करूणानिधि के जन्मदिन (3 June 1924) पर सादर नमन के साथ
तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की औपचारिक शुूरूआत 1916 में तब हुई, जब जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मण घोषणा-पत्र जारी किया। ब्राह्मणवाद बनाम गैर-ब्राह्मणवाद का संघर्ष ही इस घोषणा-पत्र का मूल स्वर था। तमिलनाडु (तब मद्रास प्रेसीडेंसी) में ब्राह्मणों का वर्चस्व किस कदर था, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1912 में वहां ब्राह्मणों की आबादी सिर्फ 3.2 प्रतिशत थी, जबकि 55 प्रतिशत जिला अधिकारी और 72.2 प्रतिशत जिला जज ब्राह्मण थे। मंदिरों और मठों पर ब्राह्मणों का कब्जा तो था ही जमीन की मिल्कियत भी उन्हीं लोगों के पास थी। इस प्रकार तमिल समाज के जीवन के सभी क्षेत्रों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था।
ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए शुरु हुआ ब्राह्मण विरोधी आंदोलन इस वर्चस्व को तोड़ने के लिेए ब्राह्मण विरोधी आंदोलन शुरू हुआ। 1915-1916 के आसपास मंझोली जातियों की ओर से सी.एन. मुलियार, टी. एन. नायर और पी. त्यागराज चेट्टी ने जस्टिस आंदोलन की स्थापना की थी। इन मंझोली जातियों में तमिल वल्लाल, मुदलियाल और चेट्टियार प्रमुख थे। इनके साथ ही इसमें तेलुगु रेड्डी, कम्मा, बलीचा नायडू और मलयाली नायर भी शामिल थे। 1920 में मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों के अनुसार मद्रास प्रेसीडेंसी में एक द्विशासन प्रणाली बनायी गयी जिसमें प्रेसीडेंसी में चुनाव कराने के प्रावधान किये गए। इस चुनाव में जस्टिस पार्टी ने भाग लिया और एक गैर-ब्राह्मणों के नेतृत्व और प्रभुत्व वाली जस्टिस पार्टी सत्ता में आई। इस पार्टी के नेतृत्व में पहली बार तमिलनाडु में 1921 में सरकारी नौकरियों में गैर ब्राह्मणों के लिए आरक्षण लागू हुआ
प्रभावकारी साबित हुआ पेरियार का आत्मसम्मान आंदोलन 1925 में पेरियार ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर आत्मसम्मान आंदोलन की शुरूआत की। इसके तहत आत्मसम्मान विवाह पद्धति आरंभ की गयी, जिसमें लड़के-लड़की दोनों को समान दर्जा दिया गया। इस विवाह पद्धति में हिंदू धर्म और ब्राह्मणों को पूरी तरह से बाहर कर दिया गया। अंतर जातीय विवाह व विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया गया। किशोर करूणानिधि की भी शादी इसी पद्धति हुई थी। जब करूणानिधि तमिलानाडु के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने डॉ. आंबेडकर के कोड बिल की तरह का एक बिल प्रस्तुत किया। जिसके तहत पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का हक दिया गया। शिक्षा, सरकारी नौकरी और स्थानीय चुनावों महिलाओं को लिए आरक्षण लागू किया गया। सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। उन्होंने महिलाओं के हित के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाओं की शुरूआत की। गरीब लड़कियों की शादी के लिए 5 हजार रूपए का अनुदान शुरू किया गया। कम और मध्यम आय की लड़कियों के लिए स्नातक तक की शिक्षा मुफ्त कर दी। विधवाओं की शादी को प्रोत्साहित करने के उनकी शादी के लिए विशेष वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।
हिंदी गाय पट्टी के ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन जहां राजनीतिक दायरे तक ही कमोबेश सीमित रहे, उसके उलट द्रविड़ आंदोलन ने ब्राह्मणवादी संस्कृति को कड़ी चुनौती दी। वहां 1916 से लेकर करूणानिधि के जीवित रहने तक तमिलनाडु में राजनीतिक संघर्ष अपने में सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्षों को किसी न किसी रूप में समाए रखा, भले ही उसका ताप-तेवर और वैचारिकी कमजोर पड़ी हो।
