विश्व कवि ढसाल का एक यादगार पत्र: दुसाध के नाम!

8 दिसंबर ,2011 मेरे जिंदगी का एक बेहद खास दिन था, इसकी उपलब्धि एक अन्तराल के बाद किया. उस दिन मेरी मुलाकात विश्व विख्यात कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल से हुई थी. 1999 से ही प्राय हर साल मेरा मुंबई और नागपुर का दौरा होता रहा है . इन दौरों में अक्सर किसी न किसी से ढसाल साहब का जिक्र सुनता. उनका नाम सुनते-सुनते उनसे मिलने की इच्छा भी धीरे-धेरे जाग्रत होने लगी. तब 6 दिसंबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में किताबों की प्रदर्शनी लगाने के दौरान कई बार उनसे मिलवाने के लिए वहां के मित्रों हल्का-फुल्का अनुरोध किया. हर बार पता चलता चला कि या तो वे बीमार हैं या पूना गए हुए हैं. ऐसा ही एक अवसर 6 दिसंबर, 2011 को फिर आया. उस दिन शिवाजी पार्क में मेरे स्टाल पर काफी भीड़ थी. वैसे जहां कहीं भी स्टाल लगाताता हूँ, विविध कारणों से लोगों की भीड़ मेरे स्टाल पर औरों से कुछ ज्यादे ही रहती है. बहरहाल उस दिन स्टाल पर जुटी भीड़ में से फिर किसी ने ढसाल साहब का जिक्र छेड़ दिया. मैंने बिना किसी खास व्यक्ति की ओर मुखातिब हुए यूं ही कह दिया कि काफी दिनों से उनसे मिलने की तमन्ना है, पर मिलने का असवर अबतक नहीं मिला.

अचानक मेरी किताबों को उलटने पलटने में व्यस्त एक व्यक्ति ने मेरी आँखों में आँखे डाल सवाल किया, ’आप उनसे मिलना चाहते हैं?’ .जी हाँ, क्या कोई उपाय है आपके पास उनसे मिलवाने का!,मेरा जवाब था. हाँ, वह आजकल मुंबई में ही हैं, मैं मिलवा दूंगा,जवाब था उस व्यक्ति का, जो शिवाजी पार्क में स्टाल लगाने पर हर बार ,मेरे स्टाल पर आते और घंटों किताबों को न सिर्फ उलटने पलटने में व्यस्त रहेते, बल्कि जाते-जाते हजार-पांच सौ की किताबें भी जरुर ले लेते. हर बार वहां जाने पर मुझे उनका इन्तजार भी रहता था,किन्तु कभी विस्तार से उनका परिचय जानने का प्रयास नहीं किया. उस दिन किया तो पता चला वे दलित पैंथर के पदाधिकारी और ढसाल साहब के अत्यंत विश्वासपात्र सुरेश केदारे हैं. उन्होंने मिलने का दिन पूछा तो मैने बता दिया :8 दिसंबर! केदारे जी ने उनका लैंड लाइन नंबर और पता लिखकर देते हुए देते हुए कहा,’मैं, उन्हें बता दूंगा, आप चले जाईयेगा.’

और मैं 8 दिसंबर को फोन करके पहुंच गया लोखंडवाला काम्प्लेक्स के निकट अँधेरी वेस्ट वाले उनके अपार्टमेंट: फ्लोराइड में. दूसरे तल अवस्थित पर उनके फ़्लैट का कॉल बेल बजाते ही मुस्कुराते हुए एक भद्र महिला ने दरवाजा खोला, बाद में जाना वह खुद उनकी अर्द्धांगिनी मल्लिका नामदेव ढसाल थीं. ऐसा लगा वे मेरे आने की प्रतीक्षा कर रही थीं.अन्दर कदम रखते ही मैंने खुद को उनके ड्राइंग रुम में पाया. मुझे बैठने का अनुरोध कर वह अन्दर कमरे में चली गयीं और मैं कुछ हद तक धडकते दिल से ढसाल साहब की प्रतीक्षा करने लगा. उनका ड्राइंग रूम आकार में बहुत विशाल तो नहीं था, किन्तु सुरुचिपूर्ण तरीके से सजा हुआ था. लग रहा था किसी लेखक के ड्राइंग रूम जैसे. उसमें हर सभ्य दलित परिवारों की भांति बाबा साहेब की तस्वीर तो थी ही, साथ ही एक और व्यक्ति की विभिन्न मुद्राओं में एकाधिक तस्वीरें भी टंगी थीं:ज्यादातर तस्वीरें ब्लैक एंड व्हाईट में थी. मैंने अनुमान लगा लिया कि वही होंगे ढसाल साहब. इन तस्वीरों के आधार पर उनके व्यक्तित्व की कल्पना करने लगा. ज्यादा नहीं, बमुश्किल तीन-चार मिनट प्रतीक्षा के बाद ही भव्य व्यक्तित्व के स्वामी ढसाल साहब को चेहरे पर भव्य मुस्कान लिए बड़ी मुश्किलों से, लगभग लंगड़ाते हुए अपनी ओर आते देखा. उन्हें देखकर मैं खड़ा हो गया. वे आये और मुझसे हाथ मिलाने के बाद बैठने का संकेत करते हुए धम्म से व्हील चेयर पर बैठ गए. मैं लगभग चालीस मिनट उनके पास बैठा रहा. उनके लिए काफी किताबें लेकर आया था. वे किताबें पलटते हुए वर्तमान हालात पर विचार विनिमय करते रहे. हमारी चर्चा मुख्यतः केजरी-हजारे द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन पर केन्द्रित रही. उनके पास से हटने का तो मन नहीं कर रहा था, किन्तु उनके स्वास्थ्य को देखते हुए और ज्यादा ठहरना उचित नहीं लगा. मैंने लगभग चालीस मिनट बाद उनसे चलने की इजाजत मांगी. जब चलने लगा, उन्होंने मना करने के बावजूद मेरी जेब में कुछ रूपये ठूस दिए. बाहर आकर गिना तो पाया 2,500 रूपये थे. उनके और हमारे बीच परवर्तीकाल में चिरकाल के लिए सेतु बने भाई सुरेश केदारे ने कहा था,’दादा दिल से राजा हैं.’ उनके घर के हालात देखर मुझे ऐसा लगा था वे आर्थिक प्राचुर्य नहीं, अभावों में ही जी रहे हैं. वावजूद इसके उन्होंने उतने रूपये मेरी जेब डाल दिया. ऐसा कोई राजा दिल व्यक्ति ही कर सकता था. बाद में तो उनसे हमारे सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ हुए और कई मुलाकातें हुईं: हर मुलाकात में उनकी शाही दिली का सबूत मिलता रहा . दिसंबर 8 की उस मुलाकात के शायद एक माह बाद ही अचानक एक दिन फोन आया. उन्होंने कहा ,’दुसाध जी अन्ना आन्दोलन के खिलाफ हमलोग तीन दिन बाद एक बड़ा प्रतिवाद सभा करने जा रहे हैं, आपको हर हाल में आना है.’ ‘सर, मैं बनारस में हूँ,’इतनी जल्दी ट्रेन का टिकट कंफर्म होना मुमकिन नहीं दीखता, अतः …’इससे आगे मैं कुछ कहता मेरी बात को काटते हुए उन्होंने कहा,’डोंट वोर्री’!मैं जहाज का टिकट भेजता हूँ.’ और उन्होंने भेजा तथा मैं दादर, चैत्यभूमि के पास आयोजित उस सभा में पहुंचा भी, किन्तु देर से. मौसम ख़राब होने के कारण फ्लाईट कुछ देर से पहुंची थी. जब सभा स्थल पर पहुंचा, उस समय वह ज्ञापन देने के लिए राज्यपाल हाउस जाने की तैयारियों में व्यस्त दिखे. हमलोग दर्जन से अधिक गाड़ियों के काफिले के साथ गवर्नर हॉउस पहुँच कर ज्ञापन दिए.

दरअसल पहली मुलाकात में मैंने जो उन्हें कई किताबें भेंट की थी, उनमें मेरी दो किताबें अन्ना-केजरी के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आन्दोलन पर थीं, जिनमें मैंने उन्हें बुरी तरह एक्सपोज कर दिया था. उस समय तक इनके खिलाफ कम से कम हिंदी में कोई किताब नहीं आई थी. इसलिए ही उन्होंने एक स्पेश्लिस्ट के तौर पर उस सभा को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था.उस दौरे में दो दिन मुंबई में रहा. इस बीच हमने एकाधिक बार लम्बा वार्तालाप किया. एक दिन उन्होंने इस बात के लिए अफ़सोस जताया कि हिंदी पट्टी में बाबा साहेब पर इतना काम हो रहा है, पर वहां के लेखकों से मिलने का अवसर नहीं निकाल पाया. बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने हिदी पट्टी के लेखकों से मिलवाने की जिम्मेवारी मुझ पर डाल दी. उन दिनों मैं 15 मार्च को आयोजित होने वाले ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ के स्थापना दिवस की तैयारियों में व्यस्त था. मैंने एक पंथ दो काज के तहत मौका-माहौल देखकर उन्हें आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया. तय यह हुआ कि 15 मार्च को वे स्थापना दिवस में शामिल होंगे और अगले दिन शाम को दिल्ली के दलित लेखकों के साथ डिनर करेंगे.

उसके बाद दिल्ली आकर अतिरिक्त उत्साह के साथ स्थापना दिवस की तैयारियों में जुट गया. आयोजन स्थल के लिए हमने चयन किया, दिल्ली के जेएनयू को. इस बीच कई लेखक मित्रों को डिनर के लिए तैयार भी कर लिया था. किन्तु प्रोग्राम के तीन-चार दिन पहले से ही उनके स्वास्थ्य में और गिरावट की खबरें आने लगीं. और शेष में स्थिति ऐसी हो गयी कि वे आने की हालात में नहीं रहे. ऐसी स्थित में उन्होंने 14 मार्च,2012 को यह पत्र फैक्स के जरिये भेजा और अनुरोध किया कि इसे उपस्थिति श्रोताओं के मध्य पढ़कर, न आ पाने के लिए मेरी और से खेद प्रकट कर दीजियेगा और मैंने वैसा किया भी. उनका वह दुर्लभ पत्र कहीं खो गया था,जो 7 नवम्बर, 2018 को लैपटॉप पर कुछ पुरानी सामग्री ढूंढते-ढूंढते अचानक मिल गया, जिसे मैंने 8 नवम्बर को फेसबुक पर डाल दिया. फेसबुक पर प्राख्यात लेखक प्रो. चौथीराम यादव, डॉ. लाल रत्नाकर, कर्मेंदु शिशिर, सुदेश तनवर, चंद्रभूषण सिंह यादव सहित अन्य कई लोगों ने उनके इस पत्र को एक स्वर में ‘ऐतिहासिक दस्तावेज’ करार दिया. बहरहाल यह पत्र एकाधिक कारणों से मेरे लिए बेहद महत्त्वपूर्ण था. पहला तो यह कि इस पत्र में उनकी लिखावट मुझे विस्मित की थी. मैं ही क्यों, कोई भी उनकी लिखावट देखकर मेरी तरह ही विस्मित हो सकता है. बहुतों को पता नहीं है कि उन्होंने ‘फाइन आर्ट’ में ग्रेजुएशन किया था. इस कारण उनकी लिखावट बेहद खूबसूरत हुआ करती थी, जिसका साक्ष्य है यह पह . उनकी विरल लिखावट के अतिरिक्त इसके महत्वपूर्ण होने का दूसरा कारण यह रहा है कि उनकी जैसी ऐतिहासिक शख्सियत ने मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के साथ मिलकर बाबा साहेब के मिशन को आगे बढाने का आह्वान किया था. ढसाल साहब बहुत ही डॉमिनेटिंग:सरल भाषा में कुछ हद तक खौफनाक व्यक्तित्व के स्वामी रहे, जिनके सामने आने पर बड़े से बड़े लोगों का भी निष्तेज हो जाना तय था. किन्तु एक खास बात यह थी कि उनके चेहरे पर सब समय एक ऐसी मुस्कान खेलती रहती थी जिसके नीचे एवरेस्ट सरीखा बुलंद आत्म विश्वास और करुणा का अपार सागर हिलोरे मारते रहता था. इस मुस्कान का पहली बार साक्षात् मैंने 8 दिसंबर, 20011 को उनके फ्लोरिडा अपार्टमेंट में किया था. 2013 के 8 दिसंबर को जब मरीन लाइन के बॉम्बे हॉस्पिटल में उन्हें आखरी बार जिंदगी और मौत से जूझते देखा, तब भी वह खास मुस्कान उनके चेहरे से जुदा नहीं हुई थी.15 फरवरी,1949 को अपने जन्म से दलित भारत को धन्य करने वाले ग्रेट पैंथर उसी हॉस्पिटल में लगभग सवा महीने जिदगी और मौत से आँख मिचौनी करते हुए 15 जनवरी, 2014 को आखरी साँस लिए थे. 2013 के 6 दिसम्बर को शिवाजी पार्क के लिए रवाना होने के सप्ताह पूर्व ही हमारे मध्य सेतु रहे सुरेश केदारे भाई से पता चल चुका था कि पैन्थरों के ‘दादा’ अर्थात हमारे ढसाल बहुत ही गंभीर हालात में बॉम्बे हॉस्पिटल में एडमिट किये गए हैं. ऐसे में 6 दिसंबर को शिवाजी पार्क में किताबों का स्टाल लगाने के बाद अगले ही दिन हॉस्पिटल पहुँच गया. किन्तु उनकी हालत इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर ने मिलने की इजाजत ही नहीं दी. ऐसा लगा उनसे बिना मिले ही वापस आ जाना पड़ेगा. किन्तु उनके प्रति मेरी अपार श्रद्धा को देखते हुए खुद मल्लिका मैडम सहित उनके सहयोगियों ने बहुत रिक्वेस्ट कर डॉक्टर से मेरे लिए इजाजत मांगी और 2011 के 8 दिसंबर की पहली मुलाकात के बाद फिर एक और 8 दिसम्बर को उनसे मिल सका,जो आखरी मुलाकात साबित हुई.

