प्रतियोगी परीक्षा में जाति के सवाल के मायने

पिछले कुछ दिनों के भीतर प्रतियोगी परीक्षा में पूछे गए दो प्रश्नों ने जातिवाद को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. ये सवाल जहां प्रश्नों का चुनाव करने वालों की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है तो वहीं इन प्रश्नों को परीक्षा में पूछने की स्वीकृति देने वाले परीक्षा बोर्ड की मंशा पर भी सवाल उठाता है. दरअसल पूछे गए प्रश्न एक विशेष जाति और वर्ग को अपमानित करने वाले हैं.

जरा आप भी इन प्रश्नों को देखिए.

एक प्रश्न दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा पूछा गया है. बोर्ड ने दिल्ली में प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित किया था. इसके प्रश्न पत्र में 200 सवाल पूछे गए थे. इसमें से हिंदी भाषा और बोध के तहत प्रश्न संख्या 75 में पूछा गया प्रश्न विवाद खड़ा करने वाला था. प्रश्न अनुसूचित जाति से संबंधित था. आप खुद देखिए- सवाल था की … कौन सामाजिक सीढ़ी में सबसे नीचे की श्रेणी में आते हैं और इनके दायित्व में तीन वर्णों की सेवा करना सम्मलित है.” तो वहीं एक अन्य प्रश्न में तो सीधे तौर पर एक दलित जाति को निशाना बनाया गया है. इसमें पर्यायवाची शब्द का सवाल पूछा गया है कि जब पंडित का पर्यायवाची पंडिताइन होता है तो चमार का क्या होगा?

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा गया ये सवाल समाज के भीतर गहरे तक समाए जातिवाद के सच को नंगा करता है. सवाल यह भी उठता है कि जिन लोगों पर प्रश्नों को तैयार करने की जिम्मेदारी थी वो कौन लोग थे और क्या सरकार और संबंधित आयोग को उनके खिलाफ करवाई नहीं होनी चाहिए?

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गुंडा शब्द की कहानी

भाषावैज्ञानिकों ने बगैर सोचे-समझे बता दिए हैं कि बदमाश के अर्थ में गुंडा पश्तो भाषा का शब्द है. यदि गुंडा पश्तो भाषा का शब्द होता तो इसका सर्वाधिक प्रयोग शेरशाह और उनके उत्तराधिकारियों के समय में मिलता. कारण कि वे अफगान थे और पश्तो अफगानिस्तान की ही भाषा है.

उर्दू में पश्तो के भी शब्द शामिल हैं. यदि गुंडा पश्तो भाषा का शब्द होता तो वली, आबरू, हातिम, सौदा, मीर, मोमिन से लेकर गालिब और दाग तक कोई न कोई उर्दू का कवि गुंडा का इस्तेमाल जरूर करता. मगर ऐसा है नहीं.

हिंदी में 1910 से पहले बदमाश के अर्थ में गुंडा का प्रचलन नहीं था. विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी से लेकर बिहारी और भारतेंदु तक किसी ने गुंडा शब्द का प्रयोग नहीं किया. 1930 के दशक में जयशंकर प्रसाद ने गुंडा कहानी लिखी थी, जिसमें नायकत्व का भाव है.

अंग्रेजी अखबारों में गुंडा का प्रचलन 1920 के आस-पास हुआ. अंग्रेजी साहित्य में इसका प्रयोग 1925 – 30 के बीच में मिलता है.

गुंडा मूलतः द्रविड़ भाषा का शब्द है, जिसकी परंपरा पुरानी है. इसमें उभार, गोलाई या नायकत्व का भाव है. गुंडा का प्रयोग दक्षिण में धड़ल्ले से मिलेगा. तीनों भाव में मिलेगा. तमिल में गुंडा एक ताकतवर नायक का अर्थ देता है जैसे गुंडराव, गुंडराज आदि. तेलुगु में भी बतौर नायक गुंडूराव मौजूद है. मराठी में गाँवगुंड ग्राम नायक का अर्थ देता है.

सही बात यह है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर के एक छोटे से गाँव नेतानार में पले – बढ़े गुंडा धुर ने 1910 में अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने और उन्हें इस कदर तंग तथा तबाह किए कि अंग्रेजी फाइलों में गुंडा का एक अर्थ बदमाश हो गया. यह गुंडा धुर की ताकत थी.

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तेजप्रताप यादव ने ऐश्वर्या को क्यों दी तलाक की अर्जी

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पटना। लालू प्रसाद यादव के परिवार से बड़ी खबर है. लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने अपनी पत्नी ऐश्वर्या को तलाक देने का फैसला किया है. सवाल है कि लालू के बेटे और बहू में ऐसा क्या हुआ कि मामला तलाक़ तक आ पहुंचा? हम आपको बताएंगे वो बड़ी वहज लेकिन पहले जान लेते हैं और तथ्य.

तेजप्रताप की पत्नी ऐश्वर्या बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पोती हैं. दोनों की शादी पांच महीने पहले ही हुई थी. तलाक के लिए तेजप्रताप यादव ने 02 नवंबर को पटना सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर दी है. तेज प्रताप ने याचिका में कहा है कि वह ऐश्‍वर्या के साथ नहीं रहना चाहते हैं. उन्होंने 13 (1) (1a) हिन्‍दु मैरेज एक्‍ट के तहत तलाक के लिए अर्जी दे दी है.

तेज प्रताप की अर्जी पर 29 नवंबर को सुनवाई होगी. दोनों की शादी इसी साल 12 मई को हुई थी. तलाक की अर्जी देने के बाद तेज प्रताप लालू से मिलने रांची रवाना हो गए.

तलाक की खबर आने से पहले दोनों आखिरी बार मुंबई में साथ दिखे थे. 23 मई को लालू यादव इलाज के लिए एशियन हार्ट अस्पताल मुंबई गए थे. उनके साथ बहू ऐश्वर्या और बेटे तेज प्रताप भी थे. ऐश्वर्या की तस्वीर राजद के पोस्टर पर दिखी थी. तब उनके राजनीति में आने की चर्चा हुई थी, हालांकि परिवार की तरफ से कहा गया था कि ऐश्वर्या अभी राजनीति में नहीं आ रही हैं.

अब हम आपको बताते हैं कि आखिर बात तलाक तक क्यों पहुंची?

दरअसल अचानक आए तलाक के इस फैसले के पीछे की वजह तेजप्रताप और ऐश्वर्या का आपसी मनमुटाव है. असल में पूर्व मंत्री व राजद विधायक चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या ने दिल्ली से मैनेजमेंट की पढ़ाई की है. जबकि लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप सिर्फ 12वीं पास हैं. दोनों भाइयों में जारी मनमुटाव की वजह भी ऐश्वर्या को ही माना गया था. बीच में तो ऐसा लगा था कि दोनों भाईयों की राह जुदा हो जाएगी. खबर है कि ऐसे में परिवार को बचाने के लिए तेजप्रताप ने ये बड़ा कदम उठाया है.

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IIMC ने दिलीप मंडल की किताब को रोका

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नई दिल्ली। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (IIMC), जिसे पत्रकारिता ट्रेनिंग का देश का सबसे बड़ा संस्थान कहा जाता है, ने अपने सिलेबस से मेरी किताब “मीडिया का अंडरवर्ल्ड” को 2016 में हटा दिया था.

यह किताब काफी समय से वहां और और कई संस्थानों की रीडिंग्स में शामिल हैं. 2015 तक यह किताब IIMC के सिलेबस का हिस्सा रही है. इसे देश के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक राजकमल-राधाकृष्ण ने छापा है. पेड न्यूज पर भारत की यह अकेली किताब है.

इस किताब को केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया क्षेत्र में देश के सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार दिया है. खुद मंत्री आए थे पुरस्कार देने. इसके लिए मुझे 75,000 रुपए भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दिए हैं. मीडिया लेखन के क्षेत्र में यह सबसे बड़ा पुरस्कार है.

क्या आईआईएमसी के ऐसा करने से मेरा कोई निजी नुकसान हुआ?

नहीं, आईआईएमसी की इस हरकत के कारण लाखों लोगों को पहली बार मेरी किताब के बारे में जानकारी मिली. इसकी अमेजन और फ्लिपकार्ट पर बिक्री बढ़ गई. मेरी दूसरी किताबों को भी इसका फायदा मिला. मेरे लिए इसका मतलब रॉयल्टी के जरिए होने वाली आमदनी भी है.

अब दिल्ली यूनिवर्सिटी कांचा इलैया की किताबों को सिलेबस से हटाना चाहती हैं.

ये बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं है. कांचा इलैया तो श्रमिक और श्रमण संस्कृति के विचारक हैं और ब्राह्मणी संस्कृति को चुनौती देते हैं. उनके विचार रोकने से और फैलेंगे.

दिलीप मंडल

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सहारनपुर में दलित-राजपूतों में फिर हुआ संघर्ष

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सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक बार फिर से दलित और राजपूतों में संघर्ष हो गया. इस दौरान दोनों पक्षों के लोग आमने- सामने आ गए और जमकर पथराव हुआ. तनाव को देखते हुए गांव में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है. बताया गया कि मंगलवार रात को दोनों पक्षों के लोगों में कहासुनी हो गई थी. जिसे लेकर बुधवार सुबह संघर्ष हो गया. इस दौरान दोनों पक्षों के लोगों में जमकर पथराव हुआ और दोनों पक्षों के तीन- तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. उधर, सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारियों में हड़कंप मच गया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए गांव में पुलिसफोर्स तैनात कर दी गई है. वहीं पूरे शहर में अलर्ट जारी कर दिया गया गया है.

