उत्तर प्रदेश में दलित छात्राओं के साथ बलात्कार और उन्हें जला दिए जाने जैसी बड़ी घटनाओं को लेकर बसपा मुखिया मायावती ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि प्रदेश में अपराधी बेखौफ हो गए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की वर्तमान सरकार में महिला सम्मान तो दूर, महिला सुरक्षा की लगातार बिगड़ती हुई स्थिति पर गहरी चिंता जताई।
बसपा मुखिया ने कहा, आगरा में छात्रा को जिन्दा जला देने व दूसरी छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटनाओं से स्पष्ट है कि प्रदेश में जघन्य अपराधी पूरी तरह से बेखौफ हो गए हैं। बुलंदशहर की हाल की भीड़ द्वारा हुई हिंसा की घटना में पुलिस अफसर की मौत के बाद आगरा की ताजा घटनाओं ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस व सरकार नाम की कोई चीज है भी की नहीं.
अपराधियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग करते हुए सुश्री मायावती ने कहा कि, आज हर पीड़ित परिवार समुचित न्याय नहीं मिल पाने के कारण भयभीत व आक्रोशित है। बुलंदशहर की हिंसा में शहीद हुए पुलिस अफसर एस.के. सिंह के मुख्य अभियुक्तों का आज लगभग तीन सप्ताह बाद भी गिरफ्तार नहीं हो पाना यह साबित करने को काफी है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी सरकार कानून-व्यवस्था के मामले में कितनी विफल साबित हो रही है.
बसपा प्रमुख के इस बयान के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को लेकर स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है। बसपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि इंसाफ नहीं मिलने तक सघंर्ष जारी रहेगा.
इसे भी पढ़ें-राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजों के क्या मायने है? छात्रा को जलाए जाने के खिलाफ मायावती ने खोला मोर्चो
उत्तर प्रदेश में दलित छात्राओं के साथ बलात्कार और उन्हें जला दिए जाने जैसी बड़ी घटनाओं को लेकर बसपा मुखिया मायावती ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि प्रदेश में अपराधी बेखौफ हो गए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की वर्तमान सरकार में महिला सम्मान तो दूर, महिला सुरक्षा की लगातार बिगड़ती हुई स्थिति पर गहरी चिंता जताई।
बसपा मुखिया ने कहा, आगरा में छात्रा को जिन्दा जला देने व दूसरी छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटनाओं से स्पष्ट है कि प्रदेश में जघन्य अपराधी पूरी तरह से बेखौफ हो गए हैं। बुलंदशहर की हाल की भीड़ द्वारा हुई हिंसा की घटना में पुलिस अफसर की मौत के बाद आगरा की ताजा घटनाओं ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस व सरकार नाम की कोई चीज है भी की नहीं.
अपराधियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग करते हुए सुश्री मायावती ने कहा कि, आज हर पीड़ित परिवार समुचित न्याय नहीं मिल पाने के कारण भयभीत व आक्रोशित है। बुलंदशहर की हिंसा में शहीद हुए पुलिस अफसर एस.के. सिंह के मुख्य अभियुक्तों का आज लगभग तीन सप्ताह बाद भी गिरफ्तार नहीं हो पाना यह साबित करने को काफी है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी सरकार कानून-व्यवस्था के मामले में कितनी विफल साबित हो रही है.
बसपा प्रमुख के इस बयान के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को लेकर स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है। बसपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि इंसाफ नहीं मिलने तक सघंर्ष जारी रहेगा.
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बजरंगबली की जाति को लेकर छिड़ा विवाद शांत नहीं हो रहा है। पहले उन्हें दलित, फिर आदिवासी, फिर मुसलमान बताने के बाद जाट बताया जाने लगा है। उत्तर प्रदेश के धर्मार्थ कार्य मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने हनुमान को जाट बताया है। अजब बात यह है कि चौधरी ने यह बयान विधान परिषद में दिया। बकौल चौधरी, ‘जो दूसरों को दिक्कत मे देखकर कूद पड़ता है, वह जाट ही हो सकता है. इसलिए हनुमान जाट थे।‘
कमाल यह है कि कुछ ही दिन पहले भाजपा के ही एक विधायक बुक्कल नवाब ने हनुमान की जाति को लेकर अनोखा बयान दिया था। बीजेपी विधायक के मुताबिक हनुमान मुस्लिम थे. अब इसके लिए भाजपा विधायक द्वारा दिए गए तर्क को भी सुनिए। बुक्कल नवाब के मुताबिक हनुमान के मुस्लिम होने के कारण ही मुसलमानों के नाम रहमान, रमजान, फरहान, सुलेमान, सलमान,जिशान और कुर्बान जैसे नाम रखे जाते हैं.
तो वहीं केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सोंघ ने हनुमान को आर्य बताया तो बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद गोपाल नारायण सिंह ने तो यह तक कह दिया कि हनुमान तो बंदर थे और बंदर पशु होता है,जिसका दर्जा दलित से भी नीचे होता है. वो तो राम ने उन्हें भगवान बना दिया. ध्यान देने वाली बात यह है कि हनुमान की जाति और धर्म को लेकर दिया गया हर बयान भाजपा नेताओं द्वारा ही दिया गया है।
सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 नवंबर को राजस्थान के अलवर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए हनुमान को दलित बताया था. उन्होंने कहा था कि हनुमान वनवासी, वंचित और दलित थे. उनके इस बयान के बाद देश भर में सियासी गलियारों में जमकर विरोध हुआ।
इसके बाद देश के कई हिस्सों में स्थित हनुमान मंदिरों पर दलितों ने कब्जा करना शुरू कर दिया था। और दलित संगठनों की ओर से हर हनुमान मंदिर का पुजारी किसी दलित को बनाने की मांग उठने लगी।
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महागठबंधन: मायावती के जन्मदिन पर हैं अब सबकी निगाहें
लखनऊ। बीएसपी प्रमुख मायावती लोकसभा चुनाव से पहले अपना जन्मदिन बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी कर रही हैं. सूत्रों का कहना है कि 15 जनवरी को अपने जन्मदिन पर मायावती कई विपक्षी दलों के नेताओं को मंच देकर अपनी ताकत दिखा सकती हैं. ऐसे में अब सबकी निगाहें इस पर लगी हैं कि बीएसपी सुप्रीमो इस मौके पर गठबंधन का ऐलान करती हैं या नहीं. साथ ही यह देखना भी दिलचस्प होगा कि उस गठबंधन में कांग्रेस शामिल होगी या नहीं.
गठबंधन का ऐलान करने से पहले एसपी-बीएसपी को 5 राज्यों के नतीजों का इंतजार था. इन नतीजों के बाद बीएसपी प्रमुख मायावती और एसपी मुखिया अखिलेश ने यह साफ भी कर दिया है कि फिलहाल उनकी कांग्रेस से दूरी बनी रहेगी. कांग्रेस ने विपक्षी एकता और अपनी ताकत दिखाने के लिए मध्य प्रदेश व राजस्थान में विपक्ष के नेताओं को जुटाया था. उसमें मायावती और अखिलेश यादव नहीं शामिल हुए थे. ममता बनर्जी, एचडी देवगौड़ा, अभय चौटाला सहित कई नेता भी शामिल नहीं हुए थे. देवगौड़ा और चौटाला पहले से मायावती के साथ हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि ये तो मायावती के मंच पर रहेंगे ही.