भारी सावधानी के बीच आईसीयू में पड़े ढसाल साहब के पास पहुंचा.वह ऑंखें बंद किये बेड पर पड़े हुए थे.’सर!मैं आया हूँ’, यह सुनते उन्होंने धीरे से आँखे खोला और फ़ैल गयी उनके चेहरे पर उनकी चिरपरिचित स्वाभाविक मुस्कान. उन्होंने मद्धिम आवाज में पूछा,’सब ठीक है न’! मैं स्तब्ध था.सर हिलाकर हामी भरा. वह और कुछ कहना चाहते थे.मैंने डॉक्टर की हिदायत को ध्यान में रखते हुए चुप रहने का संकेत किया. वे मुस्कुराकर खामोश हो गए. फिर धीरे से कहे ‘डाइवर्सिटी रुकना नहीं चाहिए’. यह सुनकर मेरी ऑंखें छलछला आयीं, किन्तु मैं खुद को सामान्य बनाये रखा. लगभग डेढ़-दो मिनटों तक स्तब्ध होकर निहारते रहने के बाद इजाजत लेकर आईसीयू से बाहर आ गया. मन बहुत उदास था. ऐसा लगा ग्रेट पैंथर को दुबारा दहाड़ते हुए नहीं देख पाऊंगा. और जिसकी आशंका थी, वह खबर आ ही गयी.

14 जनवरी को कोलकाता से दिल्ली के लिए चला था. भयंकर ठंडी में रात में कम्बल में दुबक सो रहा था. अचानक मोबाइल घनघना उठा. देखा सुबह के तीन बजे हैं और उधर से भाई सुरेश केदारे की कॉल आ रही थी. मैं समझ गया, ग्रेट पैंथर जन अरण्य का परित्याग कर चुका है. कॉल को रेस्पोंस किया तो उधर से आवाज आई,’दादा नहीं रहे’! अब जहां तक ढसाल साहब की महानता का सवाल है, उस पर बहुत कुछ लिखा गया है: देश-विदेश के ढेरों मनीषियों ने उनका आंकलन किया है. किन्तु मेरा मानना है कि जितना हुआ है, वह पर्याप्त नहीं है. डॉ.आंबेडकर के बाद दलित साईक को बदलने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले इस पैंथर का सम्पूर्ण आंकलन अभी भी बाकी है. वह विश्व इतिहास के पहले कवि रहे जिन्होंने दलित पैंथर जैसा एक मिलिटेंट(उग्र)संगठन स्थापित कर देश और महाराष्ट्र की राजनीति में बवंडर पैदा कर दिया. अधिकांश लेखक-कवि-शिल्पी समाज परिवर्तन के लिए पहले से स्थापित सामाजिक/राजनीतिक संगठनों में योगदान किये, किन्तु स्वतंत्र रूप में, खासकर लेखक नहीं, किसी कवि ने दलित पैंथर जैसा आक्रामक संगठन कही नहीं बनाया. विष्णु खरे के शब्दों में वह कवि के रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर से बड़े ऐसे कवि थे,जिन्होंने देश और महाराष्ट्र की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. अंतरराष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड रहे ढसाल साहब ने भारत में कविता को परम्परा से मुक्त एवं उसके आभिजात्यपन को ध्वस्त करने के साथ दलित साहित्य को जो तेवर दिया,उससे मुख्यधारा का साहित्य करुणा का विषय बन कर रह गया, यह सब बातें मैंने अपनी दो प्रकाशित पुस्तकों,सितम्बर 2012 में ‘टैगोर बनाम ढसाल’ तथा उनके मरणोपरांत मार्च,2014 में प्रकाशित ‘महाप्राण नामदेव ढसाल’ के जरिये काफी हद तक प्रमाणित कर दिया है. लेकिन पद्मश्री ढसाल एक कवि, संगठनकर्ता और राजनेता से भी बहुत आगे की चीज थे.

वह विश्व के इकलौते कवि-लेखक थे,जिनके समक्ष साहित्य और राजनीति ही नहीं अंडरवर्ल्ड की हस्तियाँ भी झुकती थीं. उन्होंने जिस तरह अपार प्रतिकूलताओं को जय करते हुए विविध क्षेत्रों में विश्वस्तरीय छाप छोड़ी, उसके आधार पर वे सिकंदर और नेपोलियन जैसे योद्धाओं की पंक्ति में स्थान पाने के हकदार थे, यह बात सिद्ध करने के लिए उन पर मैंने 2015 में एक खास किताब लिखने की परिकल्पना किया. इसके लिए काफी हद तक जरुरी सामग्री भी जुटा लिया था. किन्तु 2014 के बाद जिस तरह देश के हालात बद से बदतर होने लगे, मुझे उस लम्बी परियोजना से विरत होना पड़ा. यदि 2019 के बाद बहुजन भारत विशेषाधिकारयुक्त तबकों, जिनके खिलाफ संग्राम चलाने के लिए ही ढसाल साहब ने खुद को साधारण से अति-असाधारण में परिणत किया था, के हाथ से मुक्त सका तो फिर विश्व इतिहास की सबसे अनूठी शख्सियत से जुड़े अधूरे काम को पूरा करने में खुद को झोंक दूंगा, यह मेरी ग्रेट पैंथर के गुणानुरागियों के समक्ष प्रतिश्रुति है.

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लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में बसपा मुखिया मायावती

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लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त देने की तैयारी में विपक्ष की योजना को बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी धार देने में लगी हैं. मायावती करीब 15 वर्ष के बाद लोकसभा के चुनावी मैदान में उतरने के मूड में हैं.

लोकसभा के बाद राज्यसभा से शीर्ष सदन में जगह बना चुकीं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को अब लोकसभा सीट तय करनी है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा के उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को दो सीट दिलाने में मदद करने वाली मायावती का संकेत है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की आधी से अधिक सीट यानी करीब 50 पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी उतारेगी. बसपा सुप्रीमों मायावती 2019 के लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही हैं. इसके लिए उन्होंने लोकसभा सीट की तलाश शुरू कर दी है.

मायावती को पता है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है. भाजपा को 2019 में सत्ता में आने से रोकने के लिए मायावती और अखिलेश यादव के एक साथ आने की उम्मीद है. अखिलेश के साथ गठबंधन में मायावती खुद किस सीट से चुनाव लड़ेंगी, यह उनको तय करना है. इससे पहले 2004 में मायावती अकबरपुर सीट से लोकसभा चुनाव जीती थीं.

बसपा का यह पुराना गढ़ है लेकिन यह सीट समान्य हो गई. इसी कारण वह अपने गृह जिले गौतम बुद्ध नगर से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं. वह अभी तक राज्यसभा और विधानपरिषद के रास्ते सदन तक पहुंचीं हैं. अब डेढ़ दशक बाद उनके एक बार फिर से ताल ठोंकने की तैयारी है. अगर गठबंधन के तहत मायावती चुनाव लड़ती है तो निश्चित तौर पर बसपा को जमीनी स्तर पर काफी फायदा होगा. इसके अलावा गठबंधन के तहत अखिलेश यादव भी मायावती के लिए प्रचार करते नजर आ सकते हैं.

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दलित परिवार के साथ मारपीट, चार दिन बाद भी पुलिस हरकत में नहीं

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नूंह। खंड के खेड़ा-खलीलपुर गांव में दबंग परिवार द्वारा दलित परिवार के साथ मारपीट करने का मामला प्रकाश में आया है. वारदात को चार दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया है. जिससे पीड़ित दलित परिवार में भय का माहौल है. मारपीट के दौरान दलित परिवार के लोगों को गंभीर चोटें आई हैं और उनमें से एक महिला को दिल्ली रेफर कर दिया गया है. पुलिस ने दया, कृष्ण, खजान, रमेश, नेपाल, राजू, विजयपाल सहित कई लोगों खिलाफ मामला दर्ज किया है. पीड़ित पक्ष का आरोप है कि गांव के दया ने अपने घर का रैंप गली में बनाया हुआ है. कोई भी वाहन वहां से निकलता है तो उसके मकान की दीवार को रगड़ा मारता है, जिससे मकान गिरने का डर रहता है. उन्होंने अपने घर को बचाने की नीयत से दीवार के साथ एक पत्थर डाल दिया जिससे वाहन बचकर निकल जाए. इसका दया व उनके परिजनों ने विरोध किया. इसी बात को लेकर उक्त लोगों उनके साथ मारपीट की. पीड़ित परिजनों का आरोप है कि इससे पहले भी उनके साथ साथ मारपीट की जा चुकी है. झगड़े में बिश्बंर, भरतसिंह, शकुंतला, लीला को चोटें आई है. शकुंतला के सिर में अधिक चोट होने के कारण उसे मेडिकल कॉलेज नलहड़ से दिल्ली के लिए रेफर कर दिया गया है. वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि उन पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं. ये लोग आए दिन गलती करते हैं और दूसरों को दोषी ठहराते हैं. डीएसपी सुखबीर सिंह का कहना मामले की जांच चल रही है जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

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बहुजनों को गुलामी से बचाने का एक ही रास्ता है डाइवर्सिटी:एच.एल.दुसाध

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मऊ। ‘कार्ल मार्क्स ने कहा है कि दुनिया का लिखित इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है.समाज में सदैव ही विरोधी आर्थिक वर्गों का अस्तित्व रहा है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व रहा और दूसरा वह जो केवल शारीरिक श्रम करता है. मार्क्स का बताया वर्ग संघर्ष का वह इतिहास भारत में आरक्षण पर संघर्ष के रूप में क्रियाशील रहा. क्योंकि जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा भारत समाज सदियों से परचालित होता रहा, वह बुनियादी तौर पर आरक्षण की व्यवस्था रही, जिसमें उत्पादन के सभी साधन ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे. इस हिन्दू आरक्षण में ही अपनी हिस्सेदारी के लिए वंचित बहुजन सदियों से सघर्षरत रहा. आरक्षण पर इस संघर्ष में 7 अगस्त,1990 को तब एक नया ऐतिहासिक मोड़ आया, जब पिछड़ों को मंडल रिपोर्ट के जरिये नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण मिला. तब इस आरक्षण के खात्मे लिए वर्ण-व्यवस्था का सुविधाभोगी वर्ग नए सिरे से उठ खड़ा हुआ.उसने आरक्षण के खात्मे के लिए तरह –तरह के उपाय किये,जिसमें सबसे कारगर रही 24 जुलाई ,1991 से लागू नवउदारवादी अर्थनीति. और आज इस अर्थनीति को हथियार बनाकर वह आरक्षण को लगभग पूरी तरह कागजों की शोभा बनाने के बाद मंडल उत्तरकाल में संगठित वर्ग-संघर्ष में अपनी विजय का पताका फहरा चुका है.’ यह बातें आज पालिका कम्युनिटी हॉल,मऊ में आयोजित तेरहवें ‘डाइवर्सिटी डे’ समारोह में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच.एल.दुसाध ने विषय प्रवर्तन करते हुए कही.

