चापाकल से पानी लेने पर जातिवदियों का दलितों के साथ मारपीट, मौत, इंसाफ का इंतजार

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(रिपोर्ट- नागमणि) बिहार के छपरा (सारण) जिले के गड़खा में एक सार्वजनिक चापाकल से पानी लेने के कारण गांव के एक भूमिहार और साहू (बनिया-तेली) जाति के लोगों ने दलितों के साथ मारपीट की। उन्हें पीटकर अधमरा कर दिया। इसमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई है। 12 मई को घटी यह घटना गड़खा के भेल्दी थाना क्षेत्र के मौलानापुर गांव की है।

इस मामले में पीड़ित पक्ष द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि 12 मई को भेल्दी थाना क्षेत्र के मौलानापुर गांव निवासी शिवप्रसाद राम के घर के लोग सार्वजनिक चापाकल पर शौच के बाद हाथ धो रहे थे। तभी गांव का ही जातिवादी भूमिहार रंजीत कुमार द्विवेदी वहां आ गया और उन्हें भला बुरा कहने लगा। उसके उकसावे पर गांव के ही बनिया-तेली समाज के प्रमोद साह, संतोष साह, पंकज शाह, शकुंतला देवी, नागेंद्र साह, मीना देवी, श्रवण साह, विलास, जिखम कुंअर, सुबोध साह, बृजेश महतो समेत अन्य लोग मिलकर दलितों के साथ मारपीट करने लगे और जाति सूचक गाली देने लगे। चूंकि चापाकल सार्वजनिक था तो दलितों ने विरोध किया।

विरोध करने पर जातिवादियों ने लाठी-डंडा और फरसा जैसे हथियारों से दलितों पर हमला कर दिया। इसमें शिव प्रसाद राम, चंदन कुमार राम, सिकंदर राम, विवेक कुमार राम, सरोज देवी और पन्ना देवी घायल हो गए। इन्हें इलाज के लिए गड़खा CHC ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने सदर अस्पताल छपरा रेफर कर दिया। छपरा में कुछ लोगों का इलाज हुआ एवं गंभीर स्थिति को देखते हुए 3 लोगों को PMCH पटना रेफर कर दिया गया। PMCH में इलाज के क्रम में शनिवार को शिव प्रसाद राम की मौत हो गई।

पोस्टमार्टम के बाद शव जैसे ही गांव पहुंचा, ग्रामीणों ने NH-722 पर मौलानापुर के पास सड़क जाम कर दिया। घटना की सूचना मिलने के बाद भेल्दी पुलिस मढ़ौरा इंस्पेक्टर समेत गड़खा विधायक सुरेन्द्र राम पहुंच गए। उन्होंने आक्रोशित ग्रामीणों को समझा-बुझाकर शांत कराया। पुलिस ने आक्रोशित ग्रामीणों की SP से बात कराई तथा SC एक्ट के तहत कार्रवाई करने, सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने तथा घर की कुर्की-जब्ती करने का आश्वासन दिया था। जिसके बाद ग्रामीणों ने जाम हटाया। हालांकि खबर लिखे जाने तक इस मामले में अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी या अन्य कार्रवाई होने की सूचना नहीं है।

कोरोना से लड़ने में हेमंत सोरेन आगे

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 जन जागरूकता कहें, प्रशासनिक सफलता कहें या फिर शानदार नेतृत्व, कोरोना संक्रमण से निपटने के मामले में झारखंड देश के 27 राज्यों से आगे निकल चुका है। मई के दूसरे सप्ताह में जारी आंकड़े के मुताबिक झारखंड की साप्ताहिक संक्रमण दर घटकर 7.01 प्रतिशत हो गई है। इसके साथ ही संक्रमण को कम करने के मामले में झारखंड देश भर में तीसरे स्थान पर है। झारखंड के आगे तेलंगाना दूसरे नंबर जबकि उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। हालांकि उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे मिलने वाले शवों के अंबार ने कई सवाल भी खड़े किए हैं, जिसके बाद यूपी सरकार पर आंकड़ों को छुपाने का आरोप लगाने लगा है। दरअसल कोरोना को रोकने के मामले में झारखंड की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि राज्य में संक्रमण दर तीन सप्ताह में घटकर 16 से 7 प्रतिशत हो गई है।

 इसी बीच आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों का दावा है कि झारखंड में कोरोना का पीक गुजर गया है और एक जून तक लोगों को राहत मिलने लगेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सब सरकार द्वारा कोरोना रोकथाम के लिए उठाए गए प्रभावी कदम और लोगों के संयम की वजह से संभव हो पाया है। आईआईटी के वैज्ञानिक और पद्मश्री प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने कंप्यूटिंग मॉडल सूत्र तैयार किया है। इसमें गणितीय विश्लेषण के आधार पर यह दावा किया गया है। इसी तरह का दावा अन्य वैज्ञानिकों ने भी किया है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि झारखंड में कोरोना का पीक अप्रैल अंतिम सप्ताह तक था। दरअसल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कोरोना की आहट के साथ ही प्रदेश में 8 अप्रैल से ही तमाम तरह की पाबंदियां लगा दी थी। इसका फायदा यह हुआ कि राज्य में रिकवरी रेट 90 % से ज़्यादा हो गयी है। पिछले कुछ दिनों से संक्रमण दर भी 4 % के आस पास बनी हुई है। कोरोना को काबू में करने की खबरों के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य के स्वास्थ्यकर्मियों और प्रदेश की जनता को धन्यवाद दिया है।

जब झारखंड का मीडिया इस खबर को प्रचारित कर रहा था तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी प्रशंसा से खुश नहीं हो गए, बल्कि उन्होंने एक जिम्मेदार और गंभीर नेतृत्वकर्ता की तरह व्यवहार किया। 19 मई को उन्होंने ट्विटर पर लिखा- ” ऐसे खबरों को पढ़ ये मत समझियेगा की ख़तरा टल गया है। पिछले एक वर्ष में हमने देखा की जब-जब हमने इस महामारी को हल्के में लिया है, तब तब इसने दुगनी शक्ति से वापस आ कर तबाही मचायी है। इसलिए खुश होने की बजाये हमें अब और सतर्क रहना है।”

निश्चित तौर पर हेमंत सोरेन कोरोना की रोकथाम को लेकर लगातार सक्रिय रहे हैं। पिछले साल भी उन्होंने अपनी सक्रियता से प्रदेशवासियों का दिल जीता था। और इस साल भी जिस तरह उन्होंने कोरोना को काबू में किया है, एक बेहतर जनसेवक और प्रशासक के रूप में उनकी छवि मजबूत होती जा रही है।

हिंदी का बौद्धिक वर्ग इतना लिजलिजा, रीढ़-विहीन और कमजोर क्यों है? 

