IPL: फाइनल में पहुंचे चेन्नई किंग्स, बताया इनकी वजह से मिली जीत

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चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ दूसरे क्वालिफायर में 6 विकेट से जीत का श्रेय गेंदबाजों को दिया. उन्होंने कहा कि गेंदबाजी विभाग के लगातार अच्छे प्रदर्शन के दम पर ही उनकी टीम 8वीं बार आईपीएल फाइनल में पहुंचने में सफल रही. चेन्नई के गेंदबाजों ने दिल्ली को 9 विकेट पर 147 रनों पर रोक दिया था. चेन्नई ने 19 ओवरों में 4 विकेट पर 151 रन बनाकर जीत दर्ज की.

धोनी ने मैच के बाद कहा, ‘खिलाड़ियों ने जिस तरह का खेल दिखाया वह बेहतरीन था. स्पिनरों को कुछ टर्न मिल रहा था और हमने सही समय पर विकेट निकाले. उनके पास बाएं हाथ के बल्लेबाज थे और हमारे बाएं हाथ के स्पिनरों ने उनके सामने अच्छा प्रदर्शन किया.’ उन्होंने कहा, ‘अहम चीज लगातार विकेट हासिल करना रही. इसका श्रेय गेंदबाजों को दिए जाने की जरूरत है. कप्तान सिर्फ यही कहता है कि मुझे इसकी जरूरत है. इसके बाद ये उनका काम होता है कि वे कैसे गेंदबाजी करें. हम इस सत्र में अभी जहां पर हैं, उसके लिए गेंदबाजी विभाग को शुक्रिया. ’

दिल्ली के कप्तान श्रेयस अय्यर ने हार के लिए बल्लेबाजों को दोषी ठहराया, लेकिन साथ ही कहा कि उनके लिए यह सत्र शानदार रहा. अय्यर ने कहा, ‘हमारी शुरुआत निराशाजनक रही. हमने पावरप्ले में ही दो विकेट गंवा दिए, जिससे उबरना मुश्किल था. उनके पास शानदार स्पिनर हैं. कोई भी बल्लेबाज पारी को संवार नहीं पाया और अच्छी साझेदारियां नहीं निभाई गई.’

अय्यर ने कहा, ‘हमारे लिए परिणाम निराशाजनक है, लेकिन यह हमारे लिए अच्छी सीख है. हमारे लिए यह सत्र अच्छा रहा है.’ मुकाबले में फाफ डु प्लेसिस को ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया.

आतिशी के खिलाफ आपत्तिजनक पर्चे बांटने के लिए अखबार बेचने वाले को मिले थे पैसे: रिपोर्ट

पूर्वी दिल्ली में दो दिन पहले आम आदमी की प्रत्याशी आतिशी के खिलाफ आपत्तिजनक पर्चा बंटने को लेकर हंगामा खड़ा हो गया था. अब इस मामले में नया खुलासा हुआ है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक एक न्यूज़पेपर वेंडर को 300 पर्चे बंटाने के लिए पैसे दिए गए थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के योजना विहार इलाके के इस वेंडर ने कहा कि गुरुवार की सुबह उन्हें अखबार के साथ 300 पर्चे बांटने के लिए पैसे मिले थे, जिसे ‘ए’ और ‘सी’ ब्लॉक में बांटे गए. हर 100 पर्चे बांटने के लिए 15 रुपये दिए जाते हैं. हालांकि न्यूज़पेपर वेंडर एसोसिएशन के सचिव रामांकत ने कहा कि उनके वेंडर ने ये पर्चे नहीं बांटे थे. उन्होंने कहा कि पिछले 8 दिनों से वो लगातार आम आदमा पार्टी का पर्चा अखबार के साथ बांट रहे थे.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के रिटर्निंग ऑफिसर ने इस मामले में FIR दर्ज करने को कहा है. लोकसभा चुनाव 2019 के छठे चरण के तहत दिल्ली में 12 मई को वोटिंग है. मतदान से पहले राजनीतिक दलों के बीच घमासान मचा हुआ है. गुरुवार को पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने गौतम गंभीर पर आपत्तिजनक पर्चा बंटवाने का आरोप लगाया था. इसके बाद से दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है.

गंभीर ने कहा था कि अगर ये आरोप सही साबित हो गया, तो वो तुरंत अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे. साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि अगर आरोप साबित हुए फिर वो सबके सामने फांसी लगा लेंगे. इस बीच गंभीर ने सीएम अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आतिशी मारलेना पर मानहानि का नोटिस भेजा है. जवाब में आम आदमी पार्टी ने भी गंभीर के खिलाफ नोटिस भेजा है.

इस बीच आम आदमी पार्टी की आतिशी के गंभीर आरोपो पर उन्हें कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित का साथ मिला है. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने कहा है कि मैं गौतम गंभीर को जानता हूं, मुझे नहीं लगता है कि वह इस तरह की गिरी हुई हरकत करेंगे. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि आतिशी के खिलाफ जो पर्चा निकला है वह बहुत भद्दा है, उसकी निंदा होनी चाहिए.

साभार NEWS18

Fani Cyclone: तकनीक का इस्तेमाल कर बचाई गई हजारों की जान

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वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) की दो प्रयोगशालाओं की तकनीकों से ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश में गत दिनों आए ‘फेनी’ तूफान से कई लोगों की जान बचाई गई. इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ओडिशा के तटीय इलाके में बड़े पिरामिड ढांचे की छत वाले भवनों का निर्माण किया जा चुका है जिससे वहां काफी कम नुकसान होता है. इसी का नतीजा है कि पिछले 10 साल में आए कई चक्रवाती तूफानों में हजारों लोगों की जान अब तक बचाई जा सकी है.

सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं का काफी योगदान सीएसआईआर के महानिदेशक शेखर सी. मांडे ने बताया कि सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं की भवन निर्माण तकनीकों का काफी योगदान रहा है. उन्होंने बताया कि स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर, चेन्नई और सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, रुड़की ने भवन निर्माण की जो तकनीकें विकसित की हैं उनके आधार पर करीब 10 साल पहले भुवनेश्वर में मॉडल बिल्डिंग बनाए गए थे. ओडिशा में सीएसआईआर ने उस समय 75 ऐसे भवन बनाए थे जो तूफान से पूरी तरह सुरक्षित हैं.

तटीय इलाकों में पिरामिड ढांचे की छत वाले भवन मांडे ने बताया कि इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ओडिशा के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर पिरामिड ढांचे की छत वाले भवनों का निर्माण किया गया है जिससे अब वहां चक्रवाती तूफानों में घरों और लोगों की जान का नुकसान बेहद कम होता है. आंध्र प्रदेश में भी इस तरह के मॉडल भवन बनाए गए हैं. सीएसआईआर के महानिदेशक ने बताया कि वर्ष 1977 और 1999 में ओडिशा में आए चक्रवाती तूफानों में तकरीबन दस-दस हजार लोग अकाल काल के शिकार हो गए थे. लेकिन, पिछले कुछ समय में आए तूफानों में यह संख्या 20-30 या कभी-कभी इससे भी कम रहती है.

ओडिशा के सभी शिविरों में सीएसआईआर की डिजाइन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन काम करने वाले सीएसआईआर के महानिदेशक ने बताया कि ओडिशा में इस समय तूफान से सुरक्षित जितने शिविर बनाए गए हैं उनमें अधिकतर की डिजाइन परिषद की प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित तकनीकों पर आधारित है. इस प्रकार परिषद ने हजारों की संख्या में लोगों की जान बचाने में मदद की है. उन्होंने बताया कि स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर, चेन्नई में एक विंड टनल स्थापित किया गया है जिसमें तूफान जैसी स्थिति पैदा कर किसी ढांचे की मजबूती परखी जाती है. यह देश में इमारतों के ढांचों की मजबूती की जांच करने वाला सबसे अच्छा विंड टनल है.

अन्य तकनीकें भी मददगार सीएसआईआर की अन्य तकनीकें भी आपदा प्रभावित इलाकों में लोगों के राहत एवं पुनर्वास में मददगार हो रही है. ओडिशा में पिछले दिनों आए ‘फेनी’ तूफान से प्रभावित इलाकों में सीएसआईआर ने पानी को साफ करने वाला एक विशेष वाहन भेजा है जो किसी भी प्रकार के पानी को पानी को पीने लायक बनाता है. यह वाहन परिषद् की सेंट्रल सॉल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएसएमसीआरआई) द्वारा विकसित पानी साफ करने की प्रौद्योगिकी पर तैयार किया गया है.

आप लोग बहक गए, इसलिए कमजोर पड़ा आंदोलन : मायावती

नई दिल्ली। करीब 12 बजे से जीटीबी एनक्लेव का रामलीला मैदान बीएसपी के झंडों से पटने लगा था. समाजवादी पार्टी के झंडे भी लहरा रहे थे. भाषण दिए जाते रहे… बीच-बीच में ‘जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है’ और ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबेगा हाथी पर’ के नारे भी लगते रहे. माहौल में जोश भरने के लिए ‘बहन मायावती को पीएम बनावांगे, बाबा साहब के सपनो का देश बनावांगे’ का गाना बजाया जा रहा था. महिलाएं और युवक डांस भी कर रहे थे. ढाई घंटे के इंतजार के बाद मायावती का आगमन हुआ. वह कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर बरसीं.

बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि कांग्रेस के 90 साल के शासन में अति गरीब, किसान और अल्पसंख्यकों को उनके अधिकार से वंचित रखा गया. यही काम बीजेपी ने भी किया. गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों का विकास नहीं किया. इन दोनों पार्टियों के राज में आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल सका है. प्राइवेट सेक्टर में भी आज आरक्षण लागू नहीं कर सके हैं. मायावती ने ऐलान किया है कि केंद्र में उनकी सरकार बनती है तो वो अति गरीबों को स्थाई रोजगार देंगी. मायावती ने राज्य और केंद्र की ‘मास्टर की’ अपने पास रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि आपने सबको आजमा लिया है, अब बीएसपी को सत्ता में लाओ. समर्थकों को काशीराम की याद दिलाते हुए मायावती ने कहा कि दिल्ली उनकी कर्मभूमि रही है. उनका ज्यादातर मूवमेंट यहीं चला. यहां की कोई ऐसी बस्ती और मोहल्ला नहीं छोड़ा था, जहां पार्टी का नीला झंडा नहीं फहराया. आज यहीं पर उनका आंदोलन कमजोर पड़ गया है. आप लोग कुछ समय उनके साथ चले, लेकिन बाद में इधर-उधर बहक गए. नतीजतन कांग्रेस और बीजेपी को राज करने का मौका मिल गया. अन्ना आंदोलन की आड़ में आम आदमी पार्टी ने भी सत्ता हथिया ली, लेकिन आप अपने मूवमेंट को आगे नहीं बढ़ा पाए. कुछ विधायक जरूर चुने गए, लेकिन दिल्ली की सत्ता तक नहीं पहुंच सके. यूपी का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि वहां अब परिवर्तन की लहर आ गई है. प्रधानमंत्री समेत सभी बड़े नेताओं के चेहरे लटके हुए हैं. पड़ोसी राज्यों में चल रही परिवर्तन की लहर का असर दिल्ली पर भी होना चाहिए. हर बूथ पर अपना एक-एक वोट डलना चाहिए. समाजवादी पार्टी के लोग भी अपना वोट बीएसपी को ट्रांसफर करवाएं.

