शिक्षित राज्य केरल में प्रतिनिधित्व के इंतजार में महिलाएं

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 भारत में दलितों एवं महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व कितना कम है इसके संबंध में एक खबर केरल से है। भारत के सर्वाधिक सुशिक्षित राज्य केरल में भी बीते 20 सालों में सिर्फ 6 महिलाएं विधायक बन पाई हैं। इसका अर्थ साफ है कि भारत में शिक्षा के प्रतिशत के बढ़ जाने से भी समाज और परिवार में पितृसत्ता की भूमिका कम नहीं हो जाती।

केरल में पहली महिला विधायक सन 1957 में ईदुक्की के देवीकुलम विधानसभा क्षेत्र से चुनी गई थी। इसके बाद वे विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर भी बनी थी। सन 1957 में ही केरल की पहली विधानसभा में 6 महिलाएं चुनी गई थी। उस समय का आंकड़ा कुल विधायकों का 5.3% था। तब से आज तक की इतने सालों की यात्रा की तुलना की जाए तो आज की केरल की विधानसभा में 9 महिला विधायक हैं। यह संख्या आज केरल विधानसभा में कुल विधायकों की 6.4% है। इस तरह ठीक से देखा जाए तो बीते 60 सालों में केरल की राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 1.1 % की ही बढ़ोतरी हुई है।

केरल जैसे राज्य की राजनीति और विधानसभा में महिलाओं की यह स्थिति बहुत चिंतित करने वाली है। इसका अर्थ है कि वामपंथी विचारधारा भी पितृसत्ता को कमजोर करने में सफल रही है। इतना ही नहीं सर्वाधिक शिक्षित राज्य होने के दावे से भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आ रहा है। यह बात भारत के ओबीसी और दलितों और आदिवासियों के लिए विशेष रूप से चिंतनीय हैं। क्योंकि सर्वाधिक वंचित एवं शोषित समुदाय कि महिलाओं की आवाज उठाने के लिए महिला प्रतिनिधित्व पहली शर्त है। केरल जैसे राज्य में यह प्रतिनिधित्व अगर कमजोर बना हुआ है तो भारत के ओबीसी और दलितों के लिए यह खतरनाक बात है।

दलित साहित्यकार शरण कुमार लिंबाले को मिला 15 लाख राशि वाला प्रतिष्ठित सम्मान

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दलित साहित्य की दुनिया के लिए एक बड़ी खुशखबरी आई है। दलित साहित्य के वर्तमान आधार स्तंभों में से एक मराठी साहित्यकार डॉक्टर शरण कुमार लिंबाले को वर्ष 2020 के लिए प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान दिया गया है। डॉक्टर लिंबाले वाले को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘सनातन’ के लिए दिया गया है। इस सम्मान के साथ 15 लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी उन्हें दी जाएगी। गौरतलब है कि ‘सनातन’ उपन्यास भारत में सदियों से दमित और वंचित दलित एवं पिछड़ों के बारे में है। हजारों सालों से सामाजिक भेदभाव एवं आर्थिक शोषण का सामना कर रहे करोड़ों दलितों के बारे में आवाज उठाने वाला यह उपन्यास मूल रूप से मराठी में रचा गया है। पिछले साल ही डॉक्टर पदमजा घोरपड़े ने इसका हिंदी में अनुवाद किया और यह उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। हिंदी में आने के बाद इस उपन्यास को व्यापक पहचान मिली और यह अचानक ही विद्वत समुदाय एवं साहित्य समुदाय में चर्चा का विषय बन गया था। एक दलित साहित्यकार को सरस्वती सम्मान प्राप्त होना एक बड़ी बात है। इस बात के बहुत सारे निहितार्थ हैं। इसका एक विशेष अर्थ यह है कि दलित साहित्य एवं दलित साहित्यकारों के विचार प्रक्रिया अब तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य को चुनौती दे रही है। इसका एक अर्थ यह भी है कि भविष्य में भारत के आमजन एवं महिलाओं से जुड़े मुद्दों को तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य को भी सम्मान देना होगा। इन बड़े संकेतों को छुपाए हुए यह खबर पूरे भारत में दलितों के लिए एक बड़ी खुशखबरी के रूप में देखी जा रही है। शरण कुमार लिंबाले अपनी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ से काफी चर्चा में आ गए थे।

क्या होली का त्योहार ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को मनाना चाहिए?

 होली हिंदुओं का त्यौहार नहीं है, यह भारतीयों का त्यौहार है और ठीक से कहा जाए तो यह भारतीय किसानों,  मजदूरों, आदिवासियों, ओबीसी दलितों इत्यादि का त्योहार है। या फिर यह कह सकते हैं कि होली भारत के आम आदमी का त्योहार है। एक विशेष नजरिया से देखे तो वास्तव में सभी त्योहार किसानों के त्योहार है। गेहूं की कटाई के बाद प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए उत्सव बनाए गए हैं। धीरे-धीरे बाद में जैसे-जैसे धर्म और संस्कृतियों का विकास हुआ उन्होंने अपने धार्मिक प्रतीक इससे जोड़ दिए। सभी देशों में सभी समाजों में यह काम हुआ है।

इसके बाद अलग-अलग समाजों में सूचना और जानकारी का आदान-प्रदान हुआ लोग एक दूसरे से मिलने के लिए। उसके बाद धीरे-धीरे एक संस्कृति पर दूसरी संस्कृति हावी हुई, एक समाज पर दूसरे समाज ने आक्रमण करके उसे अपना गुलाम बनाया। इस तरह उन्होंने पुराने समाज के त्योहारों में अपने नए देवी-देवताओं और प्रतीकों को जोड़कर पुराने प्रतीकों को हटा दिया। यह पूरी दुनिया में हुआ है, ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में आर्य ब्राह्मणों ने भारत के मूल निवासियों के खिलाफ ऐसा किया है। पूरी दुनिया में जितने भी बड़े धर्म हुए हैं उन्होंने नए इलाकों में जाकर स्थानीय मूल निवासियों को तलवार और षड्यंत्र के जरिए जीता और फिर उन्हें मानसिक सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाकर उनकी पुरानी परंपराओं में अपनी परंपराओं  की मिलावट कर दी।

ठीक यही भारत में होली, दिवाली, गुरु पूर्णिमा, वैशाखी, पोंगल, मकर सक्रांति इत्यादि त्योहारों के साथ हुआ। फिर इसके बाद भारत के मूलनिवासी महापुरुषों के जीवन से जुड़े उत्सवों और त्यौहारों को भी आर्य ब्राह्मणों ने अपने धर्म के हिसाब से बदल दिया। उदाहरण के लिए शिव वास्तव में भारत के इंडीजीनस या ट्राइबल समुदाय के देवता रहे हैं, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित महाराष्ट्र, उड़ीसा, तेलंगाना, कर्नाटक इत्यादि राज्यों में संभू सेक कहा जाता है। उन से जुड़ा हुआ ‘शंभू नरका’ नाम का एक त्योहार होता है जिसे हिंदुओं ने बाद में शिवरात्रि बना दिया। ऐसे और बहुत सारे उदाहरण हैं जिनमें विस्तार से बात की जा सकती है।

इस तरह ठीक से देखा जाए तो भारत में मनाए जाने वाले सारे त्योहार मूल रूप से भारतीय किसानों, और महिलाओं के हैं। दिक्कत यह है कि इन प्राचीन त्योहारों को आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर और अपने धर्म की मिलावट करके किसानों मजदूरों और महिलाओं के खिलाफ खड़ा कर दिया है। इसलिए जब यह पूछा जाता है कि क्या हमें दिवाली इत्यादि त्योहार मनाने चाहिए या चाहिए नहीं मनाने चाहिए, तो इसका उत्तर थोड़ा कठिन है। यहां कठिनाई यह है कि आर्यों के ईश्वर और धर्म की मिलावट के पहले प्राचीन भारतीय लोग जिस तरीके से यह त्योहार मनाते थे, हमें वह तरीका पहले खोजना होगा। फिर हमें यह भी जानना होगा कि क्या-क्या मिलावट की गई है और मिलावट को कैसे दूर किया जाए। इस तरह अगर हम भारत के प्राचीन लोगों द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों को समझ ले, और उसमें से ब्राह्मण धर्म के ईश्वर देवी देवता और वर्णाश्रम धर्म वादी पाखंड को निकाल दें तो फिर यह त्यौहार बहुत सुरक्षित बन जाएंगे और फिर सभी दलित पिछड़े और महिलाएं इन त्योहारों को मना सकती हैं।