 हाल ही में एक घटना ने मेरे मन मे यह सवाल उठाया है कि  हिंदी का बौद्धिक वर्ग इतना लिजलिजा, रीढ़-विहीन और कमजोर क्यों  है? वजह चित्रा मुद्गल का भाजपा के बचाव में दिया बयान है।
इसके  प्रथम दृष्टया निम्न कारण दिखते हैं-
1-वर्ण-जाति का कवच 
हिंदी के बौद्धिक वर्ग का सबसे पहला कवच वर्ण- जाति का है,  कुछ चंद अपवादस्वरूप बुद्धिजीवियों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बुद्धिजीवी जाति के कवच से बाहर नहीं निकल पाते हैं।  जातीय संस्कार, परवरिश और अनौपचारिक-औपचारिक शिक्षा उन्हें वर्ण-जाति के दायरे में इस कदर जकड़ लेती है कि वे आजीवन जाति-वर्ण के कवच को तोड़कर बाहर नहीं निकल पाते। दुनिया को देखने-समझने का उनका विश्व दृष्टिकोण वर्ण-जातिवादी (ब्राह्मणवादी) ही बना रहता है यानि वैदिक हिंदूवादी।
औरों की कौन कहे, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, के. दामोदरन, सुमित सरकार और अयोध्या सिंह जैसे शीर्षस्थ वामपंथी भी इस कवच को पूरी तरह से तोड़ नहीं पाए। उदारवादियों और दक्षिण पंथियों की बात ही छोड़ दीजिए।
अकारण नहीं है कि नेहरू से लेकर चेतन भगत तक, अपरकॉस्ट बुद्धिजीवी लेखक तथाकथित मेरिट का तर्क देकर उस आरक्षण के खिलाफ जहर उगलते रहे और अभी भी उगल रहे हैं, जिसे संवैधानिक आरक्षण कहते हैं और जिसका प्रावधान सौ प्रतिशत वैदिक आरक्षण को तोड़ने के लिए किया गया था और है।
2-धर्म का कवच
हिंदी के बौद्धिक वर्ग के मानस के निर्माण में वेद, उपनिषद, गीता और रामचरित मानस का अहम योगदान है। जिन्हें आज हम हिंदू ग्रंथ कहते हैं। इन ग्रंथों से बना मानस न केवल वर्ण-जाति के कवच में बंद रहता है, वह हिंदू धर्म के कवच में भी बंद रहता है। जो इसे वर्ण-जाति और जातिवादी पितृसत्ता को जायज ठहराने का तर्क मुहैया कराते हैं। जो उन्हें संवेदनहीन और वैचारिक तौर पर दिवालिया बना देता है और हर तरह के कुकर्म को जायज ठहराने का औचित्य प्रदान करता है और अक्सर सिद्धांत और व्यवहार में समता, स्वतंत्रता, बंधुता और लोकतांत्रिक एवं वैज्ञानिक मूल्यों का विरोधी बना देता और आचरण में पांखडी।
3- वर्ण-जातिवादी पितृसत्ता का कवच
हिंदी का बुद्धिजीवी वर्ण-जाति के कवच की तरह ही पितृसत्ता के कवच में भी जकड़ा हुआ है। भारत की पितृसत्ता सामान्य पितृसत्ता नहीं हैं, वर्ण-जातिवादी पितृसत्ता है। वैचारिक और व्यवहारिक जीवन में स्त्री के प्रति उसका नजरिया जग-जाहिर है। वह स्वीकार नहीं कर पाता कि स्त्री जीवन के अधिकार सभी क्षेत्रों में उसके बराबर है और उसे प्रेम करने  जीवन-साथी चुनने और अपने अनुकूल पेशा चुनने पूरा अधिकार है।
4-रक्त-वीर्य संबंधों का कवच
हिंदी के बुद्धिजीवी रक्त-वीर्य संबंधों के कवच में भी बंद हैं। इसका नमूना देखना है, तो विश्वविद्यालयों और अन्य बौद्धिक संस्थानों में हिंदू बुद्धिजीवियों के  भाई-बंधुओं, बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों और पत्नी-पति और अन्य सगे संबंधियों की उपस्थिति के रूप में देख सकते हैं।
मेरे पास गोरखपुर विश्वविद्यालय का वर्षों का अनुभव है। कैसे इस विश्वविद्यालय और इससे जुड़े महाविद्यालयों को तथाकथित प्रोफेसरों-आचार्यों ने अपने अयोग्य बेटे-बेटियों, बाई-बंधुओं और पत्नी आदि के  लिए रोजी-रोटी का अड्डा बना दिया।
यही हाल कमोवेश अन्य विश्वविद्यालयों और उच्च संस्थानों का भी है।
इस खेल में विद्या निवास मिश्र  से लेकर नामवर सिंह तक कैसे शामिल रहे हैं, इसका कच्चा-चिट्ठा कई बार समाने आ चुका है। बयान करने की कोई जरूरत नहीं है। इन नियुक्ति-पदोन्नतियों में जाति और रक्त-वीर्य संबंधों का खेल किस तरह से खेला जाता रहा है और खेला जा रहा है, जग-जाहिर है। अधिकांश बौद्धिक संस्थानों का यही हाल है।
5- कैरियरिज्म और अवसरवाद का मेल
हिंदी के अधिकांश बुद्धिजीवी के केंद्र में सामाजिक सरोकार या देश या राष्ट्र का निर्माण नहीं होता या सच्चे ज्ञान की तलाश नहीं होती है। यह प्रवृत्ति 1990 के दशक के बाद और तेज हुई है। उनके ज्ञान-विज्ञान के केंद्र में कैरियर यानि पद- प्रतिष्ठा होती है और पुरस्कार होता है। इसके लिए वे अवसरवाद का हर खेल-खेलने को तैयार रहते हैं। इसके लिए वे विचार को वस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं और अवसरानुकूल वस्त्र पहन लेते हैं। अवसरवाद हिंदी बुद्धिजीवियों की सहज-स्वाभाविक खूबी है। पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए हर जोड़-तोड़ करने के लिए वे हमेशा तैयार रहते हैं।
6- साहस का घोर अभाव
हिंदी के अधिकांश बुद्धिजीवियों में साहस का घोर अभाव  है, वे वर्चस्व के विभिन्न रूपों को खुली चुनौती देने का साहस नहीं जुटा पाते हैं, जिसमें सत्ता को चुनौती देना भी शामिल है। वे बुद्धिजीवी के रूप में सच कहने के लिए बड़ा जोखिम उठाने को तैयार नहीं रहते हैं, वे कुछ भी दांव पर नहीं लगाना चाहते हैं। वे खोने के डर और पाने के लालच में सत्य से मुंह मोड़े रहते हैं। वे चाहते हैं कि वे पूरी तरह सुरक्षित भी बने रहें और बुद्धिजीवी भी कहलाएं।
अकारण नहीं कि हिंदू पट्टी, जिसे गाय पट्टी भी कहते हैं, आज भी मुख्यत: बर्बर मध्यकालीन मूल्यों-मान्यताओं में जी रही है और आज तक इसका लोकतांत्रिकरण- जनवादीकरण भी नहीं हो पाया। इसमें हिंदी के बुद्धिजीवियों के चरित्र की अहम भूमिका है।
यहां रेखांकित कर लेना जरूरी है कि हिंदी के बौद्धिक वर्ग का आज भी पर्याय मुख्यत: अपरकॉस्ट के सामाजिक समूह से आए लोग हैं। बौद्धिक नियंत्रण और संचालन के सभी केंद्रों पर इन्हीं का नियंत्रण और वर्चस्व है। मुस्लिम और ईसाई समाज के बुद्धिजीवी के रूप में भी, उनके बीच के अपरकॉस्ट का ही अभी भी वर्चस्व हैं। उनके बीच के पसमांदा समूह के बुद्धिजीवियों की उपस्थिति अंगुलियों पर गिनी जा सकती  है।
पिछड़े-दलितों-आदिवासियों और पसमांदा मुसलमानों के समूह से आए हिंदी के चंद बुद्धिजीवियों की उर्जा का बड़ा हिस्सा अपरकॉस्ट वर्चस्व के प्रतिवाद और प्रतिरोध में खर्च हो जा रहा है और कुछ ने अपरकॉस्ट के सामने पूरी तरह समर्पण भी कर रखा है।

भीमा कोरेगांव फिल्म के डायरेक्टर दे रहे हैं काम, बहुजनों के लिए है बड़ा मौका

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 अगर आप मेहनत कर परिणाम दे सकते हैं तो फिल्म इंडस्ट्रीज से जुड़ी नौकरी आपका इंतजार कर रही है। आपका चयन 2000 लोगों के बीच हो सकता है। बैटल ऑफ भीमा कोरेगांव फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक रमेश थेटे की फिल्म निर्माण कंपनी आपका इंतजार कर रही है। जहां तक पैसे की बात है तो काम के बदले आपको बेसिक 10 हजार रुपये के अलावा 5 हजार रुपये TA-DA मिलेंगे। बात यहीं खत्म नहीं होती, अगर आपका परफार्मेंस बढ़िया है तो आपको परफार्मेंस इंसेंटिव भी मिलेगा। यानी की आप इस काम से जुड़कर 15 से 20 हजार रुपये कमा सकते हैं। आपको जो काम करना है, वह मार्केटिंग एवं मीडिया मैनेजर्स का काम करना है। इसे आप फुल टाइम या पार्ट टाइम कैसे भी कर सकते हैं।

इस काम के लिए आपको कम से कम 10वीं पास होना चाहिए। हालांकि उच्च शिक्षित, अनुभवी तथा व्यापक जनसंपर्क रखने वाले व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाएगी। हां, काम करने के लिए उम्र 18 वर्ष से ज्यादा होनी चाहिए। सबसे शानदार बात यह है कि आपको अपने लोकल क्षेत्र में ही काम करने का मौका मिलेगा।

इस काम के लिए पंजीयन शुल्क 1000 रुपये है, जो आपको जमा करना होगा। अगर आपका चयन नहीं होता है तो आपको पंजीयन शुल्क लौटा दिया जाएगा। पैसे इस खाते में जमा करना है।

बैंक डिटेल-

AC Name- Ramesh Thete Films Current AC No- 59209399486966 HDFC Bank, Pratapnagar Branch, Nagpur IFSC Code- HDFC0001786

आवेदन करने का तरीका यह है कि आप अपना नाम, उम्र, पता, शैक्षणिक योग्यता औऱ अनुभव का उल्लेख कर और पंजीयन  शुल्क के भुगतान का स्क्रीनशॉर्ट लेकर हस्ताक्षर कर 84466 35855 पर व्हाट्सएप कर दीजिए या फिर rameshthetefilms@gmail.com पर ई-मेल कीजिए। आवेदन भेजने की अंतिम तारीख 23 मई है। तो जल्दी करिए मौका आपका इंतजार कर रहा है।

आपको यह भी बता दें कि रमेश थेटे फिल्मस फिल्म निर्माण के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती फिल्म निर्माण कंपनी है, जिसके सीईओ बहुजन समाज के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रमेश थेटे हैं। उनकी पहली फिल्म ‘द बैटल ऑफ भीमाकोरेगांव’ है, जो बनकर तैयार है और जिसमें अर्जुन रामपाल मुख्य भूमिका में हैं। इस फिल्म को लेकर डायरेक्टर ने स्पेशल वीआईपी पास भी जारी किया है, 500 रुपये में मिलने वाले इस पास का लकी ड्रा सितंबर में होना है, जिसमें जितने वालों को करोड़ों रुपये के पुरस्कार मिलेंगे। तो तुरंत आवेदन करिए।

कोरोना पर रिटायर्ड नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर चेताया

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 कोरोना मामले को रोकने की दिशा में मोदी सरकार के सुस्त रवैये की हर ओर आलोचना हो रही है। जहां देश में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, वहीं दूसरी ओर सेंट्रल विस्टा प्रोग्राम में हजारों करोड़ रुपये खर्च करने को लेकर भी मोदी सरकार की आलोचना हो रही है। इसी बीच 100 से ज्यादा रिटायर्ड नौकरशाहों के एक समूह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस महामारी के बीच सरकार के लापरवाही भरे रवैये पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि इस अत्यधिक पीड़ा के समय जब धन की कमी है, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट एक फिजूलखर्ची है।

इसके अलावा नोबेल पुरस्कार विजेता उपन्यासकार ओरहान पामुक सहित 76 विश्व प्रसिद्ध शिक्षाविदों और लेखकों ने भी मोदी सरकार से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को रद्द करने और इसमें खर्च होने वाले पैसों को कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए खर्च करने का आवाह्न किया है। रिटायर्ड अधिकारियों ने इस बात पर सवाल उठाया है कि जब देश में हर ओर लोगों की मौत हो रही है और लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का रोना रो रहे हैं, ऐसे में भी सरकार का लापरवाही भरा रवैया हैरान करने वाला है और इससे भारतीयों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पर रहा है।

इस पत्र में सरकार और उसके मंत्रियों की तमाम लापरवाही को लेकर भी निशाना साधा गया है। साथ ही पीएम केयर फंड पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि इसका गठन तब किया गया, जबकि पहले से ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष था।

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विदेशी छात्रों की पसंद बना बहन जी का बनाया यह शानदार विश्वविद्यालय

