मॉब लिंचिंग पर बसपा प्रमुख मायावती का बड़ा बयान

फाइल फोटो

नई दिल्ली। मॉब लिंचिंग की आए दिन हो रही घटनाओं पर बसपा प्रमुख मायावती ने केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. मायावती ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए संसद के इसी सत्र में इसके खिलाफ कानून बनाने की मांग की है. पार्टी की ओर से जारी अपने बयान में बसपा प्रमुख ने कहा है कि हिंसक भीड़ द्वारा निर्दोषों की हत्या की खुली छूट दे दी गई है, जिससे देश का लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में बदल गया है. अपने बयान में यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने देश भर में दलितों, पिछड़ों और आदिवासी समाज के लोगों पर बढ़ते अत्याचार का भी मुद्दा उठाया.

बसपा प्रमुख ने गोरक्षा के नाम पर राजस्थान के अलवर में हुई मॉब लिंचिंग की घटना की निंदा की है. उन्होंने इस मामले में केंद्र और राजस्थान की सरकार से कड़ी कार्रवई करने की मांग की. इस तरह की घटनाओं पर भाजपा नेताओं के विवादित बयान और ऐसे मामले में ज्यादातर भाजपा के घोषित कार्यकर्ताओं के शामिल होने पर भी बसपा प्रमुख ने भाजपा को कठघरे में खड़ा किया. मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर भाजपा नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि इसका साफ मतलब है कि ऐसी घटनाओं को भाजपा नेताओं का समर्थन है.

बसपा प्रमुख ने कहा कि “देश की आमजनता को इस बारे में सोचना होगा कि वे ऐसी संकीर्ण व ग़लत सोच के आधार पर काम करने वाली सरकार को क्यों चुने जिसमें किसी का भी जान-माल, मज़हब और साथ ही देशहित कुछ भी क़तई सुरक्षित नहीं है. इस मामले में उन्होंने बी.एस.पी. के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की उस बात को भी याद किया कि वर्तमान हालातों में अपने देश में ‘मज़बूत’ नहीं बल्कि ‘मजबूर’सरकार की ज़रूरत है. ताकि उस पर जनहित और देशहित में लगातार काम करते रहने के लिए तलवार लटकी रहे और वह निरंकुश व तानाशाही का व्यवहार नहीं कर सके जैसा कि ख़ासकर आजकल बीजेपी के वर्तमान शासनकाल में देखने को मिल रहा है.”

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तेजिंदर गगन का जाना

वरिष्ठ पत्रकार  प्रभाकर चौबे के दिवंगत होने की खबर का अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था की खबर आई, तेजिंदर गगन नहीं रहे. मुझे याद है तेजिंदर गगन से मेरी पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी. वह एक राज्य संसाधन केंद्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम था. जिसमें वह बतौर साथी वक्ता पहुंचे थे. वहां एक महिला वक्ता ने अपने वक्तव्य के दौरान महिलाओं को दोयम दर्जे में रखे जाने की वकालत कर रही थी और सारे श्रोतागण स्तब्ध होकर सुन रहे थे. वह महिला किसी कॉलेज में प्रोफेसर थी मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा है.

लेकिन जैसे ही तेजिंदर गगन के अपने वक्तव्य देने की बारी आई तो उन्होंने अपने वक्तव्य के प्रारंभ में ही कहा कि मेरी 62 साल की आयु में पहली बार किसी महिला को इस तरह के वक्तव्य देते हुए देखा है. यह एक दुर्भाग्य है की आज भी सार्वजनिक तौर पर ऐसी बातें कही जा रही है. वह भी एक महिला के द्वारा. उन्होंने बड़ी विनम्रता से अपनी बात को रखा. मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ इस प्रकार उनसे मेरा मिलने जुलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया.

प्रसंगवश बताना जरूरी है कि वे दूरदर्शन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे. तेजिंदरजी ने देशबंधु से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में वे बैंक पदस्‍थ रहे और फिर आकाशवाणी और दूरदर्शन में लंबे समय तक कार्यरत रहे. इस दौरान उन्होंने रायपुर, अंबिकापुर, संबलपुर, नागपुर, देहरादून, चैन्नई व अहमदाबाद केंद्रों में अपनी सेवाएं दीं. उनके उपन्यास काला पादरी, डायरी सागा सागा, सीढ़ियों पर चीता इत्यादि बहुचर्चित हुए.

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अनटोल्ड नाम की एक अंग्रेजी पत्रिका प्रकाशित कर रहे थे. जो वेबसाइट में भी उपलब्ध है. वे इस पत्रिका में वंचित समुदाय के दुख दर्द को पर्याप्त स्थान देते थे. वह रायपुर में तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय थे और लगभग हर कार्यक्रम में दिखाई पड़ते थे. उनकी बेहद सरल ढंग से अपनी बात रखने की शैली ने पाठकों और दर्शकों को प्रभावित कर रखा था. वे बहुत बड़ी बड़ी बातों को भी बहुत ही सहजता से बोलते थे.

हाल ही में उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन छत्तीसगढ़ की ओर से सप्तपर्णी सम्मान से नवाजा गया था इसी सम्मान की श्रृंखला में इन पंक्तियों के लेखक को पुनर्नवा पुरस्कार से नवाजा गया. मुझे बेहद गर्व था कि उनके साथ मुझे भी सम्मानित किया गया. क्योंकि वह एक सुप्रसिध्‍द उपन्यासकार थे .

उन्हें उनके उपन्यास काला पादरी के लिए बेहद प्रसिद्धि मिली. काला पादरी समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है. ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है. ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है. अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मे शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है. ‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है. निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है.

 वह कविताएं निबंध भी लिखा करते थे उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों पर चोट तथा प्रगतिशीलता की झलक मिलती थी. फिलहाल वे संस्मरण लिख रहे थे और मुझे बताया था कि कुछ संस्मरण वे प्रकाशन के लिए भी भेज रहे हैं. इसे किताब के रूप में प्रकाशित करने की योजना भी है. गौरतलब है कि मासिक पत्रिका हंस में भी उनके संस्‍मरण प्रकाशित हुये है.

वे अक्‍सर कहा करते थी की उन्‍हे वामपंथ एवं अंबेडकरवाद की समझ उनके नागपुर पदस्‍थापना के दौरान हुई. वे चीजों को बहुत ही गहराई से देखते थे. अपने किसी भी वकतव्‍य में इस बात का बखूबी ख्‍याल रखते की किसी को बुरा न लगे. इसलिए वे विनम्रता से अपनी बात रखते थे. मेरी उनके साथ पत्रिका अनटोल्‍ड के प्रकाशन के संबंध में कई बार सम्‍पर्क हुआ लेकिन कई कारणों से पत्रिका का सतत प्रकाशन नही हो पाया. उनका जाना साहित्‍य के लिए अपूर्णीय क्षति जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है.

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अठावले का मोदी चालीसा

20 जुलाई को जब लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आया था और राहुल गांधी का पीएम मोदी को झप्पी देना खबरों की सुर्खियां थी, एक नेता ने सदन में सबका खूब मनोजरंजन किया. वो नेता आरपीआई के रामदास अठावले थे. अठावले सदन में मोदी चालीसा पढ़ रहे हैं, और सदन में बैठे बाकी लोग कैसे हंस रहे हैं. दरअसल ये लोग अठावले की चालीसा पर नहीं बल्कि उन्हीं पर हंस रहे हैं.

रामदास अठावले का ताल्लुक महाराष्ट्र से है. एक वक्त में वो दलित पैंथर से जुड़े रहे, फिर अपनी पार्टी बनाई. वह महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य भी रहे हैं और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी. अठावले लोकसभा के सांसद भी रहे हैं. अठावले की खासियत यह है कि वह सत्ता और सदन में बने रहने के लिए छटपटाते रहते हैं. अपनी इस चाहत को किसी भी शर्त पर पूरा करने को अमादा अठावले इसके लिए कभी कांग्रेस के पाले में जाते हैं तो कभी शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के.

2009 में हुए लोकसभा चुनाव में अठावले लोकसभा में नहीं पहुंच सके. इस बीच उनके लिए सत्ता से दूर रहना मुश्किल हो गया, सो उन्होंने राज्यसभा जाने का तरीका ढूंढ़ निकाला. 2014 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में दलित वोटों को अपने पाले लाने के लिए भाजपा को एक दलित चेहरे की जरूरत थी. भाजपा के पास प्रदेश में कोई बड़ा दलित चेहरा नहीं था. फिर क्या था, अठावले की लॉटरी लग गई.

भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया. भाजपा और मोदी जी की कृपा से अठावले राज्यसभा के सांसद और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं. इस दौरान उनका एकमात्र काम हर बात पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती पर सवाल उठाना भर है. जाहिर है उन्हें यही काम सौंपा गया होगा. जाहिर है वो पीएम मोदी का चालीसा गाएंगे ही.

