सिख दंगे के दोषी सज्जन कुमार का कांग्रेस से इस्तीफा

1984 के सिख विरोधी दंगे के आरोप में उम्रकैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. उम्रकैद की सजा पाए सज्जन कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सज्जन कुमार ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर बताया है कि मेरे खिलाफ आए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मद्देनजर मैं कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं.

सोमवार को आया था फैसला

बता दें कि 17 दिसंबर (सोमवार) को दिल्ली हाई कोर्ट ने सज्जन कुमार को दंगे का दोषी पाया था. हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए सज्जन कुमार को दोषी पाया और उम्रकैद की सजा सुनाई.

किन आरोपों में मिली सजा

सज्जन कुमार के ऊपर आपराधिक साजिश रचने का आरोप है. साथ ही हिंसा कराने व सिख विरोधी दंगे भड़काने के भी आरोप हैं, जिनमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को दोषी पाया है.

31 दिसंबर को करना होगा सरेंडर

सज्जन कुमार को 31 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने की मोहलत दी गई है. दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने बलवान खोखर, कैप्टन भागमल व गिरधारी लाल की उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी है.

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IPL नीलामी: युवराज को नहीं मिला ख़रीददार, जयदेव उनादकट को मिले 8.4 करोड़

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नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग के 12वें सीज़न के लिए नीलामी में कई खिलाड़ियों की किस्मत का ताला खुल गया है, जबकि कई खिलाड़ियों के हिस्से मायूसी आई है. आईपीएल में अब तक जिन खिलाड़ियों की नीलामी हुई है उनमें जयदेव उनादकट को सबसे ज़्यादा साढ़े आठ करोड़ रुपए में ख़रीदा गया है. राजस्थान रॉयल्स ने डेढ़ करोड़ रुपए के बेस प्राइस वाले जयदेव उनादकट को साढ़े आठ करोड़ में ख़रीदा है. इससे पहले एक करोड़ रुपए की बेस प्राइस वाले अक्षर पटेल को दिल्ली कैपिटल ने पांच करोड़ रुपए में ख़रीदा. जबकि युवराज सिंह को कोई खरीददार नहीं मिल सका है. कैंसर से जंग जीतने के बाद मैदान में वापसी करने वाले युवराज सिंह का बेस प्राइस एक करोड़ रुपए है. लेकिन अब तक युवराज को किसी ने नहीं ख़रीदा है. इसके साथ ही मार्टिन गुप्तिल और ब्रेंडन मैकुलम को भी अभी तक किसी टीम ने नहीं ख़रीदा है. शिमरॉन हेटमेयर की चांदी रही है. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने 50 लाख रुपए की बेस प्राइस वाले वेस्ट इंडीज़ के खिलाड़ी शिमरॉन हेटमेयर को 4.2 करोड़ रुपए में ख़रीदा है. इसके साथ ही 50 लाख बेस प्राइस वाले हनुमा विहारी को भी दो करोड़ रुपए में दिल्ली कैपिटल ने ख़रीदा है.

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राहुल गांधी का मोदी पर एक और हमला

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर राहुल गांधी लगातार हमलावर बने हुए हैं. अपने नए बयान में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जब तक किसानों का कर्ज माफ नहीं करते, हम उन्हें सोने नहीं देंगे. दरअसल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के साथ ही कांग्रेस पार्टी उत्साह में दिख रही है. राहुल गांधी ने मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि तीन राज्यों में सरकार बनते ही उन्होंने छह घंटे के अंदर दो राज्यों में किसानों के कर्ज़ माफी की घोषणा कर दी. उन्होंने यह भी कहा कि तीसरे राज्य में वे घोषणा करने वाले हैं.

नरेंद्र गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार को साढ़े चार साल हो चुके हैं और पीएम मोदी ने किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं किया है. उन्होंने किसानों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप पसीना बहाते हैं. हम आपकी आवाज़ उठाते हैं.’ उन्होंने कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी किसानों का कर्ज़ माफ नहीं करेंगे हम उनको सोने नहीं देंगे.

राहुल गांधी ने कहा, ‘हमने दस दिन में कर्ज़ माफ करने का वादा किया था लेकिन हमने सिर्फ एक दिन में करके दिखा दिया. किसानों को उन्होंने भरोसा दिलाया कि कांग्रेस पार्टी बाकी सारी विपक्षी पार्टियों को लेकर आपके साथ खड़ी होगी. बता दें कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को हराकर कांग्रेस ने सरकार बनाई है. सरकार बनते ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने किसानों का कर्ज़ माफ करने की घोषणा कर दी थी.

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सिख विरोधी दंगा / कांग्रेस नेता सज्जन कुमार समेत 4 दोषियों को उम्रकैद

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नई दिल्ली। 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई. उन्हें 31 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया गया है. सज्जन को आपराधिक साजिश और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया. निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2013 को उन्हें बरी कर दिया था.

हाईकोर्ट ने सज्जन के अलावा तीन अन्य दोषियों- कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और कांग्रेस के पार्षद बलवान खोखर की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा. बाकी दो दोषियों- पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा तीन साल से बढ़ाकर 10 साल कर दी.

‘मौत की सजा तक जारी रहेगी लड़ाई’

अभियोजन के वकील एचएस फूलका और अकाली नेता मानजिंदर सिंह सिरसा ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया. हालांकि, उन्होंने कहा कि सज्जन और जगदीश टाइटलर को मौत की सजा दिलाने तक उनकी जंग जारी रहेगी. वे गांधी परिवार को भी जेल पहुंचाकर रहेंगे.

‘बंटवारे के 37 साल बाद दिल्ली ने देखी ऐसी त्रासदी’

जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘1947 में बंटवारे के वक्त कई लोगों का कत्लेआम किया गया था. इसके 37 साल बाद दिल्ली ऐसी ही त्रासदी की गवाह बनी. आरोपी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले.’’

सज्जन को गवाह ने पहचान लिया था

पिछले महीने पटियाला हाउस कोर्ट में मामले की एक गवाह चाम कौर ने सज्जन को पहचान लिया था. चाम ने बयान दिया था- घटनास्थल पर मौजूद सज्जन ने वहां मौजूद दंगाइयों से कहा था कि सिखों ने हमारी मां (इंदिरा गांधी) का कत्ल किया है, इसलिए इन्हें नहीं छोड़ना. बाद में भीड़ ने उकसावे में आकर मेरे बेटे और पिता का कत्ल कर दिया.

5 सिखों की हत्या के मामले में हुई सजा

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे फैले थे. इस दौरान दिल्ली कैंट के राजनगर में पांच सिखों- केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या हुई थी. इस मामले में केहर सिंह की विधवा और गुरप्रीत सिंह की मां जगदीश कौर ने शिकायत दर्ज कराई थी. पीड़ित परिवार की शिकायत और न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग की सिफारिश के आधार पर सीबीआई ने सभी छह आरोपियों के खिलाफ 2005 में एफआईआर दर्ज की थी. 13 जनवरी 2010 को आरोपपत्र दाखिल किया गया था.

जेटली ने कहा- सज्जन कुमार सिख विरोधी दंगों के प्रतीक

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘‘दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं. सज्जन कुमार सिख विरोधी दंगों के प्रतीक बन गए थे. 1984 में दिल्ली और दूसरे इलाकों में सिखों की हत्या की गई. यह फैसला पीड़ितों को राहत देने वाला है. कांग्रेस नेता ने दंगा भड़काने वालों का नेतृत्व किया था. जांच आयोग के अध्यक्ष रहे जज को बाद में कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य बना दिया. उन्होंने कहा था कि सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है. जांच के लिए कमेटी ने जब भी किसी कांग्रेस नेता की ओर इशारा किया, उसे हटा दिया गया. इस तरह से कांग्रेस ने लोगों के साथ अन्याय किया. इस मामले में एक और नेता (कमलनाथ) का नाम आया था, कांग्रेस उन्हें आज मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला रही है.”

