दलित दस्तक का असर: अम्बेडकरवादियों ने कोमल की पढ़ाई के लिए की आर्थिक मदद

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नई दिल्ली। बिहार के भागलपुर स्थित घोघा गांव की कोमल की पिछले दिनों दलित दस्तक में खूब चर्चा हुई. दलित दस्तक ने कोमल को लेकर खबर प्रकाशित की तो वहीं यू-ट्यूब चैनल के लिए इंटरव्यू भी चलाया. असल में इसकी एक जायज वजह भी थी. कोमल मुसहर जाति से ताल्लुक रखती हैं. और अपने गांव की मुसहर टोली से मैट्रिक की परीक्षा पास कर कोमल ने एक नया आगाज किया था. इससे पहले इस मुसहर टोली से कोई भी दसवीं पास नहीं कर पाया था.

दलित दस्तक द्वारा कोमल की कहानी को दुनिया के सामने लाने के बाद कई लोगों ने कोमल की मदद की है. दलित दस्तक में प्रकाशित अपने इंटरव्यू में कोमल ने आगे शिक्षा जारी रखने की इच्छा जाहिर की थी और शिक्षक बनने का सपना बताया था. हालांकि कोमल के दिहारी मजदूर पिता और ईट-भट्टे पर काम करने वाली उसकी मां की गरीबी कई मौके पर उसकी पढ़ाई में आड़े आती है. लेकिन अधिकारियों के समूह द्वारा कोमल की मदद के बाद उसके लिए आगे की राह थोड़ी आसान हो गई है.

इस समूह ने कोमल के लिए उसके परिवार के खाते में 27 हजार रुपये की मदद की है. मदद करने वाले अधिकारियों के नाम हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

(1) आर. ए. सेठ ज्वाइंट कमिश्नर (2) धम्मप्रिय आदित्य भारती जी (DC गाजियाबाद) (3) धम्मप्रिय शरत चंद्रा जी (DC मुज्जफरनगर) (4) धम्मप्रिय सुदीप श्रीवास (AC आगरा) (5) धम्मप्रिय विनोद मित्रा (AC आगरा) (6) धम्मप्रिय अभिषेक कुमार सेठ (AC) (7) धम्मप्रिय सुरेंद्र कैथल (DC बाँदा) (8) धम्मप्रिय संतोष कुमार (AC आगरा) (9) श्रीमती दीप्ति गुप्ता (AC आगरा) (10) धम्मप्रिय रंजय कुमार सिंह (CTO अमरोहा) (11) सुश्री सांत्वना गौतम (DC प्रशासन, इटावा) (12) धम्मप्रिय अजय कुमार वर्मा (DC चांदपुर) (13) धम्मप्रिय गंधर्व सिंह (AC आगरा) (14) धम्मप्रिय रंजीत कुमार (DC टैक्स ऑडिट कानपुर) (15) धम्मप्रिय अनिल कुमार जी (DC SIB मुरादाबाद) (16) धम्मप्रिय जय प्रकाश जी (AC झांसी) (17) धम्मप्रिय संजीव कुमार आर्य जी (DC) (18) धम्मप्रिय प्रवेश तोमर (DC मुजफरनगर) इस सहयोग पर इस समूह का कहना है कि हम लोगों ने समाज के उस तबके तक पहुँचने का प्रयास किया है जहाँ पर सूरज ने भी रोशनी देने से इनकार कर दिया था. उम्मीद है कि इन अधिकारियों का यह कदम कोमल के सपनों को नए पंख देगा.

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दलित लड़के से बाबासाहेब को गाली दिलवाने की हकीकत

नई दिल्ली।  पिछले दिनों सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने दलित समाज और बाबासाहेब आम्बेडकर को लेकर दूसरी जातियों के लोगों के मन में भरी नफरत फिर सामने ले आई है. दलित समाज के एक लड़के को पहले किडनैप करने और फिर उससे जबरन दलित समाज और बाबासाहेब को गाली दिलवाने के इस मामले से दलित समाज के लोग आक्रोशित हैं.

घटना 18 जुलाई को मेरठ की है. पीड़ित लवली दफ्तर से लौटे ही थे कि एक फोन आया और वो घर से निकल गया. इसके बाद लवली करीब 50 घंटे तक गायब रहा. पोस्ट ऑफिस में नौकरी करने वाले लवली के पिता सुरेन्द्र कुमार और मां ओंकारी देवी बेटे को ढूंढ़ने के लिए परेशान थे. बेटा तो नहीं आया, लेकिन इस बीच वायरल एक वीडियो ने लवली के माता-पिता को और परेशान कर दिया.

वीडियो में कुछ लोग लवली को मार-मारकर बाबासाहब आंबेडकर को भद्दी गालियां देने पर मजबूर कर रहे थे. साथ ही लवली को उसकी उपजाति का नाम लेकर गालियां देने को मजबूर कर रहे थे और जट्ट जिंदाबाद के नारे लगवा रहे थे.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, लवली ने बताया कि उसको इस बीच का कुछ याद नहीं है, सिवाए इसके कि कुछ लोगों ने उन्हें रिवॉल्वर की नोक पर नशे की हालत में उनके दलित समाज के सबसे बड़े आइकन भीमराव आंबेडकर को गाली देने पर मजूबर किया. लवली के लिए यह काफी पीड़ा दायक था. क्योंकि लवली का पूरा परिवार बाबासाहेब को मानने वाला अम्बेडकरवादी है. घर में मौजूद बाबासाहेब की कई तस्वीरें यह बताती भी है.

इस मामले में स्थानीय थाने में तीन लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई है. लेकिन एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से मामला लटका हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए थाने ने मामला उच्चअधिकारियों को भेज दिया है. एससी-एसटी एक्ट में आए बदलाव के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून के भीतर कोई भी केस दर्ज किए जाने से पहले सर्किल ऑफ़िसर स्तर के एक अधिकारी को उसकी जांच करना जरूरी है.

लवली से जुड़े लोगों का कहन है कि लवली बाबा साहब को मानने वाला लड़का है, वह लोगों को बाबासाहब से जोड़ता रहा है, उसे इसी की सज़ा दी गई है. चिंता की बात यह है कि अभी तक मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.

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इमरान खान बनाएंगे पाकिस्तान में सरकार, लेकिन गठबंधन की दरकार

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नई दिल्ली। पाकिस्तान में हुए आम चुनाव के नतीजे आ गए हैं. नतीजों के मुताबिक आधिकारिक तौर पर पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की जीत हो गई है. 20 सीटों पर जारी मतगणना को छोड़ चुनाव के नतीजों पर बात करें तो इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी नेशनल एसेंबली की 269 सीटों में से 109 सीटों पर शानदार जीत दर्ज है.

इस चुनाव में उनके विरोधी शाहबाज शरीफ के पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) को 63 सीटें मिली है. इस चुनाव में तीसरे स्थान पर बिलावल भुट्टो को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी रही, जिसे 39 सीटों पर जीत हासिल हुई है. हालांकि नतीजे आने के बाद विपक्षियों ने चुनाव में धांधली का मुद्दा उठाया है. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जेल जाने के बाद पार्टी को संभालनेवाले शाहबाज ने इसमें व्यापक फर्जीवाड़ा और धांधली का आरोप लगाकर चुनाव नतीजे को खारिज कर दिया. जबकि इमरान खान ने गुरुवार को अपनी जीत की घोषणा करते हुए फर्जीवाड़े के आरोपों से इनकार किया. उन्होंने इस चुनाव को पाकिस्तान के इतिहास का सबसे ज्यादा पारदर्शी चुनाव कहा.

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दिग्गज नेता करुणानिधि की तबियत बिगड़ी, मिलने के लिए दिग्गजों का जमावड़ा

चेन्नई। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) प्रमुख एम. करुणानिधि की तबीयत बिगड़ गई है. इस खबर के आने के बाद द्रविड़ नेता के आवास पर नेताओं और समर्थकों का तांता लग गया है. राज्य भर के तमाम दिग्गज नेता करुणानिधि से मिलने पहुंच रहे हैं. 94 वर्षीय करुणानिधि का इलाज चेन्नई स्थित उनके आवास पर ही चल रहा है.

वरिष्ठ नेता से मिलने पहुचंने वाले दिग्गज नेताओं में तमिलनाडु के उपमुख्यंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम, कई मंत्री और AIADMK के वरिष्ठ नेताओं के साथ करुणानिधि का हालचाल जानने पहुंचे. इस दौरान उन्होंने डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन से भी मुलाकात की. ऐसा पहली बार है कि जब AIADMK के नेता करुणानिधि के गोपालापुरम आवास पर पहुंचे हों. तो वहीं हाल ही में राजनीति में उतर चुके अभिनेता कमल हासन भी दिग्गज नेता से मिलने पहुंचे.