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झारखंडः गैंग रेप का मास्टरमाइंड और पत्थलगाड़ी नेता अरेस्ट

रांची। खूंटी जिले के अड़की स्थित कोचांग गांव में नुक्कड़ नाटक करने गई पांच युवतियों के साथ गैंग रेप का मास्टमाइंड व पत्थगड़ी समर्थक नेता जान तोनास तिडू और बलराम समद को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. पुलिस ने जोनास तिडू को जमशेदपुर के हाता चौक बस स्टैड से पकड़ा है. वहीं बलराम समद को खूंटी जिले के जीवनटोला से अरेस्ट किया गया है. आईजी नवीन कुमार ने बताया कि खूंटी गैंग रेप की घटना के बाद एसआईटी का गठन किया गया था. एसआईटी लगातार छापेमारी कर रही थी. पुलिस के दबाव के बाद दोनों महाराष्ट्र भागने का प्रयास कर रहे थे. दोनों किसी वाहन से चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन पहुंचने की योजना में थे. इस बात की सूचना मिलने के बाद जमशेदपुर के सीनियर एसपी अनूप बिरथरे, खूंटी एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा सहित कई अधिकारियों के नेतृत्व में अलग-अलग टीम का गठन किया गया. टीम ने दोनों को पकड़ लिया. आईजी ने बताया, पूछताछ में जानास तिडू और बलराम समद ने स्वीकार किया है कि वे संविधान की गलत व्याख्या कर खूंटी जिले के कई गांवों में आम जनता को बहला -फुसला कर पत्थलगड़ी कराते थे. पीएलएफआई के एरिया कमांडर रहे बाजी समद उर्फ टकला, जुनास मुंडू और अन्य को उकसा कर कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने पहुंची युवतियों के साथ गैग रेप कराया. गैंग रेप के पुलिस अब तक सात आरोपियों को अरेस्ट कर चुकी है. गौरतलब है कि खूंटी जिले के अड़की के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गयी मंडली की पांच युवतियों के साथ 19 जून को गैंग रेप किया गया था. पुलिस की जांच में यह बात सामने आई थी कि जान जोनास तिडू ने ही पीएलएफआई के बाजी समद को उकसा कर गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया था.

  • रिपोर्ट- रणजीत कुमार, रांची

जानिए, बसपा की महाबैठक में किसको मिला कौन सा पद

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए. शनिवार 21 जुलाई को हुई पार्टी की बैठक शाम 7 बजे शुरू हुई जो रात तकरीबन 10.30 तक चली. इस दौरान लिए गए अहम फैसले में जयप्रकाश सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. इसके अलावे दिल्ली और राजस्थान में भी बदलाव किया गया है. बैठक में बड़ा फैसला लेते हुए बसपा प्रमुख मायावती ने रामजी गौतम को पार्टी का नया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. रामजी गौतम उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के रहने वाले हैं.

दिल्ली के प्रभारी धर्मवीर अशोक को यहां से हटा दिया गया है, जबकि जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार को पार्टी में को-आर्डिनेटर बना दिया गया है. इसके अलावे बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर एड. वीर सिंह को भी उनके पद से हटा दिया गया है. उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के पद से भी हटा दिया गया है. धर्मवीर अशोक को जयप्रकाश सिंह के कारण बतौर सजा पद ले लिया गया है. क्योंकि धर्मवीर अशोक ने जयप्रकाश सिंह को पार्टी में आगे बढ़ाया था, जबकि एड. वीर सिंह तमाम कार्यक्रमों में जयप्रकाश सिंह के साथ मौजूद रहने के बावजूद उनके आचरण के बारे में पार्टी अध्यक्ष को नहीं बताया था.

राजस्थान में दो नए प्रभारी बनाए गए हैं. ये दोनों मुनकाद अली और सुरेश आर्य हैं. ये दोनों प्रदेश में धर्मवीर अशोक के साथ मिलकर काम करेंगे.

बसपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अहम फैसला

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 21 जुलाई को दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय पर हुई. इस दौरान देश भर से तकरीबन 300 कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे. इस दौरान बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती की ओर से विज्ञप्ति जारी किया गया. बैठक की महत्वपूर्ण बात यह रही कि राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर पद से हटाए गए जयप्रकाश सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. तो कार्यकर्ताओं को और भी कई निर्देश दिए गए. हम यहां पार्टी की ओर से जारी विज्ञप्ति को दे रहे हैं.

बसपा अम्बेडकरवादी विचारधारा वाली सर्वसमाज की पार्टी बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने पार्टी की अखिल भारतीय बैठक को आज यहाँ सम्बोधित करते हुये कहा कि बी.एस.पी. अम्बेडकरवादी विचारधारा वाली सर्वसमाज की पार्टी है तथा उन्हीं के आदर्शों व मूल्यों के बल पर आगे बढ़ते हुये भारत की राजनीति में ख़ास व महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने एवं उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में सफल हुई है तथा इसमें (बी.एस.पी.) परिवारवाद, जातिवाद व साम्प्रदायिकता के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत लांछन, छींटाकशी व विद्वेष आदि का कोई स्थान नहीं है. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसी अनुशासनहीनता को ना तो पहले कभी बर्दाश्त किया है और ना ही आगे कभी इसे सहन किया जायेगा और इसी क्रम में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व नेशनल कोर्डिनेटर श्री जयप्रकाश सिंह को उनके सभी पार्टी पदों से हटा दिया गया है और अब आज पार्टी से भी निकाल दिया गया है, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर आक्षेप करते हुये उन्हें ’’गब्बर सिंह’’ कहा था तथा कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी के बारे में भी काफी व्यक्तिगत आक्षेप व अनर्गल बयानबाज़ी की थी.

भाजपा को सत्ता से हटा कर दम लेंगे ख़ासकर ऐसे मामलों में बी.एस.पी. को सत्ताधारी बीजेपी पार्टी कतई नहीं बनने देना है जो कि सत्ता की लालच व अहंकार में आकर मर्यादाओं की हर सीमा को लांघने में लगी हुई है तथा उनके नेताओं को इसकी कोई परवाह भी नहीं जगती है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा व विधानसभा के चुनाव के दौरान् तो खासकर बी.एस.पी. के लोगों को खून के घूंट पी कर रहना पड़ा था फिर भी पार्टी ने अपना संयम बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयास किया था. देश जानता है कि जातिवादी तत्वों ने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के साथ भी ऐसा ही बर्ताव हमेशा किया था परन्तु वे कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से विचलित नहीं हुये.

बसपा का लक्ष्य सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति सुश्री मायावती जी ने अपने सम्बोधन में बी.एस.पी. ’’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’के महान लक्ष्य को लेकर चलने वाली एक अनुशासन-प्रिय पार्टी है और इसीलिए पार्टी के विरोधी भी बी.एस.पी. व उसके नेतृत्व के बारे में कुछ भी बोलने के पहले कई बार सोचते हैं और अगर कोई नेता अपनी सीमा लांघता है, तो वह जनता की नजर में अपनी इज़्ज़त ख़ुद गवाँता है. आज भी हर स्तर पर ख़ासकर बीजेपी के नेताओं द्वारा बार-बार बी.एस.पी. को उत्तेजित करने का प्रयास किया जाता है लेकिन हमारी पार्टी ने पूरा संयम बरता और बिना विचलित हुये आगे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने का प्रयास किया है.

वैसे भी यह सर्वविदित है कि बी.एस.पी. की नीति व सिद्धान्त अमूल्य संविधान, कानून व मानवीयता पर आधारित है और इसलिये इसका संकल्प ’’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’में निहित है जो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की संवैधानिक सोच पर पूर्णतः आधारित है. इस संकल्प को प्राप्त करने के क्रम में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की तरह ही बी.एस.पी. ने भी कई बार अनेकों प्रकार के धोखे खाये हैं फिर भी अपनी नीतियों व सिद्धान्तों के लिये अनेकों प्रकार की कुर्बानियाँ देने से पीछे नहीं हटी है और इस क्रम में बी.एस.पी. मूवमेन्ट ने कभी भी किसी के ख़िलाफ व्यक्तिगत लांछन व विद्वेष से अपने आपको दूर रखने का प्रयास किया है हालाँकि समय-समय पर पार्टी को जैसे को तैसा मुँहतोड़ राजनीतिक जवाब भी देना पड़ा है परन्तु वह भी मर्यादा में रहते हुये.

इसके साथ ही आज के दूषित राजनीति वातावरण में जहाँ ख़ासकर सत्ताधारी बीजेपी व उसका शीर्ष नेतृत्व भी राजनीतिक द्वेष व लांछन वाली राजनीतिक बयानबाज़ी के निचले स्तर पर नज़र आता है, तो ऐसे ख़राब माहौल में भी बी.एस.पी. के शीर्ष नेतृत्व की तरह पार्टी के सभी छोटे-बड़े पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को अपना संयम व धैर्य कभी नहीं खोना है तथा पूरी शालीनता के साथ व्यवहार करते हुये पार्टी अनुशासन से अपने आपको बांधे रखना है. पार्टी की प्रतिष्ठा व सफलता की यह कुंजी है. हमें सेना की तरह अनुशासन से बंधे रहना है, जो कि बी.एस.पी. की असली पहचान भी है.

