यूपी के 68,500 शिक्षकों की भर्ती का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, यूपी सरकार को नोटिस

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उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति में धांधली का मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच चुका है. मंगलवार को मामले की जांच सीबीआई से कराने वाली अर्जी पर न्यायालय ने यूपी सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है. न्यायालय में यह याचिका मामले की सीबीआई जांच पर रोक लगाने के आदेश के खिलाफ लगाई गई है. पिछले साल इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था.

फरवरी में उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर उच्च न्यायालय की डिविजन बेंच ने सीबीआई जांच पर रोक लगाई थी. परीक्षा में असफल रहे अभ्यर्थियों ने अदालत में याचिका दायर करके सीबीआई जांच को बरकरार रखने की मांग की है. यूपी में 68,500 पदों पर नियुक्तियां हुई थीं.

परीक्षा में मिली धांधलियों की जांच के लिए राज्य सरकार ने तीन सदस्यीय समिति बनाई थी. लेकिन इसमें दो सदस्य परीक्षा प्रक्रिया तय करने वाले बेसिक शिक्षा विभाग से होने के तर्क पर इलाहबाद उच्च न्यायालय की एकल जज ने एक नवंबर 2018 को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए थे. इसे खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल इस आधार पर कि जांच कर रहे अधिकारी दागी पाए जा रहे विभाग से हैं. मामले की जांच सीबीआई को नहीं दी जानी चाहिए. एक नजर में मामला इस परीक्षा में शामिल सोनिका देवी ने याचिका दायर कर परीक्षा प्रक्रिया पर आपत्तियां जताई गईं. सुनवाई के दौरान परीक्षा नियामक प्राधिकरण इलाहाबाद से मंगवाए गए दस्तावेजों की जांच हुई. इसमें सामने आया कि अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं को बदला गया है.

सरकार ने जांच के लिए समिति बनाई, जिसमें प्रमुख सचिव चीनी उद्योग संजय आर भूसरेड्डी को अध्यक्ष और सर्व शिक्षा अभियान निदेशक वेदपति मिश्रा व बेसिक शिक्षा के डायरेक्टर सर्वेंद्र विक्रम सिंह को सदस्य बनाया गया. प्राधिकरण सचिव सुतता सिंह को निलंबित किया गया. समिति ने बताया कि 12 अभ्यर्थियों की कॉपियां में गड़बड़ियां सामने आई.

23 अभ्यर्थियों को परीक्षा परिणाम की दूसरी लिस्ट में योग्य घोषित किया गया, वे पहली लिस्ट में फेल थे. वहीं 24 अभ्यर्थियों को योग्य होते हुए भी आयोग्य घोषित किया गया. इस याचिका पर एक नवंबर को दिए निर्णय में हाईकोर्ट ने पूरे मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे.

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दिल्ली में फिर जनाधार तलाश रही बसपा

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नई दिल्ली। राजधानी में बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) एक बार फिर अपना जनाधार तलाश रही है. आप के उदय के बाद खासा नुकसान झेल रही पार्टी लोकसभा चुनाव में दमखम के साथ उतरी है. पार्टी यहां प्रचार के अंतिम दिन 10 मई को दोपहर दो बजे पूर्व मुख्यमंत्री और सुप्रीमो मायावती की रैली भी कराएगी. पूर्वी दिल्ली क्षेत्र के जीटीबी एन्क्लेव रामलीला मैदान में होने वाली इस रैली में प्रदेश नेतृत्व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी लाने की कवायद में जुटा है.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में प्रत्याशी राजवीर सिंह के समर्थन में प्रचार अभियान में कार्यकर्ता जुटे हुए हैं. उत्तर प्रदेश से सटा इलाका होने के कारण वहां के काडर भी रोड शो में जुट रहे हैं. पार्टी ने सातों सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन नई दिल्ली और उत्तर पश्चिम दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से दो प्रत्याशियों के नामांकन रद्द हो गए. बसपा रणनीतिकार मानते हैं कि आप के घटते जनाधार का लाभ उसे मिल सकता है. 2008 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 14 प्रतिशत से भी अधिक वोट मिले थे. उस समय इस पर कई रणनीतिकार हैरान थे. इस चुनाव में पार्टी को उम्मीद है कि दिल्ली में दलित वर्ग की बड़ी संख्या में मौजूदगी से उसे फायदा मिल सकता है. हालांकि पार्टी सभी वर्गों से संपर्क साध रही है.

पार्टी ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली से राजवीर सिंह, चांदनी चौक से शाहिद अली, पूर्वी दिल्ली से संजय कुमार, पश्चिमी दिल्ली से सीता सरन सेन और दक्षिणी दिल्ली सिद्घांत गौतम को टिकट दिया है. वर्ष 2007 में पार्टी के 17 पार्षद चुने गए थे. 2012 में इनकी संख्या 12 रही. 2017 में पार्टी के महज 3 पार्षद चुने गए. 2006 के विधानसभा चुनाव में बसपा के 2 विधायक चुने गए थे.

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मीडिया पर क्यों भड़के हैं अनुपम खेर

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चंडीगढ़। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर मीडिया से काफी नाराज हैं. दरअसल अनुपम खेर की नाराजगी की वजह अखबारों में प्रकाशित वो रिपोर्ट है, जिसमें भीड़ नहीं होने के चलते भाजपा को अनुपम खेर की रैली को कैंसिल करना पड़ा. अनुपम खेर चंडीगढ़ से भाजपा की अपनी प्रत्याशी किरण खेर के समर्थन में सोमवार को रैली करने पहुंचे थे, लेकिन रैली स्थल पर भीड़ नहीं होने की वजह से भाजपा और खेर को यह रैली कैंसिल करनी पड़ी. इसी की खबर अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित कर दी, जिससे दिग्गज अभिनेता नाराज है.

इसके बाद मंगलवार को खेर ने एक और रैली को संबोधित किया जिसमें अच्छी खासी भीड़ थी. वहां अनुपम खेर ने इसका जिक्र करते हुए कहा कि मैंने 515 फिल्में की हैं, सारी फिल्में हिट नहीं होती. उन्होंने कहा कि अखबारों में जो खबर छपी है वो ठीक है लेकिन मुझे खुशी होगी अगर अखबारों में आज भी भीड़ वाली रैली की खबर भी प्रकाशित होगी. गौरतलब है कि भाजपा को पूरे देश में विपक्ष से इस चुनाव में कड़ी टक्कर मिल रही है. 2014 में जिस तरह मोदी लहर थी, इस बार वह गायब है.

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भोपाल में दिग्विजय और प्रज्ञा नहीं, साधु बनाम साध्वी की लड़ाई

भोपाल। मध्यप्रदेश लोकसभा सीट के लिए लड़ाई रोचक होती जा रही है. इस सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उतारा है तो भाजपा की ओर से आतंक की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा गया है. इस सीट पर जिस तरह से संत समाज दिग्विजय सिंह के समर्थन में आ गया है, उसने मुकाबले को और दिलचस्प बनाते हुए लड़ाई को संत बनाम साध्वी का बना दिया है.

शिवराज सिंह की सरकार में जिस चर्चित कंप्यूटर बाबा को बीजेपी (BJP) की तत्कालीन सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा दिया था वही बाबा अब ‘चौकीदार’ को बदलने को लेकर मोर्चा खोल चुके हैं. लोकसभा चुनाव में भोपाल सीट से कांग्रेस के समर्थन में आगे आ चुके नामदेव त्यागी उर्फ कंप्यूटर बाबा तो भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी भी नहीं मानते. उनका कहना है कि साधु समाज हत्याकांड, बम ब्लास्ट और आतंकवाद के साथ नहीं बल्कि धर्म के साथ रहेगा. गौरतलब है कि इस बयान के जरिए कंप्यूटर बाबा ने प्रज्ञा ठाकुर पर निशाना साधा है. दिग्विजय सिंह के समर्थन में कम्प्यूटर बाबा की अगुवाई में संतों ने भोपाल में अगले तीन दिनों के लिए डेरा जमा लिया है.

