जानिए कौन है एथलीट की दुनिया में इतिहास रचने वाली हिमा दास

गुरुवार को जब देश सोया हुआ था 18 साल की एक लड़की ने वो कर दिखाया, जिसका देश को पिछले कई सालों से बेसब्री से इंतजार था. उस लड़की का नाम हिमा दास है. आज देश में हर कोई हिमा दास का नाम जानता है. उस शानदार एथलीट ने वो कर दिखाया है जिसे करने से मिल्खा सिंह चूक गए थे, हिमा दास ने वो कर दिखाया है, जिसे पी.टी ऊषा नहीं कर पाईं थीं. देश के खेल के मैदान से जिस खबर का इंतजार सालों से था, वह इंतजार गुरुवार देर रात खत्म हो गया, जब फ़िनलैंड के टैम्पेयर शहर में हिमा दास ने IAAF विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में सबको पछाड़ते हुए सोने का तमगा अपने नाम कर लिया. हिमा ने यह दौड़ 51.46 सेकेंड में पूरा किया. इसके साथ ही हिमा अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स ट्रैक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बन गई हैं.

अब हम आपको बताते हैं कि कौन है हिमा दास. हिमा दास असल के नौगांव नाम के जिले की रहने वाली हैं. एथलिट बनने से पहले हिमा को फ़ुटबॉल खेलने का शौक था. वह आस-पास के इलाके में छोटे-मोटे फ़ुटबॉल मैच खेलकर 100-200 रुपये जीत लेती थी. ये कुछ रुपये हिमा के परिवार वालों के लिए बहुत मायने रखते थे. क्योंकि कई बार तो इन्हीं पैसों से उसके घर का चूल्हा जलता था. हिमा के घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब है. उनके पिता एक छोटे किसान हैं और खेती-बाड़ी करते हैं, जबकि मां घर संभालती हैं.

हिमा के एथलीट बनने की कहानी जनवरी 2017 में शुरू हुई. हिमा राजधानी गुवाहाटी में एक कैम्प में हिस्सा लेने आई थीं. तभी निपुण दास की नज़र उन पर पड़ी. हिमा जिस तरह से ट्रैक पर दौड़ रही थी, निपुण दास को लगा कि इस लड़की में आगे तक जाने की काबिलियत है. हिमा ने निपुण को इतना प्रभावित किया कि वो हिमा के गांव में उनके माता पिता से मिलने पहुंच गए. उन्होंने हिमा के माता-पिता को बेटी की खासियत बताई और कहा कि वे हिमा को बेहतर कोचिंग के लिए गुवाहाटी भेज दें. अब दिक्कत यह थी कि हिमा के माता-पिता बेटी के गुवाहाटी में उनके रहने का खर्च तक उठाने की स्थिति में नहीं थे. हालांकि वो बेटी को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे.

तब निपुण ने एक रास्ता निकाला. उन्होंने तय किया कि अगर हिमा के घरवाले उसे गुवाहाटी भेजने को तैयार हो जाएं तो हिमा के गुवाहाटी में रहने का खर्च वो खुद उठाएंगे.  हिमा के घरवाले इसके लिए मान गए और इस तरह हिमा गुवाहाटी आ गई.

हिमा की सफलता की पटकथा यहीं से लिखी जानी शुरू हो गई. हिमा फुलबाल खेलती थीं तो उनमें काफी स्टेमिना था. निपुण जब हिमा को फ़ुटबॉल से एथलेटिक्स में आने के लिए तैयार करने लगे तो शुरुआत में उन्होंने 200 मीटर की तैयारी करवाई, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हो गया कि हिमा 400 मीटर में अधिक कामयाब रहेगी. बस फिर क्या था…. हिमा दौड़ने लगी.

 अप्रैल में गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में हिमा दास छठे स्थान पर रही थीं. तो वहीं हालिया राष्ट्रमंडल खेलों की 4X400 मीटर स्पर्धा में भी वे शामिल थीं, हालांकि तब भारतीय टीम सातवें स्थान पर रही थी. लेकिन हिमा को सिर्फ स्वर्ण पदक दिख रहा था. वो इससे कम पर समझौते के लिए तैयार नहीं थीं. और आखिरकार हिमा ने जब फिनलैंड के टैम्पेयर में स्वर्ण पदक जीतकर वो कर दिखाया, जिसे न कर पाने की कसक पूरे देश को कई सालों से खल रहा था.

हिमा को मिली इस कामयाबी के बाद पूरा देश उन्हें बधाइयां दे रहा है. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री  तक ने उन्हें इस ऐतिहासिक कामयाबी के लिए ट्वीट कर बधाई दी है. हिमा ने भी सभी का धन्यवाद दिया है कि और कहा है कि वे देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर बेहद खुश हैं, वे आगे भी और अधिक मेडल जीतने की कोशिश करेंगी.

लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि बड़े-बड़े मैदानों में सारी सुविधाओं से लैस खिलाड़ी जब पीछे छूट जाते हैं तो वहीं पी.टी. उषा, मिल्खा सिंह और हिमा दास जैसे गरीबी और अभाव के बीच से निकले खिलाड़ी देश का नाम और नाक ऊंचा करते हैं. फिनलैंड में तिरंगा लहराती भारत की नई उड़न परी हिमा दास और उनकी प्रतिभा को पहचानने वाले कोच निपुण दास ने देश को फख्र करने का मौका दिया है.

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सांप्रदायिक राजनीति के भगवा रंग के खिलाफ ताल ठोकता आदिवासी धर्म

झारखंड के गुमला जिले के घाघरा प्रखंड की एक खबर के मुताबिक अपने आदिवासी सरना धर्म और आस्‍था के केंद्र मड़ई (देवी मंडप) पर होने वाले हिंदुत्‍ववादी हमलों और इन हमलावरों को प्राप्त राज्‍य की भाजपा सरकार के मौन समर्थन से आदिवासी समाज आहत है. आहत समाज ने समीर भगत के नेतृत्‍व में 100 से अधिक सरना धर्मालंबी आदिवासी परिवारों ने इस्‍लाम धर्म अपनाने की चेतावनी दी है. अभी तक ब्राह्मणवादी ताकतों की ज्‍यादतियों के खिलाफ दलित जातियों के लोग ही इसप्रकार से इस्‍लाम अपना लेने की धमकियाँ देते रहे हैं और इस्‍लाम अपनाते भी रहे हैं. किंतु आदिवासियों के द्वारा इस्‍लाम अपना लेने की यह धमकी साबित करती है कि आदिवासी भी दलितों के जैसे ही हिंदुत्‍ववादी ताकतों की निरंकुशता के शिकार हैं. झारखंड के सरना धर्मालंबियों की यह चेतावनी भारत के आदिवासियों की स्‍वायत्‍त धार्मिक-सांस्‍कृतिक पहचान को मिटा उन पर हिन्दू धर्म का ठप्‍पा लगा देने की हिन्दुत्‍ववादी सांस्‍कृतिक परियोजना के खिलाफ खदबदाते आदिवासी असंतोष की अभिव्‍यक्ति है.

 यह पूरा प्रसंग राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) द्वारा दिखाये जाने वाले हिन्दू राष्‍ट्र के स्‍वप्‍न में निहित खतरों की ओर साफ संकेत करता है. आर.एस.एस. और उसके राजनीतिक संस्करण भाजपा का हमारे देश के संविधान द्वारा प्रदत्‍त धार्मिक स्‍वतंत्रता के मौलिक अधिकार में कतई विश्‍वास नहीं है. संविधान ने अनुच्‍छेद 25 से 28 तक हर भारतीय व्‍यक्ति को धार्मिक स्‍वतंत्रता से जुड़े कुछ मौलिक अधिकार दिये हैं. इनके अनुसार हर भारतीय नागरिक को यह छूट है कि वह किसी खास धर्म में विश्‍वास रखे या न रखे अथवा धर्म मात्र में ही उसकी आस्‍था न हो. किंतु लगता है कि आर.एस.एस. और भाजपा आदिवासियों को हमारे देश का नागरिक ही नहीं मानते अन्‍यथा वे क्‍यों झारखंड के आदिवासियों के सरना धर्म के प्रति असम्‍मान दिखातेॽ असल में हकीकत यह है कि आर.एस.एस. और भाजपा संविधान प्रदत्‍त लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देने वाले आदिवासियों और उनके शुभचिंतकों को राष्‍ट्रविरोधी और नक्‍सली आरोपित करके हिन्दू राष्‍ट्र के अपने हिंसक यज्ञ में उन्‍हें स्‍वाहा करने की कुनीति को ही अपना धर्म मानते हैं.

 लंबे समय से इस देश के मूल निवासी आदिवासी स्‍वयं को मर्दुमशुमारी में हिन्दू धर्म समेत मुख्‍यधारा के अन्‍य धर्मों के बट्टेखाते में डालने का विरोध करते आ रहे हैं. वे मानते हैं कि उनका धर्म सरना है और हिन्दू धर्म से उनका कोई लेना-देना नहीं है. वास्‍तव में देशभर के तमाम आदिवासी समुदाय प्रकृति के उपासक रहे हैं. वे प्रकृति के साथ समन्‍वय और सहयोग के दर्शन पर आधारित प्राकृतिक धर्म में आस्‍था रखते हैं. चाहे इस आस्‍था को अलग-अलग आदिवासी समुदायों में अलग-अलग नाम दिया जाता हो, किंतु इन सभी नामों के पीछे मूल दर्शन एक ही है. लेकिन गैर आदिवासी सत्‍ता समय-समय पर आदिवासियों की धार्मिक पहचान के खिलाफ राजनीतिक-धार्मिक-कानूनी षड्यंत्र करती रही हैं. प्राचीन काल से ही हिन्दू आर्य आदिवासियों के धर्म और उनकी संस्कृति को लेकर अपने धर्म ग्रंथों में उन्‍हें राक्षस और असुर कहकर तमाम नकारात्‍मक दुष्‍प्रचार करते रहे हैं. औपनिवेशिक काल में विदेशी साम्राज्‍यवाद की शह पाकर चर्चों और मिशनरियों ने भौतिक प्रलोभनों आदि के बल पर आदिवासियों का धर्मांतरण करवाया तो आ‍जादी के बाद भी कांग्रेस की केंद्रीय सरकार ने आदिवासियों की पृथक धार्मिक पहचान को जनगणना में जगह नहीं दी. और केंद्र तथा राज्‍य में सत्‍तारूढ़ आज की हिंदुत्‍ववादी सरकारों के संरक्षण में आर.एस.एस. और उसके आनुषांगिक संगठन आदिवासियों के हिन्दूकरण की मुहिम में जोर-शोर से लगे हुये हैं.

