L K ADVANI… on ATALJI

courtesy- HT

I am at a loss of words to express my deep grief and sadness today as we all mourn the passing away of one of India’s tallest statesmen, Shri Atal Bihari Vajpayee. To me, Atalji was more than a senior colleague- in fact he was my closest friend for over 65 years.

I cherish the memories of my long association with him, right from our days as Pracharaks of the RSS, to the inception of Bharatiya Jana Singh, the struggle of the dark months during the Emergency leading to the formation of Janata Party and later the emergence of the Bharatiya Janata Party in 1980.

Atalji will be remembered as the pioneer of the first ever stable non-Congress coalition government at the Centre and I had the privilege of working as his deputy for six years.

As my senior, he always encouraged and guided me in every possible manner.

His captivating leadership qualities, mesmerising oratory, soaring patriotism and above all, his sterling humane qualities like compassion, humility and his remarkable ability to win over adversories despite ideological differences have all had a profound effect on me in all my years in public life.

I will miss Atalji immensely…

New Delhi.

16th August, 2018

5.45pm

अटल जी की कविता…. ठन गई … मौत से ठन गई

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मौत से ठन गई ठन गई मौत से ठन गई. जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई मौत से ठन गई Read it also-मुसहर
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रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, जानें क्‍या होगा असर…

नई दिल्ली। डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगातार धड़ाम हो रहा है. गुरुवार को रुपये में फिर ऐतिहासिक गिरावट आई है. एक डॉलर की क़ीमत 70.32 रुपये पहुंच गई है. गुरुवार को रुपया 43 पैसे गिरा. अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले रुपया अपने सबसे निम्नतम स्तर पर है. रुपए की ये गिरावट जो इस साल 8 फीसदी से ज्यादा रही है.

मु्द्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 70.25 पर खुला और जल्द ही कुल 43 पैसे टूटकर 70.32 पर पहुंच गया. पिछले सत्र के कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया 69.89 के निम्न स्तर पर बंद हुआ था. मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, आयातकों की ओर से अमेरिकी मुद्रा की जबरदस्त मांग और विदेशी पूंजी की निकासी से घरेलू मुद्रा में कमजोर रुख देखा गया. इसके अलावा मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार व्यापार घाटे में अधिक बढ़ोत्तरी का भी रुपया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश का व्यापार घाटा पांच साल के उच्च स्तर यानी 18 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. बुधवार को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुद्रा बाजार बंद रहे थे.

क्या होगा असर?

– महंगाई बढ़ेगी – रुपया कमजोर होने से आयात महंगे हो जाते हैं. – तेल के दाम बढ़ेंगे – तेल महंगा होने का मतलब सब्जियां, खाने पीने के सामानों का महंगा होना. – कमजोर रुपए से विदेशों में पढ़ाई और छुट्टियां मनाना महंगा होगा – कंप्यूटर,स्मार्टफोन और कार, आयात होने वाली चीजें महंगी होंगी

हालांकि उद्योगों के कई जानकार मानते हैं कि रुपया का गिरना पक्के तौर पर एक बुरी चीज नहीं है. ये भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है और खासकर मेड इन इंडिया के लिए ये जरूरी है. बजाय गिरने पर मातम मनाने के क्या हम इसे मेक इन इंडिया के लिए एक मौक़े के तौर पर देखें? इससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय निर्यात बेहतर मुक़ाबला कर पाएगा और क्या हम विदेशी कंपनियों को भारत में विश्व स्तरीय और निर्यातोन्मुख निर्माण का भरोसा दिला सकते हैं?

पिछले साल एक डॉलर के बराबर 62 रुपए थे अब ये 70 हो चुका है, इस हिसाब से ये 6 से 7 लाख रुपए सालाना ज्यादा का खर्च बैठता है. हालांकि गवर्नर के मुताबिक इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. आर्थिक मामलों के मंत्रालय के सचिव सुभाष गर्ग ने एनडीटीवी से कहा कि ये एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम है. RBI के पास पर्याप्त विदेशी मुदा भंडार है और 2013 में डॉलर के मुक़ाबले 69 रुपया था. ये अस्थायी दौर है, स्थिर हो जाएगा. अगर रुपया 80 तक भी गिरे तो कोई बात नहीं है. अगर दूसरी मुदाए भी इसी तरह से गिरती हैं. दूसरी मुदाएं भी कमजोर हुई हैं जैसे दक्षिण अफ्रीकी रैंड 2 फीसदी गिरा है, रूस के रुबल में 1.4 प्रतिशत की गिरावट आई है और मैक्सिकन पेसो 0.8 प्रतिशत नीचे आया है.

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नहीं रहें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

नई दिल्ली। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहें. 12 घंटे से ज्यादा समय से वेंटिलेटर पर रहने के बाद उन्होंने एम्स में आखिरी सांस ली. इस बीच देश भर के दिग्गज नेता और तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंच चुके हैं. सुबह से ही उनका एम्स जाकर वाजपेयी से मिलने का सिलसिला जारी था. देर शाम उनको देखने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार औऱ बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती भी पहुंची थीं.

इससे पहले 15 अगस्त की शाम को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाजपेयी जी का हाल जानने एम्स पहुंचे थे. उसके बाद लाल कृष्ण आडवाणी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण सहित तमाम बड़े नेताओं ने एम्स पहुंच कर पूर्व प्रधानमंत्री से मिले थे. सुबह भाजपा ने अपने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को भी रद्द कर दिया था और दोपहर तक पार्टी मुख्यालय पर की गई सजावट को भी हटा दिया गया था.

कंधे तक पानी में डूबकर बच्‍चे ने तिरंगे को दी थी सलामी, उसके साथ जो हुआ वो हैरान करने वाला

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धुबरी/गुवाहाटी। असम के एक स्कूल परिसर में पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कंधे तक बाढ़ का पानी भरा होने के बावजूद तिरंगे को सलामी देने वाले नौ साल के जिस बच्चे की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, उसका नाम राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के अंतिम मसौदे में नहीं है.

धुबरी जिले के प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक ताजेन सिकदर ने बताया कि छात्र हैदर अली खान का नाम 30 जुलाई को प्रकाशित मसौदा एनआसी में नहीं है. हालांकि, उसके परिवार के सदस्यों के नाम इसमें शामिल है. गौरतलब है कि सिकदर भी पिछले साल बाढ़ के पानी में हैदर और दो अन्य के साथ वहां तिरंगे को सलामी देने के लिये खड़े थे. सिकदर ने बताया कि हैदर के परदादा शुकूर अली का नाम 1951 की एनआरसी में था. उनके और हैदर के बीच एक रिश्ता होने और उपयुक्त दस्तावेजों सहित उसका जन्मप्रमाण पत्र, परिवार की जमीन का रिकॉर्ड और उसके स्कूल का प्रमाण पत्र 2015 में एनआरसी में उसका नाम जोड़ने के लिए लिये दिये गए थे.

सिकदर ने कहा कि हैदर के दादा अलोम खाम, मां जयबन खातून, बड़े भाई जयदर और छोटी बहन रीना का नाम अंतिम मसौदे में शामिल है. साथ ही, सिकदर का नाम भी सूची में शामिल है. हैदर के शिक्षक ने कहा कि वह सूची में उसका नाम जुड़वाने में इस परिवार की मदद करेंगे.