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VVPAT-EVM पर 21 दलों की याचिका खारिज, नायडू बोले- आज फिर शिकायत लेकर जाएंगे EC

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लोकसभा चुनाव के बीच 21 विपक्षी दलों को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. VVPAT-EVM की 50 फीसदी पर्चियों के मिलान की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया. इस याचिका को टीडीपी और कांग्रेस सहित 21 विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया था.

इन दलों की मांग थी कि 50 फीसदी वीवीपैट (VVPAT) पर्चियों की ईवीएम से मिलान का आदेश चुनाव आयोग को दिया जाए. सुनवाई के लिए चंद्रबाबू नायडू, डी. राजा, संजय सिंह और फारूक अब्दुल्ला अदालत में मौजूद रहे. याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि अदालत इस मामले को बार-बार क्यों सुने. CJI ने कहा कि वह इस मामले में दखलअंदाजी नहीं करना चाहते हैं.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा है कि जब चुनाव आयोग ने उनकी बात नहीं सुनी थी तो वह यहां आए, लेकिन अब वह फिर चुनाव आयोग जाएंगे. उन्होंने कहा कि तीसरा फ्रंट और चौथा फ्रंट सभी विपक्ष का ही हिस्सा है, हम पीएम उम्मीदवार का नाम चुनाव के बाद तय करेंगे.

वहीं, अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अगर अभी नतीजों में कुछ गलती आती है तो चुनाव आयोग ने कोई नियम जारी नहीं किए हैं, हम इसीलिए अदालत आए थे. अब इस मसले को लेकर विपक्षी नेता आज ही चुनाव आयोग से मिल सकते हैं.

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम पांच बूथ के ईवीएम (EVM) और वीवीपैट की पर्चियों के औचक मिलान करने को कहा था. आयोग ने इसे मान भी लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस लोकसभा चुनाव में ईवीएम और वीवीपैट के मिलान को पांच गुना बढ़ाया. कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र मे 5 वीवीपैट का ईवीएम से मिलान किया जाएगा. अभी सिर्फ एक का वीवीपैट मिलान होता है.

गौरतलब है कि अभी तक चुनाव आयोग 4125 ईवीएम और वीवीपैट के मिलान कराता है जो अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बढ़कर 20625 ईवीएम और वीवीपैट (EVM-VVPAT) का मिलान करना होगा. वर्तमान में वीवीपैट पेपर स्लिप मिलान के लिए प्रति विधानसभा क्षेत्र में केवल एक ईवीएम लिया जाता है. एक ईवीएम प्रति विधानसभा क्षेत्र के 4125 ईवीएम के VVPAT पेपर्स से मिलान कराया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग को 20625 ईवीएम की वीवीपैट पर्चियां गिननी हैं, यानी प्रति विधानसभा क्षेत्र में पांच ईवीएम की जांच होगी. उधर 21 राजनीतिक दलों के नेताओं ने लगभग 6.75 लाख ईवीएम की वीवीपीएटी पेपर स्लिप के मिलान की मांग की थी.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू (टीडीपी), शरद पवार (एनसीपी), फारूक अब्दुल्ला (एनसी), शरद यादव (एलजेडी), अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी), अखिलेश यादव (सपा), डेरेक ओ’ब्रायन (टीएमसी) और एम. के. स्टालिन (डीएमके) की ओर से दायर की गई है. याचिका में उन्होंने अदालत से आग्रह किया था कि ईवीएम के 50 फीसदी नतीजों का आम चुनावों के परिणाम की घोषणा किए जाने से पहले वीवीपैट के साथ मिलान किया जाना चाहिए या दोबारा जांच की जानी चाहिए.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी अध्यक्ष एन. चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि दुनिया के 191 देशों में से मात्र 18 देशों ने ईवीएम को अपनाया है, जिनमें से 3 देश 10 सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल हैं. नायडू ने चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और उनमें गड़बड़ी भी पैदा होती है. इसके अलावा इनकी प्रोग्रामिंग भी की जा सकती है. उन्होंने यह जानने की मांग की कि नए वीवीपैट में वोटर स्लिप मात्र 3 सेकेंड में कैसे दिखाई देता है, जबकि इसे 7 सेकेंड में दिखाई देना चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी ईवीएम से छेड़छाड़ कर वोट हासिल कर सकती है.

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EVM में VVPAT को लेकर विपक्ष को सुप्रीम कोर्ट का झटका

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File Photo: PTI

नई दिल्ली। ईवीएम-वीवीपैट के मसले पर 21 विपक्षी दलों की पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है. इन विपक्षी दलों की मांग ये थी कि चुनाव के दौरान क़रीब 50 फ़ीसदी ईवीएम मशीनों में वीवीपैट का इंतज़ाम होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर कहा है कि हम अपने पुराने फ़ैसले को बदलना नहीं चाहते, एक ही मामले को कितनी बार सुनें. साथ ही भारत के मुख्य न्यायाधीश ने ये भी कहा कि अदालत इस मामले में दख़ल देना नहीं चाहती है.

फै़सले के बाद विपक्षी दलों के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मीडिया से कहा, ”हम सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करते हैं. हमारी कोशिश पूरे देश के मतदाताओं को जागरूक करने की है. ईवीएम ख़राब हो रही हैं लेकिन चुनाव आयोग को कोई गाइडलाइंस नहीं मिली हैं.” आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को प्रत्येक एसेंबली सेगमेंट में एक के बदले पांच ईवीएम का वीवीपैट मिलने करने का निर्देश दिया था. वीवीपीटी की सुविधा होने पर ईवीएम मशीन से निकलने वाली पर्ची से वोट का मिलान करना संभव होता है.

दरअसल विपक्ष के नेता एन चंद्राबाबू नायडू की अगुवाई में पुनर्विचार याचिका में प्रति एसेंबली सेगमेंट की 50 फ़ीसदी ईवीएम मशीनों में वीवीपैट सुविधा लगाने की मांग कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट ने आठ अप्रैल को अपना फ़ैसला सुनाने से पहले चुनाव आयोग से 50 फ़ीसदी ईवीएम मशीनों में वीवीपैट लगाने के बारे में पूछा था तब चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा, ”वीवीपैट की पर्चियों के मिलान का वर्तमान तरीक़ा सबसे उपयुक्त है. हर विधानसभा क्षेत्र में 50 फ़ीसदी ईवीएम के वोटों की गणना वीवीपैट पर्चियों से करने में लोकसभा चुनाव के नतीजे पांच दिन की देरी से आएंगे.”

  • साभार- बीबीसी से

ब्रेकअप के 3 साल बाद Katrina Kaif ने Ranbir Kapoor को लेकर किया खुलासा, यूज करते हैं

नई दिल्ली। जेएनएन. बॉलीवडु एक्ट्रेस कटरीना कैफ इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘भारत’ के प्रमोशन में बिजी हैं. इसी सिलसिले में वो बॉलीवुड अभिनेता अरबाज़ खान के शो पिंच में पहुंचीं जहां उन्होंने अरबाज के हर सवाल का बेबाकी से जवाब दिया. करटरीना कैफ एक सक्सेसफुल एक्ट्रेस होने के बाद भी सोशल मीडिया से कितने वक्त बाद जुड़ी हैं ये बात सभी जानते हैं. 2017 में उन्होंने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया है.

