों को थोड़े समय के लिए कुछ आभासी नुक़सान होता दिखा, लेकिन दुनिया में लॉकडाउन की समाप्ति से पहले ही इनकी संपत्ति न सिर्फ़ लॉकडाउन से पूर्व की स्थिति में पहुँच गयी3 बल्कि उन्होंने उस दौरान इतना धन बनाया, जितना पिछले कई सालों में नहीं कमा सके थे। धन का यह केन्द्रीकरण मुख्य रूप से दुनिया को डिज़िटल बनाने की क़वायदों के कारण संभव हो सका। स्वास्थ्य और वैक्सीन व कुछ अन्य क्षेत्रों में व्यापार करने वाले लोगों ने भी उस बीच ख़ूब पैसा बनाया। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान वैश्विक धनकुबेरों की संपत्ति 19 प्रतिशत बढ़ी। इस अवधि में दुनिया के सबसे अमीर आदमी जेफ बेजोस की संपत्ति में 185.5 बिलियन यूएस डॉलर की वृद्धि हुई। 18 जनवरी, 2021 तक एलोन मस्क की संपत्ति बढ़कर 179.2 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गयी थी। गूगल के संस्थापक सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज और माइक्रोसॉफ्ट के पूर्व सीईओ स्टीव बाल्मर जैसे अन्य टेक दिग्गजों की संपत्ति में मार्च 2020 के बाद से 15 बिलियन डॉलर की बढ़ोत्तरी हुई। ज़ूम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक युआन की संपत्ति इस दौरान बढ़कर 2.58 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गयी।

भारत में भी इस दौरान आर्थिक-क्षेत्र में कुछ ऐसा घटित हो रहा था, जिसका अनुमान किसी को नहीं था। लॉकडाउन के दौरान भारत के धनकुबेर अरबपतियों अपनी कमाई में अकूत वृद्धि कर रहे थे। कोविड राहत के नाम पर जहाँ सरकारी पैसा उनकी जेब में पहुँच रहा था, वहीं घरों में बंद आम जनता की जेब में बची-खुची रक़म भी निकलकर उन्हीं धनकुबेरों के पास पहुँच रही थी। भारत में इस समय 119 अरबपति हैं, जिनमें मुकेश अम्बानी, गौतम अडानी, शिव नादर, साइरस पूनावाला, उदय कोटक, अज़ीम प्रेमजी, सुनील मित्तल, राधाकृष्ण दामनी, कुमार मंगलम बिरला और लक्ष्मी मित्तल शामिल हैं। मुकेश अंबानी इस दौरान भारत और एशिया में सबसे अमीर व्यक्ति के रूप में उभरे। उन्होंने महामारी के दौरान 90 करोड़ प्रति घंटे कमाए जबकि देश में लगभग 24 प्रतिशत लोग लॉकडाउन के दौरान महज़ 3,000 प्रति माह कमा रहे थे।

इन 119 लोगों की समेकित संपत्ति में लॉकडाउन के दौरान 35 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। कुल मिलाकर इन लोगों ने इस दौरान लगभग 13 लाख करोड़ कमाये। यह रक़म कितनी है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इतने पैसे को अगर ग़रीबों में बाँटा जाए तो भारत के निर्धनतम लगभग 14 करोड़ लोगों में से हर एक को 94 हज़ार रूपये का चेक दिया जा सकता है। सिर्फ मुकेश अंबानी ने लॉकडाउन के दौरान जितना धन कमाया है, उससे अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत उन 40 करोड़ लोगों को कम से कम पांच महीने के लिए गरीबी रेखा के उपर रखा जा सकता है, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपनी नौकरियाँ गंवा दीं।

दूसरी ओर, इस अवधि में  भारत में 12 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी के कगार पर पहुँच गये। मध्यवर्ग के लिए बैंकों से लिया गया लोन चुकाना मुश्किल हो गया और लाखों परिवार क़र्ज़दाताओं की धमकियों से तंग आकर सामूहिक आत्महत्या करने तक का विचार कर रहे हैं। सरकार ने मध्य वर्ग द्वारा क़र्ज़ पर कुछ और समय के लिए मॉनेटेरियम दिए जाने की माँग को भी अनसुना कर दिया है। बजट से पूर्व इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले में सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता क़र्ज़दाताओं के प्रति दिखायी। सरकार ने कोर्ट में यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिये कि अगर वह मॉनेटोरियम का फै़सला करती है तो इससे बैंकों में पैसा लगाने वाले पूँजीपतियों का विश्वास सरकार में कमज़ोर होगा। परिणामस्वरूप दर्जनों परिवारों के सामूहिक आत्महत्या की ख़बरें इस बीच आयीं और लाखों परिवार बैंकों व अन्य क़र्ज़दाता संस्थाओं के एजेंटों की गालियाँ सुनने, मार खाने और सरे-बाज़ार अपमानित होने के लिए मजबूर हैं। भारत सरकार का यह बजट इन समस्याओं के बारे में भी पूरी तरह मौन है।

चुप्पी का हालिया इतिहास

सिर्फ़ सरकार ही नहीं, अख़बार भी चुप हैं। यह चुप्पी लगभग तीन दशक पुरानी है। 1990 में बाज़ार केन्द्रित उदार अर्थ-व्यवस्था के आगमन के बाद से ही धीरे-धीरे आर्थिक असमानता संबंधी सवालों को दरकिनार किया जाने लगा था। वर्ष 2000 तक भारत में सिर्फ़ 9 अरबपति थे, 2017 में इनकी संख्या बढ़कर 101 हो गयी थी और जैसा कि पहले ज़िक्र हुआ, आज इनकी संख्या 119 है। एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2017 में देश द्वारा उत्पादित कुल धन का 73 फ़ीसदी देश के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की जेब में पहुँच रहा था। 2018-19 के वित्तीय वर्ष में देश के संपूर्ण वार्षिक बजट में निर्धारित राशि से अधिक धन इन धनकुबेरों के पास था। कोविड नामक वैश्विक आपदा के दौरान ये धनकुबेर पूरी र्निलज्जता से न सिर्फ़ अपना ख़ज़ाना भरते रहे बल्कि इनकी संस्थाओं ने पर्दे के पीछे से कोविड के नाम पर भयादोहन का व्यापार चलाया। इन अरबपतियों के अतिरिक्त, आर्थिक और सामाजिक शीर्ष पर मौजूद भारत के 10 फ़ीसदी लोगों का क़ब्ज़ा देश की कुल संपदा का 77 फ़ीसदी हिस्से पर है। शेष 90 फ़ीसदी आबादी के पास महज़ 23 फ़ीसदी संपदा है। इस असमानता को कम करने का एक कारगर तरीक़ा ‘वेल्थ टैक्स’ लगाया जाना है। यानी, बहुत अमीर लोगों पर उनकी संपत्ति और कमाई के अनुसार कुछ अधिक कर लगाया जाए।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें आपको याद होगा कि महामारी के शुरू में ही भारतीय राजस्व सेवा के कुछ तेज़-तर्रार, संवेदनशील अधिकारियों ने इस प्रकार का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था। उस समय दिल्ली, मुंबई, सूरत जैसे औद्योगिक नगरों से प्रवासी मज़दूर गाँव की ओर पैदल जाने के लिए मजबूर हुए थे और चलते-चलते थकान के कारण उनमें से सैकड़ों लोगों की मौत की ख़बरें आ रही थीं। इस बीच ताज़ा हवा के झोंके की तरह एक ख़बर यह भी आयी कि भारतीय राजस्व सेवा के 50 अधिकारियों ने ‘आईआरएस एसोसिएशन’ के ट्विटर एकाउंट पर एक रिपोर्ट तैयार करने की सूचना दी है। उन अधिकारियों ने उसे ‘फ़ोर्स’ (राजकोषीय विकल्प और कोविड-19 महामारी के लिए प्रतिक्रिया) शीर्षक नाम दिया था।

यह एक प्रकार से उन अधिकारियों की ओर से व्यक्तिगत तौर पर सरकार को दिए जाने वाले सुझावों का एक ख़ाका था, जिसमें कहा गया था कि “ऐसे समय में तथाकथित अत्यधिक अमीर लोगों पर बड़े स्तर पर सार्वजनिक भलाई में योगदान करने का सबसे अधिक दायित्व है”। उन अधिकारियों ने अमीर लोगों के लिए आयकर की दर को बढ़ाने और एक निश्चित राशि से अधिक की कमाई करने वाले लोगों पर चार फ़ीसद का कोविड राहत सेस ( Covid-Relief Cess) लगाने की सिफ़ारिश की थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि  रिटर्न दाख़िल नहीं करने, स्रोत पर टैक्स (TDS) कटौती नहीं करने या उसे रोक कर रखने, फ़र्ज़ी नुक़सान के क्लेम के ज़रिये टैक्स देनदारी कम करके दिखाने के कई मामले सामने आते रहते हैं। ऐसे में एक करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक आय वाले लोगों पर 30 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत टैक्स लगाया जाए। इसके अलावा पाँच करोड़ से अधिक की सालाना आय वाले लोगों पर प्रॉपर्टी टैक्स या वेल्थ टैक्स लगाया जाए। 

वे अधिकारी न कम्युनिस्ट थे, न ही व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव चाहने वाले सामाजिक क्रांतिकारी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा था कि इस प्रकार का टैक्स थोड़े समय के लिए लगाया जा सकता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। ग़रीब और मध्यम वर्ग के हाथ में थोड़ा पैसा आ सकेगा और वाणिज्य-व्यापार की गाड़ी फिर से पहले की तरह दौड़ सकेगी। इस तरह की बातों की शुरुआत करना भी किस प्रकार एक नये सिलसिले को जन्म दे सकता है, इसे इन धनकुबेरों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।