बसपा कैडर आधारित पार्टी उन्होंने कहा कि बी.एस.पी. एक कैडर-आधारित पार्टी है और कैडर जनसभाओं की तरह खुले में नहीं बल्कि बन्द जगह पर आयोजित की जाती है क्योंकि कैडर में पार्टी की नीतियों व सिद्धान्तों को सामने रखकर विचारों के बल पर सर्वसमाज को जोड़ने का काम किया जाता है. वैसे भी बी.एस.पी. देश के ग़रीबों, मज़दूरों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों व अन्य शोषितों-पीड़ितों के हितों के लिये संघर्ष करने वाली पार्टी है तथा पार्टी के कार्यक्रमों के आयोजनों पर बड़े-बड़े पूँजीपतियों व धन्नासेठों की पार्टी बीजेपी आदि की तरह पानी की तरह धन खर्च नहीं कर सकती है. बीजेपी की अपनी करनी के कारण भी इसकी केन्द्र व राज्य सरकारों की लोकप्रियता तेजी से गिर रही है परन्तु रूपया के मूल्य का तेजी से नीचे गिरते रहना देश के लिये अति-चिन्ता की बात.

भाजपा बसपा से परेशान है सुश्री मायावती जी ने कहा कि जनता की नजर में बीजेपी जनहित, जनकल्याण व देशहित आदि के विरूद्ध एक जनविरोधी निरंकुश पार्टी व सरकार बनकर उभरी है. इसलिये उसको सत्ता से यथासंभव दूर रखना अब ज़रूरी हो गया है और जिसके लिये ही विभिन्न राज्यों में विभिन्न पार्टियों से चुनावी गठबंधन या समझौता करने की नीति पर अमल किया जा रहा है. कर्नाटक में इसके अच्छे परिणाम निकले हैं तथा हरियाणा में भी बी.एस.पी.-इण्डियन नेशनल लोकदल गठबंधन तेजी से अपनी राजनीतिक पैठ बना रहा है, जिससे बीजेपी काफी ज़्यादा परेशान है.

भाजपा विरोधी रणनीति बनाएगी बसपा आने वाले विधानसभा व लोकसभा आमचुनावों के बारे में बी.एस.पी. को अपनी कारगर बीजेपी सरकार-विरोधी रणनीति बनानी है जिसके सम्बन्ध में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बी.एस.पी. मूवमेन्ट के भविष्य के साथ-साथ देश के व्यापक राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक भविष्य को ध्यान में रखकर फैसले करेगा और जब मामला परिपक्व होगा तो उसकी सार्वजनिक घोषणा अवश्य ही की जायेगी.

गठबंधन और नीतियों पर बात न करें पदाधिकारी इस सम्बंध में किसी भी स्तर के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को किसी भी प्रकार की टिप्पणी पार्टी हित के विरूद्ध व अनुशासनहीनता मानी जायेगी, जो पार्टी कभी भी गवारा नहीं करेगी अर्थात चुनावी गठबंधन या समझौता के सम्बंध में सर्वाधिकार पार्टी हाईकमान के पास सुरक्षित है, जिसका सम्मान आवश्यक है.

गोपालदास नीरज, जिनकी कविता में शराब से ज़्यादा नशा था

”इस द्वार क्यों न जाऊं, उस द्वार क्यों न जाऊं घर पा गया तुम्हारा मैं घर बदल-बदल के हर घाट जल पिया है, गागर बदल बदल के” तब फ्लाईओवरों की दिल्ली अपनी प्रक्रिया में थी. साल 2008 था शायद, जब राजधानी के व्यस्त ट्रैफिक में फंसी एक कार में प्रभाष जोशी ने अपना पसंदीदा पद्य मुझसे साझा किया था. नीरज किसे प्रिय नहीं रहे होंगे, लेकिन इसके बाद मेरी पसंद पर जैसे एक मुहर लग गई. अपने हीरो पत्रकार को जो कवि पसंद है, वही अपन को पसंद है. खटैक.

गोपालदास नीरज से मुलाक़ातें मैं उंगलियों पर गिन सकता हूं. पर हर बार उन्हीं की भाषा में कहूं तो मिलकर यही लगा कि कितनी अतृप्ति है. बाद के दिनों में पत्रकारों से बात करने का कोई मोह उन्हें नहीं रह गया था. फालतू सवालों पर झिड़क भी देते थे. लेकिन कोई दिलचस्प श्रोता मिल जाए जो जीवन दर्शन पर कोई अनूठी बात कह दे तो उससे देर तक बात कर लेते थे. एक बार जब साथी पत्रकार उनसे जीवन के संघर्षों और फिल्मी अनुभवों पर बात कर रहे थे तो मैंने हाइकू के बारे में पूछा. हाइकू बड़ी मुश्किल विधा थी, पर ज़िद्दी नीरज उसमें भी हाथ आज़मा रहे थे. मेरा सवाल शायद उन्हें ठीक लगा. फिर सवालों को निपटाना बंद करके जवाब देने लगे. मैंने उनसे पूछा कि नए लिखने वालों में कौन पसंद है तो बोले- ज़्यादा सुन नहीं पाता पर गुलज़ार अच्छा लिख रहे हैं. बाद में गुलज़ार ने भी हाइकू लिखे. जो लोग नीरज के ज़िक्र के साथ शराब का क़िस्सा छेड़ते हैं वो भी जानते हैं कि नीरज की कविता में शराब से ज्यादा नशा था जो उतरने का नाम नहीं लेता.

मेरी भाषा प्रेम की भाषा है’

मंचों पर अपने आख़िरी दिन उनकी मरज़ी के रहे. मन नहीं होता था तो हज़ारों की भीड़ में भी संचालक को कहकर शुरू में ही कविता पढ़कर होटल चले जाते थे. मन होता था तो चंडीगढ़ के एक गेस्ट हाउस में डेढ़ सौ लोगों के लिए भी डेढ़ घंटा पढ़ जाते थे. कृष्ण, ओशो रजनीश और जीवन-मृत्यु- इन विषयों पर बहुत रुचि से बात करते थे. कहते थे कि ओशो रजनीश देहांत से पहले अपना चोगा और कलम उनके लिए छोड़ गए थे.कुछ क्षेत्रीय असर भी था कि क्यों साहब उनका तकियाक़लाम हो गया था. कहते थे, “मेरी भाषा प्रेम की भाषा है. गुस्से में कभी अपना चेहरा देखना और जब प्रेम करते हों, तब देखना. क्यों साहब.”

सभी गुनगुनाने लगे, नीरज के गीत

नीरज ने साहित्य के भी स्थापित प्रतिमानों को अपने तरीक़े से तोड़ा. 1958 में लखनऊ रेडियो से पहली बार उन्होंने ‘कारवां गुज़र गया’ पढ़ी थी. उन्होंने मुझे बतलाया था कि मुंबई वालों ने वही गीत सुनकर उन्हें बुला लिया कि ये हिंदी का कौन आदमी है जो कारवां जैसे शब्द लिख रहा है. इस गीत को भी देखिए. न मात्रा, न तुकांत- ये कोई गीत ठहरा बल- ऐ भाई ज़रा देखकर चलो आगे ही नहीं पीछे भी दाएं ही नहीं बाएं भी ऊपर ही नहीं नीचे भी तू जहां आया है वो तेरा घर नहीं, गांव नहीं, गली नहीं, कूचा नहीं, रास्ता नहीं, बस्ती नहीं, दुनिया है और प्यारे दुनिया ये सर्कस है पर उस आदमी ने गीत बना दिया और सब गाने लगे. आध्यात्मिक आदमी थे पर धर्म की सामूहिकता में यक़ीन नहीं रखते थे. अब तो मज़हब भी कोई ऐसा चलाया जाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए उन्हें श्रृंगार का कवि कहलाना पसंद नहीं था. एक काव्य पाठ में उन्होंने कहा, “अध्यात्म का मुझ पर बड़ा असर रहा. लेकिन लोगों ने मुझे श्रृंगार का कवि घोषित कर दिया. आज जी भर के देख लो चांद को क्या पता कल रात आए न आए “तो यहां चांद का मतलब चांद और रात का मतलब रात थोड़े ही है. यह फिलॉस्फी है जीवन की. श्रृंगार नहीं है.” इसी काव्यपाठ में उन्होंने कहा था, “मेरा धर्म में विश्वास नहीं है, धार्मिकता में है. ईश्वर के नाम पर चार हज़ार धर्म बने. इन धर्मों ने क्या किया, ख़ून बहाया. हिंदुस्तान ने कहा, पहला अवतार- मत्स्यावतार. अवतार नहीं था वह, धरती पर जीवन का अवतरण था. फिर कृष्ण आया साहब. जीवन को उत्सव बना दिया उस आदमी ने.