श्रोत:- नवभारत टाइम्स इसे भी पढ़ें-लोकसभा में भी ऐसे ही रहा तो ये होंगे नतीजेIIT रुड़की में दलित छात्रा का यौन उत्पीड़न

आईआईटी रूड़की में एक दलित पीएचडी छात्रा की शिकायत पर हरिद्वार पुलिस ने 3 प्रोफेसरों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है. छात्रा ने आरोप लगाया था कि तीनों ने उसका शारीरिक और मानसिक शोषण किया था. इस मामले की जांच के लिए पुलिस ने एसआईटी का गठन किया था. हरिद्वार पुलिस ने बताया था कि जांच में यह पता चला है कि पीड़िता के सारे आरोप सही नहीं हैं लेकिन आरोपियों के खिलाफ मामला बनता है. उत्पीड़न को लेकर लोगों में आक्रोश फैल गया था और कैंपस के बाहर प्रदर्शन भी हुए थे.
आईआईटी रुड़की में 3 महिलाओं ने जहां 7 फैकल्टी मेंबर यौन शोषण के आरोप लगाए थे, वहीं नैनोटेक्नॉलजी सेंटर की एक दलित स्कॉलर ने भी 3 सीनियर फैकल्टी मेंबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. इस मामले की जांच के लिए पुलिस ने SIT का गठन किया था. आरोप था कि 3 फैकल्टी सदस्यों ने पीएचडी गाइड होने के नाते पहले दलित स्कॉलर का यौन शोषण किया और फिर उसे जातिसूचक शब्द भी कहे.
एसएसपी हरिद्वार एसएसपी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कनखल उपाधीक्षक की अगुवाई में एसआईटी की गठन किया था. एसआईटी ने छात्र-छात्राओं, प्रोफेसरो और स्टाफ से पूछताछ की. पीड़ित छात्रा से भी टीम ने बात की. इस जांच में यह बात सामने आई कि छात्रा के सभी आरोप सही नहीं हैं. पीड़ित छात्रा के खराब व्यवहार की शिकायत भी की गई थी. इसके बाद उसने माफी भी मांग ली थी.
छात्रा ने सुपरवाइजर को बदलने का भी आवेदन किया था. इसके बावजूद उसके आरोपों में दम है. इसे देखते हुए कोतवाली रुड़की में 3 प्रोफेसरों के खिलाफ यौन उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. पुलिस के मुताबिक इनके खिलाफ 509, 354, एससी-एसटी एक्ट और 352 के तहत केस दर्ज किया गया है. मामला जांच अधिकारी को सौंप दिया गया है.
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई हिंसा पर राज्य के पूर्व नौकरशाहों ने योगी सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया है. करीब 83 रिटायर्ड नौकरशाहों ने बुलंदशहर हिंसा के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस्तीफा मांगा है. अपने खुले खत में रिटायर्ड अफसरों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ ने बुलंदशहर हिंसा को गंभीरता से नहीं लिया. इसके अलावा वह सिर्फ गोकशी केस पर ध्यान दे रहे हैं.
आपको बता दें कि पूर्व नौकरशाहों का ये खत तब सामने आया है जब बुलंदशहर हिंसा की जांच SIT ने पूरी कर ली है. जांच में खुलासा हुआ है कि हिंसा से पहले गोकशी हुई थी. इस आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस्तीफा मांगने वालों में पूर्व अफसर बृजेश कुमार, अदिति मेहता, सुनील मित्रा जैसे बड़े अफसर शामिल हैं. अफसरों ने आरोप लगाया कि बुलंदशहर हिंसा को राजनीतिक रंग दिया गया है. आपको बता दें कि ये खुला खत सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहा है, इसमें दावा किया गया है कि 83 अफसर इनके साथ हैं.
अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने इससे पहले भी कई मसलों पर खुला खत लिखा है. बुलंदशहर हिंसा को लेकर उन्होंने कहा कि एक पुलिस वाले की भीड़ द्वारा हत्या किया जाना बहुत दर्दनाक है, इससे राज्य की कानून व्यवस्था पर कई तरह के सवाल खड़े होते हैं. उन्होंने अपील की है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए और हिंसा से जुड़े पूरे मामले की जांच होनी चाहिए.
सरकार और मोदी की आलोचना पर पत्रकार पर लगा एनएसए
मणिपुर के एक पत्रकार को बीजेपी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करना महंगा पड़ गया. उसे मंगलवार को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत एक साल तक हिरासत में रखने की सजा सुनाई गई है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 39 वर्षीय किशोर चंद्र वांगखेम को पहले 27 नवंबर को हिरासत में लिया गया था. उन्होंने फेसबुक पर एक वीडियो के जरिये मुख्यमंत्री बीरेन सिंह और साथ ही पीएम मोदी की कथित तौर पर आलोचना की थी.
बताया जा रहा है कि सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचना का मामला एक माह पुराना है. दरअसल, पत्रकार वांगखेम ने अपने फेसबुक पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जयंती पर एक वीडियो अपलोड किया था, जिसमें उन्होंने मणिपुर की बीजेपी सरकार की आलोचना की थी.
वीडियो में कथित तौर पर पत्रकार वांगखेम ने मुख्यमंत्री के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी. पत्रकार ने अंग्रेजी और मेइती भाषा में कई वीडियो अपलोड किए थे. इस वीडियो में वांगखेम ने कहा था, ‘मैं दुखी और हैरान हूं कि मणिपुर की सरकार लक्ष्मीबाई की जयंती (19 नवंबर को) मना रही है. मुख्यमंत्री यह दावा करते हैं कि भारत को एकता के सूत्र में पिराने में झांसी की रानी का योगदान था. लेकिन, मणिपुर के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया.’
उन्होंने राज्य की बीजेपी सरकार पर यह आरोप लगाया था कि मणिपुर सरकार ऐसा केवल इसलिए कर रही है क्योंकि केंद्र सरकार ने इसके लिए कहा है. उन्होंने इसे मणिपुर के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान बताया और हिंदुत्व की कठपुतली बताते हुए पीएम नरेंद्र मोदी और मणिपुर के सीएम पर अपमानजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया.
कोर्ट ने कहा राजद्रोह नहीं, फिर भी NSA के तहत फिर गिरफ्तार हुए….
यह वीडियो सामने आने के बाद पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम को 20 नवंबर को गिरफ्तार कर लिया गया. हालांकि, 26 नवंबर को वेस्ट इंफाल की सीजेएम कोर्ट ने उन्हें 70 हजार के बॉन्ड पर जमानत दे दी. जमानत के वक्त कोर्ट ने यह भी कहा कि, पत्रकार की टिप्पणी भारत के प्रधानमंत्री और मणिपुर के मुख्यमंत्री के खिलाफ अपने विचार की अभिव्यक्ति थी, लेकिन इसे राजद्रोह नहीं का जा सकता.
कोर्ट के कहने के बावजूद अगले ही दिन 27 नवंबर को पत्रकार वांगखेम को एनएसए के तहत फिर गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया. इस बार वेस्ट इंफाल के जिला न्यायाधीश ने एक नया ऑर्डर जारी किया और कहा कि, अगले आदेश तक पत्रकार को एनएसए 1980 के सेक्शन 3(2) के तहत हिरासत में रखना चाहिए. फिर दोबारा उन्होंने नए आदेश जारी किए जिसमें यह कहा गया है कि पत्रकार को 12 महीनों तक हिरासत में रहना होगा.