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बैंक अकाउंट में बैलेंस कम होने पर नहीं लगेगी पैनल्टी… जाने कैसे

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नई दिल्ली। अगर आपका SBI बैंक में सेविंग अकाउंट है तो यह खबर आपके लिए जानना बहुत जरूरी है. SBI ने सेविंग अकाउंट के लिए एक मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस (MAB) का नियम तय किया हुआ है. अगर ग्राहक इस बैलेंस को बरकरार नहीं रख पाते हैं तो बैंक उनसे जुर्माना वसूलता है. कुछ ही समय पहले के रिपोर्ट भी आई थी कि SBI ने मिनिमम बैलेंस मेंटेन न कर पाने वालों से चार्ज के तौर पर 5 हजार करोड़ रुपए वसूले हैं. इसे लेकर SBI ने क्‍लैरिफिकेशन देते हुए कहा था कि ये चार्ज उसने 40 फीसदी तक कम कर दिया है और उसके चार्ज इंडस्‍ट्री में सबसे कम हैं.

ऐसा उन लोगों के साथ सबसे ज्यादा होता है जिन्‍हें बैंकों के मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस का गणित समझ में नहीं आता है. लोग इसी बात को लेकर कन्‍फ्यूज रहते हैं कि आखिर इस बैलेंस की कैलकुलेशन क्‍या है और कितना पैसा अकाउंट में होना जरूरी है. हम आपको बता रहे हैं कि आखिर कैसे आप इस कैलकुलेशन को समझ सकते हैं और अपने पैसे बचा सकते हैं.

समझें पूरा गणित: मान लीजिए किसी बैंक में मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस रिक्‍वायरमेंट 5000 रुपए है. इसका अर्थ यह हुआ कि रोज दिन खत्‍म होने पर आपके सेविंग्‍स अकाउंट में 5000 रुपए होने चाहिए. अब ये आपके ऊपर है कि आप अकाउंट में पूरे माह केवल 5000 रुपए रखते हैं या फिर उससे ज्‍यादा. इसे एक उदाहरण से समझें..

उदाहरण: माना 1 जुलाई को आपने अपने सेविंग्स अकाउंट में 5000 रुपए जमा किए. अगले एक माह तक आपने उस अकाउंट से कोई ट्रान्जेक्शन या डिपॉजिट नहीं किया यानी न पैसे निकाले न अकाउंट में जमा किए. तो इसका मतलब यह हुआ कि आपके महीने की शुरुआत से लेकर महीने के आखिर तक अकाउंट में 5000 रुपए का डिपॉजिट मौजूद रहा. यानी आपने बैंक की मिनिमम एवरेज बैलेंस रिक्वायरमेंट पूरी की.

जब कर रहे हैं ट्रान्जेक्शन और डिपॉजिट: आप अपने अकाउंट से भले ही ट्रान्जेक्शन करें या डिपॉजिट करें लेकिन आपका एवरेज 5000 रुपए से कम नहीं होना चाहिए. इसे भी एक उदाहरण से समझें- माना 1 जुलाई को आपने अकाउंट में 5000 रुपए जमा किए. 10 जुलाई को आपने 3000 रुपए निकाल लिए. उसके बाद 20 जुलाई को फिर से 10000 रुपए जमा कर दिए. महीने कें अंत में आपके अकाउंट में 12000 रुपए होंगे. ऐसी सूरत में मिनिमम बैलेंस की कैलकुलेशन ऐसे होगी.

ऐसे समझे पूरी कैलकुलेशन:<br />- 1 जुलाई से 10 जुलाई यानी 9 दिन आपका बैलेंस रहा- 5000×9= 45000 रुपए<br />- 10 जुलाई से 20 जुलाई यानी 10 दिन आपका बैलेंस रहा- 2000×10=20000 रुपए<br />- अब 20 जुलाई से 31 जुलाई यानी 11 दिन आपका बैलेंस रहा- 12000×11= 1,32000 रुपए<br />- अब 1 जुलाई से 31 जुलाई तक कुल बैलेंस देखें तो यह रहा- 1,97,000 रुपए<br />- अब 1 दिन का बैलेंस निकालने के लिए इसमें 31 का भाग देंगे तो आएगा 6354 रुपए

इसका अर्थ यह हुआ कि भले ही आपने ट्रान्जेक्शन और डिपॉजिट किया लेकिन फिर भी आपका एक दिन के आखिर में बैलेंस 5000 रुपए से ज्यादा रहा. ऐसे में आप पर पेनल्टी नहीं लगेगी. अगर यही बैलेंस 5000 रुपए से कम रहता तो बैंक आप पर पेनल्टी वसूलता.

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गंभीर बीमारी से जूझ रहे इरफान खान ने लिया ये फैसला

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नई दिल्ली। दिग्गज अभिनेता इरफान खान इन दिनों लंदन में अपनी एक अजीब किस्म की बीमारी का इलाज करा रहे हैं. इस बीमारी का नाम ‘न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर’ है. अब वे आगे के फैसले अपनी इस बीमारी को देखकर ही ले रहे हैं.

खबर है कि इरफान ने एआईबी की वेब-सीरीज गोरमिंट छोड़ दी है. इस सीरीज को अमेजॉन प्राइम के बैनर के तले बनाया जा रहा था. इरफान इसे लेकर काफी उत्साहित थे. उन्होंने वेब सीरीज छोड़ने की जानकारी फेसबुक पर एक नोट लिखकर दी.

बता दें कि इरफान का छठा और आखिरी कीमो किया गया था. इससे पहले उनके 5 कीमो किए जा चुके हैं. इस कारण इरफान इन दिनों कमजोर हो गए हैं. खबर यह भी है की पांचवें कीमो के बाद से इरफान के शरीर में अध‍िक ऊर्जा नहीं रह गई है, जिस वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

बता दें इरफान खान ने इस दर्दनाक अपनी बीमारी का खुलासा एक ट्वीट करके किया था. इरफान ने ट्वीट कर लिखा था, जिंदगी में अचानक कुछ ऐसा हो जाता है जो आपको आगे लेकर जाती है.

इरफान ने कहा था, “ऐसे में आप च‍िंतन करना छोड़ देते ह‍ैं, प्लान‍िंग करना बंद कर देते हैं. आप जीवन के दूसरे पहलुओं पर गौर करने लगते हैं. मुझे जीवन में बहुत कुछ मिला है. इन सबके लिए बस मेरे पास एक ही शब्द है, शुक्र‍िया. मुझे जीवन से कोई इच्छा नहीं है, मुझे कोई प्रार्थना अब नहीं करनी है.”

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झंडा अशुद्ध हो जाएगा, कहकर दलित सरपंच को झंडा फहराने से रोका

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर से सटे महाराजगंज में एक दलित महिला ग्राम प्रधान को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर झंडा फहराने से रोक दिया गया. जब महिला ग्राम प्रधान नियम के मुताबिक स्कूल में झंडा फहराने पहुंची तो जातिवादी प्रिंसिपल ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. दलित समाज से ताल्लुक रखने वाली ग्राम प्रधान का आरोप है कि स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि कोई भी दलित आज तक यहां झंडा नहीं फहरा सका है.

महाराजगंज के बृजमनगंज ब्लॉक के महुआरी गांव की आरक्षित सीट से जीत दर्ज कर रीता देवी प्रधान निर्वाचित हुईं. यूपी में नियम है कि गांव का ग्राम प्रधान प्राथमिक विद्यालय में झंडा फहराएगा. इसी नियम के तहत रीता देवी गांव के प्राथमिक विद्यालय महुआरी में देश के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त पर झंडा फहराने पहुंची थीं. लेकिन उन्हें उनकी जाति की वजह से रोक दिया गया.