नीरज का काव्यपाठ

शुरुआती दिनों में हिंदी गीतों में मेरी जो रुचि बनी, उसकी नब्बे फीसदी ज़िम्मेदारी नीरज की ही थी. पांच फीसदी संतोषानंद और शेष पांच में शेष गीतकार. आगे उन्हीं का एक काव्य पाठ, ज्यों का त्यों – इस आस में कि इटावा या अलीगढ़ में अब भी चमकीली आंखों वाला एक बूढ़ा किसी चारपाई पर लेटा होगा और इसी तरह पद्य और गद्य पढ़ रहा होगा- मृत्यु क्या चीज है, घबड़ाते सूरज से प्राण धरा से पाया है शरीर ऋण लिया वायु से है, हमने इन सांसों का सागर ने दान दिया आंसू का प्रवाह जो जिसका है उसको उसका धन लौटाकर मृत्यु के बहाने हम ऋण यही चुकाते हैं काल नहीं है बीतता. बीत रहे हम लोग, क्यों साहब. इसलिए लिखता हूं, अब के सावन में शरारत मेरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के सारे शहर में बरसात हुई जिंदगी भर औरों से हुई गुफ़्तगू मगर आज तक हमारी हमसे न मुलाक़ात हुई कबीर क्या कहता है, घूंघट के पट खोल. इसी को मैं कहता हूं, आवरण उतार तब दिखेगी ज्योति. मेरे लिखे में कहीं गीता है, कहीं उपनिषद. मेरे नसीब में ऐसा भी वक़्त आना था जो गिरने वाला था, वो घर मुझे बनाना था भाषा आपके दरवाज़े आए भावों का स्वागत करने का जरिया है. गीत क्या चीज है, भाषा, भाव और वातावरण का मिश्रण. ब्रज वाले मेरे पास आए तो मैंने लिखा माखन चोरी कर तूने कम तो कर दिया बोझ ग्वालन का युद्ध की बात आए तो भाषा बदल जाती है मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध छिड़ा तो नई सुबह की नई फसल का क्या होगा अभी अलग-अलग जगह के चार दोस्त कवियों की एक साथ एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई. ऐसा क्यों है, कि कोई कहीं पैदा होता है और कहीं मर जाता है जहां मरण जिसका लिखा वो …… (दो शब्द स्पष्ट नहीं हो पाए) मृत्यु नहीं जाए कहीं, व्यक्ति वहां खुद आए मित्रों हर पल को जियो अंतिम ही पल मान अंतिम पल है कौन साल कौन सका है जान तन से भारी सांस है, इसे समझ लो ख़ूब मुर्दा जल में तैरता जिंदा जाता डूब और इसीलिए मैंने लिखा कि जिंदगी मैंने गुजारी नहीं सभी की तरह हर एक पल को जिया पूरी सदी की तरह तुम मुझे सुनोगे पर समझ न पाओगे मेरी आवाज है कान्हा की बंसरी की तरह कविता अलंकारों का ही खेल है. क्यों साहब. अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उमर की हर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आंसू आवारा होता और इसी भौरे की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती ईश्वर तक अपराधी होता, पूरा खेल दुबारा होता एकाध गीत और सुना देता हूं. क्या बज गया. थक गया. छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है खोता कुछ भी नहीं यहां पर केवल जिल्द बदलती पोथी जैसे रात उतार चांदनी पहने सुबह धूप की धोती वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों! चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है. अब न गांधी रहे न, विनोबा रहे. कहां गए वे लोग. हम साहब गरीब थे पर बेईमान नहीं थे. आप लोग चिट्ठी में नीचे लिखते हैं न ‘आपका’. वो झूठ है. जानता हूं मैं कि मेरी सांस तक मेरी नहीं है. यकीन मानिए मैंने शब्द की रोटी खाई है जिंदगी भर. इसलिए मैं ‘आपका’ नहीं ‘सप्रेम’ लिखता हूं. लेकिन अंग्रेजी में ‘योर्स सिंसियरली’ लिखना पड़ता है. कितना बड़ा झूठ है साहब. हम तो मस्त फकीर, हमारा नहीं ठिकाना रे जैसा अपना आना रे, वैसा अपना जाना रे औरों का धन सोना-चांदी, अपना धन तो प्यार रहा दिल से दिल का जो होता है, वो अपना व्यापार रहा और आख़िर में- इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में.

सभार बीबीसी Read it also-गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा
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राहुल ने ली पीएम मोदी की झप्पी, सरकार पर जमकर बरसें

नई दिल्ली। लोकसभा में उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सकपका गए जब राहुल गांधी ने उन्हें झप्पी ले ली. अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अचानक पीएम मोदी के पास पहुंच गए और उन्हें गले लगा लिया. इस दौरान एक बार मोदी को कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जब मोदी संभले तो उन्होंने राहुल गांधी से हाथ मिलाया. इससे पहले राहुल गांधी ने तमाम बातों को लेकर पीएम मोदी पर जमकर निशाना साधा.

उन्होंने 15 लाख रुपये, युवाओं को रोजगार से लेकर राफेल सौदे को लेकर सरकार पर तमाम सवाल उठाएं. तो वहीं अमित शाह की संपत्ति बढ़ने पर पीएम मोदी की चुप्पी पर भी उन्हें घेरा. कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असफलताओं को गिनाते हुए कहा की ये सरकार झूठ बोल रही है. रोजगार के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी ने कहा, “मोदी जी जहां भी जाते हैं रोज़गार की बात करते हैं. कभी कहते हैं पकौड़े बनाओ कभी कहते हैं दुकान खोलो. रोज़गार कौन लायेगा? हिन्दुस्तान के युवाओं ने प्रधानमंत्री जी पर भरोसा किया था. अपने भाषण में प्रधानमंत्री जी ने कहा था हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोज़गार दूंगा.”

अमित शाह के बेटे की संपत्ति के आश्चर्यजनक ढंग से कई गुणा बढ़ने पर राहुल ने मोदी पर तंज कसते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री जी ने कहा था मैं देश का चौकीदार हूं, देश की चौकीदारी करुंगा. लेकिन वो चौकीदार नहीं भागीदार है. जब प्रधानमंत्री के मित्र के पुत्र 16000 गुना अपनी आमदनी बढ़ाते हैं तो प्रधानमंत्री के मुंह से एक शब्द नहीं निकलता” इस दौरान राहुल गांधी ने किसानों का भी मुद्दा उठाया.

राफेल सौदे पर सरकार को घेरते हुए राहुल गांधी ने कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने मुझे बताया कि दोनों देशों के बीच राफेल को लेकर कोई सीक्रेट डील नहीं है. राफेल डील को लेकर रक्षा मंत्री ने देश से झूठ बोला. राफेल हवाई जहाज का दाम 520 करोड़ रुपये प्रति हवाई जहाज था. प्रधानमंत्री जी फ्रांस गए, जादू से यह दाम 1600 करोड़ रुपये प्रति हवाई जहाज हो गया.

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी के निशाने पर लगातार पीएम मोदी रहे. राहुल गांधी ने कई बार मोदी पर सीधा हमला बोला. पीएम को घेरते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ”पूरे देश ने अभी देखा है कि मैंने प्रधानमंत्री के बारे में साफ-साफ बोला है और प्रधानमंत्री मुझसे नज़र नहीं मिला रहे हैं. ये सच्चाई है; ‘चौकीदार नहीं, भागीदार है’ देश को ये बात समझ में आ गयी है.”

एचएएल का मुद्दा उठाते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस बात का जवाब देना चाहिए कि एचएएल से ये सौदा क्यों छीना गया और ऐसी कंपनी को क्यों दिया गया जिस पर 35 हजार करोड़ रुपये का कर्ज़ है और उसने जीवन में कभी हवाई जहाज नहीं बनाया. किसानों के मुद्दे पर राहुल गांधी ने कहा कि किसान कहता है प्रधानमंत्री जी आपने हिंदुस्तान के सबसे अमीर लोगों का ढाई लाख करोड़ का कर्जा माफ किया हमारा भी थोड़ा कर्ज माफ कीजिए. लेकिन वित्त मंत्री कहते हैं नहीं किसानों का कर्जा माफ नहीं होगा.

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हिन्दुवादियों का सवाल, अयोध्या क्यों नहीं जाते नरेन्द्र मोदी

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मगहर दौरा काफी चर्चा में रहा. मगहर वह स्थान है, जहां संत कबीर ने अपने शरीर का त्याग किया था. प्रधानमंत्री का 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बनारस जाने और वहां से चुनाव लड़ने और फिर 2019 चुनाव के पहले मगहर जाना उनकी राजनीति का एक हिस्सा है. लेकिन इस बीच एक सवाल अयोध्या को लेकर उठने लगा है. अयोध्या के लोग और हिन्दुत्व के समर्थक यह सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर बनारस और मगहर तक चले जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या क्यों नहीं आते?

यह सवाल जायज भी है, क्योंकि मोदी जी बनारस से लेकर मगहर तक चले गए. अब तक की अपनी चार सालों की सरकार में दुनिया भर में घूम-घूम कर मंदिर, मस्जिद और मज़ार पर जा रहे हैं लेकिन अयोध्या से उनकी बेरुखी रामभक्तों के समझ से परे है.

