माना आप बहुत सयाने हैं, लेकिन थोड़ा मनुष्य बनिए

  • अभिषेक श्रीवास्तव
माना आप बहुत सयाने हैं। आप जानते हैं कि मौत यहां भी है और वहां भी, इसलिए गांव लौट जाना ज़िन्दगी की गारंटी नहीं है। आप ठीक कहते हैं कि गांव न जाकर शहर में जहां एक आदमी अकेला मरता, वहीं उस आदमी के गांव चले जाने से कई की ज़िन्दगी खतरे में पड़ सकती है। सच बात है। तो क्या करे वो आदमी? गांव से दूर परदेस में पड़ा पड़ा हाथ धोता रहे? दूर दूर रहे अपनों से? मास्क लगाए? गरम पानी पीये? लौंग दबाए? क्या इससे ज़िन्दगी बच जाएगी? वैसे, आपको खुद इस सब पर भरोसा है क्या? दिल पर हाथ रख कर कहिए वे लोग, जिन्हें एनएच-24 पर लगा रेला आंखों में दो दिन से चुभ रहा है। आप मास्क लगाए हैं, घर में कैद हैं, सैनिटाइजर मल रहे हैं, कुण्डी छूने से बच रहे हैं, गरम पानी पी रहे हैं। ये बताइए, मौत से आप ये सब कर के बच जाएंगे इसका कितना भरोसा है आपको? होगी किसी की स्टैंडर्ड गाइडलाइन है, लेकिन दुश्मन तो अदृश्य है और उपचार नदारद। कहीं आप भी तो भ्रम में नहीं हैं? आपका भ्रम थोड़ा अंतरराष्ट्रीय है, वैज्ञानिक है। हाईवे पर दौड़ रहे लोगों का भ्रम भदेस है, गंवई है। आप खुद को व्यावहारिक, समझदार, पढ़ा लिखा वैज्ञानिक चेतना वाला शहरी मानते हैं। उन्हें जाहिल। बाकी उस शाम बजाई तो दोनों ने थी – आपने ताली, उन्होंने थाली! इतना ही फर्क है? बस? भवानी बाबू आज होते तो दोबारा लिखते: एक यही बस बड़ा बस है / इसी बस से सब विरस है! तब तक तो आप और वे, सब बारह घंटे का खेल माने बैठे थे? जब पता चला कि वो ट्रेलर था, खेल इक्कीस दिन का है, तो आपके भीतर बैठा ओरांगुटांग निकल कर बाहर आ गया? आपके नाखून, जो ताली बजाते बजाते घिस चुके थे और दांत जो निपोरने और खाने के अलावा तीसरा काम भूल चुके थे, वे अपनी और गांव में बसे अपनों की ज़िन्दगी पर खतरा भांप कर अचानक उग आए? लगे नोंचने और डराने उन्हें, जिन्हें अपने गांव में ज़िन्दगी की अंतिम किरन दिख रही है! कहीं आपको डर तो नहीं है कि जिस गांव घर को आप फिक्स डिपोजिट मानकर छोड़ आए हैं और शहर की सुविधा में धंस चुके हैं, वहां आपकी बीमा पॉलिसी में ये लाखों करोड़ों मजलूम आग न लगा दें? आप गाली उन्हें दे रहे हैं कि वे गांव छोड़कर ही क्यों आए। ये सवाल खुद से पूछ कर देखिए। फर्क बस भ्रम के सामान का ही तो है, जो आपने शहर में रहते जुटा लिया, वे नहीं जुटा सके। बाकी मौत आपके ऊपर भी मंडरा रही है, उनके भी। फर्क बस इतना है कि वे उम्मीद में घर की ओर जा रहे हैं, जबकि आप उनकी उम्मीद को गाली देकर अपनी मौत का डर कम कर रहे हैं। सोचिए, ज़्यादा लाचार कौन है? सोचिए, ज़्यादा अमानवीय कौन है? सोचिए ज़्यादा डरा हुआ कौन है? सोचिए, और उनके बारे में भी सोचिए जिनके पास जीने का कोई भरम नहीं है। जिन्होंने कभी ताली नहीं पीटी, जो मास्क और सैनिटाइजर की बचावकारी क्षमता और सीमा को समझते हैं, और जिनके पास सुदूर जन्मभूमि में कोई बीमा पॉलिसी नहीं है, कोई जमीन जायदाद नहीं है, कोई घर नहीं है। मेरी पत्नी ने आज मुझसे पूछा कि अपने पास तो लौटने के लिए कहीं कुछ नहीं है और यहां भी अपना कुछ नहीं है, अपना क्या होगा? मेरे पास इसका जवाब नहीं था। फिलहाल वो बुखार में पड़ी है। ये बुखार पैदल सड़क नापते लोगों को देख कर इतना नहीं आया है, जितना उन्हें गाली देते अपने ही जैसे तमाम उखड़े हुए लोगों को देख कर आया है। दुख भी कोई चीज है, बंधु! मनुष्य बनिए दोस्तों। संवेदना और प्रार्थना। बस इतने की दरकार है। एक यही बस, बड़ा बस है…। वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से  #CoronaDiaries

कोरोना, सत्ता और बेरोजगारी

वो तस्वीरें आपके सामने भी घूम रही होंगी, जो पिछले तीन दिनों से खबरों और खासकर सोशल मीडिया के जरिए देश भर में फैल चुका है। जी हां, बेतहाशा अपने घरों की ओर भागते लोगों के झुण्ड की तस्वीरें। इन्हें आप गरीब कह लिजिए, मजबूर कह लिजिए, लाचार कह लिजिए, या फिर आप थोड़ा सोचने-समझने की ताकत रखते हैं तो इन्हें ‘इंसान’ मान लिजिए। आज जब ये सड़क पर हैं तो कई तरह की बहसें चल रही हैं। बहस दो तरह की है। एक वर्ग इस पक्ष का है कि इन्हें घरों में रहना चाहिए, जैसा कि सरकार ने कहा था। जबकि दूसरा वर्ग वह है, जो इन्हें सड़कों पर देख कर चिंतित है और अपने गांव की सरहद पर लट्ठ लेकर बैठा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लॉकडाउन की घोषणा के बाद ही पुलिस सक्रिय हो गई थी, तो आखिर इतने सारे लोग सड़कों पर कैसे आ गए। क्या यह अचानक हो गया कि लाखों लोग दिल्ली-यूपी की सीमा पर दिखने लगे। क्या ये एकदम से अपने घरों से निकल कर सीधे बार्डर पर पहुंच गए? अगर सरकार इतनी सचेत थी तो आखिर इन लोगों को सड़कों पर आने से रोका क्यों नहीं गया?
आनंद विहार पर उमड़ा लोगों का हुजूम
इस भगदड़ की एक गुनहगार बिहार और उत्तर प्रदेेश की सरकारें भी है। क्योंकि दिल्ली-यूपी बार्डर पर सड़कों पर जिनका हुजूम दिख रहा है, वह इसी दोनों राज्यों के हैं। जी हां, ये वही पूर्वांचली हैं, जो दिल्ली की सियासत चलाते हैं। ये दिल्ली में जब जिसे चाहें गद्दी पर बैठा दें, जब चाहें कान पकड़ कर उठा दें। दिल्ली में हर चौथा-पांचवा वोटर पूर्वांचल का है। दिल्ली में पूर्वांचल के 35 फीसदी वोटर हैं। दिल्ली के 70 विधानसभा सीटों पर पूर्वांचल के मतदाता 20-60 प्रतिशत तक हैं। पूर्वांचल के लोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा विस्थापित होकर पहुंचते हैं। आज सड़कों पर भी वही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर उनका राज्य उन्हें आज तक कोई रोजगार क्यों नहीं दे पाया। या फिर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड की सरकारों ने अपने राज्य के लोगों का पलायन रोकने के लिए अब तक कोई उपाय क्यों नहीं किया। और इसका कसूर किसी एक नेता या एक पार्टी का नहीं है, बल्कि इसकी जिम्मेदार सभी पार्टियां और सभी नेता हैं। बिहार में कांग्रेस से लेकर गरीबों का मसीहा कहे जाने वाले लालू यादव की भी सरकार रही, तो झारखंड में भी कई बार आदिवासी मुख्यमंत्री रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश की सत्ता पर मायावती, मुलायम और अखिलेश यादव भी बैठें। इसलिए सिर्फ कांग्रेस या भाजपा को कोसने भर से काम नहीं चलेगा। सवाल इन लोगों पर भी उठते हैं। और उनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बनती थी, क्योंकि शहरों से गांवों की ओर पलायन सबसे ज्याद पलायन कमजोर वर्गों के लोग ही करते हैं। लेकिन आज जिस तरह गरीब अपने गांव और शहर के बीच बिना छत और रोटी के सड़कों पर मौजूद है, उसमें इन तमाम बहुजन नेताओं पर भी उंगली उठती है। एनएसओर के आंकड़े के मुताबिक बिहार में बेरोजगारी दर 8.3 फीसदी है। उत्तर प्रदेश में तो भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सारे रिकार्ड ही तोड़ दिए। योगी के सीएम बनने के बाद पिछले दो सालों में यहां 12.5 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं। प्रदेश के लेबर डिपार्टमेंट की ओर से संचालित ऑनलाइन पोर्टल के मुताबिक 7 फरवरी 2020 तक करीब 33.93 लाख लोग बेरोजगार रजिस्टर्ड हुए हैं। और झारखंड में हर पांच युवा में से एक युवा बेरोजगार है। लोगों के सामने यह आपदा भले ही आचनक आई है। लेकिन केंद्र सरकार को पता था कि वह लॉक डाउन करने जा रही है।ऐसे में उसे सारे इंतजाम पहले से करने चाहिए थे। ताकि लोग घरों से न निकले। तो राज्य सरकारों को भी सोचना चाहिए कि आखिर वह आज भी अपने लोगों को स्थानीय तौर पर अपने राज्यों में ही रोजगार दिलाने में क्यों विफल रही है। सवाल के घेरे में केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक हैं। कांग्रेस से लेकर भाजपा तक है। तो सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेता भी। पिस रहा है तो सिर्फ गरीब।

गया बुद्ध विहार से कोरोना पीड़ितों के लिए एक करोड़ की मदद

देश के तमाम धार्मिक स्थलों से कोरोना वायरस पीड़ितों के लिए मदद मिलनी शुरू हो गई है। पटना के हनुमान मंदिर से लेकर कुछ अन्य धार्मिक स्थलों से भी कोरोना पीड़ितों के लिए आर्थिक मदद का चेक दिया गया है। इसी क्रम में गया के जिलाधिकारी द्वारा महाबोधि महाविहार का एक करोड़ रुपये कोरोना पीड़ितों के लिए दिया गया है। देश के बुद्ध विहारों से दी जाने वाली यह सबसे बड़ी रकम होती है। गया का जिलाधिकारी ही महाबोधि महाविहार का अध्यक्ष होता है। इसके साथ ही वह विष्णु पाद मंदिर का भी अध्यक्ष होता है। सारनाथ स्थित धम्मा लर्निंग सेंटर के अध्यक्ष भंते चन्दिमा ने इससे संबंधित सूचना साझा करते हुए मांग किया है कि चूंकि गया का जिलाअधिकारी महोबोधि महाविहार और विष्णु पाद मंदिर दोनों का अध्यक्ष होता है। ऐसे में जिलाधिकारी को नैतिक आधार पर विष्णु पाद मंदिर का पैसा भी राष्ट्रहित में दान करना चाहिए। यहां सवाल जिलाधिकारी की मंशा पर उठाए जा रहे हैं कि आखिर जिलाधिकारी अपनी अध्यक्षता वाली एक संस्था के पैसे तो दान में दे रहे हैं, जबकि दूसरी संस्था का पैसा आखिर क्यों नहीं निकाल रहे।
  • राज कुमार

कोरोना की भगदड़ में ठहर कर इनकी तकलीफ भी देखिए

आज लॉकडाउन का तीसरा दिन था। उसके पहले भी मैग्जीन की तैयारियों के कारण तीन दिन ऑफिस नहीं जा पाया था। इसी बीच प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा कर दी। दो दिनों तक मैं भी परेशान रहा। इंसान हूं, डर तो सबको लगता है। लेकिन लगा कि निकलना चाहिए। देखना चाहिए कि शहर में क्या हो रहा है। वैसे भी लॉक डाउन के बाद से ही जिस तरह अपने गांव की ओर पैदल चल दिए लोगों की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे थे, वह परेशान करने वाले थे, सो मैं निकल पड़ा। नोएडा से दिल्ली की ओर चला। पहले यूपी की सीमा पर पुलिस ने रोका। फिर मीडिया पर गाड़ी लिखी देख जाने दिया। थोड़ा आगे बढ़ते ही दिल्ली की सीमा आ गई। पुलिस ने फिर रोका। फिर वही प्रक्रिया। इस बीच नोएडा की सीमा पर एक चीज ने ध्यान खींचा। एक के बाद एक तीन बैरिकेटिंग थी। उस पर बारी-बारी से डॉक्टर, एंबुलेंस और मीडिया लिखा था। यानी कि इन्हीं तीनों की गाड़ियों को जाने की इजाजत दी जाएगी। यहां से निकल कर मयूर विहार, त्रिलोकपुरी और फिर पटपड़गंज से गुजरना हुआ। जैसा कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की थी, बसें चल रही थी। छिटपुट ऑटो भी चल रहे थे, लेकिन ज्यादातर सड़क किनारे खड़े थे। जरूरी दुकाने जैसे किराना, फल, सब्जी और दवा की दुकाने खुली थी। सड़क पर लोग भी थे। बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन बहुत कम भी नहीं। कह सकते हैं कि सड़कों पर चहल-पहल थी, सड़कें सुनसान नहीं थी।
कोरोना के भय से गांवों से पलायन करते लोग
मदर डेयरी पहुंचने के बाद मैं एन.एच 24 पर चढ़ गया। दिल्ली का एक प्रमुख हाईवे, जो दिल्ली को उत्तर प्रदेश से जोड़ता है। कुछ साल पहले ही प्रधानमंत्री ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे का उद्घाटन किया था, तब से इस सड़क की किस्मत बदल गई है। आज के पहले जब भी इस सड़क से गुजरा दर्जनों गाड़ियां एक साथ सरपट भागती दिखीं। आज यह सुनसान थी। थोड़ी दूर आगे बढ़ते ही चौंकाने वाला नजारा दिखने लगा। सर और पीठ पर बैग टांगे लोग पैदल चल दिए थे। गाड़ी रोककर एक लड़के से पूछा कि कहां जा रहे हो। बोला- बलीरामपुर। आप सोचिए कि उत्तर प्रदेश का बलीरामपुर जो दिल्ली से 700 किलोमीटर है, वहां वह युवक पैदल जाएगा। उसने बताया कि वह 10 दिनों में पहुंच पाएगा। उसकी बातों को सुनकर मैं परेशान था। एक बार उसकी जगह खुद को रखकर उसका दर्द महसूस किया। वहां से मैं आनंद विहार की ओर चल पड़ा। लोगों का रेला लगा था। जत्थे के जत्थे लोग पैदल चल पड़े थे। गाजीपुर के पास हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के पेट्रोल पंप पर रुक कर वहां के स्टॉफ से बात की। उन्होंने बताया कि हर रोज 4-5 हजार लोग यहां से गुजरते हैं। चौबीसो घंटे। कोई पानीपत से आ रहा है, तो कोई पंजाब बार्डर से आ रहा है। उनसे बात ही कर रहा था कि सामने से तकरीबन दो सौ लोगों का रेला आता दिखा। मैंने उनके साथ चलते हुए पूछा- क्यों जा रहे हैं घर? सरकार ने तो रुकने को बोला है। उन्होंने कहा- यहां बिना रोटी के कैसे रहें? मैंने पूछा कि सरकार खाने को तो दे रही है। उनका जवाब था कि हमें तो तीन दिनों में नहीं मिला। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। ये उनका दर्द था, जो जुबान से निकल रहा था और उनके चेहरे पर भी साफ दिख रहा था। वो दर्द मुझ तक भी पहुंचा। लेकिन यहीं इंसान लाचार हो जाता है और सरकार की ओर ताकने लगता है। क्योंकि एक दिन में हजारों लोगों को सुविधा मुहैया कराना किसी अकेले इंसान के बस की बात नहीं होती। और यहीं सरकार बड़ी हो जाती है और इंसान बौना। लेकिन लोगों का हाल देख कर लगता है कि बड़ी सरकार अभी तक सिर्फ घोषणाओं तक ही सीमित है, उसकी घोषणाएं जमीन पर पूरी तरह नहीं उतरी है।  