विशेष रूप से आज का जो विषय है ‘होली का त्यौहार’, अगर इस त्यौहार को ठीक से देखें तो या मूल रूप से इंडीजीनस या ट्राइबल लोगों का या फिर, भारत के ओबीसी दलितों और किसानों त्योहार है। पुराने समय में फसल काटने के बाद फसल को जब पहली बार गांव में लाया जाता था तब पूरे गांव को, घरों को और गली मोहल्लों को साफ किया जाता था। यह प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करने के लिए किया जाता था। घरों से और गली मोहल्ले से जो कचरा निकलता था उसे एक स्थान पर इकट्ठा करके जला दिया जाता था। इस तरह से जलाने के दौरान अग्नि की वंदना की जाती थी, यहां अग्नि परिपक्वता और ज्ञान एवं शक्ति का प्रतीक बन जाती थी। प्राचीन समय में ईश्वर इत्यादि का आविष्कार नहीं हुआ था तब प्रकृति की शक्तियों को ही पूजा जाता था। आज भी भारत के ट्राइबल समाज में ईश्वर या सृष्टि जैसी कोई कल्पना नहीं है, भारत का ट्राईबल और दलित समाज आज भी बौद्ध और जैन परंपरा के अनुसार ईश्वर और सृष्टि को नहीं मानता है।

प्राचीन ट्राइबल या इंडीजीनस किसान घरों की सफाई के बाद गांव का कचरा एक नियत स्थान पर जलाते थे और अग्नि की वंदना करते थे। ऐसी वंदना करते समय नई-नई फसल से आई उपज का थोड़ा सा हिस्सा अग्नि को भेंट देते हुए उस अग्नि में जलाते थे। उदाहरण के लिए नए आए गेहूं की कुछ बालियां गोबर की गोलाकार की रिंग जैसी रचनाओं में बांधकर इस आग में जलाकर या भूनकर खाई जाती थी। फिर इसी आग को लेकर सभी लोग अपने अपने घरों में चूल्हा जलाते थे। इस प्रकार यह बहुत प्राचीन किसानों का त्यौहार है। बाद में आर्य ब्राह्मणों ने जब भारत पर आक्रमण किया और धीरे-धीरे अपने षड्यंत्र से भारत के भोले भाले लोगों को कमजोर करके जीत लिया। तब उनके सरल से प्रकृति पूजक त्योहारों में अपने देवी-देवताओं इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र और अपने काल्पनिक अवतारों को इत्यादि को इनसे जोड़ दिया।

भारत के मूलनिवासी समुदाय में स्त्री और पुरुष मे ज्यादा भेद नहीं किया जाता है, बल्कि प्राचीन भारतीय परंपरा तो मातृसत्तात्मक परंपरा थी। लेकिन आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर को भारत में जब थोपना शुरू किया तब उन्होंने महिलाओं को कमजोर साबित करते हुए पित्र सत्तावादी ढांचा खड़ा किया। इसीलिए उन्होंने भारत की प्राचीन मात्र देवियों और ग्राम देवियों को अपने पुरुष देवताओं की पत्नी बनाकर उनका गुलाम बनाया। और धीरे-धीरे प्राचीन भारत के त्योहारों में स्त्रियों की उर्वरा शक्ति को प्रकृति की उर्वरा शक्ति के साथ जोड़कर जो त्योहार मनाए जाते थे उन त्योहारों में अपने पुरुष एवं वैदिक देवताओं को शामिल कर दिया। इस प्रकार स्त्री और प्रकृति की वंदना करने वाले त्योहार बाद में पुरुष और ईश्वर की वंदना करने वाले त्योहार बन गए।

अब इन सभी त्योहारों में स्त्री को ना केवल कम सम्मान दिया जाता है बल्कि उन्हें पुरुषों से कमजोर, और पुरुषों पर निर्भर रहने वाले पारिवारिक सदस्य की तरह दिखाया जाता है। इस नजरिए से होली का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है, प्राचीन भारतीय समाज में जब आर्यों और ब्राह्मणों का ईश्वर नहीं आया था, तब भारतीय लोग स्त्री और प्रकृति की उर्वरा शक्ति की वंदना करते थे। ब्राह्मणों के ईश्वर ने इसे धीरे-धीरे बदल दिया और स्त्री को न केवल कमजोर साबित किया बल्कि उसकी उर्वरा शक्ति और उसकी बच्चे पैदा करने की क्षमता को अपमानित करते हुए उसे अछूत और पापयोनी सिद्ध कर दिया। होली के त्योहार में एक स्त्री को मायावी या राक्षसी कहकर जिस प्रकार जलाया जाता है वह अपने आप में एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की सूचना देने वाला कर्मकांड है।

अगर हम आज त्योहार को मनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने प्राचीन इतिहास में, अपने आसपास रहने वाले इंडीजीनस या आदिवासी एवं दलित लोगों की परंपरा में झांकना चाहिए। इसके जरिए पता चलेगा कि प्राचीन समय में किसी एक इलाके में यह त्योहार कैसे मनाया जाता था। यह तरीका जान लेना बहुत मुश्किल नहीं है, अगर हमें यह तरीका पता चल जाए तो इसके बाद हम इसमें से ब्राह्मणों की ईश्वर और वर्णाश्रम धर्म से जुड़े प्रतीकों को इसमें से निकाल सकते हैं। और फिर धीरे-धीरे हम भारत के मूल निवासियों के त्योहारों को फिर से जिंदा कर सकते हैं। अब यह काम कोई एक व्यक्ति या एक परिवार या एक गाँव नहीं कर सकता, इसके लिए भारत के मूलनिवासी बहुजनो के संगठनों को आगे आना चाहिए और संस्थागत रूप से रिसर्च करके भारत के प्राचीन त्योहारों का वास्तविक स्वरूप सामने लाया जाना चाहिए। अगर हम ऐसी शुरुआत कर सकें तो धीरे-धीरे हम अगले 10-15 साल में भारत के सभी त्योहारों को फिर से प्राचीन मूल निवासियों के त्योहारों की तरह खड़ा कर सकते हैं।

भारत के सभी त्योहार वास्तव में भारत के मूलनिवासी इंडीजीनस लोगों के या श्रमण लोगों के त्योहार हैं। इंडीजीनस लोगों को आदिवासी भी कहा जाता है, प्राचीन श्रमण लोगों ने बौद्ध धर्म जैन धर्म और आजीवक धर्म का निर्माण किया था। उन धर्मों में ईश्वर और ईश्वरीय सृष्टि का कोई महत्व नहीं है। जैन धर्म और बौद्ध धर्म तो निरीश्वरवादी धर्म है इसमें ईश्वर को नहीं माना जाता। इन धर्मों ने भारत के सबसे पुराने त्योहारों का निर्माण किया है जो कि महिलाओं और प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करते हुए उत्सव मनाने के त्योहार हैं। इन आदिवासी एवं श्रवण त्योहारों को ठीक से देखें तो यह एक दूसरे से मिलकर सहयोग करके फसल बोना, फसल काटना, मकान बनाना, रास्ता बनाना, कुआं खोदना, सिंचाई करना, शिकार करना, मिट्टी चमड़े लोहे या लकड़ी के सामान बनाना इत्यादि से जुड़ा हुआ है।

इसलिए यह त्योहार लोगों को आपस में इकट्ठा करके उनमें एक सामाजिकता की भावना पैदा करने के लिए बनाए गए थे। लेकिन दुर्भाग्य से आर्य ब्राह्मणों के भारत में आने के बाद उन्होंने भारतीयों को कमजोर करने के लिए और उन में फूट डालकर राज करने के लिए उनके इन्हें त्योहारों में अपने भेदभाव सिखाने वाले ईश्वर धर्म और देवी देवता की मिलावट कर दी। इसके बाद भारत का समाज पूरी तरीके से टूटकर कमजोर हो गया। और उसमें जाति और वर्ण व्यवस्था शामिल हो गई।

अगर हम इस बात को ठीक से समझ लें हमें पता चलता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था और दुनिया भर के अंधविश्वास असल में उत्सवों त्योहारों और किस्से कहानियों के माध्यम से ही फैलाए गए हैं। इसीलिए भारत में जिस तरीके से वर्तमान में त्योहार मनाए जाते हैं त्योहारों को पूरी तरह से बदलना बहुत जरूरी है। आप देखते होंगे और हम सभी जानते हैं कि छुआछूत, भेदभाव ऊंच-नीच, और महिलाओं का अपमान करना, यह कमजोर स्त्री का अपमान करना यह सभी स्कूल कॉलेज या विद्यालय में नहीं सिखाया जाता। यह सारी गंदी बातें लोग धार्मिक कहानियों, पुराण की कहानियों, मिथकीय कहानियों  के माध्यम से सीखते हैं। और भारत में जितने भी उत्सव एवं त्योहार हैं अभी उत्सव और त्योहार गंदी, महिला विरोधी और असभ्य कहानियों और मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।

