भाजपा विधायक के पक्ष में उतरीं मायावती, जातिवाद पर हल्ला बोल

नई दिल्ली। भाजपा की दलित महिला विधायक के मंदिर प्रवेश के बाद मंदिर को शुद्ध किए जाने के मामले पर अब बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी यूपी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. जातिगत भेदभाव से जुड़े हालिया दो घटनाओं को मुद्दा बनाते हुए बसपा प्रमुख ने भाजपा पर निशाना साधा है. उत्तर प्रदेश की भाजपा महिला विधायक मनीषा अनुरागी के मन्दिर प्रवेश पर उसे गंगाजल से धुलवाने और यूपी के इलाहाबाद में एक दलित महिला अफसर को पीने के लिए पानी नहीं देने के मामले को मायावती ने अमानवीय बताया है.

एक बयान जारी कर इन दोनों घटनाओं की निंदा करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि बीजेपी की सरकारों में इस प्रकार की जातिवादी व अमानवीय घटनाओं के साथ-साथ दलित व पिछड़े समाज में जन्में संतों व महापुरुषों की प्रतिमाओं को खण्डित व अपमानित करने जैसी घटनायें काफी ज्यादा बढ़ी हैं. इसके बावजूद भी बीजेपी सरकारों का रवैया इन मामलों को लेकर ज्यादातर उदासीन रहता है.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकारों की जातिवादी सोच व मानसिकता तथा ऐसे जातिवादी तत्वों के प्रश्रय देते रहने के कारण ही ऐसी घृणित, गै़र-इन्सानी घटनायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं. ऐसी घटनाएं बीजेपी की कथनी और करनी के अंतर को बेनकाब करती है. दरअसल महिला विधायक का मामला सोमवार को उस वक्त चर्चा में आया, जब मंदिर के ‘शुद्धीकरण’ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. बीजेपी विधायक मनीषा अनुरागी 12 जुलाई को यूपी के बुंदेलखंड इलाके के हमीरपुर जिले में एक स्कूल के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पहुंची थी, जब घटना घटी. अब यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को मुद्दा बनाए जाने के बाद भाजपा सफाई देने लगी है.

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NRC पर ममता और मायावती के निशाने पर मोदी सरकार

नई दिल्ली। कहते हैं कि कोई इंसान कितना भी गरीब हो, धरती और आसमान पर सबका समान अधिकार है. किसी फिल्म का एक गाना भी है, जिसमें धरती को बिछौना बनाने और आसमान को ओढ़ने की बात कही गई है. लेकिन अब धरती और आसमान पर भी सरकारों का कब्जा हो गया है. दुनिया में क़रीब एक करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका कोई देश नहीं.

सालों से सोई सरकारों को अचानक अपनी जमीन पर रहने वाले कुछ ‘खास’ लोग बेमतलब लगने लगे हैं और वो उन्हें बेदखल करने पर अमादा हो गई है. केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे एनआरसी यानि ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स’ अभियान से असम के लाखों लोगों की जिंदगी में अचानक तूफान आ गया है. इस अभियान के तहत सरकार ने असम में रह रहे उन लाखों लोगों को बाहरी घोषित करने पर तुली है, जिनके पास अपनी भारतीय नागरिकता को साबित करने के लिए कोई ठोस कागज नहीं है.

इस मुद्दे को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है. यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने असम में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स’ (एनआरसी) से लाखों लोगों के नाम गायब होने पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संकीर्ण और विभाजनकारी नीतियों का परिणाम बताया है. मायावती ने कहा कि इस तरह की गंभीर घटना से देश के लिए सिरदर्द बन सकती है, जिससे निपट पाना बहुत मुश्किल होगा.

इस बारे में जारी एक बयान में बसपा प्रमुख ने कहा कि भाजपा शासित असम में बरसों से रहने के बावजूद लाखों लोगों की नागरिकता सिर्फ इसलिये छीन ली गयी, क्योंकि वे अपनी नागरिकता के सम्बन्ध में कोई ठोस सबूत नहीं दे पाए. अगर वे प्रमाण नहीं दे सके तो इसका यह मतलब नहीं है कि उन लोगों से उनकी नागरिकता ही छीन ली जाए और उन्हें देश से बाहर निकालने का जुल्म ढाया जाए.

बसपा अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा और संघ की संकीर्ण विभाजनकारी नीतियों का ही यह परिणाम है कि असम में ऐसा अनर्थ हुआ है. इस साल 31 दिसम्बर को अन्तिम सूची के प्रकाशन के बाद यह देश के लिए एक ऐसा सरदर्द बनकर उभरेगा, जिससे निपट पाना बहुत ही मुश्किल होगा. उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की नागरिकता को लगभग समाप्त करके केन्द्र और असम में अपनी स्थापना का एक प्रमुख उद्देश्य प्राप्त कर लिया है. तो वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि बंगाल में इस घटनाक्रम का गहरा दुष्प्रभाव पड़ेगा लेकिन ‘भाजपा एण्ड कम्पनी’ इसका भी फायदा लेने का प्रयास कर रही है. NRC की दूसरी लिस्ट में 40 लाख लोगों का नाम होने पर पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने बीजेपी के खिलाफ जोरदार तरीके से अपनी आवाज़ बुलंद की है. उनके इस मसले पर दिल्ली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात कर अपनी बात रख चुकी हैं.

सिविल वॉर की चेतावनी देते हुए ममता बनर्जी ने कहा था कि बंगाली ही नहीं अल्पसंख्यकों, हिंदुओं और बिहारियों को भी एनआरसी से बाहर रखा गया है. जिन 40 लाख से ज्यादा लोगों ने सत्ताधारी पार्टी के लिए वोट किया था, उन्हें अपने ही देश में रिफ्यूजी बना दिया गया है. ममता ने कहा, ‘वे लोग देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. यह जारी रहा तो देश में खून की नदियां बहेंगी, देश में सिविल वॉर शुरू हो जाएगा.’

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दिल्लीः स्वाति मालीवाल ने होटल से 39 लड़कियों को छुड़ाया

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नई दिल्ली। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल महिलाओं के लिए जैसे फरिश्ता बनकर आई हैं. एक के बाद एक कई मामलों में स्वाति मालीवाल ने सैकड़ों लड़कियों की जिंदगी तबाह होने से बचा ली है. ताजा मामला मंगलवार का है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वेश्यावृति रैकेट के चंगुल से 39 लड़कियों को छुड़ाया है. स्वाति मालीवाल ने दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर मंगलवार देर रात इन लड़कियों को दिल्ली के पहाड़गंज से आजाद कराया. इन लड़कियों को नेपाल से दिल्ली वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेलने के लिए लाया गया था.

यही नहीं, इससे पहले स्वाति मालीवाल ने मंगलवार शाम वसंत विहार पुलिस थाना क्षेत्र से 18 महिलाओं को छुड़ाया था. इनमें भी 16 महिलाएं नेपाल की हैं. पुलिस ने बताया कि एक संयुक्त अभियान में वाराणसी पुलिस की अपराध शाखा और दिल्ली पुलिस ने कल वसंत विहार पुलिस थाना क्षेत्र में एक मकान पर छापेमारी की और 18 महिलाओं को छुड़ाया था. पुलिस के मुताबिक इन महिलाओं को पिछले कुछ दिनों से घर में बंद रखा गया था और उन्हें जल्द ही तस्करी के जरिए खाड़ी देशों में भेजा जाने वाला था. उन्होंने इस बाबत पूछताछ के लिए तीन लोगों को हिरासत में लिया है. दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा कि इन महिलाओं को आश्रय गृहों में भेजा जाएगा और उन्हें वापस भेजने के लिए नेपाली दूतावास से संपर्क किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इन महिलाओं को जहां रखा गया था, वहां से 68 पासपोर्ट बरामद किए गए जिनमें से सात भारतीय पासपोर्ट हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि नेपाली महिलाओं को नौकरियों का झांसा देकर फंसाया गया. छुड़ाई गई महिलाओं ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष को बताया कि वे नेपाल के भूकंप प्रभावित क्षेत्रों की रहने वाली हैं. ज्यादातर ने भूकंप में अपने घर-परिवार गंवा दिए हैं. उनकी उम्र 18 से 30 साल के बीच है. इस घटना के बाद दिल्ली पुलिस पर सवाल उठने लगे हैं. मालीवाल ने आरोप लगाया कि ‘दिल्ली मानव तस्करी का केंद्र बन गया है. दिल्ली महिला आयोग को इन रैकेटों के बारे में पता चलता है, अन्य राज्यों की पुलिस को उनके बारे में पता चल जाता है, लेकिन दिल्ली पुलिस सोती रहती है. वाराणसी पुलिस ने मुझे बताया कि मैदान गढ़ी के उस मकान का इस्तेमाल पिछले कई साल से महिलाओं की जत्थों में तस्करी के लिए होता था. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर स्थानीय पुलिस को इसके बारे में कैसे पता नहीं चला?