यह मुहिम पूरे दंडकारण्‍य में पहले से ही चलाई जा रही थी. इसमें प्रवासी भारतीयों के पैसे तक लगे थे. आदिवासी इलाकों में वनवासी स्‍कूलों और हनुमान मंदिरों की स्‍थापना, आदिवासियों के बीच हनुमान लॉकेट समेत त्रिशूल वितरण और सारंडा विश्‍व कल्‍याण आश्रम की स्‍थापना– ये सब इसी मुहिम का हिस्‍सा थे. गैर ईसाई आदिवासियों को ईसाई आदिवासियों के खिलाफ भड़काकर कंधमाल का दंगा आदि करवाया गया और उनका शुभचिंतक होने का ढोंग किया गया. दूसरे चरण में धीरे-धीरे उनकी आदिवासी पहचान खत्‍म करके आदिवासी धर्म-संस्‍कृति को भगवा रंग में रंगने की कुत्सित कोशिश की गई.

 जी.एस.घुर्ये (गोबिंद सदाशिब घुर्ये) आदिवासी को हिन्दू साबित करने की जिहादी जिद पकड़े हुए हैं. घुर्ये ने ‘तथाकथित मूल निवासी और उनका भविष्य’ शीर्षक एक पुस्तक लिखी थी जो कई संस्करणों के पश्‍चात् ‘भारत की अनुसूचित जनजातियां’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. इन्होंने हिन्दू समाज के साथ आदिवासियों के समायोजन के आधार पर आदिवासियों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करते हुए उन्हें ‘पिछड़ा हुआ हिन्दू’ साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. इनके सारे तर्क बाण एक ही धनुष से निकलते हैं जो आदिवासियों के जीववादी धर्म और हिन्दू धर्म की तथाकथित मूलभूत समानता के ख्याली तत्वों से बना है.

किंतु अब पढ़-लिख रही आदिवासी पीढ़ी अपनी पहचान के प्रति धीरे-धीरे मुखरित होने लगी है. यह पीढ़ी अब सवाल पूछ रही है कि जब 45 लाख जैनियों और 84 लाख बौद्धों के अल्‍पसंख्‍यक धर्मों को जनगणना में पृथक धर्मों के रूप में मान्‍यता दी गई है तो आदिवासियों को क्‍यों पृथक धार्मिक पहचान के इस लोकतांत्रिक अधिकार से साजिशन वंचित रखा जा रहा है जबकि उनकी संख्‍या इन अल्‍पसंख्‍यक धर्मालंबियों की जनसंख्‍या से कहीं ज्‍यादा ही है. अगर प्राचीनता की बात करे तब भी भारत के अन्‍य धर्मालंबियों की तुलना में आदिवासियों का धर्म कहीं भी उन्‍नीस नहीं ठहरता. अन्‍य धर्मालंबियों के बारे में कटु सत्‍य यह है कि ये सब इतिहास के किसी न किसी चरण में बाहर से आकर यहां बसे हैं अथवा इनका धर्मातंरण हुआ है लेकिन आदिवासी इसी देश के मूल निवासी हैं और उन्‍होंने किसी दूसरे धर्मालंबी का अपने धर्म में धर्मांतरण भी नहीं कराया है.

 वास्‍तव में आर.एस.एस. को आदिवासियों की स्‍वतंत्र स्‍वायत्‍त धार्मिक पहचान इसलिए स्‍वीकार्य नहीं है क्‍योंकि इसके कारण बहुंख्‍यक हिन्दूवाद का उसका दावा दरक जाता है. आर.एस.एस. को तो ‘आदिवासी’ शब्‍द से भी चिढ़ है क्‍योंकि यह एक संज्ञा ही उनके आर्य हिन्दू राष्‍ट्रवाद को मुँह के बल गिरा देती है. आर.एस.एस. बारंबार आदिवासियों के लिए ‘वनवासी’ संज्ञा का प्रयोग करके इन्‍हें हिन्दू किंतु पिछड़ा हिन्दू साबित करने की कोशिश करता रहता है. गौरतलब है कि 2015 के अंतिम चतुर्थांश में रांची में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित अपने अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के अधिवेशन के दौरान भी उसने आदिवासियों के सरना धर्म के दावे को सिरे से खारिज करते हुये कहा था कि सभी आदिवासी हिन्दू होते हैं. आर.एस.एस. के सह सरकार्यवाहक डॉ. कृष्‍ण गोपाल ने सरना धर्म कोड की मांग को संविधान के खिलाफ तक बताया था. आर.एस.एस. की सरना विरोधी इस नीति के खिलाफ उस समय रांची में जमकर विरोध प्रदर्शन हुये थे और आर.एस.एस. के सरकार्यवाहक डॉ. मोहन भागवत समेत सह सरकार्यवाहक डॉ. कृष्‍ण गोपाल के पुतले फूंके गये थे.

 सरना और सनातन धर्म को एक बताये जाने के साथ-साथ हिन्दूवादी लोग आदिवासियों को मूलत: रामभक्‍त भील और शबरी की संताने बताते रहते हैं. इस प्रकार के बेसिर-पैर के हिन्दूवादी मिथकों और मंसूबों के खिलाफ सरना धर्म को लेकर आज झारखंड के विभिन्न आदिवासी संगठनों और राजनीतिक दलों में मतैक्‍य नज़र आता है. सरना महासभा, एशिया पेसिफिक यूथ इंडिजिनेस पीपुल्‍स फोरम, आदिवासी सरना महासभा, आदिवासी जन परिषद्, आदिवासी छात्र संघ, आदिवासी सेंगेल अभियान, झारखंड दिशोम पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि – ये सब समय की मांग को देखते हुये आदिवासी और आदिवासी धर्म-संस्‍कृति की रक्षा के लिए लामबंद होते नज़र आते हैं. 2013 में चार आदिवासी संगठनों – अखिल भारतीय मांझी परगना समिति, अखिल भारतीय सरना धर्म मंडप, ऑल इंडिया संथाली एजुकेशन काउंसिल और झारखंड दिशोम पार्टी ने रांची के आदिवासी यूथ क्‍लब में सरना धर्म के रीति-रिवाजों को संहिताबद्ध करने के लिए तीन दिवसीय सम्‍मेलन का भी आयोजन किया था जिसमें इन संगठनों के लगभग 1000 सदस्‍यों ने शिरकत की थी.

 ईसाइयों और मुस्लिमों की जनसंख्‍या में होने वाली कथित वृद्धि को हिन्दू राष्‍ट्र के खिलाफ इन धर्मों का षड्यंत्र बताने वाला आर.एस.एस. विकास की आड़ में अपनी ही जमीन पर अल्‍पसंख्‍यक बनाये जाते आदिवासियों की त्रासदी पर एक शब्‍द तक नहीं बोलता. अगर हिन्दुओं की ठेकेदारी करने का दंभ भरने वाला आर.एस.एस. वास्‍तव में आदिवासियों को हिन्दू मानता है तो इन अभागे हिन्दुओं की इस त्रासदी पर वह मौनासन में क्‍यों पड़ा रहता हैॽ असल में आर.एस.एस यह कभी सहन नहीं कर सकता कि जनगणना में आदिवासियों को अपने सरना आदिवासी धर्म का विकल्‍प भरने का मौका दिया जाये. उसे यह बात अखरती है कि पिछली जनगणना में झारखंड की कुल जनसंख्या में से 42 लाख 35 हजार 786 लोगों ने अन्‍य के कॉलम में टिक मारा. यह बताने की जरूरत नहीं है कि इतनी बड़ी संख्‍या में अकेले झारखंड से अन्‍य धर्मालंबी का विकल्‍प चुनने वाले ये लोग कौन थे.

 आदिवासी धीरे-धीरे आर.एस.एस. और भाजपा की आदिवासी विरोधी राजनीति का रंग पहचानने लगे हैं और वे जनगणना से लेकर धार्मिक कोड बिल तक में आदिवासी धर्म को संवैधानिक पहचान देने की मांग करने लगे हैं. आदिवासियों की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी आदिवासी समुदायों की पृथक–पृथक पहचानों के नीचे छिपी साझा आदिवासियत को भी रेखांकित कर रही है. आज यह पीढ़ी एक साझा आदिवासी धर्म और आदिवासी कोड बिल की मांग कर रही है. लेकिन आर.एस.एस. आदिवासियों की इस साझा धार्मिक पहचान की मार्ग में अड़ंगे लगाने में जुटी है.

