बहुजन नायकों की जंयती के बहाने अन्य जाति-धर्मों और शास्त्रों को कोसना कितना सही?

 इन दिनों बहुजन नायकों की जयंती पर किसी अन्य जाति, धर्म और धर्म शास्त्रों को कोसने का जैसे चलन सा चल पड़ा है। पहले तो साल में बाबासाहब के नाम पर दो दिन ही होते थे। अब तो हमने कई बहुजन महापुरुषों को ढूंढ निकाला है, जिनके नाम पर दूसरे जाति धर्म को कोसने, चिढ़ाने व गालियां देने के मानो भरपूर अवसर मिल रहा है। विगत 3 जनवरी को माता सावित्रीबाई फुले की जयंती थी। सोशल मीडिया तो भर ही गया था। छोटी छोटी जगहों पर भी लोगों ने इकट्ठा होकर कोसने के एक सूत्रीय मिशन को सफल बनाने के भाषण दिए। सभा में एक युवक ने ज्योतिबा व सावित्रीबाई के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने मौहल्ले में बच्चों को दो घंटे पढ़ाने की योजना बताई तो सभी ने झिड़क कर बैठा दिया। विगत 25 दिसंबर को बहुजनों ने मनुस्मृति दहन दिवस खूब धूमधाम से मनाया। पानी पी पी कर दूसरे जाति धर्म को गालियां दी। मनुस्मृति से छांटे हुए श्लोकों का बार-बार पठन किया। सभा में जब बाबासाहब के एक उत्साही अनुयायी ने सुझाव दिया कि हमें मनुस्मृति को बार बार याद कर फिर से जिंदा करने की बजाय मानव कल्याण के लिए बाबासाहब की महान रचना ‘बुद्ध और उनका धम्म’ व ‘संविधान’ को घर घर पहुंचाने पर जोर देना चाहिए, तो सभी ने उसे डांटते हुए कहा- ‘यह काम हमारा नहीं है’। होली व रावण दहन का हम विरोध करते हैं लेकिन हर साल मनुस्मृति की होली जलाने का जश्न मनाते हैं। मजेदार बात तो यह है कि जिन्होंने मनुस्मृति लिखी उनकी संतानें मनुस्मृति को पढ़ना तो दूर देखते तक नहीं है, लेकिन कथित अंबेडकरवादी लोग इसको रस ले लेकर पढ़ते हैं ताकि एक जाति के खिलाफ बोलने का मसाला मिल जाए। आज डॉ. अंबेडकर होते तो अपने ही लोगों से लड़ना पड़ता। ज्योतिबा फुले जयंती के दिन हम जोशीले भाषण में युवाओं को यह चीख चीख कर बताते हैं कि ज्योतिबा को किन जाति के लोगों ने परेशान किया लेकिन इस बात पर चुप रहते है कि ऐसी मुश्किल हालात में भी वह अंग्रेजी में भी पारंगत हुए, सावित्री बाई को पढ़ाया, साहित्य का सृजन किया, गरीबों के लिए स्कूल खोले। इसलिए हमें भी अपनी आय का कुछ अंश देकर मौहल्लों में स्कूल खोलने चाहिए, कुछ घंटे गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहिए। कबीर जयंती हो या सतगुरु रविदास का स्मृति दिवस, सामाजिक क्रांति के इन महान संतों द्वारा रचित अथाह ग्रंथों में से हम उन्ही चंद दोहों की रट लगाते हैं जो उन्होंने किसी जाति धर्म के पाखंड के खिलाफ कहे थे। लेकिन मन की शुद्धि, ज्ञान, ध्यान, दान, मानव सेवा के विचारों को जीवन में उतारने की उनकी वाणी के पन्नों को पलटते ही नहीं है, छुपा देते हैं। कोरेगांव जैसे शौर्य दिवसों पर हमारे बहादुर वीरों की गौरव गाथा का बखान करना जरूरी है लेकिन इसके साथ ही भारत के दूसरे राज्यों में छोटे छोटे गांवों में इस दिन आसपास की दूसरी जातियों को कोस कर, माहौल बिगाड़ कर स्थानीय गरीब बहुजनों के लिए परेशानियां पैदा करना कहां की समझदारी है? बुद्ध पूर्णिमा का दिन आता है। बात प्रेम, करुणा, मैत्री, शील, समाधि व प्रज्ञा की करनी होती है, लेकिन जब तक हम दूसरे धर्म, उनके शास्त्रों रीति रिवाजों को गालियां नहीं दे देते तब तक बुद्ध पूर्णिमा का समारोह सफल नहीं माना जाता. इस दिन बुद्ध की शिक्षाओं के बजाए दूसरे धर्म की विकृतियों को ज्यादा याद करते हैं और इसके बाद अलग अलग बौद्ध संस्थाओं के लोग आपस में भिड़ते नजर आते हैं। हमने बहुजन महापुरुषों के दिनों को उनकी शिक्षा, साहित्य व जीवन से प्रेरणा लेकर मौजूदा संकट के दौर में शांति से उनकी विचारधारा फैलाने की बजाए उनके नाम पर दूसरों को कोसने के बहाने ढूंढ लिए हैं। सारी ऊर्जा सृजन की बजाए नकारात्मक दिशा में बर्बाद हो रही है। उनको पढ़ने, समझने व जीवन में अपनाने के बजाय उनकी मूर्तियों को मालाओं से ढकने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। छाती पर बाबासाहेब के चित्र वाली बनियान पहनकर उछलना, दूसरों को चिढ़ाने के लिए नारे लगाते हुए गांवों में रैली निकालना उस महापुरुष का मिशन तो नहीं हो सकता। जिस मार्ग पर नहीं जाना उसका नाम क्यों लेना? लेकिन बहुजन समाज के लोग उसी मार्ग का रात दिन रोना रोते हैं, बार बार याद करते हैं जिसके लिए महापुरुषों ने मना किया था। इसके लिए बाकायदा मोटा चंदा इकट्ठा कर बड़े समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये सामाजिक, वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक खुशहाली लाने की बजाय दूसरों को कोसने व आपस में भिड़ने के समारोह है। आखिर कहां आ गए हैं हम? चले थे मानव समाज में इनकी प्रेम, करुणा व मैत्री की विचारधारा फैलाने के लिए, लेकिन हमने अपने ही व्यवहार से महान संतों, महापुरुषों को आज दूसरे समुदायों की नजर में खलनायक बना दिया है।

आधुनिक भारत की पहली विद्रोही कवयित्री: सावित्रीबाई फुले

 अतीत के इन ब्राह्मणों के धर्मग्रंथ फेंक दो करो ग्रहण शिक्षा, जाति-बेड़ियों को तोड़ दो उपेक्षा, उत्पीड़न और दीनता का अन्त करो! -सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका थीं, इस तथ्य से हम सभी वाक़िफ़ हैं। लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो इस तथ्य से परिचत होंगे कि वे आधुनिक भारत की पहली विद्रोही महिला कवयित्री और लेखिका थीं। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, ‘काव्य फुले’ 1854 में प्रकाशित हुआ था। तब वे महज 23 वर्ष की थीं। इसका अर्थ है कि उन्होंने 19-20 वर्ष की उम्र से ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। उनका दूसरा कविता संग्रह ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ नाम से 1891 में आया। सावित्रीबाई फुले अपनी रचनाओं में एक ऐसे समाज और जीवन का सपना देखती थीं, जिसमें किसी तरह का कोई अन्याय न हो और हर इंसान मानवीय गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करे।

उन्होंने अपनी कविताओं में सबसे ज़्यादा चोट मनुवाद, जाति-वर्ण के भेदभाव और स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता पर की है। हम आपको सुनाते हैं, माता सावित्रीबाई की ऐसी ही चर्चित कविताएं-

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‘शूद्रों का दर्द’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं- दो हज़ार वर्ष से भी पुराना है शूद्रों का दर्द ब्राह्मणों के षड्यंत्रों के जाल में फंसी रही उनकी ‘सेवा’

जोतिराव फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई फुले को भी इस बात का बहुत दुःख होता था कि शूद्रों-अतिशूद्रों के बेहतर जीवन के सारे सपने मर गये हैं। वे अच्छी तरह समझती थीं कि शूद्रों-अतिशूद्रों के कर्मों का सारा फल ब्राह्मण हड़प लेते हैं और बिना फल की चिंता किए खटते रहने का उपदेश देते हैं। अपनी एक कविता में उन्होंने लिखा-

शूद्रों-अतिशूद्रों की दरिद्रता के लिए अज्ञानता व रूढ़ीवादी रीति-रिवाज़ हैं जिम्मेदार परम्परागत बेड़ियों में बंधे-बंधे सब पिछड़ गये हैं सबसे देखो जिसका यह परिणाम है कि हम झुलस गये तेज़ाब में ग़रीबी के नहीं रहा अहसास कोई भी सुख-सम्मान, अधिकार का न कोई आशा और इच्छा आत्मसात कर दु्ःखों को समझा सुखी ही अपने को

           

अपनी एक अन्य कविता में उन्होंने ब्राह्मणवाद पर करारा प्रहार किया-

पोंगा पंडित, साधु-संत सब मांगें भीख बिना मेहनत कर घूमें गली-गली, जग को दें उपदेश बिना काम के चाहें फल यह लालच दिखा स्वर्ग-पुण्य का

     

ऐसा नहीं है कि सावित्रीबाई फुले सिर्फ ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों पर ही हमलावर हैं। बल्कि वह अज्ञानतावश पशुवत ज़िंदगी जीने के लिए शूद्रों-अतिशूद्रों को धिक्कारती हैं। अपनी कविता में वह लिखती हैं-

जीवन स्वीकारते पशु समान पशुवत जीने को सुख समझें है न यह घोर अज्ञान!

फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का भी मानना था कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की दुर्दशा का कारण अज्ञानता है। सावित्रीबाई फुले भी अपनी कविताओं में मनुवादी बेडियों को तोड़ने और शिक्षित बनने का आह्वान करती हैं। लेकिन इसके साथ ही वे इस बात के लिए भी चेताती हैं कि तुम मनुवादी शिक्षा मत लेना। वो लिखती हैं-

उठो, अरे अतिशूद्र उठो तुम मर-मिट गये मनुवादी पेशवा ख़बरदार अब मत अपनाना मनु-अविद्या की… रची ग़ुलामी-परम्परा को

वे धिक्कारती हुई, समझाती हुई कहती हैं-

बिना ज्ञान के व्यर्थ सभी कुछ हो जाता बुद्धि बिना तो इंसान भी पशु कहलाता

   

वे अंग्रेजों द्वारा शिक्षा का द्वार सबके लिए खोलने को एक सुनहरे अवसर के रूप में देखती हैं और कहती हैं कि इस शिक्षा को ग्रहण करके अपनी दुर्दशा का अंत करो-

अब निठल्ले मत बैठो जाओ, शिक्षा पाओ पीड़ित और बहिष्कृतों की दुर्दशा का अंत करो सीखने का मिल गया है यह तुम्हें अवसर सुनहरा, सीख लो और तोड़ दो ज़ंजीरें ये जाति-व्यवस्था की सुनो फेंक डालो शीघ्र भाई ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों को

 सावित्रीबाई फुले अपनी कविताओं में इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या को चुनौती देती हैं। वे कहती हैं कि शूद्र ही इस देश के मूलनिवासी और वीर योद्धा थे और यहां के शासक थे। उनका समाज अत्यन्त समृद्ध समाज था। बाद में आक्रामणकारियों ने शूद्र शब्द को अपमानजनक बना दिया। वे ‘शूद्र शब्द का अर्थ’ कविता में लिखती हैं कि-

शूद्र का असली मतलब मूलनिवासी था लेकिन सूर विजेताओं ने बना दिया ‘शूद्र’ को गाली ईरानी हों या हों ब्राह्मण ब्राह्मण हों या हों अंग्रेज सब पर अंतिम विजय प्राप्त की शूद्रों ने ही क्योंकि वे ही क्रांतिकारी थे मूलनिवासी थे, समृद्ध थे वही ‘भारतीय’ कहलाते थे ऐसे वीर थे अपने पूर्वज हम हैं उन लोगों के वंशज

वे साफ़ शब्दों में कहती हैं कि यह भारत देश, यहाँ के मूल निवासियों का देश है। वही इस धरती के असली हकदार हैं-

नहीं है भारत और किसी का न ईरानी लोगों का यह न यूरोपीय लोगों का न तातारों, न हूणों का इसकी नसों में रुधिर बह रहा मूलनिवासी शूद्रों का

सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं में बहुजन समाज को जगाने का प्रयास किया। सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक जागरण की कविताएं हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में ब्राह्मणवाद-मनुवाद को चुनौती दी। शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का आह्वान किया है। उनकी कविताएं इस बात की प्रमाण हैं कि वे आधुनिक भारत की प्रथम विद्रोही कवयित्री हैं।

कोरेगांवः घटना के तीन साल बाद भी न्याय के इंतजार में सामाजिक कार्यकर्ता

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 भीमा कोरेगाँव में एक जनवरी 2018 को हिंसक झड़प हुई थी। तब विजय दिवस के 200 साल पूरे हुए थे और इस उपलक्ष्य में हजारों लोग कोरेगांव स्थित उस स्थल देश भर से पहुंचे थे। इसको एक साजिश बताते हुए अब तक 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं, कवियों और वकीलों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जिन लोगों को गिरफ़्तार किया है, उनमें दलित समाज के बुद्धिजिवी आनंद तेलतुंबडे, मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा, कवि वरवर राव, स्टेन स्वामी, सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस समेत कई अन्य शामिल हैं। ‘दलित दस्तक’ मासिक पत्रिका की सदस्यता लें, बहुजन आंदोलन एवं विचारधारा बढ़ाएं

दरअसल घटना से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को ऐतिहासिक शनिवार वाड़ा पर एल्गार परिषद का आयोजन किया गया था। इसमें प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद, सोनी सोरी और बी.जी. कोलसे पाटिल जैसी हस्तियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद एक जनवरी को हिंसा हो गई। भीड़ पर पत्थरबाजी हुई, गोलियां चली, तो वहीं कई स्थानीय लोगों के गाड़ियों के शीशे टूट गए। एक व्यक्ति मारा गया। दलित समाज इसके पीछे आरएसएस के कुछ लोगों की साजिश बताता रहा है तो पुलिस और जांच एजेंसियां इस मामले में बुद्धिजीवियों और प्रगतिशीलों को निशाना बनाती रही है। इनको तमाम आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया।

17 मई 2018 को पुणे पुलिस ने यूएपीए की धाराओं 13, 16, 18, 18B, 20, 39, और 40 के तहत मामला दर्ज किया। पुणे पुलिस की शुरुआती जांच के बाद केंद्र सरकार ने इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया। एनआईए ने भी मामले के संबंध में 24 जनवरी 2020 को भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 505(1)(B), 117 और 34 के अलावा यूएपीए की धारा 13, 16, 18, 18B, 20 और 39 के तहत एफ़आईआर दर्ज की। एनआईए ने अक्टूबर के दूसरे हफ़्ते में एक विशेष अदालत के सामने 10,000 पन्नों की चार्ज़शीट पेश की थी। इस मामले में पहली चार्जशीट दायर करने के बाद पुलिस ने 21 फ़रवरी 2019 को एक पूरक चार्जशीट पेश की। एएनआई ने मुंबई में एक नई एफ़आईआर दर्ज की और 11 लोगों को अभियुक्त के तौर पर नामज़द किया। चार्जशीट में इन पर कई आरोप लगाए गए। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर हनी बाबू को भी मामले में गिरफ़्तार किया गया था. एनआईए ने उन पर अपने छात्रों को माओवादी विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगाया।

