अब मीडिया सरकार की नहीं बल्कि सरकार मीडिया की निगरानी करती है: पुण्य प्रसून बाजपेयी

दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर के ठीक बगल में है सूचना भवन. सूचना भवन की 10वीं मंज़िल ही देश भर के न्यूज़ चैनलों पर सरकारी निगरानी का ग्राउंड ज़ीरो है. हर दिन 24 घंटे तमाम न्यूज़ चैनलों पर निगरानी रखने के लिए 200 लोगों की टीम लगी रहती है.

बीते चार बरस में यह पहला मौका आया है कि मॉनिटरिंग करने वालों के मोबाइल अब बाहर ही रखवा लिए जा रहे हैं. पहली बार एडीजी ने मीटिंग लेकर मॉनिटरिंग करने वालों को ही चेताया कि अब कोई सूचना बाहर जानी नहीं चाहिए जैसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ की मॉनिटरिंग की जानकारी बाहर चली गई.

ऐसे में बरसों-बरस से काम करने के बावजूद छह-छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे मॉनिटरिंग से जुड़े ऐसे 10 से 15 लोगों को हटाने की तैयारी हो चली है, जो मॉनिटरिंग करते हुए स्थायी सेवा और अधिक वेतनमान की मांग कर रहे थे.

वैसे मॉनिटरिंग करने वालों को साफ़ निर्देश है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को कौन सा न्यूज़ चैनल कितना दिखाता है, उसकी पूरी रिपोर्ट हर दिन तैयार हो. कुछ लालच अपनी छवि को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को लेकर भी है तो वह भी अपनी रिपोर्ट तैयार कराते हैं कि कौन सा चैनल उन्हें कितनी जगह देता है.

यानी न्यूज़ चैनल क्या दिखा रहे हैं… क्या बता रहे हैं… और किस दिन किस विषय पर चर्चा कराते हैं… उस चर्चा में कौन शामिल होता है… कौन क्या कहता है… किसके बोल सत्तानुकूल होते हैं… किसके सत्ता विरोध में… इन सब पर नज़र है. पर कन्टेंट को लेकर सबसे पैनी नज़र प्राइम टाइम के बुलेटिन पर और ख़ासकर न्यूज़ चैनल का रुख़ क्या है… कैसी रिपोर्ट दिखाई-बताई जा रही है… रिपोर्ट अगर सरकारी नीतियों को लेकर है तो अलग से रिपोर्ट में ज़िक्र होगा और धीरे-धीरे रिपोर्ट दर रिपोर्ट तैयार होती जाती है. फाइल मोटी होती है.

उसके बाद मॉनिटरिंग करने वालों की निगाहों में वह चेहरे भर दिए जाते हैं जिन कार्यक्रम पर ख़ास नज़र रखनी है. यानी रिपोर्ट दर रिपोर्ट का आकलन कुछ इस तरह होता है जिसमें सत्तानुकूल होने की ग्रेडिंग की जाती है और जो सबसे ज़्यादा सरकार का राग गाता है उन्हें आश्वस्त वाली कैटेगरी में डाला जाता है.

जो चैनल बीच की श्रेणी में आते हैं यानी प्रधानमंत्री का चेहरा कम दिखाते हैं, उन्हें मॉनिटरिंग टीम में से कोई फोन कर देता है और दोस्ती भरे अंदाज़ में चेताता है कि आपको और दिखाना चाहिए. संवाद कैसे होता है ये भी कम दिलचस्प नहीं है. बीते हफ़्ते ही नोएडा से चलने वाले यूपी केंद्रित एक चैनल के संपादक के पास फोन आया. पुराना परिचय देते हुए मीडिया पर बात हुई. उसके बाद दोस्ती भरे अंदाज़ में चेताया गया… आपका चैनल कम दिखाता है… किसे कम दिखाता है… अरे! अपने प्रधानमंत्री जी को. अरे नहीं! हम तो ख़ूब दिखाते हैं. वह आपके अनुसार ‘ख़ूब’ होता होगा हम तो मॉनिटरिंग करते हैं न. रिपोर्ट देख रहे थे आपके चैनल का नंबर कहीं बीच में है.अब आप कह रहे हैं तो और दिखाएंगे. अरे जैसा आप ठीक समझें…

तो ये सुझाव है या चेतावनी? सोचिए, कैसे चैनलों के बीच होड़ लगती होगी कि कौन ज़्यादा से ज़्यादा प्रधानमंत्री मोदी को दिखाता होगा. और कितनों को फोन दोस्ती में चेताने के लिए किया जाता होगा. हालांकि इसके आगे मॉनिटरिंग की पहल दोस्ती नहीं देखती. सुझाव के तौर पर उभरती है और इस बार फोन सूचना भवन से बाहर निकल कर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय या बीजेपी दफ्तर तक पहुंचता है, जिसमें किसी ख़ास ख़बर या किसी ख़ास मौके पर चैनल को लाइव काटने (दिखाना) से लेकर चर्चा का विषय तक बताने के लिए होता है. और चैनल ने अगर दिखाया नहीं या चर्चा न की जो सुझाव भरे अंदाज़ में चेतावनी भी होती है. जैसे, ‘अरे आप समझ नहीं रहे हैं… ये कितना महत्वपूर्ण मुद्दा है. आप संपादक हैं आप ही निर्णय लें, देश के लिए क्या ज़रूरी है ये तो समझें. आप देशहित को ध्यान में नहीं रखते. देखिये, वक़्त बदल रहा है, अब पुरानी समझ का कोई मतलब नहीं… आप तो समझते हैं… हमारा ध्यान दीजिए, नहीं तो हम आपके कार्यक्रम में आ नहीं पाएंगे.’

ये महत्वपूर्ण है कि इसके आगे के तरीके चैनलों के मालिकों तक पहुंचते हैं. सामान्य तौर पर तो अब मालिक ही ख़ुद को संपादक मानने लगे हैं तो प्रोफेशनल संपादक की हैसियत भी मालिक/संपादक के सामने अक्सर ट्रेनी वाली हो जाती है. पद-पैसा-मान्यता को बरक़रार रखने के लिए प्रोफेशनल संपादक भी अक्सर बदल जाता है. इन हालातों के बीच जब मॉनिटरिंग करने वालों की तैयार रिपोर्ट की फाइल किसी मालिक/संपादक के पास पहुंचती है तो दो प्रतिक्रियाएं साफ़ दिखाई देती हैं.

पहली, हमारा चैनल इतना शानदार है जो सरकार को नोटिस लेना पड़ा. दूसरा, इतनी मोटी फाइल में कुछ तो सच होगा. तो फिर संपादक की क्लास ली जाती है और चैनल नतमस्तक हो जाता है. हालांकि पहली प्रतिक्रिया के भी दो चेहरे हैं. एक, मालिक/संपादक को लगता है कि फाइल के ज़रिये सौदेबाज़ी की जा सकती है और दूसरा, अगर चैनल पर दिखाए गए तथ्य सही हैं तो फिर सरकारी फाइल सिवाय डराने के और कुछ नहीं.

ऐसे में पत्रकारिता की साख़ पर सवाल न उठे, ये सोच भी जागती है पर इस दायरे में कितने आ पाते हैं ये भी सवाल है. ऐसे मालिक/संपादक हैं, इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता. ख़ैर मॉनिटरिंग के इन तरीकों पर ग़ौर करने से पहले ये समझ लें कि मॉनिटरिंग का चेहरा मोदी सरकार की ही देन है, ऐसा नहीं है. हालांकि मोदी सरकार के दौर में मॉनिटरिंग के मायने और मॉनिटरिंग के ज़रिये मीडिया पर नकेल कसने का अंदाज़ ही सबसे महत्वपूर्ण हो गया है.

इनकार इससे भी नहीं किया जा सकता कि मनमोहन सिंह के दौर में यानी 2008 में ही मॉनिटरिंग की व्यवस्था शुरू हुई थी पर तब मनमोहन के दौर में ‘भारत निर्माण’ योजना केंद्र में थी. यानी ग्रामीण इलाकों में भारत निर्माण को लेकर चैनलों की कवरेज पर ध्यान.

2009 में अंबिका सोनी सूचना एवं प्रसारण मंत्री हुईं तो मॉनिरटिंग के ज़रिये संवेदनशील मुद्दों पर नज़र रखी जाने लगी. पर न तो मनमोहन सिंह, न ही अंबिका सोनी की इसमें रुचि जगी कि मॉनिटरिंग के ज़रिये छवि निखारने की सोची जाए. हां, जानकारी होनी चाहिए ये ज़रूर था.

