जेल में ही बीतेगा रामपाल का पूरा जीवन

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हिसार। स्वयंभू बाबा रामपाल को हत्या के एक और मामले में हिसार की एक अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. इससे पहले 16 अक्टूबर को भी रामपाल को 14 अनुयायियों के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. रामपाल को ये सजा एफआईआर नंबर 430 में सुनाई गई है. FIR 30 में रामपाल और उसके 13 समर्थकों पर नवंबर 2014 में बरवाला के सतलोक आश्रम में रामपाल के समर्थकों और पुलिस के बीच झड़प के दौरान आश्रम के भीतर एक महिला की हत्या का आरोप था.

एफआईआर 429 में रामपाल को 16 अक्टूबर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. एफआईआर नंबर 429 के मुताबिक नवंबर 2014 में बरवाला के सतलोक आश्रम में रामपाल के समर्थकों और पुलिस के बीच झड़प के दौरान उस पर और उसके 15 समर्थकों पर चार महिलाओं और एक बच्चे की हत्या करने का आरोप था.

ससे पहले 11 अक्टूबर को कोर्ट ने रामपाल को दोनों मामलों में दोषी ठहराया था. रामपाल नवंबर 2014 से जेल में बंद है. इससे पहले, हिसार अदालत ने अगस्त 2017 में रामपाल को लोगों को बंधक बनाने, गैरकानूनी ढंग से इकट्ठा होने, लोकसेवक के आदेश की अवहेलना करने के दो मामलों में बरी कर दिया था. रामपाल पर फैसले को लेकर सुरक्षा के खास इंतजाम किए गए हैं. 17 अक्टूबर तक इलाके में धारा 144 लागू रहेगी और सुरक्षाकर्मी तैनात रहेंगे.

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सरकार ही जातिवादी है तो जनता का क्या

ज्ञात हो कि दिनांक 13 अक्तूबर 2018 को दिल्ली में प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती के लिए  दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB)  ने पोस्ट कोड – 16/17 & 01/18 की जो परीक्षा ली गई थी उसमे चमार जाति के संदर्भ में प्रश्न संक्या 61 पेज संख्य 17 में पूछा गया कि यदि पंडित:पडिताइन तो चमार का स्त्री लिंग क्या होगा? इसके उत्तर में चार विकल्प थे  ‘चमाराइन/ चमारिन/ चमारी/ चामिर. दिल्ली नगर निगम में प्राइमरी टीचर की भर्ती के लिए हुई परीक्षा में एक सवाल में आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसके चलते विवाद खड़ा हो गया है और अनुसूचित/अनुसूचित जाति के लोग दिल्ली सरकार द्वारा प्रयुक्त इस प्रकार अभद्र भाषा के इस्तेमाल से खासे नाराज़ हैं.

इससे भड़के दिल्ली सरकार के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा, ‘यह बेहद ही गंभीर है और किसी भी सूरत में इसे बर्दाश्त न वाला प्रश्न है. प्रस्तुत संदर्भ में DSSSB के पास यह विकल्प था कि वह हिंदी की परीक्षा के प्रश्नपत्र में हिंदी साहित्य के वाल्मिकी, तुलसी, सूर, कबीर, रविदास दिनकर, मैथिलीशरण, निराला आदि की हिंदी से प्रश्न पूछता. पर जाति आधारित छिछले सवाल पूछकर DSSSB ने अपनी, भारतीय संविधान की, हिंदी की और इस देश की संस्कृति की गरिमा को चोट पहुंचाई है.’

राजेन्द्र पाल गौतम ने कहा कि सर्विस डिपार्टमेंट अभी भी उपराज्यपाल के अधीन है और इसी डिपार्टमेंट के DSSSB विभाग द्वारा ली जाने वाली प्राइमरी टीचर की प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्न संख्या 61 पर पूछे जाने वाले सवाल का क्या मतलब है. सोमवार को मुख्‍य सचिव से मिलकर बात करूंगा कि इस पर संज्ञान लें और इसकी अंतरिम जांच हो कि आखिर ऐसा किसके इशारे पर हुआ, उन पर मुकदमा दर्ज किया जाए.

बता दें कि अनुसूचित जाति की लिस्ट में शामिल जातियों के नाम लेना भी कानूनन अपराध माना जाता है. यही नहीं, हाल ही में देश के एक उच्च न्यायालय ने भी दलित शब्द के इस्तेमाल तक पर रोक लगाई है और केवल अनुसूचित जाति शब्द इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई है. ऐसे में जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल परीक्षा में किया जाना आपत्तिजनक तो है ही, साथ ही सवालिया निशान लगाता है कि आखिर कैसे इतने ऊंचे स्तर पर ये विरोधी काम हुआ? मैं समझता हूँ कि यह कोई चूक नहीं अपितु वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा अपने को उच्च साबित करने का अपमान जनक काम किया है. प्रश्न पत्र जरूर एक व्यक्ति बनाता होगा किंतु उस प्रश्न पत्र का किसी समिति द्वारा पुनरावलोकन भी तो किया जाता होगा यह शायद पहला मौका ही होगा जब इस प्रकार की धृष्टता किसी शैक्षिक संस्थान द्वारा की गई है. कोई माने न माने यह एक जानीमानी शरारत है.

 उधर जब दिल्ली अधीनस्थ सीवा चयन बोर्ड (DSSSB) की शरारत का खुलासा हुआ तो जाहिर है अनुसूचित/जनजाति वर्ग के लोगों इसका जमकर विरोध किया तो जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल पर DSSSB ने खेद जताया और कहा कि इवैलुएशन के दौरान इस प्रश्न को काउंट नहीं करेंगे. बोर्ड ने कहा, ‘दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के संज्ञान में आया है कि हाल में एमसीडी प्राइमरी टीचर के लिए जो परीक्षा हुई उसमें एक सवाल में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ है जो अनजाने में हुई गलती है. इस बारे में स्पष्ट किया जाता है कि पेपर सेट करने की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है और पेपर का कंटेंट बोर्ड के अधिकारियों के साथ साझा नहीं किया जाता है. पेपर के अंदर क्या था यह उम्मीदवारों के सामने ही पहली बार सामने आया. जिस प्रश्न से समाज के किसी वर्ग विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचती है उसके लिए हमें खेद है. बोर्ड कदम उठा रहा है जिससे कि पेपर सेट करने वाले लोगों को इस विषय के बारे में जागरुक बनाया जा सके और भविष्य में दोबारा ऐसी घटनाएं ना हो.

इस बारे में स्पष्ट किया जाता है कि पेपर सेट करने की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है और पेपर का कंटेंट बोर्ड के अधिकारियों के साथ साझा नहीं किया जाता है. माना कि ऐसा होता हो किंतु क्या पेपर सेटर ही एक अकेला मालिक होता जो जैसा चाहे वैसा पेपर तैयार करदे. यह विश्वास करने वाली बात नहीं है. कोई न कोई तो समिति होती होगी जो पेपर सेटर द्वारा तैयार किए पेपर का अवलोकन करता होगी. क्या उनके दिमाग में भी इस इस प्रश्न की ओर ध्यान नहीं गया.

स्मरणीय है कि सामाजिक स्तर पर तो ऐसे कुकृत्य हमेशा से होते रहे हैं . मसलन…. विगत में जातिसूचक शब्द का इस्‍तेमाल के लिए फंसे सलमान खान और शिल्पा शेट्टी भी चर्चा में बने रहे थे. उनकी इस हरकत के लिएदेश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए. वहीं अब मुंबई में भी दोनों के खिलाफ जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के लिए एफआईआर दर्ज की गई. यह भी कि सलमान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ के रिलीज होने के मौके पर ही उनका विरोध शुरू हो गया और कई सिनेमाघरों में तोड़फोड़ की गई.

पीलीभीत के बीसलपुर कोतवाली क्षेत्र के एक होटल में खाना खाने गए दलित लोगों को होटल मालिक ने खाना देने से इंकार ही नहीं किया अपित उन्हें जातिसूचक गालियां देकर होटल से भगा दिया था. पीलीभीत के बीसलपुर कोतवाली क्षेत्र के कस्बा निवासी अखिल भारतीय सफाई मज़दूर कांग्रेस के अध्यक्ष आकाश वाल्मीकि ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि वो अपने साथी गुलविन्दर वाल्मीकि संतोष वाल्मीकि सुमित वाल्मीकि और संजय वाल्मीकि के साथ बीसलपुर थाना क्षेत्र के ईदगाह चौराहे पर न्यू शमा होटल पर नॉनवेज खाने के लिये गये थे. तभी वहां मौजूद कस्बे का ही रहने वाला दबंग इरशाद उर्फ भूरा व होटल मालिक के पुत्र ने उसे व उसके साथयों को गालियां देनी शुरू कर दीं. साथ ही जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुये होटल पर खाना खिलाने से इंकार कर दिया.

एटा में दलित छात्र को तार से बांधकर जमकर पीटा, जातिसूचक शब्द भी कहे. बताया ये जा रहा है कि घायल छात्र को जब उसके परिजन कोतवाली लेकर पहुंचे तो पुलिस ने कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. इसके बाद पुलिस और परिजनों में जमकर बहस हुई. घायल छात्र का कहना है कि मामला भाजपा नेता से जुड़ा है. छात्र के मुताबिक कुछ समय पहले उसकी उन लोगों से कहासुनी हो गई थी जिसका बदला लेने के लिए उन लोगों ने उसे बेरहमी से पीटा है. जब इस मामले में एएसपी एटा संजय कुमार से बात की गई तो उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की बात कही है

गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में जहर खाकर शोध छात्र दीपक कुमार ने बृहस्पतिवार को खुदकुशी करने की कोशिश की. गंभीर हालत में शोध छात्र को जिला अस्पताल ले जाया गया. हालत बिगड़ने के बाद उसे बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया. जहर खाने से पहले शोध छात्र ने मोबाइल से वीडियो बनाया और डीन कला संकाय प्रो सीपी श्रीवास्तव के साथ विभागाध्यक्ष प्रो द्वारिकानाथ पर उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया.  दीपक ने कहा कि तीन महीने से दौड़ाया जा रहा है. साथ ही जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके अपमानित किया जा रहा. इस मामले को विश्वविद्यालय प्रशासन ने गंभीरता से लिया.

आजमगढ़ में दलित राजगीर की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. तीन आरोपी गिरफ्तार भी हुए किंतु वही ढाक के तीन पात. हिन्दुस्तान टीम, फरीदाबाद के अनुसार ट्यूशन से पढ़कर घर जा रहे स्कूटी सवार कक्षा नौवीं के छात्र के साथ मारपीट करने तथा जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर जान से मारने की धमकी देने का मामला प्रकाश में आया है. बताया जा रहा है कि सदर थाना पुलिस ने पीड़ित छात्र की शिकायत पर चार नामजद आरोपियों के खिलाफ एसएटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

यथोक्त जो भी वारदातें हैं, सामाजिक स्तर पर होने वाले भेदभाव का प्रदर्शन हैं, जो नई नहीं हैं किंतु हैं तो दलित विरोधी ही. प्रशासन है कि ऐसे घटनाओं के खिलाफ या तो कोई कार्यवाही होती ही नहीं या फिर कछुए की चाल से कार्यवाही की जाती है. किंतु दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) तो एक सरकारी संस्थान है. इसने ने शिक्षकों की भर्ती प्रकिया में इस तरह के जाति संदर्भित प्रश्न पूछकर जातिवादी मानसिकता का ही परिचय दिया है जो भारत के सामाजिक विकास में अवरोध तो पैदा करेगा ही अपितु समाज में वैमनस्य भी पैदा करेगा. सरकारी संस्थानों में विशेषकर शिक्षण संस्थानों में ऐसे प्रश्न पूछकर जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देना ही कहा जाएगा. अत: यह समाज हित में यह श्रेयकर ही होगा कि प्रश्न पत्र बनाने वाले  व्यक्ति और चयन बोर्ड के चेयरमैन को तत्काल प्रभाव से उनके पदों से बर्खास्त करेके इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जाए. और बोर्ड द्वारा यह कहना कि पेपर की जांच के दौरान इस प्रश्न को काउंट नहीं किया जाएगा. तो क्या इससे कथित गलती की पूर्ति हो जाएगी? क्या दलितों के कथित अपमान का कलंक धुल जाएगा? क्या बोर्ड द्वारा अपने कुकृत्य पर अफसोस जाहिए करना काफी है. जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल पर DSSSB द्वारा खेद जताना, तो ठीक ऐसे है जैसे नाक काटकर रूमाल से पौंछ देना.

यहाँ यह भी अफसोस है दिल्ली के मुख्य मंत्री केजरीवाल और उप-मुख्य मंत्री मनीश सिसोदिया इस मामले पर मूकदर्शक बने हैं. विदित हो कि मनीश सिसोदिया शिक्षा मंत्री का कार्यभार सम्भाले हुए हैं. इनसे इस मसले पर कुछ बोलने की आशा भी नहीं की जा सकती क्योंकि ये वही लोग है जिन्होंने यूथ फार इक्वालिटी के बैनर तले सबसे पहली एम्स दिल्ली में अनुसूचित/अनुसूचित जाति के छात्रों हेतु आरक्षण का विरोध किया था. ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार ही जातिवादी है तो जनता का क्या.

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यूपीः पांच दिन में तीन BSP नेताओं की हत्या

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उत्तर प्रदेश में अपराधियों के हौसले इस कदर बुलंद है कि बीते पांच दिनों के अंदर तीन बसपा नेताओं की हत्या हो चुकी है. इन वारदातों से प्रदेश की कानून- व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इन नेताओं में जुर्गाम मेहंदी, श्रीप्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना और पूर्व विधायक हाजी अलीम शामिल हैं. इन नामों को देखकर एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश में राजनीति हत्याएं शुरू हो गई हैं?

