हुंकार

बह रहा शोणित है तेरा फिर भी तू क्यों मौन है पूछ अपने आप से मानव है तू या कौन है जाति की जठराग्नि में हिन्दुत्व के अभिमान में हवन होते हैं  दलित जीते हैं वो अपमान में संविधान का नहीं उनको कोई अब डर रहा मनुवाद के दावानल में रोहित सरोज है मर रहा और तू बैठा हुआ चुप करता सिर्फ संताप है जुल्म को सहना भी होता बहुत ही पाप है उठ वरण कर वीरता का धनु कि तू टंकार दे घर से तू बाहर निकल और साथ में हुंकार दे। मुकेश गौरव Read it also-विकास
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विकास 

शब्द
किस तरह होते हैं
अर्थ परिवर्तन का
शिकार?
अतीत से वर्तमान तक
इसके अनेक उदाहरण हैं
जैसे दस्यु और दास
जो आदिकाल में
दो जातियां थी
कालान्तर में उसका अर्थ
लुटेरे और गुलाम
हो गया।
इसी प्रकार
पिछले कुछ वर्षों में
विकास का भी अर्थ
बदला है।
विकास अब पर्याय
हो गया है
मुस्लिम और दलितों में
भय और उत्पीड़न का।
क्योंकि
पिछले कुछ वर्षों में
विकास हुआ है
संघ की शाखाओं का
साधुओं का
जो व्यापारी से राजा तक
हो गए हैं।
हिन्दू और मुस्लिम वैमनस्य का,
असहमत बुद्धिजीवियों की
हत्याओं का!
भूख, बेरोजगारी और मंहगाई का
उधोग तथा व्यापार के विनाश का
जुमलेबाजी का
झूठ और फरेब का।
इसलिए
इन दिनों
भारत में विकास
सचमुच
पागल हो गया है
उसने
आधार के नाम पर
छीन लिया है
निवाला
गरीबों के मुख से
किसानों को
कर दिया गया है
मजबूर
ख़ुदकुशी के लिए!
अभी से यह कहना तो
कठिन है कि यह विकास
आखिर जाएगा कहाँ तक
लेकिन इतना तय है कि
जिसका वर्तमान ठीक नहीं
उसका भविष्य भी
ठीक नहीं होता!
इसलिए भविष्य के लिए
नहीं दी जा सकती
बलि वर्तमान की।
डॉ. एन. सिंह
सहारनपुर, यूपी
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विरोधाभास

हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम नयी टेक्नोलॉजी के टीवी को
घर में लाने में
परहेज कभी नहीं करते
लेकिन नयी सोच को
घर में आने से
हमेशा रोकते रहते हैं
विज्ञान के हर नये अविष्कार को
अपनाने की
हमें बड़ी तत्परता रहती है
लेकिन अवैज्ञानिक रिवाजों
हम फिर भी ढोए चले जाते हैं
हम कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ईमेल, मोबाईल,
फेसबुक, व्हाटस्ऐप, ट्विटर का
इस्तेमाल करने लगे हैं
लेकिन बात करने वाले के
नाम से ज्यादा उसके उपनाम में
हमारी रुचि हमेशा बनी रहती है
हमें इंसान की,
उसकी इंसानियत की,
उसकी काबिलियत की,
उसकी लायकीयत की
कोई कद्र नहीं है
हम पत्थरों में भगवान देख लेते हैं
लेकिन इंसान में इंसान भी
देख नहीं पाते
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम किसी भी नस्ल के कुत्ते को
अपने सोफे पर,
अपनी कार में बैठाने में
अपनी शोभा समझते हैं
लेकिन इंसान से
उसकी जात पूछे बिना,
उसका मजहब जाने बिना
उसे अपनी परिचय परिधि में
शामिल नहीं करते!
उसे अपने घर में
घुसने नहीं देते…
हम महापुरुषों की जयंतियां
बड़ी धूम से मनाते हैं
लेकिन उनकी बातों को मानने से
हमेशा कतराते भी रहते हैं
हमें हीर-रांझा की,
शीरी-फरहत की,
लैला-मजनूँ की,
सस्सी-पुन्नू की,
रोमियो-जूलियट की
सिर्फ कहानियाँ अच्छी लगती हैं
गर हमारे बीच
कोई हीर,
कोई रांझा हो जाए
तो वह हमें
चरित्रहीन नज़र आने लगता है
हम हाथों में बन्दूकें लेकर
प्रेम के गीत गाते हैं
हम बम के परीक्षण स्थलों पर
शान्ति के चबूतर उड़ाते हैं
हम शान्ति वार्ताएं करते हैं
और हथियारों पर
बजट भी बढ़ाए चले जाते हैं
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम पचास साल पुराने
संविधान की
समीक्षा की समितियां गठित करते हैं
लेकिन पांच हजार साल पुरानी
किताबों की समीक्षा की गुंजाइश
हमें नज़र नहीं आती
हम पत्थरों को
दूध पिला देते हैं
और बच्चों को कुपोषण से मरने देते हैं
उन्हें पोलियो ड्राप पिलाने से भी
कतराते हैं
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
राजेश चन्द्रा
संकलन- एस सी भाऊरजार
सिवनी (मध्य प्रदेश)
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बसपा नेता जयप्रकाश सिंह पर कार्रवाई के पीछे का सच

नई दिल्ली। दो महीने पहले बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने जब राजस्थान में सक्रिय पार्टी के एक युवा कार्यकर्ता को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल कोआर्डिनेटर जैसा अहम पद दिया था तो उस फैसले ने सबको चौंकाया था. पद देने के करीब दो महीने बाद जब बसपा प्रमुख ने एक झटके में ही जयप्रकाश से दोनों पद वापस ले लिया तो भी बसपा नेता के साथ-साथ अन्य लोग भी चौंके थे. किसी को भी यह यकीन नहीं था कि बहनजी इतनी तेजी से अपने ही बनाए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पर कार्रवाई कर देंगी. लेकिन अब आनन-फानन में की गई इस कार्रवाई का सच सामने आ गया है. असल में बसपा प्रमुख मायावती ने ऐसा कर के जहां कांग्रेस पार्टी के साथ अपनी दोस्ती को और मजबूती दे दी है तो वहीं उन्होंने एक झटके में भाजपा से कांग्रेस और राहुल गांधी को घेरने का एक बड़ा मुद्दा छीन लिया. इससे पहले की भाजपा, बसपा नेता के बयान के आधार पर कांग्रेस और बसपा पर सवाल खड़े करती, मायावती ने बाजी पलट दी. इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि 2014 और 2017 के चुनाव में झटका खा चुकीं मायावती अब सियासत की राह पर संभल कर कदम बढ़ा रही हैं.

असल में मायावती नहीं चाहती थी कि जयप्रकाश सिंह का बयान बसपा को घेरने का हथियार बनें. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के साथ बहनजी के रिश्ते सभी देख चुके हैं, मायावती उसमें भी कोई दरार नहीं चाहती थी. जो सबसे बड़ी बात है कि 2019 में अगर तमाम प्रमुख पार्टियों के सत्ता का गणित गड़बड़ाता है और मायावती के नाम पर तमाम दल एकमत होते हैं तो उस समय कांग्रेस का समर्थन बहुत जरूरी होगा. मायावती उस स्थिति तक पहुंचने के रास्ते में कोई रुकावट नहीं चाहती हैं. जहां तक जयप्रकाश सिंह का सवाल है तो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद उनके रंग-ढंग अचानक से बदल गए थे. उनके तमाम बयानों की चर्चा पार्टी के अंदर पहले से थी और पार्टी नेताओं को पहले से ही आशंका थी कि उन पर कभी भी गाज गिर सकती है. ऐसे में जब उन्होंने सीधे राहुल गांधी पर निशाना साध दिया तो सियासत में अपनी छवि को लेकर काफी सजग मायावती ने बिना देरी किए उन पर कार्रवाई कर डाला.

Read it also-बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह पर गिरी गाज
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किसान मार्च

पूरी पृथ्वी को बांधते हैं किसान के पांव हरियाली से पहाड़िया चढ़ते हैं उतरते हैं घाटियां एक एक कोना भर देते हैं मिट्टी का अन्न से बीजों को जगाते हैं नींद से सबका पेट भरने के लिए मगर सोए रह जाते हैं बीज उनकी आंखों के कि उनके सपनों को पोसने वाला कोई नहीं कोई नहीं जो चलाए हल बंजर होती आंखों में फसल उगाने के लिए कि सूखे चटकते खेतों में भटक रहे हैं किसान पानी की जगह सरकारी आंकड़े पी रहे हैं किसान अपना सब बेच बीज-खाद खरीद रहे हैं किसान फसलों को अपने आंसुओं से सींच रहे हैं किसान आंकड़ों की काली स्याही में तड़प रहे हैं किसान इज्जत की खातिर कुएं में कूद रहे हैं किसान नीम की बाजुओं से लिपट दम तोड़ रहे हैं किसान अपने ही खेतों में दफ्न हो रहे हैं किसान अपनी हड्डियों को खाद में बदल रहे हैं किसान मगर अब संभल रहे हैं किसान झूठे वादों की पोल खोल रहे हैं किसान अब एकजुट हो रहे हैं किसान आत्महत्याओं के बोझ को अपने सरों से उतार अधिकारों के लिए बढ़ रहे हैं किसान कि उनके कदमों को रोकना तुम्हारे बस का नहीं खेत की मिट्टी में उगे हैं उनके पांव कि सूरज ने अपने अलाव में पकाया है उन्हें वे आ रहे हैं तुम्हारे शहर की तरफ तारकोल से चिपकी सड़क पर चलते हुए अपने बुझते चूल्हों का दर्द लिए तुम्हारे कानों आंखों नाकों में भरे तारकोल को निकालने के लिए संजीव कौशल Read it also-https://www.dalitdastak.com/hate-politics/
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नफ़रत की राजनीति

ये तोड़-फोड़ की राजनीति ये नफरत की राजनीति तुम पर शोभा नहीं देती तुमने तो ठप्पा लगाया है- राष्ट्रवाद का फिर ये घिनौने, घटिया, ओछे काम क्यों? माना तुम सत्ता में आ गये हमेशा तो नहीं रहोगे कल कोई और आएगा फिर वो तोड़ेगा-फोड़ेगा तुम्हारी बनाई मूर्तियां या तुम्हारी पसंद की मूर्तियां इस तरह तो राष्ट्र का नव निर्माण न हुआ ये विनाश की शुरूआत है। माना कि तुम्हारे अंदर राष्ट्रवादी नाम का कीड़ा तुम्हें अंदर ही अंदर काट रहा है लेकिन वो कीड़ा धीरे-धीरे विषैला होता जा रहा है वो तुम्हें बहुत बड़ी हानि पहुंचायेगा और तुम्हें ही नहीं तुम्हारे चक्कर में पूरे देश को डसेगा नफ़रत की राजनीति में पूरा देश जलेगा तुम तो डूबोगे ही साथ-साथ देश को भी ले डूबोगे…| मुकेश कुमार ऋषि

गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा

जिस जाति अथवा समाज का साहित्य नहीं होता, वह जाति मृत समान ही होती है. वैसे भी हमारे देश में पहले से ही दलितों का लिखा कोई साहित्य नहीं है. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भारत के दलितों को पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार ही नहीं था. अतः हमारा कोई साहित्य भी नहीं था. समाज के उत्थान का कोई प्रेरणा-स्त्रोत होता है तो वह उसका अपना साहित्य ही होता है. दलित समाज का जो थोड़ा बहुत साहित्य था वह मौखिक साहित्य था. लिखित साहित्य के अभाव में समाज कोई प्रेरणा नहीं ले सकता. अतः समाज का अपना साहित्य होना अति आवश्यक है.
दलित समाज या कहें अछूत समाज कहे जाने वाले लोगों के समाज का साहित्य कोई गैर  दलित तो लिखने से रहा. यदि लिखेगा भी तो उसकी निष्ठा पर सवाल हमेशा बना रहेगा, क्योंकि गैर-दलित लेखकों ने हमेशा से दलित-साहित्य और इतिहास से छल-कपट ही किया है. गैर दलित लेखकों ने हमेशा से अपने गप्पी साहित्य और पराजित इतिहास के गीत ही गाए हैं. दलित समाज के साहित्यकारों, महापुरुषों व वीर और वीरांगनाओं के नामों को हम गैर दलित लेखकों व साहित्यकारों ने पुस्तकों के पन्नों से गायब ही नहीं किया बल्कि उनका चरित्र-चित्रण तक बिगाड़ कर रख दिया है. यदि उदाहरण गिनाने लग जाऊं तो कागज ही कम पड़ जाएगा.
देश की आजादी के पश्चात दलितों के मुक्तिदाता डॉ. भीमराव आम्बेडकर जी के अथक प्रयासों के बाद देश के तथाकथित निम्न जातियों को शिक्षा प्राप्ति का अवसर प्राप्त हुआ. परिणाण स्वरूप अब शिक्षित व्यक्तियों का कर्तव्य बनता है कि वे अपनी शोधपरक दृष्टि से अपने समाज के साहित्य का सृजन करें. जैसे-जैसे शोध कार्य आगे बढ़ेगा, नई-नई विषय सामग्री का समावेश होगा. अतः लेखन ही साहित्य सृजन की पहली कसौटी है.
गैर- दलित पत्र-पत्रिकाओं के साथ अब दलित समाज की पत्रिकाओं ने दलित रचनाकारों को पूरे मनोयोग के साथ प्रकाशित करना शुरू कर दिया है. अतः इन पत्रिकाओं के सम्पादकों ने अपने-अपने मंच प्रदान करके दलित-साहित्य का पूरी लगन के साथ प्रचार-प्रसार किया है. यह खुशी की बात है कि अब दलित-समाज की महत्वपूर्ण पत्रिकाएं सामने आ रही हैं और दलित लेखक उनमें खूब प्रकाशित भी हो रहे हैं. अब दलित लेखकों को गैर-दलित लेखकों का मुंह ताकने की जरूरत नहीं है. रही उनके स्तर की बात तो जब दलित पत्र-पत्रिकाओं में स्तरीय रचनाएं प्रकाशित होना शुरू हो जाएंगी तो स्तर अपने आप बन जाएगा. यह हम दलित लेखकों की कमी है कि हम में से अधिकतर लेखक यही चाहते हैं कि हमारी रचना किसी चर्चित या नामी-गिरामी पत्रिका में ही प्रकाशित हो. लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह लेखक निराश और हताश होकर कलम उठाकर एक ओर को रख देता है. यह दलित लेखन के विकास के लिए कतई भी उचित नहीं है.
इसी प्रकार गैर-दलित आलोचकों द्वारा जब कभी दलित लेखकों के लेखन की झूठी तारीफ या प्रशंसा कर दी जाती है तो ये दलित लेखक गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं और उनके अंदर हवा भर जाती है. वे भूल जाते हैं कि सच्ची और अच्छी आलोचना अपने ही करते हैं. दूसरे गैर-दलित आलोचक तो झूठी प्रशंसा करके अपनी साहित्यिक रोटियां सेकते रहते हैं. ऐसे गैर- दलित आलोचक कभी भी अपनी कलम की पैनी नौंक घुसेड़ कर गुब्बारे की हवा निकाल कर पल भर में ही फुस्स कर देते हैं. असली मान-सम्मान अपनों से ही मिलता है. अभी कुछ महीने पहले हिन्दी के एक गैर-दलित आलोचक ने केरल में जाकर एक कार्यक्रम में कहा कि वह ही हिन्दी दलित साहित्य का बड़ा और मुख्य लेखक है.
वह हिन्दी दलित लेखन का ‘मेन्टर’ है. उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए यहां तक कहा कि वह हिन्दी के दलित लेखकों की रचनाएं ठीक-ठाक करके पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाने हेतु प्रेषित करता है. हिन्दी के दलित लेखकों को तो कुछ आता ही नहीं है. वैसे कुछ हिन्दी के दलित लेखकों ने जो बेचारे छपास के भूखे हैं सचमुच में इस बामन को लेखन में अपना अधिनायक माना हुआ है. मैं इन दलित लेखकों को समझा-समझा कर थक गया हूं, लेकिन इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती. इन दलितों की कोई भी गोष्ठी उसके बिना मजाल है पूरी हो जाए. मैं समझ गया हूं कि ऐसे दलित (छपास के भूखे) लेखक अफनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और धीरे-धीरे आदरणीय डॉ.  धर्मवीर की बात को सही साबित करके रहेंगे कि एक दिन ‘दलित लेखक संघ’ ‘गैर- दलित लेखक संघ’ बनकर रह जाएगा. हिन्दी के इस गैर-दलित आचोलक ने कुछ महीने पहले मुंबई के एक साहित्यिक कार्यक्रम में भी इसी प्रकार शोर मचाया था. उस समय इस सूचना पर मैंने ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं समझा. लेकिन अब जो केरल में हुआ, वह तो बर्दाश्त से बाहर है. धुंआ तभी उठता है जब सचमुच में आग लगती है. कुछ दिनों बाद मुझे ज्ञात  हुआ है कि यह वही गैर-दलित आलोचक है जो कई वर्ष पहले डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुझे आपस में लड़वाता रहा है. मैं समय रहते उसकी चालों को समझ गया और छिटक कर उससे दूर हो गया.
इसी प्रकार 18 फरवरी, 2018 के दिन एक दलित लेखिका के पत्र-संकलन पुस्तक का लोकार्पण का कार्यक्रम दिल्ली में ही था. फोन कर कार्यक्रम में मुझे भी आने को कहा गया. मैं कार्यक्रम में गया. इस कार्यक्रम में दलित लेखकों व बुद्धिजीवियों के अलावा गैर-दलित लेखक भी आए हुए थे. कार्यक्रम में मुझसे भी दो शब्द बोलने को कहा गया. अब मैं पुस्तक पर क्या बोलता, समय रहते पुस्तक मेरे पास पहुंची ही नहीं थी. हां, मुझे भीड़ का हिस्सा बनाने के लिए बुलाया जरूर था. जबकि गैर-दलित लेखकों/आलोचकों को कई दिनों पहले पुस्तक पहुंचा दी थी.  एक कहावत है… ‘घर का जोगी जोड़गा… आन गांव का सिद्ध’. खैर… उस कार्यक्रम में अब गैर-दलित आलोचक द्वारा कही बातों पर ध्यान देने की जरूत है. पुस्तक पर तो वह कम बोले लेकिन हिन्दी के दलित-लेखन पर कही गई उसकी टिप्पणियां देखिए. उसने टिप्पणी कि की, “ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी के दलित लेखन में अब ठहराव आ गया है… आगे नहीं बढ़ पा रहा.”
उस गैर-दलित लेखक की बातें सुनकर मैं हैरान होकर रह गया था. आज दलित साहित्य कहां से कहां पहुंच गया है. अब देश तो छोड़ो, विदेशों में भी इसकी खूब चर्चा है. हिन्दी के दलित लेखन की एक युवा पीढ़ी पूरी तैयारी के साथ लेखन के मैदान में आ चुकी है. यदि नाम गिनाने लग जाऊं तो कई महत्वपूर्ण युवा दलित लेखकों के नाम छूट जाने का डर है. और यह चौबे जी महाराज कह रहे हैं कि हिन्दी के दलित लेखन में ठहराव आ गया है. गलती इनकी कतई नहीं है, हम दलित लेखकों व दलित संस्थाओं की है जो बिना सोचे-समझे हम इन गैर-दलित आलोचकों को अपने साहित्यिक आयोजनों में बुला लेते हैं और मुखिया बनाकर मंचों पर बैठा देते हैं, फिर ये गैर-दिलत आलोचक दलित-लेखन के विषय में इधर-उधर की हांक कर चलते बनते हैं. ये गैर-दलित आलोचक यह भूल गये हैं कि हिन्दी के दलित साहित्य पर कार्य कर के ही इनकी सहायक प्रोफेसरों के पद पर नियुक्तियां हुई है. और आझ वे पूरी तरह से प्रोफेसरों के पदों पर कार्यरत है. धन्य हैं ऐसे बजरंगी और चौबे जी जैसे हिन्दी दलित-साहित्य के आलोचक जो दलित साहित्य के बारे में ऐसा सोचते या बोलते हैं. हमारे दलित लेखकों व उनकी संस्थाओं के पदाधिकारियों को भी न जाने कब सुध आएगी और उनसे छिटक कर कब दूर होंगे?
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जातिगत भेदभाव करने वाले इस बड़े पत्रकारिता संस्थान के शिक्षक के खिलाफ छात्र ने खोला

नई दिल्ली। मीडिया में दलितों की भागेदारी को लेकर सर्वे आ चुका है. उस सर्वे में यह साफ उल्लेख था कि मीडिया में दलितों की भागेदारी एक प्रतिशत भी नहीं है. दलित पत्रकार हैं भी तो महज कुछ चुनिंदा संस्थानों में नीचे के पदों पर. इसकी वजह मीडिया में भयंकर रूप से फैला जातिवाद है, जो दलित समाज के युवाओं को मीडिया में आने से रोकता है. इसका एक ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश में देखने को मिला है, जहां पत्रकारिता के छात्र की जाति जानकर देश के बड़े पत्रकारिता संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने न सिर्फ उसका मजाक उड़ाया बल्कि जातिगत टिप्पणी भी की. इसके बाद अंकित पचौरी नाम के छात्र ने विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता के खिलाफ स्थानीय थाने और मानव संसाधन विकास मंत्री से शिकायत दर्ज कराई है. अंकित अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, कोलार में एम.ए पत्रकारिता के छात्र हैं. भोपाल के अनुसूचित जाति कल्याण थाने में दर्ज कराई गई अपनी लिखित शिकायत में छात्र ने बताया है कि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता उसके विभाग में मौखिक परीक्षा आयोजित कराने आए थे. इस दौरान जब अंकित अपने क्लास में पहुंचे तो डॉ. संजीव को देखकर उन्होंने अपने शिक्षक के बारे में पूछा. इस दौरान बातचीत में शिक्षक अंकित से उसकी जाति और पुश्तैनी पेशे के बारे में पूछने लगे. और यह जानते ही कि अंकित दलित समुदाय के खटीक जाति से संबंध रखते हैं, उनका मजाक उड़ाने लगे. अंकित ने इस पर आपत्ति दर्ज कराया और मामले की लिखित शिकायत स्थानीय पुलिस और संबंधित मंत्रालय को लिखी. अंकित का आरोप है कि सारा वाकया अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के एक अतिथि शिक्षक के सामने घटी थी, लेकिन मामला पुलिस में पहुंचने पर शिक्षक अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर अंकित को विश्वविद्लाय से बर्खास्त करने की धमकी दे रहे हैं. इस पूरे मामले पर भोपाल के समाचार पत्रों ने गंभीर संज्ञान लिया है. इस घटना ने पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की सोच पर भी गंभीर सवाल उठा दिया है. अब देखना है कि मंत्रालय और स्थानीय पुलिस प्रशासन अंकित को कब तक न्याय दिला पाते हैं.

