
आरएसएस,भाजपा और नरेंद्र मोदी के इतना आश्वस्त होने का स्रोत क्या है?

चिकित्सा विज्ञान की जानी-मानी हस्ती प्रो. राजकुमार के जबरन रिटायरमेंट पर उठते सवाल
भारत में करीब 542 मेडिकल कॉलेज हैं जिसमें 64 पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट है जिसमें कि पीजीआई लखनऊ के प्रख्यात न्यूरो सर्जन, साउथ एशिया के सबसे क्वालिफाइड न्यूरोसर्जन, ट्रामा सेंटर SGPGI लखनऊ के संस्थापक, AIIMS ऋषिकेश, उत्तराखंड के फाउंडिंग डायरेक्टर, करीब 54 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त, डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेकनोलॉजी, भारत सरकार द्वारा विज्ञान गौरव एवं विज्ञान रत्न से सम्मानित, नेशनल एकेडमी ऑफ़ मेडिकल साइंसेज द्वारा सम्मानित, लगभग दस हज़ार जटिल मस्तिष्क सर्जरी करने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी, चिकित्सा विज्ञान के अम्बेडकर कहे जाने वाले, वर्तमान में सैफई आयुर्विज्ञान मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलपति, प्रोफेसर राजकुमार जिनके कार्यकाल में सैफई आयुर्विज्ञान मेडिकल यूनिवर्सिटी ने नए आयाम स्थापित किए।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रोफ़ेसर राजकुमार, जिनके नाम 500 से अधिक शोध पत्र है जिसमें 34 विशेषतया कोविड पर प्रकाशित हैं, उनको उनके मेडिकल साइंस में अभूतपूर्व योगदान के लिए यूपी रत्न से सम्मानित किया है। पूरे कोविड-19 महामारी के दौर में कोरोना की पहली कामयाब पुस्तक कोविडोलॉजी व कोविड निवारक दवा RNB (राज निर्वाण बटी) देकर प्रो० राजकुमार ने पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन किया। आज जहां लगभग हर मेडिकल संस्थान में ऑक्सीजन की कमी हो रही है, वही रात-रात भर जागकर अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए प्रो० राजकुमार ने ऑक्सीजन की सप्लाई को निरबाधित रखा। सैफई मेडिकल विश्वविद्यालय में अपना कार्यभार संभालते हुए अपने तेज-तर्रार तेवर के लिए जाने जाने वाले प्रो. राजकुमार ने विश्वविद्यालय में सभी प्रकार की अनियमितताओं को दुरुस्त करके, इटावा जैसे गुंडागर्दी व बदमाशी के लिए मशहूर जनपद में स्थापित आयुर्विज्ञान संस्थान में पारदर्शी व्यवस्था को लागू किया, जो कि वहां के स्थानीय माफियाओं को रास नहीं आया। आरोप है कि वे विभिन्न माध्यमों से कुलपति, प्रो. राजकुमार के ऊपर तमाम तरह के रजनैतिक दबाव व अनर्गल आरोप लगाते रहे, किंतु अपनी साफ-सुथरी व कड़क कार्यशैली के आगे प्रो० राजकुमार ने सब कुछ फीका कर दिया।
कोविड-19 की दूसरी लहर में सुचारू रूप से चिकित्सा सेवा दुरुस्त करवाए रखना शायद कुछ माफिया प्रवृत्तियों को रास नहीं आ रहा है और वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रो. राजकुमार का आंकलन उनकी जाति को उनकी योग्यता से ऊपर रखकर करते है, हद तो तब हो गई जब कल उन्हें जबरिया अवकाश पर भेज दिया गया।
भारत जैसे देश में जहां प्रत्येक वर्ष जातिगत दुर्भावना का शिकार होकर रोहित वेमुला जैसे हजारों बच्चों की संस्थानिक हत्या कर दी जाती है ऐसे में प्रोफेसर राजकुमार जिनकी योग्यता का डंका विदेशों में भी बजता है उनको अपने ही देश में जातिगत दुर्भावना का शिकार होना पड़ रहा हैं । जबकि प्रो० राजकुमार न केवल शोषित वर्ग बल्कि सर्वसमाज द्वारा निष्ठा एवं योग्यता के लिए जाने जाते है।
ऐसे में शासन-प्रशासन व समस्त अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक एवं सर्वसमाज से अपील है कि राष्ट्र एवं चिकित्सा हित में प्रो. राजकुमार जैसे योग्य सर्जन के साथ खड़े हों और अपने स्तर से सरकार से अपील करें कि जिन लोगों के दबाव में ऐसी दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की गई है उनके उनके खिलाफ उचित कार्यवाही करने का कष्ट कर, प्रो. राजकुमार का जबरिया अवकाश का आदेश निरस्त करें। जिससे कि कोविड महामारी के दौर में चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत चिकत्सक व अन्य कर्मचारियों का मनोबल बना रहे व वे निडर एवं ईमानदारी के साथ अपनी सेवाएं दे सकें।
यह रिपोर्ट जानी-मानी समाजसेवी और बीएचयू में अंग्रेजी विभाग में असि. प्रोफेसर डॉ. इंदू चौधरी द्वारा लिखा गया है।
बहुजन बुद्धिजीवी हनी बाबू की जिंदगी खतरे में, परिवार ने लगाया बड़ा आरोप
प्रोफेसर हैनी बाबू भीमा कोरोगांव मामले में एक विचाराधीन कैदी हैं। जुलाई 2020 से ही बिना ट्रायल वह तजोला जेल में बंधक हैं, जहां उनकी आंखों में एक संक्रमण हुआ। उनकी बांयी आंख की रोशनी लगभग नहीं ही बची है। माथे से लेकर कान और नीचे ठुड्डी तक सूजन फैली हुई है। उनके अन्य अंग भी प्रभावित हैं। संक्रमण के कारण शरीर में मस्तिष्क तक जहर फैलने का खतरा है, इससे उनकी जान तक जा सकती है। असहनीय पीड़ा के कारण न ही वो नींद ले पा रहे हैं और न ही अपनी दिनचर्या के काम कर पाने में समर्थ हैं। जेल में जबरदस्त पानी की किल्लत के कारण उन्हें साफ पानी तक नहीं मिल रहा ताकि वह अपनी संक्रमित आंखों पर पानी की कुछ बूंदे तक छिड़क पाएं। उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वह अपनी संक्रमित आंखों को सख्त तौलिए से साफ करें।
हैनी बाबू 3 मई, 2021 से बायीं आंख में पीड़ा और सूजन महसूस कर रहे, जल्द ही उनके संक्रमण ने न सिर्फ पीड़ा बढ़ाई बल्कि इसके कारण उन्हें कोई भी चीज दोहरी और धुंधली नजर आने लगी। जेल के स्वास्थ्य अधिकारी ने भी यह सूचित किया कि हैनी बाबू के आंखों के संक्रमण के इलाज के लिए यहां पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, इन्हें तत्काल किसी विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श और उपचार चाहिए होगा। लेकिन उन्हें अभी तक परामर्श के लिए नहीं ले जाया जा सका है क्योंकि एस्कॉर्ट अधिकारी वहां उपलब्ध नहीं थे। 6 मई, 2021 को उनके वकील ने मजबूर होकर तजोला जेल के अधीक्षक को एक ई-मेल लिखा, जिसके बाद 7 मई को उन्हें वाशी के सरकारी अस्पताल में ले जाया गया।
वाशी सरकारी अस्पताल में हैनी बाबू का परीक्षण एक नेत्र विशेषज्ञ ने किया और उन्होंने परामर्श में कहा कि इन्हें जीवाणुरोधी (एंटी-बैक्टीरियल) दवाएं दी जाएं और दो दिन के बाद दोबारा चिकित्सकीय परामर्श के लिए लाया जाए। उनकी स्थिति लगातार बिगड़ रही है और इसके बावजूद दो दिन बाद उन्हें अस्पताल नहीं ले जाया गया है। उन्होंने सूचित किया है कि इस बार भी वजह यही है कि जेल में एस्कॉर्ट अधिकारी नहीं है।
10 मई को हैनी बाबू के वकील श्री पायोशी राय ने जेल अधीक्षक से बात करने के लिए करीब 8 बार फोन किया, लेकिन अधीक्षक ने फोनलाइन पर आने से मना कर दिया। रात करीब 8:30 बजे जेलर ने सूचित किया कि श्रीमान राय वह हैनी बाबू की स्थिति से अवगत हैं और अगले रोज उन्हें अस्पताल ले जाने का इंतजाम कर रहे हैं। वकील पायोशी राय ने एक ई-मेल भी अधीक्षक को किया और प्रार्थना में कहा कि हैनी बाबू को अस्पताल ले जाने में किसी तरह की कोताही न की जाए। ई-मेल में उनके सेहत की गंभीरता पर भी जोर दिया गया और बताया गया था कि ऐसे संक्रमण में यदि एक दिन की भी देरी की गई तो उनके आंखों की न सिर्फ रोशनी जा सकती है बल्कि यदि संक्रमण का जहर उनके दिमाग तक पहुंचा तो उनकी जान भी जा सकती है। हालांकि, उन्हें 11 मई को भी अस्पताल नहीं ले जाया गया।
बीते कुछ दिन बहुत ही कष्टकारी और चिंताजनक रहे हैं यह सोचकर कि हैनी बाबू को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए भीख मांगनी पड़ रही है। यह हृदय को चीरकर रख देना वाला है। यहां तक कि आज भी वकील पायोशी राय के जरिए कई बार जेल में फोन करने के बाद भी हमें किसी तरह का जवाब नहीं मिला है। हमें यह भय है कि यह मलिन व्यवस्था ऐसे कई जेलों में होगी और वहां भी लोगों को इस तरह का अपूर्णीय नुकसान उठाना पड़ रहा होगा। ऐसे में हम मांग करते हैं कि इस तरह के गंभीर मामलों में तत्काल और उचित चिकित्सकीय देखभाल पूरी पारदर्शिता के साथ लोगों को मिलनी चाहिए। आखिरकार हम सिर्फ भारतीय संविधान के तहत निहित गारंटीशुदा प्रदत्त अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
जेनी रोवेना (पत्नी), हरीश एमटी एंड एमटी अंसारी (भाई) का 11 मई, 2021 को जारी बयान
(यह पूरी आशंका है कि ये मामला ब्लैक फंगस का है। प्रोफेसर बाबू की मृत्यु किसी भी वक्त हो सकती है यदि जेल वाले तत्काल नहीं जगे)
अंग्रेजी में जारी बयान का विवेक मिश्रा द्वारा हिन्दी में अनुवाद
गॉड इज नॉट ग्रेट!