दरअसल, अयोध्या और भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संबंध भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर की कितनी भूमिका का सच किसी से छिपा नहीं है. 1991 में जब कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की पहली बार सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए पहुंच गया था. लेकिन दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी बहुमत से केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों में सरकार बनाने और केंद्र में चार साल पूरा कर लेने के बावजूद अयोध्या से दूरी बनाए हुए हैं.

राम भक्तों का दर्द तब और बढ़ जाता है जब प्रधानमंत्री अयोध्या के ठीक बगल में फैजाबाद तक पहुंच गए लेकिन 10 किलोमीटर दूर अयोध्या जाने से परहेज किया. इस बीच एक और वाकया हुआ, जब प्रधानमंत्री अयोध्या आ सकते थे, लेकिन उन्होंने अयोध्या से किनारा कर लिया. असल में जब अयोध्या से जनकपुर तक के लिए बस सेवा की शुरुआत होनी थी तो इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हरी झंडी दिखाना था. तब रामभक्तों और हिन्दुत्व समर्थकों को पूरी उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री का वनवास पूरा होगा और वो अयोध्या आएंगे, लेकिन तब भी मोदी अयोध्या नहीं आए बल्कि नेपाल चले गए. सवाल है कि आख़िर मोदी हरी झंडी तो अयोध्या से भी दिखा सकते थे.

प्रधानमंत्री के मगहर दौरे ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है. कबीर घोर ईश्वर विरोधी थे. धर्म और उससे जुड़े कर्मकांडों के कबीर इतने विरोधी थे कि उन्होंने मोक्ष की धरती कहे जाने वाले वाराणसी को अंतिम वक्त में त्याग कर मगहर की उस धरती को चुना, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां मरने वाला इंसान अगले जन्म में जानवर पैदा होता है. तो वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि हिन्दुत्व और ईश्वर समर्थक की है. ऐसे में विपरीत विचारधारा वाले और राम को नकारने वाले संत के मजार पर जाने की बात मोदी समर्थकों को हजम नहीं हो रही है.

बीबीसी में इसी मुद्दे पर प्रकाशित एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी 2019 के चुनाव के पहले अयोध्या जरूर जाएंगे. संभावना जताई जा रही है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी हाई कोर्ट की तर्ज पर हो सकता है, जिसमें हाई कोर्ट दो तिहाई जमीन हिन्दू पक्ष को सौंप चुका है. अगर ऐसा होता है तो मोदी एक विजेता के तौर पर अयोध्या आ सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो यह 2019 चुनाव से पहले भाजपा का तुरुप का पत्ता होगा. क्योंकि तब मोदी की हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि मजबूत होकर उभरेगी. और तब यह भी संभव है कि वह वाराणसी की बजाय अयोध्या से चुनाव लड़ जाएं और यूपी में दरकती अपनी राजनीतिक संभावनाओं को थाम लें.

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बसपा की महत्वपूर्ण बैठक कल दिल्ली में

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी से एक महत्वपूर्ण खबर है. बहुजन समाज पार्टी की बड़ी बैठक शनिवार 21 जुलाई को दिल्ली में होने जा रही है. इस बैठक में पार्टी के सभी अहम नेताओं को बुलाया गया है. बैठक में कई मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला होने की उम्मीद है. इस बैठक में गठबंधन को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा होगी. पिछले दिनों में उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं. इन बैठकों के बाद जो नतीजे निकले हैं, कल की बैठक में बसपा प्रमुख मायावती उस पर पार्टी के प्रमुख नेताओं से चर्चा करेंगी.

यह बात लगभग तय है कि बसपा प्रमुख मायावती आगामी लोकसभा चुनावों में चुनाव मैदान में उतरने जा रही हैं. चर्चा थी कि पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं को बसपा प्रमुख के लिए सुरक्षित सीट का चुनाव करने में लगाया गया था. बैठक में इस पर भी चर्चा होने की संभावना है.

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर गठबंधन होने या नहीं होने को लेकर अब तक कुछ भी साफ नहीं है. अभी तक जो सूचना है, उसके मुताबिक कांग्रेस पार्टी ने बसपा को तीनों राज्यों में गठबंधन के लिए पैकेज डील दे दी है. उसे स्वीकार करना है या फिर ठुकराना है, यह भी कल की बैठक का प्रमुख मुद्दा होगा.

इस बीच बसपा प्रमुख मायावती ने कर्नाटक में प्रभारी के पद पर रहते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ को भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में लगा दिया है. फिलहाल कल की बैठक के लिए दिल्ली में बसपा नेताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. देखा होगा कि आखिर बसपा प्रमुख कल क्या फैसला लेती हैं.

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कहीं पर निशाना, कहीं पर निगााहें