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नई दिल्ली। बच्चों के सामान बनाने वाली कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन पर भारत में संकट आ सकता है. खबरों के मुताबिक अमेरिका में इस कंपनी के पाउडर में ऐसे केमिकल मिले थे जिससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है. इस रिपोर्ट के बाद मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्रालय ने बैठक की और देशभर में जॉनसन एंड जॉनसन की फैक्ट्रियों के सैंपल जब्त करने का आदेश दिया.
रिपोर्ट में दावा किया गया कि जॉनसन एंड जॉनसन के अधिकारियों को भी ये बात पता था कि ये बेबी पाउडर खतरनाक है, लेकिन उन्होंने इसे छिपाए रखा. हालांकि कंपनी ने इस दावे को बेबुनियाद बताकर इसे साजिश करार दिया है. सूत्रों के मुताबिक अब भारत में ड्रग रेगुलेटर के अधिकारी इस कंपनी के पाउडर सैंपल जब्त करेंगे, जिसके बाद इसकी जांच की जाएगी.
आपको बता दें अमेरिका की इस दिग्गज फार्मा कंपनी के बेबी पाउडर में कैंसरकारक केमिकल एसबेस्टस होने का खुलासा हुआ है. रॉयटर्स की एक इंवेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनी को भी इस बारे में लंबे समय से जानकारी थी. रिपोर्ट के मुताबिक साल 1971 से साल 2000 तक टेस्ट के दौरान बेबी पाउडर में कई बार एसबेस्टस मिला था.
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दिल्ली। दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 सदस्यों की मौत के राज से पर्दा उठ गया है. बिसरा रिपोर्ट के मुताबिक बुराड़ी कांड में मारे गए किसी भी सदस्यप के पेट से कोई जहरीला पदार्थ नहीं मिला है. इसी के साथ रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आत्म हत्याई से पहले कुछ लोगों ने खाना खाया था लेकिन कुछ लोग भूखे थे. इस पूरे मामले की जांच क्राइम ब्रांच की टीम कर रही है. बिसरा रिपोर्ट आने के बाद यह साफ हो गया है कि परिवार के 11 लोगों ने एक साथ आत्मीहत्या की थी.
दिल्ली के बुराड़ी इलाके के संतनगर में एक घर से एक साथ 11 लाशें मिलने के मामले में हर दिन नई-नई बातें सामने आ रही थीं. पूरा परिवार ‘मोक्ष प्राप्ति’ और मृत पिता से मिलने के लिए तंत्र-मंत्र और कथित धार्मिक अनुष्ठान कर रहा था. मोक्ष प्राप्ति की एक प्रक्रिया के तौर पर परिवार ने मास सुसाइड किया. इसके लिए परिवार के दो सदस्यों घर के बगल वाली फर्नीचर की शॉप से प्लास्टिक के स्टूल और तार खरीदे थे.
ललित के कहने पर बाकी लोगों ने लगाई फांसी
पुलिस का कहना है कि घर का छोटा बेटा होने की वजह से ललित भाटिया अपने पिता भोपाल सिंह का लाड़ला था और उनके बेहद करीबी था. पिता की मौत का असर उसपर सबसे ज्यादा पड़ा. ललित सदमे में था. पास-पड़ोस के लोगों ने पुलिस को बताया कि एक हादसे में ललित की आवाज चली गई थी. काफी इलाज के बाद आवाज नहीं लौटी. तब से वह अपनी बातें लिखकर बताने लगा. परिवार के करीबियों के मुताबिक, इसी दौरान ललित ने परिवार को बताया कि पिता भोपाल सिंह उसे दिखाई देते हैं और बातें करते हैं.
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लखनऊ। पिछड़ी जातियों को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार नया फार्मूला तैयार करने की राह पर है. सरकार ने अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाने की बात कहते हुए यह फार्मूला तय किया है. नए फार्मूले में यादव और कुर्मी जाति को मिलने वाले आरक्षण को सीमित कर दिया गया है. हालांकि कमेटी की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन इसके कुछ हिस्से सामने आए हैं. इसके तहत ओबीसी को कोटा विद इन कोटा के तहत तीन वर्गों में बांटने की बात सामने आ रही हैं.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ओबीसी के भीतर उप-जातियों के वर्गीकरण के लिए इस समिति का गठन किया था, जिसके बाद यह रिपोर्ट सामने आई है. राघवेंद्र कमिटी के रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी जातियों को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को बांट दिया गया है. रिपोर्ट में चार सदस्यीय समिति द्वारा कथित तौर पर ओबीसी की संपन्न जातियों जैसे यादव और कुर्मी आदि को 7 फीसदी आरक्षण दिए जाने की बात कही गई है. बाकी 20 फीसदी आरक्षण अति पिछड़ी जातियों के कोटे में जाएगा. जस्टिस राघवेंद्र कुमार की अगुवाई वाली समिति ने ओबीसी की 79 उप-जातियों की पहचान की है. अब हम आपको बताते हैं कि किस जाति को किस वर्ग में रखा गया है और उसको कितना आरक्षण मिलेगा.
रिपोर्ट के मुताबिक संपन्न पिछड़ी जातियों में नौ जातियों को रखा गया है इनमें- यादव, अहिर, जाट, कुर्मी, सोनार, पटेल और चौरसिया सरीखी जातियां शामिल हैं. इनको 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देने का प्रस्ताव है.
जबकि अति पिछड़ा वर्ग में 65 जातियों को शामिल किया गया है उनमें- गिरी, गुर्जर, गोंसाई, लोध, कुशवाहा, कुम्हार, माली, शाक्य, तेली, साहू, सैनी, नाई और लोहार आदि जातियां हैं. इन जातियों को 11 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देने का प्रस्ताव है.
तीसरी कैटेगरी में 95 जातियों को शामिल किए जाने की बात सामने आई है. इनमें मल्लाह, केवट, निषाद, राई, गद्दी, घोसी, राजभर जैसी जातियां शामिल हैं. इनको 9 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई है.
इस रिपोर्ट की सिफारिशें सामने आने पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि देश में आबादी के हिसाब से आरक्षण हो. देश में जातियों के आधार पर जनगणना हो और उसके बाद तब आरक्षण का फार्मूला तय किया जाना चाहिए.
दरअसल राघवेंद्र कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण का ज्यादा फायदा कुछ चुनिंदा संपन्न जातियां ही उठाती रही हैं. ऐसे में कोटे के भीतर कोटा तय होना चाहिए, क्योंकि ओबीसी की बाकी 70 फीसदी जातियां अब भी आरक्षण के फायदे से वंचित है.
हालांकि, इस रिपोर्ट पर आखिरी फैसला योगी सरकार को लेना है. इस रिपोर्ट के मुताबिक आरक्षण के भीतर आरक्षण तय होगा या फिर सरकार इसमें कुछ संशोधन करेगी, यह तय होना फिलहाल बाकी है. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार तीनों वर्गों को 9-9 प्रतिशत आरक्षण देने पर विचार कर सकती है. योगी सरकार इस पर आखिरी फैसला कब लेती है, और क्या फैसला लेगी, यह आने वाला वक्त बताएगा. फिलहाल समिति की रिपोर्ट ने नई बहस तो छेड़ ही दी है.