संस्कृत और हिंदी को मिली चुनौती अकारण नहीं है कि तमिलनाड़ु में ब्राह्मण विरोधी आंदोलन के घोषणा-पत्र (1916) के साथ ही उत्तर भारतीय आर्य-ब्राह्मणों के ब्राह्मणों के भाषायी वर्चस्व के खिलाफ भी संघर्ष शुरू हो गया था। 1916 में ही मद्रास प्रेसीडेंसी (आज के तमिलनाडु) में संस्कृत भाषा वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष भी शुरू हुआ। यह आंदोलन 1937 में हिंदी विरोधी आंदोलन के रूप में तब तब्दील हो गया, जब 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी के सी. राजगोपालाचारी मुख्यमंत्री बने और उन्होंने हिंदी को एक अनिवार्य भाषा के रूप में थोपने का प्रयास किया। 27 फरवरी 1938 को राज्य स्तर पर पेरियार के नेतृत्व में हिंदी विरोधी सम्मेलन हुआ। 13 वर्षीय करूणानिधि ने भी हिंदी विरोधी इस आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की थी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि हम यह नारा लगता थे कि ‘हिंदी मुर्दाबाद, तमिल जिंदाबाद’। वे लिखते है कि यह नारा लगाते हुए और सुनते हुए हमारी नसें फड़फड़ा उठती थीं। हम रोमांच से भर जाते थे। हाल में ही जब संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में हिंदी को थोपने की कोशिश मोदी-भाजपा ने की तो, करूणानिधि और उनकी पार्टी ने कड़ा विरोध किया और सरकार को अपना फरमान वापस लेना पड़ा किसी अन्य भाषा-भाषी समाज पर कोई दूसरी भाषा थोपना क्या होता है, शायद यह समझना आज भी किसी हिंदी भाषा-भाषी के लिए मुश्किल हो, खास करके उन लोगों के लिए जो अंग्रेजी के सामने नतमस्तक हुए बैठे हैं। भाषा थोपने वाला देश या समाज अपनी भाषा के माध्यम से अपनी संस्कृति, मूल्य व्यवस्था, वैचारिकी, सोचने का तरीका और अपनी जीवन-पद्धति भी थोपता है। न्यूगोवाथूंगी ने ठीक लिखा है कि किसी समाज को अपने अधीन बनाना हो तो उस पर अपनी भाषा थोप दो। इसके उलट बात यह है कि वर्चस्व और दासता से मुक्ति का रास्ता वर्चस्वशाली भाषा से मुक्ति से खुलता है। द्रविड़ आंदोलन ने द्रविड़ समाज की सांस्कृतिक मुक्ति के लिए पहले चरण में संस्कृत और हिंदी भाषा के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष किया। करूणानिधि आजीवन भाषायी वर्चस्व की मुखालफत करते रहे।
खुद को हिंदू नहीं मानते थे करूणानिधि मुथुवेल करूणानिधि ब्राह्मणवाद विरोधी द्रविड़ आंदोलन की पैदाईश थे। आधुनिक युग में तमिलनाडु में इस आंदोलन को व्यापक जन का आंदोलन बनाने वाले ई.वी. रामास्वामी यानि पेरियार (जन्म 17 सिंतंबर 1879-निधन 24 दिसंबर 1973) थे। उन्होंने ताजिंदगी हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद का जमकर विरोध किया। वर्ण-जाति व्यवस्था और जातिवादी पितृसत्ता खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्हें धर्म और ईश्वर किसी रूप में स्वीकार नहीं थे। इसके साथ ही उन्होंने उत्तर भारतीय आर्य श्रेष्ठता के राष्ट्रवादी वर्चस्व को भी चुनौती दिया। पेरियार ने हिदूं धर्म और द्रविड़ परंपरा के बीच अंतर करते हुए लिखा, “हम लम्बे समय से कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का अर्थ है आर्य धर्म और हिन्दू आर्य हैं। इसलिए हम यह कहते रहे हैं कि हम द्रविड़ों को खुद को हिन्दू नहीं कहना चाहिए न ही खुद को हिंदुत्व को मानने वाला कहना चाहिए। इसी के अनुरूप सन् 1940 में जस्टिस पार्टी के प्रांतीय सम्मलेन में मेरी अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित हुआ। फैसला किया गया कि हम द्रविड़ खुद को हिन्दू नहीं कहेंगे और न ही यह कहेंगे कि हम हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखते हैं।” पेरियार के कथन की पुष्टि डॉ. आंबेडकर भी करते हैं। उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आर्य-ब्राह्मणवादी