मायावती ने मनाया 63वां जन्मदिन, कार्यकर्ताओं से मांगा तोहफा

अपने 63वें जन्मदिन पर बसपा प्रमुख मायावती ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से जन्मदिन का तोहफा मांगा है. बहुजन दिग्गज नेता ने तोहफे में क्या मांगा ये हम आपको बाद में बताएंगे. इससे पहले की खबर यह है कि बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने आज 15 जनवरी को अपना 63वां जन्मदिन मनाया. बसपा प्रमुख ने पार्टी मुख्यालय में 63 किलो का केक काटा. तो साथ ही हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी उन्होंने ब्लू बुक जिसका शीर्षक ‘मेरा संघर्षमय जीवन और बी.एस.पी मूवमेंट का सफरनामा’ है, का विमोचन किया. इस दौरान बसपा कार्यकर्ताओं में खूब उल्लास रहा. पार्टी के दिग्गज नेताओं में पार्टी मुखिया को जन्मदिन की बधाई देने के लिए तांता लगा रहा. बसपा कार्यकर्ता इस दिन को जन कल्याणकारी दिवस के रूप में मनाते हैं. इस दौरान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी बहनजी को जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे. दो दिन पहले ही दोनों दलों ने गठबंधन का ऐलान किया है. इस दौरान उन्होंने जहां भाजपा पर जमकर निशाना साधा, तो कांग्रेस को भी नहीं बख्शा. मायावती ने नोटबंदी से लेकर रक्षा खरीद सौदे के लिए भाजपा को कठघरे में खड़ा किया और धर्म के नाम पर राजनीति करने की निंदा की. अपनी जिंदगी के इस महत्वपूर्ण दिन पर बसपा मुखिया ने पार्टी कार्यकर्ताओं से जन्मदिन का तोहफा मांगा. उन्होंने कहा- “इस बार लोकसभा चुनाव से पहले मेरा जन्मदिन मनाया जा रहा है. इसके लिए हमारी पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने का फैसला किया है. सपा के साथ हमारे गठबंधन ने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. सपा और बीएसपी के लोग अपने गिले-शिकवे और स्वार्थ भुलाकर गठबंधन के सभी उम्मीदवारों को भारी बहुमत से ऐतिहासिक जीत दिलाएं, क्योंकि यही मेरे जन्मदिन का तोहफा होगा.” बहनजी की इस मांग के साथ ही बसपा कार्यकर्ताओं ने बहनजी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग के साथ नारेबाजी शुरू कर दी. इससे साफ है कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को यकीन हो गया है कि दोनों दल मिलकर प्रदेश और देश में सत्ता की बाजी पलट सकते हैं.

डॉ. अम्बेडकर और लोहिया के वो पत्र जो सपा-बसपा को साथ लाती है

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सपा और बसपा के विचारधारा की बात करें तो बसपा खुद को आम्बेडकरवादी पार्टी कहती है तो सपा खुद को लोहियावादी बताती है। मायावती और अखिलेश यादव से पहले मुलायम सिंह और कांशीराम भी एक साथ आ चुके हैं। लेकिन इससे पहले एक दौर में डॉ. आम्बेडकर और डॉ. लोहिया ने भी एक दूसरे के नजदीक आने की कोशिश की थी। सन् 1955 से 56 के बीच डॉ. आम्बेडकर और राम मनोहर लोहिया के बीच कई बार संवाद हुआ और जिसमें दोनो नेता एक मंच पर आने को तैयार दिख रहे थे।

बात 10 दिसंबर 1955 की है। जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने हैदराबाद से डॉ. भीम राव आम्बेडकर को पहली बार पत्र लिखा। इस पत्र में लोहिया ने यह इच्छा जताई थी कि डॉ. अंबेडकर देश भर की जनता की आवाज बनकर उभरें। वो पत्र कुछ यूं था-

‘प्रिय डॉक्टर अंबेडकर, मैनकाइंड (अखबार) पूरे मन से जाति समस्या को अपनी संपूर्णता में खोलकर रखने का प्रयत्न करेगा। इसलिए आप अपना कोई लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी। आप जिस विषय पर चाहें लिखिए। हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर आप लिखना पसंद करें, तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो बल्कि आश्चर्य भी करे। मैं चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए। ताकि आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें। मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपकी कोई दिलचस्पी होगी या नहीं। सम्मेलन में आप विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में आ सकते हैं। अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों और संसदीय काम से संबंधी समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ बात कहनी ही है।’ – सप्रेम अभिवादन सहित, आपका राम मनोहर लोहिया।

बाद में डॉक्टर अंबेडकर ने डॉ. लोहिया को जवाबी पत्र लिखा। डॉ. आम्बेडकर ने लिखा-

‘प्रिय डॉक्टर लोहिया, आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे। मैंने उनसे काफी देर तक बातचीत की। अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की कार्यसमिति की बैठक 30 सितंबर, 56 को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा। मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बात हो सके, ताकि हम लोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हम लोग क्या कर सकते हैं। मुझे खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार दो अक्तूबर 1956 को मेरे आवास पर आ सकें। अगर आप आ रहे हैं तो कृपया तार से मुझे सूचित करें ताकि मैं कार्यसमिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक सकूं।’ आपका, बी.आर.अंबेडकर।

बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने इस बीच लोहिया को पांच अक्तूबर को एक और पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने एक और पत्र का हवाला दिया-

‘आपका 1 अक्तूबर 56 का पत्र मिला। अगर आप 20 अक्तूबर को मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैं दिल्ली में रहूँगा। आपका स्वागत है। समय के लिए टेलीफोन कर लेंगे।’ आपका बी.आर. अंबेडकर

सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले दोनों नायकों की मुलाकात जब तय मानी जा रही थी, तब होनी को कुछ और मंजूर था। छह दिसंबर 1956 को डॉ. अंबेडकर ने इस दुनिया को ही अलविदा कह दिया, जिस कारण लोहिया और आम्बेडकर की बहुप्रतीक्षित मुलाकात मुलाकात नहीं हो सकी। माना जाता है कि अगर यह मुलाकात हो गई होती तो न केवल सामाजिक न्याय की लड़ाई का आज रंग-रूप कुछ और होता बल्कि देश की राजनीति की दिशा भी दूसरी होती।

क्या 25 साल पुराना करिश्मा दोहरा पाएगा सपा-बसपा गठबंधन

साल 1993 में देश भर में और खासकर उत्तर प्रदेश में जोर-शोर से जयश्री राम का एक नारा गूंज रहा था। ये वो दौर था जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद भाजपा ने देश भर के हिन्दुओं को धर्म के नाम पर अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश शुरू कर दी थी। धर्म का सहारा लेकर भाजपा अपने राजनीतिक इतिहास के चरम की ओर बढ़ रही थी। लेकिन तमाम धार्मिक उथल-पुथल के बाद भी उत्तर प्रदेश का बहुजन समाज इस नारे के भंवर में नहीं फंसा। उस दौर में बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष मान्यवर कांशीराम और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव प्रदेश में दो प्रमुख ध्रुव बने हुए थे। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में दोनों नेता एक साथ आ गए और बहुजनों ने नारा दिया… मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।

12 जनवरी को लखनऊ में जब अखिलेश यादव और मायावती एक साथ प्रेस कांफ्रेंस करने पहुंचे तो कइयों के जहन में वो दौर एक बार फिर ताजा हो गया। दोनों दलों ने 2019 लोकसभा का चुनाव साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया है। दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश की 38-38 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के सपा और बसपा के मतदाताओं में काफी जोश है। इस गठबंधन के बाद एक बड़ी चर्चा यह है कि क्या सपा और बसपा एक बार फिर भाजपा को सत्ता में आने से रोक पाएंगी?

इसको समझने के लिए 25 साल पहले के उस दौर में जाना होगा। 1992 में अयोध्याक में विवादास्पंद ढांचा गिराये जाने के बाद तत्कापलीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया और उत्त्र प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा हो गया। भाजपा को पूरा भरोसा था कि राम लहर उसे आसानी से दोबारा सत्ता में पहुंचा देगी। तब दोनों पार्टियों ने पहली बार चुनावी गठबंधन किया और बीजेपी के सामने मैदान में उतरीं।

1993 में उत्त र प्रदेश की 422 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें बसपा और सपा ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। बसपा ने 164 प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 67 प्रत्याशी जीते थे। सपा ने इन चुनावों में अपने 256 प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से उसके 109 प्रत्याशी जीते थे। बहुजन समाज के बीच हुए इस गठबंधन के आगे भाजपा टिक नहीं सकी और 1991 में 221 सीटें जीतने वाली भाजपा 1993 में 177 सीटों पर सीमट गई। तब सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बना ली और मुलायम सिंह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए।

भाजपा तब भी चरम पर थी और आज भी चरम पर है। सवाल है कि जैसे तब सपा और बसपा ने भाजपा को रोक दिया था, क्या एक बार फिर 2019 में इतिहास खुद को दोहराएगा। इस सवाल का जवाब चुनाव परिणामों के बाद मिल सकेगा लेकिन वर्तमान की हकीकत यह है कि गठबंधन के ऐलान से देश भर के बहुजन समाज में काफी उत्साह है तो भाजपा सकते में है।

अमित शाह के पानीपत युद्ध के आवाह्न की सच्चाई

भाजपा अध्यक्ष अमितशाह ने कल (11 जनवरी ) भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए पानीपत के तीसरे युद्ध का आह्वान किया। मिस्टर अमित शाह पानीपत का तीसरा यु्द्ध तो लड़ा ही जायेगा, लेकिन पानीपत के इस युद्ध में एकतरफ जै श्रीराम, मनु, पुष्यमित्र शुंग,आदि शंकराचार्य, तुलसी, पेशवा, तिलक,हेडगेवार, गोलवरकर, सावरकर और दीदयाल उपाध्याय के मानस पुत्रों होंगे और दूसरी तरफ बुद्ध, अशोक, शंबूक, एकलव्य, कबीर, फुले, शाहू जी, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, पेरियार ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा के मानस पुत्र होंगे।

आप पानीपत के तीसरे युद्ध का आह्वान हिंदू धर्म और संस्कृति रक्षा और पूरी तरफ इसकी पुनर्स्थापना के लिए कर रहे हैं, जिसका लक्ष्य द्विज मर्दों के वर्चस्व को कायम रखना और उसे और मजबूत बनाना है। जाहिर तौर यह काम वर्ण-जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को कायम रखकर और मजबूत बनाकर ही किया जा सकता है।

हम इस युद्ध का आह्वान डॉ. आंबेडकर के उस संकल्प को पूरा करने के लिए कर रहे हैं, जो संकल्प उन्होंने जाति का विनाश नामक किताब और अन्य किताबों में प्रकट किया है। वह संकल्प है, वर्ण-जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का पूर्ण विनाश और स्वतंत्रता, समता और बंधुता की स्थापना। उन्होंने यह भी कहा था कि यह तभी हो सकता है जब वर्ण-जाति व्यवस्था की जड़ मनुववाद- ब्राह्मणवाद का विनाश हो जाए।

मिस्टर अमितशाह इस युद्ध में आपके हाथ में वेद, मनुस्मृति, गीता, रामचरित मानस और बंच ऑफ थाट होगा। हमारे हाथ में बुद्ध के वचन, कबीर के दोहे, फुले की गुलामगिरी, पेरियार की सच्ची रामायण और डॉ. आंबेडकर का जाति का विनाश और 22 प्रतिज्ञाएं होगीं। आपने पानीपत के युद्ध के के हवाले से कहा यदि इस युद्ध यदि संघ-भाजपा नहीं जीतती है, अंग्रेजों की गुलामी (200 वर्षो) की तरह यह देश एक बार फिल गुलाम हो जायेगा।

हम कह रहे हैं कि यदि इस युद्ध में आप विजयी होते हैं, 2000 वर्षों से चला आ रहा सवर्ण मर्दों का वर्चस्व सिर्फ कायम ही नहीं रहेगा और ज्यादा मजबूत होगा। हम दलित-बहुजन और महिलाएं और अन्याय के शिकार अन्य लोग, इस देश के किसानों, मजदूरों और अन्य मेहनतकशों के साथ मिलकर आपको, संघ-भाजपा को और आपके आका पूंजीपतियों को अवश्य पराजित करेंगे। डॉ. आंबेडकर के शब्दों में हम पानीपत के इस युद्ध में ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का एक साथ विनाश करेंगे और आपको इस युद्ध में आपकी औकात बता देंगे।

  • डॉ. रामू सिद्धार्थ

ये कैसी गरीबी, ये कैसा आरक्षण?