Read it also-राहुल गांधी को पप्पू कहना भाजपा सांसद को पड़ा भारी, मांफी मांग भागना पड़ासिख दंगे के दोषी सज्जन कुमार का कांग्रेस से इस्तीफा
1984 के सिख विरोधी दंगे के आरोप में उम्रकैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. उम्रकैद की सजा पाए सज्जन कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सज्जन कुमार ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर बताया है कि मेरे खिलाफ आए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मद्देनजर मैं कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं.
सोमवार को आया था फैसला
बता दें कि 17 दिसंबर (सोमवार) को दिल्ली हाई कोर्ट ने सज्जन कुमार को दंगे का दोषी पाया था. हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए सज्जन कुमार को दोषी पाया और उम्रकैद की सजा सुनाई.
किन आरोपों में मिली सजा
सज्जन कुमार के ऊपर आपराधिक साजिश रचने का आरोप है. साथ ही हिंसा कराने व सिख विरोधी दंगे भड़काने के भी आरोप हैं, जिनमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को दोषी पाया है.
31 दिसंबर को करना होगा सरेंडर
सज्जन कुमार को 31 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने की मोहलत दी गई है. दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने बलवान खोखर, कैप्टन भागमल व गिरधारी लाल की उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी है.
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नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग के 12वें सीज़न के लिए नीलामी में कई खिलाड़ियों की किस्मत का ताला खुल गया है, जबकि कई खिलाड़ियों के हिस्से मायूसी आई है. आईपीएल में अब तक जिन खिलाड़ियों की नीलामी हुई है उनमें जयदेव उनादकट को सबसे ज़्यादा साढ़े आठ करोड़ रुपए में ख़रीदा गया है. राजस्थान रॉयल्स ने डेढ़ करोड़ रुपए के बेस प्राइस वाले जयदेव उनादकट को साढ़े आठ करोड़ में ख़रीदा है. इससे पहले एक करोड़ रुपए की बेस प्राइस वाले अक्षर पटेल को दिल्ली कैपिटल ने पांच करोड़ रुपए में ख़रीदा. जबकि युवराज सिंह को कोई खरीददार नहीं मिल सका है. कैंसर से जंग जीतने के बाद मैदान में वापसी करने वाले युवराज सिंह का बेस प्राइस एक करोड़ रुपए है. लेकिन अब तक युवराज को किसी ने नहीं ख़रीदा है. इसके साथ ही मार्टिन गुप्तिल और ब्रेंडन मैकुलम को भी अभी तक किसी टीम ने नहीं ख़रीदा है. शिमरॉन हेटमेयर की चांदी रही है. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने 50 लाख रुपए की बेस प्राइस वाले वेस्ट इंडीज़ के खिलाड़ी शिमरॉन हेटमेयर को 4.2 करोड़ रुपए में ख़रीदा है. इसके साथ ही 50 लाख बेस प्राइस वाले हनुमा विहारी को भी दो करोड़ रुपए में दिल्ली कैपिटल ने ख़रीदा है.
राहुल गांधी का मोदी पर एक और हमला
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर राहुल गांधी लगातार हमलावर बने हुए हैं. अपने नए बयान में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जब तक किसानों का कर्ज माफ नहीं करते, हम उन्हें सोने नहीं देंगे. दरअसल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के साथ ही कांग्रेस पार्टी उत्साह में दिख रही है. राहुल गांधी ने मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि तीन राज्यों में सरकार बनते ही उन्होंने छह घंटे के अंदर दो राज्यों में किसानों के कर्ज़ माफी की घोषणा कर दी. उन्होंने यह भी कहा कि तीसरे राज्य में वे घोषणा करने वाले हैं.
नरेंद्र गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार को साढ़े चार साल हो चुके हैं और पीएम मोदी ने किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं किया है. उन्होंने किसानों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप पसीना बहाते हैं. हम आपकी आवाज़ उठाते हैं.’ उन्होंने कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी किसानों का कर्ज़ माफ नहीं करेंगे हम उनको सोने नहीं देंगे.
राहुल गांधी ने कहा, ‘हमने दस दिन में कर्ज़ माफ करने का वादा किया था लेकिन हमने सिर्फ एक दिन में करके दिखा दिया. किसानों को उन्होंने भरोसा दिलाया कि कांग्रेस पार्टी बाकी सारी विपक्षी पार्टियों को लेकर आपके साथ खड़ी होगी. बता दें कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को हराकर कांग्रेस ने सरकार बनाई है. सरकार बनते ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने किसानों का कर्ज़ माफ करने की घोषणा कर दी थी.
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नई दिल्ली। 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई. उन्हें 31 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया गया है. सज्जन को आपराधिक साजिश और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया. निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2013 को उन्हें बरी कर दिया था.
हाईकोर्ट ने सज्जन के अलावा तीन अन्य दोषियों- कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और कांग्रेस के पार्षद बलवान खोखर की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा. बाकी दो दोषियों- पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा तीन साल से बढ़ाकर 10 साल कर दी.
‘मौत की सजा तक जारी रहेगी लड़ाई’
अभियोजन के वकील एचएस फूलका और अकाली नेता मानजिंदर सिंह सिरसा ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया. हालांकि, उन्होंने कहा कि सज्जन और जगदीश टाइटलर को मौत की सजा दिलाने तक उनकी जंग जारी रहेगी. वे गांधी परिवार को भी जेल पहुंचाकर रहेंगे.
‘बंटवारे के 37 साल बाद दिल्ली ने देखी ऐसी त्रासदी’
जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘1947 में बंटवारे के वक्त कई लोगों का कत्लेआम किया गया था. इसके 37 साल बाद दिल्ली ऐसी ही त्रासदी की गवाह बनी. आरोपी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले.’’
सज्जन को गवाह ने पहचान लिया था
पिछले महीने पटियाला हाउस कोर्ट में मामले की एक गवाह चाम कौर ने सज्जन को पहचान लिया था. चाम ने बयान दिया था- घटनास्थल पर मौजूद सज्जन ने वहां मौजूद दंगाइयों से कहा था कि सिखों ने हमारी मां (इंदिरा गांधी) का कत्ल किया है, इसलिए इन्हें नहीं छोड़ना. बाद में भीड़ ने उकसावे में आकर मेरे बेटे और पिता का कत्ल कर दिया.
5 सिखों की हत्या के मामले में हुई सजा
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे फैले थे. इस दौरान दिल्ली कैंट के राजनगर में पांच सिखों- केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या हुई थी. इस मामले में केहर सिंह की विधवा और गुरप्रीत सिंह की मां जगदीश कौर ने शिकायत दर्ज कराई थी. पीड़ित परिवार की शिकायत और न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग की सिफारिश के आधार पर सीबीआई ने सभी छह आरोपियों के खिलाफ 2005 में एफआईआर दर्ज की थी. 13 जनवरी 2010 को आरोपपत्र दाखिल किया गया था.
जेटली ने कहा- सज्जन कुमार सिख विरोधी दंगों के प्रतीक
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘‘दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं. सज्जन कुमार सिख विरोधी दंगों के प्रतीक बन गए थे. 1984 में दिल्ली और दूसरे इलाकों में सिखों की हत्या की गई. यह फैसला पीड़ितों को राहत देने वाला है. कांग्रेस नेता ने दंगा भड़काने वालों का नेतृत्व किया था. जांच आयोग के अध्यक्ष रहे जज को बाद में कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य बना दिया. उन्होंने कहा था कि सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है. जांच के लिए कमेटी ने जब भी किसी कांग्रेस नेता की ओर इशारा किया, उसे हटा दिया गया. इस तरह से कांग्रेस ने लोगों के साथ अन्याय किया. इस मामले में एक और नेता (कमलनाथ) का नाम आया था, कांग्रेस उन्हें आज मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला रही है.”