अगर इन त्योहारों को बंद कर दिया जाए तो ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था पर आधारित अंधविश्वासों को दूसरी पीढ़ी में जाने से रोका जा सकता है। लेकिन त्योहारों को बंद करना असंभव है, इसीलिए जब भारत की ओबीसी या दलित या आदिवासी आजकल प्रचलित त्योहार मनाना बंद करने की बात कहते हैं तो वे एक अर्थ में गलत हैं। वास्तव में सच्चाई यह है कि कोई भी समाज या कोई भी संस्कृति उत्सव एवं त्योहारों के बिना जिंदा नहीं रह सकती। आप अगर अपने बच्चों एवं स्त्रियों को कोई खास त्यौहार मनाने से रोकेंगे तो वे आपसे तुरंत पूछेंगे कि इस त्योहार कि जगह हम कौन सा त्योहार मनाएं? आप बच्चों, बड़े, बूढ़ों, औरतों और पुरुषों को उत्सव मनाने से  नहीं रोक सकते। आप कोई भी त्योहार बंद नहीं कर सकते।

इससे बेहतर विकल्प यह है कि आप अपने प्राचीन त्योहारों में ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था की जो मिलावट हो गई है उसे पहचान कर काट कर बाहर फेंक दें। उसमें प्राचीन श्रमण और आदिवासी संस्कृति के मूल्यों को फिर से शामिल कर दें। अगर हम यह कर सके तो अगले 10-15 साल में हम भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों, किसानों मजदूरों और महिलाओं को पापियोंनी बनाने वाली परंपरा को जड़ से उखाड़ सकते हैं, और भारत के करोड़ों लोगों को सम्मानजनक जीवन दे सकते हैं। लेकिन यह काम एक व्यक्ति एक परिवार गांव नहीं कर सकता। इसके लिए पूरे भारत के ओबीसी दलितों आदिवासियों  महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को सामने आना चाहिए।

हमें ऐसे संगठनों का निर्माण करना चाहिए जो भारत में त्योहार मनाने के ढंग, एक दूसरे से बात करने के ढंग, एक दूसरे को संबोधित करने की शैली, शादी ब्याह के तौर तरीके, जन्मदिन मनाने के तौर तरीके, होली दिवाली मनाने के तौर-तरीके बदलने की शुरुआत कर सके। इस तरह एक पक्का सांस्कृतिक बदलाव बहुत आसानी से किया जा सकता है। और आज हमारे पास इंटरनेट सोशल मीडिया इत्यादि सुविधा मौजूद है उससे यह काम अगले 10 या 15 सालों में बहुत आसानी से किया जा सकता है।

इस तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हमेशा से ही एक कठिन काम रहा है। अगर यह आसान काम होता तो यह हो ही चुका होता। बाबासाहब आंबेडकर महामना ज्योतिबाराव फूले व रामास्वामी पेरियार ने हमें कठिन काम करना ही सिखाया है। आसान काम करने से बड़े परिणाम नहीं हासिल होते, और अगर हम भारत के करोड़ों ओबीसी दलित आदिवासी और महिलाओं का जीवन सुधारना चाहते हैं तो हमें कठिन काम ही करने होंगे। दुनिया में समाज में जब भी बड़े बदलाव किए गए हैं वह धीरे-धीरे और कठिन कामों को करते हुए ही हुए हैं। उदाहरण के लिए आर्य ब्राह्मण जब भारत में पहली बार आए थे तब उन्होंने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई से भारत के मूल निवासी लोगों को अपने ईश्वर और वेद वेदान्त के षड्यंत्र में फसाया है।

आज भी आप भारत में ग्रामीण और ट्राइबल इलाकों में जाकर देखेंगे तो वहां शहरों में मनाए जाने वाले त्योहार आपको कम नजर आएंगे। आप ट्राइबल इलाकों में जाकर देखें तो वहां पर तरह-तरह के देवी-देवताओं की तस्वीरें पिछले 20 सालों में पहुंची हैं। उसके पहले वहां पर वे अपने स्थानीय ग्राम देवियों ग्राम देवताओं सहित जंगल पहाड़ पर्वत इत्यादि की पूजा करते थे। बाद में जब टेलीविजन और फिल्म आई सब टीवी सीरियल और फिल्मों के माध्यम से तरह-तरह के देवी देवताओं की कहानियां उनके घरों में पहुंची। इन कहानियों ने वहां पर जाति व्यवस्था को मजबूत किया और स्त्रियों का विरोध करने की परंपरा डाल दी। यह काम आर्य ब्राह्मणों ने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई के साथ ही किया है। और यह काम अभी भी जारी है। आप देख सकते हैं वे लोग कितनी योजना बनाकर पैसा खर्च करके हजारों लाखों लोगों को काम पर लगा कर इस काम को अंजाम देते हैं।

भारत में करोड़ों ओबीसी दलितों आदिवासियों और महिलाओं की जिंदगी बदलने के लिए हमें नई परंपराओं का निर्माण करना पड़ेगा। झंडे डंडे और राजनीतिक नारे उछालने से कुछ नहीं होने वाला, जब तक समाज के जीने का तौर तरीका उत्सव मनाने का त्योहार मनाने का तौर तरीका नहीं बदलेगा तब तक हम बाबासाहब आंबेडकर और ज्योतिबाराव फुले और बीपी मंडल साहब के सपनों का भारत नहीं बना पाएंगे।

तथ्यों को लेकर झूठ और ग़लत बोलने के रिकार्डधारी हैं पीएम मोदी- रवीश कुमार

प्रधानमंत्री इतिहास को लेकर झूठ बोलते रहे हैं। ग़लत भी बोलते रहे हैं। आधा सच और आधा झूठ बोल कर उलझाते भी रहे हैं। अगर झूठ और ग़लत बोलने में उनकी सरकार को भी शामिल कर लें तो ऐसी कई रिपोर्ट आपको मिल जाएँगी जिसमें उनकी ग़लतबयानियों का पर्दाफ़ाश किया गया है। इस रिकार्ड की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए सत्याग्रह और जेल जाने की बात को सोशल मीडिया पर मज़ाक़ उड़ जाना स्वाभाविक था। प्रधानमंत्री ने कर्नाटक के बीदर में बोल दिया कि जब भगत सिंह जेल में थे तब उनसे मिलने कांग्रेस का कोई नेता नहीं गया। तुरंत ही तथ्यों से इसे ग़लत साबित किया गया और आज तक प्रधानमंत्री ने उस पर कोई सफ़ाई नहीं दी।

गुजरात चुनाव के दौरान मोदी ने कह दिया कि मणि़शंकर अय्यर के घर एक बैठक हुई थी जिसमें मनमोहन सिंह, हामिद अंसारी मौजूद थे। इस बैठक में पाकिस्तान के उच्चायुक्त और पूर्व विदेश मंत्री आए थे। मोदी ने बेहद चालाकी से इसे गुजरात चुनाव से जोड़ा और कहा कि पाकिस्तान कांग्रेस की मदद कर रहा है और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। इस बैठक में पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर भी थे, मोदी ने इसकी भी परवाह नहीं की कि भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख दीपक कपूर पाकिस्तान के साथ मिल कर किसी साज़िश में शामिल नहीं हो सकते। दीपक कपूर ने कहा था कि उस मुलाक़ात में गुजरात चुनाव पर कोई बात नहीं हुई। ख़ैर इस झूठ पर प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में माफ़ी माँगी थी।

तक्षशिला बिहार में है। यह ग़लतबयानी थी। वाजपेयी मेट्रो में सवारी करने वाले पहले भारतीय थे। यह भी ग़लत तथ्य साबित हुआ। कर्नाटक की रैली में मोदी बोल गए कि उन्होंने खातों में सीधे पैसे भेजने की सेवा शुरू की जबकि इसकी शुरुआत 2013 में हो चुकी थी। यूपी के चुनाव प्रचार में मोदी ने कह दिया कि रमज़ान में बिजली तो आती थी दीवाली में भी आनी चाहिए थी। बाद में तथ्यों से पता चला कि यह ग़लत है। कानपुर में रेल दुर्घटना हुई थी तो आई एस आई से जोड़ दिया जिसे यूपी के पुलिस प्रमुख ने ख़ारिज किया था। इसकी रिपोर्ट आ गई है आप खुद सर्च करें।