दिल्ली यूनिट को लिए आड़े हाथ

दिल्ली में बीएसपी के पांच कैंडिडेट उतारे हैं. मायावती ने भरी रैली में इसके लिए बीएसपी की दिल्ली यूनिट को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि हमें सातों सीटों पर चुनाव लड़ना था, लेकिन यहां के नेताओं की ढिलाई और गलती की वजह से हम दो सीटों पर कैंडिडेट नहीं उतार सके. प्रदेश की कार्यकारिणी को अपने काम में सुधार लाने की जरूरत है. उन्होंने चांदनी चौक से शाहिद अली, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से राजवीर सिंह, ईस्ट दिल्ली संजय गहलोत, वेस्ट दिल्ली सीता शरण सेन और साउथ दिल्ली से सिद्धांत गौतम को वोट देने की अपील की.

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जाति को लेकर BSP मुखिया मायावती का एक बार फिर PM मोदी पर हमला

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने पीएम नरेंद्र मोदी को लगातार अपने रडार पर रखा है. बसपा मुखिया मायावती ने जाति को लेकर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है.

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिया मायावती ने ट्वीट किया है कि श्री मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं. उन्होंने जातिवाद का दंश नहीं झेला है और जातियों को लेकर मिथ्या बातें करते हैं. बसपा प्रमुख ने कहा कि जातिवाद के अभिशाप से पीडि़त लोग कैसे इसका सामना करते हैं, इन्हें पता होना चाहिए. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं, इस बात को पूरा देश जानता है.

मायावती ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जन्म से पिछड़े नहीं हैं, बस राजनीतिक फायदे के लिए वह ऐसा कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के पहले चरण से ही मायावती और नरेंद्र मोदी के बीच जाति पर टिप्पणी को लेकर बहस छिड़ी हुई है. बसपा सुप्रीमो ने कहा कि जातिवाद के अभिशाप से पीडि़त लोग कैसे इसका सामना करते हैं, इन्हें पता होना चाहिए. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं, इस बात को पूरा देश जानता है.

बसपा मुखिया मायावती ने आरोप लगाया कि जातिवाद का दंश क्या होता है, इन्हें नहीं पता क्योंकि इन्होंने कभी इसे झेला ही नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से महागठबंधन को लेकर लगातार की जा रही बयानबाजी पर मायावती ने कहा कि गठबंधन के बारे में पीएम को इस तरह की गलत बातें नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि गठबंधन जाति के नाम पर वोट नहीं ले रहा है, लेकिन भाजपा वाले इस प्रकार का झूठ प्रचारित कर रहे हैं. पीएम मोदी तो चुनावी फायदे के लिए जबरदस्ती पिछड़ा बन रहे हैं, इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ के लिए हो रहा है.

बसपा प्रमुख ने दावा किया कि इस बार उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें मिलने जा रही हैं. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी चुनाव हारने जा रहे हैं, ये निश्चित हो गया है.

मायावती ने कहा कि पीएम मोदी को गठबंधन के लिए ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए क्योंकि ऐसे शब्द ठीक नहीं हैं. बसपा प्रमुख ने कहा कि मोदी ने खुद को जबरदस्ती का पिछड़ा घोषित कर रखा है. अगर वह जन्म से ही पिछड़े हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने देगा. संघ ने कल्याण सिंह जैसे पिछड़े वर्ग के नेता के साथ क्या किया, यह सबको मालूम है. मायावती ने कहा कि गठबंधन पर आरोप लगाने के बजाय मोदी को गुजरात में झांकना चाहिए. मुझे पता चला है कि वहां दलितों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार नहीं मिला है. वहां एक दलित युवक को अपनी शादी में घोड़े पर नहीं चढऩे दिया गया. गुजरात में दलितों पर जुल्म किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा सत्ता में नहीं आ रही है और मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं होगा.

इससे पहले भी मायावती और नरेंद्र मोदी के बीच इस मुद्दे पर जुबानी जंग छिड़ चुकी है. मायावती ने पीएम मोदी को एक फर्जी ओबीसी करार दिया था. मैनपुरी में जब मायावती ने मुलायम सिंह यादव के समर्थन में सभा की थी तो उन्होंने मुलायम सिंह को पिछड़ों का असली नेता बताया था और नरेंद्र मोदी को फर्जी ओबीसी का कहा था.

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जातिवादियों के आतंक से दलित परिवार को छोड़ना पड़ा इलाका

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बुराड़ी। करीब डेढ़ महीने बाद एक दलित पीड़ित परिवार की शिकायत पर बुराड़ी थाने में दबंग आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज हो सका. क्योंकि दंबगों ने न सिर्फ अछूत कहा बल्कि जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए दंपति को बुरी तरह पीटा था. पीड़ित दलित परिवार का कसूर सिर्फ इतना था कि वह हैंडपंप से पानी भरने पहुंचा और सवर्ण जाति के दबंगों ने उसे रोक दिया. आरोपियों के हमले में पत्नी की उंगली टूट गई थी जबकि पति का सिर फट गया था. इस हमले में पीड़ित दलित परिवार इस कदर डर गया कि मामले की पुलिस को इत्तला दी.

आरोप है कि कि पुलिस ने बजाय उनकी सुनने के हमलावरों की तरफदारी की. पीड़ित परिवार का दावा है कि इंसाफ के लिए दर दर भटके. दबंगों ने पुलिस से शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी. आखिरकार एससी-एसटी कमीशन के दखल पर अब 42 दिन बाद बुराड़ी थाने की पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मारपीट, जान से मारने की धमकी देने समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है.

आरोप है कि 28 मार्च को उनका बेटा गली में पानी भरने के लिए जा रहा था. उसी दौरान आरोपियों ने उसे पानी भरने से रोक दिया. बच्चे ने जब मां को बताया तो आरोपियों ने महिला और उसके पति पर हमला कर दिया. महिला के हाथ पर व पति के सिर पर रॉड मारी. परिवार का आरोप है कि पुलिस को फोन करने के बाद पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी. इसके बाद करीब एक सप्ताह पहले यहां से मकान खाली करके इलाके के संडे मार्किट में किराए पर घर लिया है. महिला का आरोप है कि ये सभी लोग इनके परिवार के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर डराते धमकाते हैं. उनको हैंडपंप से पानी भी नहीं भरने दिया जाता है.

पुलिस अफसरों का कहना है कि मामले में पीड़ितों व चश्मदीदों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट समेत सभी पहलुओं पर जांच की जा रही है. दरअसल, पीड़ित परिवार ए-ब्लॉक, वेस्ट कमल विहार, बुराड़ी में रहता है. परिवार में पति व तीन बच्चे हैं. महिला ने बयान दिया है कि पति मजदूरी करता है. अपना मकान है. इनके पड़ोस में पिंटू यादव, पन्ना लाल, चंदू यादव व अन्य लोग रहते हैं. पीड़ित दलित का आरोप है कि 2016 में अपना मकान बनाया था. 2017 में शिफ्ट किया. आसपड़ोस सवर्ण बाहुल्य इलाका है. इससे पहले भी कई बार छोटी छोटी बातों पर झगड़ा व मारपीट कर चुके हैं. आरोप है कि मकान खाली करके कहीं और चले जाने को कहते हैं.

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इन 7 सीटों में दलित वोट कर सकता है हार-जीत का फैसला

नई दिल्ली। दिल्ली में भले ही केवल एक सीट उत्तर पश्चिम आरक्षित हो लेकिन सभी सीटाें पर दलित वोटर किसी भी उम्मीदवार को हराने जिताने का माद्दा रखते हैं. पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली में पूर्वांचली वोटर का आंकड़ा अगर छोड़ दिया जाए तो तीन सीटों में सबसे अधिक दलित वोटर हैं, बची हुई सीटाें पर भी दलित वोटर कमजोर नहीं हैं. खास बात यह है कि जाट गूर्जर बाहुल्य क्षेत्र के रूप में जानी जाने वाली दक्षिणी दिल्ली में दोनों के वोटरों को जोड़ दिया जाए तो भी दलित वोटरों की संख्या अधिक है.

चांदनी चौक- दूसरे नंबर पर दलित मतदाताओं की संख्या उत्तर पश्चिमी के अलावा पश्चिम दिल्ली और दक्षिण दिल्ली में दलित मतदातों की संख्या अन्य जातियों के मुकाबले सबसे अधिक है. उत्तर पश्चिमी में दूसरे नंबर वैश्य तो पश्चिमी दिल्ली में दूसरे नंबर पर पंजाबी मतदाता है और दक्षिणी दिल्ली में दूसरे नंबर पर गुर्जर मतदाता है. वहीं, वैश्य बाहुल्य चांदनी चौक में दूसरे नंबर दलित मतदाताओं की संख्या है. दो सीटों पर पूर्वाचल के मतदाताओं का बोलबाला.

पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली से पूर्वांचली वोटर सबसे अधिक- उत्तर पूर्व और पूर्वी दिल्ली पर पूर्वाचल के मतदाताओं का बोलबाला है. लेकिन यहां दलितों की संख्या भी ठीक ठाक है. उत्तर पूर्व सीट पर 42 फीसदी पूर्वांचल के मतदाता हैं. ऐसे ही पूर्वी दिल्ली में 1945141 मतदाताओं में से पूर्वाचल के लोगों की संख्या 39 फीसदी के करीब है. इन्हीं दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं 13 फीसदी के करीब अन्य सीटों की तुलना में अधिक है.