बता दें कि बड़गांव के पास शब्बीरपुर में ही पिछले साल दलित और राजपूतों में जमकर संघर्ष हुआ था. जिसमें कई लोगों की जान भी चली गई थी.

इसके बाद सीओ देवबंद सिद्धार्थ सिंह भी पुलिस बल के साथ पहुुंचे. पुलिस ने दोनों पक्षों को शांत कराकर घायल लोगों को उपचार के लिए नानौता चिकित्सालय भिजवाया. उधर, इस संघर्ष को लेकर राजपूत पक्ष की ओर से ओमकार और दलित समाज की ओर से राहुल ने बड़गांव थाना में तहरीर दी है. इसमें दोनों पक्षों में 20 से अधिक लोगों के नाम शामिल हैं. वहीं, बड़गांव के कार्यवाहक थाना प्रभारी योगेंद्र पाल यादव की ओर से संगीन धाराओं में दोनों पक्षों के मांगेराम, सुमित, गुल्लु उर्फ सचिन, ओमकार, अरूण, विपिन, गौरव, शिवम, अनिल, रणजीत, राहुल, दीपक, कालू, सुरेश, श्याम सिंह और 150 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है.

पुलिस की लापरवाही से हुआ संघर्ष मंगलवार रात जब दोनों पक्षों में विवाद हुआ तो दोनों पक्षों की ओर से पुलिस को सूचना दी गई थी. मगर रात में पुलिस नहीं पहुंची. दोनों पक्षों के समर्थक ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस मामले को गंभीरता से लेती तो संघर्ष के हालात न बनते.

सख्त कार्रवाई की जाएगी : सीओ सीओ देवबंद सिद्धार्थ सिंह का कहना है कि पुलिस की ओर से दोनों पक्षों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है. किसी को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी. घटना में शामिल आरोपियों को बख्शा नहीं जाएगा.

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आदिवासियों के विनाश का साक्षी है ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’

भारत के आधुनिक विकास के इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ने वाला है. 31 अक्टूबर 2018 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के नर्मदा जिले स्थित केवड़िया के साधु बेट द्वीप में स्थापित सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ का उद्घाटन करेंगे. इसके प्रतिरोध में आदिवासियों ने गुजरात बंद का आह्वान किया है और परियोजना से प्रभावित 72 गांवों के आदिवासी शोक मनायेंगे, जिसमें राज्यभर के 75,000 आदिवासी शामिल होंगे. उन्होंने घोषण किया है कि उस दिन उनके घरों में खाना नहीं पकेगा. वे ऐसा शोक तब मनाते हैं जब उनके गांव में किसी की मृत्यु हो जाती है. वे ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ के विरोध में शोक इसलिए मना रहे हैं क्योंकि यह परियोजना उनके लिए विनाशकारी साबित हुआ है. गुजरात सरकार ने ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को स्थापित करने के लिए ग्रामसभाओं के निर्णयों के विरूद्ध पुलिस और कानून का सहारा लेकर आदिवासियों की जमीन छीन ली है, उनके धार्मिक स्थलों को बर्बाद किया है और खेत, खलिहान एवं गांवों को पानी में डुबो दिया है.

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि क्या आदिवासी देश की एकता और अखंडता का हिस्सा नहीं हैं? यह कैसा स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ है, जिसमें आदिवासियों को शामिल नहीं किया गया है? क्या अमेरिका की तरह ही भारत भी आदिवासियों के लाश पर विकास की इमारत खड़ा नहीं कर रहा है? यह ठीक उसी तरह है जिस प्रकार से देशभर में ‘जनहित, प्रगति, राष्ट््रहित, विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर आदिवासियों से उनकी जमीन, जंगल और जलस्रोत छीनकर उन्हें संसाधनविहीन बना दिया गया है लेकिन उन्हें उसका हिस्सा नहीं बनाया गया. आदिवासी कबतक अपने ही देश में छले जायेंगे? क्या आदिवासियों के आंखों मे अंशू डालकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राष्ट््रीय एकता की बात करना शोभा देता है? यह किस तरह का राष्ट््रीय एकता और अखंडता है जिसके लिए आदिवासियों के अस्तित्व को दांव पर लगा दिया गया है? ऐसे फर्जी एकता और अखंडता का विरोध क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ नरेन्द्र मोदी का ड््िरम प्रोजेक्ट है. इसकी शुरूआत 2010 में हुई थी. गुजरात सरकार ने इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाने के लिए 7 अक्टूबर 2010 को ‘सरदार वल्लभाई पटेल राष्ट््रीय एकता ट््रस्ट’ की स्थापना की और छड़ इक्ट्ठा करने के लिए देशभर में अभियान चलाकर 5 लाख लोगों से दान के रूप में 5 हजार मेट््िरक्स टन छड़ इक्टठा किया गया. लेकिन इसे मूर्ति बनाने के बजाय दूसरों कार्यों में लगाया गया. यह लोगों के भावनाओं के साथ खिलवाड़ ही है. इसके बाद सुराज हस्ताक्षर अभियान एवं एकता मैराथन दौड़ का आयोजन किया गया. मूर्ति स्थल को पर्यटन स्थल बनाने के लिए ‘केवड़िया एरिया डेवलाॅपमेंट आॅथोरिटी’ का गठन किया गया तथा इसके लिए गुरूदेश्वर वायर-कम-कैसवेट मानव निर्मित झील परियोजना की शुरूआत की गई. इस परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ उठ खड़े हुए आदिवासियों को रास्ते से हटाने के लिए स्टेट रिजर्व पुलिस फोर्स का एक यूनिट ‘नर्मदा बटालियन’ का गठन किया गया, जो परियोजना स्थल पर कैम्प करती रही.

जब आदिवासियों को जानकारी हुई कि नर्मदा डैम के बाद फिर से उनकी जमीन ली जायेगी और डैम के लिए लिया गया जमीन को दूसरे कार्य में लगाया जायेगा तब उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. केवड़िया, काठी, वगाड़िया, लिम्बाडीह, नवागम एवं गोरा गांव के लोगों ने 1961-62 में नर्मदा डैम के लिए उनसे ली गई 927 एकड़ जमीन को वापस देने की मांग की क्योंकि उन्हें अबतक इस जमीन का मुआवजा नहीं दिया गया है. आदिवासियों के आंदोलन को देखते हुए गुजरात सरकार ने गुरूदेश्वर को तलुका बनाने की घोषणा की और उनके अन्य मांगों को पूरा करने का वचन दिया. इस तरह से 31 अक्टूबर 2013 को गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेन्द्र मोदी ने इसका शिलान्यास किया. सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ 182 मीटर उंचा है, जो दुनिया का सबसे उंचा मूर्ति है, जो 2398 करोड़ रूपये की लागत से बना है.

इस परियोजना में आदिवासियों के कुल 72 गांव प्रभावित हुए हैं. आदिवासियों का आरोप है कि गुजरात सरकार ने ग्रामसभाओं के निर्णयों के खिलाफ जबरर्दस्ती जमीन लेने के बाद भी अपना वादा पूरा नहीं किया है. सरकार ने सिर्फ कुछ लोगों को ही जमीन का मुआवजा दिया है. गुरूदेश्वर के रमेश भाई बताते हैं कि सरकार ने आदिवासियों की जमीन ले ली और बदले में सिर्फ पैसा दिया है लेकिन पुनर्वास पैकेज के रूप में किया गया वादा – जमीन के बदले जमीन और सरकारी नौकरी अबतक किसी को नहीं मिला है. गांवों में ऐसे भी आदिवासी हैं, जिन्होंने गैर-कानूनी भूमि अधिग्रहण के विरोध में अबतक जमीन का पैसा भी नहीं लिया है. कुछ विस्थापित आदिवासियों को अपने गांवों से हटाकर बंजर जमीन में बसाया गया है इसलिए आदिवासी सवाल उठा रहे हैं कि वे बंजर जमीन में क्या करेंगे?

‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ के लिए आदिवासियों का खेत-टांड़ और घर-बारी के साथ-साथ उनके धार्मिक स्थल को भी पानी में डूबो दिया गया. नर्मदा डैम के 3.2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ी ‘टेकड़ी’, जिसे ‘वराता बाबा टेकड़ी’ कहा जाता है आदिवासियों का देवता है, जिसे आदिवासियों से छीन लिया गया है. यह सुप्रीम कोर्ट के फैसला का खुला उल्लंघन है. ‘‘ओड़िसा माईनिंग कोरपोरेशन बनाम वन व पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य सी स. 180 आॅफ 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए स्पष्ट कहा है कि जिस तरह से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के तहत दूसरों को धार्मिक आजादी है उसी तरह आदिवासियों को भी धार्मिक आजादी का मौलिक अधिकार है. इसलिए उनके धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा और धार्मिक स्थलों का संरक्षण किया जाना चाहिए. लेकिन केन्द्र एवं राज्य सरकारों को आदिवासियों के अधिकारों से कोई सरोकार ही नहीं है इसलिए उनके अधिकारों के साथ मजाक किया गया है. आदिवासियों के धार्मिक स्थल को छीनने के लिए क्या नरेन्द्र मोदी को उनसे माफी नहीं मांगनी चाहिए? भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर आदिवासियों को विकास विरोधी होने का तामगा पहनाया जाता है लेकिन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता भी ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ परियोजना का विरोध किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ पेसा कानून 1996 का उल्लंघन कर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया है. पेसा कानून 1996 के अनुसार ग्रामसभा का निर्णय अंतिम होता है. लेकिन आदिवासियों के विरोध के बावजूद गुजरात सरकार ने इस परियोजना को आगे बढ़ाया. वगाड़िया गांव के अरविन्द तडवी कहते हैं कि नर्मदा डैम का पानी नहर के जरिये कच्छ पहुंचता है लेकिन आदिवासियों के 28 गांवों को पानी नहीं दी जाती है. यह आदिवासियों के साथ अन्याय है.

