मायावती ने राम मंदिर पर दिया बड़ा बयान

नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने शनिवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीएम नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को सत्ता में रहते हुए लगभग पांच साल पूरे होने वाले हैं और लोकसभा 2019 का चुनाव भी नजदीक आ गया है, लेकिन पीएम मोदी ने सत्ता में आने से पहले लोगों से जो वादे किए थे उनमें से 50 फीसदी वादा उन्होंने पूरा नहीं किया. इसलिए पीएम मोदी और बीजेपी के लोगों को यह पता चल गया है इस बार वो सत्ता में नहीं आने वाले.

उन्होंने कहा कि बीजेपी वादा पूरा नहीं कर पाई हेै और  छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव में  बुरी तरह पिछड़ रही है, 2019 में होने वाले चुनाव में अपनी हार तय मान रही है इसी लिए वो फिर से राम मंदिर के मुद्दे का राग अलाप रही है. राम मंदिर को हमेशा से वो चुनावी मुद्दा बनाते रहे हैं. अगर भावनाएं अच्छी होती तो राम मंदिर के लिए पांच साल का भी इंतजार नहीं करना होता. उन्होंने कहा कि राम मंदिर पर आजकल जो भी वीएचपी और शिवसेना कर रही है, वो इनकी ही साजिश है.

बसपा प्रमुख मायावती ने भीम आर्मी के चंद्रशेखर के उस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने की बात कही थी. मायावती ने कहा कि भीम आर्मी और बहुजन यूथ फॉर मिशन 2019 जैसे संगठन विपक्ष के इशारों पर भोले-भाले लोगों को बहकाने का काम कर रहे हैं. ऐसे संगठन बसपा के बढ़ते कदम में रोड़ा हैं. उन्होंने कहा कि बसपा को मालूम चला है कि ऐसे संगठन हमारे विपक्ष द्वारा पर्दे के पीछे से चलाए जा रहे हैं. जो लोग भी बसपा विरोधी संगठनों को चला रहे हैं वह दलित कालोनियों में रहने वाले हमारे भोले- भाले लोगों को बता रहे हैं कि वह मायावती को प्रधानमंत्री बनाएंगे.

बसपा के कार्यकर्ताओं को इन संगठनों से सावधान रहने की जरुरत है, क्योंकि ऐसे संगठन हमारे नाम पर लोगों की भावनाओं के साथ खेल रहे हैं. उन्होंने कहा कि बसपा सभी धर्मो और जातियों की पार्टी है. व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे संगठन बन रहे हैं. इस तरह के संगठन चलाने वाले लोग लोगों से अपना व्यवसाय चलाने और अपने कार्यक्रमों में लोगों को इकट्ठा करने के लिए कह रहे हैं.

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एमपी और छत्तीसगढ़ में तीसरी ताकत बनने की आस में जुटी बसपा

लखनऊ। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य मुकाबला भले ही बीजेपी-कांग्रेस के बीच हो लेकिन बीएसपी तीसरी ताकत बनने की उम्मीद से मैदान में है. कर्नाटक में एक सीट जीतकर सरकार में शामिल होने के बाद से बीएसपी का हौसला और बढ़ गया है. यही वजह है कि पार्टी ने इन राज्यों में पूरी ताकत झोंक दी है. चुनाव प्रचार की कमान खुद मायावती ने अपने हाथ ले ली है और लगातार रैलियां कर रही हैं. पार्टी का मानना है कि कुछ सीटें जीतकर कांग्रेस और बीजेपी को अकेले सत्ता में आने से रोक दें तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी.

कर्नाटक की तर्ज पर जोगी से गठबंधन

कर्नाटक में बीएसपी ने जेडीएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. वहां बीजेपी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी और कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी लेकिन बहुमत किसी के पास नहीं था. ऐसे में कांग्रेस ने जेडीएस का मुख्यमंत्री बनवाकर मिलीजुली सरकार बनवा दी. उसमें बीएसपी के एक मात्र विधायक को भी मंत्री बनाया गया. उसे ही ध्यान में रखते हुए मायावती ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और बीजेपी से अलग हटकर अजित जोगी की पार्टी जनता छत्तीसगढ़ के साथ गठबंधन किया है. वहां पिछले चुनाव में बीजेपी के पास 49 और कांग्रेस के पास 39 सीटें थीं. बीएसपी की कोशिश है कि बीजेपी की कुछ सीटें भी कम होती हैं और उनका गठबंधन कुछ सीटें ले आता है तो कर्नाटक जैसी स्थिति बन सकती है.

एमपी में पिछली बार थीं चार सीटें

मध्य प्रदेश में कई साल से बीजेपी सरकार है. कांग्रेस पिछली बार दूसरे नंबर की पार्टी थी. बीएसपी ने 4 सीटें जीती थीं. बीएसपी को उम्मीद है कि इस बार बीजेपी और कांग्रेस में कांटे का मुकाबला हो सकता है. ऐसे में बीएसपी कुछ सीट बढ़ाने में कामयाब हो गई तो यहां भी सरकार बनने में पेंच फंस सकता है. ऐसे में बीएसपी के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है.

मायावती खुद छत्तीसगढ़ में छह रैलियां कर चुकी हैं और मध्य प्रदेश में आठ रैलियां की हैं. राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर मध्य प्रदेश के प्रभारी हैं. वह कई महीने पहले से वहीं डटे हैं. इसके अलावा अन्य कार्यकर्ता और नेता भी वहां घर-घर प्रचार कर रहे हैं. खासतौर से सीमावर्ती जिलों में यहां के कार्यकर्ता मध्य प्रदेश के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर प्रचार कर रहे हैं.

अब राजस्थान में रैलियां

बीएसपी प्रमुख मायावती अब राजस्थान में सभाएं करेंगी. वहां बीएसपी 200 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है. हालांकि यहां उनकी सभाओं का कार्यक्रम अभी जारी नहीं किया गया है.

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आदि महोत्सव में आदिवासी कलाकारों ने देश-दुनिया को लुभाया

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में फैले मॉल संस्कृति के जाल के बीच स्थित ‘दिल्ली हॉट’ कला और संस्कृति के कद्रदानों के लिए एक अलग दुनिया है. इसी दिल्ली हॉट में आदिवासी कला और संस्कृति से परिचय कराने के लिए भारत सरकार की ओर से आदि महोत्सव का आयोजन किया गया है. यह महोत्सव 16 नवंबर से शुरू है और 30 नवंबर तक चलेगा. इस महोत्सव में अपने हुनर का प्रदर्शन करने के लिए देश भर से 600 कलाकार पहुंचे हैं.

यहां वो तमाम रंग देखने को मिलेंगे जो इस देश के मूलनिवासी आदिवासी समाज ने रचा है. इनकी कला की समझ पहुंचने वाले लोगों को दातों तले उंगुलियां दबाने पर मजबूर कर दे रही है. मसलन ओडिसा का कला, जिसे पोथि चित्रा या पटचित्रा कहा जाता है, छत्तीसगढ़ की गोंड कलाकृति औऱ मध्य प्रदेश का बैगा ट्राइबल आर्ट ऐसी अनोखी कला है, जिसे देखकर हर कोई हैरत में पर जा रहा है. इस महोत्सव में पूरे देश की आदिवासी संस्कृति एक साथ मौजूद है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश के हर हिस्से से आदिवासी कलाकार अपनी कला का रंग बिखेरने पहुंचे है. खास बात यह रहा कि हर कला की अपनी एक कहानी थी, जो स्थानीय आदिवासी समाज की कला के प्रति दीवानगी को भी दिखाता है.

इस महोत्सव के आयोजन की बात करें तो यह भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय और सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया है. इसका उद्घाटन उपराष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू ने किया. उद्घाटन सत्र के दौरान जनजातीय कार्य मंत्री जुआल ओरांव ने इसे आदिवासी संस्कृति, क्राफ्ट, नृत्य संगीत, व्यापार और खानपान का उत्सव कहा. इसमें शामिल होने के लिए आदिवासी कलाकारों को तमाम सुविधाएं भी दी गई हैं. सारा खर्च ट्राइफेड उठाता है. इस महोत्सव की ब्रांड एंबेसडर वर्ल्ड चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज मैरीकॉम हैं.

यह महोत्सव सिर्फ कलाकारों के लिए ही मौका नहीं है, बल्कि यह खरीददारों को भी देश की आदिम कला से परिचित करा रहा है. इसमें उमड़ रही भीड़ इस बात को साबित कर रही है कि आदिवासी कला को लेकर लोगों में जबरदस्त क्रेज है. दरअसल इस महोत्सव के तीन रंग हैं. आदिवासी कला, आदिवासी संस्कृति और आदिवासी व्यंजन. इस महोत्सव में पहुंचने वाले कला प्रेमियों को आदिवासी व्यंजनों से मुखातिब कराने के लिए 20 राज्यों से 80 आदिवासी शेफ मौजूद हैं, जबकि 200 कलाकारों के साथ 14 ट्राइबल डांस ग्रुप यहां बने एक विशेष मंच पर हर रोज अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. 15 दिनों के इस महोत्सव में देश की राजधानी में आदिवासी समाज को अपनी कला और संस्कृति को दुनिया के सामने रखने का मौका मिला है, तो वहीं कला संस्कृति के कद्रदानों को भी देश की आदि संस्कृति को समझने का मौका मुहैया कराया है.

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मेरठ में एक के बाद एक कई दलितों की हत्या

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मेरठ। उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिले मेरठ में एक के बाद एक कई दलितों की हत्या हुई है. पिछले कुछ महीनों में पांच दलितों की हत्या की खबर है. तुर्रा यह है कि इन तमाम हत्याओं के बावजूद प्रशासन अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाया है. घटनाक्रम के मुताबिक दो अप्रैल, 2018 भारत बन्द आन्दोलन के दौरान मेरठ के कचहरी पूर्वी गेट पर अकुंज जाटव नामक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. पुलिस ने आज तक भी केस नहीं खोला है. दूसरी घटना 04 अप्रैल, 2018 को फाजलपुर निवासी गोपी पारिया नामक युवक की सरेआम हत्या कर दी गई, जिसकी एफ. आई. आर. भी पुलिस ने अपने हिसाब से लिखी, पांच नामजदों में से पुलिस ने एक अभियुक्त की अभी तक गिरफ्तारी नहीं की है जिसका अपराध स0 390/18 थाना कंकरखेड़ा, मेरठ है. तीसरी घटना 04 मई, 2018 मोहकमपुर निवासी 22 वर्षीय विकास को उसकी प्रेमिका के घरवालों ने अपने घर बुलाकर जबरन जहर पिला दिया जिसकी उपचार के दौरान मौत हो गई. विकास के परिजनो ने चार लोगों के विरूद्ध मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन पुलिस ने आज तक भी एक भी अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं की है जिसका अपराध स0 278/2018 थाना टी.पी. नगर, मेरठ है. चौथी घटना दिनांक 09 अगस्त, 2018 उल्लेदपुर निवासी रोहित जाटव नामक युवक की गांव के ही कथित सवर्णों द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. रोहित के पिता ने गांव के ही नौ लोगों के विरूद्ध नामजद मुकदमा पंजीकृत कराया था, पुलिस ने अभी तक कुल 4 यवकों की गिरफ्तारी की है. पांच अभियुक्त पुलिस की पकड़ से अभी भी दूर है जिसका अपराध स0 230/18 थाना गंगा नगर, मेरठ है और उलटा पुलिस ने पीड़ित परिवार के विरुद्ध सगींन धाराओं में मकदमा दर्ज कर दिया. जबकि पांचवा मर्डर लंगूर स्वामी किशन लाल जाटव का है जिस की एफ आई आर तक दर्ज नहीं हुई है. पीड़ित परिवारों का आरोप है कि पुलिस उनकी एक नहीं सुन रही है और लगातार इस मामले में लीपापोती की कोशिश की जा रही है. पीड़ित परिवारों का आरोप सरकार को कठघरे में खड़ा करती है.