जो लोग झारखंड की राजनीति को निकट से देखते आये हैं, वे पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस आदिवासी राज्‍य में आदिवासियों द्वारा दक्षिणपंथी हिंदुत्‍ववादी रानीतिक पार्टी भाजपा के पक्ष में मतदान करने से हतप्रभ थे. वास्‍तव में यह ईसाई और मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक हिन्दुत्‍व की लहर ही थी कि झारखंड के आदिवासी भी अन्‍य भारतीय आदिवासियों के जैसे अपना भला-बुरा नहीं पहचान पाये थे. लेकिन आज आर.एस.एस. और भाजपा के लोग जिस प्रकार सरना धर्म के प्रतीकों के हिन्दूकरण के माध्‍यम से आदिवासी पहचान को मिटा देने के षड्यंत्रों में खुले आम लिप्‍त हैं, उससे झारखंड के गैर ईसाई आदिवासी भी ईसाई विरोधी सांप्रदायिक राजनीति के असली रंग को पहचानने लगे हैं.

– प्रमोद मीणा लेखक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी में हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. Read it also-मुन्ना बजरंगी की हत्या के लिए जेल में ऐसे पहुंचा था हथियार
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मुन्ना बजरंगी की हत्या के लिए जेल में ऐसे पहुंचा था हथियार

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मुन्ना बजरंगी (फाइल फोटो)
लखनऊ। मुन्ना बजरंगी की हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, एक के बाद एक कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. जेल में हथियार कैसे पहुंचा था, यह एक बड़ी पहेली बनी हुई थी, जिसे पुलिस ने सुलझा लिया है. दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के मुताबिक जांच के बाद यह बात सामने आई है कि पिस्टल को टिफिन में बंद कर के जेल के भीतर पहुंचाया गया था. यह भी कहा जा रहा है कि बागपत जेल में हत्या के बाद आरोपी सुनील राठी नहाया था, ताकि उसके शरीर में गन पाउडर का कोई सबूत न रहे. राठी ने अपने कपड़े भी धुलवा दिए थे, ताकि फोरेंसिक जांच के दौरान पुलिस को कोई सबूत नहीं मिले. इन तमाम गतिविधियों में अपराधियों ने जेल में सीसीटीवी नहीं होने का भी भरपूर फायदा उठाया. इससे पहले एफआईआर से भी कई नई जानकारियां मिली थी. हत्या में इस्तेमाल पिस्टल को खोजने के लिए पुलिस को घंटों मशक्कत करनी पड़ी. सूचना के आधार पर पुलिस ने जेल के गटर से एक बड़े चुंबक की मदद से पिस्टल को बरामद किया. इस दौरान पुलिस को कई कारतूस भी मिले थे.

हिमा दास ने भारत को दिलाया गौरव, ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड जीता

नई दल्ली। भारत में जो अब तक नहीं हो पाया था, हिमा दास ने कर दिखाया है. भारत की हिमा दास ने गुरुवार को फिनलैंड के टेम्पेरे में चल रहे आईएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण जीत कर इतिहास रच दिया है. हिमा दास ने वो कारनामा कर दिखाया है, जिसे करने से मिल्खा सिंह और पीटी उषा चूक गए थे.

हिमा दास से पहले भारत की कोई महिला या पुरुष खिलाड़ी जूनियर या सीनियर किसी भी स्तर पर विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड या कोई मेडल नहीं जीत सका था. पीटी उषा ने जहां 1984 ओलंपिक में 400 मीटर हर्डल रेस में चौथा स्थान हासिल किया था. मिल्खा सिंह 1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर रेस में चौथे स्थान पर रहे थे. इन दोनों के अलावा कोई भी खिलाड़ी ट्रैक इवेंट में मेडल के करीब नहीं पहुंच सका.

हिमा ने राटिना स्टेडियम में खेले गए फाइनल में 51.46 सेकेंड का समय निकालते हुए जीत हासिल की. इसी के साथ वह इस चैंपियनशिप में सभी आयु वर्गो में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला बन गई हैं. एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी हिमा दास को शानदार सफलता के लिए बधाई दी है. बुधवार को हुए सेमीफाइनल में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 52.10 सेकंड का समय निकालकर वो पहले स्थान पर रही थीं.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी बधाई

हिमा की इस ऐतिहासिक सफलता पर उन्हें देशभर से बधाइयां मिल रही हैं. राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हिमा को बधाई देते हुए कहा कि हिमा से अब ओलंपिक में पदक का इंतजार है. हिमा की सफलता पर किए गए ट्विट में राष्ट्रपति कोविंद ने लिखा-

“विश्व अंडर-20 चैंपियनशिप में 400 मीटर स्वर्ण जीतने के लिए हमारी शानदार स्प्रिंट स्टार हिमा दास को बधाई. विश्व चैंपियनशिप में यह भारत का पहला ट्रैक गोल्ड है. यह असम और भारत के लिए बहुत गर्व का विषय है; हिमा से अब ओलंपिक में पदक का इंतज़ार! — राष्ट्रपति कोविन्द”

तो वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि यह जीत आने वाले समय में युवाओं को प्रेरित करेगी. अपने ट्विट में पीएम मोदी ने लिखा-

“India is delighted and proud of athlete Hima Das, who won a historic Gold in the 400m of World U20 Championships. Congratulations to her! This accomplishment will certainly inspire young athletes in the coming years.

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दुनिया का यह ताकतवर नेता हो सकता है गणतंत्र दिवस पर मेहमान

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नई दिल्ली। साल 2019 में गणतंत्र दिवस पर भारत का मेहमान कौन होगा, इसको लेकर आखिरी चर्चा खत्म हो गई है. सरकार ने गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को न्योता भेजा है. अब सबकी नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर है कि वह इसे स्वीकार करते हैं या नहीं.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इस साल अप्रैल माह में ही यह न्योता भेजा था और अभी अमेरिकी सरकार से इस पर आधिकारिक जवाब का इंतजार है. लेकिन ऐसे संकेत मिले हैं ट्रंप प्रशासन इस निमंत्रण पर सकारात्मक तरीके से विचार कर रहा है. यह न्योता भेजने के बाद इस बारे में अब तक कई दौर का राजनयिक स्तरीय संवाद भी हो चुका है. गौरतलब है कि ट्रंप से पहले उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा के साल 2015 में रिपब्लिक डे परेड के चीफ गेस्ट थे. अगर ट्रंप इस न्यौते को स्वीकार करते हैं तो इसे विदेश नीति के लिहाज से मोदी सरकार की बड़ी सफलता मानी जाएगी.

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नोएडा में फ्लैट खरीदनें वालों के लिए बड़ी खुशखबरी

नोएडा में अपना फ्लैट खरीदने की चाहत रखने वालों को जिला प्रशासन के एक फैसले से बड़ी खुशखबरी मिली है. दरअसल जिला प्रशासन द्वारा लिए गए एक फैसले के मुताबिक एक अगस्त से नोएडा में फ्लैट का नया सर्किल रेट लागू किया जाएगा. यानि इस राहत से जिले में इस वर्ष सर्किल रेट नहीं बढ़ेगा. प्रशासन ने सुविधाओं के नाम पर लगने वाला तीन फीसदी सर्किल रेट हटा लिया है. इसमें पॉवर बैकअप और लिफ्ट के नाम पर तीन फीसदी चार्ज लगता था जो एक अगस्त से हटा दिया जाएगा.

इसके अलावा मिलने वाले अन्य राहतों में फ्लैट खरीदने वाले लोगों को अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी नहीं देनी होगी. अतिरिक्त चार्ज को 15 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी कर दिया गया है. सर्किल रेट को भी 75 फीसदी से घटाकर 65 फीसदी कर दिया गया है. यह रेट ग्राउंड और अपर ग्राउंड फ्लोर पर लागू होगा. प्रशासन का यह नियम होटलों पर भी लागू रहेगा. दादरी और जेवर में भी पुरानी दरें लागू रहेंगी.

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जातिवादियों ने तोड़ा दलित का निर्माणाधीन पीएम आवास

झुमरीतिलैया। दलित समाज के एक व्यक्ति द्वारा पीएम आवास योजना के तहत बनाया जाने वाला मकान गांव के ही जातिवादियों द्वारा तोड़ने की खबर है. इस संबंध में पीड़ित कौशल्या देवी (पति हरि दास असना इंदरवा वार्ड नंबर पांच निवासी) ने थाना में आवेदन देकर मामले की जांच कर दोषी लोगों पर कार्रवाई करने की मांग की है.

अपने आवेदन में पीड़ित कौशल्या देवी ने कहा है कि उसके ससुर कुंजील रविदास ने 1956 में गांव के ही उगर सिंह (पिता झरी सिंह) से खाता नंबर 108, प्लॉट नंबर 1013, रकवा 16 डिसमिल जमीन खरीदी थी. इस जमीन को उनका परिवार पिछले 61 सालों से जोत रहा है. इस जमीन में चार गोतिया का हिस्सा है. इसी जमीन पर पीड़ित जब अपने हिस्से में पीएम आवास योजना के तहत मकान निर्माण करा रही थी, जातिवादियों ने इसे तोड़ दिया.

पीड़िता के मुताबिक निर्माणाधीन आवास 10 फूट ऊंचा उठाया गया था. मगर 10 जुलाई को ईश्वरधारी सिंह, बैजनाथ सिंह, मुकेश सिंह, किशोर सिंह, गोपाल सिंह उर्फ घप्पु, रोबिन सिंह, सुनील सिंह, हरी सिंह आदि ने हरवो हथियार से लैस होकर कार्य स्थल पर पहुंचे और धमकी दी कि इस मकान को तोड़ों नहीं तो जान से मार देंगे. आरोप यह भी है कि इस दौरान आरोपियों ने गाली गलौज करते हुए जाति सूचक शब्द का भी प्रयोग किया. मना करने के बावजूद भी उन लोगों ने दीवार तोड़ दी, जिससे पीड़िता का काफी नुकसान हो गया.