इसके अलावा देशभर के 50 पर्यावरणविदों ने भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय को पत्र लिखकर ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ परियोजना का विरोध किया था. उनका आरोप है कि गुजरात सरकार ने इस परियोजना के लिए पर्यावरण स्वीकृति हासिल नहीं किया है. इस परियोजना से शूलपानेश्वर अभ्यरण्य एवं नर्मदा के निचला हिस्सा, जो इको सेनसिटिव जोन के रूप में चिन्हित है, प्रभावित होगा. यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 एवं ईआईए अधिसूचना सितंबर 2006, एनजीटी एवं न्यायलयों के आदेशों का उल्लंघन है. लेकिन इन सारे विरोधों को दरकिनार करते हुए भाजपा सरकार ने चुनाव में भावनात्मक फायदा उठाने के लिए कांग्रेस से उनकी विरासत और आदिवासियों से उनकी जमीन छीनकर स्टैच्यू आॅफ यूनिटी को स्थापित किया है. क्या यह शर्मनाक नहीं है?

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासियों से संबंधित कार्यक्रमों के अपने भाषणों में कई बार दोहराते हुए कहा है कि उनके रहते कोई माय का लाल नहीं है जो आदिवासियों की जमीन छीन ले. लेकिन हकीकत ठीक इसके विपरीत है. उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद नर्मदा डैम की उच्चाई बढ़ाने का निर्णय लिया, जिसे आदिवासियों की जमीन डूब गई. स्टैच्यू आॅफ यूनिटी बनाने के लिए आदिवासियों की जमीन छीनकर उन्हें मातम मनाने पर मजबूर कर दिया है. इसी तरह झारखंड के आदिवासियों की जमीन को लूटकर अडानी और वेदांता को देने की पूरजोर कोशिश की जा रही है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी भी अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्षरत हैं. इसलिए अब आदिवासियों को अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए कि चुनाव में जुमलेबाजी करने वाले नेता उनके रक्षक नहीं हो सकते हैं क्योंकि काॅरपोरेट घराना और इन नेताओं के बीच में एक बहुत मजबूत गांठजोड़ बन चुका है. यह गांठजोड़ जनहित, राष्ट््हित, विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट््रीय एकता के नाम पर आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर जमींदोज कर रहा है.

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दलित और महादलित वर्ग को ठगने का काम कर रही सरकार: मांझी

पटना।  बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने केंद्र सरकार और बिहार के नीतीश सरकार को आरक्षण के मुद्दे पर दलित और महादलित वर्ग के लोगों को ठगने का काम बताया है. मांझी ने कहा कि आरक्षण समाप्त करने की हिम्मत किसी में नहीं है. एक तरफ दलित महादलित वर्ग के लोगों को आरक्षण की हिमाकत करते हैं लेकिन बिहार और केंद्र सरकार को इतनी हिम्मत नहीं है कि वह निजी क्षेत्रों में भी दलित और महादलित वर्ग के लोगों को आरक्षण दे सके. आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने यह बातें कहीं.

उन्होंने कहा कि आरक्षण खत्म कर दे यह किसी में दम नहीं है. नीतीश कुमार के बयान पर जीतन राम मांझी ने कहा कि जो आरक्षण की बात करते हैं वो दलित महादलित को छोटा कर रहे हैं. आरक्षण के साथ जानबूझकर खिलवाड़ कर रहे हैं. भारत सरकार भी आरक्षण के साथ तोड़मोड़ कर रही है, क्योंकि नीतीश कुमार और भारत सरकार का गठबंधन है, इसलिए ऐसा कह रहे हैं.

निजी क्षेत्रों और सार्वजनिक क्षेत्रो में भी आरक्षण की बात नहीं की है. पीएम और बिहार सीएम दोनों आरक्षित वर्गों को छोड़ रहे हैं. जिस तरह से सेना के जवानों को पोस्टल बैलेट की सुविधा है उसी तरह सरकार पलायन कर चुके अतिपिछड़ा वर्ग, एससीएसटी वर्ग के लोगों को वापस उसके घर लाने की व्यवस्था करे तभी हम समझेंगे की सरकार निष्पक्ष चुनाव करा रही है.

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भारत ने वेस्टइंडीज को 224 रनों से रौंदा

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 नई दिल्ली। भारत ने वेस्टइंडीज को मुंबई में खेले गए चौथे वनडे में 224 रनों से हरा दिया. इसी के साथ भारत पांच मैचों की वनडे सीरीज में 2-1 से आगे हो गया. सीरीज का दूसरा मैच टाई रहा था. भारत के द्वारा दिए गए 378 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी वेस्टइंडीज टीम 36.2 ओवरों में 153 रनों पर ऑलआउट हो गई. जेसन होल्डर ने वेस्टइंडीज की ओर से सबसे ज्यादा नाबाद 54 रन बनाए. उनके अलावा अन्य कोई बल्लेबाज कुछ खास नहीं कर सका. भारत की ओर से खलील अहमद ने 13 रन देकर 3 और कुलदीप यादव ने 42 रन देकर 3 विकेट झटके.

रोहित शर्मा और अंबाती रायुडू के शतकों की बदौलत भारत ने 50 ओवरों में 377/5 का स्कोर बनाया. भारत की ओर से रोहित शर्मा ने सबसे ज्यादा 162 और अंबाती रायुडू ने 100 रन बनाए. वहीं धवन 38 और धोनी 23 रन बनाकर आउट हुए. केदार जाधव 16 रन बनाकर नाबाद रहे. वेस्टइंडीज की ओर से कीमो पॉल ने सबसे ज्यादा 10 ओवरों में 88 रन दे डाले. वहीं केमार रोच ने 10 ओवरों में 74 रन देकर 2 विकेट लिए.

रोहित शर्मा ने अपना 21वां शतक लगाने के साथ ही सातवीं बार 150 से ज्यादा का स्कोर वनडे में बनाया. उनके अलावा रायुडू ने तीसरा वनडे शतक लगाया.

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…जब बीजेपी के केंद्रीय मंत्री की सभा में जुटे केवल 50-60 लोग

कांकेर। चुनावी दौरे पर छत्तीसगढ़ के कांकेर विधानसभा के सरोना पहुचे केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव की सभा मे भीड़ नहीं जुटी. अब इस मामले को लेकर सफाई देने का कार्यक्रम भी शुरू हो गया है. इस विषय पर जब मंत्री जी से सवाल किया गया तो उन्होंने इलाके को गरीब तबके का बताते हुए लोगों के धान कटाई में व्यस्त होने के कारण भीड़ नहीं जुटने की बात कह दी. बता दें कि भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव और भाजपा के प्रवक्ता सचिदानंद उपासने कांकेर विधानसभा के सरोना गांव पहुचे थे जहां उनकी चुनावी सभा में आम जनता से ज्यादा तो पुलिस के जवान मौजूद थे.

सभा में महज 50 से 60 लोग ही मौजूद थे जिन्हें मंत्री जी ने बड़े जोश के साथ संबोधित करते हुए प्रदेश की भाजपा सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए एक बार फिर डॉ. रमन सिंह की सरकार बनाने की अपील की.

रामकृपाल ने कहा कि प्रदेश और केंद्र की भाजपा सरकार ने गरीब जनता के लिए तमाम योजनाएं चलाई हैं जिससे गरीब तबके के लोगों को हर तरह की सुविधा मिल सके, चावल से लेकर इलाज़ तक के लिए केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार योजनाए चला रही है जबकि 60 साल तक देश की सत्ता में रहने वाली कांग्रेस ने सिर्फ जनता की खून पसीने की कमाई को लूटा है.

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भरतपुर में कांग्रेस के लिए चुनौती बनी बसपा, 15 साल से बिगाड़ रही जीत का समीकरण

भरतपुर। राजस्थान में चुनावी समर शुरू हो गया है कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दल अपनी जीत के दावे कर रहे है. वहीं दोनों पार्टियां मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं. लेकिन राजस्थान का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले भरतपुर में दोनों ही दलों के जीत के समीकरण को बसपा प्रभावित कर रही है. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि यह इलाका यूपी से सटा हुआ है, जिसका प्रभाव यहां के मतदाता पर स्पष्ट रूप से नजर आता है. क्योंकि 2003 से पहले ही वर्ष 1998 में भरतपुर जिले की 9 सीटों में से बसपा के पास 1 सीट थी.

भरतपुर सभांग की सभी सीटों पर एससी/एसटी का वर्ग बड़ा मतदाता है. दो सीट बयाना-रूपवास और वैर तो रिजर्व है अन्य सीटो पर भी चुनाव जीतने के लिए दोनों ही प्रमुख दलों को एससी वर्ग की जरूरत होती है. इसलिए पार्टी के साथ- साथ चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी पर भी यह निर्भर करता है कि वह इस वर्ग के मतदाताओ को रिझा पायेगा या नहीं? यही वजह कि एक-दो सीट को छोड़कर भरतपुर जिले में बसपा दूसरे नम्बर पर रहती है ऐसे में खतरा कांग्रेस के लिए ज्यादा है क्योंकि जिस दलित वोट को कांग्रेस अपना समझती है वही वोट बैंक पिछले 15 साल से उससे छिटक सा गया है. यही वजह है कि पिछले 15 साल से बसपा यहां कांग्रेस के जीत के समीकरण को बिगाड़ रही है. इस बात को खुद कांग्रेस के दिग्गज भी मानते है कि बसपा भरतपुर में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रही है.