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यूं तो हर साल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से युवा भारत के तमाम विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए आते हैं। लेकिन इन दिनों एक विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। ऊंची-ऊंची इमारतें और बहुजन नायकों के विशाल प्रतिमाओं से सजे इस विश्वविद्यालय को बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने तब बनवाया था, जब वो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। यह विश्वविद्यालय है दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा यानी गौतम बुद्ध नगर में बना गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने आने वाले सेशन के लिए 124 ब्रांच में 3672 सीटों के लिए ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया शुरू की है। 2021-22 के सेशन में दुनिया के 40 देशों के 260 विदेशी छात्रों ने अब तक आवेदन किया है। खास बात यह है कि गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में विदेशी छात्रों के पढ़ने के लिए एडमिशन का आंकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है।

वर्तमान में विश्वविद्यालय में 50 विदेशी छात्र हैं जो अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने अपने देशों को रवाना हो जाएंगे। इसमें म्यांमार के अलावा कई अन्य देशों के छात्र शामिल हैं। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने इस सेक्शन में 21 नए कोर्स शुरू किए हैं।

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मामलों के निदेशक डॉ. अरविंद सिंह ने बताया कि विदेशी छात्रों ने एडमिशन में तेजी से रुचि दिखाई है और दिन-ब-दिन उनकी तादाद बढ़ती जा रही है। यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल सेकेंडरी का संबंध विभाग के भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, शिक्षा मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ आदि के साथ है, इनके जरिये भी आवेदन आते हैं।

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय 2008 में बसपा शासनकाल में बना था। भव्य इमारतों वाला यह विश्वविद्यालय 511 एकड़ में फैला हुआ है। विश्वविद्यालय में अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सेस मौजूद हैं। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की बात करें तो School of Information & Communication Technology, School of Management, School of Biotechnology, School of Engineering, School of Law, Justice and Governance, School of Buddhist Studies and Civilization, School of Vocational and Applied Sciences विषयों में पढ़ाई होती है।

कोरोना जांच के लिए मिला नया तरीका, अब नाक और मुंह में नहीं डाली जाएगी स्टिक

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 कोरोना महामारी में लोगों को एक दिक्कत इसकी जांच प्रक्रिया में भी सामने आ रही है। यह काफी तकलीफदेह और महंगी है। इसकी रिपोर्ट आने में भी देरी होती है। लेकिन अब ये तमाम प्रक्रिया जल्दी ही आसान हो सकती है और तकलीफ से भी मुक्ति मिल सकती है। नागपुर स्थित नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट जिसे NEERI भी कहा जाता है, उसके वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका ढूंढ़ निकाला है, जिससे जांच आसान हो जाएगी। खबर के मुताबिक अब कोरोना जांच के लिए नेरो फैरिंजयल और ओरो फैरिंजयल यानी नाक या गले में स्टिक डाल स्वैब (कोरोना जांच के लिए सेंपल) नहीं लिया जाएगा, बल्कि अब सलाइन गार्गल के जरिए टेस्ट कराया जा सकेगा। यानी कि अब किसी भी प्रकार की बाहरी चीज को अपने शरीर में प्रवेश दिए बगैर आप कोरोना जांच के लिए अपना स्वैब दे सकेंगे।

नागपुर के नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने कोरोना सैंपल देने के लिए सलाइन गार्गल तकनीक का इजाद किया है जो कि बेहद आसान और सटीक है। इस तकनीक को आईसीएमआर की मान्यता भी प्राप्त हो गई है और जल्द ही इसी तकनीक से कई केंद्रों में कोरोना की जांच सैंपल भी कलेक्ट किए जाएंगे। नई सलाइन गार्गल की तकनीक बहुत ही आसान है। इसमें जांच करने वाले को इस तरह का एक कंटेनर दिया जाएगा और महज कुछ सेकंड तक गार्गल करने के बाद इसी कंटेनर में उस गार्गल को एकत्र करना है और जांच के लिए प्रयोगशाला तक ये आसानी से पहुंच जाएगा।

 इस तकनीक से कोरोना जांच के लिए सैंपल एकत्र करने के लिए किसी प्रशिक्षक की जरूरत नहीं होगी। कोई भी आसानी से इस कंटेनर में अपना स्वैब का सैंपल जमा कर सकता है। इस तकनीक से जांच करने का खर्च भी मात्र 60 रुपये तक होगा तो वहीं अभी मौजूदा तकनीक RT-PCR के लिए 500 से अधिक रुपये खर्च किए जा रहे हैं। साथ ही इस तकनीक से एक ओर समय की भी बचत होगी तो वहीं नतीजे भी जल्द मिलेंगे। गौरतलब है कि भारत में आने वाली कोरोना की तीसरी लहर में सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को बताया जा रहा है, ऐसे में बच्चों का स्वैब (कोरोना जांच के लिए सेंपल) आसानी से बिना उन्हे तकलीफ दिए लिया जा सकेगा।

राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया का निधन

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 राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री और कद्दावर कांग्रेस नेता जगन्नाथ पहाड़िया का 19 मई को निधन हो गया। वे 89 साल के थे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री मोदी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित तमाम नेताओं ने शोक प्रकट किया है। राजस्थान सरकार द्वारा उनके निधन पर एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है। इस दौरान प्रदेश के सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा।

उनका जन्म 15 जनवरी 1932 को राजस्थान के भरतपुर में एक दलित परिवार में हुआ था। वे 6 जून 1980 से 14 जुलाई 1981 तक 13 महीने राजस्थान के मुख्यमंत्री रहें। वो सन् 1957 में सबसे कम उम्र के सांसद बने थे। जब वे सांसद चुने गए तब उनकी उम्र सिर्फ 25 साल और तीन महीने थी। पंडित नेहरू ने दिल्ली में उनसे हुई पहली मुलाकात के बाद उनसे प्रभावित होकर उन्हें कांग्रेस का टिकट दिया था। इसके अलावा इंदिरा गांधी की सरकार में बतौर मंत्री उनके पास वित्त, उद्योग, श्रम एवं कृषि जैसे विभाग रहें। वे 1989 से 1990 तक एक साल के लिए बिहार और 2009 से 2014 तक हरियाणा के राज्यपाल रहें। जगन्नाथ पहाड़िया एक कद्दावर जननेता थे। वे 1957, 1967, 1971 और 1980 में सांसद रहे। जबकि बाद के दिनों में कई बार विधायक भी बनें। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनके निधन पर ट्विट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया कोरोना से पीड़ित थे और दिल्ली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। गौरतलब है कि उनकी पत्नी भी इलाज के लिए दिल्ली के अस्पताल में भर्ती हैं।

पीएम केयर फंड से खरीदा गया वेंटिलेटर पड़ा बेदम

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 जब देश में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है, अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं की खस्ता हालत ने हमारे कथित महान भारत देश की कलई खोल कर रख दी है। विदेशों में अगर भारत के स्वास्थ्य सुविधाओं का माखौल उड़ रहा है तो इसकी वजह खुद हमारे देश का सिस्टम है जो बेईमानी के गर्त में डूबा हुआ है। पीएम केयर फंड से खरीदे गए वेंटिलेटर में भी सिस्टम की लापरवाही खुल कर सामने आई है। दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर के मुताबिक कहीं ऑक्सीजन प्रेशर, तो कहीं एक फ्यूज के चलते पीएम केयर वेंटिलेटर बेदम परे हैं।

 जब पीएम केयर फंड को लेकर हंगामा मचा तो पिछले साल सरकार ने इस फंड से हजारों वेंटिलेटर खरीदे। 12 मार्च को लोकसभा में दिये गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था कि 1850 करोड़ रुपये से 38,867 वेंटिलेटर्स राज्यों को भेजे गए। इसमें से 35,269 वेंटिलेटर्स के इंस्टाल होने की बात कही गई थी। सबसे ज्यादा वेंटिलेटर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत इलेक्ट्रानिक्स से खरीदा गया था जबकि इसके अलावा AMTZ, नोएडा की अग्वा हेल्थकेयर, गुजरात की ज्योति CNC और एलाइड मेडिकल से भी वेंटिलेटर खरीदे गए थे।

 लेकिन कोरोना महामारी के बीच लोगों को जिंदगी देने के लिए राज्यों को पीएम केयर फंड से दिये गए ज्यादातर वेंटिलेटर किसी काम के नहीं हैं। भास्कर की खबर के मुताबिक कहीं वेंटिलेटर में पर्याप्त ऑक्सीजन न पहुंचने तो कहीं चलते-चलते बंद होने की शिकायतें आ रही हैं। कंपनियों ने वेंटिलेटर तो सप्लाई किए लेकिन कई जगह इन्हें इस्टॉल करने की जगह सिर्फ असेम्बल करके रख दिया गया।

कई राज्यों में वेंटिलेटर लगाने के लिए लोकेशन तैयार नहीं थी। तो कई जगहों पर ऑक्सीजन पाइप से जोड़ने वाले कनेक्टर नहीं थे। डॉक्टरों और तकनीकी स्टॉफ का कहना है कि कई जगहों पर न तो समय से ऑक्सीजन सेंसर और फ्यूज कनेक्टर जैसे स्पेयर पार्ट्स् मिल रहे हैं और न सर्विस हो पा रही है। जिस कारण ये बेकार परे हैं, लेकिन इस लापरवाही के जिम्मेदार व्यवस्था में लगे अन्य लोग भी हैं। जब अस्पतालों तक वेंटिलेटर पहुंचा तो संक्रमण कम था, इस वजह से डॉक्टरों ने रुचि नहीं ली। तो कई जगहों पर महज पांच रुपये का फ्यूज उड़ जाने के कारण वेंटिलेटर को कबाड़ में रख दिया गया।

 लगातार शिकायतें आने के बाद सरकार ने इस बारे में जांच के आदेश दे दिये हैं। लेकिन जमीन पर जिस तरह देश की जनता वेंटिलेटर की कमी से दम तोड़ रही है, उसमें सरकार से लेकर वेंटिलेटर मुहैया करवाने वाली कंपनियां और अस्पताल प्रशासन सभी सवालों के घेरे में हैं। सवाल है कि हमारे देश की व्यवस्था समय पर दुरुस्त क्यों नहीं मिल पाती। ये करना यह देश कब सिखेगा??

