नीतीश के करीबी ललन सिंह बने जद (यू) के नए अध्यक्ष

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जनता दल युनाइटेड के नए अध्यक्ष ललन सिंह होंगे। दिल्ली में पार्टी ऑफिस में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में यह फैसला लिया गया। इस बैठक में शामिल होने के लिए नीतीश कुमार पटना से दिल्ली पहुंचे थे। आरसीपी सिंह के केंद्र में मंत्री बनने के बाद ही अटकलें लगाई जा रही थी कि किसी और को यह पद मिलेगा। ललन सिंह नीतीश कुमार के सबसे करीबी नेताओं में शुमार हैं। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के सभी सांसद और कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल थे।

बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन पर हंगामा क्यों?

 बहुजन समाज पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले किये जा रहे प्रबुद्ध वर्ग संगोष्ठी यानी ब्राह्मण सम्मेलन को लेकर दलित-बहुजन समाज के एक तबके में काफी रोष है। सोशल मीडिया पर बसपा प्रमुख बहन मायावती को नसीहत देने वालों की भरमार लगी है। तमाम लोग यह बता रहे हैं कि ब्राह्मणों का सम्मेलन करने से बसपा को कोई फायदा नहीं होने वाला है और इससे बसपा के अपने आधार वोट बैंक का नुकसान होगा। बहुजन समाज के कुछ लोगों की यह चिंता समझ से परे है। दरअसल दलित-बहुजन समाज में ऐसे प्रतिक्रियावादी लोगों की भरमार हो गई है, जो बिना आगा-पीछा सोचे, बस फैसला सुनाने को बेचैन नजर आते हैं। और सोशल मीडिया ने उन्हें इसका हक दे ही दिया है।

लेकिन दलित-बहुजन समाज को यह सोचना होगा कि क्या इस तरह की प्रतिक्रिया जल्दबाजी में दी गई प्रतिक्रिया नहीं है? उन्हें यह समझना होगा कि जब भी चुनाव आते हैं या किसी राजनीतिक दल को जब भी किसी समाज को खुद से जोड़ना होता है, तो इस तरह की कवायद सभी करते हैं। यह कोई अनोखी घटना नहीं होती, बल्कि एक आम राजनैतिक प्रक्रिया होती है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुंभ के दौरान सफाईकर्मियों का पैर धोया, या जब अमित शाह किसी दलित के घर जाकर खाना खाते हुए नजर आते हैं तो क्या इसका मतलब यह मान लिया जाए कि दोनों दलित समाज के हितैषी हो गए हैं? क्या यह मान लिया जाए कि प्रधानमंत्री मोदी वाल्मीकि समाज की सभी समस्याओं को दूर कर देंगे या अमित शाह दलित समाज के अधिकारों के लिए सड़क पर उतर कर आंदोलन करेंगे?

वाल्मीकि समाज का पैर धोने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्या उसके बाद उस समाज की खबर ली। क्या उसके बाद कभी उन्होंने यह ऐलान किया कि वह ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे वाल्मीकि समाज के किसी व्यक्ति को सीवर में मौत का सामना न करना पड़े। बिल्कुल नहीं। क्योंकि इस तरह की घटनाएं महज प्रतीक भर होती हैं और इनके सहारे तमाम दल और राजनेता खुद को सिर्फ उदार दिखाने की कोशिश करते हैं। और इन प्रतीकों का इस्तेमाल कर वोट के लिए ढोल बजाते फिरते हैं। यह बात उस समाज के वोटर भी समझते हैं इसलिए जब मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोते हैं और अमित शाह और राहुल गांधी दलितों के घर खाना खाते हैं तो उनका सवर्ण समाज जाति और धर्म भ्रष्ट होने का रोना नहीं रोता।

ऐसे में बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन को लेकर दलित-बहुजन समाज के एक तबके के भीतर मच रहा हो-हल्ला कहीं न कहीं बेमानी है। दलित-बहुजनों को समझना होगा कि सत्ता में आने के लिए सभी राजनैतिक दलों को हर जाति, धर्म और वर्ग का वोट चाहिए होता है। हर राजनीतिक दल इसके लिए प्रयास करता है और एक राजनैतिक दल होने के कारण बसपा इससे परे नहीं है। हर राजनीतिक दल में एससी-एसटी सेल होता है, जिसकी कमान पार्टी के दलित-आदिवासी समाज के नेताओं के पास रहती है और इससेल का दायित्व अपने समाज के वोटों को पार्टी के लिए संगठित करना है। बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा भी ब्राह्मण चेहरे हैं, लंबे वक्त से बसपा से जुड़े हुए हैं और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। निश्चित तौर पर उनकी जिम्मेदारी ब्राह्मण समाज के वोटों को बसपा के खेमे में लाने की है।

अगर उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले बहुजन समाज पार्टी सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है तो इसको लेकर हंगामे की कोई जरूरत नहीं दिखती है।कोई भी राजनीतिक दल तेरह प्रतिशत ब्राह्मण वोटों की अनदेखी करने का जोखिम नहीं लेगी।बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से भाईचारा समितियां गठित करती रही है।जहां तक विचारधारा का सवाल है तोयहां दलित-बहुजन समाज को यह भी ध्यान देना होगा कि बसपा प्रमुख मायावती कभी भी हिन्दू धर्म के धार्मिक नेताओं के घरों और मठों के चक्कर नहीं लगाती हैं और अपनी विचारधारा पर कायम हैं। और क्या कोई भी यह दावे के साथ कह सकता है कि दलित समाज की सभी जातियां बसपा के समर्थन में खड़ी हैं, और अगर बसपा ब्राह्मण सम्मेलन नहीं करती तो सभी दलित और पिछड़े एकमुश्त होकर बसपा को जीताने के लिए एक हो जाते? संभवतः ऐसा दावा कोई भी नहीं कर सकता।

उत्तर प्रदेश का चुनाव देश का सबसे बड़ा चुनाव होता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरे भारत की राजनीतिक तस्वीर तय करती है। ऐसे में हर पार्टी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए पूरा दम लगा रही है। ऐसे में अगर बहुजन समाज पार्टी अपनी राजनीतिक बिसात नहीं बिछाएगी तो निश्चित तौर पर पीछे रह जाएगी। और ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण समाज बसपा के टिकट पर चुनाव नहीं जीतता है। विधानसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी अपने सर्वसमाज के फार्मूले पर चलते हुए हर जाति, धर्म और वर्ग को चुनावी मैदान में उतारती है। ब्राह्मण समाज भी इसमें से एक है। बसपा के टिकट पर 2007 में 41 ब्राह्मण विधायक जीत कर आए थे, आखिर इस तथ्य को कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता है। राजनीति संभावनाओं का खेल है और अगर बसपा 23 प्रतिशत दलित वोट और 13 प्रतिशत ब्राह्मण वोट को एक करने की संभावना के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी करने की राह तलाश रही है तो यह उसका हक है। और चुनावी नतीजों से पहले इस फैसले को गलत कह देना ज्यादती होग।

बहुजनों के आंदोलन के आगे झुकी मोदी सरकार, NEET में OBC आरक्षण लागू करने की घोषणा

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मेडिकल की इंट्रेंस परीक्षा NEET में आरक्षण की मांग कर रहे ओबीसी समाज को बड़ी कामयाबी मिली है। पिछड़ी जातियों के भारी विरोध और सोशल मीडिया पर चली मुहिम के बाद आखिरकार मोदी सरकार झुक गई है और पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का आदेश जारी कर दिया है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए भी दस प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा हुई है। इस आदेश के बाद पांच हजार से ज्यादा ओबीसी छात्र आरक्षण का लाभ लेकर हर साल डॉक्टर बन सकेंगे।

नए आदेश के मुताबिक अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल, डेंटल कोर्स (एमबीबीएस, एमडी, एमएस डिप्लोमा, बीडीएस, एमडीएस) के लिए ओबीसी को सत्ताईस प्रतिशत और ईडब्लयूएस कोटे वाले को दस फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसका फायदा ऑल इंडिया कोटा स्कीम (AIQ) के तहत मिलेगा। आरक्षण का यह लाभ अभ्यर्थियों को वर्तमान 2021-22 सत्र से मिलेगा। इस घोषणा के बाद हर साल ओबीसी समाज के 1500 छात्रों को MBBS में 2500 ओबीसी छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएशन में फायदा मिलेगा।सरकारी मेडिकल कॉलेजों की कुल सीटों में से अंडर ग्रेजुएट की पंद्रह प्रतिशत और पोस्ट ग्रेजुएट की पचास प्रतिशत सीटें ऑल इंडिया कोटा में आती है।