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कानूनी अधिकार की वेदी पर SC–ST एक्ट की बलि

सुभाष के. महाजन बनाम महाराष्ट्रस राज्य  वाले एक मुकदमे में 20 मार्च को सर्वोच्चष अदालत ने एक फैसले में अदालत ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्या चार निवारण) अधिनियम (एससी–एसटी एक्ट ) के तहत एफआईआर लिखने से पहले शिकायतकर्ता के आरोपों की पुलिस उप अधीक्षक स्त–र के अधिकारी द्वारा गहनता से जाँच कराने के निर्देश के साथ-साथ आरोपी की गैर जमानती गिरफ्तारी पर भी रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया है. अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि इस अधिनियम के तहत दायर प्रथम सूचना रपट (एफआईआर) के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पूर्व संबंधित उच्चा अधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है. अदालत ने अपने इस निर्णय के पक्ष में अत्याचचार निवारण अधिनियम के तहत तथाकथित झूठे मुकदमों के अंबार का हवाला देते हुए आरोपियों के बचाव के लिए इन प्रावधानों को जरूरी करार दिया है. लेकिन असल में अदालत द्वारा इस अधिनियम में डाले गये ये प्रावधान इस अधिनियम की मूल आत्माा की हत्याय सरीखे हैं.
आरोपी की गैर जमानती गिरफ्तारी का प्रावधान इस अधिनियम में किया ही इसलिए गया था कि ताकतवर सवर्ण आरोपी अपने खिलाफ दर्ज़ मुकदमे को गैर कानूनी ढंग से प्रभावित न कर पाये. स्पदष्टम है कि इस निर्णय ने अदालत की विश्वनसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये हैं क्योंजकि इस निर्णय ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को कमजोर करने का काम किया है. और यही कारण है कि इस निर्णय के खिलाफ और सरकार की दलित विरोधी नीति के खिलाफ देश व्याापी बंद का आयोजन विभिन्नर दलित संगठनों द्वारा किया गया जिसे लगभग सभी विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ-साथ सत्ताव पक्ष के दलित नेताओं का व्याीपक समर्थन प्राप्त हुआ. अपने निर्णय में अदालत का कहना था कि गैर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आपराधिक मुकदमों में गलत ढंग से फंसाने के लिए इस अधिनियम का दुरुपयोग किया जा रहा है और यह दुरुपयोग बहुत ही ज्यािदा है. अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर अपने इस निष्कोर्ष से ही अदालत को इस अधिनियम के बेजा इस्तेोमाल के शिकार तथाकथित निर्दोषों को बचाने के लिए दिशा निर्देश जारी करने का बल मिला.
अदालत के इन दिशा निर्देशों के पीछे का तर्क साफ है कि अनुसूचित जाति-जनजाति के साथ अपवाद स्वइरूप ही भेदभाव होता है जबकि इस भेदभाव से उन्हें  बचाने के लिए बनाये गये अधिनियम का दुरुपयोग होना सामान्‍य बात है. इतना ही नहीं अदालत ने अपनी यह चिंता व्ययक्तन करना भी जरूरी समझा कि इस अधिनियम का क्रियान्वीयन जातिभेद को बढ़ावा देने के रूप में नहीं होना चाहिए. अदालत के ये तर्क अंबेडकर के भेदभाव विरोधी तर्कों को सिर के बल खड़े करने सरीखे हैं. आरक्षण जैसे सकारात्माक विभेदन के खिलाफ भी मनुवादी मानसिकता के लोग इसी प्रकार के कुतर्क देते हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति के मलाईदार तबके द्वारा आरक्षण का अनुचित फायदा उठाया जा रहा है.
सर्वोच्च. अदालत ने यह निर्णय महाराष्ट्र  के जिस तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष के महाजन की एक अपील के संदर्भ में दिया था, उसके खिलाफ एक दलित कर्मचारी ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज़ कराया था. सुभाष के महाजन प्राथमिक तौर पर दलित कर्मचार के खिलाफ अत्यादचार के दोषी पाये गये थे किंतु इन्हों ने अदालत में अपील की थी कि उनके खिलाफ इस अधिनियम के तहत अभियोग न चलाया जाये. अदालत महाजन की याचिका स्वीककार करते हुए उनके खिलाफ मामला रद्द कर सकती थी किंतु अदालत ने तो अभूतपूर्व सक्रियता दिखाते हुए इस निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज़ कराने के साथ कुछ शर्तें जोड़कर इस अधिनियम को नख-दंत विहीन करने की चेष्टा  की है. आरोपी महाजन ने अपने खिलाफ लगाये गये अभियोग को रद्द करने की प्रार्थना की थी, न कि अत्यामचार निवारण अधिनियम में फेर-बदल करने की मांग की थी जबकि अदालत ने इस विशेष मामले के आधार पर अधिनियम के दुरुपयोग का सामान्यीथकरण करते हुए एक त्रुटिपूर्ण फैसला दे डाला. दमनकारी सामाजिक पूर्वाग्रहों के खिलाफ असहाय दलितों और आदिवासियों को एक हद तक सुरक्षा का आश्वा सन देने वाले इस अधिनियम को निष्प्र भावी बनाने वाले इस अदालती निर्णय ने हाशिये पर पड़े हुए दलितों-आदिवासियों में व्याइपक असंतोष भर दिया है.
अदालत के इस निर्णय का एक ठोस कारण बना था सामाजिक न्यांय और सशक्तिकरण पर संसद की स्थारयी समिति की रिपोर्ट. इस रपट में सामाजिक न्यातय और सशक्तिकरण मंत्रालय द्वारा ही यह अनुशंसा दी गई थी कि इस मुकदमे के तहत झूठे मुकदमे में फंसाये जाने वाले लोगों के बचाव हेतु इस अधिनियम में कुछ अंतर्निहित प्रावधान होने चाहिए. लेकिन संसद की उस स्थाियी समिति को मंत्रालय से पूछना चाहिए था कि जो अधिनियम अनुसूचित जाति और जनजाति के मानवीय अधिकारों के संरक्षण हेतु विशेष रूप से बनाया गया था, उसमें ऐसे प्रावधान कैसे किये जा सकते हैं जिनके कारण सवर्णों के हाथों भेदभाव और उत्पी ड़न का शिकार होने वाला अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय इस अधिनियम का इस्तेवमाल करने से डरने लगेॽ
अधिनियम के बेजा इस्ते माल पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय दंड संहिता के तहत समुचित प्रावधान हैं. अत: सामाजिक न्यांय और सशक्तिकरण मंत्रालय और अदालत ने उन प्रावधानों का संज्ञान क्यों  नहीं लिया? यहाँ अदालत को यह भी ध्याधन रखना चाहिए था कि स्वनयं संसद की स्थाययी समिति ने सामाजिक न्यानय और सशक्तिकरण मंत्रालय के उन तर्कों से किंचित असहमति दिखाई थी जिनके तहत निवारण अधिनियम के अंतर्गत झूठे मुकदमों में भोले-भाले सामान्यअ वर्ग के लोगों को फंसाये जाने के आरोप लगाये गये थे. वैसे संसद की स्थानयी समिति ने अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के कथित दुरुपयोग पर जिस सामाजिक न्या‍य और सशक्तिकरण मंत्रालय से राय पूछी, उसके पास इस अधिनियम के तहत आपराधिक न्याजय प्रक्रिया के संचालन का क्षेत्राधिकार ही नहीं है.
समिति को गृह मंत्रालय से सवाल जवाब करना चाहिए था क्यों कि इस अधिनियम के क्रियान्व्यन पर टीका-टिप्पकणी करने का अधिकार उसी के पास है. गृह मंत्रालय ही यह ठीक-ठीक बता सकता था कि क्या  इस अधिनियम का दुरुपयोग इस सीमा तक हो रहा है कि आरोपी के बचाव के लिए इस अधिनियम में कोई विशेष प्रावधान अपेक्षित है. वास्त व में अब भी गृह मंत्रालय से यह पूछा जाना चाहिए कि क्यात उसकी नज़र में इस संदर्भ में भारतीय दंड संहिता के वर्तमान प्रावधान प्रभावी नहीं रह गये हैं? ध्या्तव्यद है कि इस मसले पर अतिरिक्त् महान्या्यविद् ने भी अदालत के समक्ष अपना मत रखते हुए इस प्रकार के प्रावधानों को नकारा था.
न्याहय के इस सामान्य  सिद्धांत से हम इंकार नहीं कर सकते कि दोषी व्याक्ति को भी अपना पक्ष रखने और अपने बचाव का समुचित कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, किंतु भारतीय दंड संहिता में इस विषयक अपेक्षित प्रावधान पहले से ही उपलब्धख कराये गये हैं. यह भी संभव है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपने गर्हित स्वािर्थों के लिए निर्दोष लोगों के खिलाफ अधिनियम का दुरुपयोग किया हो किंतु इस प्रकार के किसी दुरुपयोग को लेकर अदालत के पास कोई व्यकवस्थित ठोस प्रमाण थे ही नहीं. यह भी ध्याोतव्य  है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग कुछ मुट्ठीभर ताकतवर लोग ही करते पाये गये हैं. संसाधन विहीन दबे-कुचले दलित-आदिवासी भला कैसे इस निवारण अधिनियम का गलत इस्तेामाल कर सकते हैं?