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पुलिस की सुरक्षा में निकली दलित दूल्हे की बारात

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अहमदाबाद। 10 मई (भाषा) गुजरात के साबरकांठा जिले के एक गांव में ग्रामीणों के एक वर्ग से तीखी प्रतिक्रिया मिलने की आशंका से एक दलित दूल्हे ने शुक्रवार को पुलिस की सुरक्षा में अपनी बारात निकाली. एक अधिकारी ने यह जानकारी दी. गांव के नेता रंजीतसिंह राठौड़ ने बताया कि गांव से होकर बारात निकालने की उनकी योजना को लेकर कुछ गैर दलित निवासियों के आपत्ति जताने के बाद प्रांतिज तालुका के तहत सितवाड़ा गांव के रहने वाले दूल्हे के परिजनों ने पुलिस सुरक्षा मांगने का फैसला किया. पुलिस के अनुसार दूल्हे को बारात निकालने के दौरान सुरक्षा दी गयी और बारात शांतिपूर्ण तरीके से निकली. प्रांतिज के पुलिस इंस्पेक्टर के. एस. ब्रह्मभट्ट ने कहा, ‘‘सितवाड़ा के अनुसूचित जाति के लोगों को आशंका थी कि अगर उन्होंने गांव से होकर बारात निकाली तो कुछ गलत हो सकता है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए उन्होंने हमसे सुरक्षा मांगी. गांव में पुलिस के तैनात रहने से बारात शांतिपूर्ण ढ़ंग से निकली.’’

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प्रतीकात्मक

गुजरात के मेहसाणा जिले के एक गांव में दलित व्यक्ति के अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने का खामियाजा पूरे समुदाय को भुगतना पड़ा है. पूरे गांव ने अनुसूचित जाति(एससी) समुदाय के लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया है. पुलिस ने गुरुवार को यह जानकारी दी. पुलिस के अनुसार कडी तालुका के लोर गांव के अगड़ी जाति के लोग दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के कदम से कथित रूप से नाखुश थे. घटना मंगलवार की है.

गांव के सरपंच विनूजी ठाकोर ने गांव के अन्य नेताओं के साथ फरमान जारी कर गांववालों को दलित समुदाय के लोगों का बहिष्कार करने को कहा. उन्होंने बताया कि इस संबंध में ठाकोर को गिरफ्तार कर लिया गया है. पुलिस उपाधीक्षक मंजीत वंजारा ने बताया, ”सात मई को मेहुल परमार की बारात गांव से गुजर रही थी. चूंकि परमार एक दलित है इसलिए गांव के कुछ नेताओं ने इस पर आपत्ति की और समुदाय के लोगों को अपनी हद पार नहीं करने की चेतावनी दी.

जब दूल्हे के फैसले ने उसे पहुंचाया सलाखों के पीछे, जानें ऐसा क्या हुआ

उन्होंने बताया, ”अगले दिन गांव के कुछ प्रमुख ग्रामीणों ने दलितों के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की. इसके अलावा समुदाय के लोगों से बात करने या उनके साथ किसी तरह का मेलजोल रखने वालों पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाये जाने की भी घोषणा की गयी थी. वंजारा बृहस्पतिवार को दलित ग्रामीणों द्वारा फोन किये जाने के बाद गांव पहुंची थीं.

उन्होंने बताया कि गांव के सरपंच विनूजी ठाकोर की गिरफ्तारी के अलावा चार अन्य के खिलाफ भी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामले दर्ज किये गये हैं. पत्रकारों से बात करते हुए मेहुल परमार ने कहा कि बहिष्कार के आह्वान के बाद दुकानदारों ने उन्हें दूध या अन्य जरूरी घरेलू सामान तक बेचने से मना कर दिया था.

उन्होंने कहा, ”जब मैं घोड़ी चढ़ा तो कुछ ग्रामीणों ने मुझे इस तरह से बारात नहीं निकालने को कहा था. आज सुबह जब हमें सामाजिक बहिष्कार का पता चला तो हमने पुलिस की मदद मांगी. सुबह चाय बनाने के लिये किसी ने हमें दूध तक न”

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अलवर सामूहिक बलात्कार, जाति और हिंदू संस्कृति

18 वर्षीय दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की रूह कंपा देने वाली घटना किसी भी इंसान को स्तब्ध कर देने वाली. 5-6 बलात्कारियों 3 घंटे तक बारी-बारी से महिला के साथ बलात्कार किया. इस दौरान वे महिला और उसके पति को पीटते रहे. बलात्कारियों का दुस्साहस देखिए वे बलात्कार का वीडियो भी बनाते रहे. इतना नहीं उन्होंने बलात्कार के बाद इन वीडियों को नष्ट करने के लिए 9 हजार रूपए की भी मांग की. यह सब तब हुआ जब पति-पत्नी शादी की खरीदारी के लिए अलवर जा रहे थे.

इस पूरी घटना को पुलिस, राजनेता और बलात्कारियों के संरक्षकों के सहयोग से कई दिनों तक छिपाया गया. इसका एक कारण यह भी था कि इस घटना के सामने आने से दलित समाज में व्यापक आक्रोश पैदा हो सकता था और इससे राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेसी सरकार के उम्मीदवार को चुनावी नुकसान हो सकता था.

आइए भारत मे बलात्कार संबंधी कुछ तथ्यों को देख लें- ● भारत में प्रत्येक दिन 106 महिला बलात्कार का शिकार होती है. ● सामाजिक तबकों के आधार पर सर्वाधिक बलात्कार की शिकार आदिवासी, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलायें होती हैं. ● औसतन प्रत्येक दिन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ● बलात्कार की शिकार महिलाओं में 94 प्रतिशत 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां हैं. ● दुधमुँही मासूम बच्ची से लेकर 70 साल की दादी-परदादी भी बलात्कार का शिकार होती हैं बलात्कार को हिंदू धर्म और संस्कृति में पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है-

डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियां ( बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाग्मय खंड-8 ) के भाग-एक की पन्द्रहवीं पहेली के परिशिष्ट-3 में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बलात्कारी चरित्र की ओर चर्चा की है. आंबेडकर ने लिखा, “ तीनो देव ( ब्राह्मा, विष्णु और शिव ) सती ( अनसूया ) का शील-हरण करने अत्रि (ऋषि ) की कुटिया की ओर चल पड़े. इन तीनों ने ब्राह्मण भिक्षुओं का वेष धारण किया. जब वे वहां पहुंचे, अत्रि बाहर गए हुए थे. अनसूया ने उनका स्वागत किया और उनके लिए भोजन तैयार किया.” इन तीनों ने उनसे निर्वस्त होने को कहा. आंबेडकर विस्तार से पूरी कथा सुनाते हैं. अंत में आंबेडकर की टिप्पणी इस प्रकार है, “इस कहानी में अनैतिकता की दुर्गंध भरी पड़ी है और उसके अंत को जान-बूझकर ऐसा मोड़ दिया गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु,महेश के उस वास्तविक कुकर्म पर पर्दा डाल दिया जाय.” ( पृष्ठृ173-174 ). आंबेडकर ब्राह्मा द्वारा अपनी बेटी वाची के साथ बलात्कार की भी चर्चा करते हैं.’’(पृ.177)

मनुस्मृति भी जाति के आधार पर स्त्रियों के साथ बलात्कार को प्रोत्साहित करती है-

मनुस्मृति में जहां एक ओर शूद्र वर्ण के किसी व्यक्ति द्वारा ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर शूद्र को प्राण दंड का आदेश देती है- अब्राह्मण: संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति. चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमा: सदा.. (8.359 ) वहीं यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसे केवल पांच सौ पर्ण का आर्थिक दंड देना होगा- अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शूद्रा वा ब्राह्मणो व्रजन् . शतानि पच्च दण्ड्य: स्यात्सहस्रं त्वन्त्ज्यस्त्रियम्..(8.385 )

हिंदू राष्ट्र के आधुनिक विचारक-नायक सावरक बलात्कार को वीरतापूर्ण और शौर्यपूर्ण कार्य कार्य मानते थे, उन्होंने अपनी किताब सिक्स ग्लोरियस इकोज ऑफ इंडियन हिस्ट्री में इस बात के पक्ष में तर्क दिया है कि, क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार जायज है. वे इतने पर ही नहीं रूकते हिंदुओं को ललकारते हुए कहते हैं कि “ यदि अवसर उपलब्ध हो तो ऐसा न करना कोई नैतिक या वीरतापूर्ण काम नहीं है,बल्कि कायरता है”.(See Chapter VIII of the online edition made available by Mumbai-based Swatantryaveer Savarkar Rashtriya Smarak). उनकी यह किताब 1966 में मराठी में प्रकाशति हुई थी.

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इंदौर की सफाईकर्मी ने सोना गिरवी रख बेटी को पढ़ाया, अब उसे 1 करोड़ की स्कॉलरशिप मिली

इंदौर (मध्यप्रदेश)। सफाईकर्मियों की बदौलत जहां इंदौर सफाई में देश में पहले नंबर पर आया है. वहीं, अब एक महिला सफाईकर्मी नूतन घावरी की बेटी रोहिणी को प्रदेश सरकार के अनुसूचित जनजाति विभाग ने एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप दी है. मार्केटिंग में एमबीए कर चुकी रोहिणी अब पीएचडी के लिए स्कॉटलैंड जाएंगी. रोहिणी की मां नूतन कर्मचारी राज्य बीमा निगम अस्पताल में सफाईकर्मी हैं.

नूतन बताती हैं, “मैं दस साल तक रोहिणी को अपने साथ ही ड्यूटी पर ले जाती थी, लेकिन उसका मन तो पढ़ाई-लिखाई में ही लगता था. उसने आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो हम भी मना नहीं कर पाए. सोना गिरवी रखकर उसे पढ़ाया. सोना आज भी गिरवी रखा हुआ है.” वहीं, रोहिणी ने बताया कि मैं जब भी परिवार के साथ किसी शादी समारोह में जाती थी, तो लोग पापा को ताने मारते हुए कहते थे कि बेटी बड़ी हो गई है. हाथ पीले कर दो नहीं तो अच्छा लड़का नही मिलेगा. अब वे लोग ही पापा को बधाई देते हैं और अपने बच्चों को मेरा उदाहरण देते हैं.

रोहिणी के साथ भाई-बहनों की भी खेल में रुचि : राेहिणी वालीबाॅल की राष्ट्रीय खिलाड़ी भी हैं. उसकी दो बहनें- कोमल, अश्विनी, एक भाई हर्ष है. कोमल नीट क्वालिफाई हैं. अश्विनी 12वीं में है और वह भी स्टेट लेवल की वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं. भाई हर्ष नेशलन अंडर 14 बास्केटबाॅल टीम का कप्तान है.

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काशी विश्वानाथ कॉरिडोर से ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर क्यों परेशान हैं वाराणसी के मुस्लिम?

