डीयू में अतिथि शिक्षकों का आंदोलनः कठघरे में सरकार और शिक्षक संगठन

रिपोर्ट- अनिल कुमार।।  दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) और नॉन कॉलेजिएट वूमेंस एजुकेशन बोर्ड (NCWEB) के शिक्षकों को 2019 से वेतन नहीं मिला है। साथ ही उनके निर्धारित वेतन 1500 रुपये प्रति कक्षा में से गैरकानूनी ढंग से 500 रुपये प्रति कक्षा काटा गया है। परीक्षा की कॉपी जांच करने के लिए निर्धारित पैसे भी उनको नहीं दिए गए। SOL और NCWEB में सिर्फ शनिवार और रविवार को कक्षाएं होती हैं और शिक्षकों को मुश्किल से 25,000 रुपये महिना वेतन मिल पाता है और वह भी तब जब कक्षाएं चल रही हों। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक साल में लगभग छः महीने ही कक्षाएं होती हैं, इस तरह शिक्षकों का औसत वेतन लगभग 12,500 रुपये महिना ही है। ऐसे में उनके वेतन से पैसे काटना, परीक्षा की कॉपी चेक करने के पैसे न देना और 2019 से वेतन का भुगतान ना करना शिक्षकों के प्रति अन्याय है। यह उन विद्यार्थियों के प्रति भी अन्याय है जिनको वे पढ़ाते हैं। क्योंकि जब शिक्षक को ही वेतन नहीं मिलेगा तो वह कैसे बच्चों को बेहतर शिक्षा देगा? फिर भी SOL और NCWEB के शिक्षक बेहतर कर रहें हैं।

इन्हीं सब मुद्दों को लेकर 27 जनवरी, 2021 को दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 4 पर दोपहर 2 बजे से अपनी मांगे पूरी होने तक रिले हंगर स्ट्राइक का आयोजन किया गया था। इनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार थीं, (1) शिक्षण-सत्र सितंबर – दिसम्बर 2019 से SOL के अतिथि शिक्षाकों का वेतन नहीं दिया गया है, उसक भुगतान किया जाए। (2)  शिक्षण-सत्र सितंबर – दिसम्बर, 2019 के निर्धारित वेतन 1500 रुपये प्रति कक्षा में से NCWEB के अतिथि शिक्षकों का वेतनमान 500 रुपये प्रति कक्षा काटे जाने का विरोध और उसे वापस दिया जाए। (3) NCWEB के शिक्षकों का शिक्षण सत्र जनवरी – मई 2020 से वेतन नहीं मिला है उसका भुगतान तुरंत किया जाए। (4) NCWEB और SOL के अतिथि शिक्षकों का वेतन माह के अंत में देने का प्रावधान की माँग। (5) SOL और NCWEB द्वारा उत्तर पुस्तिका जाँचने के पैसे का भुगतान न किए जाने की माँग। इस आंदोलन का नेतृत्व अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति, उपाध्यक्ष संदीप, और सचिव रवि कर रहें थे। लेकिन वर्तमान सरकार कोरोना के बहाने देश के नागरिकों के मौलिक राजनीतिक अधिकार को कुचल रही है।

जब हंगर स्ट्राइक के लिए टेंट लगाने की कोशिश हुई तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 4 पर तैनात सुरक्षा कर्मियों ने कहा कि प्रॉक्टर ऑफिस से परमिशन लेकर आओ। जब प्रॉक्टर ऑफिस गए तो वहां का स्टाफ कहता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में टेंट लगने की अनुमति नहीं है। जब अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति ने पूछा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक संगठन दो महीने कुलपति कार्यालय के सामने राजाई-गद्दे लेकर कैसे बैठ गए थे? तो उनके पास जवाब नहीं था। इतने में ही मोरिस नगर थाना से भी पुलिस आ गई और अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को डिटेन करके थाने ले गई। साथ ही आंदोलन के समर्थन में जो लोग भी आए थे उन अतिथि शिक्षकों को बालपूर्वक तितर-बितर कर दिया गया।

अतिथि शिक्षकों को थाने में ले जाकर पुलिस ने बताया कि वे उन्हें कोई भी आंदोलन या धारणा-प्रदर्शन नहीं करने देंगें, क्योंकि देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। जब धरना-प्रदर्शन में आए अतिथि शिक्षक को बल पूर्वक तितर-बितर कर दिया गया तब अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को चेतावनी देकर थाने से छोड़ दिया गया। इस घटना पर डॉ कुमार गौरव कहतें हैं, कि प्रशासन और दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ (DUTA) अलग-अलग नहीं है। उन्हें यह बर्दस्त नहीं होगा कि के सामने कोई संगठन आगे बढ़े। अगर आप उनकी (DUTA) के गतिविधि पर बारीक नजर रखेंगे तब सब समझ में आएगा। कोरोना नागरिकों के मौलिक अधिकार को कुचलने का नया हथियार बन गया है। यह तथ्य भी प्रासंगिक है कि इसी दिल्ली यूनिवर्सिटी में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के लोगों ने जनवरी, 2021 के दूसरे सप्ताह में कोरोना के ही समय धरना-प्रदर्शन किया था। ऑकटूबर-नवंबर 2020 में सम्पन्न बिहार विधान सभी चुनाव में लाखों की रैलियाँ होती रही हैं और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के लिए भी रैलियां हो रही हैं।

अतिथि शिक्षक संघ ने यह भी आरोप लगाया कि उसने दूसरे कई संगठनों को भी अपने आंदोलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया था, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ शामिल हैं। लेकिन कोई भी नहीं आया। इससे इनका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। सामाजिक न्याय की बात करना सिर्फ इनकी जुबानी चाल है और वे इसे वास्तविक धरातल पर नहीं उतारना चाहते हैं। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय सहित दिल्ली के सभी शिक्षक संगठनों के रवैये से अतिथि शिक्षक भी खुद डरा हुआ है। उन्हें डर है कि अगर वे मुखर होकर अपने हक में आवाज उठाते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिल सकती है। उनकी कहीं भी स्थाई नियुक्ति नहीं होगी। उनका डर भी कोई काल्पनिक नहीं है, क्योंकि उन लोगों ने ऐसा होते देखा भी है। ऐसा हो भी रहा है। आज दिल्ली यूनिवर्सिटी का शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ अपने ही शिक्षकों के शोषण के खिलाफ चुप है। आज वह शोषक के साथ खड़ा है।

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