रेलवे में अप्रेंटिस के निकली हजारों पद पर भर्ती

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 रेलवे रिक्रूटमेंट सेल मुंबई ने वर्ष 2021-22 के लिए अप्रैंटिस के लिए 3591 पदों पर भर्ती निकालते हुए आवेदन मांगा है। नौकरी की चाहत रखने वाले अभ्यर्थी रेलवे रिक्रूटमेंट सेल की ऑफिशियल वेबसाइट rrc-wr.com पर जाकर ऑनलाइन आवेदन पत्र भरकर जमा कर सकते हैं। इस भर्ती प्रकिया के तहत विभिन्न विभागों में इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिक, पेंटर, पाइप फिटर, प्लंबर, ड्राफ्ट्समैन, पासा, वेल्डर, डीजल मैकेनिक समेत कई पदों पर भर्ती होनी है। इसकी आवेदन प्रक्रिया 25 मई 2021 से शुरू होगी। आवेदन करने की अंतिम तारीख 24 जून 2021 है।

अगर वैकेंसी डिटेल्स की बात करें तो मुंबई डिवीजन में- 738 पोस्ट, वडोदरा डिविजन में– 489 पोस्ट, अहमदाबाद डिविजन में– 611 पोस्ट, रतलाम डिविजन में– 434 पोस्ट, राजकोट डिविजन में– 176 पोस्ट, भावनगर डिविजन में- 210 पोस्ट, लोअर परेल डब्लयू/शॉप में– 396 पोस्ट, महालक्ष्मी डब्लयू/शॉप में– 64 पोस्ट के अलावा भावनगर डब्लयू/शॉप में– 73 पोस्ट, दाहोद डब्लयू/ शॉप में-187 पोस्ट, प्रताप नगर डब्लयू/ शॉप वडोदरा में– 45 पोस्ट, साबरमती इंजीनियरिंग डब्लयू/ शॉप, अहमदाबाद में– 60 पोस्ट, साबरमती इंजीनियरिंग सिग्नल डब्लयू/शॉप, अहमदाबाद में– 25 पोस्ट और हेडक्वार्ट्स कार्यालय में– 83 पदों पर भर्ती निकली है।

उम्र सीमा और योग्यता जहां तक उम्र सीमा और योग्यता की बात है तो उम्मीदवारों की आयु 15 वर्ष से कम और 24 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। और उम्मीदवारों को मान्यता प्राप्त बोर्ड से न्यूनतम 50% अंकों के साथ मैट्रिक या दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होना जरूरी है।

आवेदन शुल्क की बात करें तो सामान्य जाति के उम्मीदवारों को 100 रुपये आवेदन शुल्क जमा करना होगा। जबकि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ पीडब्ल्यूडी और महिला आवेदकों को आवेदन शुल्क के भुगतान से छूट दी गई है।

योग्य उम्मीदवार का चयन मेरिट सूची के आधार पर किया जाएगा जो कि प्राप्त अंकों के प्रतिशत के औसत पर आधारित होगा। उम्मीदवार के 10वीं क्लास और आईटीआई में प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट लिस्ट तैयार की जाएगी।

अपने ही सरकार पर भड़के भाजपा एमएलए

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 उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक राकेश राठौर ने अपनी ही पार्टी की सरकार की एक बार फिर से आलोचना की है। हालांकि योगी सरकार पर चुटकी लेते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि वह बहुत अधिक कहने से डरते हैं क्योंकि इससे उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप लग सकता है। राठौर ने यह भी आरोप लगाया कि यूपी सरकार के कामकाज में विधायकों की कोई भूमिका नहीं है और उनके सुझावों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। राठौर सीतापुर से विधायक हैं।

 उन्होंने कहा, ‘मैंने कई कदम उठाए हैं, लेकिन विधायकों की हैसियत क्या है? अगर मैं ज्यादा बोलता हूं तो मुझ पर देशद्रोह का आरोप लग सकता है।’ राठौर सीतापुर में एक सरकारी ट्रॉमा सेंटर के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे, जिसका निर्माण तो हुआ लेकिन अभी तक चालू नहीं हुआ है।

यह पूछे जाने पर कि क्या वह कह रहे हैं कि विधायकों का सरकार में कोई अधिकार नहीं है, राठौर ने कहा, ‘क्या आपको लगता है कि विधायक अपने मन की बात कह सकते हैं? आप जानते हैं कि मैंने पहले भी सवाल उठाए हैं।’ यह पहली बार नहीं है जब राठौर ने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ प्रशासन या केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार से खुले तौर पर असहमत और आलोचना की है। पिछले साल अप्रैल में कथित तौर पर उनकी विशेषता वाली एक ऑडियो क्लिप वायरल होने के बाद उन्हें भाजपा द्वारा नोटिस दिया गया था। इस ऑडियो में उन्होंने कहा था कि ‘क्या आप ताली बजाकर कोरोना वायरस भगा दोगे?

डॉ. शाहिद जमील ने छोड़ी राष्ट्रीय टॉस्क फोर्स, कोरोना रोकथाम पर घेरे में सरकार

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 जीनोम सीक्वेसिंग को लेकर राष्ट्रीय टास्क फोर्स के अध्यक्ष डॉ. शाहिद जमील ने अपनी जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि इसके पीछे के कारण अब तक सामने नहीं आए हैं, लेकिन सोशल मीडिया से लेकर स्वास्थ्य और राजनीति के क्षेत्र में काफी विवाद शुरू हो चुका है। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कोरोना वायरस की जीनोम सीक्वेसिंग को लेकर डॉ. जमील संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस बारे में कई बार सलाह भी दी लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की। इसके अलावा उन्होंने जीनोम सीक्वेसिंग को लेकर सरकार की नीतियों पर भी नाराजगी व्यक्त की थी।

 केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जीनोमिक्स कंसोर्टिया के वैज्ञानिक सलाहकार समूह (इनसाकाँग) का गठन करके उसे 10 प्रयोगशालाएं सौंप दी ताकि कोरोना के वेरियेंट्स पर विस्तृत और सटीक अध्ययन किया जा सके। इसे लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया, देश के सर्वोत्तम विषाणु वैज्ञानिक डॉ. शाहिद जमील का इस्तीफा वाकई दुखद है। मोदी सरकार में वैसे प्रोफेशनल्स की कोई जगह नहीं है जो बिना डर या पक्षपात के बेबाक राय रखते हैं। हालांकि एक सच यह भी है कि कोरोना को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की सरकार अब तक 15 राष्ट्रीय स्तर की टीम गठित कर चुकी है, जिनमें सबसे पहले अप्रैल 2020 में डॉ. गगनदीप कंग का इस्तीफा हुआ था। इससे पहले मणिपाल इस्टीट्यूट ऑफ वॉयरोलॉजी के प्रो. अरुण कुमार ने भी इस्तीफा दिया है। और अब राष्ट्रीय टॉस्क फोर्स के अध्यक्ष ड. शाहिद जमील ने अपना इस्तीफा दे दिया है।

नारदा स्कैमः क्या भाजपा में होना हर घोटाले से बचने का प्रमाण पत्र है?

 लगता है भाजपा और उसके शीर्ष नेता देश की हर संस्था को अपने हिसाब से नचाने में रिकार्ड बनाकर ही दम लेंगे। पश्चिम बंगाल में नारदा स्टिंग मामले में ममता बनर्जी सरकार के दो मंत्रियों समेत चार नेताओं को जिस तरह कोलकाता की प्रेसिडेंसी जेल भेज दिया गया है, उससे तो यही लगता है। जेल जाने वालों में ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री सुब्रत मुखर्जी और फ़िरहाद हकीम के अलावा टीएमसी विधायक मदन मित्रा और पार्टी के पूर्व नेता शोभन चटर्जी शामिल हैं। सोमवार 17 मई को सीबीआई इन नेताओं को उनके घरों से पूछताछ के लिए अपने दफ़्तर लेकर आई, जहाँ उनको गिरफ़्तार कर लिया गया, और उन्हें रात को जेल भेज दिया गया। इस बीच में खेल यह हुआ कि सीबीआई की विशेष अदालत ने चारों नेताओं को अंतरिम ज़मानत दे दी थी मगर रात को कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस फ़ैसले पर रोक लगा दिया और अभियुक्तों को अगले आदेश तक न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का निर्देश दिया। इस बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी सीबीआई के दफ़्तर गईं और वहाँ कई घंटे रहीं और राजनीतिक साजिश बताते हुए विरोध दर्ज कराया था।इस पूरे मामले में बड़ा सवाल मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं होने को लेकर उठ रहे हैं, क्योंकि ये दोनों भी नारदा स्टिंग ऑपरेशन में अभियुक्त हैं लेकिन सीबीआई द्वारा उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया है। ये दोनों नेता इस स्टिंग ऑपरेशन के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सदस्य थे लेकिन बाद में वो बीजेपी में शामिल हो गए। फिलहाल शुभेन्दु अधिकारी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं जबकि मुकुल रॉय विधायक। यह साफ देखा जा सकता है कि इन दोनों नेताओं को सिर्फ भाजपा का दामन थामने का लाभ मिल रहा है। भाजपा में गए इन दोनों नेताओं के ऊपर मुकदमा चलाने की अनुमति अभी तक सीबीआई को नहीं मिली है। जहां शुभेन्दु अधिकारी का मामला राज्यपाल के पास अटका है, वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के लिए सीबीआई की ओर से आवेदन ही नहीं किया गया है। जबकि सीबीआई द्वारा 6 अप्रैल 2019 को लोकसभा अध्यक्ष को भेजे गए रिपोर्ट के अनुसार अधिकारी सहित 11 अन्य लोग इस मामले के आरोपी हैं।

