हाथरस मामले में सीबीआई ने दाखिल की चार्जशीट, नजर अब अदालत पर

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भाजपा शासित उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में वाल्मीकि समाज की लड़की के साथ गैंगरेप और उसके बाद हत्या के मामले में सीबीआई ने आज (18 दिसंबर 2020) को चार्जशीट दाखिल कर दिया है। सीबीआई के अधिकारियों ने यह चार्जशीट एससी/एसटी कोर्ट में दाखिल की है। इसके बाद कोर्ट ने इस चार्जशीट पर संज्ञान लिया है। सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की है, उसमें 22 सितंबर को दिए गए पीड़िता के आखिरी बयान को आधार बनाया गया है। चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब सबकी नजर अदालत पर टिकी है।

केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने 11 अक्टूबर 2020 को उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर और भारत सरकार से आगे की अधिसूचना पर केस दर्ज किया। हाथरस केस में चारों आरोपियों के खिलाफ हत्या, गैंगरेप और एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई है। आरोपियों पर धारा- 325, एससी-एसटी एक्ट 376A और 376 D (गैंगरेप) और धारा 302 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई है। गौरतलब है कि हाथरस में वाल्मीकि समाज की एक लड़की के साथ 14 सितंबर के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में चार लड़कों को गिरफ्तार किया गया है।

किसानों के नाम कृषि मंत्री का पत्र, योगेन्द्र यादव ने पकड़ा 20 झूठ

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 कृषि बिल के खिलाफ सड़क पर उतरे किसानों ने मोदी सरकार की नाक में दम कर दिया है। सरकार कृषि बिल के खिलाफ किसानों के आंदोलन से इतना परेशान हो गई है कि सरकार के सभी नेता-मंत्री इन दिनों या तो किसानों को समझाने में लगे हैं, या फिर किसानों के आंदोलन को बदनाम करने में जुटे हैं। आंदोलन से बौखलाई केंद्र सरकार के कृषि मंत्री ने किसानों को संबोधित करते हुए 17 दिसंबर को किसानों के नाम एक पत्र लिखा है। यह पत्र आठ पन्नों का है, जिसको लेकर सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव का दावा है कि इसमें 20 झूठ हैं।

चिट्ठी की शुरुआत में कृषि मंत्री ने लिखा है कि कृषि मंत्री के तौर पर मेरे लिए यह बहुत संतोष की बात है कि नए कानून लागू होने के बाद इस बार MSP पर सरकारी खरीद के भी पिछले सारे रिकार्ड टूट गए हैं। ऐसे समय में जब हमारी सरकार MSP पर खरीद के नए रिकार्ड बना रही है, खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ा रही है, कुछ लोग किसानों से झूठ बोल रहे हैं कि MSP बंद कर दी जाएगी।

मेरा किसानों से आग्रह है कि राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित कुछ लोगों द्वारा फैलाए जा रहे इस सफेद झूठ को पहचानें और इसे सिरे से खारिज करें। जिस सरकार ने किसानों को लागत का डेढ़ गुना MSP दिया, जिस सरकार ने पिछले 6 सालों में MSP के जरिए लगभग दोगुनी राशि किसानों के खाते में पहुंचाई, वह सरकार MSP कभी बंद नहीं करेगी। MSP जारी है और जारी रहेगी।

हालांकि कृषि मंत्री की आखिरी लाइन कि सरकार MSP कभी बंद नहीं करेगी, MSP जारी है, और जारी रहेगी, को पढ़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वह भाषण याद आता है, जिसमें वह टेबल ठोक कर रेलवे के नहीं बिकने का दावा करते थे, लेकिन हुआ क्या? रेलवे निजीकरण के चक्र में फंस चुकी है और इस पर देश के पूंजीपतियों का कब्जा शुरू हो चुका है।