‘फ़ोर्स’ की जानकारी सामने आते ही धन-पशुओं ने हडकंप मचा दिया। मीडिया में इन प्रस्तावों को अधिकारियों की अनुशासनहीनता कहा गया। अख़बारों में लेख लिखे गये, जिसमें बताया गया कि किस प्रकार इससे अमीर लोग भारत से नाराज़ हो जाएँगे और किस प्रकार इस प्रकार के प्रावधान से टैक्स की चोरी को बढ़ावा मिलेगा। सरकार भी तुरंत ही हरकत में आयी और इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ जाँच बिठाई गयी। आनन-फानन में  भारतीय राजस्व सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को इसके लिए दंडित करते हुए उनके पदों से हटा दिया गया। सरकार ने कहा कि इस प्रकार की बात उठाने वाले युवा अधिकारियों के दोष से ज़्यादा दोष उन वरिष्ठ अधिकारियों का है, जिन्होंने उन्हें इस प्रकार की रिपोर्ट तैयार करने के लिए उकसाया।5 वे अधिकारी थे- आयकर विभाग, दिल्ली के मुख्य आयुक्त प्रशांत भूषण, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के निदेशक प्रकाश दुबे और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के उत्तर पूर्व क्षेत्र के निदेशक संजय बहादुर।यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें

उन अधिकारियों की संवेदनशीलता, अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी को किसी ने नहीं सराहा। न उनके पक्ष में कोई संपादकीय लिखा गया, न ही टीवी चैनलों पर कोई बहस चली जिसमें यह सवाल उठाया जाता कि उन्होंने न तो सरकार की आलोचना की थी, न ही कोई टैक्स अपनी मर्ज़ी से लगा दिया था तो  क्या सरकार को सुझाव देना भी अनुशासनहीनता मानी जानी चाहिए? क्या अगर कोई अधिकारी ग़रीब या मध्यम वर्ग पर किसी प्रकार के टैक्स का सुझाव देता, तब भी उसे अनुशासनहीनता मानी जाती?

अख़बार ही नहीं, इन अधिकारियों के पक्ष में न तो सिविल सोसाइटी संगठन आया, न ही कोई जातीय-धार्मिक संगठन। न तो कम्युनिस्ट पार्टियाँ उनके पक्ष में बोलीं, न समाजवादी, और न ही आम्बेकरवादी-सामाजिक न्यायवादी। किसी ने आज तक उनकी तारीफ़ में यह तक नहीं कहा कि उन कर्मठ अधिकारियों ने हमारे स्वप्नदर्शी कम्युनिस्ट साथियों और आँकड़ों की भविष्यवाणियाँ करने वाले अर्थशास्त्रियों से पहले समझ लिया था कि आने वाले महीनों में किस प्रकार धन का केन्द्रीकरण और तेज़ होगा।

 यहां Click कर दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए बहरहाल, जिस प्रकार की नयी दुनिया का सपना ये धनकुबेर देखते हैं, उसमें जो एक चीज़ वे नहीं रखना चाहते हैं, वह है- सवाल। वे सवाल-विहीन दुनिया चाहते हैं। वे एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें सबके पास खाना, कपड़ा और छत हो। लेकिन यह सवाल न हो कि इतनी असमानता क्यों है, क्यों दुनिया के अधिकांश लोगों को जीवन भर ज़रूरत से ज़्यादा तनावग्रस्त रहना पड़ता है, अथवा यह कि क्यों किसी के चेहरे पर ख़ुशी नहीं दिखती? क्यों कुछ लोग रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं? क्यों कुछ मानव समुदाय चुपचाप खत्म होते जा रहे हैं?  अगर उनके सपनों से नयी दुनिया को बचाना है तो हमें हर क़ीमत पर ऐसे सवालों का वजूद बचाए रखना होगा, उनके ख़िलाफ़ जाने वाले हर विवेकसम्मत सवाल का स्वागत करना होगा, चाहे वे सवाल किसी भी ख़ेमे से उठ रहे हों।

संदर्भ 1. Oxfam Media Briefing, “The Hunger Virus: How Covid-19 Is Fuelling Hunger In A Hungry World” July 9, 2020 2. Shagun Kapil (2020) “COVID-19 lockdowns may be over but poor still go hungry”, Down to Earth, December 09 3. Reliefweb (2021) “The Inequality Virus: Bringing together a world torn apart by coronavirus through a fair, just and sustainable economy”, Jan 25 4. Esmé Berkhout, Nick Galasso, Max Lawson et al., “The Inequality Virus”, Oxfam, January 25, 2021 5. CNBC, “Taxes are likely to go up for the wealthy in these nine states”, SEP 25 2020 6. Washington state legislature Bill-HB 1406 – 2021-22 “Improving the equity of Washington state’s tax code by creating the Washington state wealth tax and taxing extraordinary financial intangible assets” 7.Americansfortaxfairness.org, “Washington Billionaires Got $151 Billion Richer Over First 10 Months of Pandemic, Their Collective Wealth Jumping Nearly One-Half”, February 2, 2021 8. “Finance Ministry Slams IRS Officers’ Proposal on Levying a COVID-19 Wealth Tax.” The Wire, 27 Apr. 2020, the wire.in/economy/finance-ministry-irs-officers-covid-19-wealth-tax.

यह लेख सर्वप्रथम दिल्ली से प्रकाशित वेबपोर्टल ‘जन ज्वार’ में उनके साप्ताहिक कॉलम नई दुनिया’ में प्रकाशित हुआ है।


नागरिकता संशोधन कानून पर सरकार ने कदम खींचा, संसद में दिया यह बयान

 ऐसे में जब देश भर में किसान आंदोलन की धमक पहुंच चुकी है, लगता है सरकार फिलहाल कोई दूसरा विवाद नहीं होने देना चाहती है। केंद्र की मोदी सरकार ने दो फरवरी को लोकसभा में कहा कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए), 2019 को लागू करने में और समय लगेगा। सरकार ने कहा है कि नियमों उपनियमों के निर्माण की तैयारी चल रही है। सरकार ने गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति को यह भी बताया कि उसने पूरे राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने के बारे में भी अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। यहाँ नोट करना चाहिए कि सीएए अधिनियम, 2019 को 12 दिसंबर, 2019 को अधिसूचित किया गया था और यह 10 जनवरी 2020 से लागू हुआ था। इस विवादित एक्ट के तहत नियम तैयार किए जा रहे हैं। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा को लिखित जवाब में कहा संबंधित नियमों को बनाने के लिए 9 अगस्त, 2021 तक का समय बढ़ा दिया है। बीते साल इस कानून के आते ही सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। आसाम राज्य का उदाहरण बताता है कि इस कानून से मुसलमानों की बजाय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों की नागरिकता एवं पहचान पर सबसे बुरा असर पड़ा है। इसीलिए बहुजन खेमे में यह धारणा बन चुकी है कि असल में यह कानून भारत के ओबीसी, दलितों एवं आदिवासियों सहित अल्पसंख्यकों के खिलाफ बनाया गया है। पिछले साल इस कानून के खिलाफ शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन पूरे देश में सुलग उठे थे। लॉकडाउन के कारण ये आंदोलन खत्म हो गए थे। लेकिन इस साल किसान आंदोलन ने सरकार को भारी चुनौती दी है जिसके कारण सरकार बैकफुट पर आ रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद इसी कारण सरकार की लोकप्रियता घट रही है और आगामी महीनों में विधानसाभा चुनावों के मद्देनजर सरकार नागरिकता संशोधन कानून को मुद्दा बनाकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती है।

फोटो क्रेडिट- नवभारत टाइम्स

किसान आंदोलन बना अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा, मोदी सरकार की भारी किरकिरी

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 किसान आंदोलन की खबरों को दबाने की सरकार एवं मनुवादी मीडिया की कोशिश को एक करारा झटका लगा है। भारत का किसान आंदोलन अब एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। किसान आंदोलन के मुद्दे पर ब्रिटेन की मशहूर पॉप स्टार रिहाना के ट्वीट के बाद यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। इसके अलावा ब्रिटेन के सिख सांसद तनमनजीत सिंह धेसी सहित अन्य मशहूर हस्तियों ने किसान आंदोलन के मुद्दे पर अपनी राय रखी हैं।

ब्रिटिश पॉप स्टार रिहाना ने अपने ट्विटर अकाउंट से अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी सीएनएन से किसान आंदोलन पर प्रकाशित हुई एक स्टोरी का लिंक शेयर किया है। लिंक शेयर करते हुए उन्होंने टिप्पणी की है “आख़िर हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?” इस ट्वीट के साथ उन्होंने हैशटैग #FarmersProtest भी लगाया है जिससे पूरी दुनिया में मौजूद रिहाना को फालो करने वाले उनके प्रशंसकों में भारत के किसान आंदोलन के बारे में जानने की होड़ लग गई है। आलम यह है कि रियाना के इस ट्वीट का भारी असर पड़ता दिख रहा है। ट्विटर पर रिहाना के 101 मिलियन फॉलोवर हैं।

 भारतीय किसान आंदोलन के नेताओं ने इस ट्वीट को लेकर खुशी जाहिर की है। किसान एकता मोर्चा (@Kisanektamorcha) ने अपने ट्विटर हैंडल से रिहाना को धन्यवाद करते हुए ट्वीट किया गया है। @Kisanektamorcha ने ट्वीट किया है “शुक्रिया रिहाना, किसानों के आंदोलन के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए। पूरी दुनिया देख पा रही है लेकिन सरकार क्यों नहीं देख पा रही?”

दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर पूरी दुनिया में नाम कमा चुकी ‘ग्रेटा थनबर्ग’ ने भी भारतीय किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए ट्वीट किया है। इससे साफ है कि अब दुनिया भर की नजर किसान आंदोलन पर है। और विदेशों तक में मोदी सरकार की किरकिरी शुरू हो गई है।

किसानों के मुद्दे पर राज्यसभा में संग्राम

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 राज्यसभा में किसानों के मुद्दे पर बुधवार संग्राम देखने को मिला। सदन की कार्यवाही शुरू होने के कुछ समय बाद ही आम आदमी पार्टी के तीन सांसदों को निलंबित कर दिया गया। आप के सांसद किसान आंदोलन के मुद्दे को उठाते हुए वेल में पहुंच गए। सभापति ने आप सांसदों के नारेबाजी व हंगामे को देखते हुए उन्हें निलंबित कर दिया। आप सांसदों को मार्शल के जरिये सदन से बाहर किया गया। तीनों सांसदों को सदन की कार्यवाही से दिनभर के लिए निलंबित किया गया।

 इससे पहले तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के आंदोलन के मुद्दे पर राज्यसभा की कार्यवाही को पांच मिनट के लिए स्थगित किया गया। कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर सभापति वेंकैया नायडू ने AAP के तीन सांसद संजय सिंह, सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को सदन से बाहर जाने नोटिस दिया। इसके बाद सहयोग ना मिलने पर तीनों सदस्यों को मार्शल बुलाकर सदन से बाहर किया गया। इस दौरान राज्यसभा अध्यक्ष वैंकैया नायडू के तेवर काफी सख्त रहें। उन्होंने आप सांसदों के रवैये को तानाशाही वाला बताया। इससे पहले कांग्रेस सांसद गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा ने किसान आंदोलन के मुद्दे को लेकर स्थगन की कार्यवाही स्थगित करने का नोटिस पेश किया। बसपा, सीपीआई, टीएमसी, डीएमके, सीपीआई-एम ने भी स्थगन प्रस्ताव रखा।

दक्षिण एशिया से आधी शताब्दी पीछे है अमेरिका

 20 जनवरी 2021, को कमला हैरिस ने अमेरिका की पहली महिला उप राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेकर एक प्रकार का इतिहास रचा। वो पहली अश्वेत, दक्षिण एशिया की महिला हैं जिन्हे यह सम्मान मिला है। यह अमेरिकियों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण हो सकता है। परन्तु अगर इस इतिहास का बारीकी से परीक्षण किया जाय तो यह अमेरिका के लोकतंत्र में इतना भी ऐतिहासिक क्षण नहीं है जितना अमेरिकी जश्न मना रहा है।संयुक्त राज्य अमेरिकादुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है। अगर हम यहाँ लोकतंत्र की शुरुआत 1788 से ही माने, जब अमेरिकी संविधान को राज्यों द्वारा अनुमोदित किया गया था तो हम पाएंगे की लोकतंत्र के 333 साल पुराने इतिहास में अमेरिका ने अभी तक एक भी महिला को राष्ट्र के सर्वोच्च पद के लिए नहीं चुना।

अमेरिका की इस सफलता को हम ज़्यादा बड़ा करके इसलिए भी नहीं आंक सकते क्योंकि दक्षिण एशिया की तुलना में अमेरिका की यह सफलता लगभग 60 साल बाद आई है। यहाँ यह याद रहे की दक्षिण एशिया के एक छोटे से उभरते हुए लोकतंत्र श्रीलंका (जिसे उस समय सिलौन कहा जाता था) में 1960 में एक महिला को राज्य के प्रमुख के रूप में शपथ दिलाई गई थी।

अमेरिका की तुलना में भारत को ही ले लें तो यहाँ भी 1966 अर्थात लगभग अर्ध-शताब्दी पहले एक महिला को राष्ट्र की चुनी हुई सरकार का लीडर बना दिया गया था। इतना ही नहीं दक्षिण एशिया के ही  पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी अमेरिका की तुलना में लगभग तीस वर्ष पहले 1988 और 1991 में  किसी महिला को देश के प्रमुखों के रूप में शपथ दिलाई गई थी। परन्तु आज भी अमेरिका के लोकतंत्र में देश के प्रमुख राष्ट्रपति के रूप में किसी महिला को शपथ नहीं दिलाई गयी है। इस आधार पर हम आसानी से कह सकते हैं कि विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र दक्षिण एशिया के लोकतांत्रिक देशों से कम से कम आधी शताब्दी पीछे है।

तथ्यात्मक दृष्टि एवं सटीक जानकारी के लिए दक्षिण एशिया में21 जुलाई 1960 को, सिरिमाओ भंडारनायके,  दुनिया की पहली महिला राष्ट्र प्रमुख बनीं। उन्होंने अपने देश पर तीन अलग-अलग अवसरों पर 17 साल तक शासन किया और इतिहास रचा। श्रीलंका के बाद भारत की इंदिरा गांधी जनवरी 1966 में सरकार की महिला प्रमुख बनी। उन्होंने भी 31 अक्टूबर 1984 को अपनी हत्या होने से पहले, विभिन्न अवसरों पर, लगभग 15 वर्षों तक देश पर शासन किया। इंदिरा गाँधी को अपने समय में अपने राजनैतिक दल पर पूरा अंकुश ही नहीं देश की राजनीति पर भी पूरा एकछत्र आधिपत्य था। क्या हम कमला हैरिस के बारे में ऐसा सोच सकते हैं।

दक्षिण एशिया में, पाकिस्तान में भी बेनजीर भुट्टो 2 दिसंबर 1988 को राज्य की प्रमुख बनीं। वास्तव में वे दुनिया के मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों में किसी भी राज्य की पहली महिला प्रमुख बनी जिन्होंने ऐसा कारनामा किया। वह 1993-1996 के दौरान दूसरी बार भी पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। दूसरी ओर, मुस्लिम वर्ल्ड में ही खालिदा जिया ने 20 मार्च 1991 को बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और 23 जून, 1996 को एक अन्य महिला, शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली दूसरी महिला बनीं। शेख हसीना वर्तमान समय में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाली बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं।

दक्षिण एशिया में राज्य की महिला प्रमुखों की विरासत को सिरिमाओ भंडारनायके की बेटी, चंद्रिका कुमारतुंगा ने आगे बढ़ाया, वो नवंबर 1995 में श्रीलंका की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं, लेकिन 1999 में उनकी हत्या के प्रयास के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी।यहां, भारत और नेपाल जैसे दक्षिण एशियाई देशों के प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित औपचारिक प्रमुखों के नामों का उल्लेख किया जाना भी समीचीन होगा।उदाहरण के लिए, प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने जुलाई 2007 में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में जबकि विद्या देवी भंडारी ने अक्टूबर 2015 में नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। क्या अमेरिका में अभी तक ऐसा संभव हुआ है? क्या अमेरिका में अश्वेत, लेटिनो, रेड इंडियन,  मुस्लिम और दक्षिण एशिया में दलित-आदिवासी, पासमंदा महिलाएँ सर्वोच्च पदों पर पहुँच सकती हैं?

अमेरिका और दक्षिण एशिया में महिलाओं का देश के सर्वोच्च पद पर चुने जाने के मध्य कुछ चुनौतियों को भी यहाँ रेकखांकित किया जाना सामाजिक आंदोलन एवं सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से आवश्यक है।एक ओर यदि अमेरिका को अपनी पहली महिला को राष्ट्र के सर्वोच्च पद के लिए निर्वाचित करने में सफल होना है, तो वहीं दूसरी ओर दक्षिण एशिया में एक आत्मनिर्भर महिला को देश के सर्वोच्च पद पर चुनाव में सफल होना बाकी है। यहां आत्मनिर्भर का तात्पर्य है बिना किसी भी राजनीतिक संरक्षण एवम् राजनैतिक परिवार की पृष्ठभूमि के।

हम जानते हैं कि दक्षिण एशिया में राष्ट्र की प्रमुख महिला के रूप मे चयनित महिलाओं ने अपने पिता या पति की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है। उदाहरण के तौर पर,1959 में सिरिमाओ भंडारनायके अपने पति स्व. आर. आर भंडारनायके की हत्या की सहानुभूति की लहर की सवारी करते हुए आईं। उसी कड़ी में 1981 में अपने पति की हत्या के बाद खालिदा जिया ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी को आगे बढ़ाया। इसी तरह, इंदिरा गांधी, बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना, सभी ने अपने पिता क्रमशः जवाहरलाल नेहरू, जुल्फिकार अली भुट्टो और शेख मुजीबुर रहमान, की विरासत को हीआगे बढ़ाया है। श्रीलंका में चंद्रिका कुमारतुंगा को तो माता और पिता दोनों की ही विरासत मिली।

समकालीन राजनीति, सामाजिक परिवर्तन, एवं सामाजिक आंदोलन के दृष्टिकोण से अगर हम अमेरिका और दक्षिण एशिया में महिलाओं के सर्वोच्च पद पर चयन का आंकलन करें तो हमे कुछ और विचारणीय बिंदु भी मिल जाएंगे। अमेरिका के सन्दर्भ में अभी पूर्ण रूप से अश्वेत एवंअश्वेत आंदोलन से- जैसे ब्लैक पैंथर्स से निकली हुई अश्वेत महिला का अमरीका की राजनीति में स्थापित होना बाकी है। कमला हैरिस उस अस्मिता का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

 यह सर्वविदित है कि पूरे अमेरिका के राष्ट्रपति में चुनावों में कमला हैरिस की माँ की दक्षिण एशियाई (भारतीय) और उनके पिता की जमैकन या आश्वेत छवि/ अस्मिता को ही उभार कर भारतीयों और एफ़्रो-अमेरिकन्स को डेमोक्रैटिक पार्टी की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया गया। परंतु अमेरिका में रह रहे  भारतीयों ने कमला हैरिस की माँ की तमिल ब्राह्मण अस्मिता से जोड़ कर अपने आप को नहीं देखा होगा ऐसा मानना अस्मिताओं के समाजशास्त्र के आधार पर सही नहीं होगा।अतः कही ना कहीं कमला हैरिस यद्यपि अमरीकी राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए तो दिखती हैं, परंतु वास्तविकता में वो बहिष्कृत, अश्वेत, ग़रीब आदि समजों का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

उसी प्रकार, श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों में जो भी महिला राजनैतिक पैदा हुई है वो भी उच्च वार्णीय/ वर्गीय समाज से ही संबंध रखती हैं। वो भी दलित, आदिवासी, पासमंदा समाज से नहीं आती। दक्षिण एशिया में, हमें यह विश्लेषण करना होगा कि क्या ये महिला नेता ने खुद दूसरी महिलाओं को अपने राजनीतिक दलों के प्रमुख रहते हुए प्रतिनिधित्व दिया था या दे रही हैं- जैसे- इंदिरा गाँधी, सिरिमाओ भंडारनायके,  बेनज़ीर भुट्टो, शेख हसीना, चंद्रिका कुमारतुंगा आदि। अगर नहीं तो हम इनका जश्न कैसे मना सकते हैं?