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मध्यप्रदेश को लेकर मायावती ने लिया यह बड़ा फैसला

नई दिल्ली। हाल ही में आए विधानसभा के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए खुशियां लेकर आई हैं. तो वहीं बहुजन समाज पार्टी चुनावी नतीजों से बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद गुरुवार 13 दिसंबर को बसपा अध्यक्ष मायावती ने दिल्ली में समीक्षा बैठक की. इसमें चुनावी राज्यों के सभी प्रभारी और अध्यक्ष मौजूद थे. खबर है कि समीक्षा बैठक के दौरान मध्यप्रदेश में पार्टी के खराब प्रदर्शन से बसपा प्रमुख मायावती काफी नाराज रहीं. इस हार को लेकर बड़ी कार्रवाई करते हुए मायावती ने प्रदेश प्रभारी रामअचल राजभर और प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार को उनके पद से हटा दिया है. यहीं नहीं बल्कि बसपा प्रमुख ने बड़ा कदम उठाते हुए मध्यप्रदेश की पूरी कार्यकारिणी भंग कर दी है. फिलहाल प्रदेश में नई नियुक्तियों में मुरैना के डीपी चौधरी को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की खबर है.

मायावती की नाराजगी की वजह भी है. इस बार सिर्फ दो विधायक भिंड से संजीव सिंह और पथरिया से रामबाई गोविन्द सिंह ही जीत पाए हैं. बसपा के लिए चिंता की बात यह भी रही कि इस बार कोई भी मौजूदा विधायक अपनी सीट नहीं बचा पाया. तीन राज्यों के चुनावी नतीजों में बसपा के लिए सबसे चिंता की स्थिति मध्यप्रदेश में है. 2008 के बाद बसपा यहां संभल नहीं पाई है. राज्य में उसकी सीटें और वोट शेयर दोनों गिरा है. 2008 में बसपा के पास 7 सीटें थी और उसका वोट प्रतिशत 8.97 था. इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को यहां 6.29 प्रतिशत वोट मिला था और उसने 4 सीटें जीती थी. इस बार उसकी सीटें दो हो गई हैं और वोट प्रतिशत भी घटकर 4.9 प्रतिशत हो गया है.

जबकि अगर बसपा की उम्मीदों की बात करें तो बसपा को सबसे ज्यादा उम्मीद मध्यप्रदेश में ही थी. उसे लग रहा था कि वह मध्यप्रदेश में किंग मेकर बनकर उभरेगी. बसपा की यह उम्मीद गलत नहीं थी. आंकड़ों से साफ है कि रीवा, सतना, दमोह, भिंड, मुरैना आदि जिलों में बसपा का काफी प्रभाव था. मध्यप्रदेश में जिस तरह आखिरी वक्त तक एक-एक सीट को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच रस्सा-कस्सी चलती रही, उस स्थिति में बसपा अगर अपने पिछले प्रदर्शन से थोड़ा भी बेहतर प्रदर्शन करती और दर्जन भर सीटें भी हासिल कर लेती तो वह किंगमेकर बनकर उभर सकती थी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका, ये तब है जब खुद मायावती ने प्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा सभाएं की थी.

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5वीं की दलित छात्रा का अपहरण कर रेप

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प्रतिकात्मक फोटो

पलवल। सुबह-सुबह दौड़ने निकली एक 5वीं की दलित छात्रा से रेप का मामला सामने आया है. बताया गया कि आरापित ने पहले तो पीड़िता का अपहरण किया और उसके बाद वारदात को अंजाम दिया. विरोध करने पर जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी. महिला थाना पुलिस ने इस मामले में 19 साल के युवक के खिलाफ अपहरण, रेप और एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया है. मेडिकल जांच के दौरान रेप की पुष्टि हुई है.

डीएसपी विजय पाल ने बताया कि छात्रा अपनी बड़ी बहन के साथ रोजाना दौड़ की प्रेक्टिस करती है. 8 दिसंबर को छात्रा अकेली ही प्रैक्टिस के लिए अपने घर से करीब चार बजे निकली. इस दौरान छात्रा को 19 साल के एक युवक ने पकड़ लिया और घसीट कर अपने घर ले गया. विरोध करने पर छात्रा को जाति सूचक शब्दों से अपमानित करते हुए जान से मारने की धमकी दी और उसके बाद उससे रेप किया. वारदात कर युवक छात्रा को बेहोशी की हालत में छोड़कर फरार हो गया. होश में आने पर छात्रा को युवक के परिजनों व अन्य लोगों ने घर पहुंचाया. घर जाकर छात्रा ने घटना की जानकारी अपने परिवार के सदस्यों को दी. आरोपी युवक के डर की वजह से पीड़ित छात्रा डरी और सहमी रही. बुधवार को छात्रा और उसके परिजनों ने महिला थाना पुलिस को शिकायत दी. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच मेडिकल जांच करवाई, जिसमें रेप की पुष्टि हुई.

डीएसपी के मुताबिक छात्रा ने रेप का आरोप शमशाबाद निवासी 19 वर्षीय सोनू नामक युवक पर लगाया है. आरोपी को अरेस्ट करने के लिए पुलिस दबिश दी, लेकिन वह अपने घर से फरार हो गया. पुलिस का कहना है कि आरोपी युवक को अरेस्ट करने के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही है.

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दलित दस्तक मैग्जीन का दिसम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का सातवां अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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एटा में दलित की बारात में जातिवादियों ने की जमकर मारपीट

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हाथरस से आई दलित की बारात में दबंगों ने जमकर हुड़दंग काटा, मारपीट की. दलित पक्ष ने विरोध किया. जब तक लोग इसे शांत करा पाते, दोनों ओर से तीन लोग घायल हो चुके थे. दलित पक्ष ने गांव के ही दबंगों पर मारपीट का मुकदमा दर्ज कराया है. वहीं दबंग पक्ष ने भी मारपीट की रिपोर्ट दर्ज कराई है. गांव में एहतियातन फोर्स तैनात कर दिया गया है.

कोतवाली देहात में दलित पक्ष के रिंकू ने शिकायत दर्ज कराई कि बुधवार की रात गांव असरौली अमर सिंह की बेटी दीपक की शादी थी. हाथरस से बारात आई थी. गांव के ही दबंग परिवार के घर भी बारात आई थी. आरोप है कि दलित की बारात में डॉ. भीमराव आंबेडकर का फोटो देखकर दबंग भड़क गए. बारातियों की पिटाई कर दी. फोटो को क्षति पहुंचाई. बारात चढ़ने से रोक दी गई. इसमें दबंग अतेंद्र पुत्र अमर सिंह, ठाकुर और रामू पुत्रगण ब्रजेश, बहोरन सिंह व अन्य पर मारपीट, हुड़दंग, आंबेडकर के पोस्टर फाड़ दिए. बाद में दलित की बारात को सामान्य ढंग से ही ले जाना पड़ा.

वहीं ठाकुर वीरेंद्र सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि गांव में रिटायर्ड कांस्टेबल चंद्रपाल सिंह की बेटी की शादी थी. बारात आई तो दलित पक्ष के रिंकू और उनके साथियों ने बारातियों से मारपीट की. इसमें रामू व एक अन्य घायल हो गए. दोनों के कान और नाक में चोट आई है. रामू को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है. दोनों पक्षों की ओर से मारपीट की शिकायत के बाद दोनों पक्षों के नेताओं ने बैठकर समझौते की बात कराई, लेकिन काफी देर वार्ता के बाद भी कोई पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ और दोनों पक्षों का मुकदमा दर्ज कराया गया.

एएसपी क्राइम ओपी सिंह ने बताया की दोनों पक्षों की शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. घटना की जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी को मौके पर भेजा गया था. गांव में एहतियातन पुलिसबल तैनात कर दिया गया है.