वाह, मुख्यमंत्री हो तो हेमंत सोरेन जैसा, खुद देख लिजिए

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन
मुख्यमंत्री हो तो हेमंत सोरेन जैसा। जी हां, हेमंत सोरेन। झारखंड के मुख्यमंत्री। लॉक डाउन के बाद हेमंत सोरेन जिस तरह देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे झारखंड के लोगों की सहूलियत के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं वह काबिले तारीफ है। भरोसा न हो तो आप उनके ट्विटर हेंडल @HemantSorenJMM पर जाकर देख लिजिए। पिछले दो दिनों में हेमंत सोरेन ने जिस तरह ट्विटर का इस्तेमाल कर अपने राज्य के लोगों की मदद के लिए अलग-अलग राज्य के मुख्यमंत्रियों से मदद मांगी है और जिस तरह अन्य मुख्यमंत्रियों ने इसको तवज्जो दी है, वह काबिले तारीफ है। और आपदा की घड़ी में देश के एक साथ होने की बात पर मुहर लगाती है। जिन तीन मुख्यमंत्रियों से हेमंत सोरेन ने संवाद किया वो हैं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। इनमें से कोई भी मुख्यमंत्री भाजपा शासित प्रदेश का नहीं है। यह सोशल नेटवर्किंग शुरू हुई 24 मार्च को, जब झारखंड के गोमिया विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. लम्बोदर महतो ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक पत्र लिखकर अपने विधानसभा क्षेत्र के 63 श्रमिकों के नवी मुंबई के एक साईं मंदिर में फंसे होने की जानकारी दी, और उन्हें सुरक्षित झारखंड वापस लाने की अपील की। विधायक लम्बोदर महतो ने इस चिट्ठी को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ट्विट भी किया। इसके जवाब में हेमंत सोरेन ने विधायक को लॉकडाउन के कारण सभी मजदूरों को वहीं पर रहने का सुझाव दिया। साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को ट्विट में टैग करते हुए नवी मुंबई में फंसे झारखंड के श्रमिकों की मदद करने का आग्रह किया। इसके जवाब में उद्धव ठाकरे ने हेमंत सोरेन को इस बात के लिए शुक्रिया कहा कि हेमंत सोरेन ने जो जहां है, उसको वहीं रहने की सलाह दी। साथ ही संबंधित जिलाधिकारी को झारखंड के फंसे श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें जरूरी सुविधाएं देने का निर्देश दिया। ऐसा ही एक मामला ओडिसा में हुआ। ओडिसा के कटक स्थित एक सीमेंट प्लांट में झारखंड के डंडा गढ़वा के 14 मजदूरों के फंसे होने की सूचना वीरेन्द्र चौधरी ने ट्विटर के जरिए हेमंत सोरेन तक पहुंचाई। और खाने-पीने की चीजों के साथ ही उनके रहने को लेकर दिक्कतों की बात कही। हेमंत सोरेन ने तुरंत इस बारे में ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को ट्विट कर मदद मांगी। तो एक अन्य मामले में हेमंत सोरेन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी ट्विट कर झारखंड के लोगों की मदद करने का आग्रह किया, जिसके जवाब में केजरीवाल ने हेमंत सोरेन को ट्विट किया कि वह कोशिश कर रहे हैं कि दिल्ली में कोई भी व्यक्ति भूखा न मरे। हेमंत सोरेन ने देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को ट्विट कर कहा है कि झारखंड सरकार हर किसी की यथासंभव मदद करेगी। देश के समस्त मुख्यमंत्रियों से आग्रह है कि वे झारखंडियों की मदद करें। सोशल मीडिया के जरिए सिर्फ हेमंत सोरेन ही एक्टिव नहीं है, बल्कि अपने घर से दूर देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे तमाम लोग अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों से ट्विटर के जरिए संपर्क कर रहे हैं, जिसके जवाब में उनकी मदद भी की जा रही है। जहां डॉक्टर, प्रशासन और सरकार लोगों की मदद को सामने आ रहे हैं, तो वहीं सोशल मीडिया भी कोरोना की जंग में एक महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है। फिलहाल जरूरी है, देश के सभी मुख्यमंत्रियों और केंद्र सरकार को एक साथ एक सूत्र में बंध कर काम करने की। सबका साथ ही कोरोना को हरा सकता है।

गरीब पर भारी कोरोना की आर्थिक सुनामी

– प्रमोद मीणा किसी भी प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा की तरह कोरोना वायरस के हमले से उत्पन्न स्वास्थ संकट की सबसे ज्यादा मार गरीब तबके पर पड़ने वाली है। कोरोना के संचरण और संक्रमण पर रोक लगाने के लिए जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने 25 मार्च से देश भर में 21 दिनों के लिए घरबंदी की घोषणा की है, उससे कोरोना वायरस की कमर टूटे या न टूटे गरीब की कमर जरूर टूटने वाली है। वैसे इस घोषणा से पहले ही देशभर में विभिन्न राज्य सरकारें पहले ही अपने-अपने यहाँ आंशिक या पूर्ण नाकेबंदी कर चुकी हैं, यातायात और परिवहन साधनों पर रोक लगाई जा चुकी है, कारखानों-कार्यालयों और दुकानों को बंद कर दिया गया है। अत: आर्थिक संकट के जो बादल पहले से ही मंडरा रहे थे, प्रधानमंत्री की इस घोषणा के उपरांत वे और ज्याादा गहरा गये हैं। इस आर्थिक संकट का सबसे ज्यादा असर पड़ने वाला है – अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगाररत कामगार वर्ग के ऊपर। अपने घरों से सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की दूरी पर मेहनत-मजदूरी कर रहे दलित-आदिवासी-पिछड़े लोग आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से खुद को असहाय पा रहे हैं। गलियों-कॉलोनियों और सड़कों पर ठेले-खुमचे लगा अपना जीवन-यापन करने वाले छोटे-छोटे विक्रेताओं के घरों में मातम सा पसर गया है। महानगरों और दूसरे बड़े शहरों में कामबंदी होने के कारण आप्रवासी कामगार तबका बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड-छत्तीसगढ़ सरीखे निर्धन राज्योंं में अपने घरों की ओर वापस लौटने को मजबूर हुआ है किंतु रेल-सड़क का चक्का जाम कर दिए जाने के कारण ये लोग आसमान से गिरे खजूर पर अटके की स्थिति में बीच में ही फंसकर रह गए हैं। विडम्बना देखिए कि जो आप्रवासी कामगार अपनी कर्मभूमि बन चुके दूसरे राज्यों से अपनी जन्मभूमि रहे राज्योंं में जैसे-तैसे वापस भी लौटे हैं, तो उनके साथ सामाजिक अस्पृश्यता का व्यवहार किया जा रहा है। कोरोना के डर से वे अपने ही घर-समाज में अछूत बन जाने को अभिशप्त हैं। इन आप्रवासी कामगारों के प्रति सरकार और समाज का रुख जिस प्रकार वर्गीय पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है, वह भी ध्यातव्य है। एक ओर इन आप्रवासी कामगारों को वायरस के संभावित संचरण-संक्रमण का वाहक मानकर घोषित-अघोषित रूप से उनकी घर वापसी पर रोक लगाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर विदेश में अटके हुए भारतीयों की घर वापसी के लिए विशेष कदम तक उठाये गए हैं। बेहतर जीवन संभावनाओं की तलाश में विदेश जाने वाला अमीर वर्ग जब कोरोना ग्रसित देशों में फंसने लगता है, तो केंद्र की बुर्जुआ सरकार वर्गीय हितों से संचालित हो देशभक्ति की आड़ में इन लोगों की देश वापसी सुनिश्चित करने में जुट जाती है। यह जानते-बूझते हुए भी कि चीन से लौटने वाले हवाई यात्रियों के साथ-साथ यूरोप से लौटने वाले लोग भी कोरोना वायरस अपने साथ ला सकते हैं, उन्हें लगभग पूरे फरवरी माह में बेरोक-टोक आने दिया गया, कई मामलों में तो समुचित स्वास्थ जाँच प्रक्रिया से भी नहीं गुजारा गया। यूरोप से आने वाले इन लोगों की आवाजाही पर यथोचित निगरानी और प्रतिबंध नहीं लगाने के कारण ही संभवत: आज कोरोना का संक्रमण आपदा का रूप लेता जा रहा है। प्रधानमंत्री कोरोना से लड़ने के लिए जनता कर्फ्यू और थाली-कटोरा बजाने का राष्ट्री के नाम संदेश देकर कोरोना योद्धाओं (स्वास्थ कर्मियों, सफाईकर्मियों और पुलिसवालों आदि) के उत्साहवर्धन की मुहिम चलाते हैं और इस मुहिम को कोरोना के खिलाफ जनजागरुकता का नाम भी देते हैं। लेकिन जुबानी जमा खर्च के अलावा वे इस स्वास्थ्य आपदा के साथ नाभिनाल जुड़े आर्थिक संकट में अपने अस्तित्वु के लिए जूझते असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए एक भी ठोस घोषणा नहीं करते। कोरोना और उससे संबद्ध कोविड-19 जैसी महामारी पर रोक लगाने के लिए जो कामबंदी की गई है, उससे गरीबों की आर्थिक नब्ज रुक सी गई है। इस वैश्विक हो चुके इंडिया में भी देश का एक बड़ा तबका ऐसा है जो रोज कुँआ खोदता है और पानी पीता है। कोरोना अपने साथ जो आर्थिक सुनामी लेकर आया है, उसने इस तबके को बेरोजगार बना इसकी रोजी-रोटी छीन ली है। इस बेरोजगार गरीब भारत के लिए कोरोना जैसे वायरस से भी ज्यादा खतरनाक है भूख का वायरस और गरीबी की मार। फणीश्वर नाथ रेणु आजादी के तुरंत बाद ही ‘मैला आँचल’में भूख के इस वायरस को, गरीबी की इस बीमारी को भांप चुके थे। किंतु आजादी के इतने सालों बाद भी भूख और गरीबी के वायरसों पर हम विजय नहीं पा सके हैं। वस्तुभस्थिति तो यह है कि उदारीकरण के वर्तमान दौर में विशेषत: एनडीए सरकार के पिछले और वर्तमान शासनकाल भूख और गरीबी के इन वायरसों के लिए हनीमून पीरियड रहे हैं। जनकल्याण से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को पूँजीवादी मीडिया के माध्यूम से करदाताओं के ऊपर अनावश्यक बोझ बता जिस प्रकार लगातार समाप्त किया गया है, उनका बजट आवंटन घटा उन्हें मृतप्राय: बना दिया गया है, उस सबके चलते कोरोना की महामारी के बीच आर्थिक संकट में गरीब भारत वेंटिलेटर पर जाने वाला है और यह लेख लिखे जाने तक केंद्र सरकार के पास इसे बचाने के लिए कोई विशेष आर्थिक पैकेज भी नज़र नहीं आ रहा है। केरल और दिल्ली जैसे कुछ गैर भाजपाई शासन वाले राज्यों ने जरूर कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं लेकिन राज्यन सरकारों की अपनी बजटगत और संसाधनगत सीमाएँ हैं। देश भर में की जा रही समग्र नाकेबंदी के कारण शायद कोरोना के संचरण-संक्रमण पर कुछ हद तक लगाम लग भी जाए लेकिन इस नाकेबंदी की सफलता के लिए जरूरी है कि अमीर इंडिया की तरह गरीब भारत भी अपने घरों में बंद रहे। लेकिन अमीरों के इंडिया की तरह गरीबों के इस भारत के पास अपने घर में निठल्ला बैठने की क्षमता है ही कहाँ! पूँजीवादी मीडियाई खुमार में आपादमस्तिक डूबे हुए हम आत्मरमुग्ध भारतीय चाहे इस मुगालते में रहते रहें कि हम विश्व की आर्थिक शक्तियों में शुमार हो चुके हैं, लेकिन जमीनी सच्चामई तो यही बताती है कि दुनिया के समृद्ध देशों की तुलना में हमारा सामाजिक सुरक्षा तंत्र बहुत ही ज्यारदा लचर है। अमेरिका और यूरोप के देशों में सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा तंत्रों के बलबूते कम से कम कुछ समय के लिए तो समग्र नाकेबंदी को व्यावहारिक धरातल पर उतारा जा सकता है किंतु समग्र नाकेबंदी की हमारे पास वैसी क्षमता है ही नहीं विशेषत: वर्तमान आर्थिक संकट में रोजी-रोटी के लिए जूझते गरीब बेरोजगार भारत के लिए निठल्ला बैठना अपने आप में आत्महत्या करने सरीखा है। इसे कानून व्यवस्था का सवाल बता घर से बाहर निकलने वालों पर पुलिसिया कार्रवाई से भी कुछ नहीं होने वाला है। अस्तुे, देश के गरीबों को समग्र नाकेबंदी का नैतिक राष्ट्रवादी उपदेश देने के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों को इस समग्र नाकेबंदी को सफल बनाने के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र को भी दुरुस्त करना होगा। देश में कोरोना वायरस संक्रमण की आपात स्थिति को देखते हुए सामने खड़ी आर्थिक सुनामी से लड़ने के लिए तुरंत प्रभाव से बड़े पैमाने पर आर्थिक राहत के कदम उठाने होंगे। समय की कमी को देखते हुए सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी जो कुछ भी योजनाएँ और कार्यक्रम इस उदार‍ीकरण के दौर में शेष बचे हुए है, उन्हें युद्ध स्तर पर चलाना होगा। गरीब, बेरोजगार और असहाय भारत को ध्यान में रखते हुए विशेष कोरोना भत्ता दिया जा सकता है। राशन वितरण के सार्वजनिक तंत्र के माध्य‍म से जरूरतमंदों को एकाध महीने का एकमुश्त राशन मुहैया कराना और मनरेगा की बकाया मजदूरी के साथ पेंशन की त्वरित अदायगी जरूरी है। निजी और सरकारी क्षेत्र में कामबंदी के दौरान भी वेतन का नियमित भुगतान अपेक्षित है। पेंशन और राहत का अग्रिम भुगतान एक बड़ी राहत ला सकता है। सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी कार्यालयों को एक सिरे से पूरी तरह बंद करना भी आर्थिक संकट को और गहरा सकता है। इस प्रकार की नाकेबंदी में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका को अपने विवेक से काम लेना चाहिए। सार्वजनिक स्वास्थ सेवाओं, परिवहन सेवाओं समेत स्थानीय प्रशासनिक कार्यालयों के कामकाज पर पूरी तरह से रोक लगाने से पहले यह देखना होगा कि ऐसे कदमों से गरीब भारत की रोजी-रोटी और स्वास्थ पर कम से कम प्रतिकूल असर पड़े। सबसे ज्यादा जरूरत के समय गरीबों के अस्तित्व रक्षा में काम आने वाली सेवाओं को जरूरी एहतियातों के साथ चालू रखा जाना नितांत आवश्यक है। रबी की फसलों की कटाई का मौसम भी अब सिर पर आ गया है अत: रबी उत्पादों की सरकारी खरीद और निजी क्षेत्र की मंडियों-दुकानों पर समुचित कीमतों पर उनकी बिक्री भी सरकार को सुनिश्चित करनी होगी। स्पष्टत: गरीब भारत को बचाने के लिए इस संकट की घड़ी में आवश्यक सेवाओं को चालू रखना और उनका विस्तार करना जरूरी है। सामाजिक सुरक्षा तंत्र की सेहत सुधारकर इन सेवाओं को हर हाल में चलाए रखना आवश्यक है। इस सबके लिए केंद्र सरकार से जहाँ एक बड़ी धनराशि अपेक्षित है, वहीं जुगाड़ करने की रचनात्माक सोच भी जरूरी है। उदाहरण हेतु सार्वजनिक वितरण तंत्र का विस्तार करते हुए इससे संबद्ध संग्रहण और वितरण के साथ-साथ विशेष कोरोना वार्ड बनाने के लिए भी बंद कर दिए गए स्कू्ल-कॉलेजों का इस्तेतमाल किया जा सकता है। ध्यानतव्य है कि आईआईटी बॉम्बे के खाली कराए जा चुके छात्रावासों और बंद पड़ी कक्षाओं समेत अन्य भवनों का इस्तेमाल कोरोना संक्रमित लोगों को अलग-थलग रख उनका उपचार करने हेतु किया जाना तय हो चुका है। आँगनबाड़‍ियों को भी राशन के सार्वजनिक वितरण और कोरोना के खिलाफ जागरुकता फैलाने के लिए काम में लिया जा सकता है। आने वाली गर्मियों को देखते हुए पेयजल की माकूल व्यवस्था भी घर-घर तक करने की जरूरत है अन्यथा पेयजल के लिए हम लोगों के सामाजिक जुटान को नहीं रोक पाएंगे। अस्तु, सिर्फ स्वास्थ्य विषयक जागरुकता फैलाने और कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए समग्र नाकेबंदी करने मात्र से कोरोना के खिलाफ हिंदुस्‍तान जंग नहीं जीत पाएगा और इस जंग की भारी कीमत भी गरीब भारत को ही चुकानी पड़ेगी। प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अंतत: 15 हजार करोड़ के बजट की जो घोषणा की है, वह संसाधनों की कमी से जूझ रहे चिकित्साच क्षेत्र के लिए किंचित राहत की बात हो सकती है किंतु कोरोना संकट को अर्थव्यवस्था के संकट के साथ जोड़े बिना हम संकट की इस घड़ी में गरीब भारत को नहीं बचा पाएंगे। हमें याद रखना चाहिए कि कोरोना वायरस तो वर्ग के स्तर पर भेदभाव नहीं करता किंतु इससे संबद्ध आर्थिक सुनामी की सबसे ज्यादा मार गरीबों पर ही पड़ने जा रही है। नोटबंदी से अभी तक उबर न पाई भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना की इस सुनामी को झेलने के लिए भी अभिशप्त नज़र आती है। (लेखक डॉ. प्रमोद मीणा, आचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वतविद्यालय, जिला स्कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार सं संबद्ध हैं। संपर्क 7320920958 )