छवि को लेकर चिंता कांग्रेसी दौर में मनीष तिवारी में जगी, जब वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने. उनके तेवर निराले थे. पर 2014 में सत्ता बदलते ही मॉनिटरिंग करने-देखने का नज़रिया ही बदल गया. पहले जहां 15 से 20 लोग काम करते थे, यह तादाद 200 तक पहुंच गई और बाकायदा सूचना भवन में शानदार तकनीक लगी. ब्रॉडकास्ट इंजीनिंयरिंग कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड के ज़रिये भर्तियां शुरू हुईं. ग्रेजुएट लड़के-लड़कियों की भर्ती शुरू हुई. ग्रेजुएट होने के साथ महज़ एक बरस के डिप्लोमा कोर्स वाले बच्चों को 28,635 रुपये देकर छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया. कभी किसी को स्थायी नहीं किया गया.

मॉनिटरिंग पद से ऊपर सीनियर मॉनिटरिंग (37,450 रुपये) और कंटेंट एडिटर (49,500 करोड़ रुपये) जिनकी कुल तादाद 50 हैं उन्हें भी स्थायी नहीं किया गया, भले ही उन्हें भी काम करते हुए चार बरस हो गए हों. यानी मॉनिटरिंग इस बात को लेकर कभी नहीं हुई कि चैनल उन मुद्दों को उठाते हैं या नहीं जो जन अधिकार से जुड़े हों, जो संविधान से जुड़े हों. बीते चार बरस से मॉनिटरिंग सिर्फ़ इसी बात को लेकर हो रही है कि प्रधानमंत्री मोदी की छवि कैसे निखारते रहें.

दिलचस्प तो ये भी है कि मॉनिटरिंग के निशाने पर सबसे पहले डीडी न्यूज़ ही आया, जिसने शुरुआत में ही प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्रा को सबसे कम कवरेज दिया. उसके बाद डीडी न्यूज़ में ही ख़ासा बदलाव हो गया. यानी मॉनिटरिंग का मतलब छवि बनाने, नीतियों के प्रचार-प्रसार में प्राइवेट चैनलों को भी लगा देना. तरीके कई रहे और प्रधानमंत्री के साथ बीते छह महीनों में दूसरा नाम बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का जुड़ा है.

अब चैनल दर चैनल उनके कवरेज के पैमाने को भी मापा जा रहा है और नए-नवेले सूचना प्रसारण मंत्री इस कड़ी में अपनी कवरेज की रिपोर्ट भी मंगाने लगे हैं. पहली बार ‘मास्टरस्ट्रोक’ प्रकरण के बाद सूचना भवन के इमरजेंसी सरीखे हालात हो गए हैं. लगातार पूछताछ, मीटिंग या निगरानी की जा रही है कि मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है. अब मॉनिटरिंग करने वालों के मोबाइल तक बाहर दरवाज़े पर रखवा लिए जा रहे हैं.मोबाइल नंबरों को भी खंगाला जा रहा है कि आख़िर कैसे मॉनिटरिंग करने वाले शख़्स ने ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ पर तैयार हो रही रिपोर्ट को बाहर पहुंचा दिया. अब मीडिया पर नकेल कसने के लिए मॉनिटरिंग की अनोखी मशक्कत जारी है.

पुण्य प्रसून बाजपेयी Read it also-राज्यसभा उपसभापति चुनाव में कांग्रेस की हार के जिम्मेदार कौन?
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…जब पीएम मोदी ने बढ़ाया हाथ और जेटली ने हाथ मिलाने से कर दिया इनकार!

नई दिल्ली। संसद में गुरुवार का दिन पूरी तरह से राज्यसभा के उपसभापति चुनाव का ही दिन था. लेकिन यह दिन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा कि करीब तीन महीने के रेस्ट के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली संसद में पहुंचे थे. इस दौरान एक दिलचस्प वाकया देखने को मिला. हरिवंश सिंह को राज्यसभा का उपसभापति चुने जाने के बाद बधाई देने के क्रम में जब पीएम मोदी ने अरुण जेटली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो उन्होंने हाथ मिलाने से इंकार कर दिया.

किडनी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन के बाद अरुण जेटली संसद में पहली बार आए थे. उन्होंने राज्यसभा के सभापति के चुनाव में अपना वोट दिया. हरिवंश सिंह की जीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी बधाई देने के लिए उनकी सीट की तरफ गए और उन्हें गर्मजोशी से हाथ मिलाकर बधाई दी. उसके बाद वह लौटकर अपनी सीट की ओर आए और बगल में बैठे नेता सदन अरुण जेटली की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन अरुण जेटली ने मुस्कराते हुए संकेत दिया कि वह हाथ नहीं मिला सकते. उन्होंने तत्काल हाथ जोड़कर नमस्कार कर लिया, जिसका पीएम मोदी ने जवाब भी दिया.

असल में, हाल में हुई किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी की वजह से उन्हें अपने को काफी बचाकर रखना है. डॉक्टरों ने यह सलाह दी है कि वह लोगों से मेलजोल कम से कम रखें. इसकी वजह से वह करीब तीन महीने से घर में ही बैठे थे. उनके वित्त मंत्रालय का प्रभार भी फिलहाल रेल मंत्री पीयूष गोयल संभाल रहे हैं.

यहां तक कि राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को पहले ही सदन में यह चेतावनी देनी पड़ी कि अरुण जेटली को कोई छूने या उनके करीब जाने की कोशिश न करे, क्योंकि अभी उनकी सेहत सुधार के क्रम में ही है.

सत्तारूढ़ एनडीए के नेताओं के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी जैसे विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं ने भी मेज थपथपा कर अरुण जेटली का स्वागत किया.

जेटली सदन के बाहर अपने चेहरे पर एक मास्क लगाए देखे गए थे, लेकिन सदन के अंदर उन्होंने इसे हटा लिया था. ऐसे संकेत हैं कि वह जल्दी ही अपना काम भी संभाल लेंगे.

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राज्यसभा उपसभापति चुनाव में कांग्रेस की हार के जिम्मेदार कौन?

नई दिल्ली। राज्यसभा उपसभापति चुनाव में एनडीए की ओर से जेडीयू उम्मीदवार हरिवंश ने कांग्रेस प्रत्याशी बीके हरिप्रसाद को करारी मात दी है. विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने की बाद कांग्रेस का चुनाव हार जाना अपने आप में सवाल खड़े कर रहा है. जबकि एनडीए बहुमत से कम होने के बाद जीत हासिल करने में कामयाब रही है. ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ये पांच गलतियां बीके हरिप्रसाद के हार की कारण बनीं.

राज्यसभा उपसभापति के चुनाव के ऐलान के बाद कांग्रेस उम्मीदवार के चयन को लेकर कश्मकश में उलझी रही. जबकि एनडीए ने चुनाव घोषणा के साथ अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था. विपक्ष में उम्मीदवार को लेकर नामांकन के दिन तक ही माथापच्ची होती रही.

विपक्ष की ओर से पहले एनसीपी की वंदना चव्हाण का नाम सामने आया. इसके बाद नामांकन के दिन आखिरी समय पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पत्ते खोले और बीके हरिप्रसाद के नाम का ऐलान किया. कांग्रेस का जब तक उम्मीदवार घोषित होता तब तक विपक्ष के कई दलों से एनडीए उम्मीदवार को समर्थन आश्वासन दे चुके थे. ऐसे में इसकी सीधे जिम्मेदार राहुल गांधी को माना जा रहा है.

राज्यसभा उपसभापति के पद के लिए कांग्रेस की ओर बीके हरिप्रसाद के उतरने से लड़ाई विपक्ष की न रहकर कांग्रेस की व्यक्तिगत बन गई. इसीलिए कांग्रेस की ओर से ही समर्थन जुटाने की कोशिश की गई, लेकिन यूपीए के बाकी घटक दल सिर्फ वोट देने तक ही सीमित रखा. जबकि वहीं, एनडीए की ओर से जेडीयू के हरिवंश उम्मीदवार थे.बावजूद इसके पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सहित एनडीए के सहयोगी दलों ने विपक्ष के कई दलों से समर्थन के लिए बातचीत की.

राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव जीतने के लिए जिस तरह से एनडीए सक्रिय रही. कांग्रेस में उस तरह सक्रियता नहीं दिखा सकी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहीं नजर नहीं आए. इसी का नतीजा था कि विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने के बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा. जबकि एनडीए ने अपने दलों को साधे रखने के साथ-साथ विपक्ष के कई दलों के समर्थन जुटाने में कामयाब रही. एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी जैसे दलों ने विपक्ष में होने के बाद भी एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में वोटिंग की. हालांकि राहुल गांधी कोशिश करते तो इन दलों का समर्थन हासिल कर सकते थे.

आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस और पीडीपी ने राज्यसभा उपसभापति के मतदान से अपने आपको बाहर रखा था. जबकि आम आदमी पार्टी के सासंद संजय सिंह कहते रहे है कि कांग्रेस समर्थन चाहिए तो राहुल गांधी को हमारी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से बात करें.

राहुल बात नहीं कर सके, जिसके चलते आप का समर्थन नहीं मिला. इसी तरह अगर राहुल गांधी पीडीपी औैर वाईएसआर कांग्रेस से भी बात करते तो हो सकता था कि ये दल उन्हें समर्थन दे देते, लेकिन इसकी कोशिश नहीं की गई.बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में जेडीयू के उम्मीदवार के उतरने से शिवसेना और अकाली दल की नाराजगी खुलकर सामने आई थी. सत्तापक्ष के ये दोनों दल इस पद पर अपना उम्मीदवार चाहते थे. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस नाराजगी का फायदा उठा सकते थे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके. जबकि वहीं पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने समय रहते हुए अपने सहयोगी दलों से बातचीत करके उन्हें साधने में कामयाब रहे हैं. इतना ही नहीं विपक्ष के कई दलों में सेंध लगाई. इसी का नतीजा है कि एनडीए बहुमत से कम होने की बावजूद जीतने में कामयाब रही. जबकि विपक्ष पर्याप्त संख्या होने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा.

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जानिये कौन है राज्य सभा के उपसभापति

नई दिल्ली। देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में गुरुवार को उपसभापति पद का चुनाव हुआ. एनडीए गठबंधन की ओर से जेडीयू सांसद हरिवंश मैदान में थे, वहीं विपक्ष की तरफ से बीके हरिप्रसाद उनके सामने थे.हरिवंश को 125 वोट मिले, जबकि हरिप्रसाद के खाते में 105 वोट आए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश को राज्यसभा का उपसभापति चुने जाने पर बधाई दी. राज्यसभा सांसद पीजे कुरियन के उच्च सदन से रिटायर होने की वजह से यह पद इस साल जून से ही खाली थी. कुरियन केरल से कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद बने थे.

कौन हैं हरिवंश

सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार हरिवंश जेडीयू से राज्यसभा सदस्य हैं. जेडीयू ने 2014 में उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजा. 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में हरिवंश जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहे थे तभी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनका चयन हो गया. वो साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उपसंपादक रहे. लेकिन बाद में कुछ दिनों के लिए बैंक में भी काम किया फिर पत्रकारिता में वापसी की और 1989 तक ‘आनंद बाजार पत्रिका’ की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ में सहायक संपादक रहे.

इसके बाद वो 25 सालों से भी अधिक समय के लिए प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक रह चुके हैं. राज्यसभा में आने से पहले वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (1990-91) भी रह चुके हैं. 62 साल के हरिवंश बिहार और झारखंड में वहां के जाने-माने अखबार ‘प्रभात खबर’ के एडिटर रहे हैं. खास बात ये है कि वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के भी काफी करीबी रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में हरिवंश के बारे में कहा, “हरिवंश जी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी थे और चंद्रशेखर के इस्तीफ़ा देने की जानकारी उन्हें पहले से ही थी, लेकिन उन्होंने अखबार की लोकप्रियता के लिए इस खबर को लीक नहीं किया.”

बीके हरिप्रसाद विपक्ष के उम्मीदवार 

विपक्ष की तरफ से कांग्रेस सांसद बीके हरिप्रसाद को उपसभापति पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है. पहली बार राज्यसभा के लिए 1990 में चुने गए बीके हरिप्रसाद का यह उच्च सदन में तीसरा कार्यकाल है और वो ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी हैं. कांग्रेस के महासचिव रह चुके बीके हरिप्रसाद का जन्म बैंगलुरू में 29 जुलाई 1954 में हुआ था.

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जानिये कौन है देवरिया बालिका गृह चलाने वाली महिला…

नई दिल्ली। देवरिया में बालिका संरक्षण गृह में कथित तौर पर लड़कियों के साथ यौन शोषण होने का मामला हाल ही में सामने आया और उसकी संचालक गिरिजा त्रिपाठी अब पुलिस की गिरफ़्त में है.

लेकिन गिरिजा त्रिपाठी पिछले बीस साल से एक-दो नहीं बल्कि गोरखपुर और देवरिया में कई महिला संरक्षण गृह चला रही हैं और इस दौरान दिनों-दिन उनकी तरक़्क़ी भी होती रही.

गिरिजा त्रिपाठी और उनके पति मोहन त्रिपाठी को क़रीब से जानने वाले दिनेश मिश्र बताते हैं, “मोहन त्रिपाठी यहीं नूनखार गांव के रहने वाले हैं. पहले भटनी चीनी मिल में काम करते थे.”

“बाद में मिल बंद हो गई तो नौकरी भी चली गई. गिरिजा त्रिपाठी ने वहीं पर एक संस्था बनाकर महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई सिखाना शुरू किया और बाद में वो मां विंध्यवासिनी सेवा समिति बनाकर महिला संरक्षण गृह चलाने लगीं.”

दिनेश मिश्र बताते हैं कि इस संस्था के नाम पर वो कई महिला संरक्षण गृह, विधवा आश्रम और कुछ परामर्श केंद्र चलाती हैं.

सम्मानित होती रहीं है गिरिजा त्रिपाठी

गिरिजा त्रिपाठी आज लोगों की नज़रों में ‘खलनायिका’ जैसी दिख रही हों लेकिन अब से कुछ दिन पहले तक देवरिया और गोरखपुर में उनकी छवि एक समाजसेवी की थी.

सरकारी और ग़ैर-सरकारी स्तर पर चलने वाली कई सामाजिक संस्थाओं और समितियों की वो सदस्य रही हैं. रेडक्रॉस सोसाइटी जैसी संस्थाएं उन्हें सम्मानित करती रही हैं.

पिछले साल फिक्की ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम करने वाली देश की जिन 150 महिलाओं को सम्मानित किया था, उसमें गिरिजा त्रिपाठी भी शामिल थीं. उन्हें कई स्थानीय कार्यक्रमों में बतौर अतिथि बुलाया जाता रहा था.

बताया जाता है कि ज़िले के अफ़सरों से लेकर राजनीतिक दलों के नेताओं तक से उनके अच्छे संबंध रहे हैं और जानकारों के मुताबिक, यही वजह रही है कि उनकी संस्थाओं में अंदरखाने क्या हो रहा है, ये किसी को पता नहीं चल पाया और इन संस्थाओं को सरकारी फंड मिलता रहा.

जिला पुलिस ने उन्हें दी थी बड़ी ‘भूमिका’

गिरिजा त्रिपाठी की बेटी कंचनलता त्रिपाठी भी इन संस्थाओं को चलाने में उनका सहयोग करती थी और बीजेपी के एक नेता के साथ उनकी तस्वीर घटना के सामने आने के बाद काफ़ी चर्चा में है. कंचनलता त्रिपाठी भी फ़िलहाल पुलिस की गिरफ़्त में है.

वैसे दिलचस्प संयोग ये है कि कुछ समय पहले ही ज़िला पुलिस ने महिला ऐच्छिक ब्यूरो में गिरिजा त्रिपाठी को बड़ी भूमिका दी थी.

देवरिया के पुलिस अधीक्षक रोहन पी कनय बताते हैं, “जब तक किसी के बारे में कोई ग़लत जानकारी न मिल रही हो तो महिलाओं की सेवा में लगे किसी भी व्यक्ति या संस्था को सम्मानित करने में कोई हर्ज़ नहीं. लेकिन जैसे ही हमें अनियमितता की बात पता चली तो निगरानी भी रखी गई और सख़्ती भी बरती गई.”

राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़

ज़िला प्रशासन के ही एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “गिरिजा त्रिपाठी, उनके कारनामे और उनकी प्रतिष्ठा उस राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक गठजोड़ की सच्चाई है जो दिखती सबको है लेकिन आधिकारिक और क़ानूनी रूप से सामने कभी-कभी ही आती है. डीएम, एसपी से लेकर ऐसा कोई अधिकारी नहीं होगा जिसे छोटे से शहर में स्थित इस संस्था के बारे में पता न हो लेकिन कभी ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि यहां वास्तव में होता क्या है.”