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समाजवादी पार्टी और मुस्लिम हित: मिथ या हक़ीक़त

आईये आज समाजवादी गुफ्तगू की जाये वह भी उत्तर प्रदेश के समाजवाद की. यह बात सबको मालूम है कि उत्तर प्रदेश में समाजवाद का मतलब समाजवादी पार्टी. अगर मैं यह सवाल करूँ कि क्या समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव मुस्लिमों के मसीहा हैं? तो शायद आप लोग चुप हो जायें. लेकिन अगर में यह कहूँ कि मुलायम सिंह यादव मुस्लिमों के राकस्टार हैं तो हर तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ेगी.

कितना अजीब है ना. दुनिया में हर प्रकार के प्रॉफ़ेशन/ कार्य से जुड़ा हुआ आदमी चैम्पियन तब कहीं जा कर बनता है जब वह आंकड़ों/ अचिवमेंट की एक लंबी फेहरिस्त (List)बना दे. उदाहरण के तौर पर सचिन तेंदुलकर इसलिये क्रिकेट का राक स्टार है कि उसने इस प्रॉफ़ेशन/ खेल में आंकड़ों की एक सीरीज खड़ी कर दी है. इसी प्रकार सेरेना विलियम्स या रोजर फ़ेडरर अपने प्रॉफ़ेशन/ खेल के राक स्टार हैं क्योंकि उन्होने अपने चुने हुये प्रॉफ़ेशन/ खेल में आंकड़ो का पहाड़ खड़ा कर दिया है. इसी तरह अभिनेता आमिर खान बॉलीवुड का राक स्टार है क्योंकि कि उसने अपनी एक के बाद एक आने वाली फिल्मों के ज़रिये एक नये प्रकार की परिभाषा गढ़ने की कामयाब कोशिश की है. अगर यहाँ सिर्फ इस तरह के उदाहरणों को दर्ज किया जाये तो एक दिलचस्प और आँखों मे चमक पैदा करनी वाली रिपोर्ट तैयार हो जायेगी.

कहना यह है कि ऊपर की लाइनों में दिये गये उदाहरणों में अगर कोई एक चीज़ कामन है, तो वह है किसी ख़ास प्रॉफ़ेशन/ कार्य में निपुण होना यानि क़ाबिल होना. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो पूरी दुनिया के सामने संबन्धित प्रॉफ़ेशन/ कार्य में शामिल लोगों की पहचान का एक सीधा सा हवाला उनकी क़ाबिलियत एवं चुने गये एरिया में उनके द्वारा स्थापित किये गये नये नये कीर्तिमानों के चमकते आंकड़ें हैं.

इस प्रस्तावना के बाद अब आते हैं आज के विषय की तरफ यानि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के मुस्लिमों का राक स्टार होने या नहीं होने के सवाल पर. हमारे हिसाब से तो मुलायम सिंह यादव पर मुस्लिमों का राक स्टार होने का बोझ बे मतलब डाला जा रहा है. हमारा मत बिल्कुल साफ और सीधा है. भाई! माननीय मुलायम सिंह यादव के पास किस चीज़ की कमी है कि वो मुस्लिमों का सहारा या मदद लें.

उनके हाथ में एक बड़ी राजनैतिक पार्टी है जिसके दम पर वह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कई बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनका दबदबा और राजनैतिक इच्छा शक्ति इतनी मज़बूत है कि जम्हूरीनिज़ाम (DemocraticSystem) में भीअपने बेटे को मुख्यमंत्री बना देते हैं. जबकि हम सब जानते हैं कि डेमोक्रेसी में ‘’राजा और उसके बाद उसका बेटा राजा’’जैसा सिस्टम नहीं होता फिर भी समाजवादी पार्टी के संस्थापक अपने बेटे को इसके विपरीत जा कर मुख्यमंत्री बनाते हैं. अब आप ही बताइये कि जब अखिलेश यादव बिना किसी दिक़्क़त के पूरे पाँच साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहते हैं तो उन्हे या उनकी पार्टी को “ऊल जलूल हरकत करने वाले,असभ्य, गैर पढ़े लिखे और बेगारी को आतुर” मुस्लिमों की ज़रूरत कहाँ पड़ी? भाई जब मुख्यमंत्री पिता के बाद बेटा भी मुख्यमंत्री बन जाये तो ऐसी पार्टी को जुम्मन और लड्ड्न की चौखट का मुँह देखने की क्या ज़रूरत ?

पर क्या किया जाये, हमारे मिलने जुलने वालों में विविधता बहुत है. इसलिये बहुत बार ऐसा होता है कि उम्र दराज़ नगर वासियों की संगत में मेरा जैसा आदमी भी ज़बान की ज़ोर पर मुलायम सिंह यादव को मुस्लिमों का राक स्टार मानने के लिये विवश किया जाता है. यह लोग मेरे इतने करीब हैं और इससे कहीं ज़्यादा मासूम कि अखिलेश यादव को भी वही सारी उपाधि देते नज़र आते हैं जो उनके पिता श्री को 1990 के बाद से दे रखा है. इसको भी स्वीकार करने के लिये हमें विवश किया जाता है. अन्यथा मेरे जैसा इंसान किसी को राक स्टार या चैम्पियन तभी मानता है जब वह आंकड़ों/ सफलताओं से मुझे अपना हम ख्याल बना ले. जैसा कि इस आर्टिकल की शुरू की लाईनों में मैने उदाहरणों के ज़रिये बताया है.

आज के डिजिटल दौर में सुचनाओं की उपलब्धता भी एक विकराल समस्या ही मानी जानी चाहिये. यह बात इसलिये कह रहा हूँ कि मैं इस उपलब्धता की अधिक्ता का मारा हुआ हूँ. आप कहेंगे कि जब दुनिया इस उपलब्धता को अवसर या प्रसाद मान रही है तो आपको क्या हो गया है. सच बात तो यह है कि मैं अपने नगर वासियों को यह समझाने में लगा था कि आप लोग मुलायम सिंह यादव पर ज़बरदस्ती मुस्लिमों का राक स्टार होने का बोझ लादे जा रहे हैं. और नहले पे दहला यह है कि उनके बेटे अखिलेश यादव को भी वही सारी उपाधि दिये जा रहे हैं. मैंने ज़ोर दे कर कहा कि आप लोग इस तरह कि उपाधियों के ज़रिये समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उनके परिवार के साथ ज़्यादती कर रहे हैं क्योंकि वो लोग कभी इसे स्वीकारनहीं करते हैं.

इतने में एक साहब विकीपीडीया पेज खोले हुवे मोबाइल हाथ में लिये सामने आये और तेज़ आवाज़ मे कहा कि पढ़िये इसे. मैं मजबूर इंसान पढ़ने लगा, चौंकने वाली बात थी इसलिये आप भी पढ़िये. “समाजवादी पार्टी एक राजनैतिक दल है.यह 4 अक्तूबर 1992 को स्थापित किया गया. इसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री और देश के डिफेंस मिनिस्टर रह चुके हैं….समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में आधारित है. इसके समर्थन में बड़े पैमाने पर ओबीसी,दलित ,शोषित विशेष रूप से मुलायम सिंह की अपनी जाति और मुसलमानों पर आधारितहै”.

ऊपर के पैराग्राफ को तेज़ आवाज़ में पढ़ने का नुक़सान यह हुआ कि आखिरी लाइन आते ही नगर वासियों का जोश आसमान पर पहुँच गया. अब में क्या करता, वो लोग बोल रहे थे कि देखिये विशेष रूप से यादवों और मुसलमानों को इस पार्टी का समर्थक बताया गया है. मैं असहाय इंसान मुलायमवाद से अखिलेशवाद तक का सफर तय कर चुकी भीड़ के सामने चुप्पी साधे खड़ा था. हालांकि यह स्थिति देर तक नही रही लेकिन इतने कम समय मे ही मुझे अपनी स्थिति का अंदाज़ा हो गया था.

मैं भी आसानी से हार मानने वाला नहीं था इसलिये हौसला जुटाया और बैकफूट से फ्रंटफूट पर आ गया. भीड़ मे से ही एक साहब का मोबाइल उधार लिया उत्तर प्रदेश विधान परिषद की वेबसाइट को सबके सामने खोला. भला हो इस वेबसाइट के बनाने वालों का जिन्होंने दलों के नाम से इस सदन के सदस्यों की लिस्ट को सामने ही रखा है. हमने भी नगर वासियों का आज़माया हुआ नुस्खा उन्ही पर इस्तेमाल किया और विकिपीडिया की आखिरी लाइन समाजवादी पार्टी के मुख्य समर्थक यादव और मुसलमान हैं को दोहराते हुये कहा कि देखिये आप लोग इस लिस्ट मे कहाँ हैं?

फिर क्या था समाजवादी पार्टी कि तरफ से विधान परिषद मे भेजे जाने वाले 55 सदस्यों मे से 17 सदस्य यादव निकाल आये और सिर्फ 6 सदस्य मुस्लिम. यह देखने के बाद बहुतों के चेहरे के हाव भाव बदल गये. कुछ को यकीन नही हुवा तो उन्होने अपने अपने मोबाइल मे इस सदन की लिस्ट देखी तो किसी ने कहा कि यह कैसे हो सकता है जबकि हमने हमेशा समाजवादी पार्टी को अपना वोट दिया और मुलायम सिंह यादव को अपना रहनुमा मानते रहे हैं. ज़्यादा जागरूक लोगों ने कहा कि अखिलेश तो आबादी के अनुपात मे रिज़रवेशन की माँग करते हैं परंतु अपनी पार्टी में इसके विपरीत? अखिलेश ने ही 2011 के मेंफेस्टो में 18 प्रतिशत मुस्लिम रिज़रवेशन का वादा भी किया था. ज़ाहिर है कि यह रिज़रवेशन आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े मुस्लिमों को मिलना था जिनकी आबादी मुस्लिमो की कुल आबादी का 14 से 16 प्रतिशत मानी जाती है. यह तो समाजवादी पार्टी की मुस्लिमों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी है. तभी किसी ने फिर विकिपीडिया के आखिरी लाइन यादव और मुस्लिम इस पार्टी के मुख्य समर्थक हैं, को दोहराया.

यक़ीन मानिये मासूम जनता के इस तरह के सवालों ने मेरे जैसे मायूस इंसान में भी एक नई उमंग पैदा कर दिया था. लोहा गरम देख कर मैंने भी दबदबे के साथ कहा कि आप लोगों को पता है कि उत्तर प्रदेश में आपके समाज की आबादी कितनी है? उत्साहित लोगों ने मेरी तरफ देखा तो मैंने 2011 की जनगणना के हिसाब से लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होना बताया. अब लोगों ने खुद ही हिसाब लगाना शुरू कर दिया कि आबादी के हिसाब से उनकी हिस्सेदारी कितने प्रतिशत बनती है और अब तक उनको कितना हिस्सा दिया गया है.

अपनी आबादी का सही प्रतिशत जानने के बाद नगर वासियों के अंदर जो मैंने जिज्ञासा देखी तो उससे अंदाज़ा हुआ कि यह वही लोग हैं जिन्होंने कांशीराम को यह कहते हुये सुना है कि जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी. इन लोगों ने अखिलेश को भी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी मांगते हुवे सुना है. उनके जोशीले चेहरों को देखने के बाद मेरी यह ग़लत फहमी भी दूर हो गयी कि लोग कुछ करना नही चाहते या बदलाव नही चाहते.

आंकड़ो को पेश करते ही आबादी के अनुपात में नुमाइन्दगी का मामला बहुत कम समय मे ही एक गंभीर सवाल बन गया. बात यहाँ तक पहुंची कि मुझे अपनी पहली वाली बात पर दोबारा विचार करना पड़ा कि डिजिटल दौर में सूचनाओं की आसान उपलब्धता को समस्या कहना शायद सही नही है. क्योंकि मेरे घर कि तरफ कदम बढ़ाने से पहले ही कई लोगों ने बहुत क़ायदे से सूचनायें इकट्ठा कर ली थी और सवाल कर रहे थे कि लगभग 9 प्रतिशत यादव आबादी और 17 विधान परिषद सदस्य यादव जाति से ?