ऐसे अनेक उदाहरण आपको ऑल्ट न्यूज़ से लेकर तमाम मीडिया रिपोर्ट में मिलेंगे। यहाँ तक कि पंद्रह अगस्त के भाषणों में भी तथ्यों की विसंगतियाँ उजागर की जाती रही हैं। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिकार्ड है। ऐसे में बांग्लादेश की आज़ादी के समर्थन में सत्याग्रह करने और जेल जाने की बात का मज़ाक़ उड़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं है और न ही पत्रकारिता की नाकामी है। पहले भी इसी पत्रकारिता ने उनके झूठ और ग़लतबयानी को पकड़ा है जिस पर कोई जवाब नहीं आया और उन कामों को भी मोदी विरोध के खाँचे में फ़िट कर किनारे कर दिया गया। इस चालाकी को भी समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री के राजनीति नेतृत्व के नीचे इतिहास का क्या हाल किया गया है और नेहरू के इतिहास को किस तरह कलंकित किया गया है बताने की ज़रूरत नहीं। मोदी के राज में पत्रकारिता का क्या हाल हुआ है? उनके लिए पत्रकारिता के नाम पर छूट माँगने से पहले इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

यह बात सही है कि बांग्लादेश के निर्माण को लेकर उस वक्त देश में एक माहौल था। उस समय की रणनीति और राजनीति को समग्र रूप से देना यहां संभव नहीं है और न सभी जानकारी है। जनसंघ ने बांग्लादेश को मान्यता देने के आंदोलन का समर्थन किया था। संघ ने भी। शेषाद्रीचारी ने ‘दि वायर’ में लिखा है और वायर ने छापा है। शेषाद्री चारी ने लिखा है कि बांग्लादेश का बनना संघ के अखंड भारत की सोच की जीत थी। इस लेख में भी सत्याग्रह का ज़िक्र नहीं है। हो सकता है लेखक से छूट गया हो या उन्होंने इसे महत्वपूर्ण न समझा हो। मगर चारी ने लिखा है कि उस समय संघ और जनसंघ ने कई बड़े प्रदर्शन और मार्च किए थे। मुमकिन है सत्याग्रह के बारे में अलग से ज़िक्र करने की ज़रूरत न हुई हो। अगर उन्हें मौजूदा प्रधानमंत्री के जेल जाने की बात का इल्म होता तो वे वाजपेयी की भूमिका के साथ मोदी के जेल जाने के संयोग का ज़रूर ज़िक्र करते। उस समय सोशलिस्ट पार्टी के नेता भी अमरीका का विरोध कर रहे थे। दोनों के प्रदर्शन एक दूसरे से घुले मिले हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री के इस बयान के संदर्भ में तीन किताबों का ज़िक्र आया है। एक किताब आपातकाल पर है। उनकी ही लिखी हुई। जिसे बीजेपी समर्थक कोट करने लगे। इसे पढ़ने वालों ने तुरंत ही खंडन कर दिया कि इसमें एक लाइन सत्याग्रह पर नहीं है। फिर गुजरात की वरिष्ठ पत्रकार दीपल त्रिवेदी ने ट्विट किया कि andy marino मोदी के आधिकारिक जीवनीकार हैं। उनकी जीवनी में एक लाइन सत्याग्रह और जेल पर नहीं है। दीपल ने पहली दो किताबों के बारे में कहा है। मैंने दोनों किताब नहीं पढ़ी है। तीसरी किताब नीलांजन मुखोपाध्याय की है। यह किताब andy marino की जीवनी से पहले आई थी। यह भी जीवनी ही है। इस किताब में मोदी ने सत्याग्रह और जेल जाने की बात की है। उन्हीं का दावा है।इस प्रसंग के पैराग्राफ़ में मोदी कहते हैं कि अमरीकी दूतावास के सामने विरोध करने कई दलों के नेता गए थे। जॉर्ज फ़र्नांडिस भी थे। इसकी सत्यता के प्रमाण अभी तक किसी ने पेश नहीं किए हैं, प्रदर्शन हुआ होगा। दूतावास के सामने प्रदर्शन करने पर गिरफ़्तारी हो सकती है। भले ही आप भारत सरकार के समर्थन में ही करें। अब मोदी जेल गए या नहीं गए इसे लेकर मज़ाक़ उड़ रहा है तो कोई तिहाड़ जेल में आर टी आई लगा रहा है। यह भी अजीब है कि मोदी आधिकारिक जीवनी में सत्याग्रह की बात नहीं करते हैं। जेल की बात नहीं करते हैं। लेकिन दूसरी किताब में करते हैं। एक चौथी किताब लैंस प्राइस की है। इसे मैंने नहीं पढ़ी है। इसलिए कह नहीं सकता कि उसमें क्या है। न ही इस किताब को पढ़ने वाले किसी पत्रकार की बात मेरी नज़र से गुजरी है। आपकी नज़र से गुज़री हो तो बता दीजिए।

2015 का एक वीडियो बयान सोशल मीडिया पर चल रहा है जिसमें मोदी इस सत्याग्रह की बात कर रहे हैं। पत्रकार शेष नारायण सिंह ने लिखा है कि वाजपेयी के आह्वान पर जनसंघ ने बांग्लादेश के लिए सत्याग्रह किया था। जहां उनका आधार मज़बूत था वहाँ पर धरना प्रदर्शन हुआ था। उनके जानने वाले लोग भी यूपी से दिल्ली गए थे। प्रदर्शन में हिस्सा लेने। एसोसिएट प्रेस का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें पीले रंग का झंडा लिए लोग दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं। शायद यह जनसंघ का झंडा था। पुलिस से धक्का मुक्की हो रही है। ज़ाहिर है इतने अंतर्विरोधों के बीच मज़ाक़ उड़ना और सवाल उठना लाज़िमी है। प्रधानमंत्री का कौन सा बयान झूठ है और कौन सा सच इसे लेकर सतर्क रहने की ज़रूरत है। मज़ाक़ उड़ाने से पहले भी और बाद में भी। क्योंकि झूठ बोल कर निकल जाने और कुछ ऐसा बोल देने जिसे लोग झूठ समझ लें दोनों ही खेल में नरेंद्र मोदी माहिर हैं।

रवीश कुमार की फेसबुक पोस्ट से साभार। सिर्फ हेडिंग में परिवर्तन किया गया है

कैलिफोर्निया की अदालत से दलितों के पक्ष में आ सकता है फैसला !

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 जातिगत भेदभाव के खिलाफ अमेरिका में अम्बेडकरवादियों की लड़ाई जारी है। अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित संगठन ‘अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर’ (एआईसी) ने 23 मार्च को कैलिफोर्निया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा फिर से खटखटाया है। संगठन की मांग है कि उसे अमेरिका में होने वाले जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर एमिकस क्यूरी (अदालत का न्यायिक मित्र) के रूप में शामिल किया जाए।

गौरतलब है कि सिस्को सिस्टम्स नामक कंपनी में एक दलित इंजीनियर के खिलाफ सवर्ण इंजीनियरों एवं अधिकारियों द्वारा कथित जातिगत भेदभाव का मामला हुआ था जो अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। यह अमेरिका में अपनी किस्म का एक महत्वपूर्ण मामला है। अगर इस मामले में दलितों के पक्ष में फैसला आता है तो अमेरिका में जातिगत भेदभाव को भी नस्लवादी भेदभाव की तरह मानवाधिकार हनन के मामलों से जोड़ा जा सकेगा। अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (एआईसी) अमेरिका में बसे भारतीय दलितों एवं पिछड़ों के लिए आवाज उठाने वाला एक संगठन है।

अमेरिका में सवर्ण समाज के ही नहीं बल्कि दलित समाज के भारतीय भी बड़ी संख्या में बसे हैं और उनके खिलाफ भारतीय सवर्णों द्वारा भेदभाव के कई मामले सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में चूंकि जातिगत भेदभाव को नस्लवाद (रेसिज़्म) की तरह मानवाधिकार हनन के एक कारण के रूप में अभी तक नहीं देखा गया है। हालांकि भारतीय दलित बुद्धिजीवी एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता मांग करते रहे हैं कि जातिगत भेदभाव को भी नस्लवाद की तरह देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में अगर कैलिफोर्निया की अदालत से दलितों के पक्ष में फैसला आता है तो अमेरिका में एवं उसके बाद यूरोप में जाति को भी नस्ल की तरह देखने के लिए वातावरण बनाने की संभावना बढ़ जाएगी।

50% फीसदी से ज्यादा आरक्षण पर राज्य सरकारों ने लिया है यह फैसला

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26 मार्च को मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक बड़ा फैसला आया है। इसी महीने में कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच ने राज्यों से पूछा था कि क्या 50% आरक्षण की सीमा बढ़ाई जा सकती है? यह प्रश्न राज्यों की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओ में एवं विभागों में रोजगार के अवसरों में जाति आधारित आरक्षण के विषय में पूछा गया था। कई राज्यों ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि वह राज्यों में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाना चाहते हैं। इन राज्यों के साथ केंद्र सरकार ने भी कहा कि मराठा रिजर्वेशन का प्रतिशत बढ़ाया जाना संविधान के अनुकूल ही है।

गौरतलब है कि 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में जाति आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर दी थी। अब राज्यों और केंद्र के सामने सवाल यह है कि क्या उस आदेश को संशोधित करने की आवश्यकता है? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले मामले पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा था कि या आरक्षण कितने सालों तक जारी रखा जा सकता है, और क्या इस तरह आरक्षण जारी रखने से संविधान में वर्णित समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता?