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अधेड़ दरोगा मां-बाप को बंद कर 15 साल की लड़की से करता था रेप

रीवा। सलमान खान की एक फिल्म आई थी ‘वांटेड’. फिल्म में पुलिस बना महेश मांजरेकर का दिल अपने से कम की उम्र की लड़की पर आ जाता है और फिर वह लड़की को परेशान करने लगता है.

मध्य प्रदेश के रीवा जिले से ऐसी ही एक घटना सामने आई है. मऊगंज थाना प्रभारी महेन्द्र मिश्रा को 15 वर्षीय एक किशोरी को शादी का झांसा देकर उससे बलात्कार करता रहा. मिश्रा की उम्र 45 साल है. 27 जुलाई को मिश्रा ने शादी की बात कहकर लड़की को मऊगंज बुलाया था. यहां एक लॉज में ठहराया और फिर रेप किया. आखिरकार लड़की ने सब्र का बांध टूटने पर इसकी शिकायत कर दी, जिसके बाद मिश्रा को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पीटीआई की खबर के मुताबिक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) शिव कुमार सिंह ने बताया कि पीड़िता ने शिकायत में कहा है कि उसके घर में ही पिछले कई महीने से रेप किया जा रहा था. इस दौरान आरोपी लड़की के पैरेंट्स को एक कमरे में बंद कर देता था.

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने को गिरफ्तार कर लिया. मऊगंज के अपर सत्र न्यायाधीश मनीष पाटीदार की अदालत में मिश्रा को पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. मिश्रा पहले से ही शादीशुदा है. पीड़ित 9वीं क्लास में पढ़ाई करती हैं. रीवा जिला मुख्यालय से मऊगंज करीब 60 किलोमीटर दूर है.

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दलित दस्तक मैग्जीन का अगस्त 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का दुसरा अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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गोरक्षा को लेकर धंधा करने वालों के विरोध में उतरा भाजपा सांसद

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भाजपा सांसद सुमेधानंद सरस्वती

जयपुर। गोरक्षा के नाम पर गाय का धंधा करने और फिर मॉब लिंचिंग जैसी घटना करने वालों को लेकर भाजपा के एक सांसद ने बड़ा बयान दिया है. अलवर में भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डाले गए अकबर ख़ान उर्फ रकबर मामले पर सीकर के भाजपा सांसद सुमेधानंद सरस्वती ने आवाज उठाई है. उन्होंने कहा, ‘बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने गोरक्षा के नाम पर धंधा शुरू कर दिया है. इन लोगों के गो-तस्करों से वसूली के लिए गिरोह बना रखे हैं. ऐसे लोगों की वजह से ही अलवर जैसी घटनाएं सामने आती हैं.’

जयपुर में भाजपा के स्थानीय कार्यालय में मीडिया से बातचीत करते हुए भाजपा सांसद ने कहा कि गोरक्षा की आड़ में धंधा करने वाले इन लोगों की वजह से सही में गोसेवा में लगे लोग और संत समाज बदनाम हो रहा है. उन्होंने फ़र्ज़ी गोरक्षकों के ख़िलाफ़ कठोर से कठोर कार्रवाई करने की मांग की. सांसद सुमेधानंद सरस्वती ने कहा कि तमाम गोशालाओं के संचालक मुझसे मिलते हैं. उनका कहना है कि हमारे जैसे लोग और साधू-संन्यासी तो निस्वार्थ भाव से गायों की सेवा करते हैं, लेकिन इस काम को धंधा बनाने वाले लोगों की वजह हमारी बदनामी हो रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि गोसेवा की आड़ में लोगों ने गिरोह बना लिए हैं. ये दिखावे के लिए गोसेवा करते हैं. असलियत में ये गायों की तस्करी करवाते हैं. इन लोगों के ख़िलाफ़ सरकार को सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए. अकबर ख़ान की हत्या के मामले पर उन्होंने कहा कि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. न्यायिक जांच भी हो रही है. ऐसे में मेरा कुछ बोलना उचित नहीं है. जिन्होंने भी अकबर को मारा है, उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए.’

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कितना जरूरी है 9 अगस्त का भारत बंद

एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के विरोध में दो अप्रैल को दलित समाज के लोग जब सड़क पर उतरे थे तो किसी को भी यकीन नहीं था कि विरोध इतना बड़ा होगा. उस दिन जिस तरह बिना किसी संगठन या राजनीतिक दल के बुलावे के लोग अपने अधिकार को बचाने सड़क पर निकले थे, उसने दलित राजनीति की दिशा बदल कर रख दी थी. 2 अप्रैल के बंद में अगर राजनीतिक दलों की भूमिका की बात करें तो इस बंद को सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ने अपना समर्थन दिया था, वो भी आखिरी वक्त में. तमाम दल और तमाम दलित नेता इस बंद का राजनीतिक फायदा उठाने से चूक गए थे. ऐसे में दलित राजनीति के उभार और 2019 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव में दलित वोटरों का समर्थन हासिल करने की होड़ में एक बार फिर 9 अगस्त को बंद बुलाया गया है.

इस बंद को लेकर अखिल भारतीय अम्बेडकर महासभा का नाम आ रहा है और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसी बैनर तले यह बंद बुलाया गया है. राजनीतिक दलों की बात करें तो 9 अगस्त के बंद को लेकर रामविलास पासवान भी सक्रिय हैं. तो दूसरी ओर नई नवेली जनसम्मान पार्टी के अध्यक्ष और नैक्डोर के पूर्व अध्यक्ष अशोक भारती भी बंद को लेकर लगातार लोगों को संगठित करने में जुटे हैं.

हालांकि इस बंद को लेकर दलित समाज के भीतर ही ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है. सोशल मीडिया खंगालने पर यह साफ नजर आ रहा है कि तमाम लोग इस बंद में शामिल होने से बचने को कह रहे हैं और दलित नेताओं पर सवाल उठा रहे हैं. एक बड़ा धड़ा इस सवाल को उठा रहा है कि अगर एससी/एसटी सांसद सच में एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के खिलाफ हैं तो संसद के भीतर आवाज उठाएं. लोगों का कहना है कि समाज सड़क पर अपनी लड़ाई 2 अप्रैल को लड़ चुका है, अब सांसदों और नेताओं की बारी है और उन्हें संसद के अंदर लड़ाई लड़नी चाहिए. अभी संसद का मानसून सत्र चल रहा है ऐसे में दल की राजनीति से ऊपर उठकर एससी/एसटी वर्ग के सभी सांसद एकजुट होकर सरकार के खिलाफ आ जाएं, ऐसे में सरकार इसी सत्र में अध्यादेश लाकर संशोधन को वापस लेने के लिए बाध्य होगी.