मोदी सरकार द्वारा जिस तरह आनन-फानन में गरीबों को दस फीसदी आरक्षण देने की बात कही गई है, वो कई सवाल उठाने वाला है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आरक्षण के लिए मोदी सरकार ने आय और जमीन की जो सीमा तय की है, वह चौंकाने वाला है। कैबिनेट की बैठक में फैसला लिया गया कि सामान्य वर्ग में जिनकी सालाना आमदनी 8 लाख और जिनके पास खेती की 5 एकड़ से कम ज़मीन हो, ऐसे लोगों को नौकरी और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. सरकार का यह फैसला कई सवाल उठाता है। 8 लाख रुपये सलाना आमदनी के लिहाज से देखें तो सरकार ने उनको भी गरीब माना है, जो हर महीने 65 हजार से कुछ ज्यादा कमाता है। आप खुद सोचिए कि जो इंसान प्रतिदन दो हजार से अधिक की कमाई करता है, क्या वह गरीब है? आम तौर पर इस आय वर्ग के लोगों के पास घर, गाड़ी और ठीक ठाक बैलेंस रहता है। ये अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा पाते हैं, जहां की फीस तकरीबन 4-5 हजार रुपये तक होती है। ये महीने में आराम से मल्टीप्लेक्श में एक-दो फिल्म देखते हैं, शॉपिंग भी कर लेते हैं। अब इस तरह की जिंदगी जीने वाले लोगों को क्या गरीब माना जाना चाहिए?

राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक देश में 95 प्रतिशत परिवारों की सालाना आय आठ लाख रुपये से कम है। एक हजार वर्गफुट से कम भूमि पर मकान वालों की संख्या 90 प्रतिशत है। इसी तरह कृषि जनगणना के अनुसार 87 प्रतिशत किसान के पास कृषि योग्य भूमि का रक़बा पांच एकड़ से कम है। यानी देश की आबादी में 40 फीसदी सवर्ण ग़रीब हैं।

मान लिया जाए कि एक बार 10 फीसदी आरक्षण का अगर समर्थन भी करने की सोची जाए तो भी यह तब संभव है जब  सवर्ण समाज के भीतर से यह मांग उठे कि कमाई की सीमा 8 लाख रुपये सलाना से घटाकर 3-4 लाख तक किया जाए। सरकारी नौकरी में रहने वाले परिवार वालों को भी इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए। सरकार के हालिया आऱक्षण के फैसले पर सवर्ण समाज के उन गरीब वर्ग के लोगों को आंदोलन करना चाहिए जो शहरों में 10 और पंद्रह हजार की नौकरी करते हैं, जो छोटे-मोटे धंधे कर के महीने के 10-20 हजार की कमा पाते हैं, जिनके बच्चे सरकारी स्कूल या औसत प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। आरक्षण को लेकर सरकार की नीयत साफ नहीं है।

दलित दस्तक मैग्जीन का जनवरी 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का आठवां अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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विश्व पुस्तक मेले में संत रविदास और सहारनपुर की घटना पर दो महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन

विश्व पुस्तक मेले में सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड पर महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन

नई दिल्ली। दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में अम्बेडकरी साहित्य खूब बिक रहा है। इस दौरान बहुजन समाज के चिंतक और साहित्यकारों की नई-नई किताबें भी आ रही हैं। रविवार छह जनवरी को विश्व पुस्तक मेले में दो महत्वपूर्ण किताबों का विमोचन हुआ। एक किताब संत शिरोमणि रविदास जी पर थी तो दूसरी सहारनपुर के शब्बीरपुर में हुई जातीय हिंसा और उसके बाद चर्चा में आए भीम आर्मी की पूरी कहानी बयां करती डॉ. एन. सिंह की पुस्तक ‘शब्बीरपुरः जलते घर- सुलगते सवाल’ है। पुस्तक मेले में दलित दस्तक के स्टॉल हॉल नंबर 12A के स्टॉल नंबर 331 पर इन दोनों महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन साहित्यकार जय प्रकाश कर्दम द्वारा हुआ।

दास पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक शब्बीरपुरः जलते घर-सुलगते सवाल का विमोचन जाने-माने साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम, दलित दस्तक के संपादक अशोक दास, साहित्यकार-पत्रकार रूपचंद गौतम और लेखक डॉ. एन. सिंह ने किया। इस दौरान डॉ. एन. सिंह की पत्नी भी मौजूद रहीं। यह पुस्तक सहारनपुर में दलितों और सवर्ण राजपूतों के बीच हुए संघर्ष और उसके बाद भीम आर्मी की पूरी कहानी बयान करती है।

‘संत रविदास: एक समाज सुधारक, चिंतक और दार्शनिक’ पुस्तक का विमोचन

इस दिन दलित दस्तक के स्टॉल पर ही साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. रामभरोसे और ममता खांडल द्वारा संपादित पुस्तक ‘संत रविदास: एक समाज सुधारक, चिंतक और दार्शनिक’ का विमोचन भी हुआ। विमोचन वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम ने किया। इस दौरान दलित दस्तक के संपादक अशोक दास, लेखिका डॉ. पूजा राय, तेजस पुनिया, पुस्तक के प्रकाशक अनिता पब्लिशर के संतोष राय एवं डॉ. राम भरोसे के परिवारजन भी मौजूद रहें।

विश्व पुस्तक मेले में दलित दस्तक के स्टॉल पर आपको बहुजन साहित्य की ये किताबें भी मिलेगी

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नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेले में हॉल 12-12A में “दलित दस्तक” के स्टॉल नंबर 331 पर आपका स्वागत है। दलित दस्तक के स्टॉल पर मासिक पत्रिका और हमारे प्रकाशन ‘दास पब्लिकेशन’ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के अलावा ये अन्य प्रकाशकों की बहुजन साहित्य से जुड़ी तमाम पुस्तकें भी उपलब्ध है। हमारी कोशिश है कि विश्व पुस्तक मेले में दलित दस्तक को एक ऐसा मंच बनाया जाए, जहां अम्बेडकरी और बहुजन साहित्य से जुड़ी प्रमुख पुस्तकें उपलब्ध हो। हमारे स्टॉल पर जो पुस्तकें उपलब्ध हैं, उनकी सूची यूं है- ———————————————– (1) दलित दस्तक (मासिक पत्रिका) (2) बहुजन कैलेंडर 2019 (3) 50 बहुजन नायक- अशोक दास-पूजा राय (4) दलित एजेंडा 2050- डॉ. विवेक कुमार (5) राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर- डॉ. विवेक कुमार – अशोक दास (6) शब्बीरपुर: जलते घर- सुलगते सवाल- डॉ. एन. सिंह (7) करिश्माई कांशीराम- अशोक दास (8) दलित पैंथर- शरण कुमार लिम्बाले (9) वीरांगना झलकारी बाई- मोहनदास नैमिशराय (10) हरिजन से दलित – राजकिशोर (11) मोहन दास- उदय प्रकाश (12) अछूत- दया पंवार (13) हकमार वर्ग- एच.एल. दुसाध (14) 2019, भारत के इतिहास में बहुजनों की सबसे बड़ी लड़ाई- एच.एल. दुसाध (15) एजुकेशन डाइवर्सिटी- एच.एल. दुसाध (16) बाबासाहेब अम्बेडकर (जीवन चरित)- धनंजय कीर (17) भगवान बुद्ध: धम्म सार और चर्या- आनंद श्रीकृष्ण (18) नदियां बहती रहेंगी (कविता संग्रह)- राकेश कबीर (19) सुलगते अहसास (कविता संग्रह) नविला सत्यदास (20) सपनों के पंख (कविता संग्रह) पूजा राय (21) जोहरी (कहानी संग्रह) डॉ. कौशल पंवार (22) दलित पिछड़ो के मुक्ति के सवाल- मुद्राराक्षस (23) पासी समाज दर्पण- राम प्रकाश सरोज (24) चमार जाति का गौरवशाली इतिहास- सतनाम सिंह (25) धोबी समाज, संक्षिप्त इतिहास- भगवान दास-सतनाम सिंह (26) सफाई देवता- ओमप्रकाश वाल्मीकि (27) जूठन (पार्ट-1&2)- ओमप्रकाश वाल्मीकि (28) सलाम- ओमप्रकाश वाल्मीकि (29) छप्पर – जय प्रकाश कर्दम (30) मुर्दहिया- डॉ. तुलसी राम (31) मणिकर्णिका- डॉ. तुलसी राम (32) दलित ब्राह्मण- शरण कुमार लिम्बाले (33) गुलामगिरी- महात्मा ज्योतिराव फुले (34) जाति भेद का उच्छेद- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (35) अछूत कौन और कैसे- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (36) युवाओं के लिए बुद्ध- एस. भट्टाचार्य (37) संत रविदास: एक समाज सुधारक, चिंतक और दार्शनिक (38) गोंड: उत्पत्ति, इतिहास तथा संस्कृति- अनुराधा पॉल (39) आदिवासी दुनिया – हरिराम मीणा (40) मैं नास्तिक क्यों हूँ- भगत सिंह (41) भगवान बिरसा मुंडा (42) बहुजनों बिजनेस की ओर बढ़ो- डॉ. एम.एल. परिहार

Dalit Literature at world book fair
dalit dastak at world book fair
 

5-13 जनवरीः विश्व पुस्तक मेले में इन स्टॉलों पर मिलेगा अम्बेडकरी साहित्य

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विश्व पुस्तक मेले में दलित दस्तक का स्टॉल