इस चिट्ठी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने ट्विटर से शेयर किया है। 17 दिसंबर की शाम 8 बजे पीएम मोदी ने इस चिट्ठी को अपने ट्विटर हैंडल से शेयर करते हुए लिखा कि,  कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर जी ने किसान भाई-बहनों को पत्र लिखकर अपनी भावनाएं प्रकट की है, एक विनम्र संवाद करने का प्रयास किया है। सभी अन्नदाताओं से मेरा आग्रह है कि वे इसे जरूर पढ़ें। देशवासियों से आग्रह है कि वे इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएँ।

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा इस चिट्ठी को गृहमंत्री अमित शाह और सरकार के अन्य तमाम मंत्रियों ने भी शेयर किया है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस चिट्ठी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की अपील के बाद सरकार के मंत्री से लेकर भाजपा कार्यकर्ता तक इसे लोगों तक पहुंचाने में जुट गए हैं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने कृषि मंत्री की इस चिठ्ठी में 20 झूठ पकड़ा है। योगन्द्र यादव ने एक वीडियो जारी कर कृषि मंत्री और सरकार के झूठ का फांडाफोड़ किया है।

इस वीडियो में योगेन्द्र यादव ने कृषि मंत्री और सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है तो साथ ही किसानों से झूठ बोलने को लेकर कृषि मंत्री को आड़े हाथों लिया है।

दरअसल किसानों के लगातार विरोध से मोदी सरकार भारी दबाव में हैं। सामने बंगाल का चुनाव होने से सरकार की मुश्किलें ज्यादा बढ़ी हुई है। भाजपा और संघ को डर है कि अगर किसानों का आंदोलन नहीं रुका और यह मुद्दा बड़ा हो गया तो उन्हें बंगाल चुनाव में नुकसान उठाना पर सकता है। दूसरी ओर किसान अपनी मांग पूरा हुए बिना पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अब सरकार किसानों से यह लड़ाई झूठ और छल की बदौलत जीतना चाहती है।