रीता देवी के मुताबिक, ” जब वह स्कूल में पहुंची तो सवर्ण जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रिंसिपल ने उनको रोक दिया और मेरे हाथ से तिरंगे की डोर लेकर खुद झंडारोहण किया.”

जिस समय यह घटना घटी उन दौरान स्कूल के छात्र और अभिभावक भी मौजूद थे. उन्होंने जब प्रधानाध्यपक के इस रवैये को गलत ठहराते हुए विरोध किया तो प्रधानाध्यापक का कहना था कि विद्यालय में आज तक कोई भी दलित ध्वजारोहण नहीं किया है, इसलिए वह खुद झंडारोहण करेगा. यही नहीं, खबर आ रही है कि दलित महिला प्रधान को विद्यालय परिसर से बाहर जाने के लिए भी बोला गया.

तो वहीं दूसरी ओर इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में प्रकाशित खबर के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य और भाजपा शासित गुजरात के राजकोट में भी एक दलित सरपंच प्रेमजी जोगल को झंडा नहीं फहराने दिया गया. पाटिदार समाज से ताल्लुक रखने वाली डिप्टी सरपंच के पति ने दलित सरपंच को झंडा फहराने से रोक दिया. राजकोट के गोंडल तालुका के सरपंच प्रेमजी ने पुलिस से इस मामले की शिकायत की है.

सरपंच के मुताबिक- “डिप्टी सरपंच तृषा के पति राजेश सखिया ने मुझे कहा कि मैं तिरंगा नहीं फहरा सकता क्योंकि मैं दलित हूं. उसने कहा कि अगर मैंने झंडा फहराया तो यह अशुद्ध हो जाएगा. राजेश ने समारोह शुरू होने से पहले ही मुझे धमकी देते हुए कहा कि या तो कुर्सी पर ही बैठा रहूं नहीं तो इसे भी खो दूंगा.”

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भारतीय वनडे क्रिकेट टीम के प्रथम कप्तान का निधन

नई दिल्ली। पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजित वाडेकर का बुधवार रात मुंबई के जसलोक अस्पताल में निधन हो गया. वह 77 वर्ष के थे. वह लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. वाडेकर की कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में पहली बार टेस्ट मैच और पहली बार टेस्ट सीरीज जीती थी. वाडेकर ने मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी के दौरान भारतीय टीम के मैनेजर के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई थी. बाद में वह मुख्य चयनकर्ता भी बने. उनके परिवार में पत्नी रेखा के अलावा दो पुत्र और एक पुत्री है.

आठ साल के अंतरराष्ट्रीय करियर में बायें हाथ के बल्लेबाज वाडेकर ने कुल 37 टेस्ट मैच खेले. 1971 से 1974 के दौरान उन्होंने 16 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की, जिसमें से चार मैच जीते, चार हारे, जबकि आठ मैच ड्रॉ रहे. वह दो वनडे मैच भी खेले और दोनों में उन्होंने भारतीय टीम की कमान संभाली. वनडे क्रिकेट में वह भारतीय टीम के पहले कप्तान थे. वनडे कप्तान के रूप में उन्हें दोनों मैचों में हार का सामना करना पड़ा. वाडेकर कुशल क्षेत्ररक्षक भी थे.

उन्होंने टेस्ट में 46, वनडे में एक और प्रथम श्रेणी करियर में 271 कैच लपके. टेस्ट करियर में उन्होंने एकमात्र शतक न्यूजीलैंड के खिलाफ 1968 में वेलिंगटन में लगाया. इस टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने 143 रन बनाए थे. भारत ने यह टेस्ट आठ विकेट से जीता था. वाडेकर चार बार नर्वस नाइंटीज का भी शिकार बने, जिसमें एक बार वह 99 रन पर आउट हुए थे. रणजी ट्रॉफी में 17 वर्षो के करियर में उन्होंने 73 मैचों में कुल 4288 रन बनाए जिनमें उनका औसत 57.94 था. उन्होंने 1966-67 में मैसूर के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच में 323 का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया. उन्होंने 18 दलीप ट्रॉफी मैच खेले, छह में वह पश्चिम क्षेत्र के कप्तान रहे.

वाडेकर के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर शोक जताया है. अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री ने लिखा, ‘अजित वाडेकर को भारतीय क्रिकेट में दिए उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए याद किया जाएगा. एक महान बल्लेबाज और शानदार कप्तान, जिनकी कप्तानी में हमारी टीम ने कई यादगार लम्हे दिए. इन उपलब्धियों के साथ-साथ उन्हें प्रभावी क्रिकेट प्रशासक के रूप में भी आदर के साथ याद किया जाएगा. उनके निधन से दुखी हूं.’

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वाजपेयी जी बेहद गंभीर, भाजपा कार्यालय से सजावट हटी, तमाम नेताओं ने रद्द किया कार्यक्रम

नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ बिगड़ता जा रहा है. स्थिति को देखते हुए वाजपेयी जी का बचना मुश्किल लग रहा है. स्थिति खराब होने के बाद वो पिछले 12 घंटों से अधिक समय से वेंटिलेटर पर हैं. इस बीच भाजपा ने अपने पार्टी मुख्यालय से 15 अगस्त के दिन की गई सजावट को हटा लिया है. तो वहीं भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है. कई नेता तो दिल्ली की ओर निकल चुके हैं.

एम्स में सघन चिकित्सालय में वाजपेयी जी को देखने के लिए भाजपा नेताओं के पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है. 15 अगस्त की शाम को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाजपेयी जी का हाल जानने एम्स पहुंचे थे. उसके बाद लाल कृष्ण आडवाणी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण सहित तमाम बड़े नेता एम्स पहुंच रहे हैं. तो वहीं भाजपा ने अपने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को भी रद्द कर दिया.

गौरतलब है कि एक वक्त में वाजपेयी जी और लाल कृष्ण आडवाणी ने साथ मिलकर भाजपा को ऊंचाई पर पहुंचाया था. भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पहले नेता थे. अब तक के भाजपा नेताओं में कोई भी वाजपेयी जी के करिश्मे की बराबरी नहीं कर पाया है. वाजपेयी न सिर्फ भाजपा बल्कि तमाम विरोधी दलों के बीच भी काफी लोकप्रिय रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में अटल-आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी काफी प्रचलित रही है. तीनों नेता पार्टी को उस ऊंचाई तक ले गए, जिसकी कल्पना भाजपा शुरुआती दिनों में देखा करती थी.

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पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की हालत नाजुक, जानिए कौन-कौन सी है बीमारी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत पिछले 36 घंटों से नाजुक बनी हुई है. उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने एक बयान जारी कर यह जानकारी दी. एम्स की ओर से गुरुवार को भी मेडिकल बुलेटिन जारी किया गया. एम्स के मुताबिक उनकी हालत अभी भी नाजुक बन गई है.

वाजपेयी को गुर्दा (किडनी) नली में संक्रमण, छाती में जकड़न, मूत्रनली में संक्रमण आदि के बाद 11 जून को एम्स में भर्ती कराया गया था.

एम्स ने एक बयान में कहा, ‘‘दुर्भाग्यवश, पिछले 24 घंटों में उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गई है. उनकी हालत नाजुक है और वह जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं.’’