यहां तक कि साल 2014 में नारदा स्टिंग करने वाले नारदा न्यूज पोर्टल के पत्रकार मैथ्यू सैमुएल ने भी इन दोनों की गिरफ्तारी नहीं होने पर सवाल उठाया है। इस स्टिंग में तृणमूल कांग्रेस के मंत्री, सांसद और विधायक कैमरे पर काल्पनिक कंपनियों को मदद पहुँचाने के लिए मदद देते देखे गए थे, जिसके बाद हंगामा मच गया था। जांच एजेंसी की प्राथमिकी में मुकुल रॉय को पहला आरोपी बनाया गया था, जिसके कुछ सालों बाद मामला जोर पकड़ने पर मुकुल रॉय ने 2017 में भाजपा का दामन थाम लिया था।

तृणमूल कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए मुकुल रॉय और शुभेन्दु अधिकारी

इस पूरे मामले ने फिर से साबित किया है कि सीबीआई और राज्यपाल सत्ताधारी दल के एक हथियार हैं, जिसे वह अपने मतलब से चलाती रहती है। क्योंकि जब एक ही आरोप में तृणमूल के नेता जेल में हैं तो फिर तृणमूल छोड़ भाजपा जाने वाले नेता जेल से बाहर क्यों हैं?? क्या भाजपा में होना हर आरोप, हर घोटाले से बचने का प्रमाण पत्र है।

कोरोना के इस जनसंहार के दौर के जिम्मेदार नरेंद्र मोदी ही हैं

चाहे जितनी लागलपेट की बात करो, कितना भी घुमाओ, भटकाओ, कितना भी सच को दबाओ, छिपाओ, लेकिन कोरोना के इस जनसंहार के दौर के जिम्मेदार नरेंद्र मोदी ही हैं। दुनिया में जब सब कुछ स्थगित हो रहा था, भारत में भी कुंभ मेले का आयोजन, राज्यों के चुनाव और आई पी एल के मैच भी स्थगित किए जा सकते थे। इनके कारण ही कोरोना ने विकराल रूप ग्रहण किया। मोदी जी की सत्ता की जबरदस्त भूख और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने के दुस्साहस ने देश को मौत के मुंह में धकेल दिया। आज देश श्मशान में तब्दील हो गया है। और कितने लाख लोगों की जान लेकर आपकी महत्वाकांक्षा शांत होगी मोदी जी?
आप मौनी बाबा नहीं हैं,कि कुछ नहीं बोल सकते, आप बहुत वाचाल हैं। जब सारी दुनिया और भारत की जनता कोरोना के खिलाफ लड़ रही थी, आपने राम के अवतारी बनकर भारत को कोरोना से मुक्त होने की घोषणा कर दी। आपके अंध भक्तों ने ‘मोदी है तो मुमकिन है’, का उद्घोष कर आपको विश्व गुरु बना दिया। यह सब आपने मुदित मन से स्वीकार किया। इस सब के कारण दुनिया भर में आपकी जो जग हँसायी और थू-थू हुई है सो हुई है, भारत की छवि को भी जबरदस्त धक्का लगा है। इतना बढ़ चढ़कर बोलने वाले मोदी जी आज चुप क्यों हैं? आज भी क्यों नहीं अपना मुंह खोलते और देश की जनता को संबोधित कर कोरोना के कारण हो रहे इस जन संहार की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इसके लिए देश से माफी मांगते। आप देश के नायक हैं, आगे आइये। नायक श्रेय लेने के लिए ही नहीं होता, जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिए भी होता है।

इंसान गढ़ने वाले महान कलाकार-जनशिक्षक का नाम था: लालबहादुर वर्मा

जो कोई थोड़ा भी नजदीक से या उनके चाहने वालों के जुबानी लालबहादुर वर्मा को जनता रहा होगा, वह उनके बारे में दावे से कह सकता है कि वो इंसान गढ़ने वाले एक महान कलाकार और जनशिक्षक थे। उन्होंने एक नहीं, दो नहीं,… सौ नहीं हजारों इंसान गढ़े हैं, जो आज भी आंखों में खूबसूरत दुनिया का ख्वाब लिए अपने-अपने तरीके से बेहतर दुनिया बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। ये उत्तर भारत हर कहीं, मिल जाते हैं। उन्होंने सैकड़ो पेशेवर क्रांतिकारी गढ़े, उन्होंने सैकड़ों जमीन एक्टिविस्ट गढ़े, उन्होंने नाटकार गढ़े, गीतकार गढ़े और कवि-लेखक गढ़े।
सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने लड़कियों-महिलाओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार की, जो अपने-अपने तरीके से बेहतर दुनिया गढ़ रही हैं और साथ ही पितृसत्ता को चुनौती दे रही हैं। उनमें से बहुत सारी आज भी बेहतर दुनिया के लिए लड़ रही है, कुछ जेल की सलाखों के पीछे वर्षों गुजार चुकी हैं, लेकिन क्रांतिकारी परिवर्तन का उनका सपना अभी भी जिंदा है।
लालबहादुर वर्मा के आंखों में न्याय, समता, बंधुता और सबकी समान समृद्धि पर आधारित समाज का एक ख्वाब था, कभी इसे वे समाजवाद के नाम पर परिभाषित करते थे, कभी कोई और नाम दिया, लेकिन सपना वही था।लाल बहादुर वर्मा अच्छी तरह जानते थे कि बेहतर दुनिया बेहतर इंसान बनाते हैं, इसीलिए वे आजीवन बेहतर इंसान गढ़ने में लगे रहे है। अनवरत रात-दिन- अहर्निष। उन्होंने कितनों को बेहतर इंसान बनाया, अंगुलियों पर इसकी गणना करना मुश्किल है।
 
 लालबहुदार वर्मा प्रोफेसर थे, इतिहासकार थे, भंगिमा और इतिहासबोध जैसी जनपक्षधर पत्रिकाओं के संपादक थे, अनुवादक थे, यह उनके लिए बहुत कम मायने रखता था, मेरे लिए भी उनके संदर्भ में यह सब बाते बहुत कम मायने रखती हैं। प्रोफेसर तो आजकल हर शहर में मिल जाते हैं, इतिहासकारों की संख्या भी कम नहीं है, संपादक भी बहुतेरे हैं, अनुवादकों की भी भरमार है। यह सब वर्मा जी के संदर्भ में बहुत कम मायने रखता है, उनके लिए भी बहुत कम मायने रखता था।
लालबहादुर वर्मा हमारे समय के एक महान व्यक्तित्व थे, इसकी मूल वजह है, उनका प्रोफेसर होना, इतिहासकार होना,संपादक होना या लेखक होना नहीं है, इसकी मूल वजह है अंतिम सांस तक खूबसूरत दुनिया के सपने को आंखों में सजोए रखना और उस दुनिया के निर्माण के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर देना और उसके लिए अंसख्य इंसानों को गढ़ने में लगे रहना। ऐसे व्यक्तित्व या महान कलाकार के निर्माण के लिए कुछ तत्व आवश्यक हैं- गहरे स्तर की संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मानस और वैज्ञानिक टेंपरामेंट। यह सब वर्मा जी में मौजूद था।
उनके घर के दरवाजे सबसे लिए खुले थे, सच तो यह है कि उन्होंने कभी ऐसा घर बनाया ही नहीं, जिसे कहा जा सके कि यह वर्मा जी का निजी घर है। उनका घर सबका घर था। दिमाग से इतने लोकतांत्रिक यदि कोई बताए न, तो यह किसी को पता न चल पाए कि वह प्रोफेसर हैं, इतिहासकार हैं, साहित्यकार, बड़े लेखक हैं और फ्रांस से पढ़कर आए हैं।
लाल बहादुर वर्मा सच्चे अर्थे में आज के समय में ग्राम्शी के आर्गेनिक जपक्षधर बुद्धिजीवी थे। नुक्कड़ नाटकों की टीम के बीच, सड़कों पर, आम लोगों के बीच उनके जीवन का बड़ा हिस्सा बीता। जितनी उनमें मेधा थी, उतनी ही जनपक्षधरता। वर्मा जी के लिए लोकतांत्रिक दिमाग, सबको समान समझना, वैज्ञानिक चेतना और इतिहास बोध यह सब किताबी बातें नहीं थीं, न कैरियर बनाने की सीढ़ी, न रोब गांठने का माध्यम। यह सबकुछ वे जीते थे, व्यवहार में। अमल में उतारते थे।
जब वे गोरखपुर में थे, उन्होंने अपने घर को गोरखपुर की क्रांतिकारी-प्रगतिशील गतिविधियों का केंद्र बना दिया, जब वे इलाहाबाद गए, वहां के अपने घर को केंद्र बना दिया, जब उन्होंने जीवन के अंतिम समय में देहरादून को बसेरा बनाया, तो भी अपने घर को सामाजिक कार्यों का केंद्र बना दिया। अभी हाल में उन्होंने देहरादून में प्रगतिशील किताबों के एक केंद्र का उद्घाटन किया था, जिसके केंद्र वे स्वयं थे। वे जनकथाकार भी थे, वे मार्क्स की कथा को भी उतने ही चाव से सुनाते, जितने चाव से आंबेडकर की कथा को और भगत सिंह की कथा को। वे इतने जनपक्षधर थे कि कुंभ के मेले में भी जनपक्षधर दुनिया के निर्माण के लिए  प्रगतिशील कथा केंद्र खोल देते थे।
एक बात और मेरी जानकारी में जो है, वह यह कि वर्मा जी, हिंदी पट्टी के अधिकांश बुद्धिजीवियों के उन बदत्तर अवगुणों से मुक्त थे, जो आम तौर पर उनमें उनमें पाई जाती है। जैसे जातिवाद, जैसे अवसरवाद, जैसे कैरियरवाद, जैसे आत्ममुग्धता, जैसे ज्ञान का पोर-पोर में भरा अंहकार, जैसे बेटे-बेटी या भाई-बहन को किसी भी शर्त विश्वविद्यालय में घुसा देने की अदम्य इच्छा और जैसे संपत्ति निर्माण को जीवन का ध्येय बना लेना।लालाबहादुर वर्मा जी हिंदी पट्टी के आज के समय के उन चंद विरले लोगों में एक थे, जिन्हें सच्चे अर्थों में जनबुद्धिजीवी कह सकते हैं, जिनकी सारी मेधा, सारी बुद्धि, सारी जानकारी, सारी लेखकीय-संपादकीय शक्ति और जरूरत पड़ने पर सारे संसाधन और उर्जा जन के लिए समर्पित हो।
 जीवन के अंतिम समय तक,जहां तक मैं जानता हूं, वे अपनी आजीविका के लिए खटते रहे। लालबहादुर वर्मा ने खूबसूरत दुनिया बनाने के रास्ते भले ही थोड़ा अदले-बदले हों, लेकिन जीए जिंदगी भर, दुनिया को खूबसूरत बनाने के सपने के साथ जीएं और उन्हीं सपनों के साथ मरे। वर्मा जी उन चंद सौभाग्यशाली लोगों में थे, जिन्हें टूटकर चाहने वालों की संख्या सैकड़ों में नहीं हजारों में है। हजारों लोगों में वर्मा जी किसी न किसी रूप में जीवित हैं। आज वे सभी लोग गमगीन होंगे, अवसाद में डूबे होंगे। उसमें मैं भी शामिल हूं।
लेकिन अंत में एक बात जरूर, वर्मा जी ने  शानदार जिंदगी जीना किसे कहते हैं और शानदार जिंदगी क्या होती है और बड़ा मनुष्य होना, कितना सुखद होता है, इसकी मिसाल कायम की। उन्होंने एक शानदार जिंदगी जी और बहुतों को जिंदगीं किस बला का नाम है, यह बता कर गए और जिंदगी जीने का सलीका सीखा कर गए। हिंदू पट्टी के महान जन शिक्षक को अंतिम अलविदा, आप हमेशा हमारी यादों, संवेदनाओं में और विचारों में जिंदा रहेंगें, आप हमेशा हमारी प्रेरणा बने रहेंगे। हम आपके सपनों को आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश करेंगे।
अंतिम अलविदा!