एक दूसरा सवाल 2 अप्रैल के बंद के दौरान देश के कई हिस्सों, खासकर उत्तर प्रदेश में दलित समाज के युवाओं के गिरफ्तारी की है. उस आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए तमाम युवा अब भी जेल में है. तमाम युवाओं पर कई बड़ी धाराएं लगाकर उनका भविष्य खराब करने की साजिश रची गई. मेरठ और हापुड़ में तो 15-17 उम्र के कई बच्चे भी गिरफ्तार हुए. लेकिन किसी भी राजनैतिक दल या किसी बड़े दलित संगठन ने उनकी रिहाई के लिए कोई बड़ा आंदोलन अब तक नहीं किया. ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या 9 अगस्त को दुबारा बंद बुलाने वाले लोगों को जेलों में बंद दलित समाज के उन युवाओं के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

इस बंद को भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर रावण की रिहाई से भी जोड़ा जा रहा है, लेकिन चंद्रशेखर रावण के जेल जाने से लेकर उस पर रासुका की अवधि बढ़ाने तक इस मुद्दे को लेकर राजनीति ज्यादा हुई है और इस मुद्दे को उठाने वाले लोग तमाम दावों के बावजूद जमीन पर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में सफल नहीं हो पाए हैं. ऐसे में 9 अगस्त के बंद को आम जनता का कितना समर्थन मिलता है, यह देखना होगा.

लोग 15 दिन टीवी और सोशल मीडिया दूर रहें तो उनमें प्यार हो जाएगा

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नई दिल्ली। फिल्म ‘मुल्क’ आगामी 3 अगस्त को रिलिज होने वाली है. फिल्म अपने देश को प्यार न करने की तोहमत और सोशल मीडिया पर अफ़वाहों से बेज़ार आम मुसलमान के अंतर्मन को टटोलती है. इस फिल्म के प्रोमोशन को लेकर निर्देशक अनुभव सिन्हा लगातार व्यस्त हैं. एक कार्यक्रम के दौरान अनुभव सिन्हा ने कहा कि अगर हिन्दू और मुस्लिम 15 दिनों तक टीवी न देखें तो उनमें प्यार हो जाएगा.

फिल्म ‘मुल्क’ के निर्देशक अनुभव सिन्हा का मानना है कि हिंदू और मुसलमान दोनों अपने धर्म और देश से प्यार करते हैं, लेकिन उन्हें इसे (देशभक्ति) साबित करने के लिए मजबूर न किया जाए. उन्होंने कहा कि कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज ने एक नज़्म लिखी थी, ‘अब कोई मज़हब ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इनसान को इनसान बनाया जाए.’

अनुभव सिन्हा का मानना है कि मज़हब कोई बुरा नहीं है, अगर एक दूसरे पर भरोसा किया जाए और एक दूसरे की नीयत पर शक न किया जाए तो 70 साल की नफरत को 70 घंटे में प्यार और खुलूस में बदला जा सकता है. सिन्हा का कहना है कि ‘इस मुल्क में न हिंदू दंगा चाहता है और न ही मुसलमान, बस चंद लोग हैं जो इन दोनों को लड़ते देखना चाहते हैं क्योंकि इसमें उनका फायदा है.’ इसके लिए मीडिया और सोशल मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराते हुए वह सलाह देते हैं कि अगर जनता न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया से नाता तोड़ ले तो प्यार की बरसात बरसने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा.

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मुजफ्फरपुर कांड: पांच साल में 34 लड़कियों के साथ हुआ था रेप

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मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर के जिस बालिका गृह में लड़कियों के यौन शोषण और रेप किए जाने के मामले का खुलासा हुआ है वहां पिछले 5 सालों में 400 से ज्यादा लड़कियां आई थीं. कुछ हफ्ते पहले तक इसी बालिका गृह में रह रहीं 42 लड़कियों का जब मेडिकल टेस्ट किया गया तो 29 के साथ रेप की बात सामने आई. तो वहीं बाद में पांच और लड़कियों के साथ भी रेप किए जाने की बात साबित हुई.

इस मामले में मुख्य अभियुक्त और बालिका गृह का संचालक ब्रजेश कुमार ठाकुर के साथ कुल 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. इनके नाम किरण कुमारी, मंजू देवी, इन्दू कुमारी, चन्दा देवी, नेहा कुमारी, हेमा मसीह, विकास कुमार एवं रवि कुमार रौशन हैं. एक अभियुक्त फरार है. बालिका गृह को 31 मई से बंद कर दिया गया है एवं संस्था को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया. मामले की सीबीआई जांच शुरू हो चुकी है. अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर शहर के ताकतवर लोगों में से एक है.

गौरतलब है कि बिहार के समाज कल्याण विभाग की ओर से अनाथ, बेसहारा, सड़क पर रहने वाले बच्चे एवं बाल मजदूरी अथवा मानव व्यापार से मुक्त कराये गये बच्चों के लिए विभिन्न जिलों में 06 से 18 आयु वर्ग के बालक एवं बालिकाओं के लिए बाल गृह संचालित किए जाते हैं. इन बाल गृहों का संचालन राज्य सरकार द्वारा स्वयं तथा स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से किया जाता है.

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गुजरात में नवरात्रि पर नौ दिन की छुट्टी, विरोध में आए स्कूल वाले

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अहमदाबाद। नवरात्रि के दौरान स्कूल और कॉलेजों में गुजरात में नौ दिनों की छुट्टी देकर सरकार युवाओं को खुश करना चाहती है, लेकिन सरकार के इस फैसले के विरोध में स्कूल प्रशासन आ गए हैं. स्कूल मैनेजमेंट को इन छुट्टियों के कारण सिलेबस पूरा होने में मुश्किल दिखाई दे रही है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ सोमवार को मुख्यमंत्री के ही गृहशहर राजकोट में करीब 400 स्कूल मैनेजमेंट्स ने आवाज उठाई है.

अभी हाल में साल के 365 दिन में से स्कूल महज 210 दिन ही चलता है. ऐसे में 10 दिन की नवरात्रि की छुट्टी भी मिलेगी तो शिक्षा पर इसका असर होगा. वहीं कांग्रेस ने इस मामले को सियासी रंग दे दिया है. गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने कहा कि सरकार को छुट्टी देने के साथ-साथ शिक्षा के स्तर को भी देखना चाहिए. शिक्षा का स्तर बढ़ाना चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकार को फैसला लेने से पहले स्कूल और कॉलेज मैनेजमेंट के साथ भी बात करनी चाहिए थी. वहीं सौराष्ट्र के स्कूल मैनेजमेंट का कहना है कि स्कूल में पहले जन्माष्टमी की छुट्टी होती है, जिसके बाद एग्जाम और फिर दिवाली की छुट्टी आ जाती हैं. जिसमें सेमिस्टर खत्म होता है. ऐसे में अगर जन्माष्टमी, फिर नवरात्रि और फिर दिवाली की छुट्टी होगी तो बच्चों के लिए स्कूल में छुट्टी का ही माहौल रहेगा. हालांकि मैनेजमेंट के विरोध के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अड़ी हुई है. उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि सरकार किसी से पूछकर फैसला नहीं लेती है.