अरबाज खान ने कटरीना कैफ से इसी से जुड़ा एक सवाल किया. एक्ट्रेस ने उस सवाल का जवाब तो खुलकर दिया ही साथ ही कुछ ऐसा भी बता दिया जो सुर्खियां बन गया. दरअसल, अरबाज ने उनसे पूछा, क्या वो लोगों पर नजर रखने के लिए कोई फेक अकाउंट इस्तेमाल करती हैं? तो कटरीना ने बताया- नहीं, बिल्कुल नहीं… हालांकि इसी के साथ उन्होंने अपने एक्स बॉयफ्रेंड के बारे में एक सीक्रेट बता दिया.

कटरीना ने कहा, मैं तो फेक अकाउंट का इस्तेमाल नहीं करती पर मुझे पता है रणबीर फेक अकाउंट यूज करते हैं ताकी वो सब पर नजर रख सकें. वैसे बता दूं कि रणबीर कपूर ही वो शख्स हैं जिसने मुझे इंस्टाग्राम सिखाया. बता दें कि कटरीना और रणबीर ने लंबे समय तक दूसरे को डेट किया था. दोनों के शादी तक कर लेने की अटकलें थीं. लेकिन ये रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला और दोनों अलग हो गए. थोड़े दिन पहले ही ब्रेकअप को लेकर कटरीन का बयान भी सामने आया था. जिसमें उन्होंने ब्रेकअप की जिम्मेदारी ली थी.

वर्क फ्रंट की बात करें तो कटरीना जल्द ही सलमान खान के साथ फिल्म ‘भारत’ में नजर आने वाली हैं. भारत में वो लीड रोल में होंगी. फिल्म ईद के मौके पर 5 जून को रिलीज होगी. वहीं रणबीर कपूर फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में नजर आएंगे. इस फिल्म में उनके साथ आलिया भट्ट लीड रोल में होंगी. रणबीर इस समय आलिया भट्ट को डेट कर रहे हैं. जबकि कटरीना कैफ अभी सिंगल हैं.

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लोकसभा चुनाव: मायावती की दिल्ली डगर वाया आंबेडकरनगर?

लखनऊ। न चुनाव हुआ और न अभी ‘अनुमान भरे’ नतीजे आए हैं लेकिन मायावती ने अभी से ‘उपचुनाव’ के लिए जमीन तैयार कर दी है. पिछले पंद्रह सालों से सीधे चुनाव से दूर रहने वाली मायावती ने आंबेडकरनगर की रैली में कह दिया कि दिल्ली का रास्ता तो यहीं से जाता है. इसलिए अगर जरूरत पड़ी तो वह आंबेडकरनगर से ही चुनाव लड़ेंगी. मायावती ने दिल्ली का तीन बार का रास्ता इसी सीट (तब अकबरपुर) से तय किया है. हालांकि पिछले चुनाव में पार्टी ने अपनी ‘परंपरागत सीट’ गंवा दी थी.

सेफ सीट रही है आंबेडकरनगर दरअसल आंबेडकरनगर मायावती की पुरानी सीट है. मायावती यहीं से चुनाव लड़ती रही हैं. या यूं कह लें कि जब मायावती इस सीट से चुनाव नहीं लड़ीं तब भी बीएसपी के खाते में ही यह सीट रही. तब आंबेडकरनगर लोकसभा सीट अकबरपुर के नाम से जानी जाती थी. मायावती सबसे पहले 1989 में बिजनौर लोकसभा सीट से संसद पहुंची थीं. उसके बाद 1998, 1999 और 2004 में मायावती अकबरपुर (अब आंबेडकरनगर) सीट से चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचीं. 2009 में भी यह सीट बीएसपी के पास ही रही.

इस बार आंबेडकरनगर में बीएसपी के विधायक रितेश पांडे को टिकट मिला है. रितेश पूर्व सांसद राकेश पांडे के पुत्र हैं. चूंकि बीएसपी और मायावती के लिए सबसे मुफीद सीट आंबेडकरनगर ही है ऐसे में उनका यहां से चुनाव लड़ने की अपील करना लोगों को जोड़ने सरीखा ही है. साथ ही बसपा की यह परंपरागत सीट उनकी ही होगी. मायावती ने रविवार को आंबेडकरनगर में आयोजित रैली में कहा कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो वह इसी सीट से चुनाव लड़ेंगी. उन्होंने कहा कि सबको पता है कि दिल्ली का रास्ता आंबेडकरनगर की सीट से ही होकर जाता है.

जब 2014 के चुनाव चल रहे थे तब मायावती ने यह कहा था कि वह तो पहले से ही राज्यसभा सांसद हैं. उनका कार्यकाल 2018 में समाप्त होगा. इसलिए वह चुनाव नहीं लड़ेंगी.

इस लोकसभा चुनाव में माया ने कहा कि मेरे लिए महत्वपूर्ण है कि हमारा गठबंधन जीते. मेरे चुनाव लड़ने का सवाल है तो मैं कभी भी यूपी की किसी भी सीट से चुनाव लड़ सकती हूं.

एक और रैली में मायावती ने कहा कि मुझे लगता है कि यह पार्टी के हित में नहीं होगा, इसलिए मैंने 2019 के लोकसभा चुनाव से दूर रहने का मन बनाया है. एक चुनावी सभा में मायावती ने कहा था कि जरूरत पड़ने पर जब भी मेरा मन करेगा मैं किसी भी सीट को खाली कराकर वहां से चुनाव लड़ लूंगी.

आंबेडकरनगर का समीकरण आंबेडकरनगर में एक मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं और दूसरे मंत्री अपनी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. सारे जातीय समीकरण गठबंधन के लिए मुफीद हैं. फिर भी यहां जोरदार जंग है. टांडा के मोहम्मद इश्तियाक कहते हैं कि यहां हाथी का जोर है. वह कहते हैं कि आंबेडकरनगर के लिए मायावती ने बहुत कुछ किया है. वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि इस बार जातीय समीकरण टूट सकते हैं. ऐसे में जाति को जोड़कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं. मोदी का नाम चल रहा है. जिन लोगों को उनकी योजनाओं से लाभ मिला है, उनमें अधिकांश मोदी के साथ हैं.

बीएसपी ने पूर्व सांसद राकेश पांडे के पुत्र रितेश को उतारा है. पिछले चुनाव में राकेश बीएसपी के टिकट पर बीजेपी से दो लाख वोटों से हार गए थे. तब दो ब्राह्मणों की टक्कर थी. बीजेपी से हरिओम पांडे थे और बीएसपी से राकेश पांडे. बीजेपी ने इस बार प्रत्याशी बदला और राज्य सरकार के मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा को बहराइच से लाकर मैदान में उतारा है. कांग्रेस प्रत्याशी उम्मेद सिंह का पर्चा ही खारिज हो गया.

साफ है यहां लड़ाई बीजेपी और गठबंधन के बीच है. बीएसपी के वरिष्ठ नेता लालजी वर्मा टांडा के हैं. बीएसपी के ही अन्य वरिष्ठ नेता राम अचल राजभर इसी जिले के हैं. ऐसे में बीएसपी को उम्मीद है कि गठबंधन के सहारे और जाति समीकरण के बल पर यहां पर हाथी जीत जाएगा. राकेश पांडे का ब्राह्मणों में प्रभाव है, लेकिन फिर भी यहां वोटों का बंटवारा है. यह कहना कठिन है कि कौन कितने प्रतिशत वोट ले जाएगा. बीएसपी कार्यकर्ता किशनलाल कहते हैं कि दलित वोट पार्टी को ही मिलेंगे. मुस्लिम पूरी तरह उनके साथ है. यादव मतदाता भी बीएसपी के साथ जा रहा है.