अब मेरे घर जाने का वक़्त हो चुका था लेकिन चलने से पहले कुछ बातें साफ हो गयी थीं. पहली तो यह कि जिस जनता को लोग ना समझ मानते हैं अगर उन्हे स्थिति का सही अनुमान हो जाये तो बड़े बड़े होशियार की होशियारी को बेकार करने मे देर नहीं लगेगी. दूसरी यह कि डिजिटल दौर मे सामने आने वाले सोशल मीडिया को सही दिशा मे मोड़ दिया जाये तो जनता 19 प्रतिशत आबादी पर 6 सदस्य और 9 प्रतिशत पर 17 सदस्य के आंकड़ों की मदद से वर्तमान के राक स्टारों/ चैम्पियनों का बोझ उतार देगी. यह भी संभावना है कि लोग इसी तरीक़े को अपनाते हुवे पहले के राक स्टारों से भी अपने अधिकारों का हिसाब मांगने लगें. शायद इसी तरह शोषित लोगों को पता चले कि उन्होने बहुत से लोगों पर ग़लत भरोसा किया था और उन्हे अपना राक स्टार वगैरह कहा था.

मैं निजी तौर पर भारत जैसे देश में इस तरीक़े को ParticipativeDemocracy का अहम हिस्सा मानता हूँ क्योंकि यहाँ बनने वाले हर तरह के चुनावी समीकरण में सभी दल,सत्ताधारी दल को हटा कर खुद स्थापित होना चाहते हैं और एक बड़े तबक़े को ब्यवस्था एवं राजकाज से दूर रखना चाहते हैं. वैसे भी जम्हूरियत में स्थायित्व या किसी दल विशेष के एक छत्र अधिकार को अच्छा संकेत नही माना जाता है.

अब देखते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को अभी भी कोई राक स्टार चाहिये या आबादी के अनुपात में नुमाइन्दगी.

ज़ुबैर आलम

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25 को सवाई माधोपुर आएंगी बसपा सुप्रीमो मायावती

सवाई माधोपुर। बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती 25 नवम्बर को सवाई माधोपुर आएंगी. इस दौरान वह सवाई विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी हंसराज मीना के लिए सभा कर मतदाताओं से बसपा को वोट देने का आह्वान करेंगी. यह जानकारी बसपा के राज्यसभा सांसद एवं मुख्य कोऑर्डिनेटर अशोक सिद्धार्थ ने पत्रकार वार्ता के दौरान दी.

इस मौके पर राजस्थान के कोऑर्डिनेटर हरिसिंह तेंगुरिया, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश मीना आदि उपस्थित थे. इस दौरान बसपा सांसद सिद्धार्थ ने बताया कि प्रदेश की कई सीटों बसपा के भाजपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों से सीधा मुकाबला है. सवाई जिले की चारों विधानसभा सीटों पर बसपा ने उम्मीदवार खड़े किए हैं. 25 नवंबर को दोपहर 12:30 बजे इंदिरा मैदान में सभा को संबोधित करेंगी. इसके बाद करौली में सभा को संबोधित करेंगी.

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Women’s World T20: सेमीफाइनल में बाहर हुई टीम इंडिया

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एंटीगा। सर विवियन रिचर्डस स्टेडियम में शुक्रवार को खेले गए आईसीसी महिला वर्ल्ड टी20 के दूसरे सेमीफाइनल में भारतीय टीम को इंग्लैंड के हाथों 8 विकेट से हार का सामना करना पड़ा है. भारत ने टॉस जीतकर 19.3 ओवरों में सभी विकेट गंवाकर 112 रन बनाए. जवाब में इंग्लैंड ने सिर्फ दो विकेट गंवाकर 17.1 ओवर में 116 रन बनाकर मैच अपने नाम कर लिया.

इंग्लैंड की ओर से नतेली स्कीवर ने 54 और एमी जोंस ने 53 रन बनाए. भारत की ओर से राधा यादव और अंजू पाटिल ने एक-एक विकेट लिया. रविवार को फाइनल में इंग्लैंड का सामना ऑस्ट्रेलिया से होगा जिसने पहले सेमीफाइनल में गत चैंपियन वेस्ट इंडीज को हराकर लगातार पांचवीं बार फाइनल में जगह बनाई है.

113 रनों का लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और सिर्फ चार के स्कोर पर ही उसकी सलामी बल्लेबाज टैमी ब्यूमोंट सिर्फ एक रन बनाकर आउट हो गईं. उन्हें राधा यादव की गेंद पर अरुंधति रेड्डी ने कैच किया. इसके बाद डेनियल वॉट 8 रन बनाकर दीप्ति शर्मा का शिकार बनीं.

इस तरह 5 ओवरों में 24 पर इंग्लैंड को दो विकेट गिर चुके थे और भारत को यहां थोड़ी उम्मीद जगी थी लेकिन विकेटकीपर एमी जोन्स और नताली स्कीवर ने भारतीय गेंदबाजों को कोई मौका नहीं दिया और 92 रनों की नाबाद साझेदारी करते हुए अपनी टीम को जीत दिला दी. जोन्स ने 47 गेंदों पर तीन चौकों और एक छक्के की मदद से 53 और स्कीवर ने 39 गेंदों पर 5 चौकों की मदद से 53 रन बनाए.

इससे पहले, स्मृति मंधाना (34) ने भारतीय टीम को अच्छी शुरूआत दी लेकिन वह अधिक देर तक मैदान पर नहीं टिक सकीं. सोफी एक्लेस्टोन ने 43 के स्कोर पर स्मृति को पविलियन का रास्ता दिखाया. टीम के खाते में 10 रन ही जुड़ पाए थे कि सलामी बल्लेबाज तान्या भाटिया (11) भी पविलियन लौट गईं. उन्हें हीथर नाइट की गेंद पर नटाली स्कीवर ने कैच आउट किया.

जेमिमाह रोड्रिगेज (26) ने कप्तान हरमनप्रीत कौर (16) के साथ टीम की पारी को संभालने की कोशिश की. दोनों ने 36 रनों की साझेदारी कर टीम को 89 के स्कोर तक पहुंचाया लेकिन इसी स्कोर पर टैमी ब्यूमाउंट और एमी जोन्स ने जेमिमाह को रन आउट कर भारतीय टीम का तीसरा विकेट भी गिरा दिया.

हरमनप्रीत ने इसके बाद भारतीय टीम की अनुभवी बल्लेबाज वेदा कृष्णमूर्ति (2) के साथ टीम को मजबूत करने की कोशिश की लेकिन क्रिस्टी जॉर्डन ने इस योजना को विफल कर दिया. जॉर्डन ने 93 के स्कोर पर वेदा को जोन्स के हाथों कैच आउट कर पविलियन भेजा. 16वें ओवर की पहली गेंद पर वेदा का विकेट गिरा और इसी ओवर की आखिरी गेंद पर क्रिस्टी ने हरमनप्रीत को भी पविलियन का रास्ता दिखा दिया.

छठे विकेट के लिए दीप्ति शर्मा (7) और डेलन हेमलता (1) मैदान पर उतरीं लेकिन इंग्लैंड टीम की कप्तान नाइट ने यहां भारतीय टीम को बड़ा झटका दिया. उन्होंने 99 के कुलयोग पर पहले हेमलता को और उसके बाद इसी स्कोर पर अनुजा पाटिल को पवेलियन की राह दिखाई. अनुजा खाता भी नहीं खोल पाई थीं. भारतीय टीम ने 100 का आंकड़ा पार करने से पहले ही अपनी सात बल्लेबाजों को गंवा दिया.

इसके बाद दीप्ति का साथ देने आईं राधा यादव (4) भी अधिक समय तक मैदान पर नहीं टिक पाईं और 104 के स्कोर पर रन आउट होकर पविलियन लौट गईं. भारतीय टीम के खाते में आठ रन ही जुड़ पाए थे कि सोफी ने इस मैच में अपने दूसरे विकेट के रूप में अरुणधति रेड्डी (6) को आउट किया.

रेड्डी का विकेट 112 के स्कोर पर गिरा और इसी स्कोर पर इंग्लैंड की गेंदबाजों ने दीप्ति को भी रन आउट कर भारतीय टीम की पारी समाप्त कर दी. इंग्लैंड के लिए

गौरतलब है कि भारतीय टीम ने इस वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल से पहले तक हर मैच में एकतरफा प्रदर्शन किया, लेकिन आज उसका सामना उस टीम से था, जिसने एक साल पहले भारत को वनडे विश्व कप का खिताब जीतने से रोका था.

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बड़े मकसद के लिए छोटी कुर्बानी, मायावती की यही है चुनावी रणनीति की कहानी

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छत्तीसगढ़ चुनावों के दौरान बसपा प्रमुख मायावती से जब यह सवाल पूछा गया कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वह भाजपा या कांग्रेस में से किसका समर्थन करेंगी तो उन्होंने बेहद साफगोई से जवाब दिया कि दोनों में किसी का भी नहीं. उनके अनुसार ऐसा कुछ करने के बजाय वह विपक्ष में बैठना पसंद करेंगी. मायावती का आरोप है कि इन दोनों दलों में से किसी ने भी दलितों, गरीबों और वंचितों के लिए कुछ नहीं किया. इन दोनों दलों से समान दूरी बनाते हुए उन्हें नागनाथ और सांपनाथ बताना बसपा के संस्थापक कांशीराम का सिद्धांत था. मायावती उसे ही दोहरा रही हैं. हालांकि कांशीराम और मायावती, दोनों ने समय-समय पर अपने इस सिद्धांत से समझौता भी किया. मायावती अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बना चुकी हैं और उसी दौरान उन्होंने दलितों के लिए काफी काम भी किए हैं. आंबेडकर ग्राम जैसी अवधारणा ने उसी दौरान आकार लिया.

बहरहाल मायावती का हालिया बयान कई सवालों को समेटे हुए है. मसलन क्या यह रणनीति छत्तीसगढ़ चुनाव तक ही सीमित है या 2019 के चुनाव को लेकर चल रही महागठबंधन की कवायद में भी वह कांग्रेस से दूरी बनाकर रखेंगी? संभव है कि ऐसा ही हो, क्योंकि वह ऐसे ही संकेत दे रही हैं और मायावती से गठजोड़ की पींगें बढ़ा रहे सपा के अखिलेश यादव भी इन दिनों कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं. हालांकि हालात को देखते हुए उन्हें कांग्रेस को साथ में लेना पड़ सकता है. फिर भी यदि ऐसा नहीं हुआ तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-रालोद गठजोड़ मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है. मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखा जाए तो ऐसा परिदृश्य भाजपा के लिए फायदेमंद होगा.

छत्तीसगढ़ में बसपा और अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के रूप में उभरा तीसरा ध्रुव भाजपा का ही काम आसान कर रहा है. मध्य प्रदेश में भी बसपा कांग्रेस के मतों को ही विभाजित करेगी. हालांकि यह भी संभव है कि सत्ता विरोधी रुझान के कारण यह बिखराव बहुत ज्यादा न हो. मायावती की रणनीति में उत्तर प्रदेश से बाहर के राज्यों में सशक्त हस्तक्षेप एक महत्वपूर्ण पहल है. वैसे भी देश के लगभग प्रत्येक राज्य में दलित समाज है तो मायावती की कोशिश उनमें पैठ बनाकर उसे चुनाव में भुनाने की है. इसके लिए वह छोटे दलों से गठजोड़ भी कर रही हैैं. कर्नाटक में भी उन्होंने जद-एस के साथ गठबंधन किया था. वहां बसपा का एक उम्मीदवार जीता भी. इसी विधायक को पार्टी ने दबाव बनाकर मंत्री भी बनवा दिया. कर्नाटक के इसी प्रयोग को मायावती दूसरों राज्यों में भी दोहरा रही हैं. इससे बसपा को कई फायदे होंगे. एक तो पार्टी को चुनावी चर्चा में जगह मिलेगी. दूसरा, अखिल भारतीय मौजूदगी के साथ ही मत प्रतिशत भी बढ़ेगा. तीसरा, पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा बनाए रखने में मदद मिलेगी जिस पर बीते कुछ चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद सवाल उठने लगे हैैं. इस लिहाज से कर्नाटक के बाद उन्होंने इन तीनों राज्यों में वही दांव चला है.