कोरेगांवः अछूतों की वीरगाथा का स्वर्णिम अध्याय

देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली तब की महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के लिए 9 फ़रवरी 2018 को एक दो सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया था। कोलकाता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जे.एन. पटेल ने इस आयोग की अध्यक्षता की। इस आयोग को चार महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करनी थी, लेकिन अब तक कई बार और समय दिए जाने के बावजूद आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की है और मामले को लगातार टाला जा रहा है।

2021 में बहुजनों के सामने चुनौतियां

2020 खत्म होने के साथ ही 21वीं सदी के दो दशक बीत गए हैं। ऐसे में हमें थोड़ा ठहर कर अपने समाज एवं आंदोलन की दशा और दिशा पर विचार करना चाहिए। हमें सोचना चाहिए की हमारा समाज और आंदोलन कहाँ तक पहुंचा है और हमारे समाज ने क्या खोया और क्या पाया है? ताकि हम 2021 में अपनी ताकत को सकारात्मक दिशा में लगा कर अपने समाज और आंदोलन को और भी मजबूत कर सकें ताकि कोई अन्य हमारा प्रयोग अपने स्वार्थ के लिए न कर सके।

दलितों की आर्थिक दशा अगर हम दलितों में गरीबी की पड़ताल करें तो हम पाएंगे की 2004-2005 में भारत के सामजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एक आंकड़े के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति के 27.7 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। कुछ राज्यों के ग्रामीण अंचल में दलितों की हालत और भी बदतर है जैसे- बिहार में 64, झारखण्ड में 57, उत्तराखंड में 54, उड़ीसा में 50 और उत्तर प्रदेश में 44 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। NSSO के 2011 के आकड़े के अनुसार कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में स्व-रोजगार पर आश्रित अनुसूचित जाति के परिवारों में 37.4 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं और अनुसूचित जनजाति में यह प्रतिशत 19.5 प्रतिशत नियमित रूप से वेतनभोगी लोगों के बीच है। अनुसूचित जाति में 15.7 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति में 8.1 प्रतिशत लोग आज भी गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे के 73वें राउंड के अनुसार भारत में कुल 633.88 लाख सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमी हैं। इनमें से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2019-2020 (पृष्ठ- 23) के अनुसार इनमें से अनुसूचित जाति एवं जनजाति की भागीदारी शहरी क्षेत्रों में क्रमश: 9.45 एवं 1.43 प्रतिशत ही है जो कि उनकी जनसंख्या के अनुपात में बहुत ही कम है।

दलितों की आवासीय स्थिति

अगर हम इस बात का आंकलन करें कि आज दलित समाज के बहुसंख्यक लोग कहां पर रह रहे हैं, तो हम पाएंगे कि आज भी लगभग 70% दलित समाज ग्रामीण अंचल में रहता है और किसी-किसी प्रदेश में तो यह प्रतिशत इससे भी ज्यादा है। कुछ प्रमुख राज्यों पर नजर डालें तो हिमाचल में 90, बिहार में 89, असम में 86, उड़ीसा में 83, मेघालय में 80, उत्तर प्रदेश में 78 और छत्तीसगढ़ में 77 प्रतिशत लोग आज भी गांवों में रहते हैं। दलित समाज में आज भी 71% लोग भूमिहीन किसान हैं जो मजदूरी करके अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर लगभग 11 लाख अनुसूचित जाति परिवार मलिन बस्तियों में रहते हैं। यह भी कहा जाता है कि अनुसूचित जाति की कुल 10 प्रतिशत आबादी स्लम में रहती है। भारत के अनेक शहरों में यह देखा गया है कि आज भी दलितों को किराये पर घर नहीं दिया जाता है।

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दलितों की उच्च-शिक्षा में स्थिति आज भी अखिल भारतीय स्तर पर दलितों में 27 प्रतिशत लोग साक्षर नहीं हैं। ग्रामीण अंचल में यह बढ़ कर लगभग 33 प्रतिशत हो जाता है। अगर हम उच्च शिक्षा को देखें तो हम पाएंगे कि अनुसूचित जाति के केवल 13.4 और जनजाति के 4 प्रतिशत छात्र/छात्राएं ही उच्च शिक्षा में अब तक पहुंच पाए हैं। दूसरी ओर 46 केंद्रीय विश्वविद्यालयों और एक ओपन केंद्रीय विश्वविद्यालय में केवल एक कुलपति अनुसूचित जनजाति (एसटी) से संबंधित है। मध्य प्रदेश में 19 विश्वविद्यालयों में से एक भी अनुसूचित जाति (SC) का कुलपति नहीं है और उत्तर प्रदेश में 25 राज्य विश्वविद्यालयों में SC वर्ग से कोई नहीं है। ये उदाहरण इस तथ्य समझने के लिए पर्याप्त हैं कि ये विश्वविद्यालय समावेशी नहीं हैं। सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने खुलासा किया कि 2009-10 तक 1,688 स्वीकृत प्रोफेसरों और 3,298 एसोसिएट प्रोफेसर पदों में से केवल 24 प्रोफेसर और 90 एसोसिएट प्रोफेसर ही एससी श्रेणी से थे। 24 केंद्रीय विश्वविद्यालयों से एकत्र किये गए इन आकड़ों को प्रतिशत के लिहाज से देखे तो, यह क्रमशः 2.73 प्रतिशत और 4.4 प्रतिशत है। याद रहे एससी के लिए संवैधानिक रूप से केंद्र की नौकरियों में 15 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

इसी कड़ी में एक अन्य तथ्य जो भारत की उच्च शिक्षा में दलितों के प्रतिनिधित्व की पोल खोलती है वह है दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध 80 कॉलेजों में प्रधानाचार्यों की नियुक्ति। इन 80 प्रधानाचार्यों में एक भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति का नहीं है। 21 नवंबर, 2019 के ‘दि हिन्दू’ अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार मानव संसाधन मंत्री ने राज्यसभा को यह अवगत कराया कि भारत के 20 आईआईएम (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट) में केवल 11 शिक्षक अनुसूचित जाति /जन जाति के हैं। 20 में से 11 संस्थानों, जिनमें आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम कोलकत्ता भी शामिल है, में भी अनुसूचित जाति /जनजाति का शिक्षक नहीं नियुक्त किया गया है, जबकि संवैधानिक आधार पर उनको क्रमशः 15 एवं 75 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। अतः उपरोक्त आकड़ों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थान 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक तक भी समावेशी नहीं हैं और इसलिए लोकतांत्रिक भी नहीं हैं।

दलितों के साथ अस्पृश्यता और उन पर अपराध नेशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकनोमिक रिसर्च (National Council of Applied Economic Research: NCAER) और अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर 42,000 परिवारों के अध्ययन के आधार पर ये निष्कर्ष निकला कि भारत में अभी भी व्यापक स्तर पर छूआछूत प्रचलित है। विशेष कर हिंदी भाषा भाषी प्रदेशों में जिसमें सबसे अधिक अस्पृश्यता का व्यवहार होता है, वो प्रदेश मध्य प्रदेश (53 %), हिमाचल प्रदेश (50 %) राजस्थान एवं बिहार (47 %) तथा उत्तर प्रदेश में 43 प्रतिशत है।

जहां तक दलितों पर सवर्णों द्वारा अत्याचार का मामला है, उस संदर्भ में ‘नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो रिपोर्ट’, 2019, वॉल्यूम 2, पेज 509, पर गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार दलितों पर 2017 में 43203, 2018 में 42793 और 2019 में 45935 अपराध हुए हैं। अर्थात एक दिन में लगभग 125 अपराध। इसी रिपोर्ट के पेज 513 के अनुसार केवल वर्ष 2019 में दलित महिलाओं और बच्चियों के साथ कुल 3471 अपराध हुए हैं। अर्थात एक दिन में लगभग 10 बलात्कार की घटनाएं। इसी कड़ी में भारत में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 2018 (वॉल्यूम 2, चैप्टर 7, पेज नं. 510) के अनुसार 2018 में 821 दलितों की हत्याएं हुई अर्थात लगभग 2-3 दलितों की हत्याएं रोज। यहां यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि ये वो अपराध के आंकड़े हैं जो पुलिस में दर्ज हुए। कल्पना कीजिए कितने दलित डर के मारे रिपोर्ट लिखाते ही नहीं है, या बहुतों की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जाती। इन्हें मिला लें तो इन अपराधों की संख्या कहीं ज्यादा होगी।

कहाँ है अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष? ऐसे में सबसे अधिक दुखद बात तो यह है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति दोनों ही आयोग के अध्यक्षों के पद खाली पड़े हैं। यह इस ओर भी इशारा करता है कि सरकार दलितों के कल्याण एवं उत्थान के लिए कितनी अगंभीर है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 के अंतर्गत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/ जनजाति आयोग ही है जिसका मुख्य काम यह देखना है कि इन समूहों को संविधान में दिए गये अधिकार विधिवत लागू हो रहे हैं या नहीं। आयोगों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण काम यह होता है कि वो हर वर्ष अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षणिक अवस्था तथा उन पर हिंसा आदि की रिपोर्ट तैयार कर राष्ट्रपति को सौपते हैं और बाद में राष्ट्रपति फिर उन रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखते हैं। इन रिपोर्टों पर संसद के दोनों सदनों में बहस होती है और फिर उस पर एक्शन टेकेन रिपोर्ट तैयार कर सदन को सूचित किया जाता है कि इन समाजों की वास्तविक अवस्था क्या है। इस तरह संविधान के निर्माताओं में दलितों के मानव अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की थी परन्तु आज कल यह सब ताक पर रख दिया गया है।

दलित/ बहुजन आंदोलन: इतिहास और वर्तमान दलितों की उपरोक्त सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, शैक्षणिक आदि दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए वर्तमान समय में दलितों ने कम से कम 9 प्रकार के आंदोलन या संगठन स्थापित किए हैं और वे लगातार अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं। यह 9 प्रकार के आंदोलन हैं- सामाजिक, राजनीतिक, कर्मचारी तंत्र, साहित्यिक, दलित महिला आंदोलन, दलित स्वयंसेवी संगठन का आंदोलन, दलित युवाओं का आंदोलन, दलित मीडिया का आंदोलन और विश्व के अनेकों राष्ट्रों में रह रहे अप्रवासी दलित भारतीयों का आंदोलन। इन आंदोलनों एवं संगठनों के माध्यम से दलित समाज ने उपरोक्त संस्थाओं में अपनी सदस्यता स्थापित करने एवं अपने अधिकारों को लेने की कोशिश की है। (इन आंदोलनों की पूरी जानकारी के लिए देखें दलित दस्तक अंक- जनवरी 2015, वर्ग 3 अंक 8; या फिर देखें दलित एजेंडा 2050- दास पब्लिकेशन, 2015)। यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि वर्तमान आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है और वर्तमान आंदोलन उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उन्हीं आंदोलनों को आगे बढ़ा रहे हैं। अतः चंद शब्द उन आंदोलनों की ऐतिहासिकता जानने के लिए यहां जरूरी है।                                                                         50 बहुजन नायक खरीदें

अगर हम यह मान लें कि ज्योतिबा फुले ने अपना आंदोलन 1848 में आरंभ किया था तो आज 2021 में बहुजन समाज का उनका आंदोलन 173 वर्ष पुराना हो जाएगा। इस पड़ाव में आंदोलन को नवीन ऊंचाई देने के लिए नारायणा गुरु, साहू जी महाराज, ई.वी रामास्वामी नायकर (पेरियार), बाबासाहब आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद, मंगू राम, भाग्यरेड्डी वर्मा, आदि अनेक दलित/ बहुजन नायकों ने अपना सर्वस्व निछावर कर इस आंदोलन की सेवा की। आधुनिक भारत में बाबासाहब ने अपने- सामजिक, राजनैतिक, संवैधानिक, धार्मिक एवं शैक्षिणक आंदोलनों से दलितों के आंदोलन को नयी दिशा एवं नए तरीके दिए जो आज भी उतने कारगर हैं जितने उस समय थे। 6 दिसंबर 1956 को उनके महापरिनिर्वाण के बाद 1972 तक आर पी आई एवं दलित पैंथर ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया जिसकी छवि उत्तर प्रदेश में भी दिखाई पड़ी। परंतु शीघ्र ही अपने शीर्ष नेतृत्व की अंतरकलह के कारण एवं लीडरों के अहम की लड़ाई (मैं बड़ा मै बड़ा) के कारण दोनों ही आंदोलन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए। वैसे उस दौरान (1971 में) दलित बहुजन आंदोलन को तोड़ने और उसके लीडरों को अपने दल में शामिल कर खत्म करने में कांग्रेस का बहुत बड़ा योगदान रहा है। और ऐसे लगने लगा कि जैसे दलित और बहुजन आंदोलन खत्म ही हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस ने बी पी मौर्य और आर.पी.आई के एजेंडे को ही आत्मसात कर उत्तर प्रदेश ही नहीं पुरे देश में दलित आंदोलन को ही नेस्तनाबूत कर उसकी नींव को ही ख़त्म करने का प्रयास किया।

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ऐसे अंधकार पूर्ण समय में मान्यवर कांशीराम के आंदोलन का उदय हुआ। सन 1971 में पहली बार बामसेफ की नींव डालकर 1973 में इसको और मजबूती प्रदान की और बाद में 1978 में दिल्ली में इस कर्मचारी आंदोलन ‘बामसेफ’ को अखिल भारतीय स्वरूप दिया। 1981 में उन्होंने अपने आंदोलन को और विस्तार देने के लिए डी एस-4 बनाई और 1984 में बहुजन समाज पार्टी को बनाकर अपने पूर्वजों के आंदोलन को आगे बढ़ाया। उत्तर प्रदेश जैसे भारत के सबसे बड़े प्रान्त में पांच-पांच बार सरकार बनाई और इसमें चार बार (1995, 1997, 2001, 2007) एक दलित महिला को मुख्यमंत्री बनाया। इस आंदोलन ने उत्तर प्रदेश में ही नहीं अखिल भारतीय स्तर पर बहुजनों का सशक्तिकरण किया और राज्य में सवर्णो की सत्ता को भी चुनौती दी। इस आंदोलन ने दलितों के प्रतीकों को पुनः स्थापित किया और सामाजिक न्याय की नींव को और मजबूत किया। साथ ही साथ दलितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों में भी सत्ता की ललक पैदा की। भविष्य के आंदोलन की तैयारी