कावेरी अस्पताल की मेडिकल बुलेटिन के अनुसार, बढ़ती उम्र के कारण ही करुणानिधि की तबीयत बिगड़ी है. उन्हें बार-बार बुखार आ रहा है. बताया जा रहा है कि उन्हें यूरिन इन्फेक्शन हुआ था. आपको बता दें कि करुणानिधि ने हाल ही में अपना 94वां जन्मदिन भी मनाया है. ठीक 50 साल पहले 26 जुलाई को ही उन्होंने डीएमके की कमान अपने हाथ में ली थी.

गौरतलब है कि करुणानिधि पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. आज के समय में उनकी गिनती देश के दिग्गज नेताओं में होती है. अभी तक वह जिस भी सीट पर चुनाव लड़े हैं, उन्होंने हमेशा जीत दर्ज की है. करुणानिधि ने 1969 में पहली बार राज्य के सीएम का पद संभाला था, इसके बाद 2003 में आखिरी बार मुख्यमंत्री बने थे.

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जानिए क्या है आषाढ़ी पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा का महत्व

नई दिल्ली। आज (27 जुलाई) को धम्मचक्र प्रवर्तन दि‍न है. आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग किया था. आषाढ़ पूर्णिमा को धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि सन् 528 इसवी पूर्व इसी दिन सारनाथ में सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्खुओं को प्रथम धम्म प्रवचन दे कर धम्म चक्र प्रवर्तन सूत्र की देशना की थी.

धम्म चक्र प्रवर्तन दि‍वस को बहुत महत्व पूर्ण माना जाता है क्योंकि‍ यदि‍ सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध धम्म देशना नहीं करते तो आने वाली पीढि‍यों को धम्म लाभ नहीं मि‍लता और हम लोग इस से वंचि‍त रह जाते. बुद्ध ने पांच परिव्राजकों को संबोधित करते हुए कहा-भिक्खुओं, जो परिव्रजित हैं उन्हें दो अतियों से बचना चाहिए, पहली अति है कामभोगों में लिप्त रहने वाले जीवन की, यह कमजोर बनाने वाला है, गंवारु है, तुच्छ है और किसी काम का नहीं है, दूसरी अति है आत्मपीङाप्रधान जीवन जो कि दुःखद होता है, व्यर्थ होता है और बेकार होता है.

इन दोनों अतियों से बचे रहकर ही तथागत ने मध्यम मार्ग का अविष्कार किया है, यह मध्यम मार्ग साधक को अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाला है, बुद्धि देने वाला है, ज्ञान देने वाला है, शांति देने वाला है, संबोधि देने वाला है और पूर्ण मुक्ति अर्थात निर्वाण तक पहुंचा देने वाला है, यह मध्यम मार्ग श्रेष्ठ आष्टांगिक मार्ग है.

इस आर्य आष्टांगिक मार्ग के अंग हैं, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि.

बुद्ध ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा- भिक्खुओं, पहला आर्यसत्य यह है कि दुःख है. जन्म लेना दुःख है, बुढ़ापा आना दुःख है, बीमारी दुःख है, मुत्यु दुःख है, अप्रिय चीजों से संयोग दुःख है, प्रिय चीजों से वियोग दुःख है, मनचाहा न होना दुःख है, अनचाहा होना दुःख है, संक्षेप में पांच स्कंधों से उपादान (अतिशय तृष्णा का होना) दुःख है.

अब हे भिक्खुओं, दूसरा आर्यसत्य यह है कि इस दुःख का कारण हैः राग के कारण पुनर्भव अर्थात पुनर्जन्म होता है, जिससे इस और उस जन्म के प्रति अतिशय लगाव पैदा होता है, यह लगाव काम-तृष्णा के प्रति होता है, भव-तृष्णा के प्रति होता है और विभव तृष्णा के प्रति होता है.

अब हे भिक्खुओं, तीसरा आर्यसत्य है दुःख निरोध आर्यसत्य, इस तृष्णा को जङ से पूर्णतः उखाङ देने से इस दुःख का, जीवन-मरण का जङ से निरोध हो जाता है,

और अब हे भिक्खुओं चौथा आर्यसत्य है दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख से मुक्ति का मार्ग), इस दुःख को जङ से समाप्त किया जा सकता है और जिसके लिए तथागत ने आठ अंगों वाला आर्य आष्टांगिक मार्ग खोज निकाला है जो सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि हैं.

आर्य आष्टांगि‍क मार्ग

आर्य आष्टांगि‍क मार्ग भगवान बुद्ध की अद्भुत खोज थी. सभी दु:खों से वर्तमान जीवन में ही मुक्ति पाने के लि‍ए तथा इसी जीवन में वास्तिवक सुख-शांति‍ को प्राप्त करने के लि‍ए भगवान बुद्ध ने आर्य आष्टांगि‍क मार्ग बताया है यह आष्टांंगि‍क मार्ग कि‍सी एक संप्रदाय का न होकर सार्वजनीन मार्ग है क्योंकि‍ यह प्रकृति‍ के नि‍यमों पर आधारि‍त है. जो भी व्याक्ति इस मार्ग पर चलेगा दु:खों से मुक्ति होगी ही. इसे स्वयं अनुभव कर जानना आवश्यक है. इसके आठ अंग इस प्रकार है:

(1) सम्यक् दृष्टि: सम्यक् दृष्टि्‍ अर्थात सम्यक् दर्शन. यहां दर्शन शब्द का सही और वास्तवि‍क अर्थ है – जो बात, जो वस्तु जैसी है, उसे वैसे ही उसके गुण-धर्म –स्वभाव में देखना अर्थात अनुभव से जानना. अत: सम्यक् दृष्टि अर्थात शुद्ध दर्शन, वास्तवि‍क दर्शन, प्रत्येक वस्तु , व्यक्तिृ‍ तथा स्थिति‍ का यथाभूत दर्शन, सत्य दर्शन, यथाभूत ज्ञान दर्शन ही सम्य्क् दृष्टि कहलाती है. इसका अनुभव वि‍पस्सना साधना द्वारा कि‍या जा सकता है.

(2) सम्यक संकल्प- संकल्प अर्थात चिंतन, मनन. हमारा संकल्प हमारी सोच्‍ सही व सकारातमक होनी चाहि‍ए. अर्थात बुरे, दुषि‍त वि‍चारों से मुक्त , रागरहि‍त, द्वेश रहि‍त, व मोह –रहि‍त चिंतन –मनन सम्यक् संकल्प् कहलाता है. सम्यक् स्मृ,ति‍ का अभ्यास करते-करते वि‍पस्सना साधना द्वारा सम्य‍क् संकल्प का अभ्या्स कि‍या जा सकता है.

(3) सम्य‍क वचन: हमारी वाणी सम्यक् हो अर्थात हम झुठ न बोलें, कड़वी (कटु) भाषा बोलकर कि‍सी का मन न दुखाएं, कि‍सी की निंदा न करें, कि‍सी की चुगली न करें, व्यर्थ बयान न करें, गाली-गलौच न करें. मधुर बोलें, सत्यवादी हों. वाणी मृदु और संयमति‍ हो. वाणी ऐसी हो जो दो पक्षों को जोड़ने का मार करे, प्रेम भाव, मैत्री भाव, बंधुभाव बढ़ाने का काम करे, ऐसी वाणी को सम्यक् वाणी कहते है.

