बहुजन प्रेरणा स्थल पर तालेबंदी और बहुजन सत्ता 

14 अक्टूबर 2011. नोएडा के सेक्टर 18 के पास एक भव्य स्थल दुल्हन की तरह सजा हुआ था. सबके स्वागत को तैयार. तभी उसके प्रांगण में गड़गड़ाता हुआ एक हेलिकॉप्टर उतरा, और उसमें से उतरीं उत्तर प्रदेश की तत्कालिन मुख्यमंत्री मायावती. दरअसल मायावती उस भव्य स्थल का उद्घाटन करने आई थीं, जिसका नाम ‘राष्ट्रीय दलित स्मारक’ था और जिसे दलित प्रेरणा स्थल भी कहा जाता है. इसके जरिए बहनजी ने 14 अक्टूबर के महत्वपूर्ण दिवस पर धम्मचक्र को गतिमान करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया था.

दलित प्रेरणा स्थल के मुख्य गुंबद के गेट पर लगा ताला (तस्वीरः 27 सितंबर, 2019)

दलित प्रेरणा स्थल के उद्घाटन को आज 8 साल पूरे हो गए हैं. और आठ साल बाद ही बहुजनों की आस्था को केंद्र में रखकर बनाए गए इस इमारत के प्रमुख गुंबद पर ताला जड़ा जा चुका है. आप जो ये दरवाजा देख रहे हैं, वह इस भव्य इमारत का प्रमुख गुंबद है, जिसके भीतर बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर, बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम और बसपा प्रमुख सुश्री मायावती की आदमकद प्रतिमा लगी हैं. तो इसकी दीवारों पर बहुजन समाज के नायकों और उनके द्वारा किए गए प्रमुख आंदोलनों और कार्यों का जिक्र है. लेकिन इसके बंद होने की वजह से यहां आने वाले लोग अब इस तमाम इतिहास को देखने से मरहूम रह जा रहे हैं. वहां के स्टॉफ से वजह पूछने पर पता चलता है कि इसे पिछले कई महीनों से मेंटनेंस के लिए बंद किया गया है, लेकिन हकीकत में वहां कोई काम होता हुआ दिख नहीं रहा था.

आधिकारिक तौर पर 685 करोड़ रुपये की लागत से 82.5 एकड़ में बने इस प्रेरणा स्थल की खूबसूरती शुरुआती दौर में देखते ही बनती थी. शानदार पार्क, पानी के फव्वारे और दर्जन भर प्रमुख बहुजन नायकों की आदमकद प्रतिमाएं दिल्ली से सटे नोएडा के प्रमुख केंद्र में बहुजन समाज के शानदार इतिहास की गवाही देती थी. रात को रोशनी में नहाए इस स्थल की खूबसूरती और बढ़ जाती थी. यह वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति का ध्यान खिंच लेती थी, लेकिन अब इसकी चमक फीकी होने लगी है.

जगह-जगह घास उग चुके हैं तो कई जगह दीवारों से पत्थर टूट कर गिर रहे हैं. कई जगहों पर पार्क घास के जंगल सरीखे दिख रहे हैं. कैंपस में मौजूद टायलेट बंद पड़े हैं, कई नलों से पानी नहीं आता. पत्थरों पर काई जम चुकी है जो लगातार इस इमारत को कमजोर कर रहे हैं. सबसे ज्यादा चिंता की बात यहां खड़े बहुजन नायकों की आदमकद प्रतिमाओं का खराब होना है.

दलित प्रेरणा स्थल में मौजूद बहुजन महापुरुषों की प्रतिमाएं बेहतर रख-रखाव के बिना खराब हो रही हैं

यहां बहुजन समाज के दर्जन भर प्रमुख संतों-महापुरुषों की आदमकद प्रतिमाएं लगी है. प्रतिमाओं के नीचे नायकों का परिचय है. लेकिन इन्हें देखने से साफ पता चलता है कि ये सभी प्रतिमाएं घोर उपेक्षा की शिकार हैं. महामना जोतिबा फुले की प्रतिमा के नीचे लिखा उनका परिचय गायब हैं तो संत शिरोमणि रविदास का परिचय धुंधला पर चुका है.

प्रेरणा स्थल पर लगी उद्धाटक की पट्टिका

बुद्ध से लेकर बिरसा मुंडा और संत कबीर से लेकर बाबासाहब आम्बेडकर और गाडगे महाराज की प्रतिमाओं पर काई का कब्जा हो चुका है जो इन प्रतिमाओं को खराब कर रही है. हां, मान्वयर कांशीराम की प्रतिमा इन तमाम उपेक्षाओं के बावजूद साफ-सुथरी खड़ी है, जैसे वह अकेले आज भी मनुवादियों से लोहा ले रहे हों.

दरअसल दलित प्रेरणा स्थल के उद्घाटन के एक साल बाद ही 2012 में हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हो गई और मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. उसके बाद आई सपा की सरकार ने भी इन बहुजन स्थलों की उपेक्षा की. वहीं भाजपा सरकार में तो नौबत तालेबंदी की आ गई है. जब हमने इस बारे में वहां के स्टॉफ से बात करनी चाही तो कैमरे के सामने आने को कोई तैयार नहीं था. इतना भर कहा गया कि सरकार ने रख-रखाव को काफी फंड दिया है. लेकिन यह वैसा ही है जैसे कहने को संविधान में दलितों के लिए तमाम अधिकार तो हैं, लेकिन अधिकार दिलाने वालों की नीयत साफ नहीं है. दलित प्रेरणा स्थल के बारे में भी सवाल सरकार की नीयत पर ही उठ रहे हैं जो नहीं चाहती की बहुजन अपने इतिहास को जाने.

सवाल है कि बहुजन समाज को स्वाभिमान और संबल देने वाला एक प्रमुख केंद्र सिर्फ इसलिए धाराशायी होने की ओर अग्रसर है क्योंकि सत्ता में बहुजन समाज नहीं है. बसपा शासन इस बात का उदाहरण है कि सत्ता के शिखर पर होते हुए बहुुजन समाज क्या कर सकता है और सत्ता में नहीं होने पर क्या खो सकता है.

दिल्ली विवि के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद के मायने

लेखक- लक्ष्मण यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष पद को लेकर मामला बहुत पेचीदा हो चुका है. हिन्दी विभाग डीयू ही नहीं, देशभर के सबसे बड़े विभागों में एक है. इसलिए यहाँ राजनीति भी बड़े लेवल की होती रही है. पहले प्रोफ़ेसर का क़द मंत्रियों से कई गुना बड़ा हुआ करता था, तब सियासत विभाग में आकर कमजोर हो जाती या अमूमन दम तोड़ देती थी. अब प्रोफ़ेसर नेताओं के तलवे सहलाकर पद के लिए भीख मांगने लग रहे हैं. वक़्त कितना बदल गया. इस बात को ऐसे समझें कि यहाँ पीएचडी में एडमिशन से लेकर नियुक्तियों तक में प्रोफ़ेसर की चलती थी, आज सब कुछ में कैबिनेट लेवल के मंत्रियों का दखल होता है. इसलिए आज एक प्रोफ़ेसर जब नियमों की धज्जी उड़ाने में सफल हो रहा है, तो ये सामान्य बात है.

आज केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय, MHRD, सांसद से लेकर भूतपूर्व विजिटर नॉमिनी तक कुलपति पर दबाव डाल रहे हैं कि नियमों व रवायतों का उल्लंघन करके एक संघ विचारक मेरिटधारी प्रोफ़ेसर को अध्यक्ष बना दिया जाए. जबकि नियमों के मुताबिक़ प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन के रूप में हिन्दी विभाग को 72 साल के जीवनकाल में पहला दलित-बहुजन अध्यक्ष मिलने जा रहा है. इसलिए सारे नियम तोड़ने का दबाव है. जबकि प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन पिछले तीन से अधिक वर्षों से अध्यक्ष के न रहने पर कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में काम करते रहे हैं. सैकड़ों लेटर उनके कार्यकारी अध्यक्ष के आधार पर जारी हुए, फाइलों पर इनके दस्तख़त हैं. लेकिन अचानक सियासी दबाव इतना भारी हो गया कि नियम सब ध्वस्त कर दिए गए. पूरे हिन्दी विभाग से लेकर कुलपति तक जिसे सही मान रहे, वह सही हो नहीं रहा.

Delhi university

संघ विचारक प्रोफ़ेसर की दावेदारी इतनी ही पुख्ता है, तो कुलपति को तत्काल प्रभाव से उन्हें अध्यक्ष बना देना चाहिए था. लेकिन कुलपति कार्यालय उनकी फाइल रिजेक्ट कर चुका है. क्योंकि मान्यवर का तर्क है कि उन्हें भले ही प्रोफ़ेसरशिप श्यौराज जी के बाद मिली, लेकिन दो साल पहले यूजीसी ने ‘रिसर्च साइंटिस्ट’ के पदों को ख़त्म करके उनकी पे-स्केल वाला पद देने संबंधी एक ख़याली प्रस्ताव जारी किया. ख़्याल हक़ीक़त में बदला दो साल बाद, यानि अक्टूबर 2010 में. लेकिन प्रोफ़ेसर साहेब मेरिटधारी बनारस के ब्राह्मण जो ठहरे, बोले मैं तो यूजीसी के मन में उस ख़्याल आने वाले दिन से ही ख़ुद को प्रोफ़ेसर मानूँगा. और उनकी बात को संघी सियासत सही मानकर कुलपति को दबाव में रखे हुए है. आज कुलपति भी कमज़ोर है.

इसलिए कह रहा हूँ कि ये लड़ाई संविधान बनाम सत्ता की है. आंबेडकर बनाम सावरकर की है. मेरिट बनाम जाति की है. और उन साहेब प्रोफ़ेसरान की भाषा में कहें तो बनारस के ब्राह्मण बनाम शूद्र की है. और अब ये लड़ाई लिटमस टेस्ट है कि इसे कौन जीतता है. अगर आज 2019 में भी दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बनने में ऐसी साज़िशें हैं, तो बाकी अकादमिक जगत की असल तस्वीर की आप कल्पना करें. आज जब एक शूद्र बहुजन हर तरह से सक्षम, पात्र व मेरिट लेकर प्रोफ़ेसर बना है, वह एक प्रख्यात साहित्यकार व विचारक के तौर पर दर्जनों जगहों से सम्मानित हो चुका है, नियम कानून उसे विभागाध्यक्ष बना रहे हैं; तो सवाल ये है कि आज का द्रोणाचार्य कौन है? आप मदद कीजिए उसे पहचाहने में.

 लेखक जाकिर हुसैन कॉलेज में हिन्दी विभाग में पढ़ाते हैं।

गांधी ने छिन लिया था इस बहुजन नायक के हिस्से का सम्मान

सरकार महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का जश्न मना रही है. सरकार से लेकर तमाम राजनैतिक दल उनके योगदान को याद कर रहे हैं. आम तौर पर गांधी को देश में स्वच्छता और शांति के दूत के रूप में याद करने का चलन है. कहा जाता है कि उन्होंने बिना हथियार के भारत को आजादी दिला दी. हालांकि यह पूरा सच नहीं है क्योंकि आजादी के लिए सैकड़ों नायकों और हजारों देशवासियों ने अपनी जान भी गंवाई, क्रांति की.

इसी तरह भारत में मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत का मिशन चलाकर गांधी को उसका ब्रांड एम्बेसडर बनाया. लेकिन सही मायनों में बिना किसी पूर्वाग्रह के देखें तो साफ हो जाएग कि स्वच्छता का ब्रांड एम्बेडकर बनने का हक अगर किसी को था तो संत गाडगे महाराज का था.

23 फरवरी, 1876 में जन्में संत गाडगे ने 1905 में घर त्याग दिया. एक हाथ में लाठी और दूसरे में मिट्टी का भिक्षा पात्र लिए वह घर से चल दिये. वह गरीब समाज को दुखों से मुक्ति दिलाना चाहते थे. उनको सम्मान दिलाना चाहते थे, और इस वर्ग को सम्मान मिलने में सबसे बड़ी बाधा थी उनका गंदा रहन-सहन. गाडगे बाबा ने सबसे पहले गरीबों को स्वच्छता का पाठ पढाने का संकल्प लिया.

एक दिन वह एक दलित बस्ती में चले गए. पूरी बस्ती में कुड़े के ढेर थे. बस्ती के लोगों को सफाई का महत्व समझाते हुए वह स्वयं बस्ती की सफाई में जुट गए तो लोग भी उनका साथ देने लगे. शाम तक बस्ती चमक गई. इस प्रकार वह एक गांव की सफाई करते और इसका महत्व समझाते हुए दूसरे गांव की ओर चलते गए. उनके प्रयास का असर यह हुआ कि लोग अब अपनी बस्तियों को साफ रखने लगे थे.

संत गाडगे ने कुष्ठ रोगियों के लिए भी काम किया. इसके लिए गांधी की तारीफ की जाती है लेकिन गाडगे बाबा को याद नहीं किया जाता. गाडगे बाबा ने मरीजों के लिए अस्पतालों तथा कुष्ठ रोगियों के लिए कुष्ठ आश्रमों का निर्माण करवाया. उन्होंने जीव रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण काम किए. जिन धार्मिक स्थलों पर बकरे, मुर्गे, भैसे कटते थे, गाडगे बाबा ने जीवदया नामक संस्थाओं की स्थापना की शुरुआत की.

बाबा का मिशन फैलाने के उद्देश्य से उनके अनुयायियों ने 8 फरवरी 1952 को गाडगे मिशन की स्थापना की. महाराष्ट्र के अकोला में जन्में गाडगे महाराज की महानता और उनके द्वारा किए गए समाज कल्याण के कामों से महाराष्ट्र सरकार वाकिफ थी. यही वजह रही कि महाराष्ट्र के तत्कालिन मुख्यमंत्री श्री बी.जी खैर ने गाडगे बाबा की सभी संस्थाओं का ट्रस्ट बना दिया, जिसमें करीब 60 संस्थाएं हैं. आज भी यह मिशन जनसेवा को समर्पित है.