अपने साथ अमानवीय भेदभाव होने पर भी बहुसंख्याक दलित-आदिवासी  और स्त्रियाँ अपराध की सूचना तक पुलिस में दर्ज़ नहीं कराती क्योंतकि अधिकार संपन्नअ अपराधी सवर्णों का भय हाशिये के लोगों में इस कदर व्याीप्तक है कि ये लोग उनके खिलाफ थाना-कचहरी के बारे में सोच तक नहीं पाते. पुलिसवालों का मनुवादी रवैया उन्हेंो अलग हतोत्साोहित करता है. अगर किसी तरह कोई दलित अस्पृाश्यनता और उत्पीहड़न की रपट लिखवाने में सफल भी हो जाता है तो आगे चलकर ब्राह्मणवादी पुलिसिया जांच में उसकी शिकायत रफा-दफा कर दी जाती है. साधन विहीन दलित-आदिवासी के लिए आरोपी सवर्ण के खिलाफ अदालत में सफलतापूर्व अभियोजन चलाना आसमान से तारे तोड़ लाने सरीखा असंभव कार्य होता है. अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याणचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी ठहराये गये लोगों का पुलिस जाँच और अदालती मुकदमे से बेदाग बरी हो जाना एक आम बात है.
इस अधिनियम के अंतर्गत दायर मुकदमों में तथ्य  तो यह है कि ज्या‍दातर मामलों में अदालतों द्वारा मुकदमे को इस अधिनियम के प्रतिकूल घोषित करते हुए कह दिया जाता है कि आरोपी ने पीड़ित की जाति के कारण उसके साथ अस्पृकश्याता बरती ही नहीं है. खैरलांजी और झज्झिर जैसे कुख्यादत दलित उत्पीसड़न के मामलों में अदालत ने दलितों के खिलाफ मनुवादी सवर्णों की हिंसा को जातीय चश्में से देखने से इंकार कर दिया था.
अदालत ने अपने निर्णय के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के जिस गलत इस्तेअमाल का हवाला दिया है, उस संदर्भ में अदालत भूल गई कि मुकदमे के सही या झूठे होने का निर्णय अदालत को करना होता है, न कि पुलिस को इस प्रकार का न्याणयिक अधिकार मिला हुआ है. और फिर कौन सा ऐसा कानून है जिसका अनुचित प्रयोग न होता हो? क्या  दहेज के कारण होने वाली मौतों के कारण हम विवाह पर प्रतिबंध लगा देंगेॽ अंग्रेजों के जमाने के राजद्रोह कानून का तो जमकर दुरुपयोग स्वधयं सत्तात पक्ष द्वारा किया गया है और मानवाधिकार पर काम करने वाली संस्थाओं और लोगों ने अपने विस्तृात अध्यायनों में इस बाबत ठोस साक्ष्यत भी प्रस्तुपत किये हैं तो फिर सर्वोच्चय अदालत और सरकार ने अब तक इस कानून को रद्द क्योंष नहीं किया? अदालत को उन कारणों पर भी ध्यानन देना चाहिए था जिनके कारण यह  अधिनियम लाया गया था. अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के खिलाफ सामान्य  वर्ग के लोगों द्वारा बरते जाने वाले भयावह भेदभाव और दलितों तथा आदिवासियों के प्रति पुलिस-प्रशासन और न्याेयिक तंत्र में व्याऔप्त  जातीय-नस्लीसय पूर्वाग्रहों के कारण ही इस प्रकार के निवारक अधिनियम की जरूरत महसूस की गई थी. क्याक उच्चे न्यानयालयों और स्व्यं सर्वोच्च- न्या्यालय में न्यासय की कुर्सी पर बैठने वाले न्याचयधीशों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का समुचित प्रतिनिधित्वठ हम आज भी सुनिश्ति कर सके हैं?
क्या  यह सबसे ऊँची अदालत का पूर्वाग्रह नहीं था कि उसने इस मामले में अस्पृ्श्याता विषयक अपराधों को नितांत सामान्य  घटनाएं मानकर अनुसूचित जाति-जनजाति के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए रखे गये विशिष्टय कानूनी संरक्षण को ठेंगा दिखाते हुए दोषियों के वैयक्तिक अधिकारों को कहीं ज्यानदा तवज्जोण दी? अदालत अत्यािचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज़ इस मामले  में एक नितांत आधारभूत चीज भूल गयी कि यहाँ विवाद दो व्यचक्तियों के बीच में नहीं है, अपितु एक पूरा मनुवादी तंत्र है जो सदियों से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर अपने जातीय श्रेष्ठ्ता के सांस्कृुतिक अहंकार से संचालित हो अत्याचार करता आया है. अपने इस दृष्टि दोष के कारण ही अदालत अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के हितों की रक्षा के लिए बनाये गये विशेष संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों का सम्माकन करने में चूक गई.
अदालत अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्या्चार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग विषयक अपने पूर्वाग्रहों से इतनी अंधी हो चुकी थी कि वह यह भी नहीं देख पाई कि उसके इस निर्णय से संविधान प्रदत्तच मूलभूत अधिकारों के उल्लंदघन का संकट पैदा होने वाला है. अपने निर्णय में उसने जिस प्रकार अस्पृदश्यकता को मिटाने वाले और अनुसूचित जाति-जनजाति के कल्याकण के लिए बनाये गये तमाम विशेष संवैधानिक प्रावधानों के मूल में स्थित अनुच्छेयद 17 प्रदत्तव समानता के जिस मौलिक अधिकार तक की अनदेखी की है, उसे फिर से संज्ञान में लिये जाना अपेक्षित है. विडंबना है कि अदालत को अनुच्छेयद 14 और 21 के तहत जमानत प्राप्ति के आरोपी के मौलिक अधिकार तो याद रहे किंतु अनुसूचित जाति-जनजाति को नागरिकता का अधिकार दिलाने वाला अनुच्छे द 17 याद न रहा! वैसे भी कानून में संशोधन करने का, कानून दुबारा लिखने का अधिकार संसद का होता है. अदालत उन्हीं  मामलों में कानून बनाने की सलाह दे सकती है जिनमें पहले से कोई कानून न हो.
इस पूरे मामले में अनुसूचित जाति-जनजाति की दुर्दशा पर व्य वस्थाधपिका और कार्यपालिका का रवैया भी बहुत निराशाजनक है. पहले भी इस अधिनियम के क्रियान्वैयन को लेकर शासन प्रतिष्ठालन अनिच्छुकक रहे थे. इस अधिनियम के बनने के 6 साल बाद 1995 में जाकर ही इसे लागू करवाया जा सका था. इसे अमलीजामा पहनाये जाने से पहले ही इसके दुरुपयोग का हौवा जरूर खड़ा कर दिया गया था. जिस प्रकार आज बड़ी संख्याह में इस अधिनियम के तहत मनुवादी उत्पीाड़कों के खिलाफ मामले दर्ज़ हो रहे हैं, वह इस अधिनियम के दुरुपयोग का सूचक नहीं ठहराया जा सकता अपितु यह पढ़ने-लिखने से दलितों और आदिवासियों में आती जागरुकता का व्यंजजक है. यह सूचक है हाशिये से ऊपर उठने के लिए संघर्षरत दलितों-आदिवासियों पर बढ़ते ब्राह्मणवादी अत्या चारों का.
आज सालाना लगभग पचास हजार मामले अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पुलिस थानों में दर्ज़ हो रहे हैं, अर्थात दलितों-आदिवासियों के खिलाफ उत्पीतड़न और अस्पृजश्यैता की कम से कम छह घटनाएं प्रति घंटे घटित हो रही हैं. किंतु इस अधिनियम के तहत आरोपित लोगों के दोषी सिद्ध होने की दर का बहुत कम (लगभग 20 प्रतिशत) होना चिंता का विषय है. 2012 से पहले तो यह दर एक अंक में ही रहती आई थी. दोष सिद्धि की इतनी कम दर इस बात की सूचक नहीं है कि अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग भोले-भाले सवर्णों को झूठ-मूठ ही इस अधिनियम के तहत फंसाते हैं ! वास्त व में इस अधिनियम के तहत आरोपी ठहराये गये बहुसंख्यतक आरोपियों का स्वदयं को दोष मुक्तध करवाने में सफल हो जाना स्वबयं इस बात का सबूत है कि भारतीय पुलिस और न्याकय व्यरवस्थाो में मनुवाद बहुत गहरे तक बैठा हुआ है. और यही कारण है कि प्रभावशाली सवर्ण आरोपियों पर अंकुश लगाने के लिए ही अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्यापचार निवारण अधिनियम) में मामला दर्ज़ होते ही आरोपियों की गैर जमानती त्विरित गिरफ्तारी का प्रावधान रखा गया था.
20 मार्च के अदालती निर्णय के बाद दलित-आदिवासी नेताओं, नागरिक संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा बारंबार सर्वोच्च- अदालत में समीक्षा याचिका दाखिल किये जाने की मांग के बाद भी केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. सरकार दलितों-आदिवासियों के धैर्य की परीक्षा लेती रही कि उनकी प्रतिक्रिया क्याे रहती है. यह 2 अप्रैल के व्यािपक भारत बंद से उपजी घबराहट ही थी कि सरकार को न चाहते हुए भी अदालत में आधे-अधूरे मन से ही सही किंतु समीक्षा याचिका डालनी ही पड़ी जिस पर अभी सुनवाई हो रही है. 2 अप्रैल के बंद के खिलाफ आरक्षण समाप्त  करने की प्रतिक्रियावादी मांग को लेकर मनुवादी ताकतों द्वारा किये गये भारत बंद के आह्वान से यह भी स्पोष्टव हो जाता है कि हमारे समाज में भगवा राजनीति ने दलितों और आदिवासियों के खिलाफ कितना जहर भर दिया है. यह भी नहीं भूला जा सकता कि पहले भी महाराष्ट्रज के मराठों ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याहचार निवारण) अधिनियम को समाप्त  करने को लेकर राजनीतिक रैलियाँ निकाली थीं. स्प ष्टक है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक षड्यंत्र किया जा रहा है.
डॉ. प्रमोद मीणा
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दलित सांसदों के नाम खुली चिट्ठी