दरअसल एक के बाद एक बसपा के जिन तीनों नेताओं की हत्या हुई है, वो सभी पार्टी के कद्दावर नेता थे और उन सभी का अपना एक अलग रसूख भी था. यूपी के अंबेडकरनगर जिले में बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता ज़ुर्गाम मेहंदी और उनके कार चालक सुनीत यादव की 15 अक्टूबर को गोली मारकर हत्या कर दी गई. डबल मर्डर की ये वारदात अंबेडकरनगर के हंसवार थाना क्षेत्र की है. नसीराबाद में रहने वाले बसपा के वरिष्ठ नेता ज़ुर्गाम मेहंदी सोमवार की सुबह अपनी कार में टांडा की तरफ जा रहे थे. जैसे ही उनकी कार रामपुर स्थलवा के पास पहुंची, तभी दो मोटरसाइकिलों पर आधा दर्जन बदमाशों ने उनकी कार पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं.

इसी तरह 14 अक्टूबर को गाजीपुर जमानिया क्षेत्र में मदनपुरा गांव में बसपा नेता श्रीप्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना की गोली मारकर हत्या कर दी गई है. उनका शव नहर में मिला. उन्हें पीठ पर गोली मारी गई है. पुलिस ने इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है. श्रीप्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा से नाता तोड़कर बसपा का दामन थाम लिया था. बुलंदशहर के बसपा नेता और पूर्व विधायक हाजी अलीम का 10 अक्टूबर को बेडरूम में शव मिला था. उनके शरीर पर गोली लगी हुई थी. परिजन हत्या की आशंका जता रहे हैं.

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हेमा मालिनी से नजदीकी बढ़ाने के लिए धर्मेन्द्र करते थे ये काम

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नई दिल्ली। ड्रीम गर्ल की अगर कोई परिभाषा होती तो हेमा मालिनी उसमें एकदम फिट बैठतीं. वह खूबसूरत हैं, अच्छी डांसर हैं, अच्छी ऐक्टर हैं, अच्छी मां और अच्छी पत्नी भी हैं. 16 अक्टूबर यानी आज उनका बर्थडे है. आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्से…

हेमा मालिनी का जन्म 16 अक्टूबर 1948 में वीएस रामानुजम चक्रवर्ती और जया चक्रवर्ती के घर सबसे छोटी संतान के रूप में हुआ था. वह तमिलभाषी अयंगर फैमिली से हैं और हेमा की मां फिल्म प्रड्यूसर थीं. हेमा ने 1961 में एक तमिल फिल्म में डांसर के रूप में परफॉर्म करके अपने करियर की शुरुआत की थी.

ज्यादा इंट्रेस्टिंग बात यह है कि 1964 में उन्हें एक तमिल फिल्म डायरेक्टर ने हेमा को यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि वह बहुत पतली हैं. खैर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और उन्होंने 1968 में राज कपूर के ऑपोजिट सपनो का सौदागर से बॉलिवुड में डेब्यू किया. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई थी.

वैसे तो हेमा मालिनी ने अपने समय के ज्यादातर सभी बड़े स्टार्स के साथ किया लेकिन कुछ साथ उनकी जोड़ी काफी हिट रही. जिनमें से एक नाम है राजेश खन्ना. सुपरस्टार राजेश के साथ हेमा ने 10 हिट फिल्में दीं. वहीं धर्मेंद्र के साथ उन्होंने 35 फिल्मों में काम किया.

ऐसा कहा जाता है कि रमेश सिप्पी की ब्लॉक बस्टर फिल्म शोले के दौरान धर्मेंद्र को हेमा मालिनी से प्यार हो गया था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपनी ऑटोबायॉग्रफी में हेमा ने यह बात भी बताई है कि उन्हें जितेंद्र और संजीव कुमार ने भी शादी के लिए प्रपोज किया था लेकिन उन्होंने धर्मेंद्र से शादी कर ली. बता दें कि धर्मेंद्र औऱ हेमा की उम्र में 13 साल का फर्क है.

फिल्म शोले की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र और हेमा से जुड़ी एक और मजेदार कहानी रिपोर्ट्स में आ चुकी है. इस कहानी के मुताबिक, शोले की शूटिंग के वक्त जब धर्मेंद्र और हेमा का सीन शूट होता था तो धर्मेंद्र लाइटबॉय को सीन खराब करने के लिए पैसे दे देते थे. वह ऐसा इसलिए करते थे ताकि उन्हें हेमा के साथ ज्यादा से रीटेक का मौका मिले. खैर इस फिल्म के 5 साल बाद दोनों ने शादी कर ली.

हेमा के लिए धर्मेंद्र से शादी करना इतना आसान नहीं था क्योंकि वह पहले से ही शादीशुदा थे. उनकी बीवी ने धर्मेंद्र को तलाक देने से इंकार कर दिया. इसके बाद हेमा और धर्मेंद्र ने शादी करने के लिए इस्लाम अपनाया. हेमा और धर्मेंद्र की दो बेटियां एशा और अहाना देओल हैं.

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छत्तीसगढ़ में आधा दर्जन रैलियां करेंगी बहनजी, देखिए कार्यक्रम

फाइल फोटोः छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में आयोजित रैली के दौरान मायावती

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में गठबंधन के अपने सहयोगी अजीत जोगी के साथ सफल रैली करने के बाद बसपा प्रमुख मायावती जल्दी ही एक बार फिर छत्तीसगढ़ में होंगी. इस बार वो अकेले ही बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करेंगी. नवंबर महीने में अपने तूफानी दौरे में बसपा अध्यक्ष तीन दिनों 4 नवंबर फिर 16 और 17 नवंबर को छत्तीसगढ़ में रैलियों को संबोधित करेंगी. इस दौरान वो भाजपा और कांग्रेस के सामने अपने ताकत को दिखाने की कोशिश करेंगी.

मायावती बीते 13 अक्टूबर को बिलासपुर में महारैली करके अपनी संयुक्त ताकत को अन्य दलों को दिखा चुकी हैं. इसी कड़ी में बसपा मुखिया एक बार फिर छत्तीसगढ़ में होंगी. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ओपी बाजपेयी के मुताबिक इन तीन दिनों में बहनजी तकरीबन 6 रैलियों को संबोधित करेंगी. सबसे पहले 4 नवंबर को सुश्री मायावती की रैली सुबह 10 बजे राजनांद गांव जिले के डोंगरगढ़, और उसी दिन दोपहर 12 बजे दुर्ग जिले के भिलाईनगर में होगी. इसके बाद 16 नवंबर की सुबह 10 बजे आमसभा बसपा के प्रभाव वाले जांजगीर चाम्पा जिले के जांजगीर में और उसी दिन दोपहर 12 बजे रायपुर में आमसभा करेंगी. 17 नवंबर को बसपा की रैली सुबह 10 बजे बेमेतरा जिले के नवागढ़ में और उसी दिन दोपहर 12 से जिला बलौदाबाजार के कसडोल में होगी.

बसपा सुप्रीमो मायावती अपना फोकस छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव पर ज्यादा कर रही हैं. यह फोकस इसलिए और बढ़ गया है. क्योंकि अजीत जोगी की पार्टी से उनकी पार्टी के साथ गठबंधन के बाद दोनों ही दल सरकार बनाने के प्रबल दावेदार मान रहे हैं.

MeToo अभियान पर मायावती का बड़ा बयान

नई दिल्ली। MeToo अभियान को लेकर जहां तमाम राजनीतिक दलों और मीडिया दिग्गजों ने चुप्पी साध रखी है, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने इस पर बड़ा बयान दिया है. सुश्री मायावती ने ‘मी टू’ अभियान के तहत 14 महिलाओं से दुर्व्यवहार और यौन शोषण के आरोपों में फंसे केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कार्रवाई नहीं करने को लेकर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले पीएम मोदी को घेरा है. बसपा प्रमुख ने कार्रवाई नहीं करने को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार को हठधर्मी और अहंकारी कहा.

उन्होंने एम. जे. अकबर द्वारा अपने पर लगे आरोपों को राजनीतिक रंग दिए जाने की निंदा करते हुए कहा, “इस मी टू अभियान में जहां कई महिलाओं ने आगे आकर अपने साथ हुए शोषण और यौन उत्पीड़न के घटनाक्रमों को हिम्मत के साथ मीडिया के सामने रखा, वहीं बीजेपी एंड कंपनी इस अति संवेदनशील मुद्दे पर भी खामोश तमाशाई और मूकदर्शक बनी हुई है.”

एम. जे अकबर पर लगे आरोपों को आधार बनाते हुए बीएसपी प्रमुख ने भाजपा को भी कठघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि “आरोपों के कठघड़े में खड़े मंत्री से ज्यादा यह घटनाक्रम बीजेपी व केंद्र सरकार की महिला सम्मान के प्रति असंवेदनशील व इनके घोर महिला विरोधी चाल, चरित्र व चेहरे को देश दुनिया के सामने पूरी तरह से बेनकाब करता है.”

उन्होंने कहा कि- “बीजेपी सरकारों में कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा व सम्मान का बहुत बुरा हाल है, लेकिन चुनावी और राजनीतिक स्वार्थ के लिए पीड़ित महिलाओं की आवाज को पूरी तरह से असंवेदनशील होकर एक सिरे से नजरअंदाज कर देना एक ऐसा कृत्य है, जिसे शायद देश में कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा. इसका खामियाजा भी बीजेपी को आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ेगा.”

सुश्री मायावती ने कहा कि फिल्म, खेल, मीडिया सहित सभी जगहों पर ऐसे यौन उत्पीड़न व शोषण के लगने वाले आरोपों के संबंध में कार्रवाइयों के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं और इसकी निंदा व विरोध किया जा रहा है. ऐसे में बीजेपी और केंद्र सरकार का अपने मंत्री के खिलाफ कोई भी कार्रवाई न करना हठधर्मी सरकार के अहंकारी होने का भी जीता-जागता प्रमाण है.

ऐसे वक्त में जब ‘मी टू’ पर राजनीति के दिग्गजों ने चुप्पी साध रखी है, बसपा प्रमुख मायावती के इस बयान से एक हलचल शुरू हो सकती है.

कांशीराम भवन का लोकार्पण हुआ

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जालंधर। बसपा संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी के 12वें प्रीनिर्वाण दिवस पर बहुजन समाज पार्टी की ओर से राज्य सत्र पर एक विशेष कार्यक्रम पार्टी के जालंधर के नकोदर रोड पर स्थित स्टेट ऑफिस में आयोजित किया गया. जिसमें हजारों की तादाद में बसपा कार्यकर्तायों ने भाग लिया. इस अवसर पर मान्यवर कांशी राम जी की याद में ‘‘मान्यवर साहेब कांशी राम भवन’’ का उदघाटन किया गया. इससे पहले बसपा के कार्यकर्ता खुले आसमान के नीचे बैठकें किया करते थे. अब बनाये गये भवन में बैठने के लिए डबल स्टोरी हॉल का बंदोबस्त हो गया है जो वातानुकूल है. एक तरफ एक मंच बनाया गया है और मंच पर बाबा साहेब डाः आंबेडकर, साहेब कांशी राम और बहन कुमारी मायावती जी की मीर्तियां लगाई गई हैं. इस भवन के द्वार पर बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी का निशान लगाया गया है. ये भवन बसपा कार्यकर्तायों ने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया है. इस अवसर पर बसपा के स्टेट इंचार्ज एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व एम.एल.सी. डाः मेघराज सिंह, प्रदेशाध्यक्ष रशपाल सिंह राजू ने पार्टी के संस्थापक साहेब श्री कांशी राम जी के नाम पर भव्य भवन के निर्माण पर पार्टी कार्यकर्तायों को बधाई पेश की.

जालंधर से कुलवंत सिंह टिब्बा की रिपोर्ट

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ऐसे बनाए जाते है देवी-देवता

(ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति को भगवान बनाने का यह पहला मामला है. जैसी मेरी जानकारी है, फिल्मी कलाकार रजनीकांत, अमिताभ बच्चन, क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर आदि के मंदिर पहले से ही बने हुए हैं. भाजपा के वर्तमान शासनकाल में नाथूराम गोडसे का मन्दिर बनाने की बात भी जोरों पर है… शायद कहीं बना भी दिया गया हो. इनके पीछे के तर्कशास्त्रा को भी अपने-अपने तरीके से ईजाद किया जा चुका है, जैसा कि सिंधिया के विषय तर्क दिया जा रहा है कि वसुंधरा का अर्थ धरती माता होता है. यही नहीं वोहरा सिंधिया को मंदिर के माध्यम से मां कल्याणी के रूप में भी स्थापित करने जा रहे हैं…. और मोदी जी को भगवान बनाने की बारी है.)

13.10.2018 : एन डी टी वी के हवाले से खबर आई है कि महाराष्ट्र के भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाध ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान विष्णु का ‘ग्यारहवां अवतार’ बताया है. जिसका विपक्ष ने मजाक उड़ाया और कांग्रेस ने देवताओं का ‘अपमान’ करार दिया. प्रदेश भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने ट्वीट किया, ‘सम्मानीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार हैं. ’ एक मराठी चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘देश का सौभाग्य है कि हमें मोदी में भगवान जैसा नेता मिला है.’ उल्लेखनीय कि आज तक आर एस एस और भाजपा भगवान बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार बताते रहे हैं. अब सवाल ये उठता है कि विष्णु के कितने अवतार होंगे? क्या यह आर एस एस और भाजपा की नजरों मे उनके देवी-देवताओं का अपमान नहीं है? क्या यह भाजपा की खोती जा रही राजनीतिक जमीन को हासिल करने की कवायद नहीं है?