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एससी-एसटी से जुड़ा विवाद सुलझाने को पीएम मोदी खुद संभालेंगे मोर्चा

नई दिल्ली।  एससी-एसटी कानून के प्रावधानों में बदलाव और जस्टिस एके गोयल को एनजीटी चेयरमेन बनाने से नाराज अपनों को मनाने के लिए प्रधानमंत्री खुद मोर्चा संभालेंगे। इस क्रम में पीएम नरेंद्र मोदी जल्द लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान से बातचीत करेंगे। सरकार मानसून सत्र खत्म होते ही एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों में बदलाव संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाने की तैयारी कर ली है। दरअसल सरकार की मुख्य चिंता दलित संगठनों द्वारा 9 अगस्त को घोषित भारत बंद से सहयोगियों को दूर रखने की है। लोजपा सांसद चिराग पासवान ने शुक्रवार को साफ तौर पर कहा कि अगर जस्टिस गोयल को नहीं हटाया गया तो पार्टी भारत बंद का समर्थन करेगी। असली समस्या इस कानून में बदलाव करने वाले जस्टिस एके गोयल को एनजीटी का चेयरमैन बनाने और यूजीसी द्वारा प्राध्यापकों की नियुक्ति के मामले में रोस्टर है।

इन फैसलों से एनडीए के घटक लोजपा-आरपीआई ही नहीं भाजपा के भी एससी-एसटी सांसद नाराज हैं। सरकार के लिए मुश्किल यह है कि उसके पास फिलहाल जस्टिस एके गोयल को पद से हटाने का रास्ता नहीं है। इसके अलावा सत्र जारी रहते सरकार कानून में बदलाव के खिलाफ अध्यादेश भी जारी नहीं कर सकती।

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ममता ने सुझाई नई तरकीब, लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने होगा एकजुट विपक्ष

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता उमर अब्दुल्ला के साथ मुलाकात की और कहा कि अगले लोकसभा चुनावों के लिए संभावित विपक्षी मोर्चा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर किसी का भी नाम नहीं चुना जाना चाहिए।

ममता ने कहा कि पीएम उम्मीदवार का नाम नहीं चुनकर हम भाजपा का सामना ज्यादा मजबूती से कर सकते हैं। जबकि पीएम उम्मीदवार का नाम बताना भाजपा से लड़ने की क्षेत्रीय पार्टियों की एकजुटता को विभाजित कर देगा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा विरोधी क्षेत्रीय पार्टियों को साथ आना चाहिए और उन्हें देश के फायदे के लिए बलिदान देना चाहिए।

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PM बनने के लिए इमरान को छोटे दलों और निर्दलीयों की जरूरत

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इस्लामाबाद। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पी.टी.आई.) देश के संसदीय चुनाव में अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कुल 270 सीटों के लिए चुनाव हुआ था जिनमें से इमरान की पार्टी पी.टी.आई. ने 114 सीटें जीती हैं, हालांकि वह बहुमत से दूर है और उसे सरकार बनाने के लिए छोटे दलों व निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। चुनाव आयोग ने नैशनल असैंबली की 261 सीटों के परिणाम शुक्रवार को घोषित किए। दूसरे नंबर पर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पी.एम.एल.-एन) है जिसने 62 सीटें जीती हैं।

वहीं पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पी.पी.पी.) ने 43 सीटें जीती हैं जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों को 12 सीटें ही मिलीं। पाकिस्तान की नैशनल असैंबली में कुल 342 सदस्य होते हैं जिनमें से 272 सीधे चुने जाते हैं। कोई भी पार्टी कुल 172 सीटें प्राप्त करके सरकार बना सकती है। जमात-ए-इस्लामी जैसे धार्मिक दलों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमाल (एम.एम.ए.) ने 12 जबकि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री परवेज इलाही की पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने 5 सीटें जीती हैं। कराची की मुत्ताहिदा कौमी मूवमैंट (एम.क्यू.एम.) को सबसे कम सीटें मिली हैं। उसे कराची में 20 में से महज 6 सीटें मिली हैं।

प्रांतीय विधानसभाओं में पी.एम.एल.-एन पंजाब में आगे है जहां की 297 सीटों में से 127 सीटें जीतकर वह प्रांत की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। हालांकि पार्टी बहुमत से दूर है। पी.टी.आई. को 123 सीटें मिली हैं और उसकी निर्दलीयों के साथ बातचीत चल रही है जिनमें से अधिकतर ने चुनाव से पहले पी.एम.एल.-एन. से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा था। निर्दलीय उम्मीदवारों को 29 सीटें मिली हैं जो पंजाब में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इमरान की सहयोगी पी.एम.एल.-क्यू को प्रांत में 7 सीटें मिली हैं। 297 सदस्यीय सदन में सरकार बनाने के लिए 149 सीटें जीतने की जरूरत है। पी.टी.आई. ने पंजाब में भी सरकार बनाने की पहले ही घोषणा कर दी है। इस कदम से खरीद-फरोख्त के आरोप लग सकते हैं। सिंध प्रांत में पी.पी.पी. को स्पष्ट बहुमत मिला है। उसने सदन की 131 सीटों में से 74 पर जीत दर्ज की है। पी.टी.आई. 22 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर है।

वहीं एम.क्यू.एम. ने 16 सीटें जीती हैं। पी.टी.आई. ने 99 सदस्यीय खैबर पख्तूनख्वा विधानसभा में 66 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है। वहीं एम.एम.ए. 10 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। नवगठित बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बी.ए.पी.) 13 सीटों के साथ बलूचिस्तान विधानसभा में शीर्ष पर है। हालांकि 51 सदस्यीय विधानसभा में बी.ए.पी. बहुमत नहीं प्राप्त कर पाई। एम.एम.ए. 9 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है। बलूचिस्तान नैशनल पार्टी और निर्दलीयों को 5-5 सीटें मिली हैं। पी.टी.आई. ने 4 सीटें जीती हैं।

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने दिया बसपा को सीटों का ऑफर

नई दिल्ली। कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के बीच लगातार खिंचती जा रही गठबंधन की चर्चा के बीच प्रदेश यूनिट ने बसपा को 5 सीटों का ऑफर दिया है. प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष चरण दास महंत ने इस बारे में मीडिया को जानकारी दी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आखिरी फैसला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को करना है. कांग्रेस की ओर से यह बयान तब दिया गया है, जब बसपा प्रमुख मायावती ने गठबंधन पर साफ कहा है कि बसपा गठबंधन तभी करेगी जब उसे सम्मानजनक सीटें मिलेगी.

इस बीच 30 जुलाई को छत्तीसगढ़ में गठबंधन की चर्चा को लेकर बसपा और कांग्रेस के नेता आपस में बैठक करेंगे. इस बैठक में बसपा की ओर से पार्टी के प्रदेश प्रभारी एम.एल भारती शामिल होंगे. भारती कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेताओं के साथ सीटों को लेकर अपना दावा जताएंगे. इस बैठक के बाद बसपा के प्रभारी भारती बसपा प्रमुख को बैठक के बारे में सूचना देंगे, साथ ही प्रदेश में पार्टी के ग्राउंड रिपोर्ट के बारे में बताएंगे, जिसके बाद आखिरी फैसला बसपा प्रमुख करेंगी.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में बसपा का वोट प्रतिशत पांच फीसदी है. जिसके बूते पर प्रदेश में गेम चेंजर की भूमिका निभा सकती है. अब देखना है कि 30 जुलाई के बैठक के बाद क्या नतीजा निकलता है, क्योंकि अब दोनों दलों को गठबंधन पर आखिरी फैसला जल्द लेना होगा.

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09 अगस्त का भारत बन्द : कहीं ये राजनीतिक उपक्रम ही तो नहीं?

भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह व भारत के प्रधान सेवक अपनी किसी भी सभा में यह कहने से नहीं चूकते कि भाजपा दलितों के साथ है। किंतु वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा बजरिए सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को कमजोर करा दिया गया। कहनेको ये सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहा जा रहा है।  और जब 02 अप्रैल 2018 को भाजपा के इस पराक्रम के खिलाफ दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों  द्वारा सामूहिक आन्दोलन किया गया तो इसी भाजपा सरकार ने दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के अनेक नौजवानों को झूटे मामले बनाकर जेलों में ठूंस दिया गया। बहुत से तो आज तक जेल की सलाखों के पीछे हैं।
भाजपा के दो ही कर्णधार हैं जो बारबार यह आश्वासन देने से नहीं चूकते कि केंद्र सरकार दलित समुदाय के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी। भाजपा प्रमुख ने एक साथ कई ट्वीट करते हुए कहा, ‘सरकार दलितों के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करना जारी रखेगी।….’ किंतु धरातल पर उनकी घोषणा के विपरित ही काम हो रहे हैं। काफी शोरशराबे के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी एक्ट पर आदेश देने के दिन से ही केंद्र सरकार तत्काल और सजगता के साथ सक्रिय तो हो गई। और आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा की गुहार कर डाली किंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले को ठंडे बस्ते में ही डाल दिया गया। हुआ यूँ कि समाज में दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के खिलाफ और भी भयावह घटनाएं घटने लगीं हैं।
अमित शाह का ये कहना कि सरकार द्वारा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम  में संशोधन कर वास्तव में उसे और शक्ति प्रदान की है, किसी अत्यंत ही भद्दे मजाक से कम नहीं है। कमाल की बात तो ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जिस जज आदर्श गोयल ने ‘उदय ललित’ के साथ मिलकर SC,ST एक्ट को बर्बाद कर दिया, उसे सेवा निवृत्त होते ही  नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के चेयरमैन जैसे मालदार पद पर अगले पांच साल के लिए बैठा दिया। फिर ये कैसे मान लिया जाय कि एस सी/एस टी एक्ट को कमजोर करने में मोदी सरकार का हाथ नहीं है? क्या इसके बाद भी SC-ST को आगामी चुनावों अपनी भूमिका तय नहीं करनी चाहिए? कहने को तो भाजपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपने को पूरा करने को भाजपा की प्रतिबद्धता बताती है पर करती कुछ नहीं।
आगे चलने से पूर्व हम जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 है क्या। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसे 30 जनवरी 1990 से सारे भारत (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) में लागू किया गया था। यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है। इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं। यह कानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों को दंडित करता है। यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है। इसके लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था होती है। यह है संक्षिप्त हवाला अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के उपरांत भाजपा सरकार में मंत्री पद पर विराजमान दलित नेता पासवान ने यह कहकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करली कि सरकार अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को पुन: अपने प्राथमिक रूप में बनाए रखने के लिए ‘अध्यादेश’ लाएगी। किंतु अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है। इतना ही नहीं पासवान ने जेलों में बन्द दलितों की रिहाई के लिए एक बयान तक भी जारी नहीं किया।
और अब जबकि लोकसभा के चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं तो पासवान अपने बेटे चिराग पासवान को आगे करके व अन्य दलित सांसदों को बैसाखी बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने का पैंतरा चलने पर उतर आए हैं। मुझे याद आ रहा है कि एक बार लालू प्रसाद यादव ने रामविलास पासवान के बारे में कहा था कि आज के राजनीतिक माहौल में बहुत से राजनेता मौसम वैज्ञानिक बनकर उभरे हैं जो जिस मौसम को अपने हक में समझते हैं, उसी की ओर हो लेते हैं। रामविलास पासवान उनमें सबसे शीर्ष पर हैं। वही पासवान फिलहाल अपने बेटे चिराग पासवान को आगे करके लालू यादव के मत की पुष्टी कर रहे हैं। उनकी चहेती खरपतवार संस्थाएं भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने पर उतर आई हैं। 09.08.2018 को राजनीतिक “भारत बन्द” में भाग लेने को ललायित हैं।
दैनिक जागरण : 27.07.2018 के अनुसार, “एससी-एसटी एक्ट मामले में अध्यादेश लाने को लेकर विपक्ष के साथ-साथ राजग सहयोगी लोजपा की ओर से दबाव तो बढ़ रहा है, लेकिन सरकार कोर्ट का इंतजार करेगी। दरअसल, सरकार ऐसा कोई संकेत देना नहीं चाहती कि वह कोर्ट को खारिज कर रही है। चुनावी माहौल में अब सरकार पर दूसरी तरह से दबाव बनाया जा रहा है। दो दिन पहले लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की ओर से एनजीटी अध्यक्ष के रूप में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की नियुक्ति का विरोध किया गया था। उसका कहना था कि उन्होंने ही एससी-एसटी एक्ट को कमजोर किया था और उनकी एनजीटी में नियुक्ति से गलत संदेश जाता है। गुरुवार को लोकसभा में भी विपक्ष की ओर से यह मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश हुई।
कांग्रेस नेता मल्लिकाजरुन खड़गे और अन्य सदस्यों ने आरोप लगाया कि सरकार गोयल को पुरस्कृत कर रही है। सदन में मौजूद केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान भी कुछ बोलने की कोशिश करते दिखे। हालांकि उन्होंने ऐसा किया नहीं। बल्कि वह विपक्ष के एक सांसद और संसदीय कार्य राज्यमंत्री अजरुन राम मेघवाल से बातचीत करते देखे गए। खड़गे ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का मुद्दा भी उठाया जिसके तहत नियुक्ति में विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को यूनिट माना जा रहा है। उन्होंने इसे भी दलित विरोधी बताया। वहीं, संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार की ओर से साफ किया गया कि सरकार ने पहले ही यूजीसी के निर्देश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दे दी है क्योंकि यह कोर्ट के आदेश पर ही हुआ था। उन्होंने आरक्षण को लेकर भी सरकार के संकल्प को दोहराया। वहीं, सूत्रों की मानें तो सरकार कोर्ट को एक मौका देना चाहती है। वैसे भी इस मामले पर सुनवाई के लिए अब नई पीठ बननी है। ऐसे में थोड़ा विलंब हो सकता है।”
“ऐसे में थोड़ा विलम्ब हो सकता है।” से सिद्ध होता है कि रामविलास पासवान और उनके सहयोगियों की 09.08.2018 को भारत बन्द की घोषणा नितांत राजनीति से प्रेरित है। यह भी कि 09.08.2018 का भारत बन्द यदि होता है तो 02.04.2018 को आयोजित बन्द से निम्नतर ही होगा क्योंकि वह आन्दोलन पूरी तरह से एक सामाजिक आन्दोलन था और 09.07.2018 को बुलाया गया भारत बन्द का आयोजन न केवल पूरी तरह राजनीतिक है अपितु इसके वाहक दलित सांसद और दलित संस्थाएं भाजपा को अपनी शक्ति दिखाकर अपनी-अपनी सीटें पक्की करने का उपक्रम कर रहे हैं। अन्यथा 02.04.2018 के भारत बन्द पर इस सांसदों ने कोई टिप्पणी क्यों नहीं की थी? खेद की बात है कि जब ये सांसद 02.04.2018 के आन्दोलन को विपक्षी दलों की साजिश मानकर बैठे हुए थे। आज चिराग पासवान कहते है कि सरकार 09.08.2018 के भारत बन्द को विपक्ष की साजिश न समझे। और जिस जस्टिस गोयल ने एससी/एसटी एक्ट को लेकर फैसला दिया था, उसके खिलाफ दलितों में गोयल को एनजीटी चेयरमैन बनाए जाने को लेकर गुस्सा है और इसको लेकर 9 अगस्त को होने वाला दलितों का विरोध प्रदर्शन 2 अप्रैल से भी ज्यादा आक्रामक होगा।
अब माँग की गई है कि ए. के. गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन पद से तुरंत बर्खास्त किया जाय तथा संसद के इसी मानसून सत्र में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संशोधित बिल लाया जाए, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजातिय की सुरक्षा को फिर से बहाल किया जा सके। अगर इसमें किसी भी तरह की अड़चन आती है, तो संसद के सत्र को 10 अगस्त की जगह आठ अगस्त को समाप्त कर इस पर अध्यादेश लाया जाए। किंतु मेरी नजर में यह कतई भी संभव नहीं है क्योंकि सरकार पहले से ही कोर्ट को और समय देने का मन बना चुकी है।
हाँ! इतना जरूर है कि इस प्रकार की आवाज उठाने वाले ये मानने लग गए है कि लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार बीच मझधार में फंस गई है। इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की चिंता बढ़ गई है। इसकी वजह यह है कि इस मुद्दे पर मोदी सरकार द्वारा किसी भी तरह का कदम ठीक नहीं है, क्योंकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।….. किंतु ऐसा लगता नहीं कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधान सेवक की समाज विरोधी सोच जगजाहिर है। इसलिए  इस प्रकार की चेतावनी का कोई प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा ए. के. गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन पद से हटाने की मांग को मानना भी मोदी सरकार के लिए आसान नहीं है। वह इसलिए क्योंकि अगर सरकार ऐसा करती है, तो यह संदेश जाएगा कि सरकार ने अपने घटक दल के दबाव में आकर ऐसा फैसला लिया है।
सारांशत: मुझे तो लगता है कि मनुवादियों के गुलामों ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिये फिर बहुजनों को क्षणिक लालच की जंजीरे पेश करके न केवल उन्हें मूर्ख बनाने की साजिश है, अपितु अपने राजनीतिक हितों को साधने का एक उपक्रम है। मनुवा गुलामो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर फिर से बहुजनोक ो लालच की जंजीर में फंल नहीं होने देंगे । मनुवादियों के गुलामो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर फिर से बहुजनोक ो लालच की जंजीर में फंसाने का षड्यंत् । इसे सफल नहीं होने देंगे ।
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कचरा बीनने वाले के बेटे का बड़ा कारनामा, जानें क्यों देशभर में है चर्चा