डिमेंशिया के मुख्य लक्षण:

– नाम, जगह, तुरंत की गई बातचीत को याद रखने में परेशानी

– अवसाद से पीड़ित होना

– संवाद स्थापित करने/बात करने में दिक्कत होना

– व्यवहार में बदलाव आना

– कुछ निगलने में दिक्कत होना

– चलने-फिरने में परेशानी होना

– निर्णय लेने की क्षमता का प्रभावित होना

– चीजों को रखकर भूल जाना

वाजपेयी एम्स के कार्डियो थोरेसिक सेंटर के गहन चिकित्सा कक्ष में हैं. किडनी में संक्रमण, छाती में संकुलन और पेशाब कम होने के चलते 93 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता वाजपेयी को बीते 11 जून को अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी डिमेंशिया नाम की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और 2009 से ही व्हीलचेयर पर हैं. कुछ समय पहले भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. अटल बिहारी वायपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सदस्य चुने गए थे. वो बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूर्ण करने वाले पहले और अभी तक एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता हैं. 25 दिसंबर, 1924 में जन्मे वाजपेयी ने भारत छोड़ो आंदोलन के जरिए 1942 में भारतीय राजनीति में कदम रखा था.

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अब छत्तीसगढ़ में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक

छत्तीसगढ़ में सरकारी और गैर सरकारी रिकार्डों में दलित शब्द लिखने पर पाबंदी लगा दी गई है. सरकार ने बाकायदा आदेश जारी कर दलित के स्थान पर जाति का उल्लेख करने का निर्देश दिया है. राज्य में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जारी हुए इस आदेश को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा करार दिया. पार्टी का दावा है कि यह सर्कुलर नहीं बल्कि एक शिगूफा है.

सरकार ने जारी किया सर्कुलर

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राज्य सरकार ने यह सर्कुलर जारी कर अनुसूचित जाति वर्ग के एक बड़े समुदाय को साधने की कोशिश की है. केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने सभी सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्य के सभी सरकारी विभागों को निर्देशित करते हुए कहा है कि यह शब्द संविधान में नहीं है. इसलिए इसका प्रयोग ना हो. राज्य के गठन के पहले संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन सरकार ने 10 फरवरी 1982 को नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर रोक लगाई थी.

इस शब्द के इस्तेमाल पर सजा का भी प्रावधान किया गया, लेकिन दलित शब्द के प्रयोग पर कितनी सजा का प्रावधान होगा यह स्पष्ट नहीं है. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्देश के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने इस परिपत्र को जारी कर सभी विभागों को दिशा-निर्देश दिए है. इसके उल्लंघन पर सजा के प्रावधान पर विचार किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुताबिक कांग्रेस ने दलितों को जो सम्मान कभी नहीं दिया. वो बीजेपी के सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी दे रही है. उन्होंने कहा कि दलित शब्द से यह समाज आहत है. इसलिए इस पर पाबंदी लगाई गई है. इससे अनुसूचित जाति वर्ग के सम्मान में और वृद्धि होगी.

अनुसूचित जाति की आबादी बढ़ी

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी वर्ष 2011 के जनगणना के लिहाज से 12 फीसदी थी. अंदाजा लगाया जा रहा है कि 2018 में इसमें 3 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कुल 90 में से 10 सीटें आरक्षित हैं. इसमें से 9 सीटों पर बीजेपी काबिज है. जबकि एक सीट पर कांग्रेस का कब्जा है.

लिहाजा, दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाकर राज्य की बीजेपी सरकार ने इस बड़े वर्ग को अपने खेमे में बनाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है. राज्य की बीजेपी सरकार ने अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं बरसों से जारी है, लेकिन यह वर्ग महसूस करता था कि सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द उनके सम्मान का हनन करता था. इसलिए इस शब्द को निकाल बाहर फेंका जाए.

सीएम रमन सिंह ने अपने तीसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में दलित शब्द को बाहर का रास्ता दिखाकर इस वर्ग को बीजेपी के भीतर बनाए रखने के लिए फौरन आदेश जारी कर दिया.

कांग्रेस ने कहा, यह वोटबैंक की राजनीति

उधर, बीजेपी सरकार का यह फैसला कांग्रेस को रास नहीं आ रहा. उसका मानना है कि रमन सिंह की यह शिगूफे वाली एक चाल है, जो वोट बैंक के खातिर चली गई है. पार्टी के मुताबिक विधानसभा चुनाव के चंद रोज पहले लिए गए इस फैसले का औचित्य सिर्फ वोट बैंक की राजनीति को हवा देना है. कांग्रेस उपाध्यक्ष रमेश वार्लियनि के मुताबिक बीजेपी ने यह नया शिगूफा छोड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि 15 सालों में कभी भी बीजेपी को अनुसूचित जाति वर्ग का सम्मान नजर नहीं आया. अभी विधानसभा चुनाव आ गया तो पार्टी इस वर्ग के सम्मान को लेकर चिंतित हो रही है. उन्होंने कहा कि यह रमन सिंह की सोची समझी सोशल इंजीनियरिंग है, लेकिन बीजेपी को इसका फायदा नहीं होने वाला.

छत्तीसगढ़ में इसी साल अक्टूबर-नवंबर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने है. कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के साथ-साथ पार्टियां उन जाति, समुदाय और धर्म के लोगों को भी सक्रिय करने में जुट गई हैं, जिन वर्गों का वोट थोक के भाव उनकी झोली में गिरता है.

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हरियाणा में 20 अगस्त को फिर हिन्दू धर्म छोड़ेंगे दलित

भाटला के दलितों ने 20 अगस्त को गांव में ही गुरु रविदास मंदिर में बौद्ध धर्म ग्रहण करने का ऐलान किया है. उन्होंने मिर्चपुर कांड जैसी घटना की संभावना जताते हुए हांसी के एसपी से मुलाकात कर सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है. भाटला दलित संघर्ष समिति के प्रधान बलवान सिंह ने बताया कि उनके गांव में पिछले एक साल से गांव के दलितों का स्वर्ण समाज के लोगों ने सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है. उन्होंने कहा कि सामाजिक बहिष्कार के लिए ही गांव के ही एक समुदाय कुछ लोगों की गठित भाईचारा कमेटी जिम्मेदार है. समिति ने आरोप लगाया कि पुलिस उनका बहिष्कार करने वाले लोगों से मिली हुई है. उन पर कार्रवाई करने की बजाय पीड़ितों पर केस दर्ज कर रही है. गांव के ही दलित राजकुमार भाटला ने बताया कि पिछले एक साल से जारी सामाजिक बहिष्कार के कारण उन लोगों को बहुत परेशानी हो रही है.

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एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को नीतीश कुमार ने दिया बड़ा तोहफा

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को अनुसूचित जाति ((एससी)/अनुसूचित जनजाति एसटी), दलितों और ओबीसी छात्रों के लिए बड़ा ऐलान किया. उन्होंने कहा कि एससी/एसटी, दलित और ओबीसी समुदाय के छात्र अगर बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन (बीपीएससी) की प्रारंभिक परीक्षाएं (पीटी) पास करता है तो सरकार की तरफ प्रत्येक छात्र को 50 हजार रुपए दिए जाएंगे. अगर मुख्य परीक्षा पास करता है तो एक लाख रुपए दिए जाएंगे.