21वीं सदी में दुनिया में जो पांच-दस सबसे महान नास्तिक विचारक पैदा हुए हैं, उनमें से रिचर्ड डॉकिंस के बाद सबसे बड़ा नाम आता है, किस्तोंपर हीचेन का। उन्होंने 2007 में “गॉड इज नॉट ग्रेट” नाम की किताब लिखी और उस किताब में उन्होंने सैकड़ों सबूत दे कर यह साबित करने की कोशिश की कि पिछले 5000 साल में मानव जाति पर जितने भी महाविनाशकारी संकट आए उस दौरान दुनिया के किसी भी ईश्वर, अल्लाह या गॉड ने मानव जाति की कोई मदद नहीं की। मानव जाति में जो मुश्किल से 5% बुद्धिमान लोग हैं उन्होंने मानव जाति को हर संकट के समय कोई न कोई रास्ता ढूंढ कर बाहर निकाला लेकिन धर्म के नाम पर जो लोग अपना पेट पालते हैं और अपने आप को धर्म का ठेकेदार और ईश्वर का प्रतिनिधि समझते हैं उन लोगों ने मानव जाति के जो 95% लोग है और जो जन्मजात बुद्धिहीन है और जो किसी न किसी काल्पनिक सहारे के बगैर जी ही नहीं सकते, ऐसे लोगों को बार-बार अपने धर्म के जाल में जकड़ के रखा और कोई मदद नहीं की। दुर्भाग्य से आज ‘किस्तोंपर हिचेन’ हमारे बीच नहीं है, लेकिन कोरोना वायरस ने फिर एक बार किस्तोंपर हीचैन को सही साबित किया है और यह भी साबित किया है कि कोरोना वायरस प्रकृति ने पैदा किया है, ईश्वर, गॉड और अल्लाह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। सिर्फ विज्ञान ही उसको कंट्रोल करेगा।
सभी धर्मों के ठेकेदारों का यह सनातन दावा है कि, ईश्वर इस ब्रह्मांड का निर्माता है और वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और हर जगह पर मौजूद है और उसके मर्जी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिलता है। दुनिया का सबसे बड़ा धर्म ईसाई धर्म है और पूरी दुनिया के क्रिश्चन लोगों का सबसे बड़ा गुरु इटली के रोम शहर में रहता है, जिसे वेटिकन सिटी कहा जाता है। आजकल कोरोना के डर से इटली के सभी चर्च और वेटिकन सिटी लॉक डाउन हैं और उनके सबसे बड़े धर्म गुरु यानी पोप नजर नहीं आ रहे हैं। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म इस्लाम है और दुनिया भर में फैले मुसलमानों की सबसे पवित्र भूमि और पवित्र धर्मस्थल मक्का मदीना है, वह भी आज पूरी तरह से बंद है और दुनिया के तीसरे नंबर का धर्म यानी हिंदू धर्म और उसके सभी प्रसिद्ध धर्मस्थल जैसे कि चारों धाम, बालाजी मंदिर, शिर्डी के साईं बाबा का मंदिर, जम्मू के वैष्णो देवी का मंदिर और बहुत सारे छोटे-मोटे मंदिर 6-7 महीने तक लॉक डाउन रहे हैं।
दुनिया के किसी भी धर्म में और किसी भी भगवान में इतनी ताकत नहीं है की वह कोरोना नाम के एक मामूली कीटाणु को रोक सके। धर्म के ठेकेदारों ने बुद्धिहीन लोगों के अज्ञान और डर का फायदा उठाकर उनका शोषण करने के लिए दुनिया भर में बड़े-बड़े धर्मस्थल बना के रखे हैं और हजारों सालों से भोली-भाली जनता के अज्ञान और डर का नाजायज फायदा उठा रहे हैं, उनका शोषण कर रहे हैं।
जब हजारों लोग मुंबई से शिरडी तक बिना चप्पल पहने हुए पैदल जाते हैं और साईं बाबा को अच्छी बीवी, अच्छी नौकरी, अच्छी संतान और धंधे में मुनाफा मांगते हैं और समझते हैं कि साईं बाबा उनको यह सब कुछ दे देगा। यदि साईं बाबा या बालाजी या वैष्णो देवी या अजमेर शरीफ या फिर मक्का मदीना और वेटिकन सिटी अपने भक्तों की ऐसी छोटी मोटी मांगे और मुरादे पूरी करते हैं और मानव जाति का हमेशा हित और सुख देखते हैं, तो फिर आज जब मानव जाति पर इतना बड़ा संकट है, वो सामने क्यों नहीं आ रहे हैं।
विज्ञान कहता है 14 बिलियन साल पहले बिग बैंग के माध्यम से इस विश्व की निर्मिती हुई और लगभग 5 बिलियन ईयर पहले पृथ्वी की निर्मिति हुई। इस पृथ्वी पर आज तक विज्ञान ने लगभग 8 मिलियन प्रजातियां आईडेंटिफाई की हैं और मानव जाति होमोसेपियन 18 मिलियन प्रजातियों में से एक प्रजाति है और इस विश्व के अनगिनत साल के इतिहास में मानव जाति का कोई अता पता नहीं था, मानव जाति मुश्किल से पिछले चार मिलियन साल से इस पृथ्वी पर आई है। आज तक कई प्रजातियां पृथ्वी पर आई, कुछ साल तक रही और जलवायु बदलते ही नष्ट हो गई। मानव जाति भी इस पृथ्वी पर हमेशा रहेगी इसका कोई भरोसा नहीं है। जिस तरह डायनासोर और न जाने कितनी प्रजातियां आई और गई और इंसान भी इनमें से एक मामूली प्रजाति है।
इस विश्व को चलाने वाली एक शक्ति है इसे विज्ञान, नेचर या प्रकृति के नाम से जाना जाता है और विज्ञान यह भी मानता है कि प्रकृति निश्चित नियमों के अनुसार इसको चलाती है। यदि इस प्रकृति पर काबू पाना है तो हमारे हाथ में सिर्फ एक ही रास्ता है और वह है इस प्रकृति के रहस्य के नियमों को अनुसंधान, संशोधन और प्रयोग के द्वारा जान लेना। आज तक विज्ञान ने प्रकृति के बहुत सारे नियमों को खोज लिया है और विज्ञान की खोज निरंतर जारी है। दुनिया के सारे धर्म हमको सिर्फ प्रकृति की पूजा करने की शिक्षा देते हैं और यह कहते हैं की पूजा करने से प्रकृति प्रसन्न होगी और हमारी मांगे और मुरादे पूरी करेगी। दुनिया के सारे धर्मों की यह मूलभूत शिक्षा ही सरासर झूठ है। विज्ञान ने इस बात को साबित किया है कि पूजा पाठ करने से प्रकृति अपने नियम कभी नहीं बदलती। यदि प्रकृति पर काबू पाना है तो उसका एकमात्र रास्ता है प्रकृति के नियमों को जानना।
आज तक दुनिया में मानव जाति के सामने जितनी भी समस्याएं आई जैसे कि प्राकृतिक आपदाएं, और सभी प्रकार की संसर्गजन्य बीमारियां। किसी भी धर्म ने या धर्म गुरु ने या ईश्वर ने इनमें से एक भी बीमारी का कोई इलाज मानव जाति को नहीं दिया बल्कि सिर्फ विज्ञान ने दिया। मलेरिया, इनफ्लुएंजा, कॉलरा, स्मॉल पॉक्स और कितनी बीमारी पर साइंस ने दवाइयां खोजी है और इन महामारीयों को हमेशा के लिए दुनिया से मिटा दिया है। कोरोना के ऊपर भी बहुत जल्द साइंस इलाज ढूंढ निकालेगा। आज तक मानव जाति के ऊपर जब भी कोई बड़ा संकट आया है तो सारे मानव अपने अपने तीर्थ स्थल पर जाकर भगवान अल्लाह या गॉड के सामने झुक जाते हैं, लेकिन कोरोनावायरस ने तो यह रास्ता भी बंद कर दिया है। अभी सिर्फ हमारे सामने एक ही रास्ता है और वह है विज्ञान का। इसलिए कोरोना वायरस से कुछ सीख लो ! विज्ञान वादी बनो!