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वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर गंगा के तट तक बनने वाले कॉरिडोर से एक तरफ वाराणसी में लोगों को इस बात की प्रसन्नता है कि इससे गंदगी खत्म होगी और मंदिर आने वाले लोगों को सहूलियत मिलेगी. दूसरी तरफ शहर के मुस्लिमों की बात करें तो उन्हें मंदिर से सटकर ही बनी ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर चिंता सता रही है. बात 25 अक्टूबर, 2018 की है, एजाज मोहम्मद इस्लाही रात को 10 बजे ज्ञानवापी मस्जिद से लौटे ही थे कि उनका फोन बजने लगा. फोन रिसीव करते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘मस्जिद का चबूतरा तोड़ा जा रहा है.’

इस्लाही तुरंत मस्जिद की ओर दौड़े, जहां सैकड़ों की संख्या में लोग जुटे हुए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे. मंदिर के गेट नंबर 4 के पास बने ज्ञानवापी मस्जिद का चबूतरा काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के निर्माण के लिए तोड़ा जा रहा था. 17वीं शताब्दी की इस मस्जिद के केयरटेकर बताते हैं कि उस वक्त गुस्साई भीड़ के चलते चबूतरे को तोड़ना बंद कर गया और जिला प्रशासन ने इसे एक बार फिर से बनवा दिया. हालांकि इसे लेकर अब भी मुस्लिमों की चिंता खत्म नहीं हुई है. यह मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड की संपत्ति है.

ज्ञानवापी मस्जिद की ऐडमिनिस्ट्रेटिव कमिटी के सदस्य अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, वाराणसी के जॉइंट सेक्रटरी एस. एम. यासीन का कहना है, ‘बाबरी मस्जिद जैसी ही स्थिति ज्ञानवापी मस्जिद की भी हो सकती है.’ वह कहते हैं, ‘मुझे आज भी वह नारा याद है, जो 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद कारसेवक लगाते थे. वह नारा था, अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा अभी बाकी है.’

हालांकि, जिला प्रशासन का कहना है कि इस तरह के डर की बात निराधार है. वाराणसी के जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘बैरिकेड्स के पीछे मस्जिद पूरी तरह से सुरक्षित है. आगे भी सेफ रहेगी और उसे कोई नुकसान नहीं होगा.’ हालांकि, वह यह भी कहते हैं कि जिस चबूतरे को लेकर सवाल उठाया जा रहा है, वह मस्जिद परिसर का हिस्सा नहीं है. सुन्नी वक्फ बोर्ड के कब्जे में है, लेकिन धार्मिक स्थान नहीं है.

फिर आखिर क्या वजह है कि काशी विश्वनाथ प्रॉजेक्ट को लेकर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को आशंका है. इसका जवाब यह है कि उन्हें मंदिर और मस्जिद की ओर जाने वाली संकरी गलियों के चौड़ीकरण को लेकर चिंता है. यासीन कहते हैं, ‘अबतक इन तंग गलियों की दुकानों और घरों ने मस्जिद को ढके रखा है. अब यह घेरा हट जाएगा और यह मंदिरों से घिर जाएगी.’ मस्जिद के इमाम मुफ्ती अब्दुल बातिन नोमानी कहते हैं कि हमें कॉरिडोर से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिस तरह से उस पर काम हो रहा है, उससे जरूर हम चिंतित हैं.

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15 अगस्त तक टला अयोध्या का मुद्दा

अयोध्या मामले पर मध्यस्थता की प्रक्रिया के आदेश के बाद शुक्रवार को पहली बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान जस्टिस एफएमआई खलीफुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें मध्यस्थता प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 15 अगस्त तक का समय मांगा गया. इसके बाद कोर्ट ने मामले की मध्यस्थता का समय 15 अगस्त तक बढ़ा दिया.

इस दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा, ‘हम मामले में मध्यस्थता कहां तक पहुंची, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकते हैं. इसको गोपनीय रहने दिया जाए. इस दौरान वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा, ‘हम कोर्ट के बाहर बातचीत से समस्या के हल निकालने का समर्थन करते हैं.’ साथ ही मुस्लिम याचिकाकर्ताओं की ओर से अनुवाद पर सवाल उठाते हुए कहा कि अनुवाद में कई गलतियां हैं. पांच वक्त नमाज और जुमा नमाज को लेकर गलतफहमी है.

इसके बाद कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकार को अपनी आपत्तियों को लिखित में दाखिल करने की इजाजतत दे दी. आपको बता दें कि अयोध्या मामले में अभी 13 हजार 500 पेज का अनुवाद किया जाना बाकी है. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नजीर की संवैधानिक बेंच कर रही है. अब 15 अगस्त के बाद ही पता चलेगा कि मध्यस्थता प्रक्रिया ने क्या हासिल किया, क्योंकि अदालत ने आदेश दिया था कि प्रक्रिया पूरी तरह से गोपनीय होनी चाहिए.

इससे पहले 8 मार्च को अयोध्या की भूमि पर मालिकाना हक केे मामले को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की इजाजत दी थी. मध्यस्थों की कमेटी में जस्टिस इब्राहिम खलीफुल्ला, वकील श्रीराम पंचू और आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर शामिल हैं. इस कमेटी के चेयरमैन जस्टिस खलीफुल्ला हैं.

इस कमेटी को 8 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया था. कोर्ट ने कहा था कि मध्यस्थता पर कोई मीडिया रिपोर्टिंग नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की प्रक्रिया को फैजाबाद में करने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी तरह से गोपनीय होनी चाहिए. कोई भी मीडिया, न तो प्रिंट और न ही इलेक्ट्रॉनिक को कार्यवाही की रिपोर्ट करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने जो 8 हफ्ते की समय सीमा दी थी वो 3 मई को समाप्त हो गई.ऐसे में आज मालूम पड़ सकता है कि 8 हफ्ते की जो मध्यस्थता प्रक्रिया थी उसमें क्या हासिल हुआ. जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नाज़ेर की पीठ ने भी मध्यस्थता पैनल से चार सप्ताह के बाद कार्यवाही की स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा था, उनका कहना था कि यह मुद्दा 1,500 वर्ग फुट भूमि का नहीं था, बल्कि धार्मिक भावनाओं का था.

सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ सुनवाई कर रहा है. कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या के विवादित स्थल को रामजन्मभूमि करार दिया था.

हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का बंटवारा कर दिया गया था. इस जमीन को तीन हिस्सों में बांटा गया था. जिसमें ने एक हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया जिसमें राम मंदिर बनना था. दूसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था. विवादित स्थल का तीसरा निर्मोही अखाड़े को दिया गया था. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई.

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आतिशी vs गौतम गंभीर: आरोपों पर संग्राम और मानहानि का नोटिस, जानिए पूरा मामला

नई दिल्ली। दिल्ली में लोकसभा चुनाव की वोटिंग से महज 2 दिन पहले ईस्ट दिल्ली से AAP उम्मीदवार आतिशी ने बीजेपी के अपने प्रतिद्वंद्वी गौतम गंभीर पर अपने खिलाफ ‘अश्लील और अपमानजक पर्चे’ बंटवाने का आरोप लगाया है. BJP उम्मीदवार पर ओछी राजनीति का आरोप लगाते हुए आतिशी गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में भावुक हो गईं. जवाब में गंभीर ने AAP पर चुनाव जीतने के लिए ओछी हरकत का आरोप लगाते हुए आतिशी और अरविंद केजरीवाल को खुद पर लगे आरोपों को साबित करने की चुनौती दी है. देर रात गंभीर ने आतिशी और केजरीवाल के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला भी दर्ज कराया है. चुनाव आयोग ने भी आतिशी के खिलाफ कथित तौर पर बांटे गए पर्चे का संज्ञान लिया है, वहीं दिल्ली महिला आयोग ने दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजकर 11 मई तक जवाब मांगा है कि मामले में क्या कार्रवाई हुई है. आइए विस्तार से समझते हैं कि पूरा विवाद क्या है और इसमें अबतक क्या-क्या हुआ है.

पर्चा पढ़ते वक्त भावुक हुईं आतिशी पूर्वी दिल्ली से ‘आप’ उम्मीदवार आतिशी गुरुवार को अपने खिलाफ ‘आपत्तिजनक और अपमानजनक’ टिप्पणियों से भरा एक पर्चा पढ़ते समय रो पड़ीं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में आतिशी ने बीजेपी उम्मीदवार गौतम गंभीर पर पर्चे बंटवाने का आरोप लगाया. कहा कि बड़े दुख की बात है कि बीजेपी सत्ता के लालच में इतने निचले स्तर तक जा सकती है. आतिशी ने कहा जब गौतम गंभीर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ने आए थे तो मैंने उनका स्वागत किया था. नामांकन के समय जब वह मुझे मिले थे, तो मैंने कहा था- अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए. लेकिन गौतम गंभीर और उनकी पार्टी ने दिखा दिया है कि वह चुनाव में कितना नीचे गिर सकते हैं. आतिशी ने आरोप लगाया कि गौतम गंभीर और बीजेपी वालों ने पूर्वी दिल्ली के अलग-अलग अपार्टमेंट, विवेक विहार, कृष्णा विहार में ये पर्चे बंटवाए हैं. इस दौरान दिल्ली के डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया भी मौजूद थे.

आतिशी ने दावा किया कि बीजेपी के लोगों ने ये पर्चे अखबार डालनेवालों के जरिए बंटवाए हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने उनके चरित्र पर गंदे-गंदे आरोप लगाए हैं. उनके परिवार के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया है. आतिशी ने बीजेपी उम्मीदवार से सवाल किया कि अगर वह अपने खिलाफ चुनाव लड़नेवाली महिला उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव जीतने के लिए इस प्रकार के पर्चे बंटवा सकते हैं, तो चुनाव जीतने के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या करेंगे? उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि यह बहुत गंभीर मामला है. हम लोग भी राजनीति में हैं. लेकिन इस प्रकार की घटिया राजनीति लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटना है. सिसोदिया ने कहा कि हर पार्टी में महिलाएं चुनाव लड़ती हैं. हमारी पार्टी से भी लड़ रही हैं. जब आपको दिखाई दे रहा है कि आप हार रहे हो तो एक महिला के खिलाफ इतने घटिया स्तर की राजनीति करने लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी उम्मीदवार गौतम गंभीर से सवाल पूछते हुए सिसोदिया ने कहा कि इस तरह की घटिया स्तर की राजनीति करके आप चुनाव जीतना चाहते हैं. दिल्ली की जनता 12 मई को बीजेपी को इसका जवाब जरूर देगी. सिसोदिया ने कहा कि जब गौतम गंभीर देश के लिए खेलते थे तो हम उनके लिए तालियां बजाते थे. इस तरह की राजनीति की जाएगी, ऐसी उम्मीद उनसे नहीं थी.

