इस शहर में बाबासाहेब के कदम पड़े तो अम्बेडकरवादियों ने बना डाला अम्बेडकर भवन

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 पंजाब के जालंधर शहर में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर साल 1951 के अक्टूबर महीने में आए थे। पंजाब के अम्बेडकरवादियों ने पंजाब की इस भूमि को अपने लिए पवित्र माना और जिस जगह बाबासाहेब आंबेडकर आए थे, वहां अम्बेडकर भवन बना दिया। जानिए, इसकी पूरी कहानी-

 

पंजाब के बसपा प्रदेश अध्यक्ष का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

पंजाब में साल 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव में बसपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन हुआ है। बहुजन समाज पार्टी ने खुद को चुनाव में झोंक दिया है और पार्टी कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के पदाधिकारी तक सभी बसपा-अकाली गठबंधन को जीताने के लिए दिन रात लगे हैं। दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने पंजाब बसपा के अध्यक्ष जसवीर सिंह गढ़ी का इंटरव्यू लिया। आप भी देखिए, क्या कह रहे हैं बसपा के पंजाब प्रदेश अध्यक्ष-

 

बाबासाहेब ने किया था पंजाब में तीन दिन का एतिहासिक दौरा, जानिए पूरी कहानी

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बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने सन् 1951 के अक्टूबर महीने में तीनदिवसीय पंजाब का दौरा किया। वह राजनैतिक दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने तीन शहरों में भाषण दिया, जहां लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। क्या है वो कहानी, देखिए इस वीडियो में-

दलित-आदिवासी साहित्य और साहित्यकारों से दिल्ली विश्वविद्यालय को क्यों है चिढ़?

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चाहे सरकार हो या संस्थान, जब सत्ता बदलती है तो व्यवस्था के रंग भी बदलने लगते हैं। सत्ताधारी हर चीज अपने हिसाब से चलाना चाहता है, फिर चाहे वह सही हो या फिर गलत। दिल्ली युनिवर्सिटी ने हाल ही में एक ऐसा फैसला लिया है, जिससे एकेडमिक जगत में हंगामा खड़ा हो गया है। बुद्धिजीवि वर्ग दिल्ली विश्वविद्यालय को लानत भेज रहा है। हुआ यह है कि डीयू की ओवरसाइट कमेटी ने जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी की शार्ट स्टोरी को अंग्रेजी के सिलेबस से हटा दिया गया है। इसके साथ ही दलित समाज के भी दो लेखकों की रचनाओं को सिलेबस से हटा दिया गया है। ओवरसीज कमेटी (ओसी) निगरानी समिति ने जिन दो दलित लेखकों की रचनाओं को सिलेबस से हटाया है, उनके नाम बामा और सुखरथारिनी हैं, जबकि इनकी जगह “उच्च जाति की लेखिका रमाबाई” की रचनाओं को शामिल किया गया है। जबकि महाश्वेता देवी की जिस रचना को सिलेबस से हटाया गया है, उस रचना का नाम द्रौपदी है, जो कि एक आदिवासी महिला की कहानी है। यह स्टोरी सिलेबस में 1999 से ही पढ़ाई जा रही थी।

बुधवार 25 अगस्त को एकेडमिक काउंसिल की हुई मीटिंग में काउंसिल के 15 सदस्यों ने इसको लेकर अपना विरोध दर्ज कराया है। इन सदस्यों ने ओवरसीज कमेटी के काम करने के तरीके पर असहमति दर्ज कराई। साथ ही आरोप लगाया है कि सेमेस्टर फाइव में अंग्रेजी पाठ्यक्रमों को लेकर काफी बर्बरता बरती गई है। एकेडमिक काउंसिल के सदस्यों ने आरोप लगाया कि अचानक ही अंग्रेजी विभाग को इन लेखकों की रचनाओं को हटाने को कहा और इसकी कोई वजह भी नहीं बताई। ऐसा तब है जब महाश्वेता देवी को साहित्य एकेडमी अवार्ड, ज्ञानपीठ अवार्ड औऱ पद्म विभूषण अवार्ड मिल चुका है।

 एकेडमिक काउंसिल के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि ओसी यानी निगरानी समिति ने हमेशा से दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और यौन अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के खिलाफ पूर्वाग्रह दिखाया है। पाठ्यक्रम से ऐसी सभी आवाजों को हटाने के ओवरसीज कमेटी के प्रयासों से यह स्पष्ट है। दरअसल ओवरसीज कमेटी में दलित या आदिवासी समुदाय से कोई सदस्य नहीं है। जो इस मुद्दे पर कुछ संवेदनशीलता ला सकते हैं।

इस पूरे विवाद पर ओसी यानी ओवरसीज कमेटी के अध्यक्ष एम के पंडित का तर्क है कि जब भी पाठ्यक्रमों में से कुछ हटता है तो हमेशा असहमति होती है। यह एक प्रक्रिया है। हमारे यहां सिर्फ एक लेखक नहीं है; ऐसे कई लेखक हैं जिन्हें पढ़ाया जाना चाहिए। जातिवाद के आरोपों पर उन्होंने कहा कि “मैं लेखकों की जाति नहीं जानता। मैं जातिवाद में विश्वास नहीं करता। मैं भारतीयों को अलग-अलग जातियों के रूप में नहीं देखता।”

निश्चित तौर पर एम के पंडित से इसी तर्क की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि न तो वह भेदभाव के आरोप को स्वीकार करेंगे, और न ही जातिवाद के, लेकिन एकेडमिक काउंसिल के जिन 15 सदस्यों ने यह तमाम आरोप लगाए हैं, आखिर उसे कैसे खारिज किया जा सकता है? एम के पंडित चाहें जो कहें, दलित-पिछड़े समाज को लेकर दिल्ली युनिवर्सिटी का जातिवादी रवैया कई मौकों पर सामने आ चुका है। दिल्ली युनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर दलित समाज के प्रोफेसर श्योराज सिंह बेचैन की नियुक्ति को लेकर दलित समाज को आंदोलन तक करना पड़ा था। यह तब था जब वो इस पद के सही हकदार थे। सवाल है कि आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय को दलित शोषित समाज के शिक्षकों और उनके विषयों को उठाने वाले पाठ्यक्रम से क्या दिक्कत है?

पुरातत्व विभाग को मिला वह स्तूप, जिसमें बुद्ध की चिता की लकड़ी की राख को रखा गया था

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से सटा चौरी चौरा का नाम अपने आंदोलन के लिए इतिहास में दर्ज है। बुद्ध की परिनिर्वाण भूमि कुशीनगर के समीप यह ऐसा क्षेत्र है, जहां बुद्ध ने अपने का आखिरी वक्त बिताया। ताजा खबर यह है कि स्थानीय पुरातत्व विभाग ने हाल ही में किये अपने सर्वे में उस स्तूप को ढूंढ़ निकाला है, जिसमें भगवान बुद्ध की चिता की लकड़ी की राख को रखा गया था। दरअसल पुरातत्व विभाग के सर्वे में बुधवार 25 अगस्त को तहसील क्षेत्र के ब्रह्मपुर ब्लॉकके गोरसैरा गांव में 2 हजार साल पुराना स्तूप मिला है।

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी नरसिंह त्यागी व उनकी टीम ने यह सर्वे किया, जिसमें यह ऐतिहासिक स्तूप सामने आया। पुरातत्व अधिकारियों के मुताबिक यह कुषाण कालीन है। पुरातत्व अधिकारियों का दावा है कि सर्वे में मिला स्तूप भगवान बुद्ध के उस प्रसिद्ध स्तूप का शेष है, जिसमें बुद्ध की चिता की राख को रखा गया था।

पुरातत्व अधिकारियों का कहना है कि बाद में हिन्दू धर्मावलंबियों ने तेरहवीं शताब्दी के आसपास इस स्तूप के ऊपर शिव मंदिर का निर्माण करा दिया। यहीं एक और स्तूप भी है, उस पर भी लाल बलुए प्रस्तर पर निर्मित शिवलिंग स्थापित कर दिया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक ब्रह्मपुर क्षेत्र के कुछ गाँव पुरातात्विक महत्व से जुड़े हुए हैं।

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फोटो क्रेडिट- हिन्दुस्तान, न्यूज सोर्स- लाइव हिन्दुस्तान.कॉम

दलित समाज की बेटी बनी मिस इंडिया

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 इंदौर की मूक बधिर छात्रा वर्षा डोंगरे ने ‘मिस इंडिया अवार्ड’ हासिल कर कीर्तिमान रच दिया है। 5 अगस्त को उत्तरप्रदेश के आगरा में आयोजित सामान्य प्रतिभागियों की ‘स्टार लाइन मिस इंडिया कांटेस्ट’ में एक हजार प्रतियोगी को पीछे छोड़ते हुए वर्षा ने यह अवार्ड हासिल किया। इस उपलब्धि के बाद से ही वर्षा डोंगरे का नाम चर्चा है। वर्षा की यह जीत कई मायने में अनोखी है। दरअसल वर्षा बचपन से ही मूक-बधिर हैं। यानी वह बोल और सुन नहीं सकती। इस आयोजन में वर्षा अकेली ऐसी मूक बधिर थी, जो सामान्य प्रतियोगियों में शामिल हुई थी। वर्षा की सफलता ने एक इतिहास रच दिया है। वर्षा इससे पहले मूक बधिरों का मिस एमपी अवार्ड जीत चुकी हैं। एक खास बात यह भी है कि वर्षा दलित समाज की बेटी हैं।

हालांकि वर्षा की इस सफलता पर मनुवादी मीडिया में सन्नाटा पसरा है। सोशल मीडिया पर बहुजन समाज द्वारा संचालित यू-ट्यूबर्स और वेबसाइट में तो वर्षा छाई रहीं, लेकिन एक मूक-बधिर लड़की की ऐतिहासिक सफलता पर कथित मुख्यधारा की मीडिया को जितना जश्न मनाना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। हालांकि वर्षा के सपने आसमान जैसे ऊंचे हैं। वर्षा फिलहाल बीकॉम सेकंड ईयर में पढ़ रही हैं।

वर्षा की यह सफलता आसान नहीं रही। वर्षा इस मुकाम तक बहुत मुश्किल और संघर्ष से पहुंची है। वर्षा के माता-पिता और बहन भी मूक बधिर हैं। इस कारण वर्षा की परवरिश आम बच्चों जैसी नहीं हुई। बल्कि मुश्किलों ने बचपन में ही वर्षा का दामन थाम लिया था। वर्षा ने इन मुश्किलों से घबराने की बजाय, इनसे दोस्ती कर ली और अपनी जीवटता से इस मकाम को हासिल करने में सफल रही।

वर्षा की जीवटता और अपने लक्ष्य के प्रति जिद्दी होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्षा ने 13 अगस्त को ‘विश्व अंगदान दिवस’ के मौके पर मृत्यु पश्चात अंगदान देने की घोषणा की है। वर्षा कहना है, भले ही मैं मूक-बधिर हूं, लेकिन मेरी मौत के बाद मेरी किडनी, आंखें व अन्य अंग किसी के काम आ सकें, इससे बड़ी दौलत मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकती।