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दलितों का हनुमान मंदिर पर कब्जा ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल

हाल ही में एक चुनावी सभा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा किया कि हनुमान दलित थे. प्राख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव द्वारा हनुमान को विश्व का पहला आतंकवादी घोषित किये जाने के वर्षों बाद रामदास हनुमान को लेकर योगी द्वारा की गयी टिपण्णी सबसे ज्यादा चांचल्य सृष्टि की है. उनके बयान के बाद हिन्दू देवी-देवताओं की जाति चिन्हीकरण का एक नया दौर शुरू हो गया है.इसे लेकर योगी खुद अपनी जमात अर्थात साधु –संतों के निशाने पर आ गए हैं. दूसरी ओर उनके बयान के जारी होने के बाद आगरा के एक हनुमान मंदिर पर दलितों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है. दलितों द्वारा मंदिर पर कब्जे ज़माने के बाद यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि जिस जाति के जो देवता है, उस जाति देवता के मंदिरों का पूजा- पाठ सहित सम्पूर्ण का नियंत्रण उस जाति से सम्बद्ध समुदायों को सौंप दिया जाय. इस क्रम में विश्वकर्मा मंदिर लोहारों को, कृष्ण मंदिर यादवों को,राममंदिर क्षत्रियों इत्यादि को सौपने की बात सोशल मीडिया में उठ रही है. इससे उन लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी है, जो मंदिरों पर ब्राह्मणों के एकाधिकार के ध्वस्त होने का वर्षों से सपना देख रहे थे. किन्तु भारी आश्चर्य की बात यह है कि मंदिरों पर गैर-ब्राह्मणों के कब्जे को लेकर सर्वाधिक आपत्ति ब्राह्मणों में नहीं, उन दलितों में है, जिनके लिए सदियों से देवालयों के द्वार बंद रहे हैं और आज भी हैं. इसलिए इस समुदाय के बुद्धिजीवी मंदिरों पर कब्ज़ा ज़माने के लिए आमादा जातियों, खासकर दलितों को हतोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर तरह-तरह की युक्ति खड़ी करते हुए प्रचारित कर हैं कि बाबा साहेब ने मंदिरों पर, नहीं संसद पर कब्ज़ा करने का निर्देश दिया था. इनके इस अभियान में गैर-दलित बहुजनों के साथ प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी खासा सहयोग मिल रहा है.

बहरहाल गैर-ब्राह्मण जातियों द्वारा मंदिरों पर कब्जे के अभियान को हतोत्साहित करने जुटे बहुजन और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने बता दिया है कि वे क्यों अबतक भारत में सामाजिक परिवर्तन तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी के सशक्तिकरण में अबतक व्यर्थ रहे हैं. वे अपनी बौद्धिक दारिद्र्ता के चलते यह जान ही नहीं पाए कि दुनिया के दूसरे वंचित समुदाय अश्वेतों, महिलाओं इत्यादि की भांति ही भारत के वंचितों की दुर्दशा व अ-शक्तिकरण का एकमेव कारण शासकों द्वारा उनका शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) बहिष्कार है और बिना शक्ति के समस्त स्रोतों में इनकी वाजिब हिस्सेदारी सुलभ कराये इनका मुकम्मल सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता. वे यह समझने में व्यर्थ रहे हैं कि समाज के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे से ही आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की सृष्टि होती है. अगर इसकी थोड़ी उपलब्धि किया भी तो वे धर्म को शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत समझने में पूरी तरह व्यर्थ रहे. धर्म को विषमता का बड़ा कारक न मानने के कारण ही अधिकांश संगठन वंचितों को मात्र आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में हिस्सेदारी दिलाने तक अपनी गतिविधियों को महदूद रखे.

शक्ति के स्रोत के रूप में धर्म की उपेक्षा दुनिया के तमाम चिन्तक,जिनमें मार्क्स भी रहे, ही किये और आज भी किये जा रहे हैं. यह एकमात्र बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर थे जिन्होंने जोर गले से कहा था कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत होता है और शक्ति के रूप में ‘धर्म की शक्ति’ का महत्त्व ‘आर्थिक शक्ति’ से ज्यादा नहीं तो किसी प्रकार कम भी नहीं. प्रमाण देते हुए उन्होंने बताया था कि प्राचीन रोमन गणराज्य में प्लेबियन बहुसंख्य होकर भी अगर अपने अधिकारों से वंचित रहे तो इसलिए कि धार्मिक शक्ति डेल्फी के मंदिर के पुजारी के पास होती थी, जो शासक पैट्रीशियन जाति का होता था. भारत में धार्मिक शक्ति की महत्ता प्रमाणित करते हुए उन्होंने कहा था ,’क्यों बड़े से बड़े लोग साधु-फकीरों के पैर छूते हैं ? क्या कारण है कि भारत के लाखों लोग अंगूठी-छल्ला बेंचकर काशी व मक्का जाते हैं?भारत का तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां पुरोहित का शासन,मजिस्ट्रेट के शासन से बढ़कर है.’

बहरहाल जो धर्म शक्ति के स्रोत के रूप में आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, सारी दुनिया में ही उसका लाभ पुरोहित वर्ग जरुर उठाता रहा है, किन्तु एक सामाजिक समूह के रूप इसका लाभार्थी वर्ग केवल भारत में ही विकसित हुआ. शेष धर्मों में पुरोहितों को इसका लाभ व्यक्तिगत रूप से मिलता रहा. कारण, हिन्दू धर्म को छोड़कर बाकी धर्मों में पुरोहित बनने के दरवाजे सभी समूहों के लिए मुक्त रहे,सिवाय उनकी महिलाओं के. हालांकि 1886 भागों में बंटे ब्राह्मणों में सभी को पौरोहित्य का अधिकार कभी नहीं रहा. पर, चूँकि भारत के विभिन्न अंचलों में फैले छोटे-बड़े असंख्य मंदिरों के पुजारी वहां के कुछ खास ब्राह्मण ही हो सकते थे, इसलिए असंख्य भागों में बंटे ब्राह्मण पुरोहित वर्ग में तब्दील हो गए. इससे जिन ब्राह्मणों को पौरोहित्य का अधिकार नहीं रहा, वे भी आम लोगों में पुरोहित ब्राह्मणों के समान ही सम्मान पाने लगे. पौरोहित्य के अधिकार ने ही ब्राहमणों को ‘भूदेव’ के आसन पर बिठा दिया: हिन्दू समाज में सर्वोच्च बना दिया.

इस अधिकार से वंचित होने के कारण ही क्षत्रिय ‘जन-अरण्य का सिंह’ होकर भी दस वर्ष तक के बालक ब्राह्मण को पिता समान सम्मान देने के लिए विवश रहे. इस क्षेत्र का अनाधिकारी होने के नाते ही सदियों से भारतीय नारी हर जुल्म सहते हुए पति के चरणों में, पति चाहे लम्पट व कुष्ठ रोगी ही क्यों हो, स्वर्ग तलाशने के लिए ही अभिशप्त रही. वैसे तो पौरोहित्य के अधिकार से वंचित रहने के कारण तमाम अब्राह्मण जातियों की हैसियत ब्राह्मणों के समक्ष निहायत ही तुच्छ रही, किन्तु सर्वाधिक बदतर स्थिति दलितों की हुई. पुरोहित बनना तो दूर उन्हें मंदिरों में घुसकर ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करने तक का अधिकार नहीं रहा. अगर ब्राह्मणों की भांति दलितों को भी अबाध रूप से मंदिरों में प्रवेश और पौरोहित्य का अधिकार रहता तब क्या वे मानवेतर प्राणी में तब्दील होते? क्या तब भी हिन्दू उनके साथ अस्पृश्यता मूलक व्यवहार करते? सच तो यह है कि धार्मिक सेक्टर से सम्पूर्ण बहिष्कार ही दलितों के प्रति अस्पृश्यतामूलक व्यवहार का प्रधान कारण है. हिन्दू सोचते है जब दलित देवालयों से ही अछूत के रूप में बहिष्कृत हैं तो हम उनसे सछूत जैसे व्यवहार क्यों करें!

बहरहाल कल्पना किया जाय कोई चमत्कार घटित हो जाता है और समस्त आर्थिक गतिविधियों, राजनीति की संस्थाओं तथा ज्ञान के क्षेत्र मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रातिशूद्र और उनकी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिल जाति है.पर, अगर पौरोहित्य पर ब्राह्मणों का एकाधिकार पूर्ववत रहता है, क्या हिन्दू समाज में समता आ पायेगी? हरगिज नहीं ! हिन्दू समाज को समतावादी बनाने के लिए पौरोहित्य का प्रजातंत्रीकरण करना ही होगा. अर्थात जिस समाज की जितनी संख्या है, उस अनुपात में पौरोहित्य में उसके स्त्री और पुरुषों को भागीदारी सुनिश्चित करनी ही होगी. अगर ऐसा नहीं किया गया तो तमाम तरह की बराबरी हासिल करने के बादजूद तमाम गैर-ब्राह्मण जातियां ब्राह्मणों के कदमों में लोटती रहेगी. ऐसे में हर हाल में धार्मिक शक्ति का बंटवारा जरुरी है. अगर भारतीय समाज धार्मिक शक्ति के बंटवारे के लिए मन बनाता है तो इसमें डॉ. आंबेडकर का यह सुझाव काफी कारगर हो सकता है,जो उन्होंने अपनी बेहतरीन रचना ‘जाति का विनाश’ में सुझाया है.