तो वहीं दूसरी ओर संत गाडगे बाबा के सार्वजनिक स्वच्छता अभियान के समर्पण के आदर में महाराष्ट्र सरकार ने 2000-2001 में ‘संत गाडगे बाबा संपूर्ण ग्राम सफाई अभियान’ जैसी योजना का आरंभ किया, जिसके अंतर्गत सबसे स्वच्छ गांवों को पुरस्कृत करने की योजना भी बनाई गई. लेकिन पिछड़े हुए समाज से ताल्लुक रखने के कारण संत गाडगे का काम देश भर में ख्याति नहीं पा सका. न ही उस वक्त के नेताओं और समाचार पत्रों ने ही उनके काम को मान दिया. इस तरह अपना पूरा जीवन लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने में बिता देने वाले संत गाडगे स्वच्छता का ब्रांड एम्बेडसर बनने से पीछे छूट गए. आप खुद सोचिए, भारत में स्वच्छता का ब्रांड एम्बेडकर होने का हकदार कौन है? गांधी या संत गाडगे?

डॉ. आम्बेडकर के इस इंटरव्यू ने गांधी की असलियत उजागर कर दी थी

गांधी और अम्बेडकर के संबंधों पर अक्सर बहस होती रहती है. दोनों के बीच मतभेद को लेकर भी चर्चा आज भी जारी है. सवाल है कि आखिर डॉ. आम्बेडकर का गांधी से विरोध क्यों था, और तमाम मुद्दों पर डॉ. आम्बेडकर गांधी को किस तरह देखते थे. साल 1955 में डॉक्टर आंबेडकर द्वारा बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने गांधी के साथ अपने संबंधों और मतभेदों पर लंबी बात की थी. आगामी 2 अक्टूबर को मोहनदास करमचंद गांधी की 150वीं जयंती है. इस मौके पर उस इंटरव्यू में बाबासाहेब द्वारा कही गई बातों को देखना ज्यादा मौजू है.

गांधी से पहली मुलाकात पर

मैं 1929 में पहली बार गांधी से मिला था, एक मित्र के माध्यम से, एक कॉमन दोस्त थे, जिन्होंने गांधी को मुझसे मिलने को कहा. गांधी ने मुझे ख़त लिखा कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं, इसलिए मैं उनके पास गया और उनसे मिला, ये गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाने से ठीक पहले की बात है.

पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्होंने मुझसे मिलने को कहा. लिहाज़ा मैं उनसे मिलने के लिए गया. वो जेल में थे. … मैं हमेशा कहता रहा हूं कि तब मैं एक प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से गांधी से मिला. मुझे लगता है कि मैं उन्हें अन्य लोगों की तुलना में बेहतर जानता हूं,क्योंकि उन्होंने मेरे सामने अपनी असलियत उजागर कर दी. मैं उस शख़्स के दिल में झांक सकता था.

आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था. लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाज़ा मैं कह सकता हूं कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुक़ाबले बेहतर समझता हूं.

गांधी का चरित्र दोहरा था

वो हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे. उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले. पहला ‘हरिजन’ अंग्रेज़ी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप ‘दीनबंधु’ या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं. यदि आप इन दोनों अख़बारों को पढ़ते हैं तो आप पाएंगे कि गांधी ने किस प्रकार लोगों को धोखा दिया.

अंग्रेज़ी समाचार पत्र में उन्होंने ख़ुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और लोकतांत्रिक बताया. लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे. वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे,जिन्होंने भारत को हर काल में नीचे रखा है.

दरअसल किसी को गांधी के ‘हरिजन’ में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए. उनकी जितनी भी जीवनियां लिखी गई हैं, वो उनके ‘हरिजन’ और ‘युवा भारत’ पर आधारित हैं, और गांधी के गुजराती लेखन के आधार पर नहीं.

गांधी रूढ़िवादी हिन्दू थे

वो बिलकुल रूढ़िवादी हिन्दू थे. वो कभी एक सुधारक नहीं थे. उनकी ऐसी कोई सोच नहीं थी, वो अस्पृश्यता के बारे में सिर्फ़ इसलिए बात करते थे कि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें. ये एक बात थी. दूसरी बात, वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें. मुझे नहीं लगता कि इससे अधिक उन्होंने अस्पृश्यों के उत्थान के बारे में कुछ सोचा.

पूना पैक्ट पर

ब्रिटिश सरकार ने मैकडोनल्ड के दिए मूल प्रस्ताव में मेरा सुझाव मान लिया था. मैंने कहा था कि हम एक समान निर्वाचित प्रतिनिधि चाहते हैं,ताकि हिन्दुओं और अनुसूचित जातियों के बीच एक रेखा बनी रहे. मुझे लगता था कि अगर आप एक समान निर्वाचन प्रतिनिधि उपलब्ध कराते हैं तो हम समाहित हो जाएंगे और अनुसूचित जाति के नामित वास्तव में हिन्दुओं के ग़ुलाम बन जाएंगे, आज़ाद नहीं रहेंगे. अब मैंने रामसे मैकडोनल्ड से कहा कि वो इसी विषय को आगे बढ़ाना चाहते हैं, हमें अलग निर्वाचन प्रतिनिधि और आम चुनाव में अलग मत दें. ताकि गांधी ये नहीं कह सकें कि हम चुनाव के मामले में अलग हैं. पहले मेरी सोच यही थी, कि पहले पांच वर्ष हम हिन्दुओं से अलग रहें, जिसमें कोई व्यवहार,कोई संवाद न हो. ये सामाजिक और आध्यात्मिक क़दम होता….

… हम एक समान निर्वाचन के ज़रिये दोनों गुटों को एक मंच पर लाकर इस खाई को भरना चाहते हैं. लेकिन गांधी का विरोध इस बात पर था कि हमें आज़ादी के साथ प्रतिनिधित्व न मिले. लिहाज़ा उन्होंने खुलकर विरोध किया कि हमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए. गोलमेज़ सम्मेलन में उनका यही रुख़ था. उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ हिन्दू, मुस्लिम और सिख समुदाय को जानते हैं. संविधान में सिर्फ़ इन्हीं तीन समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.

इस विषय पर उनके दोस्तों ने ही उनका विरोध किया. अगर सिख और मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाता है, जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से हज़ारों गुना बेहतर स्थिति में हैं, तो अनुसूचित जाति और ईसाइयों को कैसे छोड़ा जा सकता है?

गांधी का दलितों के प्रति रुख पर

उन्हें अनुसूचित जाति को लेकर भारी डर था कि वो सिख और मुस्लिम की तरह आज़ाद निकाय बन जाएंगे और हिन्दुओं को इन तीन समुदायों के समूह से लड़ना पड़ेगा. ये उनके दिमाग़ में था और वो हिन्दुओं को दोस्तों के बिना छोड़ना नहीं चाहते थे.

गांधी महात्मा थे या राजनीतिज्ञ

उन्होंने राजनीतिज्ञ की तरह काम किया. वो कभी महात्मा नहीं थे. मैं उन्हें महात्मा कहने से इनकार करता हूं. मैंने अपनी ज़िंदगी में उन्हें कभी महात्मा नहीं कहा. वो इस पद के लायक़ कभी नहीं थे, नैतिकता के लिहाज़ से भी.

अशोक दास

दलित दस्तक मैग्जीन का अक्टूबर 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

4
[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2019/10/DALIT-DASTAK-October2019.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का पांचवां अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

कहां खड़ा है प्रबुद्ध भारत और बहुजन समाज बनाने का बाबासाहेब और मान्यवर का सपना

बहुजन इतिहास के लिहाज से अक्टूबर महीने में दो मुख्य घटनाएं घटी. एक, बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को पांच लाख से ज्यादा अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर धम्मचक्र को गतिमान किया. दूसरी, 9 अक्टूबर 2006 को मान्यवर कांशीराम का परिनिर्वाण हो गया. इन दोनों महान नायकों ने दो बड़े सपने देखे थे. बाबासाहेब ने प्रबुद्ध भारत का सपना देखा था. उनका सोचना था कि अगर देश के वंचित समाज के लोग बुद्ध के बताए रास्ते पर चलते हैं तो उनका भविष्य ज्यादा बेहतर होगा. वो पंचशील के झंडे के नीचे विश्व समुदाय से जुड़ सकेंगे तो वहीं बुद्ध के समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत पर चल कर एक बेहतर समाज का निर्माण करेंगे. दूसरी ओर 80 के दशक में बाबासाहब से प्रेरणा लेकर उनके अधूरे सपने को पूरा करने का संकल्प लेने वाले मान्यवर कांशीराम जी बहुजन समाज बनाने का सपना देख रहे थे. डीएस4 और बामसेफ के जरिए उन्होंने उस सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की और आखिरकार बहुजन समाज पार्टी बनाकर वो बहुजन समाज के तमाम वर्ग के लोगों को सत्ता तक पुहंचाने में सफल रहे. लेकिन सालों बाद भी न तो बाबासाहब के प्रबुद्ध भारत का सपना पूरा हो पाया है और न तो मान्यवर कांशीराम का बहुजन समाज का सपना.

मैं पिछले दिनों की एक घटना बताता हूं. मेरे पास एक फोन आया. सामने वाले ने कहा कि उनके रिश्ते के भाई ने दूसरी जाति की लड़की से शादी कर ली है और लड़की वाले मारपीट पर उतारु हैं और पुलिस उनकी मदद कर रही है. लड़के वाले भी इस शादी से बहुत खुश नहीं थे. मामला समझने के लिए मैंने दोनों की जाति जाननी चाही. सामने वाले व्यक्ति ने कहा कि हमलोग एससी हैं और लड़की पक्ष धोबी समाज का. मैंने कहा कि धोबी समाज भी तो अपना ही समाज है, वो भी एससी है, फिर दिक्कत क्या है? उन्होंने कहा कि हमलोग चमार हैं, वो खुद को हमसे बड़ा मानते हैं. मुझे एक झटका सा लगा, हालांकि प्रेम विवाह ऐसी चीज है कि किसी के परिजन तुरंत राजी नहीं होते हैं. लेकिन इस मामले में लड़का और लड़की दोनों पढ़े लिखे थे. लड़का अपने जीवन में अच्छी नौकरी कर रहा था. बावजूद इसके दोनों पक्ष अपने बच्चों के इस फैसले से खुश नहीं थे. इसकी वजह यह थी कि ये लोग न तो बाबासाहब के प्रबुद्ध भारत का हिस्सा बन सके हैं और न ही मान्यवर कांशीराम के बहुजन समाज का.

मध्यप्रदेश के शिवपुरी में घटी एक घटना भी काफी चर्चा में रही. यहां यादव परिवार के दो लोगों ने दलित-वाल्मीकि परिवार के दो बच्चों को इसलिए मार डाला क्योंकि कथित तौर पर सुबह के समय वह सड़क पर शौच कर रहे थे. इस घटना ने मान्यवर के बहुजन समाज बनाने के सपने को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया.

 समाज या फिर बहुजन समाज के भीतर यह एक बड़ी समस्या है जो सदियों से बनी हुई है. बाबासाहब और मान्यवर ने इसी समस्या को सुलझाने के लिए प्रबुद्ध भारत और बहुजन समाज का सपना देखा था. जो लोग पीछे छूटे हुए हैं अगर एक पल को उनकी बात न भी की जाए तो जो लोग शहरों में आकर नौकरियां हासिल कर चुके हैं और खुद के समझदार और बुद्धिजीवी होने का दावा करते हैं, कम से कम उनको खुशी-खुशी अपने बच्चों के फैसले को स्वीकार करना चाहिए. हां, बच्चे योग्य हों और एक-दूसरे के काबिल हों इस बात पर मेरी भी सहमति है. तो इसी तरह दलित-पिछड़े समाज को एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देना चाहिए, न कि उनका शोषक बन जाना चाहिए. दोनों समाज मनुवादी व्यवस्था का मारा हुआ है, ऐसे में उनका साथ बने रहना ही उनके हित में है. पिछड़े वर्ग को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए सही है. हालांकि पिछड़े वर्ग के भी तमाम लोग बहुजन समाज बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी संख्या गिनती की है.

हम तमाम लोग बाबासाहब की बात करते हैं, मान्यवर कांशीराम, सतगुरु रैदास और संत कबीर की बात करते हैं, ज्योतिबा फुले और संत गाडगे की बात करते हैं, लेकिन इन्होंने समाज से क्या चाहा, जब इस बारे में बात आती है तो वो अपनी नजरें चुराते हैं. सतगुरु रविदास ने छोटे-बड़े के भेद से परे सबके साथ मिलकर रहने की कामना की थी, बेगमपुरा की कामना की थी, लेकिन पूरा समाज तो दूर जब उनके अपने अनुयायी ही उनकी बातों को नहीं मानते तो फिर उन्हें दूसरों द्वारा किए जाने वाले भेदभाव की शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है. इसी तरह संत कबीर ने आडंबर और अंधविश्वास पर पुरजोर चोट की थी, लेकिन उनके अनुयायी होने और उन्हें अपने समाज का अंग मानने के बावजूद तमाम लोग आकंठ अंधविश्वास में डूबे हुए हैं. बाबासाहब ने तो वंचित समाज को सुधारने के लिए अपने बच्चों तक की कुर्बानी दे दी. मान्यवर कांशीराम ने अपने सुख के बारे में नहीं सोचा, अपने परिवार को त्याग दिया, कभी घर नहीं बसाया. लेकिन बहुजन समाज के तमाम महापुरुषों के त्याग के बावजूद हम सुधरने को तैयार नहीं हैं और जब तक हम प्रबुद्ध भारत या बहुजन समाज बनाने की ओर नहीं बढ़ेंगे हमारे समाज की समस्याएं यूं ही बनी रहेगी.