हालांकि ये अधिकारी एक झटके में गिरिजा त्रिपाठी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराते हैं. उनके मुताबिक ये मामला वास्तव में तब इतना तूल पकड़ा, जब विभागीय अधिकारियों से ही गिरिजा त्रिपाठी की अनबन हो गई.

ख़ुद गिरिजा त्रिपाठी भी गिरफ़्तार होने से पहले मीडिया से बात करते हुए ये कह चुकी हैं. उन्होंने चुनौती भी दी थी कि जिस लड़की ने महिला थाने जाकर यौन शोषण जैसी घटना का ज़िक्र किया है, उससे ये बातें ज़बरन कहलवाई गई हैं.

गिरिजा त्रिपाठी को जानने वाले दिनेश मिश्र बताते हैं कि गिरिजा त्रिपाठी ने पहले अपनी संस्था का काम चीनी मिल में अपने पति को मिले छोटे से कमरे से शुरू किया था लेकिन मिल के बंद हो जाने के बाद ये लोग साल 2002 के आस-पास देवरिया आकर यहीं काम करने लगे.

देखते-देखते अमीर बन गई गिरिजा त्रिपाठी

जानकारों के मुताबिक देवरिया आने के बाद इन लोगों का पहले से चल रहीं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े लोगों से संपर्क हुआ और देखते-देखते गिरिजा त्रिपाठी देवरिया के जाने माने लोगों में शुमार हो गईं. धीरे-धीरे गिरिजा त्रिपाठी को बालिका गृह, शिशु गृह के साथ ही गोरखपुर और देवरिया में वृद्धाश्रम चलाने की भी अनुमति मिल गई.

गिरिजा त्रिपाठी के पड़ोसियों का कहना है कि इन सारी संस्थाओं को चलाते हुए उन्होंने काफ़ी संपत्ति अर्जित की और फिर देवरिया के ही रजला इलाक़े में एक शानदार घर बनवाया.

पड़ोसियों के मुताबिक़ ज़िले में आने वाला कोई बड़ा अधिकारी ऐसा नहीं था जिसकी गिरिजा त्रिपाठी से नज़दीकी न रही हो. यही वजह है कि देवरिया से लेकर दिल्ली तक उन्हें नारी संरक्षण और समाजसेवा के क्षेत्र में तमाम सम्मान और पुरस्कार मिले हैं.

स्टेशन रोड स्थित जिस संस्था पर गत दिनों छापा पड़ा, वहां भी परिवार परामर्श केंद्र चलता था जहां गिरिजा त्रिपाठी बिछड़े और टूटे परिवारों को मिलाने में सहयोग करती थीं.

फ़िलहाल गिरिजा त्रिपाठी, उनके पति मोहन त्रिपाठी और उनकी बेटी कंचनलता त्रिपाठी पुलिस की गिरफ़्त में हैं.

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आजादी के लड़ाई की बहुजन नायिका: ऊदा देवी पासी

वीरांगना ऊदा देवी के सम्बंध में अधिक जानकारी का अभाव है. कुछ लेखकों द्वारा उनका वाजिद अली शाह की सेना में आना उनके पति के कारण माना जाता है, तो कुछ लोगों के मुताबिक वह सीधे वाजिद अली शाह की महिला सेना में भर्ती हुई थीं. दरअसल नवाब वाजिद अली शाह ने बड़ी मात्रा में अपनी सेना में सैनिकों की भर्ती की, जिसमें लखनऊ के सभी वर्गों के गरीब लोगों को नौकरी पाने का अच्छा अवसर मिला.

ऊदा देवी के पति मक्का पासी भी वाजिद अली शाह की सेना में भर्ती हो गए. वह काफ़ी साहसी व पराक्रमी थे. वह लखनऊ के गांव उजरियांव के रहने वाले थे. अंग्रेजों ने लखनऊ के चिनहट में हुए संघर्ष में मक्का पासी और उनके तमाम साथियों को मौत के घाट उतार दिया था. अपने पति की मौत के बाद ऊदा देवी पासी अंग्रेजों से बदला लेने का मौका तलाशने लगीं. जिसके बाद उन्होंने 3 दर्जन अंग्रेज सैनिकों को अकेले मार गिराया था. इस कहानी का पूरा जिक्र हम आगे करेंगे.

जहां तक शहीद वीरांगना ऊदादेवी की बात है तो उनके संदर्भ में सबसे पहले लंदन की इंडियन हाऊस लाइब्रेरी में 1857 के गदर से संबंधित कुछ दस्तावेज व अंग्रेज लेखकों की पुस्तकें प्राप्त हुईं जिसके अनुसार ऊदादेवी नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दस्ते की कप्तान थीं.

ऊदा देवी ने वर्ष 1857 के ‘प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ के दौरान भारतीय सिपाहियों की ओर से युद्ध में भाग लिया था. इस विद्रोह के समय हुई लखनऊ की घेराबंदी के समय लगभग 2000 भारतीय सिपाहियों के शरण स्थल ‘सिकन्दर बाग़’ पर ब्रिटिश फौजों द्वारा चढ़ाई की गयी. 16 नवंबर, 1857 को बाग़ में शरण लिये इन 2000 भारतीय सिपाहियों का ब्रिटिश फौजों द्वारा संहार कर दिया गया था. इस दौरान वीरांगना ऊदा देवी पासी ने अंग्रेजों से सीधा लोहा लिया.

ऊदा देवी ने पुरुषों के कपड़े पहन कर खुद को एक पुरुष सैनिक के रूप में तैयार किया. और एक बंदूक और कुछ गोला-बारूद लेकर एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गयी. उन्होंने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया, जब तक कि उनका गोला बारूद समाप्त नहीं हो गया. ऊदा देवी 16 नवम्बर, 1857 को 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हुईं.

ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें उस समय गोली मारी, जब वे पेड़ से उतर रही थीं. जब ब्रिटिश सैनिकों ने बाग़ में प्रवेश किया, तो उन्होंने ऊदा देवी का पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. इस लड़ाई का स्मरण कराती ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकन्दर बाग़ परिसर में स्थापित की गई है.

उनकी वीरता का दस्तावेज विदेशों अखबारों में भी दर्ज किया गया. ‘लंदन टाइम्स’ के संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई के समाचारों का जो डिस्पैच लंदन भेजा था, उसमें पुरुष वेशभूषा में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से गोलियाँ चलाने तथा अंग्रेज़ सेना को भारी क्षति पहुँचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया है. संभवतः ‘लंदन टाइम्स’ में छपी खबरों के आधार पर ही बाद में कार्ल मार्क्स ने भी अपनी टिप्पणी में इस घटना को समुचित स्थान दिया था.

कहा जाता है कि उनकी इस स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर अंग्रेज़ काल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर शहीद ऊदा देवी को श्रद्धांजलि दी थी.

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पेरियार से प्रभावित थे करुणानिधि, झेलना पड़ा था जातिवाद

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी DMK प्रमुख एम करुणानिधि नहीं रहें. 94 साल की उम्र में 7 अगस्त को उनका निधन हो गया. द्रविड़ आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हें दफनाया जाएगा. मद्रास हाईकोर्ट की अनुमति के बाद उन्हें चेन्नई के मरीन बिच पर दफनाया जाएगा. करुणानिधि राजनीति के वो दिग्गज थे, जिनके सामने से भारतीय राजनीति के लगभग सारे मुकाम गुज़रे थे. इस उम्र में भी करुणानिधि ही DMK के कर्ताधर्ता थे.

करुणानिधि के जीवन की तमाम बातें लोगों को पता है. मसलन, उन्होंने तीन शादियां की थी. सक्रिय राजनीति में आने से पहले वो तमिल फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर थे. फिल्मों से राजनीति में आने का उनका किस्सा भी किसी फिल्म की कहानी सरीखा ही है. राजनीति के इस नायक को कोई टक्कर दे सका तो वे तमिल फिल्मों के असली महानायक एमजीआर और उनकी शिष्या जयललिता ही थे. बावजूद इसके 1969 से लेकर 1977 का दशक ऐसा था जब करुणानिधि और तमिलनाडु की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे और उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं था. करुणानिधि पिछले 62 सालों में एक भी चुनाव नहीं हारे थे. फिलहाल वे थिरुवारुर सीट से MLA थे.