परन्तु 34 वर्ष पहले बनी बहुजन समाज पार्टी पिछले 12 वर्षों से सत्ता से बाहर है। इस बीच 2021 तक आते-आते राष्ट्र और राज्य की राजनीति में अमूल चूल परिवर्तन हो चुका है। राष्ट्र राजनीति में गोदी मीडिया और चंद कारपोरेट घरानो को ऐसी भूमिका में पहले कभी देश में नहीं देखा गया। साथ ही साथ इन 34 वर्षों में बहुजन समाज की एक नयी पीढ़ी, जिसने बहुजन समाज पार्टी की सरकार में सत्ता का स्वाद चखा था, भी खड़ी हो गयी है। यह पीढ़ी पुनः सत्ता प्राप्त करने के लिए व्याकुल है। उसे नेतृत्व भी चाहिए। परन्तु जैसे सभी समाजों की युवा पीढ़ी को फास्ट फ़ूड के ज़माने में हर एक चीज तेजी से चाहिए उसी तरह बहुजन समाज की इस नयी पीढ़ी को भी फ़ास्ट फ़ूड की तरह ही सत्ता और नेतृत्व भी चाहिए।

प्रो. विवेक कुमार द्वारा संपादित, राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पुस्तक खरीदें

बहुजन आंदोलन के इतिहास का आंकलन करने से यह बात सामने निकल कर आई है कि अक्सर दलित/ बहुजन समाज के लोग अपने आपको और अपने द्वारा स्थापित किए गए संगठन को सबसे बड़ा क्रांतिकारी घोषित करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। वे इतिहास में अपने आंदोलन और नायकों के संघर्षों पर जितना गर्व या उनका जितना सम्मान करना चाहिए उतना गर्व या सम्मान नहीं करते। सब को ख़ारिज कर, सबको बेकार और नकारा बता कर अपने संगठन और अपने नेतृत्व को सबसे क्रांतिकारी बता कर आगे निकलना चाहते हैं। इतिहास साक्षी है कि कोई पीढ़ी तब तक कामयाब नहीं होती जब तक वह अपने पूर्वजों के त्याग, संघर्षो और उनकी सलताओं का पर्व/उत्सव नहीं मनाती। उसके गीत नहीं गाती।

आंदोलन फास्टफूड जैसा नहीं होता आंदोलन फास्टफूड की मैगी या बर्गर नहीं है जिसे आर्डर किया और वह आ गया और आपने पेट भर लिया। आंदोलन त्याग-संघर्षों की एक लम्बी यात्रा है। यह यात्रा अपने आप को चमकाने या किसी स्थापित लीडर से तुलना करने के लिए नहीं होती। सफल आंदोलन ने लिए केवल मीडिया का सहारा नहीं लिया जाता, चाहे वह सोशल मीडिया हो या कॉर्पोरेट मीडिया। किसी अन्य दल या बिज़नेस घराने का सहारा लेकर भी बहुजन आंदोलन नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि सहारा लोगे तो इशारा भी लेना पड़ेगा। अखिल भारतीय स्तर पर मजबूत आंदोलन तैयार करने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर मजबूत संगठन, न डिगने वाली विचारधारा, हर स्तर पर कैडर और उन कैडरों को तैयार करने के लिए एक दूरदर्शी पाठ्यक्रम, लगातार कैडर कैम्प का लगा कर कैडरों की विचारधारा को मांझना, संगठन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक कार्यक्रम आदि कुछ ऐसे मूल मन्त्र हैं जिनसे एक सफल आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। आंदोलन खड़ा करने के लिए इतनी व्यापक तैयारी इसलिए क्योंकि हमारा प्रतिद्वंदी बहुत बड़ा है और उसकी पहुंच भी बहुत व्यापक है। उसके पास सभी प्रकार की संस्थाएं- राजनैतिक, संवैधानिक, शैक्षणिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि है और उन पर उसका कब्ज़ा है।

 अतः अगर हमने पुनः जल्दबाजी में बिना लम्बी तैयारी के कोई नया आंदोलन आरंभ किया तो हम फिर धोखा खाएंगे। हमारे साथ जैसे पहले छल हुआ 2021 में भी छल होगा। और जब तक हमारी तयारी पूरी न हो जाए हमें वर्तमान के अपने आंदोलन को उपरोक्त कार्यक्रमों के माध्यम से कैसे मजबूत किया जाय इसकी योजना बनानी चाहिए।

2021 में ऐसे बनेगा बहुजन भारत

दलित दस्तक अपने 9वें वर्ष में है। बीते आठ वर्षों में हमने समसामयिक विषयों पर चर्चा को अधिक तव्वजो दी है। लेकिन दर्जनों अन्य स्रोतों से आ रहे खबरों के प्रवाह ने समसामयिक विषयों पर चर्चा को काफी हद तक पूरा किया है। हम भी दलित दस्तक की वेबसाइट और यू-ट्यूब चैनल के जरिए समसामयिक विषयों पर लेखों का प्रकाशन और वीडियो के जरिए चर्चा करते रहते हैं। ऐसे में नए साल में दलित दस्तक मैग्जीन आपको समसामयिक विषयों के साथ वैचारिक मासिक पत्रिका के रूप में देखने को मिलेगी।

जब हम विचार की बात करते हैं तो हमारी विचारधारा तथागत बुद्ध के ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ को समर्पित है। हमारी विचारधारा सतगुरु रविदास के बेगमपुरा की परिकल्पना को समर्पित है। हमारी विचारधारा संत कबीर के आडंबर और अंधविश्वास रहित भारत की विचारधारा है। और जब हम विचारधारा की लड़ाई में उतरते हैं तो दलित, वंचित, पिछड़ा और आदिवासी कहे जाने वाले समाज के सामने अक्सर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की चुनौती महसूस की जाती है। ऐसे में जब एक ओर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने को अमादा देश की सरकार है तो देश के मूलनिवासी समाज के सामने अपनी बहुजन-मूलनिवासी और आदिवासी पहचान को बचाए रखने की चुनौती है। आज जब अपनी मूल पहचान को भूल कर बहुसंख्यक बहुजन (दलित-पिछड़ा-आदिवासी) तबका ‘हिन्दू’ बनने को आतुर है, यह चुनौती और बढ़ जाती है।

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ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं है कि बहुजन समाज अपनी ऐतिहासिक तारीखों, अपने नायकों, अपने पर्व-त्यौहारों और बहुजन संस्कृति को स्थापित करने की दिशा में और मजबूती से बढ़े। ‘दलित दस्तक’ के जरिए हम उन तारीखों, उन त्यौहारों को एक बार फिर से बहुजन समाज को अवगत कराने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारी बहुजन विरासत को समृद्ध करने वाले हैं। इसके लिए हमें महीने दर महीने उन 12 आंदोलनों को याद करना होगा, जिसने मूलनिवासी बहुजन संस्कृति के इतिहास को समृद्ध किया है। हमें उन नायकों को याद करना होगा जिन्होंने देश में बहुजन विचारधारा की मजबूती के लिए, अपनी मूलनिवासी पहचान को बरकार रखने के लिए शहादत दी। हमें उन नायक/नायिकाओं को याद करना होगा, जिन्होंने बहुजन समाज की सामाजिक मुक्ति के लिए अपना जीवन लगा दिया। इस कड़ी में सबसे पहले बात उन 12 बहुजन आंदोलनों की जिन्हें याद करना जरूरी है।

जनवरी (कोरेगांव की क्रांति) 01 जनवरी सन् 1818 में एक ऐसी घटना घटी थी, जिसने दलित समाज के शौर्य को दुनिया भर में स्थापित किया था। यह दिन कोरेगांव के संघर्ष के विजय का दिन है। यह लड़ाई महाराष्ट्र के पुणे स्थित भीमा-कोरेगांव में लड़ी गई थी। यह युद्ध लगातार 12 घंटे तक चला। इस महायुद्ध में पेशवा बाजीराव-II की 28 हजार सेना को ‘बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री’ के 500 ‘महार’ सैनिकों ने रौंद डाला था। इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है। इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे। 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया। बहुजन समाज को नए साल की बधाई के साथ कोरेगांव विजय दिवस जिसे शौर्य दिवस कहा जाता है, उसकी भी बधाई देनी चाहिए। एक जनवरी को देश भर से हजारों लोग यहां पहुंच कर उन लड़ाकों को याद करते हैं।

फरवरी (चौरी चौरा आंदोलन) स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास चौरी चौरा के जिक्र के बिना अधूरा है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर यह घटना 4 फरवरी (कुछ जगह 5 फरवरी भी दर्ज है।) 1922 को घटी। हुआ यह कि असहयोग आंदोलन के दौरान पुलिस ने दो क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। विरोध में आंदोलनकारी थाने के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे, जिस पर पुलिस ने गोलियां चला दी, जिसमें तीन क्रांतिकारी मारे गए। इससे भड़के क्रांतिकारियों ने रमापति चमार के नेतृत्व में चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी, जिसमें थानाध्यक्ष समेत 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। भड़के अंग्रेजों ने 222 क्रांतिकारियों को आरोपी बनाया, जिसमें ज्यादातर दलित क्रांतिकारी शामिल थे। 2 जुलाई, 1923 को रमापति चमार सहित 19 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई।

मार्च (चावदार तालाब क्रांति) चावदार तालाब नाम का यह आंदोलन बाबासाहब डॉ. आम्बेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला स्थित महाड़ में चलाया गया। उस वक्त सार्वजनिक कुओं व तालाब पर अछूतों को पानी पीने की मनाही थी, चाहे वह प्यास से मर ही क्यों न रहे हों। नगर परिषद के आदेश के बावजूद सवर्ण हिन्दु मानने को तैयार नहीं थे। तब 20 मार्च को बाबासाहब के नेतृत्व में 10 हजार से ज्यादा दलितों ने सत्याग्रह करते हुए तालाब की ओर कूच किया और पानी पी लिया। भड़के सवर्णों ने इसको पवित्र किया। इसके खिलाफ डॉ. आंबेडकर अदालत गए। लंबी लड़ाई के बाद बाम्बे हाई कोर्ट ने दलितों को पानी पीने के हक का आदेश दिया। आज उसी चावदार तालाब के बीचो बीच बाबासाहेब की प्रतिमा है।

अप्रैल (महिला मुक्ति क्रांति) आज महिलाओं को जो भी अधिकार हासिल हैं, उसमें हिन्दू कोड बिल की बड़ी भूमिका है, जिसकी परिकल्पना डॉ. आंबेडकर ने की थी। विधवा पुनर्विवाह, पैतृक संपत्ति में हक, गोद लेने का अधिकार, मातृत्व अवकाश जैसी तमाम सुविधाएं जो महिलाओं को हासिल है, वह बाबासाहब की ही देन है। महिलाओं पर लादी गई सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने के लिए डॉ. आंबेडकर ने 11 अप्रैल 1947 को भारतीय संसद में हिन्दू कोड बिल पेश किया। लेकिन बिल संसद में पास नहीं हो सका। विरोध में डॉ. आंबेडकर ने नेहरू मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया। हालांकि 1952 में डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित बातें अमल में लाई गई और महिलाओं को वो अधिकार मिले, जिसकी परिकल्पना बाबासाहब ने की थी। इस तरह महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया।

मई (दलित पैंथर क्रांति) वंचित समाज सदियों से साधन संपन्न और सत्ताधारी जातियों के अत्याचार का शिकार हुआ है। असहाय समाज अपने भीतर गुस्सा पाले सदियों तक इस अपमान को मजबूरी में सहता रहा। बाबासाहब डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान में मिले अधिकारों की बदौलत जब यह समाज थोड़ा उठ कर खड़ा हुआ तो अपने साथ हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगा। जाति उत्पीड़न के खिलाफ 29 मई 1972 को महाराष्ट्र में नामदेव ढसाल, जे.वी पंवार और राजा ढाले आदि युवाओं ने दलित पैंथर की स्थापना की। यह अफ्रीकी-अमरिकी संस्था ब्लैक पैंथर से प्रेरित था। इसने दलितों के खिलाफ होने वाले जुल्म का जवाब देना शुरू किया। यह एक बड़ा आंदोलन था, जिससे महाराष्ट्र प्रदेश में हलचल मच गई और दलितों पर अत्याचार करने से पहले अत्याचारी समाज डरने लगा।

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जून (हूल दिवस क्रांति) 1857 के विद्रोह को अंग्रेजो के खिलाफ पहला विद्रोह बताया जाता है, लेकिन सच यह है कि इससे पहले 30 जून, 1855 को आदिवासी वीरों सिदो, कान्हू और चांद, भैरव ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था। इन्होंने संथाल परगना के भगनाडीह में लगभग 50 हजार आदिवासियों को इकट्ठा करके अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। उन्होंने नारा दिया- ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’। अंग्रेजों को यह रास नहीं आया और भीषण युद्ध हुआ, जिसमें 20 हजार आदिवासी क्रांतिकारी शहीद हुए। जबकि वीर सिदो, कान्हू को 26 जुलाई 1855 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। वीर शहीदों ने जिस 30 जून को क्रांति का बिगुल फूंका था, उसी दिन को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

जुलाई (महिला शिक्षा क्रांति) भारतीय इतिहास में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को वंचित तबके की महिलाओं में शिक्षा क्रांति के लिए जाना जाता है। यूं तो ज्योतिबा फुले का महिला शिक्षा का आंदोलन 1848 में ही शुरू हो गया था, लेकिन 3 जुलाई 1851 को फुले दंपत्ति ने पुणा के बुद्धवार पेठ मुहल्ले में स्थित अन्ना साहेब वासुदेव चिपलूणकर भवन में जो स्कूल खोला उसे हम वंचित तबके की महिलाओं की शिक्षा क्रांति के आंदोलन की ठोस शुरुआत कह सकते हैं। इसके बाद ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने गरीब अछूत समाज की लड़कियों के लिए एक के बाद एक 18 विद्यालय शुरु किये, जो निस्संदेह महिला शिक्षा क्रांति आंदोलन की शुरुआत थी। महिला शिक्षा के इस आंदोलन में फातिमा शेख ने भी फुले दंपत्ति का पूरा साथ दिया।

अगस्त (मंडल आंदोलन) पिछड़े वर्ग की स्थिति की समीक्षा के लिए 20 दिसंबर 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया। यह मंडल आयोग के नाम से चर्चित हुआ। दिसंबर 1980 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई। 1982 में यह रिपोर्ट संसद में पेश हुई और 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। सत्ता में आने पर 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रिपोर्ट लागू करते हुए ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी। सवर्णों ने इसका भारी विरोध किया, लेकिन तमाम विरोध के बावजूद 13 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की अधिसूचना जारी हो गई।

सितंबर (सत्यशोधक समाज क्रांति) सत्यशोधक समाज का उद्देश्य शूद्रों-अतिशूद्रों को ब्राह्मणों के शोषण से मुक्ति दिलाकर समानता लाना था। इसके सदस्यों ने यह प्रण किया कि वे बिना किसी मध्यस्थ के एक विश्वनिर्माता की आराधना करेंगे। इस संस्था के तहत कुनबी, माली, कुंवर, बढ़ई सहित शूद्र जातियों के 700 परिवारों ने निर्णय लिया कि वे आध्यात्मिक और सामाजिक मसलों पर ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्ति पाएंगे। स्थापना के पहले ही वर्ष में सत्यशोधक समाज ने अपने सदस्यों को विवाह समारोहों में ब्राह्मणों की मौजूदगी की जरूरत को खत्म करने के लिए प्रोत्साहित किया। सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फुले ने 24 सितम्बर, 1873 को किया था। वह इसके प्रथम अध्यक्ष बने। इस तरह वंचितों के सामाजिक जीवन को ब्राह्मणमुक्त करने का अभियान शुरू हुआ। यह ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरुआती क्रांति थी।