संस्कृति से अलगाते हुए लिखा है, “अनार्य, असुर, नाग और द्रविड़ एक ही हैं। जिनका निरंतर संघर्ष आर्य संस्कृति और सभ्यता से होता रहा है।” पेरियार ने ही द्रविड़ कडगम आंदोलन शूुरू किया। इस आंदोलन के उद्देश्य के बारे में उन्होंने लिखा, “‘द्रविड़ कड़गम आंदोलन’ का एक ही उद्देश्य और केवल एक ही निशाना है और वह है आर्य ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिसके कारण समाज ऊंच और नीच जातियों में बांटा गया है। द्रविड़ कड़गम आंदोलन उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण तथा जाति व्यवस्था को जस का तस बनाए रखे हैं”। पेरियार भारत की उस नास्तिक परंपरा के व्यक्तित्व थे, जो न तो वेदों में विश्वास करता था, न ही ईश्वर में। उन्होंने साफ शब्दों में घोषणा की थी कि ईश्वर की रचना धूर्तों ने की है। उन्होंने लिखा, “ईश्वर की सत्ता स्वीकारने में किसी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ विश्वास की जरुरत पड़ती है। ये स्थिति उन्हीं के लिए संभव है जिनके पास तर्क तथा बुद्धि की शक्ति हो”। उनके लिए धर्मग्रंथ और मंदिर बहुसंख्यक समाज को गुलाम बनाने के उपकरण थे। वे लिखते हैं, ““ब्राह्मणों ने हमें शास्त्रों ओर पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर और देवी-देवताओं की रचना की”।
करूणानिधि ब्राह्मणवाद, आर्य संस्कृति और उच्च जातीय उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद को चुनौती देने वाली दक्षिण की पेरियार की इसी द्रविड़ परंपरा की अंतिम कड़ी थे। पेरियार के शिष्य परंपरा के एक वारिस के रूप में करूणानिधि ने तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि यह भी सच है कि पेरियार को अपना गुरू मानने वाला यह व्यक्तित्व धीरे-धीरे अपना ताप, तेवर, मूल्य और वैचारिकता खोता गया और भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों के कई पतनशील तत्वों से यह व्यक्तित्व भी आच्छादित हो गया। जिसका एक घृणित रूप वंशवाद भी था। कभी द्रविड़ संस्कृति और तमिल पहचान की राजनीति करने वाली करूणानिधि की पार्टी उनके बेटे-बेटियों की जागीर बन गई। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम भी अन्य दलों के जैसे व्यक्तिगत स्वार्थो और महत्वाकांक्षा का अखाड़ा बन गई। करूणानिधि ने तामिलनाडु को बनाया कल्याणकारी राज्य लेकिन मैं इस आलेख में उस करूणानिधि को याद करना चाहता हूं, जिन्होंने न केवल तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को तोड़ने की प्रक्रिया को तेज किया, साथ ही समाज और संस्कृति पर उनके वर्चस्व को काफी हद तक तोड़ भी दिया। हम सभी जानते हैं कि तमिलनाडु के आर्थिक संसाधनों पर भी ब्राह्मणों का ही नियंत्रण था। इस वर्चस्व को तोड़ने में उनकी अहम भूमिका रही है। तमिलनाडु को मानवीय विकास के पैमाने पर देश के चंद राज्यों के बरक्स खड़ा करने में उनकी भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है। उन्होंने इस राज्य को एक कल्याणकारी राज्य में बदल दिया।
संगीत सीखने गये स्कूल, मिला अपमान करूणानिधि का जन्म तमिलना़डु के तंंजौर जिले के एक गांव थिरूकुवलाई में 3 जून 1924 को हुआ था। अपने जाति के बारे में वे बताते हैं कि मेरी जाति एसाई वेलालार थी। इस जाति के लोग शादी-विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर वाद्य यंत्र बजाते थे। उनके पिता बल्लादीर मुथुवेलार प्रसिद्ध लोकगायक थे। अन्य समाजों की तरह तमिल समाज में भी बेटा हो इसके लिए मां-बाप तरह-तरह के जतन करते थे। उनकी मां ने बेटे की चाहत में सभी देवी-देवताओं और मंदिरों के चक्कर लगाए। आखिर बेटा पैदा हुआ। मां ने स्थानीय देवता के नाम उस बेटे का नाम करूणानिधि रखा। यह दीगर बात है कि होश संभालते ही यह बेटा पेरियार के प्रभाव में नास्तिक बन बैठा और आजीवन नास्तिक बना रहा। ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाले समाज में पैदा होने वाले हर गैर-द्विज बालक को किसी न किसी रूप में अपनी जाति के चलते अपमान सहना ही होता है। वह करूणानिधि के साथ भी हुआ। लोकगायक पिता ने बेटे को संगीत की शिक्षा के लिए संगीत के स्कूल में भेजा, लेकिन वहां उसे अपमान का सामना करना पड़ा। उसके बैठने की जगह उच्च जातियों से अलग थी और उसे उन गीतों को गाने से रोका जाता था, जिन्हें गाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को था। करूणानिधि लिखते हैं, “वास्तव में मेरी संगीत की कक्षा पहली राजनीतिक कक्षा थी। वहां मैंने यह जाना कि कैसै जाति के आधार पर किसी इंसान को अपमानित किया जाता है। वहां मैंने यह जाना कि कैसे खुद को सही मानते हुए कुछ लोग संस्कारों और परंपराओं से बहुसंख्यक लोगों को अपमानित करते हैं।” करूणानिधि ने उस संगीत स्कूल में शिक्षा लेने से इंकार कर दिया और कहा कि मैं वहां नहीं शिक्षा ग्रहण कर सकता, जहां इंसान की गरिमा का ख्याल न रखा जाता हो। फिल्मों को बनाया बदलाव का हथियार यहां यह याद करना जरूरी है कि यह पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन का समय था। करीब 13 वर्ष की उम्र में करूणानिधि ने 1938 हिंदी विरोधी आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की। इसी उम्र में उन्होंने लिखना भी शुरू कर दिया। उन्होंने मन्नावानेसन (छात्रों का साथी) नामक खुद का प्रकाशन भी शुरू कर दिया। लेखन के सिलसिले में ही उनकी पहली मुलाकात अन्नादुरई से हुई जो उनके राजनीतिक गुरू बने। अन्नादुरई ने उन्हें अध्ययन पर ध्यान और कैरियर बनाने की सलाह दी और साथ ही यह भी कहा कि कैसे पैसा कमा सकते हो, इस पर ध्यान दो। करूणानिधि से इस सलाह को अनसुना कर दिया। वे लेखन, सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों और राजनीति में सक्रिय बन रहे।
1916 से 1944 तक जस्टिस पार्टी द्रविड़ आंदोलन की राजनीतिक अगुवाई करती रही। 1940 में पेेरियार इस पार्टी के संरक्षक बन गए। 1944 में अन्नादुरई के प्रस्ताव पर जस्टिस पार्टी की जगह एक नई पार्टी द्रविड़ कड़गम बनी। इस पार्टी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और जातिवादी आधिपत्य के खिलाफ एक साथ संघर्ष करने का निर्णय लिया। इस पार्टी का मानना था कि कांग्रेस ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति तो चाहती है, लेकिन तमिलना़डु में उच्च जातियों का वर्चस्व कायम रखना चाहती है। यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि तमिलनाड़ु में उच्च जाति के रूप में ब्राह्मण ही थे। करूणानिधि इस पार्टी के सक्रिय नेता के रूप में उभरे। वे पेरियार और अन्नादुरई दोनों को काफी पसंद थे। पेरियार उन्हें उनके विचारों और लेखन के लिए मुख्यत: पसंद करते थे, तो अन्नादुरई उनके राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता के लिए। करूणानिधि जितने अच्छे चिंतक, विचारक और लेखक थे, उतने ही कुशल राजनेता भी थे, साथ ही वे अच्छे वक्ता और संगठनकर्ता भी थे। आजीवन उन्होंने इन संतुलनों को बनाए रखा। तमिल सिनेमा के चरित्र को उन्होंने अपने पटकथा लेखन से बदल दिया। उनके लिए फिल्में भी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव की माध्यम थीं उन्होंने पेरियार के विचारों को फिल्मी पटकथाओं में रूपान्तरित किया। उनकी फिल्में ब्राह्मणवाद को चुनौती देती थीं, जाति व्यवस्था पर प्रहार करती थीं। मनु की संहिता पर चोट करती थीं। उनकी फिल्में किस कदर क्रांतिकारी चरित्र की थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आजाद भारत में ‘पराशक्ति’ (1952) पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ‘पराशक्ति’ में द्रविड़ आंदोलन की विचारधाराओं का समर्थन और ब्राह्मणवाद के मनुष्य विरोधी चरित्र को सामने लाया गया था। उनके फिल्मी कैरियर की शुूरूआत में फिल्म राजकुमारी से हुई थी।
