17 सितंबर की तारीख दक्षिण भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास सहित बहुजन आंदोलन के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण है। इसी तारीख को साल 1879 को तमिलनाडु के इरोड में ई. वी. रामासामी का जन्म हुआ था। बाद में यही ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ के नाम से जाने गए। लेकिन सवाल यह है कि करीब डेढ़ सौ साल बाद भी पेरियार को याद करने की जरूरत क्यों पड़ती है?
क्यों एक ऐसे व्यक्ति की चर्चा आज भी होती है, जिसने धर्म, जाति, परंपरा, पितृसत्ता और सामाजिक असमानता पर इतने तीखे सवाल उठाए? और क्यों पेरियार को समझे बिना तमिलनाडु की आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक यात्रा को समझना मुश्किल है? साथ ही यह भी कि दक्षिण भारत का होते हुए भी पेरियार ने बाद के दिनों में पूरे बहुजन और अंबेडकरवादी आंदोलन को प्रभावित क्यों किया।
ई. वी. रामासामी एक सम्पन्न परिवार से आते थे। आगे चलकर उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक असमानता और जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया। उन्होंने यह सवाल मजबूती से उठाया कि— क्या किसी इंसान की सामाजिक हैसियत उसके जन्म से तय हो सकती है? क्या कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए श्रेष्ठ हो सकता है क्योंकि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है? और क्या किसी धार्मिक या सामाजिक परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि वह बहुत पुरानी है? पेरियार का जवाब था— नहीं। उनके लिए तर्क, आत्मसम्मान और समानता किसी भी परंपरा से ऊपर थे।
पेरियार के जीवन में 1904 की काशी यात्रा ने काफी कुछ बदल दिया। वाराणसी में उन्होंने जाति आधारित भेदभाव का अनुभव किया। वहां खिलाए जाने वाले निःशुल्क भोजन व्यवस्था में उन्होंने जाने की कोशिश की, लेकिन भूखे होने के बावजूद उन्हें इसलिए उस भोज में शामिल नहीं होने दिया गया, क्योंकि वह ब्राह्मण नहीं थे।
इस अनुभव ने उनके भीतर धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को लेकर सवालों को और गहरा किया। आगे चलकर उन्होंने धर्म, जाति और सामाजिक व्यवस्था को लगातार तर्क की कसौटी पर परखा और धार्मिक आस्था के बजाय तर्कवाद को महत्व दिया।
1919 में पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए। वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए और कांग्रेस के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जल्द ही उनका मुख्य सवाल सामने आया—
अगर अंग्रेज चले जाएं लेकिन भारतीय समाज के भीतर जातिगत असमानता बनी रहे, तो क्या इसे पूरी आजादी कहा जा सकता है? पेरियार का जोर था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व भी जरूरी है। यहीं से उनका कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद बढ़ता गया।
1925 के कांचीपुरम सम्मेलन में वह वंचितों के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ा सके। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और उसी वर्ष 1925 में ही Self-Respect Movement यानी आत्मसम्मान आंदोलन शुरू कर दिया। Self-Respect Movement पेरियार की राजनीति का केंद्रीय मंच बन गया। उन्होंने कहा कि किसी भी इंसान को अपने सम्मान के लिए किसी ऊंची जाति की स्वीकृति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
इस आंदोलन ने जाति के साथ-साथ महिलाओं की समानता, अंतरजातीय विवाह, विधवा विवाह और अंधविश्वास के विरोध जैसे मुद्दों को भी उठाया। पेरियार के लिए सामाजिक क्रांति का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं था। समाज की सोच बदलना भी उतना ही जरूरी था।