अक्टूबर (धम्म क्रांति) 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर शहर में डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने पांच लाख से अधिक समर्थकों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर भारत में बौद्ध धम्म का पुर्नउत्थान किया। पहले डॉ. आंबेडकर ने कुशीनगर के भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणी द्वारा पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद अपने लाखों अनुयायियों को त्रिरत्न, पंचशील और 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाते हुए बौद्ध बनाया। ऐसा बड़ा कदम उठाकर बाबासाहब ने भारत के वंचित समाज को हिन्दू धर्म से निकालते हुए नया रास्ता दिखाया, जहां समता और बंधुत्व की बात थी। बौद्ध धम्म से जुड़ कर करोड़ों दलित, शोषित हिन्दू धर्म के भेदभाव से मुक्त हो चुके हैं। वंचित समाज के लिए यह एक बड़ी धार्मिक क्रांति थी। इसे धम्म क्रांति कहा जाता है।

नवंबर (संविधान दिवस क्रांति) अगर हम भारत की सबसे बड़ी क्रांति की बात करें तो यह 26 नवंबर 1949 को घटित हुई। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने भारत के संविधान को 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन में पूरा कर 26 नवम्बर 1949 को राष्ट्र को समर्पित किया। संविधान प्रारुप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आम्बेडकर ने संविधान को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंप दिया। संविधान में मिले अधिकारों की बदौलत रातों-रात भारत में राजा और रंक कानूनी रूप से समान हो गए। जिस भारत में एक विशेष वर्ग को तमाम विशेषाधिकार प्राप्त था, और जाति की वजह से जिस वर्ग को तमाम जिल्लतें सहनी पड़ती थी, वो एक जगह पर आकर खड़े हो गए। दलितों-शोषितों के मुक्ति की कहानी शुरु हुई।

दिसंबर (मनुस्मृति दहन क्रांति) मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक ऐसा ग्रंथ है, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच असमानता की बात करता है। जो दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं को तमाम अधिकारों से वंचित करने की वकालत करता है। 25 दिसंबर, 1927 को बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर और उनके समर्थकों ने मनुस्मृति को सार्वजनिक तौर पर जलाकर इसमें लिखी अमानवीय बातों का विरोध किया। यह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दलितों के संघर्ष की अति महत्वपूर्ण घटना है। मनुस्मृति जलाने के कार्यक्रम को विफल करने के लिए सवर्णों ने कई अवरोध पैदा किया। उन्होंने पूरी कोशिश की कि हिन्दू समाज का कोई व्यक्ति उन्हें इस आयोजन के लिए जमीन न दे। तब फत्ते खां ने अपनी निजी ज़मीन उपलब्ध करायी थी। अत्याचार, शोषण और भेदभाव की पोषक मनुस्मृति को जलाने का सिलसिला आज भी जारी है।

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इन बहुजन क्रांतियों को याद रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ये आंदोलन और क्रांति हमें हमारे इतिहास और हमारे पूर्वजों के संघर्ष के बारे में बताती है। ये बताते हैं कि आज दलित-आदिवासी-पिछड़ा समाज जिस स्थिति में है, उसके लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत आंदोलन किया है। इस समाज के जितने भी लोगों को आज स्वतंत्रता और बेहतर जिंदगी मिल सकी है, वो इन्हीं संघर्ष और क्रांतियों के बूते मिली है।

बहुजन समाज के सामने एक और बड़ी दिक्कत पर्व और त्योहारों की है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को याद नहीं रखने के कारण हम अक्सर हिन्दू पर्व और त्योहारों में उलझे रहते हैं। लेकिन आप गौर से देखेंगे तो बहुजन समाज के भीतर कई ऐसे महत्वपूर्ण दिन है, जो ऐतिहासिक हैं और जिस दिन को बहुजन समाज को पर्व और उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। कुछ का जिक्र हमने ऊपर किया है, लेकिन इसके अलावा और भी तारीखे हैं। आइए एक नजर उस पर डालते हैं।

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) 26 जनवरी के दिन साल 1950 में भारत सरकार अधिनियम (एक्ट) (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था। 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा की ओर से संविधान अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू कर दिया गया। भारत का संविधान डॉ. आम्बेडकर द्वारा बनाने की वजह से इस दिन का अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोगों में खासा महत्व है। यही वो दिन है, जिस दिन के बाद डॉ. आम्बेडकर द्वारा लिखे संविधान की बदौलत देश में वंचित समाज को न्याय मिलने की शुरूआत हुई और मनुस्मृति के दौर का अंत शुरू हो गया। यह दिन लोकतांत्रिक त्यौहार का दिन है।

सतगुरु रविदास जयंती (27 फरवरी) मध्यकालीन संतों में सतगुरू रविदास का स्थान श्रेष्ठ है। इसी कारण उनको संत शिरोमणि भी कहा जाता है। सतगुरु रविदास का जन्म संवत 1433 (1376 ईं.स) में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। यह जिस दिन और तारीख को होता है, उसी दिन दुनिया भर में रविदास जयंती मनाई जाती है। साल 2021 में यह तारीख 27 फरवरी को है। सतगुरु का जन्म बनारस के नजदीक मांडुर गढ़ (महुआडीह) नामक स्थान पर हुआ था। ये चमार जाति में पैदा हुए। गुरुग्रंथ साहिब में संकलित रविदास के पदों में उनकी जाति चमार होने का उल्लेख बार-बार आया है। सतगुरु रविदास राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु भी थे। सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत और दूसरे लेखन (41 पद) शामिल हैं। पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव ने इसका संकलिन किया था। सतगुरु रविदास के ज्ञान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने विद्वता के लिए प्रख्यात काशी (वाराणसी) के पंडों को ज्ञान की परीक्षा में पराजित कर दिया था। जिसके बाद शर्त के मुताबिक काशी के पंडों ने उन्हें पालकी में बैठाकर उसे अपने कंधों पर ढोकर पूरे शहर में घुमाया था। इस दिन को पूरे दलित-वंचित समाज को त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए। इस दिन सतगुरु की जन्मभूमि वाराणसी में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें दुनिया भर से उनके अनुयायी शामिल होते हैं। आप भी इस दिन अपने परिवार क साथ वाराणसी जा सकते हैं।

11 अप्रैल ज्योतिबा फुले जयंती एवं 14 अप्रैल बाबासाहेब अम्बेडकर जयंती बहुजन समाज के लिए यह एक साकारात्मक संयोग है कि इसके दो महापुरुषों की जयंती महज चार दिन के बीच आती है। इसमें एक हैं महामना ज्योतिबा राव फुले और दूसरे हैं राष्ट्रनिर्माता बाबासाहब आंबेडकर। बाबासाहब आंबेडकर ने अपने जीवन में वंचित समाज की मुक्ति की जो मुहिम चलाई थी, उसकी नींव काफी पहले ज्योतिबा राव फुले डाल चुके थे। ये दोनों महापुरुष बहुजन समाज की मुक्ति के सूत्रधार बने थे। इनकी जयंती बहुजन समाज के लिए एक बड़ा दिन है। इसे उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। आप अपनी सुविधानुसार इसे संयुक्त रूप से भी मना सकते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा (26 मई) बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने बहुजन समाज को हिन्दू धर्म से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म की राह दिखाई थी। बाबासाहब ने खुद अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। तब से लेकर आज तक वंचित समाज के लाखों लोग अपने जीवन में बौद्ध बन चुके हैं। या फिर बौद्ध धर्म के प्रभाव में हिन्दु धर्म की रुढ़ियों और अंधविश्वास से बाहर निकल चुके हैं। साल 2021 में बुद्ध पूर्णिमा 26 मई को है। यह बहुजनों का एक बड़ा त्यौहार है।

संत कबीर जयंती (24 जून) रविदास जयंती की तरह कबीर जयंती भी तिथि के हिसाब से अलग-अलग तारीख को आती है। लेकिन यह अमूमन जून महीने में ही आती है। साल 2021 में कबीर जयंती 24 जून को है। कबीर 15वीं शताब्दी के एक विशिष्ठ कवि थे। कबीर का जन्म 1440 में जेठ महीने में पूरनमासी को हुआ बताया जाता है, जबकि उनका जन्म स्थान काशी माना जाता है। कबीर; सन्त कवि और समाज सुधारक थे। संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। कबीर की वाणी को हिंदी साहित्य में बहुत ही सम्मान के साथ रखा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में भी कबीर की वाणी को शामिल किया गया है। कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ (Bijak) नाम से है। वंचित समाज को ब्राह्मणवाद और आडंबर से बाहर निकालने के लिए संत कबीर अपने जीवन के आखिरी वक्त में मगहर चले गए थे, क्योंकि वह स्वर्ग-नरक और मोक्ष के उस मिथ्या प्रचार को झुठलाना चाहते थे, जिसमें ब्राह्मणवादी यह प्रचार करते थे कि काशी में मृत्यु होने पर लोगों को मोक्ष मिलता है। काशी और मगहर दोनों जगह संत कबीर से जुड़े स्थल है। काशी में कबीर मठ लोकप्रिय है तो मगहर में कबीर का मजर और मंदिर दोनों है। मगहर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पास है। अब इसे संतकबीर नगर के नाम से जाना जाता है। इस दिन बहुजन समाज को इन स्थलों पर जाकर त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए।

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धम्मचक्क पवत्तन दिवस (14 अक्टूबर) 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर शहर में डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर ने स्वयं और अपने लाखों समर्थकों के साथ त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। तब से हर वर्ष इस दिन को धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया जाता है। भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान इसी दिन से शुरू हुआ था। यह दिन भी बहुजन समाज के लिए महत्वपूर्ण है। इसे बड़े त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए।

बिरसा मुंडा जयंती (15 नवंबर) बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के भगवान हैं। आदिवासी समाज के हित और आजादी के लिए उन्होंने पूरे जीवन लड़ाईयां लड़ी। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को चालकद ग्राम में हुआ। बिरसा मुंडा को अपनी भूमि और संस्कृति से गहरा लगाव था। उन्होंने न केवल राजनीतिक जागृति के बारे में संकल्प लिया बल्कि अपने लोगों में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जागृति पैदा करने का भी संकल्प लिया। उन्होंने गांव-गांव घुमकर लोगों को अपना संकल्प बताया। उन्होंने ‘अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज (हमारे देश में हमार शासन) का बिगुल फूंका। बिरसा द्वारा शुरू किया गया वह आंदोलन आज तक चल रहा है।

उन तमाम बहुजन नायकों की जयंती को भी विशेष दिन के रूप में मनाने का रिवाज बहुजन समाज के बीच चल ही पड़ा है, जिन्होंने देश की बहुत बड़ी आबादी को अपने-अपने वक्त में प्रभावित किया। इसमें सावित्री बाई फुले जयंती (3 जनवरी), बाबू मंगूराम जयंती (14 जनवरी), कर्पूरी ठाकुर जयंती (24 जनवरी), जोगेन्द्र नाथ मंडल जयंती (29 जनवरी), बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा जयंती (2 फरवरी), संत गाडगे जयंती (23 फरवरी), मान्यवर कांशीराम जयंती (15 मार्च), स्वामी अछूतानंद जयंती (6 मई), छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती (26 जून), साहित्यकार अन्नाभाऊ साठे जयंती (1 अगस्त), नारायणा गुरु जयंती (20 अगस्त), राम स्वरूप वर्मा (22 अगस्त), अय्यनकाली जयंती (28 अगस्त), ललई सिंह यादव जयंती (1 सितंबर), पेरियार जयंती (17 सितंबर), मदारी पासी जयंती (24 अक्टूबर), उदा देवी शहादत दिवस (16 नवंबर), झलकारी बाई जयंती (22 नवंबर), क्रांतिकारी मातादीन जयंती (29 नवंबर), गुरु घासीदास जयंती (18 दिसंबर), और ऊधम सिंह जयंती (26 दिसंबर) शामिल है। इसके अलावा और भी बहुत से नाम हैं, जिन्होंने दलित-वंचित-आदिवासी और पिछड़े समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। स्थानीय स्तर पर ऐसे सैकड़ों नाम हैं। बहुजन समाज को उनकी जयंती पर उन्हें जरूर याद करना चाहिए।

ये दिन दलित-वंचित समाज के असली त्यौहार के दिन हैं। किसी दूसरे के धर्म के दिन जश्न में डूबने से अच्छा है कि बहुजन समाज इन दिनों को जश्न के रूप में मनाए और इस दिन को स्थापित करने में भागीदारी निभाए। हालांकि भारत का बहुजन तबका इन दिनों को विशेष पर्व के रूप में कमोबश याद करना शुरू कर चुका है, लेकिन इसको और अधिक प्रचारित करने की जरूरत है। ऐसा कर के ही एक नए बहुजन भारत का निर्माण हो सकेगा।

कोरेगांवः अछूतों की वीरगाथा का स्वर्णिम अध्याय

 Written By- डॉ. नरेश कुमार ‘सागर’ भारतीय इतिहास और इतिहासकारों ने बेशक अपनी मानसिक विकृति के चलते भले ही अछूतों को सही स्थान नहीं दिया हो, मगर ये सच है कि जब भी इस मूलनिवासी समाज को मौका मिला उन्होंने अपने जौहर खुलकर दिखाये हैं। देशभक्ति हो या साहित्य कला हर क्षेत्र में इनका अपना एक अलग ही अंदाज रहा है। फिर चाहे- संत रैदास हो, वाल्मीकि हो, वेदव्यास हो, ज्योतिबा फूले हो या फिर बिरसा मुण्डा, गोविंद गुरू, हरिसिंह भंगी, चेतराम जाटव व बल्लू मेहतर और उधम सिंह, इनको भूलाया नही जा सकता है। हमारे महापुरूषों ने एक साथ दो-दो लड़ाईयां लडीं थी। एक ब्राह्मणवाद से अपने अपमान की और दूसरी तरफ अंग्रेजों से देश की आजादी की। बहुजन समाज दोनों गुलामी के पाटों के बीच लगातार पीस ही तो रहा था। बल्कि सच तो ये भी है कि बहुजन समाज आज भी अपनी आजादी की, सम्मान की और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ता दिखाई देता है।

 भीमा कोरागांव की घटना भी उन्हीं एक घटनाओं में से एक है जो आश्चर्य चकित तो करती है ही साथ में बहुजन समाज की हिम्मत और हौसले की बुलंद कहानी कहती नजर आती है। पेशवाओं से परेशान बहुजन समाज के लोग निरन्तर प्रताड़ित किये जा रहे थे। पेशवाओं ने अछुतों के गले में थूकने के लिए जहां हंडिया तक बंधवा दी थी वही इन मानसिक विकृत लोगों ने अछूतों के पीछे झाड़ू तक बंधवा दी थी ताकि उनके पैरों के निशान जमीन पर ना रहे और ब्राहम्णो के पैर और धर्म नष्ट ना हो। ऐसी मानसिकता केवल भारत में ही देखने को मिलती है।