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मुसलमान, यादव व दलित में जो दो को साधेगा, वही जीतेगा आजमगढ़

पूर्वांचल में सबसे अहम और रोचक मुकाबला आजमगढ़ में है. यह जिला मऊ, गोरखपुर, गाजीपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर और आंबेडकर जिले की सीमा से लगा हुआ है. भाजपा के टिकट पर दिनेश लाल यादव (निरहुआ) चुनावी मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ सपा-बसपा गठबंधन के सूत्रधार अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. इस क्षेत्र में 19 फीसदी यादव, 16 दलित और 14 फीसदी मुसलमान हैं. आजमगढ़ की जनता लहर के विपरीत चलती है : इस सीट का इतिहास रहा है लहर के विपरीत चलने का. 2014 में मोदी लहर में भी यहां की जनता ने मुलायम सिंह यादव को चुना था. 1978 में कांग्रेस विरोधी लहर में यहां कांग्रेस की मोहसिना किदवई को जीत मिली थी. वीपी सिंह की लहर में यहां की जनता ने बसपा को जिताया था.

निरहुआ को प्रशंसकों के समर्थन का भरोसा बातचीत में निरहुआ से कहते हैं, अखिलेश प्रचार करने नहीं आ रहे हैं. अगर वह जीत गये, तो क्षेत्र की जनता का कितना साथ दे पायेंगे? क्या आप फिल्में छोड़ पायेंगे, इस सवाल पर उन्होंने कहा, मैं यहीं फिल्में बनाऊंगा, मुंबई से चल कर मुझे आजमगढ़ आना पड़ता है. मेरी कई फिल्में यहीं बनी हैं. मैं यहीं रहूंगा. वोटर समीकरण कुल मतदाता         17.70 लाख महिला                8.08 लाख पुरुष                   9.63 लाख अन्य                  74 एक वोटर मुकेश जी कहते हैं, यही आजगढ़ की जनता का दुर्भाग्य कि उसके पास स्थानीय कोई नेता नहीं है. जो भी हैं, बाहरी हैं. जनता अपनी समस्या लेकर किसके पास जायेगी? सपा और बसपा के गठबंधन से भाजपा कमजोर हुई है, लेकिन निरहुआ के प्रचार और जनसभा में की जा रही मेहनत की भी सराहना करते हैं. इस क्षेत्र के चुनावी समीकरण को समझना हो, तो ऐसे समझिए, यादव, दलित, मुस्लिम में से किसी दो को जो अपने पक्ष में करने में कामयाब रहा, जीत उसकी. 1962 से लगातार इस सीट पर या तो यादव प्रत्याशी विजयी हुआ है या दूसरे नंबर पर रहा है. वैसे इस बार एक यादव की टक्कर दूसरे यादव से है. अब तक हुए 14 आम चुनाव और दो उपचुनावों में से बारह बार यादव जाति के उम्मीदवार लोकसभा पहुंचे. तीन बार मुस्लिम प्रत्याशियों ने कामयाबी हासिल की. विधानसभा सीटें:-गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, आजमगढ, मेंहनगर Read it alsoPM मोदी पर मायावती ने ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ का लगाया आरोप

अलवर में पति के सामने ही एक दलित महिला से गैंगरेप, दबंगों ने VIDEO भी किया वायरल

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राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी थाना क्षेत्र में दबंगों द्वारा एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया है. प्राप्त जानकारी के मुताबिक, दबंगों ने दलित लड़की के साथ न केवल रेप किया बल्कि उसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है.

बता दें कि बीते 26 अप्रैल को एक दलित लड़की अपने पति के साथ ससुराल जा रही थी. रास्ते में कुछ दबंगों ने उसके पति को धमका कर महिला के साथ बारी-बारी से गैंगरेप किया और अश्लिल फोटो और वीडियो बना कर धमकी देने लगे कि अगर किसी को इसकी जानकारी दोगे तो इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर देंगे.

पीड़िता ने बताया कि थानागाजी थाना क्षेत्र के बामनवास काकड़ के रास्ते अलवर की ओर जा रही बाईपास सड़क पर कलाखोरा गांव के पास गुर्जर समाज के युवकों ने कथित रूप से उन्हें रोक लिया. रोकने के बाद सड़क के पास रेत के गहरे टीलों में ले गए और वहां पर आरोपियों ने पति-पत्नी के साथ जमकर अत्याचार किया.

स्थानीय पुलिस के अनुसार सभी लड़कों ने लड़की और उसके मंगेतर को डरा धमका कर अपने बस मेंcrimeकर लिया. इसके बाद लड़की के साथ हवस की हैवानियत भरा खेल खेला. लड़की की अश्लील वीडियो भी अपने मोबाइल में लिया. बाद में उस वीडियो को वायरल कर दिया.

इस घटना के बाद पीड़ित परिवार गहरे सदमे में है ओर डरा हुआ है. स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर जबरदस्त आक्रोश है. अपराधियों को गिरफ्तारी मांग भी जोर पकड़ने लगी है.

थानागाजी क्षेत्र के थानाधिकारी सरदार सिंह ने बताया कि अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और सभी की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है. पुलिस ने छोटेलाल ,जीतू ओर अशोक सहित 5-6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरु कर दी है.

पुलिस के मुताबिक सभी आरोपी शख्स गुर्जर समाज से आता है और क्षेत्र में उसका राजनीतिक प्रभाव भी है. इसलिए शुरुआत में डर की वजह से पीड़िता की ओर से रिपोर्ट दर्ज नही करवाई गई थी.

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पहाड़ के दलितों को इस परंपरा पर फिर से सोचना होगा

युवक की मौत के बाद अस्पताल में विलाप करते परिजन
विलाप करते मृतक जितेन्द्र दास के परिवार के सदस्य (इनसेट में जितेन्द्र दास)

उत्तराखंड के टिहरी में एक 23 साल के दलित युवक को मनुवादी जातिवादी गुंडों ने इसलिए मार डाला क्योंकि वो एक शादी में खाने के लिए ब्रह्मा के मुंह और जांघो से पैदा हुए लोगों के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया. महज 23 साल की उम्र में एक युवक ने जातिवाद के कारण अपनी जान गवां दी. अपने परिवार को देखने वाला वो अकेला था.

क्या खुद को दलितों की रहनुमा बताने वाली बसपा और उसके नेता इस परिवार को न्याय दिलवाएंगे? क्या बाबासाहेब के नाम पर वोट मांगने वाली भाजपा अपने शासन वाले उत्तराखंड राज्य में अपनी सरकार से कह कर इस परिवार को इंसाफ दिलवाएगी? क्या उत्तराखंड में मौजूद सैकड़ों दलित संगठन जातिवाद की भेंट चढ़ने वाले जितेंद्र दास को इंसाफ और न्याय दिलवाने के लिए सड़क पर आएंगे?

क्या ऐसी घटनाओं पर सवर्ण समाज के सजग लोगों को शर्म आएगी? क्या वो अपने समाज के ऐसे दोगले लोगों द्वारा की गई इस अमानवीयता के खिलाफ जितेंद्र को इंसाफ दिलाने सड़क पर उतरेंगे? शायद ऐसा नहीं होगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि जितेन्द्र न मारा जाता अगर पहाड़ के लोगों ने समारोहों में एक-दूसरे के यहां खाने की परंपरा न डाली होती. दरअसल पहाड़ के कई क्षेत्रों में दलित और कथित सवर्ण शादी समारोहों में एक-दूसरे के यहां खाना खाने जाते हैं. हालांकि यह भी भेदभाव पूर्ण ही होता है. दोनों एक-दूसरे के यहां जाते तो हैं लेकिन उनके भोजन और बैठने का प्रबंध अलग होता है. जितेन्द्र किसी दूसरे के घर नहीं गया था, बल्कि शादी उसके अपने परिवार में ही थी. शायद इसी लापरवाही में वह जातिवादियों के बगल में बैठ गया. और उसी के परिवार का नमक खा रहे मनुवादियों ने नमक का भी लिहाज नहीं किया और युवक को मार डाला.

