1 जून, 1873 को ज्योतिराव फुले (11अप्रैल 1827 – 28 नवम्बर 1890) की रचना ‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन हुआ था। यह किताब मराठी में लिखी गयी। इसकी प्रस्तावना फुले ने अंग्रेजी में और भूमिका मराठी में लिखी है। इस किताब को लिखने का मूल उद्देश्य बताते हुए फुले ने लिखा है कि ‘इस किताब को लिखने का एकमात्र उद्देश्य सभी उत्पीड़ित लोगों को उनकी गुलामी का अहसास दिलाना, उनको इस योग्य बनाना कि वे अपनी इस हालात के कारणों को पूरी तरह समझ सकें और अपने आप को ब्राह्मणों की गुलामी, उत्पीड़न एवं अन्याय से मुक्त करने के लिए सक्षम बना सकें (गुलामगिरी की भूमिका)।
फुले ने करीब 12 किताबें लिखी हैं। इन सभी किताबों में उन्होंने ऐसी शैली और भाषा का प्रयोग किया है, जिससे ये किताबें व्यापक दलित-बहुनजों और मेहनतकशों स्त्री-पुरुषों को समझ में आ जाएं। अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए फुले ने गुलामगिरी भी संवाद शैली में लिखा और उसे विभिन्न छोटे-छोटे परिच्छेदों में विभाजित किया। गुलामगिरी में कुल सोलह परिच्छेद हैं। इसके अलावा उन्होंने इसमें एक लंबा पंवाड़ा और बहुजन संत तुकाराम की शैली पर लिखित तीन अभंग भी समाहित किया है।
फुले ने इस किताब को यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका) के उन लोगों को समर्पित किया है, जो नीग्रो गुलामों की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। उन्हें समर्पित करते हुए फुले ने लिखा है कि “यूनाइटेड स्टेट्स के उन महान लोगों के सम्मान में, जिन्होंने नीग्रो लोगों को गुलामी से मुक्त कराने के कार्य में उदारता और निष्पक्षता के साथ सहयोग किया और उनके लिए कुर्बानी दी। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरे देशवासी उनके इस सराहनीय कार्य का अनुकरण करें और अपने शूद्र भाइयों को ब्राह्मणी जाल से मुक्त कराने में अपना सहयोग करें” (गुलामगिरी, समर्पण पृष्ठ)।
यह किताब सोलह परिच्छेदों में विभाजित है। इन सोलह परिच्छेदों में प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल में ब्राह्मणों और शूद्रों-अतिशूद्रों के बीच चले संघर्षों की कथा कही गई है। यहां एक तथ्य रेखांकित कर लेना जरूरी है कि फुले पश्चिमोत्तर भारत, विशेषकर आज के महाराष्ट्र की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना के संदर्भ में यह किताब लिख रहे हैं। जहां मूलत: शू्द्रों-अतिशूद्रों पर वर्चस्व कायम करने और उन्हें अपना गुलाम बनाने वाली जाति ब्राह्मण रही है। वहां द्विज क्षत्रिय जैसी जाति नहीं रही है। समाज का विभाजन मूलत: शोषक-उत्पीड़क ब्राह्मण और शोषित-उत्पीड़ित शूद्रों-अतिशूद्रों के बीच था।
फुले अपनी किताब ‘गुलामगिरी’ में बताते हैं कि इस क्षेत्र में ब्राह्मणों के आगमन और बाद में उनके द्वारा वर्चस्व स्थापित करने से पहले यहां वर्ण या जाति का विभाजन नहीं था। यहां एक समता आधारित राज्य था। जिसके प्रतीक बलि का राज्य या बलि राजा हैं। यह एक आर्थिक तौर पर समृद्ध इलाका था। जहां सभी खेती-किसानी करते थे और जरूरत पड़ने पर बाहरी दुश्मनों से युद्ध करते थे। इसके चलते सभी क्षत्रिय थे। फुले ने सबको क्षत्रिय के रूप में संबोधित भी किया है। परिच्छेद छह में बलि राजा और उनके राज्य का वर्णन करते हुए फुले ने लिखा है कि “इस देश का एक बड़ा भाग बलिराज के अधिकार में था।…दक्षिण में बलि के अधिकार में दूसरा एक प्रदेश था, उसको महाराष्ट्र कहा जाता है। वहां के मूल निवासियों को महाराष्ट्रियन कहा जाता था। बाद में अपभ्रंश रूप हो गया मराठे।” फुले गुलामगिरी में यह स्थापित करते हैं कि ब्राह्मणों के वर्चस्व के पहले मराठों में कोई वर्ण-जाति विभाजन नहीं था। मराठों की संख्या ब्राह्मणों से दस गुनी अधिक थी। मराठों को हमेशा-हमेशा के लिए अपने अधीन बनाने के लिए ब्राह्मणों ने शिक्षा का अधिकार छीन लिया और उन्हें हजारों जातियों में विभाजित कर दिया।