इस विद्रोह और आंदोलन की नींव 1924 में और मजबूत हो चुकी थी, जब पेरियार वायकोम सत्याग्रह में शामिल हुए। 1924 में त्रावणकोर के वायकोम में जाति के आधार पर दलित समाज के लोगों को मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी। इस भेदभाव के खिलाफ 30 मार्च 1924 को आंदोलन शुरू हुआ। कांग्रेस नेता टी. के. माधवन जो खुद एझवा, दलित जाति के थे, इसकी शुरुआत करने वाले प्रमुख नेताओं में थे। बाद में पेरियार भी वायकोम सत्याग्रह से जुड़े और आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल भी भेजा गया। इस आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण उन्हें “वायकोम वीरर” के नाम से जाना गया।
यह घटना हमें बताती है कि उस समय जाति व्यवस्था सिर्फ सामाजिक पहचान नहीं थी। जाति यह भी तय कर सकती थी कि आप किस रास्ते से चल सकते हैं। और यही वह सामाजिक व्यवस्था थी जिसे पेरियार चुनौती देना चाहते थे।
इसके बाद पेरियार आंदोलन के रास्ते पर तेजी से बढ़ते और चलते गए। पेरियार ने 2 मई 1925 को तमिल साप्ताहिक ‘कुडियारासु’ शुरू किया। इसका अर्थ था—गणराज्य। यह सिर्फ अखबार नहीं था। यह आत्मसम्मान आंदोलन के विचारों को जनता तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया। हैदराबाद विश्वविद्यालय की एक अकादमिक सामग्री भी बताती है कि ‘कुडियारासु’ ने गैर-ब्राह्मण समाज के लिए एक वैकल्पिक सार्वजनिक विमर्श तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यानी पेरियार ने सिर्फ भाषण नहीं दिए। उन्होंने विचारों के प्रसार के लिए अपना मीडिया भी खड़ा किया। यह बात आज के मीडिया और सामाजिक आंदोलनों में लगे लोगों के लिए जानना भी बेहद अहम है।
1932 में पेरियार सोवियत संघ गए। वहां उन्होंने समाजवाद और साम्यवादी व्यवस्था को करीब से देखा। रूस की यात्रा ने उनके सामाजिक और आर्थिक विचारों को प्रभावित किया, हालांकि उनके मूल आंदोलन का केंद्र हमेशा जाति-विरोध, आत्मसम्मान और सामाजिक समानता रहा। बाद के वर्षों में उनका आंदोलन और अधिक स्पष्ट रूप से तर्कवाद, नास्तिकता और सामाजिक समानता के सवालों से जुड़ गया।
कांग्रेस छोड़ने के बाद पेरियार को अपने आंदोलन को बढ़ाने के लिए एक राजनीतिक दल की जरूरत महसूस हो रही थी। तब तमिलनाडु की गैर-ब्राह्मण राजनीति में Justice Party पहले से सक्रिय थी। पेरियार उससे जुड़ गए और पार्टी के भीतर केंद्रीय भूमिका में आ गए। 1944 में उन्होंने Justice Party को द्रविड़र कड़गम का नाम देकर पुनर्गठित किया। इसके साथ ही पेरियार ने यह घोषणा कर दी थी कि ‘द्रविड़ों‘ ने भारत से अलग होकर अलग जाति-मुक्त द्रविड़स्तान गठित करने का निर्णय लिया है और इस नए देश का संबंध ब्रिटिश भारत की सरकार की बजाए सीधे इंग्लैंड की सरकार से होगा। हालांकि उनके इस विचार पर काफी आलोचना भी हुई।
बाद में इसी व्यापक द्रविड़ आंदोलन से अलग होकर DMK जैसी राजनीतिक शक्ति सामने आई और 1967 में तमिलनाडु में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर सत्ता में आई। तमिलनाडु की राजनीति में पेरियार का कद कभी कम नहीं हुआ और वह आज तक तामिलनाडु के सबसे अहम नेताओं में शुमार हैं।