सेवा में,
आदरणीय सांसद/मंत्री महोदय
जय भीम – जय भारत – जय मूलनिवासी
उपरोक्त विषयक देशहित व जनहित से जुडे महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में मैं एक साधारण सा भारतीय नागरिक आपके समक्ष कुछ विचारणीय प्रश्न रखने का प्रयास कर रहा हूं, कृपया इन बिन्दुओं से संज्ञानित होने के लिये अपने व्यस्त समय में से कुछ वक्त प्रदान कर देंगे तो निश्चित रूप से मैं आपका जीवन भर आभारी रहूंगा.
जैसा कि आप जानते ही हैं कि देश की आजादी और संविधान लागू होने से पहले एस.सी/एस.टी वर्ग के लोग हिन्दुओं की मनुस्मिृति के आधार पर बनाई गई वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र वर्ग के भी उपवर्ग अर्थात अछूत वर्ग की निम्न कही जाने वाली उन जातियों का हिस्सा थे जिनको ना तो पढने का अधिकार था, ना ही पक्के घर बनाने का अधिकार था, ना ही सम्पत्ति एकत्र करने का अधिकार था और ना ही गांव के अन्दर रहने का अधिकार था. गांव प्रधान, पार्षद, ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद, मंत्री बनने का तो सपना भी नहीं देख सकते थे. परन्तु बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर के लम्बे संघर्ष और पूना पैक्ट के बाद निर्मित संविधान में निहित राजनैतिक आरक्षण की व्यवस्था ने आपको मौका उपलब्ध करवाया और जिसकी वजह से आज आप सांसद हैं.
चूंकि बाबासाहब ने यह समझा था कि किसी भी समाज की आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने की कुंजी राजनैतिक शक्ति है, इसीलिये उन्होंने भारत के संविधान में राजनिति के हर स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था की थी जिससे कि इस समाज के सांसद और विधान सभाओं में चुने हुए नेता न केवल एस.सी/एस.टी वर्ग के लिये संविधान में प्राविधानित अधिकारों की रक्षा करेंगे बल्कि समय और परिस्थितियों के बदलाव के साथ-साथ और अधिक अधिकारों को दिलवाना भी सुनिश्चित करेंगे. बाबासाहब का यह कहना कि जिस रथ को बड़े संघर्ष के बाद मैं यहां तक लेकर आया हूं उसे यदि आगे ना बढ़ा सको तो उसे इसी हालात में छोड़ देना परन्तु किसी भी हालात में उसे पीछे नहीं जाने देना हैं. किन्तु सोचनीय विषय है कि बाबा साहेब द्वारा दिलाये गये अधिकार क्या आप के सांसद रहते धीरे-धीरे समाप्त नहीं हो रहे हैं? क्या इन अधिकारों की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है?
श्री सुब्रह्मनयम स्वामी जी कहते हैं कि हम आरक्षण को उस हालत में कर देंगे जिसका होना या ना होना बराबर होगा. यह बेहद पीड़ादायक है कि स्वामी जी के बयान पर किसी भी एस.सी/एस.टी वर्ग के सांसद की ओर से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई. आने वाले वक्त में जब ये संविधान बदल देंगे या बिना बदले ही राजनैतिक आरक्षण को समाप्त कर देंगे तो अधिकारों को पुनः प्राप्त करना असम्भव सा हो जायेगा और यदि सम्भव भी हुआ तो ना जाने कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, ना जाने कितना धन, समय और मेहनत लगेगी, क्योंकि आज तो हमारे पास संसद भी है और विधान सभाएं भी हैं जिनमें रहकर विरोध करने या कुछ कहने से अपनी बात मनवाने में सक्षम हैं. यदि राजनैतिक आरक्षण एक बार हमारे हाथों से निकल गया तो अपनी बात रखने के लिये हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा और हम सैंकड़ों साल पिछड़ जाएंगे जिसके जिम्मेदार केवल आप और आप जैसे लोग होंगे, जिसके लिये आपको आने वाली पीढ़ियां कभी माफ नहीं करेंगी.
आप यह भी जानते हैं कि हमारे देश में दो तरह की राजनैतिक विचारधाराएं हैं. एक लोकतान्त्रिक विचारधारा और दूसरी साम्प्रदायिक विचारधारा. साम्प्रदायिक विचारधारा के अंतर्गत मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी है जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनैतिक इकाई है जिसका उद्देश्य भारत का नाम हिन्दुस्तान रखना, संविधान बदलना, आरक्षण समाप्त करना, मनुस्मृति को लागू करना, हिन्दु राष्ट्र घोषित करना और हिन्दु राष्ट्र बनाकर वर्ण व्यवस्था लागू करके अछूत समाज को फिर से अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी के अंधेरे में ढकेलकर मानसिक रूप से अपना गुलाम बनाकर रखना है. अभी हाल में ही आर एस एस ने मेरठ में राष्ट्रोदय नाम से एक कार्यक्रम रखा था. जिसके पोस्टरों में हिन्दू धर्म के जिन पांच वर्णों का जिक्र किया था वो थे- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अछूत. वाल्मिकी, डॉ. आम्बेडकर और संत रविदास को अछूत लिखा था. वर्तमान व्यवस्था/समय में इस वर्ण व्यवस्था का विरोध संसद भवन में आपको करना चाहिए था परन्तु आपकी चुप्पी के कारण इन पोस्टरों का भारी विरोध एस.सी/एस.टी वर्ग के युवाओं को करना पड़ा. परिणामतः आर एस एस को इन विवादित पोस्टरों को हटाना पड़ा, परन्तु उन्होंने अपनी सोच और अपनी विचारधारा का खुलकर प्रचार तो कर ही दिया.
आपको सम्भवतः यह भी ज्ञात ही होगा कि आजकल श्री रविशंकर प्रसाद टीवी पर और अपने कार्यक्रमों में नये संविधान की प्रतिलिपि यह कहकर दिखा और प्रचारित कर रहें हैं कि देखो इस संविधान की एक प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट में रखी हुई है, जिस पर भगवान राम, कृष्ण, शिव, ब्रहमा और विष्णु की फोटो लगी है और जिस पर श्री जवाहर लाल, महात्मा गांधी, पटेल और डॉ. आम्बेडकर के हस्ताक्षर हैं. यानि कि संविधान बदलने मात्र से एस0सी0/एस0टी0 वर्ग के सारे अधिकार छीन लिये जायेंगे जिसमें उनका राजनैतिक आरक्षण भी शामिल है.
सम्भवतः आपको यह भी पता ही होगा कि ये सब प्रक्रियाएं वे पूरी कैसे करेंगे कैसे? किसी भी नियम या कानून में बदलाव के लिये लोकसभा और राज्य सभा में बहुमत का होना जरूरी होता है. आर एस एस भाजपा को ढाल बनाकर अपने गणित के अनुसार 2019 के लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद सन् 2022 तक राज्यसभा में भी बहुमत में होंगा और फिर संविधान बदलने का इनका सपना पूरा हो जायेगा फिर ये हमारे देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करके मनुस्मृति लागू कर देंगे तथा एस.सी/एस.टी. वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गां के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक अधिकारों को बहुत हद तक सीमित कर देंगे और बड़े दुख और पीड़ा की बात यह होगी कि इस कार्य में आपकी भागीदारी भी शामिल रहेगी. यानि यह अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा तो होगा ही साथ ही साथ बाबा साहेब के पूरे संघर्ष पर पानी फेर कर एस.सी/एस.टी वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गों की लगभग 100 करोड़ आबादी को फिर से अंधेरे गर्त में डालने का काम होगा. और ऐसा भी नहीं है कि इसमें आपकी कोई हानि नहीं होगी आपकी खुद की आने वाली पीढियां भी सम्मान और स्वाभिमान का अधिकार खो देंगी और आपको कोसेंगी. ऐसे हालात में जब एस0.सी./एस.टी. वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गां पर हर प्रकार से चारों तरफ हमले और अत्याचार हो रहे हों तो आपकी चुप्पी हम सबको बहुत हैरान करती है.
यह बिन्दु भी किसी हद तक सही है कि किसी भी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता या नेता को पार्टी के दिशा निर्देशों और नीतियों पर चलना पडता है परन्तु एस.सी/एस.टी. वर्गों की स्थिति कुछ भिन्न है, क्योंकि एस.सी/एस.टी वर्ग के सांसदों को बाबासाहब आम्बेडकर ने आरक्षण के माध्यम से दलितों के अधिकारों,सम्मान और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिये दिया था. अतः इस वर्ग के सांसदों और विधायकों की पहली प्राथमिकता पार्टी के दिशा निर्देशों पर चलने की नहीं बल्कि इन वर्गों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना होनी चाहिये. इसिलिये जब भी इन वर्गां पर अत्याचार होता है या उनके अधिकारों को छीना जाता है तो पूरे देश के एस.सी./एस.टी. वर्ग के लोग आपकी ओर बड़ी उम्मीदों से देखते हैं परन्तु आपकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आने से यह समाज बेहद निराश हो जाता है.
आज पूरे देश में लोकतन्त्र और भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाकर एस.सी./एस.टी. वर्ग के लोगों की सभाओं एवं कार्यक्रमों में जानलेवा हमले किये जा रहे हैं. जातिय आतंकवाद के तहत सरेआम पिटाई की जा रही है और नौजवानों की खुलेआम हत्यायें की जा रही हैं, यहां तक कि दलित महिलाओं को खुलेआम जलाया जा रहा है. बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर व अन्य मूलनिवासी महापुरूषों की मूर्तियां तोड़कर अपमानित किया जा रहा है. प्रमोशन में आरक्षण बिल्कुल समाप्त कर दिया गया है और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके आरक्षण समाप्त किया जा रहा है. इस वर्ग का प्रत्येक क्षेत्र में बजट कम किया जा रहा है और अब तो हद ही हो गई है. एकमात्र एस.सी./एस.टी. एक्ट (कानून) जो इस वर्ग के सम्मान का सुरक्षा कवच था, सुप्रीम कोर्ट के एक जज द्वारा दिये गये आदेश के माध्यम से, वह भी छीन लिया गया है.
उपरोक्त दुःखद परिस्थितियों के लिये अगर मुख्य रूप से कोई जिम्मेदार हैं तो वो हैं लोकसभा और राज्यसभा में विराजमान एस.सी./एस.टी. वर्ग के सांसद. कृपया आप ईमानदारी और गम्भीरता से विचार करें और सोचें कि आप स्वयं क्या कर रहे हैं? यदि आपको लगता है कि आप चुप रहकर समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे हैं तो कुछ भी ना करें और यदि आपका आत्मावलोकन या अंतरआत्मा कहती है कि आप अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे हैं तो शीघ्र ही निर्णय लीजिये और कांग्रेस और आर एस एस की विचारधारा को साहस के साथ छोड़कर एस.सी./एस.टी. एवं अन्य पिछड़े वर्गों की तरक्की के रास्ते प्रशस्त करने पर विचार करें.
अतः देशहित, जनहित एवं 100 करोड़ की आबादी वाले एस.सी./एस.टी. और अन्य पिछड़े वर्गों के हित में आपसे विनम्र अनुरोध है कि बचा लीजिये बाबासाहब द्वारा निर्मित भारतीय संविधान और इन वर्गों के अधिकारों को. यदि इस महान कार्य के लिये सांसद की कुर्सी छोड़ने के लिये मजबूर भी होना पड़े तो दे दीजिये यह बलिदान. इस बलिदान के लिये सदियों सदियों तक आपको याद रखा जायेगा.
यदि इस मुहिम में एस.सी./एस.टी. वर्ग के सभी सांसदों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र देने  का निर्णय लिया जाता है तो हमें पूरा विश्वास है कि आपकी सांसद की कुर्सी भी नहीं जायेगी और एस.सी./एस.टी. एवं अन्य पिछडे वर्गां के अधिकारों की वापसी भी हो सकेगी.
अत्यन्त सम्मान सहित।
जोगेन्द्र सिंह
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नई कांग्रेस कार्य समिति से इन दिग्गजों की हुई छुट्टी, ये नए चेहरे शामिल

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नई दिल्ली। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी की नई कार्य समिति (CWC) का गठन कर दिया है. नई टीम में राहुल गांधी ने युवा चेहरों और अनुभवी नेताओं को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है. हालांकि इस टीम से सालों से पार्टी में जमें तमाम दिग्गज नेताओं की छुट्टी हो गई है. पार्टी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने एक बयान जारी कर बताया है कि सीडब्ल्यूसी में 23 सदस्य, 19 स्थायी आमंत्रित सदस्य और नौ आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए हैं.

कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य

जिन लोगों को कार्य समिति में जगह दी गई है, उनमें पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, एके एंटनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी और ओमन चांडी का नाम शामिल है.

इनके अलावा असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक, अविनाश पांडे, केसी वेणुगोपाल, दीपक बाबरिया, ताम्रध्वज साहू, रघुवीर मीणा और गैखनगम के नाम भी कांग्रेस कार्य समिति में हैं. स्थायी आमंत्रित सदस्य सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पी सी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पी एल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल हैं. विशेष आमंत्रित सदस्य

विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर कुलदीप विश्नोई, इंटक के अध्यक्ष जी संजीव रेड्डी, भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशव चंद यादव, केएच मुनियप्पा, अरूण यादव, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, एनएसयूआई के अध्यक्ष फिरोज खान, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक लालजीभाई देसाई को शामिल किया गया है. कार्य समिति में जो नए नाम शामिल किए गए हैं, उनमें ओमान चांडी, तरुण गोगोई, सिद्धारमैया, हरीश रावत, कुमारी शैलजा, तमरध्वज साहू, रघुवीर मीणा, गैखंगम CWC से बाहर हुए नेता बीके हरिप्रसाद, सीपी जोशी, दिग्विजय सिंह, हेमो पूर्वा सैकिया, जनार्दन द्विवेदी, कमल नाथ, मोहन प्रकाश, सुशील कुमार शिंदे, सुशीला तिरिया, आशा कुमारी, ए चेला कुमार, कर्ण सिंह, ऑस्कर फर्नांडीज और के एच मुनियप्पा का नाम शामिल है.

करन कुमार Read it also-धर्म और जाति के सवाल पर बोले राहुल गांधी
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धर्म और जाति के सवाल पर बोले राहुल गांधी

नई दिल्ली। आगामी चुनावों के मद्देनजर धर्म और जाति को लेकर सियासत शुरू हो चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी कह कर राहुल गांधी पर निशाना साधा था. अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पलटवार किया है. उन्होंने कहा, ‘मैं पंक्ति की आखिरी लाइन में खड़े व्यक्ति के साथ खड़ा हूं. मैं शोषित, वंचित और सताए गए लोगों के साथ हूं. मेरे लिए इन लोगों के धर्म, जाति या विश्वास का मसला तुच्छ है. मैं इनके दर्द को देखता हूं और गले लगाता हूं. मैं नफरत और डर को मिटाता हूं. मैं सभी से प्यार करता हूं. मैं कांग्रेस हूं.’

वहीं, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल के इस ट्वीट पर फिर से पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताने वाले बयान पर अपनी स्थिति साफ करने की बजाय कंफ्यूजन बढ़ा रहे हैं. पिछले दो दिनों से लोग सवाल पूछ रहे हैं और स्पष्टीकरण मांग रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी को सटीक जवाब नहीं दे रहे हैं. बता दें कि हाल ही में राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की थी और कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रैली को संबोधित करते हुए तंज कसा था. राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा था, ‘नामदार कहते हैं कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, तो मैं पूछता हूं कि क्या कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है या फिर मुस्लिम महिलाओं की पार्टी भी पार्टी है?’ दरअसल पीएम मोदी तीन तलाक के मामले पर कांग्रेस को घेर रहे थे.

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संसद सत्र कल से, चार साल में मोदी सरकार के 40 बिल अटके

नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र कल बुधवार से शुरू होने जा रहा है. इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को विपक्षी दलों के साथ बैठक की और सदन चलाने के लिए उनका सहयोग मांगा. इस सत्र के दौरान सरकार के सामने उन तमाम बिलों को पारित करने की चुनौती होगी जो वो पिछले चार साल के अपने सरकार में लाई है. ऐसे बिलों की संख्या तकरीबन 40 हैं जो अटके हुए हैं. इसमें से 12 बिल बहुमत वाले सदन लोकसभा में पारित करा लिए हैं लेकिन राज्यसभा में अबतक यह अटके ही हुए हैं.

लंबित बिलों की बात करें तो मोदी सरकार की ओर से लाए गए लोकपाल, भूमि अधिग्रहण, व्हिसल ब्लोअर संरक्षण, ट्रांसजेंडर के अधिकार, तीन तलाक, भगोड़ा आर्थिक अपराधी, नदी विवाद से जुड़े बिल लंबित हैं. इनमें से सरकार तीन तलाक और भूमि अधिग्रहण बिल को प्रमुखता से पारित कराने की कोशिश में जुटी है. मुस्लिम महिलाओं से जुड़े इस बिल पर देशभर में सियासी संग्राम भी छिड़ा हुआ है.

इन बिलों को पारित करवाना सरकार के लिए चुनौती है. क्योंकि लोकसभा में बिल पारित होने के बाद वह राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं होने से अटक जाते हैं. हालांकि अब चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होने से संसद का मॉनसून सत्र काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं. पिछले दिनों पूरा बजट सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था साथ ही कामकाज के लिहाज से 16वीं लोकसभा का रिकॉर्ड काफी खराब ही रहा है.

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झारखंडः भाजपा के कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश को पीटा, कपड़े फाड़े

रांची। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर के साथ मारपीट की और उनके कपड़े फाड़ दिए. घटना आज मंगलवार की है. भाजयुमो कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के दौरे का विरोध कर रहे थे और ‘अग्निवेश गो बैक’ के नारे लगा रहे थे. स्वामी अग्निवेश जैसे ही होटल से बाहर आएं भाजपा कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ उन्हें काले कपड़े दिखाई बल्कि उनपर हमला कर दिया और उनकी लात-जूतों से पिटाई कर दी. स्वामी अग्निवेश को धकेल कर नीचे गिरा दिया. उनके कपड़े फाड़ दिए गए, पगड़ी खोल दी गई. इस दौरान बीजेपी युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश के खिलाफ नारे लगाते रहे. उन्होंने जय श्री राम, अग्निवेश भारत छोड़ो, अग्निवेश पाकुड़ में नहीं रहना होगा जैसे नारे भी लगाए. दरअसल स्वामी अग्निवेश मंगलवार को पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा में पहाड़िया समुदाय की एक सभा को संबोधित करने वाले थे. यह सभा अखिल भारतीय आदिम जनजाति विकास समिति दामिन दिवस के 195वें वर्षगांठ पर आयोजित की गयी थी. इस सभा के पहले उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस को भी संबोधित किया. इसमें उनके दिए बयानों से नाराज कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश के होटल से बाहर निकलते ही उनपर हमला कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि अग्निवेश ईसाई मिशनरी के इशारे पर आदिवासियों को भड़काने का काम कर रहे हैं. घटना के बाद पुलिस ने दोषियों पर कार्रवाई करने की बात कही तो वहीं स्वामी अग्निवेश ने अपने ऊपर हमले की न्यायिक जांच की मांग की है.

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मायावती ने बसपा नेताओं के लिए जारी किए कई निर्देश

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में तीखी टिप्पणी करना बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह को भारी पर गया है. जयप्रकाश सिंह के बयान की आलोचना होने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल को-आर्डिनेटर के पद से हटा दिया है. दरअसल 16 जुलाई को यानि कल सोमवार को लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की लखनऊ और कानपुर जोन की बैठक थी. इस बैठक की जिम्मेदारी बसपा अध्यक्ष मायावती ने पार्टी के दोनों नेशनल कोआर्डिनेटर एड. वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह को दिया था.

यह पहला मौका था जब इतना बड़ा कार्यक्रम बिना मायावती के हो रहा था. इसलिए दोनों नेशनल को-आर्डिनेटर के लिए यह बड़ी बात थी. दोनों ने यानि वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह ने इसे संबोधित किया. इसी बैठक में जयप्रकाश सिंह की जबान फिसल गई और उन्होंने सीधे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा. उन्होंने कह दिया कि राहुल गांधी विदेशी मूल के हैं इसलिए भारत की राजनीति में सफल नहीं हो सकते. देश बहन मायावती को पीएम के तौर पर देखना चाहता है.

जयप्रकाश सिंह के इस बयान को लेकर उन्हें पद से हटाए जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी के नेताओं में हड़कंप मच गया है. इस पूरे मामले को लेकर बसपा प्रमुख मायावती के ऑफिस से एक प्रेस रिलिज मीडिया को भेजी गई है, जिसमें सुश्री मायावती ने पार्टी के नेताओं को कई अहम निर्देश दिए हैं. डालते हैं उस पर एक नजर-

इस मुद्दे पर मीडिया को जारी अपने बयान में बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि बी.एस.पी. सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय तथा धर्म-निरपेक्ष व सर्व-धर्म सम्मान की सोच एवं नीतियों में विश्वास रखती है तथा उन पर पूरी ईमानदारी व निष्ठा से अमल भी करती है और यह सब उत्तर प्रदेश में, मेरे नेतृत्व में बी.एस.पी. की चार बार चली सरकार में भी देखने के लिये मिला है. जयप्रकाश सिंह ने बी.एस.पी. की इस मानवतावादी सोच व नीतियों के विरूद्ध जाकर तथा अपनी विरोधी पार्टियों के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेताओं के बारे में भी काफी कुछ व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी करके उनके बारे में काफी अनर्गल बातें भी कही हैं, जो बी.एस.पी. के कल्चर के पूरे तौर से विरूद्ध है. और जिनका बी.एस.पी. से कोई लेना-देना नहीं है. जिसे अति गम्भीरता से लेते हुये तथा पार्टी व मूवमेन्ट के हित में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयप्रकाश सिंह को उनके इस पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है और साथ ही, इनको बी.एस.पी. के राष्ट्रीय को-ओडिनेटर के पद से भी हटा दिया गया है.