प्रधानमंत्री जी, ज्यां द्रेज के ये चार सुझाव जरूर मान लिजिए

Jean Drèze
  • सिद्धार्थ रामू
प्रधानमंत्री जी कल (25 मार्च) एनडीटीवी के प्राइम टाइम में दुनिया के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री-आम आदमी के आर्थशास्त्री- ज्यां द्रेज ने कोरोना वायरस के खिलाफ संघर्ष के लिए चार-पांच सुझाव दिए हैं। प्रधामंत्री जी आप तो जानते हैं कि कोरोना वायरस के खिलाफ संघर्ष के दो मोर्चे हैं। पहला स्वास्थ्य सेवाओं से जुडा है। जिसमें कोरोना की टेस्टिंग सुविधा से लेकर, स्वास्थ्य उपकरणों-विशेषकर वेंटिलेटर- का इंतजाम, स्वास्थ्य कर्मियों के लिए सुरक्षा कीट्स की व्यवस्था आदि शामिल हैं। लेकिन जैसा कि आप ने कहा इसे रोकने का एकमात्र उपाय सोशल डिस्टेंसिंग (यानि सामाजिक अलगाव) बताया है,जिसके लिए आपने पूरे देश में लॉक डाउन की घोषणा की है। लेकिन लॉक डाउन के बाद असंगठित क्षेत्र के अधिकांश लोगों के रोजी-रोटी के साधन छीन गए हैं। इसमें करीब तीन तरह लोग हैं। एक वे जो हर-दिन कमाते हैं और खातें हैं और जिनके पास अगले दिन के लिए कोई बचत नहीं होती, दूसरे वे ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह या पंद्रह दिन बिना काम के भी भोजन का इंतजाम कर सकते हैं। तीसरे वे जिनके पास महीने भर या इसके कुछ अधिक का इंतजाम हैं। यानि इस देश की करीब 60 प्रतिशत यानि 78 करोड़ के आस-पास की आबादी ऐसी है, जो औसत तौर पर एक महीने से अधिक बिना काम या सरकारी मदद के रोजी-रोटी का इंतजाम नहीं कर सकती है। इन सभी लोगों के हितों के लिए ज्यां द्रेज ने कुछ जरूरी सुझाव दिएं हैं। जो निम्न हैं- 1- राशन कार्ड से मिलने वाले राशन को दो गुना कर दीजिए और तीन महीने महीने तक मुफ्त में राशन उपलब्ध कराइए। इसमें बीपीएल और एपीएल का बंटबारा भी भी मत कीजिए। बीपीएल और एपीएल सभी कार्ड धारकों को राशन दीजिए। इसमें मेरा सुझाव यह भी है कि इन राशन की दुकानों से राशन कार्ड पर तेल-चीनी एवं साबुन भी उपलब्ध कराइए। प्रधानमंत्री जी आपको मालूम होगा कि भारतीय खाद्यान्न निगम के पास जरूरत से ज्याद स्टॉक है। इस समय निगम के 74.2 मिलियन टन का भंडार है, जबकि आवश्यक भंडार की अधिकतम सीमा सिर्फ 41.12 मिलियन टन है। यानि निगम के पास 33.08 मिलियन टन अधिक का भंडार है। यह कई महीनों तक राशन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त है। और जो आवश्यक भंडार है, वह भी संकट के समय के लिए ही किया जाता है। इससे बड़ा संकट समय कौन सा आयेगा प्रधानमंत्री जी। प्रधानमंत्री निगम के पास जो भंडार है, वह कहीं विदेश से नहीं आया है, न आसमान से टपका है। यह पूरा भंडार देश के किसानों-मजदूरों की गाढ़ी मेहनत से उपजा है और देश की जनता के टैक्स की कमाई से उसे खरीद कर ऱखा गया है और उसका रख-ऱखाव किया जा रहा है। आखिर किस दिन काम आयेगा। ज्यां द्रेज का सुझाव मानिए। देश के राशनकार्ड धारियों को तीन महीने तक दो गुना और बिना दाम के राशन उपलब्ध कराने की घोषणा कीजिए और उसे लागू कराइए। 2- ज्यांद द्रेज ने दूसरा सुझाव दिया है कि बूढ़े, विधवा और विकलांग लोगों की पेंशन को दो गुना कर दीजिए। सारी पेंशन जल्द से जल्द जारी कर दीजिए। केरल की तरह कुछ महीनों की पेंशन एडवांस में दे दीजिए। 3- मजदूरों-गरीबों किसानों और ठेला-रेहड़ी लगाने वालों के खातों में सीधे पैसा ट्रांसफर कीजिए। ज्यां द्रेज इसका तात्कालिक तौर पर तरीका भी बताया है। सबसे पहले मनरेगा की मजदूरों के खातों में पैसा डालिए। इसके साथ मेरा सुझाव यह है कि जितने लोगों का जन-धन खाता आप ने खुलवाया था। उसमें भी सीधा पैसा ट्रांसफर कीजिए। 4-ज्यां द्रेज ने शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों के लिए रिलिफ कैंप खोलने का सुझाव दिया है। पूरे देश में ऐसे मजदूरों की संख्या करोड़ों में है। इन रिलिफ कैंपों में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ रहने- खाने का इंतजाम कीजिए। ज्यां द्रेज ने यह भी बताया कि इसके लिए करीब 3 से 4 लाख करोड़ खर्च होगा। प्रधामंत्री जी यह देश के 78 करोड़ लोगों को बचाने के लिए कुछ ज्याद पैसा नहीं है। आपने ने अपने कार्पोरेट मित्रों को पलक झपते ही 1 लाख 50 हजार करोड़ की छूट बजट के पहले ही दे दिया था। इसके साथ ही आरबीआई से सरप्लस और लाभांश के रूप में आपने 1 लाख 76 हजार करोड़ रूपया ले लिया और अपने कार्पोरेट मित्रों को विभिन्न रूपों में सौंप दिया। कार्पोरेट टैक्स में छूट और उनके द्वारा लिए कर्जों को एनपीए (माफ) करके। आप अपने चंद कार्पोरेट मित्रों को पलक झपते 1 लाख 50 हजार करोड़ की सौगात दे सकते हैं। तो क्या देश की 78 करोड़ जनता के लिए यह देश 3 से 4 लाख नहीं खर्च कर सकता है। माना ये लोग (आम जनता) आपके अडानी-अंबानी जैसे मित्र नहीं हैं, लेकिन हैं तो इस देश के ही लोग। इनका भी खयाल करिए। इसके अतिरिक्त करीब 2 लाख करोड रूपए स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जरूरत पड़ेगी। यानि कुल करीब 5 लाख करोड़ की जरूरत है। इस धन इंतजाम अधिकांश राज्य सरकारें नहीं कर सकती हैं। केंद्र सरकार ही कर सकती है। ज्यां द्रेजे ने यह भी कहा है कि जरूरत हो तो वित्तीय घाटा बढ़ने दीजिए। प्रधानमंत्री इसे महाभारत का युद्ध मत बनाइए। जिसमें दोनों पक्षों के अधिकांश लोग मारे दिए गए था। एक उल्लेख के मुताबिक इस युद्ध में दोनों पक्षों से करीब 4 5 लाख लोग शामिल हुए थे, जिसमें सिर्फ 18 योद्धा बचे थे। बहुसंख्यक लोगों को बचाने के बारे में सोचिए। मरने के लिए मत छोडिए। ज्यां द्रेज का सुझाव मान लिजिए। (एनडीटीवी के प्राइम टाइम शो की प्रस्तुति की स्मृति के आधार पर, कुछ चीजें मैंने जोड़ी हैं)  

दलितों का आरक्षण आर्थिक पिछड़ेपन को मिटाने के लिए नहीं, अस्‍पृश्‍यता के उपचार के लिए है- सुखदेव थोराट