उन्होंने आगे कहा कि जब शासक वर्गों ने नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर तेजी से आरक्षण का खात्मा करना शुरू किया, तब 12-13 जनवरी ,2002 को भोपाल में आयोजित ऐतिहासिक कांफ्रेंस से डाइवर्सिटी समर्थक दलित बुद्धिजीवियों ने नौकरियों में आरक्षण से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में हिस्सेदारी की लड़ाई के लिए आरक्षित वर्गों के बुद्धिजीवी, एक्टिविस्टों और नेताओं को आह्वान किया पर, वे उसकी लगातार अनदेखी करते रहे.वे आज भी ‘आरक्षण बचाओ’की लड़ाई में समाज को उलझाये हुए हैं.फलस्वरूप उनकी नाक के नीचे से शासक वर्गों ने आरक्षण को धीरे-धीरे ख़त्म सा कर दिया है .किन्तु डाइवर्सिटी समर्थक बुद्धिजीवी अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में हिस्सेदारी की वैचारिक लड़ाई लगातार लड़ते रहे. उनके प्रयासों से कई राज्यों में ठेकों,सप्लाई,डीलरशिप, आउट सोर्सिंग जॉब में आरक्षण लागू हुआ. आज जबकि शासक वर्गों ने बहुजनों को नये सिरे से गुलामी की ओर ठेल दिया है, जरुरत है कि पूरा आरक्षित वर्ग सर्वशक्ति से सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई में उसी तरह कूद पड़े, जैसे अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सारे भारतीय कूद पड़े थे. आज बहुजनों के समक्ष भारत के स्वाधीनता संग्राम की भांति संपदा-संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रह गया है.’

तेरहवें डाइवर्सिटी डे के अवसर पर सबसे पहले मुख्य अतिथि विद्या गौतम ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत किया. उसके बाद गढ़वा, समस्तीपुर, पटना, देवरिया, गोरखपुर, गाजीपुर, भागलपुर,बनारस इत्यादि सहित देश के विभिन अंचलों से आये अतिथियों ने बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर और महापंडित राहुल सांकृत्यायन की तस्वीरों पर माल्यार्पण कर उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया. बाद में एक-एक करके सभागार में उपस्थित लोगों ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धा व्यक्त किया.पुष्पार्पण के बाद मंच संचालक डॉ. रामबिलास भारती ने डाइवर्सिटी डे के अवसर पर किताबों के विमोचन की घोषणा की. इस अवसर पर ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ इंडिया’ के रूप में विख्यात बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच.एल.दुसाध की डाइवर्सिटी इयर बुक:2018-19 , हकमार वर्ग(विशेष सन्दर्भ:आरक्षण का वर्गीकरण), धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए सर्वव्यापी आरक्षण की जरुरत (विशेष सन्दर्भ: अमेरिकी और दक्षिण अफ़्रीकी आरक्षण) तथा 21वीं सदी में कोरेगांव जैसी चार किताबों का विमोचन हुआ. पुस्तक विमोचन के बाद डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर की घोषणा की गयी. इस सम्मान के लिए सुपर्सिद्ध पत्रकार-लेखक महेंद्र नारायण सिंह यादव, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार डॉ.लाल रत्नाकर तथा वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र प्रताप सिंह के नामों की घोषणा हुई.इनमें सिर्फ सत्येन्द्र प्रताप सिंह ही सशरीर उपस्थित होकर सम्मान ग्रहण कर सके.

चर्चा के लिए निर्दिष्ट विषय ‘धन-दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे की रणनीति’ पर विचार रखने का क्रम पथरदेवा पीजी कॉलेज के डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी से शुरू हुआ.उन्होंने जोर देकर कहा कि नौकरियों में आरक्षण से आगे बढ़कर सम्पूर्ण भागीदारी का सवाल खड़ा करना आज की सबसे बड़ी जरुरत है और यह काम पूरे देश में ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ ही कर रहा है. इस संगठन द्वारा सुझाये जा रहे उपाय के तहत यदि समस्त क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विवधता लागू हो जाय तो देश और बहुजन समाज की सारी समस्यायों का हल स्वतः हो जायेगा. तमाम क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होने से सर्वसमाज का समवेत विकास और सुदृढ़ीकारण हो जायेगा,जो देश को विभेदीकरण से मुक्तकर देश की अखंडता को चिरकाल के लिए मजबूती प्रदान कर देगा.समस्तीपुर से आये सोशल एक्टिविस्ट मन्नू पासवान ने कहा कि देश का बहुजन बहुत ही संकट ही संकट से जूझ रहा है. शासकों ने नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर हमारा सब कुछ ख़त्म कर दिया है. राहत की बात है कि इस संकट में बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़े लेखक-चिन्तक के रूप में उभरे एच.एल.दुसाध हमारे बीच हैं. दुसाध जी ने इस संकट की घड़ी में डाइवर्सिटी का एजेंडा सामने लाकर हमें इस हालात से उबरने का रास्ता सुझा दिया है. जरुरत इस बात है की है कि हम डाइवर्सिटी को जनांदोलन का रूप दें. सिवान से आये युवा लेखक राजवंशी जे.ए.आंबेडकर ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की रणनीति पर आलोकपात करते हुए कहा कि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन ने सही समय पर धन-दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे का अभियान छेड़ा है. शासकों ने जिस तरह आरक्षण को कागजों की शोभा बनाकर बहुजनों को गुलामी की ओर ठेल दिया है, इस किस्म के आन्दोलन की निहायत ही जरुरत थी.लेकिन इस लड़ाई को लड़ते हुए हमें कुछ ऐसी योजना बनाना पड़ेगा, जिससे इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे.

बलिया के प्रखर वक्ता आर.के .यादव ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे का आन्दोलन चलाने के लिए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच. दुसाध को साधुवाद देते हुए कहा कि आज धन का न्यायपूर्ण बंटवारा सबसे बड़ा सवाल है. इसके लिए दलित, आदिवासी,पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों को नए सिरे से संगठित होने की जरुरत है. अगर नहीं संगठित हुए तो विदेशी मूल का शासक वर्ग हमारा बचा-खुचा भी ख़त्म कर देगा. इसलिए धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के आन्दोलन को कामयाब बनाने के लिए मूलनिवासियों की एकता पर पहले से कहीं ज्यादा जोर देना पड़ेगा. देवरिया से आये शिक्षा अधिकारी शिवचन्द्र राम ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की बहुत जोरदार शब्दों में हिमायत की. उन्होंने कहा आरक्षण बचाने की लड़ाई अब बेमानी हो चुकी है. अब जरुरत नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि अर्थोपार्जन की ए टू जेड समस्त गतिविधियों में ही आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई लड़ने की है. इतिहास की पुकार है कि बहुजन समाज पूरी ताकत से सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई के लिए कमर कसे. कानपुर से आये प्राख्यात बहुजन लेखक के. नाथ ने कहा कि आज बड़ी जरुरत अपने आन्दोलनों की आत्म-समीक्षा करने की है. बाबा साहब के जाने के बाद उनका मिशन पूरा करने के लिए मैदान में उतरे आधिकांश संगठन ब्राह्मणवाद के खात्मे को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया पर, क्या हम इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी हासिल कर पाए? नहीं! बाद में मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जब शासक दल निजीकरण, उदारीकरण,विनिवेशीकरण की दिशा में जोर-शोर से आगे, हमारे कई संगठन और नेता आरक्षण बचाने की लड़ाई में कूद पड़े . आज भी हमारे तमाम संगठन आरक्षण बचाने तथा निजीक्षेत्र में आरक्षण बढ़ाने में मशगूल हैं. पर क्या हम कुछ कामयाब भी हुए? आज आंकडे बताते हैं कि 10% टॉप की आबादी का 90% से अधिक धन-संपदा पर कब्ज़ा हो चुका है और नीचे की 60% आबादी सिर्फ 4% से थोड़े से अधिक धन पर गुजर–बसर करने के लिए मजबूर है . जो आरक्षण दलितों की उन्नति और बचे रहने का आधार था, आज वह लगभग नहीं के बराबर रह गया है . इसलिए अतीत के अनुभवों से सबक लेते हुए ज़रूरी है कि हम बाकी चीजें भूलकर संपदा-संसाधनों में भागीदारी के लिए ताकत लगायें. इसके लिए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का दस सूत्रीय एजेंडा हमारे काम आ सकता है. यदि इस एजेंडे को लागू करव्वाने में हम कामयाब हो गए तो दलित,आदिवासी ,पिछड़े और अल्पसंख्यक न सिर्फ खुद को गुलाम होने से बचा सकते हैं, बल्कि संपदा-संसाधनों में उचित हिस्सेदारी हासिल कर अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित कर सकते हैं. अगर स्वाधीनता संग्राम की भांति अर्थोपार्जन के तमाम क्षेत्रों अपने शेयर की लड़ाई न लड़कर, सिर्फ आरक्षण बचाने में जुटे रहे तो हमारा बचा-खुचा शेष होना बिलकुल तय है.

अंत में मुख्य अतिथि विद्या गौतम,जिन्होंने देश की हर ईंट में भागीदारी के लिए 46 दिनों तक भूख हड़ताल करके एक इतिहास रचा है, ने जोरदार शब्दों में आह्वान किया कि आरक्षण बचाने की लड़ाई धोखा साबित हुई है.ऐसे लोगों के कारण ही बाबा साहेब का दिया हुआ आरक्षण दम तोड़ने जा रहा है. आज जरुरत इस बात की है कि बहुजनों का बच्चा- बूढा-जवान, औरत-मर्द उसी शिद्दत के साथ डाइवर्सिटी की लड़ाई लड़ें जैसे अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी. उन्होंने आंकड़ों के सहारे बताया कि नौकरी में हमारी हिस्सेदारी मात्र 3.95% है .आज भी 1.8% एससी/एसटी के लोग उच्च शिक्षा में हैं. 2018 में दलित बेरोजगारों की तादाद 8 करोड़ है. 54.71% दलितों के एक गज भी जमीन नहीं है. कैसे करेंगे आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी का खात्मा; कैसे होगा समाज का विकास ?इसलिए हमारे सामने मात्र एक विकल्प रह गया है, और वह है आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी.इसके लिए शक्ति के सभी स्रोतों में न्यायपूर्ण बंटवारा ही एक मात्र विकल्प है,जिसमें मुख्य रूप से सभी सरकारी टेंडर में हमारी हिस्सेदारी हो.मूलनिवासी दलित ,आदिवासी ,पिछड़े तभी प्रगति कर सकेंगे, जब प्रगति के सभी रास्तों में हिस्सेदारी हो. इसका यही रास्ता है कि उद्योगपति,सप्लायर, डीलर,ठेकेदार,पत्रकार,फिल्मकार इत्यादि बनने की चाह हमारे लोगों में पैदा हो. हमें इस मुद्दे को पोलिटिकल पार्टियों को चुनावी मुद्दों में शामिल करवाने के लिए विशेष रूप से संघर्ष चलाना होगा. आदरणीय दुसाध साहब की किताबें हम सबके लिए एक रास्ता हैं मंजिल तक पहुँचने के लिए.मैं साधुवाद दूंगी दुसाध साहब को जिन्होंने आपनी किताब डाइवर्सिटी इयर बुक:2018-19 में हमारे संघर्षों को महत्वपूर्ण स्थान दिया है.

शेष में गढ़वा से आये अशर्फीलाल बौद्ध ने सभी अतिथियों तथा बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के इस वार्षिक आयोजन को सफल बनाने में अपेक्षित सहयोग के लिए बहुजन कल्याण परिषद्/महाबोधि समाज सेवा समिति एवं भारतीय एकता परिषद्, डॉ.सी.पी.आर्य, लालचंद राम को धन्यवाद दिया. अंत में उन्होंने उपस्थित लोगों से निवेदन किया कि एच.एल.दुसाध ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे का जो अभियान छेड़ा है, उसे पूरा करने के लिए हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम की भांति संघर्ष चलाना होगा. यहाँ से संकल्प लेकर जाइए कि आप अपने-अपने इलाके में लोगों बहुजनों की आजादी की इस नयी लड़ाई से जोड़ेंगे. हम लोग 18 आदमी गढ़वा से चलकर आये हैं. इनकी ओर से मैं आश्वस्त करता हूँ कि झारखण्ड में लड़ाई को हमलोग आगे बढ़ाने के लिए मान्यवर एच.एल. दुसाध और विद्या गौतम को शीघ्र ही अपने इलाके में बुलाएँगे.

