जाति और सामाजिक पूँजी

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“आप क्या जानते हैं यह काफी नहीं है, आप ‘किसे’ जानते हैं यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है, आपके जीवन के मुक़ाम को तय करने के लिए.”

भारत में आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग धन-दौलत, ज़मीन-ज़ायदाद, नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया सब जगह पिछड़े हैं, तो उसका एक प्रमुख कारण इन वर्गों के व्यक्तियों के पास सामाजिक पूँजी के मामले में कंगाल होना भी है. नान लिन अमेरिका के ड्युक विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र के प्रोफेसर ने एक अभूतपूर्व व्यापक परिवर्तनकारी “सामाजिक पूँजी” का सिद्धांत पेश किया, जिसे पूरी दुनिया में मान्यता मिली. नान लिन ने जबरदस्त तर्कों, तथ्यों, आंकड़ो द्वारा सिद्ध कर दिया कि “आप क्या जानते हैं और किसे जानते हैं, वह आपके जीवन और समाज में फर्क लाता है.” अर्थात यदि दो व्यक्ति एक समान योग्यता के हैं, मान लीजिये दोनों के पास बी. टेक. की डिग्री है, लेकिन एक व्यक्ति ‘किसे’ जानता है के मामले में आगे है, तो जीवन में भी वही आगे जाएगा.

कार्ल मार्क्स का कहना था कि उत्पादन के लिए पूँजी, श्रम, और ज़मीन की आवश्यकता होती है. बाद में इसमें ‘तकनीक’ को भी जोड़ दिया गया और हाल ही में इसमें ‘सामाजिक पूँजी’ को भी जोड़ा गया है. आज कल यह मान्यता है कि उत्पादन के लिए पूँजी, श्रम, ज़मीन, तकनीक और सामाजिक पूँजी आवश्यक है.

अब सवाल यह है कि आखिर सामाजिक पूँजी है क्या? सामाजिक पूँजी मोटे तौर पर सामाजिक समूहों के उन कारकों को संदर्भित करती है जिसमें पारस्परिक संबंधों, साझा पहचान, साझा समझ, साझा मानदंड, साझा मूल्यों, आपसी विश्वास, आपसी सहयोग और पारस्परिकता अर्थात एक दूसरे के दुःख सुख में काम आना जैसी चीजें शामिल हैं. सामाजिक पूँजी में सभी सामाजिक नेटवर्क (जिन लोगों को व्यक्ति जानता है) और इन नेटवर्कों से उत्पन्न होने वाले झुकाव व भाव, जो एक दूसरे के लिए कुछ करने के लिए उत्पन्न होते हैं (पारस्परिकता के मानदंड) शामिल हैं. आपसी विश्वास, पारस्परिकता, सूचना का प्रवाह और नेटवर्क से जुड़े सहयोग उन लोगों के लिए मूल्य बनाता है जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

पूँजी क्या है? बाज़ार में अपेक्षित रिटर्न के साथ संसाधनों के निवेश को पूँजी कहते हैं. पूँजी एक संसाधन है जिसे लाभ के लिए निवेश किया जाता है. एक आर्थिक पूँजी होती है जो धन दौलत है, इसे सभी जानते हैं. दूसरी मानवीय पूँजी होती है जो किसी व्यक्ति की बुद्धिमता, ज्ञान, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और कौशल से संबधित होती है. तीसरी सांस्कृतिक पूँजी होती है जो उसके पहनावे, बोलने के लहज़े, शब्दज्ञान और स्वयं को व्यक्त करने पर निर्भर करती है. चौथी सामाजिक पूँजी होती है, जो लक्ष्यों को प्राप्त करने में सामाजिक संपर्क और सामाजिक संबंधों का उपयोग करने में काम आती है. जहाँ मानवीय पूँजी कौशल, ज्ञान, प्रशिक्षण और शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की गतिविधियों में एक निवेश का प्रतिनिधित्व करता है, वहीँ दूसरी ओर इसके विपरीत सामाजिक पूँजी सामाजिक रिश्तों में एक निवेश है जिसके माध्यम से अपने सामाजिक समूह के अन्य व्यक्तियों के संसाधनों का दोहन किया जा सकता है. आर्थिक पूँजी के मुकाबले सामाजिक पूँजी की विशेषता यह है कि आर्थिक पूँजी उपयोग से कम हो जाती है जबकि सामाजिक पूँजी उपयोग से कम नहीं होती. बल्कि सामाजिक पूँजी के विषय में यह माना जाता है कि यदि इसका उपयोग न किया जाए तब यह कम हो जाती है. या तो आप इसे इस्तेमाल करें वरना आप इसे खो देंगे. इस तरह से यह मानवीय पूँजी की अवधारणा के समान है. मानवीय पूँजी का भी यदि उपयोग न किया जाय तो व्यक्ति इसे खो देता है. मिसाल के तौर पर यदि कोई व्यक्ति डॉक्टरी की शिक्षा प्राप्त करके, प्रैक्टिस न करे तो वह अपनी अर्जित मानवीय पूँजी को खो देगा.