गंभीर ने दी चुनौती, भेजा मानहानि का नोटिस आतिशी की ओर से लगाए गए आरोपों का बीजेपी प्रत्याशी गौतम गंभीर ने जवाब देते हुए पलटवार भी किया है. उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुनौती देते हुए कहा कि अगर मुझ पर लगे आरोप सही साबित हुए, तो मैं चुनाव से तुरंत हट जाऊंगा या इस्तीफा दे दूंगा, लेकिन आरोप साबित नहीं हुए, तो क्या आप हमेशा के लिए राजनीति छोड़ेंगे? गंभीर ने पूछा- क्या उन्हें चुनौती मंजूर है? बीजेपी नेताओं ने आप के आरोपों को ओछी राजनीति का नया उदाहरण बताते हुए आरोप लगाया कि खुद आपवालों ने ही आपत्तिजनक पर्चे छपवाए और बंटवाए हैं. गौतम गंभीर ने इस मामले में आतिशी, मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल के खिलाफ देर रात मानहानि का नोटिस भेजा. BJP कैंडिडेट ने लीगल नोटिस भेजकर अपने खिलाफ दिए बयानों को वापस लेने और माफी मांगने या फिर मानहानि केस का सामना करने को कहा है.

गौतम ने ट्वीट कर कहा, ‘अरविंद केजरीवाल, आपने एक महिला को अपमानित करने का बेहद घृणित कृत्य किया है. वह भी उसे, जो आप ही की साथी है. और ये सब किसलिए? सिर्फ चुनाव जीतने के लिए?’ एक अन्य ट्वीट में गंभीर ने लिखा, ‘अरविंद केजरीवाल और आतिशी, आप दोनों को मेरी चुनौती है. मैं घोषित करता हूं कि अगर यह साबित होता है कि ये सब मैंने किया है, तो मैं अभी अपनी उम्मीदवारी वापस ले लूंगा. लेकिन अगर ये साबित नहीं हुआ, तो क्या आप राजनीति छोड़ोगे?’ बाद में गौतम ने एक बयान जारी कर कहा कि आतिशी को लेकर गंदे पर्चे जारी करने का जो खेल खेला गया है, यह उन्हीं लोगों के लिए आत्मघाती साबित होगा. कहा- मेरे परिवार में 5 महिलाएं हैं. कभी ऐसी ओछी राजनीति नहीं करूंगा. आम आदमी पार्टी ऐसे ट्रिक्स खेलने की आदी है, इस बार मैं इनको बचकर नहीं जाने दूंगा. केजरीवाल और उनकी पार्टी को अदालत में जवाब देना होगा.’ ‘जिसके लिए पर्चे छपे, सिर्फ उन्हीं को मिले’ गंभीर ने कहा कि यह बड़ी अजीब बात है कि पर्चे आम आदमी पार्टी को लेकर छपते हैं और केवल उनको ही मिलते हैं और वे ही उन्हें मीडिया को बांटते हैं. बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने कहा कि चुनावों से पहले विरोधियों पर ऐसे आरोप लगाने का आम आदमी पार्टी का शुरू से चरित्र रहा है. सवाल यह है कि आप नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले किसी को न तो वे पर्चे मिले और ना सोशल मीडिया पर किसी ने उन्हें शेयर किया.

पर्चे पर चुनाव आयोग ने दिए जांच के आदेश आतिशी से जुड़े विवादित पर्चे पर जिला चुनाव अधिकारी ने संज्ञान लिया है. उन्होंने लक्ष्मी नगर थाने के एसएचओ को निर्देश दिया है कि वह इस मामले की जांच करें और भारतीय चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक जरूरी कदम उठाएं. ईस्ट दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट और जिला चुनाव अधिकारी के महेश ने विवादित पर्चे की वॉट्सऐप पर सर्कुलेट की जा रही कॉपी संबंधित पुलिस अधिकारी को भिजवाते हुए यह आदेश जारी किया. हालांकि, चुनाव अधिकारी के आदेश में कहीं भी इस बाबत एफआईआर दर्ज करने का जिक्र नहीं है.

दिल्ली महिला आयोग ने दिल्ली पुलिस को नोटिस भेज मांगा जवाब ईस्ट दिल्ली से आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार आतिशी के खिलाफ छापे गए पम्फैलेट को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली महिला आयोग ने दिल्ली पुलिस को नोटिस देकर पूछा है कि इस मामले में उसने क्या ऐक्शन लिया गया है. आयोग की चीफ स्वाति जयहिंद ने ईस्ट दिल्ली के डीसीपी को नोटिस देकर पूछा है कि मीडिया से आयोग को पता चला है कि आतिशी के खिलाफ आपत्तिजनक पैम्फलेट बांटे गए हैं, क्या इस मामले में उसने एफआईआर दर्ज की है. स्वाति ने पुलिस से कहा है कि अगर एफआईआर नहीं दर्ज की गई है तो इसकी वजह क्या है? क्या दोषी की पहचान हुई है या वो पकड़ा गया है? आयोग ने पूछा है कि पुलिस ने अब तक क्या कदम उठाए हैं और मामले का स्टेटस अभी क्या है? आयोग ने सभी सवालों का जवाब 11 मई दोपहर 12 बजे तक देने को कहा है.

आयोग ने कहा है कि यह पैम्फलेट शर्मनाक, अपमानजनक और महिला विरोधी है. आतिशी के साथ डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया की मां के खिलाफ भी शर्मनाक और आपत्तिजनक बातें लिखी हैं. उन्होंने कहा कि यह महिला कैंडिडेट की मर्यादा पर हमला है.

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मोदी की सवर्णपरस्ती से पैदा हुये : लोकतंत्र के ढांचे के विस्फोटित होने लायक हालात!

सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव समापन की ओर अग्रसर है. अब इसके सिर्फ दो चरण बाकी रह गए हैं. इस बीच पक्ष-विपक्ष बदजुबानी जंग पर उतारु हो आया है. इनमें मोदी जिस तरह की स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे पूरा देश स्तब्ध है. लेकिन इस मामले में विपक्ष, खासकर कांग्रेस भी दूध की धुली नहीं है, मोदी ने यह प्रमाणित करने का अभियान 8 मई से कुरुक्षेत्र से शुरू कर दिया है . इस सभा में उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में अपने खिलाफ इस्तेमाल किये गए एक-एक अपशब्दों को गिनाते हुए कहा कि मुझे प्रधानमंत्री बनने के पहले गन्दी नाली का कीड़ा, गंगू तेली, पागल कुत्ता, भष्मासुर, बन्दर, वायरस, दाउद इब्राहीम जैसा, हिटलर, बदतमीज-नालायक, रैबीज पीड़ित, लहू पुरुष, असत्य का सौदागर,रावण, सांप, बिच्छू, मौत का सौदागर तक कहा गया. उन्होंने राहुल गाँधी पर तंज कसते हुए कहा कि वह प्रेम की भाषा बोलने का दावा करते हैं, लेकिन प्रधानमन्त्री बनने के बाद मुझे मोस्ट स्टूपिड पीएम, जवानों के खून का दलाल, गद्दाफी, हिटलर, मुसोलिनी, मानसिक तौर पर बीमार, नीच, मोदी के पिता-दादा का नाम नहीं मालूम, नालायक व नाकारा बेटा, निकम्मा , नशेड़ी और औरंगजेब जैसे नाम दिए गए. मोदी ने कहा कि सार्वजानिक मंचों से इनका उल्लेख करना उचित नहीं था,परन्तु अपने घर हरियाणा में पहुंचकर दर्द भरी दास्तान पहली बार सुना रहे हैं. अंत में उन्होंने जनता से अपील की कि उनपर लगातार जुल्म हो रहा है. इसे सोशल मीडिया के जरिये घर-घर पहुचाएं. बहरहाल मोदी अपने खिलाफ इस्तेमाल किये गए प्रायः हर अपशब्द को ही गिनाया है, पर, यह नहीं बताया कि उन्हें लोग सवर्णपरस्त और लोकतंत्र को संकटग्रस्त करनेवाला पीएम भी बताते रहे हैं. बहरहाल मोदी ने चुनाव का इमोशनल मुद्दा बनाने के लिए अपशब्दों की जो फेहरिश्त जनता के बीच रखी है, हो सकता है उससे सहमत होना कठिन हो. पर, उन्होंने अपनी सवर्णपरस्ती से जिस लोकतंत्र का हम महापर्व मना रहे है तथा जिस लोकतंत्र पर हमारे गर्व का अंत नहीं है,उसे संकटग्रस्त किया है, इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती. इसे समझने के लिए संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा लोकतंत्र की सलामती के लिए सुझाये गए मन्त्र को एक बार फिर से समझ लेना होगा.

बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने राष्ट्र को संविधान सौंपने के एक दिन पूर्व 25 नवम्बर, 1949 को संसद के सेन्ट्रल हॉल से लोकतंत्र को बचाए रखने की शर्त से अवगत कराते हुए चेतावनी के स्वर में कहा था,’26 जनवरी,1950 से हमलोग एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं. राजनीति के क्षेत्र में हमलोग समानता का भोग करेंगे, किन्तु आर्थिक और सामाजिक जीवन में हमें मिलेगी भीषण असमानता. राजनीति के क्षेत्र में हमलोग एक वोट एवं प्रत्येक वोट के एक ही मूल्य की स्वीकृति देने जा रहे हैं..हमलोगों को निकटम भविष्य के मध्य अवश्य ही इस विपरीतता को दूर कर लेना होगा. अन्यथा यह असमानता कायम रही तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के उस ढाँचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है’. तो क्या संविधान निर्माता की इस चेतावनी से यह स्पष्ट नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र के सलामती की सबसे अनिवार्य शर्त थी, आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा ! चूँकि सारी दुनिया में ही शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक-धार्मिक) का लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा कराकर ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक विषमता की सृष्टि की जाती रही है, इसलिए इसके निवारण के लिए विभिन्न सामाजिक समूहों के मध्य संख्यानुपात में शक्ति के स्रोतों से बंटवारे से भिन्न कोई उपाय नहीं रहा . इस बात को दृष्टिगत रखकर ही लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, और नए-नवेले दक्षिण अफ्रीका इत्यादि ने शक्ति –वितरण में इस सिद्धांत का अनुसरण किया. इसके फलस्वरूप इन देशों में विभिन्न वंचित नस्लीय समूहों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों इत्यादि को शासन-प्रशासन सहित अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में वाजिब हिस्सेदारी मिली. इससे वहां आर्थिक और सामाजिक विषमताजन्य विछिन्नता-विद्वेष, अशिक्षा-गरीबी-कुपोषण इत्यादि का खात्मा और लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण हुआ. लेकिन आजाद भारत के शासकों ने इसकी अनदेखी कर दिया. फलतः कई सौ जिले नक्सलवाद/माओवाद की चपेट में आ गए. इस स्थिति की भयावह घोषणा 6 मार्च ,2010 को माओवादी नेता कोटेश्वर राव उर्फ़ किशन जी ने इन शब्दों में की–‘हम 2050 के बहुत पहले भारत में तख्ता पलटकर रख देंगे. हमारे पास यह लक्ष्य हासिल करने के लिए पूरी फ़ौज है.’ जाहिर है जिस फ़ौज के बूते उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर पर कब्जा जमाने की धमकी दी थी, वह और कोई नहीं शक्ति के स्रोतों से वंचित लोगों की जमात थी. उनकी उस चेतवानी के बाद उम्मीद बंधी थी कि बारूद की ढेर पर खड़े विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सलामती को ध्यान में रखकर देश के हुक्मरान शक्ति के स्रोतों के वाजिब बंटवारे की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगे, ताकि उस आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा हो सके , जो लोकतंत्र की सलामती की सबसे अनिवार्य शर्त है. इस लिहाज से जब हम मोदी राज का आंकलन करते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.कारण मोदी राज में आर्थिक और सामाजिक विषमता को जिस बिंदु पर पहुंचा दिया गया है, उसका विस्फोटक परिणाम कभी भी सामने आ सकता है.

बहरहाल कल तक देश के प्रधानमंत्री से लेकर गृह-मंत्री और असंख्य बुद्धिजीवी जिस माओंवाद/नक्सलवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या बताते रहे,उसके प्रति अज्ञात कारणों से मोदी राज में उतनी चिंता जाहिर नहीं की गयी,जबकि सचाई है कि मोदी राज में धन-दौलत के अत्यंत असमान बंटवारे के कारण विषमता की समस्या पहले से और ज्यादा गंभीर रूप अख्तियार करती गयी. मोदी राज में समय-समय पर माओवादियों द्वारा बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा, पर, सरकार हमेशा इसे हलके में लेते हुए माओवाद का सर कुचल देने की घोषणा करती रही. उधर बीच-बीच में अख़बार यह चेतावनी देते रहे हैं,‘ आर्थिक गैर-बराबरी देश में उथल-पुथल को जन्म देती रही है इसलिए धन-दौलत का न्यायपूर्ण बंटवारा अब प्राथमिक महत्त्व का विषय बन गया.’ किन्तु मोदी सरकार इस सब बातों से आँखे मूंदे अपनी खास अंदाज में अपनी अर्थनीति आगे बढाती रही. जिसका भयावह रूप जनवरी 2018 में दावोस में जारी ऑक्सफाम की रिपोर्ट में सामने आ गई . उस रिपोर्ट से यह तथ्य उभरकर आया कि देश की 73% संपदा देश के केवल 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में सिमट गयी है. इन 1 प्रतिशत लोगों की सपत्ति पिछले एक साल में 21 लाख करोड़ बढ़ी है.

1% लोगों के हाथ 73% संपत्ति जाना कितनी बड़ी घटना थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक टॉप की 1% आबादी के पास 2000 में 37% हुआ करती थी, जो 2005 में बढ़कर 42%, 2010 में 48%, 2012 में 52% तथा 2016 मे 58% हो गयी। इससे जाहिर है कि 2000-2016 अर्थात 16 सालों में 1% वालों की दौलत में कुल इजाफा 21% का हुआ, जबकि 2016 के 58 के मुक़ाबले 2017 मे 73% पहुचने का मतलब हुआ कि एक वर्ष में उनकी दौलत में सीधे 15% की बढ़ोतरी हो गयी। है न यह आश्चर्य! और यह आश्चर्य इसलिए घटित हुआ क्योंकि भाजपा सबसे बड़ी सवर्णपरस्त पार्टी है। इस सवर्णपरस्ती के चलते ही उसने मण्डल के विरुद्ध कमंडल उठाकर देश की हजारों करोड़ की सम्पदा और असंख्य लोगों की प्राणहानि करा दिया. सवर्णपरस्ती के चलते ही स्वयंसेवी प्रधानमंत्री वाजपेयी ने चरम आंबेडकर विरोधी अरुण शौरी को साथ ले, विनिवेश मंत्रालय खोलकर उन लाभजनक सरकारी उपक्रमों औने-पौने दामों में बेचने का एक तरह से अभियान छेड़ा, जहां आरक्षित वर्ग के लोग जॉब पाते थे. लेकिन मण्डल के बाद सवर्णों के हित में आरक्षण को कागजों तक सिमटाने का जो काम दोनों सवर्णवादी दलों- कांग्रेस और भाजपा- के नरसिंह राव ,वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने दो दशकों में किया, उतना मोदी ने तीन सालों में कर दिया है। मोदी की अतिसवर्णपरस्त नीतियों, जिसे प्रगतिशील बुद्धिजीवी कारपोरेटपरस्त नीतियां बताकर बहुजनों को भ्रमित करते रहते हैं, के कारण ही 1% वालों की दौलत में 1 साल के मध्य ही 15% वृद्धि का त्रासदपूर्ण चमत्कार घटित हो गया है

बहरहाल जनवरी 2018 में आई ऑक्सफाम की रिपोर्ट से टॉप के 1% वालों की दौलत को लेकर तो खूब चर्चा हुई.पर, यदि टॉप की 10% आबादी वालों की दौलत का आंकड़ा मिलता तो पता चलता विषमता की स्थिति और बदतर हुई है । लेकिन तब टॉप के 10% वालों की दौलत का चर्चा न होने का कारण यह रहा कि ऑक्सफाम की उस रिपोर्ट में शायद अलग से टॉप की 10% आबादी की दौलत का आकड़ा सामने नहीं आया था. पर, यदि हम क्रेडिट सुइसे की 2015 वाली रिपोर्ट, जिसमे यह बताया गया था कि भारत के टॉप की 10% आबादी के पास 81% दौलत है तथा नीचे की 50% आबादी सिर्फ 4.1% धन-संपदा पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर है, के आधार पर आंकलन करें तो शर्तिया तौर पर 10 % टॉप वालों की दौलत 90% से ज्यादे का आकड़ा पार कर गयी होगी। भारत के शासक इच्छाकृत रूप से जाति जनगणना इसीलिए नहीं कराते कि सवर्णों की शक्ति के स्रोतों पर 80-90% कब्जे की कलई खुल जाएगी। बहरहाल हमें यह मानकर चलना चाहिए कि 90% देश की दौलत के इन 10% अर्थात 13 करोड़ मालिकों में से 99.9% उस जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त तबकों अर्थात सवर्ण समुदायों से होंगे जिनका सदियों से शक्ति के प्रायः समस्त स्रोतों पर 90% से ज्यादा कब्जा रहा है।

इसके भयावह परिणामों से चिंतित ऑक्सफैम इंडिया की सीईओ निशा अग्रवाल ने तब रिपोर्ट पर अपनी टिपण्णी में कहा था,’ अरबपतियों की बढती संख्या अच्छी अर्थव्यवस्था का नहीं, ख़राब होती अर्थव्यवस्था का संकेत है. जो लोग कठिन परिश्रम करके देश के लिए भोजन उगा रहे हैं, इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे हैं, फैक्टरियों में काम कर रहे हैं , उन्हें अपने बच्चों की फीस भरने, दवा खरीदने और दो वक्त का खाना जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. अमीर- गरीब के बीच बढती खाई लोकतंत्र को खोखला कर रही है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है।’ इन्ही कारणों से 2015 में क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद बहुत से अखबारों ने लिखा था -‘गैर – बराबरी अक्सर समाज में उथल-पुथल की वजह बनती है. सरकार और सियासी पार्टियों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए.संसाधनों और धन का न्यायपूर्ण बंटवारा कैसे हो , यह सवाल अब प्राथमिक महत्व का हो गया है.’

किन्तु भीषण आर्थिक विषमता पर आई ढेरों चेतावनियों से मोदी की सेहत पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा. कोई और शासक होता तो कम से कम चुनावी वर्ष में दुनिया की विशालतम वंचित आबादी के रोष से बचने के लिए उनके पक्ष में कुछ बड़े कदम जरुर उठाता .पर, चूँकि संघ प्रशिक्षित मोदी का एक ही लक्ष्य रहा है सवर्णों को और शक्तिसंपन्न बनाना, लिहाजा प्रधानमंत्री के रूप उनकी पारी के स्लॉग ओवर में सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने, 13 प्वाइंट रोस्टर के जरिये विश्वविद्यालयों में शिक्षक भर्ती सहित तमाम क्षेत्रों में सवर्णों को पहला अवसर प्रदान करने सहित 10 लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से खदेड़ने जैसा अमानवीय निर्णय ले लिया गया. इससे विषमता का नयी ऊंचाई छूना तय है. बहरहाल जिस तरह मोदी के स्लॉग ओवर में सवर्ण आरक्षण और 13 प्वाइंट रोस्टर के साथ दस लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से खदेड़ने का दु:साहसिक फैसला लिया गया है, उससे तय है कि यदि सत्ता में उनकी दुबारा वापसी होती है, तो वे सवर्णपरस्ती के हाथों मजबूर होकर इस देश के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हित में ऐसे-ऐसे फैसले लेना शुरू करेंगे, जिसके फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक विषमता उस बिंदु पर पंहुच जाएगी, जहाँ से लोकतंत्र के ढांचे का विस्फोटित होना महज कुछ अन्तराल का विषय रह जायेगा.

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क्या सोनभद्र के दलित-आदिवासी सपा-बसपा और भाजपा को वोट देंगे?

सोनभद्र उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है. यह एक आदिवासी-दलित बाहुल्य जिला है. इस जिले की कुल आबादी 18.62 लाख है जिस में से 4.21 लाख दलित और 3.85 लाख आदिवासी हैं जोकि कुल आबादी का लगभग 44% है. यह जिला कैमूर की पहाड़ियों में बसा है. इसका 3.26 हेक्टेयर भाग जंगल और पहाड़ से आच्छादित है. इसकी सीमा बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से लगती है.