अफवाहों और सुनी-सुनाई झूठी बातों में विश्वास करना अज्ञान और अंधविश्वास में डूबे मध्यमं युगीन अशिक्षित समाज की एक आम प्रवृत्ति रही थी किंतु लगता है कि पढ़-लिखकर साक्षर हो जाने और स्माकर्टफोन जैसे आधुनिक यंत्र का इस्तेमाल करने पर भी हम वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न नहीं बन पाये हैं। रह-रहकर हम अफवाहों के शिकार होते रहते हैं। कभी हम किसी मंकी मैन की अफवाह में आ जाते हैं तो कभी चोटी कटवा की। आजकल बच्चा चोरों की अफवाहों का बाज़ार गर्म है। शरारती तत्वों  द्वारा व्हाकट्अप से फैलाई गई बच्चे उठाये जाने की अफवाहों के कारण उन्माधदी बन जाने वाली भीड़े के हाथों पिछले एक-डेढ़ महीने में 20 से भी ज्यांदा निर्दोष लोगों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा जा चुका है। व्हाट्अप जैसे आधुनिक जनसंचार माध्यम का इस्तेमाल जिस प्रकार भीड़ को उत्तेजित करके लामबंद करने और अपने से अलग दिखने वाले, अपने से अलग धर्म, संस्कृति को मानने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा को भड़काने के लिए किया जा रहा है, उससे कानून और व्यवस्था की व्यापक समस्यांएँ पैदा हो गई हैं। लोगों के अंदर एक कृत्रिम भय और आक्रोश पैदा करके उन्हें कानून हाथ में लेने के लिए उकसाने की घटनाओं में हुई इस वृद्धि से स्व‍यं केंद्र सरकार भी चिंतित है और 2 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्री किरण रिजिजू ने भी व्हाेट्सअप से फैलाई जा रही इन अफवाहों और झूठी खबरों को एक बड़ा संकट बताते हुये अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अफवाहें और झूठी खबरें निर्दोष लोगों के लिए खतरा बन रही हैं। उन्हों ने आधिकारिक रूप से कोई दिशा निर्देश तो नहीं दिया किंतु कहा कि इन अफवाहों और भ्रामक समाचारों के खिलाफ राज्य सरकारों और सभी सरकारी एजेंसियों को स्वयंसेवी संगठनों को साथ लेकर एकजुट होना चाहिए और जागरुकता फैलानी चाहिए। बच्चा चोरी की इन अफवाहों के खिलाफ जन जागरुकता की आवश्याकता को श्री किरण रिजिजू द्वारा रेखांकित किया जाना स्वागत योग्य है और उनकी पार्टी द्वारा शासित राज्यों उत्तरप्रदेश एवं राजस्था‍न आदि के पुलिस महकमों द्वारा इस दिशा में पहले से ही कदम उठाने के दावे भी किये गये हैं। किंतु भीड़ को हिंसा के लिए प्रेरित करने वाली अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ और हिंसा पर उतारू भीड़ के खिलाफ त्वोरित और मुक्कसमल कार्यवाही न करके अफवाहों के माध्यम मात्र के प्रति क्षोभ प्रकट करना केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता पर संदेह करने को मजबूर कर देता है। इनकी सरकार की कथनी और करनी का अंतर इस तथ्यल से भी साबित होता है कि इस सरकार के मुखिया तक भड़काऊ अफवाहें फैलाने वालों का सोशल साइटों पर अनुकरण करते हैं।इस विषय में दिनांक 18 जुलाई के विगत मंगलवार को झारखंड के पाकुड़ में भाजपा के युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं की भीड़ द्वारा अस्सी साल के बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता स्वाामी अग्निवेश पर किया गया प्राण घातक हमला भी ध्यातव्य हैं। साइबर अपराधों के विश्‍लेषण से पता चलता है कि इंटरनेट पर विभिन्नर प्रकार के प्रलोभन देते हुए किसी लिंक विशेष पर क्लिक करने को कहा जाता है और तद्विषयक वेबसाइट विशेष की तरफ लोगों को आकर्षित करने के लिए लोगों की भावनायें भड़काने वाली सच्चीे-झूठी कहानियाँ गढ़ी जाती हैं। विज्ञापनों से होने वे राजस्व का खेल लोगों की जातीय-धार्मिक भावनाओं में उबाल लाने के पीछे काम कर रहा होता है। कई बार राजनीतिक दृष्टि से किसी विचाधारा विशेष को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए भी भ्रामक खबरें फैलाई जाती हैं। संवेदनशील वीडियों, ऑडियों और चित्रों आदि को उनके संदर्भों से काटकर इतर संदर्भ में पेश करके लोगों को उन्मा दी भीड़ में तब्दीलल कर दिया जाता है। व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्वीटर आदि जनसंचार केलोकप्रिय माध्यीमों का दुरुपयोग किसप्रकार भीड़ को हिंसक बना बेकसूर लोगों की हत्यासए करवाने में हो रहा है, इसके लिए विगत एक-डेढ़ महीने के अखबारों की सुर्खियाँ आप देख सकते हैं। मई महीने में तमिलनाडु के पुलीकट में एक बेघर व्ययक्ति को अपहरकर्ता समझ पागल भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इसी महीने में तेलंगाना के जियेपल्लीर नामक स्थान पर एक व्याक्ति को डकैत के भ्रम में भीड़ ने खत्म कर दिया। उस व्याक्ति का कसूर सिर्फ इतना था कि वह उस स्थान के वासियों के लिए अजनबी था। जून के महीने में असम के कार्बी आंगलोंग जिले में दो बाहरी व्यक्तियों को स्थानीय गाँव वालों ने बच्चा  चोर समझकर लाठियों से इतना पीटा कि दोनों के प्राण पखेरू उड़ गये। बच्चाे उठाने वाले गिरोह से होने के शक में गुजरात में भी इसी महीने एक भिखारी को उन्मा दी भीड़ का निवाला बनना पड़ा। जुलाई की शुरुआत में महाराष्ट्र  के धुले जिले में तो खानाबदोश जनजाति के पाँच लोगों तक को बच्चा़ अगुआ करने वाला गिरोह समझ पीट-पीटकर क्रूता से खत्म् कर दिया गया। और यह लेख लिखे जाने तक सबसे हाल की घटना शुक्रवार 13 जुलाई की है जब बच्चा़ चोरी की इन्ही अफवाहों ने कर्नाटक के बीदर में एक गूगल इंजीनियर के प्राण ले लिये। इस इंजीनियर के तीन साथी भी भीड़ के हत्थे  चढ़ जाने के कारण बुरी तरह घायल हो गये। वीडियों, ऑडियो और चित्रों समेत सूचनाओं और आंकड़ों आदि के त्वेरित और सुगम आदान-प्रदान के लिए बनाये गये व्‍हाट्सअप एप्लिकेशन के इस आपराधिक किस्म  के दुरुपयोग ने पुलिस-प्रशासन समेत संवेदनशील आम आदमी के होश उड़ा दिये हैं। व्हासट्सअप  के बचाव में अब यह नहीं कहा जा सकता कि तकनीक तो तकनीक होती है, उसका अच्छा -बुरा प्रयोग तो इंसान ही करता है। व्हाट्सअप, फेसबुक और ट्वीटर आदि ने हमें अभिव्ययक्ति के असीमित लोकतांत्रिक अवसर उलब्धै करा दिये हैं किंतु इनका इस्तेुमाल करने वालों के सामने उस तरह की कोई कानूनी जबावदेही अभी तक नहीं है और न स्वम नियंत्रित सेंसरशिप का प्रशिक्षण उन्हें  मिला है। चाहे कानून की खामियों के चलते सोशल साइटों पर किसी व्यतक्ति विशेष या समुदाय विशेष के विरुद्ध आग उगलने वाले लोग बच जायें किंतु भीड़ की हिंसा के लिए वे अपनी नैतिक जिम्मेहदारी से नहीं बच सकते। मोदी सरकार की ओर से अपनी नीतियों की तीखी आलोचना से परेशान हो सोशल साइटों की निगरानी रखने की जो बात पहले से उठाई जा रही थी, उसे व्हा ट्सअप से फैलाई जा रही बच्चाप चोरी की अफवाहों और इन अफवाहों से हिंसा पर उतारू हो रही भीड़ ने और ज्या दा बल प्रदान किया है। स्पमष्ट, है कि इस सारे घटनाक्रम में एक फायदा तो मोदी सरकार को होता दिख ही रहा है। साइबर कानूनों के विशेषज्ञ भी सरकार के ऊपर दबाव बनाये हुये हैं कि व्‍हाट्सअप, फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल सेवा प्रदान करने वाली सोशल साइटों पर नकेल कसने की जरूरत है। आज सरकार की तीखी आलोचना की जा रही है कि उसके पास साइबर अपराधों पर लगाम लगाने की इच्छाटशक्ति नहीं है। और मजे की बात देखिए कि अपनी सरकार की आलोचना करने वालों की राष्ट्रबभक्ति पर सवाल उठाने वाली भाजपा इस बार चुप है क्योंनकि इन आलोचनाओं से उसे अभिव्यरक्ति के अधिकार पर अंकुश लगाने का बहाना जो मिल रहा है। स्तर में सोशल मीडिया से जुड़े घृणा फैलाने के कारोबार से सबसे ज्याकदा फायदा हुआ है भाजपा और संघ परिवार की सांप्रदायिक और मनुवादी राजनीति को और इसीलिए सरकार अभी तक सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर मगरमच्छीा आँसू बहाने के अलावा कुछ खास करती नहीं नज़र आईहै। घृणा और उन्माकद से संबद्ध साइबर अपराधों के प्रति सरकार की इस उदासीनता के कारण ही सोशल साइटों पर अफवाह फैलाने का धंधा करनेवाले धंधेबाजों की हिम्म्त बढ़ रही है। सरकार की इस निष्क्रियता के कारण ही भीड़ को कानून के हाथ पंगु नज़र आते हैं और वह सोशल साइटों और व्हांट्सअप पर चलने वाली अफवाहों की बिनाह पर निरपराध लोगों की  पिटाई और हत्याो बेखौफ होकर कर रही है। लेकिन क्या बच्चोंन को अगवा करने और उनके अंगों को ऊँची कीमत पर चिकित्सा  के बाज़ार में बेचे जाने की अफवाह फैलाये जाने के लिए मात्र व्हानट्सअप ही जिम्मे्दार है ॽक्या  इन अफवाहों और झूठी खबरों के कारण अपने बच्चों  की सुरक्षा को लेकर पैदा भीड़ के भय और आक्रोश के लिए मात्र सोशल साइटों को ही अपराधी माना जाना चाहिए मंत्रालय इस सच्चाअई से इनकार कर सकता है कि बकौल राष्ट्री य अपराध रिकार्ड ब्यूकरो के आंकड़ों के अनुसार अकेले साल 2016 में बच्चोंत के खिलाफ घटित 1,06,958 अपराध के मामले दर्ज़ किये गये और इनमें से 54,723 मामले अकेले अपहरण के थे। बच्चों के साथ घटित अपराध के मामलों में दूसरा बड़ा हिस्सा, यौन अपराधों का था जिसके तहत कुल 36022 मामले दर्ज़ किये गये। किंतु बच्चों  के अपहरण और उनके साथ होने वाले बलात्कािर के इन दर्ज़ मामलों की संख्या‍ बच्चोंं पर होने वाले अपराधों के वास्तुविक आंकड़ों से बहुत कम हैं। प्राय: यह देखा जाता है कि शहरों और महानगरों की अवैध कच्चीक बस्तियों में रहने वाले गरीब-दलित-पिछड़े परिवारों के बच्चोंध के अपहरण और बलात्कांर की घटनायें अपेक्षाकृत ज्याजदा घटती हैं किंतु उनके माँ-बाप की कमजोर सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति इन अपराधों की प्राथमिकी दर्ज़ कराने में बाधक बन जाती है। क्यात बच्चोंह के अपहरण और बलात्काँर की इस हकीकत से केंद्र का गृह मंत्रालय मुँह मोड़ सकता है ॽ क्याा बच्चोंे पर हो रहे इन वास्ततविक अपराधों के लिए भी सोशल साइटें ही जिम्मेीदार हैं। अस्तु, व्हाट्सअप और सोशल साइटों पर बच्चा चोरी की अफवाहों को आजकल जो इतना बल मिल रहा है, उसके पीछे है बच्चोंं के अपहरण और बलात्काेर की कड़वी सच्चाहइयाँ। बच्चों  की चोरी को लेकर भीड़ का भय निर्मूल नहीं है। इस भय को अफवाहों के माध्यीम से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए केंद्र सरकार के मंत्री आदि चाहे व्हा ट्सअप को दोष देते रहें किंतु व्‍हाट्सअप आदि पर सरकारी नियंत्रण से यह समस्याा हल नहीं होने वाली। यहाँ दो-तीन चीजों को रेखांकित करना भी जरूरी है। एक तो हमें यह देखना होगा कि व्हा ट्सअप एप्लिकेशन और फेसबुक, ट्वीटर आदि सोशल साइटों पर अफवाहें फैलाने का दोषारोपण करके यथार्थ में केंद्र सरकार अभिव्य्क्ति की स्वहतंत्रता को नियंत्रित करने के अपने प्रच्छ्न्नर एजेंडे को ही लागू करना चाहती है। वास्तोव में केंद्र सरकार को सोशल साइटों और व्हातट्सअप आदि से फलाई जाने वाली अफवाहों और झूठी खबरों से उतनी समस्याव नहीं है जितनी समस्या  उसे इन पर होने वाली अपनी आलोचनाओं से है। प्रलोभन और भय के द्वारा मुख्याधारा के मीडिया को अपना क्रीतदास बना चुकी वर्तमान मोदी सरकार सोशल मीडिया पर मुखरित होते अपने विरोध को सहन नहीं कर पा रही है। बच्चा चोरी की अफवाहों और भीड़ की हिंसा ने मोदी सरकार को एक मनचाहा मौका उपलब्धल करा दिया है कि कानून-व्यरवस्थान का बहाना करके वह सोशल मीडिया पर नकेल कसकर अपने आलोचकों के हाथों से अभिव्यकक्ति का यह माध्यउम भी छीन ले। दूसरी बात, अफवाहों को रोकने और कानून अपने हाथ में लेने वाली उन्माेद में पागल हो चुकी भीड़ पर समुचित कार्यवाही करने की जिम्मेउदारी राज्य  की होती है, न कि व्हाकट्सअप एप्लिकेशन चलाने वाली किसी निजी कंपनी की। कोई भी सोशल साइट हमारे द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार का न तो स्थाहन ले सकती है और न उसे लेना चाहिए। सरकार कैसे सोशल मीडिया से यह अपेक्षा कर सकती है कि वह एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेकदारी का निर्वहन करे ॽ आज समस्याा यह है कि लोकतांत्रिक वैज्ञानिक मिज़ाज विकसित करने और कानून का शासन स्था पित करने के अपने संवैधानिक दायित्वोंक का निर्वहन न करके व्येवस्था पिका और कार्यपालिका अपनी जिम्मेनदारी कॉरपोरेट जगत पर डाल देने को उतावली है। भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने वाले दोषी व्यहक्ति∕समूह ∕राजनीतिक-सांस्कृपतिक संस्थाम की पहचान करना, कानून-व्यववस्था  बनाये रखने के अपने कर्तव्यल की पालना न करने वाले सरकारी अधिकारी आदि की जबावदेही तय करना और अफवाहों के कोहरे को दूर कर सत्यि की स्थाचपना करना सरकार का कर्तव्यव है, न कि व्हा ट्सअप का। किंतु तथ्यन तो यह है कि बकौल गृह मंत्रालय केंद्र सरकार के पास भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के कोई आधिकारिक आंकड़ें तक नहीं हैं। राष्ट्रीाय अपराध रिकार्ड ब्यूहरो के पास इसप्रकार की हिंसा का लेखा-जोखा रखने की कोई योजना भी नहीं है। भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा कोई सामान्या अपराध की घटना नहीं होती है अपितु यह योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया जाने वाला राजनीतिक अपराध होता है। इसके द्वारा एक बहुसंख्यंक ताकतवर समूह दूसरे अल्प संख्यकक कमजोर समूह के ऊपर अपना प्रभुत्वज स्थारपित करने की कोशिश करता है। यह अकारण नहीं है कि ज्यासदातर मामलों में उन्मा‍दी भीड़ के शिकार या तो मुसलिम हैं या दलित-आदिवासी। यहीं पर हमें बच्चाक चोरी की अफवाहों और इन अफवाहों के चलते पगलाई भीड़ की हिंसा के संदर्भ में कथितगौरक्षकों की इसीप्रकार की हिंसक परंपरा को भी नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। भीड़ को लामबंद करके मुसलिमों और दलितों के खिलाफ हिंसा का रास्ताो दिखाने वाले सबसे पहले अपराधी ये नकली गौरक्षक ही रहे हैं और इनके सिर पर किनका हाथ है, यह भी कोई छिपी बात नहीं है। गौरक्षकों और उनके राजनीतिक आकाओं ने ही भीड़ के सामने पुलिस-प्रशासन को नपुंसकता का प्रदर्शन करना सिखाया है। यह तो आज भीड़ की हिंसा के कारण राष्ट्रीरय और अंतर्राष्ट्रीओय स्त़र पर हो रही मोदी सरकार की किरकिरी ही है, जिसके चलते केंद्रीय गृह राज्य। मंत्री को बच्चाक चोरी की अफवाहों के ऊपर चिंता व्य क्तस करनी पड़ती है। अस्तुर, स्परष्टप है कि भीड़ की हिंसा पर लगाम लगाने के लिए एक विशेष कानून की आवश्यीकता है। नागरिक समाज के कुछ संवेदनशील लोगों ने इस दिशा में पहल करते हुये ‘मानव सुरक्षा कानून’ का एक मसौदा भी तैयार किया था लेकिन केंद्र सरकार अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वाेर्थों के चलते इसप्रकार के किसी भी कानून की विरोधी रही है। किंतुविगत 17 जुलाई के अपने एक फैसले में स्वलयं सर्वोच्चर अदालत तक पृथक से एक विशेष कानून लाने का निर्देश केंद्र सरकार को दे चुकी है।सरकार को देर-सबेर यह समझना ही होगा कि व्हालट्सअप जैसे किसी सोशल मीडिया के एप्लिकेशन को अनस्टॉकल करने से भीड़ की हिंसा नहीं रुकने वाली इसके लिए तो आपको अल्प संख्यक विरोधी अपना सॉफ्टवेयर बदलना होगा। -प्रमोद मीणा Read it also- यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गठबंधन की ताजा खबर
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यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गठबंधन की ताजा खबर