मिस इंडिया बनने के बाद वर्षा का सपना ‘मिस यूनिवर्स’ बनने का है। खबर है कि इंदौर के कलेक्टर ने वर्षा को भरोसा दिलाया है कि ‘मिस यूनिवर्स’ की तैयारी के लिए उसे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा मदद की जाएगी। तो वहीं वर्षा के परिवार ने उसके ‘मिस यूनिवर्स’ की तैयारियों के लिए लोगों से अपील की `है कि वे उसे आर्थिक मदद करें।

जानिए कौन थी डॉ. गेल ओमवेट, जिनकी मृत्यु पर शोक मना रहा है बहुजन समाज

 डॉ. गेल ओमवेट (Dr. Gail Omvedt) नहीं रहीं। आज 25 अगस्त को उनका परिनिर्वाण हो गया। 81 साल की उम्र में महाराष्ट्र के कासेगांव में उनका निधन हुआ, जहां वह अपने पति भरत पाटंकर और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहती थीं। गेल ओमवेट के निधन के बाद यूं तो देश भर में उदासी है, और तमाम आम और खास लोगों ने उन्हें याद किया है, लेकिन दलित-बहुजन समाज और आंबेडकरी-फुले मूवमेंट से जुड़े लोगों के लिए गेल ओमवेट का जाना एक बड़े झटके की तरह है।

इसकी एक जायज वजह भी है। अमेरिका में जन्मी अमेरिकी नागरिक गेल ओमवेट 1978 के दौर में एक शोध के सिलसिले में भारत आईं। फुले-अम्बेडकरी विचारधारा ने उनपर इतना प्रभाव डाला कि फिर वो यहीं की होकर रह गईं। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एक भारतीय नागरिक और यहां के दलित-उत्पीडित लोगों की आवाज उठाने वाली एक विदुषी के रूप मे जिया। उन्होंने दलितों, आदिवासियों के हक में मजबूती से आवाज उठाई। स्त्री मुक्ति आंदोलन और श्रमिक आंदोलन में सक्रिय रहीं। उन्होंने बुद्ध, फुले, आंबेडकर, मार्क्स और स्त्री मुक्तिवादि विचारक और संतों के विचार को एक साथ जिया।

उन्होंने न सिर्फ भारत के वंचितों और पीड़ितों के पक्ष में अपनी शोधपरक पुस्तकों के जरिए उनके आंदोलन और उनकी बातों को दुनिया भर में पहुंचाया, बल्कि जरूरत पड़ी तो सड़क पर उनके साथ खड़ी हुईं। उन्हें एक शोधार्थी और शानदार लेखक के रूप में भी याद किया जाएगा। एक ऐसी लेखक, जिनकी कलम ने भारत के शोषितों के दर्द को आवाज दी।

2 अगस्त 1941 को अमेरिका के मिनीपोलिस-मिनेसोटा शहर में जन्मी गेल ओमवेट ने कैलिफोर्निया स्थिति बर्कले विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पीएचडी की उपाधि ली। इसके बाद ही वो एक शोध के लिए भारत आ गई थीं, जिसके बाद भारत ने उन्हें और उन्होंने भारत को अपना लिया। उन्होंने भारत के महाराष्ट्र राज्य को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना। उन्होंने बाक़ायदा भारत की नागरिकता ली और उस समय अपनी एम.डी. की पढ़ाई छोड़ कर सामाजिक कार्य करने वाले डॉ. भरत पाटणकर से प्रेम विवाह किया।

डॉ. गेल की तकरीबन 25 से अधिक किताबे प्रकाशित हो चुकी है। बहुजन आंदोलन की दृष्टि से देखें तो उनके द्वारा लिखी गई महत्वपूर्ण पुस्तकों में- ‘कल्चरल रीवोल्ट इन कोलोनियल सोसायटी- द नॉन ब्राम्हीण मूवमेंट इन वेस्टर्न इंडिया’, ‘सिकिंग बेगमपुरा’, ‘बुद्धिज़म इन इंडिया’, ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’, ‘महात्मा जोतीबा फुले’, ‘दलित एंड द डेमोक्रेटिक रिव्ह्यूलेशन’, ‘अंडरस्टँडिंग कास्ट’, ‘वुई विल स्मॅश दी प्रिझन’, ‘न्यू सोशल मूवमेंट इन इंडिया आदि का नाम शामिल है।

उन्होंने भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया भी, तो लगातार शोध पत्र और लेखों के जरिए दुनिया से संवाद करती रहीं। गेल ओमवेट की शख्सियत को ज्यादा समझने के लिए बेहतर है कि हम उन लोगों की भावनाओं को देखें, जिन्होंने गेल ओमवेट के निधन के बाद उन्हें याद करते हुए उनको श्रद्धांजली दी है-

महाराष्ट्र के नागपुर से चलने वाले महत्वपूर्ण मीडिया संस्थान, आवाज इंडिया के अमन कांबले ने गेल ओमवेट को याद करते हुए लिखा-

डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों से प्रभावित होकर, भारत में बहुजन, बौद्ध, श्रमिक और नारीवाद आंदोलन की इतिहास लेखक, हम सबकी बेहद प्रिय, प्रखर चिंतक, विचारक, ज्ञानवंत, मान्यवर कांशीराम की वैचारिक सहयोगी प्रोफ़ेसर गेल ऑम्वेट नहीं रहीं। नमन।

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने उन्हें याद करते हुए लिखा- कुछ ही देर पहले दुखी करने वाली यह बुरी खबर मिली। प्रख्यात लेखिका गेल ओमवेट (Gail Omvedt) नहीं रहीं। महाराष्ट्र के कासेगांव में उनका निधन हुआ, जहां वह अपने पति भरत पाटंकर और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सन् 1978 से ही रहती थीं।

गेल का जन्म भले अमेरिका में हुआ था पर उन्होंने जीवन का बडा हिस्सा एक भारतीय नागरिक और यहां के दलित-उत्पीडित लोगों की आवाज उठाने वाली एक विदुषी के रूप मे जिया! उन्होने बर्कले से समाजशास्त्र में पीएचडी किया। एक शोध अध्ययन के सिलसिले में वह भारत आई और फिर यहीं की होकर रह गयीं। अपनी कई शोधपरक पुस्तकों के जरिये उन्होने प्रबुद्ध, लोकतांत्रिक और समावेशी होने की कोशिश करते भारत की तलाश की है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें जो इस वक्त याद आ रही हैं- दलित एन्ड डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन, अंडरस्टैन्डिग कास्ट: फ्राम बुद्ध टू अम्बेडकर एन्ड बियान्ड और अम्बेडकर: टुवर्ड्स एन इनलाटेन्ड इंडिया। उनको पढ़ने का मेरा सिलसिला तो काफी पहले शुरू हुआ लेकिन उनसे मुलाकात और निजी परिचय बहुत बाद में हुआ। कुछ साल पहले एक संगोष्ठी में हम दोनों ने एक ही मंच के एक ही सत्र में अपनी-अपनी बात रखी। गेल की मौलिकता और सहजता से मैं प्रभावित था। एक मौलिक समाजशास्त्री और उत्पीड़ित व वंचित समाज की पक्षधर लेखिका के तौर पर गेल हमेशा याद की जायेंगी। उनके जीवनसाथी भरत पाटंकर और बेटी प्राची पाटंकर के प्रति हमारी शोक संवेदना। सलाम और श्रद्धांजलि गेल ओमवेट!

वरिष्ठ लेखक, चिंतक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के एच.एल. दुसाध ने गेल ओमवेट को याद करते हुए लिखा- बहुत ही स्तब्धकारी खबर। बहुजन चिंतन के दुनिया की विराट क्षति। मैडम गेल जैसा सॉलिड और मौलिक चिंतन बहुजन वर्ल्ड में शायद किसी ने किया हो। वह जितनी आला दर्जे की थिंकर थीं, उतनी ही जिंदादिल महिला भी थीं। उनसे मिलने पर जीवन के प्रति उत्साह का नया संचार होता था। उन जैसी विदुषी को भूलना मुश्किल है!

ट्रूथ सिकर्स के सुनील सरदार ने उन्हें याद करते हुए लिखा – Dear sister Dr. Gail Omvedt went to Begumpura. We are thankful for her life and works of reconciliation. Her life is testimony of sacrificial life of purpose. We will miss her here in this side of eternity. Jay Bheem!! Jay Joti, Jay Baliraj. Sauté and goodbye Gail. See you soon.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा- भारत में बहुजन, बौद्ध, श्रमिक और नारीवाद आंदोलन की इतिहास लेखक, हम सबकी बेहद प्रिय, प्रखर चिंतक, विचारक, ज्ञानवंत, मान्यवर कांशीराम की वैचारिक सहयोगी प्रोफ़ेसर गेल आम्वेट नहीं रहीं। नमन। आपकी लिखी बीसियों किताबें आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करती रहेंगी। मेरे लिए यह निजी क्षति है। मैंने जिनसे सबसे ज़्यादा सीखा, उनमें प्रो. ऑम्वेट प्रमुख हैं। अलविदा प्रोफ़ेसर!

पेशे से राजनीतिक विज्ञान की प्रोफेसर सीमा प्रकाश, जिन्होंने शोध के दौरान गेल ऑम्वहेट को पढ़ा है, उनको याद करते हुए लिखा है- डॉ. अम्बेडकर के आंदोलन पर शोध के दौरान जिन विद्वानों की पुस्तकों को पढ़ने का अवसर मिला उनमें गेल ओमवेट की कृतियों ने अपने सरल एवं स्वाभाविक वैचारिक प्रवाह से सर्वाधिक प्रभावित किया। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के सपनों के भारत को प्रबुद्ध भारत के स्वप्न के रूप में दर्शाते हुए इसका संबंध बौद्ध धर्म की वैचारिक परम्परा और कबीर एवं रैदास के आदर्श समाज की कल्पनाओं से जोड़ा। एक महान विदुषी को हार्दिक श्रद्धांजलि एवं नमन।


नोट- इस खबर में ऊपर का हिस्सा चैतन्य दलवी की पोस्ट का सरसरी तौर पर अनुवाद एवं संपादित हिस्सा है। जबकि नीचे का हिस्सा सोशल मीडिया से लिया गया है।

 जाति जनगणना पर पीएम मोदी से मिले बिहार के बहुजन नेता, जानिए क्या हुई बात

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 पिछले करीब एक दशक से जातिगत जनगणना की मांग काफी तेज हुई है। खासकर ओबीसी की जातियां इस मुद्दे पर ज्यादा मुखर हैं। लेकिन केंद्र सरकार लगातार जाति जनगणना के सवाल पर या तो चुप्पी साधे है या फिर इस सवाल को ही टालने में जुटी रही। हालांकि अब जाति जनगणना के सवाल को टालना संभव होता नहीं दिख रहा है। इस मद्दे पर बिहार के 10 राजनीतिक दलों के 11 नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर अपनी बात रखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में हुई यह मुलाकात करीब 40 मिनट से ज्यादा चली। खास बात यह रही कि मोदी से मिलने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव तक शामिल रहे।

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 बैठक के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि- बिहार की सभी राजनीतिक पार्टियों का जातिगत जनगणना को लेकर एक मत है। हम सभी ने प्रधानमंत्री से इसकी मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार के एक मंत्री का बयान आया था कि जाति के आधार पर जनगणना नहीं होगी। इसलिए हम सभी ने प्रधानमंत्री से मिलकर बात की। उन्होंने हमारी पूरी बात सुनी, उन्हें हर पहलू से अवगत कराया गया है।

राजद नेता तेजस्वी यादव भी पीएम मोदी से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि- जातियों को ओबीसी में शामिल करने का हक राज्य सरकारों को दे दिया गया है, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि, हमारे पास कोई आंकड़े ही नहीं हैं। जातिगत जनगणना राष्ट्रहित में ऐतिहासिक काम होगा। एक बार आंकड़े सामने आ जाएंगे तो सरकारें उसके हिसाब से कल्याणकारी योजनाओं को भी लागू कर पाएंगी। मंडल कमीशन के बाद पता चला कि हजारों जातियां देश में मौजूद हैं। जब पेड़ और जानवरों की गिनती होती है तो जातीय सेन्सस क्यों नहीं हो? जब धर्म पर सेन्सस होता है तो जाति पर क्यों नहीं?

