पाकिस्तान और बौद्ध धर्म का रिश्ता बहुत पुराना है। भले आज पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन जिस भू-भाग में आज पाकिस्तान मौजूद है, वहां कभी गांधार सभ्यता बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र थी। जुलाई 2026 में पाकिस्तान सरकार ने “Gandhara – Cradle of Buddhism” रणनीति के लिए एक टास्क फोर्स बनाई है। इसका उद्देश्य गांधार विरासत के संरक्षण के साथ-साथ पाकिस्तान को बौद्ध विरासत पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनाना है।
इसके तहत पाकिस्तान ने ब्रिटिश म्यूजियम में रखी करीब 1800 साल पुरानी गांधारकालीन बौद्ध प्रतिमा को वापस लाने की पहल कर दी है। ब्रिटेन के द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पेशावर म्यूजियम ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गांधार कला की प्राचीन वस्तुओं की वापसी के लिए बातचीत शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इनमें हरिति और पंचिका की वह प्रतिमा भी शामिल है, जिसको गांधार बौद्ध परंपरा में संरक्षण और समृद्धि से जुड़े देव-युगल के रूप में देखा जाता है।
पेशावर म्यूजियम में इस प्रतिमा के लिए एक जगह इस उम्मीद से खाली रखी गई है कि एक दिन यह प्रतिमा वापस आएगी। म्यूजियम ब्रिटिश म्यूजियम से बुद्ध और बोधिसत्वों से जुड़ी दूसरी वस्तुओं की वापसी या दीर्घकालिक साझेदारी की संभावना भी तलाश रहा है। लेकिन सवाल है कि आखिर पाकिस्तान की धरती पर बौद्ध धर्म का इतना बड़ा इतिहास कैसे बना और फिर खत्म कैसे हो गया?
दरअसल पाकिस्तान के गांधार का क्षेत्र मुख्य रूप से आज के खैबर पख्तूनख्वा, पेशावर घाटी, स्वात, मर्दान, चारसद्दा और तक्षशिला के आसपास फैला हुआ था। मौर्य सम्राट अशोक के समय, यानी तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में, बौद्ध धर्म को इस क्षेत्र में खास राजकीय संरक्षण मिला। कुषाण काल में गांधार बौद्ध धर्म, शिक्षा और कला का एक बड़ा केंद्र बन गया। यहीं विकसित हुई गांधार कला, जिसमें भारतीय बौद्ध परंपरा के साथ यूनानी और रोमन कलात्मक प्रभाव भी दिखाई देते हैं। पाकिस्तान में तक्षशिला से पेशावर तक बौद्ध शिक्षा और कला रही है। तक्षशिला पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी तक बौद्ध शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। इस क्षेत्र में कई बौद्ध मठ, स्तूप और धार्मिक परिसर मिले हैं। इनमें धर्मराजिका स्तूप, जौलियन मठ और मोहरा मोराडू प्रमुख हैं।
इसके अलावा खैबर पख्तूनख्वा में तख्त-ए-बाही का बौद्ध मठ आज भी मौजूद है। UNESCO के मुताबिक इसकी स्थापना पहली शताब्दी ईस्वी के शुरुआती दौर में हुई थी और यह सातवीं शताब्दी तक इस्तेमाल होता रहा। इसे पाकिस्तान में बचे सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध मठों में माना जाता है। ऐसे में सवाल है की फिर बौद्ध धर्म कमजोर कैसे हुआ?
यहां इतिहास को बहुत सावधानी से समझना जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान में बौद्ध धर्म एक दिन में या किसी एक शासक ने खत्म कर दिया। बल्कि इसके पतन की प्रक्रिया कई सदियों तक चली। 8वीं शताब्दी से अरब सत्ता का विस्तार तथा 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच गजनवी और दूसरी तुर्क मुस्लिम शक्तियों की विजयों ने इस क्षेत्र की धार्मिक और राजनीतिक संरचना को और बदल दिया।
लगभग 11वीं–12वीं शताब्दी तक पंजाब और गांधार के बड़े हिस्सों में बौद्ध संस्थाएं कमजोर होकर समाप्त हो गईं। इतिहासकारों के बीच इसके कारणों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं हैं। वर्तमान में पाकिस्तान में बौद्ध धर्म के कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं। मसलन, तक्षशिला में धर्मराजिका स्तूप, जौलियन मठ, मोहरा मोराडू, कालावन, कुंआला स्तूप और मठ, गिरी परिसर, पिप्पला और भल्लार स्तूप आदि मौजूद है।
खैबर पख्तूनख्वा में— तख्त-ए-बाही, सहर-ए-बहलोल, जामलगढ़ी, भामाला, थरेली, रानीगट, स्वात घाटी के बुटकारा और सैदू क्षेत्र के बौद्ध अवशेष जैसे कई स्थल हैं।
पाकिस्तान के पर्यटन विभाग ने भी अपने Buddhist Heritage Trail यानी बौद्ध विरासत मार्ग में तक्षशिला, पेशावर, स्वात तथा गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रमुख बौद्ध विरासत क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया है। भामाला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहां दूसरी से पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच का बौद्ध परिसर मिला है और यहां बुद्ध के महापरिनिर्वाण की करीब 14 मीटर लंबी प्रतिमा भी मिली है। पाकिस्तान ने 2026 में इसे UNESCO की Tentative List में शामिल करने के लिए प्रस्तुत किया है।
ऐसे में यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है की पाकिस्तान अब अपने बौद्ध अतीत की ओर क्यों लौट रहा है? दरअसल यह खबर केवल एक मूर्ति की वापसी की मांग की खबर नहीं है। इसके पीछे पाकिस्तान की अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने लाने की कोशिश भी दिखाई देती है। इसलिए ब्रिटिश म्यूजियम से प्रतिमा वापस मांगने की खबर को इसी बड़ी कोशिश के हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है।
जिस जमीन से कभी गांधार कला ने बुद्ध के संदेश को मध्य एशिया और चीन तक पहुंचाया था, उसी जमीन पर आज पाकिस्तान अपने उस बौद्ध अतीत को फिर से दुनिया के सामने लाने की कोशिश कर रहा है। और अब सवाल सिर्फ एक 1800 साल पुरानी प्रतिमा का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या पाकिस्तान अपने उस इतिहास को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाकर दुनिया के सामने पेश कर पाएगा, जिसे सदियों के राजनीतिक और धार्मिक बदलावों ने लगभग भुला दिया था?

अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।