हालांकि मप्र और छत्तीसगढ़ में बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन की इच्छुक थी, लेकिन वह जितनी सीटें मांग रही थी कांग्रेस उतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी. इससे बात बनने से पहले ही बिगड़ गई और मायावती को चुनाव में तीसरे पक्ष के रूप में उतरना पड़ा. हालांकि इन चुनावों में पार्टी की भूमिका वोटकटवा की ही होगी, लेकिन यह उसके लिए कोई अपमानजनक स्थिति नहीं है. बसपा का राजनीतिक दर्शन ही यह है कि पहले हारेंगे और फिर हराएंगे. अपने इसी दर्शन के दम पर बसपा ने 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर किया था.

चुनाव में हारने की अपनी इसी ताकत को बसपा ने सियासी सौदेबाजी के अहम हथियार के रूप में विकसित कर धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक पूंजी बढ़ाई. फिर मुख्य परिदृश्य में उभरकर मतदाताओं में विश्वास जगाया और फिर विजेता बनकर उत्तर प्रदेश में राज किया. मौजूदा चुनावों में बसपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जो भी है वह पाना ही है. उत्तर प्रदेश से सटे मध्य प्रदेश के इलाकों में बसपा का अच्छा प्रभाव है. रीवांचल, चंबल और मुरैना क्षेत्र में भी बसपा प्रभावी संगठन है. हालांकि शेष मध्य प्रदेश में उसकी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है, फिर भी उसके पास छह प्रतिशत से ज्यादा मत हैं. इसी तरह छत्तीसगढ के बिलासपुर, जांजगीर संभाग और महाराष्ट्र की सीमा से लगे राज्यों के हिस्सों में भी उसकी मौजूदगी है. वैसे भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में दलित मतदाताओं का कुछ न कुछ आधार होता है. ऐसे में बसपा अपने सघन प्रभाव वाले क्षेत्रों में जीत भी दर्ज कर सकती है.

कई क्षेत्रों में वोटकटवा की भूमिका भी उसके राजनीतिक प्रभाव में उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकती है. छत्तीसगढ़ में जोगी की पार्टी का साथ भी बसपा को फायदा पहुंचा सकता है, क्योंकि जोगी की आदिवासियों के बीच गहरी पैठ है. इसीलिए ये दोनों मिलकर दलित-आदिवासी एकता का नारा भी बुलंद कर रहे थे. छत्तीसगढ में दलित आदिवासी मूलत: कांग्रेस का जनाधार रहे हैं. उसमें इस गठजोड़ द्वारा लगाई गई सेंध शायद कांग्रेस पर भारी पड़े. हालांकि राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में बहुत मेहनत की है, लेकिन वहां कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है.

पिछले विधानसभा चुनावों से पहले नक्सलियों ने राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व का सफाया कर दिया था. तिस पर बसपा-जनता कांग्रेस गठजोड़ ने उसे और कमजोर किया. छत्तीसगढ़ के उलट मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज नेता हैं. लिहाजा वहां कांग्रेस की जड़ों को कमजोर करना बसपा के लिए उतना आसान नहीं होगा. मायावती की रणनीति इन प्रांतों में अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव साबित कर 2019 के संसदीय चुनाव में बनने वाले महागठबंधन में अपना दावा मजबूत कर सीटों के बंटवारे में ज्यादा सीटें हासिल करने की है. वहीं अगर चुनाव बाद गठबंधन की सरकार बनती है तब वह सत्ता में अधिक हिस्सेदारी के लिए दबाव बना सकती हैं.

यह आम धारणा है कि मायावती के मन में प्रधानमंत्री पद की आकांक्षा है. अगर छोटे-छोटे दल मिलकर सरकार बनाते हैं तो उस स्थिति में मायावती प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावा ठोक सकती हैं. फिलहाल ऐसे ही आसार लग रहे हैं कि गठबंधन पहले राज्य स्तर पर बनेगा और फिर केंद्रीय स्तर पर उसका विकसित स्वरूप आकार लेगा. राज्यों के स्तर पर बनने वाले इन गठबंधनों में कई जगह कांग्रेस भी शामिल रहेगी, लेकिन वरिष्ठ नहीं, कनिष्ठ सहयोगी के रूप में. कांग्रेस जिन राज्यों में मजूबत स्थिति में हैं उनके साथ इन राज्यों में कनिष्ठ भूमिका के रूप में अपने प्रदर्शन से केंद्र में खुद को मजबूती दे सकती है. इस बीच यह भी देखना होगा कि फिलहाल कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने की बात करने वाली मायावती इस नीति पर कहां तक खरी उतरती हैं, क्योंकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं.

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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव : ‘यहां दलित राजनीति नहीं बल्कि दलितों के ख़िलाफ़ राजनीति है’

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कामनीबाई गवई

”वो हमसे वोट लेते हैं, चुनाव जीतते हैं, लेकिन बदले में वो हमें क्या देते हैं? कुछ नहीं. वो हमें कुछ नहीं देते. हम गोबर के कीड़ों जैसे हैं. अंबेडकर बाबा बोलकर गए थे कि गोबर के कीड़ों की तरह मत रहो लेकिन ये लोग हमें ऐसे रहने का मजबूर करते हैं.”

मध्य प्रदेश के महू शहर में रहने वाली कामनीबाई गावई अपने हालातों को कुछ इस तरह बयां करती हैं. मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इससे पहले जनता का हाल जानने की कड़ी में हम महू शहर में रुके. महू में डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म हुआ था. कामिनीबाई हाट मैदान के पास दलित-आदिवासी इलाके में रहती हैं जो महू शहर के मध्य में है. इस इलाके का नाम बुद्ध नगर है.

यहां पर एक-दूसरे सटे आधे से एक फुट चौड़े और 10-12 मीटर लंबे पांच घर हैं. असल में वहां घर ही नहीं हैं बल्कि ये 100-150 वर्ग फीट की कच्ची झोपड़ियां हैं. इनमें से एक या दो घरों को अपवाद कह सकते हैं. किसी भी घर में खिड़की नहीं है. छतों पर ढकी परतों के कोनों से थोड़ी धूप आ जाती है. इन घुटन भरे कमरों में बदबू आती रहती है. 70 साल की कामिनीबाई अंबेडकर की जन्मस्थली को देखने के लिए अपने पति के साथ महू आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं. वह यहां पर 50 सालों से ज़्यादा समय से रह रही हैं. उनके बच्चों की शादी भी यहीं हुई है. उनकी बहू, दामाद और पोते-पोतियां हैं.

अंधेरे में घर और ज़िंदगी

वह पतली गलियों से होते हुए मुझे अपने घर लेकर गई. उनके छोटे से कमरे में अंधेरा था और कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था. जब मैंने बहुत ध्यान से देखा तो वहां उनकी बेटी और बेटी के बच्चे चारपाई पर बैठे थे. बेटी छुट्टियों में अपनी मां के घर आई हुई थीं. फिर मैंने और देखने की कोशिश की तो एक गैस सिलिंडर और चारपाई के पास स्टोव, कुछ बर्तन और रस्सी पर टंगे कपड़े नज़र आए. वहीं, बाबा साहेब अंबेडकर की फोटो भी लगी थी.

कामनीबाई कहती हैं, ”मैं कूड़ा उठाकर पैसे कमाती हूँ. मेरी बेटी यहां आई है लेकिन मेरे पास ​उसे साड़ी दिलाने के पैसे नहीं है. मुझे उधार लेना पड़ेगा लेकिन ब्याज़ चुकाने में बहुत मुश्किल आती है. मुझे उसे साड़ी देनी होगी इसलिए अब सोच रही हूं कि कहीं और से पैसे मिल जाएं.” ऐसे हालात में जीने वालों में यहां ​कामनीबाई अकेली नहीं हैं. हर कोई यहां ऐसी ही ज़िंदगी जी रहा है. अधिकतर लोग कूड़ा बीनकर और घरों में सफाई का काम करके ही घर चलाते हैं. इसके बाद हम स्थानीय दलित नेता मोहनराव वाकोड़े के पास गए और लोगों के इस हाल के बारे में बात की.

उन्होंने कहा, ”यहां लोगों की स्थिति दयनीय है. वहां कोई नहीं जाता. उन्हें कई योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है लेकिन यहां उसका नामोनिशान तक नहीं है. यहां रहने वाले लोग इंदौर शहर की सफाई करते हैं और इंदौर देश का सबसे साफ शहर है लेकिन कोई भी इन लोगों का ध्यान नहीं रखता.”

डॉ. भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली

दलितकोई मुद्दा ही नहीं

महू शहर की कुल जनसंख्या एक लाख है जिनमें से 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति से हैं. इन 15 प्रतिशत में से करीब 5000 महाराष्ट्र से आप्रवासी हैं जो महू में रहने लगे हैं. अधिकतर आप्रवासी अकोला या उसके आसपास के इलाकों से हैं.

महू में कामनीबाई और अन्य दलितों की बदहाली, मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की झलक देती है. दूसरे राज्यों के मुक़ाबले मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की ख़ास जगह नहीं है. बीजेपी और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दलितों के लिए कई वादे किए हैं. लेकिन, असल चुनावी अभियान में दलित मुद्दा केंद्र में तो छोड़ो उसके आसपास भी नहीं है.

स्थानीय अख़बार ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ के संपादक प्रकाश हिंदुस्तानी कहते हैं, ”इस क्षेत्र में दलित राजनीति अपने आप में पिछड़ी हुई है. इस राज्य में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसी दलित राजनीति नहीं होती. यहां ग्रामीण और कृषि संबंधी मुद्दे प्रमुख हैं. आदिवासियों की जनसंख्या ज़्यादा है. यहां तक कि भानुसिंह सोलंकी जैसा सिर्फ़ एक नेता उप-मुख्यमंत्री के पद पर पहुंच पाया है. और किसी को ऐसी सफलता नहीं मिली.”

पिछले विधानसभा चुनावों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के चार विधायक जीते थे. ​पार्टी को सिर्फ 6.5 प्रतिशत वोट मिले थे. प्रकाश हिंदुस्तानी मानते हैं, ”अनुसूचित जाति के लोग चुप रहने वाले मतदाता हैं. वह आमतौर पर सामने नहीं आते हैं लेकिन पोलिंग के दौरान पूरी तरह काम करते हैं. ‘सपाक्स’ और ‘जयास’ यहां उभरकर आए हैं लेकिन बीएसपी को अब भी बढ़त हासिल है.”

क्या है सपाक्स और जयास

‘सपाक्स’ का मतलब है ‘सामान्य, पिछड़ा-वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण समाज’. यह सेवानिवृत्त हो चुके सरकारी अधिकारियों का संगठन है. उन्होंने पदोन्निति में आरक्षण के विरोध में ओबीसी और अल्पसंख्यकों को इकट्ठा किया था. इस संगठन ने भी आने वाले चुनाव में उम्मीदवार उतारे हैं. ‘सपाक्स’ एक तरह से ‘अजाक्स’ के विरोध में बनाई गई है. अजाक्स राज्य सरकार में काम करने वाले अनुसूचित जाति के अधिकारियों का संगठन है.

वहीं, ‘जयास’ का मतलब है ‘जय आदिवासी शक्ति संगठन’. इस संगठन ने आदिवासी इलाकों से आदिवासियों को एकजुट करने की कोशिश की है. लेकिन, संगठन इन चुनावों में कांग्रेस से गठबंधन कर रहा है. लेकिन ‘जयास’ के विरोध में कोई अनुसूचित जाति का संगठन क्यों नहीं है? हमने ये सवाल स्थानीय एससी नेता जी.डी. जारवाल से पूछा.