देश के हर हिस्से में वंचित समाज के बीच पहुंचना चाहता हूं

14-15 फरवरी, 2020 को हार्वर्ड युनिवर्सिटी, अमेरिका में इंडिया कांफ्रेंस में ‘कास्ट एंड मीडिया’ विषय पर वक्ता के तौर पर शामिल हुआ
जन्म लेना शुभ है, मृत्यु होना अशुभ। हर दिन कोई न कोई जन्म लेता है, और हर दिन किसी न किसी की मृत्यु होती है। इसलिए मैं हर दिन को एक समान मानता आया हूं। मैंने 17 दिसंबर को जन्म लिया था। साल नहीं बताऊंगा, क्योंकि आप यकीन नहीं करेंगे और मुझसे युवा बने रहने का नुस्खा पूछने लगेंगे। लेकिन अब मैं खुद को सीनियर घोषित कर सकता हूं। मैंने यह मान लिया है कि मैं बचपने से बाहर आ चुका हूं और युवावस्था के शीर्ष पर हूं।
तो मैं बात कर रहा था, जन्म और मृत्यु की। इन दोनों बिन्दुओं के बीच का जो वक्त होता है, उसे जीवन कहते हैं। हम अपना जीवन कैसे जीयें ये कुछ परिवार की पृष्ठभूमि तय करती है, कुछ शिक्षा और मित्रों के प्रभाव में तय होता है, कुछ हालात तय करते हैं, और इन सबके बाद भी अगर थोड़ी-बहुत संभावना बचती है, उसमें हम तय करते हैं कि हमें क्या करना है।
मैं आज जो कर रहा हूं, मैं हमेशा से यह करना चाहता था। मैं जब यह समझ पाया कि लिखना पढ़ना भी पेशा हो सकता है, मैं हमेशा से लिखना-पढ़ना चाहता था। लेकिन इसमें हालात और वक्त ने भी बड़ी भूमिका निभाई। बाबासाहेब के मूवमेंट से कुछ बहुत सोच कर नहीं जुड़ा। काम करते-करते, लिखते-पढ़ते, कुछ वरिष्ठों के संपर्क में आकर एक वक्त मैंने महसूस किया कि मैं बाबासाहेब का सिपाही बन चुका हूं। आंबेडकरी मिशन का हिस्सा बन चुका हूं।
अमेरिकी यात्रा के दौरान कोलंबिया युनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में लगे बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के बस्त के साथ
आज पहली बार है जब जन्मदिन पर कुछ लिख रहा हूं। हाशिये के समाज से ताल्लुक रखने वाले करोड़ों लोगों की तरह हमारे घर में जन्मदिन मनाने का कभी चलन नहीं रहा। चमरौटी के एक कोने में फूस के घेरे (जिसे हमारे पूर्वज घर कहते थे) में हमारी कई पीढ़ियां पेट भरने को गेहूं की रोटी को तरसती रही। दादा-परदादा कलकत्ता गए, वहां अंग्रेजों/ पूंजीपतियों के जूट मिल में मजदूरी की तो पिता और परिवार का पेट भरा। पिता परिवार के पहले ग्रेजुएट बने, तब तक देश आजाद हो गया था, बाबासाहेब ने संविधान लिखा, उसमें आरक्षण की व्यवस्था की, तब जाकर इस देश के हर संसाधन पर कब्जा कर के बैठे लोगों ने हमारे लिए कुछ नौकरियां मजबूरी में छोड़ी। पापा अशर्फी दास खानदार के पहले व्यक्ति थे, जो सिविल कोर्ट में लिपिक (क्लर्क) बनें।
तो सम्मान के साथ रोटी कमाने की जुगत में कई पीढ़ियां बीत गई। माता-पिता की परवरिश की बदौलत आज हम जन्मदिन को उत्सव के रूप में मनाने और केट काटने के लायक हो पाए हैं। हां, अब घर के बच्चों का जन्मदिन मनाने का चलन जरूर शुरू हो गया है। आज जीवन में पहली बार मां ने फोन पर थोड़ा हंसते हुए, थोड़े गौरव के साथ जन्मदिन की बधाई दी। मैंने मुझे जन्म देने के लिए मां को शुक्रिया कहा।
खैर, आंबेडकरी आंदोलन से जुड़ना मेरे जीवन की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इस आंदोलन ने मुझे मान दिलाया, सम्मान दिलाया, देश के हर हिस्से में हजारों-लाखों लोगों का बड़ा परिवार दिलाया। इस आंदोलन की बदौलत मैं बिहार के एक छोटे से कस्बे से अमेरिका के हार्वर्ड युनिवर्सिटी तक पहुंच पाया। मैं इस आंदोलन का कर्जदार हूं। ये जीवन इसी आंदोलन को समर्पित कर चुका हूं।
मुझे नहीं पता कि आंबेडकरी आंदोलन में मैं कितना योगदान दे पाया हूं, या इस आंदोलन में मेरे होने से क्या फर्क पड़ता है। और सच कहूं तो यह सोचना मेरा काम है भी नहीं। मैं बस हर दिन इस आंदोलन के लिए जितना कर पाऊं, करते रहना चाहता हूं। मेरे काम का, योगदान का आंकलन आपलोग करेंगे। मुझे तो बस काम करना है। मैं ऐसा बने रहना चाहता हूं कि मैं प्रशंसा और चापलूसी से खुश न हो जाऊं, किसी की आलोचना या निंदा से निराश न हो जाऊं।
मैग्जीन, वेबसाइट, यू-ट्यूब, प्रकाशन आदि के जरिए जितना कर सकता हूं, करता रहूं। मैं संचार का आदमी हूं, संचार यानी कम्यूनिकेशन यानी संवाद करने वाला। यह संवाद मैग्जीन के जरिए भी करता हूं, यू-ट्यूब के जरिए भी, वेबसाइट पर लिख कर भी, किताबें प्रकाशित कर के भी और नए साल का कैलेंडर प्रकाशित कर के भी। तमाम माध्यमों से कुछ भी कहने का सिर्फ एक उद्देश्य होता है, संवाद करना। हां, यह जरूर स्वीकार करता हूं कि जितना कर रहा हूं, उससे ज्यादा करने की ऊर्जा मुझमें है। उससे ज्यादा करना चाहता हूं।
अगर आप पूछेंगे कि आगे क्या करना है, तो मेरा जवाब होगा देश के हर हिस्से में वंचित समाज के बीच पहुंचना मेरे जीवन का उद्देश्य है। दलित-आदिवासी समाज के भीतर भी कई रंग हैं। हर प्रदेश में इस समाज का अपना इतिहास, अपनी परंपरा, जीवन जीने का अपना तरीका है। उन सारी कहानियों, परंपराओं, लोक गीतों, रिवाजों को आप सब को दिखाना चाहता हूं। दिल्ली में बैठे-बैठे मन उकताने लगा है। जीवन एकरस लगने लगा है, इसको तोड़ना चाहता हूं। बस भ्रमण पर निकल जाता चाहता हूं। बहुत सारे अनुभव समेटना चाहता हूं। आपलोगों से उन अनुभवों को बांटना चाहता हूं। उम्मीद है कि आपके गांव-शहर आऊंगा तो आप छत और रोटी जरूर देंगे। देंगे न??
बाकी, आप सबका दिया मान-सम्मान और स्नेह मेरे होने को सार्थक करता है। किसी व्यक्ति को समाज महत्वपूर्ण बनाता है। मैं आपलोगों के प्यार से अभिभूत हूं, नतमस्तक हूं। इसके बावजूद मैं यह मुगालता कभी नहीं पालता कि मैं बहुत महान काम कर रहा हूं या फिर मैं कोई “महत्वपूर्ण” व्यक्ति हूं और मुझे हर कोई जानता है। हम सब अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, और हमसे ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा काम है। क्योंकि यही हमारी पहचान है। यही वजह है कि थोड़ा छिपा रहता हूं, थोड़ा कम बोलता हूं। क्योंकि जरूरी है कि हमारा काम बोले। आखिर में जन्मदिन की बधाई देने वाले सभी मित्रों, शुभचिंतकों का धन्यवाद, बड़ों से आशीर्वाद की अपेक्षा करता हूं और मित्रों से स्नेह की। उम्मीद करता हूं कि मैं भविष्य में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो फैसला करूं, मेरे नजदीकी, मेरे परिवार के लोग मेरा साथ देंगे।