बसपा समर्थकों का कमाल, ट्विटर पर दिखाया दम

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ऐसे में जब देश भर में सरकारी विफलता की चर्चा जोरो पर है, और अंधभक्तों को छोड़कर देश की ज्यादातर जनता मोदी सरकार को फेल करार दे चुकी है, यह बहस आम है कि आखिर देश को कैसा नेतृत्व चाहिए जो कोरोना जैसे मुश्किल वक्त में चुप्पी साधने की बजाय सामने आकर व्यवस्था को दुरुस्त कर सके। तमाम लोग ऐसे वक्त में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहन कुमारी मायावती के शासनकाल को याद कर रहे हैं।

इसी बीच कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें 16 मई की शाम को 4 बजे ट्विटर पर #Nation_wants_Behan_Ji ट्रेंड करवाने की अपील की गई। यह मैसेज तेजी से सोशल मीडिया पर घूमने लगा और 16 मई को तो कमाल हो गया। बहुजन समाज पार्टी के समर्थकों ने तय वक्त पर #Nation_wants_Behan_Ji को ट्रेंड करवा दिया। एक लाख से ज्यादा लोगों ने इस स्लोगन को रि-ट्विट किया। ऐसा कर बसपा समर्थकों ने दिखा दिया कि ट्विटर पर भी वो अपनी मर्जी से अपना दम दिखा सकते हैं।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर ट्विटर को देश के संभ्रांत खाए, पीये, अघाए लोगों का केंद्र माना जाता है, लेकिन जिस तरह से यहां भी बहुजनों की धमक बढ़ रही है, वह उत्साहित करने वाली खबर है। यह इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि जब बसपा समर्थक #Nation_wants_Behan_Ji को ट्विटर पर ट्रेंड करवाने में जुटे थे, उसी वक्त यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थक भी उनके समर्थक में हैशटैग चला रहे थे, लेकिन बहनजी के समर्थकों ने उन्हें पछाड़ दिया।

खास बात यह भी रही कि इस दौरान लगातार बसपा समर्थक बसपा शासनकाल में किये गए शानदार कामों को भी प्रचारित करते रहे। उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं और जिस तरह बसपा और उसकी प्रमुख मायावती के समर्थक एकजुट हो रहे हैं, वह बसपा के लिए काफी अच्छा संकेत है।

अखिलेश कृष्ण मोहन: बहुजन पत्रकारिता के विरल रत्न

कल सुबह एक खास लेख लिखने में व्यस्त था। उसका अंतिम वाक्य लिखना शुरू ही किया था कि मोबाइल बज उठा। वह डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी का कॉल था। अंतिम वाक्य पूरा करना इतना जरुरी लगा कि कॉल रिजेक्ट कर दिया। ज्यों ही लेख पूरा हुआ, मेरे दामाद राजीव रंजन का फोन आ गया। उन्होंने बिना कोई भूमिका बांधे बताया,’ पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन नहीं रहे! सुनकर स्तब्ध रह गया। मैंने उन्हें कहा कि थोड़ी देर पहले डॉ. प्रियदर्शी का फोन आया था, शायद वह भी यही सूचना देना चाहते थे। इतना कहकर मैं फोन काट दिया। फोन काटने के बाद मैंने रुधे गले से अपने मिसेज को सूचना दी। सुनकर उन्हें भी भारी आघात लगा और ऑंखें भर आयीं। बहू खाना बनाने जा रही थी। मैंने अपने हिस्से का खाना बनाने के लिए मना कर दिया। उसके बाद अखिलेश के बेहद खास डॉ. प्रियदर्शी को फोन लगाया। प्रायः 5 मिनट बात हुई। डॉ. कौलेश्वर ने रुधे गले से कहा कि हमने सामाजिक न्याय की दुनिया का एक बड़ा नायक खो दिया। अखिलेश के नहीं रहने पर ऐसा लगता है बहुजन समाज का कोई अंग ख़त्म हो गया। उनके नहीं रहने पर हमारा फर्ज बनता है कि अब उनके परिवार के विषय में सोचें।

 डॉ. कौलेश्वर से बात करने के बाद लखनऊ में अखिलेश के अभिभावक की भूमिका में दिखने वाले डॉ. लालजी निर्मल को फोन लगाया। उन्होंने जब मेरी कॉल उठाई, मेरे धैर्य का बाँध टूट गया और मैं जोर से रो पड़ा। उन्होंने भरे गले से बताया कि जो ही सुन रहा है, वही रो रहा है। अभी विद्या गौतम का फोन आया था, वह भी बेतहासा रोये जा रही थी। विद्या और अखिलेश ने शुरुआती दौर में साथ- साथ एक चैनल में काम किया था। जब मैंने उनसे आगे के प्रोग्राम के विषय में पूछा तो उन्होंने बताया कि पार्थिव शरीर गाँव जाएगा। वहीं उनका शेष कार्य किया जायेगा। अखिलेश का पार्थिव शरीर गाँव जाना इसलिए जरुरी था, क्योंकि उनकी मां को कल ही ऐसा कुछ होने आभाष हो गया था। अगर आखिरी वक्त में अखिलेश का शरीर गाँव नहीं गया तो घर वालों का दुःख और बढ़ जायेगा। आखिर में उन्होंने कहा कि हमने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण साथी को खो दिया। उनकी भरपाई होनी मुश्किल है। डॉ. निर्मल से बात करने के बाद जब मैंने फेसबुक खोला, देखा अखिलेश के प्रति श्रद्धांजलि की बाढ़ आई हुई है। सब कुछ देख कर दिमाग और सुन्न हो गया और मैंने छोटा सा यह पोस्ट लिखा, ‘अखिलेश कृष्ण मोहन का जाना मेरे लिए कोरोना के दूसरे वेभ की सबसे बड़ी घटनाओं में एक है। मुझे तो ऐसा लगता है मेरा एक अंग ही ख़त्म हो गया। मुश्किल है एक और अखिलेश कृष्ण मोहन का होना। उनके जाने से बहुजन पत्रकारिता की एक विराट संभावना का अंत हो गया।’

 उपरोक्त अंश लिखने के बाद मैं इस लेख को पूरा करने में जुट गया, पर दिमाग सुन्न हो गया था, जिससे कंसेन्ट्रेशन ही नहीं बन पा रहा था। दिन में कुछ खाया नहीं था। इसलिए शाम को जल्दी से खा कर यह सोच कर सो गया कि सुबह तरोताजा होकर लेख पूरा करूँगा। सुबह उठा भी, किन्तु जब फेसबुक पर नजर दौड़ाया मनस्थिति और ख़राब हो गयी। फेसबुक अखिलेश की माँ के निधन की खबरों से भरा पड़ा था। वह अपने प्यारे बेटे की मौत के सदमे को झेल नहीं पायीं और शाम होते ही अखिलेश के साथ अनंत यात्रा पर निकल पड़ीं। उनकी मां के जाने की खबर सुनकर एक बार फिर मैं आंसुओं में डूब गया। उसके बाद भी लेख को पूरा करने के लिए प्रयास किया, पर बिलकुल ही सफल नहीं हुआ। शब्द- शक्ति एकदम से ख़तम सी हो गयी। अंत में फेसबुक पर यह पोस्ट डालकर मैं सरेंडर कर गया– ‘महान पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन पर आयेगी किताब!

दरअसल उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इतना व्यापक है कि लेख के जरिये उनके साथ न्याय करने में खुद को अक्षम पा रहा हूँ। ऐसे में उनपर एक किताब लाने का निर्णय लिया हूँ। अगर कोरोना काल में बचा रहा और प्रेस इत्यादि खुले रहे तो आगामी 6 दिसम्बर बाबासाहेब डॉ आम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर वह किताब लोगों के हाथों में होगी!’