देश में 1931 में पहली बार जातिगत जनगणना हुई थी। इसके बाद 2011 में ऐसी ही जनगणना करवाई गई, लेकिन सरकार की ओर से इसके आंकड़े जारी नहीं किए गए। लेकिन अब केंद्र पर इसको लेकर काफी दबाव है। बिहार विधानसभा में दो बार जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास हो चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी से मिलने जाने वाले नेताओं में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी, भाजपा नेता एवं मंत्री जनक राम, वीआईपी मुकेश सहनी, कांग्रेस नेता अजीत शर्मा, सीपीआई विधायक सूर्यकांत पासवान, सीपीएम विधायक अजय कुमार, भाकपा माले विधायक महबूब आलम और एआईएमआईएम विधायक अख्तरूल इमान शामिल थे। यानी साफ है कि जाति जनगणना के सवाल पर अब बिहार पीछे हटने वाला नहीं है। बिहार के दलित-पिछड़े समाज के नेताओं की यह एकता निश्चित तौर पर जाति जनगणना के मामले में निर्णायक साबित होगी।

(फोटो साभार- गूगल)

भाजपा का मिशन यूपीः ध्रुवीकरण, लालच और नए वादे

 उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के लिए प्रदेश के करोड़ों युवाओं को नौकरी देने का लालच देने वाले योगी आदित्यनाथ 2022 का चुनाव सामने देखकर एक बार फिर जागे हैं। 19 अगस्त को विधानमंडल के मानसून सत्र के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ कई घोषणाएं कर के यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपना एजेंडा लगभग घोषित कर दिया। योगी आदित्यनाथ ने जो लोकलुभावन घोषणाएं की है, उसमें हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण, युवाओं और कर्मचारी वर्ग को लुभाने की कोशिश, और दलितों को लालच देकर सत्ता में वापसी करने की राह बना रही है।

हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए भाजपा उत्तर प्रदेश के तीन जिलों जो मुस्लिम बहुल आबादी वाले हैं, उनका नाम बदलने की तैयारी में है। फ़िरोज़ाबाद का नाम चंद्रनगर, अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ और मैनपुरी का नाम मयन नगरी करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री ऑफिस भेजा जा चुका है। अब मुख्यमंत्री योगी को इस मामले में आख़िरी फ़ैसला लेना है, जो कि निश्चित है कि वह सही समय देख कर ले ही लेंगे।

 इसी तरह 2022 के चुनाव को देखते हुए युवाओं को साधने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक करोड़ युवाओं को टैबलेट या स्मार्ट फोन देने की बात कही। हालांकि वो युवा कौन होंगे और उनको कैसे चिन्हित किया जाएगा, यह अभी नहीं बताया गया है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब देश कोविड से जूझ रहा था और बच्चे ऑनलाइन क्लासेज कर रहे थे और उन्हें स्मार्ट फोन की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब योगीजी को स्मार्ट फोन बांटने का ख्याल क्यों नहीं आया? अब, जब इसी सरकार ने स्कूल खोलने की घोषणा कर दी है, और चुनाव सामने है, तो इस योजना का कोई मतलब नहीं है। यह सीधे तौर पर युवाओं को लालच देने जैसा है। राज्य के 16 लाख कर्मचारियों और 12 लाख पेंशनरों को 11 फीसदी महंगाई भत्ता और महंगाई राहत देने की घोषणा भी ऐसी ही है।

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 एक बड़ी चुनावी घोषणा करते हुए सीएम योगी ने माफियाओं से जब्‍त जमीन पर दलितों-गरीबों के लिए मकान बनवाने की घोषणा की। योगी के मुताबिक सरकार ने माफियाओं की 1500 करोड़ रुपए की सम्‍पत्तियां जब्‍त कर ली हैं और इसी जमीन पर वैसे गरीबों और दलितों के लिए मकान बनवाने की बात कही है, जिनके पास रहने के लिए घर नहीं है।

अब सवाल यह है कि जब उत्तर प्रदेश चुनाव की दहलीज पर खड़ा है, और तीन से चार महीने बाद कभी भी आचार संहिता लागू हो सकती है, योगी एक करोड़ युवाओं को टैबलेट और स्मार्ट फोन कब बाटेंगे? क्या योगी, माफियाओं की जमीन पर दलितों और गरीबों को इन चार महीनों में पक्का मकान बनवाकर दे देंगे?

जब योगी आदित्यनाथ प्रदेश की जनता को लुभा रहे थे, उस दौरान उन्होंने अपने काम भी गिनवाएं। सीएम योगी अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे धार्मिक स्थलों पर हुए विकास कार्यों को गिनवाते रहें। लेकिन यूपी के 75 जिलों में क्या सिर्फ तीन जिलों का ही विकास होना था? और वो भी सिर्फ धार्मिक विकास? योगी आदित्यनाथ ने पांच करोड़ युवाओं को नौकरी देने का जो वादा किया था, वह वादा कहां गया?

इसी तरह  सरकार ने क़रीब 86 लाख लघु और सीमांत किसानों के 36 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की। सरकार की इस घोषणा के बाद तमाम किसानों के कर्ज़ माफ़ ज़रूर हुए लेकिन लाखों रुपये के बकाए किसानों के जब दो रुपये और चार रुपये के कर्ज़ माफ़ी के प्रमाण पत्र मिलने लगे तो बैंकों के इस गणितीय ज्ञान ने किसानों को हैरान कर दिया। ऐसे किसानों ने बैंकों से लेकर सरकार तक न जाने कितने चक्कर लगाए लेकिन बैंकों की गणित को वो झुठला नहीं पाए।

दरअसल योगी सरकार ने ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जो आम आदमी के लिए हो। प्रदेश में जिस उज्जवला योजना और सस्ता अन्न योजना का थोड़ा-बहुत लाभ गरीब जनता को मिला भी है, वो केंद्र सरकार की योजना है, न कि योगी सरकार की। इसमें भी सिलेंडर के बढ़ते दामों के कारण उज्जवला योजना की हवा निकल चुकी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि विकास के नाम पर चार साल से ज्यादा समय तक चुप्पी साधने के बाद योगी आदित्यनाथ ने जो घोषणाएं की है, उस पर प्रदेश की जनता आखिर यकीन करे तो कैसे करें?

अफगानिस्तान, तालिबान और बुद्ध

अफगानिस्तान के कण-कण में कभी बुद्ध की प्रेम, करुणा व मैत्री की वाणी गूंजती थी। सुख, समृद्धि और खुशहाली थी। अफगानिस्तान प्रागैतिहासिक काल (prehistoric era) से भारत का अंग रहा है। आज का अफगानिस्तान भी सांस्कृतिक तौर से भारत के बहुत करीब है। गौतम बुद्ध के समय में अफगानिस्तान राजा दारयोपहु के साम्राज्य का अंग था और ‘गंधार’ कहलाता था। पेशावर (प्राचीन पुरुषपुर) गंधार का प्रमुख नगर रहा है। तक्षशिला (रावलपिंडी) पहले पूर्वी गंधार की राजधानी थी। गंधार एक समय रावलपिंडी से लेकर हिंदूकुश पर्वतमाला तक फैला हुआ था।

तक्षशिला बुद्ध के समय में विद्या व व्यापार का बड़ा केंद्र था और उसका उत्तरी भारत से बहुत घनिष्ठ संबंध था। राजा पोक्कसाति ने जब बुद्ध की महिमा व यश सुना तो वह अपना राज-पाट छोड़कर तक्षशिला से बुद्ध के पास मगध में आए और भिक्षु बनकर मानव कल्याण का मार्ग अपनाया। बुद्ध का संदेश उनके जीवन काल में ही गंधार पहुंच गया था और उनके महापरिनिर्वाण के बाद तो खूब फला फूला। बुद्ध के ढाई सौ साल बाद सम्राट अशोक ने जम्बूद्वीप के अपने विशाल साम्राज्य में 84 हजार स्तूप बनवाए थे, उनमें से एक स्तूप तक्षशिला में था। अशोक महान ने बुद्ध वाणी के प्रचार के लिए विश्व के कई देशों में धम्मदूत भेजे थे। वरिष्ठ भिक्षु मध्यान्तक के नेतृत्व में कई विद्वानों को गंधार व कश्मीर भेजा था।

मौर्य काल व बाद में कश्मीर और गंधार बुद्ध की मानव कल्याणकारी शिक्षा, कला और व्यापार के प्रमुख केंद्र बन गए थे। ग्रीक और शक समुदायों को भारतीय संस्कृति की शिक्षा देने में सबसे बड़ा योगदान गंधार के बौद्ध भिक्षुओं का ही था। सम्राट कनिष्क के समय तो अफगानिस्तान बुद्ध धम्म और संघ का महान सिंहासन था। उन्होंने उस भू-भाग पर बुद्ध की शिक्षाओं का बहुत प्रचार करवाया। गंधार पहले ईरान फिर ग्रीक संस्कृति की सीमा पर पड़ता था इसलिए गंधार को अलग- अलग संस्कृतियों के मिश्रण से नई संस्कृति को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी के परिणाम स्वरूप इंडो-ग्रीक शिल्प मूर्तिकला का जन्म हुआ और इसी गंधार शैली की बुद्ध प्रतिमाएं व चित्रकला विश्वविख्यात हुई।

 गंधार ने असंग और वसुबंधु जैसे बौद्ध दर्शन के महान विचारक व दार्शनिक दिए। दिग्नाग के गुरु वसुबंधु यही के थे जिन्होंने न्याय शास्त्र के प्रथम ग्रंथों को लिखा। ईसा से दो सौ साल पहले से एक हजार साल बाद तक गंधार बुद्ध की शिक्षा, साहित्य, संस्कृति व कला का प्रमुख केंद्र रहा। यहीं से मैत्री का संदेश चीन, मंगोलिया व आगे पहुंचा। पश्चिम से आने वाले कबिलाओं के आक्रमण की मार सबसे पहले गंधार ही सहन करता था। लेकिन उनको भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ा कर इसी में समाहित कर देता था। गंधार ने खुशी-खुशी से कभी अपनी संस्कृति को ध्वस्त होते हुए नहीं देखा। 5वीं से 7वीं सदी तक गंधार में बुद्ध की शिक्षाओं का स्वरूप कितना भव्य, व्यापक और ऊंचाई पर था, इसका गुणगान फाहि्यान व ह्वानसांग ने अपनी यात्राओं के विवरण में विस्तृत रूप में लिखा है।