कविताः मुझे बदलाव चाहिए, सुधार नहीं

सदियों से तुम्हारे
शास्त्रों, शस्त्रों और बहियों का बोझ
मेरी जर्जर देह ने ही उठाया है
बैलगाड़ी में जुते बीमार बैल की तरह
मैं ही वाहक रहा हूँ तुम्हारी सब कामनाओं का
अब तुम्हारा बैल मर ही न जाए
गिर कर चूर ही न हो जाए
इसलिए तुम देते आये हो उसे कुछ टुकड़े
जिन्दा भर रहने को
अब जब तुम्हारी कामनाएं और लक्ष्य
अधिक विशाल हुए जा रहे हैं
तुम्हें चाहिए एक मजबूत बैल
इसलिए अब तुम उछाले जा रहे
उन टुकड़ों का आकार बढ़ा रहे हो
यही तुम्हारा सुधार है
लेकिन मुझे टुकड़े टुकड़े सुधार नहीं
एकमुश्त बदलाव चाहिए
मैं बैलगाड़ी के जुए से आजाद हो
तुमसे नजरे मिलाकर चलना चाहता हूँ
तुम्हारे शास्त्रों, शस्त्रों का बोझ फेंककर
अपने शास्त्र और शस्त्र रचना चाहता हूँ
मैं तुम्हारी यात्रा का साधन नहीं
बल्कि अपने लक्ष्य का साधक बनना चाहता हूँ
अपने गंतव्य और मार्ग
स्वयं चुनना चाहता हूँ
– संजय श्रमण

