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आप वैदिक आरक्षण को क्यों नहीं खत्म करना चाहते हैं?

अगर वास्तव में समानता लानी है, तो पहले “वैदिक आरक्षण” यानी जाति-आधारित सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व — को समाप्त करने की पहल करनी होगी। क्या आप चाहते हैं कि 78 साल वाला संवैधानिक आरक्षण खत्म हो जाए, लेकिन वैदिक आरक्षण, यानी जाति व्यवस्था का दंभ और अहंकार जो हजारों साल से चला आ रहा है, यथावत बना रहे? आप वैदिक आरक्षण  को क्यों नहीं खत्म करना चाहते हैं?

आज, ‘ऊंची जातियों’ के एक वर्ग की ओर से आर्थिक आधार पर आरक्षण की  ज़ोर-शोर से मांग हो रही है। साथ ही, सोशल मीडिया पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली संवैधानिक रियायतों, ‘अत्याचार निवारण अधिनियम’ और शैक्षिक लाभों के बारे में भ्रामक और संवेदनहीन टिप्पणियां की जाती हैं। इन सब पर आक्रामक तरीके से गलत जानकारी और दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है। दलित आरक्षण को सिर्फ़ एक पीढ़ी तक सीमित रखने की मांग भी उठ रही है— ‘सीलिंग’ या ‘क्रीमी लेयर’ जैसी पाबंदियां लगाने की मांग की जाती है। गरीबों को ही आरक्षण दिया जाए कि मांग की जाती है। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को समाप्त करने की बात की जाती है।

अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, उन लोगों के लिए एक सुरक्षा कवच है जो आज भी रोज़मर्रा के जीवन में जातिगत हिंसा और भेदभाव का शिकार होते हैं। जहाँ तक कानूनों के गलत इस्तेमाल की बात है, तो सभी कानूनों का कुछ हद तक गलत इस्तेमाल होता है, लेकिन अदालतें ऐसे मामलों को खारिज कर देती हैं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को अक्सर दुश्मनी भरी भावना से निशाना बनाया जाता है और उन्हें ‘भिखारी’ तक कहा जाता है। हालांकि दलित समुदाय के कुछ लोग इन बातों का असरदार ढंग से जवाब भी देते हैं, लेकिन उन्हें अपमानजनक लहजे में ताने मारे जाते हैं। प्रत्युत्तर में भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती है, उन्हें धमकाया जाता है। आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर संसद भवन के सामने रैलियां करने की बात से लेकर धमकी भरे बयान देने और अपमानजनक नारे लगाने तक की घटनाएं होती हैं।

जबकि दूसरी तरफ ये सवर्ण लोग अपने ही समुदाय के उन करोड़पतियों और अरबपतियों के बच्चों या उन लोगों को मिलने वाले ‘क्रीमी लेयर’ और आरक्षण के फ़ायदों को नहीं देख पाते, उन पर चर्चा नहीं करते, जिन्होंने चार-पाँच पीढ़ियों तक  सरकार की सेवा की है; उन्हें सिर्फ़ दलितों से जुड़े ‘क्रीमी लेयर’ और आरक्षण ही दिखाई देते हैं। वे लगातार दलितों के बारे में झूठी, मनगढ़ंत  और एकतरफ़ा बातें फैलाते रहते हैं। ऐसे लोगों को सवर्ण नेताओं और सवर्ण अधिकारियों के पुस्त-दर-पुस्त लाभ ले रहे बेटे-बेटियों और डोनेशन से डिग्री लेने वाले वैदिक आरक्षणधारियों का क्रीमी लेयर दिखाई नहीं देता है? सवर्णों का फर्जीवाड़ा से डिग्री लेना और  फर्जी आय-जाति प्रमाण पत्र प्राप्त कर अनुचित लाभ लेना दिखाई नहीं देता है । लेकिन उन्हें दलित नेताओं और अधिकारियों का क्रीमी लेयर  दूर से ही दिखाई दे जाता है। तीन चार पीढ़ियों से लगातार सेवारत सवर्ण अधिकारियों के क्रीमीलेयर और सीलिंग पर बात और चर्चा क्यों नहीं की जाती है? उन पर सीलिंग लगाने की बात क्यों नहीं की जाती है? वे अपने हिस्से से सवर्ण गरीबों को हिस्सेदारी देने की बात क्यों नहीं करते हैं? सवर्ण गरीबों को  दलितों से हिस्सा दिलाने की चालें क्यों चली जाती हैं? क्या दलितों से इतनी दुर्भावना है कि एकतरफा झूठी और मनगढ़ंत गोल करो ?  केवल दलितों से एकतरफ़ा इस तरह के  प्रश्न करने वाले बौद्धिक बेइमान हैं, ठग हैं।