 भारत, चीन और मध्य एशिया का यातायात व व्यापार इसी मार्ग से होता था। यहां के लोग व्यापार ही नहीं बल्कि धम्म, शिक्षा और संस्कृति के प्रचार में सबसे आगे थे। ईसा के बाद दूसरी सदी में बामियान घाटियों की विशाल चट्टानों को काटकर बनाई गई बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं संसार का एक अजूबा है, लेकिन समय के करवट लेने के साथ उन्हें 2001 में बम से ध्वस्त कर दिया गया। फिर कई वर्षों की मेहनत से पुनर्निर्माण किया गया।

 लगभग 75 साल पहले महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपने ग्रंथ में लिखते हैं- “आज के अफगानिस्तान में बुतपरस्ती सबसे जघन्य अभिशाप मानी जाती है लेकिन इस देश की कला, संस्कृति, शिक्षा और दर्शन का सबसे गौरवशाली काल भी वही था, जब सारा अफगानिस्तान बुतपरस्त था। बुत परस्त फारसी शब्द है जो बुद्ध-परस्त (बुद्ध पूजक) का विकृत रूप है। अरब के बंधुओं को इनमें सिर्फ मिट्टी, पत्थर और धातु की मूर्तियां और उनके प्रति मिथ्या विश्वास ही दिखाई दिए। लेकिन वे इनकी कला की गंभीरता को नहीं समझ सके, क्योंकि कला को समझने के लिए संस्कृति की समझ होना जरूरी है। आज का अफगानिस्तान अपने प्राचीन गंधार की कला, शिक्षा, संस्कृति, महान विचारकों पर गर्व करें तो कौन अनुचित कहेगा? बुद्ध की शिक्षाएं वापस लौटे या न लौटे लेकिन पुरानी संस्कृति अफगानिस्तान की नवीन संस्कृति के निर्माण में अवश्य मददगार होगी।”

लेखक- महापंडित राहुल सांकृत्यायन संदर्भ ग्रंथ – बौद्ध संस्कृति (1949)

डॉ. मुकेश गौतम को राज्यपाल ने दिया मातृभूमि भूषण सम्मान

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 प्रसिद्ध कवि और पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. मुकेश गौतम को महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी द्वारा “मातृभूमि भूषण सम्मान- 2021” से सम्मानित किया गया। डॉ. मुकेश गौतम को यह सम्मान पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके द्वारा किए जा रहे रचनात्मक कार्यों के लिए दिया गया है। हिंदी अकादेमी; मुम्बई द्वारा आयोजित समारोह में तीनों सेनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सैन्य अधिकारियों, समाज सेवा, साहित्य, तथा शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को भी राज्यपाल ने सम्मानित किया। राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि जब भी राष्ट्र के सामने कोई संकट आता है तो हमारे देश के सभी लोग मिलकर उसका मुकाबला करते हैं, और सफलता प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि कोविड-19 से भी निपटने में हमारे देश के लोगों ने केंद्र तथा राज्य सरकारों के साथ मिलकर सराहनीय कार्य किया है। पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह ने अपने संबोधन में सभी पुरस्कार प्राप्त कर्ताओं को बधाई दी और कहां कि जो लोग समय पर राष्ट्र और समाज के लिए अच्छा कार्य करते हैं वही लोग अन्य लोगों के प्रेरणा स्रोत बनते हैं।

उल्लेखनीय है कि डॉ. मुकेश गौतम पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अभी तक पूरे देश में तीस हजार पेड़ लगाए हैं। पेड़ विषय पर उन्होंने कई पुस्तकों का लेखन भी किया है। उनकी पुस्तकों का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। वृक्ष संरक्षण विषय पर उनका आंदोलन “वृक्ष बचाओ-विश्व बचाओ” काफी चर्चित रहा है। हिंदी अकादमी, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद पांडेय ने भी सम्मान समारोह को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन आलोक चौबे ने किया।

देश की राजधानी में स्वतंत्रता दिवस पर मनुवादियों ने किया डॉ. आंबेडकर का अपमान

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 दिल्ली के तुगलकाबाद में स्वतंत्रता दिवस के दिन जातिवाद का नंगा नाच देखने में आया। इस दिन संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर झंडा फहराने गए स्थानीय जाटव मुहल्ले के दलितों को गुजर समाज के लोगों ने न सिर्फ झंडा फहराने से रोका, बल्कि राष्ट्रध्वज का अपमान किया और भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को लेकर अपशब्द कहे। इस बारे में दलित समाज ने एफआईआर दर्ज कराई है।

 तुगलकाबाद के चंदरपाल ने गोविन्पुरी थाने में दी गई अपनी शिकायत में कहा है कि 15 अगस्त को वह अपने दलित जाटव समाज के 25-30 साथियों के साथ, जिसमें औरतें भी शामिल थी, कमन की जोहर जाटव मोहल्ला तुगलकाबाद गाँव स्थित बाबासाहेब की प्रतिमा पर झंडा फहराने गए। उसी समय वहां जितेन्द्र गुजर, दीपक गुजर, रिंकू गुजर और शकुंतला गुजर आए और झंडा उतार कर फेंक दिया। साथ ही बाबासाहेब और वहां मौजूद औरतों को जातिसूचक गालियां देने लगे। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि गुजरों ने जाटव समाज के साथ मारपीट की और पथराव शुरू कर दिया, जिसमें कई लोग घायल हो गए।

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि गुजर समाज के गुंडों ने डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर गोबर फेंका और राष्ट्रध्वज का अपमान किया। इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि यह सारा घटनाक्रम पुलिस की मौजूदगी में हुआ। इस हंगामे के दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही। यहां तक की पुलिस वालों ने अपने नेम प्लेट भी हटा दिये थे, ताकि उनकी पहचान सामने नहीं आ सके। दलितों ने थाने के एसएचओ पर धमकाने का आरोप लगाया कि आखिर दलित झंडा फहराने क्यों गए थे। इस मामले में जमीन को लेकर विवाद की बात भी सामने आ रही है। कहा जा रहा है कि दलितों को आवंटित इस जमीन पर एक कद्दावर भाजपा नेता की शह पर उसके समर्थक इस जमीन को हथियाना चाहते हैं और यहां से बाबासाहेब की प्रतिमा हटाना चाहते हैं।

15 अगस्तः झंडा फहराने पर दलित सरपंच के साथ मारपीट

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भारत की आजादी के बाद हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को देश में दलितों, वंचितों को कितनी आजादी मिली है, इसकी कलई खुल जाती है। 15 अगस्त हो या फिर 26 जनवरी, हर मौके पर दलितों को देश के किसी न किसी हिस्से में झंडा फहराने से रोकने की खबर आ ही जाती है। इस बार मध्य प्रदेश के छतरपुर में एक दलित सरपंच की पिटाई इसलिए कर दी गई क्योंकि दलित समाज के सरपंच ने ब्राह्मण समाज के सचिव का इंतजार किये बिना झंडा फहरा दिया। मामला छतरपुर जिले के धामची गाँव का है। इस घटना का वीडियो भी जमकर वायरल हो रहा है।

सरपंच हन्नु बसोर का आरोप है कि उसकी पंचायत में सचिव सुनील तिवारी को 15 अगस्त के दिन उसका झंडा फहराना नागवार गुजरा। सरपंच हन्नू बसोर ने आरोप लगाया कि सचिव ने जाति सूचक शब्द कहते हुए, उसे लात मार दी है। जातिवादी गुंडे सचिव पर सरपंच के साथ उनकी पत्नी कट्टू बाई और बहू के साथ भी मारपीट की गई। घटना के बाद दलित सरपंच, उसकी पत्नी और गांव के कुछ लोग ओरछा रोड थाना पहुंचे और मामला दर्ज कराया।

कुछ सवर्ण जातिवादियों की इसी मानसिकता के चलते देश में जातिवाद की खाई आए दिन गहरी होती जा रही है। सवाल है कि आखिर सवर्ण समाज के जातिवादियों को दलितों द्वारा प्रमुख पदों पर पहुंचना इतना क्यों अखर जाता है कि वह इसे बर्दास्त नहीं कर पाते और मारपीट पर उतर आते हैं।

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रस्म अदायगी नहीं है स्वतंत्रता दिवस की बधाई

पूरा देश आज स्वतंत्रता दिवस का पर्व मना रहा है। भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर देश एवं विदेश में रहने वाले देशवासियों और अप्रवासी भारतीयों को इस दिवस की बहुत-बहुत बधाई। लेकिन यहां हमें यह समझना होगा कि स्वतंत्रता दिवस पर बधाई केवल रस्म अदायगी नहीं होनी चाहिए। इस दिवस के पीछे छुपे मूल्यों की पड़ताल कर उनको जीवन में धारण करना इस दिवस के पर्व का लक्ष्य होना चाहिए। आइये आज के दिन बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा बनाये गए भारत के संविधान में प्रद्दत- समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, सामजिक न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों का पर्व बनाये।

आज के दिन हमें बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा राष्ट्र निर्माण की संकल्पना में दिए गए मूल्यों की भी पड़ताल करनी करनी चाहिए। हमें समझना और समझाना होगा की बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा राष्ट्र निर्माण हेतु बताये गए मार्ग यथा सत्ता, शिक्षा, अर्थ, संसाधन आदि की संस्थाओं में भारत में रह रहे सभी समाजों- यथा- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, धार्मिक अल्पसंख्यक, सामान्य समाज और साथ ही साथ सभी समाजों की महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देना ही वास्तविक स्वतंत्रता दिवस है।

इन सभी समाजो में से जो समाज सबसे ज्यादा वंचित है, उनको उपरोक्त संस्थाओं में सबसे पहले प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना ही स्वतंत्रता दिवस की मूल भावना होनी चाहिए। आज के दिन हमारे राजनीतिज्ञों, राजनैतिक दलों, कॉर्पोरटे घरानो, मीडिया हाउसेस, विश्वविद्यालयों एवं सामान्य शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों आदि को बहुत ही गंभीरता से सोचना-विचारना चाहिए की आखिर इस देश की संस्थाओं ने पिछले 74 वर्षों में कितना प्रतिशत संवैधानिक लक्ष्य प्राप्त किया है।

हमें यहां, 26 नवंबर 1949, को संविधान सभा को संबोधित करते हुए बाबासाहेब आंबेडकर ने क्या कहा था, यह बात भी याद रखनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि किसी भी देश का संविधान अच्छा या बुरा नहीं होता। अच्छे से अच्छा संविधान बुरा हो जाएगा, अगर उसको चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे। और खराब से खराब संविधान भी अच्छे से अच्छा हो जाएगा अगर उसको चलाने वाले अच्छे होंगे।