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शुरुआती लापरवाही से ग्रामीणों पर कोरोना पड़ा भारी
रिपोर्ट- रूबी सरकार, भोपाल, मप्र। मध्य प्रदेश के गांवों में सन्नाटा पसरा है। ग्रामीण सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार से ग्रसित हैं। अस्पताल न जाने, जांच न कराने और वैक्सीन न लेने की जिद, इन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा है। जो अपनों को खो रहे हैं, उनकी आंखें नम है, लेकिन वह कोरोना संक्रमण से मौत पर बात करने को तैयार नहीं है। अधिकतर मृत्यु जांच न होने के कारण सामान्य माना जा रहा है। लेकिन गांव में मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अकेले पन्ना जिले के पवई विकासखंड के 18 गांवों में पिछले एक हफ्ते में 17 लोगों की मौत हुई है। इसी तरह शहडोल जिले के ब्यौहारी विकासखंड में 87, बैतूल जिले के एक ही गांव बोरगांव में 21, यहां तक प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में आने वाला टिकोदा गांव में 20 दिनों में 10 लोगों की बुखार के बाद मौत हो गई और इतने ही लोग हालत बिगड़ने के बाद इलाज के लिए दूसरे शहर गए हैं, जबकि टिकोदा की कुल आबादी ही 350 हैं, जिनमें से तकरीबन आधे लोग बुखार और खांसी से पीड़ित हैं।
लोग बुखार से दम तोड़ रहे हैं। फिर भी समय रहते जांच करवाने को तैयार नहीं है। कुछ दबी जुबान कहते है, कि कुछ लोगों को वैक्सीन लगवाने के बाद बुखार आया, जो बहुत दिनों तक ठीक नहीं हुआ और कई लोगों की तो जान चली गई। उनके भीतर डर इस कदर समा गया, कि कहते हैं, जांच कराने जाएंगे, तो कोविड के लक्षण बताकर अस्पताल में अलग-थलग भर्ती कर देंगे, फिर वहां से हम घर वापस नहीं आएंगे। छिंदवाड़ा में तो स्वास्थ्य विभाग की टीम सहजपुरी गांव पहुंची तो ग्रामीणों ने हंगामा खड़ा कर दिया, टीम को उल्टे पांव वापस भागना पड़ा। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने वैक्सीन के बाद किसी की भी मौत को नकारा है, लेकिन यह भी सच है, कि सरकारी आंकड़ों में गांव में कोरोना या बुखार से मौतों के सही आंकड़े सामने नहीं आ रहे है। इस तरह कोविड से मौत का सही आंकड़ा कभी हमारे सामने नहीं आ पायेगा। इसलिए आज वैक्सीन से मौत के डर को खत्म करना सरकार और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
बैतूल जिले की रहने वाली रेखा गुजरे भीमपुर विकासखंड के 155 गांवों में काम करती है। वह बताती है कि ग्रामीण कोविड संक्रमण की जांच के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। दूसरी तरफ लोग इतने डरे हुए हैं कि कहते हैं ‘वैक्सीन लेने से वे मर जाएंगे। टीका लगने के बाद उन्हें बुखार और चक्कर आयेगा। फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया जाएगा, जहां उसकी मृत्यु निश्चित है।’ वह घर में ही बीमारी का इलाज कर रहे हैं। कुछ तो पूजा-पाठ कर बीमारी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों के अंदर यह जो भ्रम है, यह बहुत खतरनाक हैं। इसे किसी भी सूरत में तोड़ना ज़रूरी है। जब मरीजों की स्थिति बहुत गंभीर होने लगती है, तभी मजबूरन उसे अस्पताल लेकर जाते है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
वैक्सीन का उल्लेख करते हुए रेखा गुजरे ने कहा, कि भीमपुर विकासखंड के 155 गांवों में तीन फीसदी से भी कम टीकाकरण हुआ है। रेखा ने कहा, कि ग्रामीणों द्वारा वैक्सीन को नकारे जाने पर पूरा प्रशासन और स्वास्थ्य अमला परेशान है। इनका भ्रम दूर करने और उन्हें जागरूक करने के लिए सरकार को कुछ अलग तरीके सोचनी होगी। वह बताती है, कि उनकी संस्था लगातार ग्रामीणों को जागरूक करने का काम कर रही है। उन्होंने बोरगांव का उल्लेख करते हुए कहा, कि यहां एक हफ्ते में 21 लोगों की बुखार से मृत्यु हुई है। डॉक्टरों के अनुसार मरीजों के अंदर लक्षण कोविड के ही थे, फिर भी इन मौतों को सामान्य माना गया। रेखा ने कहा संस्था अपनी तरफ से ग्रामीणों को ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, स्टीम मशीन आदि दे रही है। उन्हें समझा रही है वह अपना ऑक्सीजन का स्तर बराबर जांचते रहें। ऑक्सीजन का लेवल कम होने पर मरीज को तुरंत अस्पताल लेकर जाये, क्योंकि ऑक्सीजन का कम होना जानलेवा हो सकता है। लेकिन यह काम संस्था के प्रयास से बहुत कम गांव में हो पा रहा है। इसका दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
इसी तरह पन्ना जिले के सामाजिक कार्यकर्ता रामनिवास खरे बताते हैं कि यहां के गांवों में संक्रमण को लेकर ऐसी भ्रम की स्थिति है कि गांव वाले कहते हैं, कि जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमित बताकर हमें कोविड केयर सेंटर भेज देंगे। जहां से हम ठीक होकर घर वापस नहीं आयेंगे। रामनिवास ने अपने बड़े भाई जीतेन्द्र खरे का उल्लेख करते हुए बताया, कि भाई बीमार हुए, तो हम लोग उन्हें पन्ना से छतरपुर ले गये। क्योंकि पन्ना में इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही थी। कोविड की जांच हुई रिपोर्ट आने तक उन्हें जनरल वार्ड में रखा गया। रिपोर्ट में कोविड संक्रमण आने के बाद उन्हें कोविड वार्ड भेजने की तैयारी होने लगी। कोविड का नाम सुनते ही उनकी हृदय गति रूक गई।
दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों के लोग समुदाय के साथ मिलकर रहते हैं। कोविड वार्ड में उन्हें अकेले रहना पड़ेगा, यह सोचकर ही वह डर जाते हैं। उन्होंने पन्ना के चिकित्सा सुविधा का उल्लेख करते हुए कहा, कि पवई विकासखंड के तीन आदिवासी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसे मोहन्द्रा, सिमरिया और हरदुआ खमरिया में पिछले एक साल से डॉक्टर नहीं है। यहां कोई बीमार पड़े तो झोलाछाप डॉक्टर ही इनका इलाज करते हैं। कोरोना संक्रमण की जांच सिर्फ पवई सामुदायिक केंद्र में हो रहा है, जो गांवों से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। ग्रामीण जांच कराने इतनी दूर जाने को भी तैयार नहीं है।