‘ऊंची जातियों’ का कोई भी सदस्य कभी भी सामान्य श्रेणी के बड़े नेताओं या ऊंचे ओहदे वाले अधिकारियों के बारे में यह सवाल नहीं पूछता कि उनके बेटे, बेटियां और दामाद अपने रसूख का इस्तेमाल करके अहम पदों पर कैसे नियुक्त हो जाते हैं—या फिर ऐसी जगहों पर ऊंची जाति के किसी गरीब व्यक्ति को क्यों नहीं रखा जाता। इसके बावजूद, दलितों के मामले में ऊंची जाति के सभी लोग ज़ोर-शोर से और एकमत होकर यह दावा करते हैं कि गरीब दलितों के हक और पद अमीर या रसूखदार दलित हड़प रहे हैं या छीन रहे हैं। वे लगातार इस तरह की बातें फैलाते और प्रोपेगैंडा करते हैं, जो उनकी बुरी सोच को दिखाता है। दलित समुदाय का हर संपन्न परिवार उन्हें खटकता है। ऐसी मांगें करने वाले लोग फासीवादी सोच वाले ऊंची जाति के व्यक्ति हैं, जो भिन्न- भिन्न प्रकार के अप्रासंगिक मामले को उछाल कर, दलितों के अधिकारों को किसी न किसी रूप में हड़पने के फिराक में रहते हैं।

कुछ सवर्ण लोग ज़ोर-शोर से दलित आरक्षण में “क्रीमी लेयर” का प्रावधान लागू करने की मांग करते हैं। उनका तर्क है कि अमीर दलित, गरीबों के हिस्से का लाभ उठा लेते हैं। असल में यह मांग क्या साबित करती है? क्या जगजीवन राम, रामनाथ कोविंद, द्रौपदी मुर्मू, जीतन राम मांझी और पूर्व सीजेआई गवई जैसे ऊंचे ओहदे वाले, अमीर और प्रभावशाली लोगों के साथ  जातीय भेदभाव नहीं हुआ—और क्या अब भी नहीं होता है ? तो फिर, आर्थिक स्थिति के आधार पर दलित आरक्षण को बांटने की मांग का क्या औचित्य है? क्या यह सचमुच उनके कल्याण की मांग है, या उनके हक़ का हिस्सा हड़पने और उन्हें कमजोर करने की एक कुटिल चाल?

उल्लेखनीय है कि सामाजिक न्याय और शासन-प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का आरक्षण एक निर्विवाद राष्ट्रीय नीति रही है। यह आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। यह आरक्षण रोटी का प्रश्न नहीं है।  यह आरक्षण रोजगार देने और गरीबी दूर करने के लिए नहीं है। यह आरक्षण कोई आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह आरक्षण सामाजिक क्रांति लाने का जरिया है। यह आरक्षण शासन- प्रशासन में दलितों की हिस्सेदारी का मामला है।

यह आरक्षण हर किसी को नौकरी नहीं देता। इसका सीधा सा मतलब है कि उपलब्ध सरकारी पदों का एक तय हिस्सा और प्रतिशत—जो उस आरक्षित समूह की कुल आबादी का लगभग 1 से 2 प्रतिशत होता है—उस खास समूह के लिए अलग रखा जाता है। इसका मकसद समाज के उस वर्ग की शासन- प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करना है; यह गरीबी का इलाज नहीं है, और न ही यह नौकरी बांटने या गरीबी खत्म करने की कोई योजना है। क्या किसी ने यह पता लगाया है कि दलित कितने बेरोजगार हैं? आज दलित सवर्णों से ज्यादा बेरोजगार हैं।

आर्थिक आधार पर आरक्षण हो की मांग से प्रश्न उठता है कि क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से द्रोणाचार्य की औलादों का पैदा होना बंद हो जाएगा? क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से जाति का जहर समाप्त हो जाएगा? क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से  उच्च कोटि के मेरिटधारी पैदा होंगे? ज़ाहिर है, ऐसा कोई बदलाव नहीं होने वाला है। यथास्थिति बनी रहेगी।