इसे भी पढ़ें-महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस: ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता हैमध्यप्रदेश को लेकर मायावती ने लिया यह बड़ा फैसला
नई दिल्ली। हाल ही में आए विधानसभा के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए खुशियां लेकर आई हैं. तो वहीं बहुजन समाज पार्टी चुनावी नतीजों से बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद गुरुवार 13 दिसंबर को बसपा अध्यक्ष मायावती ने दिल्ली में समीक्षा बैठक की. इसमें चुनावी राज्यों के सभी प्रभारी और अध्यक्ष मौजूद थे. खबर है कि समीक्षा बैठक के दौरान मध्यप्रदेश में पार्टी के खराब प्रदर्शन से बसपा प्रमुख मायावती काफी नाराज रहीं. इस हार को लेकर बड़ी कार्रवाई करते हुए मायावती ने प्रदेश प्रभारी रामअचल राजभर और प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार को उनके पद से हटा दिया है. यहीं नहीं बल्कि बसपा प्रमुख ने बड़ा कदम उठाते हुए मध्यप्रदेश की पूरी कार्यकारिणी भंग कर दी है. फिलहाल प्रदेश में नई नियुक्तियों में मुरैना के डीपी चौधरी को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की खबर है.
मायावती की नाराजगी की वजह भी है. इस बार सिर्फ दो विधायक भिंड से संजीव सिंह और पथरिया से रामबाई गोविन्द सिंह ही जीत पाए हैं. बसपा के लिए चिंता की बात यह भी रही कि इस बार कोई भी मौजूदा विधायक अपनी सीट नहीं बचा पाया. तीन राज्यों के चुनावी नतीजों में बसपा के लिए सबसे चिंता की स्थिति मध्यप्रदेश में है. 2008 के बाद बसपा यहां संभल नहीं पाई है. राज्य में उसकी सीटें और वोट शेयर दोनों गिरा है. 2008 में बसपा के पास 7 सीटें थी और उसका वोट प्रतिशत 8.97 था. इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को यहां 6.29 प्रतिशत वोट मिला था और उसने 4 सीटें जीती थी. इस बार उसकी सीटें दो हो गई हैं और वोट प्रतिशत भी घटकर 4.9 प्रतिशत हो गया है.
जबकि अगर बसपा की उम्मीदों की बात करें तो बसपा को सबसे ज्यादा उम्मीद मध्यप्रदेश में ही थी. उसे लग रहा था कि वह मध्यप्रदेश में किंग मेकर बनकर उभरेगी. बसपा की यह उम्मीद गलत नहीं थी. आंकड़ों से साफ है कि रीवा, सतना, दमोह, भिंड, मुरैना आदि जिलों में बसपा का काफी प्रभाव था. मध्यप्रदेश में जिस तरह आखिरी वक्त तक एक-एक सीट को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच रस्सा-कस्सी चलती रही, उस स्थिति में बसपा अगर अपने पिछले प्रदर्शन से थोड़ा भी बेहतर प्रदर्शन करती और दर्जन भर सीटें भी हासिल कर लेती तो वह किंगमेकर बनकर उभर सकती थी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका, ये तब है जब खुद मायावती ने प्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा सभाएं की थी.
Read it also-महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस: ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता है5वीं की दलित छात्रा का अपहरण कर रेप

पलवल। सुबह-सुबह दौड़ने निकली एक 5वीं की दलित छात्रा से रेप का मामला सामने आया है. बताया गया कि आरापित ने पहले तो पीड़िता का अपहरण किया और उसके बाद वारदात को अंजाम दिया. विरोध करने पर जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी. महिला थाना पुलिस ने इस मामले में 19 साल के युवक के खिलाफ अपहरण, रेप और एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया है. मेडिकल जांच के दौरान रेप की पुष्टि हुई है.
डीएसपी विजय पाल ने बताया कि छात्रा अपनी बड़ी बहन के साथ रोजाना दौड़ की प्रेक्टिस करती है. 8 दिसंबर को छात्रा अकेली ही प्रैक्टिस के लिए अपने घर से करीब चार बजे निकली. इस दौरान छात्रा को 19 साल के एक युवक ने पकड़ लिया और घसीट कर अपने घर ले गया. विरोध करने पर छात्रा को जाति सूचक शब्दों से अपमानित करते हुए जान से मारने की धमकी दी और उसके बाद उससे रेप किया. वारदात कर युवक छात्रा को बेहोशी की हालत में छोड़कर फरार हो गया. होश में आने पर छात्रा को युवक के परिजनों व अन्य लोगों ने घर पहुंचाया. घर जाकर छात्रा ने घटना की जानकारी अपने परिवार के सदस्यों को दी. आरोपी युवक के डर की वजह से पीड़ित छात्रा डरी और सहमी रही. बुधवार को छात्रा और उसके परिजनों ने महिला थाना पुलिस को शिकायत दी. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच मेडिकल जांच करवाई, जिसमें रेप की पुष्टि हुई.
डीएसपी के मुताबिक छात्रा ने रेप का आरोप शमशाबाद निवासी 19 वर्षीय सोनू नामक युवक पर लगाया है. आरोपी को अरेस्ट करने के लिए पुलिस दबिश दी, लेकिन वह अपने घर से फरार हो गया. पुलिस का कहना है कि आरोपी युवक को अरेस्ट करने के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही है.
Read it also-गिनती से पहले स्ट्रांग रूम के बाहर वाई-फाई पर कांग्रेस का बवालदलित दस्तक मैग्जीन का दिसम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए
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मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करेंएटा में दलित की बारात में जातिवादियों ने की जमकर मारपीट
हाथरस से आई दलित की बारात में दबंगों ने जमकर हुड़दंग काटा, मारपीट की. दलित पक्ष ने विरोध किया. जब तक लोग इसे शांत करा पाते, दोनों ओर से तीन लोग घायल हो चुके थे. दलित पक्ष ने गांव के ही दबंगों पर मारपीट का मुकदमा दर्ज कराया है. वहीं दबंग पक्ष ने भी मारपीट की रिपोर्ट दर्ज कराई है. गांव में एहतियातन फोर्स तैनात कर दिया गया है.
कोतवाली देहात में दलित पक्ष के रिंकू ने शिकायत दर्ज कराई कि बुधवार की रात गांव असरौली अमर सिंह की बेटी दीपक की शादी थी. हाथरस से बारात आई थी. गांव के ही दबंग परिवार के घर भी बारात आई थी. आरोप है कि दलित की बारात में डॉ. भीमराव आंबेडकर का फोटो देखकर दबंग भड़क गए. बारातियों की पिटाई कर दी. फोटो को क्षति पहुंचाई. बारात चढ़ने से रोक दी गई. इसमें दबंग अतेंद्र पुत्र अमर सिंह, ठाकुर और रामू पुत्रगण ब्रजेश, बहोरन सिंह व अन्य पर मारपीट, हुड़दंग, आंबेडकर के पोस्टर फाड़ दिए. बाद में दलित की बारात को सामान्य ढंग से ही ले जाना पड़ा.