‘हिन्दुओं के पुरोहिती पेशे को अच्छा हो कि समाप्त ही कर दिया जाय, लेकिन यह असम्भव प्रतीत होता है. अतः यह आवश्यक है कि इसे कमसे कम वंश-परम्परा से न रहने दिया जाय. कानून के द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वही व्यक्ति पुरोहिताई कर सकेगा, जो राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास कर ले. गैर-सनदयाफ्ता पुरोहितों द्वारा कराये गए कर्मकांड क़ानून की दृष्टि में अमान्य होने चाहिए, और बिना लाइसेंस पुरोहिताई करना अपराध माना जाना चाहिए. पुरोहित राज्य का कर्मचारी होना चाहिए और उस पर राज्य सरकार का अनुशासन लागू होना चाहिए. आई.सी.एस.अधिकारियों की तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य द्वारा निर्धारित होनी चाहिए. भारतवर्ष में लगभग सभी व्यवसाय विनियर्मित हैं. डॉक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों को अपना पेशा आरम्भ करने से पहले अपने विषय में दक्षता प्राप्त करनी पड़ती है. इन लोगों को अपने जीवन में न केवल देश के नागरिक व अन्य कानूनों के पाबंद रहना पड़ता है, वरन अपने विशिष्ट पेशे से सम्बंधित विशिष्ट नियम व नैतिकता का पालन भी करना पड़ता है. .. हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग न किसी कानून की बंदिश में है न किसी नैतिकता में बंधा हुआ है. वह केवल अधिकार व सुविधाओं को पहचानता है, कर्तव्य शब्द की उसे कोई कल्पना ही नहीं है. यह एक ऐसा परजीवी कीड़ा है जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है. अतः इस पुरोहित वर्ग को मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति से कानून बनाकर नियंत्रित किये जाना आवश्यक है. कानून इस पेशे का द्वार सबके लिए खोलकर इसे प्रजातान्त्रिक रूप प्रदान कर देगा. ऐसे कानून से निश्चय ही ब्राह्मणशाही समाप्त हो जायेगी. इससे जातिवाद, जो ब्राह्मणवाद की उपज है, समाप्त करने में सहायता मिलेगी.’

बहरहाल सदियों की भांति स्वाधीन भारत में भी ब्राह्मणशाही से त्रस्त अ-ब्राह्मण जातियों के बुद्धिजीवियों ने डॉ. आंबेडकर से ब्राह्मणशाही के खात्मे का अचूक मन्त्र पाकर भी कभी ‘पौरोहित्य के पेशे के प्रजातांत्रिकरण की मांग नहीं उठाया ,इसलिए ब्राह्मण आज भी आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक शक्ति पर कुंडली मारे बैठे हैं. किन्तु आज जबकि दलितों ने हनुमान के मंदिर पर कब्ज़ा जमाकर, ब्राह्मणशाही के खात्मे की अभिनव पहल की है, हमें उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सामने आना चाहिए. ऐसा होना पर दूसरी जातियां भी अपने-अपने जातियों के देवताओं के मंदिरों पर कब्ज़ा जमाने के लिए आगे आएँगी. इससे ऐसे दिन आ सकते हैं, जब हम पाएंगे कि रावण-परशुराम के मंदिरों को छोड़कर शेष मंदिर ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त हो चुके हैं.

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… ऐसा हुआ तो 2019 में हार जाएगी भाजपा

नई दिल्ली। 2019 चुनाव में भाजपा हारेगी या जीतेगी, यह ये पांच राज्य तय करेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव की सत्ता की चाबी पांच राज्यों के पास होगी. इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु शामिल हैं. देश के ये ऐसे पांच राज्य हैं, जहां सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं. इन राज्यों में कुल 249 संसदीय सीटें है. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन को 148 सीटें मिली थीं. जबकि कांग्रेस को महज 10 सीटें और अन्य के खाते में 91 सीटें आई थीं.

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के साथ आने की स्थिति में भाजपा को फिर से उतनी बड़ी सफलता मिल पाना मुश्किल है. तो ऐसे ही पश्चिम बंगाल और तामिलनाडु में भी भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है. बंगाल में ममता बनर्जी तो तामिलनाडु में DMK और AIADMK भाजपा की राह में बड़ा रोड़ा हैं. बिहार में नीतीश कुमार के जनता दल यू के साथ मिलकर भाजपा बेहतर परिणाम की उम्मीद कर सकती है लेकिन यह बहुत आसान नहीं होगा.

बिहार में तेजस्वी यादव की भी मजबूत दावेदारी है. ऐसे ही महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ही उसके लिए बड़ा अड़ंगा है. कांग्रेस को राज्यों में मिली जीत के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस के एक बार फिर उभर कर आने से इंकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल तीन राज्यों की हार ने भाजपा के 2019 में केंद्र में वापसी पर संदेह तो पैदा कर ही दिया है.

ऐसे ही अगर तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी अगर विधानसभा की तर्ज पर चुनाव होते हैं और लोग इसी तरह वोटिंग करते हैं तो फिर भाजपा की राह और ज्यादा मुश्किल हो जाएगी. इसी तर्ज पर अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग और नतीजे हुए तो बीजेपी 63 सीटों से घटकर 23 पर आ जाएगी और कांग्रेस 6 से बढ़कर 40 पर पहुंच जाएगी.

राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजों के क्या मायने है?

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नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद कांग्रेस पार्टी में ख़ुशी की लहर है, तो भारतीय जनता पार्टी के कैंप में निराशा है. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है. हालांकि मध्य प्रदेश में कड़ा मुक़ाबला रहा और कांग्रेस बहुमत से कुछ दूर रह गई, लेकिन निर्दलीय, बसपा और सपा के समर्थन के बाद वहाँ भी सरकार बनाने का रास्ता साफ़ हो गया है. इन विधानसभा चुनाव के नतीजे राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ-साथ नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए क्या मायने रखते हैं? वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी की लोकप्रियता में कमी आई है. वे कहते हैं, “नरेंद्र मोदी आज भी इस देश के सबसे बड़े नेता हैं. लेकिन जब उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी तो बीजेपी का कुल वोट शेयर 31 फीसदी था. अब साढ़े चार साल बाद उनकी लोकप्रियता में काफ़ी कमी आई है. ज़मीन पर लोग सवाल पूछते हैं कि मोदी जी ने जो वादे किए थे उनका क्या हुआ.” “2013 से 2017 तक भारतीय राजनीति में मोदी की टक्कर का कोई नेता नहीं था. लेकिन आज उनसे ये ख़िताब छिन गया है. चुनाव जिताऊ नेता वाली उनकी छवि को धक्का लगा है. ये तो साफ है कि लोगों का मोदी से मोहभंग हो रहा है लेकिन आगामी संसदीय चुनाव में मतदान पर इसका क्या असर पड़ेगा ये तो वक़्त ही बताएगा.” इन चुनावी नतीजों से एक सवाल ये भी उठता है कि क्या अब बीजेपी में मोदी विरोध के स्वर उभरना शुरू होंगे. इस सवाल पर संजय श्रीवास्तव ने कहा, “बीजेपी में मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ें अभी उठना शुरू नहीं होंगी. लेकिन बीजेपी में एक धड़ा ऐसा भी है जो कि उस दिन का इंतज़ार कर रहा है कि अगले लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी 170 लोकसभा सीटों पर सिमट जाती है तो मोदी जी सहयोगी दलों को कैसे जुटा पाएंगे. लेकिन ये भी संभव है कि मोदी और अमित शाह में चुनावी गणित के चक्कर में थोड़ी विनम्रता आ जाए.” राहुल गांधी ने बीते साल 11 दिसंबर, 2017 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान संभाली थी. संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि इसके ठीक एक साल बाद आए चुनावी नतीजों ने बता दिया है कि राहुल गांधी परिपक्वता से फैसले लेने के लिए सक्षम हैं. बीबीसी हिन्दी के फ़ेसबुक लाइव के दौरान उन्होंने कहा, “लेकिन कई विपक्षी दलों ने अभी तक राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार नहीं किया है. कई दलों के नेता निजी बातचीतों में बताते हैं कि राहुल गांधी व्यक्ति तो बेहतरीन हैं लेकिन उनके अंदर वोट हासिल करने की क्षमता नहीं है.” ऐसे में सवाल उठता है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजों के राहुल गांधी के लिए क्या मायने हैं. बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह ने जब वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, “राहुल गांधी ने पांच में से तीन राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया है. इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल काफ़ी बढ़ जाएगा. चुनावी रणनीति की बात करें तो राहुल गांधी ने इन चुनावों में दो तरह की रणनीति को अपनाया है.” “राहुल की रणनीति में एक चीज साफ़ दिखाई दी है कि हिन्दी भाषी प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी ने अकेले ही चुनाव लड़ा. कांग्रेस ने बसपा, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे दलों के साथ समझौता नहीं किया जिससे सपा-बसपा काफ़ी नाराज़ हैं.” “कांग्रेस ने ये सोचा कि ये राज्य कभी उसके गढ़ हुआ करते थे. ऐसे में एक शक्ति परीक्षण करना चाहिए. कांग्रेस की इस रणनीति का एक पहलू ये भी है कि कांग्रेस ने तेलंगाना में टीडीपी और एक अन्य दल के साथ गठबंधन किया. इस तरह कांग्रेस ने अलग-अलग चुनावी रणनीतियों का इस्तेमाल किया.” राहुल का हिंदुत्व कार्ड गुजरात के चुनाव से लेकर इन चुनावों में भी राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जाने के साथ-साथ उन्होंने अपना गोत्र भी बताया. स्मिता गुप्ता राहुल की इस रणनीति पर बताती हैं, “कांग्रेस ने हिंदी भाषी प्रदेशों में विचारधारा के तौर पर एक नया प्रयोग किया है. 90 के दशक से देश की राजनीति में दक्षिणपंथ प्रवेश कर रहा था. लेकिन कांग्रेस के पास इसकी टक्कर में कुछ नहीं था. बीजेपी भी कांग्रेस को अल्पसंख्यकों की पार्टी कहती आई है. लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस ने खुद को हिंदू बताने से लेकर ब्राह्मण होने पर भी ज़ोर दिया. इस सबके बावजूद कांग्रेस खुद को एक सेकुलर पार्टी बताती है.” कांग्रेस पार्टी इन चुनावी नतीजों का श्रेय राहुल गांधी के नेतृत्व को देगी कि उनके कुशल नेतृत्व में कांग्रेस मध्य प्रदेश और राजस्थान में शानदार प्रदर्शन कर सकी. वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक़, राहुल गांधी को बस इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान के कांग्रेस नेतृत्व में आपसी झगड़े को रोकने की भरसक कोशिश की. वह बताते हैं, “राहुल गांधी ने पार्टी को एकजुट रखा है. हालांकि, खुद के नाम पर वोट बटोरने का करिश्मा अभी भी उनमें नहीं है. लेकिन अब वो दिन लद गए हैं कि कोई राहुल गांधी का मजाक उड़ा सके. क्योंकि राहुल गांधी ने खुद को साबित करके दिखा दिया है.” स्रोतः बीबीसी हिन्दी