आंकड़ो की बात करें तो भरतपुर जिले में वर्ष 2003 में कुल 9 सीटें थी जो परिसीमन के बाद 2008 में 7 ही रह गईं. वर्ष 2003 के नतीजों पर नजर डालें तो 9 सीटों में से भाजपा व कांग्रेस के पास 3-3 सीट ही थीं जबकि दो सीटों पर इंडियन नेशनल लोक दल के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी. वहीं 1 सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत हासिल की. हालांकि वर्ष 2004 में डीग विधायक अरुण सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में डीग सीट से दिव्या सिंह और बाद में एक निर्दलीय विधायक भाजपा में ही शामिल हो गए. जिससे आंकड़ा 6 पर पहुंच गया था.

जबकि वर्ष 2003 में वैर, नगर और रूपवास सीट कांग्रेस के खाते में थी तो बीजेपी के पास बयाना ,कुम्हेर व कामां सीट थी. वहीं डीग व भरतपुर सीट पर इनेलो के प्रत्याशी चुनाव जीते थे. जबकि नदबई सीट पर वर्तमान में पर्यटन राज्य मंत्री कृष्णेन्द्र कौर दीपा ने निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव जीता जो बाद में भरतपुर विधायक विजय बंसल के साथ भाजपा में शामिल हो गई. वर्ष 2003 में नदबई ,नगर, बयाना, भरतपुर, कुम्हेर सीट पर बसपा दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. वर्ष 2008 और 2013 में भी भरतपुर, नदबई, वैर, बयाना नगर में बसपा दूसरी बड़ी पार्टी रही. जो यह बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस के लिए यहां खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए पहले बसपा से निपटना होगा.

बसपा का फैक्टर

भरतपुर में बसपा के फैक्टर का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्ष 1998 में भरतपुर जिले की नदबई व नगर सीट से बसपा के विधायक चुने गए. इन सब सीटों पर बसपा का फैक्टर यह था कि वर्ष 2003 में पहली बार चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनने वाले दिवंगत नेता डॉ दिगम्बर सिंह बसपा के दलवीर सिंह से महज 800 वोट से ही चुनाव जीते थे. इस चुनाव में डॉ दिगमबर सिंह को 28 हजार 960 वोट मिले थे जबकि बसपा के दलवीर सिंह को 28 हजार 128 वोट मिले थे.

जबकि कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे पशुपालन डेयरी राज्य मंत्री हरि सिंह यहां पर तीसरे नम्बर पर रहे. इसी तरह नगर सीट पर कांग्रेस के मरहूम विधायक माहिर आजाद तो वर्ष 1998 में बसपा के टिकट पर ही नगर सीट से चुनाव जीते जो बाद में 2003 में कांग्रेस में शामिल हो गए और दुबारा इसी सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते. लेकिन इस बार भी बसपा के शादी खां यहां पर दूसरे नम्बर पर थे और भाजपा की अनीता सिंह तीसरे स्थान पर थी. इसी तरह नदबई में निर्दलीय कृष्णनेन्द्र कौर दीपा चुनाव जीती और बसपा दूसरे नम्बर पर और कांग्रेस के पूर्व विधायक यशवंत रामू तीसरे व भाजपा नेता डॉ जीतेन्द्र फौजदार चौथे नम्बर पर थे. अब देखना ये है कि क्या दोनों पार्टियां इस बार बसपा फैक्टर को मात देकर जीत का नया समीकरण बना पाएंगी.

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उत्तराखंड: बाबा साहब की मूर्ति से छेड़छाड़, दलित और भीम आर्मी ने किया हंगामा

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हरिद्वार। कनखल थाना अंतर्गत जियापोता में बाबा भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा को खंडित कर दिया. बाबा साहब का शरारती तत्वों ने चश्मा उतार लिया और उनकी मूर्ति पर कई खरोंच मार दिये. ये खबर जंगल में आग की तरह फैली. दलित व भीम आर्मी के युवा बड़ी तादाद में मौके पर पहुंचे. नारेबाजी और हंगामा शुरू हो गया. पुलिस-प्रशासन को सूचना लगी. अफसर मौके पर पहुंची.

तुरंत नई मूर्ति लगाने का आश्वासन दिया. इस पर हंगामा शांत हुआ. नई मूर्ति लगाने के बाद उपजिलाधिकारी व सीओ ने प्रतिमा पर फूलमालाएं चढ़ाई. कनखल थाना अंतर्गत पथरी के गांव जियापोता में रविवार की देर रात को गांव के पार्क में लगी बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा से चश्मा उतारकर उसे खंडित किया. प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की सूचना पर सैकड़ों दलित और भीम आर्मी के सदस्य मौके पर पहुंच गये.

ग्राम प्रधान नूतन कुमार ने पुलिस को सूचना दी. प्रशासन और पुलिस के हाथ-पांव फूल गये. एसडीएम मनीष सिंह, सीओ कनखल स्वप्निल किशोर सिंह, एसओ कनखल ओमभूषण फोर्स के साथ घटना स्थल पहुंचे और हंगामा कर रहे युवाओं को शान्त कराया. पुलिस की ओर से नाराज लोगों की एसएसपी रिद्धिम अग्रवाल से बातचीत भी कराई गई.

उपजिलाधिकारी मनीष सिंह ने तत्काल खंडित मूर्ति की जगह नई मूर्ति लगाने की बात कहकर भीड़ को शांत कराया. ग्राम प्रधान नूतन कुमार व पुलिस प्रशासन के सहयोग से तत्काल नई प्रतिमा मंगाकर उसी स्थान पर स्थापित की गई. प्रतिमा स्थापित करने के बाद उपजिलाधिकारी मनीष सिंह व सीओ ने प्रतिमा पर फूलमालाएं चढ़ाकर हंगामा खत्म कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया.

दूसरी ओर अम्बेडकर समिति के अध्यक्ष राजू ने पुलिस को अज्ञात लोगों के खिलाफ तहरीर दी है. ग्राम प्रधान नूतन कुमार ने बताया कि कुछ शरारती तत्वों ने गांव की छवि बिगाड़ने की कोशिश की है. उपजिलाधिकारी मनीष सिंह ने बताया कि प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ हुई है. खंडित प्रतिमा को हटाकर नई प्रतिमा स्थापित कर दी गई है. अब गांव में शांति है.

चंद्रबाबू और शरद यादव से मिले केजरीवाल, मायावती को भी महागठबंधन में लाने का प्रयास

नई दिल्ली। जेएनएन. अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए जोड़तोड़ की राजनीति शुरू हो चुकी है. इसी क्रम में शनिवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू व लोकतांत्रिक जनता दल के अध्यक्ष शरद यादव से दिल्ली स्थित आंध्र प्रदेश भवन में मुलाकात की. इससे पहले चंद्रबाबू नायडू ने बसपा सुप्रीमो मायावती से भी मुलाकात की थी.

अरविंद केजरीवाल से मुलाकात के दौरान तीनों नेताओं में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई. मुलाकात के बाद केजरीवाल ने ट्वीट किया कि देश की जनता और संविधान को बचाने के लिए सभी को एकजुट होने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में केंद्र में बैठी भाजपा सरकार से संविधान को खतरा है.

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि चंद्रबाबू नायडू के साथ एक अच्छी मुलाकात हुई. मुलाकात के दौरान राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई. वर्तमान भाजपा सरकार से देश के संविधान को खतरा है. वहीं पार्टी सूत्रों का कहना है कि आम आदमी पार्टी महागठबंधन का हिस्सा बनने का प्रयास कर रही है.

आम आदमी पार्टी इस बार हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गोवा, दिल्ली-एनसीआर की करीब 100 लोकसभा सीटों पर ही चुनाव लड़ना चाहती है. इन सीटों के चयन से पहले पार्टी अन्य क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करना चाहती है.

राजग सरकार के पूर्व सहयोगी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने विपक्षी दलों से अपील करते हुए कहा कि उनकी राजनीतिक और आदर्श संबंधी प्रतिबद्धताएं जरूर होंगी, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ना होगा.

नई दिल्ली में शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में नायडू ने मोदी सरकार पर हमला करते हुए कहा कि लोग छला हुआ महसूस कर रहे हैं. इसलिए देशहित में विपक्षी दलों को साथ आने के लिए कोई रास्ता निकालना होगा. इससे पूर्व नायडू ने बसपा सुप्रीमो मायावती से भी मुलाकात की थी. नायडू ने आंध्र के वित्त मंत्री वाई रामकृष्णुडू और तेदेपा के कुछ सांसदों के साथ मायावती से बातचीत की थी.

बताया जा रहा है कि मुलाकात के दौरान, महागठबंधन से अलग राह पकड़ चुकीं मायावती को मनाने की कोशिश की गई. इस दौरान मायावती ने कांग्रेस के विरुद्ध नाराजगी को जताते हुए कहा कि कांग्रेस, भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने के बजाय उनकी पार्टी को ही खत्म करने में तुली हुई है. नायडू ने उम्मीद जताई कि चुनाव के बाद कुछ बड़े दल आगे आ सकते हैं. मौजूदा समय में उन पर केंद्र सरकार का दबाव है.

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अमित शाह का बयान लोकतंत्र के लिए खतरा: मायावती

मायावती (फाइल फोटो)

लखनऊ। बीएसपी प्रमुख मायावती ने सुप्रीम कोर्ट पर अमित शाह के बयान को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बयान अति निंदनीय है. न्यायालय को इस बयान को संज्ञान में लेना चाहिए. केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष के मुंह से दिए गए इस बयान से साफ है कि देश का लोकतंत्र खतरे में है.