मण्डला की अनीता संगोत्रा के अनुसार इस जिले के गांवों में 22 अप्रैल से महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम घर-घर जाकर ग्रामीणों की जांच कर रही हैं। इन्हें बुखार, खांसी की दवा दी जा रही है। ग्रामीणों को कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए जागरूक किया जा रहा है। अनीता बताती है, कि कोरोना की दूसरी लहर पहले जैसी नहीं है, मास्क और सामाजिक दूरी से इससे बचा जा सके। इसलिए ज्यादा बुखार वाले लोगों को तुरंत कोविड केयर सेंटर में भेजा जा रहा है। मवई विकासखंड के 15 गांव में से अभी तक केवल दो गांव में संक्रमित पाये गये है, जिसमें से चंदा गांव के सरपंच और उनकी पत्नी का कोरोना से निधन हुआ है। इसके अलावा यहां विधायक के छोटे भाई की भी मृत्यु कोरोना से हुई है। फिर भी ज्यादा लोग वैक्सीन को लेकर भ्रमित है। बुखार आने पर खुद जाकर जांच नहीं करवा रहे हैं। इस भ्रम को तोड़ने के लिए पॉजिटिव से नेगेटिव हुए लोगों का अनुभव साझा करना बहुत जरूरी है। हालांकि आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्रों में पल्स ऑक्सीमीटर से ग्रामीणों की जांच हो रही है, लेकिन वैक्सीनेशन के बारे में चर्चा करने पर ग्रामीण मुंह फेर लेते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरपंच की मौत वैक्सीन लगवाने के बाद ही हुई थी।
दरअसल जांच न होने से बीमारी को पहचानने में देरी, इसे स्वीकार करने में देरी, फिर इलाज शुरू करने में देरी, लक्षण होने के बावजूद जांच रिपोर्ट का इंतजार करना, तुरंत इलाज शुरू न करना जैसे कारण गांव में मौतों की संख्या बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इससे पहले कि यह भयावह स्थिति को पहुंचे राज्य सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन को सतर्क होकर काम करने और ज़्यादा से ज़्यादा जागरूकता अभियान चलाने की ज़रूरत है। (चरखा फीचर)
चरखा फीचर के लिए यह रिपोर्ट रुबी सरकार ने भोपाल मध्य प्रदेश से लिखी है। अमेरिका में स्वामिनारायण मंदिर पर छापा
अमेरिका से भारत के हिंदू संप्रदाय के लोगों द्वारा बनाए जा रहे एक मंदिर के बारे में एक बड़ी खबर आ रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि अमेरिका में बन रहे इस सबसे बड़े हिंदू मंदिर में मजदूरों को उचित एवं नियमित मजदूरी दिए बिना उनसे आस्था के आधार पर बेगार करवाई जा रही है। यह मामला न्यूजर्सी का है जहां पर अमेरिका के फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन, डिपार्टमेंट ऑफ होम सिक्योरिटी एवं अमेरिका के लेबर डिपार्टमेंट ने जांच के उद्देश्य से यह छापा मारा है। यह छापा स्वामीनारायण संप्रदाय के ‘बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्थान’ पर मारा गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में काम करने वाले अधिकांश लोग दलित समुदाय के हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित खबर में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस रेड के बाद निर्माण स्थल पर से 90 मजदूरों को अमेरिका की सेंट्रल एजेंसी के द्वारा काम से हटाया गया है। मंगलवार 11 मई को अमेरिका के न्यूजर्सी की ‘नेवार्क कोर्ट’ में इस मंदिर में काम करने वाले 6 मजदूरों ने अपील की और शिकायत की थी कि उनसे बेगार कराई जा रही है। मजदूरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें भारत से अमेरिका इसी मंदिर में काम करने के लिए लाया गया है। यह मंदिर ‘रॉबिंसविले न्यूजर्सी’ में स्थित है। मजदूरों का आरोप है कि उन्हें बहुत कम पगार दी जा रही है। अमेरिका में एक घंटे के लिए काम के लिए जितना पैसा दिया जाता है, उन्हें उसका केवल 10% ही दिया जा रहा है। इसके अलावा उन्हें लंबे घंटो तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। मजदूरों ने यह भी कहा कि उनके पासपोर्ट मंदिर प्रशासन द्वारा जब्त कर लिए गए हैं।
Read this news in englishपप्पू यादव की गिरफ्तारी पर बवाल, सीएम नीतीश पर लगाया बड़ा आरोप
बिहार में कोरोना से निपटने को लेकर नहीं, बल्कि कोरोना को लेकर राजनीति अपने चरम पर है। आलम यह है कि सरकार मर्यादा तक भूल गई है और राजनीतिक द्वेष से कार्रवाई करने पर अमादा है। भाजपा नेता और छपरा से सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी और पप्पू यादव के बीच विवाद के बाद नीतीश सरकार ने जन अधिकार पार्टी के प्रमुख और पूर्व सांसद पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया है। इसके बाद पप्पू यादव और राज्य सरकार के बीच तनातनी बढ़ गई है।
गिरफ्तारी के बाद पप्पू यादव ने ट्विट कर राज्य सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है। अपने ट्विट में पप्पू यादव ने नीतीश सरकार पर कोरोना से मारने का षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है।
नीतीश जी
— Pappu Yadav (@pappuyadavjapl) May 11, 2021
प्रणाम
धैर्य की परीक्षा न लें।अन्यथा जनता अपने हाथों में व्यवस्था लेगी,तो आपका प्रशासन सारा लॉकडाउन प्रोटोकॉल भूल जाएगा
मेरा एक माह पहले ऑपेरशन हुआ है।तब भी अपना जीवन दांव पर लगा जिंदगियां बचा रहे हैं।अभी मेरा टेस्ट हुआ,कोरोना निगेटिव आया।आप पॉजिटिव कर मारना चाहते हैं
पप्पू यादव ने अपने एक अन्य ट्विट किया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि जब बिहार सरकार को कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने की तैयारी करनी चाहिए, तो सरकार पप्पू यादव से लड़ रहे हैं।
पप्पू यादव की गिरफ्तारी को लेकर कई नेताओं ने बिहार सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। राजद नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी पप्पू यादव की गिरफ्तारी का विरोध किया है। यहां तक की नीतीश सरकार में मंत्री और वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने भी पप्पू यादव की गिरफ्तारी को असंवेदनशील बताया।
गौरतलब है कि भाजपा नेता राजीव प्रताप रूढ़ी के निजी परिसर में सरकारी एंबुलेंस खड़े मिले थे, जिसके बाद पप्पू यादव ने मामले को उठाते हुए बड़ा आरोप लगाया था। जिस पर राजीव प्रताप रूढ़ी ने ड्रायवरों की कमी का हवाला दिया था और पप्पू यादव से कहा था कि वो ड्रायवर ले आएं। पप्पू यादव ने ड्रायवरों की परेड करवा दी थी। जिसके बाद राजीव प्रताप रूढ़ी, भाजपा और नीतीश सरकार की जमकर फजीहत हुई थी।लीजिए रूडी जी,ड्राइवर सेना तैयार है। एम्बुलेंस कब और कहां सौंपने वाले हैं, बताएं!