नौकरी में पदोन्‍नति हेतु मलाईदार वर्ग की अवधारणा अनुसूचित जाति (एस.सी.) और अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) पर लागू की जानी चाहिए या नहीं, यह जाँचने के लिए केंद्र ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय से सात न्‍यायधीशों की पीठ गठित करने की अपील की है. इस बारे में दि हिंदू के लिए के. वेंकटरमन द्वारा एक बातचीत सुखदेव थोराट और अश्विनी देशपांडे से की गई. यहां हम सुखदेव थोराट के पक्ष को दे रहे हैं. मलाईदार वर्ग की अवधारणा को आरक्षण पर और विशेष तौर पर एस.सी. और एस.टी. पर लागू करने के विचार विषयक एक संदर्भ क्‍या आप हमें दे सकते हैंॽ सुखदेव थोराट: राजनीति, नौकरियों और संस्‍थानों में एस.सी. को आरक्षण विशेष रूप से इसलिए दिया गया है क्‍योंकि वे लगभग 2000 सालों तक संपत्ति, शिक्षा और उद्योगों के अधिकार से वंचित थे. इसके अतिरिक्‍त उनके साथ अस्‍पृश्‍यों सरीखा व्‍यवहार किया जाता था. समाज में भेदभाव आज भी जारी है. अतीत के बहिष्‍कार के लिए एक सीमा तक (भेदभाव के खिलाफ) सुरक्षा उपाय और क्षतिपूर्ति मुहैया कराना ही आरक्षण के पीछे का मुख्‍य तर्क था. अपनी आबादी के हिस्‍से के अनुसार उन्‍हें आरक्षण दिया जाना चाहिए. कारण कि अन्‍यथा नौकरियों, उद्योगों और कृषि में जारी भेदभाव के कारण वे अपना देय भाग नहीं पा सकेंगे. वे भूमिहीन ही बने हुए हैं. मेरा मानना है कि पुनरुद्धार या क्षतिपूर्ति की नीति होनी चाहिए थी. ऐसा नहीं हुआ है. जो हम कर रहे हैं, वह वर्तमान में भेदभाव के खिलाफ कुछ संरक्षण दे रहे हैं और जनसंख्‍या के अनुपात में कुछ हिस्‍सा दे रहे हैं. अत: सर्वोच्‍च अदालत जाने की जगह सरकार को एक समिति गठित करनी चाहिए थी और जांचना चाहिए था कि नौकरी के अंदर लोग भेदभाव का सामना करते हैं या नहीं करते. मेरा अनुभव है कि एक बार जब आप नौकरी में घुस जाते हैं तो भारी भेदभाव होता है. नौकरियों में भेदभाव की शिकायत करते हुए एस.सी./एस.टी. आयोग के पास लगभग 12,000 मामले लंबित हैं. इसलिए उन्‍हें पदोन्‍नति में भी आरक्षण की जरूरत है. आपको किसी सीमा तक ऐसा लगता है कि पिछड़ेपन की परख, प्रतिनिधित्‍व की अपर्याप्‍तता और प्रशासनिक कार्यकुशलता पर आरक्षण का असर एस.सी./एस.टी. उम्‍मीदवारों के भविष्‍य को प्रभावित करता है या नहीं करता हैॽ सुखदेव थोराट: आरक्षण नीति जैसे विधेयात्‍मक कदम भेदभाव विरोधी हैं; यह आर्थिक विचार पर आधारित नहीं है क्‍योंकि भेदभाव आपकी आर्थिक स्थिति से स्‍वतंत्र होता है. महिलाएं आरक्षण की मांग कर रही हैं. क्‍या उन्‍होंने कभी यह मुद्दा उठाया है कि अपेक्षाकृत समृद्ध महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण नहीं लेना चाहिएॽ कारण कि उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है, चाहे वे गरीब हों या न हों. अत: मेरा मानना है कि यह स्‍पष्‍टता वहां रखनी होगी. मेरा दृष्टिकोण यह है कि आर्थिक रियायत नहीं देनी चाहिए. उन्‍हें अनुदान, छात्रवृत्ति मत दीजिए क्‍योंकि उनमें से कुछ आर्थिक रूप से समृद्ध होते हैं. किंतु आप इस तर्क को इस सीमा तक विस्‍तारित नहीं कर सकते कि आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों को आरक्षण नहीं देना चाहिए. इसलिए मेरा मानना है कि सर्वोच्‍च अदालत को अकादमिक ढंग से इस बिंदु को समझना है; मैं नहीं मानता कि यह कोई वैधानिक मुद्दा है. अगर सीमा को लेकर कोई सवाल है, तो सीमा को संशोधित किया जा सकता है. अगर पदोन्‍नति से दूसरों को नुकसान होता है तो उनकी सहायता करने के दूसरे तरीके भी हैं. सर्वोच्‍च अदालत को इसके ऊपर 50 प्रतिशत या कोई अन्‍य कानूनी सीमा नहीं थोपनी चाहिए. एस.सी./एस.टी. के लिए आरक्षण को बनाये रखते हुए गैर एस.सी./एस.टी. को लाभ पहुंचाने के वैकल्पिक रास्‍ते पता कीजिए. पिछड़ेपन की जाँच एक अन्‍य आयाम है. जरनैल सिंह वाले मामले में अदालत को लगा कि पिछड़ेपन की परख सभी एस.सी./एस.टी. पर लागू नहीं होनी चाहिए. लेकिन उसी समय इसने मलाईदार तबके की अवधारणा को लागू करने की वकालत भी कर डाली. क्‍या यहाँ कुछ विरोधाभास नहीं है ॽ सुखदेव थोराट: हाँ, मेरा मानना है कि विरोधाभास है. एक तरफ वे कहते हैं कि पिछड़ेपन का कोई पैमाना या सूचकांक एस.सी. और एस.टी. पर लागू नहीं होना चाहिए. दूसरी तरफ वे अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से समृद्ध कुछ एस.सी. लोगों को बाहर करने के लिए उसी आर्थिक पैमाने को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. अगर न्‍यायालय को कोई फैसला लेना ही है तो इसे एस.सी. और एस.टी. के लोगों द्वारा झेली जा रही अस्‍पृश्‍यता और भेदभाव के रिवाज के अध्‍ययन हेतु सरकार से एक व्‍यापक समीति गठित करने के लिए कहना चाहिए. अदालत को अपनी स्थिति संशोधित करनी चाहिए और देखना चाहिए कि जीवन के सभी क्षेत्रों में वे लगातार भेदभाव झेल रहे हैं. अगर कोई समुदाय भेदभाव का सामना नहीं करता है तो आप गरीबों के लिए गरीबी विरोधी नीति विकसित कर सकते हैं. लेकिन जब भेदभाव रहता है तो आप दुनियाभर में पृथक नीति रखते हैं. जिस बिंदु को हम दोनों दोहरा रहे हैं, वह यह है कि दलितों के आरक्षण का कारण आर्थिक पिछड़ापन नहीं है. यह तो वह लांछन है जो अस्‍पृश्‍यता की स्थिति के कारण आता है. और यद्यपि कानूनी रूप से अस्‍पृश्‍यता का उन्‍मूलन कर दिया गया है लेकिन बहुत सारे आंकड़ें हैं जो दिखाते हैं कि लोग अभी भी अस्‍पृश्‍यता का व्‍यवहार करते हैं. इसलिए जो कलंक अछूतपन की स्थिति के कारण आता है… आरक्षण तो उसके लिए एक छोटा सा प्रतिकारी उपाय है. अस्‍पृश्‍यता के कारण आर्थिक पिछड़ेपन और लांछन को एक साथ जोड़ने का यह सतत् प्रयास गलत है. कारण कि आप आर्थिक पिछड़ेपन पर बात कर सकते हैं, लेकिन दलितों के लिए आपको इस लांछन को दूर करना होगा. एक तर्क यह था कि जबकि प्रवेश स्‍तर पर एक व्‍यक्ति वास्‍तविक रूप से वंचित होता है और आरक्षण एक उपचारात्‍मक साधन है, किंतु जैसे ही वह आय और पद, दोनों की सीढ़ी पर ऊपर पहुँचता है, तो पदोन्‍नति में आरक्षण की संभवत: कोई आवश्‍यकता ही उसे न हो. और यह भी कि उस स्‍तर पर मलाईदार वर्ग की अवधारणा लागू होनी चाहिए. सुखदेव थोराट: हम इस बिंदु पर बल दे रहे हैं कि आरक्षण या सकारात्‍मक कार्रवाई भेदभाव पर आधारित होती है जो उन समान अवसरों को नकारना है जिनसे दूसरे लाभ उठाते हैं. और आर्थिक रूप से समृद्ध लोग भी भेदभाव का शिकार होते हैं, ये भेदभाव का शिकार होते हैं नौकरी में और दूसरे क्षेत्रों में. उन्‍हें भी सुरक्षा उपाय की आवश्‍यकता पड़ती है और यह सुरक्षा उपाय होता है- सकारात्‍मक कार्रवाई की नीति. जो मैंने कहा था, वह यह भी है कि चूँकि वे आर्थिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं, तो उन्‍हें अनुदान सरीखे आर्थिक फायदें मत दीजिए. वे इनका वहन कर सकते हैं किंतु आप इस तर्क को यह कहने तक विस्‍तारित नहीं कर सकते कि समृद्ध लोगों से आरक्षण छीन लेना चाहिए. पदोन्‍नति में आरक्षण की आवश्‍यकता है क्‍योंकि वे पदोन्‍नति में भेदभाव झेलते हैं. इसे लेकर हमारे पास अध्‍ययन नहीं हैं. सर्वोच्‍च अदालत और सरकार को ऐसे अध्‍ययन पर हाथ लगाना चाहिए. आरक्षण एक प्रकार की क्षतिपूर्ति है. सार्वजनिक क्षेत्र नौकरियों का एक बहुत छोटा हिस्‍सा ही रखता है. और वहीं वे कुछ हिस्‍सा पाते हैं. निजी क्षेत्र में भेदभाव के खिलाफ उन्‍हें कोई सुरक्षा प्राप्‍त नहीं है. आप जो अपेक्षा रखते हैं, वह है दो हजार साल के दमन की क्षतिपूर्ति. हमें उन्‍हें भूमि देनी होगी, उद्योग आरंभ करने और शिक्षा के लिए वित्‍त जुटाना होगा. आपको आरक्षण द्वारा अनुपूरक क्षतिपूर्ति और नुकसान की भरपाई वाली व्‍यापक नीति की आवश्‍यकता है. अदालत मात्रात्‍मक आंकड़ों पर जोर देती है- चाहे ये पिछड़ेपन को लेकर हों या चाहे अपर्याप्‍त प्रतिनिधित्‍व या कार्य कुशलता के सवाल को लेकर हों. क्‍या आप मानते हैं कि यह सरकार से एक बहुत ही भारी अपेक्षा है कि हर चीज को मात्रात्‍मक आंकड़ों में प्रदर्शित किया जाएॽ सुखदेव थोराट: मैं यह कहना चाहूँगा कि एस.सी. और एस.टी. (अत्‍याचार निवारण) अधिनियम और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत यह सर‍कार की जबावदेही है कि दलितों के द्वारा झेले जाने वाले भेदभाव और अस्‍पृश्‍यता की प्रकृति को सामने लाने के लिए वह हर पाँच साल पर अध्‍ययन कराए. सरकारी एस.सी./एस.टी. आयोग की रपटों में अस्‍पृश्‍यता पर एक पृथक अध्‍ययन होना अपेक्षित होता है. वह रपट पिछले 20 सालों से या लगभग इतने ही समय से सामने नहीं आई है. सरकार ने कोई अध्‍ययन भी नहीं करवाया है. गुणात्‍मक रिश्‍तों को चिह्नित करने वाली संख्‍यात्‍मक पद्धतियाँ हैं जो लेकिन दुर्भाग्‍य से राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा ऐसे सर्वेक्षणों को अनदेखा किया गया है. जिस रूप में आरक्षण नीति आज अस्तित्‍व में है, वह सहायक रही है और यह गरीब हितैषी नीति है. 60 प्रतिशत से ज्‍यादा सरकारी कर्मचारी तृतीय या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं और वे गरीब तथा कम पढ़े-लिखे हैं. ठीक इसी समय सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों का बड़े पैमाने पर निजीकरण हो रहा है और सार्वजनिक क्षेत्र तेजी से संविदा पर नौकरियों निकाल रहा है जिनके लिए कोई आरक्षण नहीं है. अत: निजी क्षेत्र तक भी समान रूप से आरक्षण को विस्‍तारित करने की आवश्‍यकता है. (इस साक्षात्कार को डॉ. प्रमोद मीणा ने अनुवाद किया है। वह महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, मोतिहारी में शिक्षक हैं। संपर्कः7320920958)  

‘मूकनायक’ का शताब्दी वर्ष बनाम वंचितों का मीडिया स्थापित करने की चुनौती

यह मेरे लिए बड़ा दिन था. 31 जनवरी 2020 का दिन. यह दिन इसलिए भी बड़ा था क्योंकि मैं पिछले पांच सालों से इस दिन का इंतजार कर रहा था. वजह इस दिन बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रकाशित पहले पत्र ‘मूकनायक’ के 100 वर्ष पूरे हो रहे थे. ‘दलित दस्तक’ के मंच से और सोशल मीडिया के जरिए भी हम घोषणा कर चुके थे कि हम इस दिन को धूमधाम से सेलिब्रेट करेंगे. क्योंकि अम्बेडकरी पत्रकारिता से 100 साल का जश्न खामोशी और कामचलाऊ ढंग से नहीं मनना चाहिए था. हमने वही किया, बाबासाहेब को एक पत्रकार के रूप में याद करने की बेहतर कोशिश की. हमने मूकनायक के शताब्दी वर्ष का आयोजन दिल्ली के सबसे महंगे और प्रमुख जगह पर किया. 15 जनपथ स्थित ‘डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में. कार्यक्रम में 17 राज्यों से लोग पहुंचे. शुक्रवार का दिन था, वर्किंग डे था, फिर भी भारी संख्या में पहुंच कर आपलोगों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाया. आप सबका बहुत धन्यवाद. इसके आयोजन में व्यस्तता के कारण हम जनवरी और फरवरी का अंक एक साथ निकाल रहे हैं. इसके लिए आपसे क्षमायाचना है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि दलित दस्तक ने जो मुहिम शुरू की थी, उसका असर देश भर में हुआ और देश के कई हिस्सों में ‘मूकनायक’ का शताब्दी वर्ष समारोह मना. अंग्रेजी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ ने इस पर 26 जनवरी को बड़ी स्टोरी की तो ‘द हिन्दू’ ने विशेष आर्टिकल प्रकाशित किया. मराठी दैनिक ‘लोकमत’ ने कार्यक्रम की पूर्व सूचना देने से लेकर कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की और बाद में विशेष लेख भी प्रकाशित किया. हिन्दी के ‘हरिभूमि’ अखबार ने खबर छापी तो ‘नवभारत टाईम्स’ और ‘न्यूज 18’ की वेबसाइट के अलावा फारवर्ड प्रेस ने भी इसको कवर किया. बीबीसी ने भी इस पर आर्टिकल प्रकाशित किया और दलित दस्तक के कार्यक्रम का भी जिक्र किया. कुल मिलाकर हम अपनी कोशिश में सफल रहे और मूकनायक के जरिए बहुजन मीडिया की चर्चा तेज हुई. साथ ही भारत के पत्रकारिता जगत में ‘मूकनायक’ का महत्व फिर से स्थापित हो पाया. लेकिन इतने भर से ही बहुत खुश हो जाने का मतलब नहीं है. इस कार्यक्रम के बाद अम्बेडकरी पत्रकारिता को बेहतर ढंग से स्थापित करने की हमारी-आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. मैं बार-बार कहता हूं कि एक मासिक पत्रिका और यू-ट्यूब के जरिए समाज के भीतर जागरूकता तो आ रही है लेकिन हम सत्ता और प्रशासन पर दबाव नहीं बना पा रहे हैं. इसका नुकसान यह हो रहा है कि हम आपकी समस्याओं को लेकर मजबूती से लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं. क्योंकि इसके लिए कम से कम एक साप्ताहिक अखबार या फिर ऐसे चैनल की जरूरत है, जहां गंभीरता से चर्चा हो सके. जब हम कार्यक्रम के आयोजन हेतु देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संपर्क कर रहे थे तो कई पाठकों ने दैनिक अखबार और चैनल की जरुरत पर बल दिया. दलित दस्तक अभी दस हजार लोगों के घरों में जा रही है. पिछले कई सालों से हम यह कोशिश कर रहे हैं कि कम से कम 100 ऐसे लोगों को जोड़ सकें, जो साल में एक बार एक निश्चित राशि का योगदान दें. मुझे नहीं लगता कि यह इतना मुश्किल काम है. क्या हमारे बीच 100 लोग ऐसे नहीं हैं जो साल में एक बार 10 हजार रुपये का योगदान दे सकें?? अगर सक्षम लोग सामने नहीं आएंगे तो वंचितों की मीडिया बनाने का सपना कैसे पूरा होगा? आर्थिक अभाव वंचितों की पत्रकारिता को लील जाने को तैयार बैठा है. इसे आपलोग ही बचा सकते हैं. जब हम मूकनायक के शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तो हमारे लिए जरूरी है कि हम वंचितों की मीडिया बनाने के सपने को आगे लेकर बढ़ें. यह सपना हम मिलकर देखेंगे तभी सफल होंगे. क्योंकि जब हम वंचित समाज का सशक्त मीडिया बनाने की बात करते हैं तो बात सिर्फ विज्ञापन की नहीं होती, बात विचार की भी होती है. हमें बाजार (विज्ञापन) और विचार का सामंजस्य बनाकर चलना होगा. यह एक बड़ी चुनौती है, लेकिन हम मिलकर इस पर जीत हासिल कर सकते हैं. क्या हम मूकनायक के शताब्दी वर्ष में वंचित समाज का सशक्त मीडिया स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. सोचिएगा जरूर, अगर आपके अंदर से ‘हां’ की आवाज आती है तो फिर संपर्क करिएगा. नोटः दलित दस्तक ने अपना एक एप ‘Bahujan Today’ के नाम से लांच किया है. आप सबसे निवेदन है कि तुरंत Play Store पर जाकर इसको डाउनलोड करिए. इसको अच्छी रेटिंग दीजिए. हम इसके जरिये भी आपसे जुड़े रहेंगे.