संयुक्त राष्ट्र में मोदी के बौद्ध प्रेम का सच!

  • लेखकः सिद्धार्थ रामू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिया. ऐसे में यह सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री मोदी जी का बुद्ध से नाता क्या है? क्या बुद्ध के जीवन, दर्शन, धम्म और विचारधारा का कोई भी ऐसा तत्व है, जिस वे स्वीकार करते हों?

आइए सबसे पहले करूणा और अहिंसा को लेते हैं, जिसके लिए दुनिया बुद्ध को जानती है. प्रधानमंत्री जी क्या यह याद दिलाने की जरूरत है, आपके नेतृत्व में 2002 में इस देश में गुजरात जैसा नरसंहार हुआ, जिसमें करीब 2000 से अधिक लोग नृशंस और क्रूर तरीके से मारे गए. लोगों को जिंदा जलाया गया, सड़कों पर गर्भवती महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार उनका पेट फाड़ दिया गया. नृशंसता और क्रूरता की सारी हदें आपके नेतृत्व में आपके लोगों ने पार कर दिया.

आज भी आपके लोग आए दिन मांब लिंचिंग कर रहे हैं, जिसके शिकार मुसलमान, ईसाई और दलित बन रहे हैं. अभी हाल हीं में आपके बजरंगी लोगों ने एक विकलांग आदिवासी को पीट-पीटकर मार डाला. यह कहते हुए कि वह गोमांस वितरित कर रहा था.

आपके आदर्श सावरकर मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार के लिए हिंदुओं को ललकारते हैं, संघ की पाठशाला के आपके गुरू गोलवरकर मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को हिंदुओं का सबसे बड़ा शत्रु घोषित कर इनके सफाए की बात करते हैं. क्या इस सोच का कोई रिश्ता बुद्ध से है? आपके एक आदर्श अटल बिहारी वाजपेयी ने दुनिया के सबसे भयानक-विध्वंस हथियार परमाणु बम को बुद्ध के साथ जोड़कर बुद्ध की करूणा, अहिंसा और विश्व मानवता के साथ प्रेम का मजाक उड़ाया था.

मोदी जी आप और आपकी पाठशाला संघ के लोगों का सबसे बड़ा आदर्श हिटलर है, जिसने सैंकडों, हजारों, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया. जिसमें बच्चे, बूढ़े भी शामिल थे. जिसका एक छोटा रूप आपके नेतृत्व में गुजरात में देखने को मिला. आपके सभी देवी-देवता भयानक तौर पर हिंसक हैं. आपके वेद, पुराण, स्मृतियां और महाकाव्य हिंसा से भरे पड़े हैं. यह हिंसा इसी देश के अनार्यों, द्रविड़ों, शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं के खिलाफ की गई है, जो आज भी जारी है.

मोदी जी क्या गुजरात की हिंसा, क्रूरता और अमानवीयता और आपके लोगों द्वारा इस समय की जा रही क्रूर एवं नृशंस मांब लिंचिग का कोई रिश्ता बुद्ध, उनकी करूणा एवं अहिंसा से है? मोदी जी, बुद्ध से आप और आपकी पाठशाला का क्या रिश्ता है. इस संदर्भ में कई सारे अन्य गंभीर एवं जरूरी सवाल पूछने हैं, लेकिन फिलहाल आज नहीं.

आज सिर्फ एक बात और कहना चाहता हूं कि आप, आपकी विचारधारा, आपके नायकों, आपके प्रिय ग्रंथों और आपकी पाठशाला संघ ने इस देश से बुद्ध एवं उनके धम्म को उखाड़ फेंकने के लिए सबकुछ किया है, आज भी कर रहें हैं. जिसमें बड़े पैमाने की हिंसा भी शामिल है. इसके साक्ष्यों से इतिहास भरा पड़ा है. एक बौद्ध भिक्षु के सिर के बदलने एक सौ स्वर्ण मुद्राएं देने की की घोषणा ब्राह्मण राज्य के संस्थापक ब्राह्मण पुष्टमित्र शुंग ने किया था. डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति और अन्य किताबों में विस्तार से इसके बारे में लिखा है.

प्रधानमंत्री जी आप जिस परंपरा का वारिस खुद को मानते हैं, जिस पाठशाला का स्वयं को स्वयंसेवक मानते हैं, उसने दुनिया को बुद्ध को नहीं दिया है, गोड़से दिया है. हां बुद्ध को इस देश की धरती से उखाड़ फेंकने के लिए सबकुछ जरूर किया है .

लेखक फारवर्ड प्रेस से जुड़े हैं।

जाति और सामाजिक पूँजी

“आप क्या जानते हैं यह काफी नहीं है, आप ‘किसे’ जानते हैं यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है, आपके जीवन के मुक़ाम को तय करने के लिए.”

भारत में आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग धन-दौलत, ज़मीन-ज़ायदाद, नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया सब जगह पिछड़े हैं, तो उसका एक प्रमुख कारण इन वर्गों के व्यक्तियों के पास सामाजिक पूँजी के मामले में कंगाल होना भी है. नान लिन अमेरिका के ड्युक विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र के प्रोफेसर ने एक अभूतपूर्व व्यापक परिवर्तनकारी “सामाजिक पूँजी” का सिद्धांत पेश किया, जिसे पूरी दुनिया में मान्यता मिली. नान लिन ने जबरदस्त तर्कों, तथ्यों, आंकड़ो द्वारा सिद्ध कर दिया कि “आप क्या जानते हैं और किसे जानते हैं, वह आपके जीवन और समाज में फर्क लाता है.” अर्थात यदि दो व्यक्ति एक समान योग्यता के हैं, मान लीजिये दोनों के पास बी. टेक. की डिग्री है, लेकिन एक व्यक्ति ‘किसे’ जानता है के मामले में आगे है, तो जीवन में भी वही आगे जाएगा.

कार्ल मार्क्स का कहना था कि उत्पादन के लिए पूँजी, श्रम, और ज़मीन की आवश्यकता होती है. बाद में इसमें ‘तकनीक’ को भी जोड़ दिया गया और हाल ही में इसमें ‘सामाजिक पूँजी’ को भी जोड़ा गया है. आज कल यह मान्यता है कि उत्पादन के लिए पूँजी, श्रम, ज़मीन, तकनीक और सामाजिक पूँजी आवश्यक है.

अब सवाल यह है कि आखिर सामाजिक पूँजी है क्या? सामाजिक पूँजी मोटे तौर पर सामाजिक समूहों के उन कारकों को संदर्भित करती है जिसमें पारस्परिक संबंधों, साझा पहचान, साझा समझ, साझा मानदंड, साझा मूल्यों, आपसी विश्वास, आपसी सहयोग और पारस्परिकता अर्थात एक दूसरे के दुःख सुख में काम आना जैसी चीजें शामिल हैं. सामाजिक पूँजी में सभी सामाजिक नेटवर्क (जिन लोगों को व्यक्ति जानता है) और इन नेटवर्कों से उत्पन्न होने वाले झुकाव व भाव, जो एक दूसरे के लिए कुछ करने के लिए उत्पन्न होते हैं (पारस्परिकता के मानदंड) शामिल हैं. आपसी विश्वास, पारस्परिकता, सूचना का प्रवाह और नेटवर्क से जुड़े सहयोग उन लोगों के लिए मूल्य बनाता है जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

पूँजी क्या है? बाज़ार में अपेक्षित रिटर्न के साथ संसाधनों के निवेश को पूँजी कहते हैं. पूँजी एक संसाधन है जिसे लाभ के लिए निवेश किया जाता है. एक आर्थिक पूँजी होती है जो धन दौलत है, इसे सभी जानते हैं. दूसरी मानवीय पूँजी होती है जो किसी व्यक्ति की बुद्धिमता, ज्ञान, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और कौशल से संबधित होती है. तीसरी सांस्कृतिक पूँजी होती है जो उसके पहनावे, बोलने के लहज़े, शब्दज्ञान और स्वयं को व्यक्त करने पर निर्भर करती है. चौथी सामाजिक पूँजी होती है, जो लक्ष्यों को प्राप्त करने में सामाजिक संपर्क और सामाजिक संबंधों का उपयोग करने में काम आती है. जहाँ मानवीय पूँजी कौशल, ज्ञान, प्रशिक्षण और शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की गतिविधियों में एक निवेश का प्रतिनिधित्व करता है, वहीँ दूसरी ओर इसके विपरीत सामाजिक पूँजी सामाजिक रिश्तों में एक निवेश है जिसके माध्यम से अपने सामाजिक समूह के अन्य व्यक्तियों के संसाधनों का दोहन किया जा सकता है. आर्थिक पूँजी के मुकाबले सामाजिक पूँजी की विशेषता यह है कि आर्थिक पूँजी उपयोग से कम हो जाती है जबकि सामाजिक पूँजी उपयोग से कम नहीं होती. बल्कि सामाजिक पूँजी के विषय में यह माना जाता है कि यदि इसका उपयोग न किया जाए तब यह कम हो जाती है. या तो आप इसे इस्तेमाल करें वरना आप इसे खो देंगे. इस तरह से यह मानवीय पूँजी की अवधारणा के समान है. मानवीय पूँजी का भी यदि उपयोग न किया जाय तो व्यक्ति इसे खो देता है. मिसाल के तौर पर यदि कोई व्यक्ति डॉक्टरी की शिक्षा प्राप्त करके, प्रैक्टिस न करे तो वह अपनी अर्जित मानवीय पूँजी को खो देगा.

सामाजिक पूँजी के स्रोत क्या हैं? सामाजिक पूँजी का चरित्र अमूर्त है. जहाँ आर्थिक पूँजी लोगों के बैंक खाते में होती है, मानवीय पूँजी उनके सर के अन्दर होती है, वहीँ सामाजिक पूँजी व्यक्ति के संबंधों की संरचना में होती है. सामाजिक पूँजी रखने के लिए एक व्यक्ति को दूसरे से सम्बंधित होना आवश्यक है. यह अन्य लोग हैं, न कि वह स्वयं, जो उसके लाभ के वास्तविक स्रोत हैं.

सामाजिक पूँजी के तंत्र क्या हैं? सामाजिक पूँजी के तीन तंत्र हैं. एक है संबंधन (बोन्डिंग), दूसरा है सेतुकरण (ब्रिजिंग) और तीसरा है जुड़ना (लिंकिंग). संबंधन एक ऐसा सम्बन्ध है जो एक व्यक्ति का परिवार से, या करीबी दोस्तों आदि से होता है. इसमें अंतरंगता (इंटिमेसी) बहुत होती है. यह सामाजिक पूँजी का सबसे अहम और मजबूत रूप है. संबंधन लोगों के समरूप, समरस, सजातीय (होमोजनस) समूहों के बीच सामाजिक नेटवर्क से बनता है. यह नस्ल, जाति या संस्कृति जैसी समान पहचान (हम जैसे लोग) की भावना पर आधारित सम्बन्ध है.

सेतुकरण (ब्रिजिंग) का तात्पर्य सामाजिक रूप से विषम, विजातीय, विविध, पंचमेल (हेटेरोजनस) समूहों के बीच सामाजिक नेटवर्क से है. संपर्क जो पहचान की एक साझा भावना से परे है, उदहारण के तौर पर दोस्त, सहकर्मी और सहयोगी. सेतुकरण पूँजी दोस्तों के बीच का रिश्ता है और इसकी शक्ति संबंधन की शक्ति से कमतर है.

जहाँ सजातीय समूह, अपराधिक माफ़िया गिरोह संबंधन सामाजिक पूँजी का निर्माण करते हैं वहीँ सुबह की सैर के साथी, क्लब के सदस्य आदि सेतुकरण पूँजी का निर्माण करते हैं. जुड़ना, संपर्क की सामाजिक पूँजी एक व्यक्ति और एक सरकारी अधिकारी या अन्य निर्वाचित नेता के बीच का सम्बन्ध है. सामाजिक सीढ़ी के ऊपर या नीचे लोगों या समूहों के जुड़ाव या संपर्क (लिंकिंग) को जुड़ाव सामाजिक पूँजी कहते हैं.

किसी भी देश या समाज की तरक्की के लिए यह आवश्यक है कि उसकी आर्थिक, मानवीय पूँजी के साथ-साथ उसकी सामाजिक पूँजी भी बढे. इससे लोकतंत्र मजबूत होता है और भाईचारा, बंधुत्व की भावना बढ़ती है. यह तभी संभव है जब विभिन्न संबंधन सामाजिक समूहों के बीच में सेतुकरण हो. सेतुकरण के बिना, संबंधन समूह बाकी समाज से अलग-थलग और बेदख़ल हो जाता है. सेतुकरण की प्रक्रिया से ही किसी भी देश या समाज की सामाजिक पूँजी में वृद्धि होती है. यदि किसी देश या समाज में संबंधन की प्रक्रिया मजबूत है लेकिन सेतुकरण की प्रक्रिया कमज़ोर है तो उस देश या समाज की सामाजिक पूँजी क्षीण और कमज़ोर हो जाती है. हमारे देश में जातिवाद के चलते सेतुकरण कम होता है और हमारा प्यारा भारत सामाजिक पूँजी के मामले में भी गरीब है.