उन्होंने कहा, ”बड़ी पार्टियों के नेताओं ने दलित नेतृत्व को दबाया है. कई बार दलित नेता ख़ुद को सिर्फ़ अपनी पार्टी तक सीमित कर लेते हैं. वह समाज के मुक़ाबले पार्टी के प्रति ज़्यादा समर्पित रहते हैं.” जारवाल ख़ुद कांग्रेस के लिए काम करते हैं. हमने उनसे पूछा कि एक दलित नेता होने के नाते क्या उन पर भी यही बात लागू होती है क्योंकि उन्होंने भी चुनाव नहीं लड़ा है.

इस पर जारवाल कहते हैं, ”कई बार आर्थिक मुश्किलें होती हैं. एक संगठन को बनाने के लिए पैसे की जरूरत होती है. हम कहां से इतने पैसे लाएंगे? यह गरीब समाज है. परिवार में सिर्फ़ एक ही सदस्य कमाने वाला होता है. अगर आर्थिक हालत मजबूत होते हैं तो लोगों को दूसरी चीजों पर ध्यान देने और संगठन बनाने के लिए ज़्यादा समय मिलता है. बाकी जो लोग आर्थिक रूप से मजबूत हैं वो इन लोगों और ऐसी जगहों पर जाना नहीं चाहते.”

जारवाल इसके बारे में और बताते हैं, ”राज्य में दलित समुदाय तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है. पहली श्रेणी में वो लोग हैं जो आरक्षण से मिली स्थायी नौकरी या स्थिर ज़िंदगी ​जी रहे हैं. दूसरी श्रेणी में वो हैं जिन्हें शिक्षा मिल रही है और तीसरी श्रेणी मजदूरी करने वालों की है.”

”पहली श्रेणी को किसी संगठन या अभियान से कोई लेना-देना नहीं है. दूसरी श्रेणी को अपने करियर की ज़्यादा चिंता है इसलिए वो ऐसे संगठन या अभियान का हिस्सा नहीं बनते. वहीं, तीसरी श्रेणी अपनी रोजी-रोटी का इंतज़ाम ही करती रह जाती है. अब ऐसे हालात में कैसे कोई संगठन या नेता पनप सकता है?”

जारवाल एक और बात की तरफ ध्यान दिलाते हैं. वह कहते हैं, ”मध्य प्रदेश में दलित समुदाय कई जातियों में बंटा हुआ है. समुदाय में कोई एक संगठित आवाज़ नहीं है. कुछ अनुसूचित जातियां जैसे महार, अहीर, जाटव, बर्वा, कोरी, खटिक, रेगर, मालवीय बलाई बड़ी जातियां हैं. लेकिन, उनमें एकजुटता व सामंजस्य नहीं है और न ही कोई उस दिशा में कोशिश करता है.”

क्या सोचता है दलिता युवा

इस सामाजिक ढांचे के साथ मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की क्या स्थिति है? एक दलित युवक विवेक मुराडे कहते हैं, ”यहां कोई दलित राजनीति नहीं है बल्कि दलितों के ख़िलाफ़ राजनीति की जाती है. नेता अपने दलित पड़ोसियों को ही देखने नहीं जाना चाहते.”

बर्वा जाति से आने वाले विवेक के पास एमकॉम की डिग्री है और वह एक फाइनेंस कंपनी में काम कर रहे हैं. उन्हें हर महीने 15 हजार रुपये तनख़्वाह मिलती है. वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने परिवार में पहले व्यक्ति हैं.

विवेक एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां लोगों के बीचे कोई भेदभाव न हो और सबके साथ एक-सा व्यवहार किया जाए. सबके लिए समान नियम हों.

विश्लेषक क्या कहते हैं

महू में डॉ. बीआर आंबेडकर यूनिवर्सिटी में कुलपति डॉ. सीडी नाईक कहते हैं, ”इस राज्य में दलितों का कोई संगठन नहीं है. कुछ संगठन हैं भी तो उनके नेता अन्य दलों के साथ सौदेबाजी में व्यस्त रहते हैं. कुछ उभरते नेता सौदेबाजी में माहिर हैं.”

लेकिन डॉ. नाईक को लगता है कि ये हालात तेजी से बदल रहे हैं. बिरसा मुंडा, तांत्या भिल्ला जैसे आदिवासियों के प्रतिमानों की तरह भीमराव आंबेडकर भी यहां आदर्श हैं. दलित युवा आदिवासियों के साथ काम रहा है. शिक्षित युवा सोचता है कि उसे अपना नेतृत्व खुद बनाना है इसिलए वो अब सक्रिया हो गए हैं.

डॉ. नाईक कहते हैं, ”इस राज्य के दलित युवाओं में जिस जोश की कमी थी वो अब पूरी हो रही है. डॉ. आंबेडकर का कहना था, शिक्षित हों , संगठित हों और लड़ें. इसे लागू होने में अभी समय लगेगा. लेकिन, मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है. कोई नहीं कह सकता कि ये कब उभरकर सामने आएगी लेकिन ​निकट भविष्य में एक संगठन जरूर आएगा.”

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22 नवंबर को जन्मदिवस पर नमन, खूब लड़ी मर्दानी जो वो झलकारी बाई थी…

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1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी कुर्बानी दी. किन्तु बहुत से ऐसे वीर और वीरांगनाये है जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो सका. किन्तु उन्हें लोक मान्यता इतनी अधिक मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी. अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना हैं, जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित कर पाये. अपनी मातृ भूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए झलकारी बाई के दिये गये बलिदान को तब के इतिहासकार भले ही अपने स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सके हों किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारों, कवियों एवं लेखकों ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रद्धा के साथ स्वीकार किया.

वीरांगना झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1820 ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक सामान्य कोरी परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम सदोवा था. सामान्य परिवार में पैदा होने के कारण झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी में बचपन से विद्यमान था. थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था. प्रारम्भ में झलकारी बाई विशुद्ध घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा. धीरे–धीरे उसने अपने पति से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन गयी. इस बीच झलकारी बाई के जीवन में आई कठिनाइयों के दौरान उनकी वीरता और निखर कर सामने आई. इनकी भनक धीरे – धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई जिसके फलस्वरूप रानी ने उन्हें महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उसकी वीरता साहस को देखते हुए उसे महिला सेना का सेनापति बना दिया.

उन्हें सेनापति बनाने के पीछे वीरांगना झलकारी बाई की शक्ल थी, जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से हू-ब-हू मिलती थी. झांसी के अनेक राजनैतिक घटनाक्रमों के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई का अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती दूल्हा जी अग्रेंजी सेना से मिल गया था और झांसी के किले का ओरछा गेट का फाटक खोल दिया. उसी गेट से अंग्रेजी सेना झांसी के किले में कब्जा करने के लिए घुस पड़ी थी. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों की सेना से घिरता हुआ देख महिला सेना की सेनापति वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी. झलकारी बाई की शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी ही उसी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल बाहर निकाल दिया और अंग्रेजी सेना से स्वयं संघर्ष करती रही और शहीद हो गई. बाद में दूल्हा जी के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अंग्रेजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है. वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी भुला नहीं सकता. झलकारी बाई को नमन।

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ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा रन बनाने के बाद भी हारा भारत

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भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए पहले टी-20 मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को डकवर्थ लुईस नियम के तहत 4 रन से हरा दिया. शिखर धवन ने 76 रन की शानदार पारी खेली. लेकिन उनकी पारी भारत के काम न आ पाई और भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे की शुरुआत हार से हुई. ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 158 रन का स्‍कोर खड़ा किया. ऑस्‍ट्रेलिया पारी के दौरान आई बारिश की बाधा के कारण डकवर्थ-लुईस नियम के तहत भारत को जीत के लिए 17 ओवर में 174 रन बनाने का लक्ष्‍य मिला. जवाब में भारतीय टीम 169 रन ही बना पाई. यानी टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा रन बनाने के बाद भी हार गई. वीरेंद्र सहवाग ने ट्विटर पर इस पर चुटकी ली है.

गाबा मैदान पर भारत के आमंत्रण पर पहले बल्‍लेबाजी करते हुए ऑस्‍ट्रेलिया ने निर्धारित 17 ओवर में 4 विकेट खोकर 158 रन का स्‍कोर खड़ा किया. मेजबान टीम के लिए आक्रामक बल्‍लेबाज ग्‍लेन मैक्‍सवेल (46 ), क्रिस लिन (37) और मार्कस स्‍टोइनिस (नाबाद 33) प्रमुख स्‍कोरर रहे. ऑस्‍ट्रेलिया पारी के दौरान आई बारिश की बाधा के कारण डकवर्थ-लुईस नियम के तहत भारत को जीत के लिए 17 ओवर में 174 रन बनाने का लक्ष्‍य मिला. जवाब में भारतीय टीम 169 रन ही बना पाई. ऑस्‍ट्रेलिया के स्‍कोर का पीछा करते हुए भारत के लिए शिखर धवन ने 76 रन (42गेंद, 10 चौके और दो छक्‍के) बनाकर स्‍कोर को गति दी.

शिखर के पेवेलियन लौटने के बाद दिनेश कार्तिक ने 30 रन (13 गेंद, चार चौके और एक छक्‍का) और ऋषभ पंत ने 20 रन (15 गेंद, एक चौका और एक छक्‍का) बनाते हुए जीत की उम्‍मीदें बरकरार रखीं. आखिरी ओवर में भारत को जीत के लिए 13 रन की जरूरत थी लेकिन इस ओवर में क्रुणाल पंड्या और दिनेश कार्तिक के आउट होते ही टीम इंडिया के संघर्ष ने दम तोड़ दिया. भारतीय टीम 17 ओवर में सात विकेट खोकर 169 रन ही बना पाई और मैच में उसे चार रन की हार का सामना करना पड़ा.

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मध्यप्रदेश में 23 नवम्बर को बसपा प्रमुख की दो बड़ी रैलियां

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी के चार-दिवसीय चुनावी प्रचार अभियान के तहत् कल चौथेे दिन भी दिनांक 23 नवम्बर 2018 को दो चुनावी जनसभाओं को सम्बोधित करेंगी.

अपने चौथे दिन के चुनावी कार्यक्रम के तहत सुश्री मायावती जी कल दिनांक 23 नवम्बर को मध्य प्रदेश खजुराहो से हवाई यात्रा द्वारा सिंगरौली पहुँचकर वहाँ के एन.सी.एल. ग्राउण्ड, वेलोजी तेलियान में आयोजित पार्टी की पहली चुनावी जनसभा को सम्बोधित करेंगी, जबकि इनकी दूसरी चुनावी जनसभा रीवा ज़िले के एस.ए.एफ. ग्राउण्ड में दोपहर के समय निर्धारित है.

उल्लेखनीय है कि बी.एस.पी. 230-.सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा आमचुनाव में किसी भी पार्टी के साथ बिना गठबन्धन के अकेले ही अपने बल पर लगभग सभी विधानसभा की सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

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कांग्रेस-बीजेपी के बागियों से सपा-बसपा मजबूत

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बागियों के मैदान में उतरने से दोनों दलों की मुश्किलें बढ़ गयी हैं. वहीं, इन बागियों के जरिए सपा-बसपा मध्य प्रदेश में अपनी सियासी ताकत बढ़ाने में जुटी हैं.

मध्य प्रदेश की कुल 230 सीटों में से 30 से अधिक सीटों कांग्रेस-बीजेपी के बागी नेता मैदान में है. सियासी मैदान में शुरुआत से शांत दिख रही बसपा-सपा ने आखिरी समय में ऐसे खेल किया कि कांग्रेस-बीजेपी दोनों के कई सीटों पर राजनीतिक समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं.

सपा-बसपा ने बीजेपी-कांग्रेस के दमदार बागियों को सियासी मैदान में उतारकर दोनों ही पार्टियां छतरपुर, टीकमगढ़ और निवाड़ी जिलों की ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबले में आ गई हैं.