वैसे तो भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ की इस टिप्पणी को ज्यादा तवज्जों देने की बात नहीं है किंतु भाजपा की संस्कृति के निम्नस्तर की झलक है, इसलिए इस टिप्पणी पर दिमाग देने की जरूरत तो है. अवधूत वाध की इस टिप्पणी पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने तो यहाँ तक कहा, ‘वाघ वीजेटीआई से अभियांत्रिकी स्नातक हैं. अब इस बात की जांच करने की जरुरत है कि उनका (डिग्री) सर्टिफिकेट असली है या नहीं. ऐसी उनसे आशा नहीं थी.’ वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलोजी इंस्टीट्यूट (वीजेटीआई) एिशया में सबसे पुराने अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में एक है. यह वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलोजी इंस्टीट्यूट के शिक्षा स्तर पर भी यह एक दाग है. बताते चलें कि वीरमाता जिजाबाई तकनीकी संस्थान (वीजेटीआई) मुंबई में एक इंजीनियरिंग कॉलेज है. 1887 में स्थापित, यह एशिया के सबसे पुराने इंजीनियरिंग कॉलेजों में से एक है. इसे 26 जनवरी, 1 997 को अपना वर्तमान नाम अपनाए जाने तक विक्टोरिया जुबली तकनीकी संस्थान के रूप में जाना जाता था.

एक मराठी चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘देश का सौभाग्य है कि हमें मोदी में भगवान जैसा नेता मिला है.’ …अब कोई वाध से पूछे कि अब तक बनाए गए देवी देवता और भगवानों की बल पर देश का कितना भला हुआ है अथवा सुरक्षित रहा है, तो शायद वो आसमान की ओर मुंह करके खड़े हो जाएंगे.

राजनीतिक बुद्धिजीवियों के इस वर्तमान प्रकरण में, मुझे बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा बुद्धिजीवियों के विषय में लिखी गई कुछेक पंक्तियां याद आ रही हैं. बाबा साहेब कहते हैं कि प्रत्येक देश में बुद्धिजीवी वर्ग सर्वाधिक प्रभावशाली वर्ग रहा है. वह भले ही शासक वर्ग न रहा हो. बुद्धिजीवी वर्ग वह है, जो दूरदर्शी होता है, सलाह दे सकता है और नेतृत्व प्रदान कर सकता है….बुद्धिजीवी वर्ग धोखेबाजों का गिरोह या संकीर्ण गुट के वकीलों का निकाय भी हो सकता है, जहां से उसे सहायता मिलती है. अब आप स्वयं सोचिए कि आज की भारतीय राजनीति में क्या हो रहा है? आप जैसे नेताओं को जैसे बुद्धिजीवियों कौन से श्रेणी में रखना चाहेंगे? क्या ध्रर्म व संस्कृति के ठेकेदारों को इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है? कहने की जरूरत नहीं कि स्वार्थी तत्वों व अवसरवादियों ने सदैव धर्म का दुरुपयोग किया है. भगवा आतंकवाद भी धर्म के दुरुपयोग का एक बेहद घिनौना रूप है.

देवी-देवता और भगवान कैसे बनाए जाते हैं यह जानने के लिए मैं कुछ पुराने उदाहरण देना चाहता हूँ. सबसे पहले राजस्थान के हेमंत वोहरा का ही किस्सा ले लीजिए. उन्होंने अवसरवाद व संकीर्ण सोच के चलते राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को पहले तो पोस्टर के माध्यम से देवी बनाने का अभियान चलाया. संभवतः इसके उत्साही परिणाम निकलने बावजूद ही उसने वसुंधरा राजे का मंदिर बनाने की योजना को अंजाम दे डाला. इसके लिए स्थान, आर्किटेक्ट, पत्थर की किस्म, मूर्ति का आकार, शेर की सवारी व उद्घाटन आदि को अंतिम रूप भी प्रदान कर दिया गया है. ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति को भगवान बनाने का यह पहला मामला है. जैसी मेरी जानकारी है, फिल्मी कलाकार रजनीकांत, अमिताभ बच्चन, क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर आदि के मंदिर पहले से ही बने हुए हैं. भाजपा के वर्तमान शासनकाल में नाथूराम गोडसे का मन्दिर बनाने की बात भी जोरों पर है… शायद कहीं बना भी दिया गया हो. इनके पीछे के तर्कशास्त्रा को भी अपने-अपने तरीके से ईजाद किया जा चुका है, जैसा कि सिंधिया के विषय तर्क दिया जा रहा है कि वसुंधरा का अर्थ धरती माता होता है. यही नहीं वोहरा सिंधिया को मंदिर के माध्यम से मां कल्याणी के रूप में भी स्थापित करने जा रहे हैं…. और मोदी जी को भगवान बनाने की बारी है.

यह अवसरवादी कवायद हमें सोचने पर विवश करती है – क्या किसी व्यक्ति का नाम ही वह कसौटी है, जिसके आधार पर देवी-देवता व भगवान बनाए जाते हैं. क्या यह देवी-देवता व भगवान बनाने की प्रक्रिया इस हकीकत को पुख्ता नहीं करती है कि अन्य देवी-देवता व भगवान भी संभवतः इसी प्रकार बनाए गए होंगे.

आकलन करें तो देवी-देवताओं और भगवानों संख्या 86 करोड़ से भी ऊपर पहुंच गई होगी. यदि यह हकीकत है तो निस्संदेह किसी भी धर्म के लिए यह बेहद खौफनाक है. यकीनन भगवान बनाने वाले व बनने वाले दोनों महान हो सकते हैं क्योंकि भगवान को बनाना और बनना दोनों ही बहुत बड़ी बात हैं. दूसरे, इनके रहमोकरम पर ही तो आजकल भारत में अमनचैन/अशांति निर्भर है. अच्छा है, ये जिसे चाहें देवी-देवता व भगवान बना दें, लेकिन जिनके कारण ये भगवान बनने और बनाने वाले आजादी की सांस ले सके हैं, उनका अपमान करने का अधिकार तो किसी को नहीं होना चाहिए. लेकिन ऐसा हो रहा है. दिल्ली से निकलने वाले अखबार ‘अमर उजाला’ दिनांक 11-7-2008 में देश के शहीदों को आतंकवादी शब्द से नवाजे जाने से दिल छलनी हो जाता है. राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान की 12वीं कक्षा की इतिहास की पुस्तक में एक ही पाठ में 9 जगह पर शहीद भगतसिंह को आतंकवादी का दर्जा दिया गया. इस प्रकरण से संस्थान के अधिकारी तो पल्ला झाड़ ही रहे हैं,

लेकिन राजनेता भी मौन धारण किए हुए हैं. जिन योद्धाओं के बलिदान पर भारत को राजनीतिक स्वतंत्राता मिली, उन्हीं का इस तरह अपमान किया जाना, क्या राष्ट्र का अपमान नहीं है? भगवान बनने व बनाने वालों को थोड़ी चिंता इसकी भी होनी चाहिए.

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अम्बेडकरनगर में बसपा नेता की हत्या

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अम्बेडकरनगर। उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर में सोमवार को बसपा नेता जुरगाम मेहंदी और उनके ड्राइवर की दिनदहाड़े गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई. जुगराम मेहंदी को बसपा के वरिष्ठ नेता लालजी वर्मा का करीबी बताया जाता है. हमले में गोलियों की चपेट में आने से दो राहगीर भी घायल हो गए.

गौरतलब है कि अम्बेडकरनगर के हंसवर थाना क्षेत्र में सोमवार को बसपा नेता जुरगाम मेहंदी की गाड़ी पर अज्ञात बदमाशों ने हमला किया. बाइक सवार बदमाशों ने बसपा नेता की गाड़ी को घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिंग की. हमले में गाड़ी में सवार जुरगाम के ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई है. वहीं हमला करने के बाद हमलावर फरार हो गए. इसके बाद लोगों ने जुरगाम मेहंदी को जिला अस्पताल में भर्ती कराया. अस्पताल में डॉक्टरों ने जुरगाम को मृत घोषित कर दिया.

छत्तीसगढ़ः बसपा-जोगी गठबंधन के साथ आई ये बड़ी पार्टी

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी बहुजन समाज पार्टी और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस को एक और सफलता मिल गई है. प्रदेश में मायावती और जोगी गठबंधन में अब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानि सीपीआई भी शामिल हो गई है. इस नए गठबंधन के बाद सीपीआई को दो सीटें दी गई है. सीपीआई बस्तर के दंतेवाड़ा और कोंटा सीट से अपने उम्मीदवार उतारेगी. दोनों ही सीटों पर सीपीआई का दबदबा है और पहले ये दोनों सीटें उसी के कब्जे में थी.

इस मामले में बसपा प्रमुख मायावती से हरी झंडी मिलने के बाद सीपीआई को गठबंधन में शामिल किया गया. यही नहीं, बल्कि बसपा ने सीपीआई के लिए अपने कोटे की दोनों सीटें छोड़ दी है. अब बसपा 35 की बजाय 33 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इससे यह भी साफ हो गया है कि कांग्रेस और भाजपा को रोकने के लिए बसपा कितनी गंभीर है. इस घोषणा के दौरान बसपा की ओर से छत्तीसगढ़ के प्रभारी और राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ भी मौजूद थे.

14 अक्टूबर को बसपा और सीपीआई के पदाधिकारियों के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में जनता कांग्रेस सुप्रीमो अजीत जोगी ने कहा कि “छत्तीसगढ़ में बसपा और छजकां गठबंधन की लोकप्रियता को देखते हुए सीपीआई भी हमारे साथ शामिल हो रही है. सीपीआई के शामिल होने से गठबंधन को मजबूती मिलेगी और बस्तर, सरगुजा व भिलाई में फायदा होगा. इससे मजूदर और किसान वर्ग के बीच हमारी ताकत और बढ़ेगी.

जहां तक सीपीआई का सवाल है तो बस्तर संभाग की दंतेवाड़ा और कोंटा सीटों पर सीपीआई की शुरू से ही बहुत मजबूत पकड़ रही है. अविभाजित मध्यप्रदेश के समय 1990 और 1993 के चुनावों में इन दोनों सीटों पर सीपीआई ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद 1998 के विधानसभा चुनावों में इन दोनों सीटों पर सीपीआई के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे. इस नए गठबंधन से अब प्रदेश भर के दलितों, आदिवासियों, कामगारों, मजदूरों और किसानों का एक ऐसा गठबंधन बन गया है, जो सबसे ज्यादा पीड़ित रहा है. वंचितों का यह गठजोर क्या गुल खिलाएगा, यह चुनाव के नतीजे तय करेंगे.

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दूसरे टेस्ट में शानदार जीत के साथ टीम इंडिया का सीरीज पर कब्जा

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हैदराबाद। भारत और विंडीज के बीच खेले गए दूसरे और आखिरी टेस्ट में भारत ने 10 विकेट से शानदार जीत दर्ज कर 2-0 से सीरीज भी अपने नाम कर ली. पहली और दूसरी पारी में भारतीय गेंदबाजों ने सधी हुई गेंदबाजी करते हुए अपना बेहतरीन खेल दिखाया और विंडीज के खिलाड़ियों को एक-एक कर चलता किया. भारत की ओर से उमेश यादव ने शानदार गेंदबाजी करते हुए कुल 10 विकेट लिए. इस तरह उन्होंने टेस्ट करियर में पहली बार किसी मैच में 10 विकेट लेने का भी कारनामा किया. उन्हें “मैन ऑफ द मैच” चुना गया. वहीं अपने डेब्यू टेस्ट में 134 रनों की शतकीय पारी और दूसरे टेस्ट में 70 रनों की अर्धशतकीय पारी खेलने वाले युवा बल्लेबाज पृथ्वी शॉ को “मैन ऑफ द सीरीज” चुना गया. बता दें कि ये टीम इंडिया की घरेलू धरती पर लगातार 10वीं जीत है.

पहली पारी में वापसी करने के बाद विंडीज की दूसरी पारी भारतीय गेंदबाजों की शानदार गेंदबाजी के आगे धराशाही हो गई. तीसरे दिन विंडीज के बल्लेबाजों ने टीम को ख़राब शुरुआत दी और टीम के 4 खिलाड़ी 50 रनों से पहले ही पैवेलियन लौट गए. टीम के ओपनर बल्लेबाज ब्रेथवेट और पावेल तो खाता तक नहीं खोल पाए. वहीं 28 रन बनाकर क्रीज पर डटने की नाकाम कोशिश में जुटे होप को जडेजा ने चलता किया. वहीं हेटमेयर को कुलदीप यादव ने पुजारा के हाथों 17 रन पर कैच आउच करवाया. अपने अर्धशतक के नजदीक पहुंच रहे सुनील अंबरीश को जडेजा ने 38 रन पर LBW आउट किया. तेज गेंदबाज उमेश यादव ने डोवरिच को दूसरा और चेज को अपना तीसरा शिकार बनाया. वहीं पहली पारी में अर्धशतक बनाने वाले विंडीज के कप्तान दूसरी पारी में 19 रन पर आउट हो गए, जडेजा ने उनका विकेट लिया. उमेश यादव ने गैब्रियल को 1 रन पर बोल्ड कर विंडीज की दूसरी पारी 127 रनों पर समेट दी. दूसरी पारी में उमेश यादव ने सर्वाधिक 4 विकेट लिए.

विंडीज के खिलाफ बेहतरीन फॉर्म में चल रहे उमेश यादव ने दूसरे टेस्ट में अपनी घातक गेंदबाजी से विंडीज के खिलाड़ियों को ज्यादा देर तक क्रीज पर टिकने नहीं दिया. बता दें कि पहली पारी में उन्होंने सर्वाधिक 6 विकेट झटके थे. वहीं दूसरी पारी में 4 विकेट लेकर उमेश ने एक टेस्ट में 10 विकेट लेने का कारनामा भी किया.

इससे पहले विंडीज की टीम ने रोस्टन चेज के शतक के दम पर पहली पारी में 311 रन बनाए थे. विंडीज की ओर से चेज ने 106 रन की शतकीय पारी खेली थी. वहीं भारत की ओर से पहली पारी में तेज गेंदबाज उमेश यादव ने 6 विकेट लिए थे.