इसमें कोई शक नहीं कि अखिलेश कृष्ण मोहन जितने बड़े पत्रकार थे, उतने ही बड़े इन्सान भी थे। इसलिए उनके नहीं रहने पर लोगों ने उनके प्रति जो श्रद्धा उड़ेली, वह विरले ही किसी को नसीब होती है। योगेश योगेश्वर ने विस्मित होकर यूँ नहीं फेसबुक पर लिखा-‘ गज़ब हो गया! इस व्यक्ति के लिए फेसबुक पर इतना लिखा गया है। क्या कमाई की है। नमन श्रद्धांजलि!’ अब जबकि मेरी शब्द-शक्ति जवाब दे चुकी है, मैं फेसबुक पर सैकड़ों की संख्या में आये लोगों के उदगार के मध्य मैं कुछेक ऐसे लोगों की राय से अपने लेख की कमी को पूरा करना चाहता हूँ, जिन्होंने उन्हें ज्यादे करीब से देखा-सुना है।

 शुरुआत प्रख्यात बहुजन चिन्तक चन्द्रभूषण सिंह यादव से करता हूँ, जिन्होंने उनकी तुलना कोहिनूर हीरे से की है। उन्होंने लिखा है-‘ अब तो स्मृतियां ही शेष हैं। “फर्क इंडिया” के सम्पादक साथी अखिलेश कृष्णमोहन जी का न होना बहुजन पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति।।……. मैं लिखूं क्या अपने इस पत्रकारिता जगत के कोहिनूर हीरे के बारे में, क्योंकि जब से यह खबर मिली है कि “फर्क इंडिया” के सम्पादक अखिलेश कृष्णमोहन जी हम सबके बीच नहीं रहे, मन उदास है, कुछ कह पाना मुश्किल है क्योंकि लखनऊ रहने पर मिलना, मुद्दों पर बहस करना, नई-नई चीजें बताना, मोटरसाइकिल पर बैठकर एक साथ भिन्न-भिन्न मिशनरी साथियो से मिलना आदि अब किसके साथ होगा?….

 मशहूर पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा है,’ लखनऊ से फिर एक बहुत स्तब्धकारी सूचना! सोशल मीडिया से ही पता चला कि ‘फ़र्क इंडिया’ के संपादक अखिलेश कृष्ण मोहन नहीं रहे। लखनऊ स्थित एक बड़े शासकीय अस्पताल में उनका इलाज़ चल रहा था। बेहद सक्रिय इस उत्साही और जनपक्षधर युवा पत्रकार के असामयिक निधन की सूचना से आज मन बहुत खिन्न और उदास है…..

उनके गृह जनपद बस्ती के वीरेंद्र कुमार दहिया का उद्गार है,’कुछ लोगों का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, उनके साथ साथ मिशन, नेकी, अच्छाई, न्याय की लड़ाई के साथ साथ और भी बहुत सी चीजों का जाना होता है….  एक्टिविस्ट पत्रकार सोबरन कबीर ने बहुत भावुक होकर लिखा है,’ भैया।।।। आप भी हम लोगों को छोड़कर चले गए।।।।। निशब्द हूं। कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हूं।’

जिस ‘दलित दस्तक’ के जरिये वह बहुजनवादी पत्रकारिता से जुड़े, उसके संपादक अशोक दास ने उन्हें यद्त करते हुए लिखा है,’  साल 2012 में जब “दलित दस्तक” की लॉन्चिंग हो रही थी, एक हमउम्र उत्साही युवा मेरे पास आया। युवक ने अपना परिचय अखिलेश कृष्ण मोहन के रूप में दिया। वो तब दिल्ली के किसी मीडिया संस्थान में काम कर रहे थे….. दिल्ली की मनुवादी मीडिया में जब भाई-भतीजावाद का बोलबाला बढ़ा और बहुजनों का काम करना मुश्किल हो गया तो अखिलेश जी लखनऊ शिफ्ट हो गए। लखनऊ जाने के बाद भी वो लंबे समय तक “दलित दस्तक” के लिए काम करते रहे। संघर्ष के दिनों में जब भी लखनऊ जाना हुआ, ठिकाना उन्ही का घर रहा। वो अपनी बाइक से मुझे हर जगह ले जाते। बाद में उन्होंने “फर्क इंडिया” के नाम से मैगज़ीन निकालनी शुरू की, फिर यूट्यूब भी चलाया। निरंतर सामाजिक न्याय की आवाज़ उठाते रहे। अखिलेश जी OBC (यादव) समाज के उन पत्रकारों में से रहे, जिन्होंने दलितों और पिछड़ों की एकता पर हमेशा विश्वास किया… मुझे “संपादक जी” कहने वाला शख्स आज हमेशा के लिए चला गया…. कल्पना में भी नहीं सोचा था कि कभी आपके बारे में ऐसे लिखना पड़ेगा। ये आपके साथ अच्छा नहीं हुआ। नमन।’

अशोक दास का पूरा संस्मरण यहां पढ़ सकते हैं- सामाजिक न्याय की पत्रकारिता करने वाला संघर्ष का साथी चला गया

अखिलेश कृष्ण मोहन जहाँ हास्पिटल में रहकर कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, वहीं हास्पिटल से बाहर उनकी ओर से लड़ाई कर रहे थे जुझारू पत्रकार नीरज भाई पटेल। अखिलेश के संघर्ष की विस्तृत जानकारी पटेल के जरिये ही मिली है। उनके पोस्ट को पढ़कर भावुक हुए बिना रहा नहीं जा सकता। उन्होंने लिखा है-‘ एक बार सोचिएगा जरूर इस शख्स के बारे में इतना क्यों लिखा जा रहा है। वजह सिर्फ इतनी है इस इंसान ने संपत्ति नहीं इंसान कमाए हैं। सुबह से सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है।।। अब ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं।।। बस ऐसा लग रहा है जैसे बीतों कुछ दिनों से लड़ी जा रही एक लड़ाई आज सुबह 5 बजकर 15 मिनट पर मैं हार गया। इतना कहूंगा कि मैंने अपना एक खुशमिजाज दोस्त, साथी, मित्र, सहयोगी, बड़ा भाई हमेशा के लिए खो दिया। सोचिए बस्ती जिले के छोटे से गांव परसांव से निकलकर लखनऊ में बिना प्रपंच जाने हुए घाघों के बीच सीमित संसाधनों में स्थापित होकर न सिर्फ जिंदगी भर दबे-कुचले, शोषित तबके की बात करना बल्कि पत्नी, दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाकर आत्म सम्मान-स्वाभिमान के साथ जिंदगी जीना व ईमानदारी व बेबाकी से पत्रकारिता करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा। सोचा न था कि अखिलेश कृष्ण मोहन भाई ऐसे चले जाएंगे कि दिन में कई-कई बार फोन पर नीरज भाई नमस्ते अब कभी सुन ही नहीं पाउंगा….

इसमें कोई दो राय नही कि मिशन जनमत पत्रिका को शुरूआत कराने में अखिलेश भाई का सबसे बड़ा योगदान है। इसलिए संपादक होने के नाते भारी मन से ये घोषणा करता हूं कि अगले माह के अंक से जिंदगी भर अखिलेश कृष्ण मोहन जी का नाम मिशन जनमत पत्रिका की प्रिंट लाइन में संस्थापक सदस्य के बतौर लिखा जाएगा… 30 अप्रैल की रात SGPGI में एडमिट होने के बाद से लगातार डॉक्टरों से बात करना, अच्छे इलाज के लिए तमाम प्रोफेसर्स से निवेदन करना। हाल पता करके भाभी से बात करना समझाना, हिम्मत बंधाना, झूठा दिलासा देना जैसे दिनचर्या में शामिल हो गया था।।।

ऐसा लगने लगा था कि अखिलेश भाई का संघर्ष अब मेरा संघर्ष है वो जीतकर बाहर आएंगे तो उनके साथ भाभी-बच्चों को देखने में ही मेरी जीत है। अहसास तो 3-4 दिन से होने लगा था कि किसी भी दिन बुरी खबर आ सकती है लेकिन फिर भी झूठी उम्मीद का दिलासा देने के लिए भाभी और उनके छोटे भाई से माफी भी चाहता हूं। 2 मई तक अखिलेश भाई को BI-PAP पर रखा गया। 4-5 मई की देर रात को किसी तरह कोशिश के बाद ICU में शिफ्ट कर दिए गए। इसके बाद उनको वेंटिलेटर पर भेज दिया गया। धीरे-धीरे मल्टीआर्गन फेल्योर, सेप्टिक शॉक, सेपसिस की खबर सुनने को मिल रही थी। भाभी को क्या समझाता बस कह देता था स्थिति अच्छी नहीं है बस उम्मीद बनाए रखिए। दो दिन बाद ही स्थिति ये थी कि उनको कंपलीट वेंटिलेटर सपोर्ट देने के अलावा डायलिसिस भी करना पड़ा लंग्स 70 प्रतिशत तक इंफेक्टिड हो चुके थे लेकिन मन मानने को कतई तैयार नहीं था। डॉक्टर्स अपनी पूरी कोशिश में लगे थे।।। हालांकि 2-3 दिनों से वहां से भी अच्छी खबरें मिलना बंद हो गई थीं।

आखिरकार 13 मई को सुबह संघर्ष विराम की खबर आ गई।।। ईश्वर नाम के अदृश्य जीव से न पहले प्रार्थना की थी न अब करूंगा।।।।मेडिकल साइंस, अच्छे डॉक्टर्स, अच्छे मेडिकल संस्थान पर पहले भी भरोसा था आज भी है। हां इस पोस्ट को पढ़ने वाले मानवों से जरूर अपील करूंगा कि अखिलेश भाई के कामों को लेकर अगर वाकई चिंतित हो तो आगे उनके परिवार व बच्चों के लिए बुरे वक्त में काम आ जाना यही उस नेक दिल के इंसान के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

उनकी पत्नी रीता कृष्ण मोहन का अकाउंट नंबर-

AC Name- Rita Krishna Mohan AC No- 55148830004 State Bank of India IFSC- SBIN0050826 BRANCH- ALIGANJ, LUCKNOW

इस बुरे वक्त में जो भी साथ खड़ा रहा सभी साथियों व भाईयों का शुक्रिया।।। आप बहुत याद आओगे अखिलेश भाई।।।’