तेरहवें डाइवर्सिटी डे आयोजन में देश के विभिन्न अंचलों से आये डाईवर्सिटी समर्थक लेखक, छात्र-गुरुजन और एक्टिविस्टों ने शिरकत किया, जिनमें अतिथि वक्ताओं के अतिरिक्त दयानाथ निगम, चंद्रभूषण सिंह यादव , केसी भारती,हरिवंश प्रसाद,डॉ.राहुल राज, इकबाल अंसारी, वसीम अख्तर,लालचंद राम,राजीव रंजन, मुंद्रिका बौद्ध इत्यादि प्रमख रहे.मंच का सफल संचालन डॉ.राम बिलास भारती के नाम रहा.

डॉ.कविश कुमार

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इटली के इस आलीशान रिज़ॉर्ट में हो रही है, दीपिका-रणवीर की शादी

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नई दिल्ली। बॉलिवुड की सबसे रोमांटिक जोड़ी दीपिका-रणवीर 14 नवंबर को शादी के बंधन में बंधने जा रही है. इटली के जिस विला में इनकी शादी हो रही है, उसकी कीमत 8 से 10 लाख रुपये पर नाइट है. बताते हैं कि बॉलिवुड ही नहीं हॉलिवुड सिलेब्रिटीज के बीच भी यह हॉट डेस्टिनेशन है. आइए देखते हैं क्‍या है इस डेस्टिनेशन की खास बातें और इटली में कहां स्थित है यह डेस्टिनेशन…

दीपिका-रणवीर ने अपनी शादी के लिए इटली के लेक कोमो को चुना है. यहां के विला देल बालिबियानेलो को उनकी डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए चुना है और इसे खूबसूरती से सजाया जा रहा है.

लेक कोमो में कई विला हैं, जो अपनी खूबसूरती के लिए बहुत मशहूर हैं. मगर विला देल बालिबियानेलो को इटेलियन आर्किटेक्‍चर के बेहतरीन नमूने के तौर पर जाना जाता है. सिलेब्रिटीज की चहल-पहल के कारण इस लोकेशन की कड़ी सुरक्षा रहती है.

खूबसूरती की बात करें, तो इस विला में लेक कोमो के इतिहास, ग्लैमर और प्राकृतिक सुंदरता का बहुत ही सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है.

यह विला चारों ओर से पानी से घिरा है जिसकी वजह से यह आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन जाता है. इस विला में पहुंचने के लिए ढाई किलोमीटर लंबा घुमावदार रास्ता तय करना पड़ता है.

विला देल बालिबियानेलो में कई रिज़ॉर्ट हैं. यह आपके ऊपर निर्भर है कि आप कौन सा सिलेक्‍ट करते हैं. इनकी कीमत 8000 से 10000 यूरो के बीच है. जो भारतीय करंसी में करीब 6. 59 lakh to Rs 8.29 lakh पड़ती है.

केवल बॉलिवुड सिलेब्रिटीज के बीच ही नहीं हॉलिवुड सिलेब्रिटीज का भी यह फेवरिट डेस्टिनेशन है. जॉर्ज क्‍लूनी और किम करदाशियां जैसी सिलेब्रिटीज के लिए यह हॉलिडे होम के जैसा है.

लेक कोमो अपनी खूबसूरत लोकेशंस और यहां के साल भर रहने वाले सुहावने मौसम के कारण सिलेब्रिटीज के बीच हॉट डेस्टिनेशन बन चुका है.

मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी की सगाई भी लेक कोमो के ही एक रिजॉर्ट में की गई थी.

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औरंगज़ेब के विरुद्ध हिन्दू विरोधी होने के झूठे आरोप को झुठलाते ऐतहासिक तथ्य

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जब मैं इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 से 1953 तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया, जो सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद को लेकर था.. मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे.. एक ने कुछ ऐसे दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे.. इनमें मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे..बादशाह ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था.. मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जैसा क्रूर शासक, जो मन्दिरों को तोडने के लिए कुख्यात है, उसने एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दी कि यह पूजा और भोग के लिए दी जा रही है.. वो बुतपरस्ती के साथ कैसे अपने को शरीक कर सकता था..

मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा, जो अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे.. मैंने दस्तावेज़ उनके सामने पेश कर दिए.. उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं. इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाड़ी शिव मन्दिर की फाइल लाने को कहा, जिसका मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था.. जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी..

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया..डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के विभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के प्रदान किये वो फ़रमान हों, जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें..

अब मेरे सामने आश्चर्य का जखीरा खड़ा था.. क्योंकि मुझे उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें प्राप्त हुईं..

यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे.. इन दस्तावेजों से प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने औरंगज़ेब के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का गलत रुख सामने लाया गया है.

औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ..ये दोनों महानुभाव औरंगज़ेब के विषय में अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे.. मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और बुरी तरह बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर का सच्चा पक्ष सामने ला रहे हैं..

औरंगज़ेब पर हिन्दू दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है.. 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था.. इसे पहली बार ‘एशियाटिक सोसाइटी’ नामके बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था..फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया..तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से ओझल रह जाता है..

यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानीय अधिकारी के नाम भेजा था, जो एक ब्राहमण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था.. वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे.. फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है. अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बरबाद नहीं किया जाय, अलबत्ता नए मन्दिर ना बनाए जाएँ.

हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहमणों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं. इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहमणों को इनके पुराने पदों से हटा दें. यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है. इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी ना करे और ना उन स्थानों के ब्राहमणों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे. ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें. इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये.’’

इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरुद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया. पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया. इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था.

यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है. बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें.

यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की है कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था. अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं. अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका ना सके, और ना उनके मामले में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें. इस फरमान पर तुरंत अमल किया जाए.’’

(तारीख-17 रबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान. वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था.

इन फरमानों में एक जंगम लोगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से सामने आया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया था कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है. उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदाद की मिल्कियत का अधिकार प्रमाणित हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल ना होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिए हमारे दरबार में ना आना पडे.

इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है. इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली रबीउल अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दिया गया. फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई.

पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है. अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई. ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसी प्रकार की दखलंदाज़ी ना होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपनी देख-रेख कर सकें.’’

इस फ़रमान से केवल यही पता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाभ नहीं बरता था. जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है.

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की. फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं. एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले. ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है. हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहमणों एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना करने में लग जाएं.

हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों को अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जाए और ना उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए.’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था. असम का उमानन्द मंदिर..

हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है, जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहमण नाम है. असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके. जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया.

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर..

हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्णुता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है. यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है. इसके लिए काफ़ी दिनों से प्रतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाता था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा. औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया.

इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है, जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था. (5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था. वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया है कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर (अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ. इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में

मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की.

साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं.

काशी विश्वनाथ का मन्दिर क्यों तोड़ना पड़ा..

निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था. विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहाँ क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी. औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया. रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका. जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा. आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है. उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी. उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे. यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था.

राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया. चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की. उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है. अतः विश्वनाथ जी की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफतार कर लिया जाए.

डाक्टर पट्ठाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है. पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा.पी.एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है.

मस्ज़िद तोड़ने की घटना…

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा, जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालुगज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे. कुछ ही वर्ष में यह रक़म करोड़ों की हो गई. तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी. जब औरंगज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए. अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया.

ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था. ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं. आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोडने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं.

स्रोत-पुस्तेक का नाम: भारतीय संस्कृति और मुग़ल साम्राज्य • लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय Read it also-मंदिर और मूर्तियों में रुचि रखने वाले शूद्रों(पिछड़ों) और आम महिलाओं से एक विनम्र सवाल!

बसपा ने जारी की 42 नामों की तीसरी सूची

जयपुर। बसपा ने सोमवार रात 42 प्रत्याशियों की तीसरी सूची जारी की. इससे पहले 19 उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं. ऐसे में बसपा ने कुल 61 प्रत्याशियों घोषित किए हैं. इस सूची में जातीय समीकरणों व सोशल इंजीनियरिंग का प्रयास किया गया है, ताकि बसपा का प्रत्याशी बीजेपी-कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकें.

उधर, ये सूची जारी करने वाले बसपा प्रदेश अध्यक्ष सीताराम मेघवाल ने कहा कि किसी भी दूसरे दल के साथ गठबंधन को तैयार नहीं है. इसकी ऑफिशियल घोषणा मंगलवार को कर दी जाएगी. गौरतलब है कि हनुमान बेनीवाल लगातार ये दावा कर रहे थे कि उनके द्वारा गठित तीसरे मोर्चे में बसपा भी शामिल होगी. इसके लिए यूपी में अंतिम दौर में वार्ता की जा रही हैं.
बसपा के घोषित उम्मीदवार
विधानसभा सीट     प्रत्याशी
सूरतगढ़ डूंगरराम गेदर
बीकानेर पश्चिम नारायण हरि लेगा
लूणकरणसर पवन कुमार ओझा
सुजानगढ़ सीताराम नायक
झुंझुनूं राजेश सैनी
मंडावा अनवर खां
गढ़ी चेतनलाल मइडा
बांसवाड़ा शांति देवी
बागीदोरा गणेशलाल कटारा
कुशलगढ़ छगनलाल पारगी
डूंगरपुर अमृतलाल आहारी
चौरासी विजयपाल रोत
सागवाड़ा दलजीत
चित्तौडगढ़ अल्लाउद्दीन खान
माण्डल शिवलाल गुर्जर
भीलवाड़ा शंकरलाल सैन
डीग- कुम्हेर प्रताप सिंह महरावर
नदबई जोगेंद्र सिंह अवाना
नगर वाजिब अली
वैर अतर सिंह पगारिया
बांदीकुई भागचंद सैनी
मालपुरा नरेंद्र सिंह आमली
करौली लाखन सिंह मीना
सपोटरा इंजीनियर हंसराम मीना
सवाई माधोपुर हंसराज मीना
सिकराय फैलीराम बैरवा
टोंक मोहम्मद अली
धौलपुर पं. किशनचंद शर्मा
बाड़ी रामहेत कुशवाह
अलवर रामगढ़ लक्ष्मण चौधरी
बयाना सुनील कुमार जाटव
झालरापाटन श्रीगयास अहमद
भरतपुर जसवीर सिंह
दौसा गोपाल मीना
निवाई बनवारी लाल बैरवा
बसेड़ी उदयवीर सिंह
अलवर ग्रामीण रिंकी शर्मा
तिजारा होशियार सिंह यादव
गंगापुर आर.के. मीना
चाकसू गजानंद खटीक
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शहरों/ नगरों /सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति नई तो नहीं है किंतु ….

आज के दौर में हम केवल भारतीय नहीं रह गए हैं. वैसे पहले भी हम कभी भारतीय नहीं रहे. भारतीय समान को जातियों में विभाजित कर देना इस देश की जनता के सिर सबसे बड़ा कलंक है. देश आजाद हुआ तो देश की जनता राजनीतिक खैमों में विभाजित हो गई. कोई कांग्रेसी तो कोई भाजपाई, कोई सपाई तो कोई कुछ…..होता चला गया और आज सद्विचारों की सहमति के बजाय खैमेंबाजी से सहमति का दौर चल रहा है. दरअसल हम स्वस्थ विचारधारा के नहीं, अपितु राजनीतिक मानसिकता के गुलाम होकर रह गए हैं. हम सोचते हैं कि वो राजनीतिक दल जिससे हम मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं, वो जो भी कुछ अच्छा-बुरा करता है, अपने चहेतों के लिए ठीक ही करता है. और आपके पसंदीदा राजनेता आपकी निजी रुचि के विषय धर्म, जाति, समाज को राजनैतिक मुद्दा बनाकर सत्ता सुख की सीढ़ियों पर चढ़ जाते हैं. इन राजनीतिक दलों को इस बात से कुछ लेना-देना नहीं कि किसी भी शहर/नगर/सड़क का नाम बदलने में सरकारी खजाने से भारी रकम खर्च होती है और लाखों- करोडो के ठेके नेताओ के अपने सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों, अनुयाइयों में बांट दिए जाते हैं. नाम बदलने का सिलसिला भी राजनीति के रोजगार का जरिया बन गया है.