अब सवाल ये है कि सामाजिक पूँजी कैसे काम करती है? सामाजिक नेटवर्क किसी व्यक्ति द्वारा किये गए कार्य के परिणामों को कैसे बढाते हैं या फिर तुलनात्मक रूप से कैसे बेहतर परिणाम देते हैं? इसके चार तरीके हैं. एक, सूचना का प्रवाह. आधुनिक युग को सूचना क्रांति का युग कहा जाता है और जिसे ‘अन्दर की बात’ पता चल जाए वो बादशाह है. मजबूत ताक़तवर लोगों के समूह के सदस्यों को बेहतर और काम की सूचनाएं प्राप्त हो जाती हैं. व्यक्ति को बेहतर अवसरों की जानकारी प्राप्त हो जाती है. दूसरा तरीका है कि निर्णय लेने वालों से बेहतर सम्बन्ध किसी रोज़गार की भर्ती या अधिकारियों को प्रभावित करके ठेके, पदोन्नति का लाभ मिल जाता है. तीसरा किसी व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध, यानि उसकी सामाजिक पूँजी की व्यापारिक घराने या कंपनी के लिए उपयोगी है. उदहारण के लिए किसी बड़े नौकरशाह की संतान किसी भी व्यापारिक कंपनी के लिए उपयोगी है क्योंकि वो अन्दर की बात पता लगा सकता है या अपने प्रभाव से काम के निर्णय करा सकता है. ऐसे सामाजिक पूँजी वाले उम्मीदवारों को बेहतर वेतन या पद दिया जाता है. चौथा लाभ स्वास्थ्य के क्षेत्र में होता है, सामाजिक सम्बन्ध भावनात्मक समर्थन प्रदान करते हैं और यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है.

हमारे देश में सामाजिक पूँजी के मामले में जातिगत विषमता बहुत अधिक है. यहाँ जातीय संबंधन वाले सामाजिक समूह बनते हैं जिनका बाकी समूहों से सेतुकरण नहीं होता. यही कारण है कि मारवाड़ियों का व्यापार, उद्यमिता, धन दौलत में प्रभुत्व है. ब्राह्मण समाज के लोगों का मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही में प्रभुत्व है. समाज शास्त्री पिएर्रे बौर्दिएउ का कहना है कि सामाजिक पूँजी सभी नागरिकों को समान रूप से उपलब्ध नहीं है. कुलीन वर्ग या द्विज जाति के लोगों को सामाजिक पूँजी विरासत में मिलती है. सूरत के हीरा व्यापारी, तमिलनाडु के गोउंदर जिनका भारतीय होजरी के व्यापार पर नब्बे प्रातिशत कब्ज़ा है इसके उदहारण हैं.

वार्ष्णेय ने जातीय और सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक पूँजी के शोध पर पाया कि अंतरा-जातीय, अंतरा-सांप्रदायिक संबंधन के चलते अंतर-जातीय या अंतर-संप्रदाय समूह नहीं बन पाते या उनमें सेतुकरण नहीं हो पाता. ऐसे में जातीय हिंसा या सांप्रदायिक हिंसा की संभावना भी बहुत बढ़ जाती है. अंतर-जातीय और अंतर-सांप्रदायिक समूह बनें तो विभिन्न जातियों व सम्प्रदायों में संचार बढेगा, झूठी अफ़वाहें नहीं फैलेंगी और प्रशासन को अपना काम करने तथा शांति, सुरक्षा और न्याय करने में मदद मिलेगी.

बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था कि भारतीय समाज एक ऐसी मीनार है जिसमें चार मंज़िल और एक तहख़ाना है. इसमें ऊपर से नीचे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और दलित रहते हैं. इस मीनार में कोई सीढियां नहीं हैं. जो जिस मंज़िल पर जन्मा है वहीँ मरेगा भी. शूद्रों और दलितों की मंज़िल में तो हजारों कोठरियां हैं जिनमें कोई दरवाजा, खिड़की या रौशनदान नहीं है. ऐसे में शूद्र और दलित एक दूसरे से आपस में भी कट जाते हैं. ऐसी स्थिति में देश में सेतुकरण के जरिये सामाजिक पूँजी के वृद्धि की संभावना बहुत कम है. आवश्यकता है कि जातियों का विनाश हो और सामाजिक पूँजी बढे. तभी भारत उन्नत देशों की ज़मात में शामिल हो पायेगा.

Read it also-पूना पैक्टः अम्बेडकर के साथ गांधी का बड़ा धोखा अनिल जयहिंद

पूना पैक्टः अम्बेडकर के साथ गांधी का बड़ा धोखा

वर्तमान में वे भारत की कुल आबादी का लगभग छठा भाग (16.20 %) तथा कुल हिन्दू आबादी का पांचवा भाग (20.13 %) हैं. अछूत सदियों से हिन्दू समाज में सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहे हैं और काफी हद तक आज भी हैं. जब देश के आजादी की चर्चा चल रही थी, उसी दरम्यान सन् 1928 में साईमन कमीशन ने स्वीकार किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रातिनिधित्व दिया जाना चाहिए. सन 1930 से 1932 एक लन्दन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंस हुए जिनमें अन्य अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों के भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत देने के अधिकार को मान्यता मिली. यह एक ऐतिहासिक एवं निर्णयकारी परिघटना थी. इन गोलमेज़ कांफ्रेंसों में डॉ. बी. आर. आम्बेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन के दलितों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं ज़ोरदार प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कम्युनअल अवार्ड’ में पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि खुद चुनने का अधिकार मिला और साथ ही सामान्य जाति के निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्णों को चुनने हेतु दो वोट का अधिकार भी प्राप्त हुआ. इस प्रकार भारत के इतिहास में अछूतों को पहली बार राजनैतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रप्त हुआ जो उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त का सकता था.

उक्त अवार्ड द्वारा दलितों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1919 में अल्पसंख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार पर अन्य अल्पसंख्यकों यथा, मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियनज तथा कुछ अन्य के साथ-साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायिकाओं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की संख्या निश्चित की गयी. इसमें अछूतों के लिए 78 सीटें विशेष निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में आरक्षित की गयीं. गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी. गांधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा.

यह ज्ञातव्य है कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध नहीं किया था. गाँधी ने इस अंदेशे को लेकर 18 अगस्त, 1932 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री, श्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड को एक पत्र भेज कर दलितों को दिए गए पृथक निर्वाचन को समाप्त करके संयुक्त मताधिकार की व्यस्था करने तथा हिन्दू समाज को विघटन से बचाने की अपील की जिसके उत्तर में ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने पत्र दिनांक 8 सितम्बर, 1932 में लिखा कि इसमें कहा गया, ” ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत दलित वर्ग हिन्दू समाज के अंग बने रहेंगे और वे हिन्दू निर्वाचन के लिए समान रूप से मतदान करेंगे, परन्तु ऐसी व्यवस्था प्रथम 20 वर्षों तक रहेगी ताकि हिन्दू समाज का अंग रहते हुए उनके लिए सीमित संख्या में विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे जिसमें उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके. वर्तमान स्थिति में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है.

जहाँ जहाँ विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे वहां वहां सामान्य हिन्दुओं के निर्वाचन क्षेत्रों में दलित वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जायेगा. इस प्रकार दलितों के लिए दो मतों का अधिकार होगा – एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र के अपने सदस्य के लिए और दूसरा हिन्दू समाज के सामान्य सदस्य के लिए. हमने जानबूझ कर- जिसे आप ने अछूतों के लिए सम्प्रदायक निर्वाचन कहा है, उसके विपरीत फैसला दिया है. दलित वर्ग के मतदाता सामान्य अथवा हिन्दू निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्ण उमीदवार को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिन्दू मतदाता दलित वर्ग के उमीदवार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान क़र सकेंगे. इस प्रकार हिन्दू समाज की एकता को सुरक्षित रखा गया है.” कुछ अन्य तर्क देने के बाद उन्होंने गाँधी जी से आमरण अनशन छोड़ने का आग्रह किया था.

परन्तु गाँधी जी ने प्रत्युत्तर में आमरण अनशन को अपना पुनीत धर्म मानते हुए कहा कि दलित वर्गों को केवल दोहरे मतदान का अधिकार देने से उन्हें तथा हिन्दू समाज को छिन्न- भिन्न होने से नहीं रोका जा सकता. उन्होंने आगे कहा, ” मेरी समझ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था करना हिन्दू धर्म को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से दलित वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा.” गांधीजी ने इसी प्रकार के तर्क दूसरे और तीसरे गोलमेज़ कांफ्रेंस में भी दिए थे जिसके प्रत्युत्तर में डॉ. आम्बेडकर ने गाँधी के दलितों के अकेले प्रतिनिधि और उनके शुभ चिन्तक होने के दावे को नकारते हुए उनसे दलितों के राजनीतिक अधिकारों का विरोध न करने का अनुरोध किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल दलित केवल स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकारों की ही मांग कर रहे हैं न कि हिन्दुओं से अलग हो अलग देश बनाने की. परन्तु गाँधीजी का सवर्ण हिन्दुओं के हित को सुरक्षित रखने और अछूतों का हिन्दू समाज का गुलाम बनाये रखने का स्वार्थ था. यही कारण था कि उन्होंने सभी तथ्यों व तर्कों को नकारते हुए 20 सितम्बर, 1932 को अछूतों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया.

यह एक विकट स्थिति थी. एक तरफ गाँधी के पक्ष में एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू समुदाय था, दूसरी तरफ डॉ. आम्बेडकर और अछूत समाज. अंततः भारी दबाव एवं अछूतों के संभव जनसंहार के भय से गाँधीजी की जान बचाने के उद्देश्य से डॉ. आम्बेडकर तथा उसके साथियों को दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार की बलि देनी पड़ी और सवर्ण हिन्दुओं से 24 सितम्बर, 1932 को तथाकथित पूना पैक्ट करना पड़ा. इस प्रकार अछूतों को गाँधी जी की जिद्द के कारण अपनी राजनैतिक आज़ादी के अधिकार को खोना पड़ा.

यद्यपि पूना पैक्ट के अनुसार दलितों के लिए ‘ कम्युनल अवार्ड’ में सरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 78 से 151 हो गयी परन्तु संयुक्त निर्वाचन के कारण उनसे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार छिन गया जिसके दुष्परिणाम आज तक दलित समाज झेल रहा है. पूना पैक्ट के प्रावधानों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1935 में शामिल करने के बाद सन 1937 में प्रथम चुनाव संपन्न हुआ जिसमे गाँधीजी के दलित प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा कोई भी दखल न देने के दिए गए आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने 151 में से 78 सीटें हथिया लीं क्योंकि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में दलित पुनः सवर्ण वोटों पर निर्भर हो गए थे. गाँधी जी और कांग्रेस के इस छल से खिन्न होकर डॉ. आम्बेडकर ने कहा था, ” पूना पैक्ट में दलितों के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है.”

कम्युनल अवार्ड के माध्यम से अछूतों को जो पृथक निर्वाचन के रूप में अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने और दोहरे वोट के अधिकार से सवर्ण हिन्दुओं की भी दलितों पर निर्भरता से दलितों का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सकता था परन्तु पूना पैक्ट करने की विवशता ने दलितों को फिर से सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना दिया. इस व्यस्था से आरक्षित सीटों पर जो सांसद या विधायक चुने जाते हैं वे वास्तव में दलितों द्वारा न चुने जा कर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं सवर्णों द्वारा चुने जाते हैं जिन्हें उनका गुलाम/ बंधुआ बन कर रहना पड़ता है. सभी राजनैतिक पार्टियां गुलाम मानसिकता वाले ऐसे प्रतिनिधियों पर कड़ा नियंत्रण रखती हैं और पार्टी लाइन से हट कर किसी भी दलित मुद्दे को उठाने या बोलने की इजाजत नहीं देतीं. यही कारण है कि लोकसभा तथा विधान सभायों में दलित प्रतिनिधियों कि स्थिति महाभारत के भीष्म पितामह जैसी रहती है जिनसे यह पूछने पर कि “जब कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तो आप क्यों नहीं बोले?” इस पर उनका उत्तर था, ” मैंने कौरवों का नमक खाया था.”

वास्तव में कम्युनल अवार्ड से दलितों को स्वंतत्र राजनैतिक अधिकार प्राप्त हुए थे जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए सक्षम हो गए थे और वे उनकी आवाज़ बन सकते थे. इस के साथ ही दोहरे वोट के अधिकार के कारण सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू भी उनपर निर्भर रहते और दलितों को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं करते. इससे हिन्दू समाज में एक नया समीकरण बन सकता था जो दलित मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता. परन्तु गाँधीजी ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के विघटित होने कि झूठी दुहाई देकर तथा आमरण अनशन का अनैतिक हथकंडा अपना कर दलितों की राजनीतिक स्वतंत्रता का हनन कर लिया जिस कारण दलित सवर्णों के फिर से राजनीतिक गुलाम बन गए.

दलितों की संयुक्त मताधिकार व्यवस्था के कारण सवर्ण हिन्दुओं पर निर्भरता के कारण दलितों की कोई भी राजनैतिक पार्टी पनप नहीं पा रही है. चाहे वह डॉ. आम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ही क्यों न हो. इसी कारण डॉ. आम्बेडकर को भी दो बार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा क्योंकि आरक्षित सीटों पर भी सवर्ण वोट ही निर्णायक होता है. इसी कारण सवर्ण पार्टियाँ ही अधिकतर आरक्षित सीटें जीतती हैं. पूना पैक्ट के इन्हीं दुष्परिणामों के कारण ही डॉ. आम्बेडकर ने संविधान में राजनैतिक आरक्षण को केवल 10 वर्ष तक ही जारी रखने की बात कही थी. परन्तु विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इसे दलितों के हित में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए अब तक लगातार 10-10 वर्ष तक बढ़ाती चली आ रही हैं क्योंकि इससे उन्हें अपने मनपसंद और गुलाम सांसद और विधायक चुनने की सुविधा रहती है.