दरअसल सरकार को यह फैसला मजबूरी और दबाव में लेना पड़ा है। एनईईटी में ओबीसी को आरक्षण दिये जाने की मांग को लेकर ओबीसी समाज ने मोर्चा खोल दिया था। सोशल मीडिया पर पिछड़े समाज के तमाम चिंतकों और बुद्धिजीवियों ने मुहिम चला रखी थी। दलित समाज ने भी इस मुहिम को अपना समर्थन दिया था। बहुजनों की इस एकता से मोदी सरकार दलित-पिछड़ा विरोधी छवि और मजबूत होने लगी थी।ओबीसी समाज के लोग मोदी सरकार में शामिल अपने समाज के मंत्रियों के खिलाफ भी हमलावर थे। यही वजह रही कि एनडीए के अन्य पिछड़ा वर्ग के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटे में ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारो के लिए आरक्षम लागू करने की मांग की थी, जिसके बाद सरकार ने इसको हरी झंडी दे दी है।

हालांकि आज भले ही मोदी सरकार एनईईटी में पिछड़े वर्ग को आरक्षण देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन पिछले चार साल में 11 हजार ओबीसी की मेडिकल सीटों को आरक्षण नहीं होने की वजह से नुकसान हुआ है। माना जा रहा है कि अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाने के लिए तैयार थे, इसी वजह से मोदी सरकार को यह फैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।  

सीएम योगी के गोरखपुर में ब्राह्मण लड़की से शादी करने पर धोबी समाज के युवक की हत्या

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर यानी CM योगी आदित्यनाथ के शहर में अनीश नाम के दलित युवक की हत्या कर दी गयी। अनीश कुमार चौधरी की 24 जुलाई को हत्या कर दी गई थी। अनीश ADO पंचायत (पंचायत अधिकारी) पद पर तैनात थे। उन्होंने प्रेम विवाह किया था और उनकी पत्नी ब्राह्मण समाज से थी। लड़की का नाम दीप्ति मिश्रा है। इस हत्या के पीछे अंतरजातीय विवाह का आरोप लगाया जा रहा है। आरोप है कि इस विवाह से लड़की पक्ष के लोग काफी नाराज थे। आरोप यह भी है कि लड़की के परिवारवालों कुछ अधिकारियों के साथ  मिलीभगत कर इस हत्याकांड को अंजाम दिया है। अनीश की हत्या दिन-दहाड़े गड़ासे से काटकर दर्दनाक तरीके से कर दी गई। हत्याकांड गोरखपुर में होने से यह मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। अनीश की हया के मामले में 17 लोग अभियुक्त बनाए गए हैं, जिनमें से चार लोगों को स्थानीय पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। फरवरी माह में अनीश कनौजिया और दीप्ति मिश्रा ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि CM योगी आदित्यनाथ की पुलिस उन्हें परेशान कर रही है। इस दंपत्ति ने आरोप लगाया कि पुलिस फ़र्ज़ी मुकदमा लगाकर उन्हें परेशान कर रही है। साफ है कि एक पढ़े-लिखे युवक को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि वह दलित था और ब्राह्मण समाज की युवती से शादी कर ली थी।
हालांकि चिंता की बात यह है कि इतना जघन्य हत्याकांड होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ है। सरकार जहां चुप्पी साधे है तो वहीं सरकार के भीतर बैठे इस समाज के मंत्री भी बोलने से बच रहे हैं। जबकि योगी सरकार में धोबी समुदाय की एक मंत्री सहित ग्यारह विधायक इसी समाज के हैं। धोबी समाज के लोगों का कहना है कि अगर ये लोग आवाज नही उठाते है तो इन सभी नेताओं का खुलेआम बहिष्कार होना चाहिए। धोबी समुदाय को बीजेपी की ऐसी भागीदारी और प्रतिनिधित्व नही चाहिए। जो अपने समाज के लिए आवाज नही उठा पाए। धोबी समुदाय के संगठनों का आरोप है कि सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार में 2017 से अब तक धोबी समुदाय के लगभग 50 से ऊपर लोगो की हत्या कर दी गयी है। उन परिवारों को अभी तक न्याय नही मिला हौ। हत्यारें बाहर घूम रहे है। जितनी हत्याएं योगी सरकार में धोबी समुदाय की हो रही है आज तक अन्य पार्टी की सरकारो में नही हुई हैं।
धोबी समाज के संगठनों ने आवाह्न किया है कि ऐसी स्थिति में यूपी के धोबी समुदाय को चाहिए कि जो उत्तर प्रदेश में सैकड़ों धोबी समुदाय के संगठन बने हुए हैं जिनके सैकड़ों राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं, वे सभी लोग एक मंच पर आकर न्याय की आवाज उठाये। समाज के भीतर से ब्राह्मण समाज के बहिष्कार की भी मांग उठ रही है। समाज के संगठनों का कहना है कि धोबी समुदाय को एक निर्णय लेना पड़ेगा कि ब्राह्मणों को पूजा-पाठ, शादी विवाह, ग्रह प्रवेश, मुंडन आदि कार्यक्रम में बुलाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगाना होगा। पंडितो को दान- दक्षिणा देने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना पड़ेगा और मंदिरों में जाना और लाखों रुपया चढ़ावा देना बंद करना होगा। दूसरी ओर बीबीसी में प्रकाशित खबर के मुताबिक अनीश पत्नी दीप्ति मिश्र का कहना है कि- अनीश के परिजन इस शादी से खुश नहीं थे। अनीश और दीप्ति ने एक साथ पंडित दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की थी। कैंपस में हुई मुलाकातों के बीच अनीश और दीप्ति का चयन ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर हो गया। नौकरी लगने के बाद उनकी अनीश से पहली मुलाकात नौ फ़रवरी 2017 को गोरखपुर स्थित विकास भवन में हुई थी एक ही पद पर चयनित होने के बाद यूनिवर्सिटी कैंपस से शुरू हुआ मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ने लगा। साथ में प्रशिक्षण के दौरान दोनों और क़रीब आ गए।
अनीश और दीप्ति ने अपनी शादी को कोर्ट में रजिस्टर्ड करायाशादी के काग़ज़ात के मुताबिक दोनों ने 12 मई 2019 को गोरखपुर में शादी कर ली थी। उनकी शादी को अदालत ने 9 दिसंबर 2019 को मान्यता दे दी थी। दीप्ति गोरखपुर ज़िले के गगहां थाना क्षेत्र के देवकली धर्मसेन गांव निवासी नलिन कुमार मिश्र की बेटी हैं। दीप्ति चार भाईबहनों में सबसे छोटी हैंउनकी दो बहनों और एक भाई की भी शादी हो चुकी है। उनका भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में हैइस समय उनकी तैनाती श्रावस्ती ज़िले में है। क्या इतने बड़े परिवार में किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया, इस सवाल के जवाब में दीप्ति कहती हैं किनहीं, उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने उनका साथ नहीं दिया। बीबीसी की खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिए।

बसपा में जाएंगे डॉ. आर.एस. प्रवीण!

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26 सालों तक एक आईपीएस अधिकारी के रूप में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना राज्य को अपनी सेवाएं देने के बाद डॉ. आर.एस प्रवीण कुमार अब राजनीति में आ रहे हैं। हमें जो खबर मिली है, उसके मुताबिक अंबेडकरवादी आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण कुमार बहुजन समाज पार्टी ज्वाइन करने जा रहे हैं। सूचना यह भी है कि वह तेलंगाना में बसपा को सत्ता में लाने के लिए काम शुरू करेंगे। खबर यह भी मिली है कि बसपा प्रमुख बहन मायावती उन्हें तेलंगाना में बड़ी जिम्मेदारी दे सकती हैं। इसकी आधिकारिक घोषणा अगस्त महीने में होने की उम्मीद है।

आर. एस. प्रवीण हाल ही में बहनजी से मुलाकात कर चुके हैं। इस मुलाकात के बाद ही उन्होंने अपने पद से वोलेंटरी रिटायरमेंट का फैसला किया है। 19 जुलाई को उन्होंने इसके संबंध में ट्विटर पर रिटायरमेंट को लेकर सूचना दी थी। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि वह सामाजिक न्याय और समानता के लिए काम करेंगे, जोकि उनका जुनून है।