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जानिए कब आएगा UPSC Civil Services Prelims का रिजल्ट, कैसे देखें रिजल्ट

नई दिल्ली। UPSC Civil Services Prelims Result 2018: यूपीएससी प्रिलिम्स परीक्षा का रिजल्ट जल्द जारी करेगा. प्रिलिम्स परीक्षा का रिजल्ट (UPSC Prelims Result 2018) ऑफिशियल वेबसाइट upsc.gov.in पर जारी किया जाएगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपीएससी प्री रिजल्ट (UPSC Pre Result) की तारीख की घोषणा 13 जुलाई को की जाएगी. प्री परीक्षा का रिजल्ट (UPSC Prelims Exam Result) 22 जुलाई को जारी कर दिया जाएगा. पीएससी प्रीलिम्स (UPSC Prelims Exam 2018) इस साल 3 जून को हुआ था. इस परीक्षा में 3 लाख अभ्यर्थियों ने इस परीक्षा में भाग लिया था. ये परीक्षा देश के कई केंद्रों में आयोजित कराई गई थी. प्रिलिम्स परीक्षा के रिजल्ट के बाद यूपीएससी मुख्य परीक्षा (Civil Services Main examination) के लिए आवेदन लेने शुरू कर देगा. यूपीएससी सिविल सर्विसेज की मुख्य परीक्षा (UPSC Civil Services Main Exam) 28 सितंबर से 7 अक्टूबर तक होगी.

UPSC Prelims Result 2018/UPSC Civil Services Prelims Result 2018 ऐसे करें चेक

स्टेप 1: ऑफिशिल वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं. स्टेप 2: UPSC Prelims Exam Result 2018 के लिंक पर क्लिक करें. स्टेप 3: अपना रोल नंबर और अन्य जानकारी भरें. स्टेप 4: रिजल्ट खुलने पर प्रिंट आउट ले लें.

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सिर्फ अमित शाह नहीं, कांग्रेस के ये दिग्गज नेता भी हैं बिहार दौरे पर

पटना। जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गठबंधन और सीटों की रार सुलझाने के लिए बिहार दौरे पर हैं, ऐसे में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता भी पटना पहुंचे हैं. कांग्रेस कमेटी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत दो दिवसीय दौरे पर बिहार में हैं. पटना पहुंचे गहलोत ने इस दौरान आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से उनके आवास जाकर मुलाकात की. 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उनका ये दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

अपने दौरे के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जहां नीतीश कुमार से सीटों का मसला हल करने में जुटे रहें वहीं अशोक गहलोत भी 2019 चुनाव के मद्देनजर अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करते रहें. माना जा रहा है कि एनडीए के साथ महागठबंधन में भी सीटों के बंटवारे पर पेंच फंस सकता है. इसी के चलते गहलोत सक्रिय हो गए हैं. वे अपने दो दिवसीय दौरे के जरिए बिहार में कांग्रेस संगठन की जमीनी हकीकत को समझने के लिए विचार-विमर्श करेंगे. इस दौरान गहलोत द्वारा राजद से गठबंधन की संभावना भी टटोले जाने की बात सामने आई है.

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अमित शाह के दौरे के बावजूद बिहार में नहीं सुलझा ‘छोटे’ और ‘बड़े भाई’ का मामला

पटना। बिहार की अपनी यात्रा पर गुरुवार को पहुंचे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने घोषणा किया है कि जदयू के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा. नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद पटना के ज्ञान भवन में आयोजित भाजपा कार्यकर्ता सम्मेलन में अमित शाह ने यह घोषणा की. शाह ने कहा कि हम एकजुट हैं और भाजपा को अपने सहयोगियों को संभालने आता है. अमित शाह ने यह भी दावा किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में सभी 40 सीटों पर हमारे प्रत्याशी विजयी रहेंगे हालांकि उन्होंने इस बारे में चुप्पी साधे रखी कि कौन कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगा.

इससे पहले पटना पहुंचने के बाद एयरपोर्ट पर अमित शाह का स्वागत बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय, बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने स्वागत किया. शाह वहां से स्टेट गेस्टहाउस पहुंचे, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सुबह का नाश्ता किया. दोनों के बीच लगभग 45 मिनट तक बात हुई. खबर है कि इस बातचीत में अमित शाह और नीतीश कुमार ने 2019 चुनाव में गठबंधन की संभावनाओं और सीटों की संख्या पर अपनी-अपनी राय रखी. अब रात को डिनर पर दोनों नेता एक बार फिर से चर्चा करेंगे.

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FIFA WC 2018: क्रोएशिया ने इंग्‍लैंड को हराकर रचा इतिहास, फ्रांस से होगी खिताबी भिड़ंत

नई दिल्ली। फीफा वर्ल्ड कप 2018 में उलटफेरों का दौर सेमीफाइनल में भी जारी रहा. रूस में खेले गए दूसरे सेमीफाइनल मैच में क्रोएशिया ने इंग्लैंड को 2-1 से हरा दिया. एक गोल से पिछड़ने के बाद अतिक्ति समय में 109वें मिनट में मारिया मांड्जुकिक के गोल के दम पर क्रोएशिया ने फीफा विश्व कप के 21वें संस्करण के फाइनल में जगह बना ली है.

क्रोएशिया पहली बार विश्व कप के फाइनल में पहुंचा है जहां उसका सामना रविवार को 1998 की विजेता फ्रांस से होगा. वहीं इंग्लैंड तीसरे स्थान के मैच के लिए शनिवार को बेल्जियम से भिड़ेगा.

क्रोएशिया पहले हाफ में एक गोल से पीछे थी, लेकिन दूसरे हाफ में उसने मैच का पासा पलट दिया और बराबरी का गोल किया. तय समय में मैच 1-1 की बराबरी पर खत्म हुआ और मैच अतिरिक्त समय में गया जहां मांड्जुकिक ने गोल कर अपनी टीम के लिए इतिहास रचा. मांड्जुकिक ने यह गोल ईवान पेरीसिक के पास पर किया. पेरीसिक ने बॉक्स के अदंर मांड्जुकिक को गेंद दी जिन्होंने बेहद आसानी से उसे गोल के निचले कोने में डाल अपनी टीम को निर्णायक 2-1 की बढ़त दिलाई जो विजयी साबित हुई.

इंग्लैंड को इस मैच में अपनी गलतियों पर काफी पछतावा हो रहा होगा. पांचवें मिनट में ही 1-0 से आगे होने के बाद उसके पास तीन से चार गोल करने के बेहद आसान और साफ मौके आए, लेकिन इंग्लैंड के कप्तान और इस विश्व कप में अभी तक सबसे ज्यादा छह गोल करने वाले हैरी केन, जेसे लिंगार्ड और रहीम स्टर्लिग अहम मैच में आसान से मौकों को भी नहीं भुना पाए. अगर यह खिलाड़ी अपने पास आए मौकों पर गोल कर देते तो इंग्लैंड तय समय में क्रोएशिया को मात दे देता.

शायद किस्मत को भी कुछ और मंजूर था. क्रोएशिया शुरुआती पलों में भी गोल खाने के बाद डिगी नहीं और उसने शानदार वापसी करते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की.

इंग्लैंड को इस अहम मैच में जिस तरह की शुरुआत चाहिए थी वो उसे मिली. पांचवें मिनट में ही कीरान ट्रिपिर ने गोल कर इंग्लैंड को बढ़त दिलाई.

इंग्लैंड को फ्री किक मिली जिसे ट्रिपिर ने गोल के बाएं कोने में डाल अपनी टीम को 1-0 से आगे कर दिया. इसके बाद इंग्लैंड के पास कई मौके आए जब वो अपनी बढ़त को दोगुना या तीनगुना कर सकती थी, लेकिन एक भी मौके पर वो सफल नहीं रही.

15वें मिनट में उसे कॉर्नर मिला. हैरी मैग्यूर इस मौके पर सही हेडर नहीं लगा पाए. केन 30वें मिनट में क्रोएशिया के गोलकीपर को छका नहीं पाए. उनके पास रिबाउंड पर भी गोल करने का मौका था और इस बार भी कप्तान विफल रहे. 36वें मिनट में लिंगार्ड ने गेंद को बाएं कोने से बाहर खेल आसान सा मौका खो दिया.

क्रोएशिया हालांकि इस बीच शांत नहीं रही. अपनी मजबूत मिडफील्ड के लिए जानी जाने वाली इस टीम ने 19 से 23वें मिनट के भीतर तीन मौके बनाए. पेरीसिक ने अच्छी तरह से अपने लिए स्पेस बनाने के बाद गेंद को गोल पोस्ट में डालना चाहा, लेकिन उनका शॉट वॉल्कर से पैर से टकरा गया.

अगले ही मिनट एंटे रेबिक ने इंग्लैंड के एश्ले यंग को तो छका दिया लेकिन वो जॉन स्टोन्स को पार नहीं कर पाए. 23वें मिनट में पेरीसिक एक बार फिर गेंद को नेट में डालने से चूक गए.

पहले हाफ में एक गोल खाने के बाद दूसरे हाफ में क्रोएशिया ने वो खेल दिखाया जिसने इंग्लैंड को मिनट दर मिनट बीतने के साथ ही पीछे धकेला. वो ज्यादा अटैक कर रही थी और गेंद को उसने अपने पास भी ज्यादा रखा. वहीं इंग्लैंड ने इस हाफ में कुछ और मौके गंवाए.

क्रोएशिया हिम्मत नहीं हार रही थी और 68वें मिनट में पेरीसिक ने बराबरी का गोल दाग कर उसमें नई जान फूंक दी. पेरीसिक ने वॉल्कर को छकाते हुए गेंद सिमे वसाल्जको को दी जिन्होंने पेरीसिक को रिटर्न पास दिया और इस बार पेरीसिक ने मौका नहीं गंवाया.

