व्रत और उपवास

व्रत और उपवास ऐसे दो शब्द हैं , जिनके बारे में लोगों में कई भ्रांतियां हैं. इस संबंध में जो हम समझते हैं या करते हैं. उसका व्रत और उपवास से कोई लेना देना नहीं है.

पाखंडी व्यवस्था (असमानता पर आधारित तथाकथित …धर्म) में व्रत और उपवास का काफी प्रचलन है . पुरुषों की तुलना में महिलाएं इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं . इसे अपने जीवन का एक हिस्सा समझती हैं . प्रत्येक वर्ष के 12 महीनों में लगभग प्रत्येक माह कोई ना कोई व्रत और उपवास का कार्यक्रम अवश्य रहता है. किसी- किसी माह में तीन- चार कार्यक्रम बन जाते हैं. अब तो ये टीनएजर्स में भी काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. वास्तव में व्रत और उपवास क्या है ? आओ इसका पता लगाएं.

व्रत में अक्सर लोग क्या करते हैं , खासकर महिलाएं. यह समझना सबसे ज्यादा जरूरी है . जैसे एकादशी, शिवरात्रि, नवरात्रि या जन्माष्टमी आदि का सीजन आता है या दिन आता है. उस दिन महिलाएं बड़े उत्साह के साथ काम में लग जाती हैं. जल्दी-जल्दी सुबह उठती हैं. नित्य क्रिया करती हैं. स्नानादि करके पूजा पाठ की सामग्री जैसे फल-फूल, अगरबत्ती- दीपबत्ती, माचिस, मिठाई व थाली आदि लेकर अपने अराध्य देवी- देवता की फोटो के सम्मुख व्रत से संबंधित पूजा पाठ में लग जाती हैं . माला – फूल चढ़ाती हैं . मिठाई अर्पित करती हैं. एक हाथ से जलती अगरबत्ती पकड़ कर दूसरे हाथ के सहारे जलती मोमबत्ती वाले हाथ को सहारा देकर घुमा घुमा कर फोटो वाले देवी देवता को सुंघाती हैं . धूप बत्ती भी सुंघाती हैं. घर में बच्चों को भले ही खाने को घी ना मिले, लेकिन दिन के उजाले में भी प्रकाश के लिए घी का दीप जलाती हैं . घर के सारे जरूरी कामकाज छोड़कर व्रत के पूजा पाठ में लगी रहती हैं. घर के मुखिया सास-ससुर या अन्य जब किसी काम के लिए कहते हैं तो फौरन जवाब दे देती हैं कि देख नहीं रहे हो, *आज मेरा व्रत है.*
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी फोटो के सामने अगरबत्ती जला देने से, फल- फूल चढ़ा देने से या घी के दिए जला देने से व्रत पूरा हो जाता है . या यूं कहें कि किसी फोटो के सामने हाथ जोड खडे होकर या बैठकर ताली बजा- बजाके, गर्दन हिला- हिलाके स्तुति गान करने को ही व्रत कहते हैं. मेरे विचार से तो शायद नही.

*व्रत* का साधारण सा अर्थ है *संकल्प लेना* या *दृढ़ प्रतिज्ञ होना*. झूठ ना बोलने , चुगली ना करने, चोरी ना करने , जुआ ना खेलने , नशा ना करने, व्यभिचार ना करने , बड़ों का सम्मान करने, गुरुओं का आदर करने, घर परिवार के भरण पोषण के लिए कुशल आजीविका अर्जित करने तथा बच्चों की शिक्षा-दीक्षा आदि के उचित प्रबंध करने के *संकल्प या दृढ़ प्रतिज्ञ होने* को *व्रत कहते हैं*. क्या हम इस प्रकार का संकल्प लेते हैं? यदि ऐसा नहीं करते हैं तो यह व्रत नही एक पाखंड है.