लोकसभा में भी ऐसे ही रहा तो ये होंगे नतीजे

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नई दिल्ली। देश के 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मना जा रहा था. इन चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है. ऐसे में अगर 2019 लोकसभा चुनाव में वोटिंग ट्रेंड ऐसा ही रहा तो फिर बीजेपी और मोदी की सत्ता में वापसी की राह मुश्किल हो जाएगी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोराम में कुल 83 लोकसभा सीटें है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन किया था. पांच राज्यों की 83 लोकसभा सीटों में से बीजेपी के पास 63 सीटें हैं. जबकि कांग्रेस को महज 6 और अन्य को 14 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे कांग्रेस के लिए बेहतर रहे हैं. जबकि बीजेपी के खिलाफ था. इसी तर्ज पर अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग और नतीजे रहे तो कांग्रेस बीजेपी 63 सीटों से घटकर 23 पर आ जाएगी और कांग्रेस 6 से बढ़कर 40 पर पहुंच जाएगी. बाकी सीटें अन्य के खाते में जा सकती है. राजस्थान राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें में से 199 पर चुनाव हुए है, जिनमें से कांग्रेस को 99, बीजेपी को 73, बसपा को 6 और अन्य को 18 सीटें मिली है. लोकसभा की 25 सीटें राज्य में हैं. बीजेपी ने 2014 के चुनाव में सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. विधानसभा चुनाव के नतीजों को लोकसभा से तुलना की जाए तो कांग्रेस को 12 सीटें मिल सकती है. वहीं, बीजेपी को 9 सीटों से संतोष करना पड़ सकती है. जबकि बाकी सीटें अन्य के खाते में जा सकती है. मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 114, बीजेपी को 109 और 7 सीटें अन्य को मिली हैं. सूबे में कुल 29 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 27 सीटें और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थी. विधानसभा चुनाव की तर्ज पर अगर 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे तो कांग्रेस को 16 और बीजेपी 13 सीटें मिल सकती हैं. छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 90 सीटों में से कांग्रेस को 68, बीजेपी को 15 और अन्य को 7 सीटें मिली हैं. राज्य में कुल 11 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने बीजेपी को 10 और कांग्रेस को 1 सीट मिली थी. विधानसभा चुनाव की तर्ज पर लोकसभा के नतीजे रहे तो कांग्रेस को 9 और बीजेपी व अन्य को 1-1 सीटें मिल सकती है. तेलंगाना तेलंगाना में विधानसभा चुनाव 119 सीटों में से कांग्रेस गठबंधन को 21 सीटें, केसीआर को 88, AIMIM को 7 और अन्य को 3 सीटें मिली है. राज्य में 17 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 2, कांग्रेस को 2 और टीआरएस को 11 सीटें मिली थी. विधानसभा की तर्ज पर लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुलेगा. जबकि कांग्रेस को 3 और केसीआर 13 सीटें जीत सकते हैं. मिजोरम मिजोरम में विधानसभा चुनाव 40 सीटों में से कांग्रेस को 5 और बीजेपी को 1 सीटें मिली है. जबकि एमएनएफ को 29 सीटें मिली है. राज्य में एक लोकसभा सीटें है और वो कांग्रेस के पास है. लेकिन ऐसे ही नतीजे रहे तो कांग्रेस को वो सीट गंवानी पड़ सकती है. स्रोतः आज तक

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बसपा का क्या हुआ, यहां देखिए

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File Photo

नई दिल्ली। पांच राज्यों के चुनाव नतीजें साफ हो चुके हैं। अब बहस इस पर हो रही है कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा और कौन मंत्री। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा जिस तीसरी पार्टी पर सबकी नजर थी, वो बहुजन समाज पार्टी है। ऐसे में इस बात का भी विश्लेषण करना जरूरी है कि आखिर इन चुनावों में बसपा कहां ठहरती है।

चुनाव से पहले माना जा रहा था कि बहुजन समाज पार्टी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पूरी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में कामयाब रहेगी। इसकी जायज वजह भी थी। मध्य प्रदेश में बसपा एक मजबूत ताकत मानी जाती है और प्रदेश के कुछ खास हिस्सों में उसकी अच्छी पकड़ है। जबकि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी से गठबंधन के बाद बसपा को तीसरी ताकत के तौर पर देखा जा रहा था। क्योंकि इसके पहले कर्नाटक में जेडीएस के साथ गठबंधन कर बसपा यह साबित कर चुकी थी। लेकिन नतीजों को देखें तो बसपा की उम्मीदों को सबसे बड़ा झटका छत्तीसगढ़ में ही लगा है। तो वहीं मध्यप्रदेश में 2008 के बाद लगातार फिसल रही बसपा इस बार भी नहीं संभल सकी और ज्यादा नीचे चली गई।

आईए आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि इन तीनों राज्यों में बसपा का क्या हाल रहा। सबसे पहले बात सीटों की।

 बसपा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन राजस्थान में किया, जहां उसने 6 सीटें जीती है। जबकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसके दो-दो विधायक जीते हैं।

फायदे नुकसान की बात करें तो बसपा को सीटों और वोट प्रतिशत के लिहाज से राजस्थान में बड़ा फायदा हुआ है। 2013 में बसपा यहां 3 सीटें जीती थी, जो बढ़कर 6 हो गई हैं। उसे 4 फीसदी वोट मिले हैं।