इस गोल ने क्रोएशिया की टीम में उत्साह भर दिया. तीन मिनट बाद उसने अपने स्कोर का आंकड़ा दो कर दिया होता लेकिन पहले पेरीसिक की किक गोलपोस्ट से टकरा कर वापस आ गई और फिर रेबिक रिबाउंड पर गोल नहीं मार पाए.

यहां से क्रोएशिया ने पूरी तरह से इंग्लैंड पर दवाब बना लिया, हालांकि इस दवाब में इंग्लैंड के गोलकीपर जॉर्न पिकफोर्ड बिना किसी परेशनी के अपना काम करते रहे और क्रोएशिया को कई मौकों पर दूसरा गोल करने से महरूम रखा. नतीजन मैच तय समय में बराबरी पर खत्म हुआ.

अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ में मांड्जुकिक ने बेहतरीन गोल कर क्रोएशिया को जीत पक्की की.

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बच्चियां अब बच्ची नहीं रह गई

प्रतीकात्मक चित्र

आज से बमुश्किल दस साल पहले तक जब लड़कियां दस-बारह साल की हो जाती थी तो उन्हें एक लड़की के तौर पर देखा जाता था. उनके कपड़े और हावभाव को समाज बतौर लड़की देखने लगता था. लेकिन इन कुछ सालों में सब कुछ बदल सा गया है. अब तो जन्म लेते ही लड़का और लड़की की पहचान अलग हो गई है. अब वो जन्मते ही लड़की है, तभी तो छह महीने तक की बच्चियों के साथ भी लोग हैवानियत करने से नहीं चूकते हैं. आज के वक्त में बच्चियां बच्चियां नहीं रह गई हैं, वो पैदा होते ही लड़की बन जा रही है.

21 जून 2018 के हिन्दुस्तान अखबार में चार साल की बच्ची से गैंगरेप की खबर प्रकाशित हुई थी जो मन को झकझोरने वाली थी. तो वहीं बिहार से एम्स में इलाज कराने के लिए पहुंची एक किशोर लड़की ने यह कह कर डॉक्टर को चौंका दिया कि उसका पिता पिछले कई सालों से उसके साथ रेप कर रहा था. रिश्तेदारों और पड़ोसियों द्वारा तो बच्चियों के यौन शोषण की खबरे आम है. हमें पहले बेटी बचाओ का नारा देकर उसे पूरा करना चाहिए, क्योंकि आज छोटी बच्चियां सबसे सॉफ्ट टारगेट हो गई है. वो प्रतिरोध नहीं कर सकती, आसानी से बहलाई फुसलाई जा सकती हैं. सो इन्हें अपना शिकार बनाना मानसिक रोगियों के लिए सबसे आसान हो जाता है.

रिपोर्ट और आंकड़ों की बात करें तो बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले में साउथ अफ्रीका पूरे विश्व में नंबर वन पर आता है. 2009 में आई ट्रेड यूनियन सॉलिडेटरी हेल्पिंग हैण्ड के रिपोर्ट के मुताबिक साउथ अफ्रीका में हर तीसरे मिनट एक बच्चे के साथ रेप होता है. 2009 में ही इसी देश के मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने बताया कि हर चार में से एक व्यक्ति ने किसी का रेप करने की बात स्वीकार की है. यहां के मर्द इसे क्राइम नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि लड़कियां रेप को इन्जॉय करती हैं. दैनिक टेलीग्राफ के अनुसार सन् 2000 में साउथ अफ्रीका में रेप और यौन उत्पीड़न के 67 हजार केस दर्ज हुए हैं. यहां के लोगों की मान्यता है कि किसी वर्जिन लड़की के साथ सेक्स करने से एड्स ठीक हो जाता है. उनकी यही सोच उन्हें कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने के लिए उकसाती है. ये दोनों तर्क कितने बेबुनियाद और कमअक्ल लोगो के हैं, आप समझ सकते हैं.

बच्चियों से बलात्कार के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स 2013 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले महामारी के स्तर पर पहुंच गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 2001 से 2011 के बीच 48 हजार से ज्यादा बच्चों के रेप केस दर्ज हुए, जिसमें 2001 में 2113 केस थे तो 2011 में 7112 केस दर्ज हुए. सबसे दुख की बात यह है कि बच्चों के साथ सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न उनके पिता, भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी और टीचर ही करते हैं. भारत सरकार की 2007 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे भारत में 12 हजार 500 बच्चे जो कुल बच्चों की आबादी का 53 प्रतिशत है और जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे, बराबरी में यौन उत्पीड़न के शिकार हुए.

इस सूची में जिम्बांबे तीसरे नंबर पर आता है. सन् 2011 में बच्चों के ऊपर हुए रेप की संख्या यहां 3172 थी. सन् 2009 में गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार सालों में 30 हजार लड़के तथा लड़कियों का इलाज किया गया जो यौन उत्पीड़न के शिकार थे. इन देशों के अलावा विकसित देशों की गिनती में आने वाले देश यूके और यूएस में भी बच्चों के साथ होने वाले रेप और यौन उत्पीड़न की संख्या कम नहीं है. ये देश बाल उत्पीड़न और रेप के मामले में विश्व में क्रमशः चौथे और पांचवे नंबर पर हैं. 2012-13 में 18,915 बाल यौन उत्पीड़न के केस सिर्फ इंग्लैंड में दर्ज हुए. ये नेशनल सोसायटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रूआलिटि टू चिल्ड्रेन (NSPCC) की रिपोर्ट कहती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक यूके में 20 में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार होता है और 90 फीसदी बच्चे अपने जानने वालों से उत्पीड़ित होते हैं. वहीं यूएस के स्वास्थ विभाग के 2010 के रिपोर्ट के मुताबिक 16 फीसदी किशोर जिनकी उम्र 14 से 17 साल की होती है, यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं.

आंकड़ें और रिपोर्ट तो फिर भी सारी सच्चाई बयान नहीं करते मगर ये रिपोर्ट हमें झकझोरने के लिए काफी है. जहां बच्चे अपने घरों में, पड़ोस में और स्कूल में ही सुरक्षित नहीं हैं तो फिर वो कहां सुरक्षित होंगे. जब बेटियां बाप से असुरक्षित हैं, बहनें भाई से असुरक्षित हैं, बच्चे अपने शिक्षक से असुरक्षित हैं तो फिर आखिर किस पर विश्वास किया जाए. ये कैसी दुनिया हो गई है, जहां हर तरफ असुरक्षा का माहौल है.

– लेखिका शिक्षिका हैं. स्त्री मुद्दों पर लिखती हैं. संपर्क- raipuja16@gmail.com

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मुन्ना बजरंगी की हत्या ईश्वर ने की है- भाजपा विधायक

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में बयान बहादुरों की कमी नहीं है. एक ओर पीएम मोदी जहां बेधड़क बोलते दिखते हैं तो वहीं उनके नेता भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं. ऐसे ही भाजपा के एक बयान बहादुर विधायक सुरेंद्र सिंह ने एक बार फिर अजीबो गरीब बयान दिया है. माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की हत्या पर विधायक ने कहा कि “डॉन मुन्ना बजरंगी की हत्या ईश्वर ने करवाई है, हालांकि संविधान उसकी हत्या में रुकावट बना था लेकिन आखिरकार ईश्वर उसकी हत्या करने में सफल हो गए.” ये वही विधायक है जिसने बलात्‍कार की बढ़ती घटनाओं पर कहा कि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भगवान राम भी आ जाएंगे तो इन घटनाओं (रेप) पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं है. यह सामाज का स्वाभाविक प्रदूषण है, जिससे कोई भी वंचित नहीं रहने वाला है. सुरेन्द्र सिंह यूपी के बैरिया से बीजेपी के विधायक हैं. गौरतलब है कि माफिया मुन्ना बजरंगी की हत्या कर दी गई थी. उसके शरीर पर सात गोलियां लगीं थीं. पुलिस ने गटर साफ कराकर उसमें से घटना में प्रयुक्त पिस्तौल, दो मैगजीन और 22 कारतूस बरामद कर लिये हैं. इस मामले में आरोपी हमलावर सुनील राठी को न्यायालय से रिमांड पर लेकर उससे पूछताछ की जा रही है. इस बीच विधायक के बयान का मजाक उड़ाया जा रहा है और इससे भाजपा की किरकिरी हो रही है. इसे भी पढ़े-तो क्या गुजरात पहुंचे मोहन भागवत के निशाने पर मोदी थे
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तो क्या गुजरात पहुंचे मोहन भागवत के निशाने पर मोदी थे

राजकोट। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रांत प्रचारकों की वार्षिक बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत गुजरात आए हैं. इससे पहले एयरपोर्ट पर जब पत्रकारों ने उनसे कुछ सवाल का जवाब चाहा तो मोहन भागवत ने ऐसा जवाब दिया, जिससे पत्रकार चौंक गए. इसके बाद पत्रकार भागवत के ‘उस’ बयान का मतलब निकालने में जुट गए हैं.

दरअसल एयरपोर्ट पर जब पत्रकारों ने भागवत से अपने सवालों के जवाब जानने चाहे तो संघ प्रमुख ने कहा कि “अगर मैं बोला तो मेरी नौकरी चली जाएगी, बोलने का काम किसी और को दिया गया है.” भागवत के इस बयान के बाद कयास है कि उनका निशाना नरेंद्र मोदी की ओर है.