कभी नहीं हारे करूणानिधि इससे पहले 1949 में द्रविड कड़गम से अलग होकर अन्नादुरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी बनायी। करूणानिधि इसके प्रमुख नेताओं में से एक थे। इस दौरान वे तमिलनाड़ु के समाज और राजनीति में एक बड़ी शख्सियत के रूप में उभर चुके थे। 1957 में डीएमके पार्टी तमिलनाडु के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हिस्सेदारी की। 1957 में करूणानिधि पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद चुनावी राजनीति के सफर में उन्हेंं कभी हार का मुंह नहीं देखना पड़ा, भले ही उनकी पार्टी चुनावों में हार गई हो। 1967 के चुनाव में डीएमके पहली बार सत्ता में आई और अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने। इस चुनावी जीत का श्रेय अन्नादुरई ने करूणानिधि को देिया। 3 फरवरी 1969 को अन्नादुरई का निधन हो गया और उनके उत्तराधिकारी के रूप में 10 फरवरी 1969 को करूणानिधि पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। वे पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया। इन 60 वर्षों के राजनीतिक कैरियर में उन्होंने अनेक उदार-चढ़ाव देखे। हार-जीत का सामना किया। एक बड़ी उपलब्धि आज के दौर में उनके हिस्से यह भी है कि उनके निजी स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप नहीं लगा। इस संदर्भ में वे बेदाग रहे।
व्यक्तिगत स्तर पर वे आजीवन नास्तिक बने रहे और तर्क और बौद्धिकता को जीवन-जगत का केंद्र मानते रहे किसी पराशक्ति को नहीं। उनकी अंतिम इच्छा यह थी कि वे उनकी समाधि उनके राजनीतिक शिक्षक अन्नादुरई की समाधि के पास बने। रूकावटों-अवरोधों के बावजूद तमिलनाडु हाईकोर्ट के निर्णय के बाद उनकी यह आखिरी इच्छा भी पूरी हुई। किसी न सच ही कहा कि मौत के बाद भी वे विजयी हुए।
सीएम बनते ही दलितों और ओबीसी के हक में लिया फैसला भले ही डीएमके पेरियार की पार्टी द्रविड़ कड़गम से अलग होकर बनी थी, लेकिन सत्ता में आने बाद अन्नादुरई और बाद में करूणानिधि दोनों ने मुख्यमंत्री के रूप में उनके विचारों व्यवहार में उतारने की कोशिश की। पहले कदम के तौर पर अन्नादुरई ने तमिलनाडु में शादी की पद्धति को बदल दिया और आत्मसम्मान विवाह पद्धति को लागू किया। मद्रास का नाम बदल कर तमिलनाडु कर दिया और तमिलनाडु में दो भाषा आधारित शिक्षा नीति को लागू किया। पहली भाषा तमिल और दूसरी अंग्रेजी। अन्नादुरई के मुख्यमंत्री रहते ही पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिेए आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इन सभी निर्णयों में करूमानिधि की भूमिका अहम थी। अन्नादुरई के निधन के बाद मुख्यमंत्री बनने के बाद 1971 में करूणानिधि ने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लागू किया। उन्होंने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 31 प्रतिशत कर दिया और एससी/एसटी के आरक्षण 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया। 