सामाजिक पूँजी के स्रोत क्या हैं? सामाजिक पूँजी का चरित्र अमूर्त है. जहाँ आर्थिक पूँजी लोगों के बैंक खाते में होती है, मानवीय पूँजी उनके सर के अन्दर होती है, वहीँ सामाजिक पूँजी व्यक्ति के संबंधों की संरचना में होती है. सामाजिक पूँजी रखने के लिए एक व्यक्ति को दूसरे से सम्बंधित होना आवश्यक है. यह अन्य लोग हैं, न कि वह स्वयं, जो उसके लाभ के वास्तविक स्रोत हैं.

सामाजिक पूँजी के तंत्र क्या हैं? सामाजिक पूँजी के तीन तंत्र हैं. एक है संबंधन (बोन्डिंग), दूसरा है सेतुकरण (ब्रिजिंग) और तीसरा है जुड़ना (लिंकिंग). संबंधन एक ऐसा सम्बन्ध है जो एक व्यक्ति का परिवार से, या करीबी दोस्तों आदि से होता है. इसमें अंतरंगता (इंटिमेसी) बहुत होती है. यह सामाजिक पूँजी का सबसे अहम और मजबूत रूप है. संबंधन लोगों के समरूप, समरस, सजातीय (होमोजनस) समूहों के बीच सामाजिक नेटवर्क से बनता है. यह नस्ल, जाति या संस्कृति जैसी समान पहचान (हम जैसे लोग) की भावना पर आधारित सम्बन्ध है.

सेतुकरण (ब्रिजिंग) का तात्पर्य सामाजिक रूप से विषम, विजातीय, विविध, पंचमेल (हेटेरोजनस) समूहों के बीच सामाजिक नेटवर्क से है. संपर्क जो पहचान की एक साझा भावना से परे है, उदहारण के तौर पर दोस्त, सहकर्मी और सहयोगी. सेतुकरण पूँजी दोस्तों के बीच का रिश्ता है और इसकी शक्ति संबंधन की शक्ति से कमतर है.

जहाँ सजातीय समूह, अपराधिक माफ़िया गिरोह संबंधन सामाजिक पूँजी का निर्माण करते हैं वहीँ सुबह की सैर के साथी, क्लब के सदस्य आदि सेतुकरण पूँजी का निर्माण करते हैं. जुड़ना, संपर्क की सामाजिक पूँजी एक व्यक्ति और एक सरकारी अधिकारी या अन्य निर्वाचित नेता के बीच का सम्बन्ध है. सामाजिक सीढ़ी के ऊपर या नीचे लोगों या समूहों के जुड़ाव या संपर्क (लिंकिंग) को जुड़ाव सामाजिक पूँजी कहते हैं.

किसी भी देश या समाज की तरक्की के लिए यह आवश्यक है कि उसकी आर्थिक, मानवीय पूँजी के साथ-साथ उसकी सामाजिक पूँजी भी बढे. इससे लोकतंत्र मजबूत होता है और भाईचारा, बंधुत्व की भावना बढ़ती है. यह तभी संभव है जब विभिन्न संबंधन सामाजिक समूहों के बीच में सेतुकरण हो. सेतुकरण के बिना, संबंधन समूह बाकी समाज से अलग-थलग और बेदख़ल हो जाता है. सेतुकरण की प्रक्रिया से ही किसी भी देश या समाज की सामाजिक पूँजी में वृद्धि होती है. यदि किसी देश या समाज में संबंधन की प्रक्रिया मजबूत है लेकिन सेतुकरण की प्रक्रिया कमज़ोर है तो उस देश या समाज की सामाजिक पूँजी क्षीण और कमज़ोर हो जाती है. हमारे देश में जातिवाद के चलते सेतुकरण कम होता है और हमारा प्यारा भारत सामाजिक पूँजी के मामले में भी गरीब है.