 इस अपमान को सहने वाले मूलनिवास समाज को जब साल 1818 में एक जनवरी को पेशवाओं से अपने अपमान का बदला लेने का मौका मिला तो उन्होंने ऐसी लड़ाई लड़ी, जो इतिहास में दर्ज हो गई। महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा नदी के तट पर पुणे के पास 1 जनवरी 1818 की हाड़ कंपाती ठण्ड में 500 महार सैनिकों ने 28000 हजार की पेशवाओं की सेना को अपने पराक्रम से रौंद डाला। पेशवाओं की सेना में 2000 घुडसवार थे वही दूसरी तरफ महार रेजिमेन्ट की सेना में कुल 500 सौ सैनिक ही थे, जिसमें सिर्फ 250 घुड़सवार थे। इस छोटी सी सेना ने 12 घंटो की वीरतापूर्वक लडाई में हजारों की पेशवाओं की सेना को हराया ही नहीं बल्कि पेशवाओं की पेशवाई का भी अंत कर दिया था। इस लड़ाई का जिक्र ना तो इतिहास करता है और ना इतिहासकार। क्योंकि इस महायुद्ध में हमारे मूलनिवासी योद्धाओं की जीत हुई थी।

 इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र भारत के वीरपुत्र व बहुजनों के मसीहा बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने अपनी एक पुस्तक ‘‘राइटिंग्स एंड स्पीचेस’’ जो अंग्रेजी में लिखी गयी है के खण्ड 12 में ‘‘द अनटचेबल्स एण्ड द पेक्स ब्रिटेनिका” में इस तथ्य का वर्णन किया, तब जाकर समाज के सामने यह ऐतिहासिक सच्चाई आ पाई। आज भीमा कोरेगांव में इन महान योद्धाओं के नाम का एक स्तम्भ खड़ा है जो मूलनिवास महारों की वीरता की गवाही देता है। इस स्तम्भ पर सभी शहीदों के नाम खुदे हुए हैं जिससे समाज अपने वीर योद्धाओं की जानकारी रख सके। इस लड़ाई में मारे गये सैनिकों को 1851 में मेडल देकर अंग्रेजी सरकार ने सम्मानित भी किया था।

इस युद्ध के समाप्त होते ही पेशवाओं की पेशवाई का भी अंत हो गया था और अंग्रेजों को भारत में सत्ता मिल गयी। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस देश में शिक्षण का प्रचार भी किया जिससे हजारों सालों से बहुजन समाज वंचित था उनके लिए भी ये रास्ते खुले। ऐसा भी नहीं है कि हमेशा महारो ने अंग्रेजों की लडाई लड़ी बल्कि यही अछूत थे जिन्होंने सबसे पहले अंग्रेजो के खिलाफ भी युद्ध लड़ा। जिनमें हमारे समाज की स्त्रियों ने भी बराबर कदम बढाये थे। फिर चाहे उस लड़ाई को लड़ने वाले बिरसा मुण्डा हों, चेतराम चमार हों, हरिसिंह भंगी हों, बल्लू मेहतर हों, तेलंगा खडिया हों, तिलका मांझी हों या फिर रानी शवेश्वरी हों, झानू, फूलो, चाम्पी, साली, कैली दाई हों या फिर झलकारी बाई का पराक्रम हो। अछूतों का इतिहास वीरता के जौहरों से भरा पड़ा है, जिसके साथ आज तक न्याय नहीं हुआ है।

ऐसा लगता है कि बहुजन समाज को अपना अस्तित्व पाने के लिए अभी कोरेगांव जैसी एक और लड़ाई लड़नी होगी। नहीं तो ये वही इतिहासकार हैं जो अंग्रेजी सेना के सिपाही मंगल पाण्डे को तो देश भक्त बना देते हैं और मतादीन भंगी को नजर अंदाज कर देते हैं। हमारा समाज भी आज नए साल के मुबारकवाद के बीच अपने इतिहास को भूल जाता है, कोरेगांव के अपने शहीदों को भूल जाता है जालिम पेशवाओं की अंतिम यात्रा को भूल जाता है, जिसका खामियाजा हम उठाते रहते है। जबकि नए साल की बधाईयों के साथ कोरेगांव युद्ध की इस विजय गाथा को भी जरूर याद करना चाहिए। हमें नमन करना चाहिए कोरेगांव के उन सूरवीरों को जिन्होंने ओछी मानसिकता वाली पीढ़ी का अंत कर एक गौरवान्वित इतिहास रच दिया था।


लेखक यूपी के हापुड़ जिले निवासी हैं। डॉ. अम्बेडकर फैलोशिप से सम्मानित हो चुके हैं। संपर्क- 9897907490

पढ़िए, वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बहुजन कैलेंडर के बारे में क्या लिखा है

 बहुजन कैलेंडर
मेरी नज़र में काम की साधना का मतलब है उसमें डूब कर करते जाना। दलित दस्तक के अशोक दास अपने काम में साधक हैं। युवा अवस्था से ही उन्होंने अपना कुछ बनाने की चुनौती स्वीकार की है। उनके काम में प्रसार संख्या की प्रासंगिकता से मुक्त जुनून दिखता है। उनकी पत्रिका नियमित पहुँचती रहती है और साल ख़त्म होने पर कैलेंडर आ जाता है। भारत का इतिहास मुख्यधारा का इतिहास नहीं है। मुख्यधारा के चर्चित नामों के योगदान से इंकार नहीं कर रहा लेकिन इसमें एक क़िस्म का असंतुलन है।
इसे दूर करने का उपाय हर रोज़ किसी महापुरुष की याद में ट्विट करना भी नहीं है जो आज कल दिन भर झूठ बोलने वाले मंत्री करते हैं। वे सोमवार को शहीद उधम सिंह की जयंती मनाते हैं तो रविवार को अश्फ़ाक की। इसका पूरा मक़सद जताना होता है कि जानते हैं। स्मरण कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ट्विट करने वाला मंत्री इससे अधिक कुछ नहीं जानता। राजनीति भी तो यही करती है। मूर्ति बनाती है। भूल जाती है।
बहुजन समाज के नायकों और घटनाओं का पाठ करने पर आप जान पाते हैं कि मुख्यधारा की तस्वीर कितनी एकांगी है। अशोक के इस कैलेंडर से काफ़ी कुछ पता चलता है। पहले तो यही कि कैलेंडर को पंचांग की तिथियों और रंगीन तस्वीरों के अलावा भी दूसरे नज़रिये से देखा जा सकता है।
शानदार प्रयास है। आप इसे देखते हुए कितना कुछ जानते हैं। पिछले साल के कैलेंडर में नायक थे तो इस साल आंदोलन हैं। उनका महत्व है। सोचिए फ़ोन पर जो तारीख़ों का कैलेंडर होता है वो कितना सादा होता है। केवल नंबर होता है। लेकिन इस पारंपरिक कैलेंडर में कितना कुछ नया है। अपनी दीवारों पर ऐसे कैलेंडर की जगह बचा कर रखिए। अशोक दास को शुभकामनाएँ।

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक पेज से। उनके पेज पर यह पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

हैदराबाद में हुआ ब्राह्मण टूर्नामेंट, मचा बवाल

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 25 दिसंबर को जब देश के तमाम हिस्सों में बहुजनों द्वारा मनुवाद को पोसने वाली ‘मनुस्मृति’ की होली जलाई जा रही थी, हैदराबाद में एक ऐसा टूर्नामेंट हो रहा था, जो सिर्फ ब्राह्मणों के लिए था। हैदराबाद के नागोल में 25-26 दिसंबर को एक क्रिकेट टूर्नामेंट खेला गया, जिसमें सिर्फ उन्हीं को खेलने की अनुमति थी, जो ब्राह्मण जाति के थे।

खास बात यह है कि खेलने वाले खिलाड़ियों को अपना आईडी प्रूफ लेकर आने को कहा गया था। टूर्नामेंट के पोस्टर में साफ लिखा गया था कि इसमें सिर्फ ब्राह्मण खिलाड़ियों को ही खेलने की अनुमति होगी। क्रिकेट टूर्नामेंट का पोस्टर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस का दौर जारी है। सवाल पूछा जा रहा है कि जब भारत में जाति के आधार पर भेदभाव प्रतिबंधित है, ऐसे में किसी जाति विशेष के टूर्नामेंट को स्थानीय प्रशासन ने कैसे अनुमति दे दी। बड़ा सवाल हैदराबाद के प्रशासन पर भी उठ रहा है।

दलित लेखक-पत्रकार भंवर मेघवंशी की किताब को मिला बड़ा सम्मान

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 लेखक-पत्रकार भंवर मेघवंशी की पुस्तक “मैं एक कारसेवक था” के अंग्रेजी संस्करण के नाम बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। इस पुस्तक को अंग्रेजी दैनिक द टेलिग्राफ के द्वारा वर्ष 2020 के नॉन फिक्सन की सूची में शामिल किया गया है। अंग्रेजी अनुवाद का नाम, I Could Not Be Hindu: The Story of a Dalit in The RSS है। यह पुस्तक नवयाना प्रकाशन ने प्रकाशित की थी। इस सूची में कुल 14 किताबों को शामिल किया गया है, जिसमें आक्सफोर्ड से लेकर कैम्ब्रिज, सेज और पेंगुइन आदि प्रकाशन से दिग्गज लेखकों की लिखी पुस्तकें शामिल हैं। इस सूची को ‘द टेलिग्राफ’ ने साल 2020 का बेस्ट नॉन फिक्सन कहा है।

जहां तक भंवर मेघवंशी की पुस्तक ‘मैं एक कारसेवक था’ (I Could Not Be Hindu: The Story of a Dalit in The RSS) की बात है तो यह पुस्तक मेघवंशी के उन दिनों के संस्मरण पर आधारित है, जब वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे। यहां तक की उन्होंने राम मंदिर के लिए कार सेवा भी की थी। लेकिन उसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिसने भंवर मेघवंशी के सामने आरएसएस में व्याप्त जातिवाद की कलई खोल कर रख दी। भंवर मेघवंशी का कहना है कि आरएसएस ने इस किताब को लेकर चुप्पी साध ली थी, ताकि उसके भीतर का जातिवाद बाहर लोगों के बीच न आ जाए।

इसके बाद से ही भंवर मेघवंशी ने आरएसएस छोड़ कर आंबेडकरवाद का दामन थाम लिया। उन्होंने बाबासाहब के विचारों को पढ़ा और आज एक बहुजन चिंतक के तौर पर जाने-माने नाम हैं। साथ ही आंबेडकरी आंदोलन में अपनी शानदार लेखनी के लिए जाने जाते हैं।


मैं एक कारसेवक था पुस्तक की बुकिंग इस लिंक से कर सकते हैं।

वीडियो देखिए- एक दलित कारसेवक से सुनिए अयोध्या आंदोलन की सच्चाई

दलित साहित्य को “दलित साहित्य” ही कहिए, जनाब

  विमर्शों की दुनिया में “दलित विमर्श” अर्थात् “दलित साहित्य” का लगभग पिछले चार- पाँच दशकों से परचम लहरा रहा है। बोधिसत्व बाबासाहब की वैचारिकी पर आधारित दलित समाज की अन्तर्वेदना-आक्रोश तथा उत्पीड़न, इच्छा, आकांक्षा को इस साहित्य में समाविष्ट किया गया है। इस समय वैश्विक पटल पर दलित साहित्य, सुर्खियाँ बटोर रहा है। देश-विदेश के तमाम विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य का अध्ययन-अध्यापन और गंभीर शोध कार्य हो रहे हैं। सैकड़ों शोधार्थी, डाक्टरेट कर अकादमिक दुनिया में अपनी धाक जमा चुके हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा सैकड़ों अध्यापकों तथा शोध अध्येताओं को शोध परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपए अनुदान के रूप में दिए जा चुके हैं, साथ ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों के लिए भी लगातार वित्तीय अनुदान दिया जा रहा है। देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित पुस्तक प्रकाशकों द्वारा दलित साहित्य का व्यापक प्रकाशन किया जा रहा है। देश-विदेश के पुस्तकालय, दलित साहित्य की पुस्तकों से अटे पड़े हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने बड़ी संख्या में दलित साहित्य पर केन्द्रित विशेषांक प्रकाशित किए गए हैं। दलित साहित्य ने हिन्दी साहित्य के साथ ही भारतीय भाषाओं के साहित्य को जीवंतता प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। विदेशी भाषाओं में दलित साहित्य तथा अन्य विमर्श मूलक साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों के बड़ी संख्या में अनुवाद किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इस समय दलित साहित्य, साहित्य की दुनिया में केंद्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। इस साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज को संविधान के अनुरूप ढालने की भरपूर कोशिश जारी है। कुछ लोग, ऐसे वक्त में दलित साहित्य के नामकरण को लेकर अनेक भ्रम फैला रहे हैं तथा कृतिम बहस चलाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, उन से सचेत रहने की आवश्यकता है। एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि- “सरजी, अब हम दलित नहीं हैं, हमें दलित शब्द, अपमानजनक लगता है, इसलिए इसका नाम बदल दिया जाए।” मैंने उनसे कहा है कि आपके पिता जी का क्या नाम है? उन्होंने बताया कि मेरे पिता जी का नाम कड़ोरे लाल है। मैंने पूछा और आपके दादा जी का नाम क्या है? वे बोले मेरे दादा जी का नाम राम गुलाम है। मैंने उनसे कहा कि क्या आपको यह नाम सम्मानजनक लगते हैं? वे बोले नहीं। तो मैंने कहा कि क्या आप इन नामों को बदल सकते हैं? वे बोले नहीं। मैने कहा क्यों?? उनका उत्तर था, सर जी उनके नाम तो जो खेती योग्य जमीन तथा अन्य सम्पत्ति है, उसमें यही नाम दर्ज है, यदि हम नाम बदलेंगे तो उस सबसे बेदखल हो जाएँगे। तब मैंने कहा कि यही हाल इस समय ‘दलित’ या “दलित साहित्य” का नाम बदलने से हो जाएगा। आप अपनी साहित्यिक विरासत से बेदखल हो जाएँगे। मैंने उनसे अपना नाम बताते हुए कहा कि देखो, मेरा नाम “काली चरण” है। मेरे पोते-पोतियाँ कहते है कि दादा जी, आप तो काले नहीं हैं, ना ही आप काली माँ को मानते हैं। आप एक प्रोफेसर भी हैं, आपका यह नाम हमें अच्छा नहीं लगाता है। अब बताओ, मैं उन्हें क्या उत्तर दूँ???? मेरे एक कट्टर अंबेडकरवादी मित्र हैं- राम गुलाम जाटव। रेलवे में बड़े अधिकारी हैं। वे राम और राम चरित्र, दोनों को कतई पसंद नहीं करते हैं। हाँ, उन्होंने अपने नाम को अंग्रेजी के “आर.जी” अक्षरों से ढँकने की कोशिश की है, पर उनके सरकारी अभिलेखों में तो रामगुलाम ही है, तथा उनके जानने वाले उन्हें रामगुलाम के नाम से ही जानते-पहचानते हैं। आरजी कहने पर उनके लोगों को अटपटा सा लगता है। कुछ लोगों के नाम में व्याकरणिक दोष होता है, पर वह उनकी हाई स्कूल की मार्कसीट में अंकित हो चुका होता है, इसलिए वे उसे अब नहीं बदल सकते हैं। जबकि “दलित साहित्य”, नामकरण तो हमारे पूर्वजों ने सुविचारित तरीके से ही रखा है। इसे हम नहीं बदल सकते हैं। अब यह नाम, हमारे दलित समुदाय की अस्मिता का प्रतीक बन चुका है, हमारे साहित्य की वैश्विक पहचान, दलित साहित्य के रूप में ही स्थापित हो चुकी है। ऐसे में अब इसको कोई नया नाम देना पूरी तरह से असंभव और बेमतलब है।

बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म को लेकर क्या ओशो और दलाई लामा दोषी नहीं?