पहली पारी में विंडीज को पहला झटका स्पिनर अश्विन ने दिया था, उन्होंने ओपनर कीरन पावेल को जडेजा के हाथों कैच आउट करवाया. इसके बाद कुलदीप यादव ने ब्रेथवेट को LBW आउट कर विंडीज को दूसरा झटका दिया था. वहीं उमेश यादव ने विंडीज को तीसरा झटका होप को LBW आउट कर दिया था. हेटमायेर कुलदीप का दूसरा शिकार बने, कुलदीप ने भी हेटमायेर को LBW आउट किया. कुलदीप ने ही सुनील अंबरीश को जडेजा के हाथों कैच आउट करवाकर अपना तीसरा और पारी का 5वां विकेट लिया था. उमेश ने डॉवरिच को LBW आउट कर विंडीज को छठा झटका दिया था. वहीं विंडीज के कप्तान जेसन होल्डर ने शानदार 52 रन की पारी खेलकर चेज के साथ 100 रनों से ज्यादा की साझेदारी भी की थी. होल्डर उमेश यादव का शिकार बने थे. इसके बाद दूसरे दिन उमेश यादव ने देवेंद्र बिशू, रोस्टन चेज और गैब्रियल को आउट कर विंडीज की पारी 311 रन पर समेट दी थी.

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दस दिन भी वादे पर खरी नहीं उतर सकी मोदी सरकार

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नई दिल्ली। मोदी सरकार पेट्रोल और डीजल के दाम में कमी कर अपनी पीठ थपथपाना चाहती थी. लेकिन सरकार द्वारा दिखाई गई दिलेरी की कलई दस दिन के भीतर ही खुल गई. दाम कम होने के बाद दाम स्थित नहीं रह पाएं और फिर से लगातार बढ़ते गए. ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमत फिर से अपने पुराने स्तर पर आ गई है. सोमवार को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 82.72 रुपये प्रति लीटर जबकि डीजल की कीमत 75.46 रुपये प्रति लीटर हो गया.

गौरतलब है कि 5 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में 2.5 रुपये की कटौती की थी. लेकिन ये कटौती स्थित नहीं रह सकी और तेलों के दाम बढ़ते गए, जिसके बाद कीमतें एक बार फिर पुराने स्तर पर पहुंच गई हैं.

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योगी सरकार का दिया सम्मान लेने नहीं जाएंगे जयप्रकाश कर्दम

नई दिल्ली। हिंदी के जाने माने साहित्यकार जय प्रकाश कर्दम उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में शामिल नहीं होंगे. जय प्रकाश कर्दम को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से चार लाख रुपये का लोहिया सम्मान दिया गया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 अगस्त को तमाम साहित्यकारों को सम्मान देने की घोषणा की थी. लेकिन दलित सहित्य से ताल्लुक रखने वाले कर्दम कुछ दलित साहित्यकारों द्वारा भाजपा की योगी सरकार द्वारा दिए गए इस सम्मान को लेकर जय प्रकाश कर्दम की आलोचना कर रहे थे. इसको लेकर वो काफी आहत थे, जिसके बाद उन्होंने ये फैसला किया है. हालांकि उन्होंने पुरस्कार लेने से इंकार नहीं किया है. फिलहाल वो सिर्फ कार्यक्रम में शामिल होने से मना कर रहे हैं.

दलित दस्तक को भेजे अपने मैसेज में उन्होंने लिखा- “मैं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 24 अक्टूबर 2018 को आयोजित सम्मान समारोह में भाग लेने के लिए लखनऊ नहीं जा रहा हूं. उस दिन मैं एक राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लेने के लिए कन्नूर, केरल में रहूंगा.”

दलित दस्तक द्वारा यह पूछने पर की क्या वो सम्मान नहीं लेंगे? उनका कहना था कि- “सम्मान साहित्य के लिए मिला है तो सम्मान की अपेक्षा साहित्य को प्राथमिकता देकर साहित्य का सम्मान करना उचित समझ रहा हूं.”

दरअसल कर्दम कुछ दलित साहित्यकारों द्वारा अपनी आलोचना से काफी असहज थे. पिछले दिनों फेसबुक पर लिखे उनके एक पोस्ट से ये समझा जा सकता है. उन्होंने अपने एक पोस्ट में लिखा-

“उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सन 2017 के लिए लोहिया सम्मान मुझे दिए जाने की घोषणा के बाद फोन और फेसबुक के माध्यम से बहुत से मित्रों और शुभचिंतकों ने मुझे बधाई और शुभ कामनाएँ दी हैं. बधाई संदेशों की कड़ी में कुछ मित्रों, शुभचिंतकों द्वारा मुझे ‘गऊ लेखक’ कहकर कटाक्ष किया गया है. आज के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में ‘गऊ’ शब्द के विशेष निहितार्थ हैं. मुझको ‘गऊ’ कहने वाली कुछ टिप्पणियाँ उसी निहितार्थ की ओर संकेत करती प्रतीत होती हैं. इन टिप्पणियों के शब्दों की व्याख्या की जाए तो यह अर्थ निकलता है कि जयप्रकाश कर्दम उस दलित विरोधी और हिंसक हिन्दुत्ववादी सोच का समर्थक लेखक है, जो गऊवाद की जनक और पोषक है. इन टिप्पणियों पर मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहना चाहता. मैं चाहूँगा कि पाठक, आलोचक और शोधार्थी मेरे लिखित साहित्य का मूल्यांकन करें और समाज को अपनी राय से अवगत कराएं.”

इस मुद्दे पर बहस ज्यादा बढ़ने पर जय प्रकाश कर्दम का एक और पोस्ट सामने आया. इसमें इन्होंने लिखा-

“पिछले कुछ दिनों से, जब से लोहिया सम्मान की घोषणा हुई है, लेखक मित्रों का एक वर्ग मेरा विशेष आलोचक बना हुआ है. अंबेडकरवाद के प्रमाण-पत्र बाँटने में लगा यह वर्ग अपनी समझ और चेतना के अनुसार मुझे ब्राह्मणवादी, दलित विरोधी, भ्रमित, भटका हुआ, बिका हुआ, आदि..आदि…विशेषणों से सुशोभित करके मुझे दलित समाज, साहित्य और आंदोलन का खलनायक सिद्ध करने में लगा है. मुझे नहीं पता इन लोगों ने मेरा लिखा साहित्य कितना पढ़ा है, पढ़ा भी है या नही. …..

मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि मैं जो था, वही हूँ और वही रहूँगा. खुद को सिद्ध करने के लिए मुझे किसी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है.

इन दोनों पोस्ट से लोहिया सम्मान को लेकर वरिष्ठ लेखक के द्वंद को समझा जा सकता है. और आखिरकार उन्होंने सम्मान समारोह में शामिल नहीं होने का फैसला किया. लेकिन उनके इस फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या एक दलित साहित्यकार को भाजपा सरकार में कोई सम्मान नहीं लेना चाहिए. भले ये सम्मान उसकी काबिलियत को देखते हुए दिया गया हो. क्योंकि जय प्रकाश कर्दम हिंदी दलित साहित्य की दुनिया में एक बड़ा नाम हैं.

उनका लिखा उपन्यास “छप्पर” दलित साहित्य का पहला उपन्यास माना जाता है. तो वहीं उनकी कई कहानियां भी काफी सराही गई हैं. उनमें से उच्च वर्ग के छद्म जातीय उदारवाद पर लिखी कहानी “नो बार” भी काफी प्रचलित कहानी है. इस पर डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है. दरअसल जय प्रकाश कर्दम ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने साहित्य की हर विधा में शानदार काम किया है. इतना काम की उनको किसी सम्मान के लिए किसी विचारधारा या सरकार की पैरवी की जरूरत नहीं है. इस पूरे घटनाक्रम ने दलित साहित्यकारों के भीतर गुटबाजी की पोल भी खोल दी है. ‘दलित दस्तक’ ने इस खबर को प्रमुखता से दिखाना इसलिए जरूरी समझा क्योंकि जयप्रकाश कर्दम का निर्णय कितना सही है, इस पर पाठक खुद फैसला लें, और उनकी आलोचना करने वाले आलोचक कितने सही हैं, इसका फैसला भी पाठक खुद करें.

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मनु या मैकाले

भारतीय इतिहास में दो तारीखें इस देश की मूलनिवासी दलितबहुजनों के लिये विशेष मायने रखती है, पहला 06 अक्टूबर 1860 और दूसरा 26 जनवरी 1950 . 06 अक्टूबर 1860 को इंडियन पेनल कोड (भारतीय दंड संहिता) लागू हुआ था और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान. आईपीसी लागू होने पर कानून के समक्ष ब्राह्मण शूद्र सभी बराबर हो गये और संविधान लागू होने पर वर्षों से चली आ रही मानवता का कलंक अस्पृश्यता को संविधान की आर्टिकल 17 में न केवल समाप्त कर दिया गया बल्कि इसका आचरण और व्यवहार करना कानूनी रूप से दंडनीय भी माना गया. अब अछूत मानव पशु से मानव बन कर जी सकते थे तथा विकास पथ पर अंतरिक्ष से भी आगे जाने के लिए स्वतंत्र थे.

आई0पी0सी0 को लागू करने वाले लार्ड मेकाले (ब्रिटिश शिक्षाविद्) और संविधान की रचना करने वाले धरती पुत्र विश्वविभूति डाॅ0 बाबासाहब अम्बेडकर थे. ये दोनों महामानव बहुजनों के लिए मसीहा के रूप में अवतरित हुये थे. लार्ड मेकाले भले ही किसी और के लिए आलोचना के पात्र हो सकते हं, किन्तु बहुजनों के लिये किसी फरिस्ता से कम नहीं थे. लार्ड मेकाले: कानूनी समता के अग्रदूत:- लार्ड मेकाले ने नई शिक्षा नीति और आईपीसी लागू कर दलितों के उन्नति और मुक्ति का द्वार खोल दिया. आईपीसी लागू होने के पहले भारत में मनुस्मृति के आधार पर कानून व्यवस्था चलता था. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को एक ही अपराध के लिये अलग-अलग दंड विधान थे. ब्राह्मण मृत्युदंड ;ब्ंचपजंस च्नदपेीउमदज द्ध से मुक्त था चाहे वह कितना भी जघन्य अपराध क्यों न किया हो. परन्तु मेकाले ने वर्णवाद पर आधारित मनु की विधान को आईपीसी से ध्वस्त कर दिया तथा भारत में आजादी के पूर्व ही कानूनी रूप से समता का बेजोड़ मिषाल प्रस्तुत किया. इससे वर्षो से कू्रर षोषण के चक्की में पीसते अछूतों को जीने की एक आषा जगी. अब यदि किसी के विरूद्ध हत्या का आरोप सिद्ध होता है तो उसे भारतीय दंड संहिता की दफा 302 के तहत उम्रकैद अथवा फाँसी की सजा दी जाती है चाहे वह ब्राह्मण हो या भंगी.

मनु ने बहुजनों को षिक्षा-सम्पति से वंचित कियाः- ऋग्वेद में चार वर्णो की कल्पना है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण शिक्षा का अधिकारी केवल वही है जबकि ब्रह्मा के पैर से जन्मे शूद्र का काम सिर्फ तीनों वर्णो की वगैर मजदूरी लिये सेवा करना है. मनु ने इसी को आधार बना कर बहुजनों पर ढ़ेर सारी निर्योग्ताएं लाद दी. उसके अनुसार शूद्र को विद्या नही ग्रहण करना चाहिए. समर्थ होने पर भी वह सम्पति नहीं रखे. वह गांव के आखिरी छोर पर बसे. जूठा भोजन करे तथा मुर्दों पर का वस्त्र पहने. शूद्र को राजा और न्यायधीश बनने का अधिकार नहीं है, आदि.

मनु के उपर्युक्त विधानों के उल्लंघन करने पर कठोर दंड दिया जाता था. मनु प्रथम व्यक्ति था जिसने भारत में अपराधों को चिन्हित कर उसे दंडविधान से जोड़ा तथा उसका नियमन किया. मनु ने षारीरिक चोट, चोरी, डकैती, झुठी गवाही, आपराधिक विष्वासघात, धोखाधड़ी, व्यभिचार तथा बलात्कार जैसे कृत्य को अपराध की श्रेणी में चिन्हित किया. राजा न्याय करता था तथा आर्थिक दंड राजकोष में जमा होता था. पीड़ित को कोई मुआवजा नहीं दिया जाता था. मनुस्मृति की रचना ईसा पूर्व 185 के आस-पास की गई थी. ऐसा नहीं है कि 2000 साल से अधिक बीत जाने कें बाद उसका असर कम हो गया. मनु का भूत आज भी ब्राह्मणों पर सवार है. मनु के विधानों का समर्थन करते हुये बाल गंगाधर तिलक ने बाबासाहब और षाहू जी महाराज द्वारा साउथवरों कमिषन के समक्ष विधान मंडलों में दलित-पिछड़ों के लिये प्रतिनिधित्व की मांग करने पर घोर आपति जताया था. वे बहुजनों को विकास के पथ पर आगे बढ़ने से वंचित करना चाह रहे थे. तिलक ने मनु विधान का अनुषरण कर कहा था कि ’’दलित पिछडों को मिडिल क्ल्लास से ज्यादा षिक्षा ग्रहण नहीं करना चाहिए.’’ ”09 जनवरी 1917 को यवतमल में उन्होंने ऐलान किया था कि ”हमारा कानून मनुस्मृति है’’( आमचा कायदा म्हण्जे मनुस्मुति). इसीलिए वे चाहते थे कि भारत में राज अंग्रेज करें और नौकरषाही ब्राह्मणों के हाथ में रहे, उनकी नज़र में स्वराज का यही मतलब था (छत्रपति षाहू द पीलर आॅफ षोसल डेमोक्रेसी).” जब तिलक जैसे महाविद्वान मनु का कट्टर सर्मथक हो सकता है तो सधारण ब्राह्मणों को क्या कहा जाय? तिलक ने मनुस्मृति द्वारा षूद्रों पर थोपी गई निर्योग्यताओं का कभी बुरा नहीं माना.

