नई दिल्ली। चार राज्यों के 63 जिलों में आज भी मैला उठाने का काम जारी है। यह तब है जबकि 1993 में मैला प्रथा के खिलाफ कानून बनने के बाद 33 साल हो चुके हैं। ऐसे में आजादी के 80वें साल में क्या भारत से यह प्रथा खत्म हो पाएगी। इसी सवाल को उठाते हुए सफाई कर्मचारी आंदोलन नाम कि संस्था ने दिल्ली के प्रेस क्लब में 1 सितंबर को कार्यक्रम का आयोजन किया।
कार्यक्रम में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से वो लोग शामिल हुए, जो आज भी इस घिनौने काम में लगे हुए हैं। उन्होंने अपना अनुभव साझा किया और सरकार से मदद की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें जो सहायता मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है।
बता दें कि जनवरी 2011 से लेकर अगस्त 2026 तक सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 593 सफाईकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं। हालांकि सरकार सिर्फ 332 लोगों के मौत की बात कहती है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन के अगुवा बेजवाड़ा विल्सन ने इसको लेकर सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने कहा कि मैं राष्ट्र गान कैसे गाऊं, जबकि आजादी के इतने सालों बाद भी मैला ढोने की प्रथा जारी है। उन्होंने कहा कि 15 अगस्त 2027 को जब देश की आजादी के 80 साल हो जाएंगे, तब क्या इस प्रथा को खत्म करने की घोषणा की जाएगी।
कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर और सुधांशु धूलिया एवं पटना हाई कोर्ट की पूर्व जज अंजना प्रकाश शामिल हुई और इस पीड़ा को समझा। विभिन्न प्रदेशों से आए कर्मचारियों की सबसे अहम चिंता मुआवजे की रकम को लेकर दिखी, जिसका वादा सरकार करती है। नियम के मुताबिक सर्वे में पहचाने गए प्रत्येक परिवार को सहायता के रूप में 40,000 रुपये की एकमुश्त नकद राशि दी जाती है। साथ ही वैकल्पिक और सम्मानजनक रोजगार शुरू करने के लिए रियायती दरों पर लोन और सब्सिडी दी जाए। मैला प्रथा में लगे परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और आवास उपलब्ध कराने के प्रावधान भी योजना में शामिल हैं।
इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या 15 अगस्त 2027 को जब भारत अपनी आजादी के 80 साल पूरे कर लेगा, तब क्या भारत से मैला प्रथा खत्म होने की घोषणा की जा सकेगी?

वीरेन्द्र कुमार साल 2000 से पत्रकारिता में हैं। दलित दस्तक में उप संपादक हैं। उनकी रुचि शिक्षा, राजनीति और खेल जैसे विषय हैं। कैमरे में भी वीरेन्द्र की समान रुचि है और कई बार वीडियो जर्नलिस्ट के तौर पर भी सक्रिय रहते हैं।