— Pappu Yadav (@pappuyadavjapl) May 8, 2021
बिहार सरकार इन सभी चालक बंधुओं को नियमित नौकरी दे। यह हर परिस्थिति में एम्बुलेंस चलाएंगे। कोविड मरीजों को मुफ्त में सेवा देंगे।
हम सेवा की राजनीति करते हैं,जनहित में ऐसी राजनीति सब करें,स्वागत है। pic.twitter.com/eZVpnRlT7l
यूपी-बिहार में गंगा नदी में लाशों के अंबार से हड़कंप
उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में लाशों के अंबार से हड़कंप मच गया है। पिछले दिनों बिहार के बक्सर में गंगा नदी में तैरती लाशें देखी गई थी, तो वहीं अब उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में नदी में तैरती लाशें दिखने से कोहराम मच गया है। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें तैरती लाशें दिख रही हैं। ये लाशें कहां से आई है, आधिकारिक तौर पर कहने से हर कोई बच रहा है, लेकिन चर्चा है कि कोरोना से हुई मौतों के बाद कई लोग अपने परिजनों की लाशों को बहा दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश से बिहार में प्रवेश करने वाली गंगा नदी में बिहार के बक्सर जिले के चौसा गांव में बड़ी संख्या में लाशें तैरती हुई देखी गई। यह बात सामने आने पर बक्सर के डिस्टिक मजिस्ट्रेट ने सोमवार 10 मई कोएक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान 30 लाशों के गंगा नदी में पाए जाने की बात स्वीकार की थी और इनका विधिवत अंतिम संस्कार करने के इंतजाम किए। इन लाशों का अंतिम संस्कार चौसा गांव के चरित्र-वन और चौसा महादेव घाट पर किया जा रहा है।
कोरोना में हिन्दीभाषी लोगों के लिए एक बड़ी सीख है
एक हिंदी-पत्रकार के तौर पर अपने लगभग चालीस वर्ष के अनुभव और देश-विदेश के अपने भ्रमण से अर्जित समझ के आधार पर पिछले कुछ वर्षो से यह बात मैं लगातार कहता आ रहा हूं, उसे आज फिर दोहराऊंगा। इस महामारी में भी नये सिरे से इसे कहने की जरुरत है। हमारा साफ शब्दों में कहना है कि अब उत्तर भारत के हिंदी-भाषी इलाकों के गरीबों और उत्पीड़ित समाज के लोगों को अपने बच्चों को शुरू से ही अंग्रेजी में शिक्षित करने का प्रबंध करना चाहिए। खर्च में कटौती करना पड़े तो भी बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कोई समझौता नहीं कीजिये। सामाजिक, धार्मिक या सामुदायिक संगठनों को गांव-गांव ऐसे स्कूल खोलने चाहिए, जहां बच्चों को शुरु से ही अंग्रेजी में शिक्षित किया जा सके। बेशक, वे एक भाषा के तौर पर हिंदी भी पढें-समझें!
अपने को आपका हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से भी यह सुनिश्चित कराइये कि वे सरकार में आने पर आपके बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह अंग्रेजी में शिक्षा का प्रबंध करेंगे। हर चुनाव में आम लोग अपने नेताओं पर इसके लिए दबाव बनायें। याद रखिये, हर प्रमुख नेता (वह चाहे जिस जाति या धर्म का हो!) का बेटा अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ा होता है या पढ़ रहा होता है।
इस महामारी (कोविड-19) के बाद जब हालात कुछ संभलेंगे तो अच्छी नौकरियां अंग्रेजी वालों को मिलेंगी और मजदूरी का काम हिंदी वालों को। अंग्रेजी के बगैर होम-डिलीवरी वाली कंपनियों की साधारण नौकरी भी नहीं मिलेगी। मामला सिर्फ नौकरी का नहीं है। सूचना, ज्ञान और विज्ञान की दुनिया से बेहतर परिचय के लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान ज़रूरी है। हिंदी में पढ़कर आपके बच्चे सूचना के लिए हिंदी उन अखबारों को पढ़ने और, टीवीपुरम् के कथित न्यूज़ चैनलों को देखने के लिए अभिशप्त होंगे, जिनका न्यूज़ की दुनिया से अब कोई वास्ता नहीं, वे सब एक अमानवीय सोच, एक जनविरोधी राजनीतिक धारा और कारपोरेट प्रोपगेन्डा के संगठित मंच भर हैं। आपके बच्चे अगर फर्राटेदारअंग्रेजी नहीं जानेंगे तो देश-विदेश के अपेक्षाकृत अच्छे मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेंगे। घटिया प्रोपगेन्डा के घटिया मंच उनके दिमाग में घटिया विचार इंजेक्ट करेंगे।
अब इस महामारी में ही देख लीजिये। हर जरूरी चीज का नाम अंग्रेजी में है: टीका का नाम सब भूल चुके हैं। अब उसे ‘हिंदी’, ‘हिंदू’ और ‘हिन्दुस्थान’ वाले भी ‘वैक्सीन’ कहते हैं। देश के हिंदी अखबारों में भी ‘वैक्सीन’ और ‘वैक्सीनेशन’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं। इसे वे ‘अप-मार्केट’ की भाषा ‘हिंग्लिश’ कहते हैं। फिर आपके बच्चे ऐसी घटिया भाषा क्यों बोलें? वे सीधे अंग्रेजी ही क्यों न बोलें? महामारी के बारे में हिंदी अखबारों में सार्थक और ज़रूरी खबरें बहुत कम छप रही हैं। हिंदी के न्यूज़ चैनल इतना सब सामने होता देखकर भी सरकारी भोंपू बने हुए हैं- पूरे के पूरे टीवीपुरम्! उनमें काम करने वाले भी ज्यादातर कुछ ही समुदायों के होते हैं।
विदेश के अंग्रेजी अखबार-न्यूज चैनल ही आज भारत का सच बताते दिख रहे हैं। अगर देश में यह काम कोई कर रहा है तो वे भारत की अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट हैं। इनमें कुछ दो भाषाओं में भी हैं। देश के कुछेक अंग्रेजी चैनलों के कुछेक एंकर और विश्लेषक भी अच्छे कार्यक्रम पेश कर रहे हैं। वेबसाइटों की पहुंच अभी हमारे यहां ज़्यादा नहीं है।
लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि ज्ञान-विज्ञान का बड़ा खजाना अंग्रेजी में है। हमारी सरकारों ने बीते 73 वर्षो में हिंदी को इस लायक बनाया ही नहीं। सरकारों के असल संचालक अंग्रेजी में सोचते और करते रहे, नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों की गरीब और उत्पीड़ित जनता खो हिंदी के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहे! आज गरीबों के बच्चे हिंदी में क्यों पढें? क्या तर्क है
हिंदी-वादियो के पास? क्या सिर्फ मजदूरी करने के लिए हिंदी में पढ़ें? रिक्शा या टेम्पो चलाने के लिए? या कुछ ‘शक्तिशाली लोगों’ के इशारे पर काम करने वाली दंगाइयो की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ?
इसलिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के उत्पीड़ित समाजों के लोगों, अब आप अपने बच्चों को वैज्ञानिक, प्रोफेसर, रिसर्चर, समाज विज्ञानी, न्यायविद्, लेखक, आईआईटियन, कम्प्यूटर विज्ञानी और अंतरिक्ष विज्ञानी बनाने के लिए अंग्रेजी को उनकी शिक्षा का माध्यम बनाइये। पढ़-लिखकर वे स्वयं भी बदलेंगे और अपने समाजों में बदलाव का प्रेरक भी बनेंगे।
इस बारे में हिंदी क्षेत्र के कुछ बुजुर्ग होते नेताओं या कुछ आत्ममुग्ध हिंदी लेखकों-बुद्धिजीवियों की फ़ालतू और बासी दलीलो से कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है। यही न कि वो आपसे कहने आयेंगे कि आप अपनी प्यारी हिंदी छोड़कर अपने बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षा क्यों दिलाने लगे? आप पूछियेगा उनसे, उनमें कितनों के बच्चे निगम या पंचायत संचालित हिंदी वाले स्कूलों में पढ़ते हैं? फिर वे आपको बेवजह हिंदी-भक्त क्यों बनाये रखना चाहते हैं?
सोचिये और बदलिये, वरना बहुत देर हो जायेगी!