मनु विधान के कारण बाबासाहब अम्बेडकर को संस्कृत शिक्षा से वंचित किया तथा विद्वता की षिखर पर होने के बावजूद हर मोड़ पर उन्हें जाति के नाम पर तिरस्कृत किया. मनु के कारण ही महामना ज्योतिबा राव फूले को कक्षा से नाम काट कर भगा दिया गया. मनु के कारण ही शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ब्राह्मणों ने पैर में अंगुठा से कराया तथा उनके पोता छत्रपति शाहुजी महाराज को पंचगंगा में षाही स्नान के मौके पर उनके राज पुरोहित राजोपाध्याय द्वारा अपमानित किया गया. मनु का ही प्रभाव है कि आज सारा दलित बहुजन समाज दबा कुचला तथा षोषित पीड़ित है जबकि मुट्ठी भर लोग उनपर षासन और षोषण कर रहे हैं.

लार्ड मेकाले: बहुजन षिक्षा के क्रंातिदूत:- मैकाले ने मनु के वर्षो से चली आ रही बनाई विधान को नई शिक्षा नीति लागू कर विध्वंस कर दिया तथा बहुजनों के लिये षिक्षा का द्वार खोल दिया. 10 जून 1834 को लार्ड मैकाले गवर्नर जनरल की काउंसिल का कानून सदस्य नियुक्त हो कर भारत आया. वर्ष 1813 में ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कम्पनी पर एक षर्त लगाई, जिसके मुताबिक कम्पनी को हर साल कम से कम एक लाख रूपये भारतीयों की षिक्षा पर खर्च करने होते थे. प्रष्न था किस तरह की षिक्षा भारतीयों को दी जाय. भारत की वर्तमान षिक्षा या ब्रिटिष सिस्टम की शिक्षा. मेकाले ने ब्रिटिश सिस्टम की शिक्षा लागू करने की सिफारिश की थी. उसने अंग्रेजी और साइंस पर जोर दिया था. गवर्नर जनरल बिलियम बैन्टिक ने मेकाले के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया साथ ही उसने दूसरी भारतीय भाषाओं की शिक्षा को जोड़ दिया.

मेकाले की षिक्षा नीति का प्रभाव:- वर्ष 1835 से 1853 तक के काल में मेकाले की नीति का ही कार्यान्यवन हुआ. बंगाल में नये स्कूल और काॅलेज खोले गये. प्रत्येक जिले में एक जिला स्कूल खोला गया. 1841 में बंगाल, बंबई और मद्रास में लोक षिक्षा परिषदों की स्थापना की गई. 1844 में घोषणा किया कि अंग्रेजी स्कूलों में षिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जायगी.

”अंग्रेजी शिक्षा का ही प्रभाव था जिसने अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जन्म दिया. पाष्चात् विचार और विज्ञान से भारत में राजनैतिक जागृति, वैज्ञानिक चेतना और धार्मिक विचार धाराएँ पनपी (भारतीय शिक्षा का इतिहास-शंकर विजयवर्गीय).” अंग्रेजी शिक्षा नहीं लागू होती तो भारत बुद्ध को अब तक नहीं जान पाता. अंग्रेजी में लिखी-सर इडवीन अरनाल्ड की ’’लाइट आॅफ एशिया’’ सर्व प्रथम बुद्ध को विश्व फलक पर लाया. मैकाले की अंग्रेजी षिक्षा नीति के कारण ही कल्पना चावला और सुनिता विलियन जैसे भारतीय मूल की विदेषी महिला अंतरिक्ष में दौड़ लगाकर भारत और विश्व का मान बढ़ाया. प्रसिद्ध लेखक एवं चिंतक मा0 चन्द्रभान के अनुसार इसी शिक्षा नीति के कारण भारत सर्विस सेन्टर में विष्व में अपनी जगह बना रहा है. अमेरिका की शायद ही ऐसी कोई युनिवर्सिटी होगी जहाँ भारतीय मूल के प्रोफेसर न हो. अमेरिका और ब्रिटेन में भारतीय डाक्टरों की अच्छी डिमांड है.’’ स्वामी विवेकानंद जैसा शूद्र संत अंग्रेजी शिक्षा का सहारा लेकर ही षिकागो में हिन्दूत्व का धूम मचा सके.

मेकाले के आलोचक विकास के दुष्मनः- परम्परावादी हिन्दू मेकाले की शिक्षा नीति का आलोचना करते हंै, उसे कोषते है; इसलिए कि मेकाले ने मनू विधान को चुनौती दी तथा ब्राह्मणों की षिक्षा पर एकाधिकार की परम्परा को तोड़ कर षिक्षा में समता की धारा प्रवाहित किया. मेकाले के इस कथन ’’ हमारे पास उपलब्ध संसाधनों के आधार पर यह मूमकीन नहीं कि सभी भारतीयों को एक साथ शिक्षित किया जा सके. कोषिस करनी चाहिए कि ऐसा वर्ग तैयार किया जाय, जो रक्त रंग से तो भारतीय हो, पर स्वाद नज़रिया, नैतिकता बौद्धिकता में इंगलिष हो और जो हमारे शेष भारतीयों के बीच इन्टरप्रेटर का काम कर सके, को गलत समझा गया. सच तो यह है कि इतिहास के पन्ने कहते हंै कि मेकाले भारत के भाग्य विधाता साबित हुये. जिस अंग्रेजी की नींव उन्होनें सन 1835 में डाली आज उसी के सहारे भारत दुनिया पर हावी हो चला है. यदि अब भी कोई मेकाले को कोसता है तो माना जायगा कि वह विकास का दुश्मन है.

संस्कृत षूद्रों का जीवन नर्क बनाया:- यदि मेकाले की षिक्षा नीति और 1854 का मौजूदा एजुकेषन सिस्टम लागू नहीं होता तो क्या होता ? तब भारत की धरती पर मनुस्मृति पर आधारित शिक्षा पद्धति लागू रहता. सारे धर्मशास्त्र संस्कृत में है और इन्हीं धर्मशास्त्रों में बहुजनों के ऊपर ढ़ेर सारी निर्योग्ताएं थोपी गई है. आज भी ये सब लागू रहता . हम अनपढ़ और अनाथ रहते, जुठन पर जिंदा रहते, षरीर में चिता का भस्म लगाकर घूमते तथा मरे जानवरों की लाषें खाते और ढ़ोते रहते. बहुजन गांव के बाहरी छोर पर रहता और पषुओं जैसा जीवन जीता क्योंकि तब अंग्रेजी शिक्षा से लैस डाॅ. बाबासाहब जैसा कोई मसीहा भी नहीं मिलता, जो हमें मुक्ति देकर उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता. न कोई कांशीराम बनता न कोई मायावती (मुख्यमंत्री), के. आर. नारायण (राष्ट्रपति) तथा जी.बी. बाला कृष्णन (सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीष) पैदा होता. बहुजन सिर्फ और सिर्फ अछूत और दास बन कर पशुओं से भी बदत्तर जीवन जीता.

मनु का दंड-विधान वर्णवाद पर आधारित:- मनु ने न केवल बहुजनों को षिक्षा और सम्पति के अधिकार से वंचित किया बल्कि उनके लिये कठोर दंड विधान भी बनाया. मनु का दंड विधान जाति आधारित था. एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय तथा शूद्र के लिये अलग-अलग दंड का प्रावधान था. ब्राह्मण को मृत्युदंड से मुक्त रखा गया था. भले ही वह कईयों की हत्या कर दे. मनु के अनुसार राजा ब्राह्मण का वध नहीं करेगा, चाहे उसने कितने ही भयंकर अपराध किये हो (मनु-8.350). इस पृथ्वी पर ब्राह्मण वध के समान कोई दूसरा बड़ा पाप नहीं है अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी ना लाये (मनु-8.581). राजा आर्थिक दंड की राशि ब्राह्मण को दे (मनु-8.336). यदि कोई षूद्र ब्राह्मणी स्त्री के साथ व्यभिचार करे तो उसका लिंग कटवा कर राजा सारी संपति ले ले, वैष्य को इसी अपराध के लिये एक वर्ष की कारावास और सारी सम्पति से बेदखल कर दंड दे. परन्तु इसी अपराध के लिये क्षत्रिय और ब्राह्मण को सिर्फ एक हजार पण का आर्थिक दंड दे (मनु -8-374-383). ब्राह्मण की सम्पति राजा कभी न ले (मनु-9.189). शूद्र ऊँचे वर्ण की आजीविका कभी न अपनावे, ऐसा करने पर राजा उसकी सम्पति छीन कर उसे देश से निष्कासित कर दे (मनु-10.96). अगर कोई शूद्र अहंकार वश ब्राह्मण को उपदेष दे तो राजा उसके मुंह और कान में खौलता तेल डलवावे (मनु-8.272). शूद्र यदि ब्राह्मण की निंदा करे, कठोर वचन कहे तो उसकी जिह्वा काट कर फेंक देनी चाहिए क्योंकि वह जन्म से ही नीच है.

मनु का उपरोक्त दंड विधान कू्ररतम और दिल दहला देने वाला है. यदि मेकाले आईपीसी लागू नहीं करता तो मनु विधान प्रत्यक्ष रूप से आज भी लागू रहता; तब हमारी स्थिति कैसी होती है ? यह लिखने की आवष्यकता नहीं है.

मेकाले की दंड संहिता समता पर आधारित:- प्रख्यात लेखक, स्तम्भकार और डाइवर्सिटी आन्दोलन के नायक मा. एच0 एल0 दुसाध लिखते है कि ’’लार्ड मेकाले भारत में एक फरिस्ते के रूप में आविर्भाव हुआ. वे फादर विलियन केरी और चाल्र्स ग्रान्ट के भारत सुधार वादी मंत्रों से अभिप्रेरित थे.’’ मेकाले ने भारत आने से पूर्व ब्रिटिष पार्लियामेन्ट को संबोधित करते हुये बडे क्षोभ के साथ कहा था ’’भारत में पंडितों और काजियों का कानून चलता है जो भारत के बृहतर हित में घातक है. यहाँ मुसलमान कुरान द्वारा और हिन्दू मनुविधान द्वारा षासित होता है.” उस समय भारत के विभिन्न राज्यों में क्रिमिनल लाॅ में समरूपता नहीं थी. लार्ड मेकाले भारत को एक समरूप और समता मूलक कानून देना के उद्देष्य से भारत प्रस्थान किये थे. सन् 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग ;थ्पतेज प्दकपंद स्ंू ब्वउपेेपवदद्ध का गठन हुआ जिसका प्रथम प्रेसीडेन्ट लार्ड मेकाले थे. मेकाले 14 अक्टूबर 1837 र्को आ0पी0सी0 का ड्राफ्ट रिर्पोट तत्कालीन गर्वनर जनरल को सौंप दिया. कई बार जाँच-पड़ताल के बाद ड्राफ्ट रिर्पोट को अंतिम रूप से सन् 1856 में प्रस्तुत किया गया. अंततः मेकाले का सोच परिणाम में सामने आया और 06 अक्टूबर 1860 को इंडियन पेनल कोड (भारतीय दंड संहिता) के रूप में यह भारत में लागू हो गया. इसके पारित होते ही भारत के सभी पूर्ववर्ती नियम-कानून निष्प्रभावी हो गये तथा देष में कानूनी एकरूपता और समानता आ गई. मनु का विषमतावादी कानून मिट गया, वर्णवाद की रीढ़ टूट गई. यह भारत में बहुजनों के हक में सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना थी. इस आई0 पी0 सी0 ने कानून के नज़रों में सबको एक समान बना दिया क्या ब्राह्मण, क्या शूद्र सभी एक कानून की तराजू पर तौले जाने लगे. इससे बहुजनों को षिक्षा और सम्पति अर्जन करने के अधिकार मिल गये. बहुजन शिक्षक, चिकित्सक, व्यवसायी, शासक, प्रशासक और लेखक आदि बनने के सपने देखने लगे. यह सपना साकार हुआ भी. इसका सारा श्रेय लार्ड मेकाले को जाता है जिनके अगुवाई में आई0 पी0 सी0 जैसे क्रिमिनल लाॅ बने.

आई0पी0सी0 ने हिन्दू साम्राज्यवाद को ध्वस्त कियाः-मा0 दुसाध साहब डाइवर्सिटी के घोषणा पत्र में लिखते है कि ’’मेकाले ने हिन्दू साम्राज्यवाद से लड़ने का मार्ग प्रषस्त किया है. अगर उन्होंने कानून की नजरों में सबकों एक बराबर करने का उद्योग नहीं किया होता तो डाॅ. अम्बेडकर, कांषीराम, मायावती, लालू प्रसाद यादव, चन्द्रभान प्रसाद, डाॅ. संजय पासवान, राजेन्द्र यादव, एस0 के0 विश्वास इत्यादि जैसे ढे़रों नेताओं, लेखकों नौकरशाहों आदि का उदय नही होता. तब शुद्रातिशूद्रों को विभिन्न क्षेत्रोें में योग्यता प्रदर्षन का कोई अवसर नहीं मिलता. कारण, तब मनु का कानून चलता.” जिन हिन्दू भगवानों और षास्त्रों का हवाला देकर वर्ण-व्यवस्था को विकसित किया गया था, आईपीसी ने एक झटके में झूठा साबित कर दिया. आईपीसी में ब्राह्मणी अर्थव्यवस्था को भी खारिज कर दिया. लेकिन सदियों से अर्थोपार्जन के बंद पडे जिन स्रोतों को मैकाले ने शुद्रातिशूद्रों के लिये मुक्त किया उसका हिन्दू साम्राज्यवाद में शिक्षा व धन बल में उन्हें इतना कमजोर बना दिया गया था कि वे लाभ उठाने की स्थिति में ही नहीं रहे.