डॉ. प्रवीण 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और फिलहाल एडीजीपी के पद पर थे। एक आईपीएस अधिकारी रहने के बावजूद वह लगातार समाज के कमजोर वर्ग की शिक्षा और बेहतरी के लिए सोचते और काम करते रहें। उन्होंने नौकरी में रहते हुए अमेरिका के हार्वर्ड युनिवर्सिटी में कुछ समय तक पढ़ाई की, जहां से लौटने के बाद साल 2012 में उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री से अनुरोध कर तेलंगाना सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सचिव का पद संभाला, जहां समाज के हाशिये पर पड़े दलित-आदिवासी समाज के बच्चे अपनी जिंदगी बेहतर करने पहुंचते हैं। हालांकि जब आर.एस प्रवीण ने सचिव का पद संभाला तो रेजिडेंशियल स्कूल की हालत खराब थी, लेकिन उन्होंने जल्दी ही इस रेजिडेंशियल स्कूल का नक्शा बदल दिया और सफलता की गाथा लिख दी। यह आर.एस. प्रवीण की मेहनत और दूरदर्शिता का ही नतीजा रहा कि रेजिडेंशियल स्कूल की सफलता को समझने के लिए हार्वर्ड युनिवर्सिटी में शोध हुआ।

आर.एस. प्रवीण की प्रेरणा से ही रेजिडेंशियल स्कूल की आदिवासी समाज की छात्रा पूर्णा मलवथ ने २५ मई २०१४ को सबसे कम उम्र में एवरेस्ट पर पहुंचने वाली लड़की होने का वर्ल्ड रिकार्ड बनाया। तो पूर्णा के साथ दलित समाज के आनंद ने भी एवरेस्ट फतह किया, जहां उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की तस्वीर हाथों में लेकर उन्हें याद किया। आनंद संभवतः पहले दलित हैं, जिन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई सफलता पूर्वक की थी। जाने-माने अभिनेता राहुल बोस ने पूर्णा की सफलता पर एक फिल्म पूर्णा बनाई थी, जिसमें आर.एस. प्रवीण के काम को दिखाया गया है। इस फिल्म में आर.एस. प्रवीण का किरदार खुद राहुल बोस ने निभाया था।

जहां तमाम अधिकारी बड़े पद पर जाने के बाद मिशन-मूवमेंट को भूल जाते हैं, डॉ. आर.एस प्रवीण हमेशा समाज को जगाने में लगे रहें। पिछले आठ साल से उनके मार्गदर्शन में तेलंगाना में भीम दीक्षा कार्यक्रम भी चल रहा है, जो हर साल मान्यवर कांशीराम की जयंती 15 मार्च से लेकर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल तक चलती है। इस दौरान बहुजन नायकों की शिक्षाओं के बारे में चर्चा होती है।

अंबेडकरी-फुले मूवमेंट के सिपाही डॉ. आर. एस प्रवीण कुमार मान्यवर कांशीराम से काफी प्रभावित हैं। जहां तक तेलंगाना में उनके सियासत में उतरने की खबर है तो निश्चित तौर पर यह बड़ी खबर है। तेलंगाना में दलित समाज की आबादी 18 प्रतिशत है जोकि एक बड़ा समाज है। यही वजह है कि उनको लुभाने के लिए मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने पिछले दिनों तमाम घोषणाएं की। प्रदेश में 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में निश्चित तौर पर आर.एस प्रवीण कुमार द्वारा बसपा में आने की खबर से प्रदेश में पार्टी को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। इसकी एक वजह यह भी है कि सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सचिव के रूप में उन्होंने जिस तरह से प्रदेश के हाशिये के समाज के लाखों बच्चों की जिंदगी बदल दी और उन्हें ऊंचा उड़ाने का सपना दिखाया, वो बड़ा समाज हमेशा डॉ. आर.एस प्रवीण के साथ खड़ा रहा है। निश्चित तौर पर यह बड़ा समूह आर.एस. प्रवीण के साथ बसपा के पाले में आ सकता है।

बसवराज बोम्मई ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया

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कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में बसवराज बोम्मई ने शपथ ले लिया है। इसके साथ ही कर्नाटक की सियासत में येदियुरप्पा युग समाप्त हो गया है और अब बसवराज का शासन शुरू हो गया है। सुबह जब बसवराज बोम्मई मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने राजभवन पहुंचे तो उनके साथ बी.एस. येदियुरप्पा भी थे।नए मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के करीबी हैं और लिंगायत समुदाय से ही आते हैं। शपथ ग्रहण के बाद बोम्मई ने कहा कि वह राज्य में गरीबों के कल्याण करने की बात कही।गौरतलब है कि इससे पहले पार्टी और येदियुरप्पा के बीच हफ्ते भर की खिंचतान के बाद येदियुरप्पा ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया था।

Image- ANI

यूपी में सबका खेल बिगाड़ सकता है यह गठबंधन

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 उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए हर राजनीतिक दल सियासी समीकरण साधने में जुट गया हैं। भाजपा ने जहां दलितों-पिछड़ों को केंद्र में सरकार में शामिल कर अपनी चाल चल दी है तो बसपा ने ब्राह्मण सम्मेलन शुरू कर दिया है। इन दोनों पार्टियों को टक्कर देने के लिए उत्तर प्रदेश में एक तीसरा सियासी गठबंधन भी तैयार है, जिसमें समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी शामिल हैं। इन दोनों युवा नेताओं के बीच रविवार 25 जुलाई को दिल्ली में बैठक हुई, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण पर चर्चा हुई है।

दरअसल पहली बार बिना अपने पिता अजीत चौधरी के चुनाव मैदान में उतरने जा रहे जयंत चौधरी पश्चिमी यूपी में जाट और मुस्लिम सहित अन्य जातियों को जोड़कर नई सोशल इंजीनियरिंग खड़ी करने की कवायद में जुट गए हैं। जाट-मुस्लिम एकता के लिए राष्ट्रीय लोकदल 27 जुलाई से भाईचारा सम्मेलन शुरू करने जा रही है। इसका आगाज, पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर के खतौली से किया जा रहा है।

 उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय की आबादी करीब 4 प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी यूपी में यह 17 फीसदी के करीब हैं। वहीं 20 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले यूपी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों पर मुस्लिम समाज की आबादी 35 से 50 फीसदी तक है। जाट और मुस्लिम वोटों की बात करें तो यह दोनों समुदाय मिलकर सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, अमरोहा, मुजफ्फरनगर, बागपत और अलीगढ़ एवं मुरादाबाद मंडल सहित विधानसभा की लगभग 100 सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। इसी समीकरण के सहारे आरएलडी खासतौर पर पश्चिमी यूपी में हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहती है। हालांकि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद कमजोर हुई है। जाट जहां भाजपा में चला गया तो मुस्लिम समाज अलग-अलग मौके पर बसपा और समाजवादी पार्टी के साथ जाता रहा।

इसके कारण अजीत चौधरी और जयंत चौधरी को भी 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। अपने पिता की मुत्यु के बाद जयंत चौधरी फिलहाल अखिलेश यादव के साथ मिलकर अपने भविष्य को बेहतर बनाने में जुटे हैं। जयंत चौधरी और अखिलेश यादव को उम्मीद है कि सपा और रालोद मिलकर जाट और मुस्लिम वोटों को फिर से एक साथ ले आएंगे। अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर यह दोनों दल यूपी की सियासत में बाकी दलों का खेल बिगाड़ सकते हैं।

किसानों के समर्थन में ट्रैक्टर से संसद पहुंचे राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को देश भर के लोगों को चौंका दिया। खासकर उन लोगों को जो संसद भवन के आस-पास मौजूद थे। दरअसल राहुल गांधी सोमवार को ट्रैक्टर से संसद भवन पहुंचे। ऐसा कर राहुल गांधी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे किसानों को अपना समर्थन दिया। किसानों ने जंतर-मंतर पर किसान संसद लगा रखा है, जो पूरे मानसून सत्र तक चलेगा। किसान सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों को हटाने की मांग को लेकर पिछले सात महीने से आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर किसानों के समर्थन में संसद में लगातार हंगामा जारी है। कांग्रेस इस पूरे आंदोलन में किसानों के साथ खड़ी है और कृषि कानूनों को वापस लेने की किसानों की मांग का समर्थन कर रही है।