सवर्ण केवल सरकारी नौकरी में ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात क्यों करते हैं? देश के अन्य संसाधनों जमीन, जायदाद एवं पैतृक संपत्ति जैसे संसाधनों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की न तो बात करते हैं, न मांग करते हैं। इस पर चर्चा करने पर ये चुप्पी साध लेते हैं । जाति समाप्त करने के नाम पर भी ये लोग मौनी बाबा बन जाते हैं।  यह पूछने पर कि क्या तुम किसी गरीब ब्राह्मण को डोम बना सकते हो और अमीर डोम को ब्राह्मण बना सकते हो तो वे इस पर  मौनी बाबा या फिर गाली गलौज देना शुरू कर देते हैं। या फिर वे ‘सनातन’-‘सनातन’की रट लगाने लगते हैं।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग क्या उन धोखेबाजों की माँग नहीं है, जो अपने  सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के हिस्से को हड़पने के फिराक में रहते हैं। यदि आरक्षण का मापदंड सिर्फ गरीबी होगा, तो देश के सभी  सवर्ण, यहाँ तक कि करोड़पति सवर्ण भी गरीब बन जाएंगे। जिस प्रकार लेटरल इंट्री में बिना परीक्षा के सवर्ण आईएएस बना दिए जाते हैं। उसमें कोई पिछड़ा या दलित नहीं दिखाई देता है। यह चयन आरक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि कथित सिफारिशी योग्यता के आधार पर होता है। कॉलेजियम द्वारा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में भी यही खेल चलता रहता है।

आज आर्थिक आधार पर मिलने वाला आरक्षण भ्रष्टाचार के नये पैमाने गढ़ रहा है। करोड़पति सवर्ण कंगाली का प्रमाण पत्र लेकर आईएएस अधिकारी तक बन रहे हैं। शिकायत के बावजूद उनके खिलाफ न कोई एफआईआर और न नौकरी से बर्खास्तगी होती है। धनी सवर्णों द्वारा इससे जो भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और धांधली फैलायी जा रही है उस पर करोड़पति सवर्ण बल्ले बल्ले करते हुए ऐश कर रहे हैं।  और बेशर्मीपूर्वक आर्थिक आधार पर आरक्षण हो का नारा बुलंद कर रहे हैं।  90%  ईडब्ल्यूएस आरक्षण से लाभान्वित व्यक्ति फर्जी हैं। समय समय पर समाचार पत्रों में भी इस तरह की फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर लाभान्वितों के बारे में  इंडियन एक्सप्रेस से लेकर अन्य समाचार पत्रों एवं चैनलों पर खबरें प्रकाशित होती रहती है। क्या देश के प्रबुद्ध लोग और गरीब सवर्ण ऐसे सवर्ण आतंकवादियों के विरुद्ध सड़क पर उतरने का काम करेंगे।

संवैधानिक आरक्षण की समय-सीमा को बार-बार दस साल के लिए बढ़ाए जाने को लेकर अक्सर तीखी टिप्पणियाँ की जाती हैं और इसे खत्म करने की मांग उठाई जाती है। संवैधानिक आरक्षण की अवधि हर दस वर्ष बाद क्यों बढ़ाई जाती है, जबकि इसका प्रावधान केवल दस वर्षों के लिए था? आरक्षण देने का मूल कारण क्या था? आरक्षण किसी का हिस्सा छीनना नहीं है, बल्कि समाज के कमज़ोर वर्ग को वह प्रतिनिधित्व दिलाना है, जिसे वह अपने दम पर प्राप्त नहीं कर पाता। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई कि मज़बूत वर्ग कमज़ोर वर्ग के हिस्से को हड़प न सके। दस वर्षों की समय-सीमा तय करते समय 1932 के पूना समझौते को ध्यान में रखा गया था। इस समझौते में गाँधी सहित सभी प्रमुख हिंदू नेताओं ने डॉ. आंबेडकर के साथ यह वचन दिया था कि दस सालों के भीतर अस्पृश्यता, सामाजिक भेदभाव और शैक्षिक असमानता समाप्त कर दी जाएगी, और सभी नागरिकों को समान दर्जा मिल जायेगा। इसी वादे के आधार पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए दस वर्षों का आरक्षण संविधान में शामिल किया गया। जिसे समीक्षा कर आगे बढ़ाने का प्रावधान किया गया. पूना पैक्ट के अनुसार, इन दस वर्षों के भीतर छुआछूत और सामाजिक-आर्थिक अन्याय को समाप्त किया जाना था और सभी लोगों को समान सामाजिक स्तर पर लाया जाना था। इसकी सारी जिम्मेदारी गाँधी, मालवीय और अन्य हिंदू नेताओं ने स्वीकार की थी। लेकिन क्या आज़ादी के 78 साल बाद भी दलित जातियों के साथ हिन्दुओं का भेदभाव, अत्याचार और उनकी नफरत समाप्त हुई? यदि नहीं, तो राजनीतिक आरक्षण की अवधि क्यों समाप्त कर दी जाए?