गुलामगिरी की भूमिका में स्वयं फुले ने यह सवाल उठाया है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की संख्या तकरीबन दस गुना ज्यादा है। फिर भी ब्राह्मणों ने शूद्रों- अतिशूद्रों को कैसे मटियामेट कर दिया? स्वंय फुले इसका जवाब देते हैं। वे लिखते हैं ‘सबसे पहले ब्राह्मणों ने शूद्रों-अतिशूद्रों के बीच नफरत की भावना फैलाने के लिए योजना तैयार की। उन्होंने प्रेम की बजाय नफरत के बीज बोये। इसके पीछे उनकी चाल यह थी कि शुद्र-अतिशूद्र समाज आपस में लड़ते रहेंगे, तभी ब्राह्मणों का वर्चस्व मजबूत होगा और स्थायित्व ग्रहण करेगा। उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए गुलाम बना लेंगे और बिना मेहनत किए उनकी (शूद्रों-अतिशूद्रों) कमाई पर बिना किसी रोक-टोक के गुलछर्रे उड़ा पायेंगे। अपनी इसी विचारधारा और चाल को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ब्राह्मणों ने जाति-भेद की फौलादी-जहरीली दीवारें खड़ी की। जाति-भेद की इस विचारधारा को शूद्र-अतिशूद्र भीतर से स्वीकार कर लें, इसके लिए जाति-भेद को ईश्वर की रचना बताने के लिए ब्राह्मणों ने बहुत सारे ग्रंथ रचे।
इस सबका परिणाम यह हुआ कि कभी एक ही समाज के लोग अब एक दूसरे को नीच समझने लगे, एक दूसरे से नफरत करने लगे और आपस में लड़ने लगे। शूद्र-अतिशूद्र समाज की आपस की फूट का ब्राह्मणों ने कैसे फायदा उठाया। इस पूरी स्थिति पर ‘दोनों का झगड़ा और तीसरे का लाभ’ कहावत बहुत सटीक बैठती है। इसका मतलब समझाते हुए फुले कहते हैं कि ब्राह्मण-पंडा पुरोहितों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों के बीच आपस में नफरत का बीज (जाति) बो दिया और खुद उन सभी की मेहनत पर ऐशो-आराम कर रहे हैं। सोलह परिच्छेदों में विभाजित गुलामी के पहले परिच्छेद में फुले ब्रह्मा की उत्पत्ति और आर्यों के आगमन की विस्तार से चर्चा करते हैं। कैसे ब्राह्मणों ने स्वयं को भूदेव या धरती का देवता बनाया, इस पर विस्तार से रोशनी डालते हैं। इस परिच्छेद में ब्राह्मण जाति की धूर्तता और उसके बर्बर चरित्र की चर्चा की गई है। फुले लिखते हैं कि ‘सबसे पहले उन आर्य लोगों ने बड़ी-बड़ी टोलियां बनाकर इस देश में आकर कई बर्बर हमले किए और यहां के मूल निवासी राजाओं के प्रदेशों पर बार-बार हमले करके आतंक फैलाया। (गुलामगिरी, पहला परिच्छेद)। परिच्छेद दो में ब्राह्मणों के अगुवा मत्स्य और उसके हमले की चर्चा की गई। परिच्छेद तीन में कच्छ, भूदेव, भूपति, द्विज, कश्यप और क्षत्रिय आदि का वर्णन किया गया है। इसमें आर्य-ब्राह्मणों के अगुवा कच्छप के नेतृत्व में मूल निवासियों पर होने वाले हमले का वर्णन है। परिच्छेद चार-पांच में आर्यों-ब्राह्मणों के नेता वराह द्वारा मूल निवासियों के राजा हिरण्यकश्यप और हिरण्यगर्भ की छल से हत्या की कहानी की हकीकत को फुले ने उजागर किया है। इसी में हिरण्यकश्यप के बेटे प्रहलाद को अपने जाल में फंसाने की ब्राह्मणों की चाल को दिखाया गया है। इस युद्ध में वराह और नरसिंह आर्यों के अगुवा थे। परिच्छेद छह बलिराजा और उनके राज्य पर केंद्रित है। कैसे ब्राह्मणों के अगुवा वामन ने उनकी हत्या किया, इसका वर्णन किया गया है। महाराष्ट्र के समाज में बलिराजा को लोग कितना प्यार एवं सम्मान देते हैं और उनके राज्य की वापसी की आज भी चाह रखते हैं। इस तथ्य को फुले ने महाराष्ट्र के लोक में व्यापक तौर पर स्वीकृत “अला बला जावे और बलि का राज्य आवे” के माध्यम से प्रकट किया है।