1989-1991 में मुख्यमंत्री बनने के दौरान उन्होंने आरक्षण में उपवर्गीकरण करके उपेक्षित जातियों को प्रतिनिधित्व दिया। जैसा कि जिक्र किया जा चुका है कि इसी कार्यकाल के दौरान उन्होंने महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया। भूमि संबंधों में परिवर्तन और इसके मालिकाना की स्थिति में बदलाव के लिए भी करूणानिधि ने कई कदम उठाए। भूमि सुधार अधिनियम 1970 के माध्यम से उन्होंने सीलिंग की सीमा मानक 30 एकड़ से घटाकर 15 एकड़ कर दिया। इस अधिनियम के माध्यम से उन्होंने वासस्थान की जमीन पर सबको मालिकाना हक प्रदान कर दिया। ध्यान रहे पहले वासस्थान की भूमि के मालिक भी जमींदार ही होते थे,भले ही वहां अन्य लोग घर बनाकर रहते हों। वेे पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने हाथों से खींचे जाने वाले रिक्शे को खत्म कर दिया। हाथों से रिक्शा खींचने वालों को साइकिल रिक्शा उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए और इसका परिणाम यह हुआ कि हाथ से खींचने वाले रिक्शे तमिलनाडु से गायब हो गए। उन्होंने सभी जातियों के लोग मदिंरो में पुजारी बन सके इसके लिए निरंतर प्रयास किया। तमाम कानूनी अड़चनों के बाद भले ही उनकी यह इच्छा बहुत बाद में पूरी हुई।
करूणानिधि आजीवन खुद को पेरियार का वैचारिक शिष्य और अन्नादुरई का राजनीतिक शिष्य मानते रहे। 1969 में तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनने का बाद उन्होंने पेरियार के 91वें जन्मदिन पर कहा, “ पेरियार तमिलनाडु के सरकार हैं।” भले ही यह टिप्पणी अपने शिक्षक के प्रति एक तात्कालिक भावात्मक प्रतिक्रिया हो, लेकिन यह सच है कि करूणानिधि पेरियार के विचारों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करते रहे और द्रविड़ आंदोलन को किसी न किसी रूप में जिंदा रखे।


उत्तर प्रदेश के चुनाव से पूर्व जहां सभी पार्टियां यूपी चुनाव की तैयारी में लगी है, बहुजन समाज पार्टी अजीबो गरीब फैसले ले रही है। पार्टी के इस फैसले से पार्टी कमजोर होती दिख रही है। नए घटनाक्रम में बसपा ने अपने दो कद्दावर नेताओं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर और विधानमंडल के नेता लालजी वर्मा को पार्टी से निकाल दिया है। शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को नए विधायक दल का नेता चुना है।
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस अरुण मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आय़ोग का नया अध्यक्ष बनाया गया है। मिश्रा 20 सितंबर 2020 को रिटायर हुए थे। इसके बाद 31 मई 2021 को उन्हें पीएम मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन का चेयरमैन चुन लिया। और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद उन्होंने 2 जून को पदभार संभाल लिया है। आयोग का चेयरमैन होने के नाते उन्हें अब कैबिनेट मंत्री का दर्जा और सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन इस नियुक्ति को लेकर बवाल शुरू हो गया है और जनता की अदालत में जस्टिस मिश्रा का ट्रायल शुरू हो गया है। इस ट्रायल में जस्टिस मिश्रा पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। मिश्रा के खिलाफ खासतौर पर रिजर्वेशन के विरोध में काम करने, दलितों/आदिवासियों के हक का विरोधी होने, पूंजीपतियों के पक्ष में काम करने और न्यायपालिका में रहते हुए पक्षपात करने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
यूपी में 69 हजार शिक्षकों की भर्ती मामले में बहुजन समाज के साथ हुई धोखाधड़ी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। परिषदीय प्राइमरी स्कूलों के लिए निकली शिक्षकों की भर्तियों में बहुजन युवाओं को मिलने वाली नौकरी साजिश के तहत गैर आरक्षित वर्ग के युवाओं को दे देने की साजिश का भांडाफोड़ होने के बाद बहुजन बुद्धिजीवियों से लेकर बहुजन समाज के नेताओं ने योगी सरकार को जमकर घेरा है।
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में थाना कोतवाली की पुलिस ने गांव अभिया खुर्द के निवासी दलित समाज के बाबूलाल कोरी को महज इसलिए गिरफ्तार कर हवालात में डाल दिया, क्योंकि उन्होंने अपनी पोती की शादी के कार्ड में बाबासाहेब की उन 22 प्रतिज्ञाओं को प्रिंट करवा दिया था, जिसे सन् 1956 में बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अपने अनुयायियों को बौद्ध धर्म की दीक्षा देते हुए दिलवाई थी।