(4) सम्यक कर्म: मन, वचन और शरीर द्वारा कि‍ये जाने वाले कार्य-सम्यक् रहें अर्थात ठीक रहें. मि‍थ्या‍चार, परस्त्री गमन, व्यभि‍चार असम्यक् कर्म है. कि‍सी दूसरे की वस्तु चुराना, चोरी करना असम्यक् कर्म है, नशा करना, गांजा, अफीम आदि‍ लेना असम्यक् कर्म है. शरीर, वचन और मन से इन दुष्कर्मों से वि‍रत रहें तो ही सम्यक् कर्म होगा. (5) सम्यक आजीवि‍का: हर व्याक्ति को अपने व परि‍वार के भरण-पोष्ण के लि‍ए कोई न कोई कार्य करना आवश्यक हे. हमारी आजीवि‍का का रास्ता सम्यक अर्थात सही होना चाहि‍ए. आजीवि‍का के साधन में कि‍सी व्यक्ति को हानि‍ नहीं होनी चाहि‍ए. कि‍सी को धोखा नहीं देना चाहि‍ए. दूसरों को हानि‍ पहुंचाकर, लूट कर, चोरी कर, ठगकर या धोखा देकर यदि‍ जीवि‍का चलाई जाती है तो वह असम्यक् आजीवि‍का है. केवल पैसा कमाने के लि‍ए ऐसे व्यापार-धंधे या कार्य क करें जो अन्य लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान पहूंचाते हैं. नशीले व मादक पदार्थों का व्यापार जहरीलें पदार्थों का व्या‍पार असम्यक् है. मांस- मदि‍रा का व्याापार, प्राणि‍यों का व्यांपार, अस्त्र-शस्त्र का व्याकपा असम्यक है. (6) सम्यक व्यायाम: मन की कमजोरी दूर करने के लि‍ए, उसके वि‍कार दूर करने के लि‍ए मन का व्यायाम आवश्यक है. मन का स्वयं परीक्षण करें. यदि‍ इस तथ्य का अनुभव हो कि‍ मन में कुछ बुराई या दुर्गुण हैं तो उन्हें नि‍कालने का प्रयास करें. कि‍सी भी तरह के दुगुर्ण हममें न आने पाएं इस बात से स्वयं सजग रहें. मन में अच्छाइयों- सद्गुणों को घर करने दें. सद्गुणोंपार्जन के लि‍ए हमेंशा तत्पर रहें, अपने सद्गुणों में हमेशा वृद्धि‍ करने का प्रयास करें. दूसरों में कुछ अच्छे गुण नजर आए तो उसे ग्रहण करने का प्रयास करें. अपने चि‍त्त को सद्गुणों की ओर अग्रसरि‍त करने वाले इस मानसि‍क प्रयास को सम्यक् व्या‍याम कहते हैं.

(7) सम्यक समृति‍: स्मृति‍ का अर्थ है, जागरूकता, सजगता. वर्तमान क्षण में शरीर में होने वाली संदेवनाओं के प्रति‍ सजगता व जागरूकता. शरीर और चि‍त्त में स्वभावगत तौर पर होने वाली क्रि‍याओं-प्रति‍क्रि‍याओं के प्रति‍ सचेत रहकर, जागरूक रहकर उस वास्तवि‍कता को, उस वर्तमान सच्चा-ई को समता भाव से देखना-परखना, यही सम्यक् स्मृति‍ है , शरीर में जि‍स समय जो भी और जैसी भी संवेदना हो रही है, उसका यथाभूत ज्ञान दर्शन. वि‍पस्ससना के द्वारा ही इसका अभयास कि‍या जा सकता है.

(8) सम्य‍क समाधि‍: समाधि‍ अर्थात मन की एकाग्रता. चित्त की एकाग्रता लाभदायक होती है. मन कि‍सी भी आलंबन से एकाग्र हो सकता है. वि‍कारों से भरा मन भी एकाग्र हो सकता है. अत: मन की केवल एकाग्रता सम्यक् समाधि‍ नहीं है, अपि‍तु जि‍स आलंबन के द्वारा मन एकाग्र कि‍या जा रहा है. उसे लेकर यदि‍ हम राग पैदा करें, द्वेष पैदा करें, मोह पैदा करें, तो यह सम्यक समाधि‍ नहीं हुई. आलंबन रागवि‍हीन, द्वेषवि‍हीन और मोहवि‍हीन होना आवश्य क है. यही सम्यक समाधि‍ है. अत: कुशल चि‍त्त और नि‍र्मल चि‍त्त की एकाग्रता को ही सम्यक समाधि‍ कहते हैं. आनापान सति‍ के अभ्यास से सम्यक् समाधि‍ उपलब्ध हो सकती है. वि‍पस्सना साधना द्वारा सम्यक् समाधि‍ का योग्य‍ अभ्यास कि‍या जा सकता है. सम्यक का अर्थ है कि‍ सही, सम्य‍क् का अर्थ है सचमुच. यह आर्य आष्टांगि‍क मार्ग सभी दुखों से मुक्ति‍ पाने व वास्तवि‍क सुख:शांति‍ से जीवन जीने का अनमोल रास्ता है. यह वर्तमान जीवन में ही निर्वाण का साक्षात्कार करा सकता है. इसमें मन को वश में रखने और निर्मल रखने पर वि‍शेष जोर दि‍या गया है क्योंकि‍ सभी अवस्थाएं पहले मन में उत्पन्न होती हैं. मन ही प्रधान है. मलि‍न व दूषि‍त मन से बोलने पर या कार्य करने पर दुख पीछे-पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे बैलगाड़ी के पहि‍ए बैलगाड़ी के बैलों के पीछे. जब मनुष्य स्वच्छ नि‍र्मल मन से बोलता है या कर्म करता है तो सुख उसके पीछे ऐसे ही हो लेता है, जैसे आपका अपना साया.

इस प्रकार हे भिक्खुओं, इन चीजों के बारे में मैंने पहले कभी सुना नहीं था, मुझमें अंतदृष्टि जागी, ज्ञान जागा, प्रज्ञा जागी, अनुभूति जागी और प्रकाश जागा.

बुद्ध ने अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा, हे भिक्खुओं जब मैंने अपनी अनुभूति पर इन चारों आर्य सत्यों को इनके तीनों रूपों के साथ, और उनकी बारह कङियों के साथ, पूर्ण रूप से सत्य के साथ जान लिया, पूरी तरह समझ लिया और पूरी तरह अनुभव कर लिया, उसके बाद ही मैंने कहा कि मैंने सम्यक सम्बोधि प्राप्त कर ली है, इस तरह मुझमें ज्ञान की अंतर्दृष्टि जागी, मेरा चित्त सारे विकारों से मुक्त हो गया है, हे भिक्खुओं जब मैंने अपने स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभवों से और पूर्ण ज्ञान और अंतर्दृष्टि के साथ इन चारों आर्यसत्यों को जान लिया, यह मेरा अंतिम जन्म है अब इसके बाद कोई नया जन्म नहीं होगा.

बुद्ध के इन चार आर्यसत्य और आर्यअष्टांगिक मार्ग को सुनकर कौंङन्न के धर्मचक्षु जागे और उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता है, जिसका उत्पाद होता है उसका व्यय होता है, कौंङन्न के चेहरे के भावों को देखकर बुद्ध ने कहा- कौंङन्न् ने जान लिया. कौंङन्न ने जान लिया. इसलिए कौंङन्न का नाम ज्ञानी कौंङन्न पङ गया. बुद्ध के इस उपदेश से कौंङन्न के अंदर भवसंसार चक्र, धम्म चक्र में परिवर्तित हो गया, इसलिए इस प्रथम उपदेश को धम्मचक्र प्रवर्तन सुत्त कहते हैं.

पांचों पंचवर्गीय भिक्खु बुद्ध के चरणों में नत मस्तक हो गए और उनसे अनुरोध कि‍या कि‍ वह इन पांचों भि‍क्खु्ओ को अपना शि‍ष्य स्वीकार करे. बुद्ध ने “भि‍क्खु आओ” कह कर उन्हें अपना शि‍ष्यु स्वीकार कि‍या. चूंकि‍ पांचो भि‍क्खुओं ने इसी दि‍न बुद्ध को अपना गुरू स्वीकार कि‍या था इसलि‍ए आषाढ़ी पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. बुद्ध ने यह उपदेश आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन दिया था, इसलिए बौद्धों में आषाढ़ पूर्णिमा पवित्र दिन माना जाता है.

आषाढ़ पूर्णिमा से भिक्खुओं का वस्सावास (वर्षावास/ चातुर्मास अर्थात वर्षा ऋतु में एक ही स्थान पर वास करना) आरंभ होता है, इस दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाओं द्वारा महाउपोसथ व्रत रखा जाता है. बौद्ध विहारों में धम्म देशना के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. सबका मंगल हो!
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तीन दिन से नहीं जला था चूल्हा, भूख से बिरहोर की मौत

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रांची। केंद्र-राज्य सरकार व संबंधित महकमों के तमाम वादों व दावों को झुठलातें हुए क्षेत्र के कुंदरिया बस्ती आरा में भूख से दम तोड़ने वाले 40 साल के चिंतामण मल्हाह के बाद रांची से सटे रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड के अंतर्गत नावाडीह पंचायत के जरहैया टोला निवासी राजेंद्र बिरहोर लगभग 40 की बुधवार मौत हो गई। राजेंद्र की मौत ने चिंतामण की मौत के मोले में लीपापोती करने वाले प्रषासन की कलई एक बार फिर से खोलकर रख दी है।

राजेंद्र की पत्नी ने बताया कि उसे जांन्डिस था। षरीर में खून की कमी थी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। घर में तीन दिन से चूल्हा नहीं जला था। दवा खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे। बताया जाता है कि पूर्व में राजेंद्र का इलाज मुखिया के सहयोग से मांडू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कराया गया था। बाद में उसे रिम्स में भर्ती कराया गया था।

रिम्स के डाक्टरों ने दवा देकर उसे घर भेज दिया था। पत्नी नें बताया कि राजेंद्र टैक्टर चला कर परिवार चलाता था। उसकी बीमारी के बाद घर की स्थिति खराब हो गई किसी तरह पड़ोसियों से कुछ मांग कर छह बच्चों का पेट भरती थी। राजेंद्र की मौत की सूचना मिलने के बाद मांडू के बीडीओ व सीओ उसके घर पहुंच कर लीपापोती करते हुए राजेंद्र के परिजनों को मुआवजे के तौर पर 10 हजार रूपये नगद व दो क्विंटल चावल दिया।

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कलंकित बिहार!