बहुजन समाज मेकाले को सम्मान दें:- अंग्रेजी शिक्षा और आईपीसी लागू कर लार्ड मेकाले ने बहुजनों का सदियों से जकडे़ जंजीर को काट दिया है. हम गलतफहमी वश इस मसीहा के प्रति अनादार का भाव रखते हैं, यह ठीक नहीं. हमारे अन्य बहुजन नायकों की तरह वे भी हमारा उद्धारक हैं. उन्होंने षिक्षा, सत्ता, सम्पति पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ कर और हमें हमारा अधिकार दिलाकर हमारा उद्धार किया है. अंग्रेजों की ईस्ट इंड़िया कम्पनी रूल के कारण ही देश में प्रथम बार सन् 1774 में नंद कुमार देव नाम के एक ब्राह्मण अपराधी कों फांसी की सजा दी गई. जो कि न्यायिक जगत में एक एक महत्वपूर्ण घटना थी. बाद में कम्पनी रूल को हटा कर पूरे भारत में समान रूप से आई0 पी0 सी0 लागू किया गया जिसका श्रेय लार्ड मेकाले को जाता है. वर्णवादी ब्राह्मणवादी के नज़रों में मेकाले भले ही आदरणीय नहीं हो परन्तु बहुजनों के लिए तो वे नायक थे. हम उन्हंे 25 अक्टूबर को उनके 208 वाँ जन्म दिन पर कोटिशः नमन करते हैं.

दो में से क्या चाहिए ? मनु या मेकाले:- इतिहास से सबक लेकर बहुजनों को यह निर्णय लेना है कि उसे किसको चुनना है ? मनु अथा मेकाले को. संकीर्णता से ऊपर उठकर निःसंकोच बहुजन विचार करे, विचार दे और विचार फैलाये. चिल्ला-चिल्लाकर इतिहास कहता है कि मेकाले ने जिस अंग्रेजी शिक्षा की नींव सन् 1835 में और आईपीसी की नींव 1860 में डाली थी उसी के बूते बहुजन विकास के पंख से अंतरिक्ष छूने को बेताब है तथा भारत दुनियां पर हावी हो चला है. इसमें कोई शक नहीं की मेकाले भारत के भाग्य विधाता साबित हुये. प्रसिद्ध स्तम्भकार, लेखक और चिंतक मा. चन्द्रभान प्रसाद का मानना है कि अंग्रेज भारत में देर से आये और पहले चले गये. यदि ब्रिटिश शासन सन् 1600 में पूर्णत स्थापित हो जाता और वे सन् 2001 तक रहते तो दलित समाज आज उन्नति के सोपान पर होता (भारतीय समाज और दलित राजनीति). चन्द्रभान जी की बातों में दम है, इसमें कोई शक नहीं.

आज मेकाले की मूत्र्ति स्थापित करने की जरूरत है; मनु की नहीं. परन्तु राजस्थान उच्च न्यायलय परिषर में अन्याय और असमसनता के प्रतिक मनु की आदमकद मूत्ति न्याय की खुली चुनौति दे रही है. किसी की मूर्ति उसके व्यक्तित्व, कृतित्व और आदर्ष की याद दिलाती है. समाज उसका अनुकरण कर मानववादी और समतावादी विकास के पथ पर प्रषस्त होता है. जब मद्रास षहर की एक प्रमुख सड़क पर जनरल नील की मूर्ति स्थापित की गई तो कांग्रेस के तत्वकालीन प्रखर सांसद एस0 सत्यमूर्ति ने जनरल नील की मूर्ति हटाये जाने का सवाल उठाते हुये कहा था कि “मनुष्य रूप में यह राक्षस मद्रास (अब चेन्नई) षहर के सुन्दरतम सार्वजनिक भागों में से एक को बदनुमा बना रहा है.’’ सत्यमूर्ति ने ब्रिटिष सरकार को याद दिलाया कि नील ने कानपुर में किस कदर क्रूरता का नंगा नाच किया था और विद्रोही गांवों को जला डालने और गांव वालों को मौत के घाट उतरवा कर तथा कथित बागियों के सिर कत़्ल कर के सार्वजनिक स्थलों पर लटकाने का काम किया था. सत्यमूर्ति ने जनरल नील के आदेष पर हुई बर्बरता को ‘‘मनुष्यता के विरूद्ध जधन्य अपराध’’ बताया और कहा कि ‘‘ऐसा नहीं हो सकता कि लोग उस मूर्ति को देख कर यह महसूस करंगेे कि इसे हटाया नहीं जाना चाहिए’’. सता पक्ष के लोगों को इस दलील को अनसुनी करने का नैतिक साहस नहीं था. वे शर्मिंदा हुये और नील की मूर्ति को हटा कर संग्रहालय में रख दिया गया. यह बात 1927 की हैं.

बिल्कूल नील की मूर्ति की तरह ही राजस्थान हाई कोर्ट परिसर में स्थापित मनु की मूर्ति मनु काल की बर्बर और विषम कानून तथा सामाजिक विधान को याद दिलाती है. यह मूर्ति आज के बहुजनों को याद दिला कर विचलित करता है कि किस तरह मनु ने भारत के मूलनिवासियों के ऊपर षास्त्रीय निर्योग्यताओं को थोप कर उन्हें ‘‘षिक्षा, सम्पति और षस्त्र’’ के अधिकार से बंचित किया. ये 85ः बहुजन घोर बंचनाओं के दौर से गुजरते हुये मानव होते हुये मानव-पषु बना दिये गये. वह मनु ही था, जिसने लिखा कि ”यदि षूद्र ब्राह्मण के सामने आसन पर बैठे तो उसके चुतड़ काट देना चाहिए, ब्राह्मणों को दुर्बचन कहे तो उसके मुंह में दस अगुंल की तपाई लोहे की छड़ घुसेड़ देना चाहिए और किसी ब्राह्मणी बाला से प्रेम करे तो उसका लिंग कटवा देना चाहिए.” इतना ही नहीं, ”यदि षूद्र अपनी जीवन निर्वाह के लिये सम्पति रखे तो ब्राह्मणों को उसे छीन लेना चाहिए.” क्या इन टीश भरी बातों का चूभन मनु की प्रतिमा देख कर बहुजन मानस में नहीं होता होगा?

वास्तव में मनु की मूर्ति की मौजूदगी अपने में मानव गरीमा का अपमान है. इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि यह मूर्ति किसी लोकप्रिय मांग के कारण नहीं लगाई गई, बल्कि हुछ लोग इकठा हुये और सार्वजनिक स्थान को हड़प लिया. वे मनु को न देखे हैं और न ही उसका इतिहास जानते हैं, मनुस्मृति किसकी कृति है यह भी ठीक-ठीक पता नहीं, परन्तु मनु के नाम पर हैं, फिर भी मनु की घृणामूलक काल्पनिक मूर्ति लगा दिये. उन्होंने यह जानते हुये भी प्रतिमा की स्थापना कर दी कि भारत के बहुसंख्यक लोग मनु और उसकी कृति से घोर नफरत करते हैं, उसकी मूत्र्ती पर कालिख पोतने हिमाकत रखते हैं. आने वाले समय में यह नफरत की आग एक बड़े क्रांति की ज्वाला का रूप ले सकती है. अतः मनु के मूर्ति को उखाड़ कर किसी अज्ञात कुड़ेदान में फेंक देना चाहिए तथा मनुस्मृति को जला कर भस्म कर देना चाहिए. बाबासाहेब डाॅ0 अम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 को काले और क्रूर कानून के प्रतिक मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से दहन कर यह दिखा दिया है कि बहुजनों को किसी भी हाल में मनु और उसके विधान स्वीकार्य नहीं है. आज बाबासाहेब के सच्चे अनुयायियों को ऐसा करने के लिए उद्यत होना चाहिए.

डाॅ0 विजय कुमार त्रिषरण

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एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की

 
फोटो : TheQuint.com

महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है. उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है. यद्यपि कि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इसके बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं. यहां तक कि बी. आर. आंबेडकर और ज्योति राव फूले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविडियन शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की.

इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि ‘माही’ शब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में ‘शांति कायम करे. अधिकांश देशो के राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे. उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था. _उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोई जगह नहीं थी. कोई भी अपने भोजन, आनंद या धार्मिक अनुष्ठान के लिए मनमाने तरीके से अंधाधुंध जानवरों को मार नहीं सकता था. सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके राज्य में किसी को भी निकम्मे तरीके से जीवन काटने की इजाजत नहीं थी. उनके राज्य में मनमाने तरीके से कोई पेड़ नहीं काट सकता था. पेडों को काटने से रोकने के लिए उन्होंने बहुत सारे लोगों को नियुक्त कर रखा था.

विजय दावा करते हैं कि महिषासुर के लोग धातु की ढलाई की तकनीक के विशेषज्ञ थे. इसी तरह की राय एक अन्य इतिहासकार एम.एल. शेंदज प्रकट करती हैं, उनका कहना है कि “इतिहासकार विंसेन्ट ए स्मिथ अपने इतिहास ग्रंथ में कहते हैं कि भारत में ताम्र-युग और प्राग ऐतिहासिक कांस्य युग में औजारों का प्रयोग होता था. महिषासुर के समय में पूरे देश से लोग, उनके राज्य में हथियार खरीदने आते थे. ये हथियार बहुत उच्च गुणवत्ता की धातुओं से बने होते थे. *लोककथाओं के अनुसार महिषासुर विभिन्न वनस्पतियों और पेड़ों के औषधि गुणों को जानते थे और वे व्यक्तिगत तौर पर इसका इस्तेमाल अपने लोगों की स्वास्थ्य के लिए करते थे.*

*क्यों और कैसे इतने अच्छे और शानदार राजा को खलनायक बना दिया गया?* इस संदर्भ में सबल्टर्न संस्कृति के लेखक और शोधकर्ता योगेश मास्टर कहते हैं कि “इस बात को समझने के लिए सुरों और असुरों की संस्कृतियों के बीच के संघर्ष को समझना पडेगा”. वे कहते हैं कि “ जैसा कि हर कोई जानता है कि असुरों के महिषा राज्य में बहुत भारी संख्या में भैंसे थीं. आर्यों की चामुंडी का संबंध उस संस्कृति से था, जिसका मूल धन गाएं थीं. जब इन दो संस्कृतियों में संघर्ष हुआ, तो महिषासुर की पराजय हुई और उनके लोगों को इस क्षेत्र से भगा दिया गया”.

कर्नाटक में न केवल महिषासुर का शासन था, बल्कि इस राज्य में अन्य अनेक असुर शासक भी थे. इसकी व्याख्या करते हुए विजय कहते हैं कि “1926 में मैसूर विश्वविद्यालय ने इंडियन इकोनामिक कांफ्रेंस के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि _कर्नाटक राज्य में असुर मुखिया लोगों के बहुत सारे गढ़ थे. उदाहरण के लिए गुहासुर अपनी राजधानी हरिहर पर राज्य करते थे. हिडिम्बासुर चित्रदुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन करते थे. बकासुर रामानगर के राजा थे. यह तो सबको पता है कि महिषासुर मैसूर के राजा थे. यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि आर्यों के आगमन से पहले इस परे क्षेत्र पर देशज असुरों का राज था. आर्यों ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया”.

आंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी मिथकों के इस चित्रण का पुरजोर खण्डन किया है कि असुर दैत्य थे. आंबेडकर ने अपने एक निबंध में इस बात पर जोर देते हैं कि “महाभारत और रामायण में असुरों को इस प्रकार चित्रित करना पूरी तरह गलत है कि वे मानव-समाज के सदस्य नहीं थे. असुर मानव समाज के ही सदस्य थे”. *_आंबेडकर ब्राह्मणों का इस बात के लिए उपहास उड़ाते हैं कि उन्होंने अपने देवताओं को दयनीय कायरों के एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है. वे कहते हैं कि हिंदुओं के सारे मिथक यही बताते हैं कि असुरों की हत्या विष्णु या शिव द्वारा नहीं की गई है, बल्कि देवियों ने किया है. यदि दुर्गा (या कर्नाटक के संदर्भ में चामुंडी) ने महिषासुर की हत्या की, तो काली ने नरकासुर को मारा. जबकि शुंब और निशुंब असुर भाईयों की हत्या दुर्गा के हाथों हुई. वाणासुर को कन्याकुमारी ने मारा. एक अन्य असुर रक्तबीज की हत्या देवी शक्ति ने की. आंबेडकर तिरस्कार के साथ कहते हैं कि “ऐसा लगता है कि भगवान लोग असुरों के हाथों से अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को, अपने आप को बचाने के लिए भेज दिया”.

*आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा.* इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि “देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे. इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है. अपने शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई. नाटक-नौटंकी के लिए अच्छी, लेकिन अंसभव सी लगने वाली इन कहानियों, से हट कर हम इस सच्चाई को देख सकते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी वर्ग ने देशज लोगों के इतिहास को तोड़ा मरोड़ा. इतिहास को इस प्रकार तोड़ने मरोड़ने का उनका उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना था.

केवल बंगाल या झारखण्ड में ही नहीं, बल्कि मैसूर के आस-पास भी कुछ ऐसे समुदाय रहते हैं, जो चामुंडी को उनके महान उदार राजा की हत्या के लिए दोषी ठहराते हैं. उनमें से कुछ दशहरे के दौरान महिषासुर की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं. जैसा कि चामुंडेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीनिवास ने मुझसे कहा कि “तमिलनाडु से कुछ लोग साल में दो बार आते हैं और महिषासुर की मूर्ति की अाराधना करते हैं”.