लेकिन जो बातें लोगों को नहीं पता है, उसका जिक्र करना भी जरूरी है. मसलन, खासकर उत्तर भारत के लोगों को यह बात कम पता है कि करुणानिधि को जातिवाद का सामना करना पड़ा था. उन्हें बचपन में ही संगीत सीखने के दौरान छूआछूत का शिकार होना पड़ा था. करुणानिधि का परिवार एक खास वाद्यंत्र बजाता था. बालक करुणानिधि के लिए भी यह सीखना जरूरी था, लेकिन उन्हें उनकी जाति के चलते कम वाद्ययंत्र सिखाये जाते थे. यह बात उन्हें बुरी लगती थी. इस कारण करुणानिधि का मन संगीत में नहीं लगा.

उनके मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसके बाद वह जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ दक्षिण में बिगुल फूंकने वाले ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से जुड़ गए. इस तरह करुणानिधि काफी कम उम्र में ही द्रविड़ लोगों के ‘आर्यन ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गये.

जब सन् 1937 में तमिलनाडु में हिन्दी अनिवार्य भाषा के तौर पर लाया जा रहा था. करुणानिधि इस कदम के विरोध में उठ खड़े हुये. तब उनकी उम्र मात्र 14साल की थी. इस उम्र में ही वो इसके खिलाफ नारे लिखने लगे थे. इसी दौरान उनकी धारदार शैली पर ‘पेरियार’ और ‘अन्नादुराई’ की नजर गई. ये दोनों उस दौर में तमिल राजनीति के महारथी हुआ करते थे.

करुणानिधि के लेखन और बात रखने की असाधारण क्षमता से प्रभावित होकर इन्होंने करुणानिधि को अपनी पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया. लेकिन देश की आजादी के साथ ही पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए और करुणानिधि अन्नादुराई के साथ उनके रास्ते पर चले आये. लेकिन अलग होने के बावजूद उनके पूरे जीवन पर पेरियार के विचारों का प्रभाव बना रहा. इसी प्रभाव की वजह से ईश्वर के अस्तित्व से करुणानिधि ने सीधा इंकार कर दिया था.

सितंबर, 2007 में दिया उनके भाषण का यह वाक्य उनकी शैली और विचारों की एक नज़ीर पेश करता है, जिसमें पेरियार से प्रभावित इस दिग्गज नेता ने कहा था- “लोग कहते हैं कि सत्रह लाख साल पहले एक आदमी हुआ था. उसका नाम राम था. उसके बनाए पुल रामसेतु को हाथ ना लगायें. कौन था ये राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट हुआ था? कहां है इसका सबूत?”

तमिलनाडु में पेरियार द्वारा लगाई गई और अन्नादुराई और करुणानिधि की संभाली गई गैर ब्राह्मणवादी, हिन्दी विरोधी राजनीति का बोलबाला आज तक है, क्योंकि उसे करुणानिधि जैसे बड़े नेता द्वारा मजबूत आधार मिला. करुणानिधि को दलित दस्तक की श्रद्धांजलि.

बसपा प्रमुख ने करुणानिधि को यूं दी श्रद्धांजली

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एम. करुणानिधि की अनसुनी बातें

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Ø तामिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि नहीं रहें Ø उनका जन्म 3 जून 1924 को तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले में हुआ था Ø वो 94 साल के थे और पिछले कुछ दिनों से बीमार थे Ø सेहत की वजह से वो बीते दो साल से राजनीति से दूर थे Ø बचपन में संगीत सीखने के दौरान उन्हें जातिभेद का सामना करना पड़ा था Ø पेरियार और अन्नादुराई ने पहली बार करुणानिधि की प्रतिभा को पहचाना Ø पेरियार से काफी प्रभावित थे करुणानिधि Ø वह करीब 8 दशकों तक राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहे Ø उन्होंने कुल 13 बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और हमेशा जीते Ø 27 जुलाई 1969 को करुणानिधि डीएमके के अध्यक्ष बने Ø 1969 में ही वो पहली बार मुख्यमंत्री बनें Ø वो दिल्ली की राजनीति से दूर ही रहे Ø वो पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे Ø करुणानिधि ने आखिरी विधानसबा चुनाव थिरुवरूर विधानसभा सीट से जीता था Ø करुणानिधि ने अपने बेटे एम.के स्टालिन को अपना राजनीतिक वारिस घोषित किया है Ø राजनीति से पहले वो फिल्मों में सक्रिय थे Ø उन्होंने करीब 50 तमिल फिल्मों की पटकथा और संवाद लेखा Ø उन्होंने तीन शादियां की थी Ø उनका काला चश्मा उनकी खास पहचान था Ø अपने चश्मे से उन्हें इतना लगाव था कि उन्होंने इसे 46 साल बदला 2017 में बदला Ø पुराना चश्मा भारी होने के कारण उन्होंने नया हल्का चश्मा पहनना शुरू किया Ø करुणानिधि ने 1960 में एक्सीडेंट में एक आंख खराब होने के कारण काला चश्मा पहनना शुरू किया Ø 40 दिन तक तलाश किए जाने के बाद यह चश्मा जर्मनी से आया था Ø सबसे पहले पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन से जु़ड़े थे करुणानिधि Ø आर्यन ब्राह्मणवाद के खिलाफ आंदोलन में भी थे शामिल करुणानिधि Ø करुणानिधि के समर्थक उन्हें कलाईनार (कला का विद्वान) कह कर बुलाते थे इसे भी पढ़े-अण्णाभाऊ साठेः महाराष्ट्र की धरती का तड़पता सूरज
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विदेशी जमीन पर दोहरा शतक मारने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज

नई दिल्ली। आज भारतीय क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई की 78वीं जयंती है. उनके जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बना कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है. सरदेसाई को स्पिन बॉलिंग के खिलाफ भारत का सर्वश्रेष्‍ठ बल्‍लेबाज माना जाता था. सरदेसाई की शानदार बल्लेबाजी की बदौलत भारतीय क्रिकेट ने 1971 में सही मायनों में जब चलना सीखा था, तब वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड जैसी टीमों को उन्हीं की जमीन पर हराना शुरू किया था. गूगल द्वारा बनाए गए डूडल में सरदेसाई बैट से बॉल को मारते हुए दिखाई दे रहे हैं.

दिलीप सरदेसाई का जन्म 8 अगस्त 1940 को गोवा में हुआ था, वह गोवा के पहले ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने टीम इंडिया के लिए खेला था. उन्होंने 1959 में स्कूल टूर्नामेंट में शानदार 435 रन बनाकर क्रिकेट जगत में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराई थी. सरदेसाई ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत सन 1959-60 में यूनिवर्सिटीज के बीच होने वाली रोहिंटन बारिया ट्रॉफी से की थी. जिसमें उन्‍होंने 87 की औसत से कुल 435 रन बनाए थे. सन 1960-61 में भारत में यूनिवर्सिटीज के खिलाफ खेलने आई पाकिस्‍तान टीम के खिलाफ उन्‍होंने पुणे में 194 मिनट तक डटे रहकर 87 रन बनाए थे.

सरदेसाई पहले भारतीय बल्लेबाज थे, जिन्होंने विदेशी जमीन पर दोहरा शतक मारा था. अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में उनकी शुरुआत इंग्‍लैंड के खिलाफ 1961 में हुई थी. 30 मैंचों की 55 पारियों में उन्होंने 39.23 के औसत से कुल 2001 रन बनाए थे. उनका सर्वाधिक स्कोर 212 रन है, जो उन्होंने 1971 में वेस्टइंडीज के खिलाफ किंग्स्टन के सबीना पार्क में बनाया था. हालांकि सरदेसाई ने अपने पूरे टेस्ट क्रिकेट करियर में सिर्फ दो छक्के मारे थे. उन्होंने अपने पूरे करियर में प्रथम श्रेणी के 179 मैचों की 271 पारियों में 41.75 की औसत से कुल 10230 रन बनाए थे. इनमें 25 शतक और 56 अर्द्धशतक शतक शामिल हैं.

2 जुलाई 2007 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था. चेस्ट इंफेक्शन के बाद उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल में एडमिट किया गया था, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली थी.

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देश भर के 9000 शेल्टर होम की होगी जांच

नई दिल्ली। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दो राज्यों के बालिका गृहों में यौन उत्पीड़न के मामले सामने आने के बाद अब केंद्र सरकार ने पूरे देश में मौजूद 9000 शेल्टर होम का ऑडिट करने का आदेश दिया हैं. ये रिपोर्ट दो महीने में जमा करनी होगी.