उधर हाल ही में संसद के मानसून सत्र के दौरान राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग को संवैधानिक दर्जा देने से संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा ने दो तिहाई से अधिक बहुमत के साथ सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी. सदन ने राज्यसभा द्वारा विधेयक में किए गए संशोधनों को निरस्त करते हुए वैकल्पिक संशोधन तथा और संशोधनों के साथ ‘संविधान (123वां संशोधन) विधेयक, 2017’ पारित किया.

बिहार के मुजफ्फरपुर में शेल्टर होम में रह रहे बच्चियों के साथ हुए बलात्कार के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार विपक्ष के निशाने पर हैं. इस घोषणा के बाद उन्हें राहत महसूस हो रही होगी. क्योंकि हो सकता है प्रदेश के एससी, एसटी, दलित और ओबीसी का युवा वर्ग उनके इस घोषणा से सीएम का विरोध करना छोड़ दे.लेकिन बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश पर हमला तेज किए हुए हैं. उन्होंने कहा है कि इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बड़े अधिकारियों को बचा रहे हैं. साथ ही उसने कहा नीतीश जी, ‘आप सब दोष दूसरों पर मढ़ते हैं. छोटे कर्मचारियों को फंसाते हैं. बड़े अधिकारियों को बचाते हैं क्योंकि उन्हें नहीं बचाया तो वो आपकी सारी पोल खोल देंगे.’

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प्रधानमंत्री जी बलात्कार राक्षसों की नहीं आपके देवताओं की प्रवृति रही है!

प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा कि बलात्कार राक्षसी प्रवृति है, जबकि डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियों में हिंदू धर्मशास्त्रों और पुराणों के हवाले से बताया है कि ब्रह्मा, विष्णु और तीनों ने मिलकर सती अनसूया के साथ सामूहिक बलात्कार किया था. उन्होंने यह भी लिखा है कि ब्रह्मा ने अपनी बेटी के साथ ही बलात्कार किया. अहिल्या और अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार करने वाला इंंद्र आपका सबसे बड़ा देवता है. प्रधानमंत्री जो मनु आपके के आदर्श हैं, वे शूद्र समाज की महिलओं के साथ बलात्कार के पक्ष में खड़े हैं.

प्रधानमंत्री जी आपको यह भी पता होगा कि आपके महानायक वीरसावरकर मुस्लिम महिलओं का साथ बलात्कार को वीरतापूर्ण कार्य मानते हैं. इसके उलट प्रधानमंत्री जी जिन अनार्य राजाओं को आप राक्षस कहते हैं, उनमें से कोई भी बलात्कारी नहीं था. रावण सीता के अपने पास रखे रहे, लेकिन उन्होंने उन्हें स्पर्श तक नहीं किया. प्रधानमंत्री जी हिंदू संस्कृति का गुणगान करते आप नहीं थकते उसके देवत बलात्कार की संस्कृति के वाहक रहे हैं, राक्षस नहीं.

डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियां ( बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाग्मय खंड-8 ) के भाग-एक की पन्द्रहवीं पहेली के परिशिष्ट-3 में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बलात्कारी चरित्र की ओर चर्चा की है. आंबेडकर ने लिखा, “ तीनो देव ( ब्राह्मा, विष्णु और शिव ) सती ( अनसूया ) का शील-हरण करने अत्रि (ऋषि ) की कुटिया की ओर चल पड़े. इन तीनों ने ब्राह्मण भिक्षुओं का वेष धारण किया. जब वे वहां पहुंचे, अत्रि बाहर गए हुए थे. अनसूया ने उनका स्वागत किया और उनके लिए भोजन तैयार किया.” इन तीनों ने उनसे निर्वस्त होने को कहा. आंबेडकर विस्तार से पूरी कथा सुनाते हैं. अंत में आंबेडकर की टिप्पणी इस प्रकार है, “इस कहानी में अनैतिकता की दुर्गंध भरी पड़ी है और उसके अंत को जान-बूझकर ऐसा मोड़ दिया गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु,महेश के उस वास्तविक कुकर्म पर पर्दा डाल दिया जाय.” ( पृष्ठृ173-174 ). आंबेडकर ब्राह्मा द्वारा अपनी बेटी वाची के साथ बलात्कार की मानसिकता की भी चर्चा करते हैं.’’(पृ.177)

मनुस्मृति भी ब्राह्मणों को गैर-ब्राह्मण स्त्रियों के साथ बलात्कार के लिए प्रोत्साहित करती हुई लगती है.

मनुस्मृति में जहां एक ओर शूद्र वर्ण के किसी व्यक्ति द्वारा ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर शूद्र को प्राण दंड का आदेश देती है-

अब्राह्मण: संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति. चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमा: सदा.. (8.359 )

वहीं यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसे केवल पांच सौ पर्ण का आर्थिक दंड देना होगा-

अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शूद्रा वा ब्राह्मणो व्रजन् . शतानि पच्च दण्ड्य: स्यात्सहस्रं त्वन्त्ज्यस्त्रियम्..(8.385 )

को भी व्यक्ति इस बात की कल्पना कर सकता है जिस धर्म-संस्कृति के आदर्श नायक किसी भी महिला के साथ बलात्कार को जायज ठहराते हों, या खुद ही बलात्कारी हों और जिनके धर्मग्रंथ किसी खास जाति की महिला के साथ बलात्कार को बहुत छोटा अपराध मानते हो, वह देश कैसै होगा, इस देश के लोग कैसे होंगे, उस कौम की मानसिकता कैसी होगी?

बलात्कार को वीरतापूर्ण और शौर्यपूर्ण कार्य कार्य मानते थे, संघ-भाजपा के आदर्शनायक विनायक दामोदर सावरकर. उन्होंने अपनी किताब सिक्स ग्लोरियस इकोज ऑफ इंडियन हिस्ट्री में इस बात के पक्ष में तर्क दिया है कि, क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार जायज है. वे इतने पर ही नहीं रूकते हिंदुओं को ललकारते हुए कहते हैं कि “ यदि अवसर उपलब्ध हो तो ऐसा न करना कोई नैतिक या वीरतापूर्ण काम नहीं है,बल्कि कायरता है”.(See Chapter VIII of the online edition made available by Mumbai-based Swatantryaveer Savarkar Rashtriya Smarak). उनकी यह किताब 1966 में मराठी में प्रकाशति हुई थी. उसका अंग्रेजी में अनुवाद उपलब्ध है. हम सभी जानते हैं कि सावरकर संघ-भाजपा के सबसे बड़े आदर्श नायकों में एक हैं. अपनी इस किताब में उन्होंने विस्तार इस बात का विवरण दिया है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदू महिलाओं का अपहरण किया था, उन्हें मुसलमान बनाया था और उनके साथ बलात्कार किया था, इसलिए हिंदुओं को भी ऐसा ही करना चाहिए.

अपनी इस किताब में सावरकर साफ-साफ सीख दे रहे हैं कि अवसर मिलने पर हिंदुओं को मुस्लिम महिलाओं के साथ जरूर बलात्कार करना चाहिए. यह उनका नैतिक धर्म है और एक वीरतापूर्ण कार्य है.इस तथाकथित नैतिकता और वीरता का परिचय हिंदूवादी ‘वीरों’ ने अनेक दंगों में दिया है. गुजरात और मुजफ्फर नगर के दंगे इसके सबसे घृणित उदाहरण हैं. कठुआ की मासूम लड़की के साथ बलात्कार का हिंदुवादियों द्वारा समर्थन सावरकर के बताये रास्ते पर चलने का सिर्फ एक कदम है.