नई दिल्ली। हर साल की भांति इस साल भी विश्व पुस्तक मेला आ चुका है। किताबों की यह दुनिया देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 5 जनवरी से 13 जनवरी तक सजेगी। विश्व पुस्तक मेले की खासियत यह है कि यहां देश-दुनिया के तमाम भाषाओं कि किताबें मिलती है। यह मेला सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक चलता है।

नौ दिनों तक पुस्तक मेला दलित-बहुजन साहित्यकारों की गतिविधियों का भी केंद्र रहेगा। विश्व पुस्तक मेले में अम्बेडकरी साहित्य की मौजूदगी की बात करें तो पिछले कुछ सालों में यहां अम्बेडकरी, बहुजन और बौद्ध साहित्य की मांग काफी बढ़ी है। आलम यह है कि सामान्य प्रकाशकों से ज्यादा भीड़ बहुजन साहित्य उपलब्ध कराने वाले स्टॉल पर रहती है। अम्बेडकरी और बौद्ध आंदोलन से जुड़े लोगों की इस मांग को पूरा करने के लिए हर साल की भांति इस साल भी बहुजन समाज के प्रकाशक विश्व पुस्तक मेले में मौजूद रहेंगे। इसमें सम्यक प्रकाशन, गौतम बुक सेंटर और दलित दस्तक का नाम खासतौर पर लिया जा सकता है। इन तीनों स्टॉलों से आप बहुजन साहित्य ले सकते हैं। पाठकों के लिए अच्छी बात यह है कि तीनों स्टॉल प्रगति मैदान के हॉल नंबर 12A में हैं।

सम्यक प्रकाशन का स्टॉल नंबर 147 से 150 तक है। जबकि गौतम बुक सेंटर का स्टॉल नंबर 38 है। जहां तक दलित दस्तक की बात है तो इसका स्टॉल नंबर 331 है। दलित दस्तक के स्टॉल से आप ‘दलित दस्तक’ मासिक पत्रिका की सदस्यता भी ले सकते हैं। (यहां से सभी कैलेंडर का पेज दिखाना है। लिंक नीचे दे रहा हूं, वहां मिल जाएगा) इसके अलावा स्टॉल पर बहुजन नायकों के भव्य चित्रों और उनके विचारों से सजा साल 2019 का भव्य बहुजन कैलेंडर भी ले सकते हैं। इस कैलेंडर की चर्चा मीडिया और बुद्धिजीवियों में भी है। (यहां कैलेंडर का लिंक दिखाना है।)

दलित दस्तक के स्टॉल पर विदेशी सैलानी भी पहुंचे

दलित दस्तक के ही प्रकाशन “दास पब्लिकेशन” द्वारा प्रकाशित तकरीबन दर्जन भर विशेष पुस्तकें भी इस स्टॉल पर रहेंगी। इसमें सहारनपुर और भीम आर्मी से जुड़े पूरे घटनाक्रम की पड़ताल करती नई प्रकाशित पुस्तक शब्बीरपुरः जलते घर-सुलगते सवाल और 50 बहुजन नायक सहित अन्य किताबें मिलेंगी।

कुल मिलाकर विश्व पुस्तक मेले के भीतर अम्बेडकरी साहित्य की एक अलग दुनिया सजेगी। दलित दस्तक आप सबका विश्व पुस्तक मेले में स्वागत करता है।

 

नए साल पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने किए दो धमाके

नई दिल्ली। साल 2019 के आगमन पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने देश भर के लोगों को बधाई दी है। अपने संदेश में बसपा प्रमुख ने खासतौर पर देश के वीर सैनिकों, पुलिस और जवानों को बधाई देते हुए गरीब, मजदूर और किसानों की बेहतरी की कामना की है। इस दौरान मीडिया को जारी अपने बयान में बसपा प्रमुख ने दो बड़ी बात कही है।

बसपा प्रमुख ने तीन तलाक विधेयक और मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के मसले का जिक्र करते हुए दो महत्वपूर्ण बात कही है। तीन तलाक पर अपने बयान में यूपी की पूर्व मुखिया ने विपक्ष की हां में हां मिलाया है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार को ‘‘तीन तलाक विधेयक-2018’’ को पहले ‘‘संयुक्त संसदीय प्रवर समिति’’ के पास विचार-विमर्श के लिए भेजने की समूचे विपक्ष की मांग को मान लेना चाहिए।

इसके अलावा मायावती ने मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के सामने कई मांगे रखते हुए, इन्हें नहीं मानने पर समर्थन देने पर पुनर्विचार करने की धमकी दे डाली। बसपा प्रमुख ने कहा कि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस पार्टी की नई बनी सरकारों को किसानों व बेरोजगारों के हितों में तत्काल सार्थक कदम उठाने की जरूरत है। इसके साथ ही बसपा प्रमुख ने 2 अप्रैल 2018 को एससी-एसटी एक्ट के विरोध में किए गए भारत बंद के दौरान राजनीतिक द्वेष के कारण गिरफ्तार किए गए लोगों के मामले तुरंत वापस लेने और खत्म करने की मांग की.

मायावती ने कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार ऐसा नहीं करती है तो बी.एस.पी. को इनको बाहर से समर्थन देने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

Team MIP to commence its free Mock Interview Program

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Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence Dr. B. R. Ambedkar

Mock Interview Program, an ongoing annual interview preparation module which has been running successfully for the past four years is back. This is a team of dedicated and socially committed individuals comprising of officers and academics from leading backgrounds to groom and prepare candidates for the UPSC interview commencing from 4th of February 2019. The MIP team has successfully guided over 150 candidates in the past four years to help them achieve their goals.

The panel comprises of senior retired and serving bureaucrats with years of experience and academics who are subject experts from leading universities and committed to pay back to the society. The Mock Interview Program thrives on the trickle down effect where the previously selected candidates join our team as mentors to groom the new candidates. This one on one grooming and mentoring as proved extremely beneficial in the past as evident by our success rate and more importantly by our ever widening circle of MIP.

The mock interview are free of cost and are held on Saturday and Sunday. A detailed analysis of DAF with probable questions is provided along with a video recording of the interview for the candidates to assess their performance.

The candidates may kindly register via www.ektatrust.org.in or may email their DAFs to jaibheem.mip@gmail.com. The contact number for queries is +91 9654895753. The interviews are held at H.No 6669 , block no. 9 street no. 7 Dev Nagar Karol Bagh, Delhi 05.

Report- Pooja Paswan

अब यूपी के बहुजन सहयोगियों ने उड़ाई मोदी की नींद

लखनऊ। 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की छटपटाहट साफ दिख रही है. तो इस बीच एनडीए के बहुजन नेताओं ने भाजपा की मुश्किल बढ़ा दी है. शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल के महत्वपूर्ण जिले गाजीपुर में होने वाली रैली में शामिल नहीं होकर स्थानीय दिग्गज और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने साफ कर दिया कि भले ही केंद्र में मोदी का राज हो पूर्वांचल में उनका सिक्का चलता है. तो वहीं पीएम मोदी की रैली में शामिल नहीं होकर उन्होंने भाजपा और पीएम मोदी को असहज भी कर दिया.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज के दो महत्वपूर्ण नेताओं के इस विद्रोह से यूपी में पहले ही मुश्किल में फंसी भाजपा अब और घिर गई है. एनडीए में शामिल इन दोनों नेताओं की बात करें तो ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार में मंत्री हैं, जबकि अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. अनुप्रिया पटेल की पार्टी के अध्यक्ष आशीष पटेल ने कुछ दिन पहले ही प्रदेश सरकार द्वारा अपना दल के नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाया था, जबकि ओमप्रकाश राजभर तमाम मुद्दों को लेकर लगातार मोदी से लेकर योगी तक पर निशाना साधते रहे हैं.

बिहार में बहुजन नेताओं की गोलबंदी के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी बहुजन नेताओं के आंख तरेरने के क्या मायने हैं. इस पर राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार का कहना है कि यह बहुजन नेताओं की हुंकार है. दलित और पिछड़े नेता अब राजनीति में अपनी हिस्सेदारी को छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि वह अपने प्रतिनिधित्व की मांग को जोर-शोर से उठा रहे हैं. दोनों नेताओं के विरोध को इसी रूप में देखना होगा.”

जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के अपने दो सहयोगियों की बगावत से भाजपा बौखलाई हुई है. इससे पहले ही बिहार में मुसीबत में फंसी भाजपा यूपी में भी बहुजन नेताओं के चक्रव्यूह में उलझती दिख रही है. देखना होगा कि इस राजनीतिक चक्रव्यूह में विजय किसकी होती है.

क्या भाजपा की चाल है, फिल्म ‘ The Accidental Prime Minister’

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर बनी फिल्म ‘The Accidental Prime Minister’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. रिलीज होने के बाद ही फिल्म विवादों में है. कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता जहां फिल्म को लेकर आपत्ति जता रहे हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी फिल्म को प्रोमोट करने में जुट गई है. भाजपा के उत्साह का आलम यह है कि उसने इस फिल्म के ट्रेलर को अपनी पार्टी के ट्विटर हैंडल से ट्विट भी किया है.

यह फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की लिखी किताब ‘The Accidental Prime Minister’ पर आधारित है. संजय बारू मई 2004 से अगस्त 2008 तक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे. यहां से इस्तीफा देने के बाद 2014 में उन्होंने यह किताब लिखी थी. इस किताब के सामने आने के वक्त भी हंगामा हुआ था, जो कि फिल्म की रिलीज के बाद एक बार फिर उभर आया है.

हालांकि पहले यह किताब आने और अब 2019 चुनाव के ठीक पहले इस पर बनी फिल्म के रिलीज होने पर सवाल उठना लाजिमी है. दरअसल ट्रेलर में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मनमोहन सिंह गांधी परिवार की कठपुतली थे. ऐसे में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्म के जरिए गांधी परिवार खासकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाना बनाया गया है.

यहां एक तथ्य यह भी है कि सिर्फ मनमोहन सिंह ही नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में कई अन्य भी ‘Accidental Prime Minister’ हुए हैं. इसमें चौधरी चरण सिंह, इंद्रकुमार गुजराल, चंद्रशेखर और एच.डी देवेगौड़ा का नाम लिया जा सकता है. चौधरी चरण सिंह की बात करें तो वो 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री बने. उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था लेकिन कांग्रेस ने 19 अगस्त को उनसे समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिर गई.

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी एक अनोखे घटनाक्रम में साल 1990 में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 को देश के प्रधानमंत्री बने और उन्हें 21 जून 1991 को इस्तीफा देना पड़ा. वह सिर्फ छह महीने ही प्रधानंत्री के पद पर रह पाएं. इंद्र कुमार गुजराल के बारे में तो कहा जाता है कि उन्हें सुबह जगाकर बताया गया कि उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनना है. ऐसे में सिर्फ डॉ. मनमोहन सिंह को एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर कहना गलत है.

यह फिल्म 11 जनवरी 2019 को रिलीज होगी. इस फिल्म में डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर की बात करें तो उनके बयान और प्रतिबद्धता भारतीय जनता पार्टी के करीब दिखती है. उनकी पत्नी किरण खेर भी भाजपा की सांसद हैं. ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इस फिल्म को सबने साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी और इसके प्रमुख नेता सोनिया एवं राहुल गांधी को घेरने के लिए बनाया है? ताकि 2019 के चुनाव में भाजपा और मोदी को इसका लाभ मिल सके.