मुजफ्फरपुर में समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार द्वारा संचालित बालिका गृह में रहने वाली उनतीस बालिकाओं के यौन शोषण का खुलासा पूरे बिहार के लिए शर्म का विषय है। यौन शोषण की शिकार सभी लड़कियों की उम्र अठारह साल से कम है। शर्म का विषय यह भी है कि सालों से चल रहे बच्चियों के साथ बलात्कार और प्रताड़ना का यह खुलासा इस बालिका गृह का समय-समय पर निरीक्षण करने वाले किसी दंडाधिकारी या सरकार के किसी अधिकारी ने नहीं किया। संस्थान के बारे में ऐसी शिकायतें मिलने के बाद जब बिहार सरकार ने मुंबई की संस्था ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ से इसकी ऑडिट कराई तो पहली बार यह रहस्योद्घाटन हुआ कि यहां की लड़कियां संस्थान के लोगों द्वारा निरंतर यौन-शोषण का शिकार हुई हैं। इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के आधार पर जिला बाल कल्याण संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक ने बालिका गृह का संचालन करने वाले स्वयंसेवी संस्था ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ के पदाधिकारियों पर केस दर्ज कराया है।

बालिका गृह की लड़कियों की मेडिकल जांच के बाद उनमें से उनतीस लड़कियों के साथ बलात्कार और शारीरिक हिंसा की पुष्टि हो चुकी है। पुलिस को लड़कियों ने यह भी बताया कि बलात्कार के दौरान एक लड़की की मौत भी हो गई थी जिसकी लाश शायद परिसर में ही कहीं गाड़ दी गई। पिछले पांच सालों में यहां से छह लड़कियों के गायब होने की भी सूचना है। इस घटना के संबंध में दस लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई है और पुलिस इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार ग्यारह लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही है। मीडिया और आमलोगों में यह चर्चा ज़ोरो पर है कि ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ के लोगों द्वारा कुछ अधिकारियों और दबंग नेताओं की अय्याशी के लिए लड़कियों को बाहर भी भेजा जाता था। अनुसंधान में इस संदेह की पुष्टि नहीं हुई।

मुजफ्फरपुर की एस.एस.पी हरप्रीत कौर के अनुसार इस मामले में किसी भी लड़की ने यह नहीं बताया कि उसे कभी हॉस्टल से बाहर ले जाया गया था। अब इस मामले का एक ही पक्ष उपेक्षित है कि सरकार द्वारा बालिका गृह का समय-समय पर निरीक्षण करते आ रहे दंडाधिकारियों और बिहार सरकार के बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों पर बलात्कार के साक्ष्य छुपाने के आरोप में कोई कारवाई क्यों नहीं की जा रही है। ये अधिकारी यह कहकर नहीं बच सकते कि निरीक्षण के दौरान बलात्कार पीड़ित लड़कियों ने उन्हें इस बाबत कुछ नहीं बताया। किसी बालिका गृह के निरीक्षण के दौरान लड़कियों से यह सवाल सबसे पहले पूछा जाना चाहिए था। ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ के लोगों ने जब यह सवाल पूछा तो लड़कियों ने अपने साथ घटी बर्बरता की तमाम कहानियां सुना दीं।

मेरी नज़र में मुजफ्फरपुर पुलिस के अनुसंधान की दिशा सही है। कुछ लोगों की मांग पर सरकार ने इसकी जांच सी.बी.आई को सौंपने का फैसला किया है। इस फैसले के पीछे की नीयत सियासत में गहरी पैठ रखने वाले रसूखदार अभियुक्तों के हित में अनुसंधान को लंबे अरसे तक लटकाकर और स्पीडी ट्रायल को विलंबित कर उन्हें पीड़ितों पर दबाव बनाने का अवसर मुहैय्या कराना भी हो सकता है। जो लोग ‘सरकारी तोते’ के नाम से कुख्यात सी.बी.आई से अब भी निष्पक्षता की उम्मीद रखते हैं, उनके भोलेपन को सलाम ही किया जा सकता है!

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पाकिस्तान चुनाव: आतंकी हाफिज सईद की पार्टी का सूपड़ा साफ, बेटा और दामाद भी हारा

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साल 2008 मुंबई हमले का मास्टरमाइंड और जमात-उद-दावा चीफ हाफिज सईद को पाकिस्तान में हुए चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है. आतंकी हाफिज सईद की पार्टी अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक (एएटी) के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं. हाफिज सईद ने 260 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.

इस चुनाव में हाफिज का बेटा और दामाद भी किस्मत आजमा रहा था. लेकिन दोनों अपनी-अपनी सीट बुरी तरह हार गए. बेटा हाफिज तल्हा सईद लाहौर से 200 किलोमीटर दूर सरगोधा सीट से चुनाव लड़ रहा था. हाफिज सईद यही का रहने वाला है.

आतंकी हाफिज सईद का दावा था कि उसके सभी प्रत्‍याशी इन चुनावों में जीतेंगे. लेकिन पाकिस्‍तान की जनता ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया. हाफिज सईद ने लोगों से अपील कि थी कि वो ‘पाकिस्तान की विचारधारा’ के लिए मतदान करे.

हाफिज सईद ने मिल्‍ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) के बैनर तले अपने प्रत्‍याशियों को मैदन में उतारा था. लेकिन बाद में चुनाव आयोग की ओर से मान्‍यता देने से इनकार कर दिया गया था. इसके बाद हाफिज सईद ने अल्‍लाह-ओ-अकबर के बैनर तले अपने प्रत्‍याशियों को मैदान में उतारा.

आपको बता दें कि जमात-उद-दावा को अमेरिका ने जून 2014 में आतंकी संगठन घोषित किया था. ये संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा था जिसने साल 2008 में मुंबई हमले को अंजाम दिया था. अमेरिका ने सईद पर एक करोड़ डॉलर का इनाम भी घोषित कर रखा है.

सभार-न्यूज18 Read it also-पाकिस्तान में आम चुनाव, 272 सीटों पर 100 दल मैदान में दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

मोदी की राह मुश्किल करने वाराणसी और अयोध्या जाएंगे उद्धव ठाकरे

नई दिल्ली। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे कई मुद्दों पर भाजपा सरकार और उसके नेताओं पर सवाल उठाते रहते हैं. साथ होते हुए भी दोनों पार्टियों के बीच तल्खी जगजाहिर है. अब उद्धव ठाकरे ने हिन्दुत्व के सवाल पर भाजपा को घेरने का मन बना लिया है. इसके तहत शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और हिन्दुत्व के केंद्र स्थल अयोध्या जाएंगे. उद्धव ठाकरे के इस दौरे को लेकर मुंबई में पोस्टर लगाए गए हैं, जिसमें अयोध्या और वाराणसी में उद्धव का साथ देने की अपील की गई है.

पिछले दिनों शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि पिछले 25 वर्षो से शिवसेना इसलिए बीजेपी के साथ खड़ी है क्योंकि दोनों दल हिंदुत्व की विचारधारा, हिंदुओं के दर्जे, राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा समेत अन्य मुद्दों पर समान राय रखते हैं. लेकिन हिंदुत्व क्या है? उद्धव ठाकरे ने कहा कि “मैं मेरे पिता शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बालासाहेब ठाकरे से अक्सर यह पूछता था. उनका जवाब होता था कि राष्ट्रीयता हमारा हिंदुत्व है. हम नहीं चाहते कि हिन्दू केवल मंदिर में जाकर घंटियां बजाएं, चोटी रखें और जनेऊ धारण करें. बालासाहेब के हिंदुत्व के विचारों को अब प्रचारित और लागू किया जाना चाहिए.”

शिवसेना के इस कदम से भाजपा मुश्किल में आ सकती है. दरअसल, राम मंदिर के मुद्दे शिवसेना लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रही है. शिवसेना का कहना है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी राम मंदिर के वायदों को भूल गई.