नीरज भाई पटेल ने अखिलेश के परिवार के मदद की जो अपील की है, उसमें उनके चाहने वाले तमाम लोगों की भावना का प्रतिबिम्बन हुआ है। उनके परिवार को मदद मिले, यही उनके चाहने वालों की अंतिम इच्छा है, जिसे सही तरीके से शब्द दिया है चौधरी संदीप यादव ने। उन्होंने मुख्यमंत्री को अपील करते हुए लिखा है- ‘सीनियर पत्रकार जिंदादिल इंसान अखिलेश कृष्ण मोहन आज कोरोना से जंग हार गए! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मेरी माँग है पीड़ित परिवार को 5 करोड़ की आर्थिक सहायता दी जाएं!’ यह भारी संतोष का विषय है कि अखिलेश कृष्ण मोहन के हजारों कद्रदानों की भांति प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है।

कोरोना संकट के बीच पीएम मोदी का बेतुका बयान

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी काफी दिनों तक गायब रहने के बाद देश की जनता के सामने आए। जब किसान आंदोलन लगातार जारी है और किसान कृषि बिल को वापस लेने की मांग पर अड़े हुए हैं, उन्हें लुभाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने आज किसान सम्मान निधी की आठवीं किस्त जारी की। कार्यक्रम ऑनलाइन था। अब चूकि पीएम मोदी सामने आए थे, तो निश्चित तौर पर उन्हें कोरोना को लेकर कुछ न कुछ बोलना ही था। क्योंकि अगर वह नहीं बोलते तो सवाल उठता ही। ऐसे में भाषणवीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण के दौरान कोरोना को लेकर तमाम बातें कही, जिसमें तीन बातें उल्लेख करना जरूरी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, बीते कुछ समय से जो कष्ट देशवासियों ने सहा, मैं भी उतना ही महसूस कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग दवाओं और जरूरी वस्तुओ की कालाबजारी में लगे हैं, इन पर कठोर कार्रवाई की जाए। पीएम ने यह भी कहा कि भारत और कोई भी भारतवासी हिम्मत नहीं हारेगा, हम लड़ेंगे और जीतेंगे।
भाषणवीर प्रधानमंत्री के इस बयान के आने से ज्यादा बेहतर होता कि वो जैसे अब तक कोरोना के कोहराम के बीच चुप्पी साधे रहे, आज भी अपना मुंह बंद ही रखते, क्योंकि उन्होंने जो कहा, उसने देश के लोगों को और ज्यादा ही निराश किया और उनकी गिरती साख पर एक बट्टा और लगा दिया। साथ ही उनके लोगों और भांड मीडिया द्वारा प्रचारित 56 इंच के सीने को एक बार फिर से छलावा साबित कर दिया।

पीएम मोदी ने कहा कि वो देशवासियों के कष्ट को महसूस कर रहे हैं। सवाल उठता है कि देश की जनता ने मोदी के नाम पर इसलिए वोट नहीं दिया था कि वो उनकी परेशानी महसूस करेंगे, बल्कि निश्चित तौर पर इसलिए दिया था कि वो देश के लोगों की तकलीफों को दूर करेंगे। कालाबजारी पर प्रधानमंत्री मोदी का बयान गोल मोल रहा। जिस गुजरात और मध्यप्रदेश में नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने की घटना हुई है, उन दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है, जो कहीं न कहीं पीएम मोदी के इशारे पर ही चलती है। केंद्र में भी ‘मोदी राज’ है। ऐसे में उन पर शिकंजा कौन कसेगा??

 जब से कोरोना की दूसरी लहर आई है, देश की सरकार सुन्न सी पर गई है। बल्कि कहीं न कहीं इस दूसरी लहर को बढ़ाने में योगदान ही दिया है। तमाम राज्यों के चुनाव और यूपी के पंचायत चुनाव ने तमाम राज्यों की हालत खराब कर दी है। हाल ही में प्रतिष्ठित आउटलुक मैग्जीन ने अपने कवर पेज पर Missing (लापता) लिखा है, उसने भारत सरकार को मिसिंग बताया है। वर्तमान में देश ऐसे ही हालात में है। ऐसे वक्त में जब देश की जनता को उसकी सरकार की सबसे ज्यादा जरूरत थी, सरकार खामोश खड़ी तमाशा देख रही है। देश किसके भरोसे चल रहा है, किसी को नहीं पता।

दलितों का अपमान करने वाली टीवी अभिनेत्री पर एफआईआर दर्ज

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दलितों का अपमान करने वाली टीवी अभिनेत्री पर एफआईआर दर्ज टेलीविजन जगत की एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री द्वारा भारत के करोड़ों दलितों का अपमान किए जाने की घटना के बाद एक बड़ी खबर आ रही है। पिछले दो दिनों में इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया सहित सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर यह मुद्दा चर्चा में बना हुआ था। आज खबर आ रही है कि दलितों का सार्वजनिक रूप से अपमान करने वाली एवं जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल करने वाली टीवी कलाकार मुनमुन दत्ता पर एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया गया है। मुनमुन दत्ता ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ टीवी सिरियल में बबीता का किरदार निभाती है।
वायरल वीडियो में अभिनेत्री ने वाल्मीकि समाज के एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे वह समाज अपमानजनक मानता है। इसके बाद हालांकि अभिनेत्री ने माफी भी मांगी, लेकिन अभिनेत्री के खिलाफ हरियाणा के हांसी में एफ आई आर दर्ज की गई थी। हांसी की पुलिस सुपरीटेंडेंट निकिता गहलोत ने जानकारी दी है कि इस अभिनेत्री के खिलाफ सिटी पुलिस स्टेशन में एससी एसटी एक्ट की धारा 3(1), U के अंतर्गत 11 मई मंगलवार को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

सामाजिक न्याय की पत्रकारिता करने वाला संघर्ष का साथी चला गया

साल 2012 में जब “दलित दस्तक” की लॉन्चिंग हो रही थी, एक हमउम्र उत्साही युवा मेरे पास आया। युवक ने अपना परिचय अखिलेश कृष्ण मोहन के रूप में दिया। वो तब दिल्ली के किसी मीडिया संस्थान में काम कर रहे थे। हम दोनों दिल्ली के पांडव नगर (मदर डेयरी) मुहल्ले में रहते थे। हमारा मिलना-जुलना चलता रहा। बाद के दिनों में अखिलेश जी “दलित दस्तक” पत्रिका से भी जुड़े। दिल्ली की मनुवादी मीडिया में जब भाई-भतीजावाद का बोलबाला बढ़ा और बहुजनों का काम करना मुश्किल हो गया तो अखिलेश जी लखनऊ शिफ्ट हो गए। लखनऊ जाने के बाद भी वो लंबे समय तक “दलित दस्तक” के लिए काम करते रहे। संघर्ष के दिनों में जब भी लखनऊ जाना हुआ, ठिकाना उन्ही का घर रहा। वो अपनी बाइक से मुझे हर जगह ले जाते। बाद में उन्होंने “फर्क इंडिया” के नाम से मैगज़ीन निकालनी शुरू की, फिर यूट्यूब भी चलाया। निरंतर सामाजिक न्याय की आवाज़ उठाते रहे। अखिलेश जी OBC (यादव) समाज के उन पत्रकारों में से रहे, जिन्होंने दलितों और पिछड़ों की एकता पर हमेशा विश्वास किया।
पिछले दिनों जब उन्नाव की घटना हुई तो लखनऊ जाना हुआ। उनसे मिलना तय था, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। कोरोना से संघर्ष के दिनों में जब वो अस्पताल में भर्ती थे, मैंने उनको फोन लगाया। उनका फोन नहीं उठा। फिर उन्होंने मुझे फोन लगाया, तो मैं फोन से दूर था। इस तरह फिर बात नहीं हो पाई। हां, मैंने व्हाट्सएप्प पर मैसेज किया तो उनका जवाब आया कि “अब ठीक हो रहा हूँ सर”। थोड़ी तसल्ली हुई। लेकिन फिर नेशनल जनमत के संपादक और छोटे भाई नीरज पटेल से बात हुई तो उन्होंने स्थिति चिंताजनक बताई। अखिलेश जी के घर कई बार रुका हूँ, तो उनके परिवार से भी संपर्क में रहा। पिछले कुछ दिनों से उनकी पत्नी के संपर्क में था। मन परेशान था, अखिलेश जी की चिंता थी, तो हर रोज एक बार बात कर लेता था। परसो आखिरी बार उनसे हाल-चाल लिया। वो बेतहासा रो रहीं थी, मैंने कोई जरूरत पूछा तो बोलीं.. “भईया, बस उनको ले आइये आपलोग”। मन रो दिया, मैंने फोन रख दिया। कल डर के मारे फोन नहीं किया कि क्या कहूंगा। अखिलेश जी इकलौते ऐसे शख्स रहे जो पहले दिन से लेकर आखिरी वक्त तक मुझे “संपादक जी” कह कर संबोधित करते रहे। उनकी पत्नी ने बताया की उनके फोन में भी मेरा नम्बर इसी नाम से सेव था।
मुझे “संपादक जी” कहने वाला शख्स आज हमेशा के लिए चला गया। कोरोना ने इस उम्र के कई साथियों को लील लिया है। हर खबर परेशान कर रही है।
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अखिलेश जी के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मैंने उनको बड़ा होते हुए देखा है। क्या कहूँ… उनके ऊपर बहुत जिम्मेदारी थी। अखिलेश जी से जुड़े सभी लोगों को इस मुश्किल वक़्त में उनके परिवार के साथ खड़ा होना होगा। उनके परिवार की ओर मदद का हाथ बढ़ाना होगा। उनके नहीं रहने के बाद उनके परिवार-बच्चों को संभालना होगा। यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। व्यक्ति के नहीं रहने पर आर्थिक सहायता उसके परिवार की सबसे बड़ी मदद होती है। मेरी अपील है कि आप अखिलेश कृष्ण मोहन जी के परिवार की आर्थिक मदद जरूर करें। उनकी पत्नी रीता कृष्ण मोहन का अकाउंट नंबर दे रहा हूं-
AC Name- Rita Krishna Mohan AC No- 55148830004 State Bank of India IFSC- SBIN0050826 BRANCH- ALIGANJ, LUCKNOW
अलविदा भाई।
कल्पना में भी नहीं सोचा था कि कभी आपके बारे में ऐसे लिखना पड़ेगा। ये आपके साथ अच्छा नहीं हुआ। नमन Akhilesh Krishna Mohan जी।