छ्त्तीसगढ़ में बसपा के पास एक विधायक था। इस चुनाव में उसे एक सीट का फायदा हुआ है। लेकिन बसपा का वोट प्रतिशत 2013 के 4.45 प्रतिशत से गिरकर 3.8 प्रतिशत पर आ गया है।

मध्यप्रदेश में बसपा के लिए चिंतन की स्थिति है। 2008 के बाद बसपा यहां संभल नहीं पाई है। राज्य में उसकी सीटें एक बार फिर कम हो गई हैं और वोट शेयर भी गिरा है। 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को यहां 6.29 प्रतिशत वोट मिला था और उसने 4 सीटें जीती थी। इस बार उसकी सीटें दो हो गई हैं और वोट प्रतिशत भी घटकर 4.9 प्रतिशत हो गया है।

जिन सीटों पर बसपा जीती है

अब हम आपको बताते हैं कि बसपा ने कौन-कौन सी सीट जीती है। मध्यप्रदेश में बसपा ने भिंड और पथरिया सीट जीती है,भिंड से बसपा उम्मीदवार संजीव सिंह ‘संजू’ ने जीत हासिल की है। उन्होंने भाजपा को हराया है।

उऩ्हें 69107 वोट मिले हैं,जबकि पथरिया विधानसभा से रामबाई गोविंद सिंह ने भी भाजपा को हराकर जीत दर्ज की है। रामबाई गोविंद सिंह को 39267 वोट मिले हैं।

 राजस्थान में बसपा के 6 उम्मीदवार जीते हैं। इसमें

–    नगर विधानसभा से – वाजीब अली

–    करौली विधानसभा से – लाखन सिंह मीणा

–    नदवई विधानसभा से – जोगेन्द्र अवाना

–    किशनगढ़ वास विधानसभा से – दीपचंद खेड़िया

–    तिजारा विधानसभा से – संदीप कुमार यादव

–    उदयपुर वाटी विधानसभा से – राजेन्द्र गूढ़ा

जबकि छत्तीसगढ़ में बसपा ने पामगढ़ और जैजेपुर की सीट जीती है। पामगढ से इंदू बंजारे ने जीत हासिल की है, जबकि जैजैपुर सीट को बसपा ने बरकरार रखा है। यहां से पार्टी के सिटिंग एमएलए केशव चंद्र दुबारा जीत कर आए हैं।

चुनाव परिणाम के बाद बसपा अध्यक्ष मायावती ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है। मायावती ने 13 दिसंबर को सभी विजयी विधायकों और चुनावी प्रदेशों के पदाधिकारियों को दिल्ली तलब किया है, जहां वह चुनाव परिणाम पर मंथन करेंगी। बहरहाल 2019 के पहले यह चुनाव परिणाम बसपा के लिए भी एक सबक है।

गुजरात में सड़क पर क्यों उतरे हजारों अम्बेडकरवादी

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जूनागढ़ (गुजरात)। डॉ बाबा साहब आंबेडकर जी के 63 वे महापरिनिर्वाण दिन पर गुजरात राज्य के जूनागढ स्थित शहर मे गुजरात भर और अन्य राज्य के आए हुवे स्वयम सैनिक दल परिवार के सैनिक द्वारा डॉ बाबा साहब जी को मान वंदना और सलामी दी गई और साथ मे उनके कार्य को याद किया गया और बडे ही पैमाने मे आए हुवे सभी सैनिक को द्वारा मानवंदना के साथ सामुहिक तौर पर राज्यस्तरीय अधिवेशन मे उनके कार्य को लेकर विचार-विमर्श किया गया और किस तरह बहुजन समाज मे से कुरीतिया व्यसन, और जो सामाजिक बुराई या को नाबुद किया जाए उस पर सामाजिक जागृति के माध्यम से किस तरह यह समाज अपनी हर क्षेत्र मे अग्रसर हो उस पर बाते सभी सैनिक द्वारा रखी गई.

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उर्जित पटेल के बाद एक और अर्थशास्त्री का इस्तीफा

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नई दिल्ली। भारत के जाने माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया है. रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे के अगले ही दिन यह खबर सामने आई है. ख़ास बात ये है कि उन्होंने अपना इस्तीफ़ा एक दिसंबर को दिया था, लेकिन इसकी जानकारी 11 दिसंबर को तब सार्वजनिक हुई जब उन्होंने इस बारे में ट्वीट किया है. सुरजीत भल्ला ने ट्वीट में कहा है कि, “मैंने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की पार्ट टाइम सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है.” भल्ला ने इस्तीफ़ा क्यों दिया है, इसको लेकर उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी है.

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उर्जित पटेल के इस्तीफा मोदी सरकार के लिए कितना बड़ा झटका

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नई दिल्ली। आमतौर पर भारतीय समाज क्रिकेट और राजनीति तक की सीमित रहता है. आर्थिक मुद्दों पर उसकी रुचि कम ही रहती है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था एक ऐसा पहलू है, जिसका प्रभाव हर एक व्यक्ति पर पड़ता है. इसी से जुड़ी एक बड़ी खबर सोमवार 10 दिसंबर को सामने आई, जब भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. पटेल रिजर्व बैंक के 24वें गवर्नर थे. उनका कार्यकाल अगले साल 4 सितंबर को खत्म होना था. कार्यकाल खत्म होने के 9 महीने पहले इस्तीफा देने के उर्जित पटेल के फैसले से सरकार को बड़ा झटका लगा है. पटेल ने 4 सितंबर 2016 से प्रभार संभाला जो जनवरी 2013 से डिप्टी गवर्नर पद पर थे.

हालांकि उन्होंने इस्तीफे का कारण व्यक्तिगत बताया है लेकिन पिछले काफी समय से सरकार के साथ उनका मतभेद चल रहा था. सरकार के साथ कथित मतभेद के कारण कार्यकाल के बीच में ही पद छोडऩे वाले वह देश के दूसरे गवर्नर हैं. इससे पहले बेनेगल रामा राव ने तत्कालीन वित्त मंत्री के साथ विवाद की वजह से 1957 में इस्तीफा दे दिया था.

मोदी सरकार के साथ कई मसलों पर लंबी तनातनी के बाद उनके इस्तीफ़े की अटकलें लगाई जा रही थी, हालांकि ऐसे इस्तीफे को व्यक्तिगत कारणों से दिया गया ही बताया जाता है लेकिन माना जा रहा है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता, कैश फ्लो और ब्याज दरों में कमी नहीं करने को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव था.

पटेल के इस्तीफ़े की टाइमिंग भी अहम है. पटेल का इस्तीफ़ा ऐसे समय पर आया है, जब पूरा देश पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहा था. तो वहीं एक दिन बाद ही संसद का शीतकालीन सत्र भी शुरू होना था. इसके अलावा चार दिन बाद यानी 14 दिसंबर को रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक निर्धारित है.

रिज़र्व बैंक और मोदी सरकार के बीच तनातनी पहली बार तब उभर कर सामने आई थी जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता की वक़ालत की थी. विरल आचार्य ने मुंबई में देश के बड़े उद्योगपतियों के एक इवेंट में कहा था, ‘केंद्रीय बैंक की आज़ादी को कमज़ोर करना त्रासदी जैसा हो सकता है. जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.’

इस्तीफे के पीछे का एक कारण रिजर्व बैंक के खजाने पर सरकार की नजर होना भी है. सरकार आरबीआई के खज़ाने में पड़ी जमा राशि में बड़ा हिस्सा चाहती थी. इसको लेकर सरकार के साथ रिजर्व बैंक के गवर्नर का विवाद चल रहा था. हालाँकि सरकार की तरफ से स्पष्ट किया गया था कि उसे अभी किसी तरह की रकम की ज़रूरत नहीं है. केन्द्र सरकार और आरबीआई के बीच विवाद का एक और विषय आरबीआई एक्ट का सेक्शन 7 था. इस सेक्शन के तहत केन्द्र सरकार जनहित में अहम मुद्दों पर आरबीआई को निर्देश दे सकती है. हालांकि केन्द्र सरकार ने कहा था कि उसने इस सेक्शन का इस्तेमाल नहीं किया है.

अब सवाल है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से इस्तीफे का कितना प्रभाव पड़ेगा.

विश्लेषकों की राय

ऑर्गनाइजेशन फोर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी OECD ने 2019 के लिए भारत का जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.3 फ़ीसदी रखा है. ऐसे में आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना है कि ग्रोथ रेट घटाने की ख़बरों के बीच गवर्नर का पूरा कार्यकाल किए बगैर बीच में पद छोड़ देना रेटिंग एजेंसियों को और चौकन्ना कर देगा.