Read it also-बहुजन छात्र संघ के द्वारा काशी विद्यापीठ के कुलपति को ज्ञापन

सम-विषम योजना बढ़ते प्रदूषण का हल नहीं

राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर सम-विषम योजना शुरू करने की बात कह कर दिल्ली जनता की परेशानियां बढ़ाने का निश्चय किया है. सम-विषम योजना 2016 में दो बार लागू की गई थी. लेकिन उस वक्त भी नतीजों को लेकर ही परस्पर विरोधी रिपोर्टें और खबरें आती रहीं. पंजाब और हरियाणा में पराली जलाए जाने एवं स्मॉग फॉग यानी धुआं युक्त कोहरा के कारण राजधानी में प्रदूषण के उच्चतम स्तर पर पहुंच के लिये सम-विषम योजना लागू करना कैसे युक्तिसंगत हो सकता है? सम-विषम योजना पर अड़े रहने का आप सरकार का फैसला वायु प्रदूषण के खिलाफ किसी वैज्ञानिक एवं तार्किक उपाय के बजाय उसकी अक्षमता, अपरिपक्वता एवं हठधर्मिता का द्योतक हैं.

दिल्ली में 4 से 15 नवंबर के बीच सम-विषम योजना लागू होगी, इस अवधि में प्रदूषण के चिंताजनक स्तर तक बढ़ने के मद्देनजर आप सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गयी हैं. दिल्ली सरकार ने प्रदूषण रोकने के लिए सात बिंदुओं के आधार पर कार्ययोजना बनाई है. इसमें दीपावली पर पटाखे न जलाने की अपील, कूड़ा और पेड़ों की पत्तियां जलाने पर रोक, धूल से बचाव, पेड़ लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने जैसे कदम भी शामिल हैं. लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से एक भी उपाय अब तक कारगर साबित नहीं हुआ है. सड़क पर अगर वाहन कम चलें तो निश्चित रूप से एक सीमा तक वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है, क्योंकि दिल्ली के वायु प्रदूषण से होने वाले प्रदूषण की भागीदारी चालीस फीसद है. यह कम नहीं है. ऐसे में अगर दिल्ली सरकार समय रहते एहतियात के तौर पर कदम उठा रही है तो यह उसकी जागरूकता को दर्शाता है. जाहिर है, दिल्ली की जिम्मेदारी संभाल रही सरकार का यह सबसे बड़ा फर्ज भी है कि वह प्रदूषण पर काबू करके इस शहर को रहने लायक बनाए. लेकिन सम-विषम योजना से दिल्ली की जनता को होने वाली परेशानियां पर ध्यान देना भी उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए.

समस्या जब बहुत चिन्तनीय बन जाती है तो उसे बड़ी गंभीरता से नया मोड़ देना होता है. पर यदि उस मोड़ पर पुराने अनुभवों के जीए गये सत्यों की मुहर नहीं होती तो सच्चे सिक्के भी झुठला दिये जाते हैं. इसका दूसरा पक्ष कहता है कि राजनीतिक वाह-वाही की गहरी पकड़ में यदि आम जनता की सुविधाओं को बन्दी बना दिया जाये तो ऐसी योजना की प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े होने स्वाभाविक है. यह कदम कानून का पालन करने वाले नागरिकों का अपमान भी होगा जो प्रदूषण के लिए अपने वाहनों की नियमित जांच कराते हैं क्योंकि उन्हें आने-जाने और अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने में समस्या होगी, अपने कार्यालयों एवं व्यवसाय-स्थलों, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने एवं अन्य आपातकालीन स्थितियों में गंतव्य तक पहुंचने में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा. इसीलिये सम-विषम योजना की घोषणा के साथ ही इसे लेकर सवाल भी उठने लगे हैं. सवाल सिर्फ योजना पर नहीं, बल्कि इसे लागू करने के पीछे दिल्ली सरकार की गंभीरता को लेकर ज्यादा है. केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नीतिन गडकरी ने यह कह दिया है कि प्रदूषण से निपटने के लिए सम-विषम योजना की कोई जरूरत नहीं है. केंद्र सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जो प्रदूषण कम करने में सहायक होंगे. ऐसे में बड़ा सवाल फिर यही खड़ा होता है कि जहरीली हवा में हांफती दिल्ली को आखिर प्रदूषण से मुक्ति दिलाने का उपाय क्या है?

दिल्ली का प्रदूषण विश्वव्यापी चिंता का विषय बन चला है. कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ यहां तक कह चुके हैं कि दिल्ली रहने लायक शहर नहीं रह गया है. दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ी कुछ मूलभूत समस्याएँ मसलन आवास, यातायात, पानी, बिजली इत्यादि भी उत्पन्न हुई. नगर में वाणिज्य, उद्योग, गैर-कानूनी बस्तियों, अनियोजित आवास आदि का प्रबंध मुश्किल हो गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण के मामले में विश्व में चैथा स्थान है. दिल्ली में 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण औद्योगिक इकाइयों के कारण है, जबकि 70 प्रतिशत वाहनों के कारण है. खुले स्थान और हरे क्षेत्र की कमी के कारण यहाँ की हवा साँस और फेफड़े से संबंधित बीमारियों को बढ़ाती है. प्रदूषण का स्तर दिल्ली में अधिक होने के कारण इससे होने वाले मौतें और बीमारियां स्वास्थ्य पर गंभीर संकट को दर्शाती है. इस समस्या से छुटकारा पाना सरल नहीं है. हमें दिल्ली को अप्रदूषित करना है तो एक-एक व्यक्ति को उसके लिए सजग होना होगा, सरकार को भी ईमानदार प्रयत्न करने होंगे.

पिछले पांच सालों के दौरान दिल्ली में वाहनों की तादाद में सत्तानवें फीसद बढ़ोतरी हो गई. इनमें अकेले डीजल से चलने वाली गाड़ियों की तादाद तीस प्रतिशत बढ़ी. कभी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डीजल से चलने वाली नई गाड़ियों का पंजीकरण रोक दिया गया था, लेकिन सवाल है कि पहले से जितने वाहन हैं और फिर नई खरीदी जाने वाली गाड़ियां आबोहवा में क्या कोई असर नहीं डालेंगी? इस गंभीर समस्या के निदान के लिये दिल्ली सरकार को अराजनैतिक तरीके से जागरूक रहने की जरूरत है. दिल्ली में प्रदूषण और इससे पैदा मुश्किलों से निपटने के उपायों पर लगातार बातें होती रही हैं और विभिन्न संगठन अनेक सुझाव दे चुके हैं. लेकिन उन्हें लेकर दिल्ली सरकार की कोई ठोस पहल अभी तक सामने नहीं आई है. हर बार पानी सिर से ऊपर चले जाने के बाद कोई तात्कालिक घोषणा होती है और फिर कुछ समय बाद सब पहले जैसा चलने लगता है.

हर साल दिल्ली में नवंबर-दिसंबर में प्रदूषण की मात्रा बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाती है. इसके दो बड़े कारण है. एक पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाए जाने से निकलने वाला धुआं दिल्ली की ओर आना और दूसरा कारण दिल्ली में वाहनों से निकलने वाला धुआं. राजधानी दिल्ली में अब भी लाखों ऐसे वाहन हैं जिनकी पंद्रह साल की अवधि समाप्त हो चुकी है, लेकिन सड़क पर बेधड़क दौड़ रहे हैं. पिछले चार साल में दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग ने ऐसे वाहन मालिकों के खिलाफ शायद ही कोई कार्रवाई की होगी. जहां तक दिपावली पर पटाखे फोड़ने का सवाल है, सुप्रीम कोर्ट पहले ही पाबंदी लगा चुका है. लेकिन लोगों पर इसका कोई असर नहीं दिखा. दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में कूड़ा जलता देखा जा सकता है. राजधानी में कूड़े के जो पहाड़ खड़े हैं, उनको हटवाने के लिए पिछले चार साल में क्या कोई बड़ा फैसला हुआ?

सवाल यह भी है कि क्या कुछ तात्कालिक कदम उठा कर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या से पार पाया जा सकता है? लेकिन यहां मुख्य प्रश्न बढ़ते प्रदूषण के मूल कारणों की पहचान और उनकी रोकथाम संबंधी नीतियों पर अमल से जुड़े हैं. दिल्ली में वाहन के प्रदूषण की ही समस्या नहीं है, हर साल ठंड के मौसम में जब हवा में घुले प्रदूषक तत्वों की वजह से जन-जीवन पर गहरा असर पड़ने लगता है, स्मॉग फॉग यानी धुआं युक्त कोहरा जानलेवा बनने लगता है, तब सरकारी हलचल शुरू होती है. विडंबना यह है कि जब तक कोई समस्या बेलगाम नहीं हो जाती, तब तक समाज से लेकर सरकारों तक को इस पर गौर करना जरूरी नहीं लगता.

सम-विषम योजना 2016 में दो बार लागू की गई थी. जिस पर दिल्ली सरकार का दावा था कि सम-विषम लागू करने से प्रदूषण दस से बारह फीसद की कमी आई थी. जबकि कुछ अध्ययनों में यह सामने आया कि इससे हवा में मौजूद घातक कण पीएम 2.5 और कार्बन की मात्रा बढ़ गई थी. योजना लागू करनी है तो सख्ती से की जानी चाहिए, सिर्फ वाहवाही बटोरने के लिए नहीं. हमें हमेशा ऊपर से नियमों को लादने के बजाय जनता को जागरूक करने पर जोर देना चाहिए. और उनकी भागीदारी बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी नीतियां असर दिखाएंगी और तभी आम-जनता का शासन के प्रति विश्वास कायम रहेगा, तभी समस्या का हल होगा. प्रेषकः

ललित गर्ग

झारखंड में बांस से हो रहा है विकास

हरा सोना के नाम से मशहूर बांस खेती सदैव फायदे का सौदा साबित हुई है. यह वह फसल है जो बंजर जमीन को भी उपजाऊ बना देती है. 18 सितंबर को विश्व बांस दिवस मनाया जाता है. इसे पृथ्वी पर सबसे टिकाउ मेटेरियल माना जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अन्य वनस्पितियों की तुलना में बांस में ऑक्सीजन की मात्रा 35 प्रतिशत अधिक है. बांस के माध्यम से टिकाउ विकास एवं हरित भारत की परिकल्पना को भी साकार किया जा रहा है. यह संसार का एकमात्र पौधा है जो किसी भी वातावरण में तेजी से उन्नति करता है. अपने इसी गुण के कारण इसे उन्नति का प्रतीक और समृद्धि देने वाला पौधा माना जाता है. फेंगशुई में बांस के पौधे को दिव्य पौधा कहा जाता है. भारतीय समाज में भी बांस को शुभ माना गया है.

भारत के जिन राज्यों में बांस का सबसे अधिक उत्पादन होता है उनमें झारखंड भी प्रमुख है. आदिवासी बहुल यह राज्य वनों से घिरा हुआ है. इंडिया स्टेट फॉरेस्ट रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में 23,478 वर्ग किमी में वन फैला हुआ है. झारखंड सरकार की योजना है कि बांस के उत्पाद से आदिवासियों की जीवन शैली में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. इसके लिए राज्य सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है. एक तरफ जहां बांस का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कारीगरों को हुनरमंद बनाकर स्वरोजगार के लिये प्रेरित किया जायेगा. तीन साल में बांस के पेड़ बढ़ते हैं, उसका विकास तेजी से होता है.

आज झारखंड में पैदा होने वाले बांस की मांग पूरे विश्व में बढ़ी है. इसी मांग को देखते हुए झारखंड सरकार की ओर से पहली बार बांस कारीगर मेला 2019 का दो दिवसीय आयोजन उपराजधानी दुमका में किया जा रहा है. झारखंड में 4470 स्कावयर किलोमीटर क्षेत्र में बांस का उत्पादन होता हैं, यहां 2520 मिलीयन टन बांस का उत्पादन होता है. पूरे देश का आधा बांस झारखंड में पाया जाता है, यहां के बंबुसा टुलडा, बंबुसा नूतनस और बंबुसा बालकोआ की मांग विश्व भर में है. बंबूक्राफ्ट राज्य का प्रमुख उधोग बन चुका है,लगभग 500 प्रकार के उत्पाद बांस के बन रहे हैं, जो अन्य प्रदेशों में भेजे जा रहे हैं, जिस्से 50 लाख की आय प्रतिवर्ष सरकार को हो रही है. उद्योग विभाग के सचिव के रवि कुमार बताते हैं कि झारखंड सरकार वर्ष 2022 तक ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों को गरीबी से मुक्त कर उनकी आय दोगुनी करने जा रही है. उन्होंने बताया कि वन आधारित उत्पादों के माध्यम से लोगों को रोजगार मुहैया कराने की दिशा में प्रयास किये जा रहे है. राष्ट्रीय बांस मिशन और झारखंड राज्य बांस मिशन के प्रयास से बांस के उत्पादन, लघु एवं कुटीर उघम एवं हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है. किसानों के जीवन स्तर में हरित भारत, सतत एवं टिकाउ विकास की संकल्पना के माध्यम से बांस आधारित उधोग से रोजगार की दिशा में प्रयास सरकार की ओर से किये जा रहे है.

राज्य में मोहली परिवारों की संख्या लाखों में है जो परंपरागत रूप से बांस के उत्पादन टोकरी, सूप, डलिया सहित कई सामग्री वर्षों से परंपरागत रूप से बना रहे हैं और अपनी आजिविका चला रहे है. मोहली परिवारों को बंबूकाॅफ्ट की ओर से प्रशिक्षण दिया जा रहा है. बांस कारीगर मेला 2019 में देशभर से दस हजार कारीगर जुटेंगें, जिन्हें प्रशिक्षण के साथ टिकाउ विकास के बारे में बताया जायेगा. देशभर के निवेशकों को बांस आधारित उधोग के बारे में बांस कारीगर मेला में बताया जायेगा. कारीगर मेला में आईकिया, टाईफेड, फैब इंडिया, ईसाफ सहित कई संगठन असम, त्रिपुरा, दिल्ली, मेघालय सहित कई राज्यों से जुटेंगें. झारखंड में कारीगर मेला का आयोजन मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उघम विकास बोर्ड, उधोग विभाग, झारखंड राज्य बंबू मिशन, झारक्राफॅट और जेएसएलपीएस मिलकर कर रहा है. झारखंड में इससे पहले मोमेंटम झारखंड का भी आयोजन किया जा चुका है.