वहीं ठाकुर वीरेंद्र सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि गांव में रिटायर्ड कांस्टेबल चंद्रपाल सिंह की बेटी की शादी थी. बारात आई तो दलित पक्ष के रिंकू और उनके साथियों ने बारातियों से मारपीट की. इसमें रामू व एक अन्य घायल हो गए. दोनों के कान और नाक में चोट आई है. रामू को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है. दोनों पक्षों की ओर से मारपीट की शिकायत के बाद दोनों पक्षों के नेताओं ने बैठकर समझौते की बात कराई, लेकिन काफी देर वार्ता के बाद भी कोई पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ और दोनों पक्षों का मुकदमा दर्ज कराया गया.
एएसपी क्राइम ओपी सिंह ने बताया की दोनों पक्षों की शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. घटना की जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी को मौके पर भेजा गया था. गांव में एहतियातन पुलिसबल तैनात कर दिया गया है.
Read it alos-परिनिर्वाण दिवस पर सामने आया मनुवादी मीडिया का जातिवादी चेहरादलितों का हनुमान मंदिर पर कब्जा ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल
हाल ही में एक चुनावी सभा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा किया कि हनुमान दलित थे. प्राख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव द्वारा हनुमान को विश्व का पहला आतंकवादी घोषित किये जाने के वर्षों बाद रामदास हनुमान को लेकर योगी द्वारा की गयी टिपण्णी सबसे ज्यादा चांचल्य सृष्टि की है. उनके बयान के बाद हिन्दू देवी-देवताओं की जाति चिन्हीकरण का एक नया दौर शुरू हो गया है.इसे लेकर योगी खुद अपनी जमात अर्थात साधु –संतों के निशाने पर आ गए हैं. दूसरी ओर उनके बयान के जारी होने के बाद आगरा के एक हनुमान मंदिर पर दलितों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है. दलितों द्वारा मंदिर पर कब्जे ज़माने के बाद यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि जिस जाति के जो देवता है, उस जाति देवता के मंदिरों का पूजा- पाठ सहित सम्पूर्ण का नियंत्रण उस जाति से सम्बद्ध समुदायों को सौंप दिया जाय. इस क्रम में विश्वकर्मा मंदिर लोहारों को, कृष्ण मंदिर यादवों को,राममंदिर क्षत्रियों इत्यादि को सौपने की बात सोशल मीडिया में उठ रही है. इससे उन लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी है, जो मंदिरों पर ब्राह्मणों के एकाधिकार के ध्वस्त होने का वर्षों से सपना देख रहे थे. किन्तु भारी आश्चर्य की बात यह है कि मंदिरों पर गैर-ब्राह्मणों के कब्जे को लेकर सर्वाधिक आपत्ति ब्राह्मणों में नहीं, उन दलितों में है, जिनके लिए सदियों से देवालयों के द्वार बंद रहे हैं और आज भी हैं. इसलिए इस समुदाय के बुद्धिजीवी मंदिरों पर कब्ज़ा ज़माने के लिए आमादा जातियों, खासकर दलितों को हतोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर तरह-तरह की युक्ति खड़ी करते हुए प्रचारित कर हैं कि बाबा साहेब ने मंदिरों पर, नहीं संसद पर कब्ज़ा करने का निर्देश दिया था. इनके इस अभियान में गैर-दलित बहुजनों के साथ प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी खासा सहयोग मिल रहा है.
बहरहाल गैर-ब्राह्मण जातियों द्वारा मंदिरों पर कब्जे के अभियान को हतोत्साहित करने जुटे बहुजन और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने बता दिया है कि वे क्यों अबतक भारत में सामाजिक परिवर्तन तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी के सशक्तिकरण में अबतक व्यर्थ रहे हैं. वे अपनी बौद्धिक दारिद्र्ता के चलते यह जान ही नहीं पाए कि दुनिया के दूसरे वंचित समुदाय अश्वेतों, महिलाओं इत्यादि की भांति ही भारत के वंचितों की दुर्दशा व अ-शक्तिकरण का एकमेव कारण शासकों द्वारा उनका शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) बहिष्कार है और बिना शक्ति के समस्त स्रोतों में इनकी वाजिब हिस्सेदारी सुलभ कराये इनका मुकम्मल सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता. वे यह समझने में व्यर्थ रहे हैं कि समाज के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे से ही आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की सृष्टि होती है. अगर इसकी थोड़ी उपलब्धि किया भी तो वे धर्म को शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत समझने में पूरी तरह व्यर्थ रहे. धर्म को विषमता का बड़ा कारक न मानने के कारण ही अधिकांश संगठन वंचितों को मात्र आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में हिस्सेदारी दिलाने तक अपनी गतिविधियों को महदूद रखे.
शक्ति के स्रोत के रूप में धर्म की उपेक्षा दुनिया के तमाम चिन्तक,जिनमें मार्क्स भी रहे, ही किये और आज भी किये जा रहे हैं. यह एकमात्र बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर थे जिन्होंने जोर गले से कहा था कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत होता है और शक्ति के रूप में ‘धर्म की शक्ति’ का महत्त्व ‘आर्थिक शक्ति’ से ज्यादा नहीं तो किसी प्रकार कम भी नहीं. प्रमाण देते हुए उन्होंने बताया था कि प्राचीन रोमन गणराज्य में प्लेबियन बहुसंख्य होकर भी अगर अपने अधिकारों से वंचित रहे तो इसलिए कि धार्मिक शक्ति डेल्फी के मंदिर के पुजारी के पास होती थी, जो शासक पैट्रीशियन जाति का होता था. भारत में धार्मिक शक्ति की महत्ता प्रमाणित करते हुए उन्होंने कहा था ,’क्यों बड़े से बड़े लोग साधु-फकीरों के पैर छूते हैं ? क्या कारण है कि भारत के लाखों लोग अंगूठी-छल्ला बेंचकर काशी व मक्का जाते हैं?भारत का तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां पुरोहित का शासन,मजिस्ट्रेट के शासन से बढ़कर है.’
बहरहाल जो धर्म शक्ति के स्रोत के रूप में आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, सारी दुनिया में ही उसका लाभ पुरोहित वर्ग जरुर उठाता रहा है, किन्तु एक सामाजिक समूह के रूप इसका लाभार्थी वर्ग केवल भारत में ही विकसित हुआ. शेष धर्मों में पुरोहितों को इसका लाभ व्यक्तिगत रूप से मिलता रहा. कारण, हिन्दू धर्म को छोड़कर बाकी धर्मों में पुरोहित बनने के दरवाजे सभी समूहों के लिए मुक्त रहे,सिवाय उनकी महिलाओं के. हालांकि 1886 भागों में बंटे ब्राह्मणों में सभी को पौरोहित्य का अधिकार कभी नहीं रहा. पर, चूँकि भारत के विभिन्न अंचलों में फैले छोटे-बड़े असंख्य मंदिरों के पुजारी वहां के कुछ खास ब्राह्मण ही हो सकते थे, इसलिए असंख्य भागों में बंटे ब्राह्मण पुरोहित वर्ग में तब्दील हो गए. इससे जिन ब्राह्मणों को पौरोहित्य का अधिकार नहीं रहा, वे भी आम लोगों में पुरोहित ब्राह्मणों के समान ही सम्मान पाने लगे. पौरोहित्य के अधिकार ने ही ब्राहमणों को ‘भूदेव’ के आसन पर बिठा दिया: हिन्दू समाज में सर्वोच्च बना दिया.