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अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को  असंवैधानिक  न ठहराएं.: रविशंकर प्रसाद

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली 25.12.2018) के हवाले से,  अगर संवैधानिक नैतिकता सरकार की कार्रवाई की कसौटी है तो इसे एकदम स्पष्ट परिभाषित किये जाने की जरूरत है, यह अलग-अलग न्यायाधीशों के लिए भिन्न नहीं हो सकतीं. इसमें हर हाल में सहमति और समरूपता होनी चाहिए. यह भी कि संवैधानिक नैतिकता स्पष्ट होनी चाहिए.
यह बात कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान दिवस के मौके पर विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में बोलते हुए कही. कानून मंत्री यह टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि कई बार अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहरा देती हैं. ऐसे में कानून मंत्री का संवैधानिक नैतिकता को स्पष्ट परिभाषित किये जाने और उसके न्यायिक मानक तय किये जाने की जरूरत पर बल देने के मायने निकलते हैं. कानून मंत्री के इस बयान में क्या यह अंतरनिहित नहीं लगता कि अदालतो को सरकार कैसे ही भी काम हों — नैतिक अथवा अनैतिक, उन पर सवाल खड़े किए जाने चाहिएं.
संवैधानिक नैतिकता को परिभाषित करने की जरूरत पर बल देते हुए कानून मंत्री ने कहा कि हमने संवैधानिक नैतिकता के बारे में काफी सुना है. मै सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि इसे बहुत बारीकी से स्पष्ट किये जाने की जरूरत है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब सरकार की कार्रवाई को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर संविधान की खिलाफत करने वाला बताया जाता है तो फिर उसके बारे में हर हाल में न्यायिक मानक तय होने चाहिए जिनके आधार पर उसका निर्धारण हो. जैसे अनुच्छेद 14 ‘समानता’ और अनुच्छेद 21 ‘स्वतंत्रता’ के अधिकार का मुद्दा.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि  संविधान की सलाह नहीं मानना अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने संविधान की खासियतों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मुश्किल समय में मार्ग दर्शन करता है. हमारे लिए हितकारी है कि हम इसकी सलाह पर ध्यान दें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे हठ का नतीजा तेजी से अवसान और अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान दिवस सिर्फ समारोह मनाने का मौका नहीं है बल्कि हमे भविष्य का रोडमैप तैयार करना चाहिए. जस्टिस गोगोई ने कहा कि शुरूआत में हमारे संविधान को जटिल और बड़ा बताकर आलोचना की गई थी लेकिन पिछले सात दशकों ने साबित कर दिया कि यह कितना अच्छा है.
इस आयोजन के के राम मन्दिर का मुद्दा उठाते हुए न्यायधीश/शों  के सामने रविशंकर जी ने कहा कि  फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाए मंदिर केस. यह भी कि कानून मंत्री ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सवाल बताते हुए मंदिर विवाद को जल्द सुलझाने का अनुरोध किया.  …. सनझ नहीं आया कि ये उनका जस्टिस गोगोई को कोई सुझाव है अथवा कुछ और…. मुझे तो लगता है कि उनका सुझावे अपरोक्ष रूप से अदालत पर राजनीतिक द्वाब बनाने का एक राजनीतिक तरीका है. हैरत की बात तो ये रही कि केंद्रीय मंत्री की बात सुनते ही दर्शक दीर्घा में बैठे अधिवक्ता ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने लगे.
अफसोस तो ये रहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को नंदलाल बोस द्वारा लिखी गई संविधान की ‘मूल प्रति’ भेंट की. किताब के प्रथम पन्ने का जिक्र करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि मौजूदा संविधान से पहले ही पश्चिम बंगाल के नंदलाल बोस ने इस संविधान को लिख दिया था. इस पर महात्मा गांधी से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक के हस्ताक्षर हैं. मेरे मतानुसार रविशंकर जी का ये बयान एकदम तथ्यों से मेल नहीं खाता क्योंकि में  26 लोगों की संविधान कमैटी में न तो नन्दलाल बोस का नाम ही शामिल है. संदर्भ हेतु मैं उन 26 लोगों के नाम भी यहाँ देदे रहा हूँ.
पंडित जवाहर लाल नेहरू (सबसे पहले प्रधान मंत्री), सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य जे बी कृपलानी, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत, बाबा साहेब डॉं. बी आर अंबेडकर (ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष थे. इन्हें संविधान का निर्माता माना जाता है.), शरत चंद्र बोस, सी राजगोपालाचारी (इन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है), डॉं. सच्चिदानंद सिन्हा (संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष थे.), ए कृष्णास्वामी अय्यर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी पट्टाभि सीतारमैया- (संविधान सभा में हाउस कमेटी के अध्यक्ष थे.), के एम मुंशी, जी वी मावलंकर- (संविधान सभा की कार्रवाई समिति के अध्यक्ष  व लोकसभा के पहले अध्यक्ष थे.), एच सी मुखर्जी- (संविधान सभा में अल्पसंख्यकों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.), गोपीनाथ बारदोलोई, ए वी ठक्कर- (संविधान सभा में असम को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.),   बी एल मित्तर-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), सैयद मोहम्मद सादुह- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), डी पी खैतान-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी एन राव- (संविधान सभा के सलाहकार थे.), माधव राव- (बी एल मित्तर के इस्तीफे के बाद इन्हें संविधान की मसौदा निर्माण समिति का सदस्य नियुक्त किया गया था.), टी टी कृष्णमाचारी- (डी पी खैतान के निधन के बाद इन्हें ही संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति में जगह दी गयी थी.), एन गोपालस्वामी अयंगर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), श्री हरे कृष्ण महताब- (यह संविधान सभा के सदस्य थे), एम आसफ अली- (यह संविधान सभा के सदस्य थे.) तथा भारत की जनता- संविधान के निर्माण में, उसके अनुपालन में और उसके प्रति आस्था की अभिव्यक्ति में भारतीय जनता का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि यह पूरा संविधान हम भारत के लोगों के द्वारा ही अंगीकृत और आत्मार्पित है.
ये बात सही है कि आजादी मिलने से पहले ही स्वतंत्रता सेनानियों के बीच संविधान निर्माण की बात होने लगी थी. तब उन्होंने एक संविधान सभा का गठन किया. संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में हुई. संविधान सभा के कुल 389 सदस्य थे, लेकिन उस दिन 200 से कुछ अधिक सदस्य ही बैठक में उपस्थिति हुए. हालांकि 1947 में देश के विभाजन और कुछ रियासतों के संविधान सभा में हिस्सा ना लेने के कारण सभा के सदस्यों की संख्या घटकर 299 हो गयी.
दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र के लिये संविधान निर्माण कोई आसान काम नहीं था, तभी इसके निर्माण में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे. इस दौरान 165 दिनों के कुल 11 सत्र बुलाये गये. देश की आजादी के कुछ दिन बाद 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिये डॉं. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया. 26 नवंबर 1949 को हमारा संविधान स्वीकार किया गया और इसके कुछ अर्टिकिल लागू भी कर दिए किंतु पूर्ण रूप 24 जनवरी 1950 को 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर करने 26 जनवरी 1950 को हमारा सिंवधान लागू किया गया तो उसके साथ ही संविधान सभा भंग कर दी गयी.
यथोक्त के आलोक में पता नहीं रवि शंकर जी कहते है कि नन्दलाल बोस ने जो संविधान लिखा वर्तमान संविधान से पहले लिखा गया था जिस पर गान्धी जी और डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के हस्ताक्षर भी है. भला नन्दलाल बोस ने किस अधिकार के चलते ऐसा किया गया होगा, इसके उल्लेख भी नहीं किया गया है. दूसरे यह कि संविधान को 26 लोगों की अधिकारिक टीम को सविधान  बनाने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे, अब नन्दलाल बोस जी को कि तथाकथित संविधान को बनाने में कितना समय लगा होगा. वैसे भी नन्दलाल जी के पास इतने संशाधन ही न थे जिससे वो इस प्रकार का कोई काम कर सकते. बता दें कि नन्दलाल बोस का जन्म दिसंबर 1882 में बिहार के मुंगेर नगर में हुआ. उनके पिता पूर्णचंद्र बोस ऑर्किटेक्ट तथा महाराजा दरभंगा की रियासत के मैनेजर थे. 16 अप्रैल 1966 कोलकाता में उनका देहांत हुआ. उन्होंने 1905 से 1910 के बीच कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्ट में अबनीन्द्ननाथ ठाकुर से कला की शिक्षा ली, इंडियन स्कूल ऑफ़ ओरियंटल आर्ट में अध्यापन किया और 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे.
अब देखने की बात ये है कि जो नन्दलाल बोस जी 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे. अब ये कैसे माना जा सकता है कि नन्दलाल् बोस ने अपने स्तर पर किसी संविधान की रचना की होगी. हाँ! ये सच है कि एक केन्द्रीय मंत्री के प्रस्ताव पर विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रों से सजाने का मौका दिया गया था. नंदलाल बोस की मुलाकात पं. नेहरू से शांति निकेतन में हुई और वहीं नेहरू जी ने नंदलाल को इस बात का आमंत्रण दिया कि वे भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रकारी से सजाएं. 221 पेज के इस दस्तावेज के हर पन्नों पर तो चित्र बनाना संभव नहीं था. लिहाजा, नंदलाल जी ने संविधान के हर भाग की शुरुआत में 8-13 इंच के चित्र बनाए. संविधान में कुल 22 भाग हैं. इस तरह उन्हें भारतीय संविधान की इस मूल प्रति को अपने 22 चित्रों से सजाने का मौका मिला. इन 22 चित्रों को बनाने में चार साल लगे. इस काम के लिए उन्हें 21,000 मेहनताना दिया गया. नंदलाल बोस के बनाए इन चित्रों का भारतीय संविधान या उसके निर्माण प्रक्रिया से कोई ताल्लुक नहीं है. वास्तव में ये चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा हैं. सुनहरे बार्डर और लाल-पीले रंग की अधिकता लिए हुए इन चित्रों की शुरुआत होती है भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक की लाट से. अगले भाग में भारतीय संविधान की प्रस्तावना है, जिसे सुनहरे बार्डर से घेरा गया है. मैं समझता हूँ कि नन्दलाल बोस जी द्वारा बनाए गए अन्य चित्रों का उल्लेख करता विषय संगत नहीं है.
चर्चा तो ये भी है कि राफेल केस के चलते हमारे कानून मंत्री और प्रधान सेवक ने नवनियुक्त चीफ जस्टिस गोगोई से उनके घर पर नहीं अपितु गोगोई जी के कार्यालय/ कोर्ट परिसर में मिले थे. इस फोटो के नीचे लिखा हुआ है, “अब जरा सोचिए इतिहास में पहली बार कोई पीएम प्रोटोकॉल तोड़कर किसी न्यायाधीश से मिलने उसके घर पहुंच जाए. उसके बाद तो क्लीनचिट मिलनी ही है.”
इसी बीच जब राफेल के मामले में सुप्रीम कोटे राफेल मामले क्लीन चिट दे दी जाती है तो लोगों का ये कयास लगाना शायद गलग नहीं होगा कि हो सकता कोर्ट का ये निष्कर्ष राजनीतिक दवाब में लिया गया फैसला है. … इसलिए भी कि जब विपक्ष और अन्य बुद्धीजीवियों द्वारा इस प्रकरण को जनता के बीच जोरों से उछाल दिया तो सरकार सुप्रीम कोर्टे में तथ्यात्मक सुधार करने के लिए याचिका दायर कर दी है जिससे सिद्ध होता है कि सरकार के द्वारा कोर्टे में गलत जानकारियां दी गई हैं. खैर! अब मूल मुद्दे पर आते है कि कानून मंत्री द्वारा दिए गए बयान से एक तीर से तीन शिकार करने जैसा है. पहला – अदालतों की कार्यप्रक्रिया पर अपरोक्ष रूप से सरकार के दवाब मानवाना कि सरकार के द्वारा किए गए किसी भी काम को संवैधानिक ढांचे में ढालें, दूसरे – राम मन्दिर का मुद्दा उठाकर सरकार ने अदालत को जैसे चुनौती ही है कि राममन्दिर का फैसला जल्दी जल्दी किया जाए. रविशंकर 2019 के चुनावों की चिंता भी सता रहा है तभी तो राममन्दिर के निर्माण का मुद्दा उठाकर वो रामभक्तों को ये संदेश देना चाहते हैं कि प्रयासों में को कमी नहीं रही है.  और तीसरे – नन्दलाल बोस को अधिकारिक संविधान से पहले की रचना का श्रेय देकर वो अधिकारिक संविधान समिति के सदस्यों और डा. अम्बेडकर के संविधान निर्माण के काम को नकार कर समिति के सदस्यों का अपमान भी करते हैं….. मूल रूप से मंत्री जी यहाँ बाबा साहेब अम्बेडकर की छवि को धूमिल करने का प्रयास करते दिखते हैं.