इस दौरान राहुल गांधी के साथ रणदीप सुरजेवाला, दीपेंद्र हुड्डा और बीवी श्रीनिवास सहित कई कांग्रेसी नेता ट्रैक्टर पर राहुल गांधी के साथ दिखें। हुड्डा और सुरजेवाला को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया इस दौरान राहुल गांधी ने कहा कि किसानों की आवाज नहीं सुनी जा रही है। उन्होंने तीनों कानूनों को काला कानून बताते हुए कहा कि सरकार को इन कानूनों को वापस लेना होगा।

बीहड़ से संसद तक फूलन देवी की पूरी कहानी

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 फूलन देवी की हत्या 25 जुलाई 2001 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के बाहर कर दी गई थी। फूलन देवी एक ऐसी नायिका थीं, जिन्होंने अत्याचार के खिलाफ चुप रहने की बजाय लड़ने का रास्ता चुना। जिन्होंने अपने अपराधियों को अपने हाथों से खुद सजा दी। जो अपनी हिम्मत के बूते बीहड़ से संसद तक पहुंची। ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास ने फूलन देवी का सबसे पहली बार इंटरव्यू लेने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय का इंटरव्यू लिया है। जिन्होंने फूलन देवी की सारी कहानी बताई। एक ऐसी कहानी, जिसने फूलन से जुड़ी कई नई बातों पर प्रकाश डाला है। इस इंटरव्यू को देखने के बाद आप ऐसी फूलन को जान पाएंगे, जो उनके बारे में प्रचारित तमाम अफवाहों को नकारती हुई, असली फूलन देवी को सामने लाती है। 2018 में लिए गए इस इंटरव्यू को अब तक 10 लाख से ज्यादा दर्शक देख चुके हैं। तो जानिए, फूलन की पूरी कहानी। आप भी देखिए-

फूलन देवी की विरासत लेकर संजय निषाद और मुकेश सहनी में छिड़ी जंग

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 25 जुलाई को फूलन देवी की पुण्यतिथि के ठीक पहले उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर जंग छिड़ गई है। इस जंग में एक ओर हैं बिहार के वीआईपी पार्टी के मुकेश सहनी तो दूसरी ओर हैं यूपी की निषाद पार्टी के संजय निषाद। दरअसल विकासशील इंसान पार्टी यानी वीआईपी के नेता मुकेश सहनी, उत्तर प्रदेश के 18 शहरों में फूलन देवी की पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा लगाकर अपनी पार्टी को यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में लॉंच करना चाहते थए। लेकिन सहनी की इस कोशिश को योगी आदित्यनाथ सरकार ने तगड़ा झटका दे दिया है।

 25 जुलाई को फूलनदेवी की पुण्यतिथि को देखते हुए मुकेश सहनी ने पटना से ये प्रतिमाएं भेजी थी, जो यूपी के जिलों में लगना था। इन प्रतिमाओं को वाराणसी और मिर्जापुर में जब्त कर लिया गया है। वाराणसी के पुलिस कमिश्नर ने मुकेश सहनी को पत्र लिखकर कहा है कि उनकी पार्टी को ऐसे कार्यक्रम की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2008 से ही धार्मिक या राजनीतिक व्यक्ति की प्रतिमा सरकारी या निजी जमीन पर भी लगाने के लिए उच्चस्तरीय इजाजत चाहिए। इसे कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन भी बताया जा रहा है।

जबकि वीआईपी पार्टी का कहना है कि वाराणसी एसडीएम ने कोविड 19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए इस कार्यक्रम की इजाजत दे दी थी। राज्य के मुख्य सचिव को भी इन कार्यक्रमों की विस्तृत सूचना भेजी गई थी।

ऊपर से जो भी कहा जा रहा हो, यहां असल पेंच संजय निषाद का है। वीआईपी के मुखिया मुकेश सहनी यूपी में भी अपनी पार्टी का विस्तार उन क्षेत्रों में करना चाहते थे, जहां निषाद समाज का वोट बैंक है। इसके लिए उन्होंने फूलन देवी की जयंती का दिन चुना। मुकेश सहनी को लगा था कि बिहार सरकार में भाजपा के साथ शामिल होने के कारण भाजपा की ओर से उन्हें मदद मिलेगी, लेकिन यूपी में भाजपा के साथ खड़े निषाद पार्टी के संजय निषाद को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने मुख्यमंत्री मोदी के साथ मिलकर खेल कर दिया। दरअसल यूपी की राजनीति में निषाद पार्टी के डॉक्टर संजय निषाद की बीजेपी से नाराजगी और खुले तौर पर डिप्टी सीएम पद की मांग के बाद मुकेश सहनी के यूपी चुनाव लड़ने के ऐलान से लगा था कि भाजपा ने संजय निषाद का विकल्प तैयार रखा है। संजय निषाद को जैसे ही मुकेश सहनी के यूपी में आने की भनक लगी, वो चुपचाप भाजपा के पीछे जा खड़े हुए। बदले में भाजपा ने मुकेश सहनी के यूपी में आने को लेकर रोड़ा अटका दिया है।

हालांकि मुकेश सहनी अब भी प्रतिमा स्थापित करने पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि प्रतिमा स्थापित करने से हमें कोई डिगा नहीं सकता। हम राज्य के नियमों का पालन करते हुए ऐसा करेंगे। यूपी चुनाव में निषाद वोट को देखते हुए मुकेश सहनी ने कहा था कि वीआईपी यूपी के 18 मंडलों में फूलन देवी की 18 फीट ऊंची प्रतिमा लगाएगी। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मल्लाह यानी निषाद और अन्य उपजातियों के 14 परसेंट वोट हैं। यूपी में संजय निषाद इनके एक नेता हैं जो निषाद पार्टी के अध्यक्ष हैं और इस समय बीजेपी के साथ हैं।

सुपरस्टार सूर्या की नई फिल्म होगी ‘जयभीम’, फिल्म का पोस्टर रिलिज

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दक्षिण भारत के सुपरस्टार सूर्या शिवकुमार ने अपने 46वें जन्मदिन पर सुपरस्टार सूर्या ने एक बड़ा धमाका किया है। उन्होंने अपने फैंस को स्पेशल गिफ्ट देते हुए अपनी अगली फिल्म का लुक साझा किया है। फिल्म का नाम है, जय भीम। सूर्या इस फिल्म में एक वकील के किरदार में नजर आने वाले हैं, जो आदिवासी समाज के हक के लिए लड़ते नजर आएंगे। सूर्या ने फिल्म जय भीम का फर्स्ट लुक पोस्टर सोशल मीडिया पर शेयर किया है। उन्होंने पोस्टर शेयर करते हुए लिखा- जय भीम का फर्स्ट लुक शेयर करके बहुत एक्साइटिड हूं। पोस्टर में सूर्या इंटेंस लुक में नजर आ रहे हैं। उन्होंने ब्लैक कोट पहना हुआ है। जय भीम में सूर्या के साथ प्रकाश राज और राजिशा विजयन अहम भूमिका निभाते नजर आने वाले हैं। सूर्या इस फिल्म में एक्टिंग करने के साथ इसे प्रोड्यूस भी करने वाले हैं। यह फिल्म उनके प्रोडक्शन हाउस 2d एंटरटेनमेंट के तले बन रही है।

यह उनकी 39वी फिल्म है, जिसे टीएस गनानवेल ने डायरेक्ट किया है और लिखा है। जय भीम की शूटिंग चेन्नई में कोरोना की दूसरी लहर से पहले शुरू हो गई थी। मगर महामारी के चलते इसे रोक दिया गया था। ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े होने वाले और  NEET में आरक्षण के मामले में खुलकर ओबीसी समाज का पक्ष लेने वाले तमिल फिल्म स्टार सूर्या शिवकुमार पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं। चर्चा की वजह उनका लगातार ब्राह्मणवाद के खिलाफ होने और वंचित-शोषित तबके के साथ खड़ा होना रहा है। इसको लेकर वह भाजपा के निशाने पर भी रहे थे।

 सूर्या ने इंडस्ट्री में अपनी पहचान अपने टैलेंट के दम पर बनाई है। सूर्या कई सालों से इंडस्ट्री में हैं और उनकी हर फिल्म हिट साबित होती है। सूर्या टॉलीवुड के स्टार होने के साथ प्रोड्यूसर भी हैं और टीवी प्रिसेंटर भी हैं। उन्होंने साल 1997 में फिल्म नेरुक्कु नेर से अपने करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद से वह कई फिल्मों में नजर आ चुके हैं। सूर्या की फिल्मों की नकल कर आमिर खान से लेकर अजय देवगन तक हिट फिल्में दे चुके हैं। आमिर खान की गजनी और अजय देवगण की सिंघम इनकी ही फिल्मों की हू-ब-हू रिमेक है।