उन्‍होंने कहा क‍ि सीबीआई, सीवीसी, ईडी, आरबीआई जैसी अहम स्वायत्तशासी संस्थाओं में जो गंभीर संकट का दौर चल रहा है, वह सरकार के अहंकार का ही दुष्परिणाम है. मायावती ने कहा कि देश संविधान से चलता है और इसी आधार पर आगे भी चलेगा. इसके बावजूद सत्ताधारी पार्टी का नेतृत्व उत्तेजक भाषणबाजी करके राजनीति की रोटियां सेकने का प्रयास बार-बार कर रहा है.

मायावती ने कहा क‍ि सबरीमाला मंदिर मामले में अमित शाह इतना भड़काऊ और असंवैधानिक भाषण देकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हो रहे चुनावों में धर्म का इस्‍तेमाल करना चाहते हैं. सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर यदि बीजेपी को आपत्ति भी है तो इसके लिए सड़कों पर तांडव करने, हिंसा फैलाने, केरल सरकार को बर्खास्त करने की धमकी देने जैसा गलत रवैया नहीं अपनाना चाहिए. कानूनी तौर पर अपनी बात रखनी चाहिए.

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दलित मतदाताओं को साधने का बड़ा मंच बना आंबेडकर का जन्मस्थान महू

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महू (इंदौर)। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्मस्थान महू दलित वोटों को साधने का एक बड़ा मंच बन चुका है. तीन दशकों से चुनावों को दौरान अकसर बड़े नेता महू का रुख करते रहे हैं. इनमें कांशीराम, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजीव गांधी, नरेंद्र मोदी, मायावती जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं.

बाबा साहेब आंबेडकर भले ही जन्म के बाद कुछ ही समय महू में रहे हों, लेकिन इस शहर का नाम उनके साथ ही दलित अस्मिता का प्रतीक बन चुका है. ऐसे में स्वाभाविक रूप से हर बड़ा नेता इस मंच से देशभर के दलितों तक पहुंचना चाहता है.

इसी उम्मीद में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी 30 अक्टूबर को यहां आने वाले हैं. वे सभा संबोधित करने से पहले आंबेडकर स्मारक पहुंचेंगे. कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वे यहां पहली बार आ रहे हैं. हालांकि साढ़े तीन साल पहले भी वे यहां आ चुके हैं. विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी नजर मध्य प्रदेश के करीब 80 लाख दलित वोटों पर है. महू में ही करीब तीस हजार दलित मतदाता हैं.

इस विधानसभा चुनाव की बात करें तो इसी 22 अक्टूबर को पाटीदार नेता हार्दिक पटेल महू में थे. अपने रोड शो के बाद वे आंबेडकर स्मारक गए, वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इसी दिन अपनी जन आशीर्वाद यात्रा के बाद आंबेडकर स्मारक पहुंचकर शीश नवाया.

यूं तो महू में चुनाव प्रचार के लिए वाजपेयी और नरसिम्हाराव जैसे नेता पहले भी आते रहे हैं लेकिन 80 के दशक के अंत में आंबेडकर मूवमेंट जोर पकड़ रहा था. इसके बाद यहां सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की ओर से आंबेडकर अनुयायी आते थे. 90 का दशक आते-आते महू शहर का नाम पूरी तरह बाबा साहेब की जन्मस्थली के रूप में जाना जाने लगा था. इसके बाद राजनेताओं के यहां आने का सिलसिला शुरू हुआ.

वर्ष 1991 के आम चुनाव के समय जब प्रदेश में भाजपा की पटवा सरकार थी, तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कांशीराम, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, मायावती यहां आए थे. इसके बाद प्रदेश में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान भी नेताओं के आने का सिलसिला जारी रहा.

2008 में आचार संहिता लगने से कुछ पहले लालकृष्ण आडवाणी ने आंबेडकर स्मारक का लोकार्पण किया. वहीं 2013 में आंबेडकर स्मारक में पांच प्रतिमाओं का अनावरण हुआ. इसके बाद 2 जून 2015 को राहुल गांधी और 14 अप्रैल 2016 (आंबेडकर जयंती) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 14 अप्रैल 2018 को राष्ट्रपति डॉ. रामनाथ कोविंद भी यहां आए.

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T-20 टीम से महेंद्र सिंह धोनी की ‘छुट्टी’ क्यों?

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नई दिल्ली। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को वेस्टइंडीज के साथ भारत में होने वाली टी-20 मैचों के लिए चुनी गई टीम में शामिल नहीं किया गया है. इसके अलावा धोनी ऑस्ट्रेलिया दौरे पर भी टी-20 टीम का हिस्सा नहीं होंगे. जानकार धोनी को ड्रॉप किए जाने की कई वजह बता रहे हैं.

जानकारों की मानें तो ड्रॉप करने की पहली बड़ी वजह यह है कि बीते एक साल से महेंद्र सिंह धोनी के फॉर्म पर बहस हो रही थी. यह बात गौर करने वाली है कि एमएस धोनी ने साल 2018 में महज 70.47 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए हैं. एक कैलेंडर ईयर में ये उनका सबसे खराब प्रदर्शन है.

दूसरी बड़ी वजह बीते दिनों वेस्टइंडीज और इंग्लैंड के खिलाफ खेली गई वनडे सीरीज भी है जिसमें धोनी कुछ खास कमाल नहीं कर पाए. उनके बल्ले से रन नहीं निकले. इंग्लैंड में उन्होंने दो वनडे पारियों में बल्लेबाजी की और वहां उनका स्ट्राइक रेट 63.20 रहा. इंग्लैंड में धोनी को चौके-छक्के लगाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी. ऐसे में इस बात की संभावना है कि सेलेक्टर्स ने उनके मौजूदा फॉर्म को देखते हुए यह फैसला किया हो.

इस सीरीज से ड्रॉप किए जाने की तीसरी बड़ी वजह ऋषभ पंत का मौजूदा फॉर्म भी है. जानकार बताते हैं कि ऋषभ पंत को धोनी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है. इंग्लैंड की सीरीज में ऋषभ ने कमाल का प्रदर्शन किया. इसके साथ ही सेलेक्टर्स उन्हें वनडे में भी आजमा रहे हैं. ऐसे में उन्हें टी-20 फॉर्मेट में भी मौका दिया गया है. पंत एक युवा क्रिकेटर हैं. सेलेक्टर्स भविष्य की ओर देख रहे हैं. ऐसे में अब धोनी के वनडे करियर पर भी सवाल उठने लगे हैं.

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वर्धा विश्वविद्यालय मनाया गया लार्ड मैकाले जन्मदिवस

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वर्धा। 26 अक्टूबर. ऑल इंडिया दलितआदिवासी- बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के द्वारा 25 अक्टूबर लार्ड मैकाले का जयंती मनाया गया.

भारत में आधुनिक शिक्षा एवं सामाजिक न्याय पर आधारित कानून व्यवस्था की नींव रखने वाले लॉर्ड मैकाले का जन्मदिवस विश्वविद्यालय में छात्र-संवाद के माध्यम से मनाया गया. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शोधार्थी व छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर परिचर्चा में भागीदार बन कर अपनी बातों को रखा. लार्ड मैकाले के जन्म से लेकर भारत में आने के बाद भारत में शिक्षा व न्याय प्रणाली को लेकर किए गए बदलाव व सामाजिक आंदोलन रूप में याद किया गया.

जिसके फलस्वरूप दलित, आदिवासी व बहुजन समाज में जागृति दिखाई पड़ा व भारत मजबूत राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हुआ है. कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगाण गाकर किया गया इसके बाद संविधान की प्रस्तावना की शपथ लिया गया. इस अवसर पर रमेश कुमार, आकाश खोब्रागड़े, आकाश मेश्राम, दर्शना मेश्राम,सुजीत बोधि बनकर, भंते राकेशआनंद, जितेंद्र सोनकर, नरेश कुमार साहू, सुधीर ज़िंदे, डॉ. अस्मिता राजुरकर, रजनीश अंबेडकर, रविचन्द आशा, क्रांति कुमार, कृष्ण कुमार निषाद, सुहास कमलाकर, नीलूराम कोर्राम एवं मुकुल भैसारे आदि वक्ता शामिल हुये. मंच संचालन रामदेव जुर्री एवं धन्यवाद ज्ञापन श्रेयात ने किया. संवाद कार्यक्रम का समापन केक काटकर व एक दूसरे को बधाई देकर किया गया.

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सबरीमाला और महिलाएं

मेरे कई पाठक/पाठिकाओं ने मुझे मैसेज करके कहा की मुझे सबरीमाला विवाद पर लिखना चाहियें. पर मैं सोचता हूँ मेरे लिखने या न लिखने से क्या होगा? वैसे हुआ तो कुछ सबसे बड़ी अदालत के लिखने के बाद भी नहीं. खैर लिखने या कहने से होता भी क्या हैं..?

कहने को तो वो कहते थे की हम सब एक हैं. वो कहते थे लड़के-लड़कियों को बराबर पढ़ाओ. वो कहते थे मंदिर में भगवान रहते थे और वो ये भी कहते थे कि भगवन की नज़र में सब एक हैं.जो बस आपको आपके कर्मों से तोलते हैं.