छत्तीसगढ़ सरकार ने वकीलों पत्रकारों के परिवार को भी माना फ्रंटलाईन वर्कर्स
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक जीवन में सबसे अगली पंक्ति में काम करने वाले लोगों एवं उनके परिवारों को टीकाकरण में प्राथमिकता देने की घोषणा की है। छत्तीसगढ़ के पत्रकारों, वकीलों, सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों सहित उनके परिवारों को भी फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में देखा जाएगा। इस प्रकार ना केवल इन कर्मचारियों को बल्कि उनके परिवारजनों को भी टीकाकरण अभियान में पहली प्राथमिकता दी जाएगी।
इसे एक बड़ी रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। कोरोना से युद्ध में फ्रंट लाइन पर काम करने वाले लोगों की शिकायत रहती थी कि उन्हें स्वयं को टीका लगने के बावजूद उनके घर वालों में संक्रमण का खतरा बना रहता था। सिर्फ एक व्यक्ति को टीका लग जाने से पूरा परिवार सुरक्षित नहीं हो जाता है, छत्तीसगढ़ में फ्रंटलाइन वर्कर्स अपने काम के दौरान एवं अपने पारिवारिक जीवन में बहुत अधिक तनाव का सामना कर रहे थे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने इस बात को समझा एवं इसके लिए जरूरी उपाय किए हैं। अब छत्तीसगढ़ राज्य के कोरोनावायरस एवं फ्रंटलाइन वर्कर्स स्वयं की एवं परिवार की चिंताओं से मुक्त होकर अधिक ऊर्जा एवं लगन के साथ काम कर सकेंगे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ प्रशासन के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सामने यह मांग रखी थी। छत्तीसगढ़ प्रशासन की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के कई राज्यों में पत्रकारों एवं वकीलों को फ्रंटलाइन वर्कर्स की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने इन वकीलों एवं पत्रकारों के परिवारों को भी इस श्रेणी में शामिल कर लिया है।
कोरोना ने भारत की स्वास्थ्य एवं सफाई व्यवस्था की पोल खोली
2021 के शुरुआत में जनवरी महीने में कोरोना के दौर में एक बार फिर से भारत की सफाई व्यवस्था की पोल खुल चुकी है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि भारत में साफ-सफाई एवं सैनिटेशन की सुविधाओं के बारे में गलत आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। सैनिटेशन के विशेषज्ञ आसिफ वानी का कहना है कि भारत को पब्लिक हेल्थ और विशेष रूप से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा एवं सैनिटेशन पर बहुत ध्यान देना पड़ेगा।
उनका कहना है कि फरवरी 2020 में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में 1404 लोगों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 10926 लोगों पर एक डॉक्टर मौजूद है। इस आंकड़े के हिसाब से देखा जाए तो भारत स्वास्थ्य के मामले में दुनिया में बहुत पीछे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 नागरिकों पर एक डॉक्टर की उपलब्धि होनी चाहिए। इस लिहाज से देखा जाए तो ब्राजील कितनी भारत से बहुत अच्छी है, इसके बावजूद वहां पुराना की महामारी ने कहर बरपा रखा है।
भारत की सैनिटेशन और पब्लिक हेल्थ की स्थिति बहुत ही खराब है। भारत में लगभग 60 लाख लोग लोग हर साल, संक्रामक बीमारियों से मर जाते हैं, इसके अलावा 1000 नए जन्मे बच्चों में से 33 बच्चे 1 साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं। यह स्थिति है जो कोरोना बीमारी के आने के पहले बनी हुई थी। आज कोरोना की महामारी के दौर में हम कल्पना कर सकते हैं कि जब सारा स्वास्थ्य का इंफ्रास्ट्रक्चर कोरोना के पीछे लगा हुआ है, सब सामान्य संक्रामक बीमारियों एवं गैर संक्रामक बीमारियों से पीड़ित लोगों को किस तरह का इलाज एवं सुविधाएं मिल पा रही होंगी। इस नजरिए से देखा जाए तो कोराना ने भारत की स्वास्थ्य एवं सेनिटेशन व्यवस्था को दुनिया के सामने नंगा कर दिया है।
कोरोना महामारी के बीच गरीबों की ऐसे मदद कर रहे हैं अमेरिका के हेल्थ वर्कर
कोरोना की इस वैश्विक महामारी के बीच संक्रमण, मौत और अभाव सहित अव्यवस्था की सबसे बुरी मार भारत का वंचित तबका झेल रहा है। यह समाज ना केवल आर्थिक रूप से कमजोर होता है, बल्कि वे सामाजिक एवं शासन प्रशासन से मिलने वाली सहायता भी हासिल नहीं कर पाते हैं। ऐसे में बीमारियां एवं प्राकृतिक आपदाओं का सबसे ज्यादा असर भारत के दलितों एवं आदिवासियों पर ही होता है। ऐसे लोगों की मदद के लिए अमेरिका के बोस्टन से प्रयास शुरू किए गए हैं और यह प्रयास शुरू किया है, अमेरिका बोस्टन में बसी कुमारी अर्जुन और उनके साथियों ने।
कुमारी अर्जुन और हेल्थ वर्कर साथी टेलीफोन, इंटरनेट और टेलीमेडिसिन के जरिए भारत के दलित एवं आदिवासी परिवारों में कोरोना से संक्रमित हो रहे मरीजों की मदद कर रहे हैं। लगभग 10 साल पहले अर्जुन ने भारत के आदिवासियों के लिए टेलीहेल्थ प्रोग्राम बनाया था। इसका उद्देश्य दूरदराज में बसे हुए आदिवासियों को इंटरनेट और मोबाइल फोन के जरिए चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराना था। उनका कहना है कि एक साल पहले जब कोविड-19 की बीमारी शुरू हुई उन्हें अपने इस प्रयास की सार्थकता नए स्तर पर दिखाई दी। उन्होंने अनुभव किया कि आदिवासियों एवं दलितों को भारत में वैसे भी देखना या छूना पसंद नहीं किया जाता है, ऐसे में कोरोना की बीमारी होने के बाद उनके खिलाफ सबसे गंदा भेदभाव शुरू होगा। इसीलिए उन्होंने अपने मूल कार्यक्रम को कोरोना की बीमारी के लक्षणों के निदान एवं जरूरी दवाइयों की सलाहकारी की तरफ मोड़ दिया।
अर्जुन का कहना है कि ‘यह एक मानवीय आवश्यकता है, अक्सर दलितों आदिवासियों के कोरोना से पीड़ित मरीजों को कह दिया जाता है कि तुम्हें कोरोना हो गया है अब तो तुम मरने वाले हो, ऐसी स्थिति में न केवल मरीज बल्कि उसका पूरा परिवार असहाय हो जाता है।’ ऐसी स्थिति में आ चुके परिवार फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए अर्जुन द्वारा शुरू की गयी ‘टेली हेल्थ फैसिलिटी’ से संपर्क करके आवश्यक जानकारी हासिल करते हैं। इस कार्यक्रम में भारत के कई राज्यों एवं इलाकों के स्थानीय कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं जो स्थानीय भाषा का इंग्लिश में अनुवाद करते हैं, और अर्जुन के काम को आसान बनाते हैं। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि कुमारी अर्जुन स्वयं दलित परिवार से आती है।
कोरोना की सबसे ज्यादा मार सह रहा है दलित समुदाय: ऑक्सफैम अमेरिका
कोरोना महामारी से एक तरफ पूरी दुनिया पीड़ित है और सरकारों की लापरवाही के कारण भारत में भी अब यह गांव-गांव तक पहुंच रहा है। भारत के छोटे-छोटे गांव से भी इंफेक्शन और मौतों की खबरें आने लगी है। ऐसे में ऑक्सफैम अमेरिका एवं ऑक्सफेम इंडिया की तरफ से आए बयानों में भारत से गरीब दलित आबादी पर कोरोना महामारी के भयानक परिणामों का अंदाजा होता है। देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह की हालात बन रहे हैं उन के मद्देनजर ऑक्सफैम अमेरिका की डायरेक्टर अलीवैलू रामी शेट्टी का कहना है कि ‘एंबुलेंस के लिए लंबी कतारें लग रही हैं, दौड़ते भागते लोगों की सांसें उखड़ने लगी हैं, और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था लगभग असहाय हो चुकी है… ऐसे में सबसे गरीब एवं हाशिये पर डाल दिए गए समुदायों की स्थिति सबसे खराब है।’
ऑक्सफैम इंडिया के अधिकारियों का कहना है कि ‘इस महामारी ने पूरे भारत के गरीबों को और दलितों को एक बार फिर से अनिश्चितता और गरीबी के दलदल में धकेल दिया है, इस स्थिति में ना केवल वे सेहत से जुड़ी समस्याएं झेल रहे हैं बल्कि गरीबी की मार भी सबसे ज्यादा उन्हीं पर पड़ रही है’। ऑक्सफैम इंडिया के डायरेक्टर पंकज आनंद का कहना है कि ‘हमारी जानकारी में जितने भी लोग हैं उनमें से एक भी ऐसा परिवार नहीं है जिसमें कोई एक व्यक्ति इनफेक्टेड ना हुआ हो… ऐसी स्थिति में महिलाएं और दलित समुदाय के लोग बहुत अधिक तकलीफ उठा रहे हैं।’ ऑक्सफेम अमेरिका की डाइरेक्टर रामशेट्टी का कहना है कि ‘दलित समुदाय इस महामारी के दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जातिगत भेदभाव एवं गरीबी के कारण उन्हें मामूली सी आर्थिक एवं स्वास्थ्य सेवाओं की मदद भी नहीं मिल पा रही है।’
Read this news in Englishकश्मीरी मुसलमानों ने ब्राह्मणों के अंतिम संस्कार के लिए बढ़ाया हाथ
कोरोना महामारी से जूझ रहे कश्मीर में सांप्रदायिक सद्भाव एवं मानवता की मिसाल पेश करने वाली एक नई घटना सामने आई है। कश्मीरी पंडितों के परिवार में में मृत्यु होने के बाद, अंतिम संस्कार के लिए स्थानीय मुस्लिम युवाओं ने हाथ आगे बढ़ाया है। इस संकट की घड़ी में जबकि पवित्र रमजान माह भी चल रहा है, और सभी मुस्लिम युवा रोजेदार हैं, अपनी भूख प्यास एवं कोरोना बीमारी के इंफेक्शन की चिंता किए बिना ब्राह्मण परिवारों की मदद की पहल करना एक सुकून का अहसास देती है।