संसद का शीतकालीन सत्र रद्दः क्या किसानों से डरी हुई है मोदी सरकार

 आमतौर पर साल के नवंबर-दिसंबर महीने में होने वाला संसद का शीतकालीन सत्र इस साल नहीं होने जा रहा है। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सदन में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को पत्र लिखकर बताया है कि कोविड-19 के कारण तमाम दलों की सहमति को देखते हुए इस बार संसद सत्र नहीं होगा। जनवरी 2021 में बजट सत्र होने की बात कही जा रही है।

सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला और सवालों से भागने वाला है। हाल ही में बिहार में चुनाव हो गया, बंगाल में तमाम नेता मुंह झोके हैं, खासकर सत्ता दल के नेता। भूमि पूजन, उद्धाटन सब हो रहा है। राजनीतिक माइलेज लेने के लिए किसान आंदोलन में हर दिन जाकर फोटो खिंचवाया जा रहा है, लेकिन संसद सत्र नहीं होगा। जो नेता रोज सैकड़ों अंजान लोगों से मिल रहे हैं, भीड़ का सामना कर रहे हैं। चुनाव के दौरान हजारों अंजान कार्यकर्ताओं के बीच से गुजर रहे हैं, वो 550 सांसदों के साथ बैठना नहीं चाहते हैं। यह तब है जब कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि संसद सत्र बुलाया जाए और किसानों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर कृषि कानून में संशोधन किया जा सके। लेकिन किसान आंदोलन को दबाने और उलझाने में जुटी और हर सवाल से भागने की आदि हो चुकी केंद्र सरकार ने सत्र को टाल दिया है।

देश का अन्नदाता सड़कों पर है। कड़ाके की ठंड के बावजूद किसान कृषि बिल के विरोध में डटे हुए हैं। इस बीच किसानों की मौत की खबरें आनी शुरू हो गई है। किसानों के आंदोलन को देश भर में समर्थन मिल रहा है। देश का आमजन कह रहा है कि सरकार को किसानों की बात सुननी चाहिए। लेकिन दूसरी ओर सरकार के मंत्री तक किसानों को कभी आतंकवादी, कभी खालिस्तानी, कभी विदेशी ताकतों का मोहरा तो कभी टुकड़े गैंग का सदस्य तक कह रहे हैं। भाजपा के शासन वाले मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो किसानों को कुकुरमुत्ता तक कह डाला। नया घटनाक्रम यह है कि देश के विभिन्न जगहों से उन किसान संगठनों से सरकार को समर्थन दिलवाया जा रहा है, उनके साथ फोटो खिंचवाई जा रही है, जिनका कोई नाम तक नहीं जानता था।

कुल मिलाकर सरकार ने ठान लिया है कि उन्हें किसानों की मांगों को नहीं मानना है। सरकार के सरगना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को कह रहे हैं कि कृषि कानून उनके हित के लिए है, लेकिन सवाल यह है कि अगर ऐसा है तो मोदी और उनकी सरकार किसानों को यह भरोसा दिलाने में नाकाम क्यों हैं? इस बिल से किसानों का ऐसा कौन सा फायदा है, जो सरकार को तो दिख रहा है लेकिन किसानों को नहीं दिख रहा। आप किसी भी पेशे/ व्यवसाय की बात कर लिजिए, क्या यह संभव है कि उस पेशे/व्यवसाय में लगे लोगों को किसी नियम-कानून से फायदा हो और उन्हें समझ में नहीं आ रहा हो?

 थोड़ा पीछे चलिए, इसी सरकार ने कहा था कि पुराने नोटों को बंद कर नया नोट आने से कालाबजारी रुक जाएगी। इसका फायदा किसको हुआ, और नुकसान किसको, यह तो जनता के सामने आ चुका है, लेकिन नोटबंदी की लाइन में लगे जिन लोगों की जान चली गई वो देश का मध्यम वर्ग का आम आदमी था। अब जीएसटी पर आते हैं। कहा गया कि एक देश एक टैक्स होगा। लेकिन जीएसटी के बाद आप और हम जब भी खरीददारी करने गए हमें पहले से ज्यादा भुगतान करना पड़ा। व्यापारियों के बीच तो ‘कमल का फूल, बड़ी भूल’ नाम से कहावत खूब वायरल हुआ था। ऐसे ही अब कृषि बिल को लेकर सरकार कह रही है कि इससे किसानों का फायदा होगा।