सरकारी योजनाओं से गरीबी उन्मूलन संभव नहीं

आजादी के बाद से ही गरीबों की दशा सुधारने के लिए सरकार कल्याणकारी योजनाएं चलाती रही है. आज स्वतंत्रता के 71 साल बीत जाने के बाद भी गरीबों की दशा नहीं सुधरी है, बल्कि गरीबी बढ़ी ही है. इसके पीछे कारण यह है कि एक तो सरकारी योजनाओं की पहुंच पात्र जरूरतमंदों तक शत-प्रतिशत नहीं है, दूसरा  इन योजनाओं के मॉडल में गरीबी उन्मूलन का मंत्र नहीं है. गरीबों के लिए ये वेलफेयर योजनाएं पेन किलर की तरह हैं, जो दर्द से कुछ पल के लिए राहत देती हैं, लेकिन दर्द का स्थाई इलाज नहीं करती हैं. इस बात की तस्दीक कोसी क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने के लिए किया गया कोसी प्रतिष्ठान का ग्राउंड सर्वे भी करता है. कोसी क्षेत्र के किसानों के जीवन, उनके सामाजिक-आर्थिक हालात, उनकी खेती-किसानी की स्थिति, कृषि पैदावार, पशुपालन, शिक्षा व स्वास्थ्य, लोगों को मिल रही सरकारी सुविधाएं और यहां की लोक कलाओं की दशा को समझने के लिए कोसी प्रतिष्ठान के इस सर्वेक्षण में सरकारी योजनाओं पर आए नतीजे में उपरोक्त दोनों बातें पुष्ट हुई हैं.
दरअसल, देश के अन्य हिस्सों की तरह कोसी क्षेत्र में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), अंत्योदय, वृद्धा पेंशन, मनरेगा, इंदिरा आवास (अब इसका नाम प्रधानमंत्री आवास हो गया है), मिड-डे मील, किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सरकारी योजनाएं चल रही हैं और 2014 में नई सरकार आने के बाद जनधन खाता, शौचालय, गैस कनेक्शन देने के लिए उज्ज्वला जैसी योजनाएं शुरू हुई हैं. कुल मिलाकर इस वक्त गरीबों के लिए 10 से अधिक सरकारी योजनाएं चल रही हैं, जिसमें पीडीएस के तहत राशन का अनाज, अंत्योदय के तहत मुफ्त अनाज, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मुफ्त घर, मनरेगा के तहत साल में सौ दिन रोजगार, पक्का शौचालय के लिए बारह हजार रुपये मदद, मुफ्त गैस कनेक्शन के लिए उज्ज्वला स्कीम, रियायती बिजली, सामाजिक पेंशन, जनधन खाता, द्वार तक पक्की सड़क, खेती-पशुपालन व व्यवसाय के लिए रियायती कर्ज और किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा जैसी योजनाएं शामिल हैं, लेकिन इनकी पहुंच पात्र लाभार्थी तक पर्याप्त नहीं है. कोसी प्रतिष्ठान के दो गांव- कालिकापुर और लक्ष्मीनियां के 811 परिवार के सैंपल के आधार पर सरकारी सुविधाओं और उनकी पहुंच पर किए गए सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले आए हैं.
इन दोनों गांव में दस सबसे गरीब परिवार जिनकी सालाना आय 18 से 40 हजार रुपये के बीच है, उन्हें राशन का अनाज नहीं मिल रहा है और 15 अमीर परिवार जिनकी सालाना आय चार से नौ लाख के बीच है, उन्हें राशन का अनाज मिल रहा है. कुछेक जमींदार परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें अंत्योदय योजना के तहत मुफ्त राशन मिल रहा है. दोनों गांव में 88.40 प्रतिशत परिवार राशन का अनाज ले रहे हैं. मात्र 28.11 फीसदी परिवार ही गैस चूल्हा का प्रयोग कर रहे हैं. पक्का शौचालय केवल 30.45 फीसदी परिवार के पास है, जबकि लक्ष्मीनियां पंचायत पूर्ण ओडीएफ मुक्त घोषित है. ये दोनों गांव इसी पंचायत में आते हैं. शौचालय के लिए केवल 16.40 फीसदी लोगों को ही सरकारी योजना के तहत पैसे मिले हैं. शौचालय के लिए सरकारी मदद पाने के लिए 35.26 फीसदी लोगों को कमीशन देना पड़ा है. प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ केवल 37.23 प्रतिशत परिवार को ही मिला है. मनरेगा का फायदा केवल 22.19 फीसदी लोगों को ही मिल रहा है. पक्की सड़क 29.46 फीसदी परिवार के दरवाजे तक है. सरकारी कर्ज में से कृषि कर्ज का लाभ केवल 1.84 फीसदी परिवारों ने लिया, पशुपालन के लिए कर्ज लेने वाले केवल 0.24 प्रतिशत हैं तो व्यवसाय के लिए किसी ने भी कर्ज नहीं लिया है.
सामाजिक पेंशन, किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा पर सर्वे चुप है. हां, जनधन खाता 87.05 फीसदी के पास है और बिजली का प्रयोग 94.57 फीसदी लोग कर रहे हैं. ये आंकड़े बता रहे हैं कि सुशासन बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दावों के विपरीत सरकारी योजनाओं की पहुंच की स्थिति दयनीय है. केवल जनधन व बिजली को छोड़ दिया जाय तो अन्य किसी भी सरकारी योजनाओं की पहुंच संतोषजनक नहीं है.
यूं तो कहने के लिए यह हालत दो गांवों की है, लेकिन समग्रता में देखा जाय तो यही हालत पंचायत की है, अंचल की है, जिला की है, राज्य की है और देश की है. आपको जानकर हैरानी होगी कि बिहार सरकार के अपने आंकड़े के मुताबिक करीब 60 से 65 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. 2010 में बिहार सरकार ने डाटा जारी किया था कि 1.40 करोड़ परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं. हर परिवार में औसत चार लोग भी मान लें तो लगभग साढ़े पांच से छह करोड़ लोग बीपीएल में हैं, जबकि जनसंख्या दस करोड़ है. यानी बिहार की आधी से अधिक आबादी गरीब. विश्व बैंक के मुताबिक भी समूचे देश के 29 राज्यों में से बिहार सबसे कम आय वाला राज्य है. विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2005 से साल दर साल बिहार में गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई है. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भी बिहार देश का सबसे निर्धन राज्य है. बिहार के 41. 4 फीसदी लोग बीपीएल श्रेणी में हैं. ध्यान देने वाली बात है कि 2005 से सुशासन बाबू नीतीश कुमार लगातार बिहार में विकास होने का दावा कर रहे हैं. इस दावे के बावजूद हर साल करीब 44 लाख लोग गरीबी के चलते जीविका के लिए बिहार से पलायन कर रहे हैं. बड़ा सवाल है आखिर कई सरकारी योजनाओं व सुविधाओं के बावजूद बिहार क्यों गरीबी से बाहर नहीं आ रहा है, यहां क्यों लगातार गरीबों की संख्या बढ़ रही है? इसका मतलब है कि इन सरकारी योजनाओं में खामियां हैं, वे गरीबी दूर करने के अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रही हैं, या यूं कहें कि इन सरकारी योजनाओं के बूते गरीबी दूर करना संभव ही नहीं है, क्योंकि इनमें गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने की अवधारणा ही नहीं है. यह जरूर कहा जा सकता है कि ये सरकारी योजनाएं लोगों को गरीब बनाए रखने के लिए हैं. सपाट शब्दों में कहें तो मनरेगा, पीडीएस, अंत्योदय, सामाजिक पेंशन, पीएम आवास जैसी तमाम वेल्फेयर स्कीमें लोगों को गरीब बनाए रखने का सरकारी प्रपंच मात्र है और यह देशभर में किया जा रहा है. इस प्रपंच को उदाहरण से समझा जा सकता है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक पात्र को घर बनाने के लिए सवा लाख रुपये की सहायता दी जाती है. भ्रष्टाचार का हिस्सा कटने के बाद लाभार्थी को करीब एक लाख रुपये मिलता है. इतने कम पैसे में कैसा घर बनेगा और कितने दिन टिकेगा, सहज अनुमान लगाया जा सकता है. लेकिन सरकारी आंकड़े में दर्ज हो जाएगा कि अमुक व्यक्ति को आवास मिल गया.
देश में गरीबों के नाम पर सरकारी योजनाओं का प्रपंच पहली पंचवर्षीय योजना से चल रहा है. आठवीं पंचवर्षीय योजना तक सरकार के प्रशासनिक व्यय के बाद आम बजट का सबसे अधिक हिस्सा गरीबी उन्मूलन के नाम से सामाजिक योजनाओं पर खर्च किया गया. 90 के दशक के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीति अपनाने के पश्चात सरकार योजनाओं पर खर्च कम करने के उपायों पर चर्चा जरूर की, लेकिन वोट बैंक दरकने के डर से व्यापक पैमाने पर बजट घटाने की हिम्मत नहीं जुटा सकी. अभी 71 साल पर नजर डालें तो गरीबी उन्मूलन के लिए पचास से अधिक नामों से योजनाएं चलाई गर्इं, इसके लिए लाखों करोड़ रुपये खर्च किए गए, तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा तो केवल मनरेगा पर खर्च किया जा चुका है. हर पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन का बजट बढ़ता गया है. आज के रुपये के मूल्य के हिसाब से देखें तो अब तक औसतन 70 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा गरीबी उन्मूलन पर खर्च किया जा चुका है, लेकिन गरीबी नहीं हटी, गरीबी कम भी नहीं हुई. हां, शहर में 32 रुपये और गांव में 26 रुपये रोजाना खर्चने वाले को अमीर ठहरा कर आंकड़ों में गरीबी कम करने की बेशर्मी जरूर दिखाई गई.
किसी की नीयत ही नहीं
दरअसल किसी भी सरकार की मंशा ही नहीं है कि गरीबी हटे? सबकी इच्छा इस नासूर को बनाए रखने की है. वजह भी है. गरीब नहीं रहेंगे तो योजनाएं किसके लिए बनेंगी, भ्रष्टाचार की मलाई कैसे मिलेगी, वोट बैंक कैसे तैयार होगा? गरीबों के नाम पर चल रही योजनाओं में किस कदर भ्रष्टाचार है, यह किसी छिपा नहीं है. एक रुपये में 15 से 20 पैसे ही पात्र लाभार्थी को मिल पाते हैं. लोगों ने कोसी बाढ़ के बाद सरकारी मुआवजे में भ्रष्टाचार का दैत्य चेहरा देखा है. आपको पता है कि संविधान का लक्ष्य ही लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है, जिसमें सरकार का दायित्व है कि वह हर जनता को रोटी, रोजी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सूचना उपलब्ध करवाए, लेकिन 68 साल के गणतंत्र में सरकारें संविधान के लक्ष्य हासिल करने में विफल रही हैं. सरकारों ने केवल जनकल्याण के नाम पर खैराती सुविधाओं की डुगडुगी थाम रखी है. आज जनकल्याण के नाम पर जितनी भी सरकारी योजनाएं हैं, उनमें गरीबी दूर करने की दृष्टि नहीं है, उनमें गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने का सूत्र नहीं है, बल्कि यह कहने में हर्ज नहीं कि ये तमाम योजनाएं गरीबों को गरीब बनाए रखने के लिए ही हैं. देश में गरीबी बनाए रखने की सरकारी साजिश में सभी सरकारें शामिल हैं. बिहार ही नहीं देश के सभी राज्यों में गरीबी की दारूण स्थिति है.
देश के बड़े हिस्से में गरीब भूख, कुपोषण व बीमारी का सामना कर रहे हैं. उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार, न्याय नसीब नहीं हो रहे हैं. बड़ा सवाल है कि एक राज्य की दशा सुधारने के लिए एक सरकार को कितना वक्त चाहिए? 10 साल, 15 साल, 20 साल या 30 साल? हमारे देश में किसी एक दल की सरकार को 34 साल तक का वक्त मिला है. किसी एक नेता को 10 से 23 साल तक शासन का वक्त मिला है, लेकिन गरीबों की दशा नहीं सुधरी है. ज्योति बसु, करुणानिधि, पवन चामलिंग, माणिक सरकार, लालू यादव, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, शीला दीक्षित, तरुण गोगोई, चंद्रबाबू नायडू, प्रकाश सिंह बादल, मुलायम सिंह यादव, मायावती, जयललिता, एनटी रामाराव जैसे नेता 10 से 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि देश के सभी बड़े नेता को पर्याप्त समय तक शासन का अवसर मिला है और सभी प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों को भरपूर समय तक सत्ता मिली है. सभी प्रमुख राजनीतिक विचारधारा-वामपंथ, समाजवादी, मध्यमार्ग, मिश्रित पूंजीवादी, राष्ट्रवादी-दक्षिणपंथ को साबित करने का समय मिला है. लेकिन आजादी के 71 साल बाद आज कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहां गरीबी नहीं है और वहां पीडीएस-अंत्योदय-मनरेगा जैसे पेटभरू कार्यक्रम नहीं चल रहे हैं, भूख से मौतें नहीं हो रही हैं व लोग सतत गरीबी के दरिद्रता चक्र में नहीं फंसे हुए हैं. मजेदार यह है कि आजादी से लेकर अब तक के हर चुनाव में गरीबी दूर करने का वादा रहा है, लेकिन गरीबी दूर नहीं हो सकी है. विश्व बैंक की 2015 में आई गरीबी मापने की नई विधि मोडिफाइड मिक्स्ड रिफरेंस पीरियड के मुताबिक भी भारत में अमेरिका के बराबर की आबादी करीब 27 करोड़ बीपीएल श्रेणी में हैं. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक मई 2016 में 27 करोड़ लोग भारत में गरीबी रेखा के नीचे थे. एशियन विकास बैंक के मुताबिक भारत में 22 फीसदी आबादी निहायत गरीब है, जबकि भूटान में 8.2 फीसदी व श्रीलंका में 4.1 फीसदी आबादी गरीब हैं. सरकार के नवीनतम आंकड़े के मुताबिक भी करीब 20 फीसदी यानी लगभग 26 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. आजादी के बाद देश ने जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह व नरेंद्र मोदी जैसे दूरदर्शी-विशेषज्ञ नेता-विचारक को भी देखा है. इसके बावजूद गरीबी कम नहीं हो पाई. इसलिए यह कहने में गुरेज नहीं कि गरीबी उन्मूलन के नाम पर चलाई गईं सरकारी योजनाएं फेल रहीं, हमारी नीतियां विफल रहीं, हमारी राजनीति विफल रही, हमारे नेता विफल रहे. आगे उम्मीद भी नहीं दिखाई देती, क्योंकि इन्हीं में से अधिकांश दल व चेहरे देश व राज्यों के सत्ता परिदृश्य में रहेंगे.
क्या है विकल्प
संविधान निर्माता और अर्थशास्त्री डा. भीमराव अंबेडकर ने गरीबी उन्मूलन के लिए आमदनी के स्थायी स्रोत के निर्माण की अवधारणा रखी थी. इसके लिए उन्होंने ‘स्टेट सोशलिज्म’ का सिद्धांत दिया था, जिसमें राज्य द्वारा हर परिवार को बिना भेदभाव स्थाई आजीविका उपलब्ध कराने की बात है. यह संभव है, लेकिन अब तक किसी सरकार ने व नेता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है. स्टेट सोशलिज्म का लक्ष्य ही बिना भेदभाव सभी नागरिकों का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उत्थान कर उनको आत्मनिर्भर बनाना है. मौजूदा व्यवस्था में भी अगर सभी सरकारी वेल्फेयर योजनाओं को मिलकर केवल रोजगार सृजन योजना ही चलाई जाय तो भी कुछेक साल में गरीबी उन्मूलन हो जाएगा. लेकिन सच पूछिए तो सरकारों की रुचि खैरात बांटने में है, जनता को परजीवी बना कर रखने में है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में नहीं है.
शंभू भद्रा