ये सभी परिच्छेद इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि आर्य-ब्राह्मणों ने मूल निवासियों के राज्य पर कई बार हमले बोले। उनके बीच युद्ध हुआ। अंततः मूल निवासियों की पराजय और ब्राह्मणों की विजय हुई। आर्य-ब्राह्मणों में सबसे कूर, नृशंस और बेरहम परशुराम था। फुले के अनुसार परशुराम के द्वारा 21 बार जिन क्षत्रियों के विनाश की कथा पुराणों में कही गई है, वे क्षत्रिय कोई और नहीं, बल्कि यहां के मूल निवासी शूद्र-अतिशूद्र थे। परशुराम ने किस नृशंसता से उनका कत्ल किया, इसका विस्तार से वर्णन परिच्छेद आठ में किया गया है। परिच्छेद नौ, दस, ग्यारह, बारह में ब्राह्मणों के पूर्ण वर्चस्व की स्थापना की कथा कही गई है। परिच्छेद तेरह से लेकर पंद्रह तक, आधुनिक युग में अंग्रेजों के आगमन, शूद्रों-अतिशूद्रों की स्थिति में थोड़ा सुधार एवं परिवर्तन, अंग्रेजों के राज्य में भी कैसे ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व कायम किया, इसका वर्णन किया गया है। इन परिच्छेदों में अंग्रेजी राज कैसे शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए थोड़ी राहत लेकर आया? कैसे इन समुदायों को थोड़ी आजादी और सांस लेने का मौका मिला और इस अवसर का फायदा शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा पाने के लिए उठाया इसका भी वर्णन किया है। गुलामगिरी के एक भाग में फुले लिखते हैं- मनु जलकर खाक हो गया, जब अंग्रेज आया। ज्ञान रूपी मां ने हमको दूध पिलाया।।
इन्हीं परिच्छेदों में ब्राह्मणवादी पेशवाई की पराजय और अंग्रेजों की विजय के परिणामों की भी चर्चा है। सब कुछ के बावजूद भी अंग्रेजी शिक्षा का फायदा उठाकर ब्राह्मणों ने अंग्रेजों के राज्य में कैसे अपना वर्चस्व कायम रखा फुले इसके कारणों की भी विस्तार से चर्चा करते हैं। परिच्छेद सोलह में ब्राह्मणों के चुंगल से शूद्रों-अतिशूद्रों की कैसे मुक्ति हो, इस विषय पर केंद्रित है। इसमें वे शूद्रों-अतिशूद्रों के प्रतिनिधि के रूप में तीन प्रतिज्ञा लेते हैं- ब्राह्मणों ने जिन तीन प्रमुख धर्मग्रंथों के आधार पर शूद्र-अतिशूद्र लोग ब्राह्मण के गुलाम हैं और उनके जिन ग्रंथों में हमारी गुलामी के समर्थन में लिखा गया है, हम उन सभी धर्मग्रंथों को खारिज करते हैं। जो कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को नीचा समझने का आचरण करता है। हम उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देंगे। जो गुलाम ( शूद्र, दास, दस्यु) के अपने रचयिता को मानकर नीति के अनुसार चलने और जीविकोपार्जन का उचित साधन अपनाने का निर्णय करते और उसके अनुसार अपना आचरण करते हैं। उनको हम अपने परिवार के भाई की तरह मानेंगे, उन्हें प्यार करेंगे और उनके साथ खाना-पीना करेंगे। चाहे वे लोग किसी भी देश के रहने वाले क्यों न हों। (गुलामगिरी परिच्छेद: सोलह) इस किताब का अंत अभंग की इन निम्न पंक्तियों से होता है- हम शिक्षा पाते ही, पाएंगे वह सुख। पढ़ लो मेरा लेख, ज्योतिराव कहे।।