काबिलियत किस तरह गरीबी को पछाड़ कर सफलता हासिल करती है। इसकी जीवंत मिसाल हैं मध्यप्रदेश के देवास जिले के आशाराम चौधरी। आशाराम चौधरी एक कचरा बीनने वाले कामगार के बेटे हैं। और उन्होंने भयंकर गरीबी से जूझते हुए अपने पहले ही प्रयास में एम्स की परीक्षा पास की है। इस परीक्षा में उनकी ओबीसी वर्ग में 141वीं रैंक आई थी। अब उनका चयन जोधपुर के एम्स में हो गया है। यहां वह एमबीबीएस की पढ़ाई करेंगे। आसाराम की सफलता की कहानी सुनने के पहले उनके संघर्ष को जानने की कोशिश करते हैं। देवास जिले के विजयागंज मंडी गांव में आशाराम के पिता की घास-फूस की एक झोपड़ी है, जिसमें न तो शौचालय है और न ही बिजली का कनेक्शन। उनकी मां ममता बाई गृहिणी हैं। छोटा भाई सीताराम नवोदय विद्यालय में 12 वीं की पढ़ाई कर रहा है। और उनकी बहन नर्मदा भी नौवीं कक्षा में पढ़ रही है। घर में कमाई का श्रोत सिर्फ आशाराम के पिता है। ऐसे में गरीबी के इस दबाव का सामना करते हुए आशाराम की सफलता कई लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गई है। उन्होंने अपनी सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए एम्स में चयनित होने पर मैं इतना खुश हूं कि मैं अपनी खुशी को शब्दों में प्रकट नहीं कर सकता हूं। मेरा अगला सपना है कि मैं न्यूरोसर्जन बनूं।’ 4/ 6 आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’  आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’ आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’ आशाराम ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव के एक सरकारी स्कूल में हासिल की है। इसके आगे की पढाई उन्होंने देवास जिले के एक स्कूल से की। गरीबी से जूझने के बावजूद एम्स की परीक्षा पास करने वाले आशाराम ने अपने गरीबी के दिनों से जुड़ी भयावह यादें साझा की। उन्होंने कहा, ‘मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी अच्छी नहीं है। मेरे पिताजी (रणजीत चौधरी) ने पन्नियां, खाली बोतलें और कचरा बीनकर घर का खर्च चलाया और मुझे और मेरे भाई-बहन को पढ़ाया। लेकिन जब मेरा चयन एम्स के लिए हो गया, तो मैंने उनसे कहा कि अब कचरा बीनने का काम मत करो। हम उनके लिए एक छोटी सी सब्जी की दुकान खोलने की योजना बना रहे हैं।’ आशाराम की इस सफलता पर शासन और प्रशासन भी उनकी सहायता कर रहा है। आशाराम का कहना है कि जोधपुर जाने के लिए टिकट का इंतजाम देवास के कलेक्टर ने किया है। उन्होंने एक अधिकारी भी भेजा है जो आशाराम को जोधपुर तक ले जाएगा। आशाराम ने उनका आभार जताया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी आशाराम को बधाई दी है। (साभार-न्यूज18)
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झारखंड में आदिवासी की मौत, पत्नी ने भूख से मरने का दावा किया

रामगढ़ (झारखंड)। झारखंड के रामगढ़ जिले में 40 वर्षीय आदिवासी व्यक्ति की मौत के बाद उनकी पत्नी ने दावा किया कि भूख के चलते उनकी मौत हुई. पत्नी के अनुसार उसके पास राशन कार्ड नहीं था.

आदिम बिरहोर आदिवासी से ताल्लुक रखने वाले राजेंद्र बिरहोर की बीते 24 जुलाई को मांडू खंड के नवाडीह गांव में मौत हो गई. नवाडीह गांव रामगढ़ से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

बहरहाल, जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भूख से मौत होने की बात से इनकार किया है और कहा कि बिरहोर की मौत बीमारी के चलते हुई है.

बिरहोर की पत्नी शांति देवी (35) ने बताया कि उसके पति को पीलिया था और उसके परिवार के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसके लिये डॉक्टर द्वारा बताया गया खाद्य पदार्थ और दवाई खरीद सकें.

शांति ने बताया कि उसके परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था जिससे वे राज्य सरकार की सार्वजनिक वितरण योजना के तहत सब्सिडी वाले अनाज प्राप्त कर पाते.

छह बच्चों के पिता बिरहोर परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे. उन्हें हाल में यहां के राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था. इलाज के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी.

मांडू के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) मनोज कुमार गुप्ता ने आदिवासी व्यक्ति की भूख से मौत की बात से इनकार किया है.

उन्होंने 26 जुलाई को बिरहोर के घर का दौरा किया और दावा किया कि बिरहोर की मौत बीमारी के चलते हुई.

बीडीओ ने स्वीकार किया कि परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था.

उन्होंने शांति देवी को अनाज और परिवार के लिए 10,000 रुपये दिए. उन्होंने कहा, ‘हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि उनके परिवार का नाम सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी युक्त राशन पाने वालों की सूची में क्यों नहीं दर्ज था.’

भोजन का अधिकार अभियान की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि एक वर्ष पहले कमज़ोरी के कारण राजेंद्र बिरहोर काम करना छोड़ दिए थे. उनकी पत्नी को सप्ताह में 2-3 दिनों का ही काम मिल पाता था. पिछले एक साल में परिवार की आमदनी में गिरावट के कारण राजेंद्र बिरहोर, उनकी पत्नी और छह बच्चे पर्याप्त पोषण से वंचित थे. परिवार को मनरेगा में आखरी बार 2010-11 में काम मिला था. उन्हें आदिम जनजातियों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन की 600 रुपये प्रति माह की राशि भी नहीं मिलती है. प्रखंड विकास पदाधिकारी इस योजना के विषय में अवगत भी नहीं थे.

विज्ञप्ति के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया है कि ‘आदिम जनजाति’ समुदाय- जिसका हिस्सा बिरहोर समुदाय है- को अन्त्योदय अन्न योजना अंतर्गत प्रति माह 35 किलो राशन का हक़ है. साथ ही, झारखंड के आदिम जनजाति समुदाय के परिवारों को उनके घर पर नि:शुल्क राशन मिलना है.