किसान आंदोलन को धार देने जंतर-मंतर रवाना हुए किसान, किसान संसद शुरू

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सरकार से दो-दो हाथ करने को किसानों जंतर मंतर कूच कर रहे हैं। दिल्‍ली की सीमाओं पर कई महीनों से डटे आंदोलनकारी किसान अपने प्रदर्शन को और धार देने वाले हैं। संयुक्‍त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्‍व में किसानों का एक जत्‍था जंतर मंतर की ओर कूच कर चुका है। दिल्‍ली पुलिस ने यहां पर उन्‍हें प्रदर्शन की इजाजत दी है। जंतर मंतर पर ‘किसान संसद’ लगेगी जिसमें भारतीय किसान यून‍ियन के नेता राकेश टिकैत भी शामिल होंगे। सिंघु बॉर्डर से 200 किसानों का जत्‍था बसों के जरिए जंतर मंतर पर किसान संसद लगाएगा। सुबह 11 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक प्रदर्शन चलेगा।

दूसरी ओर संसद के भीतर किसानों के साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी है। कांग्रेस सांसदों ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ संसद परिसर में प्रदर्शन किया। पार्टी के पूर्व अध्‍यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी ने इस प्रदर्शन का नेतृत्‍व क‍िया। इस बीच राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने हम किसानों के मुद्दों को सदन में उठा रहे हैं। किसान हमारी रीढ़ की हड्डी है। किसानों के बिना हम जी नहीं सकते। उस आवाज को उठाना जरूरी है और हम उठाएंगे।

बेशर्मी भरा है सरकार का यह बयान कि ऑक्सीजन की कमी से देश में कोई नहीं मरा

एक चौंकाने वाला और बेशर्मी भरा बयान केंद्र सरकार की ओर से आया है, जिसमें कहा गया है कि कोविड के कोहराम के दौरान देश में किसी की भी मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई। थोड़ा पीछे चलिए, मार्च के आखिरी हफ्ते से जून के आखिरी हफ्ते तक के उस तीन महीने के दौर को याद करिए….., जब गंगा में लाशे तैर रही थीं……., जब श्मशान भी रो रहा था। जब लोग अस्पतालों के बाहर अपने नाते-रिश्तेदारों की जान बचाने की गुहार लगा रहे थे। उस तस्वीर को याद करिए जब ऑटो में बैठी एक महिला अपने पति की जान बचाने के लिए उसके मुंह में मुंह लगाकर उसे ऑक्सीजन देने की नाकाम कोशिश करती दिखी थी। जब लोग ऑक्सीजन सिलेंडर की चाहत में एक जिले से दूसरे जिले, यहां तक की एक राज्य से दूसरे राज्य का चक्कर काट रहे थे। और ऑक्सीजन नहीं मिल सकने के कारण उनके परिजन दम तोड़ रहे थे। लेकिन मोदी जी की यह सरकार देश की संसद में दिन दहाड़े यह झूठा बयान दे रही है कि देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा।
हालांकि यह सरकार तो आए दिन झूठ बोलने के कारण एक्सपोज भी हो चुकी है। लेकिन इस बार का झूठ सिर्फ झूठ नहीं, बल्कि अपराध है। क्योंकि यह झूठ देश की संसद में बोला गया। केंद्र सरकार की तरफ से मंगलवार को कहा गया है कि कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई है। फिलहाल संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है और इस दौरान सदन में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार से पूछा था कि क्या यह सच है कि Covid-19 की दूसरी लहर में कई सारे कोरोना मरीज सड़क पर और अस्पताल में इसलिए मर गए क्योंकि ऑक्सीजन की किल्लत थी? इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री भारती प्रवीण पवार द्वारा दिये गए लिखित उत्तर में बताया कि ‘स्वास्थ्य राज्य का विषय है और किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि किसी की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई है।’ आप देश की जनता हैं, आप खुद से पूछिए कि क्या आपका कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई सगा ऑक्सीजन की आस में आखिरी सांस लेने को मजबूर नहीं हुआ? और भीतर से जो जवाब आए उसे मानिए, क्योंकि हमारे देश की सरकार को झूठ बोलने की आदत सी हो गई है। यह झूठ तब बोला जा रहा है जब इसी सरकार का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की डिमांड काफी बढ़ गई थी। महामारी की पहली लहर के दौरान ऑक्सीजन की मांग 3095 मीट्रिक टन थी जो दूसरी लहर के दौरान बढ़ कर करीब 9000 मीट्रिक टन हो गई। ……… और आश्चर्य तो यह है कि केंद्र से अपने सुर में सुर मिलाते हुए तामिलनाडु, बिहार और मध्यप्रदेश राज्य ने भी दावा किया है कि उनके प्रदेश में ऑक्सीजन की किल्लत से कोई मौत नहीं हुई।
जब भारत की संसद में कोरोना को लेकर झूठे आंकड़े दिए जा रहे थे, उसी मंगलवार के दिन वाशिंगटन के अध्ययन संस्थान सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट की ओर से जारी रिपोर्ट में कोरोना से 34 से 49 लाख लोगों के मरने का दावा किया गया। इस रिपोर्ट को अभिषेक आनंद, जस्टिस सैंडफर और चार सालों तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यन भी शामिल हैं। अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबित इस दावे के पीछे सरकारी आंकड़ों, अंतरराष्ट्रीय अनुमानों, सेरोलॉजिकल रिपोर्टों और घरों में हुए सर्वे को आधार बनाया गया है। अमेरिकी अध्ययन में कहा गया है कि भारत में जनवरी 2020 से जून 2021 के बीच कोविड-19 से लगभग 50 लाख (4.9 मिलियन) लोगों की मृत्यु हुई है। अमेरिकी अध्ययन में इन मौतों को विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से देश की सबसे बड़ी मानव त्रासदी बताई गई है। यह आंकड़ा भारत सरकार के आंकड़ों से 10 गुना से भी ज्यादा है। क्योंकि वर्ल्डोमीटर के मुताबिक, भारत में कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या तीन करोड़ 12 लाख से ज्यादा है जबकि संक्रमण से अब तक चार लाख 18 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, ऐसा बताया जा रहा है।
इस बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार जहां ऑक्सीजन की कमी से मौतों को नकार रही है, वहीं वह टीकाकरण की कमी को भी नकार रही है। जबकि आज भी देश में सिर्फ सात फीसदी से कम आबादी का ही पूरी तरह टीकाकरण हो पाया है। लोग अस्पतालों का चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें कोविड वैक्सीन नसीब नहीं हो रहा है। भारत के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगस्त में तीसरी लहर सामने आ सकती है। उससे ठीक पहले सरकार का इतना बड़ा झूठ देश की आम जनता के गले से कैसे उतर पाएगा। क्या झूठ बोलने वाली इस सरकार पर ही मुकदमा नहीं चलना चाहिए।

बिहार राजभाषा विभाग की घोषणा, सुशीला टाकभौरे को बी.पी. मंडल अवार्ड

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 बिहार सरकार मंत्रिमंडल सचिवालय के राजभाषा विभाग ने विभिन्न श्रेणी के पुरस्कारों के लिए नामों का चयन कर लिया है। इस बार पुरस्कारों के लिए 15 श्रेणी के लिए नामों का चयन किया गया है। सभी श्रेणी के लिए पुरस्कार की राशि 50 हजार से तीन लाख रुपये तक है। इसके तहत दलित साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे को बी.पी. मंडल अवार्ड मिला है। जबकि डॉ. अशोक कुमार को बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर पुरस्कार देने की घोषणा हुई है।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे को बिहार राजभाषा विभाग की ओर से बी.पी. मंडल पुरस्कार के तहत दो लाख रुपये का पुरस्कार मिलेगा। सुशीला टाकभौरे का जन्म दिनांक 4 मार्च 1954 को मध्यप्रदेश के जिला होशंगाबाद में बनापुरा गाँव में हुआ था। सुशीला जी हिंदी दलित साहित्य की अग्रणी महिला साहित्यकारों में से एक है। उनके जीवन के अनुभव, एक दलित और स्त्री होने के नाते उनके जीवन का संघर्ष उनकी रचनाओं में भली-भांति परिलक्षित होती हैं। एक कहानीकार तथा एक कवियत्री के रूप में उन्होंने अपनी अलग छाप स्थापित की है। वे ‘वाल्मीकि’ समाज से आती हैं। सुशीला जी का रचना संसार उद्द्येश्यपरक है। उनकी रचनाओं के केंद्र में नारी अथवा दलित अवश्य रहते हैं। उनकी रचनाएँ समाज में समानता एवं उच्च आदर्शों की वकालत करती हैं। उनके उपन्यास ‘नीला आकाश’, ‘वह लड़की‘ और ‘तुम्हें बदलन ही होगा’ अम्बेडकरवादी विचार धारा से ओत-प्रोत हैं जिसमें दलित उद्धार, सामाजिक समरसता तथा जातिगत व्यवस्था के उन्मूलन की वकालत की गयी है। सुशीला जी की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुयी। इसके माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष और कटु अनुभवों को साझा किया है। उनकी कई रचनाओं को विभिन्न विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