 बौद्ध धर्म पर पुनर्जन्म का आरोप मढ़ने वाले अक्सर तिब्बत के दलाई लामा का उदाहरण देते हैं। आधुनिक भारत के ‘शंकराचार्य’ अर्थात ओशो रजनीश जैसे वेदांती पोंगा पंडित ने भी बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म को प्रक्षेपति करके बुद्ध का ब्राह्मणीकरण करने का सबसे बड़ा प्रयोग किया है। ओशो ने बारदो नामक अन्धविश्वास की व्याख्या करते हुए दलाई लामा के और खुद के तिब्बती अवतार की चर्चा की है। उनके भक्त इसे सर माथे पर लिए घूमते हैं। आइए आपको बताता हूँ दलाई लामा और ओशो रजनीश के तर्कों को कैसे उधेड़ा जाये, ये सभी तार्किकों और मुक्तिकामियों सहित दलितों बहुजनों के काम की बात है। ध्यान से समझियेगा। दलाई लामा अपने को पूर्व दलाई लामा का अवतार बताते हैं। उसी व्यक्ति की आत्मा का अक्षरशः पुनर्जन्म जो पहले राजा या राष्ट्र प्रमुख था। इसे समझिये। ये धर्म और राजनीति के षड्यंत्र का सबसे लंबा और जहरीला प्रयोग है। जब आप पुराने राजा के अवतार हैं तो आपको एक वैधता और निरंकुश अधिकार अपने आप मिल जाता है। और चूँकि सारा समाज ध्यान, समाधि, निर्वाण और पुनर्जन्म की चर्चा में डूबा है तो कोई सवाल भी नहीं उठा सकता। न विरोध होगा न विद्रोह न परिवर्तन, क्रांति या लोकतंत्र की मांग उठेगी। राजसत्ता मस्ती से अपना काम करती रहेगी। गरीब मजदूर अपने अवतार के लिए रात दिन खटते रहेंगे। न कोई शिक्षा मांगेगा, न चिकित्सा, न रोजगार मांगेगा। और न सभ्यता या विज्ञान का विकास ही हो सकेगा। इसीलिये तिब्बत पर जब आक्रमण हुआ तो वो आत्मरक्षा न कर सका और ढह गया। कोई संघर्ष भी न कर सका चीन के खिलाफ। और सबसे मजेदार बात ये कि जादू टोने रिद्धि सिद्धि और चमत्कार के नाम पर पूरे मुल्क पर शासन करने वाले लामा को खुद भी दल बल सहित पलायन करना पड़ा। कोई शक्ति या सिद्धि काम न आई। ये तो हुई राजा द्वारा अपना पद सुरक्षित करने की बात, अब आइये पुनर्जन्म की टेक्नोलॉजी पर। तिब्बती दलाई लामा अगर पिछले राजा की ही आत्मा का पुनर्जन्म है, उसी के संस्कार, विचार, शिक्षण, अनुभव और ज्ञान लेकर आ रहा है तो उन्हें इस जन्म में देश के सबसे कुशल और महंगे शिक्षकों की जरूरत क्यों होती है? उन्हें अंग्रेजी, गणित, राजनीति, इतिहास ही नहीं बल्कि उनका अपना पेटेंट विषय “अध्यात्म” सीखने के लिए भी दूसरे टीचर चाहिए। टीचर क्यों चाहिए? अपने पिछले जन्मों में जाकर वहीं से डाऊनलोड क्यों नहीं कर लेते भाई ? क्या दिक्कत है? दूसरों को जो सिखा रहे हो वो खुद क्यों नहीं आजमाते? शिक्षकों की फ़ौज पर पच्चीस साल तक करोड़ों अरबों का खर्चा क्यों करते हैं? आप समझे कुछ? ये पुनर्जन्म की जहरीली खिचड़ी सिर्फ दूसरों को खिलाने के लिए है ताकि गरीब जनता नये लामा अर्थात नये राष्ट्राध्यक्ष की वैधता और निर्णयों पर प्रश्न न उठाये। लेकिन यहां ध्यान रखिएगा कि इसका ये मतलब नहीं है कि दलाई लामा बुरे व्यक्ति हैं। वे सज्जन पुरुष हैं, उनका पूरा सम्मान है। वे जगत के शुभ हेतु शक्तिभर प्रयास कर रहे हैं लेकिन अपनी संस्था और संस्कृति के अतीत में जो अन्धविश्वास फैलाकर एक पूरे मुल्क का सत्यानाश किया है उसको वे इंकार नहीं कर सकते। इससे हमें सबक लेना चाहिए।

“हमने सदियों तक एससी-एसटी के लोगों के साथ खराब व्यवहार किया, हमें अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए- मद्रास हाईकोर्ट

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मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे आने वाले समय में दलित समाज को लेकर न्यायपालिका के रवैये पर एक नई बहस छि़ड़ सकती है। एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने दलितों को लेकर बड़ा बयान दिया। हाईकोर्ट ने कहा, “हमने सदियों तक एससी-एसटी के लोगों के साथ खराब व्यवहार किया। आज भी उनके साथ ठीक व्यवहार नहीं हो रहा है। इसके लिए हमें अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए।”

 दरअसल कोर्ट ने तमिल दैनिक अखबार ‘दिनकरन’ में प्रकाशित एक खबर का खुद संज्ञान लेते हुए यह बयान दिया है। इसी खबर को हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर ने भी प्रकाशित किया है।

तमिल दैनिक में 21 दिसंबर को एक खबर प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया था कि मेलूर तालुक की मरुथुर कॉलोनी से एक दलित परिवार को अपने परिजन का अंतिम संस्कार करने के लिए खेतों से गुजरकर कब्रिस्तान जाना पड़ा। क्योंकि वहां तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं थी। अदालत ने इस खबर पर खुद ही संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका मानकर सुनवाई की।

 सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, अन्य वर्गों की तरह अनुसुचित जाति वर्ग के लोगों को भी कब्रिस्तान/विश्राम घाट घाट तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़कों की सुविधा मिलनी चाहिए। लेकिन इस खबर से पता चलता है कि उनके पास ऐसी सुविधा, अब भी कई जगह नहीं है।

इस दौरान अदालत ने राज्य के अफसरों से दलित-आदिवासी समाज की स्थिति को लेकर कई सवाल पूछ डाले। कोर्ट ने अफसरों से पूछा-

  • तमिलनाडु में एससी के लोगों की कितनी बस्तियां हैं?
  • क्या अनुसूचित जाति की सभी रिहाइशों में साफ पानी, स्ट्रीट लाइट, शौचालय, कब्रिस्तान तक पहुंचने के लिए सड़क आदि की सुविधा है?
  • इस तरह की ऐसी कितनी बस्तियां हैं, जहां कब्रिस्तान तक पहुंचने के लिए सड़क आदि की सुविधा है।
  • इस तरह की ऐसी कितनी बस्तियां हैं, जहां कब्रिस्तान तक पुहंचने के लिए सड़क नहीं हैं?
  • इन लोगों को परिजनों के शव के साथ कब्रिस्तान तक पहुंचने के लिए सड़क की सुविधा मिले, इसके लिए अब तक क्या कदम उठाए गए?
  • ऐसी सभी रिहाइशों में साफ पानी, शौचालय, सड़क आदि की सुविधा कब तक मिल जाएगी?

इस मामले में, अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव के साथ-साथ आदिवासी कल्याण, राजस्व, शहरी निकायों और जल आपूर्ति विभागों के प्रमुख सचिवों को भी पार्टियों के रूप में मांगा है। अधिकारियों से अनुसूचित जाति की बस्तियों में मौजूद सुविधाओं के बारे में भी सवाल पूछे गए थे। तमाम मामलों में जब यह आरोप लगने लगा है कि देश में इंसाफ भी उन्हीं को मिलता है, जिनके पास सत्ता और रुतबा है। जब देश के कई रिटायर जज भी अदालत की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं, ऐसे में मद्रास हाईकोर्ट का दलितों से जुड़े मामले का स्वतः संज्ञान लेना और शासन-प्रशासन से सवाल पूछना निश्चित तौर पर देश की न्याय व्यवस्था का एक बेहतर कदम है।

मनुस्मृति दहन दिवस पर देश भर के बहुजन संगठनों ने किया कार्यक्रम, जलाए काले कानून

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मनुस्मृति दहन दिवस (25 दिसंबर) के मौके पर देश भर में बहुजन समाज के संगठनों ने काले कानून का दहन किया। दिल्ली में भीम ज्ञान चर्चा के बैनर तले बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया तो उत्तर प्रदेश, बिहार सहित देश के तमाम राज्यों में इस दिन बहुजन संगठनों ने मनुस्मृति के विरोध में कार्यक्रम आय़ोजित किया। यूपी के मऊ में मनुस्मृति दहन दिवस कार्यक्रम के मौके पर रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव और किसान नेता बलवंत यादव ने कहा कि मनुस्मृति भारत के अतीत का मसला नहीं है, यह वर्तमान का मसला भी है। आज भी भारत में मनुसंहिता पर आधारित वर्ण-जाति व्यवस्था का श्रेणीक्रम पूरी तरह लागू है। भारत में बहुसंख्यकों की नियति आज भी इससे तय होती है कि उन्होंने किस वर्ण-जाति में जन्म लिया है। वर्तमान लोकसभा में 21 प्रतिशत सवर्णों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व 42.7 प्रतिशत है। ग्रुप-ए के कुल नौकरियों के 66.67 प्रतिशत पर 21 प्रतिशत सवर्णों का कब्जा है। ग्रुप बी के कुल पदों के 61 प्रतिशत पदों पर सवर्ण काबिज हैं। कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में शिक्षक से लेकर प्रिंसिपल-कुलपति तक के पद पर सवर्णों का दबदबा है। न्यायपालिका (हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट) में 90 प्रतिशत से अधिक जज सवर्ण हैं। मीडिया भी सवर्णों के कब्जे में ही है। राष्ट्रीय संपदा में सवर्णों की हिस्सदारी 45 प्रतिशत है। कुल भू-संपदा का 41 प्रतिशत सवर्णों के पास है। नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से सवर्ण वर्चस्व और बहुजनों की चौतरफा बेदखली का अभियान बढ़ रहा है। इस मौके पर बिहार के भागलपुर में कार्यक्रम को संबोधित करते हु डॉ. विलक्षण रविदास ने कहा कि 25 दिसंबर 1927 को डॉ. अंबेडकर ने पहली बार मनुस्मृति में दहन का कार्यक्रम किया था। डॉ. आंबेडकर मनुस्मृति को ब्राह्मणवाद की मूल संहिता मानते थे। उनका कहना था कि भारतीय समाज में जो कानून चल रहा है, वह मनुस्मृति के आधार पर है। सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव और बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच के विपिन कुमार ने कहा है कि वर्तमान मोदी राज ‘मनु राज’ का पर्याय बन चुका है। संविधान तोड़ कर मनुविधान थोपा जा रहा है। मनुविधान के आधार पर देश को चलाने के लिए लोकतंत्र को खत्म किया जा रहा है। आज के दौर में मनुस्मृति दहन दिवस ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठा है।

बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के सोनम राव और मिथिलेश विश्वास ने कहा कि नई शिक्षा नीति-2020 सामाजिक न्याय विरोधी-बहुजन विरोधी है। शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने वाला है। संत रविदास महासभा के महेश अंबेडकर और सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम का होना मनुस्मृति के अस्तित्व का प्रमाण है। ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर प्रावधान के साथ ही मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर सवर्णों को दिया गया 10 प्रतिशत आरक्षण संविधान विरोधी है, मनुवादी वर्ण-जाति व्यवस्था को मजबूत करता है। अन्य संगठनों में सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) ने भी कार्यक्रम आयोजित किया। भागलपुर जिला के बिहपुर प्रखंड में गौतम कुमार प्रीतम की पहलकदमी से दीपक रविदास, गौरव पासवान, अनुपम आशीष, रूपक यादव, अनुपम रविदास, रविकांत रविदास,दिवाकर दास के नेतृत्व में आज के दिन दर्जन से ज्यादा गांवों में मनुस्मृति दहन दिवस पर कार्यक्रम आयोजित हुआ।

आरएसएस आदिवासियों को वनवासी क्यों कहती है?

इस पर काफी लंबे समय से बड़ी बहस चलती आ रही है कि सेकुलर मायने क्या? धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निरपेक्ष? धर्म क्या है? पंथ क्या है? अंग्रेजी में जो ‘रिलीजन’ है, वह हिन्दी में क्या है- धर्म कि पंथ? हिन्दू धर्म है या हिन्दू पंथ? इस्लाम धर्म है या इस्लाम पंथ? ईसाई धर्म है या ईसाई पंथ? बहस नयी नहीं है. गाहे-बगाहे इस कोने से, उस कोने से उठती रही है, लेकिन वह कभी कोनों से आगे बढ़ नहीं पायी!