इसी कारण विधायिका के संवैधानिक आरक्षण की समय-सीमा हर दस वर्ष बाद बढ़ाई जाती रही है। लेकिन इस समय सीमा का शैक्षणिक संस्थानों या सरकारी सेवाओं में दिए जाने वाले आरक्षण से कोई संबंध नहीं है। इस आरक्षण का कभी भी अवधि विस्तार नहीं किया गया है। यानी जब तक सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव रहेगी, यह आरक्षण जारी रहेगा। जब तक सदियों पुरानी सामाजिक असमानता और ऊँची जातियों का  अहंकार – दंभ समाप्त नहीं होता, तब तक कमज़ोर वर्गों को सुरक्षा देने वाली यह व्यवस्था आवश्यक है।

इसलिए, अगर वास्तव में समानता लानी है, तो पहले “वैदिक आरक्षण” — यानी जाति-आधारित सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व — को समाप्त करने की पहल करनी होगी। क्या आप चाहते हैं कि 78 साल वाला संवैधानिक आरक्षण खत्म हो जाए, लेकिन वैदिक आरक्षण, यानी जाति व्यवस्था का दंभ और अहंकार जो हजारों साल से चला आ रहा  है, यथावत  बना रहे? आप वैदिक आरक्षण  को क्यों नहीं खत्म करना चाहते हैं? वैदिक आरक्षण यानी जाति व्यवस्था को बनाए रखते हुए संवैधानिक आरक्षण को समाप्त करने की मांग करने वाले फासीवादी हैं?

आजकल वैदिक आरक्षण धारियों द्वारा अपने जन्मगत ऊंची जाति के अंहकार, दंभ और सर्वश्रेष्ठ समझने के अभिमान में रहते हैं के द्वारा संवैधानिक आरक्षण के खिलाफ सतत भ्रामक और झूठा अभियान चलाया जा रहा है। ऊंची जातियों की कुल आबादी 15% है। फिर भी  ईडब्ल्यूएस के नाम पर उन्हें 10% आरक्षण  दिया गया है। और शेष 50 % में भी इनकी नियुक्ति की जाती है। इसके बावजूद इन लोगों का पेट नहीं भरता है। ये आरक्षण और  योग्यता का हनन – हनन चिल्लाते रहते हैं।  जिनके बाप दादा ने सदियों से 100% आरक्षण का उपभोग किया है, वे आज संवैधानिक आरक्षण का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

जाति व्यवस्था एक बड़ा उपनिवेशवाद  है। कमज़ोर जातियाँ ताकतवर जातियों के सामने डर के साये में जीती हैं।  भारत में जातिवाद सबसे बड़ा आतंकवाद है। जाति के आधार पर हमला, उत्पीड़न, अत्याचार, हत्या करना, उसे क्या कहेंगे – आतंकवादी ? जातियां राष्ट्र विरोधी हैं, यह भारत के बर्बादी का कारण है।  जिसने समाज को ऊंच-नीच  और भेदभाव की खाइयों में विखंडित कर दिया । जाति व्यवस्था ऊंची जाति के लोगों की वह सामाजिक व्यवस्था है जिन्हें उनके स्वार्थ, दंभ और विशेषाधिकारों को बनाए रखने में मदद करता है। इसी वैदिक आरक्षण के जहर को कम करने के लिए संवैधानिक आरक्षण लाया गया है। किस तरह से द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा काटा। आरक्षण इसलिए लाया गया कि एकलव्य कमजोर नहीं है बल्कि द्रोणाचार्य छली, कपटी और बेइमान है। इसलिए वैदिक आरक्षण यानी जाति व्यवस्था हटाओ समानता लाओ देश बचाओ अभियान शुरू करो संवैधानिक आरक्षण स्वयं समाप्त हो जाएगा।

सवर्ण ज़ोर शोर से मेरिट की बात करते रहते हैं। लेकिन मेरिटवान लोगों की करतूतों पर लोग चर्चा नहीं करते हैं। मेरिट की बात जब होती है तो परीक्षा पास करने के लिए न्यूनतम अंक सबके लिए बराबर होते हैं। प्रवेश में कुछ रियायत दी जाती है, लेकिन  जो अंतिम परीक्षा होती है, जिसमें योग्यता का पैमाना होता है, वह सबके लिए बराबर होता है। किसी अयोग्य दलित की नियुक्ति नहीं की जाती है,फिर भी, दलितों पर ‘अक्षमता’ का झूठा और गुमराह करने वाला आरोप लगाया जाता रहता है।