इस मामले में ताज़ा स्थिति यह है कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारे आरक्षण की सीमा 50% से अधिक बढ़ाने के पक्ष में आ गयी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए इन प्रश्नों के कारण यह मामला बहुत महत्वपूर्ण बन गया है। अब सीधे सीधे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की संवैधानिकता से जुड़े सैद्धांतिक प्रश्न को सुलझाने पर बहुत कुछ निर्भर हो गया है। अब इस मामले में भविष्य में जो भी फैसला आएगा वह निर्णायक रूप से भारत के दलितों पिछड़ों के भविष्य को तय करेगा।

बिहार में महासंग्राम शुरू, तेजस्वी ने की नीतीश कुमार को घेरने की तैयारी

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23 मार्च को बिहार विधानसभा में हुई गुंडागर्दी के खिलाफ राष्ट्रीय जनता दल ने मोर्चा खोल दिया है। नीतीश कुमार पर  गुंडई का आरोप लगाते हुए राजद ने कल 26 मार्च को बिहार बंद का ऐलान किया है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्विट करते हुए कहा-

सड़कछाप गुंडई पर उतर आए अहंकारी नीतीश कुमार द्वारा विधानसभा के चीरहरण, माननीय विधायकों के साथ मारपीट, बेरोजगारी, महँगाई और सरकारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध कल, 26 मार्च, को महागठबंधन के द्वारा बिहार में बिहार बन्द का आह्वान किया है!

सभी बिहारवासी बन्द में हिस्सा लें!

23 मार्च की घटना के बाद से ही नीतीश कुमार की किरकिरी हो रही है। हर ओर नीतीश कुमार की आलोचना हो रही है। राजद और इसके नेता तेजस्वी यादव खासकर नीतीश कुमार पर हमलावर हैं। तेजस्वी ने एक वीडियो जारी कर भी नीतीश पर निशाना साधा है।

Telangana lost its Anti-Caste Doctor: Dr. Kolluri Chiranjeevi (1947-2021)

“I wanted to see Telangana as a separate state before I die”- a seasoned activist Dr. Kolluri Chiranjeevi, seven years ago over a phone call on 8 March when the central government officially announced the formation of the state on 2, June, 2014. I was on my way back to Delhi after a year long field work in Osmania University.  What a coincidence that on March 8th of this year he left us, leaving a legacy of his anti-caste activism for social justice.

As a budding sociologist, I spent 2013 conducting field work in Hyderabad as I researched the Telangana movement. In that time, I had the honor and privilege of meeting the famed activist and first generation student leader of the separate Telangana movement, Dr. Chiranjeevi Kolluri. While I traveled around the city, whenever I passed by lakdi Ka Pul, I would stop by Dr. Chiranjeevi’s flat to feel the warmth of his charming personality. As we started speaking, his wife, who is also a doctor and has provided free medical service to the poorest neighborhood, will make chai. After chai, chutney, and biryani, “Dr. Saab” travels back in history and brings out those facts that were not available in newspapers or archives. After listening to his revolutionary story, as a young researcher, I have always been interested in this question: “What motivates someone to become an activist?”

Born into a socialist family in 1947 in Warangal to a father who was a cloth mill worker and was a Lohia’ite.  ‘There was Hind Mazdoor Sabha that time, and my father was a committee member of this. We had a political atmosphere in our house. That is how I became an activist,’ proudly recalls Dr. Chiranjeevi.

Chiranjeevi was a brilliant student of medical science (MBBS) at Osmania University who eventually turned to radical activism, rising to the top leadership in the 1969 Osmania student movement for separate Telangana. Along with his group, he formed the Telangana Student Action Committee and fought for their separate Telangana. In August 1969, students printed the pamphlet and declared a Separate state on their own and also gave a press statement about a program to celebrate Telangana.. A senior leader Kaloji Rao was invited to honour the function, but right before the function police arrested Kaloji Rao and Chiranjeevi.

To get their Telangana, Chiranjeevi’s group decided to follow the constitutional way. After the formation of Telangana Praja Samiti; students contested general elections and won with a majority in the Telangana region. After all this struggle of winning elections, Chiranjeevi and his friends realised that the government would never give Telangana its freedom. In a state of hopelessness, Chiranjeevi and his friends turned into radical Marxists and joined the People’s War Group. After serving there for a decade, he realised this was a diversion of his goal for a separate Telangana. In the 1980s, when Manyawar Kanshi Ram formed the Bahujan Samaj Party, Dr. Chiranjeevi was inspired by the slogan, Ballot is more powerful than bullet. He began working for the BSP as the president of Andhra Pradesh region and cherished some wonderful moments in the company of Kanshi Ram and travelled the Northern India. That journey made him a life-time anti-caste activist and writer and he served as an editor to Bahujan Patrika.

Dr Chiranjeevi – A man who lost hundreds of his friends in the first Telangana agitation for separate statehood in 1969. He recalls the 10 month long agitations saying, “We had no clue how to fight it. We had a dream, we had passion to see our own statehood; but we didn’t have a strategy. Being on the protest sites and running on the roads of Hyderabad, we learned new strategies to survive the police brutality. We used to carry two handkerchiefs and two onions in our pocket. The minute they used to throw the tear gas shell, we used to eat onion and its smell used to stop the effect of gas. When police throw tear gas shells, it takes 15-20 seconds to burst. Once the gas started coming out, then it was not easy to pick it or touch it because it was very hot. Within these 20 seconds, we used to pick up the shells and throw them back at the police. Such instant strategies were part of our everyday life for 10 months and the battle was so brutal that the police never followed any rules and killed our more than 1000 students. The official data reveals only 372 students died.”

When I asked him what he thought of the ongoing Osmania student activism at the time, Dr. Chiranjeevi displayed resentment about the state of affairs in that most activism was social media based. His way of countering that was forming the 1969 Founders’ Forum for Separate Telangana to support and guide activists in strategies of protest and negotiation until the separate statehood was given to Telangana in 2014. Even after Telangana formation, he continued advocating the welfare of the socially marginalized sections.

Telangana will always miss its doctor, and his activism will always remain alive among revolutionaries, like the meaning of his name.

केरल में लागू होगा ‘रोहित वेमुला एक्ट’?

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भारत के करोड़ों ओबीसी, दलित एवं आदिवासी छात्रों के लिए एक बड़ी संभावना बन रही है। लंबे समय से शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी, दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव को काम करने का रास्ता खोजा जा रहा है। आरक्षित वर्ग से आने वाले बच्चों को ‘कोटा वाला’ कहा जाता है। इस तरह करोड़ों भारतीय बच्चों को जातिवादी और वर्णवादी असमाजिक तत्वों द्वारा सताया जाता है। लेकिन यह स्थिति बदल सकती है और इसकी शुरुआत केरल राज्य से हो सकती है। केरल कांग्रेस ने घोषणा की है कि अगर केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ सत्ता में आता है तो केरल में भारत का पहला ‘रोहित वेमुला एक्ट’ लागू होगा। इस एक्ट के जरिए दलित और आदिवासी छात्रों को भेदभाव से लड़ने में मदद मिलेगी। शनिवार 20 फरवरी को जारी यूडीएफ के 2021 केरल चुनाव घोषणापत्र में यह बात कही गई। इससे समझा जा सकता है कि इसका लाभ शूद्र समझे जाने वाले ओबीसी को भी मिलेगा।

कांग्रेस के इस घोषणापत्र में कहा गया है, “हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव, रैगिंग और पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए ‘रोहत वेमुला अधिनियम’ लागू करेंगे। सन 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव के कारण दलित समाज के छात्र रोहित वेमुला को आत्महत्या करनी पड़ी थी, इस घटना के बाद देश भर के छात्रों और शिक्षाविदों के बीच आंदोलन छिड़ गया था, जिसमें केंद्र सरकार से इस अधिनियम को लागू करने की मांग की गई थी।”

आरक्षण पर हमले को लेकर मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में RSS-BJP को घेरा