लेकिन सवाल यह है कि आखिर समरसता या फिर सद्भावना के नाम पर दलित समाज को ऐसी प्रथाओं और चलन को क्यों ढोना चाहिए, जहां उनका अनादर होता हो या फिर उन्हें सामने वाले से कमतर महसूस होता हो. टिहरी-गढ़वाल के दलितों को अब इस प्रथा के बारे में फिर से सोचना चाहिए, जिसके चलते युवक की जान गई.

समरसता बनाम जातीय आतंकवाद

देश के कई समाचार पत्रों में यह खबर प्रकाशित हुई है

टिहरी जिले के श्रीकोट गांव में जातीय दंभ में डूबे मनुवादियों द्वारा एक दलित युवक की हत्या की खबर इस समाज के एक तबके का अमानवीय चेहरा उजागर करता है. दलित युवक को सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि वह एक शादी समारोह में कथित ऊंची जाति के लोगों के बीच खाना खाने बैठ गया. इस घटना ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि हिन्दू धर्म में एक जाति के व्यक्ति की दूसरी जाति के व्यक्ति के साथ कितनी नफरत है. उत्तराखंड के अधिकतर गांवों में विशेषकर गढ़वाल मंडल में आज भी शादियों के दौरान तथाकथित सवर्ण और तथाकथित अवर्ण (संवैधानिक नाम अनुसूचित जाति) जातियों में एक दूसरे को निमंत्रण देने की परंपरा है. इसके जरिए समाजिक सौहार्द को मजबूत करने की बात कही जाती है.

लेकिन इस परंपरा का सबसे दुखद पहलू यह है कि शादी समारोह के दौरान दोनों जातियों का भोजन अलग–अलग बनता है. यदि सवर्णों के यहां शादी है तो दलित पक्ष के लोगों को राशन अलग दे दिया जाता है और वो अलग खाना बनाते हैं और खाते हैं. ठीक यही हाल दलितों के यहां शादी होने पर होता है. वहां सवर्ण पहुंचते तो हैं लेकिन अलग खाते पकाते हैं. ऐसे में सामाजिक सौहार्द बनाने की कोशिश एक दिखावा मात्र बनकर रह जाती है, क्योंकि ऐसे में दोनों पक्ष एक-दूसरे के साथ घुल-मिल नहीं पाते हैं. टिहरी जिले में घटी घटना इसको इंगित भी करती है.

मृतक जितेन्द्र दास की गलती बस इतनी भर थी कि वह खाने के लिए वहां जा बैठा जहां कथित सवर्णों का झुंड खाने बैठा था. बस यही बात उनसे हजम नहीं हुई और वो जितेन्द्र के साथ मारपीट करने लगे, जिसके बाद अंततः उसने दम तोड़ दिया. दुखद पहलू यह है कि आज दलित समाज का व्यक्ति कभी उनके बीच बैठ जाता है तो तथाकथित सवर्णों का जातीय अहंकार कुलाचें मारने लगता है और ऐसी घटनाएं हो जाती हैं. ऐसा भी नहीं है कि उत्तराखंड में इस तरह की घटना पहली बार हुई है. पहले भी ऐसी घटनाएं सुनने को आती रहती हैं. ऐसी घटना होने के बाद शुरू होता है समझौते का खेल, जैसा इस घटना के बाद भी दिखने लग गया है और फिर क्रूरता के इस खेल को सामान्य घटना बनाकर रफा दफा कर दिया जाता है और फिर निर्लज्जता से कह दिया जाता है कि SC ST Atrocity एक्ट का दुरुपयोग होता है.

कुछ लोग एक जाति द्वारा दूसरी जाति को निमंत्रण देने और अलग अलग खाना बनाने को ही समरसता कहते हैं जबकि बहुजन बुद्धिजीवि इसको मानसिक गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र कहते हैं. हकीकत में यह देश का सबसे बड़ा आतंकवाद है. इस आतंकवाद की जद में देश की एक चौथाई आबादी है. तथाकथित प्रगतिशील तो ऐसे अवसरों पर अपना मुंह ऐसे बंद कर लेते हैं मानो उनके नजरों के सामने तो कुछ हुआ ही नहीं. दलित समाज से एक ही निवेदन है कि समरसता नहीं समता के लिए संघर्ष करो, अपनी मानसिक कुंठा को समाप्त कर आगे बढ़ना ही आपकी जीत का कारण बनेगा.

  • लेखक संजय कुमार उत्तराखंड में शिक्षक हैं। उनके फेसबुक वॉल से साभार।

जानिए, कैसे बीजेपी का खेल बना-बिगाड़ सकती हैं आज की 51 सीटें

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के 5वें चरण में यूं तो 51 सीटों पर ही मुकाबला है लेकिन दिल्ली की कुर्सी की जंग के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण चरण है. बीजेपी के लिए यह चरण तो काफी अहम है. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने इन 51 सीटों में से 40 पर जीत दर्ज की थी जबकि कांग्रेेस को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी. ऐसे में बीजेपी के लिए यहां काफी कुछ दांव पर लगा है.

पांचवें चरण में यूपी की 14, पश्चिम बंगाल की 7, बिहार की 5, झारखंड की 4 और जम्मू-कश्मीर की दो सीट पर वोट डाले जा रहे हैं. इसके अलावा राजस्थान और मध्य प्रदेश की भी सीटों पर मतदान हो रहा है. राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों ही जगह विधानसभा चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने से चूक गई थी, ऐसे यहां बीजेपी के लिए आर या पार की लड़ाई है. इन सीटों में ज्यादातर पर बीजेपी और कांग्रेस में सीधी टक्कर है. पीएम मोदी के जबरदस्त प्रचार ने इन सीटों पर मुकाबला रोचक बना दिया है.

पांचवें चरण में राजस्थान की 25 में से 12 सीटों और मध्य प्रदेश की 29 में से 7 सीटों पर चुनाव हो रहा है. 2014 में जहां राजस्थान में बीजेपी ने सारी सीटें जीती थीं तो वहीं मध्य प्रदेश में मात्र 2 सीटों पर चूक गई थी. पांचवें चरण के चुनाव के साथ राजस्थान की सभी सीटों पर मतदान हो जाएगा, जबकि मध्य प्रदेश में एक राउंड और होगा.

इसके अलावा पूर्वी यूपी की कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर पांचवें, छठें और सातवें चरण की लड़ाई यह तय करेगी कि एसपी-बीएसपी गठबंधन बीजेपी की जीत का पहिया रोकती है या फिर पीएम नरेंद्र मोदी का हिंदुत्व प्लस विकास का दांव भारी पड़ता है. इस चरण में सोनिया गांधी के गढ़ रायबरेली और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अमेठी में भी मतदान हो रहा है. एसपी-बीएसपी ने इन दोनों सीटों पर कांग्रेस को समर्थन दिया है. आइए एक नजर डालते हैं, अलग-अलग राज्यों के चुनावी समीकरण पर-

पांचवें चरण में उत्तर प्रदेश में अवध क्षेत्र में मतदान हो रहे हैं जहां बीजेपी और कांग्रेस की लड़ाई की बड़ी तस्वीर सामने है. 14 सीटों में बीजेपी ने 2014 में 12 सीटें जीती थीं. सिर्फ रायबरेली और अमेठी में ही बीजेपी चूक गई थी. वहीं 2009 में कांग्रेस ने 14 सीटों में से 7 सीटें जीती थीं.

इस बार कांग्रेस न सिर्फ दो सीटों पर बल्कि धौरहरा, बारांबकी, फैजाबाद और सीतापुर में भी बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रही है. अमेठी में राहुल गांधी और स्मृति इरानी एक बार फिर आमने-सामने हैं तो रायबरेली में सोनिया के सहयोगी रह चुके दिनेश सिंह उनके खिलाफ बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं.