डॉ. सुशीला टाकभौरे के बारे में और उनकी लिखी गई किताबों के बारे में जानने के लिए इस लिंक को देखिए

प्रधानमंत्री मोदी पर ट्वीट करने के कारण आजतक ने अपने पत्रकार को निकाला

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 अपने आप को सबसे तेज और क्रांतिकारी बताने वाले चैनल ‘आज तक’ पर उसके एक पत्रकार ने आरोप लगाया है कि चैनल ने उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ट्वीट करने के कारण नौकरी से निकाल दिया है। पत्रकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर दो ट्वीट लिखा था, जिसके बाद उन्हें जाने को कह दिया गया। पत्रकार ने यह ट्विट 17 जुलाई को लिखा था और 19 जुलाई को आज तक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। पत्रकार का नाम श्याम मीरा सिंह है। लोकतंत्र के जिस चौथे खंभे पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी थी, उसने महज सवाल पूछने भर से अपने पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया है। इससे समझा जा सकता है कि भारत का मीडिया आज कितना कमजोर हो चुका है। इस पूरे घटनाक्रम को पत्रकार ने सोशल मीडिया पर साझा किया है। अपने फेसबुक पोस्ट में उन्होंने जो लिखा है, उसे यहां हम नीचे दे रहे हैं-

“आज से आजतक के साथ पत्रकारिता का मेरा सफर खत्म हुआ। प्रधानमंत्री मोदी पर लिखे मेरे दो ट्वीट की वजह से मुझे आजतक से निकाल दिया गया है। मुझे इस बात का दुःख नहीं है, इसलिए आप भी दुःख न करें। जिन दो ट्वीट का हवाला देते हुए मुझे निकाला गया है, वे ये दो ट्वीट हैं-

1.Who says Respect the Prime Minister. They should first ask Modi to respect the post of Prime Minister post. (हिंदी अनुवाद- जो कहते हैं कि प्रधानमंत्री का सम्मान करो, उन्हें सबसे पहले मोदी से कहना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री पद का सम्मान करें)

2.यहाँ ट्विटर पर कुछ लिखता हूँ तो कुछ लोग मेरी कंपनी को टैग करने लगते हैं. कहते हैं इसे हटाओ, इसे हटाते क्यों नहीं… मैं अगला ट्वीट और अधिक दम लगाकर लिखता हूँ. पर इसे लिखने से पीछे नहीं हटूँगा कि ”Modi is a shameless Prime Minister.”

ये दो बातें हैं जिनपर मुझे निकाला गया या निकलवाया गया। सात महीने पहले जब मैंने आजतक JOIN किया, तब भी मुझे इस बात का भान था कि मुझे क्या लिखना है, किन लोगों के लिए बोलना है। तब ही से सत्ताधारी दल के समर्थकों द्वारा कंपनी को टैग कर-कर के लिखा जाने लगा था कि ‘इस आदमी (मुझे) को आजतक से निकाला जाए, क्योंकि ये मोदी विरोध में लिखता है। बीते कुछ दिनों से भी कंपनी पर सोशल मीडिया के माध्यम से एक वर्ग के द्वारा ये दवाब बनाया जा रहा था। अंततः इन दो ट्वीट के बाद मुझे ‘आजतक’ से निकाल दिया गया है। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। जो मैंने लिखा मैं उसके लिए स्टैंड करता हूं। ये वो बातें हैं जो एक पत्रकार के रूप में ही नहीं, एक नागरिक के रूप में मुझसे अपेक्षित थी कि मैं एक ऐसे शेमलेस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं जो एक खिलाड़ी के अंगूठे की चोट पर ट्वीट कर सकता है मगर विदेश में शहीद हुए एक ईमानदार पत्रकार पर एक शब्द भी नहीं बोलते।

मुझसे एक नागरिक के रूप में ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को ‘शेमलेस’ कहूं जिसकी लफ्फाजी और भाषणबाजी ने मेरे देश के लाखों नागरिकों को कोरोना में मरने के अकेला छोड़ दिया। मुझसे ये अपेक्षित था कि ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार को बेशर्म कहूं जिसकी वजह से इस देश का एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हर रोज भय में जीता है, जिसे हर रोज डर लगता है कि शाम को सब्जी लेने जाऊंगा तो घर लौट भी पाऊंगा या नहीं या दाढ़ी और मुसलमान होने के कारण मारा जाऊँगा। मुझसे ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूँ जो लद्दाख में शहीद हुए 21 सैनिकों की शहादत की खबर को दबाए, और अपनी गद्दी बचाने के लिए ये कहकर दुश्मन देश को क्लीनचिट दे दे कि सीमा में कोई नहीं घुसा, न कोई विवाद हुआ है। देश को बाकी लोगों से पता चले कि हमारे जवानों की हत्या कर दी गई है।

किसी भी पार्टी, छात्र, मजदूर, शिक्षकों, शिक्षामित्रों, दलितों के संगठन अपना विरोध करने के लिए सड़क पर आएं और पुलिस लाठियों से उनकी कमर तोड़ दे। तब मुझसे ये अपेक्षित किया जाता है कि उस पुलिसिया जुल्म के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री को मैं कहूं कि वे ‘शेमलेस’ हैं। हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर आठ महीने तक सड़कों पर पड़े रहें, उनमें से सैंकड़ों बुजुर्ग धरनास्थल पर ही दम तोड़ दें, और प्रधानमंत्री कहें कि मैं केवल एक कॉल दूर हूं, तब एक नागरिक के रूप में मुझसे उम्मीद की जाती है कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं।

ऐसी हजार बातें और सैंकड़ों घटनाएं हैं जिन पर इस देश के प्रधानमंत्री को शेमलेस ही नहीं, धूर्त, चोर और निर्दोष नागरिकों के अधिकारों को कुचलने वाला एक कायर तानाशाह कहा जाए। इसलिए मुझे अपने कथन का, अपने कहे का कोई दुःख नहीं है। इस बात का भान मुझे नौकरी के पहले दिन से था कि देर सबेर मुझसे इस्तीफा मांगा जाएगा या किसी भी मिनट पीएमओ आवास की एक कॉल पर निकाल दिया जाऊँगा। हर ट्वीट करते हुए जेहन में ये बात आती थी कि इसके बाद कहीं FIR न हो जाए, कहीं नोटिस न भेज दिया जाए… कैसे निपटूंगा उससे? ये जोखिम मन में सोचकर भी लिख देता था… मैंने वही बातें कहीं जो मुझसे एक पत्रकार के रूप में ही नहीं एक सिटीजन के रूप में भी अपेक्षित थीं, जिसकी उम्मीद सिर्फ मुझसे नहीं की जाती, बल्कि एक दर्जी से भी की जाती है कि वर्षों में कमाए इस देश की स्वतंत्रता के लुटने पर तुम बोलोगे। ये अपेक्षा मुझसे ही नहीं की जाती, प्राइमरी में पढ़ाने वाले टीचर से भी की जाती है, विश्वविद्यालयों के कुलपति, मकान बनाने वाले राजमिस्त्री, सड़क पर टेंपो चलाने वाले ड्राईवर, पढ़ने वाले छात्रों, कंपनियों में काम करने वाले हर कर्मचारी से ये उम्मीद की जाती है कि हर रोज हो रही भीड़ हत्याओं पर वे बोलेंगे। मैंने अपना काम चुकाया, जहां रहा हर उस जगह कोशिश की कि आम इंसानों की बेहतरी के लिए कुछ लिख सकूं।