आजाद समाज पार्टी बनाम बहुजन समाज पार्टी

नई पार्टी की घोषणा के बाद पार्टी का झंडा दिखाते चंद्रशेखर आजाद। फोटोः ANI photo
  • नंदलाल वर्मा 15 मार्च, 2020 अर्थात् बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जी के जन्मदिन पर भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर आजाद द्वारा एक अलग राजनैतिक दल “आजाद समाज पार्टी” का गठन कर मीडिया के माध्यम से बाबा साहब डॉ अंबेडकर जी और कांशी राम जी के अधूरे मिशन या सपनो को साकार करने का संकल्प लेते हुए बहुजन समाज को संबोधित किया। बहुजन समाज विरोधी वर्तमान राजनैतिक मौसम में इस नवगठित दल की सामाजिक व राजनैतिक स्थिति और उस पर पड़ने वाले भावी परिणामों पर देश के बहुजन समाज (एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक, जिसकी सैद्धांतिक परिकल्पना डॉ आंबेडकर जी ने की थी और जिसका सक्रिय राजनीति में समावेश कांशी राम जी ने किया था) के सुशिक्षित और जागरूक समाज का अत्यंत गंभीरतापूर्वक चिंतन और विमर्श करने का उत्तरदायित्व एक बार फिर उत्पन्न हो गया है।
उसे इस नवगठित राजनैतिक दल के निहितार्थ को राजनैतिक परिदृश्य में ढूंढना और समझना होगा।   आधुनिक पूंजीवादी राजनीति और व्यावसायिक रूप में बदल चुकी वर्तमान राजनीति से बहुजन समाज की राजनैतिक रूप से अति महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी का एक बड़े वर्ग के अंदर अल्प समय में सरल मार्ग से राजनीति के शिखर पर पहुंचने की अतिवेग की लहरें हिलोरें मारने लगी हैं, जो इन दोनों महापुरूषों के सामाजिक एवं राजनैतिक दर्शन/विचारधारा के झूठे सहारे के बल पर भोले-भाले बहुजन समाज को राजनैतिक रूप से दिग्भ्रमित करने में लगा हुआ है। यह माध्यम अंबेडकर जी और कांशी राम जी की राजनैतिक विचारधारा के बिल्कुल अनुकूल नही हैं। बहुजन समाज का जो युवा वर्ग इस साजिश का शिकार होते दिखता हैं, उससे हमारा विनम्र निवेदन है, कि वह एक बार डॉ आंबेडकर जी और कांशी राम जी की शिक्षा और उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक त्याग, तपस्या और समर्पण के भाव का एकाग्रचित्त होकर स्वस्थ चिंतन के साथ अहसास अवश्य करें, क्योंकि इन महापुरुषों/युगपुरूषों के व्यक्तित्वों और कृतत्वों का इतनी जल्दी मूल्यांकन किया जाना आसान कार्य नहीं है। सामाजिक छुआछूत और अपमान की जो पीड़ा अंबेडकर जी ने प्रत्यक्ष रूप से केवल देखी ही नहीं थी, बल्कि बहुजन समाज के खातिर ही उसका सामाजिक व राजनीतिक स्तर पर लंबे समय तक सीधा दंश भी झेलते रहे। सामाजिक और राजनैतिक विषम और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वह अपने मिशन को साकार करने में तत्कालीन मनुवादी शक्तियों से उनके बीच रहकर अत्यंत धैर्य और संयम से कई स्तर पर लंबे समय तक लड़ते और जूझते रहे। डॉ. आंबेडकर जी अच्छी तरह जानते थे कि विश्व में ज्ञान अर्थात् विद्वता का मान सम्मान हमेशा रहा और इसी मंतव्य के साथ उन्होंने शिक्षा को सर्वोपरि रखकर विदेशों से भी शिक्षा ग्रहण करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने संबंधित विषयों की मात्र डिग्रियां ही हासिल नहीं की, बल्कि विषय के मर्म को समझकर उसके व्यावहारिक पहलुओं पर महारथ हासिल की थी, जिनकी प्रासंगिकता संबंधित क्षेत्रों में आज भी भारत के आधुनिक विद्वानों द्वारा मानी जा रही है। तत्कालीन मनुवादी व्यवस्था में उनको संविधान सभा से लेकर मंत्रिमंडल में सम्मानपूर्वक स्थान मिलने की मज़बूरी केवल उनकी विषयगत योग्यता के कारण बनती रही। भारत स्वतंत्र होने के बाद तत्कालीन उत्पन्न संवैधानिक व राजनैतिक परिस्थितियों का सामना करने के लिए डॉ आंबेडकर जी का कोई विकल्प नहीं दिख रहा था, इसीलिए डॉ आंबेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनने लायक,संविधान सभा के तमाम सदस्यों में से अम्बेडकर के बराबर या उनसे अधिक उपयुक्त,योग्य और सक्षम कोई अन्य का नहीं मिल पाना,डॉ आंबेडकर की योग्यता और क्षमता का इससे बड़ा प्रमाणपत्र और क्या हो सकता है? यदि ऐसा रहा होता तो तत्कालीन संविधान सभा की संरचना डॉ आंबेडकर को देश का संविधान बनाने का अधिकार नहीं देती। यदि डॉ आंबेडकर जी व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन पर केन्द्रित होते तो वह विदेशों से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह उस भारत में दुबारा वापस आने की सोचते भी नहीं, जहां पर उन्होंने सामाजिक ऊंच-नीच और जातीय छुआछूत का प्रत्यक्षतः अनुभव किया था और विदेशों में जहां सामाजिक जाति की ऊंच-नीच और छुआछूत लेशमात्र भी नहीं था,किसी देश में बसकर सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न, सम्मान और गौरव का जीवन जी लेते।अंबेडकर जी देश व विदेश में जब उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो वह केवल अपने लिए नहीं पढ़-लिख रहे थे, बल्कि हजारों साल से इस देश के दलित,वंचित और शोषित समाज के करोड़ों बच्चों के सपनों को साकार करने का लक्ष्य उनको रात-दिन मेहनत करने के लिए लगातार परेशान और प्रेरित कर रहा था।विदेश में पढ़ने वाला यह दलित छात्र मात्र भीम राव अंबेडकर नहीं था, बल्कि वह स्वयं को देश के बहुजन समाज का एक भावी सामाजिक एवं राजनैतिक महानायक के रूप में तैयार कर रहा था।इसी सोच ने डॉ आंबेडकर को अछूतों के लिए नारकीय बने भारत देश में पुनः आने पर मज़बूर कर दिया था। आंबेडकर जी अपनी इसी शिक्षा और विशेषज्ञता के बल पर स्वतंत्रता से पूर्व और बाद भी बहुजन समाज की सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता के लिए अकेले लंबे समय तक लगातार लड़ते रहे और उन्होंने अपने खराब स्वास्थ्य को दृष्टिगत दृष्टिगत रखते हुए बहुजन समाज के लिए संवैधानिक व्यवस्था इस क़दर और उम्मीद में रखी थी,कि भविष्य में फिर कभी यदि कोई बहुजन नायक पैदा होता तो उसे इस व्यवस्था का लाभ बहुजन हित में उठाने का रास्ता सुगम और सहज हो सकता है।उसी उम्मीद का परिणाम है,कांशी राम जी और बहन मायावती जी की सामाजिक व राजनीतिक इंजीनियरिंग और कैमिस्ट्री पर आधारित बहुजन समाज पार्टी की सफल व सार्थक प्रयोगवादी राजनैतिक यात्रा। सामाजिक और राजनैतिक गलियारों में निर्विवाद रूप से डॉ आंबेडकर जी की सामाजिक व संवैधानिक  व्यवस्था/विरासत के असली पोषक/उत्तराधिकारी और  बहुजन समाज की राजनीति के सफल प्रयोगकर्ता कांशी राम जी को ही माना जाता है। कांशी राम ने दलित महानायक के सम्मान की खातिर एक अच्छी सरकारी नौकरी छोड़कर बामसेफ और डी एस4 के मंचों से पैदल,साईकिल और बसों ट्रेनों से हजारों सभाएं और किलोमीटर की यात्राओं के माध्यम से सामाजिक जनजागृति करते हुए बीएसपी गठित कर अपनी राजनीतिक सूझबूझ और बहन मायावती के तेजतर्रार और प्रखर नेतृत्व में बहुजन समाज की राजनीति को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने में राजनीतिक गलियारों में दलित राजनीति को एक नई बहस का मुद्दा बना दिया था।कांशी राम जी ने अपनी जीवित अवस्था में ही बहन मायावती जी को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।यदि कांशी राम जी अपनी जीवित अवस्था में ऐसा न भी कर पाए होते, तो भी उनकी राजनीति की विरासत की असली हकदार बहन जी के अलावा कोई हो ही नहीं सकता था,क्योंकि बहन जी ने तत्कालीन सामाजिक विषमताओं और परिवार की कपोलकल्पित मर्यादाओं की परवाह किए बगैर सरकारी नौकरी छोड़कर बहुजन समाज की सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन की लंबी यात्रा में कांशी राम जी के साथ कंधा से कंधा मिलाकर अंतिम समय तक उनका एक बेटी के रूप में साथ दिया है।बहन जी को एक लड़की होने के नाते तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक स्तर पर आपत्ति और अपमानजनक अनगिनत टिप्पणियों का सामना करना पड़ा होगा? ऐसे में बहुजन समाज को चाहिए कि वह राजनैतिक रूप से धैर्य और संयम रखते हुए डॉ. भीम राव आंबेडकर, कांशी राम और बहन मायावती जी के जीवन संघर्ष को सदैव अपने और समाज के सामने रखकर बहुजन समाज के राजनैतिक चिंतन व विमर्श को जीवित रखने के प्रयासों में कोई कोर-कसर बाकी न रखें,तभी डॉ आंबेडकर और कांशी राम जी का मिशन बहन मायावती जी के नेतृत्व में आगे बढ़ सकता है। वर्तमान बहुजन समाज पार्टी या उसके नेतृत्व के कुछ सन्दर्भो या प्रसंगों और श्रृंखलाबद्ध राजनैतिक नेतृत्व के किसी स्तर पर संवादहीनता के कारण उत्पन्न अदृश्य व काल्पनिक अपारदर्शिता पर बहुजन समाज के कुछ अतिमहत्वाकांक्षी लोगों की अदूरदर्शी सोच की वजह से असहमति जैसी स्थिति हो सकती है,किन्तु उसे पारस्परिक विचार-विमर्श के माध्यम से दूर करने के प्रयास कर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता हैं।नेतृत्व के प्रति असहमति या नेतृत्व श्रृंखला की कुछ कमियों का अर्थ यह कदापि नहीं निकलता है,कि उसकी आधारपरक राजनैतिक विचारधारा का विभाजन कर उस दल के समानांतर एक और राजनैतिक दल खड़ा कर देना,जिनका अंतिम लक्ष्य एक ही हो,का कोई सार्थक औचित्य प्रतीत नहीं होता है। यह बहुजन समाज की स्थापित राजनैतिक शक्ति में फूट या बिखराव डालने के अलावा कुछ नहीं हो सकता।दूसरे दलों जैसे कांग्रेस और बीजेपी में दलित नेताओं को कांशी राम जी “गुलाम चमचों” की संज्ञा दिया करते थे।यदि कांशी राम जी आज जीवित होते तो बीएसपी को कमज़ोर करने के उद्देश्य से उसके समानांतर खड़े किए जा रहे दलों के नेताओं को “स्वतंत्र चमचों” की संज्ञा देने के अलावा कुछ नहीं कहते। भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद को राजनैतिक दल गठित करने से पहले एक बार डॉ आंबेडकर,कांशी राम और बहन मायावती जी के सामाजिक व राजनैतिक जीवन संघर्ष का गहनता व गंभीतापूर्वक अवलोकन और मूल्यांकन करना चाहिए था।इन तीनों महान सख्शियतों ने अपने निजी और पारिवारिक जीवन की तिलांजलि देकर देश के दलितों,वंचितों और शोषितों के लिए सामाजिक जनजागृति की लंबी संघर्ष युक्त आंदोलनात्मक यात्रा की भट्टी में स्वयं को झोंककर बहुजन समाज का विश्वास जीतने में सफलता प्राप्ति के बाद बीएसपी की राजनीतिक यात्रा को इस मुकाम पर पहुंचा पाया है।यदि इस यात्रा में वह दो कदम चल नहीं सकते हैं,तो इस यात्रा के रास्ते पर चलने वाले बहुजन समाज को दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से दूसरा रास्ता बनाने का काम तो नहीं करना चाहिए था। अब बहुजन समाज सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से काफी जागरूक और सजग हो चुका है। यदि चन्द्रशेखर आजाद अपने को बहुजन समाज का सच्चा हितैषी मानते हैं तो अपने नदी रूपी नवगठित राजनीतिक दल  का रुख बीएसपी जैसे राजनैतिक समुद्र की ओर अग्रसर करने में ही बहुजन समाज का व्यापक हित या उद्देश्य पूरा होने की संभावनाएं बनती हैं।  बहुजन समाज की छिन्न-भिन्न शक्ति से डॉ आंबेडकर जी और कांशी राम जी के अधूरे सपने या मिशन को गंतव्य/लक्ष्य तक पहुंचाना असम्भव सा लगता है। लेखक वाई डी पीजी कॉलेज, लखीमपुर खीरी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। संपर्क- 9415461224

दलित दस्तक मैग्जीन का जनवरी-फरवरी 2020 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2020/03/jan-feb2020.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का आठवां -नौवां अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस: झूठ का भ्रमजाल

संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम पर विविध प्रतिक्रयाएं सामने आईं हैं, जिनमें से कई नकारात्मक हैं. एक ओर जहाँ उत्तरपूर्व में इस नए कानून का भारी विरोध हो रहा है, जिसमें कई लोगों की जानें जा चुकीं है, वहीं इससे संविधान में आस्था रखने वालों और मुसलमानों में गंभीर चिंता व्याप्त हो गयी है. यह कानून पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के ऐसे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन और ईसाई रहवासियों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने का अधिकार देता है, जिन्हें उनके देशों में प्रताड़ित किया जा रहा है. इस सूची में इस्लाम धर्म का पालन करने वालों का नाम नहीं है. म्यांमार जैसे देशों में मुसलमानों पर भीषण अत्याचार हो रहे हैं परन्तु वे इस सूची में शामिल नहीं है. इस कानून में जिन तीन देशों का उल्लेख किया गया है, वहां भी मुसलमानों के कई पंथों के सदस्यों को प्रताड़ित किया जा रहा है परन्तु उनके लिए इस कानून में कोई स्थान नहीं है.

इस कानून के खिलाफ बहुत कुछ लिखा जा रहा है. यह कहा जा रहा है कि यह बहुलतावादी भारत को एक हिन्दू राष्ट्र में बदलने का षडयंत्र है. यह भी चिंता का विषय है कि इस कानून का बचाव करते हुए यह आरोप लगाया जा रहा है कि धर्म के आधार पर देश के विभाजन के लिए कांग्रेस दोषी है. यह एक सफ़ेद झूठ है. राज्यसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए कहा कि, “इस देश का विभाजन अगर धर्म के आधार पर कांग्रेस ने न किया होता, तो इस बिल का काम नहीं होता.” इसके जवाब में कांग्रेस के शशि थरूर ने कहा की शायद श्री शाह उनके स्कूल में इतिहास के पीरियड में जो पढ़ाया जाता था, उस पर ध्यान नहीं देते थे.

शाह आरएसएस के कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने बाद में संघ की विद्यार्थी शाखा एबीवीपी की सदस्यता ले ली थी. शशि थरूर का यह कहना सही है कि शाह ने स्कूल में इतिहास की पढ़ाई ठीक से नहीं की. परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने आरएसएस की शाखाओं में पढ़ाये जाने वाले इतिहास को न केवल ग्रहण किया है बल्कि उसे आत्मसात भी किया है. हम सब जानते हैं कि महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का भी मानना था कि भारत के विभाजन के लिए कांग्रेस के शीर्षतम नेता गांधीजी ज़िम्मेदार थे. अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादी भी यही मानते हैं. राष्ट्र का आधार धर्म है, यह बात सबसे पहले सावरकर और उनके बाद जिन्ना ने कही थी. परन्तु धर्म को राष्ट्र की आधार मानने के विचार की नींव रखने वाले थे हमारे औपनिवेशिक शासक जिन्होने एक ओर मुस्लिम लीग तो दूसरी ओर हिन्दू महासभा-आरएसएस को हर तरह से बढ़ावा दिया.

अंग्रेजों को लगता था कि ये दोनों संगठन ‘बांटो और राज करो’ की उनकी नीति को लागू करने में सहायक होंगे. सन 1942 में जब राष्ट्रीय आन्दोलन अपने चरम पर था, तब अंग्रेजों का ध्यान एक अन्य कारक पर भी गया. और वह था तत्कालीन विश्व की भौगोलिक-राजनैतिक परिस्थितियां. उस समय, सोवियत संघ एक महाशक्ति बन चुका था और ब्रिटेन-अमरीका की विश्व पर दादागिरी को चुनौती दे रहा था. सोवियत संघ दुनिया भर के औपनिवेशिकता-विरोधी आंदोलनों का प्रेरणास्त्रोत भी था. स्वाधीनता आन्दोलन के कई नेता समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे. यह सब देखकर ब्रिटेन को लगा कि अगर उसे दुनिया के इस हिस्से में अपना वर्चस्व बनाये रखना है तो उसे भारत को विभाजित करना ही होगा.

धर्म-आधारित राष्ट्रवाद, ज़मींदारों और राजाओं के घटते प्रभाव की प्रतिक्रिया में उभरा. औद्योगिकीकरण, संचार के बढ़ते साधनों और आधुनिक शिक्षा के प्रसार के चलते, भारत एक धर्मनिरपेक्ष-प्रजातान्त्रिक राष्ट्र के रूप में उभर रहा था. मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा और बॉम्बे एसोसिएशन जैसे समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों और सामाजिक परिवर्तनों की लहर ने सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन्म दिया. ज़मींदारों और राजाओं के अस्त होता वर्ग, समानता का सन्देश देने वाली सामाजिक शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से घबरा गया. उसे लगने लगा कि जन्म-आधारित ऊंच-नीच की अवधारणा पर खड़ा उनके वर्चस्व का किला दरक रहा है.