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की बातचीत अंतिम चरण में है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती इस मुद्दे पर लगातार संपर्क में हैं. इस बीच कुछ बातें तय हो चुकी हैं. मसलन, दोनों दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे और इन दोनों बड़े नेताओं को समर्थन देंगे.

तो वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी को भी शामिल करना चाहते हैं. अखिलेश यादव की नजर ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सोलेहदेव भारतीय समाज पार्टी पर भी है. हालांकि इसको लेकर अभी बसपा की सहमति मिलनी बाकी है. अगर बसपा इन तीनों दलों के लिए सीटें छोड़ने को राजी नहीं हुई तो सपा अपने कोटे से कुछ सीटें छोड़ सकती है.

एक बड़ी खबर यह भी है कि यूपी के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव औऱ मुलायम सिंह यादव के अलावा बसपा प्रमुख मायावती के भी चुनाव मैदान में उतरने की बात तय हो गई है. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बार होगा जब मायावती लोकसभा चुनाव लड़ेंगी.

दूसरी ओर राजस्थान, छत्तीसगढ़ औऱ मध्यप्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर भी बसपा और कांग्रेस साकारात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं. इन तीनों राज्यों में दोनों दलों के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है. हालांकि सीटों को लेकर खिंचतान अब भी जारी है. कांग्रेस की ओर से गठबंधन की बात महासचिव अशोक गहलोत कर रहे हैं तो वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को इसकी जिम्मेदारी दी है.

खबर के मुताबिक कांग्रेस पार्टी तीनों राज्यों में बसपा को चार से पांच सीट देने को राजी है, जबकि बसपा और ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा मजबूत दावेदार है. इन तीनों राज्यों के चुनाव लोकसभा के संभावित चुनावों से छह महीने पहले होने हैं. ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के लिए यह एक बड़ा चुनाव है, जिसमें कोई दल किसी भी तरह की चूक नहीं चाहता है. उम्मीद है कि आने वाले कुछ दिनों में जल्दी ही बसपा, कांग्रेस और सपा आधिकारिक रूप से गठबंधन का ऐलान कर सकते हैं.

Read it also-​दलित के यहां रोटी खाने को सभी तैयार, बेटी देने को कोई तैयार नहीं- पासवान
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​दलित के यहां रोटी खाने को सभी तैयार, बेटी देने को कोई तैयार नहीं- पासवान

नई दिल्ली। एनडीए में घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और पीएम नरेंद्र मोदी सरकार में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने देश भर में दलितों राजनीति कर रहे नेताओं पर करारा हमला किया है। उन्होंने कहा कि दलितों से रोटी खाने को सब तैयार हैं परंतु बेटे देने कोई तैयार नहीं होता। उन्होंने कहा अंतरजातीय विवाह से जाति व्यवस्था खत्म हो सकती है। रोटी और बेटी की समस्या हल हो जाए तो जातिवाद खत्म हो जाएगा। बता दें कि 2014 के बाद से अब तक लगभग हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेता दलित और आदिवासियों के यहां जाकर रोटी खाते हैं, कभी कभी बनाते भी हैं।

इस दौरान भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे विपक्ष पर हमला बोलते हुए पासवान ने कहा कि उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ बन रहे महागठबंधन की वही हालत होगी, जैसी इंदिरा गांधी के समय 1977 सिंडीकेट की। इनका राष्ट्रीय नेता कौन है? राहुल गांधी, चन्द्राबाबू नायडू और ममता बनर्जी को लोग नेता नहीं देख रहे हैं। यहां तो सब अपनी ढपली बजा रहे हैं। पासवान ने माना कि उत्तरप्रदेश के कैराना और फूलपुर का उपचुनाव हारना चिंता का विषय है।

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थाने में दलित को पीटकर मार डालने वाले पुलिसवालों को 10 साल की सजा