राज्य के प्रत्येक जिला में बांस बहुतायत मात्रा में पाया जाता है, जिससे रोजगार की संभावना बढ़ी है. राज्य में बांस के क्षेत्र में संभावना है, कृषि से लेकर उर्जा के वैक्ल्पिक स्त्रोत की संभावना बनी है. बांस आधारित सामानों के उत्पादन के विपणन की समस्या नहीं है, मल्टीनेशनल कंपनी सामग्री खरीदने को तैयार है. बांस से बने उत्पादों जैसे सोफा सेट, टेबल, बैग और दैनिक उपयोग की कलात्मक सामग्रियों की मांगें हाल के दिनों में काफी बढ़ी हैं, जिससे इनका विश्व व्यापार भी बढ़ा है.

गैर सरकारी संस्था ईसाफ के अजित सेन बताते हैं कि राज्य के सभी जिलों में बांस का उत्पादन होता आ रहा है, संताल परगना में सर्वाधिक बांस का उत्पादन होता है. इसके अतिरिक्त गोड्डा, साहिबगंज, पाकुड, दुमका, जामताड़ा, जमशेदपुर, हजारीबाग, खुटी, गुमला, रांची रामगढ़ जिला में बहुतायत मात्रा में बांस उपलब्ध है. वे बताते हैं कि मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उघम विकास बोर्ड द्वारा कारीगरों के कल्सटर बनाकर उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है. एक कल्स्टर में लगभग दो सौ कारीगर होते हैं, राज्य में लगभ हजार कल्सटर बन चुके हैं. कारीगरों के लिये प्रोडयूसर ग्रुप भी बना है, कारीगरों को दक्ष करने के उद्देश्य से उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है. खास बात यह है कि झारखंड में बांस से बने उत्पादों की मांग यूरोप और मिडिल ईस्ट में होने लगी है.

बांस उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए कारीगरों को आधुनिक तरीके सिखाये जा रहे हैं ताकि उन्हें अधिक से अधिक रोजगार मिल सके. बांस के कारीगर संतोष मोहली, काशीनाथ मोहली, जोसेफ मोहली, बबिता कुमारी, मार्शिला हेम्ब्रम बताती हैं कि वे प्रति माह दस हजार रूपये इस रोजगार से कमा लेती हैं. झारखंड में गरीबों के आय बढ़ाने की दिशा में सरकार प्रयासरत है, कारीगरों को प्रशिक्षित कर कई नये प्रकार के उत्पाद बनने लगे हैं. सहायक उधोग निदेशक सुधीर कुमार सिंह बताते हैं कि बांस कारीगर मेला 2019 के आयोजन के बाद इस क्षेत्र में राज्य का नाम और बढ़ेगा. उन्होंने बताया कि इस मेला में बिजनेस डेलिगेशन की टीम भी आ रही हैं, जिससे कारीगरों को लाभ मिलेगा. नेशनल बंबू मिशन बांस की खेती के लिये पीपी मोड और मनरेगा अंर्तगत बांस के प्लांटस लगायेगा.

झारखंड के आदिवासी अब रोजगार के लिये बंगाल पलायन नहीं करेंगें, बांस से उन्हें घर में ही रोजगार उपलब्ध हो सकेगा. बंबू कुटीर उद्योग के माध्यम से उनकी जीवन में बदलाव आने की संभावना है. झारखंड वन प्रदेश है जहां प्रकृति ने उन्हें बहुत कुछ दिया हैं. बांस से रोजगार की अपार संभावना बनती जा रही है.

शैलेन्द्र सिन्हा

मलखान सिंह की कविताएं पाखंडवाद को ध्वस्त करके सामाजिक बदलाव की मांग करती हैं

“मलखान सिंह की कविताएं पाखंडवाद को ध्वस्त करके सामाजिक बदलाव की मांग करती हैं”मलखान सिंह हिन्दी दलित साहित्य (कविता) में समावेशी तेवर के रचनाकार थे. उनकी कविता विद्रोही स्वर में होते हुए भी समाज को समरसता का संदेश देती है. सामाजिक चेतना का स्वर उनकी कविताओं में बहुत बारीकी से दर्ज़ हुई है. वे इतिहास के गलियारों से गुजरते हुए उन सभी भौतिक वस्तुओं की तरफ जाते हैं जहां पर तथा कथित हिन्दी के कवि जाने से डरते हैं. उनकी कविताएं सामाजिक यथार्थ का विवरण इस तरह पेश करती हैं जैसे इतिहास की कोई किताब हो, और किताब हो क्यों न ? उन्होंने सामाजिक गैरबराबरी जो देखा/झेला है. उनकी कविता की बस्ती में निम्न वर्गों की जीवन गाथा दर्ज़ है. शोषण-दमन का लेखा-जोखा बहुत ही स्पष्ट रूप में आया है. उनका कवि कर्म उनके इर्द-गिर्द घटती हुई घटनाओं का आख्यान है, जिसमें इतिहास है, वर्तमान है और भविष्य भी. उन्होंने अपनी कविता का जनतंत्र जिस तरह से बुना है वह देखते ही बनता है. गाँव के दक्षिण से लेकर बाकी तीनों दिशाओं का विवरण ऐसे पेश करते हैं कि समाज शास्त्री बौनें दिखने लगते हैं. मलखान सिंह की काव्य दृष्टि अत्यंत पीड़ादायी परिस्थितियों को देखकर बनी है. वे अपनी कविताओं में जाति के प्रश्न को लेकर बार-बार टकराते हैं. प्रश्न भी करते हैं कि, क्या इस देश हमारी पहचान केवल हमारी जाति से ही तय होगी? वह यह भी कहते हैं, क्या हम इंसान नहीं हैं? हमारे साथ इन्सानों जैसा व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? ‘मैं आदमी नहीं हूँ (2)’ कविता का एक अंश देखिये-

मैं आदमी नहीं हूँ स्साब जानवर हूँ दोपाया जानवर जिसे बात-बात पर मनुपुत्र- माँ चो- बहन चो- कमीन कौम कहता है.”

कवि ने इस प्रश्नवाचकता से ‘तथा कथित’ मानव समाज से प्रश्न करता है. खुद को जानवर कहकर मानव समाज पर चोट करता है. इस प्रसंग को लेकर डॉ. अम्बेडकर बरबस याद आते हैं जहाँ उन्होंने सामाजिक असमानता को लेकर प्रथम गोलमेज सम्मलेन में इसकी उपस्थिति दर्ज कराते हुए उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) की दूसरी बैठक 31 दिसम्बर 1930 को सदन के समक्ष सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर बोलते हुए कहा कि, “महोदय! सर्वप्रथम मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूँ कि, भारत में अनेक अल्पसंख्यक वर्ग हैं, जिनकी अपनी राजनीतिक पहचान होनी चाहिए, किन ये सभी अल्पसंख्यक वर्ग एक जैसे नहीं हैं, इनमें अनेक असमानताएं हैं, एक दूसरे से भिन्नताएं हैं. प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग कि सामाजिक है सियत अलग-अलग है. उदाहारण के लिए भारत का सबसे छोटा अल्पसंख्यक वर्ग है, पारसी समुदाय. इस समुदाय की सामाजिक है सियत बहुसंख्यकों की सामाजिक है सियत से कम नहीं है. दूसरी ओर दलित वर्ग है. देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय, अर्थात मुस्लिम समुदाय के बाद दूसरे नम्बर पर आने वाला अल्पसंख्यक वर्ग! इस समुदाय की सामाजिक है सियत एक अदना आदमी की हैसियत से भी गई गुजरी है.”2 दरअसल, अंबेडकर के इस कथन को मलखान सिंह के काव्य दृष्टि में देखी जा सकती है. जिसमें वह निम्न वर्गों की वकालत करते हुए नजर आते हैं. असल में कवि का जो मूल कर्तव्य होता है वह मलखान सिंह की काव्य दृष्टि में निहित है. कवि का धर्म ही यही होना चाहिए कि सामाजिक यथार्थ को ही काव्य का विषय बनाया जाए. अपने समय के सवालों से मुठभेड़ करे. जनता के पक्ष में खड़ा हो. सामाजिक सौहार्द बनाए रखे. उसकी कविता में समाज को आगे ले जाने लिए ‘विजन’ हो, जिससे विकृत व्यवस्था में बदलाव लाया जा सके. तभी वह कवि अपने समय से आगे निकल कर बड़ा कवि बनता है. इस तरह का ‘विजन’ मलखान सिंह की कविताओं की ख़ासियत है.

मलखान सिंह ने अपनी कविता का फ़लक व्यापक करते हुए उदारवादियों की जमकर आलोचना की है. नेताओं की भतर्सना की है. लोकतंत्र पर प्रश्न किया है. शिक्षा, स्वास्थ्य और देश की विभिन्न चीजों पर उनका ही कब्ज़ा है, जो आज के समय का जवलंत मुद्दा बना हुआ है. कवि इस विषय को लेकर बहुत पहले ही चिंचित हो गया था, इसलिए वहअपने और निम्न समुदाय के होने/रहने पर विचार करते हैं और कहते हैं कि धरती का कोई कोना हमारे लिए नहीं है? उदाहरण के तौर पर ‘कैसा उदारवाद यह’ कविता का एक अंश देखिये-

“आज ! देश की शिक्षा देश की चिकित्सा देश के बाज़ार आकाश-पाताल धरती की कोख तक बस उन्हीं की सत्ता है”3

मलखान सिंह सवाल करते हैं कि लोकतंत्र में जहाँ सब की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए, उसी लोकतंत्र में अभी भी एकमात्र सच्चाई जाति ही क्यों है? क्यों दलितों को उनकी जाति से ही पहचाना जाता है? जाति को देखकर क्यों उनके प्रति दुर्व्यवहार किया जाता है? कवि इस भेदभाव को बहुत बारीकी से पकड़ता है. अपनी अस्मिता को संकट ग्रस्त होते हुए देखता है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अपने ही देश में उसको तथा कथित समाज के लोगों द्वारा उसके पहचान को ‘इगनोर’ किया जा रहा है. जिस लोकतंत्र में व्यक्ति की महत्ता को केंद्र में रखा जाना चाहिए वहाँ पर इस तरह का दुर्व्यवहार करना किस सभ्यता का द्योतक है? फ्रांस की क्रांति में असमानता की भेद को मिटाने के लिए ही क्रांति हुई थी और समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का नारा लगाया गाया. इन्हीं तीन मुख्य विंदुओं को हमारे यहाँ संविधान के केंद्र में रखा गाया है, जिससे आधुनिक भारत में सबको समता, सम्मान और पहचान मिल सके. सबको अपना अधिकार मिल सके. कवि चिंतित है वह इसलिए कि उसे समानता और स्वतंत्रता के सारे उपकरण खोखले लगते हैं. इसका आशय यह नहीं कि वह देश और देश के संविधान में विश्वास नहीं रखना चाहता बल्कि यहाँ कि आवाम जो अपने बुद्धि विलाप के चलते निम्न वर्गों के साथ जिस तरह का रुख अपनाती है उसको लेकर चिंतित है. इसलिए वह कहता है कि मेरी पहचान केवल जाति से होती है, मेरी प्रतिभा से नहीं, मेरे नाम से नहीं. एक उदाहरण ‘फटी बंडी’ कविता से देखिये –

“मैं अनामी हूँ अपने इस देश में जहाँ-जहाँ भी रहता हूँ आदमी मुझे नाम से नहीं जाति से पहचानता है और जाति से सलूक करता है.”4

बावजूद इसके इन तमाम प्रश्नों से टकराते हुए कवि आगे बढ़ता है और ‘सुनो ब्राह्मण’ कविता में कहता है कि,

“हमारी दासता का सफ़र तुम्हारे जन्म से शुरू होता है और इसका अंत भी तुम्हारे अंत के साथ होगा.”5

इस कविता में कवि अपने विचार को धारदार तौर प्रयोग करता है. वह यह जनता है कि प्रतिरोध से ही समाज में समाजिकता/बदलाव लायी जा सकती है, क्योंकि समाज का एक धड़ा ऐसा है जो सुनता नहीं. बावजूद इसके कवि इन विसंगतियों से अपने को निराश/हताश नहीं पाताबल्कि भविष्य के लिए आत्मज्ञान और संबल प्रदान करता है. आत्मविश्वास को बढ़ाता है. कवि अपनी कविताओं में बिना किसी समुदाय को अलग किए हुए सबकी समानता की बात करता है. देश और देश के बाहर के लोगों को भी अपना मानता है. एक कविता ‘छत की तलाश’ का उदाहरण देखिये-

“मकां ऐसा बनाऊँगा जहाँ हर होठ पर बंधुत्व का संगीत होगा मेहनतकश हाथ में- सब तंत्र होगा बाजुओं में दिग्विजय का जोश होगा. विश्व का आँगन हमारा घर बनेगा. हर अपरिचित पाँव भी अपना लगेगा.”6

कवि यहीं नहीं रुकता वह अंधविश्वास पर गहरा चोट करता है और पंड्डे-पुरोहितों के द्वारा फैलाये गए भ्रम पर सवाल खड़ा करता है. वह ईश्वर के होने पर सवाल करता है. उसके द्वारा बनाए गए सिद्धांतों पर सवाल करता है. जिस ईश्वर का सहारा लेकर पुरोहितों ने समाज में असमानता का बीज बोया है उसकी खबर लेते हुए उनके मुँह का रंग बदल देता है और यह भी कहता है कि तुम्हारी पाखंडी सत्ता के सामने हम झुकने वाले नहीं. बल्कि उसका सामना करने वाले लोग हैं. यह चेतना या स्वाभिमान दलित समाज के ऐतिहासिक गौरव का स्मरण करवाता है. हमें इतिहास में अपने होने/लड़ने की याद दिलाता है. स्वाभिमान से जीने की चेतना का भान कराता है, एकदम कबीर के भाँति. यह कहने में तनिक भी गुरजे नहीं है कि मलखान सिंह कातेवर धर्म के विरुद्ध नहीं है. पाखंड के विरुद्ध नहीं है. वे अपनी बेबाक तेवर से वह धरती को नरक बनाने वालों की कुटिलता को उगाजर करते हैं. उनके दुराचारों की व्याख्या करते हैं, जो दलित समाज को चेतनाहीन बना देना चाहते थे, जिससे उनकी खोखली सत्ता को ढहाया न जा सके. एक उदाहरण ‘ज्वालामुखी के मुहाने’ कविता से देखिये-

“हमें अन्धा हमें बहरा हमें गूंगा बना गटर में धकेल दिया ताकि चुनौती न दे सकें तुम्हारी पाखंडी सत्ता को.”7

लेकिन इस पाखंडी समाज को यह कहाँ ज्ञान है कि ज्वालामुखी अर्थात दलित समाज को कोई पाट सकता है? क्या कोई इस समाज क रोक सकता है? इसी कविता कि अगली कड़ी में देखिये कि कवि ने किस तरह ब्राह्मणों की खबर ली है.