आज अगर हम 15 अगस्त 2021 में अपनी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तो हमें यह चिंतन करना होगा कि हमने अपने संविधान को कितना सफल बनाया है। और इस पड़ताल का आधार यह होना चाहिए कि हमने संविधान में दिए गए मूल्यों को जमीनी स्तर पर कितना लागू किया है। अगर हम आज के दिन यह पड़ताल नहीं करते हैं तो स्वतंत्रता दिवस का पर्व निरर्थक होगा।

मान्यवर कांशीराम के जेल भरो आंदोलन की 37वीं वर्षगांठ और मंडल कमीशन की सिफारिशें

 आज बहुजन समाज के लिए बड़ा दिन है। आज ही के दिन मान्यवर कांशीराम जी के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी द्वारा मंडल कमीशन में पिछड़ी जातियों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हेतु की गई सिफारिशों को लागू करवाने के लिए जेल भरो आंदोलन किया गया था। आज उसकी 37वीं वर्षगांठ है। 37 वर्ष पहले सन् 1984 में 1 से 14 अगस्त तक बहुजन समाज पार्टी ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने के लिए जेल भरो आंदोलन किया था। इस दौरान बसपा ने संसद भवन के सामने बोट क्लब पर अपने 3749 कार्यकर्ताओं के साथ धरना प्रदर्शन किया तथा गिरफ्तारियां भी दी।

यहां 3749 कार्यकर्ताओं की संख्या के पीछे छिपे हुए अर्थ को भी समझना अति आवश्यक है। मान्यवर कांशी राम ने यह संख्या इसलिए चुनी थी क्योंकि मंडल कमीशन के अंदर 3749 जातियों का ही समावेश था। अर्थात मंडल कमीशन ने आरक्षण के लिए 3749 पिछड़ी जातियों को चिन्हित किया था। यद्यपि बाद में मंडल कमीशन की फाइनल रिपोर्ट में 3743 जातियों का ही नाम आया। जिसमें से 88 जातियां मुस्लिम समाज की भी समायोजित की गई।

साथ ही साथ मान्यवर कांशीराम ने ऑपरेस्ड इंडियन मैगजीन के अक्टूबर 1984 के अंक में यह भी वर्णित किया कि ऐसे ही प्रदर्शन एवं गिरफ्तारियां भारत के अनेक राज्यों की राजधानियों एवं जिला मुख्यालयों पर भी दिए गए। साथ ही साथ यह नारा भी प्रचलित किया गया कि, “मंडल कमीशन लागू करो, वरना कुर्सी खाली करो”।

इतना ही नहीं इसके पश्चात मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कराने के लिए मान्यवर कांशीराम ने 10-11 अगस्त 1985 से 1993 तक मा. कांशीराम के नेतृत्व में बामसेफ, डीएस-4 और बसपा ने मिलकर पूरे भारत में पाँच सेमिनार और 500 सिंपोज़ियम किए। यहां बहुजन समाज को यह जानना जरुरी है कि पिछड़ी जातियों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हेतु संविधान में जिस कमीशन की संकल्पना की गई थी, वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत बना।

संविधान के इस अनुच्छेद 340 को बाबा साहेब आंबेडकर ने बनाया था। और बाद में जब वे नेहरू की कैबिनेट में कानून मंत्री थे तब इसे लागू कराने का भरसक प्रयास किया। जब वे इसमें कामयाब नहीं हुए तो उन्होंने नेहरू की कैबिनेट से भी त्यागपत्र दे दिया। यह तथ्य उन्होंने अपने रेजिग्नेशन स्पीच में साफ-साफ लिखा, जिसे हम बाबा साहेब (English Writings and Speeches ) के वॉल्यूम 14- पार्ट 2; पृष्ठ संख्या 1319 पर पढ़ सकते हैं।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि मान्यवर कांशीराम ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए जो भी धरना, प्रदर्शन, सिंपोजियम, सेमिनार, और गिरफ्तारियां आदि बहुजन समाज पार्टी के माध्यम से दी वह बाबा साहेब आंबेडकर के अधूरे एजेंडे को पूरा करने के मार्ग में उठाया गया कदम था। इसीलिए बार-बार मान्यवर कांशीराम कहा करते थे कि मैंने बाबा साहेब आंबेडकर के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए ही बहुजन समाज पार्टी बनाई है। बहुजनों की एकता के लिए हमें ऐसे आंदोलनों की तिथियों को अवश्य याद रखना चाहिए।

आखिर बसपा को क्यों नहीं मिलता करोड़ों का चंदा?

 तमाम राजनीतिक दल अक्सर बहुजन समाज पार्टी पर यह आरोप लगाते हैं कि बसपा पैसे लेकर टिकट देती है। बसपा की मुखिया मायावती जब खुद को दलित की बेटी कहती हैं तो तमाम मनुवादी दलों के मनुवादी नेता मायावती को दौलत की बेटी कह कर उनका मजाक उड़ाते हैं। और तो और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के कारण बसपा छोड़ कर जाने वाला हर नेता बहनजी पर टिकटों की खरीद बिक्री का आरोप लगाता है।

लेकिन वहीं जब देश के मूलनिवासी दलित, आदिवासी और पिछड़ों का खून चूसने वाले भारत के धन्नासेठ मनुवादी दलों को हजारों करोड़ रुपये का चंदा देते हैं तो उस वक्त कोई आवाज नहीं उठाता। तब कोई सवाल नहीं करता कि वो हजारो करोड़ रुपये आएं कहां से? तब कोई यह नहीं पूछता कि हजारों करोड़ रुपये का चंदा सिर्फ मनुवादी दलों को ही क्यों मिलता है, बसपा को ऐसे चंदे क्यों नहीं मिलते।

हम ये सवाल इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि चुनाव आयोग की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट आई है। जिसके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी को साल 2019-20 के दौरान ढाई हजार करोड़ रुपये का चंदा मिला है। भाजपा को यह पैसे इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिला है, जिसको कुछ लोग ब्लैक मनी को व्हाइट मनी बनाने का साधन मानते हैं। देश की सत्ता में पिछले सात सालों से जमीं भाजपा, जो लगातार देश के तमाम संसाधनों को निजी हाथों में बेचती जा रही है, कहीं धन्नासेठ उसे इसका इनाम तो नहीं दे रहे हैं। यह सवाल मैं इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि भाजपा को साल 2018-19 में इलेक्टोरल बॉन्ड से 1450 करोड़ रूपये मिले थे। और इस बार उसको पिछले वित्तिय वर्ष के मुकाबले करीब 76 प्रतिशत अधिक ढाई हजार करोड़ रुपये मिले हैं।

वहीं कांग्रेस को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए 318 करोड़ रुपये मिले हैं। जो पिछले साल के मुकाबले 17 प्रतिशत कम है। दूसरी विपक्षी पार्टियों की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस को 100 करोड़, डीएमके को 45 करोड़ रूपए, शिवसेना को 41 करोड़ रूपए, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 20 करोड़ रूपए, आम आदमी पार्टी को 17 करोड़ रूपए और राष्ट्रीय जनता दल को 2.5 करोड़ रूपए का चंदा इलेक्टोरल बांड के जरिए मिला है। बसपा को कितने पैसे मिले हैं, इसका कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है। यानी बसपा को कोई पैसे नहीं मिले हैं।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इलेक्टोरल बॉन्ड योजना इसी मंशा से बनाई गई थी कि सत्ताधारी बीजेपी को लाभ पहुँ सके। दरअसल इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक ज़रिया है। यह एक वचन पत्र की तरह है जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खरीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीके से दान कर सकते हैं। मोदी जी की सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी और इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था।

आरोप लगता है कि इलेक्टोरल बॉन्ड में चूंकि पैसे देने वालों की पहचान गुप्त रखी गई है, इसलिए इससे काले धन को बढ़ावा मिल सकता है। यानी यह योजना बड़े कॉरपोरेट घरानों को उनकी पहचान बताए बिना पैसे दान करने में मदद करने के लिए बनाई गई थी। यानी कि जो सरकार काला धन लेकर आने का ढिंढ़ोरा पीटकर सत्ता में आई थी, उसने काला धन मैनेज करने का कानून बना दिया।

मैं यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आप और हम टैक्स पेयर हैं। सरकार हमारे एक-एक पैसे का हिसाब मांगती है। हम एक लाख रुपये भी छिपा नहीं सकते, लेकिन सत्ता की आड़ में ऐसी व्यवस्था बना ली गई है कि भारत के सवर्ण नेतृत्व वाले दल धन्नासेठों के और अपने हजारों करोड़ रुपये आसानी से छिपा सकते हैं। गुमनाम तरीके से हर साल हजारों करोड़ रुपये हासिल करने वाले नेता और राजनीतिक दल जब बसपा पर और बसपा प्रमुख मायावती पर पैसे लेने का आरोप लगाते हैं और उन्हें दौलत की बेटी कहते हैं तो गरीब-वंचित समाज को उनसे यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि भारत के पूंजीपति भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को तो करोड़ों रुपये दे देते हैं, जबकि बसपा सहित दलित-पिछड़ों के नेतृत्व वाले अन्य दलों से मुंह फेर लेते हैं। देश के बहुजनों को भी इस बारे में खुद भी समझने की जरूरत है।

साल 2019-20 के दौरान भाजपा को मिले ढाई हजार करोड़ से ज्यादा

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 भारतीय जनता पार्टी को साल 2019-20 के दौरान भाजपा को ढाई हजार करोड़ रुपये मिले हैं। चुनाव आयोग के सामने पेश की गई एक वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में भारतीय जनता पार्टी ने यह जानकारी दी है। यह राशि साल 2018-19 में पार्टी को इलेक्टोरल बॉन्ड से मिले 1450 करोड़ रूपये से करीब 76 प्रतिशत अधिक है। जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान 18 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदे में कुल मिलाकर लगभग तीन हजार 441 करोड़ रुपये की राशि मिली है।

इस राशि में भाजपा को मिली राशि कई गुना बढ़ी है, तो वहीं कांग्रेस को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए केवल 318 करोड़ रुपये मिले हैं। कांग्रेस को मिली राशि साल 2018-19 को मिली राशि से 17 प्रतिशत कम है। कांग्रेस को 2018-19 वित्तीय वर्ष में 383 करोड़ रुपये मिले थे।

दूसरी विपक्षी पार्टियों की बात करें तो वित्तीय वर्ष 2019-20 में ही बॉन्ड के ज़रिए तृणमूल कांग्रेस को 100 करोड़, डीएमके को 45 करोड़ रूपए, शिवसेना को 41 करोड़ रूपए, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 20 करोड़ रूपए, आम आदमी पार्टी को 17 करोड़ रूपए और राष्ट्रीय जनता दल को 2.5 करोड़ रूपए का चंदा मिला। बसपा को मिली राशि का कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इलेक्टोरल बॉन्ड योजना इसी मंशा से बनाई गई थी कि सत्ताधारी बीजेपी को लाभ पहुँच सके।

क्या हैं इलेक्टोरल बॉन्ड?

इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है। यह एक वचन पत्र की तरह है जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खरीद सकते हैं और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीके से दान कर सकते हैं। भारत सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी और इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था। इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक राजनीतिक दलों को धन देने के लिए बॉन्ड जारी कर सकता है। इन्हें को ऐसा कोई भी दाता खरीद सकता है जिसके पास एक ऐसा बैंक खाता है जिसकी केवाईसी की जानकारियां उपलब्ध हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड के ख़िलाफ़ तर्क यह है कि चूंकि दाता की पहचान गुप्त रखी गई है इसलिए इससे काले धन की आमद को बढ़ावा मिल सकता है। एक आलोचना यह भी है कि यह योजना बड़े कॉरपोरेट घरानों को उनकी पहचान बताए बिना पैसे दान करने में मदद करने के लिए बनाई गई थी।

ओलंपिक और भारत में खेलों का जाति शास्त्र!

 23 जुलाई से शुरू हुए टोक्यो ओलम्पिक- 2020 का समापन हो चुका है, जिसमें 206 देशों के 1000 से अधिक खिलाडी दर्शक-शून्य स्टेडियमों में 33 खेलों की 339 स्पर्धाओं में अपनी काबलियत का मुजाहिरा किये। खेलों के इस महाकुम्भ में 39 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 113 मैडल जीतकर अमेरिका शीर्ष पर रहा। दूसरे नंबर पर रहा हर क्षेत्र में अमेरिका के समक्ष चुनौती पेश कर रहा चीन, जिसने 38 स्वर्ण के साथ कुल 88 पदक जीते। पदकों की संख्या के लिहाज से मेजबान देश जापान तीसरे स्थान पर रहा, जिसने 27 स्वर्ण सहित कुल 58 पदक हासिल किये। जहाँ तक विश्व शक्ति बनने का दावा करने वाले भारत महान का सवाल है, एक स्वर्ण, दो रजत और चार कास्य के साथ कुल 7 पदक सवा सौ करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश के हिस्से में आया, जो ओलम्पिक खेलों के इतिहास में इसका अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन है।

इसके पहले भारत ने 2012 के रिओ ओलम्पिक में 6 पदक जीते थे। भारत के प्रदर्शन पर तंज कसते हुए हुए चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने लिखा है, ‘दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत का टोक्यो ओलम्पिक में अभियान सिर्फ एक स्वर्ण पदक के साथ ख़त्म हो गया। भारत को एक स्वर्ण पदक मिला।’ इसमें आगे लिखा गया है कि एक स्वर्ण, दो रजत और चार कांस्य पदक के साथ भारत मैडल जीतने वाले 93 देशों की रैंकिंग में 48 वें नंबर है। भारत ने टोक्यो ओलंपिक में 127 एथलीट का दल भेजा था, लेकिन सफलता केवल 7 को मिली। भारत जब भी पदक जीतता है तो बहस तेज हो जाती है लेकिन फिर हर कोई शांत हो जाता है।’ इतना ही नहीं ग्लोबल टाइम्स ने भी भारत के प्रदर्शन का मखौल उड़ाते हुए लिखा है, ‘भारत को केवल एक स्वर्ण पदक और कुल सात पदक मिले हैं। इससे पता चलता है कि भारत को कई चीजों के आधुनिकीकरण में बहुत लम्बी दूरी तय करनी है।’ भारत के लोग खुश हो सकते हैं कि उनके दुश्मन देश नंबर एक पाकिस्तान की तरफ से सोशल मीडिया पर काफी सकारात्मक रुख देखने को मिला। वहां के लोगों ने भारतीय खिलाड़ियों की भरपूर सराहना की है।

खैर! हमारा प्रबल प्रतिद्वन्दी देश जितना भी मजाक उडाये भारत के लोग, विशेषकर वर्तमान केन्द्रीय सरकार टोक्यों ओलंपिक में खिलाडियों के प्रदर्शन काफी खुश है। वह तरह–तरह से सन्देश दे रही है कि उसके कारण ही भारत ने ओलंपिक में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया है। यह सही है कि टोक्यो में भारतीय खिलाडियों ने कुछ सुधरा हुआ प्रदर्शन किया है: विशेषकर जिस हॉकी की वजह से खेल जगत में भारत की कुछ प्रतिष्ठा रही है, उस हॉकी की पुरुष और महिला टीम ने नए सिरे से धाक जमाई है। खासकर चौथे स्थान पर रही महिला हॉकी टीम ने तो कुछ हद तक विस्मृत ही कर दिया है। मैडल न जितने के बावजूद बहुत ही प्रतिकूलताओं में पली-बढ़ी भारतीय लड़कियों ने भारत सहित पूरे विश्व का दिल जीत लिया है। बहरहाल कुछ सुधरे प्रदर्शन को लेकर मोदी सरकार जितना भी अपनी पीठ थपथपाए, सच्चाई यही है कि हमारा प्रदर्शन शर्मनाक रहा, जिसे आगामी पेरिश ओलंपिक में बदलने के लिए लिए अभी से युद्ध स्तर पर जुट जाना चाहिए। टोक्यो ओलंपिक में जिस तरह नीरज चोपड़ा ने भालाफेंक में गोल्ड, रवि दहिया ने रेसलिंग में रजत, मीराबाई चानू ने वेटलिफ्टिंग में रजत, लवलीना बोरगोहेन ने बॉक्सिंग, पीवी सिन्धु ने बैडमिन्टन, बजरंग पुनिया ने रेसलिंग और पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक जीतने का कारनामा किया है, उससे प्रेरणा लेकर चाहें तो देश के खेल अधिकारी भारतीय खेलों के जाति शास्त्र का ठीक से अध्ययन कर ओलंपिक में देश की शक्ल बदल सकते हैं।

काबिलेगौर है कि किसी जमाने में राष्ट्र के शौर्य का प्रतिबिम्बन युद्ध के मैदान में होता था, पर बदले जमाने में अब यह खेल के मैदानों में होने लगा है। इस सच्चाई को सबसे बेहतर समझा चीन ने, जिसने 21वीं सदी में विश्व आर्थिक महाशक्ति के रूप में गण्य होने के पहले अपना लोहा खेल के क्षेत्र में ही मनवाया। लेकिन युद्ध हो या खेल, दोनों में ही जिस्मानी दमखम की जरुरत होती है। विशेषकर खेलों में उचित प्रशिक्षण और सुविधाओं से बढ़कर, सबसे आवश्यक दम-ख़म ही होता है। माइकल फेल्प्स, सर्गई बुबका, कार्ल लुईस, माइकल जॉनसन, मोहम्मद अली, माइक टायसन, मेरियन जोन्स, जैकी जयनार, इयान थोर्पे, सेरेना विलियम्स, नाडाल, जोकोविक जैसे सर्वकालीन महान खिलाड़ियों की गगनचुम्बी सफलता के मूल में अन्यान्य सहायक कारणों के साथ प्रमुख कारण उनका जिस्मानी दम-ख़म ही रहा है। दम-ख़म के अभाव में ही हमारे खिलाड़ी ओलम्पिक, एशियाड, कॉमन वेल्थ गेम्स इत्यादि में फिसड्डी साबित होते रहे हैं। जहां तक जिस्मानी दम-ख़म का सवाल है, हमारी भौगोलिक स्थिति इसके अनुकूल नहीं है। लेकिन इससे उत्पन्न प्रतिकूलताओं से जूझ कर भी कुछ जातियां अपनी असाधारण शारीरिक क्षमता का परिचय देती रही हैं। गर्मी-सर्दी-बारिश की उपेक्षा कर ये जातियां अपने जिस्मानी दम-ख़म के बूते अन्न उपजा कर राष्ट्र का पेट भरती रही हैं। जन्मसूत्र से महज कायिक श्रम करने वाली इन्हीं परिश्रमी जातियों की संतानों में से खसाबा जाधव, मैरी कॉम, पीटी उषा, ज्योतिर्मय सिकदार, कर्णम मल्लेश्वरी, सुशील कुमार, विजयेन्द्र सिंह, लिएंडर पेस, सानिया मिर्जा, बाइचुंग भूटिया, दीपा कर्मकार, हिमा दास इत्यादि ने दम-ख़म वाले खेलों में भारत का मान बढ़ाया है। हॉकी में भारत जितनी भी सफलता अर्जित किया, प्रधान योगदान उत्पादक जातियों से आये खिलाड़ियों का रहा है। इस बार भी वंदना कटारिया, सुमित वाल्मीकि, रानी रामपाल, सलीमा, निक्की प्रधान, लाल रेम सियामी, दीप ग्रेस, निशा वारिश, सविता पुनिया, नवनीत कौर इत्यादि हॉकी प्लेयरों की पारिवारिक पृष्ठभूमि श्रमजीवी जातियों की ही रही है। नीरज चोपड़ा, चानू, लवलीना, रवि दहिया, बजरंग पुनिया श्रमजीवी परिवारों से ही निकल कर ओलंपिक में अपनी चमक बिखेरे हैं।

यहां अनुत्पादक जातियों से प्रकाश पादुकोण, अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्द्धन सिंह राठौर, गगन नारंग, गीत सेठी, विश्वनाथ आनंद, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली इत्यादि ने वैसे ही खेलों में सफलता पायी जिनमें दम-ख़म नहीं, प्रधानतः तकनीकी कौशल व अभ्यास के सहारे चैंपियन हुआ जा सकता है। जहां तक क्रिकेट का सवाल है, इसमें फ़ास्ट बोलिंग ही जिस्मानी दम-ख़म की मांग करती है। किन्तु दम-ख़म के अभाव में अनुत्पादक जातियों से आये भागवत चन्द्रशेखर, प्रसन्ना, वेंकट, दिलीप दोशी, आर अश्विन इत्यादि सिर्फ स्पिन में ही महारत हासिल कर सके, जिसमें दम-ख़म कम कलाइयों की करामात ही प्रमुख होती है। दम-ख़म से जुड़े फ़ास्ट बॉलिंग में भारत की स्थिति पूरी तरह शर्मसार होने से जिन्होंने बचाया, वे कपिल देव, जाहिर खान, उमेश यादव, मोहम्मद शमी इत्यादि उत्पादक जातियों की संताने हैं। आज भारत में बल्लेबाजी को विस्फोटक रूप देने का श्रेय जिन कपिल देव, विनोद काम्बली, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, शिखर धवन इत्यादि को जाता है, वे श्रमजीवी जातियों की ही संताने हैं। इस बार के भी ओलंपिक में उत्पादक जातियों में जन्मे खिलाड़ियो की सफलता का यही सन्देश है कि हमारे खेल चयनकर्ता प्रतिभा तलाश के लिए पॉश कालोनियों का मोह त्याग कर अस्पृश्य, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं जंगल-पहाड़ों में वास कर आदिवासियों के बीच जाएं, यदि चीन की भांति भारत को विश्व महाशक्ति बनाना चाहते हैं तो।