लखनऊ में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का मुकाबला गठबंधन की प्रत्याशी पूनम सिन्हा से है. वहीं रिजर्व सीट मोहनलालगंज में बीजेपी के मौजूदा सांसद कौशल किशोर के सामने गठबंधन से सीएल वर्मा और कांग्रेस से आरके चौधरी हैं. फैजाबाद में बीजेपी सांसद लल्लू सिंह, गठबंधन के प्रत्याशी आनंद सेन और कांग्रेस के निर्मल खत्री के बीच मुकाबला है. इसके अलावा नेपाल सीमा के पास स्थित धौरहरा सीट पर कांग्रेस के जितिन प्रसाद और बीजेपी की रेखा वर्मा के बीच दिलचस्प मुकाबला है.

इस चरण में एमपी और राजस्थान में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है. पिछले साल दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी दोनों हिंदी पट्टी के राज्यों में हार गई थी और कांग्रेस ने यहां सरकार बनाई थी लेकिन बीजेपी राष्ट्रीय चुनाव अच्छा प्रदर्शन करने के लिए भारी दांव लगा रही है. दूसरी ओर, चार महीने पहले ही बनी सरकार के बावजूद कांग्रेस को यहां चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

राजस्थान में पूर्वी हिस्से में सभी 12 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं जिसे डेप्युटी सीएम सचिन पायलट का गढ़ माना जाता है. यहां गुर्जरों की आबादी बहुल हैं जो सचिन पायलट को सीएम न बनाए जाने के चलते कांग्रेस नेतृत्व से नाराज हैं. हालांकि सचिन चाहते हैं कि वे एकजुट रहें ताकि उनके वोटों का बंटवारा न हो.

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बसपा सुप्रीमो का बड़ा बयान, कहा- अगर पीएम बनने का मौका मिला तो यूपी की इस सीट से लड़ूंगी चुनाव

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव का रण जारी है. इस बीच बीएसपी प्रमुख मायावती ने बड़ा बयान दिया है. बसपा अध्यक्ष मायावती ने रविवार को इशारों-इशारों में कहा कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिलेगा तो वह अंबेडकर नगर से चुनाव लड़ सकती है. मायावती ने अंबेडकर नगर में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव बाद यदि जरूरत पड़ी तो वह अंबेडकर नगर सीट से चुनाव लड़ेंगी. हालांकि, उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का खुलकर जिक्र नहीं किया, लेकिन उन्होंने कहा कि “अगर सब ठीक रहा तो मुझे यहां से चुनाव लड़ना पड़ेगा. क्योंकि दिल्ली की राजनीति का रास्ता अंबेडकर नगर से होकर जाता है”. मायावती सभास्थल पर लगाए गए अपने उस कटआउट को देखकर बहुत खुश थीं, जिसमें वह संसद भवन के बाहर खड़ी हैं और उसपर प्रधानमंत्री लिखा हुआ था.

अंबेडकर नगर बसपा प्रत्याशी रितेश पांडेय के समर्थन में वोट मांगने पहुंचीं मायावती ने आगे कहा, “इस चुनाव में नमो-नमो वालों की छुट्टी होने वाली है और जय भीम वाले आने वाले हैं”. गौरतलब है कि चुनाव से पहले मायावती ने ऐलान किया था कि वह इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगी. उन्होंने हालांकि यह भी कहा था कि चुनाव बाद नतीजों व परिस्थितियों को देखते हुए यदि जरूरत पड़ी तो उप्र में अपने किसी भी उम्मीदवार की सीट से वह चुनाव लड़ेंगी. आपको बता दें कि मायावती की बीएसपी और समाजवादी पार्टी इस बार यूपी में साथ चुनाव लड़ रही हैं. मायावती लगातार बीजेपी और कांग्रेस पर हमलावर हैं. हालांकि एक दिन पहले ही उन्होंने रायबरेली और अमेठी में होने वाले मतदान में गठबंधन के कार्यकर्ताओं से कांग्रेस को समर्थन देने की अपील की थी.

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स्मृति ईरानी का राहुल गांधी पर बूथ कैप्चरिंग करवाने का आरोप

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में आज सात राज्यों की कुल 51 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं. दोपहर 1 बजे तक कुल 30% वोटिंग हुई है. मध्यप्रदेश में करीब 31% और राजस्थान में 32% वोट पड़े हैं. झारखंड में भी 35% से ज्यादा मतदान हुआ है. आज जिन सीटों पर वोटिंग हो रही है उन पर करीब 8 करोड़ 75 लाख मतदाता हैं. 674 उम्मीदवार हैं. जिन 51 सीटों पर मतदान है, 2014 में भाजपा ने उनमें से 39 पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिली थीं. इस बीच अमेठी में भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी ने बूथ कैप्चरिंग का आरोप लगाया है.

ईरानी ने कहा कि मैंने प्रशासन और चुनाव आयोग को अलर्ट करते हुए ट्वीट किया है. उम्मीद है कि वे कार्रवाई करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि देश के लोगों को तय करना है कि राहुल गांधी की इस तरह की राजनीति को दंडित किया जाए या नहीं. इस ट्वीट के साथ स्मृति ने एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें एक बुजुर्ग महिला कह रही है कि वह भाजपा को वोट देना चाहती थी, लेकिन जबर्दस्ती हाथ पकड़कर उससे कांग्रेस को वोट दिलवा दिया गया.

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62 भाजपाईयों पर दलित उत्पीडन का आरोप

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प्रतीकात्मक चित्र

आजमगढ़। तरवां थाना क्षेत्र के हैबतपुर डुभाव गांव में तीन मई की रात चुनाव प्रचार के दौरान हुई दो गुटों के बीच मारपीट की घटना मुकदमा दर्ज होने के बाद राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है. एक पक्ष ने तहरीर देकर सात दलितों को आरोपित किया है. जबकि दूसरी तरफ से दलितों ने 62 भाजपा समर्थकों पर दलित उत्पीड़न और मारपीट की रिपोर्ट दर्ज कराई है. पुलिस केस दर्ज कर मामला की जांच कर रही है.

हैबतपुर डुभार गांव निवासी अभिषेक सिंह पुत्र योगेश्वर की तरफ से दर्ज कराई गई रिपोर्ट में गांव के अजय पुत्र प्यारे सहित सात लोगों को नामजद किया गया है. अभिषेक का आरोप है कि रंजिश के चलते तीन मई की रात मनबढ़ों ने मारपीटकर अभिषेक उसके भाई समेत चार लोगों को घायल कर दिया. साथ ही उसकी बाइक तोड़कर क्षतिग्रस्त कर दी. इसी मामले में अजय कुमार ने भी तहरीर देकर केस दर्ज कराया है. उसने गांव के शिवम सिंह पुत्र कामेश्वर, अभिषेक सहित 12 लोगों को नामजद और 50 अज्ञात लोगों को आरोपित किया है. अजय कुमार का आरोप है कि आरोपी तीन मई की रात साढ़े आठ बजे चुनाव प्रचार कर रहे थे. इस दौरान हर-हर मोदी कहते हुए हमला बोल दिया. जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए मारपीटकर घायल कर दिया. साथ ही जान से मारने की धमकी दी है. एसपी त्रिवेणी सिंह ने बताया कि दोनों पक्षों की तहरीर के आधार पर केस दर्ज कर लिया गया है. सीओ लालगंज अजय यादव को पूरे मामले की जांच सौंपी गई है.