जब भारत आते हैं; तब उनके लिए इस देश के मायने कुछ और हो जाते हैं। सिंपल भाषा में कहें तो ये देश बुद्ध का देश नहीं रहता, भगवान चेंज हो जाते हैं। यह बात साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरे देशों से संबंध बनाने के लिए भगवान बुद्ध को इस्तेमाल करते हैं। कई बार इसमें उनका स्वार्थ और मौका परस्ती भी झलक जाती है। जब विदेश में कुछ बड़ा होता है, तब यही मीडिया पीछे–पीछे तक विदेश चला जाएगा। वहां से जाकर रिपोर्टिंग करेगा। रशिया और यूक्रेन की लड़ाई में यूक्रेन तक चला जाएगा, जिसमें उसका टीआरपी छोड़ कोई राष्ट्र परस्त भाव दिखता नहीं है। लेकिन जब देश के सबसे बड़े राष्ट्र निर्माता को दुनिया भर में तवज्जो दी जा रही है, तब भारतीय मीडिया गूंगी हो गई है। क्यों गूंगी हो गई है, यह बड़ा सवाल है?
इस बार आज 29 मार्च 2023 को सम्राट अशोक की जयंती मनाई गई। ऐसे लोगों द्वारा जो अशोक की महानता को, भारत के लिए उनके योगदान को और बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में उनके योगदान को भूले नहीं है। लेकिन भारत की सरकारों ने उस सम्राट अशोक को अनदेखा कर दिया, जिसके राज्य का चिन्ह आज भी इस्तेमाल होता है। जिसका दिया चक्र, जिसे अशोक चक्र कहा जाता है, भारत के तिरंगे में है। चाहे कांग्रेस की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो, गठबंधन की सरकारें रही हों, या अब भाजपा की सरकार हो, भारत की तमाम सरकारों ने अगर सम्राट अशोक को नजरअंदाज कर दिया, तो सवाल उठता है ऐसा क्यों?
मध्यप्रदेश का मण्डला जिला एक आदिवासी बाहुल्य है। जो पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। इस जिले में बसे आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख साधन खेती है। लेकिन, सहजता से खेती कर पाना इतना सरल नहीं है, यह हमें मण्डला जिले का मोहगांव ब्लॉक बताता है। इस ब्लॉक के 12 गाँव में आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी लोग पीढ़ियों से राजस्व और वन भूमि पर खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों को आजतक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) प्रदान नहीं किये गये हैं। भूमि के पट्टे ना मिलने से आदिवासी और अन्य परंपरागत निवासी सरकार की किसान सम्मान निधि, कृषि क्षतिपूर्ति जैसी अन्य योजनाओं से वंचित रह जाते है। वहीं, पट्टा न मिलने से लोग जमीन पर आधिकारिक हक भी नहीं जता पाते।
किसानों की काबिज भूमि के पट्टे प्राप्ति का अभियान चलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा का कहना है कि, ‘यह कहानी मंडला जिले के मोहगांव ब्लॉक के 12 गाँवों की है। जहां पीढ़ियों से लोग काबिज भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें अब तक पट्टा नहीं मिला। जिससे किसानों को कृषि योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिलता। सिन्हा आगे कहते हैं, ‘मेरे ख्याल से मध्यप्रदेश में अगर सर्वे किया जाए, तो ऐसे हजारों परिवार मिलेगें। जो कि पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें पट्टे नहीं मिले।


मध्यप्रदेश में जमीन पट्टे की मांग सिवनी (पांचवीं अनुसूची क्षेत्र) जिले से भी उठ रही है। जिले की जनपद पंचायत घंसौर, ग्राम पंचायत बखारी माल और धूमामाल के बरगी बांध विस्थापितों ने एक पत्र, दिनांक 22-02-2023 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम लिखा है। पत्र में कहा गया कि, वन अधिकार कानून 2006 के तहत पूर्व से काबिज दावेदारों को जांच उपरांत भू-अधिकार पत्र प्रदान किये जाएंगे। इस पत्र के जरिए प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि ना मिलने जैसी कई मूलभूत समस्याओं के समाधान की मांग की गयी।