राजनगर सीट- कांग्रेस के बागी से सपा मजबूत

बुदेलखंड के छतरपुर जिले की राजनगर सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन चतुर्वेदी को पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने सपा का दामन थाम लिया है. सपा ने नितिन चतुर्वेदी को टिकट देकर अपने आपको मुकाबले में ले आई है. नितिन चतुर्वेदी का सीधा मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी और विक्रम सिंह से बताया जा रहा है. सत्यव्रत बेटे को जिताने के लिए जी जान से जुटे हैं.

बिजावर सीट पर राजेश शुक्ला सपा

छतरपुर जिले की बिजावर सीट पर भी ऐसा ही हाल है. बिजावर सीट पर बतौर कांग्रेस प्रत्याशी दो बार चुनाव हार चुके राजेश शुक्ला का टिकट काटकर कांग्रेस ने शंकर प्रताप सिंह बुंदेला को मैदान में उतारा है. जबकि राजेश कांग्रेस सेवादल के जिला अध्यक्ष थे. ऐसे में पार्टी से नाराज शुक्ला को सपा ने टिकट देकर मैदान में उतार दिया है, जिससे मुख्य मुकाबला सपा और कांग्रेस के बीच हो गया है.

महाराजपुर में बसपा

छतरपुर जिले की महाराजपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने युवा नेता नीरज दीक्षित टिकट दिया है. इससे कांग्रेस सेवा दल के जिला अध्यक्ष राजेश महतो ने पार्टी से बगावत कर बसपा का दामन थाम लिया है. ऐसे में वे बसपा के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में है. ऐसे में यहां मुकाबला बीजेपी के मानवेंद्र सिंह, कांग्रेस के नीरज और बसपा के राजेश के बीच होता दिख रहा है.

बीजेपी के बागी सपा के साथ

छतरपुर जिले में आने वाली चंदला विधानसभा सीट पर बीजेपी से बगावत करने वाली नगर पंचायत अध्यक्ष अनित्य सिंह बागरी को सपा ने उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी ने इस सीट पर मौजूदा विधायक आरडी प्रजापति के बेटे राजेश प्रजापति को मैदान में उतारा है.

अजय यादव हुए बागी

टीकमगढ़ की खरगापुर विधानसभा सीट से बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे राहुल सिंह को दोबारा प्रत्याशी बनाया है, जबकि वे पिछला चुनाव हार गए थे. इससे नाराज होकर पूर्व विधायक ने अजय यादव बीजेपी से बगावत कर बसपा से चुनावी मैदान में उतरे हैं.

जतारा सीट पर बीजेपी के बागी

जतारा विधानसभा सीट से बीजेपी ने पिछला चुनाव हार चुके हरिशंकर खटीक को फिर प्रत्याशी बना दिया. बीजेपी से नाराज जिला पंचायत सदस्य अनीता खटीक सपा के टिकट लेकर मैदान में हैं. कांग्रेस ने यहां शरद यादव की पार्टी लोक जनतांत्रिक दल के उम्मीदवार विक्रम चौधरी को समर्थन दे दिया है. इससे कांग्रेस के मौजूदा विधायक दिनेश अहिरवार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं.

सागर से कांग्रेस के बागी

सागर विधानसभा सीट से कांग्रेस से बगवात कर जगदीश यादव सपा से टिकट लेकर चुनावी मैदान में हैं. इसी तरह दमोह और पथरिया सीट से भाजपा के पूर्व मंत्री और बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रामकृष्ण कुसमारिया ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है. वे पिछला चुनाव राजनगर से हार गए थे.

बीजेपी के कई बागी निर्दलीय मैदान में

बीजेपी के जितेंद्र डागा भोपाल के हुजूर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी पर चुनाव लड़े रहे हैं. जबलपुर से बीजेपी के युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष धीरज पटेरिया निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में है. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट बरघाट विधायक कमल मर्सकोले भी निर्दलीय मैदान में है. बैहर सुरक्षित सीट से बीजेपी के बागी सुधीर कुसरे निर्दलीय मैदान में हैं.

बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी वारासिवनी सीट से बागी गौरव पारधी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. यहां से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साले संजय सिंह मसानी चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे ही ग्वालियर की पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता ने बीजेपी से बगावत कर चुनाव मैदान में उतरी हैं.

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जातीय राजनीति के शिकार सुपर 30 के आनंद कुमार

कौन कितना प्रतिभाशाली है, ये उस व्यक्ति के काम की तुलना में उसकी जाति से समझना लोग ज़्यादा प्रामाणिक मानते हैं. जब व्यक्ति सवर्ण नहीं हो और उसकी प्रतिभा की चर्चा हो रही हो तो उन्हीं सवर्णों के कान खड़े हो जाते हैं. लोग उसकी क़ाबिलियत पर सवाल खड़ा करने लगते हैं.” यह भारतीय समाज की सच्चाई है. दुनिया भर में अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ने वाले सुपर 30 के संस्थापक आनंद कुमार इन दिनों भारतीय समाज की इसी कड़वी सच्चाई से जूझ रहे हैं.
आनंद पटना से 25 किलोमीटर दूर देवधा गांव के रहने वाले हैं. जाति की दृष्टि से यह गांव भूमिहार और कहार बहुल है. इस गांव को लोग जितना इस गांव के नाम ‘देवधा’ से जानते हैं उससे ज़्यादा इसे आनंद कुमार के गांव के रूप में जाना जाता है. दुनिया आनंद की प्रतिभा के लिए उन्हें सलाम करती है. आनंद के पढ़ाए सैकड़ों स्टूडेंट्स दुनिया भर की नामी गिरामी कंपनियों में काम कर रहे हैं, जहां लोग उन्हें आनंद सर के स्टूडेंट्स के नाम से जानते हैं. लेकिन आनंद के अपने ही गांव के ज्यादातर सवर्णों को आनंद पर गर्व नहीं, जलन है. वो आनंद को एक महान प्रतिभाशाली इंसान के तौर पर नहीं बल्कि पर एक ‘कहार’ के बेटे के तौर पर देखते हैं. और आज भी खुद को जाति के आधार पर आनंद से श्रेष्ठ मानते हैं.
आनंद कुमार ने भूमिहार जाति में शादी की है.
गांव के कुछ लोग इस बात को लेकर आनंद कुमार पर नाराज रहते हैं कि उनके गांव के किसी बच्चे का आज तक सुपर 30 में एडमिशन नहीं हुआ. न किसी भूमिहार का और न ही आनंद की अपनी जाति कहार का. हालांकि आनंद से रामानुजम क्लास में पढ़ने वाले युवक का तर्क हैं कि उनके गांव का कोई स्टूडेंट सुपर 30 की प्रवेश परीक्षा में पास ही नहीं हुआ, तो ऐडमिशन कहां से होगा. आनंद कुमार भी इस मामले पर साफ कर चुके हैं कि वो अपने गांव के नाम पर बिना प्रवेश परीक्षा पास किए किसी का सुपर 30 में एडमिशन नहीं ले सकते.
आनंद कुमार पर बिहार में बहुत पहले से सवाल उठता रहा है, लेकिन यह हमला तब और बढ़ गया है जब आनंद पर बायोपिक बन रही है, जिसमें आनंद कुमार का किरदार मशहूर अभिनेता ऋतिक रोशन कर रहे हैं. लेकिन आनंद कुमार का सफर कोई एक दिन का सफर नहीं है. वह बेहद गरीबी से उठकर, संघर्ष कर यहां तक पहुंचे हैं. उन्होंने जीवन में तमाम अभाव झेले, आर्थिक दिक्कतों की वजह से वो कैंब्रिज युनिवर्सिटी में दाखिला नहीं ले पाएं.
1993 में आनंद को यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज से एडमिशन के लिए लेटर आया. उसे 6 लाख रुपए की तत्काल ज़रूरत थी. मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से बात की और कहा कि बिहार का होनहार लड़का है, बहुत नाम करेगा, इसकी आप मदद कीजिए. लालू ने कहा कि आप कह रहे हैं तो ज़रूर मदद करूंगा, उसे मेरे पास भेज दीजिए. मैंने आनंद को कहा कि जाओ लालूजी से मिल लो. वो मिलने गए तो उसे शिक्षा मंत्री के पास भेज दिया गया. शिक्षा मंत्री ने अपने पीए से पांच हज़ार रुपए देने के लिए कहा.” इस घटना से आनंद ने काफी अपमानित महसूस किया.
दरअसल, यह शक नहीं करना है बल्कि टारगेट करना है. ”लोग इस बात को पचा नहीं पाते हैं कि अति पिछड़ी जाति का यह लड़का इतना कैसे कर सकता है. ऐसा नहीं है कि आनंद की कोई स्क्रूटनी नहीं हुई है. मैं नहीं मानता कि वो पिछले 20 सालों से लोगों को बेवकूफ़ बना रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स और जापानी मीडिया ने इस पर एक महीने तक काम किया.”
अगर आनंद के प्रति सवर्णों में पूर्वग्रह को देखना है तो इस उदाहरण से बख़ूबी समझा जा सकता है. वो बताते हैं, ”वशिष्ठ नारायण सिंह की प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली. ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी प्रतिभा को मौक़ा मिला. मौक़ा इसलिए मिला क्योंकि वो अच्छी फैमिली से भी थे. उनकी शादी भी एक रसूख वाले परिवार में हुई. एक और बात उनके पक्ष में जाती है कि वो सवर्ण हैं. मानसिक स्थिति बिगड़ जाने के कारण वशिष्ठ नारायण सिंह समाज को बहुत दे नहीं पाए. आज भी वो अपनी दिमाग़ी हालत से जूझ रहे हैं.”
सेनगुप्ता कहते हैं, ”वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में बिहार में हर कोई इज़्ज़त से बात करता है जबकि आनंद पर लोग शक करते हैं. आनंद ने बिहार से दर्जनों वैसे बच्चों को आईआईटी तक पहुंचाया जो प्रतिभा होने के बावजूद ग़रीबी के कारण पढ़ नहीं पा रहे थे. आख़िर ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि आनंद पैसे कमाता है, उसने एकाधिकार को चुनौती दी है. ऐसा इसलिए भी कि वो सवर्ण नहीं है.”
आनंद कुमार पर एक आरोप यह भी है कि वो सुपर 30 में पढ़ने वाले स्टूडेंट की सूची जारी नहीं करते हैं. बिहार के मीडिया कर्मियों ने इस बात को खूब उछाला. उनकी मांग है कि आनंद जब सुपर 30 में 30 स्टूडेंट का चयन करते हैं तो उसकी लिस्ट दें और जब आईआईटी का रिजल्ट आता है तब की लिस्ट दें. आख़िर आनंद ऐसा करने से क्यों बचते हैं?
आनंद कहते हैं, ”जहां तक लिस्ट की बात है तो उसे हमने कई बार सार्वजनिक किया है. मैं हर साल सूची जारी करता हूं और अख़बार वालों को देता हूं. इस साल फ़िल्म को लेकर इतना प्रेशर था कि कई चीज़ें नहीं हो पाईं. पटना में कोचिंग वाले बच्चों की ख़रीद फ़रोख्त शुरू कर देते हैं, इस वजह से भी गोपनीयता बरतनी पड़ती है.”
रिजल्ट के पहले भी और रिजल्ट के बाद भी ऐसा किया है. अगर मेरे काम के ऊपर किसी को शक है तो उन्हें मुझसे अच्छा काम करके मिसाल कायम करनी चाहिए. मैंने आज तक किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा और जिस तरह से मैंने पढ़ाई की है उसका दर्द मैं ही जान सकता हूं. मैंने अब तक का जीवन पटना के 10 किलोमीटर के रेडियस में जिया है और यहीं अमरीका, जापान और जर्मनी के पत्रकार मिलने आए. अब अभयानंद जी कई सुपर 30 चलाते हैं और मुझे अच्छा लगता है कि उनके यहां से भी बच्चों का भला हो रहा है.” आनंद यह भी जोड़ते हैं कि जो इंसान हार जाता है वही शिकायत करता है और उन्हें कभी हार नहीं मिली इसलिए किसी की शिकायत करने का कोई मतलब नहीं है.
तमाम आरोपों पर आनंद थोड़े झुंझला भी जाते हैं. कहते हैं, ”मैं हर आरोप का जवाब दूं या बच्चों को पढ़ाऊं? कोई ग़रीब का बच्चा या जिसकी कोई पहचान नहीं है उसका बच्चा आगे बढ़ता है तो उसे परेशान किया जाता है. लोग विरोध कर रहे थे, लेकिन जब फ़िल्म बनने की बात आई तभी क्यों कैंपेन चलाया गया. क्यों लोग कहने लगे कि उन्हें भी फ़िल्म में लाया जाए. मेरे लोगों को फ़ेसबुक पर लिखने का आरोप लगाकर जेल में बंद कर दिया गया. मैं तब भी चुप हूं. वक़्त ही न्याय करेगा.”
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– यह रिपोर्ट बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार द्वारा बीबीसी के लिए लिखी गई रिपोर्ट पर आधारित है. इसमें हेडिंग के अलावा बेहद मामूली फेरबदल के साथ ‘दलित दस्तक’ में साभार प्रकाशित किया जा रहा है.
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यह कवर स्टोरी, दलित दस्तक के ……… अंक में प्रकाशित हुई थी

बीजेपी का झंडा लगी चलती कार में दलित लड़की के साथ गैंगरेप

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आजमगढ़। आजमगढ़ से दलित शिक्षिका के साथ भाजपा के झंडे लगे वाहन में गैंगरेप का सनसनीखेज मामला सामने आया है. इतना ही नहीं लड़की का वीडियो क्लिप भी बनाया गया है. पीड़िता ने थाने में आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है.