क्या विश्व का सबसे पुराना और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने-अपने देश की राजनीति के सार्वोच्च पदों पर बहिष्हकृत समाजों की महिलाओं को चयनित कर विश्व के अनेक देशों के लिए, विशेषकर दक्षिण एशिया के देशों के लिए, उदाहरण प्रस्तुत कर लोकतंत्र को और मजबूत करेगा? इंतजार रहेगा 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में।


तस्वीर साभार- पहली तस्वीर, गूगल, दूसरी तस्वीर- Photo Illustration by Minhaj Ahmed Rafi, वेबसाइट- Newsweek Pakistan, तीसरी तस्वीर- http://www.anindianmuslim.com

बीजेपी सरकार का नया बजट: बहुजन विरोधी बजट !

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 पुरानी कहावत है कि नाकाबिल औलादें काबिल बाप की संपत्ति को बढ़ाती नहीं बल्कि लुटाती हैं। आज की बीजेपी सरकार की नीतियाँ देखकर यह बात बहुत स्पष्ट होती जा रही है। हम देख पा रहे हैं कि आजादी के बाद बीते सत्तर सालों में जिन संस्थाओं, उद्योगों, सार्वजनिक परिसंपत्तियों आदि का निर्माण किया गया उसे बीजेपी सरकार एक एक करके निजी हाथों में बेच रही है। एक फरवरी को जारी आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सितारमण ने बहुत सारे सरकारी उपक्रमों एवं परिसंपत्तियों की हिस्सेदारी को निजी कंपनियों को बेचने (विनिवेशीकरण) की घोषणा की है। इस वित्त वर्ष में इस तरह से सरकारी संपत्ति निजी कंपनियों को बेचकर 2.1 लाख करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य रखा गया है।

वर्ष 2018-19 और 2019-20 के लिए यह लक्ष्य क्रमशः 80 हजार करोड़ एवं 1.05 लाख करोड़ रखा गया था। इस वर्ष के बजट में एलआईसी के शेयर्स को भी निजी हाथों में बेचने की योजना लागू की जानी है। इस बजट में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन एयर इंडिया, आईडीबीआई, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया, कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया, बीईएमएल और पवन हंस के निजीकरण कि योजना का घोषित की गई है। यहाँ ध्यान देना जरूरी होगा कि इन सार्वजनिक संस्थानों, विभागों में एवं औद्योगिक उपक्रमों में बड़ी संख्या में ओबीसी, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इनमें संविधान प्रदत्त आरक्षण का लाभ भी मिलता है जिससे भारत के करोड़ों गरीब बहुजनों को सही सामाजिक एवं आर्थिक प्रतिनिधित्व भी हासिल होता है। निजी कंपनियों के हाथों में जाने के बाद इन उद्योगों एवं संस्थानों आदि में बहुजनों को न तो आरक्षण का लाभ मिलेगा न ही श्रम कानूनों का कोई पालन होगा। इस प्रकार सरकार की मंशा निजीकरण द्वारा बहुजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को खत्म करने की है। इसी उद्देश्य से बीजेपी सरकार द्वारा निजीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है।

फोटो क्रेडिट- ऊपर की तस्वीर सोशल मीडिया से। तस्वीर सांकेतिक है

मोदी सरकार का नया बजट: विचित्र ‘चुनाव नीति’ और जनविरोधी ‘कबाड़ नीति’

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साल 2021-2022 के लिए आम बजट एक फरवरी को पेश हो गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट पेश करने के बाद से ही इसकी व्याख्या की जा रही है। बीजेपी सरकार द्वारा घोषित बजट में साफ नजर आ रहा है कि सरकार को पूरे भारत के आम नागरिकों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं की फिक्र नहीं है। ठीक से कहें तो यह एक यह एक ‘चुनावी बजट’ है। आने वाले चंद महीनों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल सहित पुद्दुचेरी में चुनाव होने वाले हैं। इन्हीं राज्यों के लिए इस बजट में कई सारे लोक-लुभावन प्रावधान किये गए हैं। इन प्रावधानों के जरिए इन राज्यों की जनता का मन मोहकर चुनाव जीतने की रणनीति बीजेपी सरकार के इस बजट में साफ नजर आ रही है। इन चुनावी राज्यों में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण या चाय बाग़ानों के श्रमिकों के कल्याण जैसी योजनाएं लाई जा रही हैं। अधिकांश आर्थिक एवं राजनीति विश्लेषक यह कह रहे हैं कि सिर्फ चुनावी राज्यों में निर्माण एवं कल्याण की योजनाओं की घोषणा करने का असल मकसद सिर्फ चुनाव जीतना है। इस प्रकार यह बजट आम जनता के फायदे के लिए नहीं बल्कि बीजेपी की चुनावी राजनीति के फायदे के लिए बनाया गया है। इस बजट में चार पहिया वाहनों के लिए एक नई और विचित्र कबाड़ नीति भी लाई जा रही है। इस नीति के अनुसार निजी चार पहिया वाहन 20 साल तक और व्यावसायिक वाहन 15 साल तक ही इस्तेमाल किये जा सकेंगे और इस अवधि के बाद इन्हे कबाड़ में शामिल करना होगा। असल में यह फैसला भी आम जनता की जेब पर बोझ डालकर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। नोटबंदी, जीएसटी एवं तालाबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में जो मंदी आई है उसे औटोमोबाइल उद्योग को इस तरह के नकली सहारा देकर ठीक करने की कोशिश की जा रही है।

जगदेव प्रसादः भागीदारी के सवाल को पुरजोर तरीके से उठाने वाले नायक

 भागीदारी की बात आज की नहीं है। इसका पूरा इतिहास है। आजाद भारत में पहली बार भागीदारी के सवाल पर बात संविधान की प्रस्तावना से शुरू हुई थी। उसके पहले अंग्रेजों ने सवाल उठाया था। मध्ययुग में रैदास ने उठाया(ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न, छोट-बड़े सब सम बसे, रैदास रहे प्रसन्न),इनके पहले बुद्ध के पास जा सकते हैं। उन्होंने भी समानता की बात की है। इस प्रकार बुद्ध पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भागीदारी की बात को उठाया था। आधुनिक काल में संविधान निर्माण करने वालों के मन में यह बात थी कि भारत में भागीदारी समान नहीं है। इसलिए उन्होंने संविधान में सामाजिक न्याय की बात की।

बुद्ध से चार्वाक, आजीवक, रैदास, फूले, शाहू आदि सब लोग लगातार भागीदारी का प्रश्न उठा रहे थे। इसी परंपरा को बाबा साहब आंबेडकर ने स्वीकार किया और अपने आंदोलन को आगे लेकर चले। इसी समय जगदेव प्रसाद (जन्म 2 फरवरी 1922- परिनिर्वाण- 5 सितंबर 1974) ने भी अपने दर्शन में इस परंपरा को समायोजित किया था।जगदेव बाबू को अलग करके देखने की जरूरत नहीं। वह इसी परंपरा का हिस्सा थे। वह 90 प्रतिशत की बात कर रहे थे। ‘दस का शासन 90 पर नहीं चलेगा’।’ जगदेव प्रसाद सहित हमारे सभी सामाजिक चिन्तक समस्या के मूल को समझ रहे थे। वह जान गए थे कि किसी भी देश की संरचना वहां के भूगोल और इतिहास के साथ जनमानस के सरोकरों से बनती है। भारत एक ऐसा देश है जहां जनमानस आपस में कई स्तरों पर विभाजित है। मसलन जाति-धर्म, ऊंच-नीच, छुआ-छूत, अमीर-गरीब आदि। यह विभाजन किसी की ‘जागीरदारी सोच’ को संरक्षण देता है तो किसी की ‘गुलामी और शोषण का कारण’ बनता है। इन कारणों की पड़ताल करने वालों की पहली पीढ़ी के व्यक्ति थे बाबू जगदेव प्रसाद। उनके पिता शिक्षक थे। परिवारिक स्तर बहुत उन्नत तो नहीं था, लेकिन शिक्षित होने के कारण हालात ठीक थे। अरवल के जिस कुर्था गांव (बिहार) में उनका जन्म हुआ था वहां सामंती मानसिकता वाले लोग उनके साथ जातिगत भेद-भाव करते थे। यह व्यवहार जगदेव प्रसाद को नागवार लगता था। जगदेव बाबू का परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था। आर्थिक आत्मनिर्भरता व्यक्ति को सबल बनाती है। सबलता से चेतना और स्वतंत्रता निर्मित होती है। जगदेव प्रसाद का ‘नई धोती पहनना’ और उस पर गांव के द्विज का सवाल उठाना, उनके जीवन को ही नहीं पूरे देश को दिशा दे गया। वह ऐसे चिंतक थे, जिसने बिना किसी पार्टी और स्वार्थ के मोह में फंसे शोषित समाज को एकजुट करने का प्रयास किया। उनका ‘विचार’ बहुजन की ‘नई पीढ़ी की वैचारिकी’ गढ़ रहा है। जगदेव प्रसाद अपने जीवन से सीख कर भ्रांतियों से बाहर निकले थे।उनके पिता जब बीमार पड़े तो डॉक्टर को दिखाने के बजाय उनकी तीमारदारी के लिए ‘देवी-देवताओं की उपासना’ की गई। लेकिन जब ‘देवता’ उनके पिता को नहीं बचा सके, तब आस्था और परंपरा के नाम पर होने वाले ढोंग से उनका भ्रम टूटा। तमाम पूजा-पाठ के बाद भी पिता नहीं रहे और उपरोहिता, पंडा आदि ने जगदेव प्रसाद को इसका दोषी बताया। उस मानसिकता के बारे में आप सोचिए जिसमें जगदेव प्रसाद के घर श्राद्ध के लिए आये पंडित ने यह आरोप लगाया था कि ‘जगदेव प्रसाद का कार्य है खेती-बारी करना और यह पढ़ाई कर रहा है।’ इसीलिए यह मौत हुई है। उस ब्राह्मण ने कहा था कि ‘जे अपन धरम छोड़ी ओकर यही हाल होई।’ जगदेव प्रसाद का यहां से जो मोहभंग हुआ, चेतना जगी, वही आज हमारे लिए चिंतन का केंद्र है। सत्ता और नेतृत्व का महत्व वह समझते थे। तभी पार्टी बनाकर सरकार बनाने तक पहुंचे।