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बीजेपी को हमारी चाल समझ में नहीं आ रही – अखिलेश यादव

https://www.dalitdastak.com/बीजेपी-को-हमारी-चाल-समझ-मे/उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन की चाल समझ में नहीं आ रही है. ‘आजतक’ के साथ सुपर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में अखिलेश यादव ने कहा कि बात सिर्फ दलित, यादव मुस्लिम की नहीं है, महिलाएं हमें बड़ी संख्या में वोट दे रही हैं क्योंकि डिंपल हमारे साथ हैं.

अखिलेश यादव ने कहा कि जिस समय पूनम सिन्हा का टिकट फाइनल हुआ, उस समय शत्रुघ्न सिन्हा को कांग्रेस से टिकट नहीं मिला था. शत्रुघ्न सिन्हा से मेरी बातचीत हुई, मैंने ऑफर नहीं किया था, लेकिन उन्होंने कहा था कि मैं नहीं लड़ सकता हूं क्योंकि मैंने पटना की जनता से वादा किया हुआ है. वे कह चुके थे कि उनकी पार्टी बदल सकती है चुनाव क्षेत्र नहीं बदलेगा. उन्होनें कहा कि मैं अपनी वाइफ को लड़ा सकता हूं.

इसी क्रम में जब अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस के लिए सॉफ्ट नहीं हैं. अखिलेश यादव ने कहा कि सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को दो सीटें दी गई हैं. आदरणीय मायावती जी और हम लोगों ने मिलकर ये फैसला लिया था कि हम उनको गठबंधन में शामिल करेंगे और अमेठी व रायबरेली की सीटें उनके लिए छोड़ेंगे. ये हम दोनों का संयुक्त फैसला था. हमने माना कि ये परंपरागत रूप से कांग्रेस की सीटें हैं. हालांकि बीजेपी और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं है. इनकी नीतियों की वजह से ही देश की ये हालत है. जिस समय हमारी बातचीत हुई और सीटें तय कीं उस समय हमने ये दो सीटें छोड़ने का फैसला किया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं कांग्रेस के प्रति सॉफ्ट हूं.

एक सवाल पर अखिलेश यादव ने कहा कि आप मेरे पुराने भाषण उठाकर देख लीजिए मैंने हमेशा कहा है कि कांग्रेस देश की हर समस्या के लिए जिम्मेदार है. जब गठबंधन की बात हुई तब सपा और बसपा ने ही मिलकर कांग्रेस को दो सीटें दीं. जिस व्यक्ति ने मेरे और नेता जी पर पीआईएल की थी, वो कांग्रेस का आदमी है. जब लखनऊ में नॉमिनेशन होने वाला था वही व्यक्ति आया था. मुझे लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस ने पीआईएल करने वाले समझौता कर रखा है.

अखिलेश यादव ने कहा कि मेरी कोशिश है कि बीजेपी को कैसे रोक सकूं. इसीलिए बहुजन समाजपार्टी के साथ हमने गठबंधन किया. कांग्रेस चूंकि खुशी मना रही थी तीन राज्यों में जीत का. उन्हें किसी पार्टी की परवाह नहीं थी. इसीलिए वो गठबंधन में भी नहीं है. हम कह सकते हैं की बीजेपी और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है. मेरे पुराने भाषण उठाकर देख लीजिए, जितनी भी बुराइयां देश में हैं उनके लिए कांग्रेस जिम्मेदार है.

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सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जवान तेज बहादुर

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने वाले बीएसएफ के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव ने नामांकन रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे तेज बहादुर यादव का नामांकन रद्द कर दिया गया था. तेज बहादुर यादव ने पहले निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल किया था. इसके बाद समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. समाजवादी पार्टी ने पहले शालिनी यादव को टिकट दिया था. तेज बहादुर का पर्चा रद्द होने के बाद अब समाजवादी पार्टी की ओर से शालिनी यादव ही पीएम मोदी के मुकाबले में हैं. वहीं कांग्रेस ने अजय राय को दोबारा टिकट देकर पीएम मोदी के खिलाफ उतारा है.

बता दें, यादव के एक वीडियो ने विवाद खड़ा कर दिया था जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि जवानों को घटिया खाना दिया जा रहा है. इसके बाद उन्हें सीमा सुरक्षा बल से बर्खास्त कर दिया गया था. जिला निर्वाचन अधिकारी सुरेन्द्र सिंह ने तेज बहादुर यादव द्वारा पेश नामांकन पत्र के दो सेटों में ‘कमियां’ पाते हुए उनसे एक दिन बाद अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा था. गौरतलब है कि यादव ने 24 अप्रैल को निर्दलीय और 29 अप्रैल को समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर नामांकन किया था. उन्होंने बीएसएफ़ से बर्खास्तगी को लेकर दोनों नामांकनों में अलग अलग दावे किए थे. इस पर जिला निर्वाचन कार्यालय ने यादव को नोटिस जारी करते हुए अनापत्ति प्रमाण पत्र जमा करने का निर्देश दिया था. यादव से कहा गया था कि वह बीएसएफ से इस बात का अनापत्ति प्रमाणपत्र पेश करें जिसमें उनकी बर्खास्तगी के कारण दिये हों.

जिला मजिस्ट्रेट सुरेन्द्र सिंह ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 और धारा 33 का हवाला देते हुए कहा कि यादव का नामांकन इसलिये स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि वह निर्धारित समय में “आवश्यक दस्तावेजों को प्रस्तुत नहीं कर सके.” अधिनियम की धारा 9 राष्ट्र के प्रति निष्ठा नहीं रखने या भ्रष्टाचार के लिये पिछले पांच वर्षों के भीतर केंद्र या राज्य सरकार की नौकरी से बर्खास्त व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकती है. धारा 33 में उम्मीदवार को चुनाव आयोग से एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है कि उसे पिछले पांच सालों में इन आरोपों के चलते बर्खास्त नहीं किया गया है. कलेक्ट्रेट कार्यालय में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने दावा किया कि यादव और उनकी टीम को “पर्याप्त समय” दिया गया था, लेकिन वह दस्तावेज पेश नहीं कर पाए.

हालांकि यादव ने दावा किया था कि उन्होंने चुनाव अधिकारियों को आवश्यक दस्तावेज सौंपे थे. उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, “मैंने बीएसएफ में रहते हुए उसी बारे में आवाज बुलंद की, जिसे मैंने गलत पाया. मैंने न्याय की उस आवाज को बुलंद करने बनारस आने का फैसला किया था. अगर मेरे नामांकन में कोई समस्या थी तो एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में दाखिल करने (मेरे कागजात) के समय उन्होंने मुझे इस बारे में क्यों नहीं बताया. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर खुद को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए “तानाशाही कदम” का सहारा लेने का आरोप लगाया.

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कथित ऊंची जाति के साथ खाने पर दलित युवक की पीटकर हत्या

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देहरादून। उत्तराखंड के हॉस्पिटल में 23 साल के दलित युवक ने दम तोड़ दिया. युवक को घायल अवस्था में अस्पताल लाया गया था. आरोप है कि दलित युवक अपनी चचेरी बहन की शादी में गलती से उच्च जाति के लोगों के साथ बैठकर खाना खाने लगा था, जिसके बाद उच्च जाति के लोगों ने उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था.

दलित युवक का नाम जितेंद्र दास है. उसके परिजनों का आरोप है कि 26 अप्रैल को जितेंद्र नैनबाग तहसील की एक शादी समारोह में गलती से उच्च जाति के लोगों के साथ खाना खाने लगा था. जितेंद्र की बहन पूजा ने बताया कि उसकी चचेरी बहन की शादी थी. जितेंद्र गलती से उस काउंटर पर से खाना ले लिया, जिससे उच्च जाति के लोग खा रहे थे. खाना लेने के बाद वह उच्च जाति के लोगों के बीच कुर्सी में बैठ गया.