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एससी/एसटी सांसदों ने मोदी सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा

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नई दिल्ली। एससी/एसटी एक्ट पर फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) का अध्यक्ष बनाए जाने पर एससी/एसटी सांसदों ने सवाल उठाया है. 23 जुलाई को मोदी सरकार में मंत्री रामविलास पासवान के घर पर एनडीए के दलित सांसदों की बैठक हुई जिसमें एससी/एसटी अत्याचार निरोधक कानून और सरकारी नौकरियों में प्रोमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. इसी बैठक में जस्टिस गोयल को हटाने के लिए दलित सांसदों ने सहमति दी थी. जस्टिस गोयल छह जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे और उसके बाद सरकार ने उन्हें एनजीटी अध्यक्ष नियुक्त किया था. एनडीए के सांसदों का कहना है कि जस्टिस गोयल की नियुक्ति से दलितों के बीच अच्छा संदेश नहीं गया है और इससे आगामी चुनावों में नुकसान हो सकता है.

इस बीच रामविलास पासवान के सांसद बेटे चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर एनजीटी अध्यक्ष को पद से बर्खास्त करने की मांग की है. साथ ही सरकार से एससी/एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाने की मांग की है. चिराग पासवान ने पीएम को पत्र लिखकर कहा है कि जल्द से जल्द जस्टिस (रिटायर्ड) एके गोयल को एनजीटी चेयरमैन पद से बर्खास्त किया जाए. चिराग ने पत्र में कहा- ”संसद के चालू सत्र में विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव से अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कानूनी सुरक्षा की व्यवस्था को बहाल किया जाए. अगर इसमें कोई अड़चन है तो संसद के चालू सत्र को दो दिन पहले खत्म कर अध्यादेश लाया जाए.”

बताते चलें कि 20 मार्च को जस्टिस गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की पीठ ने एससी/एसटी एक्ट में बड़े बदलाव का एक्ट पारित किया था. इस आदेश के बाद दलित समाज की ओर से 2 अप्रैल को देश भर में बड़ा आंदोलन हुआ था. विपक्षी दलों और दलित चिंतकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने मजबूती से पक्ष नहीं रखा, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया और कानून कमजोर हुआ. विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार धीरे-धीरे आरक्षण खत्म करना चाहती है. अब इसी मुद्दे को लेकर तमाम दलित सांसदों के साथ आने से सरकार मुश्किल में घिर गई है.

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बिहार एनडीए में घमासान

पटना। देश की राजनीति की दिशा तय करने में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार का नाम आता है. फिलहाल बंगाल, ओडिसा और तामिलनाडु के अलावा बिहार ऐसा प्रदेश है, जहां भाजपा मुश्किल में है. ऐसे में बिहार में सभी गठबंधन दलों को साथ लाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पिछले दिनों बिहार का दौरा कर नीतीश कुमार से मुलाकात की थी. लेकिन बिहार एनडीए में घमासान की खबर ने भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है.

असल में नीतीश कुमार के प्रतिद्वंदी उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने नीतीश कुमार को नेता मानने से इंकार कर दिया है. पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कुशवाहा ने कहा था कि एनडीए की बैठक में अगले मुख्यमंत्री और नेता का नाम तय होना चाहिए. बतौर नेता कुशवाहा ने अपनी दावेदारी भी पेश की थी.

अपने नेता के बयान के बाद कुशवाहा की पार्टी ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पार्टी के प्रवक्ता सत्येंद्र ने बिहार में फैली अव्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए नीतीश सरकार को जमकर घेरा. उन्होंने कहा कि तब बिहार में जंगलराज, हत्या और अपहरण का माहौल था. उससे बिहार को बचाने के लिए नीतीश कुमार उस वक्त की मजबूरी थे. लेकिन अभी बिहार का जो हाल है, उसमें रालोसपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं मानेगी.

आरएलएसपी के प्रवक्ता ने आगे कहा, “नीतीश कुमार जी जनता दल यूनाइटेड के लीडर हो सकते हैं लेकिन एनडीए के लीडर नहीं हो सकते. बिहार में प्रदेश के अंदर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है. बिहार में सबसे ज्यादा सांसद बीजेपी के पास है, इसलिए बड़े भाई वो हो सकते हैं. नीतीश कुमार जी बड़े भाई कैसे बन सकते हैं. राष्ट्रीय समता पार्टी नीतीश कुमार को कभी बड़े भाई के रोल में नहीं मानेगी.

दरअसल रालोसपा भाजपा पर अपने नेता उपेन्द्र कुशवाहा को एनडीए का नेता चुनने के लिए दबाव बना रही है. रालोसपा के इस दावे का आधार बिहार का जातीय समीकरण है, जिसमें नीतीश कुमार की जाति का वोट मात्र डेढ़ फीसदी तो कुशवाहा जाति का वोट प्रतिशत 10 फीसदी है.

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आरक्षण के जनक:राजर्षि शाहूजी महाराज

भारतवर्ष आरक्षण का देश है.कारण,धर्माधारित जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यह देश सदियों से परिचालित होता रहा है,वह वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों-आर्थिक ,राजनीतिक और धार्मिक- के बंटवारे की व्यवस्था रही है.चूंकि वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक विदेशागत आर्य थे इसलिए उन्होंने इसमें ऐसा प्रावधान रचा कि शक्ति के स्रोतों में मूलनिवासी समाज (शुद्रतिशूद्रों) को रत्ती भर भी हिस्सेदारी नहीं मिली और यह समाज चिरकाल के लिए पूर्णरूपेण शक्तिहीन होने को अभिशप्त हुआ.ऐसे शक्तिहीन समाज को सदियों बाद किसी व्यक्ति ने पहली बार शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी दिलाने का सफल दृष्टान्त कायम किया तो वह थे कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू जी महाराज.

26 जून 1874 को कोल्हापुर राजमहल में जन्मे शाहू जी छत्रपति शिवाजी के पौत्र तथा आपासाहब घाटगे कागलकर के पुत्र थे.उनके बचपन का नाम यशवंत राव था.तीन वर्ष की उम्र में अपनी माता को खोने वाले यशवंत राव को 17 मार्च 1884 को कोल्हापुर की रानी आनंदी बाई ने गोंद लिया तथा उन्हें छत्रपति की उपाधि से विभूषित किया गया.बाद में 2 जुलाई 1894 को उन्होंने कोल्हापुर का शासन सूत्र अपने हाथों में लिया और 28 साल तक वहां का शासन किये.19-21 अप्रैल 1919 को कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय कुर्मी महासभा के 13 वें राष्ट्रीय सम्मलेन में उन्हें राजर्षि के ख़िताब से नवाजा गया.

शाहू जी की शिक्षा विदेश में हुई तथा जून 1902 में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एल.एल.डी. की मानद उपाधि प्राप्त हुई जिसे पानेवाले वे पहले भारतीय थे.इसके अतिरिक्त उन्हें जी.सी.एस.आई.,जी.सी.वी.ओ.,एम्.आर.इ.एस. की उपाधियाँ भी मिलीं.एक तेंदुए को पलभर में ही खाली हाथ मार गिराने वाले शाहू जी असाधारण रूप से मजबूत थे.उन्हें रोजाना दो पहलवानों से लड़े बिना चैन नहीं आता था.

शाहू जी ने जब कोल्हापुर रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली उस समय एक तरफ ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो दूसरी तरफ ब्राह्मणशाही जोर शोर से क्रियाशील थी .उस समय भारतीय नवजागरण के नायकों के समाज सुधार कार्य तथा अंग्रेजी कानूनों के बावजूद बहुजन समाज वर्ण-व्यवस्था सृष्ट विषमता की चक्की में पीस रहा था.इनमें दलितों की स्थिति जानवरों से भी बदतर थी.शाहू जी ने उनकी दशा में बदलाव लाने के लिए चार स्तरों पर काम करने का मन बनाया .पहला,उनकी शिक्षा की व्यवस्था तथा दूसरा, उनसे सीधा संपर्क करना.तीसरा ,प्रशासनिक पदों पर उन्हें नियुक्त करना एवं चौथा उनके हित में कानून बनाकर उनकी हिफाजत करना.अछूतों की शिक्षा के लिए एक और जहाँ उन्होंने ढेरों पाठशालाएं खुलवायीं, वहीँ दूसरी ओर अपने प्रचार माध्यमों द्वारा घर-घर जाकर उनको शिक्षा का महत्व समझाया.उन्होंने उनमें शिक्षा के प्रति लगाव पैदा करने के लिए एक ओर जहाँ उनकी फीस माफ़ कर दी, वहीँ दूसरी ओर स्कालरशिप देने की व्यवस्था कराया.उन्होंने राज्यादेश से अस्पृश्यों को सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने की छूट दी तथा इसका विरोध करने वालों को अपराधी घोषित कर डाला.

दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतरकारी साबित हुईं.पहला,1917 में उन्होंने उस ‘बलूतदारी-प्रथा’ का अंत किया,जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गाँव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं.इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा ‘वतनदारी’ का अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया.इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई.दलित हितैषी उसी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-‘मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हे तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है .मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे.’उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया.किन्तु वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों के हित में किये गए ढेरों कार्यों के बावजूद इतिहास में उन्हें जिस बात के लिए खास तौर से याद किया जाता है,वह है उनके द्वारा किया गया आरक्षण का प्रावधान.

हम जानते हैं भारत सिर्फ आरक्षण का ही देश नहीं है,बल्कि दुनिया के अन्य देशों के विपरीत यहाँ के वर्ग संघर्ष का इतिहास भी आरक्षण पर केन्द्रित रहा है.खास तौर से दलित –पिछड़ों को मिलनेवाले आरक्षण पर देश में कैसे गृह-युद्ध की स्थिति पैदा हो जाती है,यह हमने मंडल के दिनों में देखा .तब मंडल रिपोर्ट के खिलाफ देश के शक्तिसंपन्न तबके के युवाओं ने जहां खुद को आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा-दाह में झोंक दिया,वहीँ सवर्णवादी संघ परिवार ने राम जन्मभूमि –मुक्ति आन्दोलन के नाम पर स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया,जिसके फलस्वरूप राष्ट्र की बेशुमार संपदा तथा असंख्य लोगों की प्राण हानि हुई.बाद में मंडल-2 के दिनों (2006 में जब पिछड़ों के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में आरक्षण लागू हुआ) में पुनः गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर दी गई. 21वीं सदी में जहाँ सारी दुनिया जिओ और जीने दो की राह पर चल रही है,वहीँ भारत के परम्परागत सुविधासंपन्न लोग आरक्षण के नाम पर बार-बार गृह –युद्ध की स्थिति पैदा किये जा रहे हैं.ऐसे हालात में 1902 के उस हालात की सहज कल्पना की जा सकती जब शाहू जी महाराज ने चित्तपावन ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के मध्य 26 जुलाई को अपने राज्य कोल्हापुर की शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में दलित-पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया.यह आधुनिक भारत में जाति के आधार मिला पहला आरक्षण था.इस कारण शाहू जी आधुनिक आरक्षण के जनक कहलाये.ढेरों लोग मानते हैं कि परवर्तीकाल में बाबासाहेब डॉ.आंबेडकर ने शाहू जी द्वारा लागू किये गए आरक्षण का ही विस्तार भारतीय संविधान में किया.

लेकिन भारी अफ़सोस की बात है कि जिस आरक्षण की शुरुआत शाहूजी जी ने किया एवं जिसे बाबा साहब में विस्तार दिया , वह आरक्षण आज लगभग पूरी तरह कागजों की शोभा बन चुका है. यदि आरक्षण पूरी तरह कागजों की शोभा बनकर अपनी उपयोगिता खो देता है तब फिर लोग शाहूजी या बाबा साहेब ही नहीं, इस दिशा में योगदान करने वाले दूसरे महापुरुषों को भी भूल जायेंगे. ऐसे में यदि आप शाहूजी जैसे अपने महापुरुषों को याद रखना चाहते हैं तो आपको सिर्फ आरक्षण बचाने का नहीं बल्कि बढ़ाने की सफल लड़ाई लड़नी होगी. और आज की तारीख में वह लड़ाई अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका से प्रेरणा लेते हुए सर्वव्यापी आरक्षण अर्थात डाइवर्सिटी लागू करवाने के लिए लड़नी होगी. इससे बेहतर विकल्प और कोई नहीं है.

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महाराष्ट्र में क्यों नाराज़ हैं मराठा?

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन फिर से आग पकड़ने लगा है. आशंका है कि सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए तो हालात और बिगड़ सकते हैं. राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं, ऐसे में सरकार की मुश्किल ये है कि वह सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग को सीधे-सीधे नहीं मान सकती.

इस पहले राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार ने मराठों को आरक्षण से जुड़ा बिल विधानसभा में पास कर दिया था, लेकिन कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी, कोर्ट ने पिछडा वर्ग आयोग से मराठा समाज की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है, जिसके बाद ही मराठा आरक्षण पर कोई फैसला संभव है.

देवेंद्र फडणवीस सरकार की मुश्किल ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निर्धारित पचास फीसदी की सीमारेखा के पार जाकर राज्य में मराठों को आरक्षण देना संभव नहीं और अगर सरकार ने ओबीसी के लिए तय 27 फीसदी कोटे में ही मराठों को शामिल करती हैं, तो राज्य में एक अलग ओबीसी आंदोलन शुरू हो जाएगा. ओबीसी और दलित दोनों ही वर्ग आरक्षण में किसी तरह के बदलाव के खिलाफ है.

ऐसे में सरकार मराठा समाज को मनाने के लिए उनके एजुकेशन फीस आधी करने, एजुकेशन लोन पर ब्याज दरें आधी करने और हॉस्टल सुविधाएं बढ़ाने का आश्वासन दे रहे हैं. हालांकि मराठा समाज अगले साल होने वाले चुनाव को देखते हुए सरकार को झुकाने में की कोशिश में है.

दरअसल राज्य में मराठों की आबादी 28 से 33 फीसदी तक मानी जाती है. मराठा समाज परंपरागत रूप से खेतिहर रहा है और उनका कहना है कि पिछले कई सालों से लगातार पड़ रहे सूखे और खेती में नुकसान के कारण वे बरबादी की कगार पर पहुंच गए हैं. उनका दावा है कि आत्महत्या करने वाले किसानों में सबसे ज्यादा संख्या मराठों की है, इसलिए उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए. राज्य सरकार ने हाल ही में 72 हजार पदों पर बहाली का विज्ञापन निकाला है और मराठा इसमें आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

मराठा समाज की दूसरी सबसे बड़ी मांग शिक्षा में आरक्षण की है. दरअसल महाराष्ट्र में जिला स्तर पर ही इंजीनियरिंग और मेडिकल के कई कॉलेज खुल गए हैं और मराठा समाज में इनमें दाखिले के लिए आरक्षण और फीस माफी चाहते हैं. इन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने की फीस अभी काफी ज्यादा है. आंदोलन कर रहे मराठों का कहना है कि उन्हें बच्चों की पढ़ाई के लिए खेत गिरवी रखकर लोन लेना पड़ता है. इसके अलावा डोनेशन के लिए साहूकारों से कर्ज लेना पड़ जाता है. खेती में नुकसान, फसलों के दाम में कमी और ब्याज के बढ़ते बढ़ते फंदे के कारण कई किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं.

इस मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे राजनीतिक कारणों को भी खारिज नहीं किया जा सकता है. लंबे समय बाद राज्य में पिछले चार साल से देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं. मनोहर जोशी के बाद सीएम पद संभालने वाले फडणवीस राज्य के दूसरे ब्राह्मण नेता हैं. ऐसे में शरद पवार, अशोक चव्हाण, नारायण राणे और पृथ्वीराज चव्हान जैसे नेताओं वाले मराठा समाज को सीएम पोस्ट से ये दूरी अखरती भी है.

राज्य की सियासत में मराठों में बड़ी ताकत के रूप देखा जाता है. यहां विधानसभा की कुल 288 सीटों में से 80 पर मराठा वोट ही निर्णायक माना जाता है. हालांकि बीजेपी को भी पता है कि ज्यादातर मराठा उसे वोट नहीं देते. वे या तो एनसीपी, कांग्रेस के साथ हैं या फिर शिवेसना के साथ. ऐसे में बीजेपी आरक्षण जैसे सवाल पर उनकी सारी बातें मानकर ओबीसी और दलित को नाराज़ करने की मूड में नहीं. राज्य की आबादी में ओबीसी 52% हिस्से का दावा करता है, तो वहीं दलित खुद को 7 से 12 प्रतिशत तक बताते हैं. जाहिर है राजनीतिक तौर पर मराठों के साथ पूरी तरह खड़ा होना बीजेपी को अपने लिए मुफीद नहीं दिखता.