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 कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार को संसद में सरकार पर अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षण खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है। इसका प्रमाण देते हुए उन्होंने कहा है कि सरकार ने अभी तक सभी सरकारी विभागों में इस श्रेणी के तहत 50 फीसदी रिक्तियां भरने का काम पूरा नहीं किया है।

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश (संशोधन) विधेयक 2021 पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खड़गे ने कहा, “सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में आरक्षण धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। हर विभाग में एससी वर्ग में 50  प्रतिशत सीटें खाली हैं। रेलवे में एससी वर्ग की 56 फीसदी, रक्षा में 85 फीसदी और डाकतार विभाग में 28 फीसदी पद खाली हैं।”

उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए आगे कहा कि “वे रिक्तियों को भरना नहीं चाहते। दलितों को मिलने वाली सुनिश्चित नौकरी को खत्म करने की साजिश हो रही है। यह साजिश दलितों की नौकरी रोककर आर्थिक रूप से कमजोर रखते हुए पुराने जमाने की तरह गुलाम बनाए रखने की साजिश है।”

गौरतलब है कि सन 2015 में तमिलनाडु में मांग उठाई गयी थी कि सात चुनिंदा जातियों को अनुसूचित जाति श्रेणी में शामिल किया जाए। खड़गे ने आरोप लगाया है कि तब से अब तक केंद्र सरकार ने इस विषय में चुप्पी बनाए रखी। केंद्र सरकार चाहती तो 2015 में ही यह विधेयक ला सकती थी लेकिन केंद्र सरकार तमिलनाडु में चुनावों का इंतजार कर रही थी। अब जब चुनाव आने वाले हैं तक राजनीतिक फायदे के लिए बीजेपी सरकार यह विधेयक ला रही।

हाथरस पीड़िता को इंसाफ को लेकर बहन जी ने योगी सरकार को घेरा

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 बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने हाथरस मामले में पीड़ित परिवार को इंसाफ नहीं मिलने का मामला उठाया है। इस दौरान उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने योगी सरकार और यूपी प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाया है। हाथरस मामले में आज 22 मार्च को ट्वीट करते हुए बहन जी ने लिखा है कि “हाथरस गैंगरेप के पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने में लगातार रुकावटें आ रही है। ये रुकावटें असल में योगी सरकार की अक्षमता और लापरवाही का सबूत है। मायावती ने आगे अपने ट्वीट में कहा कि हाथरस बलात्कार मामले में अब जो नए तथ्य उजागर हो रहे हैं उसे साफ पता चलता है कि पीड़िता के परिवार को न्याय दिलाने के मामले में योगी सरकार की कार्यशैली किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।”

एक अन्य ट्वीट में बहनजी ने कहा है कि हाथरस कांड में आए नए तथ्यों को माननीय हाईकोर्ट द्वारा संज्ञान मे लेना चाहिए। गवाहों और वकील को धमकाने की जो शिकायतें आ रही हैं उसकी वजह से यूपी पुलिस की कार्यशैली भी संदिग्ध हो जाती है। इसलिए माननीय हाई कोर्ट को पुलिस द्वारा पीड़िता के परिवार, वकील एवं गवाहों को मिलने वाली धमकी के मामले में उचित कार्रवाई हेतु कठोर आदेश देनी चाहिए।

गौरतलब है कि हाथरस गैंगरेप मामले में घटना के कुछ समय बाद आनन-फानन में पीड़िता का अनुचित तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया गया था। जब यह मामला मीडिया में तूल पकड़ गया तब तत्काल कार्रवाई करते हुए हाथरस जिले के पुलिस अधीक्षक सहित चार अन्य पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की थी। लेकिन इस मांग के बावजूद अभी तक पीड़िता के परिवार को ना तो न्याय मिला है और ना ही दोषियों के खिलाफ उचित कार्यवाही का कोई संकेत मिल रहा है। ऐसे में भारत का पूरा दलित बहुजन समाज आक्रोशित है एवं दोषियों को सजा मिलने का इंतजार कर रहा है। बसपा अध्यक्ष ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए साफ कर दिया है कि वह अन्य नेताओं की तरह दलितों पर हमले को भुनाने की बजाय उस पर गंभीरता से सोचती हैं और लगातार नजर बनाए रखती हैं कि पीड़ित पक्ष को इंसाफ मिल रहा है या नहीं।

किसान आंदोलन में भी अहम होते जा रहे हैं डॉ. आंबेडकर

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किसान आंदोलन में भी बार-बार बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का जिक्र हो रहा है। गाहे-बगाहे किसान नेता बाबासाहब को याद कर रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में भारतीय किसान यूनियन के एक महत्वपूर्ण नेता गुरनाम सिंह चरूनी ने दलितों और सवर्णों की एकजुटता पर जोर दिया है। रविवार 21 मार्च को हरियाणा के कैथल में आयोजित बहुजन महापंचायत में उन्होंने आंदोलन की सफलता के लिए दलितों और सवर्णों की एकता को महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन तभी सफल हो सकता है जबकि सभी जातियों के लोग किसानों के पक्ष में एकजुट होंगे।

कैथल में अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों के संयुक्त मोर्चे में उन्होंने यह बयान दिया। इस बहुजन महापंचायत में  उन्होंने कहा कि अगर यह आंदोलन सफल नहीं होता है तो सिर्फ किसानों को ही नुकसान नहीं होगा। किसानों के साथ ही केंद्र द्वारा लादे जा रहे कृषि कानूनों का खामियाजा किसानों के अलावा सभी गरीबों को भुगतना होगा। इस प्रकार यह केवल किसानों का नहीं बल्कि पूरे गरीब, दलित एवं बहुजन समाज के भविष्य का भी सवाल है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि “अब समय आ गया है कि दलित, पिछड़ा वर्ग और उच्च जाति के समुदाय एकजुट हो जाएं, अब ऊंची जाति के परिवारों को अपने घरों में बाबासाहब अंबेडकर की फोटो लगाना चाहिए।” किसान आंदोलन के तीन महीने गुजर जाने के बाद किसान नेताओं का दलितों और बहुजनों की सामाजिक राजनीतिक शक्ति को इस तरह से रेखांकित करना महत्वपूर्ण बात है। भारत के गांवों में दलितों और ओबीसी के बीच ब्राह्मणवादी शक्तियों ने हमेशा से लड़ाइयां पैदा ही हैं। इस पृष्ठभूमि में ओबीसी किसान नेताओं द्वारा दलितों से भाईचारे और घर घर में अंबेडकर की फ़ोटो लगाने की मांग करना एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यह न केवल दलितों और ओबीसी के लिए हितकारी है बल्कि भारत के महान लोकतंत्र, सांविधानिक मूल्यों और गंगा जमुनी संस्कृति के लिए भी फायदेमंद बात है।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल: और कितनी पीढ़ियों तक जारी रहेगा आरक्षण?

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भारत के बहुजनों ने लिए आरक्षण से जुड़े सवाल पर एक नई बात उठी है। शुक्रवार 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण कितनी और पीढ़ियों तक चाहिए? यह सवाल असल में महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लिए उठी आरक्षण की मांग को लेकर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सप्ताह पहले भारत के सभी राज्यों से जवाब मांगा था कि क्या 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही इस बात पर चिंता जताई है कि अगर आरक्षण 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हुआ तो इसकी वजह से समाज में असमानता बढ़ सकती है।

गौरतलब है कि आरक्षण से जुड़े एक ऐतिहासिक मामले ‘इंदिरा साहनी केस’ में हुए फ़ैसले के मुताबिक़ आरक्षण की सीमा 50 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं हो सकती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सवाल उठाया था कि क्या इंदिरा साहनी केस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए? कोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या इस मामले को और बड़ी बेंच के पास भेज दिया जाना चाहिए?