चूंकि उम्र और तजुर्बें में बच्चा हूं। करियर के शुरुआती मुहाने पर हूं। जहां से आगे का मुझे पता नहीं… शुरुआत में ही मेरे लिखे के बदले मेरा रोजगार छीन लिया गया तो अंदर से कभी कभी कुछ इमोशनल हो जाता हूं। ऐसे लगता है जैसे कोई छोटी सी चिड़िया किसी जंगल में आई और उड़ने से पहले ही उसके पंख कुतर दिए गए हों। पर ये भी जरूरी है। उस नन्हीं चिड़िया पर ये विकल्प था कि वो कुछ दिन बिना उड़े ही अपने घोंसले में रहे, चुप बैठे, कहीं भी उड़ने न जाए। पर उस चिड़िया ने अपने पंख कुतर जाना स्वीकार लिया, लेकिन ये नहीं कि वो उड़ना छोड़ देगी। जमीन पर पड़े उसके पंख इस बात के रूप में दर्ज किये जाएंगे कि कोई ऐसा शासन था जिसमें पंछियों के पंख कुतर लिए जाते थे। अगर वो चिड़िया उड़ना बंद कर घोसले में ही बैठी रहती तो ये पंख कभी दर्ज नहीं होते और पंख कुतरने वाले शासन का नंगा चेहरा कभी नजर नहीं आता। ऐसी नन्हीं चिड़ियों के कुतरे हुए पंख, उस जंगल पर राज करने वाले राजा का चेहरा दर्ज करने के लिए कागजात हैं। इसलिए मुझे दुःख नहीं, अफ़सोस नहीं….. संतुष्टि जरूर है कि मैं अपना हिस्सा चुका के जा रहा हूँ। बाकी अपने हर अच्छे बुरे में इन पंक्तियों से हिम्मत मिलती रहती है कि ”हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं…

 

लाखों बच्चों की तकदीर बदलने वाले चर्चित अंबेडकरवादी आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण लेंगे रिटायरमेंट

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देश भर में अपने शानदार काम के लिए चर्चित तेलंगाना के आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण स्वैच्छिक सेवानिवृति (रिटायरमेंट) लेने जा रहे हैं। उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और अपने विभाग को इस संबंध में आवेदन दे दिया है। आऱ.एस प्रवीण वर्तमान में सोशल वेलफेयर रेसिडेंसियल स्कूल के सेक्रेट्री पद पर हैं। आर.एस प्रवीण ने इसकी जानकारी ट्विटर के माध्यम से साझा की। अपने रिटायरमेंट की जानकारी देने के लिए लिखे गई चिट्टी को शेयर करते हुए उन्होंने लिखा- “एक आईपीएस अधिकारी के रूप में मातृभूमि की सेवा करते हुए मुझे 26 वर्ष हो गए। अब मैंने अपनी गति से अधिक जोश के साथ सामाजिक न्याय और समानता के लिए अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आज आवेदन किया है। मैं अपने पूरे करियर में मेरे साथ खड़े रहने के लिए आप सभी का धन्यवाद करता हूं।” गौरतलब है कि आर.एस प्रवीण ने अपनी मेहनत के बूते सोशल वेलफेयर स्कूल की तकदीर बदल दी थी। इसके लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली है। उनके काम को आधार बनाकर फिल्म निर्माता एवं अभिनेता राहुल बोस ने पूर्णा नाम की फिल्म बनाई थी। दक्षिणपंथी धारा के लोग अक्सर आर.एस. प्रवीण के काम से खुन्नस में रहते हैं और उन्हें घेरने की कोशिश में जुटे रहते हैं। पिछले दिनों भाजपा नेताओं ने एक कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश की थी, जिसके बाद उनके समर्थकों ने पूरे तेलंगाना में काफी विरोध प्रदर्शन किया और आर.एस. प्रवीण कुमार के समर्थन में उतर गए, जिसके बाद भाजपाईयों को अपने पैर पीछे खिंचने पड़े। हम यहां दलित दस्तक के संपादक अशोक दास द्वारा आर.एस. प्रवीण का लिया गया इंटरव्यू भी दे रहे हैं, ताकि आप उनके काम को बेहतर तरीके से समझ सकें।
नोट- इस लिंक पर जाकर भी आप आर.एस. प्रवीण कुमार के काम के बारें में दलित दस्तक द्वारा की गई वीडियो स्टोरी को देख सकते हैं- telangana social welfare dalit dastak – YouTube

क्या बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन से ब्राह्मणों को फर्क पड़ेगा

 बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन करने की घोषणा कर दी है। इसकी शुरुआत बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र 23 जुलाई को अयोध्या से करेंगे। पहले चरण में 23 जुलाई से 29 जुलाई तक ब्राह्मण सम्मेलन होगा। सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में यह सम्मेलन जिलेवार किया जाएगा। निश्चित तौर यह चुनाव के पहले की जाने वाली कवायद है और इसे चुनावी कार्यक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा हर दल करती है और बसपा भी अपवाद नहीं है।

यहां सवाल यह है कि बसपा को इस सम्मेलन से मिलेगा क्या, और क्या ब्राह्मण समाज बसपा से जुड़ेगा और 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए बसपा को वोट करेगा? उत्तर प्रदेश में करीब 12 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता हैं। मीडिया में ब्राह्मणों का वर्चस्व है, और उन्होंने ऐसा प्रचारित कर रखा है कि यूपी में ब्राह्मण समाज जिस पार्टी को समर्थन करता है उसकी सरकार बन जाती है। हालांकि यह कितना सच है, इसका कोई रिसर्च मौजूद नहीं है। लेकिन जब यूपी में समाजवादी पार्टी जीतती है, तो यही मीडियाकर्मी हल्ला मचाते हैं कि वह ब्राह्मणों के वोट से जीती है, और जब बसपा की सरकार आती है तो शोर मचाया जाता है कि सपा को रोकने के लिए ब्राह्मणों ने बसपा की सरकार बना दी है। और जब भाजपा की सरकार बनती है तो ब्राह्मणों को भाजपा के पाले में बताया जाता है। इस तरह जीत चाहे जिस पार्टी की हो, प्रदेश में चाहे जिसकी सरकार बने मीडिया की अपनी ताकत से ब्राह्मण समाज खुद को सत्ता के साथ हमेशा जोड़े रखता है।

इस बार मीडिया का एक खेमा कह रहा है कि ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में भाजपा से और खासकर योगी सरकार से नाराज हैं और इसलिए गुस्साए ब्राह्मण योगी सरकार को गिराने के लिए किसी और राजनीतिक दल को वोट देंगे। ऐसे में सपा और बसपा दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी होने का दावा करते हुए ब्राह्मण वोटों के लिए ‘जय परशुराम’ का नारा लगा रहे हैं। बसपा का ब्राह्मण सम्मेलन इसी कड़ी में लिया गया फैसला है।

हालांकि विचारधारा के स्तर पर बसपा और सपा में एक बहुत बड़ा फर्क है। बहुजन समाज पार्टी जहां ब्राह्मण वोटों के लिए अपने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को केंद्र में रखते हुए सारी रणनीति बनाती है तो वहीं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद मंदिरों, मठों और धर्मगुरुओं के चक्कर लगाते दिखते हैं। दूसरी ओर बसपा प्रमुख मायावती ब्राह्मणों के वोट के लिए मंदिरों और मठों के चक्कर नहीं लगातीं। न ही उनके धर्मगुरुओं को बहुत भाव देती हैं। जिस कारण बहनजी ब्राह्मण वोटों के लिए रणनीति बनाते हुए भी दलित वोटों को अपने साथ जोड़े रखने में सफल रहती हैं।

अब सवाल है कि यूपी में ब्राह्मण वोट कितना महत्वपूर्ण है। निश्चित तौर पर 12 प्रतिशत वोटर किसी भी पार्टी के लिए एक बड़ा नंबर होता है और वह सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का माद्दा रखता है। और इसको भी खारिज नहीं किया जा सकता कि जब भी कोई दल सत्ता में आता है तो उसे कमोबेश हर जाति का समर्थन मिलता ही होगा। 2007 में बसपा ने प्रदेश की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर तलहका मचा दिया था। तब बसपा को तीस प्रतिशत वोट मिला था। 2017 विधानसभा चुनाव में 325 सीटों के साथ बीजेपी की सरकार बन गई थी।