यद्यपि सोनभद्र वन उपज और खनिज संपदा से भरपूर है और यह जिला उत्तर प्रदेश को सब से अधिक राजस्व देता है परन्तु विकास की दृष्टि से यह जिला नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसारर देश के 15 अति पिछड़े तथा उत्तर प्रदेश के 4 अति पिछड़े जिलों में शामिल है. यहाँ पर अधितर दलित आदिवासी भूमिहीन हैं और उनके जीवन का स्तर बहुत निम्न है. अधिकतर महिलाएं और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. लोगों के लिए पीने का सुरक्षित उपलब्ध नहीं है और गर्मियों में पानी की अति कमी हो जाती है. विद्यालयों की कमी के कारण सामान्य जातियों, दलितों और आदिवासियों का शिक्षा दर उत्तर प्रदेश की दर से काफी कम है. जिले में स्वास्थ्य सुविधायों की बहुत कमी एवं खस्ता हालत है. सिचाई के साधनों की अत्यंत कमी के कारण कृषि अति पिछड़ी है. स्थानीय मार्किट उपलब्ध न होने के कारण किसानों को अरहर, चना तथा टमाटर आदि को अति कम दर पर बेचना पड़ता है. इन कारणों से सामान्य जातियों के साथ साथ दलित एवं आदिवासी जातियां सामाजिक तथा आर्थिक तौर पर बहुत पिछड़ी हुयी हैं.

जैसा कि सर्वविदित है कि ग्रामीण परिवेश में भूमि का बहुत महत्त्व होता है. सोनभद्र जिले की कुल आबादी (18.62 लाख) का तीन चौथाई भाग (15.48 लाख) ग्रामीण क्षेत्र में रहता है. अतःइन सबके लिए भूमि का स्वामित्व अति महत्वपूर्ण है. ग्रामीण लोगों में बहुत कम परिवारों के पास पुश्तैनी ज़मीन है. अधिकतर लोग जंगल की ज़मीन पर बसे हैं परन्तु उस पर उनका मालिकाना हक़ नहीं है. इसी लिए जंगल की ज़मीन पर बसे लोगों को स्थायित्व प्रदान करने के उद्देश से 2006 में वनाधिकार अधिनयम बनाया गया था जिसके अनुसार जंगल में रहने वाले आदिवासियों एवं वनवासियों को उनके कब्ज़े वाली ज़मीन का मालिकाना हक़ अधिकार के रूप में दिया जाना था. इस हेतु निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक परिवार का ज़मीन का दावा तैयार करके ग्राम वनाधिकार समिति की जाँच एवं संस्तुति के बाद राजस्व विभाग को भेजा जाना था जहाँ उसका सत्यापन कर दावे को स्वीकृत किया जाना था जिससे उन्हें उक्त भूमि पर मालिकाना हक़ प्राप्त हो जाना था.

वनाधिकार अधिनयम 2008 में लागू हुआ, उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुत मज़बूत सरकार थी. उसी वर्ष इस कानून के अंतर्गत सोनभद्र जिले में वनाधिकार के 65,000 दावे तैयार हुए परन्तु 2009 में इनमे से 53,000 अर्थात 81% दावे ख़ारिज कर दिए गये. मायावती सरकार की इस कारवाही के खिलाफ आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने अपने संगठन आदिवासी-वनवासी महासभा के माध्यम से आवाज़ उठाई परन्तु मायावती सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. अंतत मजबूर हो कर हमे इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को सभी दावों की पुनः सुनवाई करने का आदेश अगस्त 2013 को दिया परन्तु तब तक मायवती की सरकार जा चुकी थी और उस का स्थान अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने ले लिया था. हम लोगों ने 5 साल तक अखिलेश सरकार से इलाहबाद हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार कार्रवाही करने का अनुरोध किया परन्तु उन्होंने हमारी एक भी नहीं सुनी और एक भी दावेका निस्तारण नहीं किया. इससे स्पष्ट है कि किस प्रकार मायावती और अखिलेश की सरकार ने सोनभद्र के दलितों और आदिवासियों को बेरहमी से भूमि के अधिकार से वंचित रखा.

आइये वनाधिकार कानून को लागू करने के बारे में अब ज़रा भाजपा की योगी सरकार की भूमिका को भी देख लिया जाए. यह सर्विदित है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में लिखा था कि यदि उसकी सरकार बनेगी तो ज़मीन के सभी अवैध कब्जे (ग्राम सभा तथा वनभूमि ) खाली कराए जायेंगे. मार्च 2017 में सरकार बनने पर जोगी ने इस पर तुरंत कार्रवाही शुरू कर दी और इसके अनुपालन में ग्राम समाज की भूमि तथा जंगल की ज़मीन से उन लोगों को बेदखल किया जाने लगा जिन का ज़मीन पर कब्ज़ा तो था परन्तु उनका पट्टा उनके नाम नहीं था. इस आदेश के अनुसार वनाधिकार के ख़ारिज हुए 53,000 दावेदारों को भी बेदखल किया जाना था. जोगी सरकार की बेदखली की इस कार्रवाही के खिलाफ हम लोगों को फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हम लोगों ने बेदखली की कार्रवाही को रोकने तथा सभी दावों के पुनर परीक्षण का अनुरोध किया. इलाहबाद हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध पर बेदखली की कार्रवाही पर रोक लगाने, सभी दावेदारों को छुटा हुआ दावा दाखिल करने तथा पुराने दावों पर अपील करने के लिए एक महीने का समय दिया तथा सरकार को तीन महीने में सभी दावों पुनः सुनवाई करके निस्तारण करने का आदेश दिया. अब उक्त अवधि पूर्ण हो चुकी है परन्तु सरकार द्वारा इस संबंध में कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी है.

इसी बीच माह फरवरी में आरएसएस की एक संस्था वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वनाधिकार कानून की वैधता को चुनौती दी गयी तथा वनाधिकार के अंतर्गत निरस्त किये गये दावों से जुडी ज़मीन को खाली करवाने हेतु सभी राज्य सरकारों को आदेशित करने का अनुरोध किया गया. मोदी सरकार ने इसमें आदिवासियों/वनवासियों का पक्ष नहीं रखा. परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई तक ख़ारिज हुए सभी दावों की ज़मीन खाली कराने का आदेश पारित कर दिया. इससे प्रभावित होने वाले परिवारों की संख्या 20 लाख है जिसमे सोनभद्र जिले के 65,000 परिवार हैं. इस आदेश के विरुद्ध हम लोगों ने आदिवासी वनवासी महासभा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट फिर गुहार लगाई जिसमें हम लोगों ने बेदखली पर अपने आदेश पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई तक बेदखली पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों की पुन: सुनवाई का आदेश दिया है जिस पर चुनाव उपरान्त कारवाही की जानी है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि किस तह पहले मायावती और फिर अखिलेश यादव की सरकार ने दलितों, आदिवासियों और वनवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत भूमि के अधिकार से वन्चित किया है और भाजपा सरकार में उन पर बेदखली की तलवार लटकी हुयी है. यह विचारणीय है कि यदि मायावती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में इन लोगों के दावों का विचरण कर उन्हें भूमि का अधिकार दे दिया होता तो आज उनकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती. इसी प्रकार यदि मायावती ने अपने शासन काल में भूमिहीनों को ग्रामसभा की ज़मीन जो आज भी दबंगों के कब्जे में है, के पट्टे कर दिए होते तो उनकी आर्थिक हालत कितनी बदल चुकी होती. अतः यह विचारणीय है कि क्या मायावती, अखिलेश और भाजपा सरकार द्वारा दलितों,आदिवासियों और वनवासियों को भूमि के अधिकार से वंचित करने की इस कार्रवाही के सम्मुख वे लोग इस चुनाव में उन्हें वोट देंगे?

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भारत को मिल सकता है दूसरा दलित जज

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने मोदी सरकार को जजों की प्रोन्नति के लिए दो जजों के नाम भेजे हैं जिसमें एक जिसमें एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी शामिल हैं जो 2025 में भारत के दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त कर सकते हैं. इनमें दो अन्य नामों को दोहराया गया है.

कॉलेजियम ने बॉंबे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्णा गवई और हिमाचल प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत का नाम बुधवार को पदोन्नति के लिए आगे बढ़ाया है. और सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की है. अगर मोदी सरकार इस प्रस्तावना को स्वीकार कर लेती है तो दोनों जज देश के मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं.

दिप्रिंट ने इन दोनों जजों के नामांकन किए जाने की बात जनवरी में प्रकाशित की थी.अगर केंद्र न्यायाधीश गवई की नियुक्ति को हरी झंडी दे देता है तो वह 11 मई 2010 के बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पहले दलित जज होंगे. बता दें कि मुख्य न्यायधीश बालाकृष्णन 11 मई 2010 को सेवानिवृत्त हुए ते उसके बाद अभी तक भारत के टॉप कोर्ट में कोई दलित जज नहीं हुआ है. बालाकृष्णन के बाद गवई ही सीजेआई के रूप में 13 मई 2025 को शपथ लेंगे.

गवई के सेवानिवृत्त होने के बाद कांत मुख्य न्यायाधीश की कतार में अग्रणी होंगे.

नरेंद्र मोदी सरकार ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से गुजारिश की है कि हाशिए पर मौजूद तबके को उच्चस्तरीय न्यायाधीशों की श्रृंखला में शामिल किए जाएं. बता दें पिछली सरकारें भी इसपर बात करती रहीं हैं.

गुरुवार को कोलेजियम ने एकबार फिर से झारखंड हाई कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश अनिरुद्ध बोस और उनके गुवाहटी उच्च न्यायालय के सहयोगी ए.एस बोपन्ना के लिए भी सिफारिश की है. केंद्र ने इन दोनों का नाम पिछले महीने कॉलेजियम को इनदोनों जजों की सिफारिश की थी.

वरिष्ठता और हाशिए पर पड़े लोगों का प्रतिनिधित्व गवई की सिफारिश करने वाला कॉलेजियम जिसमें शीर्ष अदालत के पांच सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं. उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनकी वरिष्ठता भारत के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच क्रम संख्या 8 पर हैं. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत की शीर्ष अदालत ने एक दशक से दलित न्यायाधीश नहीं था.

कॉलेजियम का प्रस्ताव जो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध है उसमें लिखा है कि उनकी सिफारिश का किसी भी तरह से गलत अर्थ निकाला जाना चाहिए कि बॉम्बे हाई कोर्ट के तीन वरिष्ठतम न्यायाधीश (जिनमें से दो मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा कर रहे हैं) न्यायमूर्ति गवई की तुलना में कम उपयुक्त हैं.