इसी प्रकार व्रत को पाली भाषा में भी समझ सकते हैं. *व्रत पाली भाषा के विरत शब्द से बना हुआ है,* जिसका अर्थ होता है , पाप कर्मों या बुरे कर्मों से विरत रहना या दूर रहना. जैसे हम झूठ नहीं बोलेंगें. चोरी नही करेंगें. चुगली नही करेंगें. नशीले आदि पदार्थों से दूर रहेंगें. बिना सोचे विचारे कोई काम नही करेंगें. इस प्रकार *मनोविकारों से दूर रहकर और चित्त को निर्मल कर सीलों का पालन करना ही व्रत है.* पालीसुत्त में भी कहा गया है कि-

  • *पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि.* मैं प्राणी हिंसा से विरत रहने या दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता/करती हूं.
  • *अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि.* मैं बिना दिए हुए दान अर्थात चोरी से विरत रहने या दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता/करती हूं.
  • *कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि.* मैं व्यभिचार से विरत रहने या दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता/ करती हूं.
  • *मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि.* मैं झूठ बोलने से विरत रहने या दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता/ करती हूं.
  • *सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि.* मैं प्रमाद पैदा करने वाले नशीले पदार्थों से विरत रहने या दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता/ करती हूं.

इसी प्रकार *उपवास* का भी मामला है . लोग अक्सर किसी निर्धारित माह की निर्धारित तिथि पर पड़ने वाले विशेष अवसरों पर खासकर महिलाएं बिना भोजन किए निराहार किसी विशेष अनुष्ठान में संलिप्त दिखाई पड़ती हैं. पूछने पर पता चलता है कि उनका उपवास है. उपवास के दिन वे किसी से ठीक से बात नही करती हैं. यहां तक कि सास-ससुर और पति आदि के भोजन – पानी मांगने पर नाक भौंह सिकोडते हुए कहती हैं कि दिखाई नहीं दे रहा कि *आज मेरा उपवास है.* आप लोगों को केवल अपने भोजन पानी की ज्यादा चिंता फिकर है. मेरे उपवास की नही. आज सुबह से कुछ खाया पिया नही है . इसका जरा सा भी ख्याल नही है . शाम को पति के ऊपर और अधिक उखड जाती हैं, जब उनको यह पता चलता है कि पति ने उनके खाने-पीने के लिए कुछ फल फ्रूट नही लाया है.

उपवास के दिन वे घर का कोई विशेष काम धाम नहीं करती हैं. न जानवरों को चारा पानी देती . न खेती-बाड़ी में विशेष सहयोग ही करती हैं. कुल मिलाकर यह उपवास न होकर एक प्रकार से भूख हड़ताल का तांडव सिद्ध होता है. क्या बिना भोजन किए निराहार, निराजल रहने को, अपनों का अनादर करने को, पूजा की थाल सजा के किसी फोटो के सामने बुत बनने को उपवास कहते हैं. मेरे विचार से शायद नही.

उपवास हिंदी के दो शब्दों से मिलकर बना है . *उप* और *वास*. उप का शाब्दिक अर्थ है *समीप या निकट* . वास का शाब्दिक अर्थ है *निवास करना या कहीं जाकर रहना*. अर्थात सज्जनों की संगति करना. सन्मार्ग पर चलना. बुद्धिजीवियों के समीप या निकट रहना . अच्छे और गुणवान लोगों के निकट निवास करना. बुरे लोगों की संगतियों से दूर रहना. पाप कर्मों से दूर रहकर पुण्यकर्मों को करना . सीलों का पालन करना. चित्त को निर्मल और शुद्ध करना ही उपवास है . अर्थात *दुर्जनों से दूर रहकर सज्जनों के समीप रहना ही उपवास है.* क्या हम उपवास में ऐसा करते हैं ? अगर नही करते हैं, तो यह उपवास नही एक पाखंड है.

पालीसुत्त में भी कहा गया है कि-
*सब्ब पापस्स अकरणं कुसलस्स उपसंपदा सचित्त परियोदपनं एतं बुद्धान सासनं.* अर्थात सभी पाप कर्मों से दूर रहकर कुशल कर्मों को करना ही बौद्धों का संदेश है.
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सुनील दत्त
बौद्धिक एवं सामाजिक चिंतक रायबरेली

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