पिछले दो वर्षों से असुर पूरे देश में आक्रोश का मुद्दा बन रहे हैं. यदि पश्चिम बंगाल के आदिवासी लोग असुर संस्कृति पर विचार-विमर्श के लिए विशाल बैठकें कर रहे हैं, तो देश के विभिन्न विश्विद्यालयों के कैम्पसों में असुर विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं. बीते साल उस्मानिया विश्विद्यालय और काकाटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘नरकासुर दिवस’ मनाया था. चूंकि जेएनयू के छात्रों के महिषासुर उत्सव को मानव संसाधन मंत्री (तत्कालीन) ने इतनी देशव्यापी लोकप्रियता प्रदान कर दी थी कि, मैं उसके विस्तार में नहीं जा रही हूं.

महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण की क्या व्याख्या की जाए? क्या केवल इतना कह करके पिंड छुडा लिया जाए कि, मिथक इतिहास नहीं होता, लोकगाथाएं भी हमारे अतीत का दस्तावेज नहीं हो सकती हैं. विजय इसकी सटीक व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “मनुवादियों ने बहुजनों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा. *हमें इस इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड़ को झाडंना पडेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पडेगी. यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं.* महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों का बढता आकर्षण बताता है कि वास्तव में यही काम हो रहा है. जय महिषासुर! जय मूलनिवासी!!

(गौरी लंकेश ने यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, जो वेब पोर्टल बैंगलोर मिरर में 29 फरवरी, 2016 को प्रकाशित हुई थी)

“गंगा का कपूत, गंगा के सपूत को खा गया है,

“गंगा का कपूत, गंगा के सपूत को खा गया है, यह कोई सामान्य मौत नही, यह एक राजनैतिक हत्या है एक माँ की अस्मत के लिए एक बेटे ने अपनी जान दे दी है, लेकिन कभी उसका बेटा होने का दावा नहीं किया,

और जो गला फाड़-फाड़ कर खुद को गंगा माँ का स्वघोषित बेटा बताता फिरता रहा उसी ने गंगा माँ को बेच डाला है…”

प्रो० जी०डी०अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) गंगा को बचाने के लिए 111 दिनों से भूख हड़ताल पर चल रहे थे, परंतु माँ गंगा के स्वघोषित फर्जी बेटे और उसकी बड़बोली सरकार को इंच मात्र फ़र्क नहीं पड़ा. (जिस सरकार की जल संसाधन व गंगा सफ़ाई मंत्री उमा भारती ने अपने बड़बोलेपन में गंगा के स्वच्छ न होने पर उसी गंगा में डूबकर प्राण त्यागने का प्रण लिया था, आज वह बेहयाई की पराकाष्ठा पर विराजमान है)

गंगा माँ को बचाने के लिए अंतिम साँस तक संघर्षरत रहे प्रोफ़ेसर को कुछ दिन पूर्व ही पुलिस द्वारा जबरन अनशन स्थल से उठाकर एम्स में भर्ती करवाया गया था, जहाँ कल शाम उनकी मृत्यु हो गई, और गंगा माँ का सच्चा सपूत सदैव के लिए गंगा माँ की गोद में चिर निद्रा में लीन हो गया.

2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी बनारस से चुनाव लड़ने आए थे, तो उत्तर प्रदेश और बनारस वासियों की भावनाओं से खेलने के लिए मोदी ने माँ गंगा को खिलौने की तरह खूब इस्तेमाल किया था. उन्होने खुद को माँ गंगा का बेटा बताया और ‘नमामि गंगे’ प्रोजेक्ट की शुरूआत की, जो इनके बाकी चुनावी नारों की तरह ही मात्र एक जुमला साबित हुआ.

लेकिन इस दुनिया में अगर अंबानी के दलाल मोदी जैसे लफ्फाज और बहुरूपिए नेता हैं तो जी०बी०अग्रवाल जैसे उच्चशिक्षित, कर्तव्यनिष्ठ और वचनबद्ध लोग भी हैं, जो मात्र सत्ता हासिल करने के लिए जुमलेबाजी करने वाले धूर्तों से बेहद आगे हैं.

आई०आई०टी० कानपुर के प्रोफ़ेसर और पर्यायवरण विभाग के प्रमुख रहे जी०डी०अग्रवाल जी ने 24 फ़रवरी 2018 व 13 जून 2018 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गंगा की दयनीय स्थिति का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री पर गंगा की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए अंतिम साँस तक भूख हड़ताल पर बैठने की बात लिखी थी.

जिसके बाद वह विगत चार महीनों से अनवरत भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे. उन्होने कहा था ‘अब तो लगता है गंगा की स्वच्छता के लिए जारी मेरा यह अनशन मेरी मौत के साथ ही खत्म होगा’. और हुआ भी यही, इस निकम्मी सरकार के कानों पर जूँ तक न रेंगी, और प्रोफ़ेसर ने प्राण त्याग दिए.

हमें तो यह डर हैं कि कहीं अब यह सरकार और इनके मंदबुद्धि समर्थक किसानों की तरह प्रोफ़ेसर जी०डी०अग्रवाल को भी नक्सली न घोषित कर दें. यह भक्त अपने आका मोदी की फटी पतलून को अपने हाथ से ढँककर छिपाने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पूर्व ही मोदी सरकार की गंगा सफ़ाई के प्रति लापरवाही देख फटकार लगाते हुए कहा था कि “इस तरह से तो गंगा 200 साल में भी साफ़ नहीं होगी”. गंगा के नाम पर चुनकर आई भाजपा की मोदी सरकार ने बीते चार सालों में 16 हजार करोड़ ₹ का बजट देने की बात कही थी जिसने वास्तव में गंगा माँ से ही बेईमानी की और केवल 5378 करोड़ ₹ ही बजट में दिए. बजट में जारी 5378 ₹ में से केवल 3633 करोड़ ₹ खर्च के लिए निकाले गए और इसमें से केवल 1836 करोड़ 40 लाख ₹ ही वास्तव में खर्च किए गए. अर्थात किए गए वादे का लगभग 10%!

इसके बावजूद कि 1836 करोड़ 40 लाख ₹ गंगा की सफाई पर खर्च हुए, पिछले 54 महीने में गंगा पहले के मुकाबले 58% और मैली हो गयी.

रिपोर्ट बताती है कि गंगा के पानी में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया 58 फीसदी बढ़ गया है. 1000 मिलीलीटर पानी में 2,500 से ज्यादा कोलिफॉर्म माइक्रोऑर्गेनिज्म्स की मौजूदगी इसे नहाने के लिए असुरक्षित बना देती है. गंगा के पानी के नमूने में बैक्टीरिया दूषण आधिकारिक मानकों से 20 गुना अधिक है.

सोचिए कि यह इंसान जब अपनी माँ का नहीं हो सका तो किसका होगा? सिर्फ अडानी और अंबानी का ही हो सकता है यह. क्योंकी इसी ने एक बार कहा थी कि यह गुजराती व्यापारी है, इसके खून में व्यापार है.

हमें यह प्रण लेना चाहिए कि इन राजनैतिक नरपिशाचों की असंवेदना और लापरवाही के कारण हुतात्मा प्रोफ़ेसर जी०डी०अग्रवाल के दिए गए बलिदान को हम ज़ाया नही जाने देंगे. हमें गंगा की स्वच्छता का संकल्प लेते हुए प्रोफ़ेसर के सपनों को मंज़िल तक पहुँचाने का प्रण लेना चाहिए.

प्रोफ़ेसर जी०डी०अग्रवाल अमर रहें! निकम्मी मोदी सरकार मुर्दाबाद!

प्रतीक सत्यार्थ फ़ैज़ाबाद (उ०प्र०)

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मोदी के खिलाफ बनारस में ताल ठोकेंगे शत्रुध्न सिन्हा?

नई दिल्ली। क्या शत्रुध्न सिन्हा वाराणसी में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आगामी लोकसभा चुनाव में ताल ठोकेंगे. जी हां, यह सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत तेजी से फैल रही है. चर्चा तेज है कि बिहारी बाबू 2019 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से सांसद पीएम नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरेंगे.

दरअसल यह चर्चा 11 अक्टूबर को शत्रुध्न सिन्हा के लखनऊ में सपा कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के बाद शुरू हुई है. इस दिन अखिलेश यादव की अगुवाई में जयप्रकाश नारायण की जयंती मनाई गई. इसमें शॉट गन शत्रुध्न सिन्हा भी शामिल हुए, जिसके बाद यह चर्चा चल पड़ी है.

लखनऊ में सपा कार्यालय में शत्रुध्न सिन्हा की मौजूदगी सीधे-सीधे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती थी. सिन्हा के साथ पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा भी कार्यक्रम में पहुंचे थे. कार्यक्रम में शत्रुघ्न सिन्हा उर्फ बिहारी बाबू ने कहा कि वे जेपी से प्रभावित होकर राजनीति में आए थे. अटल जी के वक्त लोकशाही थी, आज तानाशाही चल रही है. खोखली जुमलेबाजी नहीं चलेगी.

इस दौरान शत्रुध्न सिन्हा और अखिलेश यादव दोनों ने एक-दूसरे की जमकर तारीफ की. शत्रुध्न सिन्हा ने कहा कि अखिलेश के ऊर्जावान और ओजस्वी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश जयप्रकाश जी के सपनों को पूरा करेगा और भाजपा का सफाया करने में सफल होगा. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा- ‘यहां अखिलेश तैयार है, बिहार में तेजस्वी तैयार हो चुका है. अब डरने को जरूरत नहीं है.’ ईवीएम पर सवाल उठाते हुए बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, ईवीएम पर भी निगाह और खयाल रखना.

इस कार्यक्रम के बाद सपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि वाराणसी में पार्टी शत्रुध्न सिन्हा को मैदान में उतरने के लिए आग्रह कर सकती है. जल्दी ही इस संबंध में सिन्हा से बातचीत किए जाने की भी चर्चा है. ये चर्चा खोखली नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस वजह भी है. दरअसल बिहार में बिहारी बाबू शत्रुध्न सिन्हा के लाखों चाहने वाले हैं. वाराणसी बिहार से सी सटा हिस्सा है. यह पूर्वांचल बेल्ट कहा जाता है, जहां सिन्हा को उतना ही पसंद किया जाता है, जितना कि बिहार के किसी हिस्से में. दूसरी बात, वाराणसी में कायस्थ वोटों की संख्या भी शत्रुध्न सिन्हा के पक्ष में जाती है. वाराणसी कैंट विधानसभा को लें तो यहां कायस्थ वोटों की संख्या 35 हजार है। सन् 1991 से लेकर ताजा विधानसभा चुनाव पर यहां कायस्थ नेता का ही कब्जा है। शहर दक्षिणी विधानसभामें भी कायस्थ वोटों की संख्या ठीक-ठाक है. तो ऐसे में अगर 2019 लोकसभा चुनाव से पहले शत्रुध्न सिन्हा भाजपा से इस्तीफा दे देते हैं तो उन्हें सपा से टिकट ऑफर किया जा सकता है. और अगर ऐसा होता है और मोदी फिर से वाराणसी से चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाते हैं तो अबकी लड़ाई एक तरफा नहीं रह जाएगी. शॉट गन उन्हें कड़ी टक्कर देंगे.

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प्रधानमंत्री मोदी को लिखे जीडी अग्रवाल के वो तीन पत्र, जिसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया

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नई दिल्ली। पिछले 112 दिनों से गंगा सफाई की मांग लेकर आमरण अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का गुरुवार को निधन हो गया. उन्होंने गंगा नदी को अविरल बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन बार पत्र लिखा था. हालांकि एक बार भी वहां से कोई भी जवाब नहीं आया.

वे अपने पत्रों में बार-बार प्रधानमंत्री को याद दिलाते रहे कि गंगा नदी को जल्द से जल्द साफ करना कितना जरूरी है. लेकिन मोदी की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई.

पहला पत्र उन्होंने उत्तरकाशी से 24 फरवरी 2018 को लिखा था, जिसमें वे गंगा की बिगड़ती स्थिति के साथ प्रधानमंत्री को साल 2014 में किए गए उनके उस वादे की याद दिलाते हैं जब बनारस में उन्होंने कहा था कि ‘मुझे मां गंगा ने बुलाया है.’ उन्होंने लिखा,

भाई, प्रधानमंत्री तो तुम बाद में बने, मां गंगाजी के बेटो में मैं तुमसे 18 वर्ष बड़ा हूं. 2014 के लोकसभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं मां गंगाजी के समझदार, लाडले और मां के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे. पर वह चुनाव मां के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से जीतकर अब तो तुम मां के कुछ लालची, विलासिता-प्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गए हो और उन नालायकों की विलासिता के साधन (जैसे अधिक बिजली) जुटाने के लिए, जिसे तुम लोग विकास कहते हो, कभी जल मार्ग के नाम से बूढ़ी मां को बोझा ढोने वाला खच्चर बना डालना चाहते हो, कभी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए हल का, गाड़ी का या कोल्हू जैसी मशीनों का बैल. मां के शरीर का ढेर सारा रक्त तो ढेर सारे भूखे बेटे-बेटियों की फौज को पालने में ही चला जाता है जिन नालायकों की भूख ही नहीं मिटती और जिन्हें मां के गिरते स्वास्थ्य का जरा भी ध्यान नहीं.

मां के रक्त के बल पर ही सूरमा बने तुम्हारी चाण्डाल चौकड़ी के कई सदस्यों की नज़र तो हर समय जैसे मां के बचे खुचे रक्त को चूस लेने पर ही लगी रहती है. मां जीवीत रहे या भले ही मर जाए. तुम्हारे संविधान द्वारा घोषित इन बालिगों को तो जैसे मां को मां नहीं, अपनी संपत्ति मानने का अधिकार मिल गया है. समझदार बच्चे तो नाबालिग या छोटे रहने पर भी मातृ-ऋण उतारने की, मां को स्वस्थ-सुखी रखने की ही सोचते हैं और अपने नासमझ भाई-बहनों को समाझाते भी हैं. वे कुछ नासमझ, नालायक, स्वार्थी भाई-बहनों के स्वार्थ परक हित-साधन के लिए मां पर बोझा-लादने, उसे हल, कोल्हू या मशीनों में जोतने की तो सोच भी नहीं सकते खूच चूसने की तो बात ही दूर है.