“मदान्ध ब र ह म न धरती को नरक बनाने से पहले यह तो सोच ही लिया होता कि ज्वालामुखी के मुहाने कोई पाट सकता है जो तुम पाट पाते !”8

इस तरह देखा जाए तो यह बात कही जा सकती है कि मलखान सिंह की कविताओं में जो चेतना शील दृष्टि है, वह दृष्टि शोषित-पीड़ित समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है. जनता की सच्चाई जनता के सामने प्रस्तुत करती है. जैसे संत कबीरदास और संत रविदास ने प्रस्तुत की है. मलखान सिंह के यहाँ विचारों को लेकर कोई अंतर्विरोध नहीं है. परंपरा का अनुसरण उनकी कविता का मुख्य विंदु है. उनके यहाँ कबीर, रविदास, ज्योतिबा फुले और अंबेडकर के विचार प्रथम स्थान पाते हैं. वे पूरे साफगोई के माध्यम से भाषा में सहजता बरतते हुए जनता की भाषा में अपनी कविता कहते हैं. बोझिलता उनके यहाँ दूर-दूर तक नहीं है. सामान्य मनुष्य अपनी पीड़ा को उनकी कविताओं में देख सकता है. अत्याचारी और पाखंडी उनकी कविताओं से सीख ले सकता है, जिससे समाज में समन्वय और बन्धुत्व कायम रखा जा सके. मलखान सिंह की कविता इसी कि तसदीक करती है. संदर्भ सूची- 1. मलखान सिंह, सुनो ब्राह्मण, रश्मि प्रकाशन, लखनऊ, पृ. सं. 65,2018. 2. बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, सम्पूर्ण वांग्मय, खंड-5, पृ. सं. 43. 3. मलखान सिंह,ज्वालामुखी के मुहाने,रश्मि प्रकाशन,लखनऊ,पृ. सं. 7, 2019. 4. मलखान सिंह,सुनो ब्राह्मण,रश्मि प्रकाशन,लखनऊ,पृ. सं. 75, 2018. 5. वही,पृ. सं. 100, 2018. 6. वही,पृ. सं. 84, 2018. 7. मलखान सिंह,ज्वालामुखी के मुहाने,रश्मि प्रकाशन,लखनऊ,पृ. सं. 40, 2019. 8. वही,पृ. सं. 40, 2019.

सुमित कुमार चौधरी शोधार्थी- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

दलित दस्तक मैग्जीन का सितंबर 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

0
[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2019/09/September_2019.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का चौथा अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

दलित दस्तक मैग्जीन का अगस्त 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

0
[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2019/09/august_2019.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का तृतीय अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

दलित दस्तक मैग्जीन का जुलाई 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

0
[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2019/09/July_2019.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का दूसरा अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

शॉट पूरा करने के बाद मैं दिल खोलकर रोया – पा. रंजीत

निर्देशक पा. रंजीत के कार्यालय का स्‍वागत कक्ष एक पुस्‍तकालय सरीखा दिखता है. यह दीवारों पर लगे फिल्‍मी पोस्‍टरों से प्राय: शेखी बघारने वाले कोडम्‍बक्‍कम जैसे तमिल निर्देशकों के कार्यालयी स्‍थलों की चिल्‍लपों से बहुत दूर है. यहाँ पुस्‍तकों की अलमारियों में अंबेडकर, पेरियार और मार्क्‍स एक-दूसरे के साथ समय गुजारते हैं. कोने में एक कैरमबोर्ड है जिसका इस्‍तेमाल उनके सहायक निर्देशक मन बहलाव और गंभीर चिंतन-मनन के लिए करते हैं. उस स्‍थान पर एक भी मूवी पोस्‍टर नहीं है. न ही स्‍वयं उन्‍हीं के चित्र वहाँ हैं. रंजीत कंधे उचकाते हैं कि ‘ठीक ही तो है, यह सब (फिल्‍में) मेरे विषय में कभी था ही नहीं’ वे न सिर्फ तमिल सिनेमा की महत्‍वपूर्ण आवाज़ के रूप में उभरे हैं अपितु जातिवाद के विरुद्ध एक स्‍वर के रूप में भी उभरे हैं.

पिछले कुछ सप्‍ताह रंजीत के लिए व्‍यस्‍तता भरे रहे हैं- ग्‍यारहवीं सदी के तमिल शासक राजा राजा चोलन के ऊपर उनकी टिप्‍पणियों ने कुछ लोगों को नाराज कर दिया. हमारे मिलने से सिर्फ एक दिन पहले ही उन्‍हें सशर्त अग्रिम जमानत मिली थी. जैसे ही हम बातचीत के लिए बैठते हैं, वे कहते हैं कि ‘पुढु अनुभवम्’ (नया अनुभव है). श्रीनिवास रामानुजम् द्वारा ‘दि हिंदू’ के लिए उनके साथ की गई इस बातचीत का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है-

आपने अभी राजा राजा चोलन का विषय क्‍यों उठाया ?

– मैं उस स्‍थल (थंजावुर) के कारण उनके बारे बोला था और इसलिए भी बोला था क्‍योंकि हर एक दावा करता है कि राजा उनकी जाति का था. मेरा मुख्‍य मुद्दा यह है कि उनके शासन के दौरान कामगार वर्ग के पास स्‍वयं की जमीन क्‍यों नहीं थीॽ मैंने जो कहा, वह मेरे द्वारा पढ़े गये के.के. पिल्‍लई, के.ए. नीलकंडा शास्‍त्री, पी.ओ. वेलसामी और नोवोरु करशिमा के लेखन पर आधारित है.

राजा राजा चोलन ने भव्‍य मंदिर बनवाये और उनकी दीवारों की नक्‍काशियों में नाइयों और धोबियों के नाम भी शामिल करवाये.

मंदिरों की वास्‍तुकला से मैं हतप्रभ हूँ. मुझे राजा के उस आयाम को लेकर कोई समस्‍या नहीं है. लेकिन यह उन्‍हीं का शासन है कि जाति ने अपना बदसूरत सिर उठाया. अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग कब्रिस्‍तान भी होते थे. हो सकता है कि यह पहले से प्रचलन में रहा हो किंतु उनके शासन के दौरान यह एक मजबूत प्रथा बन गई. बहुत सी पुस्‍तकें इस ओर संकेत करती हैं.

निर्देशक पा. रंजीत

एक फिल्‍म निर्माता के लिए अपनी फिल्‍मों और फिल्‍मों के बाहर राजनैतिक होना क्‍यों महत्‍वपूर्ण हैॽ

जो मैंने जीवन से सीखा है, मुझे उसे लिपिबद्ध करना होता है. अपने कामकाज में और अन्‍यत्र जो मैं झेलता था, उसके बारे में मुझे बात करनी होती है. अपने बड़े होने के वर्षों से जाति के मुद्दे ने सर्वत्र मेरा पीछा किया है, चाहे यह पीछा किया जाना जश्‍न में रहा हो या निराशा में रहा हो, इसलिए जब मैं निर्देशक बन गया तो मुझे इसके बारे में बात करनी ही थी. ऐसा कोई रास्‍ता नहीं है कि मैं सिर्फ अपनी रचनात्‍मक प्‍यास बुझाने के लिए फिल्‍म बना सकूँ.

उदाहरण हेतु एक पेड़ लीजिए, या एक कुँआ लीजिए या एक खेल मैदान. मेरे गाँव के अधिकांश लोग इन्‍हें सौंदर्य की वस्‍तु या आनंद के स्‍थल के रूप में देखते थे किंतु मैं नहीं देखता था. कारण कि समाज मुझे बताता रहा था कि यह मेरा नहीं था. कोई कहता कि मैं एक दलित होने के कारण पेड़ पर नहीं चढ़ सकता था या कुएं का इस्‍तेमाल नहीं कर सकता था. मैंने सोचना जारी रखा कि कुछ चीजें जिनका इस्‍तेमाल हर एक के लिए बहुत आम होता है, वे मेरे लिए सुलभ क्‍यों नहीं होती थींॽ इसलिए आज जब मैं एक पेड़ या कुएं को फिल्‍माता हूँ तो मैं इसे सिर्फ कलात्‍मक नज़र से नहीं देख सकता; यह मेरे लिए एक भिन्‍न कहानी पेश करता है. मैं उस कहानी को सुनाने के लिए ही फिल्‍म निर्माता बनना चाहता हूँ.

आप निश्‍चय ही, उस कहानी को वैकल्पिक सिनेमा के माध्‍यम से सुना सकते हैं, किंतु वाणिज्यिक, बड़ी सितारा फिल्‍मों में ऐसा करते हुए चुनौतियाँ क्‍या हैंॽ

जब रजनी सर मेरे पास आये तो मैं जानता था कि ‘अट्टाकथि’ (2012) और ‘मद्रास’ (2014) जैसी मेरी यथार्थवादी फिल्‍में देखकर ही उन्‍होंने मेरा चयन किया था; अत: मैं इस बात को लेकर बिल्‍कुल आग्रही था कि काबली (2016) और काला (2018) उसी शैली में हों जिस शैली में मैं बहुत सहज था. वाणिज्यिक सिनेमा बहुसंख्‍यकों से बात करता है और यही कारण है कि मैं यहाँ रहूँगा. लेकिन लोग खरी चीज की सराहना करते हैं. और अपनी फिल्‍मों के साथ मैं निश्‍चय ही कह सकता हूँ कि मैंने अपने दर्शकों के साथ संवाद कायम कर लिया है. यह मुझे आगे बढ़ाना जारी रखेगा.

क्‍या कोई अविस्‍मरणीय घटना है जिसने आपको राजनैतिक होने की ओर प्रेरित कियाॽ

– यह मेरी जीवन शैली का हिस्‍सा था. पड़ोसी का बच्‍चा मुझे स्‍कूल में एक ग्‍लास पानी इसी तरह से सौंपता था. या दुकानदार मेरे हाथ में खुल्‍ला न रखकर उसे काउंटर पर छोड़ देता था. ऐसी बहुत सारी घटनाएँ हैं. जो सवाल मुझे उद्वेलित किये रहता था, वह था कि हम (दलित), समाज के साथ एकीकृत क्‍यों नहीं थेॽ ऐसा संभव है कि यह सवाल दूसरों के लिए तुच्‍छ रहा हो, किंतु यह गहराई तक मुझे व्‍यथित करता था.

आप अक्‍सर अपने बचपन की चीजों के विषय में बोलते हैं. क्‍या 2019 में चीजें बहुत ही ज्‍यादा अलग नहीं हैंॽ

– कैसे भिन्न हैॽ हमने अभी एक प्रधानाध्‍यापिका के विषय में सुना है जो बच्‍चों से शौचालय साफ करने को बोलती थी. एक निर्णय के बारे में सुना है जिसने इलवरासन की मृत्‍यु को आत्‍महत्‍या बताया. हम कैसे कह सकते हैं कि चीजें बदल गई हैं. हम तो आरक्षण को ही नहीं पचा सकते, लेकिन हम कहते हैं कि ‘‘यह नई दुनिया है. आओ जाति को भूल जायें और बराबर हो जायें.’’ लोगों से शताब्दियों के दमन को भूल जाने के लिए कहना भी एक हिंसा है. हमें इस पर बहस करने की और क्षतिपूर्ति करने की जरूरत है. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम नहीं कह सकते कि चीजें बदल गई हैं.

उत्‍तरी मद्रास, मलेशिया, धारावी … आपकी फिल्‍में उन स्‍थानों पर आधरित होती हैं जहाँ दमित वर्गों के लोग होते हैं. घटना स्‍थल कैसे महत्‍वपूर्ण होता हैॽ

सब कुछ पृष्‍ठभमि ही होती है. अगर आप किसी गाँव में जाते हैं तो वहाँ के पोस्‍टरों, झंडों और मूर्तियों को देखें… वे वहाँ रहने वाले लोगों की कहानी कहते हैं. जब मैं किसी चरित्र को फिल्‍माता हूँ तो मैं विस्‍तार से (उसकी) पृष्‍ठभमि पर शोध करता हूँ क्‍योंकि मेरा मानना है कि यह अत्‍यधिक योगदान करती है. एक आकाशीय शॉट के बारे में विचार करें जहाँ आप एक गाँव देखते हैं जिसमें मुख्‍य इलाके से कुछ दूरी पर रहने वाले पचास परिवारों की एक बस्‍ती है. यह शॉट एकल दृश्‍य में ही सारी कहानी कह देता है.