विचारणीय है कि एक तरफ आदिवासी वर्ग सालों से जमीन पट्टों की मांग करता आ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ लाखों भू-अधिकार दावें निरस्त हो रहें हैं और दावों का निपटारा भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थति में, आदिवासी वर्ग के गरिमा पूर्ण जीवन जीने की आजादी, न्याय, विश्वास, समता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट बरकरार है। आदिवासी वर्ग को लेकर हमें बार-बार सुनने मिलता हैं कि,‘‘जल, जंगल और जमीन, ये हैं आदिवासी के अधीन, लेकिन हकीकत बिल्कुल इससे उलट है। आदिवासी वर्ग आज भी भूमि जैसे अन्य संसाधनिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।


चुनावों पर करीब से नजर रखने वाली संस्था सीएसडीएस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का फार्मूला दिया है। सीएसडीएस का दावा है कि अगर इस फार्मूले पर काम किया जाए तो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को आसानी से सत्ता से बाहर किया जा सकता है।
दरअसल सीएसडीएस ने 2024 चुनावों को लेकर जो सर्वे किया है, उसके मुताबिक अगर भाजपा को छोड़कर सारा विपक्ष साथ मिलकर चुनाव लड़े तो आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को दुबारा सत्ता में आने से आसानी से रोका जा सकता है। सर्वे करने वाली संस्था का कहना है कि ऐसा होने पर विपक्ष को आसानी से बहुमत मिल जाएगा। दरअसल सीएसडीएस के इस दावे के पीछे पिछले चुनावों में तमाम दलों को मिली सीटें और वोट प्रतिशत है।
एक सच्चा अंबेडकरवादी जब हुंकार भरता है, तो बड़ी-बड़ी तानाशाह सरकार घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। यह तस्वीर तेलंगाना के बसपा प्रमुख आर.एस प्रवीण कुमार की है, जो जीत के बाद अपना आमरण अनशन तोड़ रहे हैं। दरअसल तेलंगाना में भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद तेलंगाना के तमाम विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लेकिन आईपीएस की नौकरी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामने वाले चर्चित अंबेडकरवादी आर.एस. प्रवीण ने सरकार के खिलाफ आमरण अनशन का ऐलान कर दिया था। उन्होंने 16 मार्च को घोषणा की थी कि जब तक ग्रुप-वन की प्रारंभिक परीक्षा रद्द नहीं होती, वह आमरण अनशन पर रहेंगे।
उन्होंने 17 मार्च से बसपा मुख्यालय पर आमरण अनशन भी शुरू कर दिया। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर घर पर छोड़ दिया। उन्होंने वहां भी अनशन जारी रखा। इस बीच मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव पर दबाव बढ़ता गया, जिसके बाद आखिरकार 24 घंटे के भीतर सरकार को बसपा और छात्र संगठनों की मांग माननी पड़ी। तेलंगाना राज्य लोक सेवा आयोग ने ग्रुप वन की प्रारंभिक परीक्षा सहित दो अन्य परीक्षाएं रद्द कर दी। जिसके बाद आर.एस प्रवीण ने अनशन वापस ले लिया। इस बीच आर.एस प्रवीण की बेटी का भी एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह पिता के आमरण अनशन की घोषणा के बाद रोती हुई नजर आई थी।

13 मार्च की तारीख भारत के लिए बेइंतहा सम्मान लेकर आई। इस दिन हर ओर ऑस्कर अवार्ड की चर्चा हो रही है। भारत की झोली में पहली बार दो ऑस्कर अवार्ड एक साथ आए हैं। भारतीय फिल्म RRR के गीत ‘नाटू-नाटू’ ने जहां बेस्ट ओरिजिनल सांग की श्रेणी में ऑस्कर जीता है। तो दूसरी ओर तमिल भाषा की डॉक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ ने ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’ केटेगरी में भारत के लिए पहला ऑस्कर जीत लिया है।