मामला रानी की सराय थाना क्षेत्र का है. यहां की रहने वाली एक शिक्षिका का आरोप है कि वह शाम को कोचिंग से घर वापस लौट रही थी. तभी आजमगढ़- वाराणसी मार्ग पर भाजपा का झंडा लगे एक स्कार्पियों वाहन सवार लोगों ने उसे अगवा कर लिया और उसके साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया. पीड़िता का आरोप है कि उसकी अश्लील वीडियो भी बनाई गई और किसी को बताने पर जान से मारने धमकी भी दी गई है.

पीड़िता किसी तरह अपने घर पहुंची और उसने आपबीती परिजनों को बताई. जिसके बाद पीड़िता के परिजनों ने थाने में आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया. पुलिस मुकदमा दर्ज कर आरोपियों की तलाश में जुट गई है.

इस बारे में पुलिस अधिक्षक कमलेश बहादुर का कहना है कि मामले की प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है. गैंगरेप से पीड़ित युवती का मेडिकल कराने के लिए उसे अस्पताल भेजा जा रहा है. गाड़ी पर झंडा लगा होने की बात भी पुलिस अधीक्षक नगर ने स्वीकार की है.

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जाति को नकारते हुए दलित युवक और ब्राह्मण युवती ने रचाई शादी

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बरेली। दो अलग-अलग जातियों का विवाह होने की वजह से प्रेमी-प्रेमिका को कई मर्तबा परेशानियों का सामना करना पड़ता है. उत्तर प्रदेश के बरेली में ऐसा वाक्या सामने आया है जो देश मे कम देखने या सुनने को मिलता है. दरअसल बरेली के एक दलित युवक का रिश्ता ब्राह्मण समाज की एक युवती से हुआ. दोनों परिवार ने खुशियों के साथ समाज के सामने रिश्ते की रस्में निभाई और एक दूसरे परिवारों के सदस्यों को गले लगाकर एक दूसरे को रिश्ते की मुबारकबाद दी. ये वाक्या जातिवाद की दीवार खड़े कर रहे उन लोगों के लिए सबक है.

दरअसल यूपी के बरेली के बिहारीपुर के रहने वाले मोहित दलित समाज से है जबकि उनकी मंगेतर रितिका ब्राह्मण समाज से है. दोनों की मुलाकात करीब 8 साल पहले एक शादी समारोह की दौरान हुई थी. तबसे वह एक दूसरे को पसंद करने लगे थे लेकिन समाज की तमाम बंदिशों के कारण दोनों के रिश्ते में तमाम दिक्कतें आ रही थी. दोनों के रिश्तों की सबसे बड़ी बाधा थी एक का दलित होना और एक सामान्य जाति का होना. रितिका और मोहित ने हिम्मत नहीं हारी पहले तो दोनों परिवारों ने समाज का वास्ता देकर रिश्ते से इंकार किया बाद में बच्चों की खुशी के लिए स्वीकार कर लिया.

मोहित ने बताया कि वह अपनी मंगेतर से बहुत प्यार करता है. यही वजह रही दोनों एक दूसरे के लिए कई साल इंतजार किया. आज उनकी शादी हुई है. उन्हें खुशी है उनका पूरा सुसराल पक्ष और परिवार ने हम दोनों के साथ हमारी खुशियों में शरीक हैं. वहीं रितिका के एक नजदीकी ने कहा कि दोनों परिवार मोहित और रितिका के रिश्ते से बेहद खुश हैं. उनका आशीर्वाद दोनों बच्चों के साथ है. मोहित और रितिका की खबर उन बाप के लिए खास है जो अपनी झूठी शान और शौकत के लिए अपनी बच्चों की जान के दुश्मन बन जाते हैं.

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कांग्रेस की वजह से प्रदेश और देश में भाजपा की सरकारें: मायावती

भोपाल। मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार के लिए बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने बालाघाट में कहा कि कांग्रेस बसपा को खत्म करना चाहती है. प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है इसलिए उसने गठबंधन का प्रस्ताव रखा था. लेकिन कांग्रेस सोची समझी रणनीति व षडयंत्र के तहत गठबंधन में कम सीटे देकर बसपा को कमजोर व खत्म करना चाहती थी. तब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. मायावती ने कहा कि अगर कांग्रेस पार्टी अब तक के शासन काल में पचास फीसदी वायदे भी पूरी करती तो भाजपा आज इतनी आगे नहीं बढ़ती और न ही उसकी कई प्रदेशों सहित केंद्र में उसकी कहीं सरकार होती.

मायावती ने कहा कि कांग्रेस बसपा के सर्वोच्च नेतृत्व पर अनर्गल आरोप लगा रही हैं. हमने टिकट बंटवारे में भी सर्व समाज के लोगो को टिकिट दिया है. देश को आज हुए भारतीय संविधान को लागू हुए बरसो बीत चुका हैं. कांग्रेस और बीजेपी की सरकार रही तब भी सर्व समाज मे से दलीतो आदिवासियो पिछड़े वर्गों मुस्लिमो व अन्य धर्मिक साथ साथ साथ गरीबो मजदूरों किसानों व्यापारियों का कोई खास विकास नही हो सका हैं.

मायावती ने कहा कि भीमराव के प्रयासों में जो आरक्षण की सुविधा मिली हैं उसे सभी विरोधी पार्टियां धीरे-धीरे खत्म करने में लगी हैं. आरक्षण का कोटा अब तक पूरा नही किया है. कांग्रेस व भाजपा की मिलीभगत से आदिवासी और दलित नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण को प्रभावहीन बना दिया है जिसके लिए हमे कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा हैं.

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बिहार में बहुजन छात्रों ने मनाया संविधान दिवस

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पटना। विगत 18/11/2018 को अम्बेडकर भवन, दरोग़ा राय पथ, पटना में बहुजन छात्र संघ के द्वारा संविधान दिवस का आयोजन किया गया, जिसमें देश स्तर के छात्र नेता कुणाल किशोर विवेक ने बताया कि चुकी संविधान दिवस 26/11/2018 को मनाया जाना है और कई बड़े बड़े कार्यक्रम लगे है जिसके वजह से पटना के छात्रों के माँग पर 18 नवम्बर को ही संविधान दिवस मनाया गया.

बिहार से छात्र नेता आनंद कुमार दिनकर, परिमल हसन, शुभम,डी॰यू॰,मनोज विभकर, पी॰यू॰,सम्राट चंदन, रणविजय कुमार भारती, दीपक राज,राजाराम बाबू, सुनील कुमार, नागेन्द्र कुमार, अनिल कुमार, आदि प्रमुख छात्रों ने संविधान की महता और इसके प्रयोग पर विशेष बल दिया.

कार्यक्रम की विशेष ख़ूबी और आकर्षण का केंद्र Friends Of Rohit Vemulla, चेरावंदा राजू रहे जो हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से चलकर पटना को पहुँचे थे. राजू ने युवाओं को अपनी राजनीतिक समझ को बढ़ाने के साथ साथ संविधान की महता पर प्रकाश डाला.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मा. शंकर राम, ADM(Ret.) ने कहाँ की छात्रों के लिए आज का समय काफ़ी चुनौती भरा है ऐसे में छात्र काफ़ी तेज़ी से संगठित हों.अपने सम्बोधन में माननीय ने कहाँ की आज के दौर में अग्रेसिव पॉलिटिक्स की काफ़ी ज़रूरत आन पड़ी है और इसके किए युवा आगे आये और संगठित हों.

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इंदिरा की जान बचाने के लिए चढ़ा था 80 बोतल ख़ून

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भुवनेश्वर से इंदिरा गाँधी की कई यादें जुड़ी हुई हैं और इनमें से अधिकतर यादें सुखद नहीं हैं. इसी शहर में उनके पिता जवाहरलाल नेहरू पहली बार गंभीर रूप से बीमार पड़े थे जिसकी वजह से मई 1964 में उनकी मौत हुई थी और इसी शहर में 1967 के चुनाव प्रचार के दौरान इंदिरा गाँधी पर एक पत्थर फेंका गया था जिससे उनकी नाक की हड्डी टूट गई थी.

30 अक्तूबर 1984 की दोपहर इंदिरा गांधी ने जो चुनावी भाषण दिया, उसे हमेशा की तरह उनके सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने तैयार किया था. लेकिन अचानक उन्होंने तैयार आलेख से अलग होकर बोलना शुरू कर दिया. उनके बोलने का तेवर भी बदल गया.

इंदिरा गांधी बोलीं, “मैं आज यहाँ हूँ. कल शायद यहाँ न रहूँ. मुझे चिंता नहीं मैं रहूँ या न रहूँ. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आख़िरी सांस तक ऐसा करती रहूँगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मज़बूत करने में लगेगा.” कभी-कभी नियति शब्दों में ढलकर आने वाले दिनों की तरफ़ इशारा करती है.

भाषण के बाद जब वो राजभवन लौटीं तो राज्यपाल बिशंभरनाथ पांडे ने कहा कि आपने हिंसक मौत का ज़िक्र कर मुझे हिलाकर रख दिया. इंदिरा गाँधी ने जवाब दिया कि वो ईमानदार और तथ्यपरक बात कह रही थीं. उस रात इंदिरा जब दिल्ली वापस लौटीं तो काफ़ी थक गई थीं. उस रात वो बहुत कम सो पाईं. सामने के कमरे में सो रहीं सोनिया गाँधी जब सुबह चार बजे अपनी दमे की दवाई लेने के लिए उठकर बाथरूम गईं तो इंदिरा उस समय जाग रही थीं. सोनिया गांधी अपनी किताब ‘राजीव’ में लिखती हैं कि इंदिरा भी उनके पीछे-पीछे बाथरूम में आ गईं और दवा खोजने में उनकी मदद करने लगीं. वो ये भी बोलीं कि अगर तुम्हारी तबीयत फिर बिगड़े तो मुझे आवाज़ दे देना. मैं जाग रही हूँ.

सुबह साढ़े सात बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं. उस दिन उन्होंने केसरिया रंग की साड़ी पहनी थी जिसका बॉर्डर काला था. इस दिन उनका पहला अपॉएंटमेंट पीटर उस्तीनोव के साथ था जो इंदिरा गांधी पर एक डॉक्युमेंट्री बना रहे थे और एक दिन पहले उड़ीसा दौरे के दौरान भी उनको शूट कर रहे थे. दोपहर में उन्हें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन और मिज़ोरम के एक नेता से मिलना था. शाम को वो ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन को भोज देने वाली थीं. उस दिन नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, सीरियल्स, संतरे का ताज़ा जूस और अंडे लिए. नाश्ते के बाद जब मेकअप-मेन उनके चेहरे पर पाउडर और ब्लशर लगा रहे थे तो उनके डॉक्टर केपी माथुर वहाँ पहुंच गए. वो रोज़ इसी समय उन्हें देखने पहुंचते थे.