 आम्बेडकर के बहाने, कई निशाने  इधर बहस कोने से नहीं, केन्द्र से उठी है। और बहस केन्द्र से उठी है, तो चलेगी भी, चलायी जायेगी। अब समझ में आया कि बीजेपी ने संविधान दिवस यों ही नहीं मनाया था। मामला सिर्फ 26 जनवरी के सामने 26 नवम्बर की एक नयी लकीर खींचने का नहीं था। और आम्बेडकर को अपने ‘शो-केस’ में सजाने का आयोजन सिर्फ दलितों का दिल गुदगुदाने और ‘समावेशी’ पैकेजिंग के लिए नहीं था। तीर एक, निशाने कई हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या? गहरी बात है। आदिवासी नहीं, वनवासी क्यों? और गहरी बात यह भी है कि बीजेपी और संघ के लोग ‘सेकुलर’ को ‘धर्म-निरपेक्ष’ क्यों नहीं कहते? दिक़्क़त क्या है? और कभी आपका ध्यान इस बात पर गया कि संघ परिवार के शब्दकोश में ‘आदिवासी’ शब्द क्यों नहीं होता? वह उन्हें ‘वनवासी’ क्यों कहते हैं? आदिवासी कहने में दिक़्क़त क्या है? गहरे मतलब हैं।

आरएसएस आदिवासियों को वनवासी क्यों कहती है? आदि’ यानी प्रारम्भ से। इसलिए ‘आदिवासी’ का मतलब हुआ जो प्रारम्भ से वास करता हो। संघ परिवार को समस्या यहीं है। वह कैसे मान ले कि आदिवासी इस भारत भूमि पर शुरू से रहते आये हैं? मतलब ‘आर्य’ शुरू से यहां नहीं रहते थे? तो सवाल उठेगा कि वह यहां कब से रहने लगे? कहां से आये? बाहर से कहीं आ कर यहां बसे? यानी आदिवासियों को ‘आदिवासी’ कहने से संघ की यह ‘थ्योरी’ ध्वस्त हो जाती है कि आर्य यहां के मूल निवासी थे और ‘वैदिक संस्कृति’ यहां शुरू से थी। और इसलिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ की उसकी थ्योरी भी ध्वस्त हो जायेगी क्योंकि इस थ्योरी का आधार ही यही है कि आर्य यहां के मूल निवासी थे, इसलिए यह ‘प्राचीन हिन्दू राष्ट्र’ हैं। इसलिए जिन्हें हम ‘आदिवासी’ कहते हैं, संघ उन्हें ‘वनवासी’ कहता है यानी जो वन में रहता हो। ताकि इस सवाल की गुंजाइश ही न बचे कि शुरू से यहां की धरती पर कौन रहता था। है न गहरे मतलब की बात।

धर्म-निरपेक्षता के बजाय पंथ-निरपेक्षता क्यों? धर्म और पंथ का मामला भी यही है। संघ और बीजेपी के लोग सिर्फ़ ‘सेकुलर’ के अर्थ में ‘धर्म’ के बजाय ‘पंथ’ शब्द क्यों बोलते हैं? क्यों ‘धर्म-निरपेक्ष’ को ‘पंथ-निरपेक्ष’ कहना और कहलाना चाहते हैं? वैसे कभी आपने संघ या संघ परिवार या बीजेपी के किसी नेता को ‘हिन्दू धर्म’ के बजाय ‘हिन्दू पंथ’ बोलते सुना है? नहीं न! और कभी आपने उन्हें किसी हिन्दू ‘धर्म-ग्रन्थ’ को ‘पंथ-ग्रन्थ’ कहते सुना है? और अक्सर आहत ‘धार्मिक भावनाएं’ होती हैं या ‘पंथिक भावनाएँ?’ ‘भारतीय राष्ट्र’ के तीन विश्वास क्यों? इसलिए कि संघ की नजर में केवल हिन्दू धर्म ही धर्म है, और बाकी सारे धर्म, धर्म नहीं बल्कि पंथ हैं। और हिन्दू और हिन्दुत्व की परिभाषा क्या है? सुविधानुसार कभी कुछ, कभी कुछ। मसलन, एक परिभाषा यह भी है कि जो भी हिन्दुस्तान (या हिन्दूस्थान) में रहता है, वह हिन्दू है, चाहे वह किसी भी पंथ (यानी धर्म) को माननेवाला हो। यानी भारत में रहनेवाले सभी हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और अन्य किसी भी धर्म के लोग हिन्दू ही हैं। और एक दूसरी परिभाषा तो बड़ी ही उदार दिखती है। वह यह कि हिन्दुत्व विविधताओं का सम्मान करता है और तमाम विविधताओं के बीच सामंजस्य बैठा कर एकता स्थापित करना ही हिन्दुत्व है। यह बात संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे के अपने पिछले भाषण में कही थी। लेकिन यह एकता कैसे होगी? अपने इसी भाषण में संघ प्रमुख आगे कहते हैं कि संघ ने ‘भारतीय राष्ट्र’ के तीन विश्वासों ‘हिन्दू संस्कृति’, ‘हिन्दू पूर्वजों’ और ‘हिन्दू भूमि’ के आधार पर समाज को एकजुट किया और यही ‘एकमात्र’ तरीक़ा है।

तब क्या होगा सरकार का धर्म? यानी भारतीय समाज ‘हिन्दू संस्कृति’ के आधार पर ही बन सकता है, कोई सेकुलर संस्कृति उसका आधार नहीं हो सकती। और जब यह आधार ‘हिन्दू संस्कृति’, ‘हिन्दू पूर्वज’ और ‘हिन्दू भूमि’ ही है, तो ज़ाहिर है कि देश की सरकार का आधार भी यही ‘हिन्दुत्व’ होगा। यानी सरकार का ‘धर्म’ (यानी ड्यूटी) या यों कहें कि उसका ‘राजधर्म’ तो हिन्दुत्व की रक्षा, उसका पोषण ही होगा, बाकी सारे ‘पंथों’ से सरकार ‘निरपेक्ष’ रहेगी? हो गया सेकुलरिज़्म! और मोहन भागवत ने यह बात कोई पहली बार नहीं कही है। इसके पहले का भी उनका एक बयान है, जिसमें वह कहते हैं कि ‘भारत में हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ते-भिड़ते एक दिन साथ रहना सीख जायेंगे, और साथ रहने का यह तरीक़ा ‘हिन्दू तरीक़ा’ होगा। तो अब पता चला आपको कि सेकुलर का अर्थ अगर ‘पंथ-निरपेक्ष’ लिया जाये तो संघ को क्यों सेकुलर शब्द से परेशानी नहीं है, लेकिन ‘धर्म-निरपेक्ष’ होने पर सारी समस्या खड़ी हो जाती है।

गोलवलकर और भागवत अब ज़रा माधव सदाशिव गोलवलकर के विचार भी जान लीजिए, जो संघ के दूसरे सरसंघचालक थे। अपनी विवादास्पद पुस्तक ‘वी, आर अवर नेशनहुड डिफ़ाइंड’ में वह कहते हैं कि हिन्दुस्तान अनिवार्य रूप से एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है और इसे हिन्दू राष्ट्र के अलावा और कुछ नहीं होना चाहिए। जो लोग इस ‘राष्ट्रीयता’ यानी हिन्दू नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा के नहीं हैं, वे स्वाभाविक रूप से (यहाँ के) वास्तविक राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे सभी विदेशी नस्लवालों को या तो हिन्दू संस्कृति को अपनाना चाहिए और अपने को हिन्दू नस्ल में विलय कर लेना चाहिए या फिर उन्हें ‘हीन दर्जे’ के साथ और यहां तक कि बिना नागरिक अधिकारों के यहां रहना होगा। तो गोलवलकर और भागवत की बातों में अन्तर कहाँ है?


(यह आलेख फेसबुक से प्राप्त हुआ है, लेखक अज्ञात है, इसलिए मूल लेखक इसका क्रेडिट खुद लेने को स्वतंत्र हैं।)

किसान आंदोलन मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों है, और सरकार क्यों नहीं लेना चाहती वापस

पिछले 25 दिनों से चल रहा किसान आंदोलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने उपस्थित सबसे बड़ी चुनौती क्यों है? 1- पूरे पंजाब में यह एक जनांदोलन है। जिसे पंजाब के बहुलांश जनता का समर्थन प्राप्त है और यह समर्थन बढ़ता ही जा रहा है। 2- हरियाणा में भी यह तेजी से जनांदोलन की शक्ल ले रहा है। 3- देश के कोने-कोने से धीरे-धीरे इस आंदोलन को बड़े पैमान पर समर्थन प्राप्त हो रहा है और यह एक देशव्यापी जनांदोलन बनने की ओर बढ़ रहा है। 4- अभी तक इस जनांदोलन की बागडोर उन किसानों और किसान नेताओं के हाथ में है, जो झुकने को तैयार नहीं हैं। 5- इस आंदोलन को खालिस्तानी और नक्सली-माओवादी कहकर बदनाम करने की कोशिश नाकाम साबित हुई है, बल्कि इसका उलटा असर पड़ा है। 6- इस आंदोलन की रीढ़ पंजाबी सिख हैं, जो गहरे स्तर पर मानवतावादी होने के साथ ही अपने मान-सम्मान के लिए लडाकू कौम रही है। अत्याचारी शासकों के खिलाफ संघर्ष और कुर्बानी की इनकी करीब 500 वर्षों की परंपरा है। 7- यह मेहनतकश किसानों का जनांदोलन है, जो खुद अपने खेतों में अपने परिवार सहित कठिन श्रम करते हैं, भले ही इसके साथ वे मजदूरों का उपयोग करते हों। वे अपने खेतों में अपने पूरे परिवार सहित काम करते हैं, जिसमें महिला-पुरूष दोनों शामिल हैं। 8- इस आंदोलन की रीढ़ मूलत: पंजाब-हरियाणा के वे किसान हैं, जिनकी समृद्धि एवं संपन्नता का मूल आधार उनकी खेती है। 9- यह आंदोलन उन किसानों का आंदोलन है, जो अपने आर्थिक संसाधनों के बलबूते इस आंदोलन को महीनों-वर्षों टिकाए रख सकते हैं। 10- प्राकृतिक आपदा, युद्ध, जनसंघर्षों-जनांदोलनों आदि में देश-दुनिया के हर क्षेत्र में हर समुदाय के लिए सहायता पहुंचाने वाले सिखों के देशव्यापी एवं विश्वव्यापी समूह इस आंदोलन की हर तरह से मानवीय सहायता कर रहे हैं। 11- कुछ जड़सूत्रवादी वामपंथियों को छोड़कर हर तरह के जनवादी-प्रगतिशील समूह इस आंदोलन के साथ हैं, वे अपने तरीके से हर संभव मदद इस आंदोलन को पहुंचा रहे हैं। 12- देश के किसानों, विशेषकर पंजाब-हरियाण के किसानों को इस बिल से यह संंदेश गया है कि मोदी सरकार किसानों की फसल और जमीन अपने कार्पोरेट मित्रों ( अंबानी-अडानी) को सौंपना चाहती है और उन्हें इन कार्पोरेट घरानों का गुलाम किसान या मजदूर बना देना चाहती है। उनकी सोच आधार है, क्योंकि दुनिया के कई सारे देशों में ऐसा हुआ और इसकी तरीके से कार्पोरेटे को खेती की जमीन सौंपी गई। 13- सिंघू बार्डर और टिकरी बार्डर पर मौजूद किसान इस आंदोलन को अपने जीवन-मरण के प्रश्न के रूप में देखने लगे हैं। उन्हें यह विश्वास हो गया है कि यदि ये कानून लागू हो गए तो उनकी जितनी भी और जैसी संपन्नता एवं समृद्धि है, वह खत्म ही हो जाएगी, इसके साथ आने वाली पीढियां भी बर्बाद हो जायेंगी। 14- यह एक ऐसा जनांदोलन है, जिसके निशान पर कार्पोरेट घराने और उनके मीडिया हाउस भी हैं। 15- इस जनांदोलन में शामिल अधिकांश किसानों को यह विश्वास हो गया है कि मोदी सिर्फ कार्पोरेट घरानों के लिए काम करते हैं, वे उनके हाथ की कठपुतली हैं। अंबानी-अडानी जो चाहते हैं, वही होता है। यह मोदी की सरकार नहीं अंबानी-अड़ानी की सरकार है। उनका कहना है कि यह कानून भी अंबानी-अडानी के हितों के लिए बनाया गया है। 16- इस जनांदोलन को बहुलांश वैकल्पिक मीडिया का खुला समर्थन प्राप्त है और सोशल मीडिया भी इस जनांदोलन को समर्थन दे रही है। 17- इस जनांदोलन को मोदी जी हिंदू-मुस्लिम का एंगल या पाकिस्तान का एंगल नहीं दे पा रहे हैं। सिर्फ उनके पास कोसने के लिए विपक्षी पार्टियां हैं। विपक्षी पार्टियां किसानों को गुमराह कर रही हैं यह तर्क अधिकांश लोगों के गले नहीं उतर रहा है। शायद भीतर से मोदी सरकार को भी इस पर भरोसा नहीं। 18- भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के वादों को पूरा करने में मोदी जितन भी सफल हुए हो, लेकिन आर्थिक मामलों में उन्होंने जितने भी वादे किए उन सभी में वे अविश्वसनीय साबित हुए हैं। जिसके चलते मोदी जी के किसी भी वादे पर किसानों को भरोसा नहीं है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वे किसानों के नहीं कार्पोरेट के दोस्त हैं और उनके द्वारा पाले-पासे गए हैं। 19- इस आंदोलन को धीरे-धीरे मजदूरों का भी समर्थन प्राप्त हो रहा है, क्योंकि जिन कार्पोरेट मित्रों के लिए ये तीन कृषि कानून बने हैं, उन्हीं कार्पोरेट मित्रों के लिए मोदी सरकार तीन बड़े लेबर लॉ भी पास कर चुकी है। 20- आम गरीब जनता में भी यह संदेश जा रहा है कि यदि गेहू-चावल पैदा करने वाले किसानों की खेती कार्पोरेटे के हाथ में चली गई, तो उन्हें सस्ते गल्ले की दुकानों से मिलने वाला सस्ता अनाज मिलना भी बंद हो जाएगा और उनकी भूखमरी और कंगाली और बढ़ जाएगी।

निम्न कारणों से मोदी जी इस कानून को वापस नहीं लेना चाहते है या नहीं ले पा रहे हैं- 1- देशी-विदेशी कार्पोरेट घरानों की निगाह देश के किसानों की फसल और जमीन पर है और यह कानून देश के किसानों की फसल और जमीन पर कार्पोरेट के कब्जे का रास्ता खोलता है, जो कार्पोरेट के मुनाफे और संपदा में बेहतहाशा वृद्धि करेगा 2- खेती पर निर्भर करीब 75 करोड़ लोगों के बड़े हिस्स की तबाही उन्हें शहरी स्लम बस्तियों में जाने के लिए बाध्य करेगी, जो कार्पोरेटे घरानों के लिए बहुत ही सस्ते मजदूर के रूप में उपलब्ध होंगे। यही कार्पोरेट घराने चाहते हैं. 3- खाद्य उत्पादों पर कार्पोरेट का नियंत्रण उन्हें बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं से मुनाफा कमाने का अवसर प्रदान करेगा। 4- चुनाव जीतने के लिए कार्पोरेट घरानों द्वारा भाजपा को मुहैया कराए गए अकूत धन की वसूली के लिए कृषि क्षेत्र को कार्पोरेट घरानों को सौंपना नरेंद्र मोदी की बाध्यता है, जैसे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को और बैंकों एवं भारतीय जीवन बीमा निगम की पूंजी को। 5- इसके साथ मोदी का व्यक्तिगत अहंकार भी इसके आड़े आ रहा होगा,जिस व्यक्ति ने देश को तबाह कर देने वाली नोटबंदी को भी आज तक अपनी गलती नहीं मानी, वह कैसे मान लेगा कि ये तीन कृषि कानून गलत हैं और उन्हें वापस लिया जा रहा है। मोदी जी इन कृषि कानूनों को वापस लेने या स्थगित करने की जगह गुरु तेगबहादुर के शहदी दिवस पर उन्हें माथा टेकने का भावात्मक खेल खेल रहे हैं। लेकिन इस जनांदोलन में शामिल किसान इस पाखंड कह रहे हैं।

किसान आर-पार की लडाई की तैयारी के साथ बार्डर पर डटे हुए हैं, पीछे से उन्हें रसद मुहैया हो रही है, देखना है कि इन जाबांज किसानों के सामने मोदी सरकार कितने देर टिकती है और अपने बचाव के लिए कौन सा रास्ता निकालती है।अबकी बार मोदी सरकार का सामने योद्धाओं की कौम से है, जिन्हें शहीद होना तो आता है, लेकिन झुकना नहीं आता। उन्हें झुकाना एक बहुत मुश्किल भरा काम है। वो भी तब, जब उनका सबकुछ दांव पर लगा हुआ है।