संकट में बहुजन राजनीति

हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने बहुजन राजनीति को असमंजस में डाल दिया है. एक ओर तो संविधान विरोधी RSS-BJP का सफाया होने से ST, SC, OBC और अल्पसंख्यकों ने राहत की साँस ली है, वहीं कांग्रेस की जीत ने “बहुजन समाज” के अपने राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

बाबासाहब अम्बेडकर ने १९३६ में Independent Labour Party(स्वतंत्र मज़दूर पार्टी) की स्थापना कर महाराष्ट्र से राजनीति में कदम रखा था. लेकिन ६ दिसंबर, १९५६ को उनके महापरिनिर्वाण के बाद, उनका अपने समाज को देश का हुक्मरान बनाने का सपना, उनके अनुयायी पूरा न कर सके. खुद बाबासाहब ने आगरा के ऐतिहासिक भाषण में इस बात पर दुःख जताया था कि मुझे ऐसा कोई भी नज़र नहीं आता, जो मेरे बाद इस कारवाँ को आगे ले जा सके. उनकी यह बात सच साबित हुई.

१९६० के दशक में साहब कांशी राम पूना के DRDO में नौकरी कर रहे थे. उनके अनुसार, उन्होंने बाबासाहब की मूवमेंट(आंदोलन) को खुद अपनी आँखों से खत्म होते देखा. उन्होंने कई बार इसके बारे में बताया कि वो तो फुले-शाहू-अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित होते जा रहे थे, लेकिन इसको चलाने वाले लोग एक-एक कर इसे छोड़ इधर-उधर भाग रहे थे, जिनमें ज़्यादा संख्या कांग्रेस में जाने वालों की थी. जब वो उनसे पूछते थे कि भई आप लोग बाबा के मिशन को छोड़कर क्यों जा रहे हैं ? उनका जवाब होता था कि “बाबा की विचारधारा तो चांगली(अच्छी) है, लेकिन होउ शकत नाही(हो नहीं सकता). इस विचारधारा पर चलकर हम राजनीति में MLA-MP नहीं बन सकते. जब हम MLA-MP नहीं बनते हैं, तो हमारा समाज भी हमारी कदर नहीं करता, इसलिए हम बाबा को छोड़कर बापू के चरणों में जा रहे हैं.

साहब इस नतीजे पर पहुँचे कि अगर हमें इस विचारधारा को राजनीति में आगे बढ़ाना है, तो फिर अपने लोगों को MLA-MP बनाकर विधानसभा और लोकसभा में भेजना ही होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर इतिहास अपने को दोहराएगा. जिस तरह से RPI को छोड़कर बाबा के लेफ्टिनेंट(अनुयायी) बापू के चरणों में गए; ठीक उसी तरह आज के हमारे नेता भी इस मूवमेंट को छोड़कर भाग खड़े होंगे.

१४ अप्रैल १९८४ को बहुजन समाज पार्टी बनाने के शुरुआती दिनों से ही उनका पूरा ज़ोर चुनावी रिजल्ट(नतीजों) पर था. उन्होंने नारा दिया कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा हराने के लिए और तीसरा जीतने के लिए लड़ा जायेगा. लेकिन वो इससे भी एक कदम आगे निकल गए. १९८५ में लड़े पहले पंजाब विधान सभा चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को हरवा डाला और १९८९ को लड़े दूसरे चुनाव में उन्होंने ३ सांसद और उत्तर प्रदेश में १३ विधायक जितवा लिए.

इसके बाद तो उन्होंने पुरे उत्तर भारत की राजनीति में तूफान ला दिया. जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़(उस वक्त मध्य प्रदेश का हिस्सा), बिहार जैसे राज्यों में फुले-शाहू-अम्बेडकर का कारवां, एक बार फिर सही पटरी पर आ अपनी मंज़िल को और तेजी से बढ़ने लगा.

१९९९ के लोक सभा चुनावों में वो बसपा को देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बना चुके थे. अब उनका निशाना अगले साल २००४ में होने वाले लोक सभा चुनावों में इसे पहले नंबर की पार्टी बना, बहुजन समाज को देश का हुक्मरान बनाना था. लेकिन १५ सितम्बर २००३ को ट्रेन में चंद्रपुर, महाराष्ट्र से हैदराबाद जाते वक्त सख्त बीमार पड़ गए और फिर अपने परिनिर्वाण तक राजनीति में वापसी न कर सके.