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि सरकार केवल मदारी की भूमिका में होती है, उसे कटोरा थामना पड़े या कटोरा छिनना पड़े, हर हाल  पैसे कमाने से मतलब है…., वो ऐसा खेल ही दिखायेगी जिससे जनता पैसे के साथ साथ ताली भी बजाए… और हम वही कर रहे हैं…

शहरों/नगरों/सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति के चलते, गए दिनों में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के चलते हुए तीन बड़े नाम बदले गए हैं| मुगल सराय स्टेशन का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया तो इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखा गया| (2018) दीवाली के एक दिन पहले ही सीएम योगी आदित्याथ ने फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या कर दिया है. पता नहीं … अब अयोध्या का क्या नाम होगा? इस तरह अब महाराष्ट्र के शहर उस्मानाबाद और औरंगाबाद के नाम बदलने की भी मांग की जा रही है. अब हैदराबाद का नाम बदलने की बात सामने आई है तो कल अहमदाबाद का नाम बदलने की बात होगी, इसमें शंका की कोई जगह नहीं है. बताते चलें कि ताजा खबर है…भाजपा द्वारा शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया को विश्वभर में तिरछी निगाह से देखा जा रहा है. लेकिन भाजपा, खासकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके सिपहसालार आए रोज इस बारे में कोई न कोई बयान देते ही जा रहे हैं और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आँख और मुंह दोनों बन्द किए हुए है. विदित हो कि अब मुज्जफरनगर, आगरा, आजमगढ़, अलीगढ़ आदि अन्य शहरों के नाम बदलने की बात सामने आई है. अब इसमें योगी आदित्यनाथ का कोई दोष थोड़े ही है… वो तो हैं ही योगी. भला एक योगी को शासन-प्रशासन चलाने की कला से क्या लेना-देना? जो कर सकते हैं, कर रहे हैं.

शहरों/नगरों/सड़कों का नाम बदलने का राजनीतिक इतिहास कोई नया नहीं है. सिद्धार्थ झा के अनुसार विलियम शेक्सपियर ने एक बार कहा था- ‘नाम में क्या रखा है?  किसी चीज का नाम बदल देने से भी चीज वही रहेगी. गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, गुलाब ही रहेगा.’ कम से कम मैं तो शेक्सपीयर की बात से इसलिए सहमत हूँ कि यदि भारत का नाम बदलकर ‘अमेरिका’ रख दिया जाए तो क्या भारत अमेरिका हो जाएगा? … नहीं…कतई नहीं.

लेकिन आज की भाजपा सरकार को नाम प्रासंगिक हो उठा है, इसलिए भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश की बहुत ही ख्यातिप्राप्त चिर-परिचित जगह का नया नामकरण किया गया है. मुगलसराय एक ऐसा ही नाम है जिससे देशी ही नहीं, विदेशी भी भली-भांति परिचित हैं, क्योंकि यहां से न सिर्फ उनके लिए काशी का रास्ता जाता है बल्कि सारनाथ की ख्याति इसे दूर-दूर तक लोकप्रिय करती है. इसका नाम अब ‘दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन’ कर दिया गया है. मुगलसराय स्टेशन का नाम संस्कृति, इतिहास और सभ्यता को दर्शाता है. ये काशी का अहम हिस्सा है. मुगलसराय के इतिहास में अगर हम झांकें तो इसमें हमारे अतीत की खुशबू महकती है जिसको भारत से अलग करना कठिन है. भले ही राष्ट्रवाद के दौर में हम सांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर मुगलिया इतिहास की अनदेखी करें लेकिन नाम बदलने से जज्बात नहीं बदला करते… यह हरेक को जान लेने की बात है.

अतीत के झरोखों में झांकें तो मुगलसराय कभी भी सिर्फ एक स्टेशन भर नहीं रहा. मुगल साम्राज्य के दौर में अक्सर लोग पश्चिम-दक्षिण से उत्तर-पूरब जाते वक्त शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित ग्रांड ट्रंक रोड का इस्तेमाल करते थे. दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में जीटी रोड पर दूरी को दर्शाने वाली कोस-मीनारें अब भी मौजूद हैं, जो दिशा और किलोमीटर बताती थीं. ये सड़क बेहद अहम थी व ढाका से पेशावर, कोलकाता-दिल्ली व अम्बाला-अमृतसर को जोड़ती थीं….तो क्या ये भाजपा सरकार जी. टी. रोड का नाम बदलेगी या इसे नेस्तोनाबूद करके नई सड़क बनाने का काम करेगी. … यह भी तो शेरशाह सूरी ने ही द्वारा बनवाई गई थी.

अब बात करते हैं कि मुगलसराय स्टेशन का नाम राष्ट्रवादी चिंतक और जनसंघ नेता के नाम पर क्यों रखा गया है? साल 1968 में इसी स्टेशन पर दीनदयाल उपाध्याय की लाश लावारिस हालत में मिली थी. जेब में 5 रुपए का मुड़ा-तुड़ा नोट और एक टिकट था और इसके अलावा कोई पहचान नहीं थी. स्टाफ लावारिस लाश समझकर अंतिम संस्कार करने जा रहा था लेकिन तभी किसी ने पहचान लिया और फिर अटलजी और सर संघसंचालक गोवलकर जी आए और दिल्ली ले जाकर इनका अंतिम संस्कार किया गया. उनकी मृत्यु एक राज ही रही…. क्यों, कैसे हुई? इस पर से पर्दा आज तक भी नहीं उठ पाया है. भाजपा इस वर्ष (2018) को दीनदयाल शताब्दी वर्ष मना रही है और उनको सम्मान देने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को ये सुझाव दिया जिसको केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया गया. अब क्योंकि राजनीति की सेहत कमजोर पड़ती जा रहा है, सो विभाजनकारी राजनीति अपने चरम पर है….विभाजनकारी राजनीति ही भाजपा की शक्ति है. किंतु आज लोगों में इस विभाजनकारी राजनीति के प्रति काफी रोष तो है किंतु विपक्ष का एकजुट होना अति-आवश्यक है. किंतु भाजपा सरकार और भाजपा के विभाजनकारी नेता इस नाम बदलाव की प्रक्रिया को अति महत्त्वपूर्ण समझ रहे हैं, शायद यह उनकी सबसे बड़ी भूल होकर उभरेगी, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है.

ऐसा भी नहीं है कि पहली बार किसी शहर/नगर/सड़क का नाम बदला गया हो. नाम बदलने का लंबा इतिहास है. कभी राज्यों, कभी शहरों तो कभी सड़कों का…नाम बदलने का काम हमेशा होता ही रहा है. सड़क-मुहल्लों की गिनती नहीं कर पा रहा नगर निगम का जो भी आका होता है, वो मनमानी करता रहता है. आसपास नजर दौड़ाएंगे तो तमाम पार्षदों के मां-बाप, रिश्तेदारों के नाम पर सड़कें मिल जाएंगी. राज्यों या शहरों का नाम बदलने के लिए केंद्र की स्वीकृति लेनी होती है. किंतु आज की तारीख में ऐसा कतई भी देखने को नहीं मिल रहा. विगत में नाम बदलने की प्रक्रिया किसी न किसी प्रकार पारदर्शी होती थी और साम्प्रदायिक मसलों के आधार पर तो कतई नहीं होती थी, किंतु आज का सत्य ये है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया एक खास द्वेश के कारण की जा रही है और वह है ‘हिन्दू…मुसलमान’ का द्वेश-राग.

उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत में साल 1950 में सबसे पहले ‘पूर्वी पंजाब’ का नाम ‘पंजाब’ रखा गया. 1956 में ‘हैदराबाद’ से ‘आंध्रप्रदेश’, 1959 में ‘मध्यभारत’ से ‘मध्यप्रदेश’ नामकरण हुआ. सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ… 1969 में ‘मद्रास’ से ‘तमिलनाडु’, 1973 में ‘मैसूर’ से ‘कर्नाटक’, इसके बाद ‘पुडुचेरी’, ‘उत्तरांचल’ से ‘उत्तराखंड’,  2011 में ‘उड़ीसा से ओडिशा’ नाम किया गया. लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती. मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, शिमला, कानपुर, जबलपुर लगभग 15 शहरों के नाम बदले गए. सिर्फ इतना ही नहीं, जुलाई 2016 में मद्रास, बंबई और कलकत्ता उच्च न्यायालय का नाम भी बदल दिया गया. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इससे मिलते-जुलते नामों से बदलाव किया गया है. अब तक शहरों का नाम नेताओं के नामों पर करने की कवायद नहीं की गई थी… हां! कांग्रेस और अन्य दलों की सरकारों ने नए प्रतिष्ठानों के नाम जरूर नेताओं के नाम पर रखे किंतु किसी भी पुराने शहर/नगर/सड़क के नाम नेताओं को श्रेय देने के नाम पर नहीं बदले. संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है. एयरपोर्टस/ रेलवे स्टेशंस के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे गए हैं. हैरत की बात तो ये है कि  मुगलसराय में स्टेशन के साथ-साथ नगर निगम का नाम भी बदल दिया गया.

विदित हो कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में जो भी परिवर्तन किए जाते है, ज्यादातर बदलाव राजनीतिक कारणों से किए जाते हैं…. लेकिन कुतर्क ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करने की दीए जाते हैं …और कुछ नहीं. नाम बदलने से सरकारों को फायदा ये होता है कि उन्हें कम समय में सुर्खियां बटोरने को मिल जाती हैं, दूसरा गंभीर विषयों से जनता का ध्यान भटकाना होता है…. 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा का यह हथकंडा कितना काम आएगा यह तो समय ही बताएगा … किंतु भाजपा की कोशिश तो यही है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन के जाल में फंसाकर जनता को अपनी असफलता के मुद्दे से भटकाकर अपना राजनीतिक उल्लू साध लिया जाए.

यूँ तो कांग्रेस की सरकार ने भी कुछ ऐसे काम किए थे. आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के समय में ‘कनाट प्लेस’ और ‘कनाट सर्कस’ का नाम बदलकर ‘राजीव चौक’ और ‘इंदिरा चौक’ कर दिया गया था. किंतु हुआ क्या…. इस बात को दो दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग ‘कनाट प्लेस’ को ‘कनाट प्लेस’ ही कहते हैं. अगर ‘कनाट प्लेस’ का नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं आई होती. भाजपा को इस प्रकरण से कुछ न कुछ तो सीख लेनी चाहिए ही कि नहीं? क्यों न शहरों/ नगरों/ सड़कों/ गलियों के नाम बदलने के लिए भी एक आयोग का गठन कर देना चाहिए? आखिर नाम बदलने के पीछे कोई तर्क-वितर्क तो होना ही चाहिए कि नहीं?

मै ये मानता हूँ कि हिन्दू और मुसलमान भारत की विरासत का अटूट हिस्सा हैं. नाम बदलने की इस प्रक्रिया के चलते समाज में फूट डालने की कोशिश, मुझे तो लगता है कि भाजपा के राजनीति को ही भारी पड़ेगी. अब आप कहेंगे कि मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए कई जिलों के नाम बदले थे, हाँ! मैं मानता  उस पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं? स्मरण रहे कि मायावती ने किसी भी शहरों/नगरों/सड़कों के नाम तो कतई नहीं बदले थे, अपितु समाज को एक करने वाले महानायकों के नाम पर केवल और केवल नए नामों से जिले भर ही बनाए थे. जबकि भाजपा भारतीय समाज में विभाजनकारी संदेश पहुँचाने वाले लोगों के नाम पर शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन का काम करने पर उतारू है. यह प्रक्रिया देश के लिए हितकारी नहीं है, सो शहरों/नगरों/सड़कों के नए सिरे से  नामकरण की राजनीति बंद होनी चाहिए.

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नक्सलियों के गढ़ में वोटिंग के लिए लगी लंबी कतारें

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पहले चरण के विधानसभा चुनावों के तहत 18 सीटों के लिए मतदान जारी है. दोपहर एक बजे तक 25.15 फीसदी वोटिंग हो चुकी है. नक्सलियों की धमकी का लोगों पर कोई असर नहीं है और मतदान केंद्रों के बाहर लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं. सोमवार सुबह 7 बजे से शुरु हुई वोटिंग शाम तीन बजे तक होगी जबकि कुछ केंद्रों पर यह शाम पांच बजे तक चलेगी. नक्सली धमकियों और हमलों के बीच हो रहे मतदान में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं.