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​मिरजापुर। उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में पुलिस कस्टडी के दौरान पिटाई से दलित की मौत के एक मामले में अदालत ने चौकी प्रभारी और कॉन्स्टेबल को 10-10 साल की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश एससीएसटी भगवती प्रसाद सक्सेना की अदालत यह फैसला दिया है। अदालत ने पुलिस कस्टडी में पिटाई से दलित की हुई मौत के जुर्म में तात्कालीन चौकी प्रभारी पटेहरा उप निरीक्षक राजाराम यादव, कांस्टेबल वरीसन प्रसाद एंव ग्रामीण नेबुल कोल को 10-10 वर्ष की कड़ी कैद की सजा के साथ साढ़े छह हजार के जुर्माने से दंडित किया।

मड़िहान थाना क्षेत्र के ग्राम सभा ग्रामपुर निवासी निशा देवी ने आठ जुलाई 2013 को थानाध्यक्ष मड़िहान को इस आशय की तहरीर दिया कि उसके पति महेश कुमार कोल को गांव के ही नेबुल के इशारे पर चौकी प्रभारी पटेहरा राजाराम यादव और कांस्टेबल वरीसन प्रसाद ने इस कदर पिटा कि पुलिस कस्टडी में ही उसकी मौत हो गई। इसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ थाना मड़िहान में रिर्पोट दर्ज कर कार्रवाई की गई। ​इस बार में अदालत ने फैसला सुनाते हुए दोषियों को दंडित किया है।

Read it also-झारखंड में आमरण अनशन पर बसपा विधायक
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झारखंड में आमरण अनशन पर बसपा विधायक

रांची। अपने क्षेत्र के जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर से चालू कराने और एससी,एसटी, ओबीसी की आरक्षण सीमा को 50 सीसदी से 73 फीसदी करने की मांग के साथ विधायक ने आमरण अनशन शुरू कर दिया है. पलामू के हुसैनाबाद के बसपा विधायक कुशवाहा शिवपूजन मेहता मंगलवार से अपनी इन दोनों मांगों के साथ आमरण अनशन पर बैठे हैं. विधायक का आरोप है कि पूर्व में उनके द्वारा जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर चालू कराने की मांग की गई थी. इसपर सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सदन में उन्हें आश्वासन दिया था. यहां तक की मुंख्यमंत्री ने एक मंच से भी सीमेंट फैक्ट्री को शुरू कराने की बात कही थी. बावजूद इसके आश्वासन के एक साल बीत जाने के बाद भी कोई काम नहीं हुआ.

अपनी मांग के साथ विधायक मंगलवार को अनशन पर बैठ गए. इसके बाद सीएम रधुवर दास विधायक से मिलने अनशन स्थल पहुंचे और जपला सीमेंट फैक्ट्री को शीघ्र ही शुरू कराने का आश्वासन देते हुए अनशन तोड़ने का आग्रह किया, जिसे विधायक ने अस्वीकार कर दिया. बसपा विधायक मेहता का कहना है कि जबतक उनकी मांगों पर सरकार कार्रवाई नहीं करती तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा.

इस बीच विधायक को बुधवार को विधानसभा से एंबुलेंस में बैठाकर राजेंन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेंडिकल साइंस (रिम्स) में भर्ती कराया गया. रिम्स पहुंचने के बाद भी वह एंबुलेंस में ही अनशन पर बैठे रहे. रिम्स में चिकित्सकीय जांच कराने के लिए अस्पताल के अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों ने काफी प्रयास किया, लेकिन उन्होंने अस्पताल में भर्ती होने से साफ मना कर दिया और एंबुलेंस से नीचे नहीं उतरे. हालांकि इसके बाद इमरजेंसी में उनकी जांच की गई और उन्हें 13 नंबर कॉटेज में भर्ती कर लिया गया.

गौरतलब है कि जपला सीमेंट फैक्ट्री 1990 से बंद पड़ा है. अलग राज्य के रूप में झारखंड के गठन के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि यह फैक्ट्री फिर से शुरू हो जाएगी और उन्हें रोजगार मिलेगा. लेकिन राज्य गठन के 18 साल बीत जाने के बाद भी किसी सरकार ने उस ओर ध्यान नहीं दिया.

रणजीत कुमार

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अभ्यार्थियों को रेलवे ने दिया एक मौका जाने……

नई दिल्ली। रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.

रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.

यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.

गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.

जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.(इनपुट भाषा से)

रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.

रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.

यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.

गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.

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कैदियों को जेल से रिहा करेगी मोदी सरकार

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नई दिल्ली। भारत की केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है. इस फैसले के मुताबिक अब जेल में बंद कैदियों को रिहा किया जाएगा. इसके लिए सरकार ने महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती को चुना है. कैबिनेट में भी इसको लेकर मंजूरी मिल गई है. सरकार के फैसले के मुताबिक आगामी 2 अक्टूबर को देश के विभिन्‍न जेलों से कैदियों को विशेष माफी के तहत रिहा कर दिया जाएगा. यह रिहाई तीन चरणों में होगी.

पहले चरण में कैदियों को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्‍टूबर, 2018 को रिहा किया जाएगा. दूसरे चरण में कैदियों को चम्पारण सत्याग्रह की वर्षगांठ पर 10 अप्रैल, 2019 को रिहा किया जाएगा. वहीं तीसरे चरण में कैदियों को 02 अक्‍टूबर, 2019 को रिहा किया जाएगा. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए फैसले के तहत जिन कैदियों को रिहा किए जाने का प्रस्ताव है, उसमें उम्रदराज महिला कैदी, बुजुर्ग कैदी, किन्नर कैदी और दिव्यांग कैदी शामिल हैं. फैसले के तहत उन कैदियों को रिहा किया जाना है, जिन्होंने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया है. केंद्र सरकार ने वास्‍तविक सजा की 66 फीसदी अवधि पूरी करने वाले कैदियों को भी रिहा करने का फैसला किया है.

हालांकि इस फैसले के तहत ऐसे कैदियों को विशेष माफी नहीं दी गई है, जो मृत्‍युदंड की सजा काट रहे हैं. उन कैदियों को भी इस योजना से बाहर रखा जाएगा, जिनकी मृत्‍युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया है. इसके अलावा दहेज मृत्‍यु, बलात्‍कार, मानव तस्‍करी, पोटा, यूएपीए, टाडा, एफआईसीएन, पोस्‍को एक्‍ट, धन शोधन, फेमा, एनडीपीएस, भ्रष्‍टाचार रोकथाम अधिनियम आदि के दोषियों को भी इस योजना के लाभ से बाहर रखा जाएगा. इस प्रक्रिया को देखने के लिए एक समिति गठित करने की भी बात कही जा रही है.

जाहिर सी बात है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलने वाला है, वो खुश होंगे. अगर सरकार का यह फैसला जेल सुधार और जेल में बंद कैदियों को एक और मौका देने की कवायद है तो यह एक अच्छी पहल है. लेकिन अगर सरकार के इस फैसले के राजनीतिक पहलू को देखें तो उसके कुछ और मायने दिख रहे हैं. संभव है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलेगा वो और उनके परिवार वाले सरकार के प्रति नतमस्तक होंगे और 2019 के चुनावों में सरकार को उनका वोट रूपी समर्थन जरूर मिलेगा. ऐसे में सवाल है कि क्या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी आम जनता का वोट मिलने की उम्मीद खोती जा रही है और आगामी चुनाव में जीत के हथकंडे के रूप में ऐसे फैसले ले रही है?? यह सवाल तब तक कायम रहेगा, जब तक जेलों से रिहा होने वाले लोगों के आंकड़े सामने नहीं आ जाते.

करन कुमार

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समाज

समाज और देश धीरे-धीरे बदल ही रहा था कि अचानक मनु के रखवाले देश के रहनुमा बन गए! और देश फिर से गुलाम हो गया। छिनने लगी आजादी पहले खाने की, फिर पहनने ओढ़ने की, फिर शिक्षा की, फिर धर्म की, फिर कर्म की, फिर मूर्ति की, फिर रंग की देश मे असमानता, जातिवाद, आडम्बर, अवैज्ञानिकता, रूढ़िवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार, हावी हो गए! इस तरह देश का जीवन और इंसानियत फिर से गुलाम हो गयी! जुगुल किशोर चौधरी इसे भी पढ़े-हुंकार
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हुंकार

बह रहा शोणित है तेरा फिर भी तू क्यों मौन है पूछ अपने आप से मानव है तू या कौन है जाति की जठराग्नि में हिन्दुत्व के अभिमान में हवन होते हैं  दलित जीते हैं वो अपमान में संविधान का नहीं उनको कोई अब डर रहा मनुवाद के दावानल में रोहित सरोज है मर रहा और तू बैठा हुआ चुप करता सिर्फ संताप है जुल्म को सहना भी होता बहुत ही पाप है उठ वरण कर वीरता का धनु कि तू टंकार दे घर से तू बाहर निकल और साथ में हुंकार दे। मुकेश गौरव Read it also-विकास
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