कॉलेजियम के प्रस्ताव में कहा गया है कि उनकी नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच में लगभग एक दशक के बाद अनुसूचित जाति वर्ग से ताल्लुख रखने वाले जज होंगे.

सूर्यकांत, जो वरीयता की क्रम संख्या 11 पर हैं वो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का प्रतिनिधित्व करेंगे यह उनका मूल न्यायालय है, जो अभी सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश के लिए जिम्मेदार हैं

वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में 27 न्यायाधीश हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत संख्या 31 है. यदि सभी चार सिफारिशों को मंजूरी दे दी जाती है. तो न्यायालय के पदों कि संख्या पूर्ण होगी.

दो न्यायाधीश गवई ने 2017 में तब सुर्खियां बटोरीं. जब वह सीबीआई जज बीएच लोया के परिवार द्वारा किए गए बेईमानी के आरोपों का खंडन किया था. लोया, जिनकी कथित तौर पर 2014 में नागपुर में एक शादी में शामिल होने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी. उस समय, न्यायाधीश लोया सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ सीबीआई के मामले की सुनवाई कर रहे थे.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इस मामले में मुक्त कर दिया गया है.

कारवां पत्रिका को दिए साक्षात्कार में जब जज लोया के परिवार ने उनकी मृत्यु की परिस्थितियों पर सवाल उठाया तब शादी में मौजूद जज गवई ने भी आरोपों को खारिज कर दिया है.

परिवार ने कहा था कि लोया को एक ऑटोरिक्शा में अस्पताल ले जाया गया था और उनके कपड़े पर खून थे इन दोनों दावों को जज गवई द्वारा इनकार कर दिया गया.

सूर्यकांत को सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के लिए कॉलेजियम की सिफारिश को मंजूरी देने में बहुत समय लिया था.

सूत्रों के अनुसार इन बातों के अलावा सरकार परामर्शदाता न्यायाधीशों में से एक वर्तमान राष्ट्रीय हरित अधिकरण अध्यक्ष आदर्श कुमार गोयल द्वारा भेजी गई नोट और शिकायत पर गौर करना चाहती थी.

एक सरकारी सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, जब से एक विस्तृत जांच हुई तब से सरकार कोई मौका नहीं लेना चाहती थी. लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जस्टिस गोयल ने खुद एक स्वतंत्र जांच के लिए कहा था.

सूत्र ने कहा, ‘न्यायाधीश और उनके परिवार के सदस्यों के कुछ संपत्ति सौदों का विवरण था, जिसके बारे में न्यायमूर्ति गोयल ने शिकायत दर्ज की थी.

सूत्र ने यह भी कहा कि ‘शिकायत में किए गए दावे निराधार पाए गए और यह तभी हुआ जब हिमाचल प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी गई’.

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अलवर गैंगरेप केसः दलितों का गुस्सा बढ़ा, चंद्रशेखर भी पहुंचे

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राजस्थान के अलवर जिले में दलित युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले ने तूल पकड़ लिया है. इसको लेकर दलित समुदाय का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर ने दलित युवती के साथ गैंगरेप करने वाले आरोपियों का सामाजिक बहिष्कार करने की मांग की है. उन्होंने मामले की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की भी मांग भी उठाई है. वहीं, इस मामले में पुलिस ने अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है.

इस मामले में गिरफ्तार चौथे आरोपी की पहचान महेश गुर्जर और पांचवें आरोपी की पहचान हंसराज गुर्जर के रूप में हुई है. इससे पहले पुलिस ने मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया था. इन आरोपियों के नाम इन्द्राज गुर्जर, अशोक गुर्जर और मुकेश गुर्जर हैं. इसके अलावा मामले में आरोपी छोटे लाल गुर्जर और हंसराज गुर्जर की तलाश जारी है. पुलिस महानिदेशक कपिल गर्ग ने बताया कि अलवर गैंग रेप मामले में सभी आरोपियों की गिरफ्तारी की कोशिश की जा रही है.

आपको बता दें कि अलवर जिले के थानागाजी थाने में 2 मई को दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला दर्ज किया गया था. उधर, अलवर पहुंचे भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि अलवर जिले के थानागाजी में घटित एक दलित युवती के साथ गैंगरेप का मामला बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है. आरोपियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर दोषियों को कड़ी सजा दी जाए.

चंद्रशेखर ने कहा कि राजस्थान के अलवर जिले में ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं, लेकिन अधिकारी लापरवाह नजर आते हैं. उन्होंने अधिकारियों के रवैये पर आक्रोश जताते हुए कहा कि जो काम पुलिस अधिकारियों को करना चाहिए वह काम पीड़ितों ने किया है. आरोपियों के नाम पते मोबाइल सब पीड़ित पक्ष की ओर से पुलिस को दिया गया है.

चंद्रशेखर ने अलवर के पुलिस अधीक्षक का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी पक्ष के लोग पुलिस अधीक्षक अलवर को फोन करते हैं और धमकाते हैं. और पुलिस अधीक्षक अपने आप को असहाय बताते हैं. ऐसे पुलिस अधीक्षक का स्थान जेल में है और उन्हें जेल मिलनी चाहिए. रावण ने आरोप लगाया कि पैसे के लालच में ऐसे पुलिस अफसरों ने अपना जमीर बेच दिया है. रावण ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार शीघ्र आरोपियों को गिरफ्तार नहीं करेगी तो वे राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाकर आंदोलन करेंगे.

दूसरी ओर महिला विकास एवं समाज अधिकारिता मंत्री ममता भूपेश ने थानागाजी के पीड़ित परिवार से मुलाकात की. संपूर्ण घटना की जानकारी भी ली. बाद में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि उनकी प्राथमिकता सबसे पहले पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना है और सरकार पीड़ित परिवार के साथ है. उन्होंने बताया कि सरकार ने इस मामले में तुरंत एक्शन लिया और एसपी को एपीओ कर दिया जबकि थानेदार को सस्पेंड कर दिया गया है.

राज्य की मंत्री ममता भूपेश ने कहा कि यह राजनीति करने का समय नहीं है और जो लोग धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें धरना प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. सरकार की भी मंशा साफ है, जो भी इस मामले में दोषी हैं. उन्हें बख्शा नहीं जाएगा. 3 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं. शेष 2 लोगों की गिरफ्तारी बाकी है.

श्रम मंत्री टीकाराम जूली ने कहा कि इस मामले में पुलिस की लापरवाही और मिली भगत सामने आई है. जांच की जा रही है. उनकी कॉल डिटेल निकलवाकर इन के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा कि वे इस मामले में मुख्यमंत्री से बात करेंगे और दोषियों के खिलाफ जो भी सख्त से सख्त कार्रवाई होगी, वह की जाएगी. राजस्थान सरकार ने पीड़ित परिवार को फौरन आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई है. मंत्री ने बताया कि दो-तीन दिन में बाकी दो तीन आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

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विपक्ष ने शुरू की नतीजों के बाद की तैयारियां, होगा महाजुटान

नई दिल्ली। 17वीं लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण तक पहुंचने के साथ ही तमाम दल चुनावी नतीजों के बाद की रणनीति बनाने में जुट गए हैं. खासकर विपक्षी दल चुनाव बाद पैदा होने वाली स्थिति को लेकर ज्यादा सजग है. इसको देखते हुए किस स्थिति में क्या हो, यह तय करने के लिए विपक्षी दलों का महाजुटान होने जा रहा है. वोटों की गिनती के दो दिन पहले पहले 21 मई को ऐसी बैठक होने की खबर आ रही है. बैठक राजधानी दिल्ली में होगी.

बैठक में सभी विपक्षी दलों के प्रतिनिधि बैठकर चुनाव के बाद की परिस्थितियों पर चर्चा करेंगे. इस बैठक के संबंध में विपक्षी दलों के बीच से ही प्रस्ताव आना शुरू हो गया है. सीपीआई के सांसद डी राजा के मुताबिक विपक्षी दल चुनाव खत्म होने के बाद अनौपचारिक रूप से बैठकर चुनाव के बाद की संभावित परिस्थितियों को लेकर चर्चा करेंगे जो कि एक सामान्य बात है. यह कोई औपचारिक बैठक नहीं है.

माना जा रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद सभी विपक्षी दल अपनी सीटों के आंकलन के साथ मिलेंगे, जिसमें यह तकरीबन तय हो जाएगा कि विपक्ष मिलकर कितनी सीटें जीत रहा है और किस राज्य में भाजपा को कितनी सीटें मिल रही हैं. दरअसल चुनाव बाद पार्टी को यह अहसास हो जाता है कि वह कितनी सीटें जीत रही है. यह अनुमान 80 फीसदी तक सही ही होता है. इसी के बूते विपक्षी दल चुनाव बाद अपनी रणनीति पर बात करेंगे. इस बैठक में प्रधानमंत्री पद को लेकर कोई चर्चा नहीं होगी. हालांकि इस बैठक में हुई किसी चर्चा के तभी मायने हैं जब एनडीए को बहुमत नहीं मिलता है.

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11 को बक्सर व भभुआ में होगी मायावती की जनसभा

पटना। बिहार में छठे व सातवें चरण के चुनाव में बीएसपी त्रिकोणीय लड़ाई का दृष्य पैदा करने की कोशिश में है. बसपा वाल्मीकि नगर, आरा, काराकाट, सासाराम, गोपालगंज व शिवहर में खुद को काफी हद तक मजबूत मान रही है. यहां चुनाव में जीत-हार से अधिक ध्यान पार्टी नेताओं को बीएसपी के बढ़ते जनाधार को वोट में बदलने पर है. इसको लेकर बूथ व सेक्टर स्तर पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गयी है. यहां कार्यकर्ता पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने के लिए रात-दिन मेहनत कर रहे हैं. बसपा प्रमुख मायावती 11 मई को बक्सर और भभुआ में चुनाव सभाओं को संबाेधित करेंगी. पार्टी ने वाल्मीकि नगर से दीपक यादव, शिवहर मुकेश कुमार झा, आरा मनोज यादव, बक्सर सुशील कुशवाहा, सासाराम मनोज राम, काराकाट राज नारायण तिवारी, जहानाबाद नित्यानंद यादव को जीत दिलाने के लिए जोर-शोर से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है. बीएसपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की टीम इन क्षेत्रों में घूम रही है. पार्टी ने भी कार्यकर्ताओं को कहा है कि वह पूरी निष्ठा से काम करें, ताकि बीएसपी अपने त्रिकोणीय लड़ाई में सफल हो सके.

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