हालांकि महाराष्ट्र में आरक्षण और खासतौर से शिक्षा में आरक्षण का मुद्दा बड़ा पेचीदा है. यहां करीब 75 फीसदी सीटें अलग-अलग आरक्षण के नाम पर राज्य के मूल निवासी बच्चों के लिए रिजर्व होती हैं. इनमें मूल एससी/एसटी और ओबीसी भी शामिल होते है. इसके अलावा ज्यादातर निजी संस्थाओं में 15 फीसदी सीट मैनेजमेंट और एनआरआई कोटे की होती है. जाहिर है इनसे अलग किसी और वर्ग को आरक्षण दे पाना राज्य सरकार के लिए काफी मुश्किल लगता है. इसके लिए पहले से ही आरक्षण कोटे में ही मराठों को एडजस्ट करना होगा, जिस पर फिर नया राजनीतिक बवाल होगा.

संदीप सोनवलकर Read it also-शर्मनाक: बर्तन धो रहा है करगिल का यह हीरो दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

शर्मनाक: बर्तन धो रहा है करगिल का यह हीरो

नई दिल्ली। जूस की दुकान पर बर्तन धो रहे इन शख्स को जानते हैं आप? यह करगिल वॉर के वीर योद्धा सतवीर सिंह हैं। इन्हें इस हाल पर सरकारी सिस्टम ने लाकर बैठा दिया है। कल देशभर में 19वां करगिल विजय दिवस मनाया जाएगा लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में ही एक योद्धा जूस की दुकान खोलकर खुद ही झूठे बर्तन धो रहे हैं।

लांस नायक सतवीर सिंह दिल्ली के ही मुखमेलपुर गांव में रहते हैं। करगिल युद्ध के दिल्ली से इकलौते जाबांज हैं। 19 साल बीत गए, पैर में आज भी पाकिस्तान की एक गोली फंसी हुई है, जिसकी वजह से चल फिर नहीं सकते। बैसाखी ही एक सहारा है। यह योद्धा करगिल की लड़ाई जीते, मगर हक के लिए सिस्टम से लड़ते हुए हार गए।

सतवीर बताते हैं, ‘वह 13 जून 1999 की सुबह थी। करगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर थे। तभी घात लगाए पाकिस्तानी सैनिकों की टुकड़ी से आमना-सामना हो गया। 15 मीटर की दूरी पर थे पाकिस्तानी सैनिक।’ 9 सैनिकों की टुकड़ी की अगुवाई सतवीर ही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका। बर्फ में 6 सेकंड बाद ग्रेनेड फट गया। जैसे ही फटा पाकिस्तान के 7 सैनिक मारे गए। उन्होंने बताया, ‘हमें कवरिंग फायर मिल रहा था लेकिन 7 जवान हमारे भी शहीद हुए थे। उसी दरम्यान कई गोलियां लगीं। उनमें एक, पैर की एड़ी में आज भी फंसी हुई है। 17 घंटे वहीं पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। सारा खून बह चुका था। 3 बार हेलीकॉप्टर भी हमें लेने आया। लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग की वजह से नहीं उतर पाया। हमारे सैनिक ही हमें ले गए। एयरबस से श्रीनगर लाए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट कर दिया।’

अभी भी बैसाखी के सहारे चलते हैं सतवीर

सरकारी आंकड़ों में करीब 527 देश के जवान शहीद हुए और करीब 1,300 से ज्यादा योद्धा घायल हुए थे। भारत की विजय के साथ 26 जुलाई को यह युद्ध समाप्त हुआ। करगिल के उन घायल योद्धाओं में लांस नायक सतवीर सिंह का भी नाम था। उस युद्ध में शहीद हुए अफसरों, सैनिकों की विधवाओं, घायल हुए अफसरों और सैनिकों के लिए तत्कालीन सरकार में पेट्रोल पंप और खेती की जमीन मुहैया करवाने की घोषणा की थी। लांस नायक सतबीर सिंह के पैर में 2 गोलियां लगी थीं। एक तो पांव से लगकर एड़ी से निकल गई और दूसरी पैर में ही फंसी रह गई। वह गोली आज भी उनके पैर में फांसी हुई है।

इस वीर जवान ने बताया, ‘एक साल से ज्यादा मेरा इलाज दिल्ली सेना के बेस हॉस्पिटल में चला। मुझे भी औरों की तरह पेट्रोल पंप आवंटित होने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश पेट्रोल पंप नहीं मिल सका। इसके बाद जीवनयापन करने के लिए मुझे करीब 5 बीघा जमीन दी गई। मैंने उस पर फलों का एक बाग भी लगाया। वह जमीन का टुकड़ा भी करीब 3 साल तक मेरे पास रहा, लेकिन बाद में मुझसे छीन लिया। 2 बेटे हैं जिनकी पढ़ाई भी पैसों के अभाव में छूट गई। पेंशन और इस जूस की दुकान से घर का खर्च मुश्किल से चलता है।’

वह कहते हैं, ’13 साल 11 महीने नौकरी की। मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट करार दिया। दिल्ली का अकेला सिपाही था। सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। सरकार ने जमीन व उस पर पेट्रोल पंप देने का वादा किया। उसी दरम्यान एक बड़ी पार्टी के नेता की तरफ से संपर्क किया गया। ऑफर दिया कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने इनकार किया तो सब कुछ छीन लिया गया। 19 साल से फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में घूम रही हैं। आज तक कोई नहीं मिला। कोई मदद नहीं मिली। सम्मान नहीं मिला। डिफेंस ने सम्मान बरकार रखा।’

सभार-नवभारत टाइम्स Read it also-संसद सत्र कल से, चार साल में मोदी सरकार के 40 बिल अटके दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

तो क्या मायावती के लिए पद छोड़ने को तैयार हैं राहुल गांधी

भारतीय जनता पार्टी भले ही इस पर चुटकी ले रही है कि पीएम प्रत्याशी बनने की घोषणा के अगले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना हाथ खींच लिया है, लेकिन असल में ऐसा कर राहुल गांधी ने एक दूरदर्शी नेता का काम किया है. दरअसल कांग्रेस पार्टी ने अध्यक्ष राहुल गांधी को अगले लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने का फैसला किया. पार्टी ने यह भी कहा कि वह विपक्षी पार्टियों के बीच पीएम उम्मीदवार को लेकर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी. लेकिन वहीं मंगलवार 24 जुलाई को खुद राहुल गांधी ने संकेत दिए कि अगले लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में भाजपा और आरएसएस की सरकार बनने से रोकने के लिए कांग्रेस हर मुमकिन और जरूरी कदम उठाएगी.

हालांकि राहुल गांधी ने पीएम बनने की संभावना से इंकार नहीं किया और अगर कांग्रेस पार्टी मजबूत बनकर उभरती है तो जाहिर है कि प्रधानमंत्री पद पर सबसे बड़ा दावा राहुल गांधी का ही होगा. लेकिन राहुल गांधी ने यह भी साफ किया कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस किसी भी ऐसी सरकार को समर्थन देगी जो भाजपा और आरएसएस की सरकार या उसके द्वारा समर्थित किसी सरकार को बनने से रोक सके. राहुल गांधी का यह फैसला एक सोचा समझा फैसला है, जिसके अपने राजनीतिक मायने हैं.

हाल ही में दिल्ली में सौ से ज्यादा महिला पत्रकारों के साथ एक अनौपचारिक मुलाकात में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसी महिला को पीएम के रूप में स्वीकार करने की संभावना पर हामी भरी. राहुल ने कहा कि भाजपा-आरएसएस की सरकार या उसके द्वारा समर्थित किसी भी सरकार को बनने से रोकने के लिए वह हर मुमकिन कदम उठाएंगे और जो भी जरूरी होगा वह करेंगे. ऐसे में

अभी कोई यह दावे से नहीं कह सकता कि 2019 चुनाव के बाद क्या स्थिति बनेगी. कांग्रेस और राहुल गांधी का एकमात्र लक्ष्य भाजपा को रोकना है. कई और विपक्षी दल भी यह दावा करते हैं. ऐसे में कांग्रेस पार्टी हर संभावना पर सोच रही है. चुनाव बाद जो स्थिति बनेगी उसमें कौन कहां खड़ा होगा, अभी से इसका कयास लगाना संभव नहीं है. लेकिन कांग्रेस से इतर जो सबसे बड़ा नाम सामने आ रहा है वह बसपा प्रमुख मायावती और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का नाम है. हालांकि बंगाल से होने के कारण ममता बनर्जी का दावा कमजोर हो सकता है. और अन्य सहयोगी दलों की मदद से मायावती का दावा मजबूत हो सकता है. वर्तमान हालात में मायावती के साथ देवेगौड़ा की जेडीएस, अभय चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल और सपा के अखिलेश यादव खड़े हैं. एक दलित और महिला के तथ्य को साथ देखा जाए तो बसपा प्रमुख मायावती को इसका फायदा मिल सकता है.