यह सरकार अपने और अपने ‘हितैषियों’ के फायदे के लिए एक के बाद एक फैसले ले रही है और देश के बड़े वर्ग को राम नाम, धर्म और सांप्रदाय में उलझा कर रखे हुए हैं। और देश का वह सभ्य समाज जो खुद को ज्यादा पढ़ा लिखा और समझदार मानता है, वह इस झांसे में आकर कुछ भी समझने को तैयार नहीं है। लेकिन इस सरकार के पिछले वायदों और जुमलों को देखते हुए वह अन्नदाता उसके झांसे में आने से इंकार कर रहा है, जिसे सबसे भोला भाला माना जाता है।

 अगर इस आंदोलन के राजनैतिक रूप को देखें तो सड़क पर मौजूद ज्यादातर किसान पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के हैं। पंजाब और राजस्थान में कांग्रेस सरकार है और भाजपा कृषि बिल के लिए हरियाणा को कुर्बान करने को तैयार दिख रही है, क्योंकि अगर उसे हरियाणा की कीमत पर अपने पूंजीपति मित्रों के हित को सहेजना हो, तो भी भाजपा पीछे हटती नहीं दिख रही है। लड़ाई लंबी चलेगी। सड़क पर किसान और संसद में विपक्ष इसको कैसे लड़ेगा, इसकी सफलता और असफलता इसी पर निर्भर है। फिलहाल तो सरकार ने शीतकालीन सत्र को रद्द कर सवालों से भागने की अपनी परंपरा को कायम रखा है।

 

एम्स में हड़ताल पर नर्सिंग स्टॉफ, सरकार और एम्स प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा

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देश के सबसे बड़े अस्पताल दिल्ली के एम्स का नर्सिंग स्टॉफ अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चला गया है। दरअसल नर्स युनियन ने सरकार और एम्स प्रशासन के सामने वेतन बढ़ोतरी समेत अन्य मांगे रखी थी। एक महीने पहले रखी गई  मांगों पर कोई साकारात्मक जवाब नहीं मिलने के बाद नर्सिंग स्टॉफ हड़ताल पर चला गया है। एम्स नर्सिंग युनियन का कहना है कि सरकार और एम्स प्रशासन हमारी मांग नहीं मान रहा है, ऐसे में हमारे पास और कोई चारा नहीं था। नर्सिंग यूनियन का यह भी आरोप है कि AIIMS प्रशासन उनसे बात करने को भी तैयार नहीं है। मामले को सुलझाने की बजाय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाया है। मंत्रालय का कहना है कि हाईकोर्ट का आदेश नहीं मानने वालों पर कार्रवाई होगी। तो दूसरी ओर एम्स प्रशासन ने संविदा यानी कांट्रैक्ट पर नर्सों की भर्ती शुरू कर दी है और इसके लिए अखबारों में विज्ञापन दे दिया गया है। एम्स नर्सिंग यूनियन (AIIMS Nursing Union) के अध्यक्ष हरीश कुमार काजला ने चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें मानी नहीं जाएंगी, तब तक हड़ताल जारी रहेगी। नर्सों के हड़ताल पर जाने से डॉक्टरों और मरीजों की परेशानी भी बढ़ गई है और देश के सबसे बड़े अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराने लगी है। लेकिन एम्स प्रशासन ने जिस तरह कड़ा रुख अपनाया है, उससे साफ है कि बीच में मुश्किलों का सामना सिर्फ मरीजों को ही करना पड़ेगा।

यूपी में AAP का बड़ा राजनैतिक फैसला, दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को बड़ी जिम्मेदारी