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है, ”मैंने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से कहा है कि दो महीनों में सभी बाल देखभाल संस्थानों का सोशल ऑडिट सुनिश्चित किया जाए. इसके लिए मैंने प्रारूप भी तैयार कर दिया है.”

ऑडिट का ये नया प्रारूप पुराने से अलग होगा जिसमें सिर्फ़ बच्चों व बेड की संख्या और अन्य सुविधाओं की जांच की जाती थी.

अब शेल्टर होम चलाने वालों की पृष्ठभूमि और बच्चों की हालत की भी जांच की जाएगी.

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अलविदा करुणानिधि

नई दिल्ली। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की मौत के साथ ही दक्षिण भारत की राजनीति का एक लंबा चला अध्याय खत्म हो गया. मंगलवार 7 अगस्त को इस दिग्गज नेता ने 94 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. करुणानिधि की मौत की खबर से तमिलानाडु समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई. उनके समर्थक छाती पीटकर रोते देखे गए. इस बीच उनके पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों की संख्या में नेतागण व समर्थक चेन्नई के राजाजी हॉल पहुंच रहे हैं. हाईकोर्ट ने उनके शरीर को चेन्नई के मरीना बीच पर दफनाने की अनुमति दे दी है.

भारतीय राजनीति में करुणानिधि के कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको श्रद्धांजलि देने के लिए तमाम दिग्गज नेता चेन्नई में राजाजी हॉल पहुंचे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी करुणानिधि को श्रद्धांजलि देने चेन्नई पहुंचे. इसके अलावा रक्षा मंत्री निर्मला सीतारामण, कमल हासन, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी, जयललीता की भतीजी दीपा जयकुमार सहित तमाम दिग्गजों ने राजाजी हाल पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दक्षिण के दिग्गज नेता को श्रद्धांजलि दी.

राजधानी दिल्ली में राज्यसभा और लोकसभा में डीएमके प्रमुख करुणानिधि को श्रद्धांजलि देने के बाद सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित हो गई. विदुथलाई चिरुथईगल कात्ची (वीसीके) प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने तमिलनाडु के श्रद्धांजलि देने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के लिए भारत रत्न की मांग की. तो वहीं दूसरी ओर मद्रास हाईकोर्ट द्वारा करुणानिधि के पार्थिव शरीर को चेन्नई के मरीन बीच पर दफनाने की अनुमति मिलते ही उनके बेटे स्टालिन और बेटी कनिमोझी फूट-फूट कर रोने लगे.

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बसपा प्रमुख ने करुणानिधि को यूं दी श्रद्धांजली

M. KARUNANIDHI (1924-2018)

नई दिल्ली।बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने द्रविड़ मूवमेन्ट के जाने-माने नेता व तमिलनाडु के पाँच बार रहे मुख्यमंत्री श्री करूणानिधि के निधन पर गहरा दुःख व शोक व्यक्त किया है.

पार्टी द्वारा जारी एक शोक संदेश में सुश्री मायावती जी ने करुणानिधि के परिवार के साथ-साथ उनके करोड़ों अनुयायियों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति देने की कुदरत से प्रार्थना की है.

करुणानिधि को श्रद्धांजलि देते हुए सुश्री मायावती ने कहा कि ग़रीबों, किसानों, मज़दूरों व अन्य मेहनतकश अवाम के लिये आजीवन संघर्ष करते रहने वाले श्री करूणानिधि  के निधन से तमिलनाडु को ही नहीं बल्कि देश को अपूर्णीय क्षति हुई है. वे देश की राजनीति में भी अपने योगदान के लिये हमेशा याद किये जाते रहेंगे.

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आजादी के बहुजन नायकः उदईया चमार और मातादीन वाल्मीकि

पहले स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर तिलका मांझी और उनके साथियों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए युद्ध की आग आगे बढ़ चली थी. इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल 1804 में बजा. छतारी के नवाब नाहर खां अंग्रेजी शासन के कट्टर विरोधी थे. 1804 और 1807 में उनके पुत्रों ने अंग्रेजों से घमासान युद्ध किया. इस युद्ध में जिस व्यक्ति ने उनका भरपूर साथ दिया वह उनके परम मित्र उदईया थे. हालांकि उदईया चमार के बारे में बहुत विस्तृत जानकारी नहीं है, लेकिन यह साफ है कि उनकी वीरता का लोहा अंग्रेज भी मानते थे. अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में नवाब नाहर खां की ओर से लड़ते हुए उन्होंने अकेले ही सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया. बाद में उदईया चमार पकड़े गए और उन्हें फांसी दे दी गई. उदईया की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों में प्रचलित हैं.

इसके बाद देश 1857 की क्रांति की ओर बढ़ चला था. 1857 की क्रांति ऐसी थी, जिसके बाद अंग्रेजों और भारतीयों के बीच लगातार सीधी लड़ाई लड़ी जाने लगी. 1857 की क्रांति को घोषित तौर पर पहला स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध माना जाता है. भारतीय इतिहासकारों द्वारा इस पूरी क्रांति का श्रेय मंगल पांडे को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस क्रांति के सूत्रधार थे मातादीन वाल्मीकि.

मातादीन के पुरखे अंग्रेजी शासन में सरकारी नौकरी में रहे थे. अतः शीघ्र ही मातादीन को भी बैरकपुर फैक्ट्री में खलासी की नौकरी मिल गई. यहां अंग्रेज सेना के सिपाहियों के लिए कारतूस बनाए जाते थे. इन्हीं कारतूसों को तमाम हिन्दू सैनिक अपने मुंह से खिंचकर और बंदूकों में भरकर इस्तेमाल करते थे. अंग्रेजी फौज के निकट रहने के कारण मातादीन के जीवन पर उसका खासा असर पड़ा था.

मातादीन को पहलवानी का भी शौक था. वह इस मल्लयुद्ध कला में दक्षता हासिल करना चाहते थे, लेकिन अछूत होने के कारण कोई भी हिन्दू उस्ताद उन्हें अपना शागिर्द बनाने को तैयार नहीं होता था. आखिरकार मातादीन की मल्लयुद्ध सीखने की इच्छा पूरी हुई और एक मुसलमान खलीफा इस्लाउद्दीन जो पल्टन नंबर 70 में बैंड बजाते थे, मातादीन को मल्लयुद्ध सिखाने के लिए राजी हो गए. इसी मल्लयुद्ध कला की बदौलत ही मातादीन की जान-पहचान मंगल पाण्डे से हुई थी. लेकिन जल्दी ही मातादीन की जाति जानने के बाद उनके प्रति मंगल पांडे का व्यवहार बदल गया.

एक दिन गर्मी से तर-बतर, थके-मांदे, प्यासे मातादीन ने मंगल पाण्डे से पानी का लोटा मांगा. मंगल पाण्डे ने इसे एक अछूत का दुस्साहस समझते हुए उन्हें झिड़क दिया और कहा, ‘अरे भंगी, मेरा लोटा छूकर अपवित्र करेगा क्या?’ फिर क्या था, इस अपमान से जले मातादीन ने वो राज खोल दिया, जो सालों से दबा हुआ था, और जिसने 1857 की क्रांति की नींव रख दी. मातादीन ने मंगल पांडे को ललकार दिया और कहा कि पंडत, तुम्हारी पंडिताई उस समय कहा चली जाती है जब तुम और तुम्हारे जैसे चुटियाधारी गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से काटकर बंदूकों में भरते हो.’

यह सुनकर मंगल पांडे सन्न रह गया. जल्दी ही मातादीन की ये बात हर बटालियन और हर छावनी में फैल गई. मातादीन द्वारा कहे कड़वे सच ने सेना में विद्रोह की स्थिति बना दी. सारे हिन्दू सैनिक सुलग रहे थे. 1 मार्च, 1857 को मंगल पाण्डे परेड मैदान में लाईन से निकल कर बाहर आ गया और एक अधिकारी को गाली मार दी, जिसके बाद विद्रोह बढ़ता चला गया. इसके बाद मंगल पाण्डे को फांसी पर लटका दिया गया. मंगल पांडे को फांसी देने की बात सभी जानते हैं. लेकिन एक सच से तमाम लोग आज भी अंजान हैं. विद्रोह फैलाने के जुर्म में अंग्रेजों ने मातादीन को भी गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद मातादीन को भी अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया.