साभार-द वायर

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लोकसभा चुनावः सियासी गठजोड़ की कवायद शुरू, शरद पवार ने की मायावती से मुलाकात

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार और बसपा सुप्रीमो मायावती के बीच यहां ” रिश्तों की तल्खी खत्म करने के लिए हुई बैठक से दोनों दलों के बीच गठबंधन होने की संभावना जताई जाने लगी है। पवार ने कल मायावती और उनके निकट सहयोगी सतीश चंद्र मिश्रा से मुलाकात की थी।

बसपा ने हालांकि इस पर चुप्पी साध रखी है लेकिन पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि करीब एक घंटे चली बैठक का उद्देश्य ” रिश्तों की तल्खी खत्म करना था। इससे पहले मायावती ने महाराष्ट्र में राकांपा के साथ गठबंधन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इस बार चीजें अलग थीं और बैठक सकारात्मक रही क्योंकि दोनों दल भाजपा का मुकाबला करने के लिए 2019 चुनावों की तैयारियां कर रहे हैं। रामदास अठावले नीत रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का कांग्रेस – राकांपा के साथ काफी समय तक गठबंधन रहा था और महाराष्ट्र के दलित समुदाय के बीच उनकी अच्छी पहुंच है। आरपीआई अब भाजपा के साथ गठबंधन में है। सूत्रों ने बताया कि बसपा के साथ गठबंधन से राकांपा को महाराष्ट्र और खासकर विदर्भ क्षेत्र में फायदा मिल सकता है।

सभार-हिन्दुस्तान

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भीड़ की सियासत! किस ओर जा रहा है विश्व गुरु।

जब एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति थे जो स्वयं एक प्रख्यात वैज्ञानिक भी रहे हैं और जो मिसाइल मैन के नाम से विख्यात थे,उन्होंने विजन 2020 किताब के माध्यम से भारत को सन् 2020 तक एक महा शक्ति बनाने का सपना देखा था।महाशक्ति केवल परमाणु अस्त्रों या मिसाइल बनाकर,या शैन्य शक्ति को मजबूत बनाकर ही नहीं वरन भारत की उन तमाम समस्याओं से पार पाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की ,विकाशसील भारत नहीं वरन विकसित भारत बनाने की कल्पना की थी।जिन विकट समस्याओं से देश आजादी से पूर्व तथा आजादी के 70 सालों तक जूझ रहा है।“भ ”से भजन और भगवान का पाठ पढने वाले देश में आज भ से भीड हिसा़ पर व्यापक चिंता हो रही है और चर्चा भी हो रही है।इस भीड़ तंत्र के शोर-शराबे में भूख से मरने वाले इंसानों की कोई चीत्कार सुनाई नहीं देती है।

भीड़ भी देश की है और मरने वाले भी देश के ये अजीब किस्म का नजारा देश में अशांति फैलाने का काम कर रहा है।गॉंधी जी ने कहा है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं।हमको मॉंब लिचिंग पर शक्त कानून तो अवश्य ही बनाना चाहिएं मगर किसी भी घटना के घटित होने के पीछे कुछ न कुछ कारण और कारक जरुर होते हैं उनको भी जानान आवश्यक हो जाता है।जिस प्रकार अलग-अलग वायरस कंप्यूटरों पर अटैक कर उनको खराब कर देता है उसी प्रकार हिंदूस्तान में भी तीन प्रकार के वायरस सक्रिय हैं-पहला अंधविश्वास का वायरस,दूसरा धर्म तथा जातिवाद का वायरस और तीसरा राजनीति का वायरस। जिस प्रकार देश में भीड़ द्धारा या अन्य कारणों से हिंसा होती है उन हिंसाओं के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से ये कारण छुपे होते हैं।और ये सभ्य और सुशिक्षित समाज के आंखों में पटटी बांध देते है।सिर्फ कानून बनाकर ही बुराइयों और समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता इसके कई उदाहरण हमारे पास है

यहॉं तक की संपत्ति रखने का अधिकार भी मूल अधिकार की श्रेणी से 42वें संविधान संशोधन द्धारा हटाया गया है मगर आज देश में पूॅंजी पतियों तथा पूॅंजीरहित लोगों के बीच में कितना लंबा फासला है किसी से छुपा नहीं है।अस्पृश्यता निवारण के लिए भी शख्त कानून है,दहेज उत्पीड़न के लिए भी शख्त कानून है,मगर इन कानूनों के बावजूद भी घटनायें लगातार घट रही है।यहॉं तक की हमारे पास शिक्षा का अधिकार कानून भी है मगर शत-प्रतिशत शिक्षित भारत अभी तक नहीं बन पाया है।विजन 2020 के बाद सन् 2025 तक भारत को विश्व गुरु बनाने का भी सपना हमने देखा है।इस कडी़ में प्रधानमंत्री मोदी जी ने मोर्चा संभाला है और इलेक्टा्रनिक समाज और डिजिटल भारत के निर्माण की ओर पहल की है।जिसमें डिजिटल इंडिया को प्रमुखता दी है।लड़खडाते गरीब के कदमों ,दम तोड़ रहे किसानों और करोडों़ बेरोजगारों की फौज के बावजूद भी देश स्मार्ट सिटि में तब्दील होने को है।

बुलेट ट्रेन देर सबेर देश में दौडने वाली है और मेकइन इंडिया से से भारत यांत्रिकी में अग्रसर होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है।ये सभी कदम और योजनायें वास्तव में भारत को विश्व गुरु बनाने में अवश्य ही मील का पत्थर साबित हो सकते थे।मगर आजकल देश में कुछ और ही नजारा दिख रहा है।जहॉं हमको न्यूइंडिया की नींव को मजबूत करना था वहॉं हिंदू और मुसलमान की नींव को और गहरा किया जा रहा है।जहॉं हमको समतामूलक समाज की नींव को मजबूत करना था जातियों को मजबूत किया जा रहा हैं।पहले ही भ्रमित और अंधविश्वास से लोग जकडे़ हुए हैं।कभी किसी को डायन का रुप बताकर मार दिया जाता है।,हाल ही दिल्ली में एक ही परिवार के 11 लोगों का अंधविश्वास के कारण आत्म हत्या कर लेना ताजा उदाहरण है।लगता है देश के लोग मृग मरीचिका का शिकार होने लगे हैं।जिस प्रकार रेगिस्तान के जानवर रेत के ढेर को पानी का तालाब समझ बैठते हैं और उसकी ओर तेजी से भागने लगते हैं।

भीड़ की इस मरीचिका को सिर्फ कानून बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता है हॉं कुछ कमी जरुर लायी जा सकती है। आज जरुरत है अंधविश्वास पर चोट करने की,वैज्ञानिक सोच पैदा करने की,जाति,संप्रदाय से उठ कर सत्यम् शिवम सुन्दरम् और बशुधैव कुटंबकम् की भावना को विकसित करना होगा।हमको स्मरण करना होगा कि हिन्दुस्तान हमेशा इतिहास का केन्द्र विन्दु रहा है।तथा प्रसिद्ध विद्धान और प्राचीन इतिहासकार मैक्समूलर के इन शब्दों को स्मरण करना चाहिए-मैक्समूलर ने 1882 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में व्याखान दिया जिसमें उन्होंने भारत की इन शब्दों में प्रशंसा की है-”अगर हम सारी दुनियॉं की खोज करें ऐसे मुल्क का पता लगाने के लिए कि जिसे प्रकृति ने सबसे संपन्न,शक्तिवाला और सुन्दर बनाया है-जो कुछ हिस्सों में धरती पर स्वर्ग की तरह है-तो मैं हिन्दुस्तान की तरफ इसारा करुंगा“। आई0 पी0 हृयूमन

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‘सैराट’ जैसी सफल क्यों नहीं हो पाई ‘धड़क’

नई दिल्ली। पिछले शुक्रवार को फिल्म धड़क रिलिज हुई थी. यह फिल्म मराठी फिल्म सैराट का हिन्दी रि-मेक थी. जाह्नवी कपूर और ईशान खट्टर की फिल्म ‘धड़क’ का कलेक्शन देखकर इतना जरूर कह सकते हैं कि ‘धड़क’ कमाई के मामले में फेल हो गई. ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि फिल्म ‘सैराट’ की तरह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ेगी लेकिन इस फिल्म का बजट निकालना भी मुश्किल हो गया है.