1-Savarkar’s Sanction to Use Rape as Political Weapon ( News clik )

2- Reading Savarkar: How a Hindutva icon justified the idea of rape as a political tool (scroll.in )

रामू सिद्धार्थ

Read it also-भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय
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स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दू धर्म से आजाद हुए सैकड़ों दलित, बने बौद्ध

अपनी घोषणा के मुताबिक हरियाणा के जींद में दलित समुदाय के पांच सौ लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया. जब देश आजादी मना रहा था, ये लोग उस हिन्दू धर्म से आजाद हो गए जिसकी वजह से दलित समाज को शोषण का शिकार होना पड़ता है. दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी के धरनास्थल पर 300 से ज्यादा दलित परिवारों के करीब 500 लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया. उत्तर प्रदेश और दिल्ली से आये छह बौद्ध भिक्षुओं ने धरनास्थल पर ही इन परिवारों को दीक्षा देकर धर्म परिवर्तन कराया.

दरअसल ये लोग पिछले तकरीबन छह महीनों (187 दिन) से दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी केबैनर तले अपनी मांगों को लेकर जींद के लघु सचिवालय में धरने पर बैठे थे. इनकी मांगों में कुरूक्षेत्र के एक गांव की दलित बेटी से हुई दरिंदगी की जांच कराना, हिसार के भटला में दलितों का सामाजिक बहिष्कार करने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने और दलितों पर किए गए झूठे मामले खारिज करना, दलितों पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाना आदि शामिल हैं.

कमेटी के संयोजक और धरना संचालक दिनेश खापड़ का कहना है कि वे सरकार से कोई नई मांग नहीं मांग रहे बल्कि उन मांगों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं, जिनके बारे में सरकार खुद पहले ही पूरा करने की घोषणा कर चुकी है. जब से देश और हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी है तब से दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर है. सरकार ने हर मामले में दलितों की अनदेखी करके दलितों के साथ विश्वासघात किया है.

‘ लोकतंत्र का भविष्य समन्वय में है संघर्ष में नहीं ’

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय थी

आजादी से 1 वर्ष पहले 1946 में डॉ. आंबेडकर ने लिखा कि “ हिंदुओं और मुसलामनों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं हैं. यह सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है.. कांग्रेस मध्यवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसकों हिदू पूंजीपतियों की समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और सत्ता प्राप्त कर लेना है, जो इस समय अंग्रेजों की मुट्ठी में हैं.” ( डॉ, आंबेडकर, संपूर्ण वाग्यमय, खंड-17, पृ.3 ).

मुसलमान मध्यवर्गीय हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अलग पाकिस्तान की मांग कर रहे थे. हिदुओं की नेतृत्व गांधी और मुसलमानों का नेतृत्व जिन्ना कर रहे है. दोनों अपने-अपने समाज के मध्यमवर्गीय हिंदुओं और मुसलानों के अगुवा थे, जिन्हें हिंदू और मुस्लिम धनिक वर्ग का समर्थना प्राप्त था. इसी के चलते डॉ. आंबेडकर गांधी और जिन्ना दोनों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे. उन्होंने दोनों के बारे में लिखा- “ गांधी और जिन्ना के संदर्भ में आंबेडकर ने कहा है कि “ मैं श्री गांधी और श्री जिन्ना से घृणा करता हूं- वैसे मैं घृणा नहीं करता, वरन मैं उन्हें नापसंद करता हूं-तो इसलिए कि मैं भारत को अधिक प्यार करता हूं.” आंबेडकर एक स्वतंत्रता, समता, बंधुता आधारित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के मार्ग की दोनों को बाधा मानते थे. गांधी और जिन्ना को नापसंद करने का कारण बताते हुए उन्होंने लिखा है कि “ यदि गांधी, ‘महात्मा’ पुकारे जाते हैं, तो श्री जिन्ना को ‘कायदे- आजम’ कहा जाता है. यदि गांधी कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं तो श्री जिन्ना को मुस्लिम लीग होना ही चाहिए….जिन्ना इस बात पर बल देते हैं कि गांधी यह स्वीकार करें कि वह एक हिंदू नेता हैं. गांधी इस बात पर बल देते हैं कि जिन्ना यह स्वीकार करें कि वह मुस्लिम नेताओं में एक हैं.” इतना ही नहीं आंबेडकर इन दोनों नेताओं को राजनीतिक दिवालियापन का शिकार भी मानते हैं. उन्होंने इनके बारे में लिखा, “ऐसी राजनीतिक दिवालियापन की स्थिति कभी देखने को नहीं मिली, जैसी इन दो भारतीय नेताओं में पाई गई.” आंबेडकर इन दोनों व्यक्तियों को चरम अहंकारी और स्वकेंद्रित मानते हैं. उन्होंने लिखा, “ मैं तो केवल यही बता सकता हूं कि मेरी निगाह में उनकी हैसियत क्या है? पहली बात मेरे दिमाग में जो आती है, वह यह कि उन जैसै दो महान अंहमवादी व्यक्तियों को खोज निकालना बड़ा कठिन है, जो उनसे प्रतिस्पर्धा कर सकें, उनके लिए ( गांधी और जिन्ना ) व्यक्तिगत उत्कर्ष ही सबकुछ है, और देश का हित कुर्सी पर बैठकर एक दूसरे का विरोध करना मात्र है. उन्होेंने भारतीय राजनीति को आपसी कलह का विषय बना दिया है.”

( यह सब कुछ आंबेडकर ने ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ शाीर्षक अपने भाषण में कहा है. यह भाषण 1943 का है )

फुले की तरह आंबेडकर भी देख रहे थे कि आजादी की लड़ाई का सारा उद्देश्य सवर्ण वर्चस्व की स्थापना है. उनका कहना था कि देश की गुलामी और शूद्रों-अतिशूद्रों की हजारों वर्षों की गुलामी का मामला एक साथ हल होना चाहिए. लेकिन व्यापक बहुजन समाज का दुर्भाग्य यह है कि भारत और पाकिस्तान आजाद नहीं मिली, बल्कि भारत की सत्ता उच्च जातीय और उच्च वर्गीय हिंदुओं के हाथ में गई और पाकिस्तान की सत्ता उच्च जातीय और उच्च वर्गीय मुसलानों के हाथ में गई. जैसा डॉ. आंबेडकर ने भविष्यवाणी की थी.