दरअसल जो दोनों अवार्ड मिले, उससे भारत के मूलनिवासी समाज की कहानी जुड़ी थी। RRR जहां आदिवासी नायक कोमराम भीम को केंद्र में रखकर बनाकर बनाई गई थी, तो वहीं डाक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ में हाथी के जो साथी हैं, वो भी आदिवासी समाज के हैं।



लेकिन इसी टोले में किसुन और भगेसर की जिंदगी आज भी नहीं बदली। परिवार की जो हालत तीन दशक पहले थी, वही आज भी है। वजह, यह परिवार न तो बाहर कमाने निकल पाया, न ही बच्चों को पढ़ा पाया। नतीजा यह हुआ कि गांव के कुछ सामंत परिवारों के घर की चाकरी करने में पहले खुद की जिंदगी होम हुई, अब बच्चों की हो रही है। और यह सिर्फ इन दो घरों का मसला नहीं है, बल्कि शिक्षा के मामले में कई घरों की कहानी यही है।
लेकिन बाहर की दुनिया देखने से अब उनमें चेतना आ रही है। सोशल मीडिया पर वह अपना इतिहास ढूंढ़ रहे हैं। यही वजह है कि अब टोले में सरस्वती पूजा की जगह रविदास जयंती और अंबेडकर जयंती मनाई जाने लगी है। नागेश्वर के बेटे विक्की जो ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, का कहना है कि- अब हमलोग सही गलत समझने लगे हैं। इसके बावजूद जाति की वजह से हमें कई बार ताने सुनने पड़ते हैं। लेकिन अब गांव का कोई बड़ी जात का आदमी जाति के नाम पर हमें अपमानित करने की कोशिश करता है तो हम मुंहतोड़ जवाब देते हैं। हम समझ गए हैं कि बेहतर शिक्षा के जरिये अच्छे पैसे कमाकर हम इस स्थिति से निकल सकते हैं। मेरी उम्र के सभी बच्चे पढ़ रहे हैं और बेहतर भविष्य के सपने देखते हैं।
विक्की की यह बात एक उम्मीद देती है कि नई पीढ़ी का भविष्य बेहतर होगा। लेकिन यह मजह अफौर के इस टोले की हकीकत है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चमारों की बस्ती की कहानी अलग है। हर टोले को अशर्फी दास जैसे एक नायक की जरूरत है।
आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र। बंगाली पुनर्जागरण मूलत: हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे। इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को चुनौती दी। वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया। महाराष्ट्र के पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं। इस पुनर्जागरण के दो स्तंभ थे- सावित्री बाई फुले और उनके पति जोतिराव फुले।
दिल्ली के प्रगति मैदान में इन दिनों किताबों का मेला लगा है। विचारों का मेला लगा है। यह मेला 5 मार्च तक चलेगा। विश्व पुस्तक मेले का यह 50वां साल है। इस लिहाज से यह महत्पूर्ण है। भांति-भांति के प्रकाशक, भांति-भांति की पुस्तकों के साथ मौजूद हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस विश्व पुस्तक मेले में कहा जा रहा है कि यहां तकरीबन 2000 प्रकाशक स्टॉल लगे हैं। कोविड के कारण यह पुस्तक मेला तीन सालों बाद आयोजित हो रहा है। पुस्तक मेले में हर दिन कोई न कोई ख्याति प्राप्त लेखक पहुंचता है और उनको सुनने जुटती है भारी भीड़।
पुस्तक मेले में हर विचारधारा की पुस्तकें और लेखकों को आसानी से टहलते देखा जा सकता है। अंबेडकरी-फुले आंदोलन के प्रकाशकों की बात करें तो इस साल बहुजन वैचारिकी वाले छह बुक स्टॉल लगे हुए हैं। उसमें दलित दस्तक के स्टॉल के साथ-साथ जयपुर के प्रकाशक एम.एल. परिहार की बुद्धम पब्लिकेशन, फारवर्ड प्रेस सहित जाने माने प्रकाशक सम्यक प्रकाशन और गौतम बुक सेंटर का स्टॉल लगा हुआ है। ये सभी स्टॉल हाल नंबर 2 में आस-पास ही मौजूद हैं। हॉल नंबर दो में दलित दस्तक का स्टॉल नंबर- 378 है। इसके आस-पास ही बाकी सभी प्रकाशकों के स्टॉल भी मौजूद हैं। इसके अलावा आदिवासी साहित्य के साथ इस बार वंदना थेटे भी अपने प्रकाशन के साथ मौजूद हैं।