दरअसल अखिल भारतीय प्रांत प्रचारकों की तीन दिवसीय सालाना बैठक 15 -17 जुलाई तक गुजरात के सोमनाथ में होने वाली है. इसको लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत 12 से 18 जुलाई तक सोमनाथ में रहेंगे. इस तीन दिवसीय बैठक में संघ प्रमुख, संघ के सर कार्यवाह भैया जोशी के अलावा सभी सह सर कार्यवाह, कार्यकारिणी सदस्य, क्षेत्र प्रचारक, प्रांत प्रचारक और सह प्रांत प्रचारक हिस्सा लेंगे. माना जा रहा है कि इस बैठक में आगामी लोकसभा व तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ देश के सामाजिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक विकास के मुद्दों पर मंथन होगा.

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मध्यप्रदेश में अम्बेडकर और संत रैदास का अपमान

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छतरपुर। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार जहां अपने आपको दलित हितैषी बता रही हैं वही दूसरी ओर यही सरकार दलितों पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाने में नाकाम है. मामला छतरपुर जिले के बमीठा थाना क्षेत्र में आने वाले कुटिया ग्राम पंचायत का है, जहां दलितों के साथ मारपीट की गई और बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और संत रैदास का अपमान किया गया.

छत्तरपुर के कुटिया में अहिरवार समाज के लोग बाबा साहब डॉ अम्बेडकर और संत रविदास जी के बैनर तले कन्या भोज का कार्यक्रम कर रहे थे. इस दौरान डी.जे. में संत रविदास जी की आरती बज रही थी. यह बात वहां के सामंती समाज को बर्दास्त नहीं हुई. वो वहां आकर गाली गलौच करने लगे और संविधान निर्माता बाबा साहब का बैनर और अन्य सामान कुएं में फेंक दिया. इस दौरान उन्होंने मोके पर मौजूद दलितों के साथ मारपीट की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी.

किसी तरह पीड़ितों ने मामले की जानकारी पुलिस को 100 पर दी, तब जाकर मामला दर्ज हो पाया. स्थानीय थाने में sc/st एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है. तो वहीं दलितों में बाबासाहेब और संत रविदास के अनादर को लेकर गुस्सा है. उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है. उनका कहना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी तक लड़ाई जारी रहेगी. रिपोर्ट- कालीचरण अहिरवार

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बहनजी के चुनाव लड़ने की खबर से राजनीतिक हलचल तेज

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। खबर है कि बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. चर्चा गरम है कि पार्टी बसपा प्रमुख के लिए सुरक्षित सीट तलाश करने में जुट गई है. इस खबर के आने के बाद देश की राजनीति में अचानक से हलचल तेज हो गई है. इस खबर के सामने आने के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी सकते में है तो वहीं बसपा कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह है.

बसपा प्रमुख के अम्बेडकर नगर चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने की खबर भी आ रही है. यह सीट बसपा के लिए सुरक्षित सीट मानी जाती है. मायावती ने अपना आखिरी लोकसभा चुनाव भी इसी सीट से लड़ा था. 2009 के पहले यह सीट अकबरपुर के नाम से जानी जाती थी. विधानसभा चुनाव में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बावजूद बसपा अपना यह गढ़ बचाने में कामयाब रही. इस लोकसभा क्षेत्र की तीन विधानसभा सीटों पर बसपा का कब्जा है. साल 1998, 1999 और 2004 में मायावती इस सीट से लोकसभा में जा चुकी हैं.

साल 2003 में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मायावती ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था. 2004 में अम्बेडकर नगर सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद कुछ समय बाद मायावती ने इस्तीफा देकर राज्यसभा की सदस्यता ले ली थी. तब से वह राज्यसभा की सदस्य रही हैं. पिछले साल सहारनपुर मामले के बाद उन्होंने राज्यसभा सीट से भी इस्तीफा दे दिया था.

आइडिया-वोडाफोन विलय को सरकार ने दी मंजूरी

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नई दिल्ली। दूरसंचार मंत्रालय ने सोमवार को वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्युलर के विलय को सशर्त मंजूरी दे दी. इस विलय के बाद बनने वाली नई कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी.सूत्रों ने बताया, ‘‘दूरसंचार विभाग ने सोमवार को वोडाफोन-आइडिया के विलय को मंजूरी दे दी. अंतिम अनुमति के लिए उन्हें कुछ शर्तों का पालन करना होगा.’’ विभाग ने आइडिया सेल्युलर को वोडाफोन के स्पेक्ट्रम के लिए 3,926 करोड़ रुपये का नकद भुगतान करने और 3,342 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी जमा कराने के लिए कहा है.

गौरतलब है कि विलय के बाद बनने वाली कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी जिसका मूल्य डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक (23 अरब डॉलर) होगा. नयी कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 35% होगी और इसके ग्राहकों की संख्या लगभग 43 करोड़ होगी.

इस विलय से कर्ज के बोझ में दबी दोनों दूरसंचार कंपनियों को थोड़ी राहत मिलेगी क्योंकि बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी. दोनों कंपनियों का कुल ऋण करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है.

विलय के बाद बनने वाली कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी जिसका मूल्य डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक (23 अरब डॉलर) होगा.

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अप्रैल विद्रोह

5 अप्रैल को देश भर के दलितों में भयंकर गुस्सा था. दो अप्रैल के आंदोलन के बाद उनका गुस्सा बढ़ गया था. खासतौर पर भाजपा शासित राज्यों में हालात ज्यादा बुरे थे. और चूंकि देश के अधिकांश राज्यों में सत्ता पर भाजपा का कब्जा है, सो पूरे देश के हालात बुरे थे. असल में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ 2 अप्रैल को देश भर के दलित सड़कों पर थे. जिसके बाद इस आंदोलन की कमर तोड़ने के लिए दलित युवाओं और आंदोलनकारियों की धर-पकड़ जारी थी.

‘दलित दस्तक’ के स्थानीय प्रतिनिधियों ने जो जानकारी मुहैया कराई, उसके मुताबिक इस आंदोलन के बाद देश के कई हिस्सों में दलितों पर पुलिस का कहर टूट पड़ा. हरिद्वार में 43 लोगों को गिरफ्तार किया गया. अलीगढ़ के खैर में 125 लोगों पर कार्रवाई हुई. मुजफ्फरनगर में 60 गिरफ्तारियां हुई, जिनमें कुछ की जमानत हो गयी कुछ अभी जेल में हैं बाकी अभी धर पकड़ जारी है. सहारनपुर में 900 लोगों पर अज्ञात एफआईआर हुई है. यह तब है जबकि सहारनपुर में विरोध प्रदर्शन शांति पूर्वक निकला था. मेरठ में गिरफ्तारियों का आंकड़ा 200 के पार था. बुलंदशहर में 135 की गिरफ्तारी हुई थी और उस तारीख तक किसी की बेल नहीं हुई थी. मथुरा में 600 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई तो मध्य प्रदेश के दतिया में यह आंकड़ा 250 था.

बिहार के छपरा जिले में दाउदपुर थाना क्षेत्र के हर्षपुरा गांव से रोशन कुमार ने दलित दस्तक को बताया कि 2 अप्रैल के दो दिन पहले उनके गांव में ऊंची जाति के लोगों ने संगठित होकर दलितों के ऊपर हमला किया और उन्हें यह धमकी देते रहे कि “अब तो सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को निष्प्रभावी बना दिया है. अब तुम दलित कहां जाओगे, क्या करोगे.” जयपुर से रिपोर्ट आई कि ज्योति नगर थाने में 20-25 के करीब अनुसूचित जाति एवं जनजाति के युवकों को पुलिस ने धर दबोचा और उनके साथ मारपीट की थी. उनमें से कइयों की परीक्षा भी चल रही थी. राजस्थान के ही बाड़मेर में 300 से अधिक जबकि नीम का थाना में 150 के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट दर्ज हुई.

ग्वालियर, मुरैना और भिंड में हालात इतने खराब हो गए थे कि दलितों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था. चंडीगढ़ में करीब 250 अम्बेडकरवादियों की गिरफ्तारी हुई, हालांकि उन्हें शाम को रिहा कर दिया गया. अजमेर से दो दर्जन युवाओं के गिरफ्तारी की खबर मिली. इसमें तमाम शहरों में पुलिस ने युवाओं पर 3 से 4 धाराओं में केस दर्ज किया, ताकि वे आसानी से बाहर न आ सकें. जाहिर है कि देश में इतने ही शहर नहीं हैं. तमाम शहरों की रिपोर्ट हम तक पहुंच भी नहीं पाई.

खास तौर पर उत्तर प्रदेश के हापुड़ और मेरठ में तो 2 अप्रैल के आंदोलन के बाद कई दिनों तक पुलिस लगातार दबिश देती रही. यहां ज्यादातर 18-30 साल के युवाओं को निशाना बनाया गया. पुलिस ने घर में घुस-घुस कर उन्हें गिरफ्तार किया. इस दौरान घऱ की महिलाओं से भी बदतमीजी की खबर है. पुलिस वालों का अत्याचार जब हद से आगे बढ़ गया तो मेरठ में महिलाओं ने जिला मुख्यालय पर धरना देकर अपने बच्चों की गिरफ्तारी और खुद से छेड़छाड़ का विरोध किया.

असल में ये सारी धर-पकड़ सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट में हुए संसोधन के खिलाफ 2 अप्रैल को सड़क पर उतरे दलितों के विरोध प्रदर्शन के बाद की गई थी. इस आंदोलन के बाद दलितों को न सिर्फ पुलिस के अन्याय का सामना करना पड़ा, बल्कि कई जगहों से ऐसे वीडियो वायरल हुए, जिसमें ऊंची जाति के लोग दलितों की भीड़ पर न सिर्फ पत्थर बरसाते दिखें बल्कि उन्होंने दलितों की भीड़ पर गोलियां भी चलाई. असल में यह प्रशासन और एक खास वर्ग के लोगों का गुस्सा था, जो नीले झंडे लिए उस हुजूम से खौफ खा रहा थे जो 2 अप्रैल को सड़कों पर उतर आई थी.