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पिता की मृत्यु के बाद व्यवस्था से निराश जगदेव प्रसाद डॉ. रामस्वरूप वर्मा के ‘अर्जक संघ’ से जुड़ गए। अर्जक संघ से जुड़कर सांस्कृतिक जागरण का कार्य प्रारंभ किया। उनको समझ आ गया था कि अब सांस्कृतिक टकराहट राजनीतिक जागरूकता के साथ चलेगी। उन्होंने समझ लिया था कि समाज में बहुत ‘भेद-भाव’ है और इसकी परिकल्पना के पीछे ‘षडयंत्र’ है। उसको खत्म करने के लिए वह सक्रिय राजनीति में आये। यहां से उनके जीवन की धारा पूरी तरह बदल गई। अपने अनुभव से सीख लेकर सामाजिक न्याय को परिभाषित करते हुए वह कहते थे, ‘दस प्रतिशत शोषकों के जुल्म से छुटकारा दिलाकर नब्बे प्रतिशत शोषितों को नौकरशाही और ज़मीनी दौलत पर अधिकार दिलाना ही सामाजिक न्याय है।’ तभी उन्होंने जनता से आह्वान किया कि ‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।’ उनको पता था कि बदलाव की चाभी ‘मार्क्सवाद और समाजवाद में नहीं सत्ता के पास’ है। जबतक सत्ता में भागीदारी नहीं होगी, बदलाव नहीं आएगा।

व्यवस्था से टकराने के बाद जगदेव प्रसाद को यह समझ आ गया था कि सत्ता कुछ नहीं, बंदरबांट का ही दूसरा नाम है। पार्टी कोई भी हो, विचारधारा कोई भी हो, ज्यादातर कुछ लोगों के कब्जे में है और वही लोग उसका संचालन कर रहे हैं। मुखौटा अलग-अलग है, अंदर सब एक जैसे हैं। तभी उन्होंने ‘शोषित समाज दल’ नाम से अलग पार्टी बनाई। उस दौर में ‘समाजवाद और मार्क्सवाद का विचार समस्याओं के निदान का कैप्सूल’ बनाकर पेश किया जा रहा था। जगदेव प्रसाद शोषितों की समस्याओं का निदान समस्या की जड़ में जाकर करने के पक्ष में थे। उनका कहना था कि ‘आज का हिंदुस्तानी समाज साफ तौर पर दो भागों में बंटा हुआ है- दस प्रतिशत शोषक और नब्बे प्रतिशत शोषित। दस प्रतिशत शोषक बनाम नब्बे प्रतिशत शोषित की इज्जत और रोटी की लड़ाई हिंदुस्तान में समाजवाद या कम्यूनिज्म की असली लड़ाई है।’ उनकी नज़र में भारत का ‘असली वर्ग-संघर्ष’ यही था। उनके अनुसार इस ‘नग्न यथार्थ’ को नहीं मानने वाले ‘द्विज समाज के पोषक और जालफरेबी’ थे। आर्थिक असमानता और भागीदारी के अभाव को वह समझ गए थे। इस बात का खुलासा उन्होंने 31 जुलाई 1970 को अमरीकी अर्थशास्त्री एफ. टॉमसन को दिए साक्षात्कार में किया था। उन्होंने कहा था कि ‘अभी जो व्यवस्था है उसमें दलों का नहीं अपनी जातीय संरचना का समन्वय है। क्योंकि ‘समन्वय से शोषक को फायदा है’। लेकिन शोषित को समन्वय से नहीं ‘संघर्ष’ से फायदा होगा’। उन्होंने दो दलों की कार्यप्रणाली का उदाहरण देते हुए समझाया है कि किस तरह विभिन्न दलों और विचारधाराओं के नाम पर शोषितों को उलझाया जा रहा है और संविधान में किए गए प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह जो आपसी फूट है वह हमारी ताकत को संगठित नहीं होने देती। जगदेव प्रसाद अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे। वह जानते थे कि ‘हिंदुस्तान में आर्थिक गैरबराबरी के साथ सामाजिक गैरबराबरी भी है। सामाजिक गैबराबरी की लड़ाई इज्जत की लड़ाई है।उनका विश्वास था किसामाजिक क्रांति के बिना आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती।जब शोषितों के हाथ में सत्ता आएगी तब ‘आर्थिक गैरबराबरी’ खत्म होगी। हालांकि मंडल कमीशन के बाद उत्तरप्रदेश और बिहार में जिन दलों की सत्ता आयी, वह अर्जक और शोषित समाज के ही थे। उन लोगों ने भी काफी हद तक निराश ही किया। बहुजन व्यक्तियों द्वारा संचालित पार्टियों के दौर में भी ‘सत्ता का सुख और भोग’ उन लोगों ने ही किया, जिन पर सदियों से ‘शोषक’ होने का आरोप लगता रहा है।

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें जगदेव प्रसाद के विचार की उस जड़ को समझना जरूरी है जिसे वह 50 वर्ष पहले समझा रहे थे। सिर्फ समझा नहीं रहे थे, बल्कि उसे बिहार में अमल में ले आए थे। उनको साजिशन नहीं मारा गया होता तो संभव है कि आज की भारतीय राजनीति का परिदृश्य कुछ और होता। जब मुल्क आजाद हुआ तब यह उम्मीद लगाई गई थी कि ‘आजाद हिंदुस्तान में न कोई शोषित रहेगा और न कोई शोषक रहेगा और न कोई जुल्म बर्दाश्त करने वाला। बराबरी कायम होगी और हर इंसान को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।गैरबराबरी को देखते हुए बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘समता और समानता’ जैसे प्रावधान संविधान में करवाने की लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद भी भागीदारी नहीं मिली। कारण साफ है। जब आम चुनाव हुए और टिकट बंटवारे की बात आई तो उन्हीं ज़मींदारों/नवाबों को मौका दिया जो पहले शोषक थे। नतीजा यह हुआ कि पुरानी व्यवस्था आगे भी कायम रही।

 यहां Click कर दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए पश्चिम के देशों में जिस समानता की लड़ाई की शुरुआत हुई, वह अमीर-गरीब (बुर्जुआ-सर्वहारा) की लड़ाई थी। वहां सिर्फ अर्थ-भेद की समस्या थी। आर्थिक गैर बराबरी को ठीक करना था। भारत की स्थिति बिल्कुल अलग थी और है। यहां जाति प्रथा, ऊंच-नीच की भावना प्रबल है। अर्थात् ‘आर्थिक गैरबराबरी के साथ सामाजिक गैरबराबरी भी है। सामाजिक गैरबराबरी इज्जत की लड़ाई है। हमें विश्वास है, जबतक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तबतक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती।जगदेव बाबू का मानना था कि ‘जबतक शोषित समाज के हाथ में बागडोर नहीं आएगी तबतक आर्थिक गैरबराबरी नहीं मिटेगी।’ हिंदुस्तान का सर्वहारा हरिजन, आदिवासी, नीची जाति और पिछड़ी जाति के लोग हैं। यह आबादी में नब्बे प्रतिशत हैं। इनकी आजादी अभी तक नहीं आई है।

जगदेव प्रसाद का प्रयास इतने लंबे समय के बाद भी किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा तो इसका कारण यह है कि मान्यवर कांशी राम को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल (जातिवादी या बहुजन केंद्रित) इस भेद को नहीं समझ पाया। हालांकि कांशी राम का प्रयास भी उनके रहने तक ही था। उनके बाद के लोग ‘आत्म मुग्धता’ के कारण कांशी राम के विचारों को आगे नहीं बढ़ा सके। आगे न बढ़ा सकने के कारणों में एक प्रमुख कारण यह दिखता है कि शोषितों के बीच जो नेतृत्व उभरा उनमें मसीहा होने का बोध तो था लेकिन उस बोध को स्थायित्व देने वाला विचार बिल्कुल नहीं था। विचार होता तो लोगों को चेतना के सांचे में ढाला जा सकता था। स्वतंत्रता का बहुप्रतीक्षित इंतजार ख़त्म हो जाता, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। बहुजनों के नाम पर सत्ता पाने वाली पार्टियां भी कांग्रेस, वामपंथ और जनसंघ (अब बीजेपी) के ढर्रे को तोड़ नहीं सकीं। किसी न किसी रूप में वह भी पुरानी व्यवस्था का पोषक बनकर रह गईं। तमाम सुधारों के बाद भी सम्राट अशोक ने जिस व्यवस्था को सालों तक इस देश में चलाया, उसका आना अभी बाकी है। समाज में ‘वह चेतना ही नहीं आ सकी है जो शोषितों को स्वतंत्रता तक’ ले जा सके। हम बात इस उम्मीद के साथ कर रहे हैं कि वह आएगी।क्योंकि जबतक सबकी स्वतंत्रता नहीं आएगी, यह देश मुकम्मल राष्ट्र नहीं बनेगा।जब तक प्रतिनिधित्व नहीं होगा, कोई संस्था या राष्ट्र मुकम्मल नहीं होगा।प्रतिनिधित्व केवल संस्थानों में नहीं, उन सभी जगहों पर होना जरुरी है जहां से एक व्यक्ति में स्वतंत्रता का एहसास पैदा होता है। इनमें सत्ता, समानता, बंधुत्व, आर्थिक/सामाजिक गैरबराबरी आदि सब शामिल है। यही हमारे नायकों का सपना था।