ऐसे में अगर बसपा एक बार फिर से ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कवायद में जुटी है तो इसे एक चुनावी रणनीति के रूप में स्वीकार करना चाहिए। दरअसल चुनावी रणनीति बनाते समय राजनीतिक दलों को कई स्तरों पर सोचना पड़ता है। 2017 विधानसभा चुनावों के दौरान जब बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को जमकर टिकट दिया था, तो माना गया  कि दलित और मुस्लिम वोटों के जरिए बसपा ने एक मजबूत समीकरण तैयार कर लिया है और तमाम सीटों पर जहां भाजपा और बसपा में सीधा मुकाबला होगा, वहां यादव सहित अन्य पिछड़े वर्ग का वोट भी बसपा को जाएगा। इसे एक बेहतरीन रणनीति माना गया था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और बसपा को झटका लगा था। इस बार बसपा ब्राह्मण वोटों को साधने की कवायद में जुटी है। इस रणनीति से बसपा ब्राह्मण समाज को कितना जोड़ पाएगी और उसके इस कदम की आलोचना होगी या फिर सराहा जाएगा; यह चुनाव बाद जीती गई सीटों के नंबर पर निर्भर करेगा।

NEET में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन की तैयारी में मंडल आर्मी

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पिछड़े वर्ग को NEET में आरक्षण नहीं मिलने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इसी क्रम में मंडल आर्मी नाम का संगठन 19 जुलाई को अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन करने की तैयारी में है। मंडल आर्मी ने आवेदन देकर संबंधित अधिकारियों से इसकी अनुमति मांगी है। मंडल आर्मी की ओर से डीसीपी दिल्ली, एसएचओ तिलक मार्ग थाना और एसएचओ संसद मार्ग के नाम से दिये गए आवेदन में कहा गया है कि – हम लोग माननीय सु्प्रीम कोर्ट द्वारा रिट पिटीशन संख्या 596 (215) सलोनी कुमारी बनाम डायरेक्टर जनरल हैल्थ सर्विसेज और अन्य मामले में छह वर्षों से फैसला नहीं सुनाए जाने की वजह से केंद्र सरकार द्वारा NEET ऑल इंडिया कोटा में राज्यों को ओबीसी आरक्षण न देने की वजह से प्रति वर्ष पिछड़ा वर्ग को मेडिकल में हजारों सीटों के नुकसान को लेकर 19 जुलाई 2021 दिन सोमवार की सुबह साढ़े दस बजे संवैधानिक दायरे में रहकर एवं कोविड नियमों का पूर्णतया पालन करते हुए बेहद शांतिपूर्ण ढंग से सुप्रीम कोर्ट के सामने भगवानदास मार्ग पर धरना प्रदर्शन करने आ रहे हैं, जिससे किसी को भी कोई परेशानी नहीं होगी।

इस आवेदन को ट्विट करते हुए सोशल एक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने इसका समर्थन किया है। उन्होंने वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी की सभा का जिक्र करते हुए कहा कि  जब प्रधानमंत्री हज़ारों लोगों की जनसभाएं कर रहे हैं तो पुलिस किस मुँह से आपको मना करेगी? @DelhiPolice इजाजत दीजिए प्लीज़। ओबीसी हितों का सवाल है। देश की आधी से ज़्यादा आबादी उनकी है।

दलितों के वोट के लिए सपा ने बनाई स्पेशल रणनीति, बाबासाहेब को लेकर पार्टी करेगी बड़ी घोषणा

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उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले तमाम दल अपनी-अपनी रणनीति को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं। एक-दूसरे की काट के लिए सभी दल बेहतर रणनीति बनाने की कवायद में जुटे हैं। यूपी की सियासत की बात करें तो यहां मुकाबला बसपा, समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच होना है। बहुजन समाज पार्टी जहां 2007 के फार्मूले पर चलने की रणनीति तैयार कर रही है तो वहीं समाजवादी पार्टी ने दलितों के वोट हासिल करने के लिए अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा फेरबदल किया है।

2022 चुनाव में बहनजी अपनाएंगी 2007 वाला फार्मूला !

खबर है कि समाजवादी पार्टी लोहिया की तर्ज पर ही बाबासाहब के नाम से वाहिनी बनाने जा रही है। इसके साथ ही आगामी यूपी चुनाव के लिए सपा का चुनावी समीकरण MY यानी मुस्लिम यादव नहीं बल्कि MYD यानी मुस्लिम, यादव और दलित होने की बात सामने आ रही है। इस कवायद की बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जातियों को साधना है, खासकर उन जातियों को जो बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर में आस्था रखती हैं। दलित समाज के वोटों को साधने के लिए समाजवादी पार्टी ‘लोहिया वाहिनी’ की ही तर्ज पर ‘बाबासाहब वाहिनी’ का गठन करने जा रही है। बताया जा रहा है कि इसकी रुपरेखा काफी हद तक तय भी हो चुकी है।
समाजवादी पार्टी के भीतर से जो सूचना आ रही है, उसके मुताबिक सपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस वाहिनी का नेतृत्व उस दलित नेता के हाथ में देना चाहता है जो काफी ज्यादा पढ़ा-लिखा हो और दलित समाज के मुद्दों को समझता हो। दरअसल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की इस कवायद के पीछे सोची-समझी रणनीति है। सपा ने पिछले दिनों में खुद को काफी बदला है। खासकर समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है। निश्चित तौर पर यह सपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। देखना होगा कि सपा की इस कवायद को दलित समाज कैसे लेता है और उस पर कितना यकीन करता है। तो वहीं यह भी देखना होगा कि समाजवादी पार्टी दलितों को सपा में कितना जोड़ पाती है।

सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली वाल्मीकि महिला बनी नगर निगम की SDO

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वक्त-वक्त पर सफलता की ऐसी मिसाल सामने आती है, जो इस बात पर मुहर लगाती है कि इंसान अगर कुछ हासिल करना चाहे और उसके लिए ईमानदारी से कोशिश करे तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। राजस्थान के जोधपुर में एक महिला सफाईकर्मी ने इतिहास रच दिया है। कल तक सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली महिला अपनी लगन और मेहनत से जोधपुर म्युनिसिपल कारपोरेशन की एसडीएम बन गई है। शानदार सफलता हासिल कर मिसाल पेश करने वाली महिला का नाम आशा कंण्डारा है और वह वाल्मीकि समाज से ताल्लुक रखती हैं। राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आर एस 2018 में उसका चयन हो गया है। आशा की सफलता की चर्चा पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान में हो रही है, और अब उनकी सफलता देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। लेकिन आशा को सबकुछ तुक्के से नहीं मिल गया, बल्कि आशा ने अपनी हिम्मत से सफलता की यह इबारत लिखी है। आशा की कहानी शुरू होती है जोधपुर की उन सड़कों से जिसकी वह सफाई किया करती थी। सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते हुए आशा नगर निगम के अफसरों को देखा करती थीं और मन ही मन उसने ठान लिया कि उसे भी अफसर बनना है।
आशा ने सिलेबस का पता किया और तैयारी शुरू कर दी। आशा के साथ हमेशा किताबें होती थी, और जैसे ही उसे खाली समय मिलता, वह पढ़ने बैठ जाती थी। चाहे जोधपुर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की सीढ़ियां हो या कहीं सड़क किनारे… खाली वक्त में आशा का एक ही काम था… पढ़ाई करना। और उन्हीं किताबों के जादू ने आशा की जिंदगी में जादू कर दिया और वह जिस जिले की सड़कों पर झाड़ू लगाती थी, वहीं  अब अधिकारी बन कर अपनी गाड़ी से गुजरती हैं। हालांकि आशा की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। आठ साल पहले उनका पति से झगड़ा हुआ, जिसके बाद दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आशा पर थी। बच्चों को और खुद को जिंदा रखने के लिए आशा नगर निगम में झाड़ू लगाती थी। सफाई कर्मचारी के रुप में नियमित तौर पर नियुक्ति के लिए आशा ने दो सालों तक नगर निगम से लड़ाई लड़ी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। आशा निराश थी, लेकिन उसने हौंसला नहीं छोड़ा… लड़ना नहीं भूली। और आखिरकार आशा को एक ओर जहां नगर निगम की ओर से सफाई कर्मचारी के रूप में नियमित नियुक्ति मिल गई। तो वहीं राज्य प्रशासनिक सेवा में भी चयन हो गया और अब वह एसडीएम बन गई हैं।
निश्चित तौर पर आशा की सफलता लाखों युवाओं को प्रेरणा देने वाली है। खासकर उस वाल्मीकि समाज के युवाओं को, जो झाड़ू और कलम के बीच के अंतर को नहीं समझ पाते हैं। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सहित तमाम बहुजन नायक हमेशा कहते रहे हैं कि वंचितों-शोषितों का जीवन सिर्फ शिक्षा से ही बदल सकता है। आशा की सफलता इस पर मुहर लगाती है।