इस तरह मातादीन वाल्मीकि ने जो चिंगारी लगाई थी, आखिरकार वह चिंगारी सन् 1947 में भारत के आजाद होने की वजह बनी.

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भारत-पाकिस्तान पर ओमपुरी का आखिरी इंटरव्यू वायरल

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नई दिल्ली।  पिछले साल यानी 2017 में बॉलीवुड ने ओम पुरी जैसे दिग्गज एक्टर को खो दिया. निधन से 6 महीने पहले तक ओम पुरी ने अपनी आखिरी फिल्म ‘लस्थम-पस्थम’ की शूटिंग की थी. यह फिल्म भारत-पाक संबंधों पर बनी है. फिल्म को लेकर ओम पुरी ने एक इंटरव्यू भी दिया था. जिसे उनका आखिरी इंटरव्यू कहा जा रहा है.

खबरों की मानें तो इस इंटरव्यू के एक हफ्ते बाद ही ओम पुरी का निधन हो गया था. फिल्म ‘लस्थम-पस्थम’ में ओम पुरी ने एक टैक्सी ड्राइवर का रोल निभाया है. फिल्म को लेकर ओम पुरी ने कहा था, ‘मेरा रोल अपने आप ही दर्शकों को एक खास मैसेज देगा. मानव ने इतनी अच्छी कहानी लिखी है. लोग इसे देखेंगे तो समझेंगे कि हम लोग बेफिझूल की लड़ाई लड़ रहे हैं.’

‘एक-दूसरे के लिए जबदरस्ती नफरत का भाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है. सबसे बड़ी ट्रेजेडी ये थी कि कुछ ही समय में 10 लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी खत्म हो गई. जब विभाजन हुआ तो लोगों ने सोचा कि एक भाई बॉर्डर के इस तरफ रहेगा दूसरा उस तरफ. इसके बाद जब समय मिलेगा दोनों एक-दूसरे से मिल लिया करेंगे.’

‘ऐसा हो नहीं पाया. हालात बदतर होते चले गए. मेरा निवेदन है कि लोग ये फिल्म जरूर देखें और जो मैसेज मिल रहा है उसे समझने की कोशिश करें. विभाजन से दोनों मुल्कों के लोगों ने बहुत कुछ गंवाया है.’ बता दें कि यह फिल्म 9 अगस्त को रिलीज होगी.

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इस मछली के लिए 20 मिनट लगी बोली, लाखों में बिकी

नई दिल्ली। एक मछली ने मुंबई के दो मछुआरे भाइयों को एक ही दिन में लखपति बना दिया. शायद उन भाइयों को भी अंदाजा नही था कि उनकी किस्मत इस तरह बदलने वाली है. वह रोज की तरह पालघर समुद्रतट पर मछलियां पकड़ने गए थए और किस्मत से उनके जाल में घोल मछली फंस गई. जब वे मछली को बाजार में बेचने गए तो वह 5.5 लाख में बिकी. आस-पास के लोगों के अनुसार बहुत दिनों के बाद यहां किसी को घोल मछली मिली.

मुंबई का मछुआरा महेश अपने भाई के साथ शुक्रवार को मछली पकड़ने गया था. मुर्बे तट पर उनको अपना जाल भारी लगा. जब उन्होंने देखा तो पाया कि उनके जाल में घोल मछली फंसी थी. मछली का वजन लगभग 30 किलोग्राम था. महेश और उनके भाई द्वारा पकड़ी गई घोल फिश की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. सोमवार को मछली को बेचने के लिए बोली लगाई गई. मछली को खरीदने के लिए व्यापारियों की लंबी लाइन लगी थी. यह बोली बीस मिनट तक चली और और मछली को 5.5 लाख रुपये में एक व्यापारी ने खरीद लिया.

जानिए यह मछली क्यों खास हैं

घोल मछली खाने में स्वादिष्ट तो होती ही है. इस मछली में चमत्कारी औषधीय गुण पाए जाते हैं जिसके कारण पूर्वी एशिया में इसकी कीमत बहुत ज्यादा है. यहां तक कि घोल (ब्लैकस्पॉटेड क्रॉकर, वैज्ञानिक नाम प्रोटोनिबा डायकांथस) को ‘सोने के दिल वाली मछली’ के रूप में भी जाना जाता है. बाजार में अलग-अलग मछली की अलग-अलग कीमतें होती हैं. रविवार को मछुआरे महेश ने उसे सबसे ऊंची कीमत पर बेचा.

यह मछली मुख्यत: सिंगापुर, मलयेशिया, इंडोनेशिया, हॉन्ग-कॉन्ग और जापान में निर्यात की जाती है. घोल मछली जो सबसे सस्ती होती है उसकी कीमत भी 8,000 से 10,000 तक होती है.’ मई में भायंदर के एक मछुआरे विलियम गबरू ने यूटान से एक मंहगी घोल पकड़ी थी. वह मछली 5.16 लाख रुपये में बिकी थी.

घोल मछली का उपयोग दवाइयों और कॉस्मेटिक में भी

घोल मछली का उपयोग दवाई निर्माता कंपनी भी करती हैं. इसकी स्किन में उच्च गुणवत्ता वाला कोलेजन (मज्जा) पाया जाता है. इस कोलेजन को दवाओं के अलावा क्रियाशील आहार, कॉस्मेटिक उत्पादों को बनाने में प्रयोग किया जाता है. बीते कुछ वर्षों में इन सामग्री की वैश्विक मांग बढ़ रही है. यहां तक कि घोल का महंगा कमर्शल प्रयोग भी होता है. उदाहरण के तौर पर मछली के पंखों को दवा बनाने वाली कंपनियां घुलनशील सिलाई और वाइन शुद्धि के लिए इस्तेमाल करती हैं.

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HDFC बैंक में FD पर मिलेगा ज्यादा ब्याज, नई दरें लागू

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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट बढ़ाए जाने के बाद अब निजी क्षेत्र के HDFC बैंक ने विभिन्न परिपक्वता अवधि की मियादी जमाओं (एफडी) पर ब्याज दर 0.6 प्रतिशत तक बढ़ाई है. एचडीएफसी बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार संशोधित ब्याज दरें 6 अगस्त से लागू हो गई हैं. मियादी जमा पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी से ऋण की ब्याज दरों पर भी दबाव बनेगा.

बैंक ने छह महीने से लेकर पांच साल की मियादी जमा पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है. छह महीने से नौ महीने की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.4 प्रतिशत बढ़ाकर 6.75 प्रतिशत की गई है.

9 महीने तीन दिन से लेकर एक साल से कम की जमा पर ब्याज दर 0.6 प्रतिशत बढ़ाई गई है. वहीं एक साल की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.4 प्रतिशत बढ़ाकर 7.25 प्रतिशत की गई है.

दो साल एक दिन से लेकर पांच साल की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.10 प्रतिशत बढ़ाई गई है. रिजर्व बैंक ने पिछले सप्ताह रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत किया था.

गौरतलब है कि RBI ने पिछले हफ्ते हुई मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग में रेपो रेट को 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.50 फीसदी किया था. HDFC बैंक की FD दरें बढ़ने के बाद अब कर्ज दरों में भी बढ़ोत्‍तरी होने की संभावना है.