बीजेपी नेताओं द्वारा राष्ट्रगान के अपमान से बंगाल की राजनीति में तूफान

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 पश्चिम बंगाल से एक बड़ी और हैरान करने वाली खबर आ रही है। अपने आप को राष्ट्रवाद का चैंपियन बताने वाले बीजेपी नेताओं ने कथित रूप से राष्ट्रगान का अपमान किया है। इस बात को लेकर बंगाल की राजनीति गरमा गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी एवं उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने बीजेपी नेताओं पर राष्ट्रगान के अपमान का आरोप लगाया है। इस खबर से जुड़े वीडियो और ट्वीट्स इंटरनेट पर वाइरल हो रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेता दावा कर रहे हैं कि बीजेपी के नेताओं ने राष्ट्रगान गाते समय भारी भूल की है। इस भूल से राष्ट्रगान का अपमान हुआ है। राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी के सांसद और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने इस बारे में एक ट्वीट किया है।

उनका कहना है कि “जो लोग देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर सबको उपदेश देते हैं उन्हें खुद ही सही तरीक़े से राष्ट्रगान गाना नहीं आता है। यह वो पार्टी है जो यह दावा करती है कि उसने भारत के सम्मान को बनाए रखा है। यह सब बहुत शर्मनाक है।” पश्चिम बंगाल सरकार में शिक्षा मंत्री नेता श्री पार्थ चटर्जी ने भी यह आरोप लगाया है और कहा है कि “हैरान करने वाली बात है कि जहाँ उन्हें जन-गण-मंगलदायक-जय-हे गाना था, वो वहाँ जन-गण-मन-अधिनायक-जय-हे गा रहे थे।” इन आरोपों से तिलमिलाए पश्चिम बंगाल में बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्री शमिक भट्टाचार्य ने राष्ट्रगान के अपमान के इस आरोप का खंडन किया है। उल्लेखनीय है कि बीजेपी के नेता अन्य पार्टियों के नेताओं कार्यकर्ताओं द्वारा तिरंगे या देश के अपमान पर आसमान सर पर उठाया लेते हैं। ऐसे में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को कथित रूप से राष्ट्रगान तक गाना नहीं आने पर इनकी बड़ी बदनामी हो रही है।

मंदीप पुनिया ने जनपक्षधर पत्रकारिता करने की कीमत चुकाई है

भारतीय समाज एक ऐसे मोड़ आकर खड़ा हो गया है, जहां जो कोई पत्रकारिता करना चाहता है, तो उसके सामने वर्तमान सत्ता ने सिर्फ दो रास्ते छोड़े हैं, पहला सत्ता की दलाली। यह दो तरीके से की जा सकती है, खुले तौर पर सत्ता की दलाली, जैसे विभिन्न कार्पोरेट चैंनलों के एंकर- रिपोर्टर और अधिकांश हिंदी अखबारों के संपादक कर रहे हैं। सत्ता की दलाली में हिस्सेदारी एक दूसरी वजह है- रोजा रोटी की मजबूरी के चलते कार्पोरेट मीडिया या हिंदी अखबारों में नौकरी। भले ही ऐसे लोगों को रोटी-रोटी की मजबूरी के चलते यह काम करना पड़ रहा है, लेकिन यह उनके विवेक और आत्मा को मार रहा है, ऐसे लोगों को भी अब वैकल्पिक रास्तों की तलाश के बारे में सोचना चाहिए और कुछ लोग सोच भी रहे हैं। भारत में दो तरह की सत्ता है- कार्पोरेट सत्ता और ब्राह्मणवादी सत्ता। सत्ता की दलाली में हिस्सेदार पत्रकारिता इनमें से किसी एक सत्ता के दलाल हैं या दोनों के एक साथ। यह दलाली सिर्फ पैसे के लिए नहीं, विचारों के चलते भी ऐसा करने वाले लोगों की अच्छी खासी तादात है- हिंदू राष्ट्र के लिए जीन-जान लगाकर पत्रकारिता कर रहे हैं। हिंदी राष्ट्र मतलब अपरकॉस्ट हिदू मर्दों के वर्चस्व वाला राष्ट्र। दूसरे तरह की पत्रकारिता है- खुली जनपक्षधर पत्रकारिता। जिसे कार्पोरेट सत्ता और ब्राह्मणवादी सत्ता को एक साथ चुनौती देनी है। इसमें खतरा ही खतरा है- रोटी-रोटी का खतरा, जेल जाने का खतरा और गौरी लंकेश की तरह मारे जाने का खतरा। आज ब्राह्मणवादी कार्पोरेट फासीवाद के दौर में हर तरह की का जोखिम उठाकर ही सच्ची पत्रकारिता की जा सकती है। इसमें जेल जाने और जान से मार दिए जाने का जोखिम भी शामिल है। मंदीप पुनिया ने जनपक्षधर पत्रकारिता करने की कीमत चुकाई है।

मनदीप पुनिया की रिहाई के लिए पत्रकारों का आंदोलन जारी, रवीश कुमार ने भी उठाई आवाज

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स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया की गिरफ्तारी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। 31 जनवरी को दिल्ली पुलिस के मुख्यालय के पास पत्रकरों के प्रर्दशन से जहां यह साफ हो गया है कि गोदी मीडिया से इतर पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी इसे मुद्दा बनाकर लड़ने को तैयार है। तो वहीं कई समाचार पत्रों ने भी इससे संबंधित खबरें प्रकाशित कर मनदीप की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाया है। वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने भी इस मुद्दे पर अपने फेसबुक पेज पर लिखा कर मामले का संज्ञान लिया है।

रवीश कुमार ने लिखा- 

मनदीप को गिरफ्तार किया गया है। किसान आंदोलन को स्वतंत्र पत्रकारों ने कवर किया। अगर ये पत्रकार अपनी जान जोखिम में डाल कर रिर्पोट न कर रहे होते तो किसानों को ही ख़बर नहीं होती कि आंदोलन में क्या हुआ है। फ़ेसबुक लाइव और यू ट्यूब चैनलों के ज़रिए गोदी मीडिया का मुक़ाबला किया गया। अब लगता है सरकार इन पत्रकारों को भी मुक़दमों और पूछताछ से डरा कर ख़त्म करना चाहती है। यह बेहद चिन्ताजनक है। बात-बात में FIR के ज़रिए पत्रकारिता की बची खुची जगह भी ख़त्म हो जाएगी। जिस तरह से स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया और धर्मेंद्र को पूछताछ के लिए उठाया गया उसकी निंदा की जानी चाहिए। आम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्या वे अपनी आवाज़ के हर दरवाज़े को इस तरह से बंद होते देखना चाहेंगे? एक पत्रकार पर हमला जनता की आवाज़ पर हमला है। जनता से अनुरोध है कि इसका संज्ञान लें और विरोध करे। मनदीप को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। दिल्ली पुलिस के अफ़सर भी ऐसी गिरफ़्तारियों को सही नहीं मानते होंगे। फिर ऐसा कौन उनसे करवा रहा है? कौन उनके ज़मीर पर गुनाहों का पत्थर रख रहा है? उन्हें भी बुरा लगता होगा कि अब ये काम करना पड़ रहा है। हम उनकी नैतिक दुविधा समझते हैं लेकिन संविधान ने उन्हें कर्तव्य निभाने के पर्याप्त अधिकारी दिए हैं। अफ़सरों को भी पत्रकारों की गिरफ़्तारी का विरोध करना चाहिए।

डीयू में अतिथि शिक्षकों का आंदोलनः कठघरे में सरकार और शिक्षक संगठन

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रिपोर्ट- अनिल कुमार।।  दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) और नॉन कॉलेजिएट वूमेंस एजुकेशन बोर्ड (NCWEB) के शिक्षकों को 2019 से वेतन नहीं मिला है। साथ ही उनके निर्धारित वेतन 1500 रुपये प्रति कक्षा में से गैरकानूनी ढंग से 500 रुपये प्रति कक्षा काटा गया है। परीक्षा की कॉपी जांच करने के लिए निर्धारित पैसे भी उनको नहीं दिए गए। SOL और NCWEB में सिर्फ शनिवार और रविवार को कक्षाएं होती हैं और शिक्षकों को मुश्किल से 25,000 रुपये महिना वेतन मिल पाता है और वह भी तब जब कक्षाएं चल रही हों। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक साल में लगभग छः महीने ही कक्षाएं होती हैं, इस तरह शिक्षकों का औसत वेतन लगभग 12,500 रुपये महिना ही है। ऐसे में उनके वेतन से पैसे काटना, परीक्षा की कॉपी चेक करने के पैसे न देना और 2019 से वेतन का भुगतान ना करना शिक्षकों के प्रति अन्याय है। यह उन विद्यार्थियों के प्रति भी अन्याय है जिनको वे पढ़ाते हैं। क्योंकि जब शिक्षक को ही वेतन नहीं मिलेगा तो वह कैसे बच्चों को बेहतर शिक्षा देगा? फिर भी SOL और NCWEB के शिक्षक बेहतर कर रहें हैं।