लगभग इसी समय, मुसलमानों का एक वर्ग कहने लगा कि भारत में इस्लाम खतरे में हैं. हिन्दुओं के एक वर्ग ने, हिन्दू धर्म के खतरे में होने का राग अलापना शुरू कर दिया. राष्ट्रीय संगठनों और अन्यों ने दलितों और महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. सामंती वर्ग को लगा कि यह धर्म पर आधारित असमानता पर हमला है. उनके संगठनों में प्रारंभ में केवल ज़मींदार और राजा थे. परन्तु बाद में, उन्होंने देश के कुलीन वर्ग और तत्पश्चात आम लोगों के एक तबके को भी अपने साथ लेने में सफलता हासिल कर ली. यहीं से हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवाद की नींव पड़ी. इस प्रकार, एक ओर था भारतीय राष्ट्रवाद, जिसके प्रतिनिधि गाँधी, अम्बेडकर और भगत सिंह जैसे नेता थे तो दूसरी ओर था धार्मिक राष्ट्रवाद जिसके चेहरे थे मुस्लिम लीग, जिसका गठन 1906 में हुआ और हिन्दू महासभा और आरएसएस, जो क्रमशः 1915 और 1925 में अस्तित्व में आये. जहाँ भारतीय राष्ट्रवादी, देश में व्याप्त असमानता के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे वहीं धार्मिक राष्ट्रवादी अपने-अपने प्राचीन गौरव का गुणगान कर रहे थे.

सावरकर, हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे का विरोधी मानते थे. मुस्लिम लीग को लगता था कि हिन्दू बहुसंख्यक देश में मुसलमानों को समान अधिकार नहीं देंगे. हिन्दू राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाना शुरू कर दिया, जिसकी परिणीति सांप्रदायिक दंगों के रूप में सामने आई.

देश में सांप्रदायिक हिंसा के दावानल ने कांग्रेस को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह माउंटबैटन के देश के विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले. कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार करते हुए अपने प्रस्ताव में कहा कि यद्यपि वह द्विराष्ट्र सिद्धांत (जिसके समर्थक सावरकर, जिन्ना, गोलवलकर, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आरएसएस थे) को स्वीकार नहीं करती, तथापि देश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा की तुलना में वह विभाजन को देश के लिए कम बुरा मानती है. विभाजन की रूपरेखा बनाने वाले वीपी मेनन के अनुसार, “पटेल ने दिसंबर 1946 में ही देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया था परन्तु नेहरु इसके लिए छह माह बाद राजी हुए”.

मौलाना आजाद और गांधीजी ने द्विराष्ट्र सिद्धांत और देश के विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया परन्तु देश में साम्प्रदायिकता के नंगे नाच को देखते हुए, उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा. अमित शाह और आरएसएस का यह दावा एकदम गलत है कि कांग्रेस ने धर्म को राष्ट्र के आधार के रूप में स्वीकृति दी.

लेखकः राम पुनियानी

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

दलित दस्तक मैग्जीन का दिसम्बर 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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क्या दलित संविधान प्रदत अधिकार खोने जा रहे हैं !

आज 6 दिसम्बर है. बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस. यूं तो आज के खास दिन बाबासाहेब को पूरा देश ही नहीं, जन्मगत कारणों से शोषण-वंचना की शिकार बने पूरे विश्व के लोग ही कमोबेश याद करेंगे, श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे, किन्तु दलितों की बात और होगी. आज उनके हजारों संगठन बाबासाहेब के अवदानों को याद करने और अपनी मुक्ति का नया संकल्प लेने के लिए जगह-जगह संगोष्ठियाँ–सभाएं आयोजित करेंगे. मार्च निकालेंगे. लेकिन सबकुछ के बावजूद ऐसा लगता है जिन अधिकारों से बाबासाहेब ने उन्हें लैस किया, उसे भविष्य में वे शायद बरक़रार नहीं रख पायेंगे. ऐसा क्यों और कैसे हो सकता है, इसे जानने के लिए दलित समुदाय के दर्दनाक इतिहास का एक बार सिंहावलोकन जरुरी है.

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की भांति ही दलित, जिन्हें भारत में सामाजिक क्रांति के प्रणेता ज्योतिबा फुले अतिशूद्र कहा करते थे एवं संविधान में जिन्हें अनुसूचित जाति के रूप में चिन्हित किया गया है, हिंदू-धर्म की प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था की उपज हैं जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक-शैक्षिक) की वितरण-व्यवस्था रही. वैदिक आर्यों द्वारा प्रवर्तित वर्ण-व्यवस्था में दलितों के लिए अध्ययन-अध्यापन, शासन–प्रशासन, सैन्य वृत्ति, भूस्वामित्व, व्यवसाय-वाणिज्य और आध्यात्मानुशीलन इत्यादि का कोई अधिकार नहीं रहा. यही नहीं हिंदू समाज द्वारा अस्पृश्य रूप में धिक्कृत व बहिष्कृत दलितों को अच्छा नाम रखने या देवालयों में घुसकर ईश्वर की कृपालाभ पाने तक के अधिकार से भी पूरी तरह वंचित रखा गया. दलितों को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर मानव जाति के समग्र इतिहास का सबसे अधिकार-विहीन मानव-समुदाय में तब्दील करने वाली वर्ण-व्यवस्था को सर्वप्रथम चुनौती गौतम बुद्ध की तरफ से मिली. उनके प्रयत्नों से वर्ण-व्यवस्था में शिथिलता आई. वर्ण-व्यवस्था में शैथिल्य का मतलब शक्ति के जिन स्रोतों से दलितों को वंचित किया गया था, उनमें उनको अवसर मिलने लगा. किन्तु यह स्थिति चिरस्थाई न बन सकी. अंतिम बौद्ध सम्राट बृहद्रथ की पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या के बाद के हिन्दुराज में वर्ण-व्यवस्था नए सिरे से सुदृढ़ हो गयी. इसके सुदृढ़ होने के फलस्वरूप दलितों को आगामी दो हज़ार सालों तक शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत हो कर रह जाना पड़ा.

शुंगोत्तर काल में मानवेतर बने दलितों को थोड़ी राहत मध्यकाल में ही मिल पाई. उक्त काल में सवर्णों और शूद्रातिशूद्रों में कई ऐसे संतों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी भक्तिमूलक रचनाओं के जरिये जातिभेद का विरोध करने सबल प्रयास किया. इनमें उत्तर भारत में रामानंद, रैदास, कबीर, नानकदेव; पूरब में चैतन्य और चंडीदास; पश्चिम में चोखामेला, नामदेव, तुकाराम और दक्षिण में निबारका और बसव का नाम प्रमुख है. किन्तु इन संतो के प्रयासों से दलितों को भावनात्मक रूप से राहत भले ही मिली, शक्ति के स्रोतों में कुछ नहीं मिला. बहरहाल जिन दिनों भारत के क्रान्तिकारी कहे जानेवाले संत ईश्वर की नज़रों में सबको एक बताने का उपदेश करने में निमग्न थे, उन्ही दिनों यूरोप के संत मार्टिन लूथर के सौजन्य से वहां वैचारिक क्रांति कि शुरुआत हुई जिसे रेनेसां (पुनर्जागरण) कहते हैं. परवर्तीकाल में अंग्रेजों के सौजन्य से 19 वीं सदी के में मानव सभ्यता का कलंक बने भारत में भी नवजागरण की शुरुआत हुई. राष्ट्रीयता और सामाजिक परिवर्तन का बीजारोपड़ इसी काल में हुआ, इसी काल में अंग्रेजी पढ़े -लिखे आभिजात्य वर्ग में स्त्री-सुधार के साथ अन्य सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों से जूझने की भावना पैदा हुई. बंगाल के राजा राममोहन से शुरू हुई समाज सुधार की यह धारा पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण दिशाओं में प्रवाहित हुई. राजा राममोहन राय द्वारा प्रारम्भ किये गए समाज सुधार कार्य को केशव चन्द्र सेन, प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर, महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद-विवेकानंद-रामलिंगम, रानाडे, आरजी भंडारकर, जी.जी अगरकर, एनजी चंदावरकर, गोखले-गाँधी इत्यादि जैसे सवर्ण समाज में पैदा हुए महान लोगों ने आगे बढ़ाया. पर ये लोग बुद्धि, तर्क, सत्य, स्वतंत्रता, समानता जैसे योरोपीय दर्शन अपना कर सती, विधवा, बालिका विवाह, बहुविवाह प्रथा और अन्य कई सामाजिक बुराइयों के खिलाफ तो अभियान चलाये किन्तु ‘अछूत-प्रथा‘ पर लगभग निर्लिप्त रहे. अस्पृश्यता के खिलाफ सीधा संघर्ष फुले ने ही शुरू किया, उन्होंने जहाँ अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर दलितों को शिक्षित करने का ऐतिहासिक कार्य किया, वहीँ सत्यशोधक समाज के माध्यम से उन्हें अंध-विश्वास से मुक्त करने में महती योगदान दिया. उनके अतिरिक्त शुद्रातिशूद्र समाज में जन्मे नारायण गुरु, अय्यनकाली, संत गाडगे, सयाजी राव गायकवाड, शाहूजी महाराज, पेरियार जैसे और कई लोगों ने दलितों की दशा में बदलाव लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया. किन्तु उपरोक्त महामानवों के प्रयासों के बावजूद सदियों से सभी मानवीय अधिकारों से शून्य अस्पृश्यों की स्थिति लगभग अपरिवर्तित रही.

ऐसी विषम परिस्थितियों में डॉ. आंबेडकर का उदय हुआ. उनके समक्ष दलितों को वर्ण-व्यवस्था के उस अभिशाप से मुक्ति दिलाने की चुनौती थी जिसके तहत वे हजारों साल से शक्ति के सभी स्रोतों से वंचित रहे. कहना न होगा उन्होंने इस चुनौती का नायकोचित अंदाज़ में सामना करते हुए दलितों को शक्ति से लैस करने का असंभव सा कार्य कर दिखाया. उन के ऐतिहासिक प्रयासों का परिणाम है कि आज दलित शक्ति के सभी स्रोतों में तो नहीं पर, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में अपनी कुछ उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हुए हैं. विगत वर्षों में हमने एक दलित को राष्ट्रपति; कुछेक को मुख्यमंत्री और ढेरों को कबीना मंत्री बनते एवं कईयों को महान चिन्तक – साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित होते देखा गया. हाल के वर्षों में कुछ को बसपा-भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष और विश्वविद्यालयों का उप कुलपति भी बनते देखा गया है. इसके अतिरिक्त उन्हीं के विचारों पर चलकर बसपा के रूप में दलितों की पहली राष्ट्रीय पार्टी के उदय का हम साक्षी बने. जैसा कि शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है कि वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही और बौद्ध काल को छोड़कर हजारों वर्षों से नर-पशुओं के लिए शिक्षक, पुरोहित, भू-स्वामी, राजा, व्यवसायी इत्यादि बनने के सारे रास्ते पूरी तरह बंद रहे. यदि वर्ण-व्यवस्था के वितरणात्मक चरित्र पर ध्यान दिया जाय तो पता चलेगा भारी प्रतिकूलताओं के मध्य बाबा साहेब शक्ति के स्रोतों में दलितों को जितना शेयर दिला पाए, बात उससे बहुत आगे नहीं बढ़ी. संविधान निर्माण के समय बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर दुनिया के सबसे असहाय स्टेट्समैन रहे. आज की तरह न तो दलितों की कोई राष्ट्रीय पार्टी थी और न हीं इनका आज जैसा कोई बौद्धिक वर्ग ही तैयार हुआ था. जो विशुद्ध हिन्दू अर्थात सवर्ण दलितों के अधिकारों के विरुद्ध सब समय प्रायः शत्रु की भूमिका में अवतरित रहे, उन्हीं सवर्णों की उस दौर की चैम्पियन पार्टी के सौजन्य से वह संविधान निर्मात्री सभा के अंग बने. अतः उनके हाथ बंधे थे. अगर ऐसा नहीं होता जिस बाबासाहेब ने अपनी महानतम रचना जाति का उच्छेद में ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए पौरोहित्य के पेशे के प्रजातान्त्रिकरण का सुझाव दिया, पूँजीवाद के साथ ‘ब्राह्मणवाद’ को सबसे बड़ा शत्रु करार देने वाले आंबेडकर क्या पौरोहित्य के पेशे के प्रजातंत्रीकरण का प्रावधान करने में कोई कमी करते? इसी तरह जिस बाबा साहेब ने 1942 में अंग्रेजी सरकार के समक्ष गोपनीय ज्ञापन के जरिये ठेकों में आरक्षण की मांग उठाये थे, क्या वे संविधान में इसकी व्यवस्था करने में कमी करते? सच्ची बात तो यह है कि जिस बाबा साहेब ने कभी यह कहा था कि यदि दलितों को मुक्ति न दिला सका तो खुद को गोली से उड़ा लूँगा, वह आंबेडकर दलितों को वर्ण-व्यवस्था के अभिशाप से निजात दिलाने के लिए शक्ति के समस्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिलाने की समस्त व्यवस्था कर देते, इसमें शायद किसी को संदेह हो. किन्तु न कर सके तो इसलिए कि वह संविधान निर्माण के समय बेहद लाचार व्यक्ति थे. बहरहाल बाबा साहेब की विवशता को ध्यान में रखते हुए उनके अनुसरणकारियों का फर्ज बनता था कि उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए वे शक्ति के समस्त स्रोतों में दलित ही नहीं, वर्ण-व्यवस्था के समस्त वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनकी वाजिब हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई लड़ते. लेकिन वे ऐसा न कर सके.

आंबेडकर उत्तरकाल के इतिहास का सिंहावलोकन करने पर साफ़ विदित होता है कि दलित संगठनों, बुद्धिजीवियों, नेताओं ने अपनी अधिकतम उर्जा धर्मान्तरण, जाति उन्मूलन, ब्राह्मणवाद विरोध जैसे अमूर्त मुद्दों में लगाया. ऐसा लगता है बाबासाहेब ने उन्हें जितने अधिकार दिलाये थे, उसे ही पर्याप्त मानते हुए शक्ति के बाकी बंचे स्रोतों में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष ही नहीं चलाये. आज इक्कीसवीं सदी में जबकि शासक दलों द्वारा संविधान को लगभग व्यर्थ और 24 जुलाई, 1991 को गृहित नवउदारवादी अर्थनीति के जरिये आरक्षण को लगभग कागजों की शोभा बना उन्हें गुलामों की स्थिति में पहुंचा दिया गया है: वे आर्थिक मुक्ति के बजाय ज्यादातर भावनात्मक मुद्दों पर उद्वेलित होते हैं. जब कहीं आंबेडकर की किसी मूर्ति को आघात पहुचाया जाता है, जब कोई रामदेव बहुजन महापुरुषों का अनादर करता है; जब कभी रैदास मंदिर तोड़ा जाता है, दलित सड़कों पर उतरने में देर नहीं लगाते. किन्तु जब सरकारी उपक्रमों को बेचा जाता है, हॉस्पिटल, रेल, हवाई अड्डों को निजी हाथों में देने की हरी झंडी दिखाई जाती है, दलित समुदाय नहीं के बराबर उद्वेलित होता है. इसकी ताजी मिसाल 1 दिसंबर, 2019 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली है जो निजीक्षेत्र में आरक्षण, न्यायपालिका में आरक्षण दिलाने के साथ केंद्र सरकार के लाभ में चल रहे बड़े-बड़े उपक्रमों के विनिवेश के खिलाफ आयोजित हुई थी, जिसमें दलितों के तमाम संगठनों के स्वतः-स्फूर्त शामिल होने की उम्मीद जताई गयी थी. किन्तु वैसा न हो सका. ले दे कर मुख्यतः उसी संगठन के लोग शामिल हुए थे, जिस संगठन ने इसे आयोजित किया था. 1 दिसंबर, 2019 को रामलीला मैदान में दलित संगठनों और एक्टिविस्टों की सीमित उपस्थिति बताती है कि आंबेडकर के लोग निकट भविष्य में उनके द्वारा प्रदान किये गए तमाम संवैधानिक अधिकारों को खोने जा रहे हैं!