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मैरीकॉम समेत कॉमनवेल्थ के 10 गोल्ड मेडलिस्ट एशियाड में नहीं खेलेंगे…

नई दिल्ली। इंडोनेशिया के जकार्ता और पालेमबैंग में 18 अगस्त से एशियन गेम्स की शुरुआत होगी. भारत ने 34 खेलों में भागीदारी के लिए 572 एथलीट के नाम का ऐलान कर दिया है. इनमें इसी साल अप्रैल में हुए गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले 20 खिलाड़ियों के नाम नहीं हैं. बॉक्सर एमसी मैरीकॉम, शूटर जीतू राय, वेटलिफ्टर संजीता और मीराबाई चानू समेत 10 गोल्ड मेडलिस्ट एशियन गेम्स में दिखाई नहीं देंगे. स्टार बॉक्सर मैरीकॉम को उनका पसंदीदा भार वर्ग नहीं मिला, इसलिए उन्होंने नाम वापस ले लिया. भारत ने चार साल पहले दक्षिण कोरिया के इंचियोन में हुए पिछले एशियन गेम्स में 57 मेडल हासिल किए थे. इनमें 11 गोल्ड, नौ सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज शामिल थे.
एशियन गेम्स में इन भारतीय एथलीटों का चयन नहीं हुआ:-
 नोट: तेजस्वनी सावंत और आेम मिठरवाल ने कॉमनवेल्थ में दो अलग-अलग कैटेगरी में मेडल जीते थे, इसलिए कुल 20 खिलाड़ी एशियन गेम्स टीम का हिस्सा नहीं हैं
मैरीकॉम वर्ल्ड चैम्पियनशिप की तैयारी करेंगी : मैरीकॉम को एशियाड के लिए 51 किग्रा भार वर्ग में जगह मिल रही थी, लेकिन वे 48 किग्रा भार वर्ग में ही खेलना चाह रही थीं. इसलिए उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. मैरीकॉम 2014 एशियन गेम्स में भी गोल्ड जीतीं थीं. 2010 के एशियाड में उन्हें ब्रॉन्ज से संतोष करना पड़ा था. अब मैरीकॉम नवंबर में होने वाले वर्ल्ड चैम्पियनशिप की तैयारी करेंगी. वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मैरीकॉम इससे पहले पांच बार गोल्ड और एक बार सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं.
मीराबाई और संजीता का एशियाड खेलने का सपना टूटा : गोल्ड कोस्ट में सोना जीतने वाली वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और संजीता चानू भी एशियाड टीम में नहीं हैं. दोनों अब तक एक बार भी एशियन गेम्स का हिस्सा नहीं बनी. मीराबाई ने चोट के कारण एशियाड से 10 दिन पहले अपना नाम वापस लिया. वहीं, डोप टेस्ट में फेल होने के कारण संजीता चानू को टीम में नहीं चुना गया. अनुशासनहीनता के कारण पूनम यादव को बाहर कर दिया गया. इन तीनों के साथ वेंकट राहुल भी एशियाड टीम में जगह बनाने में नाकाम रहे.
रेसलिंग में बबीता-सोमवीर नहीं : रेसलिंग की टीम में कॉमवेल्थ गेम्स गोल्ड जीतने वाले राहुल अवारे, सिल्वर जीतने वाली बबीता और ब्रॉन्ज पर कब्जा करने वाले सोमवीर को टीम में नहीं लिया गया. बबीता मई में एशियाड ट्रेनिंग कैम्प में नहीं गई थी, जिस कारण उनका नाम टीम में शामिल नहीं किया गया. वहीं, भारतीय कुश्ती संघ के अनुसार, राहुल अवारे और सोमवीर ने अपने वजन को जरूरत के मुताबिक नहीं घटाया इसलिए उनका चयन नहीं किया गया.
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‘ लोकतंत्र का भविष्य समन्वय में है संघर्ष में नहीं ’

लोकतंत्र में प्रयुक्त ‘लोक‘ शब्द अपने अपार विस्तार में समस्त संकीर्णताओं से मुक्त है . ‘लोक’ जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र-वर्ग आदि समूह की संयुक्त समावेशी इकाई है, जिसमें सहअस्तित्व का उदार भाव सक्रिय रहकर ‘लोक‘ को आधार देता है. ‘लोक‘ में सबके प्रति सबकी सहानुभूति का होना आवश्यक है. इसी से ‘लोक‘ एक इकाई के रूप में संगठित होकर अपनी जीवन-शक्ति अर्जित करता है. ‘जिओ और जीने दो‘ का उदार विचार लोक-संग्रह का मार्गदर्शी सिद्धांत है और इस सिद्धांत पर आधारित ‘लोक‘ में न्याय , समानता और शांति की प्रतिष्ठा के लिए ‘लोक‘ ने स्वशासित ‘तंत्र‘ के रूप में लोकतंत्र को समस्त शासन तंत्रों में श्रेष्ठ मान्य किया है.

स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया. हमारे संविधान के प्रारंभ में प्रस्तुत पंक्ति ‘हम भारत के लोग……‘ हमारी समावेशी प्रकृति की साक्षी है. इस ‘हम‘ में ‘सर्व’ का भाव है- किसी वर्ग, वर्ण, संप्रदाय, समूह, आदि का नहीं. यह ‘हम‘ शब्द ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘ की ओर इंगित करता है . इस ‘हम‘ में समस्त भारतवासियों के कल्याण और उत्थान की उदार भावना समाहित है. ‘सबका साथ, सबका विकास‘ इसका संकल्प है और इसी संकल्प की संपूर्ति में हमारी स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता की सार्थकता है. समसामयिक संदर्भ में इस सत्य को ईमानदारी से स्वीकार करने की आवश्यकता है- ‘लोक‘ (जनसामान्य) को भी और ‘तंत्र‘ (नेतृत्व़-प्रशासन) को भी.

यह विचारणीय है कि सैद्धांतिक स्तर पर देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता का संकल्प निरंतर दोहराने और सामाजिक-न्याय, समानता एवं समरसता के लोक लुभावन नारे उछालने वाले हमारे ‘तंत्र’ ने व्यावहारिक धरातल पर सत्ता पर अबाध अधिकार पाने की दुराशा में वोट बैंक बनाने के लिए ‘लोक‘ को अनेक समूहों में बांटने की जो कूट रचनाएं रचीं उनके कारण आज हमारा लोकतंत्र भयावह समस्याओं से ग्रस्त है . भड़काऊ भाषण, समस्त ‘लोक‘ के स्थान पर ‘समूह विशेष’ के हितसाधन का प्रयत्न, उग्र-हिंसक आंदोलन और आंकड़ों के गणित में उलझी कथित राजनीति ने जनजीवन को असंतोष, अशांति असुरक्षा और भय से भर दिया है. ‘लोक‘ की निरंकुशता और ‘तंत्र‘ की तानाशाही स्वतंत्रता का पथ कंटकाकीर्ण कर रही है. एक ओर ‘लोक‘ तथाकथित आंदोलनों के बहाने हिंसा पर उतारू है, वाहन फूंके जा रहे हैं, निर्दोषों की हत्या हो रही है, सडकों पर दूध बहाया जा रहा है, सब्जियां फेंकी जा रही हैं, सार्वजनिक जीवन अशांत किया जा रहा है– अर्थात वह सब हो रहा है जो लोकतंत्र में ‘लोक‘ (जनता) को नहीं करना चाहिए. दूसरी ओर ‘तंत्र’ कहीं उग्र आन्दोलनकारियों पर लाठियां-गोलियां बरसाता नजर आता है तो कभी उनकी उचित-अनुचित मांगों को स्वीकार करता, मुआवजा बाँटता और घुटने टेकता दिखाई देता है. दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं .

हमारी वर्तमान उपर्युक्त स्थिति के लिए तंत्र की सत्ता लोलुपता, सत्ता पाने के लिए समूह अथवा वर्ग विशेष के तुष्टीकरण की प्रवृत्ति तथा जाति-धर्म आधारित वोट बैंक की दूषित राजनीति उत्तरदायी है.