तुम्हारा अग्रज होने, तुम से विद्या-बुद्धि में भी बड़ा होने और सबसे ऊपर मां गंगा जी के स्वास्थ्य-सुख-प्रसन्नता के लिए सब कुछ दांव पर लगा देने के लिए तैयार होने में तुम से आगे होने के कारण गंगा जी से संबंधित विषयों में तुम्हें समाझाने का, तुम्हें निर्देश देने का जो मेरा हक बनता है वह मां की ढेर सारी मनौतियों और कुछ अपने भाग्य और साथ में लोक-लुभावनी चालाकियों के बल पर तुम्हारे सिंहासनारूढ़ हो जाने से कम नहीं हो जाता है. उसी हक से मैं तुम से अपनी निम्न अपेक्षाएं सामने रख रहा हूं.

इसके बाद दूसरा पत्र उन्होंने हरिद्वार के कनखाल से 13 जून 2018 को लिखा. इसमें जीडी अग्रवाल ने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि उनके पिछले खत का कोई जवाब नहीं मिला है. अग्रवाल ने इस पत्र में भी गंगा सफाई की मांगों को दोहराया और जल्द प्रतिक्रिया देने की गुजारिश की.

हालांकि इस पत्र का भी उनके पास कोई जवाब नहीं आया. इस बीच उनकी मुलाकात केंद्रीय मंत्री उमा भारती से हुई और उन्होंने फोन पर नितिन गडकरी से बात की थी. कोई भी समाधान नहीं निकलता देख उन्होंने एक बार फिर पांच अगस्त 2018 को नरेंद्र मोदी को तीसरा पत्र लिखा.

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

मैंने आपको गंगाजी के संबंध में कई पत्र लिखे, लेकिन मुझे उनका कोई जवाब नहीं मिला. मुझे यह विश्वास था कि आप प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगाजी की चिंता करेंगे, क्योंकि आपने स्वयं बनारस में 2014 के चुनाव में यह कहा था कि मुझे मां गंगा ने बनारस बुलाया है, उस समय मुझे विश्वास हो गया था कि आप शायद गंगाजी के लिए कुछ करेंगे, इसलिए मैं लगभग साढ़े चार वर्ष शान्ति से प्रतीक्षा करता रहा.

आपको पता होगा ही कि मैंने गंगाजी के लिए पहले भी अनशन किए हैं तथा मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए मनमोहन सिंह जी ने लोहारी नागपाला जैसे बड़े प्रोजेक्ट रद्द कर दिए थे जो कि 90 प्रतिशत बन चुके थे तथा जिसमें सरकार को हजारों करोड़ की क्षति उठानी पड़ी थी, लेकिन गंगाजी के लिए मनमोहन सिंह जी की सरकार ने यह कदम उठाया था.

इसके साथ ही इन्होंने भागीरथी जी के गंगोत्री जी से उत्तरकाशी तक का क्षेत्र इको-सेंसिटिव जोन घोषित करा दिया था जिससे गंगाजी को हानि पहुंच सकने वाले कार्य न हों.

मेरी अपेक्षा यह थी कि आप इससे दो कदम आगे बढ़ेंगे तथा गंगाजी के लिए और विशेष प्रयास करेंगे क्योंकि आपने तो गंगा का मंत्रालय ही बना दिया था. लेकिन इन चार सालों में आपकी सरकार द्वारा जो कुछ भी हुआ उससे गंगाजी को कोई लाभ नहीं हुआ.

उसकी जगह कॉरपोरेट सेक्टर और व्यापारिक घरानों को ही लाभ दिखाई दे रहे हैं. अभी तक आपने गंगा से मुनाफा कमाने की ही बात सोची है. गंगाजी को आप कुछ दे नहीं रहे हैं. ऐसा आपकी सभी योजनाओं से लगता है. कहने को आप भले ही कहें कि अब हमें गंगाजी से कुछ लेना नहीं है, उन्हें देना ही है.

दिनांक 03.08.2018 को मुझसे केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती जी मिलने आई थीं. उन्होंने नितिन गडकरी जी से मेरी फोन पर बात करवाई थी, किन्तु समाधान तो आपको करना है, इसलिए मैं सुश्री उमा भारती जी को कोई जवाब नहीं दे सका. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी नीचे दी गई चार मांगों को, जो वही हैं जो मेरे आपको 13 जून 2018 को भेजे पत्र में थी, स्वीकार कर लीजिए, अन्यथा मैं गंगाजी के लिए उपवास करता हुआ आपनी जान दे दूंगा.

मुझे अपनी जान दे देने में कोई चिंता नहीं है, क्योंकि गंगाजी का काम मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है. मैं आईआईटी का प्रोफेसर रहा हूं तथा मैं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं गंगाजी से जुड़ी हुई सरकारी संस्थाओं में रहा हूं. उसी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आपकी सरकार ने इन चार सालों में कोई भी सार्थक प्रयत्न गंगाजी को बचाने की दिशा में नहीं किया है. मेरा आपसे अनुरोध है कि मेरी इन चार मांगों को स्वीकार किया जाए. मैं आपको यह पत्र उमा भारती जी के माध्यम से भेज रहा हूं.

मेरी चार मांगे निम्न हैं…

1. गंगा जी के लिये गंगा-महासभा द्वारा प्रस्तावित अधिनियम ड्राफ्ट 2012 पर तुरन्त संसद द्वारा चर्चा कराकर पास कराना (इस ड्राफ्ट के प्रस्तावकों में मैं, एडवोकेट एम. सी. मेहता और डा. परितोष त्यागी शामिल थे ), ऐसा न हो सकने पर उस ड्राफ्ट के अध्याय–1 (धारा 1 से धारा 9) को राष्ट्रपति अध्यादेश द्वारा तुरन्त लागू और प्रभावी करना.

2. उपरोक्त के अन्तर्गत अलकनन्दा, धौलीगंगा, नन्दाकिनी, पिण्डर तथा मन्दाकिनी पर सभी निर्माणाधीन/प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना तुरन्त निरस्त करना और गंगाजी एवं गंगाजी की सहायक नदियों पर सभी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं को भी निरस्त किया जाए.

3. उपरोक्त ड्राफ्ट अधिनियम की धारा 4 (डी) वन कटान तथा 4(एफ) खनन, 4 (जी) किसी भी प्रकार की खुदान पर पूर्ण रोक तुरंत लागू कराना, विशेष रुप से हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में.

4. एक गंगा-भक्त परिषद का प्रोविजिनल (Provisional) गठन, (जून 2019 तक के लिए). इसमें आपके द्वारा नामांकित 20 सदस्य, जो गंगा जी और केवल गंगा जी के हित में काम करने की शपथ गंगा जी में खड़े होकर लें और गंगा से जुड़े सभी विषयों पर इसका मत निर्णायक माना जाए.

प्रभु आपको सदबुद्धि दें और अपने अच्छे बुरे सभी कामों का फल भी. मां गंगा जी की अवहेलना, उन्हें धोखा देने को किसी स्थिति में माफ न करें.

मेरे द्वारा आपको भेजे गए अपने पत्र दिनांक 13 जून 2018 का कोई उत्तर या प्रतिक्रिया न पाकर मैंने 22 जून 2018 से उपवास प्रारंभ कर दिया है. इसलिए शीघ्र आवश्यक कार्यवाही करने तथा धन्यवाद सहित.

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सहारनपुर में फिर दलित-राजपूतों में विवाद, तीन युवकों की जमकर पिटाई

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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक बार फिर से विवाद हो गया. यहां बारात में शामिल होने आए दलित युवकों के बाइक से पटाखे की आवाज निकालने पर विवाद हो गया. दूसरे वर्ग के लोगों ने उनके साथ मारपीट कर दी. इसमें तीन युवक घायल हो गए. दलितों का आरोप है कि विवाद रास्ता पूछने को लेकर हुआ. मौके पर पहुंची पुलिस ने घायलों को सीएचसी फतेहपुर में भर्ती कराया. बाद में दलित समाज के लोग इकट्ठे होकर थाने पहुंचे और सात राजपूत युवकों के खिलाफ तहरीर देकर कार्रवाई की मांग की. सीओ सदर ने भी गांव में पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया. दलित और राजपूतों के विवाद की खबर मिलते ही एसओ भारी पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे और घायलों को सीएचसी फतेहपुर भिजवाते हुए आरोपी पक्ष के एक ग्रामीण को हिरासत में ले लिया. एहतियात के तौर पर गांव में पुलिस तैनात कर दी गई. घटना के बाद दलित पक्ष के लोग इकट्ठा होकर थाने पहुंचे. जहां दाबकी जुनारदार निवासी सुग्घन चंद पुत्र आशाराम की तरफ से बडेढ़ी निवासी सात युवकों के खिलाफ थाने में तहरीर देकर कार्रवाई की मांग की. तहरीर में आरोप है कि बाराती में गए युवक गांव में रास्ता पूछने के लिए रुके थे जिस पर राजपूतों ने जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए धारदार हथियारों से हमला कर दिया.

फतेहपुर थाना अध्यक्ष एमपी सिंह ने बताया कि अल्हेड़ी गांव में दलित राजू पुत्र हुकम सिंह की बेटी की बारात दाबकी जुनारदार गांव से आई थी. गुरुवार की शाम चार बजे दो बाइकों पर सवार कुछ बाराती पास के गांव बडेढी घोघु आए थे. यहां पर वह बुलेट मोटरसाइकिलों के साइलेंसरों से पटाखे जैसी आवाज निकाल रहे थे, साथ ही अभद्र भाषा का प्रयोग भी कर रहे थे. गांव के राजपूत युवकों द्वारा ऐसा करने से रोकने पर विवाद हो गया. विवाद बढ़ने पर बडेढ़ी के युवकों ने बाइक सवार युवकों के साथ मारपीट कर दी. इसमें राम प्रसाद, अनुज, सोनू सिंह घायल हो गए. उन्होंने बताया कि तहरीर मिल गई है. रिपोर्ट दर्ज की जा रही है. गांव में तनाव जैसी कोई बात नहीं है.

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राजस्थान चुनाव: दलित संगठनों ने चुनाव से पहले जारी किया ‘घोषणा-पत्र’

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नई दिल्ली। राजस्थान में चुनाव की घोषणा के साथ हीं राज्य में सक्रिय दलित संगठन अपनी अनेक मांगों के साथ राज्य के सियासी दलों के पास पहुंचने जा रहे हैं. गुरुवार को दलित संगठनों ने समाज के इस वंचित समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर एक ‘दलित घोषणा-पत्र’ को मीडिया के समक्ष जयपुर में जारी किया है. इस मांग-पत्र को वे राज्य की सियासत में सक्रिय सारे दलों को भेजकर अपनी चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल करनें को कहेंगे.

10 पेज की इस घोषणा-पत्र को अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच ने तैयार किया है. इस घोषणा पत्र में दलित उत्थान और सरोकार से जुड़े सारे मुद्दों को शामिल किया गया है. दलितों से जुड़े सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक ,शैक्षणिक मुद्दों को लेकर तैयार किए गए इस मांग-पत्र के माध्यम से दलित समाज से जुड़े मुद्दे पर राजनीतिक दलों को अपना दृष्टिकोण भी बताना पड़ेगा.

फिलहाल चुनाव के पहले जारी इस दलित घोषणा पत्र के माध्यम से समाज के दलित समुदाय के अलावा घूमंतु समुदाय,आदिवासी और महिलाओं के अधिकार से जुड़े मांगों को भी शामिल किया गया है. इस घोषणा पत्र में छुआछुत को खत्म करना, एससी -एसटी एक्ट 1989 को पूरी तरह लागू करना, मैला उठाने के काम में लगे सफाईकर्मियों का पुर्नवास, डायन-प्रथा के खिलाफ सशक्त कानून और दलित समुदाय के लोगों को मुफ्त शिक्षा देने जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है.

दलित महिला अधिकार मंच की राजस्थान की समन्वयक सुमन देवथिया के अनुसार, ‘ इस बार सत्ता में आने वाला दल सरकार बनने के बाद उत्पीड़न के शिकार दलितों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराए. साथ हीं राजस्थान के जिन भागों से इस तरह के ज्यादातर मामलें सामने आते हैं, उन इलाकों को संवेदनशील घोषित किया जाए.’

देवथिया का यह भी कहना है कि, ‘सिर पर मैला ढोने की प्रथा को स्थायी रूप से समाप्त किया जाना चाहिए और इस काम में लगे सफाईकर्मियों का पुनर्वास भी किया जाना चाहिए. वहीं उनके पुर्नवास के लिए सरकार को आर्थिक सहायता के साथ स्थायी नौकरी भी देनी चाहिए.’

दलित समुदाय के इस घोषणा-पत्र में दलितों के लिए लागू राजस्थान सिलिंग एक्ट के तहत दलित समुदाय के लोगों को जमीन के समान वितरण की भी मांग की गई है. इसके अलावा दलित संगठनों ने राजनीतिक दलों से अनारक्षित सीटों पर दलित महिलाओं को चुनाव में टिकट देने की भी मांग की है.

वैसे राज्य की आबादी में 17 प्रतिशत वाले SC समुदाय को आए दिन जातिगत उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. राजस्थान में 5 दलितों की डांगावास कांड में हुई हत्या, राज्य के कई इलाको में ऊंची जाति के लोगों का दलितों को शादी के वक्त घोड़ी पर ना चढ़ने देना जैसी घटनाएं सामने आती हो. लेकिन दलितों के साथ होने वाले अत्याचार के मामले,अब तक राजस्थान की राजनीति में चुनावी मुद्दा बन कर नहीं उभर सकी हैं.

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