नीले आसमान के नीचे नीले झंडों से पटे देश भर की सड़कों पर यह नजारा किसी को भी हैरत में डालने वाला था. पूरा देश इस नीले सैलाब को अचरज से देख रहा था. सबके लिए उससे भी आश्चर्य की बात यह रही कि यह सैलाब किसी के बुलाए बिना अपनी मर्जी से उमड़ा था. लोगों का यह समुंदर तब था जब 2 अप्रैल की दोपहर तक देश के कई शहरों में यह साफ नहीं था कि प्रदर्शन करना है या नहीं. गोरखपुर से दलित दस्तक के प्रतिनिधि राजकुमार ने फोन कर बताया कि 12 बजे तक दलित संगठन इस बात को लेकर ऊहापोह की स्थिति में रहें कि शहर में विरोध का झंडा कौन उठाएगा और दो बजते-बजते स्थिति यह थी कि गोरखपुर का सबसे व्यस्त गोलघर चौराहे की सभी दुकानों के शटर गिरे हुए थे और योगी के गढ़ में जय भीम का नारा गूंज रहा था.

स्वतः स्फूर्त और बिना नेतृत्व हुए इस दलित आंदोलन पर समाजशास्त्री और जेएनयू में प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार कहते हैं “यह महज एक दिन का गुस्सा नहीं था, बल्कि यह सदियों से अपमानित समाज के संचित गुस्से का इजहार था. दलितों का अब राजनैतिक दलों की माई-बाप संस्कृति से मोहभंग हो गया है. दलित समाज अब अपने मुद्दों को उठाने के लिए किसी का मुंह ताकना नहीं चाहता.” यह इसलिए भी है क्योंकि यह समाज अब थोड़ा संबल हुआ है. शहरों में रह रहे इस समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक होने औऱ अपनी चुनावी ताकत का अहसास होने से स्थिति बदली है. सबके हाथों में मोबाईल है और पूरा समाज आपस में बिना रोक-टोक संवाद कर रहा है. अब वह अपना एजेंडा खुद तय कर रहा है.

दलित समाज का हर जागरूक व्यक्ति खुद के साथ औऱ अपने समाज के लोगों के साथ हर रोज हो रहे अत्याचार से गुस्से में है. भारत में हर 15वें मिनट में दलितों के साथ अपराध होता है. हर दिन छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना होती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट (2016) के मुताबिक पिछले दस सालों में दलितों पर होने वाले अत्याचार में 51 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. ये आंकड़े पीड़ित समाज में गुस्सा भरने के लिए काफी है. 1989 का अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम दलित समाज का बचाव करता था, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दलितों को अपनी सुरक्षा पर खतरा दिखने लगा. और खुद को असुरक्षित महसूस करने के कारण दलित समुदाय सड़कों पर आ गया. हैरान करने वाली बात यह रही कि सरकारी कर्मचारी भी अपने दफ्तरों से सामूहिक छुट्टी लेकर इस आंदोलन का हिस्सा बने. आरक्षण पर हमले और नौकरियों में डिमोशन होने से कर्मचारी वर्ग में भी बेहद गुस्सा था.

दलित समाज की यह असुरक्षा बेवजह नहीं थी. बीते सालों में कई ऐसी बातें हुई है जिसने दलितों में असुरक्षा का भाव भर दिया है. दलितों को सुरक्षा का भाव देश का संविधान देता है. चूंकि इस संविधान को बाबासाहब आम्बेडकर ने बनाया है सो दलित समाज का संविधान से लगाव भी ज्यादा है. इस संविधान में जो चीजें वंचित तबके को सुरक्षा देती है; वह राजनैतिक आरक्षण, नौकरियों में आरक्षण और अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम है. इसमें से किसी एक पर हमला दलित समाज को आक्रामक कर देता है. पिछले एक दशक में सरकारी नौकरियां लगातार कम हुई है. 2014 में मोदी के शासन में आने के बाद स्थिति और बदतर हुई है. पिछले दिनों कॉलेजों में नियुक्ति का एक मामला सामने आया. यह एससी-एसटी औऱ ओबीसी के लोगों की भर्ती का था, इसमें आरक्षण को कमजोर किया गया. नौकरियों में ठेका प्रथा, निजीकरण और विनिवेश ने भी आरक्षण के नियमों में छेड़छाड़ का मौका दे दिया है. दलित समाज का युवा इस स्थिति को समझ रहा है और अपना अधिकार छिनते देख उसमें गुस्सा है.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी-एसटी अधिनियम में बदलाव को लेकर जो फैसला सुनाया, उसमें उसने दलित उत्पीड़न के मामले में शिकायत मिलने पर अग्रिम जमानत की सुविधा दे दी और मुकदमा दायर करने से पहले जांच की बात जोड़ दी. साथ ही सरकारी कर्मचारियों के मामले में गिरफ्तारी से पहले डीएसपी रैंक के अधिकारी से मामले की जांच को जरूरी कर दिया. तर्क यह था कि ऐसा जातिवीहीन समाज बनाने के लिए किया जा रहा है. इस पूरी कवायद की जड़ में केंद्र सरकार की वह रिपोर्ट थी, जिसमें एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम कानून के दुरुपयोग की बात कही गई थी. झूठे मुकदमों के आरोप की हकीकत

ऊंची जातियों के लोगों द्वारा दलितों को लेकर झूठे मामलों की शिकायत कोई नई नहीं है, वो ऐसा काफी लंबे वक्त से करते रहे हैं. पिछले साल महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लोगों ने भी दलित उत्पीड़न कानून में नरमी को लेकर मांग की थी. उनका तर्क था कि मराठाओं के खिलाफ इस अधिनियम में कई फर्जी मामले दर्ज हैं. हालांकि तब इसके जवाब में महाराष्ट्र पुलिस ने राज्य सरकार को सौंपे अपने रिपोर्ट में कानून के दुरुपयोग का कोई सबूत होने से इंकार किया था. तो हाल ही में इसी सरकार की एक अन्य संस्था द्वारा जारी आंकड़ा बताता है कि झूठे मामले के 21 फीसदी केसों की संख्या घटकर अब 15 फीसदी हो गई है.

हालांकि यहां हमें झूठे मुकदमों की सच्चाई को समझना भी जरूरी है. इसमें कहीं न कहीं वह उच्च तबका भी शामिल है, जो इसके दुरुपयोग की शिकायत करता रहता है. कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि ऊंची जाति का एक व्यक्ति ऊंची जाति के ही अपने दूसरे विरोधी से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए अपने अधीन काम करने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों से झूठे मामले दर्ज करवा देता था. अपनी रोजी-रोटी जैसी जरूरी जरूरतों के लिए सामान्य वर्ग पर निर्भर रहने के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति का व्यक्ति दबाव में अपने बॉस के इशारे पर मामला दर्ज करवा देता था. लेकिन अब इस वर्ग में शिक्षा का प्रसार होने और सामान्य वर्ग पर निर्भरता कम होने से झूठे मामलों में कमी आई है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम में संशोधन से पहले दलितों के खिलाफ अपराध के मामले में कुल दर्ज मुकदमों में सिर्फ 9 फीसदी मामलों में ही सजा मिल पाती है.

यानि की एक तो दलितों को न्याय नहीं मिल रहा था और उस पर से कानून को कमजोर कर दिया गया. अनुसूचित जाति और जनजाति को न्याय मिलने की दर कितनी धीमी है, यह 2016 के इस आंकड़े से समझा जा सकता है-

प्रदेश कुल दर्ज मामले सजा

उत्तर प्रदेश 10,430 1582 बिहार 5,726 209 राजस्थान 6,329 680 मध्य प्रदेश 6,745 1159 आंध्र प्रदेश 2,740 33 ओडिशा 2,477 52 कर्नाटक 2,237 22 महाराष्ट्र 2,139 127 – स्रोतः राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो

अगर इस कानून के दुरुपयोग की बात मान भी लें तो क्या देश में ऐसा कोई कानून है, जिसके दुरुपयोग की बात न उठी हो या फिर जिसका दुरुपयोग न हुआ हो. कानून और ताकत के दुरुपयोग का सबसे ज्यादा मामला तो पुलिस से जुड़ा होता है. उत्तर प्रदेश में हाल में जो एनकाउंटर हुए हैं, उसमें कई एनकाउंटर के फर्जी होने की बात सामने आई है. घरवालों ने इस बात के सबूत भी दिए हैं. तो क्या पुलिस के अधिकार को कम कर दिया जाना चाहिए या फिर एनकाउंटर की व्यवस्था को खत्म कर देना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने अन्य कानूनों की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया?

एससी-एसटी एक्ट की हकीकत

प्रोफेसर विवेक कुमार कानून के दुरुपयोग से उलट एक दूसरा सवाल उठाते हैं. उनका कहना है, “ दुरुपयोग के उलट सच्चाई यह है कि इस कानून का पूरी तरह से पालन नहीं हो पाता है. यह बात इस मामले में रिहाई की ऊंची दर से साबित भी होती है. ” 1992 में राजस्थान में भंवरी देवी मामले का जिक्र करते हुए प्रो. विवेक कहते हैं कि इस मामले में तमाम सबूतों और बयानों को अनदेखा कर अदालत ने ऊंची जाति के बलात्कारियों को यह कहकर रिहा कर दिया था कि लड़के अपने पिता के सामने ऐसा कुकृत्य नहीं कर सकते हैं. तो बिहार में हुए दलितों के एक हत्याकांड में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

एससी-एसटी कानून में हालिया बदलाव से दलितों-आदिवासियों के बचाव का संवैधानिक कवच कमजोर हो गया है. आर्थिक रूप से तो देश का यह वंचित तबका पहले से ही काफी परेशान रहा है. आजादी के सात दशकों के बाद भी देश की तीन-चौथाई अनुसूचित जाति की आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. इनमें से 84 फीसदी आबादी की औसत मासिक आमदनी 5000 रुपये से भी कम है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 60 फीसदी से ज्यादा दलित आबादी किसी तरह की आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं होती है. छोटे-मोटे काम कर अपना जीवन जीने वाले दलितों में 55 फीसदी बटाईदार और खेतिहर मजदूर हैं. गांवों में रहने वाले दलितों में 45 फीसदी भूमिहीन हैं.