पदाधिकारियों को चेतावनी मैं मीडिया के माध्यम से पूरे देश में, अपनी पार्टी के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों व नेताओं को भी यह चेतावनी देती हूँ कि वे बी.एस.पी. की हर छोटी-बड़ी मीटिंग व कैडर-कैम्प एवं जनसभा आदि में केवल बी.एस.पी. की विचारधारा, नीतियों व मूवमेन्ट के बारे में तथा दलित एवं पिछड़े वर्ग में जन्में अपने महान सन्तों, गुरूओं व महापुरूषों एवं पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में केवल उनके जीवन-संघर्ष एवं सिद्धान्तों व सोच के सम्बन्ध में ही अपनी बातें रखें. उनकी आड़ में दूसरों के सन्तों गुरूओं व महापुरूषों के बारे में अभद्र एवं अशोभनीय भाषा का कतई भी इस्तेमाल ना करें.

गठबंधन पर बयान से बचें गठबंधन पर बहनजी ने कहा है कि… उत्तर प्रदेश व देश के अन्य राज्यों में भी किसी भी पार्टी के साथ जब तक चुनावी गठबन्धन की घोषणा नहीं हो जाती है, तब तक गठबन्धन के बारे में किसी भी स्तर पर बात न करें. यह सब पार्टी के लोगों को अपनी पार्टी के हाईकमान पर ही छोड़ देना चाहिये.

लिखकर करें प्रेस वार्ता बहनजी ने पार्टी के नेताओं को सुझाव दिया है. उन्होंने कहा है- मैं पार्टी के खासकर वरिष्ठ नेताओं व पदाधिकारियों को यह सलाह देती हूँ कि उन्हें विशेषकर गम्भीर व महत्वपूर्ण विषयों पर तथा प्रेसवार्ता में भी ज्यादातर अपनी बातों को लिखकर ही रखना व बोलना चाहिये. ताकि खासकर जातिवादी मीडिया व हमारी विरोधी पार्टियों को फिर किसी भी प्रकार से हमारी पार्टी के बारे में गलत बात कहने व प्रचार करने का मौका ना मिल सके.

तो ये तमाम बातें हैं जो बसपा अध्यक्ष मायावती ने मीडिया को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कही है. जहां तक जयप्रकाश सिंह को पद से हटाए जाने की बात है तो दिक्कत यह हुई कि इस बैठक में राहुल गांधी पर हमले और उनके विदेशी मूल के सवाल को उठाने से कांग्रेस के नेताओं ने भी शिकायत दर्ज करा दी. खबर जब मायावती जी तक पहुंची तो वो भी हैरान रह गईं क्योंकि इस वक्त राहुल गांधी को निशाने पर लेना बिल्कुल गैर जरूरी था. क्योंकि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में गठबंधन को लेकर बसपा और कांग्रेस के बीच बात चल रही है और राहुल गांधी इस मामले को खुद देख रहे थे. तो वहीं अगर 2019 में बसपा अध्यक्ष मायावती के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बनती है तो वह बिना कांग्रेस के समर्थन के पूरा नहीं हो सकती है. ऐसे में सीधे राहुल गांधी पर निशाना साधना जाहिर है जयप्रकाश सिंह का गैर जरूरी कदम था. जिसकी सजा उन्हें मिल गई है.

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बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह पर गिरी गाज

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने हाल ही में बनाए गए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह को पद से हटा दिया है. जयप्रकाश सिंह के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल को-आर्डिनेटर के पद से हटाया गया है. ऐसा लखनऊ में 16 जुलाई को हुए कानपुर और लखनऊ जोन की बैठक में जयप्रकाश सिंह के आपत्तिजनक संबोधन के बाद किया गया है. जयप्रकाश सिंह ने अपने संबोधन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.

इस बारे में एक बयान जारी कर बसपा प्रमुख ने यह जानकारी दी है. प्रेस विज्ञप्ति में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती के हवाले से कहा गया है कि- “मुझे कल लखनऊ में बी.एस.पी. के हुये कार्यकर्ता-सम्मेलन में, पार्टी के खासकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ‘‘श्री जयप्रकाश सिंह’द्वारा दिये गये भाषण के बारे में यह जानकारी मिली है कि उसने कल बी.एस.पी. की इस मानवतावादी सोच व नीतियों के विरूद्ध जाकर तथा अपनी विरोधी पार्टियों के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेताओं के बारे में भी काफी कुछ व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी करके उनके बारे में काफी अनर्गल बातें भी कही हैं, जो बी.एस.पी. के कल्चर के पूरे तौर से विरूद्ध है. और जिनका बी.एस.पी. से कोई लेना-देना नहीं है.

अर्थात इनके द्वारा इस किस्म की कही गई बातें उनकी व्यक्तिगत सोच की उपज हैं तथा बी.एस.पी. की नहीं और साथ ही उनकी ऐसी सभी बातें बी.एस.पी. की सोच व नीतियों के विरूद्ध भी हैं. जिसे अति गम्भीरता से लेते हुये तथा पार्टी व मूवमेन्ट के हित में भी आज हमारी पार्टी ने अभी हाल ही में नये-नये बने बी.एस.पी. के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयप्रकाश सिंह को उनके इस पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है और साथ ही, इनको आज ही बी.एस.पी. के राष्ट्रीय को-ओडिनेटर के पद से भी हटा दिया गया है.

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हेट क्राइम में यूपी टॉपर, गुजरात नंबर 2

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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और गुजरात पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला है. रिपोर्ट के मुताबिक, हेट क्राइम के मामले में भाजपा शासित उत्तर प्रदेश नंबर वन है. जबकि, गुजरात को दूसरे नंबर पर रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2018 के पहले 6 महीनों में 100 हेट क्राइम दर्ज किए गए. इसमें ज्यादातर शिकार दलित, आदिवासी, जातीय और धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग और ट्रांसजेंडर बने हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, हेट क्राइम में अब तक कुल 18 घटनाओं के साथ यूपी टॉप पर है. इसके बाद 13 घटनाओं के साथ गुजरात दूसरे नंबर पर और 8 घटनाओं के साथ राजस्थान तीसरे नंबर पर है. खास बात यह है कि नफरत की इस आग का शिकार सबसे ज्यादा दलित और शोषित समाज है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 के पहले 6 महीनों में ‘हेट क्राइम’ के कुल 67 मामले वंचित-शोषित समाज के खिलाफ दर्ज किए गए हैं. जबकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस तरह के 22 मामले हुए हैं. इनमें से ज्यादातर केस गाय और ऑनर किलिंग से संबंधित हैं. उत्तर प्रदेश में भी सबसे अधिक मामले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ऐसे वक्त पर आई है, जब विगत शनिवार को कर्नाटक के बीदर जिले में भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह पर एक 32 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान ले ली. भीड़ ने उसके तीन दोस्तों की भी जमकर पिटाई की, जिसमें एक ही हालत नाजुक है.