इन्हीं सब मुद्दों को लेकर 27 जनवरी, 2021 को दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 4 पर दोपहर 2 बजे से अपनी मांगे पूरी होने तक रिले हंगर स्ट्राइक का आयोजन किया गया था। इनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार थीं, (1) शिक्षण-सत्र सितंबर – दिसम्बर 2019 से SOL के अतिथि शिक्षाकों का वेतन नहीं दिया गया है, उसक भुगतान किया जाए। (2)  शिक्षण-सत्र सितंबर – दिसम्बर, 2019 के निर्धारित वेतन 1500 रुपये प्रति कक्षा में से NCWEB के अतिथि शिक्षकों का वेतनमान 500 रुपये प्रति कक्षा काटे जाने का विरोध और उसे वापस दिया जाए। (3) NCWEB के शिक्षकों का शिक्षण सत्र जनवरी – मई 2020 से वेतन नहीं मिला है उसका भुगतान तुरंत किया जाए। (4) NCWEB और SOL के अतिथि शिक्षकों का वेतन माह के अंत में देने का प्रावधान की माँग। (5) SOL और NCWEB द्वारा उत्तर पुस्तिका जाँचने के पैसे का भुगतान न किए जाने की माँग। इस आंदोलन का नेतृत्व अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति, उपाध्यक्ष संदीप, और सचिव रवि कर रहें थे। लेकिन वर्तमान सरकार कोरोना के बहाने देश के नागरिकों के मौलिक राजनीतिक अधिकार को कुचल रही है।

जब हंगर स्ट्राइक के लिए टेंट लगाने की कोशिश हुई तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 4 पर तैनात सुरक्षा कर्मियों ने कहा कि प्रॉक्टर ऑफिस से परमिशन लेकर आओ। जब प्रॉक्टर ऑफिस गए तो वहां का स्टाफ कहता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में टेंट लगने की अनुमति नहीं है। जब अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति ने पूछा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक संगठन दो महीने कुलपति कार्यालय के सामने राजाई-गद्दे लेकर कैसे बैठ गए थे? तो उनके पास जवाब नहीं था। इतने में ही मोरिस नगर थाना से भी पुलिस आ गई और अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को डिटेन करके थाने ले गई। साथ ही आंदोलन के समर्थन में जो लोग भी आए थे उन अतिथि शिक्षकों को बालपूर्वक तितर-बितर कर दिया गया।

अतिथि शिक्षकों को थाने में ले जाकर पुलिस ने बताया कि वे उन्हें कोई भी आंदोलन या धारणा-प्रदर्शन नहीं करने देंगें, क्योंकि देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। जब धरना-प्रदर्शन में आए अतिथि शिक्षक को बल पूर्वक तितर-बितर कर दिया गया तब अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को चेतावनी देकर थाने से छोड़ दिया गया। इस घटना पर डॉ कुमार गौरव कहतें हैं, कि प्रशासन और दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ (DUTA) अलग-अलग नहीं है। उन्हें यह बर्दस्त नहीं होगा कि के सामने कोई संगठन आगे बढ़े। अगर आप उनकी (DUTA) के गतिविधि पर बारीक नजर रखेंगे तब सब समझ में आएगा। कोरोना नागरिकों के मौलिक अधिकार को कुचलने का नया हथियार बन गया है। यह तथ्य भी प्रासंगिक है कि इसी दिल्ली यूनिवर्सिटी में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के लोगों ने जनवरी, 2021 के दूसरे सप्ताह में कोरोना के ही समय धरना-प्रदर्शन किया था। ऑकटूबर-नवंबर 2020 में सम्पन्न बिहार विधान सभी चुनाव में लाखों की रैलियाँ होती रही हैं और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के लिए भी रैलियां हो रही हैं।

अतिथि शिक्षक संघ ने यह भी आरोप लगाया कि उसने दूसरे कई संगठनों को भी अपने आंदोलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया था, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ शामिल हैं। लेकिन कोई भी नहीं आया। इससे इनका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। सामाजिक न्याय की बात करना सिर्फ इनकी जुबानी चाल है और वे इसे वास्तविक धरातल पर नहीं उतारना चाहते हैं। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय सहित दिल्ली के सभी शिक्षक संगठनों के रवैये से अतिथि शिक्षक भी खुद डरा हुआ है। उन्हें डर है कि अगर वे मुखर होकर अपने हक में आवाज उठाते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिल सकती है। उनकी कहीं भी स्थाई नियुक्ति नहीं होगी। उनका डर भी कोई काल्पनिक नहीं है, क्योंकि उन लोगों ने ऐसा होते देखा भी है। ऐसा हो भी रहा है। आज दिल्ली यूनिवर्सिटी का शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ अपने ही शिक्षकों के शोषण के खिलाफ चुप है। आज वह शोषक के साथ खड़ा है।

जब महेन्द्र सिंह टिकैत ने बोट क्लब पर जुटाई थी लाखों की भीड़

 सम्मान हरेक का है, किसान हो या जवान, शहरी हो ग्रामीण। 21वीं सदी में महानगरों में जी रहे उन लोगों की अज्ञानता तो समझी जा सकती है, जिनको अब फिल्मों में भी गांव और किसान देखने को नही मिलते। लेकिन बौद्धिक होने का दंभ भरने वाले और खेती बाड़ी में देश में सबसे पिछड़े इलाकों से आने वाले लोगों का क्या कहेंगे। कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को जानते हुए भी वे शांति से दो महीने तक अपनी बात रखने के लिए गाजीपुर जैसी सरहद पर बैठे किसानों के बारे में वे क्या क्या लिखते हैं। उस गाजीपुर सीमा पर जहां से गुजरते समय लोग नाक पर कपडा लगा लेते हैं। किसी को भी अपने घर से दूर अच्छी से अच्छी जगह भी एकाध दिन ही अच्छी लगती है। किसानों को जहां रोका वहीं रुक गए। चाहे वह गाजीपुर हो या सिघु सीमा। उनके लिए जहर भरी भाषा का उपयोग करने वाले क्या सरकार को डिक्टेट करना चाहते हैं। क्या वे पुलिस जवानों से भी अधिक किसानों के बारे में समझ रखते हैं, जिसकी ड्यूटी उनके आसपास ही है और जो खुद किसान परिवारों से ही आते हैं। किसानों का आंदोलन जिन मुद्दों को लेकर है वे भारत सरकार से संबंधित है। उनकी लड़ाई किसी राज्य सरकार से नहीं है न पुलिस प्रशासन से। भारत सरकार और किसानों के बीच 11 दौर की बातचीत के बाद भी संवाद के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। सुप्रीम अदालत ने भी उनके धरने को हटाने के लिए नहीं कहा है। लेकिन जिनके रास्ते में भी गाजीपुर या सिंघु सीमा नहीं पड़ती, उनका रास्ता सबसे ज्यादा अवरुद्ध हो रहा है। जिन लोगों ने लाल किले पर हिंसा की वे फेसबुक पर लाइव अपनी बातें कह रहे हैं। लेकिन उनके बारे में बोलते समय डर लगता है। जैसे वे सगे हों और शांत बैठे किसान दुश्मन। अपराधी देर सबेर सलाखों के पीछे पहुंच ही जाएंगे।

मैने बोट क्लब पर लाखों की भीड़ को एक सप्ताह तक बैठे देखा है। लाल किले पर भी महेंद्र सिंह टिकैत के विशाल जमावड़े को देखा है। चांदनी चौक का एक भी कारोबारी नहीं कह सकता है कि किसानों ने उनको कोई नुकसान पहुंचाया हो। लाल किले को नुकसान पहुंचाने का तो सवाल ही नहीं। जिन लोगों ने पंजाब में उग्रवाद के दिनो में मौन रहना सीख लिया था वे अब खलिस्तान के इतिहास पर लिखते हुए इनसे जोड़ रहे हैं। जो शांति से बैठे हैं, उनके मुद्दों का विरोध करिए लेकिन वातावरण विषाक्त मत कीजिए। लोकतंत्र में जनता को वह ताकत मिली हुई है कि वह अपनी बात को मनाने के लिए आंदोलन करे। रास्ता संवाद से ही निकलना है और दोनों पक्षों में संभव है कि किसी को थोड़ा झुकना भी पडे। लेकिन यह भी सच है कि कोई आंदोलन अनंतकाल तक नहीं चलता। अतीत में ये ही किसान संगठन जब कांग्रेस, सपा, बसपा और जनता दल की सरकारों से लड़ते थे तो आपको योद्धा लगते थे। लेकिन अब आढ़तियों का एजेंट, खलिस्तानी और दुनिया के सबसे बुरे हो गए हैं। दो महीनों से वे सरकार गिराने नहीं बैठे हैं। उनको पता है कि उनके पास चुनने का अधिकार है वापस बुलाने का नहीं। लेकिन शांति से अपनी बातों को उठाने वालों के खिलाफ जहर उगलना लोकतंत्र के खिलाफ खड़ा होना है। बेहतर होगा कि कामना करेंं कि संसद सत्र के बीच किसानों की सम्मानजनक घर वापसी के लिए रास्ता निकले और वे अपने घर लौटें। खेतीबाड़ी में बहुत काम होता है। वे किसी को किसी रूप में परेशान नहीं करना चाहते, बल्कि खुद परेशान हैं।

ब्रिटिश रविदासिया हैरिटेज फाउंडेशन का ब्रिटेन में उद्घाटन

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 26 जनवरी 2021 को ब्रिटिश रविदासिया हैरिटेज फ़ाउंडेशन (यू.के.) का ब्रिटेन की हाई शेरिफ़ सुसन लौसाड़ा द्वारा उद्घाटन हुआ। यू.के. के वर्तमान सांसद मौहमद यासीन सहित अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने उद्घाटन में देश-दुनिया के अनेक लोगों ने शामिल होकर अपनी शुभकामनाएं दीं। यू.के. के कांशी रेडियो ने इसे लाईव चलाया। बी.आर.अच. फ़ाउंडेशन में कुल नौ ट्रस्टी हैं, जिनके नाम- ओम प्रकाश बागा, सत पॉल, रूप लाल, अमरीक पलाही, सैम कल्याण, डॉ. मनोज दहिया, डॉ. ओपिंद्र कौर तक़खड, पूनम सांगरे, और दीपिका चावड़ा हैं। इसमें डॉ. मनोज दहिया और दीपिका चावड़ा भारत से शामिल हैं।