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.संपर्क: 9654816191)

परिनिर्वाण दिवस पर बाबासाहेब से एक संवाद

आदरणीय बाबासाहेब जय भीम-नमो बुद्धाय आज हम अम्बेडकरवादी लोग आपका 64वां परिनिर्वाण दिवस मना रहे हैं। हम अम्बेडकरवादी लोग जिले-जिले में कार्यक्रम कर आपको याद कर रहे हैं। क्या महाराष्ट्र, क्या बंगाल। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आज आपको याद किया जा रहा है। तमाम सरकारें भी आपको श्रद्धांजलि दे रही हैं। कुल मिलाकर देश भर में आज आपकी ही चर्चा है।

खूब भाषण हो रहे हैं। हम इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि आपने क्या कहा था, आपका क्या योगदान रहा। आपने समाज निर्माण में, राष्ट्रनिर्माण में क्या-क्या योगदान दिया था। हम अम्बेडकरवादी अब आपको राष्ट्रनिर्माता से आगे बढ़कर विश्वविभूति कहने लगे हैं। हम गुमान के साथ तमाम लोगों को बताते हैं कि आप “सिंबल ऑफ नॉलेज हैं।” यह भी कि आप “ग्रेटेस्ट इंडियन” हैं।

लेकिन हम इस बात कि चर्चा नहीं कर रहे हैं कि आपने हमलोगों से क्या उम्मीद की थी। हम इस बात की चर्चा नहीं कर रहे हैं कि आपने हमसे क्या चाहा था, हमसे कैसा समाज बनाने की उम्मीद की थी। हमें आपने जो शिक्षित होने, संगठति होने और संघर्ष करने का मूलमंत्र दिया था, उस बारे में हम कितना आगे बढ़े हैं। हम इस बात की भी चर्चा नहीं कर रहे हैं कि आपने जिस सत्ता पर वंचितों के बैठने का सपना देखा था, उस बारे में हम क्या कर रहे हैं।

आपके शिक्षा वाले उपदेश का हम पर व्यापक असर हुआ है। पूरा समाज इसे अमल में ला रहा है। बच्चे पढ़ रहे हैं, गार्जियन पढ़ा रहे हैं। अभाव के बावजूद बच्चों को शिक्षा दिलाने का काम हो रहा है। आपके जाने के बाद बहुत सारे लोग आईएएस-आईपीएस, प्रोफेसर, डॉक्टर और इंजीनियर बन गए हैं। हमारे लोगों की कोठियां बन गई हैं, कुछ लोगों के पास तो बड़ी गाड़ियां और बंग्ले भी हैं। लेकिन हम अभी तक अपना कोई एजुकेशन सिस्टम खड़ा नहीं कर पाए हैं, जैसा आपने ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी’ के तहत करने की शुरुआत की थी। दूसरी ओर अब देश की सरकारों को हमारा शिक्षित होना अखरने लगा है, क्योंकि हम आंदोलन करने लगे हैं। सही-गलत समझने लगे हैं। इसलिए सरकार शिक्षा को इतना महंगा कर देना चाहती है कि आने वाले दिन मुश्किल भरे दिख रहे हैं।

लेकिन इस शिक्षा की बदौलत आगे बढ़ने वाले लोगों में एक नई दिक्कत पैदा हो गई है। वो समाज से ऊपर होकर एक वर्ग हो गए हैं। हालांकि सभी ऐसे नहीं हैं, तमाम लोग अच्छे भी हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों का हाल यह है कि वह अपनी सफलता का श्रेय आपको देने की बजाय मिट्टी की मूरत को देने लगे हैं। वह आपके संघर्ष को भूल चुके हैं, जो आपने उनके लिए किया। वो तो अब अपनी जाति भी नहीं बताते और छुपकर रहते हैं।

दूसरी बात आपने संगठित होने की कही थी तो यहां बड़ी दिक्कत है। मुझे यह बताते हुए अच्छा नहीं लग रहा है कि आपका समाज संगठित नहीं है। एक शहर में अगर समाज के 10 हजार लोग हैं तो महज 200-300 लोग ही संगठित हैं। बाकी हम आपस में खूब लड़ते हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं। आपस में ही जातिवाद भी करते हैं। आपने इतनी मेहनत और खोज से जो किताबें लिखी थी, जिसमें आपने हमारा इतिहास बताया था, उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है। जिन्होंने पढ़ा है, वो थोड़ा सुधरे हैं, बाकियों को ये सब बेकार लगता है।

हम आपके नाम पर संगठित भी हुए हैं। देश भर में आपके नाम पर लाखों संगठन हैं। आपके समाज के नेता भी खूब संगठित हैं। जब भी इनके अधिकारों से छेड़-छाड़ होती है, ये संसद जाम कर देते हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के 150 के करीब सांसद पार्टी की दीवार लांघ कर साथ आ खड़े होते हैं। लेकिन हां, जब समाज के हकों पर डाका पड़ता है तो अपने आकाओं के आगे इनकी जुबान नहीं खुलती है। एससी-एसटी वर्ग के अधिकारों को लेकर ये संसद जाम करने का माद्दा नहीं रखते। ये खुद ही अपने आरक्षण की कॉपी फाड़ देते हैं। दलित उत्पीड़नों पर चर्चा करने से तो ये ऐसे बचते हैं जैसे उन बेटियों के शरीर से रिसते खूब इनके झक सफेद कुर्तों को गंदा कर देंगे।

हालांकि आपके जाने के बाद 90 के दशक में एक बड़ा काम यह हुआ कि कांशीराम नाम के एक व्यक्ति ने आपसे प्रेरणा लेकर सत्ता की मास्टर चाभी को हासिल कर लिया। वह आपके परम अनुयायी थे। बड़ी मेहनत से उन्होंने वंचित समाज को एकजुट किया और एक बड़े प्रदेश में सत्ता को हासिल किया। लगा कि अब वक्त बहुजनों का है। वंचितों को न्याय मिलेगा। लेकिन उनके जाने के एक दशक बाद चीजें फिर खराब होने लगी। उस दौरान पैदा हुए नेता सत्ता के मोह में ऐसे फंसे कि समाज पीछे छूटने लगा। तमाम नेता अपने लिए सुविधाओं का पहाड़ खड़ा करने में जुट गए और इस कोशिश में कुछ ऐसे काम कर गए कि वह केंद्र के दबाव में रहने लगे। बाकी के जिन अन्य नेताओं से उम्मीद थी, उन्होंने किसी न किसी बड़ी पार्टी का दामन थाम कर समझौता कर लिया और उनका नारा बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की जगह स्वजन हिताय – स्वजन सुखाय हो गया है।

संघर्ष भी हमने इधर खूब किया है। 2 अप्रैल 2018 को हमने सरकार को चने चबवा दिये थे, जब संविधान में मिले हमारे एससी-एसटी अधिनियम को बदलने की कोशिश की गई। लेकिन संघर्ष की कहानी यहीं तक नहीं है। संघर्ष हम आपस में भी खूब कर रहे हैं। आपके नाम पर देश भर में लाखों संगठन हैं, हम उसका अध्यक्ष बनने के लिए खूब संघर्ष करते हैं। चमार-वाल्मीकि, धोबी, पासी, खटिक, महार, मातंग आदि-आदि का भी आपस में खूब संघर्ष है। हम सब खुद को दूसरे से बेहतर होने का दावा कर खूब संघर्ष करते हैं।

एक और जो महत्वपूर्ण बात आपके बतानी थी, वह यह है कि इन दिनों हम ब्राह्मणों और मनुवादियों को खूब गाली दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर हमने उनके छक्के छुड़ा रखे हैं। यू-ट्यूब पर उन्हें पानी पी-पीकर गरिया रहे हैं। ट्विटर पर अपनी बात ट्रेंड करवा रहे हैं। हमने अपनी सारी परेशानियो के लिए उन्हें दोष दे रखा है। भले ही हम आपस में खूब जातिवाद करें, भले ही हम एक-दूसरे की टांग खिंचते रहें। भले हीं हमारे सैकड़ों नेता अलग-अलग आकाओं की गुलामी करते रहें। हमने तय किया है कि हम आपस में लड़ते रहेंगे लेकिन अपनी तमाम परेशानियों, पिछड़ेपन और गरीबी सबका ठीकरा मनुवादियों के सर पर फोड़ेंगे।

लेकिन हां, सब कुछ बुरा ही नहीं है। बहुत सारे लोग सच्चाई से आपके देखे सपने को पूरा करने में भी लगे हैं। इसमें अनपढ़ से लेकर अधिकारी तक शामिल हैं। तमाम अभावों के बावजूद, तमाम जिम्मेदारियों के बावजूद ये लोग नीले झंडे के रंग को बुझने से रोके हुए हैं। तन, मन, धन से आपके सपने के लिए काम कर रहे हैं।

बाकी सब ठीक है। जल्दी ही गणतंत्र दिवस आएगा, हम फिर आपको याद करेंगे, फिर 14 अप्रैल आएगा, हम फिर आपकी जयंती मनाएंगे। फिर संविधान दिवस आएगा तो भी हम आपको याद करेंगे। संविधान दिवस के बाद फिर से आपका परिनिर्वाण दिवस आएगा, हम फिर से आपको श्रद्धांजलि देंगे। फिलहाल आप 26 जनवरी तक आराम करिए। एक बार फिर से आपको जय भीम-नमो बुद्धाय। – ‘मूकनायक’ के जरिए आपने जो सपना देखा था, उसको पूरा करने में लगा आपका एक अनुयायी अशोक दास (संपादक, दलित दस्तक)

दलित दस्तक मैग्जीन का नवम्बर 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2020/03/november2019.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का छठा अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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Dismantling Casteism & Racism Symposium

“Jai Bhim! Jai Martin Luther King!” So began Professor Kancha Ilaiah Shepherd’s address to a packed audience at the Michigan League on Saturday, October 12. Invoking Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar and Dr. Martin Luther King—two stalwarts in the global struggle against racism and casteism—Professor Shepherd kicked off a full-day of presentations and discussions for the symposium “Dismantling Casteism & Racism: Continuing the Unfinished Legacy of Dr. B.R. Ambedkar.” The event was a first-ever collaboration between the Ambedkar Association of North America (AANA) and University of Michigan’s Program in Asian/Pacific Islander American (A/PIA) Studies. Aimed at building solidarity and examining issues that pertain to the Dalit community in South Asia, the symposium explored the politics of dignity and equal rights for marginalized communities in a global context with an emphasis on intersections with issues of gender, race, and religion. As the organizers put it, “We seek to strengthen conversations between scholars, activists, and practitioners in analyzing caste-based discrimination and violence in South Asia and beyond.”

The Vandenberg room of the Michigan League was filled with nearly one-hundred audience members, including guests from California, Chicago, Toronto, Indiana and Kentucky. Two long-time activists of the Ambedkarite movement, Dr. Velu Annamalai (Washington, DC) and Dr. Gary Bagha (Sacramento) were also in attendance. During a reception held in Sterling Heights on Friday, Dr. Annamalai—the former executive director of the International Dalit Forum—spoke about his early years as an activist for the Dalit cause when he first immigrated to the U.S. in the late 1960s. Dr. Annamalai described his efforts lecturing across the country to African American audiences about the struggle against casteism and penning editorials in Indian-American newspapers that challenged the benevolent image of Gandhi by highlighting his record of anti-Black racism and his role in undermining Dalit self-determination.

Dismantling Casteism & Racism Symposium

The Saturday morning session featured speeches from Professor Kancha Ilaiah Shepherd, who recently retired from the Center for theStudy of Social Exclusion and Inclusive Policy at Maulana Azad University, and Thenmozhi Soundararajan, the director of Equality Labs and former director of AANA in the U.S. One of India’s most prominent anti-caste intellectuals, Shepherd spoke about the “spiritual fascism” that undergirds caste practice and sharply criticized the virulent Hindu nationalism of modern India that continues to persecute and disenfranchise the Dalitbahujan community. Continuing these themes, Soundararajan discussed the role of “Hindu fascism” in proliferating a climate of violence and hatred towards Dalits, Muslims, Christians, and other non-upper-caste communities. Her presentation displayed examples of the proliferation of hate speech against Muslims and Dalits on social media as well as the bipartisan inroads that the Hindu Right have made in U.S. electoral politics. Her presentation askeda captivated audience to consider, “What does it mean to be an Ambedkarite during a time of fascism?” “It means more than just coming to a conference,” Soundararajan explained, imploring the audience to consider how to continue the struggle against casteism and Hindutva outside of ivory tower spaces.

An afternoon session featured three panelists who discussed more personal impacts of casteism, colorism, and racism by focusing on the role of mental health. Ankita Nikalje, M.S., M.Ed, a doctoral candidate at the College of Education at Purdue, described her personal experiences of living as a Dalit woman and connected her narrative to recent studies which highlight the rampant caste-based discrimination in the Asian-Indian immigrant community in the U.S in education, employment, local businesses, places of worship, and interpersonal relationships. Professor Ronald Hall from Michigan State University, whose scholarship has focused on the role of “colorism” in the African American community, drew connections between colorism and caste in South Asia. The final panelist, Professor Gaurav Pathania from George Washington University, explored the ways that student activism in India has empowered Ambedkarite scheduled castes, scheduled tribes, and OBC students to construct a new narrative to counter the mainstream narratives of Hindu mythology within the sacred spaces of higher education. He closed the afternoon panel with a recitation of his poem, “The Moon Mirrors a Manhole. To conclude the event, Mahesh Wasnik, a co-founder of the AANA and symposium organizer, presented plaques and a copy of the Indian constitution to each of the panelists.

The symposium was the culmination of a conversation that began in January 2019, initiated by Mahesh Wasnik and Vivek Chavan of AANA in coordination with Professor Manan Desai of UM’s A/PIA Studies program. In the end, the symposium brought together a number of communities not only at the University of Michigan and Metro-Detroit region, but nationally. It was sponsored by community organizations including the Periyar-Ambedkar Circle, the American Federation of Muslims of Indian Origin, and the Association for India’s Development. A long list of University of Michigan sponsors also generously funded and supported the event, including A/PIA Studies, the Department of American Culture, the Office of Diversity, Equity, and Inclusion, Rackham’s DEA Programmatic Support Fund, the LSA Humanities Institute Mini Grant for Public Humanities, the Center for South Asian Studies, the Department of English Language & Literature, the Department of Comparative Literature, the Center for South Asian Studies, the Department of History, the Global Scholars Program, and the Barger Leadership Institute.

The organizers especially thankthe following individuals who made the event possible: Vivek Chavan, Rakesh Raipure, Chatak Dhakne, Prabhu Karan, Dinesh Pal, Ganganithi Sivapandian, Sandeep Kulkarni, Anshul Sontakke, Rohit Meshram, Bikash, and Bipin.

आपने कल क्या किया? दीपावली मनाई या फिर दीपदानोत्सव?