पेरियार जब दक्षिण भारत में अपना आंदोलन बढ़ा रहे थे, तभी डॉ. आंबेडकर भी सक्रिय थे। पेरियार और डॉ. आंबेडकर के बीच मुलाकातें भी हुई। डॉ. आंबेडकर और पेरियार, दोनों, हिन्दू धर्म और वर्णव्यवस्था के विरोधी रहे। पेरियार से आंबेडकर की पहली मुलाकात सन् 1940 में हुई, जिसमें दोनों ने स्वतंत्र भारत में दलितों और शूद्र जातियों के राजनैतिक भविष्य पर चर्चा की। आंबेडकर की पेरियार से अगली मुलाकात तब हुई जब पेरियार द्रविड़र कषगम का गठन कर चुके थे । इसी तरह जब डॉ. आंबेडकर ने दलितों के लिए बौद्ध धर्म का विकल्प दिया तब पेरियार ने इसकी प्रशंसा की। सन 1950 के दशक में जब पेरियार की द्रविड़र कषगम ने ‘द्रविड़’ कृषकों के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित किया गया। हालांकि बीमार होने के कारण आंबेडकर सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले सके और उन्होंने अपनी ओर से पी.राजभोज को मद्रास भेजा।
अब आते हैं पेरियार के सबसे विवादित और चर्चित काम पर। पेरियार का मानना था कि धर्म, परंपरा और धार्मिक ग्रंथ भी तर्क और आलोचना से ऊपर नहीं हो सकते। इसी दृष्टिकोण को सामने रखते हुए उन्होंने रामायण की अपनी आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की। इसमें महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण की इस आधार पर कटु आलोचना की कि इसमें उत्तर भारत के आर्य जातियों को अत्यधिक महत्व दिया गया है और दक्षिण भारतीय द्रविड़ों को क्रूर, हिंसक, अत्याचारी जैसे विशेषण लगाकर न केवल अपमानित किया गया है बल्कि राम-रावण कलह को केन्द्र बनाकर राम की रावण पर विजय को दैवी शक्ति की आसुरी शक्ति पर, सत्य की असत्य पर और अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में गौरवान्वित किया गया है।
इसमें पेरियार ने रामायण की पारंपरिक व्याख्या को चुनौती दी और राम तथा रावण की कहानी को द्रविड़ बनाम आर्य सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष के अपने वैचारिक नजरिए से पढ़ा।
बाद में इसका अंग्रेजी संस्करण Ramayan: A True Reading के नाम से सामने आया और हिंदी में इसका अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इसके हिंदी संस्करण सच्ची रामायण के प्रकाशक ललई सिंह यादव थे। किताब के प्रकाशित होते ही भारी विवाद हो गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने पुस्तक की प्रतियां जब्त करने का आदेश दिया।
मामला पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट गया। 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने State of Uttar Pradesh vs. Lalai Singh Yadav मामले में सरकार की अपील खारिज कर दी।
अगर पेरियार के पूरे जीवन को एक लाइन में समझना हो तो उनकी लड़ाई “जन्म के आधार पर किसी इंसान को ऊंचा या नीचा मानने की व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की थी।” वह ब्राह्मणवादी विचारधारा के कटु आलोचक थे।
पेरियार के पूरे संघर्ष के केंद्र में जाति का अंत, आत्मसम्मान, समानता, तर्कवाद, महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल था। पेरियार को याद करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज भी भारत में जाति पर बहस खत्म नहीं हुई है। आज भी जन्म के आधार पर सामाजिक पहचान तय होती है। आज भी जाति और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर बहस होती है। आज भी धर्म और परंपरा को लेकर समाज में तीखे मतभेद हैं।
आज भी यह सवाल मौजूद है कि— क्या किसी परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि वह पुरानी है? या फिर उसे भी तर्क, समानता और मानवीय गरिमा की कसौटी पर परखा जाना चाहिए?
और शायद इसी वजह से, 17 सितंबर 2026 को उनकी 147वीं जयंती पर भी पेरियार सिर्फ इतिहास का विषय नहीं हैं। वे आज की बहस का हिस्सा हैं।

अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।