खबरों के मुताबिक पुलवामा जिले के कश्मीरी पंडित परिवार के 70 वर्षीय चमन लाल की कुछ दिन पहले कोरोना से हुई मृत्यु के बाद आसपास के मुस्लिम गांव में भी खबर फैल गई। खबर मिलते ही मुस्लिम परिवारों के लोग बड़ी संख्या में शोक व्यक्त करने के लिए चमन लाल के घर इकट्ठा हुए। जब मुस्लिम भाइयों ने देखा कि चमनलाल के परिवार में बहुत ही कम सदस्य हैं तो अंतिम संस्कार में मदद करने के लिए उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। इस प्रकार की खबरें घाटी के कई अन्य जिलों से भी आ रही हैं।
गौरतलब है कि पूरे भारत से इस तरह की खबरें कई महीनों से आ रही हैं, लेकिन मुस्लिम बहुल कश्मीर राज्य से ऐसी खबरों का आना विशेष महत्व रखता है क्योंकि हिंदुत्ववादी शक्तियों ने यह प्रचार किया है कि जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं वहां मुस्लिम समुदाय भाईचारे का प्रदर्शन नहीं करता है। कश्मीर घाटी से आ रही सांप्रदायिक सद्भाव की यह खबरें भारत की महान गंगा जमुनी संस्कृति की झलक दिखाती है।
इस नेता ने मोदी सरकार को बताया फेल, सुप्रीम कोर्ट से सेना बुलाने की मांग की
जुझारु युवा दलित नेता और आजाद समाज पार्टी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने बीजेपी सरकार को फेल बताया है। उन्होंने कहा है कि बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट को अब तेजी से हस्तक्षेप करना चाहिए और भारतीय सेना को हालात से निपटने के लिए बुलाया जाना चाहिए। चंद्रशेखर का कहना है कि ‘केंद्र की बीजेपी सरकार कोरोना महामारी को रोकने में पूरी तरह अक्षम साबित हुई है, राष्ट्रपति एवं सुप्रीम कोर्ट को आगे होकर संज्ञान लेना चाहिए और भारत के 130 करोड़ लोगों जीवन की रक्षा करने के लिए सेना को बुलाया जाना चाहिए।’
आजाद ने विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी एवं बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा कि इस सरकार ने पांच राज्यों में और विशेष रूप से बंगाल में चुनाव जीतने के लिए भारत के 130 करोड़ लोगों की जान दांव पर लगा दी है। विशेषज्ञों की राय को आधार बनाते हुए उन्होंने कहा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन यूरोप अमेरिका और अफ्रीका के कई विशेषज्ञों ने भारत को बराबर चेतावनी दी थी कि दूसरी लहराने वाली है, और यह पहली से कहीं अधिक खतरनाक साबित होगी, लेकिन मोदी सरकार ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और वे सिर्फ चुनाव में लगे रहे।’ चंद्रशेखर आजाद ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी स्थिति में व्यवस्था को सेना के हवाले कर देना चाहिए। चंद्रशेखर आजाद का यह बयान 8 मई को सामने आया।
ऑक्सीजन आवंटन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई देश के टॉप डाक्टर्स की टास्क फोर्स
कोरोना संक्रमण के बीच विभिन्न अस्पतालों में हो रही ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को 12 सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन किया है। जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा बनाई गई इस नेशनल टास्क फोर्स का काम पूरे देश में ऑक्सीजन की व्यवस्था को देखा जाएगा। इस टास्क फोर्स में देशभर के नामी-गिरामी अस्पतालों के प्रमुख डॉक्टरों को शामिल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए नेशनल टास्क फोर्स में वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेस के पूर्व वाइस चांसलर डॉ. भाभातोश बिस्वास, दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के चेयरपर्सन डॉ. देवेंद्र सिंह राणा, नारायणा हेल्थ केयर के चेयरपर्सन डॉ. देवीशेट्टी, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (वेल्लोर) के प्रोफेसर डॉ. गगनदीप कांग, डॉ. जेवी पीटर, मेदांता अस्पताल के चेयरपर्सन डॉ. नरेश त्रेहन, फोर्टिस अस्पताल के डॉ. राहुल पंडित, सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. सौमित्र रावत, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बायलरी साइंस (दिल्ली) के डॉ. शिव कुमार, मुंबई स्थित ब्रीच कैंडी अस्पताल के डॉ. जरीर एफ. शामिल हैं। इसके अलावा टॉस्क फोर्स में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव और नेशनल टास्क फोर्स के संयोजक जोकि सरकार में कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हैं, इसमें शामिल होंगे।
कोरोना के कोहराम के बीच देश की शीर्ष अदालतें लगातार मामले पर नजर बनाए हुए हैं और व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में चिंतित दिख रही हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नसीहत देते हुए पिछले दिनों कहा था कि आप हमें कड़े फैसले के लिए मजबूर न करें। कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि कुछ भी छिपाने के लिए नहीं है तो फिर सरकार आगे आकर देश को यह बताना चाहिए कि किस तरह से केंद्र सरकार की ओर से ऑक्सीजन का आवंटन किया जा रहा है।
मोदी सरकार पर शिवसेना का हमला, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर उठाए सवाल
शिवसेना ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर गंभीर लापरवाही एवं असंवेदनशीलता का आरोप लगाया है। पार्टी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि केंद्र की बीजेपी सरकार कोरोना महामारी के दौरान बड़ी संख्या में हो रही मौतों के बीच फिजूलखर्ची का एक ऐसा उदाहरण पेश कर रही है जो पूरी दुनिया में भारत की बहुत गलत छवि पेश करता है। पार्टी ने कहा है कि बीते 70 सालों में पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक अलग-अलग प्रधानमंत्रियों ने जो सिस्टम बनाया था वही आज देश के काम आ रहा है। आज की सरकार ने ना तो कोई सिस्टम बनाया है और ना कोई उपाय किया है जिसके जरिए इस महामारी का सामना किया जा सके।
इसके अलावा शिवसेना ने केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लागू किए जा रहे सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर भी गंभीर सवाल उठाएं। शिवसेना का कहना है कि ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, वैक्सीन और अन्य आवश्यक दवाइयों सहित तालमेल की कमी से जूझ रहे इस देश में बीस हजार करोड रुपए सिर्फ नए संसद भवन और प्रधानमंत्री आवास के लिए खर्च करना एक भयानक फिजूलखर्ची है। आज जबकि देश को कोरोना महामारी से निपटने के लिए पैसों और संसाधनों की आवश्यकता है ऐसे समय में इतने बड़ी धनराशि को गैर जरूरी काम में खर्च करना भारत के नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ करने के समान है।
शिवसेना ने यह भी कहा कि एक तरफ आज भारत बांग्लादेश श्रीलंका और भूटान जैसे देशों से मदद मांग रहा है, और दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी हजारों करोड रुपए अपना नया घर बनाने के लिए खर्च कर रहे हैं। यह एक विचित्र स्थिति है और अगर यह जारी रहती है तो भारत के नागरिकों का अपनी सरकार से विश्वास उठेगा बल्कि वे भारत की नौकरशाही और न्यायपालिका में भी विश्वास खो देंगे।
मायावती ने केजरीवाल को कहा नौटंकीबाज
कोरोना महामारी के बीच दिल्ली एवं देश के अन्य राज्यों में नागरिकों की बढ़ती हुई तकलीफ के मद्देनजर बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि देश के नेता काम कम कर रहे हैं एवं काम करते हुए अतिशयोक्ति पूर्ण प्रतिक्रिया देते हुए काम का दिखावा ज्यादा कर रहे हैं। मायावती ने दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर आरोप लगाया है कि वे ‘काम कम और नौटंकी ज्यादा कर रहे हैं’ हमारे लोग दिल्ली छोड़कर जाने के लिए मजबूर हैं और यह घटना केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र और हरियाणा सहित पंजाब में भी हो रही है।
ऐसी ज्यादातर घटनाओं में दलित एवं बहुजन समाज के लोगों को कष्ट उठाना पड़ रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि पूरे देश में गरीबों दलितों आदिवासियों एवं सब तरह के कमजोर व वंचित समाज के लोगों के लिए मुफ्त और अनिवार्य टीकाकरण का अभियान चलाया जाना चाहिए। हिंदी में एक के बाद एक ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा है की दिल्ली के मुख्यमंत्री हाथ बांधे हुए खड़े हैं और लोगों से अपील कर रहे हैं कि दिल्ली छोड़कर ना जाएं। मायावती के अनुसार यह केवल एक नौटंकी है क्योंकि केजरीवाल कोरोना की स्थिति में सुधार के लिए कुछ खास काम नहीं कर रहे हैं। अगर वह वाकई कुछ ठोस काम कर रहे हैं तो दिल्ली में रहने वाले गरीब लोग दिल्ली छोड़कर क्यों भाग रहे हैं?