आपने कल क्या किया? दीपावली मनाई या फिर दीपदानोत्सव, या फिर एक बार फिर त्यौहारों को लेकर द्वंद में पड़े रहें? अच्छा दोनों में फर्क क्या है, और दोनों को मनाने का आपका तर्क क्या है? बीते हफ्ते भर से अम्बेडकरवादियों के फोन दीपावली Vs दीपदानोत्सव की बहस से फट रहे थे। दीपदानोत्सव वाले इसे लगातार बौद्ध त्यौहार बता रहे थे। उनके मुताबिक जिस पर बाद में हिन्दुओं ने कब्जा कर लिया। अच्छा दीपावली भी मजेदार त्यौहार है। यह हिन्दू समाज भी मनाता है, सिख धर्म वाले भी मनाते हैं, जैन धर्म वाले भी और कुछ भारतीय बुद्धिस्ट भी। मैंने भारतीय बुद्धिस्ट इसलिए कहा क्योंकि थाईलैंड और श्रीलंका सहित तमाम अन्य बौद्ध देश दीपावली नहीं मनाते। दीप दानोत्सव वाले पक्ष के विरोधियों का तर्क है कि उन्होंने कहीं भी बाबासाहब या फिर बौद्ध साहित्य में दीप दानोत्सव के बारे में नहीं पढ़ा। दीप दानोत्सव के पक्षधरों द्वारा सम्राट अशोक द्वारा जो 84 हजार बौद्ध स्तूपों पर दीया जलाने की बात की जाती है, या फिर तथागत बुद्ध के उनके नगर में लौटने के दौरान नगर को दिये से रौशन करने की जो बात कही जाती है, उसे भी दीपदानोत्सव मनाने का विरोधी पक्ष मनगढ़ंत कहता है। विरोधी पक्ष का कहना है कि कहीं बौद्ध साहित्य में इसका प्रमाण नहीं है। उनका दूसरा तर्क यह है कि अगर दीप दानोत्सव बौद्ध त्यौहार है तो आखिर यह अन्य बौद्ध देशों में क्यों नहीं मनाया जाता। मैंने बौद्ध साहित्य की सभी पुस्तकें नहीं पढ़ी इसलिए पहले तर्क के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कह सकता, लेकिन मुझे दूसरा तर्क दमदार लगता है। एक सवाल यह भी आता है कि दीप दानोत्सव कब मनेगा, इसका आधार हिन्दू पांचांग और कैलैंडर ही क्यों होता है? बौद्ध धम्म का कोई विद्वान भंते क्यों नहीं बताता कि दीप दानोत्सव कब है।

दूसरी बात, मान लिजिए कि अम्बेडकरवादियों का एक धड़ा अगर दीपदानोत्सव मनाना चाहता है तो दिक्कत क्या है? उनके तर्क के मुताबिक अगर वो इसी बहाने घर के कोने-कोने की सफाई कर लेते हैं, सालों से पड़ा हुआ बेकार सामान नष्ट कर लेते हैं, घरों की पुताई करवा लेते हैं और इस दिन तथागत बुद्ध और बाबासाहब के आगे दीप जला लेते हैं तो किसी को क्यों दिक्कत होनी चाहिए, क्योंकि आखिर उन्होंने किसी अन्य काल्पनिक ईश्वर के सामने तो माथा नहीं टेका। इस दिन को मुस्लिम भी दीये जलाते पाते गए हैं, क्रिश्चियन में भी कई लोग जलाते हैं। फिर अगर बुद्धिस्टों ने दीया जलाया तो इतनी हाय तौबा क्यों?

तीसरी बात, हिन्दू नहीं होने और बौद्ध होने के द्वंद में फंसे समाज के लिए यह कितना आसान है कि वह ऐसा त्यौहार नहीं मनाए जो उसी के घर-परिवार में 99 फीसदी लोग मना रहे होते हैं। मुस्लिम कोई हिन्दू और अन्य धर्मों का त्यौहार नहीं मनाते, क्रिश्चियन भी किसी अन्य धर्म का त्यौहार नहीं मनाते। और उनके लिए ऐसा करना आसान होता है, क्योंकि उनका हिन्दू धर्म से वास्ता नहीं होता। उनके नाते-रिश्तेदार सभी उसी धर्म के लोग होते हैं। उनके हक में जो बात सबसे ज्यादा होती है कि वह अपने ही समाज के लोगों के बीच रहते हैं। एक मुसलमान का या फिर एक क्रिश्चियन का पड़ोसी और नाते-रिश्तेदार भी इसी समाज का होता है। जबकि अम्बेडकरी समाज की दिक्कत यह है कि इस समाज का तकरीबन 95 फीसदी आदमी जो आज अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट होने की राह में है, कल तक उसके परिवार के लोगों का संबंध उसी धर्म से था, जिससे आज वो दूर भागना चाहता है। जिनकी पिछली पीढ़ी अम्बेडकरवादी या बुद्धिस्ट नहीं है, ऐसे लोगों की बात करे तो अम्बेडकरवाद को समझने और बुद्धिज्म को अपनाने के वक्त तक उनकी तकरीबन आधी जिंदगी निकल चुकी होती है। यह खुद को अपने उस पुराने धर्म से तभी बेहतर तरीके से और जल्दी काट पाएगा जब वो उन लोगों के बीच रहे जिनसे उनकी सांस्कृतिक एकरूपता है। यानि वह भी मुसलिम, क्रिश्चियन और सिख समाज की तरह एक साथ एकजुट रहे।

आखिरी बात, दीपावली और दीपदानोत्सव के द्वंद के बीच बेहतर यह होगा कि बौद्ध समाज के विद्वान जिनमें विद्वान भंतेगण, पुराने बुद्धिस्ट और बौद्धाचार्य शामिल हैं, उनको एक साथ बैठकर धम्म सम्मेलन करना चाहिए। दीपदानोत्सव होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए, इस विषय पर सबका पक्ष सामने आने के बाद आपसी सहमति से एक फैसला ले लें, जिसे पूरा अम्बेडकरी समाज और बौद्ध समाज माने। ध्यान रहे, मैंने अम्बेडकरी और बौद्ध समाज कहा। बाकी जो लोग खुद को इस दायरे से अलग रखना चाहते हैं और दीवाली मनाना चाहते हैं तो यह उनकी स्वतंत्रता होगी। उन्हें हमको बुद्धिज्म की तरफ लाने की कोशिश करते रहना चाहिए। हां, लेकिन फिर वो खुद को बौद्ध समाज या अम्बेडकरी समाज का हिस्सा मानने का दावा करना छोड़ दे। अब अम्बेडकरी-बुद्धिस्ट समाज को हर साल होने वाली इस थकाऊ और परेशान करने वाली बहस से छुटकारा मिलना चाहिए। और इसका दायित्व अम्बेडकरी-बुद्धिस्ट समाज के बुद्धीजिवियों के ऊपर है।

नोटः मैंने कोशिश की है कि इस विषय पर मैं हर तरह के लोगों की मनःस्थिति का ध्यान रखूं। मैं इस विषय में किसी भी पक्ष के साथ खड़ा नहीं हूं, सिर्फ तथ्यों के साथ खड़ा हूं और सही तथ्य क्या है, इसका फैसला विद्वानजन करेंगे।

क्या महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की टीम में खेले प्रकाश आंबेडकर?

प्रकाश आम्बेडकर और ओवैसी (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे साफ हो गए हैं. महाराष्ट्र की बात करें तो प्रदेश में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को 161 सीटें मिली है, जबकि कांग्रेस-एनसीपी 98 सीटें हासिल कर सकी हैं. पिछली बार भाजपा-शिवसेना गठबंधन को विधानसभा में 185 सीटें मिली थीं. नतीजों को देखकर पता चलता है कि इस बार गठबंधन को 24 सीटों का नुकसान हुआ है. न तो बहुजन समाज पार्टी और न ही प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी एक भी सीट जीत पाई.

चुनाव नतीजों के बाद एक बार फिर आंकड़ों को सामने रखकर विश्लेषण का दौर शुरू हो चुका है. इंडिया टुडे डाटा इंटेलिजेंस यूनिट ने उन सभी सीटों का आंकलन किया, जहां भाजपा ने जीत दर्ज की और उन सीटों पर कांग्रेस/एनसीपी और वीबीए यानि वंचित बहुजन अघाड़ी को मिले वोटों का प्रतिशत जोड़ दिया. इन तीनों पार्टियों के वोट शेयर जोड़ने के बाद पता चला कि अगर तीनों पार्टियां साथ चुनाव लड़तीं तो भाजपा को 34 सीटों पर हार का सामना करना पड़ता.

ऐसी स्थिति में कांग्रेस-एनसीपी-वीबीए को लगभग 138 सीटें मिलती और भाजपा घटकर 128 पर रह जाती. लेकिन अब चुनाव बीत चुका है और राजनीतिक दलों के पास अफसोस करने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है. लेकिन…

सवाल है कि प्रकाश आंबेडकर ने कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन क्यों नहीं किया? सवाल यह भी है कि असदुद्दीन ओवैसी की जिस AIMIM के साथ मिलकर उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था और दोनों को एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जाने लगा था, आखिर प्रकाश आंबेडकर ने विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी से गठबंधन क्यों तोड़ दिया? जबकि महाराष्ट्र चुनाव में दो सीटें जीतने वाले ओवैसी आखिरी समय तक प्रकाश आंबेडकर के साथ गठबंधन को लेकर कोशिश करते रहें.

ओवैसी का कहना था कि गठबंधन होने की स्थिति में दोनों दलों के कम से कम 15 से 20 सीटें जीतने की संभावना रहती. ऐसे में प्रकाश आंबेडकर को राज्यसभा भेजा जा सकता था. लेकिन ओवैसी की कोशिश रंग नहीं लाई और गठबंधन नहीं हुआ.

विधानसभा चुनाव में प्रकाश आंबडेकर ने 274 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा था. लेकिन वह कोई सीट नहीं जीत सकें. सिर्फ एक सीट पर उन्हें कुछ समय के लिए बढ़त मिल सकी थी. जबकि ओवैसी ने महाराष्ट्र में 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उन्होंने दो सीटें जीती.

अब सवाल है कि दोनों के बीच गठबंधन क्यों नहीं हुआ? इसके जो कारण सामने आए उसके मुताबिक प्रकाश आंबेडकर ओवैसी को गठबंधन में सिर्फ 8 सीटें देना चाहते थे. खबर यह भी है कि प्रकाश आंबेडकर ओवैसी से उनके सीटिंग विधायकों वाली सीटें चाहते थे. जाहिर है कि ओवैसी के लिए ऐसा करना संभव नहीं था. गठबंधन तोड़ने के लिए प्रकाश आंबेडकर ने यह भी आरोप लगाया कि AIMIM को दलित वोट ट्रांसफर हो जाते हैं लेकिन वंचित बहुजन अघाड़ी के उम्मीदवार को मुस्लिम वोट नहीं मिलते. इन तीन कारणों को आधार बनाकर प्रकाश आंबेडकर ने ओवैसी के साथ गठबंधन नहीं किया.

अब जरा इसी साल हुए लोकसभा चुनाव के आंकड़े देखिए.

लोकसभा चुनाव में ओवैसी और प्रकाश आंबेडकर ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इन्होंने राज्य के सभी 48 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे. इस गठबंधन को 42 लाख से अधिक वोट मिला और उसका वोट प्रतिशत 7 फीसदी से ज्यादा रहा. ओवैसी की पार्टी एक सीट जीतने में सफल रही थी. इस गठबंधन ने भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस और राकंपा सबको काफी नुकसान पहुंचाया. हालांकि ज्यादा नुकसान कांग्रेस एनसीपी को हुआ. इस गठबंधन की वजह से कांग्रेस और शिवसेना के कई दिग्गज चुनाव हार गए.

माना जा रहा था कि विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन तीसरी बड़ी ताकत बनकर उभरेगा, लेकिन विधानसभा चुनाव के ठीक पहले प्रकाश आंबेडकर गठबंधन तोड़ने पर अमादा दिखने लगे और आखिरकार गठबंधन तोड़ दिया.

अब सवाल यह है कि जो प्रकाश आंबेडकर कुछ समय पहले तक ओवैसी के साथ मिलकर भाजपा को रोकने की बात कह रहे थे, वह अचानक अकेले चुनाव मैदान में क्यों कूद गए, जबकि इतने सालों के इतिहास में यह साफ है कि प्रकाश आंबेडकर अकेले महाराष्ट्र की राजनीति में कई बड़ा कमाल नहीं कर पाए हैं. उन्होंने ऐसा फैसला क्यों किया जो आखिरकार भाजपा के हक में गया. क्या यह पूरा घटनाक्रम महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में प्रकाश आंबेडकर की भूमिका पर सवाल नहीं उठाता है?

मोदी आखिर महाबलीपुरम में कचरा क्यों चुन रहे थे

इस हफ्ते की खास खबर यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कविता लिख दी है. मोदी ने यह कविता महाबलीपुरम में सागर के किनारे लिखी, जहां वह चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग के साथ दो दिनों की अनौपचारिक वार्ता के लिए मौजूद थे और सुबह की सैर पर निकले थे. बकौल मोदी वह सागर से संवाद में खो गए थे. मोदीजी की कविता सामने आने के बाद समाचार चैनलों को ब्रेकिंग न्यूज मिल गया है तो ट्विटर पर इस कविता को सराहने और रि-ट्विट करने की होड़ मची है. गोया यह उनके सी आर यानि करियर रिकार्ड में दर्ज हो रहा है.

इससे पहले पीएम मोदी की समुंदर के किनारे कचरा चुनने की तस्वीर भी बड़ी खबर बनी थी. पीएम समुद्र के किनारे पड़े प्लास्टिक की बोतलों को चुन कर इकट्ठा कर रहे थे. सवाल यह है कि पीएम मोदी क्यों कविताएं लिखने लगते हैं या फिर क्यों वह समुद्र के किनारे से बोतलें उठाने लगते हैं और सबसे बड़ा सवाल कि आखिर क्यों ये सारी तस्वीरें और ख्यालात सार्वजनिक किए जाते हैं. तो इसका जवाब यह है कि संभवतः पीएमओ चाहता है कि मोदीजी इस तरह के जो काम कर रहे हैं, वह सब कोई देखे. और जब ऐसा होता है तो पहला सवाल यह आता है कि क्या ऐसा दिखाने के लिए ही किया जाता है? और अगर यह दिखाने के लिए ही किया जाता है तो आखिर इसके पीछे मंशा क्या है?

इसके लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. मोदी भारत के संभवतः पहले प्रधानमंत्री हैं जो अपने विदेशी समकक्षों से दोस्ताना दिखते हैं. अपने विदेशी समकक्षों को कस कर गले लगाना, उनके कंधे पर हाथ रख देना आमतौर पर पहले के प्रधानमंत्रियों में नहीं दिखता था. लेकिन मोदी अगर ऐसा कर रहे हैं तो आखिर क्यों कर रहे हैं?

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की चाहत एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित होने की दिखती है, जिसके आस-पास कोई दूसरा नेता न हो. मोदी ट्रेडिशनल नेता की तरह नहीं दिखना चाहते हैं. भारत युवाओं का देश है और मोदी के बहाने भाजपा के केंद्र में यही युवा वर्ग हैं. अमेरिका जाकर वहां के राष्ट्रपति ट्रंप की मौजूदगी में हाउडी मोदी जैसा आयोजन या फिर मैन वर्सेस वाइल्ड शूट करना इसी का हिस्सा है. मीडिया में दिखते रहने की पीएम मोदी की जो योजना है और उन्हें लगातार दिखाने के लिए मीडिया जिस तरह बेताब दिखती है, और जिस तरह से पीएम या फिर सरकार के विरोध में उठने वाले हर सवाल को दबा देने की पुरजोर कोशिश की जा रही है, ऐसे में पीएम का कविता लिखना और कचरा उठाना ही ब्रेकिंग न्यूज बनता रहेगा.

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