सवाल यह भी उठ रहा है कि ऐसी कहानियों से बने समाज के बीच जो महिलाएं अपने घरों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्णय लेती हैं, वह करोना महामारी में दवा और वैक्सीन को लेकर क्या मज़बूत निर्णय ले पायेंगी? हम इसकी पड़ताल करते है उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में, जहां हमने बात की नमिता द्विवेदी से, जो नंन्दौली गांव में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। इन दिनों बड़ी शिद्दत से कोरोना महामारी के लिए जागरूकता जगाने में जुटी हुई हैं। हमारे सवाल पूछे जाने में पर कि महिलाएं वैक्सीन के बारे में क्या सोचती है? बताती हैं- “महिला हो या पुरुष, वैक्सीन को लेकर लोगों की राय बटी हुई है। कुछ लोग कहते है कि वैक्सीन लगवा लेनी चाहिए, लेकिन अब भी बहुत से लोग वैक्सीन से घबरा रहे हैं। मुझे लगता है कि अभी लोग बहुत डरे हुए हैं। एक तो इस महामारी से और दूसरा वैक्सीन की अलग अलग कहानियों से। जब तक लोगो को ठीक से समझाया नही जायेगा, उन्हें इस पर पूरी तरह से भरोसा नही आयेगा। विशेषकर ग्रामीण महिलाएं जो सबसे अधिक अशिक्षित हैं, उनमें वैक्सीन को लेकर सबसे अधिक भ्रम और अंधविश्वास अपनी जड़े जमा चुका है। जिसे समाप्त करना बहुत आवश्यक और बड़ी चुनौती है।
बहरहाल वैज्ञानिक नज़रियों और अंधविश्वासों का झगड़ा तब तक चलता रहेगा जब तक देश के हर ग्रामीण इलाकों तक शिक्षा और सही सूचना नहीं पहुंच जाती है। जिस दिन ऐसा मुमकिन होगा, पूजा जैसी युवा गृहणी और नमिता जैसी जमीनी कार्यकर्ता के लिए समाज में निर्णय लेने की चुनौतियां समाप्त हो जाएंगी। लेकिन ऐसे परिवेश को तैयार करने के लिए हम सब को आगे आने की ज़रूरत है।
चुनाव से पहले सत्ताधारी पार्टी यूपी में कुछ बड़ा फैसला कर सकती है। साफ दिख रहा है कि विवादास्पद कारोबारी रामदेव से जुड़ा ताजा विवाद और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़े सरकारी कदमों से जुड़ी खबरों को सुचिंतित योजना के तहत उछाला गया है। टीवीपुरम् या मीडिया के अन्य हिस्सों के जरिये इसे इतना उछाला गया कि लोग टीकाकरण (वैक्सीनेशन) की सरकारी महा-विफलता को भूल जायं! उत्तर के हिंदी-भाषी राज्यों के गाँवों में कोरोना से हो रही बेतहाशा मौतों के बारे में खबरें दिखना बंद हो जायं। सामाजिक जीवन में उसकी चर्चा तक न हो। अखबार और चैनल लोगों की बीमारी, बेबसी और बेहाली की खबरें छापना-दिखाना बंद कर दें और हिंदी क्षेत्र में पारुल खख्खर जैसी कोई कविता भी न लिखे।
दिल्ली के तीन मुंसिपल कॉर्पोरेशनों के मरने वाले 95 कर्मचारियों में 49 सफाई कर्मचारी हैं, इनमें सिर्फ एक या दो को केजरीवाल द्वारा घोषित 1 करोड़ की क्षतिपूर्ति राशि मिली, शेष इसके लिए दर-दर भटक रहे हैं। दिल्ली के अमीरों- मध्यवर्गीय लोगों के घरों के कूड़ा उठाने वाले और उनकी गलियां-सड़के साफ करने वाले सफाई कर्मचारियों के बारे में मैं सुनता रहा हूं कि देखो इन लोगों को कोरोना नहीं होता, इनका इम्युन सिस्टम इतना मजबूत है कि इनको कुछ नहीं होता।
अंबेडकरवादी समाज हमेशा से ‘पे बैक टू सोसाइटी’ के रास्ते पर चलता है। कोविड के दौर में यह समाज एक बार फिर से सामने आया है। दिल्ली में अंबेडकरवादी संगठनों ने मिलकर जय भीम कोविड आइसोलेशन सेंटर बनाया है, जहां कोरोना से जूझ रहे गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज किया जा रहा है। खास बात यह है कि यहां ऑक्सीजन समेत सभी जरूरी सुविधाएं मौजूद है।