फिर अचानक वो कहने लगे लड़कियाँ बचाओं, उन्हें गर्भ में मत मारों, लड़कियाँ पढ़ाओं, फ्री में पढाओ, एक ही बेटी है तो बाल्टी भर योजनाओं का लाभ उठाओ. फिर उन्होंने तैंतीस परसेंट आरक्षण तक दे दिया. फिर एक दिन उसके साथ बुरा हुआ तो वो सड़क पर आ गए एक मोमबत्ती लेकर और इन्साफ की मांग की. हम तो सिर्फ इतना जानते थे कि व्रत रखना, भगवन की पूजा करना, चौथ से लेकर एकादशी तक सब के सब नारी के हिस्से हैं, उन्ही के बस में है, उन्ही के लिए बने हैं. पर नहीं साहब, नहीं..!! माफ़ करें ज़िन्दगी हर कदम एक नई जंग है. फिर एक दिन पता चला कि साहब अभी तो कुछ हुआ ही नहीं. नारी के नाम पर इतना ढोंग रचने वाले वो और उनका समाज सिर्फ आईआईटी का फॉर्म फ्री करवा पाया है, और कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. यकीन मानिये एक औरत कढ़ाई में तेल डालते ही खाने को स्वादिष्ट बना देती है, एक माँ ही सिर में तेल डाल थके हुए दिमाग को ताज़गी दे सकती है, जब शनि देव घर आते थे तो माँ ही तेल डालकर एक-दो रूपए दान देती थी, हमे तो समझ ही नहीं आया ये सब आज तक. पर फिर उधर वो कहते हैं नारी ने तेल डाल दिया है शुद्धिकरण करो. अरे साहब! तेल तो वही था सरसों का था कि रिफाइंड, इस से एक बार को फिर भी फ़र्क़ पड़ सकता है? वो कहते हैं जिस महिला को पीरियड्स होता है उसके मन्दिर में घुसते ही मन्दिर अपवित्र हो जाएगा. सब खत्म हो जाएगा. महिला के घूसते ही दरगाहें कब्रगाह बन जाएँगी.

और एक दिन कानून की मोटी मोटी किताबों में दबा खुद कानून नींद से जागा और उसने कहा : “कानून कहता है कि स्त्री पुरुष सब एक समान. स्त्रियों को मन्दिर जाने से कोई नहीं रोक सकता “

क्या समाज बदल गया है? या हम बदल गए?

नही !उस देश में औरत का रुतबा कैसे बुलंद हो सकता है.जहाँ मर्दों की लड़ाई में गालियां मां -बहन को दी जाती है. बीते कई दिनों फिजाओं में शोर हैं, लाख कान बंद करो पर ये शोर छन छन के पर्दों को फाड़ रहा हैं. शोर का नाम हैं “ केरल के सबरीमाला मन्दिर में एक उम्र की लडकियों या महिलाओं का प्रवेश. “ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी किसी महिला का प्रवेश मन्दिर में नहीं हो सका. बड़ी आसानी से कानून, समानता, इन्सनित जैसे शब्द हार गये और धार्मिक प्रोपोगंडा जीत गया.और ये उसी देश में हुआ जहां हम स्त्री को देवी रूप में पूजते हैं.

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… इस व्यवस्था के समर्थक ये तर्क दे रहे है की ये परम्परा सदियों से चली आ रही है, इस लिए इसका निर्वहन जरुरी है. मासिक धर्म के समय मन्दिर में प्रवेश से मंदिर की पवित्रता खत्म हो जाएगी. और हजारो मन्दिर भी तो हैं जहां महिलाएं आसानी से जा सकती है तो उन्हें सिर्फ सबरीमाला ही जाना जरूरी है क्या?

सच कहूँ आपके सदियों पुराने सड गल चुके धर्मों ने या आपके कथित देवताओ, अल्लाह,यीशु,पैगम्बरों और संतो ने ( इंद्र से ले कर आशाराम और रामपाल तक, मौलाना से लेकर पॉप तक ) महिलो के साथ साथ हमेशा दोयम दर्जे का व्यवहार किया है. तो अब जब हम 21वी सदी में खड़े है तो थोडा तार्किक बनिए, सालो पहले अपने ऊपर लाद दी गयी फालतू की मान्यताओ ( वैसे पागलपन ज्यादा अच्छा शब्द है ) से बहार निकालिए. सोचिये जिस सनातन के नाम पर ये कर रहे है उसका मूल क्या हैं? आपके सनातन धर्म ने ही सदियों से चली आ रही रुढियों को थोड़ा है, चाहे वो सती प्रथा हो या बालविवाह या विधवा विवाह.

मंदिर के बाबाओ ( मैनेजरों, माफियाओ ) को समझना होगा की जब हमारा संविधान स्त्री और पुरुष में कोई फर्क नही करता तो आपकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ परमात्मा की भक्ति होनी चाहिए, स्त्री या किसी समुदाय के लिए भेदभाव नही.

इस विषय में सबसे शर्मनाक बात हैं, मंदिर प्रवेश को महिला के मासिक धर्म से जोड़ देना. मैं कभी नहीं समझ पाता हूँ की एक स्त्री जो देवी का रूप है वो एकदम से महीनों के कुछ दिनों के लिए अछुत सी क्यों हो जाती हैं? ये तो एक सामन्य शारीरिक प्रक्रिया भर हैं, जिसकी वजह से ही हम और आप इस दुनियां में आ सकें हैं. तो एक शारीरिक प्रकिया के लिए किसी इन्सान से ये भेदभाव क्यों?तो क्यों हम उन दिनों में स्त्री को उ देवी तो क्या इंसान तक नहीं समझते हैं. जिस वजह से हमारा वजूद है हम क्यों उस पर ही सवाल उठाते हैं? धर्म के नाम पर अपना लंगोट कस कर मर्दानगी दिखाने वाले सिर्फ एक दिन उस दर्द और उलझन को जी कर देखिये जिसे स्त्रिया हर महीने सालों साल जीती हैं. लेकिन मैं ये भी जानता हूँ की ये समझने और होने में अभी वक्त लगेगा.

सच बात तो ये है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक धर्मभीरू होती है. किसी भी धर्मिक आयोजन में महिलाओं की संख्या देख आसानी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता हैं. और अपनी इसी धर्मभीरुता की वजह से वो धर्मिक शिकारियों की आसान शिकार होती हैं. वो खुद महीनों के उन दिनों में खुद को अलग सी कर लेती हैं, वो अपने घर के मन्दिर तक नहीं जाती हैं. तो भला वो वहाँ क्यों जायेंगी जहां उन्हें मालुम की इस अवस्था में नहीं जाना हैं.

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पर जरा सोचिये कोई महिला पूरे साल आपके और आपके बच्चो कि सलामती की लिए उपवास रखे ( भले ही आप बाहर मुर्गा उड़ाते रहे हो ), पूजा करे और जब आप उसके साथ इस मंदिर में जायेगे तो उसे बाहर बैठना पड़े, वो भी इस लिए की वो एक अपवित्र महिला है और आप पीला कपडा पहन कर अंदर जाने का टिकट थाम ले क्युकी आप पवित्र पुरुष है.

हाँ, ये सच है की सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति मिल जाने के बाद भी बहुत कुछ नहीं बदलने वाला. अभी वो कोख में मारी जायेंगी,हर दिन उनका रेप होगा, हर दिन उनकी बोली लगेगी, कभी इज्जत, कभी दहेज, कभी दंगे कभी युद्ध के नाम पर मारी जाएंगी. कुछ भी नहीं बदलेगा कुछ वैसे ही जैसे शनि शिंगणापुर प्रवेश के बाद कुछ नहीं बदला. या शायद कुछ बदले भी…!!लेकिन क्या आपको नहीं लगता है की धर्म की आड़ पर बनाई गयी इन बेहूदा दीवारों का गिरना आवश्यक हैं? आवश्यक है इंसान इंसान होना.

मेरा हर धर्म के ठेकेदारों से एक ही सवाल है की क्या आपका धर्म इतना कमजोर है की किसी के छू देने से, पूजा कर देने या उसके के बारे में कुछ सच बोल देने से, उसके कार्टून बना देने से वो गिर जायेगा,खत्म हो जायेगा??? ..

और यदि ऐसा है तो माफ़ करियेगा हमे आपके धर्म की कोई जरूरत नही है. तुम्हारी है तुम ही सम्हालों ये दुनियां.

डॉ. सिद्धार्थ

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‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ या आदिवासियों की कब्र

मेरे देशवासियों! जश्न के अवसर पर रोना वाला मनहूस होता है मैं भी उन मनहूस लोगों में से एक हूं जब पूरा देश 31 अक्टूबर के जश्न में डूबने के लिए उतावला है तो मैं मनहूस 31 अक्टबूर के लिए शोकगीत लिख रहा हूं मेरे लिए तो यह खुशी का दिन होना चाहिए मेरे प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा हो रहा है विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा हमारे देश में बनी है वह भी सरदार पटेल की गांधी के प्रिय शिष्य की एकता-अंखडता के प्रतीक की गर्व और जश्न के अवसर पर शोकगीत लेकिन क्या करूं? मुझे यह पता है कि 72 आदिवासी गांवों को उजाड़कर बना है, पटेल का यह स्मारक आप के लिए, दुनिया के लिए यह पर्यटन स्थल होगा मगर यह आदिवासियों के सपनों की कब्र है आप कहेंगे कोई नई बात थोड़ी है कब्रों पर तो ही सभ्यताएं विकसित हुई हैं विकास परवान चढ़ा है, आपको पता है, 31 अक्टूबर को 75 हजार आदिवासी घरों में चूल्हे नहीं जलेंगे खाना नहीं बनेगा ऐसा वे तब करते हैं, जब किसी की मृत्यु होती है, 31 अक्टूबर को वे सामूहिक मृत्यु दिवस मनाएंगे मातम दिवस मनाएंगे जब 31 अक्टूबर को रंगारंग का कार्यक्रम हो रहा होगा जश्न परवान पर होगा प्रधानमंत्री जी इस महान उपलब्धि पर गर्व कर रहे होंगे मीडिया इस महान उपलब्धि का ढिंढोरा पीट रही होगी तब अपने घरों से उजाड़े गए हजाराें आदिवासी दर-बदर भटक रहे होंगे जहां उन्हाेंने अपना सारा जीवन गुजारा उस जगह के लिए हुड़क रहे होंगे यह वही जगह है, जहां सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा खड़ी की गई उनका स्मारक बनाया गया है मैं अपने उजाड़े गए आदिवासी भाई-बहनों, चाचा-चाचियों के लिए कुछ नहीं कर सकता रो तो सकता ही हूं, मातम तो मना ही सकता हूं एक दिन उनके सामूहिक मृत्यु दिवस पर उनके साथ भूखा तो रह ही सकता हूं आपका जश्न आपको मुबारक मैं उनके मातम में शामिल होऊंगा भले आप मुझे मनहूस कहें ताे कहते रहें रामू सिद्धार्थ Read it also-एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की

साहित्यिक जनतंत्र के प्रणेता : राजेन्द्र यादव

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फाइल फोटो

राजेन्द्र यादव बड़े जीवट वाले व्यक्ति थे. बचपन में नाटक में अभिनय के दौरान वाण लगने से उनकी एक आंख चली गयी. हाॅकी के खेल में चोट लगने से एक पैर फैक्चर हो गया. पर इन तकलीफों पर सोचने का उनके पास वक्त नहीं था. उनके मन-मस्तिष्क में कुछ और चल रहा था. वे जिद्दी स्वभाव के थे. इसीलिए अपनी तकलीफों पर वे ज्यादा नहीं सोचते थे. कहते थे ‘इससे मानसिक अशांति पैदा होगी, मुझे मानसिक रूप से उतनी फुर्सत नहीं है कि तकलीफों पर सोच सकूं.’ वे बेहद पढ़ाकू थे. उन पर लिखने की धून सवार थी.