‘धड़क’ ने बॉक्स ऑफिस पर पहले दिन धमाकेदार ओपनिंग की थी लेकिन वीकेंड के बाद से इस फिल्म के कलेक्शन में जबरदस्त गिरावट हुई. शुक्रवार को रिलिज होने के दिन से बुधवार तक का कलेक्शन देखा जाए तो ‘धड़क’ अब तक सिर्फ 47.35 करोड़ का बिजनेस कर पाई है, जबकि फिल्म का बजट 50 करोड़ है. तो वहीं ‘सैराट’ फिल्म का बजट महज 4 करोड़ था लेकिन फिल्म ने 100 करोड़ का बिजनेस किया था. इसके बाद यह साफ हो गया है कि जाह्नवी की ‘धड़क’ सैराट की तरह जादू चलाने में सफल नहीं हो पाई है.

सैराट 2016 में आई मराठी फिल्म थी. मराठी फिल्म इतिहास की अब तक की सबसे सफल फिल्म होने का खिताब इस फिल्म को हासिल है. मराठी में पहली बार किसी फिल्म ने 100 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया. फिल्म के दोनों किरदार और गाने लोगों की जबान पर चढ़ गए. इस फिल्म के लिए निर्देशक नागराज मुंजाले को कई अवार्ड भी मिले.

इस कामयाबी को भुनाने के लिए हिन्दी में धड़क बनाई गई. संगीत का जिम्मा अजय-अतुल की उसी जोड़ी ने संभाला, जिन्होंने सैराट की धुनों से पूरे महाराष्ट्र को भिगो दिया था. दो बड़े स्टार परिवारों से इस फिल्म के कैरेक्टर उठाए गए. दोनों फिल्मों की कहानी और कैरेक्टर कमोबेश एक सा रहा. सवाल है कि आखिर इन सब के बावजूद धड़क, फिल्म सैराट जैसा जादू क्यों नहीं पैदा कर पाई?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इसके कारण गिनाते हुए क्विंट हिन्दी के लिए एक आर्टिकल लिखा है, जिससे यह साफ होता है कि फिल्म सैराट का हिन्दी रिमेक क्यों उतना सफल नहीं हो पाया, जितनी की उम्मीद की जा रही थी. आइए डालते हैं एक नजर आखिर दोनों फिल्मों में क्या फर्क है.

1. सबसे पहला फर्क निर्देश को लेकर है. असल में धड़क फिल्म के निर्देशक शशांक खेतान और सैराट के नागराज मंजुले दोनों के फिल्म की कहानी को देखने का नजरिया अलग है.

नागराज मंजुले महाराष्ट्र के एक दलित परिवार में जन्मे फिल्मकार हैं. जाति उनके लिए कोई किताबी चीज नहीं है. जाति को उन्होंने अपने आसपास देखा और झेला है. इसलिए जाति भेद के कारण होने वाली ऑनर किलिंग को वे वहां से देख पाए हैं, जो किसी और लोकेशन से देख पाना संभव नहीं है.

शशांक कोलकाता के एक मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े फिल्मकार हैं. उन्होंने फिल्म में ईमानदार रहने की कोशिश की है. नागराज मंजुले को ऐसी कोई कोशिश नहीं करनी पड़ी.

2. दोनों फिल्मों में जो दूसरा अंतर है, वो दोनों फिल्मों के बीच बड़ा गैप पैदा कर देता है. फिल्म धड़क से जाति का सवाल गायब, जबकि सैराट इस सवाल से टकराती है.

अगर धड़क में हीरो के पिता यह एक डायलॉग न बोलते कि “वे लोग ऊंची जाति वाले हैं, उस लड़की से दूर रहो” तो पता भी न चलता कि हीरो नीची जाति का है या कि यह ऑनर किलिंग पर बनी फिल्म है. इस डायलॉग को छोड़ दें तो फिल्म अमीर लड़की और मिडिल क्लास लड़के की प्रेम कहानी है. पूरी फिल्म जाति से मुंह चुराकर चलती है.

दूसरी ओर सैराट में हीरो अपने पिता के साथ मछलियां पकड़ता है. गांव के बाहर की दलित बस्ती में उसका मकान है. उसके माता-पिता उसकी दलित जाति का उसे एहसास कराते हैं. हीरोइन उसके घर आकर पानी पी लेती है, तो यह एक दर्ज करने लायक बात बन जाती है.

यहां तक कि गांव की पंचायत में भी हीरो का पिता अपनी दलित होने की बेचारगी को जताता है. हीरो और हीरोइन जब गांव छोड़कर भागते हैं तो शहर में एक दलित बस्ती में वे ठहरते हैं. वहां बौद्ध पंचशील का झंडा बैकग्राउंड में है, जो यह बताता है कि वे कहां हैं. हीरोइन का मराठा होना भी साफ नजर आता है.

3. सैराट बारीकियों में चलती है, कमजोरों के साथ खड़ी होती है

सैराट में हीरो के दो दोस्त हैं. एक मुसलमान है और दूसरा शारीरिक रूप से कमजोर. एक चूड़ी बेचने वाले का बेटा है तो एक मोटर मैकेनिक. यहां फिल्म के लेखक और डायरेक्टर नागराज मंजुले की सामाजिक दृष्टि साफ नजर आती है. ये दोस्त हास्य पैदा करते हैं, लेकिन समाज के विस्तार और उसकी पीड़ाओं को भी दिखाते हैं. धड़क इन बारीकियों में जाने से कतरा जाती है.

4. क्लासरूम सीन में भी सैराट ने धड़क से बाजी मार ली है

सैराट में जब हीरोइन का दबंग भाई क्लास में आता है और मास्टर को थप्पड़ मारता है तो डॉयरेक्टर इशारों में बता देता है कि मास्टर दलित है. वह क्लास में इंग्लिश साहित्य पढ़ाते हुए दलित पैंथर आंदोलन के कवि के बारे में बताता है. धड़क का डायरेक्टर ऐसी कोई जहमत नहीं उठाता, बल्कि शिक्षक का नाम अग्निहोत्री बताकर वह पूरे सीन को कमजोर कर देता है. अग्निहोत्री की एक ठाकुर लड़कों के हाथ से पिटाई में वह ताप नहीं है जो एक मराठा दबंग द्वारा एक दलित शिक्षक पर हाथ उठाने में है, वह भी तब जब वह शिक्षक दलित चेतना के कवि को पढ़ा रहा हो.

5. अंतिम सीन में धड़क, सैराट से काफी कमजोर पड़ जाती है

सैराट के अंत में हीरोइन के परिवार वाले लड़का-लड़की दोनों को मार देते हैं. धड़क में डायरेक्टर हीरोइन को बचा लेता है. यह ऑनर किलिंग का तरीका नहीं है. ऑनर किलिंग में अक्सर देखा गया है कि परिवार वाले लड़की को नहीं छोड़ते. खासकर तब जब उसने अपने से नीच जाति के लड़के के साथ प्रेम या शादी की है.

ऑनर किलिंग करने के पीछे परिवार और जाति की इज्जत जाने का एक भाव होता है और जाति गौरव दोबारा हासिल करने के लिए और दोबारा ऐसी घटना न हो, ऐसा सबक बाकी लड़कियों को देने के लिए, लड़कियों की हत्या की जाती है. इस बात को वो लोग नहीं समझ पाते, जिन्होंने जाति को सिर्फ किताबों में पढ़ा है.

एक और बात दोनों फिल्मों को काफी अलग करती है. धड़क दो फिल्मी परिवारों की अगली पीढ़ी का लॉन्च पैड है, वहीं सैराट के हीरो और हीरोइन दोनों दलित परिवारों से हैं. उनका कोई फिल्मी अतीत नहीं है. उनका इस फिल्म में होना सिर्फ नागराज मंजुले की दृष्टि की वजह से है.

इसके अलावा फिल्म के लिए शहरों का चुनाव, सेट और लोकेशन भी दोनों फिल्मों को अलग बनाती है. सैराट के शहर, सेट और लोकेशन फिल्म को सपोर्ट करते हैं, धड़क में ऐसा नहीं होता. दिलीप मंडल के शब्दों में, धड़क लगातार इस बात का ध्यान रखती है कि दर्शकों को कोई गंदी या आंखों को चुभने वाली चीज न दिखाई जाए. सैराट एक ईमानदार फिल्म है. धड़क के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती.

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