‘खाएगा तो मरेगा…’ पूजा का आरोप है कि उच्च जाति के एक व्यक्ति ने कहा नीच जाति का हमारे साथ नहीं खा सकता. खाएगा तो मरेगा. उसके बाद उन लोगों ने उसे जमकर पीटा. जितेंद्र को गंभीर हालत में सीएचसी ले जाया गया यहां से उसे श्री महंत इंद्रेश हॉस्टिल में 28 अप्रैल को भर्ती कराया गया. उसकी हालत गंभीर थी और उसमें कोई सुधार नहीं हो रहा था, आखिर रविवार को उसने दम तोड़ दिया.

पूजा ने बताया कि जितेंद्र उनके परिवार का एकलौता कमाने वाला सदस्य था. अब उनके परिवार का क्या होगा? उसने आरोप लगाया कि उच्च जाति के लोग उन लोगों को केस वापस लेने की धमकी दी रहे हैं. आरोप लगाया कि पुलिस ने अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं की है. आरोपियों पर एससी-एसटी ऐक्ट भी नहीं लगाया गया है.

7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज नरेंद्र नगर के सीओ उत्तम सिंह ने बताया कि जितेंद्र के परिजनों की तरफ से एफआईआर 28 अप्रैल को दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने सात लोगों के खिलाफ आईपीसी और एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया था. देहरादून एसएसपी निवेदिता कुकरेती ने कहा कि पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी करने का प्रयास कर रही है.

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राबड़ी देवी का अपमान करने वाले आजतक के पत्रकार को बहुजनों ने धो डाला

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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसा तूफान मचा है, जिसमें बहुजन समाज के तमाम नेताओं से लेकर आम लोगों ने एक बड़बोले पत्रकार को उसकी औकात दिखा दी है. पत्रकार का नाम निशांत चतुर्वेदी है और वो आजतक चैनल में एडिटर के पद पर नौकरी करता है.

मामला एक मई को शुरू हुआ. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बिहार के मुजफ्फरपुर दौरे के बाद बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने एक ट्विट किया.

राबड़ी देवी ने मोदी पर चुटकी लेते हुए लिखा-

मोदी कल लीची के शहर मुज़फ़्फ़रपुर आए थे लोगों ने उनके आम खाने के तरीक़े के बाद पूछा कि लीची कैसे खाते है?

काटकर, चूसकर या वाश-बेसिन पर खड़ा होकर? पीएम ने जवाब ही नहीं दिया क्योंकि पूछने वाला कोई हीरो-हिरोइन नहीं था? जवाब नहीं सूझा क्योंकि सवाल पूर्व निर्धारित और नियोजित नहीं था.

राबड़ी देवी के इसी ट्विट को अगले ही दिन दो मई को रि-ट्विट करते हुए आजतक के पत्रकार निशांत चतुर्वेदी ने पूर्व मुख्यमंत्री का मजाक उड़ाते हुए लिखा-

अच्छा जी राबड़ी देवी जी भी ट्वीट करती है 

कोई इनसे बोले कि ये बस तीन बार ट्विटर बोलकर बता दें 

बस फिर क्या था, हंगामा शुरू हो गया. बहुजन समाज के लोगों ने इसे स्त्री विरोधी और जातीय दंभ से भरी टिप्पणी ठहराते हुए सोशल मीडिया पर निशांत चतुर्वेदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. ट्विटर से लेकर फेसबुक पर लोग निशांत चतुर्वेदी को टैग कर उसे लानत भेजने लगे.

राबड़ी देवी ने खुद निशांत चतुर्वेदी पर पलटवार करते हुए ट्विट किया-

बेटा तेरे जैसे पतलकारों को बहुत पसीना पोंछवाया है. वोट की ताक़त से लोकतांत्रिक तरीक़े से 8 साल देश के दूसरे सबसे बड़े सूबे (बिहार-झारखंड) की मुख्यमंत्री रही हूँ.

तो तेजस्वी यादव इस मामले को बढ़ाते हुए इंडिया टूडे के मालिक अरुण पुरी और आजतक के प्रमुख संपादक सुप्रिय प्रसाद तक ले गए. तेजस्वी ने पत्रकार के इस कमेंट को एक महिला पर की गई जातिवादी टिप्पणी के लिए अरुण पुरी और सुप्रिय प्रसाद से सवाल पूछ लिया और पत्रकार द्वारा मांफी की मांग की.

Dear @aroonpurie ji, Do you really endorse the classist, racist, xenophobe and casteist remark by your editor? Don’t you think he must apologise for it?

@supriyapd Do you really have such unfairly prejudiced people working in your organisation @aajtak ?

बात जब आगे बढ़ी तो बहुजन समाज के लोग निशांत चतुर्वेदी के पुराने ट्विट को भी खंगालने लगे और इसी साल 8 जनवरी को आरक्षण से संबंधित पोस्ट को ढूंढ़ लाएं जिसमें निशांत चतुर्वेदी ने लिखा था-

दुनिया का भारत शायद इकलौता देश होगा जहां कुछ खास लोग आरक्षण को लेकर इतने उत्साहित हो रहे हैं. आपमें से कितने लोग आरक्षण के कोटे से पास हुए डॉक्टरों से इलाज कराने की हिम्मत रखते हैं.

तो इसी बीच एक आपत्तिजनक पोस्ट बसपा प्रमुख मायावती के खिलाफ भी मिला, जिसे तेजस्वी यादव और पत्रकार दिलीप मंडल ने रि-ट्विट कर दिया. जिस पर पहले से ही खार खाए बैठे दलित-बहुजन युवाओं ने सोशल मीडिया पर निशांत चतुर्वेदी पर हमला बोल दिया.

इस पूरे मामले को कई बार रि-ट्विट करने वाले पत्रकार दिलीप मंडल ने तो निशांत चतुर्वेदी को चुनौती दे डाली. दिलीप मंडल ने लिखा-

मैं उसी इंडिया टुडे ग्रुप में मैनेजिंग एडिटर यानी टॉप लीडरशिप पोजिशन में रहा, जहाँ निशांत चतुर्वेदी आज मीडियम लेबल पर नौकरी करता है… मैं निशांत चतुर्वेदी को खुली चुनौती देता हूँ कि पाँच लोगों की ज्यूरी के सामने लाइव होकर एक पेज हिन्दी या इंग्लिश बिना ग़लती किए लिख दे तो मैं उसे एक लाख रुपए का पुरस्कार दूँगा.

बहुत देखी है सवर्णों की मेरिट!

निशांत पर हमला बोलते हुए दिलीप मंडल ने आगे लिखा है-

ये मेरे अंडर काम कर चुका है. जानता हूँ उसकी मेरिट. एक लाख रुपए दाँव पर यूँ ही नहीं लगा दिए मैंने. सवर्णों की मेरिट है उनके आपसी कनेक्शन और जाति से मिला आत्मविश्वास.

राबड़ी देवी पर ट्विट कर फंसे निशांत चतुर्वेदी को आखिरकार मामले में खुद को घिरता देख तेजस्वी यादव को ट्विट कर खेद जताना पड़ा तो वहीं मायावती पर आपत्तिजनक ट्विट को डिलीट करना पड़ा.

इस पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा-

आज तक चैनल के संपादक निशांत चतुर्वेदी ने बहन मायावती के खिलाफ जातिवादी नफ़रत से लिखी गई अश्लील ट्विट डिलीट की. सोशल मीडिया अब सवर्ण मर्दों की बपौती नहीं है कि जो मन में आया उल्टी करके चले गए.

सही भी है, जातिवादी और महिलाओं को निम्न दृष्टि से देखने वाले पत्रकार के एक ट्विट को बहुजन समाज ने जिस तरह से मुद्दा बना डाला और उसे मांफी मांगने पर मजबूर कर दिया, उसने यह साबित कर दिया है कि बहुजन समाज अब अपने अपमान को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं.

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