सीवर में मरने का अभिशाप

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भारत में हर पांचवें दिन एक सफाई कर्मचारी काल का ग्रास बनता है, और राज्यों से लेकर केन्द्र में सरकार के आधीन नगरपालिकाएं, या प्रशासन या निर्वाचित प्रतिनिधि अपेक्षित कदम उठाने की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल कर अपना पल्ला झाड़ लेते है. हाथ से मैला साफ करने वाला वह दुर्भाग्यशाली इंसान तब सुर्खियों में आता है जब सीवर में दम घुटने या हादसे में उसकी मौत हो जाती है. पर किसी अधिकारी की जबान से यह नहीं निकलता है कि “यह हमारी समस्या है; हम इसका समाधान करेंगे”

नए प्रौघोगिकीय साधन स्वागतयोग्य है. कितना अच्छा हो कि ये अमानवीय काम सफाई कर्मचारियों के बजाए मशीने करने लगें. पर प्रौघोगिकी समाधान समस्या का हल नहीं है क्यों कि बुनियादी तौर पर यह प्रौघोगिकी की नहीं बल्कि एक समाजिक समस्या है और इसके बाद प्रशासनिक. सफाईकर्मी वाल्मीकि जैसी जातियों से हैं जो सदियों से हाथ से मैला ढ़ोते आ रहे हैं और छुआछूत का शिकार रहे हैं. इस जाति में जन्म लेना अभिशाप के समान है. यह जन्मजात जाति अन्याय के खिलाफ खड़े होने की आपकी क्षमता को पगुं कर देती है.

उसकी बेड़ियां इतनी मजबूत होती है कि इस काम से पीछा छुड़ाने के बाद भी पैरों को जकड़े रहती है. वे भेदभाव से बचने के लिए अपनी पत्नियों से भी पहचान छिपाते हैं. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी जाति की पहचान छिपाने कि जरूरत में कैसी बेबसी होगी जो अंतरंग रिश्तों में सच का सामना नहीं कर सकती? कौन-सी तकनीक, कौन-सा ऐप, कौन सा विज्ञापन अभियान इसे ठीक कर सकता है?

1993 और 2013 में पारित कानूनों के तहत हाथ से मैला साफ करना प्रतिबंधित है, फिर इसे लागु क्यों नहीं किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने सीवर की सफाई में मरने वाले हर एक कर्मचारी के परिवार को 10 लाख रु. के मुआवजे का आदेश दिया है. फिर भी सिर्फ दो प्रतिशत ही इसका लाभ उठा सके है. हमारी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10-15 साल में सीवर की सफाई करने के दौरान करीब 1,870 सफाईकर्मियों की मौत हुई. कई मामले तो सामने भी नहीं आए,

अपनी किताब कर्मयोग में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाथ से मैला साफ करने को एक ‘आध्यात्मिक अनुभव” माना है. मेरा उनसे निवेदन है कि वे हाथ से मैला साफ करने वाले किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से पूछें कि क्या दूसरों के मल साफ करने के दौरान उसे पलभर के लिए भी आध्यात्मिक अनुभव होता है, या रोजाना काम पर निकलना क्या उसके लिए तीर्थयात्रा जैसा है?

दरअसल इनके पास कोई और चारा भी नहीं, क्योंकि इन जातियों में जन्मे लोगों के लिए कोई वैकल्पिक रोजगार मौजूद नहीं है. इस तरह का ‘आध्यात्मिक ’ रंगरोगन कर सरकार इन लोगों के पुनर्वास के लिए धन आवंटित करने में कोताही करती है. अगर कोई छोटा कोष आवंटित होता भी है तो वह सरकारी विभागों की बंदरबांट और समितियों और सर्वेक्षण कर रहे सरकारी कर्मचारियों को तो रोजगार मिल जाता है, लेकिन उन्हे ही नहीं मिलता जिनके नाम पर कोष जारी होता है.

यही सरकार स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों के निर्माण के लिए 2 लाख करोड़ रूपए आवंटित करती है. इनमें से अधिकतर शौचालय गड्ढ़े या सेप्टिक टैंक वाले होते हैं-5 करोड़ शौचालय का मतलब 5 करोड़ गड्ढ़े इन्हे कौन साफ करेगा? वाल्मीकि लोग, और कौन? मीडिया की सुर्खियों में जगमग दिख रहा स्वच्छ भारत अभियान ऐसी तस्वीरें पेश करता है मानो सभी भारतीय साफ-सफाई की इस नई लहर में मिल-जुलकर हाथ बटां रहे है. लेकिन जरा मरने वाले सफाई कर्मचारियों की जाति के बारे में पिछला ब्योरा मालूम करें. सरकारी टास्क फोर्स के हाल के अनुमान के अनुसार, देश में हाथ से मैला साफ करने वालों की संख्या 53,000 है. लेकिन यह अनुमान 640 जिलों में से सिर्फ 121 जिलों के सर्वेक्षण पर आधारित है. इसमें कुछ गलत है. हमारा अनुमान है कि उनकी संख्या करीब 1,50,000 है.

सरकार के बाद इसकी जिम्मेदारी समाज की है. हमें जातिगत भदभाव, उसकी जड़े कितनी गहरी या विस्तृत है, उसे खंगालने की जरूरत है. न तो समाज हमारा दुश्मन है, न राज्य हम सरकार की नीतियों और परंपरा के वेश में सामाजिक भेदभाव का विरोध करते है. आज स्थितियां बदल गई हैं. समाज में कड़वाहट फैली है. पहले जब हमने ड्राई लैट्रिन के खिलाफ अभियान चलाया तो जिन लोगो ने असुविधाएं झेली, उन्होने भी हमारे खिलाफ गुस्सा नहीं दिखाया था, बल्कि हमें समझा कि हम क्या और क्यों कर रहे हैं. हम चाय पीते हुए अपने मतभेदों पर चर्चा कर सकते थे. लेकिन आज हालात वैसे नहीं.

वास्तविक आध्यात्मिक अनुभव तभी तक जीवंत होगा जब हाथ से मैला ढ़ोने का चलन समाप्त होगा. उन बेबस परिवारों को सम्मानित रोजगार दिलाने की पहल होनी चाहिए जो जिंदा रहने के लिए इस काम को करने के लिए मजबूर है.

बेजवाड़ा विल्सन

बेजवाड़ा विल्सन सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक है.
उन्हे 2016 में मैगसेसे पुरस्कार से नवाजा गया है.

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1 COMMENT

  1. “सीवर में मरने का अभिशाप ” वास्तविक रूप से वही समझ सकता है जो इस को करता है.

    वर्ना तो इस जघन्य, घृणित एवं अमानवीय कार्य को लोग “आध्यात्मिक अनुभव” भी बता देते हैं !

    उम्मीद करता हूँ कि ऐसे लेख समाज में संवेदना पैदा करेंगे और समाज में सकारात्मक बदलाव लायेंगे.
    एक अच्छे लेख के लिए वीरेंद्र जाटव जी और दलित दस्तक news डेस्क को बहुत बहुत बधाई!!
    – राज वाल्मीकि, दस्तावेज समन्वयक, सफाई कर्मचारी आन्दोलन, दिल्ली

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