यहीं से बहुजन राजनीति की दिशा बदली और वो लगातार ऊपर जाने की बजाय नीचे फिसलना शुरू हुई. साहब का सपना अधूरा रह गया और चुनावी असफलताओं का दौर शुरू हुआ. २०१४ में १९८९ के बाद पहली बार बसपा अपना एक भी सांसद लोकसभा में नहीं भेज पायी.

अभी हुए पांचों राज्यों के चुनाव में से तीन – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान न सिर्फ उत्तर प्रदेश से सटे हुए हैं बल्कि किसी समय वहाँ बसपा का एक मज़बूत आधार होता था. मध्य प्रदेश तो किसी समय उत्तर प्रदेश के बाद बसपा का दूसरा अहम सूबा हुआ करता था, लेकिन वहाँ उसकी सीटें ४ से घटकर सिर्फ २ रह गयी. छत्तीसगढ़ में अजित जोगी के साथ समझौता कर तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयोग भी विफल हुआ, कांग्रेस वहाँ भारी बहुमत से जीती और बसपा यहां भी सिर्फ २ सीटें ही जीत पायी. राजस्थान में उसे २०० में से सिर्फ ६ सीटें मिली और वो सरकार बनाने में कोई भूमिका नहीं निभा पाई.

इस सबका रोष सोशल मीडिया पर दिखा और बहुत सारे बहुजन युवाओं ने इस पर अपनी प्रतिक्रियायें दी. कुछ ने इसके लिए बहनजी के नेतृत्व पर सवाल उठाया तो कुछ ने इसके लिए उत्तर प्रदेश से सभी राज्यों में भेजे जाने वाले प्रभारियों को कोसा. कुछ ने “बहुजन हिताये, बहुजन सुखाये” की जगह किये गए “सर्वजन सुखाये, सर्वजन हिताये” और “हाथी नहीं गणेश है; ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” की विचारधारा को जिम्मेवार ठहराया तो कुछ ने और कारण बताये.

तो क्या हम साहब कांशी राम के दिखाए रास्ते से भटक गए हैं ? क्या बहन मायावती के नेतृत्व में कमी है या फिर उत्तर प्रदेश से लगातार दूसरे राज्यों में भेजे जा रहे प्रभारी बाबासाहब अम्बेडकर और साहब कांशी राम के “मिशन” को “कमीशन” में बदल चुके हैं ? ऐसे कई और सवाल पूरे बहुजन समाज को घेरे हुए हैं.

आज बहुजन राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से वो अब किस ओर जाये, इस उलझन में है. ऐसा लगता है कि बाबासाहब के वचन, “जाओं अपनी दीवारों पर लिख लो की एक दिन हम इस देश के हुक्मरान होंगे” कहीं सिर्फ दीवारों पर ही न लिखे रह जाये.

बर्तानिया के मशहूर नेता और प्रधानमंत्री रहे, सर विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि “However beautiful the strategy, you should occasionally look at the results.”(रणनीति कितनी भी सुंदर क्यों न हो, आपको नतीजों को भी देखते रहना चाहिए)

साहब कांशी राम ने भी हमें चेताया था कि, “मैं तो असलीयत से कभी मुँह नहीं मोड़ता हूँ, अगर असलीयत से हम मुँह मोड़ ले, तो हर मोड़ पर असलीयत हमारे सामने आ जाएगी. मुँह मोड़ कर कहा जायेंगे ?” उम्मीद है पूरा बहुजन समाज अब इस असलीयत से और मुँह नहीं मोड़ेगा और एक दूसरे की टांग-खिचाई करने की जगह पूरी हिम्मत से इन सवालों का सामना करते हुए सही रास्ते ढूंढने में लग जायेगा.

सतविंदर मदारा

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अपने फ़ार्म हाउस पर काटा सलमान ख़ान ने बर्थडे का केक

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मुंबई। बॉलीवुड के दबंग और बॉक्स ऑफिस के सुल्तान और भारत की शान सलमान ख़ान आज 53 साल के हो गए. बुधवार देर रात सलमान अपने दोस्तों और परिवार के साथ अपने फ़ार्म हाउस पर पहुंचे और केक काटकर अपना जन्मदिन मनाया.

इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं सलमान अपने फेवरेट कलर ब्लैक में ही नज़र आ रहे हैं. उनके आस-पास बस कुछ चुनिंदा दोस्त और परिजन ही नज़र आ रहे हैं. इस तस्वीर में उनके पीछे आप उनके ख़ास बॉडीगार्ड शेरा को देख सकते हैं. सलमान इस मौके पर बेहद खुश नज़र आ रहे हैं. दिसंबर का महीना सलमान और उनके परिवार के लिए बहुत ही ख़ास होता है. इस महीने उनके परिवार में कई सदस्यों का बर्थडे होता है. आप कह सकते हैं कि यह महीने ख़ान परिवार के लिए जश्न का महीना है.

सलमान ख़ान आज देश के सबसे बड़े सुपरस्टार हैं. बड़े ही नहीं छोटे पर्दे पर भी उनका धाक रहता है. दस का दम से लेकर बिग बॉस उन्हीं के दम पर चलती है. बहरहाल, सलमान ने इस मौके पर हाथ जोड़कर सबका आभार जताया.

सलमान ख़ान को यारों का यार कहा जाता है. उनका जिस पर दिल आ गया कहते हैं उसकी लाइफ सेट हो गयी. इसके अलावा भी वो दिल खोलकर सामाजिक कार्यों में भी शामिल रहते हैं.

इस मौके पर सलमान के भाई अरबाज़ ख़ान अपनी गर्लफ्रेंड जॉर्जिया के साथ पहुंचे. उनके अलावा सोहैल ख़ान, बहनोई आयुष शर्मा, अभिनेत्री दीया मिर्ज़ा, कृति सनोन, फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली, सतीश कौशिक, अमृता अरोड़ा, अनिल कपूर, सोनू सूद आदि भी नज़र आये.

सलमान की ग़ज़ब की फैन फॉलोविंग हैं. बच्चे भी उन्हें बहुत पसंद करते हैं. उनकी आखिरी रिलीज़ फ़िल्म रेस 3 कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पायी लेकिन, उनकी आने वाली फ़िल्म भारत से उन्हें और उनके फैंस को बहुत उम्मीदें हैं.

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4 माह की निगरानी के बाद NIA ने आतंक के बड़े गठजोड़ का किया भंडाफोड़, 20 से 30 साल के 10 आरोपी अरेस्ट

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बुधवार को दिल्ली व यूपी में 17 स्थानों पर छापेमारी कर आतंक के बड़े गठजोड़ का भंडाफोड़ किया है. एनआईए के प्रवक्ता आलोक मित्तल ने बताया कि 10 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है. छह अन्य लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है. फिदायीन हमलों की तैयारी कर रहे थे : मित्तल ने बताया कि गिरफ्तार सभी लोग आतंकी संगठन आईएसआईएस से प्रेरित ‘हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम’ से जुड़े थे. ये लोग फिदायीन हमलों से देश की प्रमुख हस्तियों, नेताओं, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और दिल्ली के बड़े बाजारों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे.

सिलसिलेवार बम धमाके करने की साजिश थी: एनआईए प्रवक्ता ने कहा, जिस स्तर की तैयारी थी उससे लगता है कि वे जल्द हमले को अंजाम दे सकते थे. वे रिमोट कंट्रोल बम बना रहे थे और फिदायीन दस्ता तैयार कर रहे थे. देश के महत्वपूर्ण स्थलों पर सिलसिलेवार बम धमाकों की इनकी योजना थी. गोला बारूद बरामद : संदिग्धों के पास से 112 अलार्म घड़ी, 150 राउंड गोला-बारूद, 12 पिस्टल, करीब 25 किलोग्राम बम बनाने की सामग्री , पोटैशियम नाइट्रेट, पोटैशियम क्लोरेट, सल्फर बरामद हुआ. स्टील पाइप मिले हैं, जिसका पाइप बम बनाने में प्रयोग होता है. आरोपी बुलेट प्रूफ सुसाइड वेस्ट भी बना रहे थे जिससे फिदायीन हमले कर सकें. इनके पास से देश में बना रॉकेट लांचर भी बरामद हुआ है.

सोना चोरी कर हथियार खरीदे: पकड़ में आया मॉडयूल अपने पैसों पर चलाया जा रहा था. सोना चोरी करके हथियार खरीदे गए थे.

विदेशी आका के संपर्क में थे

गिरोह का सरगना मुफ्ती सुहेल अमरोहा का रहने वाला है. वहां एक मदरसे में बतौर मुफ्ती काम कर रहा था. इस समय वह दिल्ली के जाफराबाद में रह रहा था. एनआईए की पूछताछ में पता चला कि एक विदेशी आका के सहारे वह पूरा नेटवर्क संचालित करता था. गिरफ्तार सभी आरोपी 20 से 30 साल की उम्र के हैं. इनमें नोएडा के निजी विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग का एक छात्र व डीयू में बीए तृतीय वर्ष का एक छात्र भी शामिल है. ज्यादातर आरोपी मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं. दो के अलावा बाकी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं.

यहां से गिरफ्तारी

दिल्ली के जाफराबाद और सीलमपुर में छह स्थानों पर छापेमारी की गई. उत्तरप्रदेश के 11 स्थानों पर छापा मारा गया. इनमें से छह स्थान अमरोहा में, दो लखनऊ, दो हापुड़ और एक स्थान मेरठ का है. पांच लोगों को अमरोहा जिले से पकड़ा गया है जबकि पांच को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया.

एटीएस के साथ कार्रवाई

यूपी के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के आईजी असीम अरुण ने बताया कि एनआईए ने एटीएस के साथ संयुक्त अभियान में कार्रवाई को अंजाम दिया. अधिकारियों के मुताबिक, संदेहास्पद गतिविधियों की सूचना मिलने के बाद पिछले कुछ समय से एनआईए इस समूह पर नजर रख रही थी.

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UP: नोएडा में नमाज के बाद अब ग्रेटर नोएडा में श्रीमद्भागवत कथा पर रोक, मचा हंगामा

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नोएडा। दिल्ली से सटा यूपी का गौतमबुद्धनगर जिला इन दिनों सार्वजनिक स्थानों पर नियमों के खिलाफ धार्मिक आयोजनों के लिए चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले जहां नोएडा में सरकारी पार्क पर नमाज पढ़ने की पाबंदी लगाई गई, वहीं अब ग्रेटर नोएडा में सरकारी जमीन पर होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा को रोक दिया गया है. इसको लेकर विशेष समुदाय में खासा रोष है.

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा के आवासीय सेक्टर-37 में 26 दिसंबर (बुधवार) से नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा की शुरुआत होनी थी. यह जमीन प्राधिकरण की है. ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने बिना अनुमति हो रही श्रीमद्भागवत कथा की बात बताई और बुधवार सुबह ही इस भूखंड से तंबू, मंच और लाउडस्पीकर हटवा दिए. प्राधिकरण की इस कार्रवाई का आयोजकों ने जमकर विरोध किया. कुछ महिलाओं ने तो धरना प्रदर्शन तक किया.