फिलहाल पुस्तक मेला अपने अंतिम चरण में है। साहित्य प्रेमियों का आना लगातार जारी है। खास बात यह भी है कि इस मेले में स्कूली छात्र भी खूब पहुंच रहे हैं। तो तमाम पुस्तक प्रेमी अपने बच्चों के साथ पुस्तक मेले में शिरकत कर रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि न्यू मीडिया और ट्विटर और इंस्टा के इस दौर में उनके बच्चे किताबों से भी जुड़े रहें और बेहतर इंसान बन सकें। इस दौरान पाठकों में अपने प्रिय लेखकों के साथ तस्वीरें लेने की होड़ भी देखी जा रही है।
अमेरिका के सिएटल शहर में अब जाति को लेकर भेदभाव करने वालों की खैर नहीं होगी। सिएटल में जाति आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित कर दिया गया है। मंगलवार को एक बड़े फैसले में सिएटल सिटी काउंसिल ने शहर के भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल कर लिया। यानी अब इस शहर में अगर कोई किसी से जाति के आधार पर भेदभाव करता है, तो उस पर कार्रवाई होगी। पहले भेदभाव विरोधी कानून में रंग और नस्ल आधारित भेदभाव ही शामिल था। सिएटल सिटी काउंसिल ने इस अध्यादेश को 6-1 से पारित कर दिया।
अमेरिका की नगर परिषद में पेश हुआ ये अपनी तरह का पहला प्रस्ताव है। इसको लेकर लंबे समय से मांग की जा रही थी। इसके समर्थक इसे सामाजिक और समानता के लिए अहम कदम मान रहे हैं। हालांकि दक्षिण एशिया और खासकर भारत के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इस प्रस्ताव का मकसद दक्षिण एशिया के लोगों खासकर भारतीय अमेरिकियों को निशाना बनाना है। बता दें कि अमेरिका में भारतीय मूल के अप्रवासियों की संख्या दूसरे नंबर पर है। अमेरिकन कम्यूनिटी सर्वे के 2018 के आंकड़े के मुताबिक अमेरिका में भारतीय मूल के 42 लाख लोग रहते हैं। भारत में जाति आधारित भेदभाव पर 1948 से ही प्रतिबंध है।
हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों को श्रद्धा से देखने की परंपरा रही है। लेकिन अब हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों की परंपरा को कलियुगी बाबा लगातार दागदार कर रहे हैं। इन दिनों बागेश्वर धाम का धीरेन्द्र शास्त्री चर्चा में है। बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री का भाई गुंडा निकल गया है। शास्त्री के भाई ने हथियारों के बल पर दलितों को धमकाया है, जिसका वीडियो वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडिया में बागेश्वर धाम वाले शास्त्री के भाई ने एक दलित महिला की शादी में घुसकर वहां मौजूद मेहमानों को पिस्तौल दिखाकर धमकाया।
समाजवादी पार्टी ने अपनी पार्टी के दो सवर्ण नेताओं को निष्कासित कर दिया है। इसमें पहला नाम रोली तिवारी मिश्रा जबकि दूसरा नाम ऋचा सिंह का है। ये दोनों नेता रामचरित मानस मुद्दे पर स्वामी प्रसाद मौर्य का लगातार विरोध कर रही थीं और मौर्य के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल रखा था। ऐसे में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के फैसले से साफ हो गया है कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के सवर्ण नेताओं की बजाय पिछड़े समाज के नेताओं के साथ खड़े हैं।