उन्होंने डॉक्टर माथुर को भी अंदर बुला लिया और दोनों बातें करने लगे. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के ज़रूरत से ज़्यादा मेकअप करने और उनके 80 साल की उम्र में भी काले बाल होने के बारे में मज़ाक़ भी किया. नौ बजकर 10 मिनट पर जब इंदिरा गांधी बाहर आईं तो ख़ुशनुमा धूप खिली हुई थी. उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह काला छाता लिए हुए उनके बग़ल में चल रहे थे. उनसे कुछ क़दम पीछे थे आरके धवन और उनके भी पीछे थे इंदिरा गाँधी के निजी सेवक नाथू राम. सबसे पीछे थे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी सब इंस्पेक्टर रामेश्वर दयाल. इस बीच एक कर्मचारी एक टी-सेट लेकर सामने से गुज़रा जिसमें उस्तीनोव को चाय सर्व की जानी थी. इंदिरा ने उसे बुलाकर कहा कि उस्तीनोव के लिए दूसरा टी-सेट निकाला जाए.

जब इंदिरा गांधी एक अकबर रोड को जोड़ने वाले विकेट गेट पर पहुंची तो वो धवन से बात कर रही थीं. धवन उन्हें बता रहे थे कि उन्होंने उनके निर्देशानुसार, यमन के दौरे पर गए राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को संदेश भिजवा दिया है कि वो सात बजे तक दिल्ली लैंड कर जाएं ताकि उनको पालम हवाई अड्डे पर रिसीव करने के बाद इंदिरा, ब्रिटेन की राजकुमारी एन को दिए जाने वाले भोज में शामिल हो सकें. अचानक वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर इंदिरा गांधी पर फ़ायर किया. गोली उनके पेट में लगी. इंदिरा ने चेहरा बचाने के लिए अपना दाहिना हाथ उठाया लेकिन तभी बेअंत ने बिल्कुल प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से दो और फ़ायर किए. ये गोलियाँ उनकी बग़ल, सीने और कमर में घुस गईं.

वहाँ से पाँच फुट की दूरी पर सतवंत सिंह अपनी टॉमसन ऑटोमैटिक कारबाइन के साथ खड़ा था. इंदिरा गाँधी को गिरते हुए देख वो इतनी दहशत में आ गया कि अपनी जगह से हिला तक नहीं. तभी बेअंत ने उसे चिल्लाकर कहा गोली चलाओ. सतवंत ने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक कारबाइन की सभी पच्चीस गोलियां इंदिरा गाँधी के शरीर के अंदर डाल दीं. बेअंत सिंह का पहला फ़ायर हुए पच्चीस सेकेंड बीत चुके थे और वहाँ तैनात सुरक्षा बलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी. अभी सतवंत फ़ायर कर ही रहा था कि सबसे पहले सबसे पीछे चल रहे रामेश्वर दयाल ने आगे दौड़ना शुरू किया. लेकिन वो इंदिरा गांधी तक पहुंच पाते कि सतवंत की चलाई गोलियाँ उनकी जांघ और पैर में लगीं और वो वहीं ढेर हो गए. इंदिरा गांधी के सहायकों ने उनके क्षत-विक्षत शरीर को देखा और एक दूसरे को आदेश देने लगे. एक अकबर रोड से एक पुलिस अफ़सर दिनेश कुमार भट्ट ये देखने के लिए बाहर आए कि ये कैसा शोर मच रहा है.

उसी समय बेअंत सिंह और सतवंत सिंह दोनों ने अपने हथियार नीचे डाल दिए. बेअंत सिंह ने कहा, “हमें जो कुछ करना था हमने कर दिया. अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो.” तभी नारायण सिंह ने आगे कूदकर बेअंत सिंह को ज़मीन पर पटक दिया. पास के गार्ड रूम से आईटीबीपी के जवान दौड़ते हुए आए और उन्होंने सतवंत सिंह को भी अपने घेरे में ले लिया. हालांकि, वहाँ हर समय एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी. लेकिन उस दिन उसका ड्राइवर वहाँ से नदारद था. इतने में इंदिरा के राजनीतिक सलाहकार माखनलाल फ़ोतेदार ने चिल्लाकर कार निकालने के लिए कहा. इंदिरा गाँधी को ज़मीन से आरके धवन और सुरक्षाकर्मी दिनेश भट्ट ने उठाकर सफ़ेद एंबेसडर कार की पिछली सीट पर रखा. आगे की सीट पर धवन, फ़ोतेदार और ड्राइवर बैठे. जैसे ही कार चलने लगी सोनिया गांधी नंगे पांव, अपने ड्रेसिंग गाउन में मम्मी-मम्मी चिल्लाते हुए भागती हुई आईं. इंदिरा गांधी की हालत देखकर वो उसी हाल में कार की पीछे की सीट पर बैठ गईं. उन्होंने ख़ून से लथपथ इंदिरा गांधी का सिर अपनी गोद में ले लिया. कार बहुत तेज़ी से एम्स की तरफ़ बढ़ी. चार किलोमीटर के सफ़र के दौरान कोई भी कुछ नहीं बोला. सोनिया का गाउन इंदिरा के ख़ून से भीग चुका था.

कार नौ बजकर 32 मिनट पर एम्स पहुंची. वहाँ इंदिरा के रक्त ग्रुप ओ आरएच निगेटिव का पर्याप्त स्टॉक था. लेकिन एक सफ़दरजंग रोड से किसी ने भी एम्स को फ़ोन कर नहीं बताया था कि इंदिरा गांधी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में वहाँ लाया जा रहा है. इमरजेंसी वार्ड का गेट खोलने और इंदिरा को कार से उतारने में तीन मिनट लग गए. वहाँ पर एक स्ट्रेचर तक मौजूद नहीं था. किसी तरह एक पहिए वाली स्ट्रेचर का इंतेज़ाम किया गया. जब उनको कार से उतारा गया तो इंदिरा को इस हालत में देखकर वहाँ तैनात डॉक्टर घबरा गए. उन्होंने तुरंत फ़ोन कर एम्स के वरिष्ठ कार्डियॉलॉजिस्ट को इसकी सूचना दी. मिनटों में वहाँ डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गए.

एलेक्ट्रोकार्डियाग्राम में इंदिरा के दिल की मामूली गतिविधि दिखाई दे रही थीं लेकिन नाड़ी में कोई धड़कन नहीं मिल रही थी.उनकी आँखों की पुतलियां फैली हुई थीं, जो संकेत था कि उनके दिमाग़ को क्षति पहुंची है. एक डॉक्टर ने उनके मुंह के ज़रिए उनकी साँस की नली में एक ट्यूब घुसाई ताकि फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंच सके और दिमाग़ को ज़िंदा रखा जा सके.

इंदिरा को 80 बोतल ख़ून चढ़ाया गया जो उनके शरीर की सामान्य ख़ून मात्रा का पांच गुना था. डॉक्टर गुलेरिया बताते हैं, “मुझे तो देखते ही लग गया था कि वो इस दुनिया से जा चुकी हैं. उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी किया. फिर मैंने वहाँ मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या हम उन्हें मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा नहीं. फिर हम उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गए.”

डॉक्टरों ने उनके शरीर को हार्ट एंड लंग मशीन से जोड़ दिया जो उनके रक्त को साफ़ करने का काम करने लगी और जिसकी वजह से उनके रक्त का तापमान सामान्य 37 डिग्री से घटकर 31 डिग्री हो गया. ये साफ़ था कि इंदिरा इस दुनिया से जा चुकी थीं लेकिन तब भी उन्हें एम्स की आठवीं मंज़िल स्थित ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया. डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने उनके लीवर के दाहिने हिस्से को छलनी कर दिया था, उनकी बड़ी आंत में कम से कम बारह छेद हो गए थे और छोटी आंत को भी काफ़ी क्षति पहुंची थी. उनके एक फेफड़े में भी गोली लगी थी और रीढ़ की हड्डी भी गोलियों के असर से टूट गई थी. सिर्फ़ उनका हृदय सही सलामत था.

अपने अंगरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने के लगभग चार घंटे बाद दो बजकर 23 मिनट पर इंदिरा गांधी को मृत घोषित किया गया. लेकिन सरकारी प्रचार माध्यमों ने इसकी घोषणा शाम छह बजे तक नहीं की. इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाले इंदर मल्होत्रा बताते थे कि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गाँधी पर इस तरह का हमला हो सकता है. उन्होंने सिफ़ारिश की थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए.

लेकिन जब ये फ़ाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने बहुत ग़ुस्से में उस पर तीन शब्द लिखे, “आरंट वी सेकुलर? (क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?)” उसके बाद ये तय किया गया कि एक साथ दो सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके नज़दीक ड्यूटी पर नहीं लगाया जाएगा. 31 अक्तूबर के दिन सतवंत सिंह ने बहाना किया कि उनका पेट ख़राब है. इसलिए उसे शौचालय के नज़दीक तैनात किया जाए. इस तरह बेअंत और सतवंत एक साथ तैनात हुए और उन्होंने इंदिरा गाँधी से ऑपरेशन ब्लूस्टार का बदला ले लिया.

साभार- बी.बी.सी.

रेहान फ़ज़लबीसाभार- बी.बी.सी.

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श्रेयात ने नीदरलैंड्स में आयोजित 16th डेवलपमेंटडॉयलाग में हिस्सा लिया

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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा, महाराष्ट्र में प्रोफ. एल. कारुण्यकरा के मार्गदर्शन में शोधरत श्रेयात ने नीदरलैंड्स में आयोजित 16thडेवलपमेंट डॉयलाग (16th Development Dialogue) में प्रतिभाग एवं शोधपत्र प्रस्तुत किया.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशलस्टडीज़{International Institute of Social Studies (ISS)},हेग (The Hague)द्वारा 01&02 नवम्बर 2018 को ‘Social Justice amidst the Convergence of Crises: Repoliticizing Inequalities’थीम पर प्रस्तावित कॉन्फ्रेंस में श्रेयात ने अपने शोध पत्र को प्रस्तुत किया. श्रेयात ने अपने शोधपत्र Activism and Awareness: ‘Weapons’ of Resistance for Dalit Students AgainstCaste Discrimination in Higher Education के माध्यम से विश्वविद्यालयों में हो रहे दलित छात्रों के उत्पीड़न एवं इस उत्पीड़न के विरोध में दलित छात्रों के प्रतिरोध को लिपिबद्ध किया है. कॉन्फ्रेंस के प्रथम दिवस को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रोफ. बारबराहैरिसव्हाइट ने संबोधित किया और समापन पर प्रोफ. जोजीतिसिकता ने अपना वक्तव्य दिया. इस कॉन्फ्रेंस में विश्व भर के लगभग 140 शोधार्थियों ने प्रातिभाग किया.

भारत के विश्वविद्यालयों में लगातार हो रहे दलित छात्र-छात्राओं के उत्पीड़न और दलित छात्रों के साथ दुर्व्यवहार को इस शोधपत्र के माध्यम से प्रमुखता से उठाने का प्रयास किया गया है. शोधपत्र में दलित छात्रों के प्रतिरोध के विभिन्न आयामों पर भी प्रकाश डाला गया है.

श्रेयात ने भगवान बुद्ध, ज्योतिबा फुले और बाबासाहेब अंबेडकर को अपना आदर्श बताया और कहा कि बहुजन समाज के लोगों को यदि आज सम्मानित जीवन जीने और पढ़ने-लिखने का अधिकार मिला है तो यह इन महापुरुषों के अथक प्रयासों का परिणाम है.

श्रेयात ने प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफ. विवेक कुमार एवं प्रोफ. एल. कारुण्यकरा को अपना प्रेरणास्रोत बताया और अपने माता-पिता और चाचा को अपनी इस सफलता का श्रेय दिया.

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