डॉ. मनोज दहिया अभी ICSSR से ‘रविदासिया धर्म’ पर पोस्ट-डोकटोरल फ़ेलोशिप कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से सतगुरु रविदास पर Ph.D. की है। ये दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफ़ेसर भी रहे हैं और अनेक संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। दीपिका चावड़ा सुप्रीम कोर्ट में वकील और समाज सेवी हैं। इस संस्था का प्रोजेक्ट है, ‘सतगुरु रविदास के जीवन को खोजना।’ यह शोध कार्य वर्ष 2027 में सतगुरु रविदास की 650 वीं जयंती पर पूरा होगा। ऑनलाइन हुए इस उद्घाटन में देश-दुनिया के प्रोफ़ेसर, डॉक्टर, इंजीनियरिंग, वकील, शोधकर्ता, संत, राजनीतिज्ञ आदि अनेक 100 से अधिक लोगों ने भाग लिया जैसे प्रो. ओपिंद्र कौर तकखड़, प्रो. गैरी मक्लोव, प्रो. भूप सिंह गौड़, प्रो. प्रमोद कुमार मेहरा, डॉ. सुनीता देवी मेहरा, प्रो. राजबीर सिंह, डॉ. प्रदीप सोलंकी, डा संदीप कुमार कनौजिया, जे. के. दास, गुरदीप गिरी महाराज, सतपाल विर्दी, डी. सी. भाटिया, डॉ. नेक चंद, संदीप दहिया, मनीष सहरावत, अलका निमेश, सीरी राम अर्श, रेणु किशोर, अनिल रविदासिया, चंद्रशेखर, अमृत लाल, आत्म प्रकाश, मोहित नोलिया, संजय गुरान, मनीष खोखरा, संदीप दंडोतिया, पंकज अरोलिया, चौधरी साहिल रंगा, बंटी बिलोनिया, मोहन लाल आदि अनेक गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

राकेश टिकैत ने दी आत्महत्या की धमकी

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गाजीपुर बॉर्डर पर किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि पहले वह गिरफ्तारी देना चाहते थे, लेकिन बीजेपी के विधायकों ने हमारे लोगों के साथ मारपीट की है। हमारे लोगों को रास्ते में पीटने की योजना बना रखी है। उन्होंने कहा कि अब हम यहां से नहीं जाएंगे। यहीं बैठेंगे। किसान नेता राकेश टिकैत ने खुदकुशी की भी धमकी दी है। मीडिया से बातचीत में रोते हुए राकेश टिकैत ने कहा, ‘अगर तीनों कृषि कानून वापस नहीं होते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। मुझे कुछ भी हुआ तो प्रशासन जिम्मेदार होगा।’ उन्होंने कहा, ‘मैं किसानों को बर्बाद नहीं होने दूंगा। किसानों का मारने की साजिश रची जा रही है। यहां अत्याचार हो रहा है। इस बीच गाजीपुर बॉर्डर पर प्रशासन की ओर से सभी सुविधाएं हटा दी गई हैं। प्रशासन की इस कार्रवाई पर राकेश टिकैत ने कहा, ‘देश ने मुझे झंडा दिया है तो पानी  भी देगा। मैं गाजियाबाद का पानी नहीं पीऊंगा। गांव के लोग पानी लेकर आएंगे तब मैं पीऊंगा।’  इससे पहले राकेश टिकैत ने सुप्रीम कोर्ट से मांग किया कि वह दिल्ली में हुई हिंसा की जांच कराएँ। लाल किले पर कौन लोग थे, इसकी भी जांच कराई जाए।

किसान आंदोलनः मुझे तो यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट सरीखा लग रहा है

सवाल यह है कि किसान अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे? सवाल यह भी है कि जो किसान दो महीने तक शांतिपूर्ण धरना दे सकते हैं, वह दिल्ली में आकर बवाल क्यों करेंगे? सवाल यह भी है कि जो किसान अपने नाबालिग बच्चों और महिलाओं के साथ आंदोलन कर रहे हैं, वह ऐसा क्यों करेंगे कि लाठी चार्ज हो?

इस मुद्दे पर नीचे बात करेंगे। फिलहाल वर्तमान हालात देखिए। गाजीपुर बॉर्डर पर किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि पहले वह गिरफ्तारी देना चाहते थे, लेकिन बीजेपी के विधायकों ने हमारे लोगों के साथ मारपीट की है। हमारे लोगों को रास्ते में पीटने की योजना बना रखी है। उन्होंने कहा कि अब हम यहां से नहीं जाएंगे। यहीं बैठेंगे। किसान नेता राकेश टिकैत ने खुदकुशी की भी धमकी दी है। मीडिया से बातचीत में रोते हुए राकेश टिकैत ने कहा, ‘अगर तीनों कृषि कानून वापस नहीं होते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। मुझे कुछ भी हुआ तो प्रशासन जिम्मेदार होगा।’ उन्होंने कहा, ‘मैं किसानों को बर्बाद नहीं होने दूंगा। किसानों का मारने की साजिश रची जा रही है। यहां अत्याचार हो रहा है।

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इस बीच गाजीपुर बॉर्डर पर प्रशासन की ओर से सभी सुविधाएं हटा दी गई हैं। प्रशासन की इस कार्रवाई पर राकेश टिकैत ने कहा, ‘देश ने मुझे झंडा दिया है तो पानी  भी देगा। मैं गाजियाबाद का पानी नहीं पीऊंगा। गांव के लोग पानी लेकर आएंगे तब मैं पीऊंगा।’  इससे पहले राकेश टिकैत ने सुप्रीम कोर्ट से मांग किया कि वह दिल्ली में हुई हिंसा की जांच कराएँ। लाल किले पर कौन लोग थे, इसकी भी जांच कराई जाए।

वहीं दूसरी ओर सिंधु बार्डर पर जा रही सड़क ब्लॉक कर दी गई। गाजीपुर बार्र पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती है। जो स्थानीय लोग पिछले दो महीने से किसानों का सहयोग कर रहे थे, अब अचानक हाइवे खाली कराने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने लगे हैं। ये लोग दिल्ली पुलिस और प्रशासन के समर्थन में नारेबाजी कर रहे हैं।

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दरअसल यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट सरीखा दिख रहा है। जैसे फिल्मों में होता है, वैसा ही। वरना 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड की इजाजत नहीं दी जाती। संभवतः यह इसलिए किया गया, क्योंकि 26 जनवरी के बहाने इसे देश की अस्मिता से, देशभक्ति से जोड़ा जा सके। और जब बाद में किसानों पर डंडे परे तो कोई उनके समर्थन में न आए। और जो आए, उसे देश विरोधी ठहराया जा सके।

दिल्ली में हुआ दंगा भूले नहीं होंगे आप, याद है न कैसे शुरू हुआ था? सरकार कृषि बिल वापस नहीं लेगी, उसने बता दिया था। किसान पीछे नहीं हटेंगे, उन्होंने भी कह दिया था। फिर रास्ता क्या था??? क्या इससे पूरी तरह इंकार किया जा सकता है कि एक स्क्रिप्ट लिखी गई हो, कुछ किरदार तय किये गए हों, उनकी भूमिका तय हो। और फिर क्या हुआ, सब सामने ही है।

मुझे ये कोई फिल्म या नेट फ्लिक्स की सिरीज सरीखा दिख रहा है, जिसमें शासक कहीं दूर बैठा मुस्कुरा रहा है।

लाल किले पर किसानों का झंडा कहीं सरकारी साजिश तो नहीं

आज 26 जनवरी 2021 को जब सरकारी गणतंत्र दिवस मन रहा था, लुटियन दिल्ली की सड़कें खेत जोतने वाले ट्रैक्टर से अटे पड़े थे। (मैं सरकारी गणतंत्र दिवस इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वर्तमान में देशवासियों के नागरिक कानून बाधित हैं और जब तक ऐसा है, देशवासियों के लिए गणतंत्र दिवस के कोई मायने नहीं हैं।) इसी दिन यह भी हुआ कि लाल किले पर जहां भारत के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं, वहां किसानों ने अपना झंडा फहरा दिया। लाल किले तक किसानों का पहुंचना इत्तेफाक नहीं है। क्योंकि देश में इस सरकार में कुछ चीजें बिना सरकार के चाहे नहीं हो सकती। लाल किले तक किसानों को पहुंचने देना संभवतः सरकार की कोई योजना हो, जिसके जरिए किसान आंदोलन को बदनाम कर सरकार को इस आंदोलन को कुचलने का बहाना मिल सके। और अगर ऐसा नहीं है, तो किसानों के इस आंदोलन को देश का आंदोलन बनने से कोई नहीं रोक सकता। क्योंकि दिल्ली की चौखट पर दो महीने से अधिक समय से बैठे किसानों ने अब दिल्ली के दिल लुटियन पर दस्तक दे दी है; जहां किसानों के साथ देश की आम जनता भी जुड़ती जा रही है। इस आंदोलन को उन लोगों का भी समर्थन मिल रहा है, जो इस तानाशाह शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। किसान देश को अन्न देता है, लेकिन किसान आंदोलन जिस तरह बड़ा बनता जा रहा है, दिखने लगा है कि किसानों के नेतृत्व में देश को एक बार फिर से बोलने, अपने विचार रखने और सत्ता का विरोध करने का उसका मौलिक अधिकार मिल जाए। देश ‘भारत’ बना रहे, ‘हिन्दोस्तान’ बनने से बच जाए।