आठ नक्सल-प्रभावित जिलों की जिन 18 सीटों पर वोटिंग हो रही हैं उनमें बस्तर, दंतेवाड़ा और मुख्यमंत्री की सीट राजनांदगांव जैसे इलाके शामिल हैं. इन इलाकों से पिछले 10 दिनों के अंदर 300 आईईडी बरामद हो चुकी हैं. राजनांदगांव जिले के मोहला-मानपुर, कांकेर जिले के अंतागढ़, भानुप्रतापपुर और कांकेर, कोंडागांव जिले के केशकाल और कोंडागांव, नारायणपुर जिले के नारायणपुर, दंतेवाड़ा जिले के दंतेवाड़ा, बीजापुर जिले के बीजापुर तथा सुकमा जिले के कोंटा विधानसभा में सुबह सात बजे से दोपहर तीन बजे तक वोट डाले जाएंगे.

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केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार का 59 की उम्र में निधन

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बेंगलुरु। केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार का सोमवार तड़के चार बजे यहां निधन हो गया. वे 59 साल के थे. कुछ महीनों से फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थे. अक्टूबर में न्यूयॉर्क से इलाज कराकर लौटे थे. दोबारा तबीयत बिगड़ने पर उन्हें बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया था. उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था. उनकी पार्थिव देह बेंगलुरु स्थित घर पर अंतिम दर्शन के लिए रखी गई है. वे 1996 से 2014 के बीच बेंगलुरु दक्षिण सीट से छह बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे सबसे युवा मंत्री थे. अनंत कुमार के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने शोक जताया. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा- “अनंत कुमार के निधन की खबर सुनकर बेहद दुख हुआ. उन्होंने भाजपा की लंबे अरसे तक सेवा की. बेंगलुरु उनके दिल और दिमाग में हमेशा रहा. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को साहस दे.”

आज राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा

केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, अनंत कुमार के निधन पर सोमवार को देशभर में राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा. वहीं, कर्नाटक सरकार ने राज्य में तीन दिन का शोक और सोमवार का अवकाश घोषित किया है. उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा. अनंत के पास दो विभागों का प्रभार था

मोदी सरकार में कुमार के पास दो मंत्रालय की जिम्मेदारी थी. वे 2014 से रसायन एवं उर्वरक मंत्री थे. इसके अलावा उन्हें जुलाई 2016 में संसदीय मामलों की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. अनंत कुमार वाजपेयी सरकार में मार्च 1998 से अक्टूबर 1999 तक नागरिक उड्डयन मंत्री भी रहे. उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को बेंगलुरु में हुआ था. उन्होंने केएस ऑर्ट कॉलेज हुबली से बीए किया था. इसके बाद जेएसएस लॉ कॉलेज से एलएलबी की थी. उनके परिवार में पत्नी तेजस्विनी, दो बेटियां ऐश्वर्या और विजेता हैं.

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अल्पसंख्यक शोधार्थी से मारपीट करने एवं जान से मारने की धमकी की शिकायत

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मैं आबिद रेजा पीएचडी जनसंचार सत्र: 2018-19 का महात्मा गा.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा का शोधार्थी हूँ. मैं कक्ष सं. 67 में रहता हूँ. दिनांक 07/11/2018 को तक़रीबन 12:45 बजे. जैसे ही मैं गोरख पाण्डेय छात्रावास में प्रवेश कर अपने कक्ष स. 67 की ओर जानी वाली सीढीओं पर कुछ सीढी ही चढा था. जब तक कि राम सुंदर कुमार(पीएचडी शोधार्थी, सत्र: 2018-19) ने मेस से निकलते हुए आवाज़ देना शुरू कर दिया. तुम्हारे यहाँ पैसा बकाया है क्यों नहीं दे रहे हो. उसके आवाज़ देने और मेरे सीढी चलने की गति इतनी थी जब तक मैं सामने कुछ सीढीयों पर चढ़ चुका था और राम सुंदर कुमार भी पीछे की सीढ़ी पर चढ़ते हुए कहने लगा कि तुमने मेस का पैसा नहीं दिया है. मैंने कहा कि मैंने पाँच सौ रुपए दिये हैं और तक़रीबन 300 सौ के आस-पास जो भी होगा दे देता हूँ. उसने कहा कि नहीं तुम अभी दो फिर मैंने कहा कि मैं कमरे में जा रहा हूँ और पैसा लाकर देता हूँ और अभी मैंने खाना भी नहीं खाया है. जब तक पैसे के लिए उसने मेरी शर्ट की कालर पकड़ ली और जबर्दस्ती करने लगा और अशोभनीय और अभद्रता करने लगा जबकि मैंने उसे छुड़ाने की कोशिश की तो उसने धका देते हुए मुझे मेरे सर के बायां माथे पर घुसा मारकर ख़ून बहा दिया और लात घुसा चलाने लगा. फूटे हुए माथे का विडियो और तस्वीर मेरे पास मौजूद है. इस घटना की आवाज़ सुनते ही तमाम लोग इस घटना शरीक होकर बीच-बचाव करा दिए. इसके पूर्व में भी कहा था देखों मेरा संबंध असामाजिक तत्वों के साथ भी है जब चाहूँ तुम्हें कुछ अनहोनी करा सकता हूँ. और इस घटना के दूसरे दिन यानि आठ तारीख को कहा कि पाकिस्तान है तू और पाकिस्तान क्यों नहीं जा रहे हो. गाय के नाम पर तुम्हें मारना पड़ेगा. अगर तुमने कहीं शिकायत की तो देखना मैं क्या करता हूँ. इस भय से और उसके गुंडा प्रवृति के कारण मैं इस घटना के बाद और डरा हुआ हूँ. मानसिक रूप से परेशान हूँ और मुझे ऐसा लगता है धार्मिक उन्माद के नाम पर मेरी जान ली जा सकती है. मेरी दिनचर्या भी प्रभावित है. मैं  विश्वविद्यालय प्रशासन से निवेदन किया है मेरी सुरक्षा दी जाए. क्योंकि मैं असुरक्षित महसूस कर रहा हूँ. जिससे मेरी शिक्षण व्यवस्था सुचारु रूप से व्यवस्थित हो सके.
आबिद रेज़ा

असली ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान की कहानी

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भारत में 19वीं सदी में जिन ठगों से अंग्रेज़ों का पाला पड़ा था, वे इतने मामूली लोग नहीं थे. ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और पुख़्ता जानकारी 1839 में छपी किताब ‘कनफ़ेशंस ऑफ़ ए ठग’ से मिलती है. किताब के लेखक पुलिस सुपरिटेंडेंट फ़िलिप मीडो टेलर थे लेकिन उन्होंने ‘इसे सिर्फ़ कलमबंद किया है.’ दरअसल, साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का ‘कनफ़ेशन’ यानी इक़बालिया बयान है. फ़िलिप मीडो टेलर ने आमिर अली से जेल में कई दिनों तक बात की और सब कुछ लिखते गए. टेलर के मुताबिक, “ठगों के सरदार ने जो कुछ बताया, उसे मैं तकरीबन शब्दश: लिखता गया, यहां तक कि उसे टोकने या पूछने की ज़रूरत भी कम ही पड़ती थी.”

अब हम आपको बताते हैं कि आखिर कैसे थे असली ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान’.

टेलर ने लिखा है, “अवध से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था, उन्हें पकड़ना इसलिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वे बहुत ख़ुफ़िया तरीके से काम करते थे. उन्हें आम लोगों से अलग करने का कोई तरीका ही समझ नहीं आता था. वे अपना काम योजना बनाकर और बेहद चालाकी से करते थे ताकि किसी को शक न हो.”

उनके अपने रीति-रिवाज़, विश्वास, मान्यताएं, परंपराएं, उसूल और तौर-तरीक़े थे जिनका वे बहुत पाबंदी से धर्म की तरह पालन करते थे. उनकी अपनी एक अलग ख़ुफ़िया भाषा थी जिसमें वे आपस में बात करते थे. इस भाषा को रमासी कहा जाता था. गिरोह में हिन्दू और मुस्लिम दोनों होते थे.

चाहे हिंदू हों या मुसलमान, ठग शुभ मूहूर्त देखकर, विधि-विधान से पूजा-पाठ करके अपने काम पर निकलते थे, जिसे ‘जिताई पर जाना’ कहा जाता था. ठगी का मौसम आम तौर पर दुर्गापूजा से लेकर होली के बीच होता था. तेज़ गर्मी और बारिश में रास्तों पर मुसाफ़िर भी कम मिलते थे और काम करना मुश्किल होता था. जिताई पर जाने से सात दिन पहले से ‘साता’ शुरू जाता था. इस दौरान ठग और उनके परिवार के सदस्य खाने-पीने, सोने-उठने और नहाने-हज़ामत बनाने वगैरह के मामले में कड़े नियमों का पालन करते थे.

साता के दौरान बाहर के लोगों से मेल-जोल, किसी और को बुलाना या उसके घर जाना नहीं होता था. इस दौरान कोई दान नहीं दिया जाता था, यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली जैसे जानवरों को भी खाना नहीं दिया जाता था. जिताई से सफल होकर लौटने के बाद पूजा-पाठ और दान-पुण्य जैसे काम होते थे. ठगी और लूटपाट के लिए हत्याएं भी की जाती थीं। इसके लिए भी कुछ नियम थे। पहला नियम यह था कि क़त्ल में एक बूंद भी खून नहीं बहना चाहिए, दूसरे किसी औरत या बच्चे को किसी हाल में नहीं मारा जाना चाहिए, तीसरे जब तक माल मिलने की उम्मीद न हो, हत्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.

कैसे होती थी रास्ते पर ठगी: ——————– जिताई पर निकलने वाले ठगों का गिरोह 20 से 50 तक का होता था. वे आम तौर पर तीन दस्तों में चलते थे, एक पीछे, एक बीच में और एक आगे. इन तीनों दस्तों के बीच तालमेल के लिए हर टोली में एक-दो लोग होते थे जो एक कड़ी का काम करते थे. वे अपनी चाल तेज़ या धीमी करके अलग होते या साथ आ सकते थे. रास्ते में कई बार वो जरूरत के हिसाब से अपना रूप बदलते रहते थे। ठगों के सरदार आमतौर पर पढ़े लिखे इज़्ज़तदार आदमी की तरह दिखने-बोलने वाले लोग होते थे।

आमिर अली के मुताबिक ठगों के काम बंटे हुए थे. ‘सोठा’ गिरोह के सदस्य सबसे समझदार, लोगों को बातों में फंसाने वाले लोग थे जो शिकार की ताक में सरायों के आसपास मंडराते थे. वे आने-जाने वालों की टोह लेते थे, फिर उनके माल-असबाब और हैसियत का अंदाज़ा लगाकर उसे अपने चंगुल में फंसाते थे. शिकार की पहचान करने के बाद कुछ लोग उसके पीछे, कुछ आगे और कुछ सबसे आगे चलते. रास्ते भर धीरे-धीरे करके ठगों की तादाद बढ़ती जाती लेकिन वे ऐसा दिखाते जैसे एक-दूसरे को बिल्कुल भी नहीं जानते. अपने ही लोगों को जत्थे में शामिल होने से रोकने का नाटक करते थे ताकि शक न हो. हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं थी.

आखिरी हमला —————— सबसे आगे चलने वाले दस्ते में ‘बेल’ यानी कब्र तैयार करने वाले लोग होते थे. उन्हें बीच वाले दस्ते में से कड़ी का काम करने वाला बता देता था कि कितने लोगों के लिए कब्र बनानी है. पीछे वाला दस्ता नज़र रखता था कि कोई ख़तरा उनकी तरफ़ तो नहीं आ रहा. आख़िर में तीनों बहुत पास-पास आ जाते लेकिन इसकी ख़बर शिकार को नहीं होती थी.

कई दिन गुज़र जाने के बाद जब शिकार चौकन्ना नहीं होता था और जगह माकूल होती थी तब गिरोह को कार्रवाई के लिए सतर्क करने के लिए, बातचीत में पहले से तय एक नाम लिया जाता था. यह पहला इशारा था कि अब कार्रवाई होने वाली है. इसके बाद ठगों में सबसे ‘इज्ज़तदार’ लोगों की बारी आती थी जिन्हें ‘भतौट’ या ‘भतौटी’ कहा जाता था. इनका काम बिना खून बहाए रुमाल में सिक्का बांधकर बनाई गई गांठ से शिकार का गला घोंटना होता था. हर एक शिकार के पीछे एक भतौट होता था, पूरा काम एक-साथ दो-तीन मिनट में होता था. इसके लिए मुस्तैद ठग अपने सरगना की ‘झिरनी’ यानी आखिरी इशारे का इंतज़ार करते थे.