माराठा आरक्षण मामले में सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार के वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संवैधानिक बेंच के सामने अपनी बात रखी। राहतगी ने कहा है कि आरक्षण को बदले हुए हालात में फिर से विचार किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा है कि आरक्षण को तय करने का मामला राज्यों पर छोड़ देना चाहिए। आगे उन्होंने यह भी दलील दी कि मंडल मामले में अदालत का जो फ़ैसला था, वह 1931 की जनगणना के आधार पर था। लेकिन तब से आज तक सामाजिक आर्थिक परिस्थितीयां काफी बदल चुकी हैं इसलिए आरक्षण पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

जिग्नेश मेवानी विधानसभा से एक दिन के लिए निलंबित, जानिए क्या है मामला

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गुजरात में एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के मामले में निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी ने न्याय के लिए आवाज उठाई है। जिग्नेश मेवानी ने इस मामले में राज्य सरकार एवं जांच एजेंसियों पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है। इस आरोप से परेशान गुजरात विधानसभा ने जिग्नेश मेवानी को शुक्रवार 19 मार्च को 1 दिन के लिए विधानसभा से निलंबित कर दिया है। इसे एक अनुशासनात्मक कार्यवाही माना जा रहा है जो कि जिग्नेश मेवानी द्वारा विधानसभा में कथित तौर पर शक्तियां दिखाने के जवाब में की गई है।

इस प्रदर्शन से नाराज होकर विधानसभा स्पीकर ने मेवानी को एक बार फिर से बैठने को कहा, और उन्हें धमकी भी दी कि वे उन्हें विधानसभा से बेदखल कर देंगे। अंत में विधानसभा अध्यक्ष की तरफ से उचित प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर मेवानी ने विधानसभा में अपना प्रदर्शन और नारेबाजी जारी रखी। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने सार्जेंट भेजकर मेवानी को सदन से बलपूर्वक हटवाया और उन्हें एक दिन के लिए विधानसभा से निलंबित कर दिया।

गौरतलब है कि दलित आरटीआई कार्यकर्ता अमराभाई बोरिचा की दो मार्च को हुई हत्या के बाद हत्या के आरोपी इंस्पेक्टर पीआर सोलंकी की गिरफ्तारी लंबे समय से नहीं हुई है। गुजरात विधानसभा में चल रहे बजट सत्र के दौरान प्रश्नकाल समाप्त होने के ठीक पहले जिग्नेश मेवानी ने यह मुद्दा उठाया। मेवानी ने विधानसभा में गृहमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी से  सीधा सवाल पूछे। सभा अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी ने उन्हें अपने स्थान पर बैठने को कहा। इसके बाद मेवानी ने नारेबाजी करना शुरू कर दी और न्याय की मांग करते हुए विधानसभा में तख्तियां दिखाई। मेवानी वडगांव विधानसभा क्षेत्र के निर्दलिय विधायक हैं।

दलितों के हक के 50 हजार करोड़ खर्च नहीं कर सकी मोदी सरकार

साल 2014 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी, तो इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बड़े-बड़े दावे किये थे। उन्होंने यहां तक कहा कि आने वाला वक्त देश के कमजोर तबकों और गरीबों का है। पहली बार सत्ता में आने तक तो कमोबेश स्थिति थोड़ी बहुत ठीक रही, लेकिन साल 2019 में दोबारा सत्ता में आने के बाद तो भाजपा सरकार ने जैसे गरीबों को रौंदने और अमीरों को और अमीर बनाने का फैसला कर लिया है।

 हाल ही में आई खबर के मुताबिक भारत सरकार ने अनुसूचित जाति के कल्याण के लिए आवंटित कुल राशि में से तकरीबन 50 हजार करोड़ रुपए की राशि इस्तेमाल ही नहीं की गई है। इसका यह अर्थ है कि भारत सरकार बीते 4 सालों में दलित समाज के कल्याण के लिए ना तो आवश्यक योजना बना पाई न ही उन्हें लागू कर पाई है।

जो आंकड़े सामने आए हैं, वह बताते हैं कि साल 2017- 18 से लेकर सन 2020-21 के दौरान अनुसूचित जाति के कल्याण के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, लेकिन सरकार की लापरवाही का आलम यह रहा कि इसमें से 49 हजार 722 करोड़ रुपए बिना खर्च किए ही वापस कर दिए हैं। सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों की योजनाओं में इस राशि का उपयोग होना था, जो कि नहीं हो सका है। इससे साफ है कि भाजपा की सरकार और इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दलितों के हितों को लेकर लापरवाह हैं, क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो 50 हजार करोड़ की बड़ी राशि बिना खर्च हुए वापस नहीं चली जाती।

Rs 50,000 crore, or 20% of funds allotted for SC welfare, left unused by Modi govt in 4 years

 इस पूरे मामले में एक अनोखी बात भी सामने आई है। खबर है कि नीति आयोग ने  सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को एक अजीब सलाह देते हुए कहा है कि इस आवंटित राशि का 60% दलितों में सर्वाधिक गरीब एक करोड़ लोगों को शर्त के साथ सीधे उनके खाते में जमा किया जाए। इस तरह का कैश ट्रांसफर साल में 4 बार ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ के जरिए किए जाने का सुझाव दिया गया है। इसके बाद का जो 40 प्रतिशत हिस्सा बचेगा, उसके बारे में सरकार तय करेगी कि वह उस राशि को कहां खर्च करेगी।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने इस सुझाव पर अमल करते हुए अनुसूचित जाति जनजाति के सबसे गरीब परिवारों की मदद के लिए एक नया ढांचा निर्मित किया है। मंत्रालय  ने एक नई योजना का निर्माण किया है जिसे ‘प्रधानमंत्री सामाजिक समावेशीकरण अभियान योजना’ का नाम दिया गया है। इस योजना के विषय में सरकार बड़े-बड़े दावे करना शुरू कर चुकी है। हालांकि इस योजना को फिलहाल जरूरी अनुमति नहीं मिली है। इस विषय में भारत सरकार का कहना है कि यह योजना अनुसूचित जाति के सर्वाधिक गरीब एक करोड़ परिवारों को सीधे-सीधे मदद करेगी।

यहां सबसे ज्यादा निराशाजनक बात यह है कि साधारण गरीब परिवारों से जुड़े विभागों ने सबसे ज्यादा लापरवाही दिखाई है। कृषि मंत्रालय, स्कूल शिक्षा साक्षरता मंत्रालय, रोजगार एवं मजदूर मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय, परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्रालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय के विभिन्न विभागों ने अपने लिए 80% से अधिक आवंटित राशि का उपयोग ही नहीं किया है।

 इतना ही नहीं, 1.33 लाख करोड़ रुपए जो कि 10 अलग-अलग विभागों को जारी किए गए थे, उनके खर्च की पड़ताल से पता चलता है कि उससे अनुसूचित जाति के लोगों को कोई फायदा ही नहीं हुआ है। पिछले 4 सालों में यह स्थिति लगातार बनी रही और कोरोना के दौरान यह आर्थिक अन्याय अपने चरम पर पहुंच गया है। इस वर्ष में एक अनुमान के मुताबिक लगभग 41 प्रतिशत आवंटित राशि बिना खर्च किए ही वापस चली गई है।

 ये आंकड़ें साफ बताते हैं कि अनुसूचित जाति के लोगों के लिए ना तो सरकार संवेदनशील है और ना ही उसके विभाग। अलग-अलग योजनाओं में अनुसूचित जाति के करोड़ों परिवारों के लिए जो भी राशि आई, उसका बिना खर्च हुए वापस चले जाना अपने आप में बहुत कुछ बताता है। विशेष रुप से नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना की मार से पीड़ित अनुसूचित जाति के करोड़ों लोग आर्थिक रूप से बहुत अधिक परेशान हैं। ऐसे में सरकार एवं सभी विभागों द्वारा उनके लिए तय की गई धनराशि का बिल्कुल भी उपयोग नहीं कर पाना सरकार की लापरवाही को दर्शाता है। एक विशेष  अर्थ में यह लापरवाही नहीं है, इसे गौर से देखा जाए तो भारत के दलित समाज के खिलाफ यह जानबूझकर किया गया आर्थिक अपराध है। सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि इसके बारे में तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया और खुद बहुजन समाज में बड़ी चर्चा नहीं होती है। जरूरी है कि बहुजन समाज इस तरह के आर्थिक घोटाले को जाने।

बजटः तेलंगाना सरकार ने दलित समाज के विकास के लिए की एक हजार करोड़ रुपये की घोषणा

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भारत में सार्वजनिक जीवन एवं शासन प्रशासन में बाबा साहब आंबेडकर द्वारा स्थापित मूल्यों और दलित हित की राजनीति का एक नया उदाहरण सामने आया है। तेलंगाना की के. चंद्रशेखर राव सरकार द्वारा दलित बहुजन समाज के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। तेलंगाना सरकार ने वर्ष 2021-22 का बजट पेश करने के दौरान राज्य में दलितों के लिए 1000 करोड़ रुपये की नई योजना की घोषणा की है।

तेलंगाना के वित्त मंत्री टी हरीश राव ने बजट पेश करने के दौरान यह घोषणा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने राज्य में अनुसूचित जातियों के सर्वांगीण विकास के लिए नई रणनीति बनाई है। उन्होंने कहा, ‘भारतीय संविधान के निर्माता डॉ बी. आर आंबेडकर ने कहा था कि जो अपने लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं, वे ही समाज को प्रगति की ओर ले जा सकेंगे’। राव ने आग कहा कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री दलितों के लिए योजना बनाते हुए बाबा साहब आंबेडकर के इन्ही मूल्यों पर चलने का प्रयास कर रहे हैं।