ओलंपिक खिलाड़ियों का चयन, भारतीय मीडिया और भारतीय न्यायपालिका में सबसे होनहार और बहुत ज़्यादा काबिल लोगों को कथित तौर पर भर्ती किया जाता है; यहाँ अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए कोई आरक्षण नहीं है, फिर भी इन संस्थानों की वैश्विक स्थिति क्या है? इस सच्चाई का विश्लेषण उनकी काबिलियत के घमंड को तोड़ देता है, क्योंकि  आज  ये संस्थान दुनिया की टॉप 100 की सूची में कहीं भी नहीं हैं।

देश में बड़े-बड़े पुल निर्माण के कुछ समय बाद में धराशाई क्यों हो गए ? पुल बनाने वाला वह ठेकेदार किस जाति का था? वहां काम करने वाले इंजीनियर किस जाति के थे ? मरीज के पेट में रोईं, कैंची छोड़ने वाले डॉक्टर किस जाति के थे? डोनेशन के बल पर डॉक्टर और इंजीनियर बनने वाले अधिकांश किस जाति के होते हैं? जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, वैसे लोग क्या बतला सकते हैं कि देश का गोपनीय सुरक्षा दस्तावेज बेचने वाले, राष्ट्रद्रोह जैसे अपराध करने वाले लोगों में कितने दलित समाज के लोग हैं ?

आरक्षण को लेकर लंबे समय से तानाकसियां भी चलती रहती हैं। अरे, ये दलित लोग… ये तो आरक्षण वाले हैं, ये तो कोटे वाले हैं, अरे ये तो सरकारी दामाद हैं…, इन्हें पढ़ने लिखने की क्या ज़रूरत ? आम तौर पर सवर्ण हिंदू दलितों-आदिवासियों के बारे में यही कहते पाये जाते हैं।

दूसरी तरफ़ दलित-आदिवासियों में भी सवर्ण हिंदुओं के बारे में ऐसी ही बातें चलती हैं। ‘अरे भाई, ये ब्राह्मण हैं…, ये ब्रह्मा के मुँह से निकले हैं…, ये बिना मेहनत के दूसरों की कमाई खाते है, ये परजीवी हैं, इन्हें धार्मिक आरक्षण मिला हुआ है, द्विजो पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, इत्यादि-इत्यादि। समाज में ये अविश्वास और नफ़रत अब बढ़ती जा रही है। अब सोशल मीडिया के आने के बाद इस नफ़रत को जैसे डबल इंजन की ताक़त मिल गई है। दुख और चिंता की बात ये है कि सवर्ण हिंदुओं और बहुजनों के तथाकथित सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन भी इसी नफ़रत के आधार पर अपने संगठन मज़बूत करते आये हैं। ऐसे में इनमें आपस में सृजनात्मक संवाद रुका हुआ है। अगर ये संवाद और अधिक समय तक रुका रहा तो ख़तरा कहीं ज़्यादा बढ़ जाएगा।

आज का दौर सूचना क्रांति का दौर है। आजकल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए फ़ेक न्यूज़ फैलाकर बड़े दंगे और असंतोष भड़काये जा सकते हैं। भारत जैसे बहुधार्मिक, बहुभाषिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में ये ख़तरा पश्चिमी समाज से ज़्यादा है। ऐसे में अगर सामाजिक आंदोलनों के बीच एक न्यूनतम स्तर का शिष्टाचार और संवाद नहीं है तो ये हर तरह के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के लिए घातक हो सकता है। आज का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ संवाद की जगह आरोप, और विवेक की जगह उन्माद लेता जा रहा है। हालिया घटनाओं और सोशल मीडिया पर फैल रहे लेखों–वीडियो ने समाज को “हम बनाम वे” की खाई में धकेल दिया है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।

आज  बाबासाहेब  आंबेडकर  को या तो देवता बनाया जा रहा है या खलनायक। जबकि उन्होंने संविधान के ज़रिये हर भारतीय को बराबरी का अधिकार दिया। उनकी लड़ाई किसी जाति के खिलाफ नहीं थी, बल्कि जाति-आधारित अन्याय के खिलाफ थी। सोशल मीडिया पर बाबासाहेब आंबेडकर  को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिलती हैं; एक पक्ष उन्हें खलनायक के तौर पर दिखाता है तो दूसरा उन्हें नायक मानता है, और यह बहस जारी है। इसे नफरत भरे नारों में बदल देना समाज को और तोड़ता है। अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो नुकसान किसी एक जाति का नहीं होगा — नुकसान भारत का होगा। क्या देश के जागरूक नागरिक इन मुद्दों पर विचार करेंगे और अपनी पहल को आगे बढ़ाएंगे?

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