गुजरात में 60 प्रतिशत मंत्री कोरोना संक्रमित
भारत में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में गुजरात भी शामिल है। केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार होने के कारण गुजरात की जमीनी स्थिति की खबर नहीं हो पा रही है। जिस तरह भारत सरकार पूरे देश में इंफेक्शन और मृत्यु का आंकड़ा छुपा रही है, उससे कहीं अधिक आगे बढ़कर गुजरात राज्य के इंफेक्शन एवं मृत्यु के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं। हाल ही में विभिन्न पत्रकारों द्वारा उजागर किए गए आंकड़ों के आधार पर पता चल रहा है कि गुजरात राज्य की स्थिति उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से बहुत बेहतर नहीं है।
8 मई को आइ एक खबर के अनुसार कोरोना महामारी की शुरुआत से लेकर अभी तक गुजरात राज्य के 60% कैबिनेट मंत्री कोरोना संक्रमित हुए हैं। मुख्यमंत्री विजय रुपाणी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल के साथ 23 में से 14 कैबिनेट मंत्री कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। हालांकि यह सभी अब संक्रमण से बाहर आ चुके हैं। कोरोना की पहली लहर के दौरान दिवाली के पहले गुजरात के कुछ मंत्री कोरोना संक्रमित हुए थे। लेकिन इस बात से कोई शिक्षा नहीं ली गई और अब दूसरी लहर जब आई है तब संक्रमण रोकने एवं मरीजों का इलाज करने के लिए उचित उपाय नहीं किए गए हैं।
गुजरात सरकार के मंत्रियों का इस तरह से संक्रमित होना एवं इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना बहुत कुछ बताता है। इससे पता चलता है कि वहां पर आम आदमी की क्या हालत हो रही होगी। गुजरात के उप मुख्य मंत्री अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। इनके अलावा शिक्षा मंत्री भूपेंद्रसिंह चूड़ासामा अस्पताल से छुट्टी लेने के बाद एक हफ्ते से होम आइसोलेशन में है। उनके अलावा राज्य के गृह मंत्रालय एवं न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी देखने वाले प्रदीप सिंह जडेजा अभी अभी अस्पताल से बाहर आए हैं।
पंचायत चुनाव नतीजों को लेकर उत्साह में बसपा, किया बड़ा दावा
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजे सामने आ गए हैं। ऐसे में सभी पार्टियां अपनी जीत का दावा कर रही है और अपना प्रदर्शन बेहतर बता रही है। इसी क्रम में बहुजन समाज पार्टी ने बयान जारी कर पंचायत चुनाव में अपनी पार्टी के प्रदर्शन की सराहना की है। बसपा ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में सत्ता व सरकारी मशीनरी का भारी दुरुपयोग एवं विरोधी पार्टियों द्वारा अपार धनबल के अनुचित इस्तेमाल के बावजूद बहुजन समाज पार्टी ने लगभग पूरे प्रदेश में जो रिज़ल्ट प्रदर्शित किया है वह अति-उत्साहवर्द्धक है तथा यहाँ होने वाले अगामी विधानसभा आमचुनाव के लिए लोगों में नई उर्जा, जोश भरने व हौंसले बुलन्द करने वाला है।
सुश्री मायावती जी ने इसके लिए प्रदेश की जनता का तहेदिल से आभार प्रकट करते हुए तथा पार्टी के हर स्तर के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि जितने भी निर्दलीय उम्मीदवार कामयाब हुए हैं उनमें से ज्यादातर वास्तव में बी.एस.पी. से ही जुड़े हुए लोग हैं, जिन्होंने खासकर रिजर्व सीटों पर आम सहमति नहीं बन पाने पर अपने- अपने बूते पर ही चुनाव लड़कर जीत हासिल की है।
कुल मिलाकर, यूपी के जिन ज़िलों में बी.एस.पी-समर्थित उम्मीदवार के लिए आम सहमति बन गई वहाँ बी.एस.पी. का अच्छा रिजल्ट आया तथा जिन जिलो में आम सहमति नहीं बनने के कारण, एक-एक सीट पर कई लोग बी.एस.पी. का झण्डा-बैनर आदि लेकर चुनाव लड़ते रहे, वहाँ सामान्य सीटो पर तो पार्टी को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन सुरक्षित सीटो पर पार्टी के कई-कई उम्मीदवार खड़े होने की वजह से ऐसा नहीं हो सका, जिसका फिर ज्यादातर लाभ विरोधी पार्टियों को पहुँच गया।
सुश्री मायावती जी ने चुनाव परिणामों के सम्बंध में कहा कि यू.पी. पंचायत चुनाव में बी.एस.पी. का पूरे प्रदेश में विशेषकर बड़े जिलो में से कुछ जिलो को छोड़कर अधिकांश जिलो में प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। और खासकर आगरा, मथुरा, मेरठ, बुलन्दशहर, गाजियाबाद, सहारनपुर, मुरादाबाद, हापुड़, शाहजहाँपुर, कानपुर देहात, जालौन, बाँदा, चित्रकूट, लखीमपुर खीरी, हरदोई, सुल्तानपुर, बलरामपुर, सन्तकबीर नगर, महाराजगंज, आजमगढ़, मऊ, प्रयागराज, भदोही, मिर्जापुर, चन्दौली आदि जिलो में बी.एस.पी का काफी बेहतरीन रिजल्ट आया है।
बसपा ने कहा है कि बी.एस.पी के कई-कई उम्मीदवार एक सीट पर खड़े नहीं होते तो निश्चय ही बी.एस.पी. का प्रदर्शन और भी ज्यादा बेहतर हो सकता था, फिर भी पार्टी के लोगों द्वारा विरोधियों के साम, दाम, दण्ड, भेद आदि हथकण्डों का सामना करते हुए अपने अति-सीमित संसाधनों से अच्छी सफलता अर्जित करना जीत की खुशी को दोगुणा करता है। बसपा ने पंचायत चुनाव परिणाम को उत्साहवर्द्धक और अगामी विधानसभा आमचुनाव के लिए लोगों में नई उर्जा, जोश भरने व हौंसले बुलन्द करने वाला कहा है।