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मोदी सरकार के चार साल

दलितों व अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार के आँकड़े भी तो देते मोदी जी.
केंद्र में मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गये हैं. वर्ष 2014 में जब इस सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब जनता की उम्मीदें यूं ही आसमान पर नहीं थीं, बल्कि मोदी जी ने जनता को दिन में ऐसे तारे दिखाए थे, जिन्हें भाजपा के अमित शाह ने जुमला करार देकर जनता की छाती पर दाल दलने का काम किया. तीस साल बाद केंद्र में किसी पार्टी को जुमलेबाजी के बल पर अकेले बहुमत हासिल हुआ था. किन्तु इस मजबूत सरकार से जनता कुछ बड़े बदलावों की आशा कर रही थी और खुद मोदी और उनके सहयोगियों ने इसका वादा भी किया था. किन्तु हुआ क्या? टीम मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लेकर देश की आम जनता और व्यापारिक वर्ग को तबाही के मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया. भाजपा बेशक इन फैसलों को अपनी सफलता मानती रहे. नोटबंदी के फैसले के साथ जुड़ी अपेक्षाओं को लेकर कई जरूरी आंकड़े सरकार ने अब तक जारी नहीं किए हैं, फिर सरकार इस नोटबंदी को किस आधार पर अपनी सफलता से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है?
सरकार का कहना है कि गत चार वर्षों के दौरान विभिन्न मोर्चों पर कई परेशानियों का सामना करते हुए, उसने हर परेशानी को दूर कर विकास का मार्ग प्रशस्त किया. सरकार ने दावा किया कि मुद्दा चाहे डोकलाम का रहा हो या फिर सीमा पर पाक की कार्रवाई का या फिर देश में नक्सलवाद का या फिर घरेलू मंच पर तेल का, हर मुद्दे को सुलझाने में सरकार ने बखूबी सफलता हासिल की. डोकलाम और पाक सीमाओं का तो हमें पता नहीं किंतु तेल की कीमतों का बहीखाता तो हमारे सामने है, फिर किस आधार पर ये मान लिया जाय कि मोदी सरकार ने ऐसे बड़े मामले आसानी से हल कर लिए? सरकार का यह भी कहना है कि न केवल देश में बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत का मान बढ़ाया, किंतु मोदी सरकार ने ये खुलासा नहीं किया कि किस प्रकार से भारतीय दूतावास के जारिए मोदी जी की सभा में प्रवासी भारतीयों की भीड़ को इक्ट्ठा किया गया?
सरकार का कहना है कि सरकार ने हर मोर्चे पर पारदर्शी रहते हुए अपने सभी फैसलों की जानकारी आम-जन तक पहुंचाई. जबकि सरकार का ऐसा कहना सच्चाई से कोसो दूर है. सच तो ये है कि सरकार की असफलता को उजागर करने वालों को सीधा देशद्रोही ठहरा दिया जाता रहा. सरकार का यह एक थोथा दावा है कि पीएम मोदी ने सोशल नेटवर्किंग से जुड़कर लोगों को अपने रोजाना के कार्यक्रम और लोगों को अपनी सोच के बारे में बताया और उनसे सुझाव भी मांगे. हाँ! ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए पीएम ने अपने मन की बात तो की किंतु जनता के मन की बात न तो सुनी और न ही जनता से किए गए वादों के कार्यान्वयन के बारे सही से कुछ बताया. कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के चार साल में झूठ और धर्मान्धता की संस्कृति का इस कदर फैलाव हुआ है कि भाजपा अन्दरखाने इस फैलाव का जश्न मना रही है. सरकार को अपने इस कृत्य पर तनिक भी अफसोस नहीं है. इस बारे में जिस तरह से सोशल मीडिया पर कुतर्कों का जाल बुना गया है, वह बताता है कि यह सरकार जनता की तर्क बुद्धि का कितना सम्मान करती है.
सरकार ने मीडिया की गुलामगीरी पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया.…. क्यों? विदित हो कि मोदी सरकार ने सबसे ज्यादा पैसा मीडिया को मौन रखने और सरकार की वाहवाही करने के लिए खर्च किया है. सरकार को इसका खुलासा करना चाहिए. कोई तो बात होगी कि भारत का मीडिया 180 देशों के रिपोर्ट कार्ड में 138वें स्थान पर आ गया है. भारतीय प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया सत्ता का पैरोकार बनने को मजबूर किया गया है या फिर उसकी आदत बन गई है कि अब चाटुकारिता के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता.
सरकार को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि दो करोड़ की रिश्वत मांगने के आरोप में जेल जाने वाले पत्रकार सुधीर चौधरी को इस सरकार ने वाई श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई हुई है जबकि अन्य चर्चित और ईमानदार पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने में कोताही क्यों बरती जा रही है, जबकि उन्हें हिन्दुवादी हिंसक ताकतों द्वारा न केवल हिन्दू विरोधी करार दिया जा रहा है अपितु उन्हें जान से मार देने की धमकियां दी जा रही हैं. होना तो ये चाहिए कि सरकार को ये बातों खुद संज्ञान लेकर ऐसे पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए. खेद की बात है कि भाजपा के शासन काल में पिछ्ले शासन काल के मुकाबले सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्याएं की गई हैं. सरकार ने इस पर कोई बयान क्यों नहीं दिया? इस दौरान रोहित वेमुला, नजीब जैसे कई प्रतिभाशाली छात्रों को जमींदोज करने का काम भी किया गया है. क्या ऐसे मुद्दे मोदी सरकार के एजेंडे से बाहर के मुद्दे हैं? क्या आर एस एस के मुद्दे ही आज की सरकार के मुद्दे हैं? क्या हिन्दुत्व ही मोदी जी का मूल मुद्दा है? जब वो अपने को ओ बी सी का बताते हैं तो फिर वो कैसे ब्राह्मणवाद का समर्थन कर सकते हैं? अगर वो ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हैं तो फिर ओ बी सी  कैसे हो सकते हैं?
मोदी सरकार ने पिछ्ले चार साल में जनहित के नाम पर लगभग सौ से भी ज्यादा योजनाओं की घोषणाएं की हैं. ये एक अच्छी बात है. किंतु इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर ये सरकार खाली कागजी आंकड़े पेश करके ही संतुष्टी का ढोंग कर जनता को 2019 की बजाय 2022 तक अपने वादों को पूरा करने का झुनझुना थमा दे रही है. रिटायर हो चुके लोगों को अब न्यू पेंशन स्कीम का झुनझुना थमा दिया गया है. अब वो इस झांसे को समझ गये हैं. सच ये है कि मोदी सरकार की एक भी स्कीम का कार्यान्वयन जमीनी आधार पर नहीं हुआ है. खाली कागजों को रंगने का काम किया है मोदी सरकार ने.
सरकार ने इस बात का भी कोई उल्लेख नहीं किया कि बैंकों का पूरा सिस्टम क्यों ध्वस्त है? सरकार ने माल्या, नीरव मोदी, मोहुल भाई और न जाने और भी कितने ही ऐसे भाई लोग हैं जो बैंकों को चूना लगाकर इस मोदी राज में परदेसी हो गए. उनपर कोई चर्चा क्यों नहीं की? उल्टा बैंक कर्मियों को ही दोषी ठहराने का काम किया जा रहा है. राजनेता चाहे कांग्रेस के हों या भाजपा के, सब दूध के धुले हैं, यह सिद्ध करना ही उनका काम रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के अनुसार दो ऐसे सेक्टर हैं जिनको ये सरकार फैलाने का काम कर रही है…एक- झूठ और दूसरा- धर्मांधता. माना कि हर सरकार के दौर में एक राजनीतिक संस्कृति पनपती है, किंतु मोदी सरकार के दौर में “झूठ” नई सरकार की संस्कृति बनकर उभरी है. अब सवाल किया जा सकता है कि जब प्रधानमंत्री ही झूठ बोलते हों तो फिर दूसरों के बारे में क्या कहें? उल्लेखनीय है कि धर्मांधता की धारा को आगे बढ़ाने के मकसद से भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस से इत्तेफाक रखने वाले कई संगठन बनकर खड़े हो गए हैं जो काम तो इन्हीं के लिए करते हैं मगर अलग इसलिए हैं ताकि बदनामी उन पर न आएं.
सरकार ने इस सत्य पर भी कोई टिप्पणी नहीं की कि उनकी सरकार नौकरी के फ्रंट पर फेल रही है. रोजगार न दे पाने के कारण भी सरकार की चमक फीकी हो रही है, किंतु इस मसले पर सरकार मौन रही है और पकौड़े तलने जैसे सुझाव देकर ही अपनी असफलता को छुपाने के काम में लगी रही. अफसोस की बात है कि अपना सबसे बड़ा वादा मोदी सरकार पूरा नहीं कर पाई. चुनावी घोषणा पत्र में उसने हर साल 2 करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था, मगर हकीकत कुछ और ही निकली. सरकार की सोच है कि सिर्फ नौकरी को ही रोजगार न माना जाए. लेकिन ऐसा तब होता जब काफी लोगों को स्वरोजगार के साधन उपलब्ध हो पाते. स्टार्ट-अप योजना के जरिए इस दिशा में एक कोशिश जरूर हुई पर वह लहर दो साल भी नहीं चली. सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले रीयल एस्टेट सेक्टर का हाल बुरा है. इस सदी में सबसे ज्यादा मध्यवर्गीय नौकरियां टेलिकॉम सेक्टर में मिलती थीं, जो अचानक समस्याग्रस्त लगने लगा हैं. नौकरियों में आरक्षण पर कुठाराघात, एस सी/ एस टी पर अत्याचार के विरोध में पूर्व पारित सरकारी आदेश का सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया जाना क्या मोदी सरकार के संज्ञान में नहीं आया? यदि नहीं, तो क्यों?
और भी बहुत से सवाल हैं जो देश की दलित और अल्पसंख्यक आबादी से जुड़े हुए हैं जिन्हें मोदी सरकार ने चार साल पूरा होने के जश्न के दौरन छुआ तक नहीं. मसलन कश्मीर में हिंसा को रोकने के लिए क्या किया? एक सिर के बदले दस सिर लाने वाले मोदी जी ने यह भी नहीं बताया कि उनके शासन काल में कितने सैनिक शहीद हुए और कितनों को यथावत सम्मान दिया गया? और उनके बदले कितने दुश्मनों के सिर देश में लाए गए. पीएम मोदी दलित उत्पीड़न पर भी चुप्पी साधे रहें, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितने दलितों और अल्पसंख्यकों को मौत के घाट उतारा गया और किस आधार पर? मोदी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितनी किशोरियों की लाज लूटी गई और कितनों की हत्या की गई? मोदी सरकार ने यह भी नहीं बताया कि मोदी जी के पिछ्ले चार सालों में शासन-प्रशासन ने दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ कितने फर्जी मुकदमे दर्ज किए और कितने फर्जी एनकाउंटर किए? केवल और केवल सरकारी आँकड़ों के बल पर सुर्खियां बटोरने का काम करना न केवल राजनीतिक है अपितु समाज विरोधी भी है.
खैर! सरकार के पास अभी एक साल का वक्त और है. इस बीच वह जनता की कुछ मुश्किलें दूर कर दे तो सरकार को अपना गुणगान करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी अपितु जनता उनका ये काम खुद ही कर देगी. विकास का काम जमीन पर ऐसे ही दिखना चाहिए जैसे कि दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ लगातार हो रहे अत्याचार. तो फिर माना जा सकता है कि सरकार विकास के कार्यो के लिए कटिबद्ध है, अन्यथा नहीं.
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बहनजी को पीएम बनाने के संकल्प के साथ हुई बसपा के दो बड़े जोन की बैठक

लखनऊ। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी हर मोर्चे पर तैयारी में जुट गई है. इन्हीं तैयारियों के तहत आज 16 जुलाई को लखनऊ और कानपुर मंडल के पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन लखनऊ के गोमती नगर में हुआ. इस सम्मेलन की शुरुआत पार्टी अध्यक्ष मायावती को पीएम बनाने के संकल्प के साथ की गई. इसके साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन पर उत्साह जताया. हालांकि इस सम्‍मेलन में खुद मायावती शामिल नहीं हुईं.

यह सम्मेलन लखनऊ के सबसे बड़े ऑडिटोरियम इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित किया गया था. आज की इस बैठक का जिम्मा नए बनाए गए नेशनल कोऑर्डिनेटर वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह को दिया गया. मायावती अपने तमाम कार्यकर्ताओं का फीडबैक इन जोनल कोऑर्डिनेटरों की मीटिंग के माध्यम से ले रही हैं. माना जा रहा है कि इस सम्मेलन का मकसद पार्टी कार्यकर्ताओं से उनकी राय जानकर लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति तय करना है. इसके साथ ही पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुंचाने के काम पर भी फैसला लिया जाएगा.

इस कार्यक्रम की शुरुआत बकायदा दोनों नेशनल कोऑर्डिनेटर को मुकुट पहनाकर की गई. कार्यक्रम की शुरुआत में यह संकल्प हुआ कि मायावती को प्रधानमंत्री बनाना है. हाल ही में एमएलसी बनाए गए भीमराव अंबेडकर ने मंच से 1993 के गठबंधन की याद दिलाई और 2019 में एक बार फिर से वैसे ही गठबंधन को दोहराने की बात करते हुए पार्टी मुखिया मायावती को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.

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हरभजन सिंह की खरी-खरी, ‘क्रोएशिया ने FIFA फाइनल खेला और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे हैं’

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नई दिल्ली। ओलंपिक खेलों और फुटबाल के दौरान हमेशा भारत की संख्या का हवाला देकर पदकों और विश्व कप फुटबाल में क्वालीफाई न कर पाने की चर्चा आम है. यह बात हर भारतीय को सालती है कि आखिर इतनी ज्यादा संख्या होने के बावजूद भारत ओलंपिक में पदक के लिए क्यों जूझता है. तो विश्वकप फुटबाल में क्वालीफाई भी क्यों नहीं हो पाता. फीफा वर्ल्ड कप 2018 के बाद इसी मुद्दे पर क्रिकेट खिलाड़ी हरभजन सिंह का दर्द छलक गया है.

फीफा वर्ल्ड कप फ्रांस और क्रोएशिया के बीच खेला गया. इसी पर हरभजन सिंह ने कहा कि ‘क्रोएशिया ने FIFA फाइनल खेला और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे हैं.’ दरअसल फाइनल गंवाने वाला क्रोएशिया महज 50 लाख आबादी वाला एक छोटा सा देश है. रविवार को रूस के लुज्निकी स्टेडियम में खेले गए फाइनल मैच में फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से मात दी. इस छोटे देश के बड़े कारनामे से प्रभावित होकर इंडियन क्रिकेटर हरभजन सिंह ने देश के मौजूदा हालात पर तंज कसे हैं.

हरभजन सिंह ने फाइनल मैच शुरू होने से पहले ट्वीट किया- ‘लगभग 50 लाख की आबादी वाला देश क्रोएशिया फुटबॉल वर्ल्ड कप का फाइनल खेलेगा और हम 135 करोड़ लोग हिन्दू-मुसलमान खेल रहे है’. इसके साथ ही हरभजन सिंह ने हैशटैग सोच बदलो देश बदलो भी लिखा था.

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