प्राधिकरण के विशेष कार्याधिकारी सचिन सिंह की मानें तो उन्हें कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं दी गई. यदि वे इसे फिर भी करते हैं तो यह गैर कानूनी होगा.

ग्रेटर नोएडा (प्रथम) के क्षेत्राधिकारी निशंक शर्मा ने बताया कि प्राधिकरण द्वारा की गई इस कार्रवाई से उसका कोई लेना-देना नहीं है. यह कार्रवाई प्राधिकरण अधिकारियों तथा प्राधिकरण से संबद्ध पुलिसकर्मियों ने की है.

यह है पूरा मामला

ग्रेटर नोएडा सेक्टर-37 में बुधवार को उस वक्त तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अतिक्रमणकारी दस्ते ने मंदिर के लिए अवैध रूप से कब्जा की गई जमीन पर बने टेंट को हटा दिया. देखते ही देखते सैकड़ों सेक्टरवासी मौके पर जमा हो गए. इस दौरान विवाद काफी विवाद बढ़ गया.

प्राधिकरण अधिकारियों के मुताबिक करीब दो वर्ष पहले से ही मंदिर के नाम पर सेक्टर की जमीन पर अवैध कब्जे की कोशिश की जा रही थी. इसी क्रम में स्थानीय लोगों ने भगवान की मूर्तियां भी स्थापित कर दी थीं, लेकिन गाहे-बगाहे सेक्टरवासी प्राधिकरण से मंदिर के लिए जमीन की मांग भी कर रहे थे.

कुछ लोगों ने श्रीमद्भागवत कथा के बहाने विधिवत मूर्ति स्थापित करने की योजना बनाई. इसके तहत सेक्टर में पंडाल लगाया गया था. इसकी जानकारी मिलते ही ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के वरिष्ठ प्रबंधक यशपाल सिंह के निर्देश पर बुधवार सुबह अतिक्रमण हटाओ दस्ता सेक्टर में पहुंचा और भागवत कथा के लिए लगा टेंट हटा दिया. मामले की जानकारी मिलते ही मौके पर सैकड़ों सेक्टरवासी जमा हो गए और प्राधिकरण की कार्रवाई का विरोध करने लगे. हालांकि, विवाद बढ़ने पर स्थानीय लोगों ने बीच बचाव किया और मामले को शांत किया.

नमाज को लेकर भी उठ चुका है विवाद

गौरतलब है कि पिछले दिनों बिना इजाजत नोएडा सेक्टर-58 स्थित कुछ कंपनियों के कर्मचारियों द्वारा एक पार्क में जुमे की नमाज पढ़े जाने को लेकर नोएडा पुलिस ने नोटिस भेजा था, इसको लेकर हंगामा मचा हुआ है. स्थानीय लोगों की शिकायत पर 23 कंपनियों को भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि पार्क जैसे सार्वजनिक स्थल का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता. कंपनियां अपने कर्मचारियों को नहीं रोकतीं, तो इसके लिए उन्हें जिम्मेदार माना जाएगा और उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. पार्क में किसी तरह के धार्मिक आयोजन के लिए प्रशासन की इजाजत लेनी होगी.

वहीं, नोटिस को लेकर कंपनी के कर्मचारियों में बढ़ते गुस्से के बाद मंगलवार को नोएडा के जिलाधिकारी बीएन सिंह और एसएसपी डॉ. अजय पाल ने साफ किया कि नोटिस भेजने का मकसद किसी विशेष धर्म को मानने वालों की भावनाएं आहत करना नहीं है. अभी प्रशासन से कार्यक्रम की इजाजत नहीं मिली है, इसलिए नोटिस भेजा गया है.

गौरतलब है कि सेक्टर-58 स्थित एक पार्क में फरवरी 2013 से प्रत्येक शुक्रवार को नमाज पढ़ी जा रही थी. पहले इसमें शामिल होने वालों की संख्या कम थी, जो बीते कुछ दिनों से काफी बढ़ चुकी है. कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर पंकज राय ने बताया कि सात दिसंबर को स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत की. इसमें कहा गया कि हर हफ्ते होने वाले इस धार्मिक आयोजन से उन्हें परेशानी हो रही है.

पुलिस ने आयोजकों से कहा कि प्रशासन की अनुमति के बिना धार्मिक आयोजन नहीं कर सकते. कुछ लोगों ने सिटी मजिस्ट्रेट से अनुमति के लिए आवेदन किया है, जो अभी तक मिली नहीं है. इसके बावजूद 14 दिसंबर को लोग पार्क में नमाज पढ़ने के लिए जुटे. सूचना पर पहुंची पुलिस ने मुफ्ती नोमान अख्तर और आयोजक आदिल रशीद को शांति भंग की आशंका में गिरफ्तार कर लिया था, जिन्हें बाद में जमानत मिल गई. इसके बाद 23 कंपनियों के प्रबंधन को नोटिस जारी कर प्राधिकरण के पार्क में धार्मिक कार्यक्रम की अनुमति की इजाजत नहीं मिलने की जानकारी दी.

सभी कंपनियों के लिए है यह सूचना

एसएसपी अजयपाल शर्मा के मुताबिक, नोएडा सेक्टर 58 में खुले स्थानों पर धार्मिक कार्यक्रमों पर रोक लगाई गई है. इस नोटिस के संबंध में एसएसपी अजय पाल शर्मा का कहना है कि सेक्टर 58 में नोएडा प्राधिकरण का पार्क है. इस पार्क में धार्मिक आयोजन के लिए कुछ लोगों द्वारा इजाजत मांगी गई थी, लेकिन इसकी इजाजत अभी तक सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नहीं की गई है. इजाजत नहीं मिलने के बावजूद वहां भारी संख्या में लोग जुटे, ऐसे में उन्हें बताया गया कि आयोजन की इजाजत अभी भी नहीं हुई है. यही सूचना सभी कंपनियों को भी दी गई है.

यह है असली समस्या

पुलिस की मानें तो सेक्टर 58 के इस पार्क में पहले से ही कुछ लोग शुक्रवार को नमाज पढ़ने जा रहे थे. देखा गया है कि पिछले कुछ हफ्तों से नमाज पढ़ने वालों की संख्या तेजी से इजाफा हुआ है. ऐसे में इस तरह की गतिविधि पर कुछ लोगों ने एतराज जताया है. इस बाबत सेक्टर 58 के एसएचओ पंकज के अनुसार ये निर्देश सभी के लिए हैं.

9 विभाग गहलोत ने अपने पास रखे, पायलट को ग्रामीण विकास, किसे क्या मिला, पूरी सूची देखें

खास बातें-
राजस्थान में विभागों का बंटवारा, वित्त और गृह समेत 9 विभाग अशोक गहलोत के पास.
सचिन पायलट को सार्वजनिक निर्माण, ग्रामीण विकास समेत पांच विभाग मिले.
गहलोत और पायलट के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद हुआ फैसला.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ घंटों बातचीत के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रियों के विभागों का बंटवारा कर दिया है. अब सीएम गहलोत ने गृह, वित्त सहित 9 मंत्रालय अपने पास रखे हैं. वहीं उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के पास ग्रामीण विकास, पंचायती राज सहित पांच मंत्रालय हैं. बात दें कि मंत्रियों के विभाग के बंटवारे को लेकर दो दिनों से रस्साकशी चल रही थी. जिसका हल निकालने के लिए गहलोट और पायलट बुधवार शाम को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के पास पहुंचे थे.
राजस्थान के मंत्रियों कि पूरी सूची
अशोक गहलोत
  वित्त विभाग
  आबकारी विभाग
  आयोजना विभाग
  नीति आयोजना विभाग
  कार्मिक विभाग
  सामान्य प्रशासन विभाग
  राजस्थान राज्य अन्वेषण ब्यूरो
  सूचना प्रौद्यौगिकी एवं संचार विभाग
  गृह मामलात एवं न्याय विभाग
सचिन पायलट
  सार्वजानिक निर्माण विभाग
  ग्रामीण विकास विभाग
  पंचायती राज विभाग
  विज्ञानं एवं प्रौद्यौगिकी विभाग
  सांख्यिकी विभाग
बुलाकी दास कल्ला
  ऊर्जा विभाग
  जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग
  भू-जल विभाग
  कला, साहित्य, सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग
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  संसदीय मामलात विभाग
परसादीलाल मीणा उद्योग विभाग
  राजकीय उपक्रम विभाग
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प्रमोद जैनभाया
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रमेश चंद्र मीणा
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग
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प्रताप सिंह खाचरियावास
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सालेह मोहम्मद
अल्पसंख्यक मामलात विभाग
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राज्यमंत्री
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शिक्षा विभाग (प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा) (स्वतंत्र प्रभार)
  पर्यटन विभाग
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महिला एवं बाल विकास विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
  जन अभियोग निराकरण विभाग
  अल्पसंख्यक मामलात विभाग
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जनजातीय क्षेत्रीय विकास विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
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सुखराम बिश्नोई
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चुनाव परिणाम से लेकर कुछ इस तरह रही राजस्थान में हलचल
11 दिसंबर: चुनाव परिणाम घोषित.
16 दिसंबर: अशोक गहलोत और सचिन पायलट दिल्ली में राहुल गांधी से मिलने पहुंचे. यहां से निर्देश मिलने के बाद 17 दिसंबर को शपथ ग्रहण की. इसी बीच 108 आईएएस के तबादले हो गए. 17 आईपीएस भी बदले गए.
17 दिसंबर: दिल्ली से चेहरा तय होने के बाद सीएम-डिप्टी सीएम ने शपथ ली.
18 दिसंबर: 40 आईएएस, 8 आरएएस बदले, तीन आईएफएस के तबादले, सीएमओ में अदला-बदली की.
20 दिसंबर: 17 आईपीएस बदले गए.
21 दिसंबर: सीएम के आर्थिक सलाहकार एवं सलाहकार नियुक्त किए गए.
23 दिसंबर: मंत्रियों की सूची फाइनल करने के लिए अशोक गहलोत और सचिन पायलट दिल्ली पहुंचे. वहां के निर्देशन में 24 दिसंबर को 13 कैबिनेट और 10 राज्य मंत्रियों को शपथ ग्रहण कराई गई.
24 दिसंबर: 23 मंत्रियों ने शपथ ली.
25 दिसंबर: 33 में 30 कलेक्टर बदले.
गहलोत और पायलट के शपथ लेने के बाद 13 कैबिनेट और 10 राज्य मंत्रियों ने भी 72 घंटे पहले शपथ ले ली थी लेकिन मंत्रियों के विभागों का बंटवारा नहीं हो पाया था. इसकी असली वजह ये थी कि टिकट बंटवारे से लेकर सीएम की नियुक्ति, कैबिनेट चुनने और उनके विभागों के बंटवारे सहित तमाम मसले दिल्ली से ही तय हुए हैं. वहीं, ब्यूरोक्रेसी में बदलाव की तेजी देखें तो पिछले आठ दिन में ही 140 से ज्यादा अफसरों को इधर-उधर किया जा चुका है.
श्रोतः- अमर उजाला