अब सवाल ये है कि सामाजिक पूँजी कैसे काम करती है? सामाजिक नेटवर्क किसी व्यक्ति द्वारा किये गए कार्य के परिणामों को कैसे बढाते हैं या फिर तुलनात्मक रूप से कैसे बेहतर परिणाम देते हैं? इसके चार तरीके हैं. एक, सूचना का प्रवाह. आधुनिक युग को सूचना क्रांति का युग कहा जाता है और जिसे ‘अन्दर की बात’ पता चल जाए वो बादशाह है. मजबूत ताक़तवर लोगों के समूह के सदस्यों को बेहतर और काम की सूचनाएं प्राप्त हो जाती हैं. व्यक्ति को बेहतर अवसरों की जानकारी प्राप्त हो जाती है. दूसरा तरीका है कि निर्णय लेने वालों से बेहतर सम्बन्ध किसी रोज़गार की भर्ती या अधिकारियों को प्रभावित करके ठेके, पदोन्नति का लाभ मिल जाता है. तीसरा किसी व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध, यानि उसकी सामाजिक पूँजी की व्यापारिक घराने या कंपनी के लिए उपयोगी है. उदहारण के लिए किसी बड़े नौकरशाह की संतान किसी भी व्यापारिक कंपनी के लिए उपयोगी है क्योंकि वो अन्दर की बात पता लगा सकता है या अपने प्रभाव से काम के निर्णय करा सकता है. ऐसे सामाजिक पूँजी वाले उम्मीदवारों को बेहतर वेतन या पद दिया जाता है. चौथा लाभ स्वास्थ्य के क्षेत्र में होता है, सामाजिक सम्बन्ध भावनात्मक समर्थन प्रदान करते हैं और यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है.

हमारे देश में सामाजिक पूँजी के मामले में जातिगत विषमता बहुत अधिक है. यहाँ जातीय संबंधन वाले सामाजिक समूह बनते हैं जिनका बाकी समूहों से सेतुकरण नहीं होता. यही कारण है कि मारवाड़ियों का व्यापार, उद्यमिता, धन दौलत में प्रभुत्व है. ब्राह्मण समाज के लोगों का मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही में प्रभुत्व है. समाज शास्त्री पिएर्रे बौर्दिएउ का कहना है कि सामाजिक पूँजी सभी नागरिकों को समान रूप से उपलब्ध नहीं है. कुलीन वर्ग या द्विज जाति के लोगों को सामाजिक पूँजी विरासत में मिलती है. सूरत के हीरा व्यापारी, तमिलनाडु के गोउंदर जिनका भारतीय होजरी के व्यापार पर नब्बे प्रातिशत कब्ज़ा है इसके उदहारण हैं.

वार्ष्णेय ने जातीय और सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक पूँजी के शोध पर पाया कि अंतरा-जातीय, अंतरा-सांप्रदायिक संबंधन के चलते अंतर-जातीय या अंतर-संप्रदाय समूह नहीं बन पाते या उनमें सेतुकरण नहीं हो पाता. ऐसे में जातीय हिंसा या सांप्रदायिक हिंसा की संभावना भी बहुत बढ़ जाती है. अंतर-जातीय और अंतर-सांप्रदायिक समूह बनें तो विभिन्न जातियों व सम्प्रदायों में संचार बढेगा, झूठी अफ़वाहें नहीं फैलेंगी और प्रशासन को अपना काम करने तथा शांति, सुरक्षा और न्याय करने में मदद मिलेगी.

बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था कि भारतीय समाज एक ऐसी मीनार है जिसमें चार मंज़िल और एक तहख़ाना है. इसमें ऊपर से नीचे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और दलित रहते हैं. इस मीनार में कोई सीढियां नहीं हैं. जो जिस मंज़िल पर जन्मा है वहीँ मरेगा भी. शूद्रों और दलितों की मंज़िल में तो हजारों कोठरियां हैं जिनमें कोई दरवाजा, खिड़की या रौशनदान नहीं है. ऐसे में शूद्र और दलित एक दूसरे से आपस में भी कट जाते हैं. ऐसी स्थिति में देश में सेतुकरण के जरिये सामाजिक पूँजी के वृद्धि की संभावना बहुत कम है. आवश्यकता है कि जातियों का विनाश हो और सामाजिक पूँजी बढे. तभी भारत उन्नत देशों की ज़मात में शामिल हो पायेगा.

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अनिल जयहिंद

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