दक्षिण भारत की राजनीति में इस प्रकार के प्रयोग कोई नई बात नहीं हैं। सत्तर-अस्सी के दशक में पेरियार की राजनीतिक विचारधारा ने भारत के बहुजन समाज को एकजुट करके नई द्रविड़-बहुजन राजनीति की नींव रखी थी। तेलंगाना सरकार द्वारा दलितों के हित में नई योजना लाने की यह घटना भारत के बहुजनों और लोकतंत्र के लिए एक अच्छी खबर मानी जा रही है।

ओबीसी के प्रतिनिधित्व पर आई चौंकाने वाली रिपोर्ट

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 भारत के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों में भारत के बहुजन समाज के प्रतिनिधित्व पर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। एक आरटीआई के जवाब में पता चला है कि पुराने आईआईएम संस्थानो में बहुजन प्रोफेसर्स की उपस्थिति दस प्रतिशत से भी कम थी। बीते कुछ सालों में कई सारे नए आईआईएम बनने के बाद भी बहुजनों का प्रतिनिधित्व कमजोर बना हुआ है। यह जानकारी आईआईएम बैंगलोर के एक पीएचडी छात्र द्वारा दायर आरटीआई के जवाब में हासिल हुई है। इस प्रकार भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में भारत के बहुजन समाज की जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग फिर से उठने लगी है। देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं पुराने आईआईएम संस्थानों में से एक आईआईएम कोलकाता में एससी-एसटी का एक भी शिक्षक नहीं है जबकि ओबीसी के केवल दो शिक्षक हैं। इस प्रकार आईआईएम कोलकाता के कुल 77 शिक्षकों के बीच बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व सिर्फ 3 प्रतिशत है। इसी तरह आईआईएम बैंगलोर में 3 एससी, एक एसटी और 2 ओबीसी शिक्षक हैं। इस प्रकार यहाँ बहुजन प्रतिनिधित्व 6% है। आईआईएम अहमदाबाद ने इस मामले पर किसी भी तरह की जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया है। यह आँकड़े एक दुखद तस्वीर बयान करते हैं। आजादी के इतने दशकों के बाद भी भारत के समाज में बहुजन जातियों से आने वाले व्यक्तियों की भागीदारी सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों में कमजोर बनी हुई है। इस कारण न केवल बहुजन समाज की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति बाधित हुई है बल्कि देश का लोकतंत्र भी कमजोर होता जा रहा है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद जहां इसको लेकर बहस शुरू हो गई है तो वहीं ओबीसी समाज के बुद्धीजिवियों ने अपने ही समाज के लोगों पर सवाल उठाया है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने ट्विट किया है-

दरअसल इस आंकड़े के सामने आने के बाद ओबीसी के भीतर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। देखना यह होगा कि क्या ओबीसी समाज चुपचाप सरकार की इस साजिश को स्वीकार कर लेता है या फिर विरोध करता है।

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गरीब बहुजनों के साथ खिलवाड़ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इस मामले में केंद्र को लगाई फटकार

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आधार कार्ड से लिंक न होने के कारण लगभग तीन करोड़ राशन कार्ड सरकार द्वारा रद्द कर दिए गए हैं। इस मामले में दायर एक जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकारों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए जवाब मांगा है। बुधवार 17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला बहुत गंभीर है और इस पर संवेदनशीलता से विचार होना चाहिए क्योंकि यह सबसे गरीब लोगों के जीवन से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि राशन कार्ड रद्द होने के कारण जनजातीय क्षेत्रों में भुखमरी से कई लोगों की मौत हुई है। मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि केंद्र सरकार पर इस तरह के आरोप लगाने से किसी को कोई फायदा नहीं होने वाला है।बोबडे ने आगे यह भी जनजातियों की खाद्य सुरक्षा का मुद्दा राज्य की सूची में आता है इसलिए इसमें केंद्र सरकार पर आरोप लगाना उचित नहीं है और राज्य सरकार को इस मामले की जांच करनी चाहिए।कॉलिन गोंजाल्विस ने अपना पक्ष रखते हुए केंद्र को इस सबके लिए जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा कि राशन कार्ड निरस्त करने का काम केंद्र सरकार ने इस आधार पर किया है कि इन लोगों के पास आधार कार्ड नहीं हैं। गौरतलब है कि यह याचिका ह्यूमन राइट ला नेटवर्क की तरफ से लगाई गई है। 28 सितंबर 2017 को झारखंड के सिमडेगा, करमाटी की 11 वर्षीय बच्ची संतोषी की भूख से मौत हो गयी थी। इसके बाद संतोषी की मां और बहन की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता के साथ संतोषी की मां कोइली देवी और बहन गुड़िया देवी भी मौजूद थीं।

महाराष्ट्रः दलित पैंथर ने खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा

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 महाराष्ट्र के पुणे में भारत के दलितों के जुझारू सामाजिक संगठन ‘दलित पैंथर’ ने गरीबों के हक में एक बार फिर आवाज बुलंद की है। राज्य में बिजली बिलों की जबरन वसूली के खिलाफ 15 मार्च को पुणे के जिला अधिकारी कार्यालय में विरोध प्रदर्शन किया गया। गरीब दलित परिवारों की शिकायत पर कार्यवाही करते हुए दलित पैंथर ने यह कदम उठाया है। बीते कई महीनों में गैस, पेट्रोल और डीजल के दाम में भारी वृद्धि हुई है और महाराष्ट्र में बिजली उपभोक्ताओं को महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड(एमएसईडीसीएल) द्वारा लॉकडाउन के बहाने अतिरिक्त बिजली बिल दिए गए हैं। एमएसईईसीएल ने कहा है कि अगर वे बिल नहीं भरेंगे तो उनकी बिजली काट दी जाएगी। इस मुद्दे पर बहुजन समाज के गरीब परिवार दलित पैंथर ऑफ इंडिया ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बापूसाहेब भोसले के नेतृत्व में प्रदेश व्यापी जन आंदोलन किया है। उन्होंने एमएसईईसीएल के कार्यों की निंदा की है। उन्होंने कंपनी के इस फैसले को किसान और आम आदमी के साथ अन्याय कहा है। इस प्रकार महाराष्ट्र में गरीब दलितों की समस्याओं पर जन आंदोलन की एक नई भूमिका तैयार होती नजर आ रही है। गौरतलब है कि किसानों के आंदोलन पर पहले से ही एक आंदोलन चल रहा है। हाल ही में बैंक कर्मचारियों ने बैंकों के निजीकरण के विरोध में हड़ताल का आयोजन किया है। ऐसे में महाराष्ट्र राज्य में बिजली के मुद्दे पर दलित पैंथर का सक्रिय होना बहुजन समाज के हितों से जुड़ी राजनीति की दिशा में एक नए मुद्दे का संकेत करता है।

मा. कांशीराम जयंती पर पैतृक गांव में ‘मिशन जय भीम’ ने किया प्रतिमा का अनावरण

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बहुजन समाज के नायक मान्यवर कांशीराम की जयंती पर उनके पैतृक गांव ख्वासपुर में प्रतिमा का अनावरण किया गया। मिशन जय भीम के राष्ट्रीय संरक्षक राजेन्द्र पाल गौतम जी ने ख़्वासपुर में साहब कांशीराम जी की प्रतिमा का अनावरण किया। इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। राजेन्द्र पाल गौतम सुबह अपने काफिले के साथ ख्वासपुर के लिए निकले, जहां पहुंच कर उन्होंने प्रतिमा का अनावरण किया। इस मौेके पर राजेन्द्र पाल गौतम ने कहा कि वो चार-पांच महीने पहले मान्यवर कांशीराम जी के गांव आए थे। तब वहां मान्वयर के पहचान की कोई चीज मौजूद नहीं होने से उन्हें निराशा हुई थी। बाहर से बिल्कुल पता नहीं चल पा रहा था कि यह मान्यवर कांशीराम जी का गांव है। तब उन्होंने वहां के सरपंच मनप्रीत सिंह (मन्नी), कांशीराम जी के परिवार के लोग और गांव वालों से बात की, तब जाकर मान्यवर कांशीराम के गांव में उनकी प्रतिमा बनाने का रास्ता साफ हुआ। गांव के सरपंच और गांव वालों ने इसके लिए जमीन भी मुहैया करवाई।

इस दौरान एक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया, जिसमें गांव के तमाम वर्गों के लोग मौजूद रहे। सबने मिशन जय भीम और उसके संरक्षक राजेन्द्र पाल गौतम के इस प्रयास की सराहना की। गौरतलब है कि राजेन्द्र पाल गौतम दिल्ली सरकार में समाजिक न्याय मंत्री भी हैं।