शुरू में वे ‘चेखव’ से काफी प्रभावित थे, पर जल्द ही उससे मुक्त हो गए. फिर ‘कफ्का’ ने उन्हें गहरे रूप से प्रभावित किया. वैसे हिमिंग्वे, स्वाइग, कामू, सात्र्र, मार्खेज, हेराल्ड, पिंटर, बर्नार्ड शाॅ, बर्टेड रसेल, टैगोर, बच्चन, रेणु, फैज, मार्क ट्वेन, आॅस्कर वाइल्ड, दाॅस्तोव्स्की, टाॅलस्टाॅय, ब्लादिमीर नोबोकोव जैसे दर्जनों साहित्याकारों और विचारकों की रचनाओं व विचारों का उन्होंने अध्ययन किया था. पर इनमें से उनका कोई रोल माॅडल नहीं था. वे स्वतंत्र लेखकीय व्यक्तित्व में विश्वास रखते थे.

राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त, 1929 को आगरा में हुआ था. 1951 में उन्होंने लिखना शुरू किया. उस समय तक पश्चिमी अभिजात्यवाद, नव-अभिजात्यवाद ;छमू ब्संेेपबपेउद्धए स्वच्छंदतावाद ;त्वउंदजपबपेउद्ध तथा भारतीय छायावाद जैसी साहित्यिक विचारधाराएं तो गौण हो गईं थीं. चाल्र्स डार्विन का विकासवाद, सिग्मंड फ्रायड, एल्फेड एडलर एवं कार्ल गुस्ताफ युंग (जुंग) का मनोविश्लेषणवाद तथा माक्र्स, माओत्से तुंग तथा ग्राम्शी की प्रगतिवादी विचारधाराएं साहित्य सृजन को प्रभावित कर रही थीं. राजेन्द्र यादव भी इन नवीन विचारधाराओं से अछूते नहीं थे वे कहते थे कि ‘ऐसा साहित्य जो प्रश्न नहीं उठाता, असहमति नहीं पैदा करतेा है, वह समाज में रचाना में, बदलाव नहीं आने देगा. ऐसे साहित्य का उद्देश्य क्या हो सकता है? मेरे लिए साहित्य का मतलब यथास्थिति का कहीं न कहीं प्रतिरोध करना है.’ निश्चित रूप से ‘प्रतिरोध’ की यह शक्ति उन्हें माक्र्सवाद से ही मिली. वे मानते थे कि साहित्य की पारंपरिक विधा ‘कविता’के माध्यम से इस ‘प्रतिरोध’ को वर्तमान परिपे्रक्ष्य में अभिव्यक्ति नहीं किया जा सकता. यह विधा अब पुरानी पड़ चुकी है. ‘आज की भाषा या किसी औद्योगिक समाज की भाषा, दूसरे शब्दों में जनतांत्रिक समाज की भाषा, कविता नहीं, गद्य ही होती है. …कविता ने छायावाद तक तो मुख्यधारा बनाए रखी, उसके बाद नहीं. कविता सवाल नहीं उठाती है. आप देखो कि मौथिलीशरणगुप्त एक समय में कितने बड़े कवि थे, आज कहीं हैं ही नहीं. तमाम पौराणिक चीजों को उन्होंने नए तरह से व्याख्यायित करने की तो केशिश की, उन पर सवाल नहीं उठाए. उन चीजों में उनकी श्रद्धा फिर भी रही. और श्रद्धा से तो आप ‘विनय पत्रिका’ ही लिख सकते हैं.’ (‘कथादेश’, दिसम्बर 2013, पृ. 21-22)

राजेन्द्र यादव ने अपनी सूक्षम अंतर्दृष्टि से यह जान लिया था कि कविता में प्रतिरोध की अब शक्ति नहीं रही, सो उन्होंने ‘गद्य’ का चुनाव किया. अपने लेखक मित्रों मोहन रोकश एवं कमलेश्वर के साथ ‘नयी कहानी’ की सूत्रपात की. उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए. देवताओं की मूर्तियां (1951), खेल-खिलौने (1953), जहां लक्ष्मी कैद है (1957), अभिमन्यु की आत्महत्या (1959), छोटे-छोटे ताजमहल (1961), किनारे से किनारे तक (1962), टूटना (1966), चैखटें तोड़ते त्रिकोण (1987), यहां तकः पड़ाव-1, पड़ाव-2 (1989), श्रेष्ठ कहानियां, प्रिय कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां, प्रेम कहानियां, चर्चित कहानियां, मेरी पच्चीस कहानियां तथा हैं जो आतिश गालिब (2008). इन कहानियों के माध्यम से उन्होंने सामाकजिक रूढ़ियों, विषमताओं, विडम्बनाओं को न सिर्फ रेखांकित किया है, बल्कि सामाजिक-नैतिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं.

राजेन्द्र यादव के उपन्यासः प्रेत बोलते हैं (1951) (बाद में यह ‘सार आकाश’ के नाम से 1959 में प्रकाशित हुआ), उखड़े हुए लोग (1956), कुलटा (1958), शह और मात (1959), अनदेखे अनजान पुल (1963), एक इंच मुस्कान (1963, पत्नी के साथ) मंत्रविद्ध (1967) तथा एक था शैलेंद्र (2007) में भी सामाजिक-नैतिक प्रतिरोध पूरी समग्रता के साथ उपस्थित हुआ है.

प्रतिरोध की यह शक्ति उनकी औपन्यासिक आलोचना-दृष्टि में भी दिखाई पड़ता है. ‘अठारह उपन्यास’ (1981) उनकी एक लम्बी आलोचनात्मक यात्रा का चिंतन है, जो 1951 से प्रारंभ होकर 1981 तक फैला हुआ है. प्रेमचंदोत्तर उपन्यासों की आलोचना में उनहोंने आलोचना की परंपरागत पद्धति को स्वीकार नहीं किया. ‘उपन्यासः स्वरूप और संवेदना’ (1998) में उन्होंने आधुनिक प्रतिमानों का समावेश किया है. इस दृष्टि से ‘कहानीः स्वरूप और संवेदना’ (1968), ‘प्रेमचंद की विरासत’ (1978), ‘ औरों के बहाने’ (1981) भी उल्लेखनीय आलोचनात्मक कृतियां हैं. ‘एक दुनिया समानांतर’ (1967) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. अन्य आलोचनात्मक कृतियों-निबंधों: कांटे की बात (1994), मेरा साक्षात्कार (1994), कहानीः अनुभव और अभिव्यक्ति (1996), आदमी की निगाह में औरत (2001), वे देवता नहीं हैं (2001), मुड़-मुड़ के देखता हूं (2002), नरक ले जाने वाली लिफ्ट (2002), मैं ‘हंस’ नहीं पढ़ता (2006), अब वे वहां नहीं रहते (2007), काश मैं राष्ट्रद्रोही होता (2008), स्वस्थ आदमी के बीमार विचार (2012) में भी उन्होंने गंभीर प्रश्न उठाए हैं.