वंचित समाजों में जन्मी प्रतिभाओं को इसलिए भी प्रोत्साहित करना जरुरी है क्योंकि दुनिया भर में अश्वेत, महिला इत्यादि जन्मजात वंचितों में खुद को प्रमाणित करने की एक उत्कट चाह पैदा हुई है। वे खुद को प्रमाणित करने की अपनी चाह को पूरा करने के लिए खेलों को माध्यम बना रहे हैं। उनकी इस चाह का अनुमान लगा कर उन्हें दूर-दूर रखने वाले यूरोपीय देश अब अश्वेत खेल–प्रतिभाओं को नागरिकता प्रदान करने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। इससे जर्मनी तक अछूता नहीं है। स्मरण रहे एक समय हिटलर ने घोषणा की थी-‘सिर के ऊपर शासन कर रहे हैं ईश्वर और धरती पर शासन करने की क्षमता संपन्न एकमात्र जाति है जर्मन: विशुद्ध आर्य-रक्त। उनके ही शासन काल में 1936 में बर्लिन में अनुष्ठित हुआ था ओलम्पिक। हिटलर का दावा था कि ओलम्पिक में सिर्फ आर्य-रक्त ही परचम फहराएगा, किन्तु आर्य-रक्त के नील गर्व को ध्वस्त कर उस ओलम्पिक में एवरेस्ट शिखर बन कर उभरे सर्वकाल के अन्यतम श्रेष्ठ क्रीड़ाविद जेसी ओवेन्स। अमेरिका के तरुण एथलीट, ग्रेनाईट से भी काले जेसी ओवेन्स जब बार-बार विक्ट्री स्टैंड पर सबसे ऊपर खड़े हो कर गोल्ड मैडल ग्रहण कर रहे थे। उनके मुकाबले गोरे लोग पीछे छूट गए। जेसी ओवेन्स ने 100 मीटर, 200 मीटर, लॉन्ग जम्प और फिर रिले रेस ट्रैक फिल्ड से चार-चार स्वर्ण पदक जीत लिए थे। तब हिटलर उनकी वह सफलता बर्दाश्त नहीं कर सका था और मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ था।

ब्रिटेन के लीवर पूल में जो काले कभी भेंड़-बकरियों की तरह बिकने के लिए लाये जाते थे, उन्ही में से एक की संतान जेसी ओवेन्स ने नस्ल विशेष की श्रेष्ठता की मिथ्या अवधारणा को ध्वस्त करने की जो मुहीम बर्लिन ओलम्पिक से शुरू किया, परवर्तीकाल में खुद को प्रमाणित करने की चाह में उसे गैरी सोबर्स, फ्रैंक वारेल, माइकल होल्डिंग, माल्कॉम मार्शल, विवि रिचर्ड्स, आर्थर ऐश, टाइगर वुड, मोहम्मद अली, होलीफील्ड, कार्ल लुईस, मोरिस ग्रीन, मर्लिन ओटो, सेरेना विलियम्स, उसैन बोल्ट इत्यादि ने मीलों आगे बढ़ा दिया। खेलों के जरिये खुद को प्रमाणित करने की वंचित नस्लों की उत्कट चाह का अनुमान लगाकर ही हिटलर के देशवासियों ने रक्त-श्रेष्ठता का भाव विसर्जित कर देशहित में अनार्य रक्त का आयात शुरू किया। आज कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि खेलों में सबसे अधिक नस्लीय-विविधता हिटलर के ही देश में है। अब हिटलर के देश में कई अश्वेत खिलाड़ियों को प्रतिनिधित्व करते देखना, एक आम बात होती जा रही है।

बहरहाल देशहित में ताकतवर अश्वेतों के प्रति श्वेतों, विशेषकर आर्य जर्मनों में आये बदलाव से प्रेरणा लेकर भारत के विविध खेल संघों के प्रमुखों को भी वंचित जातियों के खिलाड़ियों को प्रधानता देने का मन बनाना चाहिए। नयी सदी में मैडल जीतने के बाद जिस तरह खिलाड़ियों पर पैसों की बरसात हो रही है, उससे सिर्फ नीरज चोपड़ा- रवि दहिया इत्यादि ही नहीं, दीपा कर्मकार, हिमा दास, वंदना कटारिया, सुमित वाल्मीकि के भी भाई -बहनों में दम-ख़म वाले खेलों के जरिये खुद को प्रमाणित करने के साथ अपना जीवन स्तर उठाने की तीव्र ललक पैदा हो चुकी है। श्रमजीवी जातियों की सोच में आये इस बदलाव का सद्व्यवहार करने का यदि खेल अधिकारी और सरकारें मन बना लें तो निकट भविष्य में ओलंपिक का शर्मनाक रिकॉर्ड सुधारना ज्यादा कठिन नहीं होगा।

टोक्यो ओलंपिक में अकेले दो गोल्ड और ब्रोंज मैडल जीतने वाली अश्वेत रिफ्यूजी खिलाडी साफिया हसन ने नए सिरे से एक और तरीका बताया है, जिसके जरिये भारत ओलंपिक में अपनी स्थिति सुधार सकता है। सिफान हसन पर टिपण्णी करते हुए किसी ने सोशल मीडिया पर लिखा है-‘ सिफान इसलिए भी खास हैं क्योंकि वो लड़की होने के साथ एक रिफ्यूजी भी हैं। मगर नीदरलैंड तथा यूरोप की वह धर्मनिरपेक्ष संस्कृति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो मानवीय आधार पर बिना किसी भेदभाव के अपने देश के रास्ते दूसरे धर्मों के लोगों के लिए खोल देते हैं और धार्मिक आधार पर किसी को हतोत्साहित नहीं करते। यह उन लोगों के लिए सबक है जो हर मामले में धार्मिक पहचान को आगे ले आते हैं।’

जिस तरह भारत विदेशी खेल कोचों को आयात करता हैं, उसी तरह विदेश के विधर्मी काबिल खिलाड़ियों को भी नागरिकता देना शुरू करे तो ओलंपिक मैडल की तालिका में हमारी स्थिति बेहतर हो सकती है। हालांकि ओलंपिक में चमत्कारिक परिणामों की संभावना के बावजूद खेल संघों पर हावी प्रभु जातियों के लिए भारत की श्रमजीवी जातियों को प्राथमिकता तथा विदेशों के विधर्मी खिलाडियों को नागरिकता देना आसान काम नहीं है। इसके लिए उन्हें राष्ट्रहित में उस वर्णवादी मानसिकता का परित्याग करना पड़ेगा जिसके वशीभूत होकर इस देश के द्रोणाचार्य, कर्णों को रणांगन से दूर रख एवं एकलव्यों का अंगूठा काट कर, अर्जुनों को चैंपियन बनवाते रहे हैं। पर, अगर 21वीं सदी में भी खेल संघों में छाये द्रोणाचार्यों की मानसिकता में आवश्यक परिवर्तन नहीं आता है तो भारत क्रिकेट, शतरंज, तास, कैरम बोर्ड, बिलियर्ड इत्यादि खेलों में ही इतराने के लिए अभिशप्त रहेगा। ओलम्पिक मैडल की शीर्ष तालिका में पहुंचने का उसका सपना सपना बना रहेगा और चीन जैसे प्रतिद्वंदी मजाक उड़ाते रहेंगे।

क्रंदन नहीं समाधान चाहने वाले साहित्यकार थे सूरजपाल चौहान

वरिष्ठ दलित साहित्यकार एवं संवेदनशील कवि सूरजपाल चौहान जी का दिनांक 15 जून, 2021 को लंबी बीमारी से निधन हो गया था। दलित साहित्य के आरंभिक लेखकों में से एक चौहान जी भी थे। सूरजपाल चौहान का नाम उन दलित लेखकों में शुमार है, जो लकीर के फकीर नहीं बने और दलित चिंतन की स्वतंत्र जमीन पर आकर रचनाएं की। यह इसलिए संभव हो सका था क्योंकि चौहान जी ईमानदार और मजबूत व्यक्तित्व के थे। उन्होंने कौम की समस्या और उस के समाधान को समझा और फिर आजीवक चिंतन के साथ आए। कैलाश दहिया जी ने चौहान जी के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी एक फेसबुक टिप्पणी में बिल्कुल सही लिखा है- “सूरजपाल चौहान जी ने वैचारिक यात्रा पूरी की है। माता के जागरण की भेंट से शुरू कर, बुद्ध वंदना से होते हुए आजीवक तक पहुंचे हैं। इस से दलितों को सीख लेने की जरूरत है। चौहान साहब को शत् शत् प्रणाम।”(1)

 बताइए, ये चौहान जी की दो कविताओं ‘मेरा गांव कैसा गांव…’ और ‘ये दलितों की बस्ती है’ को महत्वपूर्ण कविता बता रहे हैं और कह रहे हैं कि दलित समाज चौहान जी से ऐसे ही सार्थक लेखन की की उम्मीद कर रहा था। दलित समाज अपनी समस्याओं का समाधान चाहता है। रोने-धोने और शिकायत करते रहने से समाज की समस्या का समाधान नहीं निकलता। दलित समाज के लिए वही लेखनी सार्थक है, जो उस की समस्या के समाधान के क्रम में लिखा गया हो।

यह जरूरी लग रहा है कि चौहान जी की उन दोनों कविताओं को देख लिया जाए। पहली कविता इस प्रकार है –

“कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव!

कच्ची मड्डिया टूटी खटिया घूरे से सटकर बिना फूँस का— मेरा छप्पर मेरे घर न कौए की काँव। मेरा गाँव कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव!

उनके आँगन गैया बछिया मेरे आँगन सूअर, मुर्ग़ियाँ मेरे सिर उनकी लाठी बेगारी करने को गाँव। मेरा गाँव कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव!

उनका खेत उन्हीं का बैल और उन्हीं का है ट्यूब-वेल ‘मेरे हिस्से मेहनत आयी उनके हिस्से है आराम’ मेरा गाँव कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव!

ब्याह-बरात का— काम कराते देकर जूठन बहकाते जब मरता है कोई जानवर दे-देकर गाली उठवाते दिन-रात ग़ुलामी कर-करके थक गये— बिवाई फटे पाँव। मेरा गाँव कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव!