राजनीतिक घमासान

उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को जब दलित सड़क पर उतरे तो अचानक देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया. देश भर की सड़कों पर दलितों के सैलाब को अपने पाले में खिंचने के लिए राजनैतिक दलों में होड़ मच गई. तो इस जनसमूह के सामने आने से घबराई भाजपा और केंद्र सरकार ने आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर दी. हालांकि उसके पास इस बात का जवाब नहीं है कि उसने ऐसा करने में दो हफ्ते का समय क्यों लगाया. स्पष्ट है कि यह दलितों की बढ़ी हुई राजनीतिक शक्ति है, जिससे तमाम दल घबरा गए हैं. यह वही भाजपा है जिसके नेता पिछले चार साल से संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने की बात कर रहे हैं.

आगे क्या होगा

तो क्या दलितों के सड़क पर उतरने के बाद देश में और इस समाज में कुछ बदलेगा? इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, “ जो गुस्सा सामने आया वह एक दिन का गुस्सा नहीं था, बल्कि वो लंबे वक्त का असंतोष था. ऐसे गुस्से स्थायी नहीं होते. यह गुस्सा स्थायी तभी बन सकता है, जब इस प्रतिरोध का कोई सांगठनिक ढांचा बने और इसके बीच से कोई सांगठनिक ताकत प्रेरक शक्ति बनें. देश इस वक्त बड़ी क्राइसिस का शिकार है. बहुजन समाज के बीच से कोई बड़ा विजनरी लीडरशिप नहीं दिख रहा है.” उर्मिलेश का कहना है कि फिलहाल देश में नरेंद्र मोदी और भाजपा के पास एक विजन है. उनका विजन किसके लिए सही और किसके लिए गलत है या फिर यह कितना खतरनाक है, इस पर बहस हो सकती है. आप उससे सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता.

बकौल उर्मिलेश, “दो अप्रैल को सांगठनिक तौर पर दलित समाज जिस तरह से सामने आय़ा है उसने पूरे देश को चौंकाया जरूर है. इस बात की काफी संभावना है और यह हो भी सकता है कि लोग संगठित होकर भाजपा को हरा दें, लेकिन इससे ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा है. आज भारत को एक नए अम्बेडकर की जरूरत है.”

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राहुल गांधी ने संभाली कांग्रेस-बसपा गठबंधन पर चर्चा की कमान

नई दिल्ली। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गंठबंधन को लेकर खिंचतान मची है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के साथ आने के बाद हुई भाजपा की हार के बाद माना जा रहा था कि आगामी विधानसभा चुनावों में भी विपक्षी दलों के बीच गठबंधन आराम से हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. विपक्षी दल भाजपा को हराने पर तो एकमत हैं लेकिन सीटों के गणित ने गठबंधन की राह को मुश्किल बना दिया है.

कयास थे कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेगी. दोनों के वोट प्रतिशत को देखकर यह तय माना जा रहा था कि दोनों के साथ आने की स्थिति में भाजपा को आराम से सत्ता से बाहर किया जा सकता है. लेकिन पहले मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रभारी द्वारा कांग्रेस से विपक्ष की संभावनाओं को खारिज करने और बाद में छत्तीसढ़ के दिग्गज नेता अजीत जोगी और बसपा प्रमुख मायावती की मुलाकात ने कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है.

खबर यह आ रही है कि कांग्रेस पार्टी बसपा को सम्मानजनक सीट देने में आनाकानी कर रही है, जिसके बाद बसपा दूसरी संभावना टटोल रही है. अब बसपा को छिटकते देख कांग्रेस पार्टी एक बार फिर हरकत में आ गई है. राज्य के नेताओं से बात नहीं बनने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब खुद कमान संभाल ली है. 14 जुलाई को राहुल गांधी ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अपने प्रभारियों को दिल्ली तलब किया है, जिसमें वह स्थिति की समीक्षा करेंगे.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी इस बैठक में बसपा के साथ गठबंधन की संभावना को फिर से टटोलेंगे. खबर यह भी है कि राहुल तीनों राज्यों में बीएसपी से अलग-अलग गठबंधन की बजाय एक साथ पैकेज डील के मूड में हैं. वह बसपा को एक ही साथ ऐसा फार्मूला देना चाहते हैं, जिस पर बसपा राजी हो जाए. राहुल गांधी के आदेश पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बीएसपी नेतृत्व के संपर्क में हैं.

दरअसल बसपा सुप्रीमो मायावती की अजीत जोगी से मुलाकात के बाद कांग्रेस की बेचैनी तब साफ दिखी थी जब मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने सफ़ाई दी कि मायावती से बातचीत टूटी नहीं है और सीटों के बंटवारे को लेकर अभी भी बातचीत जारी है. उम्मीद है कि आने वाले हफ्ते में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की उम्मीद पर अंतिम मुहर लग जाएगी.

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इंग्लैंड में ODI सीरीज दौरान भारत की निगाहें वनडे में नंबर वन रैंकिंग पर

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नई दिल्ली. इंग्लैंड की सरजमीं पर 12 जुलाई से भारत और इंग्लैंड के बीच होने तीन एकदिवसीय मैचों की सीरीज में अगर भारत इंग्लैंड को 3-0 से हरा देता है, तो वह आईसीसी की वनडे रैकिंग में शीर्ष पर पहुंच जाएगा. इंग्लैंड और भारत अभी वनडे रैंकिंग में क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर हैं. इन दोनों के बीच पहला वनडे गुरुवार को नाटिंघम में होगा. इस मैच से एक महीने तक चलने वाले एकदिवसीय मैचों की शुरुआत भी होगी. इस दौरान कुल दस टीमें इस फॉर्मेट में खेलेंगी. इंग्लैंड को टी 20 अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला में 2-1 से हराने वाले भारत ने दो मई को सालाना अपडेट के बाद अपनी शीर्ष रैंकिंग गंवा दी थी लेकिन उसके पास फिर से इसे हासिल करने का मौका है.

शीर्ष रैंकिंग के लिए भिड़ेंगे भारत-इंग्लैंड

आईसीसी के अनुसार इसके लिये उसे इंग्लैंड को 3-0 से हराना होगा. दूसरी तरफ इंग्लैंड अगर इसी अंतर से जीत दर्ज करता है, तो वह शीर्ष पर अपनी स्थिति मजबूत कर देगा और उसकी बढ़त दस अंक की हो जाएगी.  भारत और इंग्लैंड के बीच श्रृंखला 17 जुलाई को समाप्त होगी. इस बीच जिम्बाब्वे पांच मैचों के लिये पाकिस्तान की मेजबानी करेगा. ये मैच 13 से 22 जुलाई के बीच खेले जाएंगे. वेस्टइंडीज 22 से 28 जुलाई के बीच बांग्लादेश के खिलाफ तीन वनडे खेलेगा. श्रीलंका 29 जुलाई से 12 अगस्त के बीच पांच मैचों के लिये दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी करेगा जबकि नीदरलैंड अपनी सरजमीं पर नेपाल के खिलाफ दो वनडे खेलेगा. नेपाल एक अगस्त को नीदरलैंड के खिलाफ वनडे में अपना पहला खेलेगा.

खिलाड़ियों के पास भी रैंकिंग सुधारने का मौका

इस बीच खिलाड़ियों के पास भी अपनी रैंकिंग में सुधार का मौका रहेगा. भारतीय कप्तान विराट कोहली अभी 909 अंक के साथ बल्लेबाजी रैंकिंग में शीर्ष पर हैं. वह दूसरे नंबर पर काबिज पाकिस्तान के बाबर आजम से 96 अंक आगे हैं. भारत के चौथी रैंकिंग के रोहित शर्मा टी 20 की अपनी फार्म को वनडे में भी बरकरार रखना चाहेंगे. इंग्लैंड के छठी रैंकिंग के जो रूट के पास रास टेलर को पीछे छोड़ने का मौका रहेगा. गेंदबाजी रैंकिंग में शीर्ष पर काबिज जसप्रीत बुमराह उंगली की चोट के कारण श्रृंखला में नहीं खेल पाएंगे जिससे अन्य को अंतर कम करने का मौका मिलेगा. तीसरे नंबर पर काबिज हसन अली फिर से शीर्ष पर पहुंचने की कोशिश करेंगे.

वनडे क्रकेट टीम की वर्तमान रैंकिंग

क्रम    देश                           रेंटिंग अंक
1     इंग्लैंड                             126 2      भारत                            122 3      दक्षिण अफ्रीका                 113 4      न्यूज़ीलैंड                        112 5      पाकिस्तान                      102 6      ऑस्ट्रेलिया                      100 7      बांग्लादेश                         93 8      श्रीलंका                            77 9      वेस्टइंडीज                         69 10    अफ़ग़ानिस्तान                   63 11    जिम्बाब्वे                         55 12     आयरलैंड                         38 13     स्कॉटलैंड                         28 14     संयुक्त अरब अमीरात           18 इसे भी पढ़े-गेंदबाजों के लिए डरावना होता जा रहा है वन डे क्रिकेट भी
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