लोकतंत्र में सत्ता जनता की सेवा का माध्यम है, विलासितापूर्ण सामंती दुरभिलाषाओं की पूर्ति का नहीं. सेवा के पथ पर संघर्ष नहीं होता किंतु अधिकाधिक सुख-सुविधा संचय की चाहत, जनता की गाढ़ी कमाई के बल पर व्यक्तिगत विलासिताएँ जुटाने की इच्छा राजनीतिक दलांे के मध्य गलाकाट स्पर्धा पैदा करती है. दुर्भाग्य से हमारा लोकतंत्र इसी दिशा में अग्रसर है. सत्ता के रथ को विलासिता के पंकिल-पथ से विरत कर सेवा और त्याग के पथ पर अग्रसर करना आज प्राथमिकता बन गई है.

आज सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में वाक्संयम अत्यावश्यक हो गया है क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों द्वारा कही गई बातें जनसाधारण के क्रिया-पथ का विनिश्चय करती हैं . हमारे नेतृत्व में वाकसंयम का अभाव हमारे समाज पर दुष्प्रभाव डाल रहा है. कदाचित भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल पश्चात से ही यह दोष से व्याप्त हो गया था. इसीलिए प्रख्यात कवि पंडित श्यामनारायण पांडेय ने सन 1956 में प्रकाशित ‘शिवाजी‘ महाकाव्य में चेतावनी दी थी-

उन्मत्त भाषण खोर नेता देश को बहका न दें . अनुरक्त अनुशासित प्रजा की जिन्दगी दहका न दें ..

लगभग साठ वर्ष पूर्व महाकवि ने हमें जो चेतावनी दी थी उसके प्रति असावधानी दर्शाने का दुष्परिणाम आज हमारे सामने है. वर्तमान सामाजिक राजनीतिक स्थितियाँ इस तथ्य की साक्षी हैं.

दुर्भाग्य से आज ‘लोक’ विभिन्न राजनीतिक दलों में बँटा हुआ है. प्रत्येक साधारण नागरिक प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से विचार के स्तर पर किसी ना किसी दल के निकट है और उसी के नेता की बात पर पूरी तरह विश्वास करता है– चाहे वह बात सही हो अथवा नहीं. यह स्थिति चिंताजनक है. अपनी पसंद के नेता पर विश्वास करना सहज स्वाभाविक है किंतु उसके गलत निर्णयों का भी आंख मूंदकर समर्थन करना लोकतंत्र के हित में नहीं है. इसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता.

सामान्यतः ‘लोक‘ अपने ‘तंत्र’ द्वारा निर्देशित पथ पर आगे बढ़ता है किंतु वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों में ‘लोक‘ को आगे बढ़कर ‘तंत्र’ का मार्गदर्शन करने की आवश्यकता है. वोटों के चुनावी गणित में उलझी तुष्टीकरण की आत्मघाती राजनीति करने वालों के कारण ‘तंत्र’ अपने ‘लोक‘ को सही दिशा नहीं दे पा रहा है. अतः ‘लोक‘ को ‘अप्प दीपो भव‘ के सिद्धांत पर अपने कल्याण का पथ स्वयं निर्मित करना होगा. दलीय दल-दल में धंसे समूहों के हित की राजनीति करने वालों को सही दिशा दिखानी होगी और यह तब संभव होगा जब ‘लोक‘ समूह विशेष के हित-साधन की संकीर्ण मानसिकता से उबरकर, निजी स्वार्थों की बलि देकर संपूर्ण समाज के लिए समर्पित सेवाभाव से कार्य करने वाले समाजसेवियों को तंत्र में प्रतिष्ठित करे , अपराधिक पृष्ठभूमि वाले बाहुबलियों को तंत्र में प्रवेश न करने दे. ‘लोक‘ की ऐसी सक्रियता से ही ‘तंत्र’ में सुधार संभव होगा और हमारा लोकतंत्र अपनी विकास-यात्रा सतत जारी रख सकेगा.

लोकतंत्र को भीड-तंत्र में बदलना खतरनाक खेल है. रैलियों, सभाओं, यात्राओं के रूप में ‘तंत्र‘ खुलेआम यह खेल खेलता रहा है. शक्ति-प्रदर्शन की इस होड़ में शक्ति, समय और धन का दुरुपयोग तो होता ही ह,ै साथ ही जनजीवन भी यातायात आदि व्यवस्थाओं के बाधित होने से असुविधा अनुभव करता है. यही भीड़ उग्र और हिंसक होकर राष्ट्रीय-संपत्ति को भी क्षति पहुंचाती है. अप्रिय घटनाएं घटती हैं. आज जब शासन को जनता तक और जनता को शासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए दूरदर्शन, समाचार-पत्र, ईमेल, सोशल-मीडिया जैसे अनेक प्रभावशाली संसाधन उपलब्ध हैं तब ऐसे भीड़ भरे प्रदर्शनों-सभाओं का क्या औचित्य है ? लोकहित में राष्ट्रीय-संपत्ति की सुरक्षा के लिए ‘लोक‘ और ‘तंत्र‘ दोनों को भीड़ जुटाने से बचने की आवश्यकता है.

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की भूमिका एक जागरूक प्रहरी की होती है. ‘लोक‘ की जागरूकता से ‘तंत्र‘ गलत निर्णय नहीं ले सकता, वह अपनी मनमानी नहीं कर सकता और जागरूक ‘तंत्र‘ लोक-कल्याण में बाधक आपराधिक तत्वों को नहीं पनपने देता. इस प्रकार लोकतंत्र की सफलता ‘लोक‘ और ‘तंत्र‘ दोनों की जागरूकता पर निर्भर करती है. विडम्बना यह है कि आज हम अपने सामूहिक स्वार्थों के प्रति जागरूकता प्रकट करते हैं, लोकहित के प्रति नहीं. यदि हम विभाजित मानसिकता को त्यागकर राष्ट्रीय-चेतना के एक सूत्र में बंध कर सारे समाज के हित-साधनों के लिए जागरूक हों, आपसी वैमनस्य भूलें, विगत घटनाओं की कटुता त्यागकर पारस्परिक सहयोग का संकल्प लें तो हमारा लोकतंत्र अधिक सशक्त और सार्थक बनेगा. यह स्मरणीय है कि हमारे लोकतंत्र की जीवनशक्ति विभिन्न समूहों के मध्य समन्वय में है ,संघर्ष में नहीं.

डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र विभागाध्यक्ष-हिन्दी शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय होशंगाबाद म.प्र

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 रणवीर सिंह और दीपीका पादुकोण की शादी फिक्स

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नई दिल्ली। बॉलीवुड स्टार दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी फिक्स हो गई है. खबरों के मुताबिक रणवीर और दीपिका इसी साल 20 नवंबर को शादी के बंधन में बंधने वाले हैं. यह शादी इटली में होगी. शादी में गिने चुने लोगो को ही बुलाया जाएगा जिनमें उनके कुछ दोस्त और करीबी ही शामिल हैं.

कहा जा रहा है कि शादी में शामिल होने वालों की संख्या 30 के करीब ही है. इस खबर को फिल्मफेयर की एक रिपोर्ट में कंफर्म किया गया है. रणवीर और दीपिका की शादी पिछले काफी समय ले बी टाउन का सबसे हॉट टॉपिक बनी हुई है. शादी को लेकर कई तरह की खबरें सामने आ चुकी हैं. ये ग्रैड वेडिंग इटली में होगी. जिसके बाद इंडिया में सभी के लिए रिसेप्शन का आयोजन किया जाएगा.

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