इस अधिकार से वंचित होने के कारण ही क्षत्रिय ‘जन-अरण्य का सिंह’ होकर भी दस वर्ष तक के बालक ब्राह्मण को पिता समान सम्मान देने के लिए विवश रहे. इस क्षेत्र का अनाधिकारी होने के नाते ही सदियों से भारतीय नारी हर जुल्म सहते हुए पति के चरणों में, पति चाहे लम्पट व कुष्ठ रोगी ही क्यों हो, स्वर्ग तलाशने के लिए ही अभिशप्त रही. वैसे तो पौरोहित्य के अधिकार से वंचित रहने के कारण तमाम अब्राह्मण जातियों की हैसियत ब्राह्मणों के समक्ष निहायत ही तुच्छ रही, किन्तु सर्वाधिक बदतर स्थिति दलितों की हुई. पुरोहित बनना तो दूर उन्हें मंदिरों में घुसकर ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करने तक का अधिकार नहीं रहा. अगर ब्राह्मणों की भांति दलितों को भी अबाध रूप से मंदिरों में प्रवेश और पौरोहित्य का अधिकार रहता तब क्या वे मानवेतर प्राणी में तब्दील होते? क्या तब भी हिन्दू उनके साथ अस्पृश्यता मूलक व्यवहार करते? सच तो यह है कि धार्मिक सेक्टर से सम्पूर्ण बहिष्कार ही दलितों के प्रति अस्पृश्यतामूलक व्यवहार का प्रधान कारण है. हिन्दू सोचते है जब दलित देवालयों से ही अछूत के रूप में बहिष्कृत हैं तो हम उनसे सछूत जैसे व्यवहार क्यों करें!
बहरहाल कल्पना किया जाय कोई चमत्कार घटित हो जाता है और समस्त आर्थिक गतिविधियों, राजनीति की संस्थाओं तथा ज्ञान के क्षेत्र मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रातिशूद्र और उनकी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिल जाति है.पर, अगर पौरोहित्य पर ब्राह्मणों का एकाधिकार पूर्ववत रहता है, क्या हिन्दू समाज में समता आ पायेगी? हरगिज नहीं ! हिन्दू समाज को समतावादी बनाने के लिए पौरोहित्य का प्रजातंत्रीकरण करना ही होगा. अर्थात जिस समाज की जितनी संख्या है, उस अनुपात में पौरोहित्य में उसके स्त्री और पुरुषों को भागीदारी सुनिश्चित करनी ही होगी. अगर ऐसा नहीं किया गया तो तमाम तरह की बराबरी हासिल करने के बादजूद तमाम गैर-ब्राह्मण जातियां ब्राह्मणों के कदमों में लोटती रहेगी. ऐसे में हर हाल में धार्मिक शक्ति का बंटवारा जरुरी है. अगर भारतीय समाज धार्मिक शक्ति के बंटवारे के लिए मन बनाता है तो इसमें डॉ. आंबेडकर का यह सुझाव काफी कारगर हो सकता है,जो उन्होंने अपनी बेहतरीन रचना ‘जाति का विनाश’ में सुझाया है.
‘हिन्दुओं के पुरोहिती पेशे को अच्छा हो कि समाप्त ही कर दिया जाय, लेकिन यह असम्भव प्रतीत होता है. अतः यह आवश्यक है कि इसे कमसे कम वंश-परम्परा से न रहने दिया जाय. कानून के द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वही व्यक्ति पुरोहिताई कर सकेगा, जो राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास कर ले. गैर-सनदयाफ्ता पुरोहितों द्वारा कराये गए कर्मकांड क़ानून की दृष्टि में अमान्य होने चाहिए, और बिना लाइसेंस पुरोहिताई करना अपराध माना जाना चाहिए. पुरोहित राज्य का कर्मचारी होना चाहिए और उस पर राज्य सरकार का अनुशासन लागू होना चाहिए. आई.सी.एस.अधिकारियों की तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य द्वारा निर्धारित होनी चाहिए. भारतवर्ष में लगभग सभी व्यवसाय विनियर्मित हैं. डॉक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों को अपना पेशा आरम्भ करने से पहले अपने विषय में दक्षता प्राप्त करनी पड़ती है. इन लोगों को अपने जीवन में न केवल देश के नागरिक व अन्य कानूनों के पाबंद रहना पड़ता है, वरन अपने विशिष्ट पेशे से सम्बंधित विशिष्ट नियम व नैतिकता का पालन भी करना पड़ता है. .. हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग न किसी कानून की बंदिश में है न किसी नैतिकता में बंधा हुआ है. वह केवल अधिकार व सुविधाओं को पहचानता है, कर्तव्य शब्द की उसे कोई कल्पना ही नहीं है. यह एक ऐसा परजीवी कीड़ा है जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है. अतः इस पुरोहित वर्ग को मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति से कानून बनाकर नियंत्रित किये जाना आवश्यक है. कानून इस पेशे का द्वार सबके लिए खोलकर इसे प्रजातान्त्रिक रूप प्रदान कर देगा. ऐसे कानून से निश्चय ही ब्राह्मणशाही समाप्त हो जायेगी. इससे जातिवाद, जो ब्राह्मणवाद की उपज है, समाप्त करने में सहायता मिलेगी.’
बहरहाल सदियों की भांति स्वाधीन भारत में भी ब्राह्मणशाही से त्रस्त अ-ब्राह्मण जातियों के बुद्धिजीवियों ने डॉ. आंबेडकर से ब्राह्मणशाही के खात्मे का अचूक मन्त्र पाकर भी कभी ‘पौरोहित्य के पेशे के प्रजातांत्रिकरण की मांग नहीं उठाया ,इसलिए ब्राह्मण आज भी आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक शक्ति पर कुंडली मारे बैठे हैं. किन्तु आज जबकि दलितों ने हनुमान के मंदिर पर कब्ज़ा जमाकर, ब्राह्मणशाही के खात्मे की अभिनव पहल की है, हमें उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सामने आना चाहिए. ऐसा होना पर दूसरी जातियां भी अपने-अपने जातियों के देवताओं के मंदिरों पर कब्ज़ा जमाने के लिए आगे आएँगी. इससे ऐसे दिन आ सकते हैं, जब हम पाएंगे कि रावण-परशुराम के मंदिरों को छोड़कर शेष मंदिर ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त हो चुके हैं.
Read it also-दलित कहकर मंदिर में कथा कराने से रोका!… ऐसा हुआ तो 2019 में हार जाएगी भाजपा
नई दिल्ली। 2019 चुनाव में भाजपा हारेगी या जीतेगी, यह ये पांच राज्य तय करेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव की सत्ता की चाबी पांच राज्यों के पास होगी. इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु शामिल हैं. देश के ये ऐसे पांच राज्य हैं, जहां सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं. इन राज्यों में कुल 249 संसदीय सीटें है. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन को 148 सीटें मिली थीं. जबकि कांग्रेस को महज 10 सीटें और अन्य के खाते में 91 सीटें आई थीं.