इशारा मिलते ही पलक झपकते भतौट शिकार के गले में फंदा डाल देते थे और दो-तीन मिनट में आदमी तड़पकर ठंडा हो जाता था. इसके बाद लाशों से कीमती सामान हटाकर उन्हें पहले से खुदी हुई कब्रों में ‘एक के सिर की तरफ़ दूसरे का पैर’ वाली तरकीब से कब्रों में डाल दिया जाता ताकि कम-से-कम जगह में ज्यादा लाशें आ सकें. इसके बाद जगह को समतल करके उसके ऊपर कांटेदार झाड़ियां जो पहले से तैयार रखी होती थीं, लगा दी जाती थीं ताकि जंगली जानवर कब्र को खोदने की कोशिश न करें. इस तरह पूरा का पूरा चलता-फिरता काफ़िला हमेशा के लिए ग़ायब हो जाता था और ठग भी.

बीबीसी हिन्दी में प्रकाशित राजेश प्रियदर्शी के लेख का अंश साभार प्रकाशित

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मृत्यु भोज नहीं करने को लिया शपथ

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अजमेर। चूरू जिले के अंबेडकर नगर, गांव न्यारा के मेघवाल समाज के लोगों ने एक राय होकर मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुरीति को त्यागने ने का संकल्प 7 नवंबर, 2018 दीपावली को लिया। लोगों का तर्क था कि किसी की मृत्यु पर भोज का आयोजन करना गलत परंपरा है। किसी के मरने पर मिठाई खाना कैसी परंपरा है। यह भी तय हुआ कि जो मृत्यु भोज करता हो उसके यहाँ कोई भी भोजन नहीं करेगा।

दरअसल समाज के भीतर काफी लंबे वक्त से मृत्यु भोज को लेकर बहस चली आ रही है। अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोग अक्सर इसका विरोध करते हैं। इसको खत्म करने के लिए कई स्तरों पर लगातार जागरूकता अभियान चलाया जाता है। जिसके बाद ऐसा देखने को मिल रहा है।

डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’

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संविधान दिवस के उपलक्ष्य में बरेली में भव्य आयोजन

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बरेली। संविधान दिवस के उपलक्ष्य में 11 नवम्बर को बरेली में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. लार्ड बुद्धा इण्टरनेशनल धम्म ट्रस्ट द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से होगा. एकदिवसीय बहुजन मैत्री एवं सामाजिक चिन्तन महासम्मेलन का विषय वर्तमान सामाजिक परिवेश में बुद्धिजीवीयों की भूमिका और समस्याओं के निदान में उनका योगदान होगा.

इस कार्यक्रम के मुख्य मार्गदर्शक के रुप में पूज्य भन्ते करुणाकर महाथेरा, सुमित रत्न थेरा और बोधिपिया तिस्सा जी उपस्थित रहेंगे. इसकी अध्यक्षता मा. धर्मप्रकाश भारतिय जी, पूर्व एम.एल.सी. बसापा, और इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. इन्दु चौधरी (प्रोफेसर बी.एच.यू.) होंगी.

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इस हिन्दू राष्ट्र में दलितों की यही नियति है!

भगवा झंडों वाला जो हिन्दू राष्ट्र आरएसएस बीजेपी निर्मित करने की फ़िराक में हैं, उसमें दलितों की क्या भूमिका होगी, कोई भूमिका होगी भी या नहीं अथवा उनके लिए कोई जगह भी नहीं होगी, उनको छिप छिप कर जीना पड़ेगा, इसके संकेत मिलने लगे है.

यह उन दलित युवाओं के लिए एक सबक भी है, जो बहुत उछल उछल कर हिन्दू संगठनों में हिस्सेदारी करते है, संघ की शाखाओं में जाते हैं, बजरंग दल के नारे लगाते है, भगवा पट्टा बांध कर अकड़ अकड़ कर घूमते है, विश्व हिंदू परिषद व अन्य हिंदूवादी संगठनों के मोहरे बनकर दंगे फसाद फैलाते है. इनकी औकात इस बहुचर्चित व बहुप्रतीक्षित हिन्दुराष्ट्र में क्या होगी, इसकी झलक भी अब मिलने लगी है.

भाजपा शासित राजस्थान में दक्षिणपंथी समूहों की प्रयोगशाला है भीलवाड़ा, इसके रायला थाना क्षेत्र के भैरु खेड़ा (सुरास) गांव में 14 लोगों का एक ‘हिदू युवा संगठन’ बनाया गया, जिसमें दो दलित युवा भी शामिल किए गए, इन दोनों दलित युवाओं से सदस्यता व गांव में लगाने के लिए बैनर बनवाने हेतु पैसा लिया गया, पर जैसे ही बैनर बन कर आया, गांव के गैरदलित हिंदुओं ने आपत्ति जता दी कि – ये ब्लाईट हिन्दू संगठन में क्या कर रहे हैं, अब इनके फ़ोटो लगेंगे गांव में? हमको इनके चेहरे देखने पड़ेंगे रोज?

अन्ततः जब गांव की शुद्र (ओबीसी) जातियों का विरोध बहुत मुखर हो गया तो रास्ता निकाला गया कि दोनों दलित युवाओं के फोटोओं पर टेप चिपका कर उन्हें छिपा दिया जाए, ताकि गांव के कथित ऊंची जाति के लोगों को इनकी शक्ल नहीं देखनी पड़े. हिन्दू युवा संगठन ने दलित युवाओं के फोटो हाईड करके जैसे ही पोस्टर चिपकाया, खबर दलित मोहल्ले तक भी पहुंची. दलित युवाओं के हिलोरें मारता नया नया हिन्दू जोश ठंडा पड़ गया, उसकी जगह आक्रोश ने ले ली.

8 नवम्बर 2018 की सुबह दलित युवा रामस्वरूप बलाई तथा गोरधन बलाई ने गांव में पहुंचकर इस बात पर आपत्ति जताई कि जब उन्हें हिदू युवा संगठन से जोड़ा गया और बैनर बनवाने के लिए पैसा लिया गया तो अब बैनर से उन्हें क्यों हाईड किया गया? केवल दलित युवाओं के चेहरों पर टेप क्यों चिपकाया गया, यह तो हमारा अपमान है.

दलित युवाओं की आपत्ति हिंदुत्व के नए रक्षक शूद्रों को अत्यंत नागवार गुजरी, उन्होंने दोनों दलित युवाओं को पहले तो जमकर जातिगत गालियां दी, उनको उनकी असली औकात बताई और बाद में हरफूल लौहार, नारायण गुर्जर, मुकेश लौहार व महावीर गुर्जर ने मिलकर इन दलित युवाओं के साथ मारपीट की, नारायण गुर्जर ने तो पथराव तक किया, जान से मारने की धमकी तक दे डाली.

जब इस मारपीट की खबर गांव के दलित मोहल्ले तक पहुंची तो नगजीराम बलाई नामक एक दलित युवा ने हिम्मत करके उपरोक्त बैनर को नीचे उतार दिया, एक दलित की ऐसी हिमाकत हिदू वीर कैसे सहन करते, पूरा गांव दलितों के खिलाफ एक जुट हो गया, दलितों के साथ गाली गलौज व धक्कामुक्की की गई तथा गांव छुड़वा देने की धमकी तक दे दी गयी.

पीड़ित दलित परिवारों ने बताया कि गांव में पूरी तरह हिदू आतंक व्याप्त है, यही स्थिति रही तो हमें गांव छोड़ना पड़ेगा.

इस घटनाक्रम परेशान दलितों ने रायला थाने में रिपोर्ट लिखवाई, लेकिन वहां से कार्यवाही के बजाय समझाईश की नसीहत देकर मामला रफा दफा करने की कोशिश की जा रही है, घटनाक्रम के तीन दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक मुकदमा दर्ज नहीं हो पाया है.

हिदू राष्ट्र के इस पोस्टर कांड के बाद से भैरु खेड़ा( सुरास) के दलित भय, दशहत व आतंक के साये तले जीने को विवश है, वहीं हिन्दू युवा संगठन का भगवा ध्वज शान से लहर लहर लहरा रहा है और दूसरे कोने पर मौजूद बजरंग बली अत्यंत गुस्से में दिख रहे है, यह बजरंगी आक्रोश दलितों को कितना नुकसानदायक होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता है.

भैरु खेड़ा (सुरास) जैसे लाखों गांव इस देश मे हैं, जहाँ पर दलित, आदिवासी व घुमन्तू समुदायों के करोड़ों युवाओं को जबरन हिन्दुराष्ट्र की भट्टी में झोंका जा रहा है, उनका जातिगत उत्पीड़न भी जारी है और धर्म की अफीम भी पिलाई जा रही है, शायद यही हिन्दू राष्ट्र में दलितों की नियति है. इस हिन्दू राष्ट्र में दलित, आदिवासी व घुमन्तुओं के लिए कोई जगह नहीं हैं.

भंवर मेघवंशी

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पीएम के लिए मायावती को मिला एक और बड़े नेता का समर्थन

नई दिल्ली। पीएम पद की रेस में बसपा अध्यक्ष मायावती को एक और बड़े नेता का समर्थन मिल गया है. छतीसगढ़ में बसपा के नए सहयोगी और जनता कांग्रेस के प्रमुख अजीत जोगी ने कहा है कि वो 2019 में मायावती को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस, मायावती की बीएसपी और वामदल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

अजीत जोगी ने अपने एक बयान में कहा, ‘हमने बहुजन समाज पार्टी और लेफ्ट के साथ गठबंधन किया है, गठबंधन की जीत होती है तो मैं मुख्यमंत्री बनूंगा, वहीं 2019 में पीएम पद के लिए मायावती एक बेहतर उम्मीदवार हैं. जोगी ने कहा मेरा भरोसा है कि एक गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई गठबंधन 2019 में बहुमत में आएगा. इसी से यह निश्चित होगा कि 2019 में कौन पीएम बनेगा, मेरी राय में चार बार सीएम रहीं मायावती इस पद के लिए बेहतर उम्मीदवार हैं.

जोगी ने बसपा के साथ अपनी पार्टी के गठबंधन को दो दिलों का मिलन कहा है. जोगी के मायावती को लेकर दिए बयान से 2019 में बसपा प्रमुख के पीएम बनने की उम्मीद को और बल मिला है. जोगी 5वे बड़े नेता हैं जिन्होंने पीएम पद के लिए मायावती के नाम का सीधा समर्थन किया है. इससे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी, पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नैशनल लोक दल के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला भी 2019 में मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बता चुके हैं.

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“व्हाट इज इन ए नेम”, अर्थात नाम में क्या रखा है

महान विद्वान सेक्सपियर ने लिखा है, “व्हाट इज इन ए नेम”, अर्थात नाम में क्या रखा है. बच्चा जब पैदा होता तब उसका नामकरण संस्कार किया जाता है. उसको एक नाम दिया जाता वही नाम उसकी पहचान बन जाती है यहाँ तक कि मरने के उपरांत भी व्यक्ति का नाम जिंदा रहता है. इतिहास गवाह है कि नाम और इज्जत के खातिर बड़ी बड़ी जंग लड़ी गयी है और किसी को अपने नाम को चमकाने की और किसी को दूसरे के नाम को मिटाने की प्रवृति लंबे समय से चली आ रही है. भारत में नाम एकसमान, काम एक समान होते हुए भी व्यक्ति की पहचान का पैमाना जाति और धर्म भी अहम हो जाता है. कुछ लोग इतिहास में दर्ज इसलिए हो जाते हैं कि ओ लिखने लायक कुछ काम कर गए होते है. एक अंग्रेजी की सूक्ति है कि there is nothing good or bad, but thinking makes it so” इस दुनिया मे ऐसे शासक हुए हैं उन्होंने जो सोचा ओ जनता पर थोप डाला. लेकिन भारत का प्राचीन इतिहास गौरव और शौर्य से भरा पड़ा है. विश्व की महानतम प्राचीन सभ्यताओं में मेसापोटामिया की सभ्यता के बाद भारत की सिंधुघाटी सभ्यता का अपना विशेष नाम है. इसको हड़प्पा की सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है.