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राजेन्द्र यादव ने न सिर्फ कहानी एवं उपन्यास लेखन के पारंपरिक पद्धति में बदलाव किया, बल्कि हिंदी साहित्य के जनतंत्रीकरण में भी महत्वपूर्ण रोल अदा किया. उन्होंने हांशिये के लोगों को साहित्य के केन्द्र में लाकर एक नई वैचारिकी निर्मित की. वे कहते थे कि हमारा साहित्य कुलीन लोगों का साहित्य रहा है, इसमें हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज छूट गई है. यही वजह है कि उन्होंने ‘हंस’ के माध्यम से ‘स्त्री विमर्श’ एवं ‘दलित विमर्श’ को काफी बढ़ावा दिया. दलित चिंतक कंवल भारती कहते हैं कि ‘वे हिंदी साहित्य में नए विमर्श के सम्राट थे. साहित्य में प्रगतिशील चिंतन तो पहले भी था, लेकिन वह ब्राह्मणवादी विचारधारा से प्रभावित था. राजेन्द्र यादव ने उस चिंतन को ब्राह्मणवाद से मुक्त करने में जो भूमिका निभायी, वह अद्वितीय है. ‘हंस’ में अपने संपादकीय लेखों के माध्यम से जिस सामाजिक परिवर्तन की धारा चलायी उसका मुकाबला कोई संपादक और कोई लेखक नहीं कर सकता. …अपने स्त्री-विमर्श में जिन खौलते हुए सवालों को उन्होंने उठाया था, उसके लिए उन्हें भारतीय संस्कृति के ‘रक्षकों’ से क्या-क्या नहीं सुनने को मिला. यहां तक कि तथाकथित नारीवादियों तक ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई. बावजूद इसके उन्होंने अपनी हट आलोचना और हर कुतर्क का जवाब और भी विचारोत्तेजक और नए-नए तर्कों के साथ दिया. (‘प्रभात खबर’, पटना, 30 अक्तूबर 2013)

वरिष्ठ साहित्यकार वीरेन्द्र यादव कहते हैं कि ‘यह स्वीकार करना होगा कि राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से साहित्यिक कुलीनतावाद और कलावाद को सशक्त चुनौती दी थी. जब समूची हिन्दी पट्टी में सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरतावाद की आंधी चल रही थी, तब ऐसे दौर में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में ही नहीं, बल्कि धार्मिक कूढ़मगजता के विरुद्ध भी अभियान छेड़ा था. परिणामस्वरूप उन्हें मुकदमे, अदालतों और जमानत आदि के खतरों और झंझटों से भी गुजरना पड़ा था. सही अर्थों में राजेन्द्र यादव एक ऐसा ‘पब्लिक इंटलेक्चुअल’ थे, जो राजनीति संस्कृति और समाज के हर पहलू पर प्रगतिशील दृष्टिकोण रखते थे. यह सचमुच विस्मयकारी है कि वे यह सब अपनी उस बढ़ी हुई उम्र में कर सके थे, जब सामान्यतः लोग संन्यास की आरामदायक मुद्रा में यथास्थितिवाद के पैरोकार और वर्चस्व की सत्ता के मुखापेक्षी हो जाते हैं.

राजेन्द्र यादव अपने सामाजिक सरोकारों और लेखन में ही नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व में भी पूरी तरह जनतांत्रिक थे. जिस तरह ‘हंस’ के पृष्ठों पर असहमति और बहस की पूरी छूट थी, उसी तरह ‘हंस’ के कार्यालय की अड्डेबाजी में भी. राजेन्द्रजी युवतम लेखकों को भी बहस और असहमति की पूरी छूट ही नहीं देते थे, बल्कि उसका सम्मान भी करते थे. यही कारण था कि ‘हंस’ जितना एक पत्रिका का कार्यालय था, उससे कहीं अधिक साहित्यिक अड्डेबाजी का केन्द्र. समूचे देश में साहित्यकारों के लिए ‘हंस’ कार्यालय दिल्ली पहुंचने पर अनिवार्य गंतव्य होता था. राजेन्द्र जी के ठहाकों से गुंजायमान इस अड्डे पर पहुंचते ही उम्र और पीढ़ियों की दूरियां पल भर में तिरोहित हो जाती थीं. (वही)

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दलित साहित्यकार श्योराज सिंह बेचैन, जो रोन्द्र यादव से खासा प्रभावित रहे हैं, कहते हैं कि ‘राजेन्द्र यादव ने दलित अधिकार को सैद्धांतिक विमर्श का विषय बनाने का बड़ा काम ‘हंस’ के जरिए किया. उन्होंने ‘हंस’ की विषय-वस्तु को अधिक लोकतांत्रिक और विविधतासम्पन्न बनाया, जिससे दलितों में राजेन्द्र यादव को सिर-माथे रखने वाला ‘हंस’ का बड़ा पाठक वर्ग पैदा हुआ. रोजन्द्र यादव और ‘हंस’ के कारण दलित लेखकों को मुख्यधारा में पहचाना जाने लगा, जो इससे पहले अपनी सामुदायिक पत्रिकाओं के सीमित पाठकीय दायरे में ही पढ़े जाते थे. ‘हंस’ सामाजिक दृष्टि से अगड़ों, पिछड़ों, हिंदू, मुस्लिमों, ब्राह्मणों, दलितों-सब में जाती रही है. यहां तक कि वह मराठी, पंजाबी आदि गैर-हिंदी क्षेत्रों में और साहित्येतर विषयों- जैसे रानीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र आदि से जुड़े लोगों के बीच भी पढ़ी जाती रही है. ऐसी पत्रिका जिसमें दलित साहित्य को जगह देकर राजेंद्र यादव ने पहचान का बड़ा क्षितिज उपलब्ध कराया. दलित रचनाओं की मार्फत एक बड़ा पाठक वर्ग दलित जीवन और उसकी समस्याओं से परिचित हुआ.

अस्पृश्यता का भाव रखने वाले और जातिगत अभिमान और ज्ञान के गुरुर में डूबे संपादक दलित लेखकों को अपने कक्ष में घुसने तक नहीं देते थे, जबकि राजेन्द्र यादव उनके साथ एक ही थाली में खाते और खिलाते थे. दलित लेखकों के घर जाते थे. सारी दूरियां मिटाते थे. दलितों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध कितने ही संपादकीय उन्होंने लिखे, वे साहित्य और चिंतन में दलितों के खुद के नेतृत्व को प्रेरित कर रहे थे और उसे व्यापक स्तर पर स्वीकार्य बनाने की राह बना रहे थे.

दलित साहित्य के विरोधी यादवजी के साथ ‘हंस’ के सहयोगियों तक में मौजूद थे, जो दलित रचना को पूर्वाग्रह से देखते/देखती थीं. राजेन्द्र यादव छापते तो वे कहते कि यह आरक्षण दिया जा रहा है और आरक्षण का मतलब मैरिट का न होना था, जबकि हंस में दलितों की भी कच्ची रचना वे नहीं छापते थे. उन्होंने मुझसे कितनी ही बार प्रतिप्रश्न किया था कि क्या तुम पांचवीं पासको यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिला दोगे? नहीं न! …तो मान लो ‘हंस’ साहित्य की यूनिवर्सिटी है.’ (‘हंस’ दिसम्बर 2013, पृ. 81) हालांकि राजेन्द्र यादव ने यह स्वीकार किया था कि जो जैन्युन है हम उन्हें कुछ रियायत देते हैं. वे इसे ‘डेमोक्रेटिक राइट’ के रूप में देखते थे.

इस प्रकार हम देखते हैं राजेन्द्र यादव का पूरा उद्यम हिन्दी साहित्य के लोकतंत्रीकरण का उद्यम है. उनका व्यक्तित्व कबीर-फुले आम्बेडकर के वैचारिकी से निर्मित था. उन्होंने अभिजात्य हिन्दी साहित्य की न सिर्फ बखिया उधेड़ी, बल्कि हिन्दी साहित्य में सभी वर्गों का समावेश कर लोकतंत्रीकरण किया. यही वजह है कि कुछ लोग उन्हें साहित्य का बीपी सिंह कहते हैं. हालांकि बीपी सिंह को वंचित वर्ग को शासन में भागीदारी (आरक्षण) देने के तुरंत बाद सत्ता गवांनी पड़ी थी, पर राजेन्द्र यादव की सत्ता को चुनौती देने की हैसियत किसी में नहीं थी. वे जबतक रहे तबतक शीर्षस्थ रहे. उन्होंने अपने युग का मजबूती से नेतृत्व किया.

रामकृष्ण यादव

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MP: BSP ने जारी की 50 उम्मीदवारों की लिस्ट

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है. बसपा ने 50 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की है. बसपा ने मध्य प्रदेश में किसी भी पार्टी से गठबंधन नहीं किया है और सभी सीटों पर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है.

बसपा के प्रदेश प्रभारी राम अचल राजभर ने पार्टी की पहली सूची जारी की. इसमें प्रदेश के सभी चारों विधायकों को दोबारा से टिकट दिया गया है. इसके अलावा दो पूर्व विधायकों को फिर से पार्टी ने भरोसा करते हुए टिकट दिया है.

बसपा ने सत्यप्रकाश को अम्बाह विधानसभा से, उषा चौधरी को सतना की रैगांव सीट से, शीला त्यागी को रीवा के मनगंवा से और बलवीर सिंह दंडोतिया को मुरैना सीट से टिकट दिया गया है. जबकि दंडोतिया पहले मुरैना के दिमनी विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे.

इन चारों विधायकों को अलावा रामलखन सिंह पटेल को सतना की रामपुर बघेलान और रामगरीब कोल को रीवा की सिरमौर से प्रत्याशी घोषित किया है. दोनों नेता पूर्व विधायक हैं. बसपा ने जो सूची जारी की है उसमें मुरैना, रीवा, दमोह, सतना सहित अपने प्रभाव वाले अन्य इलाके की सीटें शामिल हैं.

बता दें कि चुनाव घोषणा से पहले बसपा ने 22 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी थी. जिनमें पार्टी ने अपने विधायक बलवीर सिंह दंडोतिया के नाम की घोषणा नहीं की थी. हालांकि पहली लिस्ट वाले उम्मीदवारों के नाम भी दूसरी लिस्ट में शामिल हैं.

2013 में मध्यप्रदेश में बीएसपी ने 230 सीटों में से 227 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. बसपा यहां 6.42 फीसदी वोट के साथ चार सीटें जीतने में सफल रही थी. राज्य 75 से 80 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों ने 10 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे. जबकि बीजेपी और कांग्रेस के बीच 8.4 फीसदी वोट शेयर का अंतर था. बीजेपी को 165 सीटें और कांग्रेस को 58 सीटें मिली थीं.

मध्य प्रदेश में बसपा का आधार यूपी से सटे इलाकों में अच्छा खासा है. चंबल, बुंदेलखंड और बघेलखंड के क्षेत्र में बसपा की अच्छी खासी पकड़ है. कांग्रेस के साथ बसपा का न उतरना शिवराज के लिए अच्छे संकेत माने जा रहे हैं.

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