बंद्योपाध्याय कहते हैं, “सबसे बड़ी मुश्किल ये होगी कि भारत की ग्रोथ स्टोरी से विदेशी निवेशकों का डिग सकता है. वैसे भी रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं हैं और इस घटनाक्रम के बाद हालत और बदतर होंगे.”

विश्लेषकों का कहना है कि इस ख़बर का बेहद नकारात्मक असर आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है. इलारा कैपिटल की वाइस प्रेसिडेंट गरिमा कपूर का कहन है, “भारत के लिए ये बेहद नकारात्मक ख़बर है. भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़राब होगी. विदेशी संस्थागत निवेशक भी इसे सकारात्मक रूप से नहीं लेंगे. आखिरकार केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता का सवाल है. अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिहाज से ये नकारात्मक होगा.”

दूसरी ओर सरकार के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या ये आने वाली है कि वो इस पद पर किसे बिठाते हैं. पहले रघुराम राजन और फिर उर्जित पटेल, दोनों ही गवर्नरों के कार्यकाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे ये लगा है कि सरकार रिज़र्व बैंक पर दबाव बनाना चाहती है. निश्चित तौर पर भारत में निवेश कर मुनाफ़ा कमाने की इच्छा रखने वाले विदेशी निवेशकों का सेंटिमेंट बिगड़ेगा.”

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी कहा है कि उर्जित का इस्तीफ़ा अर्थव्यवस्था पर गहरा आघात है. जो भी हो रिजर्व बैंक के प्रमुख पद से गवर्नर का इस्तीफा देश की सत्ता पर सवाल खड़े करने वाला है.

गौरतलब है कि पटेल ने ब्रिक्स देशों के बीच अंतर-सरकार संधि और इन देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच अंतर बैंक समझौते (आईसीबीए) की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाई थी. इससे इन देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच आरक्षित विदेशी मुद्रा व्यवस्था (सीआरए) तथा विदेशी मुद्रा की अदला-बदली की सुविधा के नियम निर्धारित किए जा सके.’ पटेल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में भी काम कर चुके हैं. वो 1996-1997 के दौरान आईएमएफ से प्रतिनियुक्ति पर भारत आए थे.

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विपक्षी मंच से सपा-बसपा के गायब रहने के मायने

नई दिल्ली। तीन राज्यों के चुनावी नतीजों में भाजपा के पिछड़ने की खबर भऱ से ही विपक्ष की बांछे खिल गई है. चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले ही जहां ज्यादातर विपक्षी दलों ने एक साथ आकर भाजपा के खिलाफ मोर्चे की कवायद शुरू कर दी तो वहीं बिहार से एनडीए में शामिल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही है.

गठबंधन से अलग होते ही कुशवाहा को मोदी के द्वारा बिहार के लिए किए गए वादों की याद आ गई. तो चार साल से ज्यादा समय तक सत्ता की मलाई खाने के बाद कुशवाहा को सामाजिक न्याय का एजेंडा भी याद आ गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय के एजेंडे से हटकर RSS के एजेंडे को लागू किया जा रहा है. इससे पहले कुशवाहा तेजस्वी यादव औऱ शरद यादव से भी मुलाकात कर चुके थे.

हालांकि महागठबंधन की कवायद को मायावती और अखिलेश यादव के शामिल नहीं होने से झटका लगा. अखिलेश यादव ने चुनावी नतीजों से पहले महागठबंधन की कवायद को जल्दबाजी बताया. तो वहीं मायावती पहले ही कह चुकी हैं कि जब तक सीटों को लेकर कोई पुख्ता बातचीत नहीं हो जाती, तब तक गठबंधन बनाने का कोई फायदा नहीं है. पिछले दिनों एक प्रेस विज्ञप्ति में बसपा प्रमुख ने कहा था कि चुनाव पूर्व बने गठबंधन अक्सर सीटों के तालमेल के समय टूट जाते हैं, इसलिए सीटों पर सहमति के बाद ही बसपा किसी गठबंधन में घोषित तौर पर शामिल होगी.

दोनों प्रमुख दलों के महागठबंधन की बैठक में शामिल नहीं होने की एक वजह  दोनों की कांग्रेस पार्टी से नाराजगी भी है. अखिलेश यादव खुलकर कांग्रेस से अपनी नाराजगी जता चुके हैं। तो वहीं मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव से पूर्व कांग्रेस के अड़ियल रवैये के कारण गठबंधन की बात नहीं बनने पर बसपा प्रमुख मायावती भी कांग्रेस से नाराज हैं.

उत्तर प्रदेश के इन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के महागठबंधन की बैठक में शामिल नहीं होने से जहां विपक्षी उम्मीदों को झटका लगा है तो वहीं भाजपा इसे अधूरे विपक्ष की गोलबंदी बता रही है. जो भी हो सत्ता और विपक्ष की असली लड़ाई पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ही तय करेंगे. इन परिणामों के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का रुख क्या होगा, यह भी बड़ा सवाल है.

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10 साल बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया को उसी की ज़मीन पर हराया

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एडिलेड में खेले गए पहले टेस्ट मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 31 रनों से हरा दिया है. खेल के आख़िरी दिन ऑस्ट्रेलिया के सारे बल्लेबाज़ 291 रन पर ही आउट हो गए. इससे पहले भारत ने एडिलेड ओवल में 2003 में टेस्ट मैच जीता था.

भारत ने कभी भी एक टेस्ट सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पहला मैच नहीं जीता था. इस जीत के साथ ही यह रिकॉर्ड भी टूट गया. भारत ने दूसरी पारी के बाद ऑस्ट्रेलिया को 323 रनों का लक्ष्य दिया था. इस जीत के साथ ही भारत ने चार मैचों की टेस्ट सिरीज़ में 1-0 की बढ़त ले ली है. ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से एस मार्श ने दूसरी पारी में सबसे ज़्यादा 60 रन बनाए. दूसरी पारी में मार्श के अलावा किसी भी खिलाड़ी का निजी स्कोर 50 तक भी नहीं पहुंच पाया. मार्श के बाद कप्तान टिम पेन ने सबसे ज़्यादा 41 रन बनाए. चेतेश्वर पुजारा को मैन ऑफ द मैच मिला. पुजारा ने पहली पारी में 123 और दूसरी पारी में 71 रनों की शानदार पारी खेली थी. इस मैच में पुजारा ने 16वां शतक मारा.

मैच के चौथे दिन भारत ने 307 रन बनाए थे. भारत को पहली पारी में 15 रनों की बढ़त मिली थी और इस आधार पर ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 323 रनों का टारगेट मिला था. चौथे दिन ऑस्ट्रेलिया ने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की लेकिन भारतीय गेंदबाज़ों ने खेल ख़त्म होने तक चार विकेट चटका दिए थे और स्कोर 104 का था.

पाँचवे दिन ऑस्ट्रेलिया ने खेलना शुरू किया तो मोहम्मद शामी और ईशांत शर्मा ने हैंडस्कॉम्ब और ट्रैविस हेड को 14-14 रन के निजी स्कोर पर ही आउट कर दिया. बुमराह ने टिम पेन का सबसे अहम विकेट लिया. टिम पेन ने ऑस्ट्रेलिया की उम्मीद जगा दी थी, लेकिन बुमराह ने 41 रन के निजी स्कोर पर उन्हें चलता कर दिया.

इस मैच में ऋषभ पंत ने रिकॉर्ड 11 कैच लिए. पंत ने ऐसा कर जैक रसल और एबी डिविलियर्स की बराबरी कर ली है. जीत के बाद विराट कोहली ने अपने गेंजबाज़ों की जमकर तारीफ़ की. कोहली ने कहा कि गेंदबाज़ों ने मौक़ों का फ़ायदा उठाया. इसके साथ ही कोहली ने पुजारा और रहाणे की बल्लेबाज़ी की प्रशंसा की. कोहली ने कहा कि पुजारा और रहाणे ने जीत की बुनियाद रखी दी थी. भारतीय कप्तान ने बैटिंग में मिडल ऑर्डर के बाद के प्रदर्शन पर चिंता जताई है. इस जीत के बाद सुनील गावसकर ने कहा कि भारत ने पहली पारी में 15 रन का लीड लेकर आत्मविश्वास हासिल कर लिया था. गावसकर का मानना है कि इस हार के बाद ऑस्ट्रेलिया दबाव में होगा.