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के साथ आने की स्थिति में भाजपा को फिर से उतनी बड़ी सफलता मिल पाना मुश्किल है. तो ऐसे ही पश्चिम बंगाल और तामिलनाडु में भी भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है. बंगाल में ममता बनर्जी तो तामिलनाडु में DMK और AIADMK भाजपा की राह में बड़ा रोड़ा हैं. बिहार में नीतीश कुमार के जनता दल यू के साथ मिलकर भाजपा बेहतर परिणाम की उम्मीद कर सकती है लेकिन यह बहुत आसान नहीं होगा.
बिहार में तेजस्वी यादव की भी मजबूत दावेदारी है. ऐसे ही महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ही उसके लिए बड़ा अड़ंगा है. कांग्रेस को राज्यों में मिली जीत के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस के एक बार फिर उभर कर आने से इंकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल तीन राज्यों की हार ने भाजपा के 2019 में केंद्र में वापसी पर संदेह तो पैदा कर ही दिया है.
ऐसे ही अगर तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी अगर विधानसभा की तर्ज पर चुनाव होते हैं और लोग इसी तरह वोटिंग करते हैं तो फिर भाजपा की राह और ज्यादा मुश्किल हो जाएगी. इसी तर्ज पर अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग और नतीजे हुए तो बीजेपी 63 सीटों से घटकर 23 पर आ जाएगी और कांग्रेस 6 से बढ़कर 40 पर पहुंच जाएगी.
राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजों के क्या मायने है?
नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद कांग्रेस पार्टी में ख़ुशी की लहर है, तो भारतीय जनता पार्टी के कैंप में निराशा है.
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है. हालांकि मध्य प्रदेश में कड़ा मुक़ाबला रहा और कांग्रेस बहुमत से कुछ दूर रह गई, लेकिन निर्दलीय, बसपा और सपा के समर्थन के बाद वहाँ भी सरकार बनाने का रास्ता साफ़ हो गया है.
इन विधानसभा चुनाव के नतीजे राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ-साथ नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए क्या मायने रखते हैं? वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी की लोकप्रियता में कमी आई है.
वे कहते हैं, “नरेंद्र मोदी आज भी इस देश के सबसे बड़े नेता हैं. लेकिन जब उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी तो बीजेपी का कुल वोट शेयर 31 फीसदी था. अब साढ़े चार साल बाद उनकी लोकप्रियता में काफ़ी कमी आई है. ज़मीन पर लोग सवाल पूछते हैं कि मोदी जी ने जो वादे किए थे उनका क्या हुआ.”
“2013 से 2017 तक भारतीय राजनीति में मोदी की टक्कर का कोई नेता नहीं था. लेकिन आज उनसे ये ख़िताब छिन गया है. चुनाव जिताऊ नेता वाली उनकी छवि को धक्का लगा है. ये तो साफ है कि लोगों का मोदी से मोहभंग हो रहा है लेकिन आगामी संसदीय चुनाव में मतदान पर इसका क्या असर पड़ेगा ये तो वक़्त ही बताएगा.”
इन चुनावी नतीजों से एक सवाल ये भी उठता है कि क्या अब बीजेपी में मोदी विरोध के स्वर उभरना शुरू होंगे.
इस सवाल पर संजय श्रीवास्तव ने कहा, “बीजेपी में मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ें अभी उठना शुरू नहीं होंगी. लेकिन बीजेपी में एक धड़ा ऐसा भी है जो कि उस दिन का इंतज़ार कर रहा है कि अगले लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी 170 लोकसभा सीटों पर सिमट जाती है तो मोदी जी सहयोगी दलों को कैसे जुटा पाएंगे. लेकिन ये भी संभव है कि मोदी और अमित शाह में चुनावी गणित के चक्कर में थोड़ी विनम्रता आ जाए.”
राहुल गांधी ने बीते साल 11 दिसंबर, 2017 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान संभाली थी.
संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि इसके ठीक एक साल बाद आए चुनावी नतीजों ने बता दिया है कि राहुल गांधी परिपक्वता से फैसले लेने के लिए सक्षम हैं.
बीबीसी हिन्दी के फ़ेसबुक लाइव के दौरान उन्होंने कहा, “लेकिन कई विपक्षी दलों ने अभी तक राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार नहीं किया है. कई दलों के नेता निजी बातचीतों में बताते हैं कि राहुल गांधी व्यक्ति तो बेहतरीन हैं लेकिन उनके अंदर वोट हासिल करने की क्षमता नहीं है.”
ऐसे में सवाल उठता है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजों के राहुल गांधी के लिए क्या मायने हैं.
बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह ने जब वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, “राहुल गांधी ने पांच में से तीन राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया है. इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल काफ़ी बढ़ जाएगा. चुनावी रणनीति की बात करें तो राहुल गांधी ने इन चुनावों में दो तरह की रणनीति को अपनाया है.”
“राहुल की रणनीति में एक चीज साफ़ दिखाई दी है कि हिन्दी भाषी प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी ने अकेले ही चुनाव लड़ा. कांग्रेस ने बसपा, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे दलों के साथ समझौता नहीं किया जिससे सपा-बसपा काफ़ी नाराज़ हैं.”
“कांग्रेस ने ये सोचा कि ये राज्य कभी उसके गढ़ हुआ करते थे. ऐसे में एक शक्ति परीक्षण करना चाहिए. कांग्रेस की इस रणनीति का एक पहलू ये भी है कि कांग्रेस ने तेलंगाना में टीडीपी और एक अन्य दल के साथ गठबंधन किया. इस तरह कांग्रेस ने अलग-अलग चुनावी रणनीतियों का इस्तेमाल किया.”
राहुल का हिंदुत्व कार्ड
गुजरात के चुनाव से लेकर इन चुनावों में भी राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जाने के साथ-साथ उन्होंने अपना गोत्र भी बताया.
स्मिता गुप्ता राहुल की इस रणनीति पर बताती हैं, “कांग्रेस ने हिंदी भाषी प्रदेशों में विचारधारा के तौर पर एक नया प्रयोग किया है. 90 के दशक से देश की राजनीति में दक्षिणपंथ प्रवेश कर रहा था. लेकिन कांग्रेस के पास इसकी टक्कर में कुछ नहीं था. बीजेपी भी कांग्रेस को अल्पसंख्यकों की पार्टी कहती आई है. लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस ने खुद को हिंदू बताने से लेकर ब्राह्मण होने पर भी ज़ोर दिया. इस सबके बावजूद कांग्रेस खुद को एक सेकुलर पार्टी बताती है.”
कांग्रेस पार्टी इन चुनावी नतीजों का श्रेय राहुल गांधी के नेतृत्व को देगी कि उनके कुशल नेतृत्व में कांग्रेस मध्य प्रदेश और राजस्थान में शानदार प्रदर्शन कर सकी.
वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक़, राहुल गांधी को बस इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान के कांग्रेस नेतृत्व में आपसी झगड़े को रोकने की भरसक कोशिश की.
वह बताते हैं, “राहुल गांधी ने पार्टी को एकजुट रखा है. हालांकि, खुद के नाम पर वोट बटोरने का करिश्मा अभी भी उनमें नहीं है. लेकिन अब वो दिन लद गए हैं कि कोई राहुल गांधी का मजाक उड़ा सके. क्योंकि राहुल गांधी ने खुद को साबित करके दिखा दिया है.”
स्रोतः बीबीसी हिन्दी 