कोविड के दौर में जब देश के लोगों को एक-दूसरे के मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, अंबेडकरवादी और बुद्धिस्ट संगठनों का इस तरह समाज को मेडिकल सहायता देना एक बड़ा कदम है, और अंबेडकरी आंदोलन के सबसे बड़े मंत्र ‘पे बैक टू सोसाइटी’ का एक बेहतर उदाहरण है।
रमाबाई के परिनिर्वाण दिवस (27 मई) पर उनको सादर नमन
डॉ. आंबेडकर रमाबाई के व्यक्तित्व का कितना ऊंचा मूल्यांकन करते थे, इसका अंदाज इन शब्दों से लगाया जा सकता है- “उसके सुन्दर हृदय, उदात्त चेतना, शुद्ध चरित्र व असीम धैर्य और मेरे साथ कष्ट भोगने की उस तत्परता के लिए, जो उसने उस दौर में प्रदर्शित की, जब हम मित्र-विहीन थे और चिंताओं और वंचनाओं के बीच जीने को मजबूर थे। इस सबके लिए मेरे आभार के प्रतीक के रूप में।”
जब आंबेडकर ने रमाबाई को लंदन से लिखा, दाने-दाने को हूं मोहताज
ऐसे दौर उनके जीवन में कई बार आए। पहली बार तब जब आंबेडकर 1920 में दूसरी बार अध्ययन के लिए इंग्लैंड गए। जाने के पहले उन्होंने रमाबाई को घर का खर्च चलाने के लिए जो रकम दी थी, वह बहुत कम थी और बहुत ही जल्दी खर्च हो गई। उसके बाद उनका घर का खर्च रमाबाई के भाई-बहन की मजदूरी से चला। रमाबाई के भाई शंकरराव और छोटी-बहन मीराबाई-दोनों छोटी-मोटी मजूरी कर तक़रीबन आठ-दस आने (50-60 पैसे) रोज कमा पाते थे। उसी में रमाबाई बाजार से किराना सामान खरीद कर लातीं और रसोई पकाकर सबका पेट पालती थीं। इस तरह मुसीबत के ये दिन उन्होंने बड़ी तंगी में बिताए। कभी-कभी उनके परिवार के सदस्य आधे पेट खाकर ही सोते, तो कभी भूखे पेट ही। (वंसत मून, 1991 पृ.25)
कई मूवी रिव्यू पढ़ने और देखने के बाद कल रात कर्णन मूवी देखी। शुरू करने से पहले बॉलीवुड के अभिनेता, अभिनेत्रियों, निर्देशक, प्रोड्यूसर, स्क्रिप्ट राइटर, म्यूजिक आर्टिस्ट व फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े तमाम लोगों से एक आग्रह है कि वो अपने कीमती समय में से ढाई घंटे निकालकर एमेजॉन प्राइम पर कर्णन मूवी जरूर देखें ताकि पता चले कि इन विषयों पर भी स्क्रिप्ट लिखी जा सकती है, म्यूजिक बनाए जा सकते हैं, डायलॉग लिखे जा सकते हैं। बॉलीवुड को चलाने वाले कुछ चालाक दिमाग मे एक नेरेटिव गढ़ा हुआ है कि किसी भी फिल्म में मुख्य किरदार या तो दलित न हो यदि एक दो फिल्म में किसी दलित, वंचित को मुख्य किरदार में दिखाया भी जाए तो इतना दरिद्र, हीन, मूक बना देते हैं ताकि शान से रह रहे बहुजनों को भी यह देख कर शर्म आए। बॉलीवुड के दलित किरदार इतने गूंगे क्यों होते हैं? बॉलीवुड की फिल्में बहुजनों के जीवन पर कभी नहीं बनती, उनके ब्याह शादी, पहनावा, खान पान, काम धंधा, रहने सहने का तरीक़ा आदि पर कभी फिल्में नहीं बनती।
फिल्म में पढ़ाई को लेकर भी अच्छा संदेश डाला गया है। एक बहुजन युवा व इस फिल्म का मुख्य किरदार सीआरपीएफ में भर्ती हो जाता है। ज्वाइनिंग लेटर देखते ही सारे गांव वाले खुशी के मारे झूम उठते हैं। उन सबको विश्वास है कि यही हमारे लिए कुछ अच्छा कर सकता है।
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध के सबसे पुराने और सबसे शातिर दुश्मनों को आप आसानी से पहचान सकते हैं। यह दिन बहुत ख़ास है इस दिन आँखें खोलकर चारों तरफ देखिये। बुद्ध की मूल शिक्षाओं को नष्ट करके उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बकवास भरने वाले बाबाओं को आप काम करता हुआ आसानी से देख सकेंगे।
आजकल आप किसी भी बाबाजी के पंडाल या ध्यान केंद्र में चले जाइए। या यहीं फेसबुक पर ध्यान की बकवास पिलाने वालों को देख लीजिये। वे कृष्ण और बुद्ध को एक ही सांस में पढ़ाते हैं, ये गजब का अनुलोम विलोम है। जबकि इनमे थोड़ी भी बुद्धि हो तो समझ आ जाएगा कि बुद्ध आत्मा को नकारते हैं और कृष्ण आत्मा को सनातन बताते हैं, कृष्ण और बुद्ध दो विपरीत छोर हैं।