बैंक में सलेक्शन हुआ तो युवती ने क्यों किया बाबासाहब को याद

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 बधाई दीजिए बड़ी बहन (सुमन रानी) का सिलेक्शन इंडियन बैंक में हुआ है। सरकारी बैंक में नौकरी लगना कोई बड़ी बात नहीं है, ये बड़ी बात तब बन जाती है; जब आप शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखते हुए अपने घर-परिवार की जिम्मेदारी को संभालते हुए, बिना किसी कोचिंग के, एक ऐसे छोटे से गांव से निकल कर आते हो, जहां तक जाने के लिए कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट या कोई ऑटो भी ना चलता हो। ऐसे हालातों से निकल कर उच्च शिक्षा प्राप्त करना व तमाम सुविधाओं से लैस कैंडिडेट्स से कॉम्पिटिशन करना आसान नहीं है।

सब कुछ जानते हुए भी कुछ मेरिट धारी छपाक से बोल देते है कि ‘पता नहीं आरक्षण की बदौलत कहां-कहां से उठकर आ जाते हैं’। ऐसे लोग आपको डिमोटिवेट करने, नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन मुझे पता है ऐसे निगेटिव लोगों से निपटना आपके बाएं हाथ का खेल है।

आप वाकई कमाल हो, अधिकतर लड़कियां शादी के बाद अपने कैरियर की तरफ ध्यान नहीं दे पाती, शादी के बाद वो पति, बच्चो में ही उलझ कर रह जाती हैं, लेकिन आपने सब जिम्मेदारियों को बखूबी संभाला, आप उन सब लड़कियों के लिए प्रेरणस्रोत हो, जो सोचती हैं कि शादी के बाद आगे बढ़ पाना मुश्किल है।

आपको एक बार फिर से बधाई, साथ ही मुबारकबाद जीजा जी को, जो हमेशा आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें, आपको तमाम सुविधाएं उपलब्ध करवाई। थैंक यू बाबा साहेब, आपको कोटि कोटि प्रणाम। आपके बिना हर खुशी अधूरी है, आप ना होते तो ये सब असंभव था।


फेसबुक पर यह पोस्ट अंजु गौतम ने डाला है। अंजू अम्बेडकवादी हैं। उन्होंने अपनी बहन की सफलता पर उनके संघर्ष को और बाबासाहब को याद किया है। बाबासाहब का सपना भी यही था कि हर बेटी पढ़े, आगे बढ़े, आत्मनिर्भर बने। दलित दस्तक भी यह मानता है कि सुमन रानी जी की सफलता समाज की उन लड़कियों को प्रेरणा देने वाली है, जो आगे बढ़ने, सपने देखने का माद्दा रखती हैं। आप ठान लिजिए, पढ़िए, याद रखिए, जहां चाह है, वहां राह है। सुमन रानी जी की सफलता इसको साबित भी करती है। बधाई। 

 भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है

 भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है। भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है।

हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा। कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है।इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं। एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है। लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है।

पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदी को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं। कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं। इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं।

ये भी पढ़िए- जब विश्व के दार्शनिक मानव सभ्यता का इतिहास लिख रहे थे, भारतीय दार्शनिक क्या कर रहे थे?

ये मजेदार बात है। भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है। लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है। ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है।

इसका एक ही कारण नजर आता है। प्राचीन भारतीय दार्शनिको की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया। उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका। कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये। कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पायी। बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया।

कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है। फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है। इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा उंचा मुकाम देते हैं। इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे।

यह भी पढ़िए- क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे?

गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है। वहां हर दार्शनिक अपनी नयी बात लेकर आता है। दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं। भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए।

इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है। यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं।

उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है। आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है। डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है।

इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं। भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है। वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है।

भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता, यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है। इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता।

ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है। यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है। पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं। इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ। जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है।

भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुडी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी।

जब विश्व के दार्शनिक मानव सभ्यता का इतिहास लिख रहे थे, भारतीय दार्शनिक क्या कर रहे थे?

मानव इतिहास की महान विदुषी एरियल ड्यूरेंट जब अपने पति विल ड्यूरेंट के साथ मिलकर विश्व इतिहास और सभ्यता सहित दर्शन के विकास का अत्यंत विस्तृत लेखा जोखा लिख रही थीं, उसी दौर में बर्ट्रेंड रसल भी दर्शन का इतिहास लिख रहे थे। फ्रायड मनोविज्ञान के रहस्य खोल रहे थे, फ्रेडरिक नीत्शे मूल्यों को और ईश्वर को चुनौती दे रहे थे, लुडविन वित्गिस्तीन पूरे तर्कशास्त्र को ही नया रूप दे रहे थे, डार्विन इसी समय में क्रमविकास की खोज करते हुए इंसान की उत्पत्ति और विकास की पूरी समझ ही बदल डाल रहे थे, हीगल के प्रवाह में मार्क्स और एंगेल्स पूरे इतिहास और मानव समाज के काम करने के ढंग को एकदम वैज्ञानिक दृष्टि से समझा रहे थे। आइन्स्टीन, मेक्स प्लांक, नील्स बोर और श्रोडीन्जर अपनी अजूबी प्रतिभा से क्लासिकल न्यूटोनियन फिजिक्स और यूक्लिडीयन जियोमेट्री सहित भौतिकशास्त्र की पूरी समझ को एक नए स्तर पर ले जा रहे थे।
उस समय भारतीय चिन्तक क्या कर रहे थे?
उन्नीसवी सदी के आरंभ से बीसवीं सदी के अंत तक भारतीय पंडित पश्चिमी विद्वानों से शर्मिन्दा होते हुए या तो अन्टार्कटिका में अपने पूर्वजों की खोज कर रहे थे या फिर फर्जी राष्ट्रवाद के लिए गणेश-उत्सव का कर्मकांड रच रहे थे।बंगाल के कुछ चिंतक इसाइयत की कापी करके नियो-वेदांत की और मिशनरी स्टाइल समाज सेवा की रचना कर रहे थे, अपने ब्रिटिश आर्य बंधुओं के “आर्य-आक्रमण” को अपने लिए वरदान मानते हुए भरत मिलाप सिद्ध कर रहे थे और पश्चिमी स्त्री की स्वतन्त्रता से शर्माते हुए सती प्रथा से पिंड छुडाने के लिए पहला सभ्य प्रयास कर रहे थे।
इसी दौर के दुसरे संस्कारी पंडित जन भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्री फुले पर गोबर और पत्थर फेंक रहे थे, ज्योतिबा फूले के बालिका स्कूल और विधवा आश्रम को बंद कराने के लिए सब तरह के षड्यंत्र कर रहे थे, अंबेडकर को पढने लिखने से रोकने की सनातनी चाल चल रहे थे, कुछ चिन्तक-योगी नीत्शे और डार्विन की खिचड़ी बनाकर अतिमानस और पूर्ण-योग की रचना कर रहे थे।
आजादी के बाद हमारे महानुभाव फिलहाल क्या कर रहे हैं?
एक महर्षि बीस मिनट के ध्यान से हवा में उड़ने की तकनीक सिखा रहे थे। एक योगानन्द जी क्रियायोग के बीस बरस के अभ्यास से बीस करोड़ सालों का क्रमविकास सिद्ध करने का दावा कर रहे थे। कुछ महान दार्शनिक अपने ही शिष्य की थीसिस चुराकर शिक्षक दिवस पर लड्डू बाँटने का इन्तेजाम कर रहे थे। एक रजिस्टर्ड भगवान पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों जैसे फ्रायड जुंग और विल्हेम रेख की जूठन की भेल पूरी बनाकर बुद्ध और कबीर के मुंह में वेदान्त ठूंस रहे थे। इस षड्यंत्र से वे जोरबा-द-बुद्धा की रचना करके अभी अभी गए हैं। हाल ही में एक बाबाजी हरी लाल चटनी और रसगुल्ले खिलाकर किरपा बरसा रहे हैं।
एक अन्य महाराज जमुना का उद्धार कर ही चुके हैं और एक गुरूजी देश भर की नदियों को बचाने के लिए सडकों की ख़ाक छानकर फिलहाल सुस्ता रहे हैं, जल्द ही किसी नए अभियान पे निकलेंगे। वहीं एक अन्य बाबाजी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर में प्राणायाम का विश्वरिकार्ड बनाकर च्यवनप्राश बाँट रहे हैं, व्यवस्था परिवर्तन और क्रान्ति से शुरुआत करके आजकल दन्तकान्ति, केशकान्ति बेच रहे हैं।
नतीजा सामने है। पश्चिम में वे नई सभ्यता और नैतिकता सहित ज्ञान विज्ञान साहित्य, कला दर्शन, फेशन, फिल्मों, कपडे लत्ते, चिकित्सा, भोजन, भाषा, संस्कृति और हर जरुरी चीज का विकास और निर्यात कर रहे हैं और हम सबकुछ आयात करते हुए, खरीदते हुए जहालत के रिकार्ड तोड़ते हुए गोबर के ढेर में धंसते जा रहे हैं।
और अब तो गाय के गोबर से मामला गधे की लीद तक पहुँच गया है। विकास रुक ही नहीं रहा।

अखिलेश और योगी पर क्यों भड़कीं बहनजी

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बसपा पर अक्सर विपक्षी पार्टियां जाति की राजनीति का आरोप लगाती हैं। दरअसल ये वो दल हैं जो खुद जाति और धर्म की राजनीति में गहरे तक डूबे हुए हैं। हालांकि बसपा के शासनकाल में पूरे प्रदेश के लोगों के लिए विकास के जो काम हुए उसने बसपा, उसके प्रमुख नेताओं और उनकी विकास की सोच को जिस तरह देश भर में स्थापित किया, उसने बसपा की राजनीति को नई पहचान दी। बात चाहे यमुना एक्सप्रेस वे की हो, फार्मूला वन रेसकोर्स बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट की या फिर एक शानदार शहर ग्रेटर नोएडा बसाने की, यह काम मायावती के नेतृत्व में बसपा की सरकार ने ही किया। 2012 में बसपा सरकार जाने के बाद भी बसपा शासनकाल में बनी तमाम योजनाओं को बाद की सरकारों ने अपना नाम देकर काम किया और उसका श्रेय भी खुद लिया। बसपा के बाद आई सपा और फिर भाजपा सरकार के इसी रवैये पर बहनजी ने हाल ही में दोनों दलों और इसके नेताओं को आड़े हाथों लिया है। बहन मायावती ने 18 दिसंबर को एक के बाद एक तीन ट्विट कर सपा और भाजपा सरकार पर जमकर भड़ास निकाली। बहनजी ने कहा, यूपी में खासकर गंगा एक्सप्रेस-वे हो या विकास के अन्य प्रोजेक्ट अथवा जेवर में बनने वाला नया एयरपोर्ट, जग-जाहिर है कि ये सभी बीएसपी की मेरी सरकार में ही तैयार किए गए विकास के वे प्रख्यात मॉडल हैं जिसको लेकर पहले सपा व अब वर्तमान बीजेपी सरकार अपनी पीठ आप थपथपाती रहती है।

अपने दूसरे ट्विट में बहनजी ने कहा, साथ ही मेट्रो एवं अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, कन्नौज सहित यूपी के प्रचीन व प्रमुख शहरों में बुनियादी जनसुविधाओं की नई स्कीमें व इनको रिकार्ड समय में पूरा करने का काम भी बीएसपी का ही विकास मॉडल है जो कानून द्वारा कानून के राज के साथ प्राथमिकता में रहा, जिससे सर्वसमाज को लाभ मिला।

बहनजी ने अपने तीसरे ट्विट में लिखा कि इस प्रकार मेरी सरकार के सन 2012 में जाने के बाद यूपी में जो कुछ भी थोड़ा विकास संभव हुआ है वे अधिकांश बीएसपी की सोच के ही फल हैं। मेरी सरकार में ये काम और अधिक तेजी से होते अगर तब कांग्रेस की रही केन्द्र सरकार पर्यावरण आदि के नाम पर राजनीतिक स्वार्थ की अड़ंगेबाजी नहीं करती।

दरअसल भाजपा के विरोधी हों या फिर समर्थक, हर कोई बेहिचक बसपा शासनकाल में हुए कई कामों के लिए आज भी बहनजी को याद करता है। ऐसे में जब बसपा शासनकाल की योजनाओं को बाद की सरकारें बिना बसपा को क्रेडिट दिए उसका ढिंढ़ोरा पीटती हैं, तो बहनजी को गुस्सा आना स्वाभाविक है।

किसान आंदोलन पर बहनजी का बड़ा बयान

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 नए कृषि बिल के खिलाफ किसानों के आंदोलन को बसपा प्रमुख मायावती लगातार समर्थन दे रही हैं। किसानों के आंदोलन को बहनजी न सिर्फ लगातार समर्थन दे रही हैं, बल्कि इस मुद्दे पर लगातार किसानों के पक्ष में मुखर हैं। हाल ही में 19 दिसंबर को बसपा प्रमुख ने एक ट्विट कर फिर से इस मुद्दे पर बड़ा बयान दिया है। बहनजी ने अपने बयान में कहा, “बसपा यह मांग करती है कि केन्द्र की सरकार को, हाल ही में देश में लागू तीन नए कृषि कानूनों को लेकर आन्दोलित किसानों के साथ हठधर्मी वाला नहीं बल्कि उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाकर उनकी माँगों को स्वीकार करके, उक्त तीनों कानूनों को तत्काल वापस ले लेना चाहिए।”

इससे पहले 7 दिसंबर को भी बहनजी ने कृषि कानून को लेकर किसानों के साथ अपनी सहमति जताई थी। और 8 दिसंबर को किसानों द्वारा किये गए भारत बंद को अपना समर्थन दिया था। 7 दिसंबर को किए अपने ट्विट में बहनजी ने कहा था, “कृषि से सम्बंधित तीन नये कानूनों की वापसी को लेकर पूरे देश भर में किसान आन्दोलित हैं व उनके संगठनों ने दिनांक 8 दिसम्बर को ’’भारत बंद’’ का जो एलान किया है, बी.एस.पी उसका समर्थन करती है। साथ ही, केन्द्र से किसानों की माँगों को मानने की भी पुनः अपील करती है।”

किसानों के आंदोलन को लेकर बसपा प्रमुख ने शुरुआती ट्विट 29 नवंबर को किया था, जिसमें उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार को घेरा था। बहनजी ने कहा था, “केन्द्र सरकार द्वारा कृषि से सम्बन्धित हाल में लागू किए गए तीन कानूनों को लेकर अपनी असहमति जताते हुए पूरे देश में किसान काफी आक्रोशित व आन्दोलित भी हैं। इसके मद्देनजर, किसानों की आम सहमति के बिना बनाए गए इन कानूनों पर केन्द्र सरकार अगर पुनर्विचार कर ले तो बेहतर।”

दरअसल किसानों के आंदोलन और उनकी मांगों के साथ बसपा लगतार खड़ी है। बसपा प्रमुख न सिर्फ आंदोलन के हर दिन की प्रगति को देख रही हैं, बल्कि अपना पक्ष भी रख रही हैं। बसपा अपने शासनकाल में भी किसानों के मुद्दों को लेकर काफी संवेदनशील रही हैं। बसपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में किसानों की स्थिति काफी बेहतर थी। गन्ना किसानों को जो मूल्य दिया गया था, वह आज भी एक रिकार्ड है तो वहीं बहन मायावती के नेतृत्व वाले बसपा शासनकाल में भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार को देश में सबसे ज्यादा पैदावार के लिए मेडल दिया। अनाज उत्पादन में प्रदेश नंबर वन रहा था।