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सवर्णों की मार से दलित बच्चों का स्कूल जाना हुआ बंद

2016 में उत्तराखण्ड के बागेश्वर जनपद में एक दलित युवक को इसलिए मार दिया गया था कि उसने सवर्ण टीचर का आटा छू दिया था. आज फिर दो वर्ष बाद बागेश्वर जनपद में ही जातिवाद का क्रूर चेहरा देखने को मिला है. सवर्ण समाज के जातिवादियों द्वारा दलित समुदाय के छात्राओं के साथ छेड़खानी और अभद्रता की गयी जिसका विरोध दलित वर्ग के छात्रों ने किया तो सवर्णों ने उनकी बुरी तरह पिटाई कर दी.

घटना बागेश्वर जिले के राजकीय इंटर कालेज तिलसारी में पढ़ रहे अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव उड़खली के बच्चों के साथ घटित हुई है. जातिवादियों की पिटाई से पांच से अधिक छात्र घायल हुए हैं. छात्रों में दहशत और भय बना हुआ है तथा जान का खतरा बना है जिस कारण उपरोक्त विद्यालय में 40 से उपर अध्ययनरत छात्रों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है. हैरानी की बात है कि पटवारी ने 24 घंटे बीतने के बाद भी खबर लिखे जाने तक एफआइआर दर्ज नहीं की थी. पीड़ित पक्ष के अभिभावकों ने आन्दोलन की चेतावदी दी है. ऐसी घटनाएं लगातार देश में बढ़ती जा रही हैं न सड़क पर दलित सुरक्षित हैं न ही स्कूलों में. लगता है देश को डिजिटल नहीं दलित इंडिया में तब्दील कर दमन की नीति हो रही है. क्या न्यू इंडिया की शुरुआत मॉब लिचिंग से हो रही है जिसमें दलितों को, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है. स्कूल में ही जब बालिकाएं सुरक्षित नहीं तो बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ का नारा मात्र दिखावा और चुनावी जुमला ही बन कर रह गया है.

आई0 पी0 ह्यूमन

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हर महीन लाखों कमाने का ऑफर लेकर बाजार में आया अमूल

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नई दिल्ली। अमूल लोगों के बीच में एक शानदार ऑफर लेकर आया है. अपने ऑफर में अमूल लोगों को लाखों कमाने का भरोसा दे रहा है. अमूल का कहना है कि कंपनी के साथ जुड़कर लोग 5 से 10 लाख रुपये महीना कमा सकते हैं. दरअसल अमूल अपनी फ्रेंचाइजी ला रहा है.

अमूल के मुताबिक फ्रेंचाइजी के लिए आपको रॉयलिटी और मुनाफा शेयर का भुगतान नहीं करना पड़ेगा. फ्रेंचाइजी 2 लाख रुपये से भी शुरू की जा सकेगी. इसके लिए एक अच्छी सी लोकेशन पर पहले से बनाई हुई दुकान या जगह की जरूरत पड़ेगी. यह किराए की भी हो सकती है. डेढ़ से 6 लाख रुपये की लागत वाले फॉर्मेट की दुकान के सारे खर्च फ्रेंचाइजी खुद उठाएगी.

फ्रेंचाइजी की तरफ से उठाए जाने वाले खर्चों में दुकान का इंटीरियर, उपकरण आदि शामिल होंगे. अमूल के थोक विक्रेता फ्रेंचाइजी तक सामान पहुंचाएंगे और फ्रेंचाइजी उसे फुटकर में बेचकर बड़ा मुनाफा कमाएगी. फुटकर मुनाफा प्रोडक्ट्स के हिसाब से अलग-अलग भी हो सकता है. अमूल के मुताबिक ब्रिकी की मात्रा पर अतिरिक्त पूंजी की जरूरत निर्भर करेगी. लोकेशन के हिसाब से अलग-अलग जगह पर अनुमानित मासिक बिक्री के टर्नओवर में अंतर हो सकता है. गौरतलब है कि अमूल कई प्रकार की फ्रेंचाइजी ऑफर करता है जैसे अमूल आउटलेट, अमूल रेलवे पार्लर या अमूल किओस्क, इसके लिए 2 लाख रुपये का निवेश करना पड़ेगा. इसके अलावा 25 हजार रुपये की ब्रांड सिक्योरिटी लगेगी, जो नॉन रिफंडेबल होगी. एक लाख रुपये दुकाने को दोबारा तैयार करने पर खर्च किए जाएंगे और 75 हजार रुपये जरूरी उपकरणों पर खर्च होंगे. दूसरे प्रकार की फ्रेंचाइजी अमूल आइसक्रीम स्कूपिंग पार्लर है. इसके लिए 5 लाख रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी. इसमें 50 हजार रुपये की ब्रांड सिक्यॉरिटी, 4 लाख रुपये रिनोवेशन और डेढ़ लाख रुपये उपकरणों के लिए निवेश करने होंगे.

 साभारः अमर उजाला

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पाकिस्तान में आम चुनाव, 272 सीटों पर 100 दल मैदान में

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नई दिल्ली। भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में आज आम चुनाव हो रहा है. इसके लिए सुबह 8 बजे से ही वोटिंग शुरू है, जो शाम 6 बजे तक चलेगी. आम चुनाव में सीधा मुकाबला नवाज शरीफ और इमरान खान की पार्टी के बीच माना जा रहा है. चुनाव में 272 सीटों के लिए तकरीबन 100 राजनीतिक दल मैदान में हैं.

चुनाव के ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा आत्मसमर्पण करने और उसके बाद जेल जाने से यह चुनाव काफी रोचक हो गया है. चुनाव के नतीजे शरीफ की रिहाई का फैसला करेंगे. इस बीच पाकिस्तान से आ रही खबरों के मुताबिक इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ और नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई है. दोनों पार्टी के कार्यकर्ता पंजाब के राजनपुर में भिड़े गए.

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इंकम टैक्स रिर्टन भरने के लिए सिर्फ 6 दिन बचे, फाइन से बचने के लिए जल्दी करें

नई दिल्ली। इंकम टैक्स रिटर्न यानि सलाना कमाई का लेखा जोखा. टैक्स का रिटर्न भरने की आखिरी तारीख 31 जुलाई है. इसलिए अगर आप इसके दायरे में आते हैं तो अगले 6 दिनों के भीतर अपना आईटीआर फाइल कर लेना चाहिए. अगर आपने इसमें चूक की तो आप पर एक हजार रुपये से दस हजा रुपये तक का फाइन लग सकता है. आप अपना आईटीआर ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरीकों से भर सकते हैं.

अगर आप वेतनभोगी हैं, तो आपको आईटीआर 1 फॉर्म अथवा सहज भरना होगा. इसमें आप अपनी सैलरी डिटेल फॉर्म 16 की मदद से आसानी से भर सकते हैं. आपको ज्यादातर डिटेल इसमें मिल जाती हैं. आप अपनी सैलरी स्लिप की मदद भी ले सकते हैं.

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गठबंधन पर मायावती की कांग्रेस को दो टूक

नई दिल्ली। तीन राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों में बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होगा या नहीं, यह ऐसा सवाल बन गया है, जिसका जवाब किसी को नहीं मिल रहा है. पिछले हफ्तों की बात करें तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस औऱ बसपा के गठबंधन से जुड़ी कई खबरें और कई तरह के बयान सामने आ चुके हैं. लेकिन गठबंधन को लेकर सच्चाई क्या है, यह बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने खुद बताया है.

गठबंधन को लेकर आज अपने दो टूक बयान में बसपा प्रमुख ने साफ-साफ कहा है कि-

बी.एस.पी. किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव तभी लड़ेगी, जब हमारी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी. जहाँ तक कांग्रेस के कुछ नेता जो मीडिया में बी.एस.पी. के साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों के सम्बन्ध में गठबन्धन को लेकर आए दिन अपनी क़िस्म-क़िस्म की प्रतिक्रियाएं दे रहें हैं, उनको हमारी पार्टी का यह स्पष्ट कहना है कि बी.एस.पी. इन प्रदेशों में भी कांग्रेस के साथ तभी गठबंधन करके चुनाव लड़ेगी, जब हमारी पार्टी को यहाँ गठबन्धन में सम्मानजनक सीटें मिलेंगी.

अपने बयान में बसपा प्रमुख ने यह भी कहा है कि इन तीनों ही प्रदेशों में हमारी पार्टी सभी सीटों पर पूरी मजबूती के साथ अकेले अपने बलबूते पर ही चुनाव लड़ने की तैयारी में पूरे जी-जान से लगी हुई है. अब देखना है कि बसपा की इस सीधी बात पर कांग्रेस का क्या जवाब आता है.

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