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आजादी की लड़ाई के बहुजन नायकः तिलका मांझी

जब भी देश की आजादी की बात होती है, उसके संघर्ष की बात होती है तो अक्सर उच्च वर्ग के लोगों के नाम सामने आते हैं. इतिहास के पन्ने पलटने पर भी दलित समाज को मायूसी ही लगती है. असल में एक सोची-समझी साजिश के तहत इतिहासकारों ने आजादी की लड़ाई के इतिहास से दलितों का नाम मिटा दिया. या फिर उनकी पहचान जाहिर नहीं की. शिक्षा के प्रसार के बाद अब इस समाज के लोग आजादी के अपने नायकों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर सामने लाने लगे हैं. अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने दलितों और आदिवासियों ने जान की बाजी लगा दी अपना लहू बहाया और शहीद हो गए. इतिहास के धुंधले पन्नों और इतिहासकारों को कुरेदने के बाद हम जिन्हें ढ़ूंढ़ सके, उनके योगदान को हम इस सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं. आज से लेकर 15 अगस्त तक दलित दस्तक हर दिन आपको ऐसे नायकों की वीरगाथा सुनाएगा, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना खून बहाया. आज की कहानी….. क्रांतिकारी तिलका मांझी, सिद्धु संथाल और गोची मांझी के बारे में… वैसे तो देश की आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 का माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में शुरू हो गया था. तिलका मांझी को हम भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कह सकते हैं. 1857 की क्रांति से लगभग सौ साल पहले स्वाधीनता का बिगूल फूंकने वाले तिलका मांझी को इतिहास में खास तव्वजो नहीं दी गई. तिलका मांझी वो नायक थें, जिन्होंने संथाल आदिवासियों द्वारा किए गए बहुचर्चित संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया था. संथाल विद्रोह के दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर 1771 से लेकर 1784 तक 13 साल अंग्रेजों से लंबी लड़ाई लड़ी. 1778 में उन्होंने पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप को अंग्रेजों से मुक्त करवाया. 1784 में तिलका मांझी ने राजमहल के मजिस्ट्रेट क्लीवलैंड को मार डाला. इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा प्रांत में दलितों और आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. इस विद्रोह में अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी. संथाल विद्रोह के लड़ाके सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता से अंग्रेज कांपते थे. इन दोनों का अलग से कोई विस्तृत इतिहास नहीं मिल सका है, लेकिन इन दोनों लड़ाकों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. जहां तक तिलका मांझी की बात है तो क्लीवलैंड को मार डालने के कारण अंग्रेज उनके पीछे पड़ गए. इसके बाद आयरकुट नाम के अंग्रेज अफसर के नेतृत्व में तिलका मांझी और उनके साथियों पर अंग्रेजी सेना ने जबरदस्त हमला कर दिया. कहा जाता है कि उस हमले में तिलका मांझी गिरफ्तार कर लिए गए थे. इसके बाद अंग्रेज उन्हें घोड़े से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर ले आएं. इसके बावजूद भी वो जीवित रहे. अंग्रेज यह देखकर हैरान थे कि मिले घसीटे जाने के बावजूद वह जिंदा कैसे हैं. आखिरकार 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष में लटका कर उन्हें फांसी दे दी गई. इतिहास द्वारा इस महान आदिवासी नायक की उपेक्षा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि उनकी ऐसी कोई पेंटिंग तक उपलब्ध नहीं है, जिसे कृतज्ञ देशवासी सहेज सकें.

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2019 महायुद्ध के लिए मायावती ने लिए ये बड़े फैसले

File Photo

नई दिल्ली। 2019 का लोकसभा चुनाव किसी महायुद्ध से कम नहीं है. जिस तरह से तमाम दलों ने इसके लिए कमर कस ली है, वह युद्ध के आगाज के पहले की तैयारी सरीखी है. इस बीच कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने की संभावना के बीच बसपा प्रमुख मायावती भी अपने किले को दुरुस्त करने में जुट गई हैं. इसके लिए बसपा अपने संगठन को बड़ा करने की तैयारी में है. अपनी नई रणनीति के तहत पार्टी ने सभी वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. इसके साथ ही तमाम मंडलों की सीधी बैठक में बसपा प्रमुख मायावती ने साफ निर्देश दिया है कि हर जिले में 23 सदस्यों की बूथ कमिटियां जल्द बनाई जाएं. पिछले चुनाव तक इनकी संख्या पांच सदस्यों की थी. इसी तरह जिला को-आर्डिनेटर के स्थान पर अब सेक्टर स्तर के प्रभारी बनाए जा रहे हैं. इसमें एक अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष होंगे. कमिटी में सभी वर्गों को भागीदारी देने को कहा गया है. उसमें भी आधे युवाओं को जगह देने के निर्देश हैं. दरअसल बीएसपी चीफ धीरे-धीरे गैर एनडीए दलों के बीच केंद्र में आ रही हैं. ऐसे में बीजेपी उनकी मजबूत घेराबंदी करना चाहती है, जिससे निपटने के लिए मायावती भी खुद को मजबूत करने में जुट गई है. मायावती लगातार दिल्ली में ही रहकर रोजाना प्रदेश के मंडलों की समीक्षा कर रही हैं. तो वहीं बसपा प्रमुख का यह भी मानना है कि किसी जीत के लिए अनुशासन जरूरी है. यही वजह रही कि पिछले दिनों अनुशासनहीनता करने वाले कई नेताओं को पार्टी ने या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर उनकी जिम्मेदारी बदल दी. अब संगठन स्तर पर पार्टी में बदलाव से बसपा कितनी मजबूत बनकर उभरती है, यह देखना होगा.

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सवर्ण गरीबों को आरक्षण का समर्थन, गरीब मुसलमानों को भी मिले आरक्षण – मायावती

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने एससी/एसटी विधेयक में संशोधन का स्वागत किया है. हालांकि इस दौरान उन्होंने एक नया मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार और पीएम मोदी को मुश्किल में डाल दिया है. बसपा प्रमुख ने मोदी सरकार से गरीब मुसलमानों के लिए आरक्षण मांगा है. उन्होंने आर्थिक आधार पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिए जाने की मांग का समर्थन करते हुए कहा है कि गरीब मुसलमानों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा कि “यदि केंद्र सरकार उच्च जाति के गरीब लोगों को संविधान में संशोधन के जरिए आरक्षण देने के लिए कोई कदम उठाती है तो बीएसपी इसका सबसे पहले समर्थन करेगी. मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में भी काफी गरीबी है. ऐसे में अगर केंद्र सरकार उच्च जाति के लिए कोई कदम उठाती है तो मुस्लिमों व दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए.” इससे पहले एससी/एसटी एक्ट के पारित होने का श्रेय बसपा प्रमुख ने 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा किए गए भारत बंद को दिया. उन्होंने कहा कि दलितों ने जो भारत बंद बुलाया था, जिसमें बीएसपी कार्यकर्ताओं के साथ देश की जनता ने भाग लिया था, यह उसका असर है कि केंद्र को संशोधन बिल लाने के लिए मजबूर होना पड़ा. बसपा प्रमुख ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी इसका श्रेय दिया. इस दौरान केंद्र सरकार में शामिल दलित नेताओं को कठघरे में खड़ा करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि जब 2 अप्रैल को आंदोलन किया गया था तो केंद्र सरकार के सभी दलित व आदिवासी मंत्री चुप्पी साधे हुए थे. मायावती की मांग ने राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. भाजपा जहां एससी/एसटी संशोधन बिल के जरिए दलित और पिछड़ा वर्ग आयोग के जरिए ओबीसी समाज को साधने की कोशिश कर रही थी, मायावती ने सवर्ण समाज के गरीबों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की मांग उठाकर भाजपा और केंद्र के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है. Read it also-9 अगस्त के आंदोलन के पहले ही एससी-एसटी एक्ट पर संशोधन लाने के खेल को समझिए
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मुसहर

मामाजी वो कौन था ? गांव का था। दाल,चावल, आंटा,सब्जी, तेल मसाला और रूपए भी मामीजी ने क्यों दिए ? नेग दिए हैं भांजे । नेग क्यों ? तुम्हारे भाई की शादी है । भाई की शादी मे भीखारी को इतना नेग ? तुम नहीं समझोगे शहर मे रहते हो भांजे । क्यों नहीं समझूंगा ? बताइये मामाजी । पत्तल लाया था। फ्री में……? नहीं तो ।।।।। फिर इतना सारा राशन क्यों ?खाना खिला देना था। बहुत गरीब है बेचारा। खाना क्यों नहीं खिलाये, पूरा तो खाना खाया है।वह घंटों से गांजा पीता रहा। हमारे घर का नहीं खाएगा। क्यों …..? हम लोग चमार हैं ना भांजे। गलत मामा,चमार तो आदमियत के दुश्मनों ने बनाया है, हम लोग तो चंवरवंश से हैं। हैं तो पर पाखंडी धर्म- जातिवादी नहीं मानते। त्याग दो ऐसे धर्म को जहां समानता, मानवता नहीं । देखो भीखारी, गंदा बदबूदार, उसकी सांस संड़ाध मार रही थी,साथ मे खड़ा होने लायक न नहीं था,इतना सम्मान दिया, अपमान कर गया, चमार के घर का नहीं खाऊंगा कहकर चला गया। भांजे जिनकी चूल्हा गरम की औकात नहीं होती, वही ज्यादा छूआछूत करते हैं। कौन सी जाति का था वो बदबूदार आदमी ? मेढक,कछुआ, चूहा का शिकार करने वाला मुसहर। वो माय गांड मुसहर भी चमार से ऊंचा…….? डां नन्द लाल भारती Read it also-समाज
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