अब तार्किक प्रश्न ये खड़ा होता है कि जिस सिंधु नदी के नाम पर इस सभ्यता का नाम इंदुस वैली civilisation पड़ा ओ सिंधु नदी पाकिस्तान में है. और ओ पाकिस्तान कभी भारत का अभिन्न अंग हुवा करता था. लेकिन आज भारत पाकिस्तान एक दूसरे के विलोम शब्द बन चुके हैं जैसे कि दिन का रात. जिस तरह से आजकल भारत में संस्थाओं,ऐतिहासिक धरोहरों, के नाम परिवर्तन का दौर चला है उसे देखकर लगता हमने सब कुछ हासिल कर लिया, सब कुछ पैदा कर लिया, हमने बेरोजगारी पर जीत पा ली, हमने भरस्टाचार पर जीत पा ली, हमने कुपोषण, भुखमरी पर जीत पा ली, हमने शत प्रतिशत साक्षरता हांसिल कर ली, हमने महिलाओं पर हो रहे जुल्म और शोषण पर जीत पा ली और सबसे अहम हमने हजारो वर्षों के कलंक जातिवाद जो कि आरक्षण की जननी कही जाती है उस जाति के बंधन से मुक्त हो गए है और अब सिर्फ नए सिरे से नामकरण की ही रश्म जैसे अब शेष रह गयी हो. इस नव युग के दो अवतार मोदी और योगी सिर्फ नामकरण की ही रस्म पूरी करने में लगे हों? हम देखते है नामों में बड़ी रोचकता भी और हैरानी करने वाले तथ्य भी छुपे हैं. जैसे किसी व्यक्ति का नाम अमर हो और ओ क्या अमर रहता है? सुखी राम से ज्यादा सुखी सायद दुखी राम रहता हो. बदलने का ही शौक है तो समाज की सोच बदली जाए.

अंधविस्वास और पाखण्ड को बदल जाये, पुरानी रूढ़ियों, पुरानी सड़ी गली मानसिकता को बदला जाए, किन कारणों से देश गुलाम हुवा उन कारणों को बदला जाए. महिलाओ के प्रति पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता और धरणाओं को बदल कर आधुनिकता की ओर सबको समान अवसर प्रदान करने की सोच विकसित की जाए. हैरानी होती है एक तरफ हम मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं और शोषण के लिए काफी चिंतित और उत्सुक प्रतीत हो रहे हैं तीन तलाक, की समस्या से उनको स्वतन्त्रता दिलाने में संसद से लेकर न्यायालय तक लड़ाई लड़ रहे है. लेकिन जिस न्यू इंडिया और सबका साथ सबका विकास की बात कर रहे है उस न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, में आज भी हिन्दू महिलाओ और हिन्दू दलितों के लिए मन्दिरों में प्रवेश करना मंगल ग्रह में प्रवेश करने से भी कठिन हो रहा है. आज भारती समाज को पुनर्जागरण की जरूरत महसूस होने लगी है. जिस प्रकार 19वीं सदी में कई कुप्रथाओ का अंत हुआ उसी प्रकार पुनः नवजागरण की आवस्यकता है. इतिहास को बदलकर हम अपने भविष्य को नहीँ बदल सकते है बेसक ऐतिहासिक गलतियों से अवश्य ही सबक लिया जाना चाहिए.

भविष्य की मजबूत इमारत वर्तमान की ज्वलन्त समस्यों पर विजय प्राप्त कर ही खड़ी की जा सकती है. नाम तो बहुत बदले गए है शहरों के, संस्थानों के, योजनाओ के, मगर उनकी कार्यशैली और स्वरूप नहीं बदला, नरेगा को मनरेगा करने से रोजगार में कोई क्रांतिकारी बदलाव अभी तक देखने को नहीं मिले है. किसान नरेगा में भी आत्महत्या कर रहे थे मनरेगा में भी, किसान इंडिया में भी उसी हाल में था जिस हाल में नई इंडिया में जी रहा है, दलित के लिए अछूतपन, भेदभाव वैदिक भारत मे भी था, आर्यव्रत में भी था, हिंदुस्तान में भी था,भारत में भी था और अब जब से न्यू इंडिया बनी है तब भी दलित शोषित और उपेक्षित ही है. इतना ही नहि गांधी ने दलितों को एक नया नाम दिया हरिजन लेकिन उस नामकरण से दलितों को अपने लिए गन्दी गाली समान लगने लग गयी और उस शब्द को असंवैधानिक करार दिया गया. उत्तराखंड राज्य गठन जब हुवा तब उत्तरांचल राज्य के नाम से हुआ इसका बाद में नाम उत्तराखंड कर दिया मगर हालत जो उत्तरांचल राज्य के थे वही हालात उत्तराखंड राज्य का भी है. पलायन, बेरोजगारी, उत्तरांचल राज्य में भी प्रमुख समस्या थी, उत्तराखंड राज्य में भी प्रमुख समस्या है. राजनीति से सत्ता तो परिवर्तित होती है मगर समाज को जगाने के लिए समाजसुधारकों की जरूरत होती है जो इस बक्त दिखता नहीं. सत्ता की भूख के आगे करोड़ो भूखे पेट तड़प रहे है. देश को 21वीं सदी के लिए तैयार करना है तो ध्यान, ज्ञान और विज्ञान के रास्ते पर चलना होगा  ताकि हम तकनीक और यंत्रों के समुन्द्र पार के देशों पर निर्भर न रहे.

लेखक:- आई0 पी0 ह्यूमन, (हल्द्वानी) नैनीताल, स्वतन्त्र स्तम्भकार, PGD, JMC Read it also- छत्तीसगढ़ चुनाव में कहां खड़ी है बसपा

यूपी में 2500 साल पुरानी बुद्ध मूर्ति मिली

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सिद्धार्थनगर शहर के बीचों बीच छठ घाट की साफ सफाई के दौरान जमुआर नदी से तथागत भगवान बुद्ध की प्राचीन मूर्ति मिली  है. मूर्ति के ढाई हजार साल पुरानी होने का अनुमान है. अष्टधातु की इस मूर्ति की कीमत लगभग 10 करोड़ आंकी गई है.

रविवार दोपहर नगरपालिका अध्यक्ष मो. जमील सिदृदीकी जमुआर नदी पर बने छठ घाट की सफाई करवा रहे थे. बताया जाता है कि मजदूर जब नदी में घुस कर उनके किनारों को साफ करने लगे तो उन्हें यह मूर्ति मिली. मौके पर मौजूद अध्यक्ष जमील सिदृदीकी ने मूर्ति देखा तो वह चौंक पड़े. वह बुद्ध की दो फीट उंची मूर्ति थी और काफी वजनी थी. उन्हें मूति की प्राचीनता और महत्व का अहसास हुआ तो फौरन इसकी खबर प्रशासन को दी गई. प्रशासनिक अमला आनन फानन में घाट पर पहुंच गया.अनुमान है कि उक्त मूर्ति नदी में बह कर आई होगी.

यह नदी गौतम बुद्ध के पिता की राजधानी प्राचीन कपिलवस्तु नदी से जुड़ी है.कपिलवस्तु बजहासागर के पास है. बजहा सागर का पानी जमुआर नदी में गिरता है. इसलिए संभव है कि बुद्ध के पुरातात्विक क्षेत्र से मूति नदी में बह कर यहां तक चली आई हो.

फिलहाल पुलिस विभाग ने इसे अष्टधातु की मूर्ति बताते हुए इसकी कीमत दस करोड़ आंका है और इसके ढाई हजार साल तक पुरानी होने की संभावना बताई जा रही है. मूर्ति को देखने के लिए मौके पर हजारों की भीड़ थी. समाचार लिखे जाने तक मूर्ति को प्रशासनिक संरक्षण में लेने की कार्रवाई चल रही थी.

इस बारे में नगरपालिका अध्यक्ष मो. जीमल सिदृदीकी ने कहा है कि प्रतिमा महत्वपूर्ण है. उसकी कलात्मकता देख कर बौद्ध काल के स्वर्णिम युग का इतिहास ताजा हो गया है.

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Thugs Of Hindostan बनी सबसे ज्यादा एडवांस बुकिंग वाली फिल्म

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नई दिल्ली। आमिर खान, अमिताभ बच्चन, फातिमा सना शेख और कैटरीना कैफ की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ रिलीज हो गई है. फिल्म को भले ही अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला, लेकिन फिल्म की पहले दिन की कमाई ने सबको चौंका कर रख दिया है. फिल्म ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श की रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म ने पहले दिन ने 52.25 करोड़ की कमाई कर ली है.

फिल्म के पहले दिन की कमाई के साथ फिल्म ने एक बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. दरअसल, सभी हिन्दी फिल्मों के पहले दिन के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को अगर देखें तो अब तक सबसे ज्यादा पहले दिन कमाने वाली फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ है. ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ के बाद दूसरे नंबर पर शाहरुख खान की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर है’. ‘हैप्पी न्यू ईयर’ ने पहले दिन 44.97 करोड़ रूपए की थी. तो वहीं तीसरे नंबर पर 41 करोड़ रूपए के साथ ‘बाहुबली 2’ है. वैसे बता दें कि फिल्म ने रिलीज के साथ ही कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम किए थे जिस वजह से भी फिल्म की कमाई इतनी ज्यादा हो पाई है.

सबसे ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज

जी हां, इस फिल्म को ग्लोबली करीब 7000 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया है. बता दें कि इससे पहले बाहुबली 2 को दुनियाभर में 6500 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था. इतनी ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज होने की वजह से भी फिल्म की कमाई इतनी ज्यादा हो पाई है.

सबसे ज्यादा एडवांस बुकिंग वाली फिल्म

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के 2 लाख टिकट पहले दिन के लिए एडंवास बुक हुए थे. ये अब तक की किसी बॉलीवुड फिल्म के लिए सबसे बड़ी एडवांस बुकिंग बताई जा रही है.

ये हैं 10 बॉलीवुड फिल्मों की पहले दिन की कमाई ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां         : 52.25 करोड़ हैप्पी न्यू ईयर                 : 44.97 करोड़ बाहुबली 2                     : 41 करोड़ प्रेम रतन धन पायो           : 40.35 करोड़ सुल्तान                        : 36.54 करोड़ धूम 3                         : 36.22 करोड़ संजू                            : 34.75 करोड़ टाइगर जिंदा है               : 34.10 करोड़ चेन्नई एक्सेप्रेस              : 33.12 करोड़ एक था टाइगर               : 32.93 करोड़. Read it also-दलित और महादलित वर्ग को ठगने का काम कर रही सरकार: मांझी

दलित बस्ती में घुसकर 5 हुड़दंगियों ने की मारपीट, खुखरी और तलवारें लहराईं

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सुंदरनगर। सुंदरनगर में कुछ हुड़दंगियों ने चमुखा पंचायत की दलित बस्ती में घुसकर हमला कर 3 लोगों से मारपीट की और सरेआम खुखरी और तलवारें लहराईं. इस दौरान बस्ती की डेढ़ दर्जन महिलाओं सहित ग्रामीणों ने उनका बचाव किया. मामले को लेकर सुंदरनगर एस.डी.एम. और सुंदरनगर पुलिस को शिकायत पत्र सौंपकर ग्रामीणों ने न्याय की गुहार लगाई है. चमुखा पंचायत के सिहली के मंगलवाणा निवासी हेम राज पुत्र रघु राम, राम लाल पुत्र रघु राम और टेक चंद पुत्र लोहारू राम ने कहा कि 5 नशेड़ी हुड़दंगियों ने अचानक उनके गांव मंगलवाणा में घुसकर कर हमला कर दिया. उन्होंने कहा कि पांचों हुड़दंगी तलसाई के रहने वाले हैं और उच्च जाति से संबंधित हैं. उन्होंने कहा कि दलित बस्ती मंगलवाणा में घुसकर पांचों ने जातिसूचक गालियां निकालीं और 3 लोगों से मारपीट करने लगे.

इस दौरान उन्होंने तीनों को जान से मारने की धमकी दी और खुखरी व तलवारें भी निकाल लीं लेकिन तब तक बस्ती की महिलाएं भी बचाव में भाग कर आ गईं, जिसे देख कर पांचों भाग कर कुछ दूरी पर एक मकान में घुस गए जबकि खुखरी और तलवार की म्यान वहीं गिर कर छूट गई. उन्होंने कहा कि मंगलवाणा बस्ती के ग्रामीणों ने मंगलवाणा की नाकाबंदी कर दी और रास्ते में काफी देर तक पहरा देते रहे, जिसे देख कर पांचों हुड़दंगी भागने में सफल हो गए. वहीं सुंदरनगर के तहसीलदार उमेश शर्मा ने बताया कि स्थानीय लोगों की शिकायत पर कार्रवाई कर मामले की जांच के पुलिस को आदेश दिए गए हैं. इस तरह की किसी भी हरकत को क्षेत्र में कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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