उनका दूल्हा चढ़ घोड़ी पर घूमे सारा गाँव-गली मेरी बेटी की शादी पर कैसी आफ़त आन पड़ी जिन पर आया— घोड़ी चढ़ वो अलग पड़े हैं दोनों पाँव। मेरा गाँव कैसा गाँव? न कहीं ठौर न कहीं ठाँव”(5)

देखा जा सकता है इस कविता में कवि अपनी स्थिति का दुखड़ा रो रहा है। अपनी गुलामी की स्थिति दुनिया को दिखा रहा है। गुलाम कौम की स्थिति कैसी होती है यह कौन नहीं जानता भला? यह कविता महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह दलितों की गुलामी के जीवन को दर्शाती है। यह ठीक है कि दलित कौम की यातनाएं, पीड़ा, अत्याचार जो उस ने इतिहास के एक लम्बे काल में सहे हैं उसे सामने लाना चाहिए। लेकिन, साथ में समाधान की बात भी तो हो। पर देखा यह गया है कि दलितों के साहित्य के नाम पर क्रंदन करने का एक पूरा दौर ही चला है। यह कविता दलित आंदोलन के उसी प्रारंभिक दौर की कविता है। अभी भी तथाकथित दलित लेखक इस नकारात्मकता में मशगूल हैं। दिवंगत मलखान सिंह का एक कविता संग्रह तो ‘सुनो ब्राह्मण’ के नाम से ही है। जिस में वे ब्राह्मण के सामने घुटनों के बल बैठ कर अपनी पीड़ाओं का रोना रो रहे हैं। उस कविता संग्रह को द्विजों ने दलितों की नम्बर एक कविता संग्रह का खिताब भी दे रखा है। उस कविता संग्रह की खोल बांध कैलाश दहिया जी ने अपने लेख ‘मलखान सिंह का कविताकर्म’ में की है, जिस में उन्होंने लिखा है – “कवि को दलित की समस्या का पता तो है, लेकिन इनके पास समस्या का समाधान नहीं है।…बताना यही है कि ‘सुनो ब्राह्मण’ कविता संग्रह में ब्राह्मण बचा ही रह गया है, जो कवि को आंखे दिखा रहा है।

जब तक कवि’ सुनो भंगी सुनो चमार’ नाम से अपना संग्रह नहीं लाते तब तक यह इन्हें आँखें ही दिखाएगा।”(6) तो, दलितों को ध्यान देना चाहिए कि द्विज दलितों को कभी स्वतंत्र देखना नहीं चाहते। उन्हें तो रोने-धोने और ‘हाय मार डाला’ ‘हाय मार डाला’ करते हुए दलित ही पसंद हैं। शोषित जितना रोता है, पीड़ा से जितना कराहता है सामंत को उतना ही आनंद मिलता है। वह उतना ही अपनी मूंछों पर ताव देता हुआ घूमता है। दुनिया की कौन कौम गुलाम नहीं रही है? क्या वे अपनी गुलामी का रोना रोते हुए ही स्वतंत्र हुई हैं? दलित ही ऐसा क्यों सोचता है कि रोने-धोने से ही उसे स्वतंत्रता मिल जाएगी। वह हथियार क्यों नहीं उठाना चाहता? युद्ध क्यों नहीं करना चाहता? कहीं ऐसा तो नहीं कि उस ने अपनी पीड़ा और यातनाओं के बदले दुश्मन से मुआवजा मांगने की आकांक्षा पाल ली है।

चौहान जी की दूसरी कविता ‘ये दलितों की बस्ती है’ भी देखी जाए –

“बोतल महँगी है तो क्या, थैली बहुत ही सस्ती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

ब्रह्मा विष्णु इनके घर में, क़दम-क़दम पर जय श्रीराम । रात जगाते शेरोंवाली की … करते कथा सत्यनाराण..। पुरखों को जिसने मारा था, उनकी ही कैसिट बजती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

तू चूहड़ा और मैं चमार हूँ, ये खटीक और वो कोली । एक तो हम कभी हो ना पाए, बन गई जगह-जगह टोली । अपने मुक्तिदाता को भूले, गैरों की झाँकी सजती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

हर महीने वृन्दावन दौड़े, माता वैष्णो छह-छह बार । गुडगाँवा की जात लगाता, सोमनाथ को अब तैयार । बेटी इसकी चार साल से, दसवीं में ही पढ़ती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

बेटा बजरँगी दल में है, बाप बना भगवाधारी भैया हिन्दू परिषद में है, बीजेपी में महतारी । मन्दिर-मस्जिद में गोली, इनके कन्धे से चलती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

शुक्रवार को चौंसर बढ़ती, सोमवार को मुख लहरी । विलियम पीती मंगलवार को, शनिवार को नित ज़हरी । नौ दुर्गे में इसी बस्ती में, घर-घर ढोलक बजती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

नकली बौद्धों की भी सुन लो, कथनी करनी में अन्तर । बात करें हैं बौद्ध धम्म की, घर में पढ़ें वेद मन्तर । बाबा साहेब की तस्वीर लगाते, इनकी मैया मरती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

औरों के त्यौहार मनाकर, व्यर्थ ख़ुशी मनाते हैं । हत्यारों को ईश मानकर, गीत उन्हीं के गाते है । चौदह अप्रैल को बाबा साहेब की जयन्ती, याद ना इनको रहती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

डोरीलाल है इसी बस्ती का, कोटे से अफ़सर बन बैठा। उसको इनकी क्या चिन्ता अब, दूजों में घुसकर जा बैठा । बेटा पढ़कर शर्माजी, और बेटी बनी अवस्थी है । ये दलितो की बस्ती है ।।

भूल गए अपने पुरखों को, महामही इन्हें याद नहीं । अम्बेडकर, बिरसा , बुद्ध, वीर ऊदल की याद नहीं । झलकारी को ये क्या जानें, इनकी वह क्या लगती है । ये दलितो की बस्ती है ।।

मैं भी लिखना सीख गया हूँ, गीत कहानी और कविता । इनके दु:ख दर्द की बातें, मैं भी भला था, कहाँ लिखता । कैसे समझाऊँ अपने लोगों को , चिन्ता यही खटकती है । ये दलितों की बस्ती है।।”7

यह कविता दलितों की सांस्कृतिक गुलामी को उजागर करती है। यह सांस्कृतिक गुलामी के दुष्परिणाम का ही चित्रण है जिसे चौहान जी ने अपनी कविता में चित्रित किया है। दुनिया में अनेक स्वतंत्र कौमें हैं। इन अलग-अलग कौमों के होने का अर्थ ही यह है कि प्रत्येक कौम की अपनी खुद की संस्कृति, परम्पराएँ, रीति-रिवाज हैं। बिना इन के कोई भी कौम नहीं है। दलित कौम के लोग भी खेती-बाड़ी करते हैं, कमाते हैं, शादी-ब्याह करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं, घर-गृहस्थी बसाते हैं। इस तरह से जीवन यापन के लिए दलितों को भी धर्म दर्शन, तीज-त्यौहार, परम्पराएं चाहिए ही चाहिए। दलित आज इन सब मामलों में भटके हुए हैं तो इस में उन का क्या दोष है? दोष तो उन के नेता का है, महापुरुष का है, चिंतक का है जिन्होंने दलित कौम को धर्म के मामले में भटकाया है। बताया जाए, दलित डा. अम्बेडकर के कारण हिन्दू बने हुए हैं। जब कौम अपने धर्म दर्शन से कट गई है तो वह दूसरे की धार्मिक गुलाम बनेगी ही बनेगी। फिर दलित यहाँ तो खुद ही धार्मिक गुलामी की शरण में जा रहा है। तो, सूरजपाल चौहान जी की ये दोनों कविताएँ एक समय के हिसाब से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें बताया जाए, चौहान जी इस से कहीं आगे बढे़ हैं। इन कविताओं से आगे निकल कर चौहान जी ‘मेरा गांव ऐसा क्यों है?’, ‘ये दलितों की बस्ती ऐसी क्यों है?’ का समाधान भी तलाशते हैं। इसी समाधान की तलाश में आगे बढ़ते हुए चौहान जी मुकम्मल मुकाम ‘आजीवक’ तक आए हैं। और फिर उन की कलम से दलितों की समस्या का समाधान लिए हुए यह कविता निकलती है-

“अपना पुरखा भूलकर, दूजे का गुणगान। यह तो तू भी जानता, कभी न मिलता मान।।

अपना पुरखा भूलकर, चले दूसरे संग। कैसे तुम ज्ञानी पुरुष, सोच-सोच हम दंग।।

विश्वासी पुरखे रहे, चले वे अपनी चाल। फिर तू काहे ढो रहा, दूजे का कंकाल।।

अनजाने करता रहा, मैं दूजे का जाप। जैसा है वैसा भला, मेरा अपना बाप।।

जातिवाद के आज-तक, ना खुल पाए जोड़। बाबा भी थक-हारकर, गये भंवर में छोड़।।

ना तो मैं हिंदू कभी, और ना ही मैं बुद्ध। हूं आजीवक जन्म से, कर्म रहे हैं शुद्ध।।

आजीवक को भूलकर, लिया कमंडल थाम। अब तक ठोकर खा रहा, भूला अपना धाम।।

अपना पुरखा ढूंढ कर, किया बहुत उपकार। धर्मवीर जी आपका, जग में हो सत्कार।।”(8)

ये दोहे चौहान जी की दोहों की पुस्तक में संकलित हैं। इन दोहों से चौहान जी की वैचारिक यात्रा का पता चलता है। सूरजपाल चौहान जी अपनी कविताओं के जरिए साफ-साफ बता रहे हैं कि रोने-धोने का दौर अब खत्म हो चुका है। दलितों को समाधान चाहिए। समाधान के रूप में चौहान जी के ये दोहे बेजोड़ हैं। बताइए, ये कह रहे हैं कि चौहान जी से ‘मेरा गांव कैसा गांव’ और ‘ये दलितों की बस्ती है’ जैसी लेखनी की उम्मीद दलित समाज कर रहा था! चौहान जी दलित समाज की समस्या का समाधान चाहते थे, जिस में वे ‘आजीवक’ तक पहुंचे हैं।

देखा जा सकता है ऊपर दिए गए चौहान जी के दोहों में से पहला दोहा इस प्रकार है – ‘अपना पुरखा भूलकर, दूजे का गुणगान। यह तो तू भी जानता कभी न मिलता मान।।’ अब महान आजीवक रैदास के इस दोहे को देखा जाए- ”पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत। रैदास दास पराधीन सों, कौन करै हैं प्रीत?”(9)

साफ देखा जा सकता है चौहान जी के ये दोहे सद्गुरु रैदास के दोहों के क्रम में आये हैं। अर्थात चौहान जी अपने जीवन के अंतिम दौर में अपने पुरखों रैदास-कबीर के आंदोलन से जुड़ गए थे। आगे उन की कलम से आजीवक आंदोलन से जुड़ी ऐसी ही रचनाएँ निकलने वाली थीं। खैर, सूरजपाल चौहान दलित कौम के स्वतंत्र और असली साहित्यकार के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए हैं। जो हमारे लिए गर्व की बात है। हाथ में नये नये कलम थामे दलितों को चौहान जी से सीख लेनी चाहिए।

मेरा गांव कैसा गांव और ये दलितों की बस्ती है से चौहान काफी लोकप्रिय हुए थे। चौहान जी की महत्वपूर्ण और साहसिक रचनाएँ उनकी आत्मकथाएं ‘संतप्त’ और ‘तिरस्कृत’ हैं। हर दलित को चौहान जी की आत्मकथाओं को अवश्य पढ़ना चाहिए। अपनी आत्मकथा लिख कर चौहान जी ने दलित कौम की मूल और ऐतिहासिक समस्या को सब के सामने रखा।

दिल्ली कैंट के बाद अब त्रिलोकपुरी में दलित बेटी के साथ हैवानियत

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दिल्ली कैंट में गुड़िया के चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में फिर से एक दलित बेटी के साथ हैवानियत हुई है। बच्ची महज छह साल की है और आरोपी उसका पड़ोसी बताया जा रहा है। यह घटना समाज के बीमार लोगों की सच्चाई उजागर करती है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि आरोप है कि आरोपी की गिरफ्तारी से पहले पुलिस ने लगातार पीड़ित परिवार पर दबाव बनाया और मामला दर्ज नहीं करने को कहा। एक के बाद एक हो रही इस तरह की घटनाओं के कारण पुलिस विभाग लोगों के निशाने पर है।