आपके संवाद जबर्दस्‍त होते हैं, चाहे ‘गाँधी ड्रेस- अंबेडकर कोट’ वाला चुटकुला हो या ‘नीलम एंगल उरिमाइ’ हो. क्‍या आपको कभी यह डर लगता है कि वक्‍तव्‍य देने की बजाय ये पंचलाइन बनकर रह जायेंगे.

– मैं याद करता हूँ कि ‘गाँधी-अंबेडकर’ वाली पंक्ति लिखते हुए और रजनी सर के सामने नोट पैड रखते हुए मैं परेशान था कि वे क्‍या कहेंगे. वे चीख पड़े- ‘सुपर सर’, किंतु कुछ ऐसी चीज की तो मैं बिल्कुल भी उम्‍मीद नहीं कर रहा था. शॉट पूरा करने के बाद मैं शौचालय में गया और दिल खोलकर रोया. यह बहुत ही भावुक बात थी; मुझे लगा कि मैंने एक ताकतवर आवाज़ के साथ मुखर वक्‍तव्‍य दे दिया था.

आपकी फिल्‍मों में महिलाएँ बहुत मजबूत होती हैं. क्‍या हम शीघ्र ही महिला केंद्रित फिल्‍म की उम्‍मीद कर सकते हैंॽ

– जिन महिलाओं के इर्द-गिर्द मैं बड़ा हुआ, वे कामगार वर्ग की थीं. सिनेमा में जो मैंने देखा, वह कुछ ऐसा था जिसका अपने वास्‍तविक जीवन में मैंने कभी सामना नहीं किया था- दब्‍बूपन के साथ अपने पतियों के बगल में खड़ी महिलाएँ. मैंने अपने माता-पिता, मेरी जगह की महिलाओं और इस प्रकार के चरित्रों को कभी भी तमिल सिनेमा में फिल्‍मांकित नहीं देखा. यही कारण है कि मैं महिलाओं के लिए मजबूत चरित्र लिखता हूँ. मुझे दृढ़ता से लगता है कि अगर वे ज्‍यादा सशक्‍त हो जाती हैं तो वे समाज को सुधार सकती हैं. कारण कि ये वे ही हैं, जो बच्‍चों को बड़ा करती हैं, उन्‍हें बताती हैं कि किसके साथ घुलना-मिलना है और कैसे घुलना-मिलना है. मेरे पास पूरी तरह से महिला केंद्रित कुछ योजनाएँ हैं. पूर्णत: स्‍त्री के दृष्टिकोण से कही गई एक प्रेम कहानी है. मैं किसी दिन एक सुपर हीरो की कहानी फिल्‍माने की भी उम्‍मीद करता हूँ … वंडर वीमैन की तर्ज़ पर.

काला के क्‍लाइमेक्‍स में रंग के संदर्भ में महत्‍वपूर्ण उपपाठ था. आपके नाटकों में से एक का शीर्षक है मंजल. आप रंग के माध्‍यम से अवधारणाओं को समझाने का प्रयास करते हैं. क्‍या यह सफल होता हैॽ

– मेरा मानना है कि मैं सफल रहा हूँ. भारत के संदर्भ में रंग बहुत महत्‍वपूर्ण हैं. झंडे को लीजिए- कुछ लोग सोचते हैं कि केसरिया, हरा और सफेद क्रमश: हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. अंबेडकर समानता के व्‍यंजक एक रंग के रूप में नीले रंग की बात करते हैं. मैं इस सब को ‘काला’ के क्‍लाइमेक्‍स में रखना चाहता था. यह मूलत: एक लड़ाई वाला सिक्‍वेंस था, लेकिन मैं कुछ दार्शनिक सा सूचित करना चाहता था. वह यह कि अगर लोग इन तीन रंगों के नीचे एक साथ आ जाते हैं तो वे वर्चस्‍व के विरुद्ध संघर्ष कर सकते हैं और मेरा मानना है कि नीला चक्र इसी एकता को प्रतिबिंबित करता है.

पा. रंजीत, एक परिचय

  • चेन्नई में अवाडि के निकट एक गाँव में जन्‍म
  • चेन्‍नै के राजकीय ललित कला महाविद्यालय से स्‍नातक
  • 2012 में रोमांटिक कॉमेडी अट्टाकथि से निर्देशकीय आगाज
  • पहली गैर तमिल परियोजना- स्‍वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा पर आधारित जीवनी परक फिल्‍म पर काम जारी.
  • गंभीर रूप से प्रशंसित पेरियारम पेरुमाल (2018) का निर्माण
  • फिल्म फेयर अवार्ड फॉर बेस्ट डायरेक्टर (तमिल) के लिए नामित
  • नीलम कल्‍चर सेंटर नामक स्‍वयंसेवी संगठन के साथ काम करते हैं

इस इंटरव्यू को डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण, बिहार ने अनुवाद किया है.

दिल्‍ली को आज 10 साल बाद मिलने जा रही ये सुविधा, महिलाओं को होगा विशेष फायदा

0

नई दिल्ली। क्लस्टर स्कीम में आने वाली एक हजार स्टैंडर्ड फ्लोर बसों की पहली खेप के तहत मंगलवार को 25 नई बसों को मंगलवार से दिल्ली के सड़कों पर उतारा जाएगा. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राजघाट डिपो से हरी झंडी दिखाकर इन्हें रवाना करेंगे. इन बसों में हाइड्रोलिक लिफ्ट, पैनिक बटन, सीसीटीवी कैमरे व जीपीएस जैसी सुविधाएं हैं. परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने कहा कि दिल्ली में करीब दस साल के बाद नई बसें आई हैं. स्टैंडर्ड फ्लोर बसों की पहली खेप द्वारका सेक्टर 22 डिपो के लिए होगी.

खास हैं ये बसें

37 सीटों वाली इन बसों में 14 पैनिक बटन और 3 कैमरे लगे हैं. नारंगी रंग की इन बसों को क्लस्टर स्कीम के तहत चलाया जाएगा. अभी जो बसें चल रही हैं, उनमें 41 सीटें हैं. परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सभी बसों में दिव्यांगों को व्हील चेयर सहित चढ़ाने के लिए हाइड्रोलिक लिफ्ट लगाई गई है, इस वजह से 4 सीटें कम की गई हैं.

इसके अलावा बस में दोनों तरफ 7-7 पैनिक बटन हैं. इसके साथ ही तीन कैमरे लगाए गए हैं. 2 कैमरे बस के अंदर लगाए गए हैं और एक कैमरा बस की पीछे की तरह लगा है ताकि चालक को बस के पीछे आती गाड़ियों के बारे में पता चल सके. इससे सड़क हादसों को रोकने में मदद मिलेगी. इससे कंट्रोल रूम में स्क्रीन पर पता चल जाएगा कि कौन सी नंबर की बस है और कहां पर है.

दिल्ली सरकार की योजना 4 हजार बसें लाने की है, जिनमें एक हजार बसें हाइड्रोलिक लिफ्ट वाली हैं. इसके अलावा डीटीसी की एक हजार बसें आएंगी. एक हजार लो फ्लोर एसी सीएनजी बसें और एक हजार लो-फ्लोर एसी इलेक्ट्रिक बसें आनी हैं.

Read it also-वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को रैमॉन मैग्सेसे अवार्ड

आरक्षण को ले भागवत के बयान पर सियासत: मनोज झा ने दी चेतावनी- आग से मत खेलें

पटना। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण  पर चर्चा को लेकर दिए बयान पर बिहार में सियासत तेज हो गई है. इस मुद्दे पर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी जनता दल यूनाइटेड  ने विपक्षी महागठबंधन के साथ सुर मिलाया है. राष्‍ट्रीय जनता दल सांसद मनोज झा ने भागवत को आग से नहीं खेलने की चेतावनी दी है.

विदित हो कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा था कि आरक्षण के पक्ष व विपक्ष के लोगों के बीच सद्भावपूर्ण माहौल में बातचीत होनी चाहिए. आरक्षण पर चर्चा हर बार तीखी हो जाती है. हालांकि, इसपर समाज के विभिन्न वर्गों में सामंजस्य की जस्‍रत है.

मोहन भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि यह आग से खेलने की कोशिश है. ऐसा हुआ तो लोग सड़कों पर उतरेंगे और सौहार्दपूर्ण माहौल की चर्चा ही खत्म हो जाएगी. केवल बहुमत के आधार पर सभी बातों को नकारा नहीं जा सकता है. आरक्षण की मंजिल अभी दूर है. उन्‍होंने कहा कि संसदीय बहुमत और नैतिकता में काफी फर्क है. देश का संविधान नैतिकता व बहुमत की नोंक पर है.

मनोज झा ने कहा कि आरक्षण पर चर्चा में दिक्कत है, क्‍योंकि देश में सौहार्दपूर्ण माहौल है ही नहीं. पिछड़ों और आदिवासियों को अभी तक उनका हक ही नहीं मिला है. आंशिक तौर पर जो मिला है, उसकी भी समीक्षा की बात की जा रही हैं. .इन इरादों और इशारों पर आपत्ति है.

Read it also-Read Dalit Dastak August 2019 Issue दलित दस्तक का अगस्त 2019 अंक यहां पढ़िए

9वीं क्लास में देखा IAS बनने का सपना, ग्रेजुएशन पूरा होते ही पहली बार में क्रैक किया UPSC

सिविल सर्विस की परीक्षा में प्रतिष्ठा ममगाईं ने पहली बार में ही सफलता हासिल कर ली थी. प्रतिष्ठा हाई स्कूल और ग्रैजुएशन के दिनों से इस परीक्षा की तैयारी में जुट गईं थी. हालांकि उम्र कम होने की वजह से उन्हें परीक्षा में बैठने से पहले एक साल तक इंतजार करना पड़ा. प्रतिष्ठा कक्षा नवीं में थी जब उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें आईएएस बनना है.

दिल्ली की रहने वाली प्रतिष्ठा ममगाईं ने साल 2017 के सिविल सर्विस की परीक्षा में 50वीं रैंक हासिल की है. उन्हें ये सफलता ग्रैजुएशन पास करने के एक साल बाद ही प्राप्त हो गई थी. उनके मुताबिक कई छात्र हाई स्कूल या कॉलेज के दिनों से ही आईएएस बनाने का सपना देखते हैं, ऐसे में छात्रों को इस परीक्षा के लिए खुद को तैयार करना चाहिए. उन्होंने इस वीडियो के जरिए खास टिप्स शेयर किए हैं जिसके तहत कॉलेज में रहकर इस परीक्षा के लिए तैयारी कर सकते हैं.

इन बातों पर रखे खास ध्यान

  • सिलेबस के अनुसार पढ़े
  • बुकलिस्ट तैयार करें
  • परीक्षा की आवश्यकता को समझे
  • न्यूजपेपर पढ़ने की आदत डाले
  • आंसर राइटिंग की प्रक्रिया को समझे
  • अपनी योग्यिता को चेक करें

प्रतिष्ठा ममगाईं के मुताबिक यूपीएससी हर साल सिलेबस जारी करता है. ऐसे में अपनी तैयारी सिलेबस को देखते हुए करें. उसके बाद कैंडिडेट्स को एक बुक लिस्ट तैयार कर लेना चाहिए. जिसके तहत हर एक टॉपिक के लिए कौन सी बुक पढ़े. जैसे अगर इंटरनेट से पढ़ाई कर रहे हैं तो उसके लिए भी सोर्स मजबूत होना चाहिए है. ऐसे में अलग बुकलिस्ट तैयार कर लेने से चीजें आपको आसानी से मिलती जाएंगी.

कई बार यूपीएससी की परीक्षा को निकालने के लिए इसकी आवश्यकता को उम्मीदवार समझे. जैसे इस परीक्षा को निकालने के लिए अलग अलग पैटर्न होता है, जिसमें प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू सब शामिल होते हैं. ऐसे में तीनों की आवश्यकता के हिसाब से पढ़ें. सबसे महत्वपूर्ण बात कि न्यूजपेपर जरूर पढ़े. प्रतिष्ठा ममगाईं के मुताबिक भले ही आप तैयारी करें या न करें, लेकिन आपको न्यूजपेपर जरूर पढ़ना चाहिए. न्यूजपेपर देखना और न्यूजपेपर पढ़ना ये एक अच्छी आदत है. जो कि आपको बेहतर नागरिक बनाता है. अगर आपके अंकर ये आदत नहीं है तो बनाए.

इस परीक्षा में लोग किसी भी तरह तैयारी कर नहीं निकाल सकते हैं, बल्कि इसकी स्ट्रटजी को समझना होगा. तभी इसे क्रैक किया जा सकता है कि कई बार लोगों के आंसर राइटिंग के फॉर्मेट सही नहीं होते हैं. आपको अपने आंसर को पेश करने का तरीका आना चाहिए. आखिर में अपको अपनी योग्यिता की समझ होनी चाहिए. जैसे आप किस साल में इस परीक्षा को देने के लिए योग्य है. उसके हिसाब से तैयारी करें.

Read it also-बात अब आगे बढ़ चुकी है! अब वे CBSE में ही पढ़ेंगे।

रघुराम राजन ने मंदी पर मोदी सरकार को किया सतर्क

0

भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में जारी मंदी बहुत चिंताजनक है और सरकार को ऊर्जा क्षेत्र और ग़ैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तुरंत हल करना होगा.

उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में रघुराम राजन ने कहा कि भारत में जिस तरह जीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

उन्होंने मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के उस बयान का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने जीडीपी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाने की बात कही थी और अपना अनुमान पेश किया था.

साल 2018-19 में विकास दर 6.8 प्रतिशत हो गई थी जो 2014-15 के बाद सबसे कम है. कई निजी विशेषज्ञों और सेंट्रल बैंक का अनुमान है कि इस साल भी विकास दर 7 प्रतिशत के सरकारी अनुमान से कम रहने वाली है.

Read it also-श्रीनगर एयरपोर्ट में हिरासत में लिए गए सीताराम येचुरी