आख़िर विकेट के लिए भारतीय गेंदबाज़ों को जूझना पड़ा, लेकिन आर अश्विन ने हेज़लवुड के रूप में 10वां विकेट लेकर ऐतिहासिक जीत दिला दी. इस जी के साथ ही विराट कोहली भारत के पहले कप्तान बन गए हैं, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका में टेस्ट मैच जीता. इस जीत से भारत दूसरा एशियाई देश बन गया है जिसने ऑस्ट्रेलियाई ज़मीन पर टेस्ट सिरीज़ का पहला मैच जीता. इससे पहले पाकिस्तान ने ही ऐसा किया था. अश्विन ने कुल 6 विकेट लिए और ऑस्ट्रेलिया में उनका यह बेहतरीन प्रदर्शन था.

2003 में राहुल द्रविड़ के बाद विराट कोहली की टीम ने यह इतिहास रचा है. इस जीत में भारतीय गेंदबाज़ों की ख़ूब सराहना हो रही है. आख़िरी पारी में जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शामी और अश्विन ने तीन-तीन विकेट लिए. पहली पारी में भारत ने 250 रन बनाए थे. इसके जवाब में ऑस्ट्रेलिया 235 रन ही बना पाया और भारत को 15 रनों की बढ़त मिली थी.

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सांसद सावित्री बाई फुले का मायावती कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. चर्चा है कि सावित्रीबाई फुले बहुजन समाज पार्टी में जाना चाहती हैं. जब मायावती राज्यसभा की सांसद थीं, तब संसद के गलियारे में भी फुले ने बहनजी से मिलकर उनसे बसपा में शामिल होने की इच्छा जताई थी, हालांकि तब मायावती ने उन्हें अपने सांसद का कार्यकाल खत्म करने का सुझाव दिया था. मायावती और बहुजन समाज पार्टी को लेकर सावित्री बाई फुले का झुकाव कोई नया नहीं है, बल्कि फुले का मायावती से पुराना लगाव रहा है. हम आपको बताते हैं कि आखिर क्या है, सावित्री बाई फुले का मायावती कनेक्शन.

सावित्री बाई फुले कई मामलों में बसपा प्रमुख को फॉलो करती हैं. मसलन उनकी कद-काठी से लेकर हेयर स्टाइल तक बसपा प्रमुख जैसा ही हैं. फुले ने भी संन्यास ले लिया है और बहुजन आंदोलन के हित के लिए अपना जीवन देने की घोषणा कर चुकी हैं.

बहरहाल राजनीति से इतर सावित्री बाई का जीवन भी संघर्षों भरा रहा है. जब वह 6वीं में थीं तो उनके शिक्षक ने उनका वजीफा हड़प लिया और विरोध करने पर उन्हें स्कूल से बाहर कर दिया. दिलचस्प बात ये है कि तब उन्हें बसपा सुप्रीमो मायावती से सीधे बड़ी सहायता मिली थी.

सावित्री बाई फुले ने एक इंटरव्यू में एक घटना का जिक्र किया था. फुले के मुताबिक, “जब मैं कक्षा 6 पास हुई थीं. तब मुझे 480 रुपए वजीफा मिला था. पहले छात्रवृत्ति खाते में नहीं आती थी. मास्टर के खाते में आती थी. मैंने उनसे वजीफा मांगा लेकिन उन्होंने कहा कि चूंकि मैंने तुम्हें पास किया है, इसलिए मैं वजीफा नहीं दे सकता. यही नहीं उन्होंने मेरा नाम काटकर स्कूल से भगा दिया. साफ कह दिया कि मैं नहीं पढ़ाऊंगा.”

इसके बाद मजबूरन सावित्री बाई फुले की पढ़ाई रुक गई. सावित्री ने एक इंटरव्यू में कहा था, “इसके बाद अचलेंद्र नाथ कनौजिया मुझे लखनऊ लेकर गए. उस समय मायावतीजी यूपी की मुख्यमंत्री थीं. वहां मुझे जनता दरबार में पेश किया गया. इसके बाद मैंने सीधे मायावती जी से बात की. मैंने उनसे कहा कि मेरे टीचर ने नाम काट दिया है. कई सालों से मैं घर बैठी हूं. अब आगे पढ़ना चाहती हूं. इसके बाद मायावतीजी ने उनसे पूछा कि कहां पढ़ना चाहती हैं? इस पर मैंने बताया कि नानपारा के इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहती हूं. इसके बाद मायावती ने तुरंत डीएम को फोन किया और डीएम से मेरी टीसी, मार्कशीट मंगवाई और सीधे मेरा एडमिशन इंटर कॉलेज में करवा दिया.”

भाजपा छोड़ने के बाद अब फुले एक बड़ी रैली की तैयारी में हैं जहां वह अपनी आगामी रणनीति का खुलासा करेंगी. देखना यह होगा कि आखिर उनकी यह रणनीति क्या होगी. और यह बसपा और बसपा प्रमुख मायावती के कितने करीब होगी.

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संसद का शीतकालीन सत्र कल से, ये होंगे प्रमुख मुद्दे

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संसद का शीतकालीन सत्र हंगामेदार रहने के आसार हैं. मंगलवार से शुरू होने वाले इस सत्र के दौरान सरकार तीन तलाक, उपभोक्ता संरक्षण, चिट फंड, डीएनए, गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम जैसे विधेयकों सहित करीब तीन दर्जन विधेयक पारित कराना चाहती है. इनमें 20 विधेयक नये हैं जबकि बाकी सदन में पहले ही पेश किये जा चुके विधेयक हैं.

कांग्रेस सहित विपक्षी दल राफेल मुद्दा, कृषि एवं किसानों की समस्याओं, सीबीआई में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के बीच झगड़े जैसे मुद्दे उठाकर सरकार को घेरने का प्रयास करेंगे. राज्यसभा में कांग्रेस के नेता भुवनेश्वर कालिता ने ‘हम संसद सत्र के दौरान राफेल समेत अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे उठायेंगे और सरकार से जवाब मांगेंगे.’

उन्होंने कहा कि संसद में उठाये जाने वाले विषयों की रूपरेखा पार्टी की बैठक में तय की जाएगी लेकिन किसानों के मुद्दे, सीबीआई में वर्तमान स्थिति, साम्प्रदायिक सौहार्द के समक्ष चुनौती जैसे विषय निश्चित तौर पर उठेंगे. वहीं, संसदीय कार्य राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि सरकार के लिये यह सत्र महत्वपूर्ण है. तीन अध्यादेश के संबंध में विधेयक आने हैं. ‘हम तीन तलाक संबंधी विधेयक पारित कराना चाहते हैं.’

उन्होंने कहा कि लोकसभा में पेश किये गए करीब 15 विधेयक और राज्यसभा में पेश 9 विधेयक पारित होने हैं. अन्य महत्वपूर्ण नये विधेयक भी पेश किये जाने हैं और पारित होने हैं.

यह पूछे जाने पर कि, विपक्ष राफेल समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास करेगा, गोयल ने कहा कि विपक्ष नियमों के तहत कोई भी मुद्दा उठा सकता है और सरकार इसके लिये तैयार है. सरकार का दामन और नीयत दोनों साफ हैं. ‘हम नियमों के तहत चर्चा कराने को तैयार हैं.’

संसद का शीतकालीन सत्र ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब पांच राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना मिजोरम के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने वाले हैं. इनमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस के लिये महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि संसद सत्र पर चुनाव परिणाम का प्रभाव देखने को मिल सकता है.

सत्र के दौरान लोकसभा में पेश होने वाले नये विधेयकों में तीन तलाक संबंधी विधेयक, कंपनी संशोधन विधेयक, भारतीय चिकित्सा परिषद संशोधन विधेयक, भारतीय औषधि प्रणाली के लिये राष्ट्रीय आयोग संबंधी विधेयक, राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग विधेयक, राष्ट्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आयोग विधेयक, राष्ट्रीय विमान संशोधन विधेयक, जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक संशोधन विधेयक, सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय जांच एजेंसी संशोधन विधेयक, गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम संशोधन विधेयक, बांध सुरक्षा विधेयक, एनसीईआरटी विधेयक आदि शामिल हैं.

श्रोत :- न्यूज18 Read it also-रिटायर होते ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने खोली चुनावों की पोल