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आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने कदम बढ़ाने लगी है। पहले हाथरस मामले में संजय सिंह को आगे कर पार्टी ने आक्रामक रुख दिखाया तो अब पार्टी पंचायत चुनाव में उतरने जा रही है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इसका ऐलान करते हुए अपनी रणनीति भी साफ कर दी।

केजरीवाल ने कहा, ‘यूपी के लोग दिल्ली क्यों आ रहे हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि वहां सुविधाएं नहीं हैं। अगर दिल्ली में सुविधाएं तैयार की जा सकती है तो UP में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है। UP में अब तक गंदी राजनीति देखी है। ऐसे में अब उसे नया मौका मिलना चाहिए।’

दरअसल आम आदमी पार्टी 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में उतरने जा रही है। पंचायत चुनाव के बहाने पार्टी प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है। साथ ही जमीन पर पार्टी कितनी मजबूत है, और अब तक प्रदेश में कितने कार्यकर्ताओं को जोर पाई है, यह उसे यह भी देखना है।

 यूपी में केजरीवाल अपनी पार्टी के दलित नेताओं के भरोसे आगे बढ़ रहे हैं। इसके लिए दलित समाज से आने वाले मंत्री राजेंद्र पाल गौतम को चुनाव प्रभारी बनाया गया है। जबकि डिप्टी स्पीकर राखी बिड़ला और विधायक सुरेंद्र कुमार को सह प्रभारी बनाया गया है। राजेंद्र पाल ने 65 जिलों में प्रभारियों की नियुक्ति भी कर दी है। बाकी के जिलों में भी प्रभारी जल्द नियुक्त होंगे। गौरतलब है कि राजेंद्र पाल गौतम की गिनती तेज तर्रार नेता के तौर पर होती है। वह दिल्ली की सीमापुरी से लगातार दूसरी बार विधायक बने। दिल्ली सरकार में उनके जिम्मे सामाजिक न्याय मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

ज्योतिबा फुले से हिन्दी जगत का परिचय कराने वाले बौद्ध विद्वान डॉ. विमलकीर्ति नहीं रहें

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वरिष्ठ बौद्ध साहित्यकार और चिंतक डॉ. (प्रो.) विमलकीर्ति नहीं रहें। 71 साल (जन्मतिथिः 5 फरवरी, 1949) की उम्र में उनका परिनिर्वाण आज 14 दिसंबर को हो गया। वह नागपुर युनिवर्सिटी में पालि और बौद्ध विभाग के प्रोफेसर थे। बौद्ध धर्म दर्शन और पालि भाषा पर उनका अधिकार था। पालि भाषा शब्दकोष पर उन्होंने काम किया। साथ ही सामाजिक विषयों पर भी काम किया। वो बड़े चिंतक थे और तमाम विषयों पर उन्होंने अपनी अहम राय समाज के बीच रखी और समाज का मार्गदर्शन किया। महामना ज्योतिबा फुले के साहित्य को हिन्दी में पहली बार उन्होंने ही अनुवाद किया और प्रकाशित करवाया। जिससे उत्तर भारत के हिन्दी क्षेत्रों में लाखों-करोड़ों लोग ज्योतिबा फुले के सामाजिक योगदान को जान सकें। उनकी नवीनतम पुस्तक थी ब्राह्मण संस्कृति बनाम श्रमण संस्कृति

वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम ने प्रो. विमलकीर्ति जी को श्रद्धांजलि दी है। उनको याद करते हुए कर्दम जी ने कहा कि विमलकीर्ति जी के साथ पिछले 20 सालों से रिश्ता था। अनेक आयोजनों में हम एक साथ रहे। बौद्ध साहित्य और पालि भाषा में दिया गया उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकेगा। शांति स्वरूप बौद्ध के बाद विमलकीर्ति जी का जाना बौद्ध आंदोलन और बौद्ध साहित्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

Video- वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम ने प्रो. विमलकीर्ति को किया याद

बिरसा मुंडा ट्राइबल युनिवर्सिटी को मिला कुलपति

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आखिरकार लंबे इंतजार के बाद गुजरात सरकार ने डॉ. मधुकर पदवी को बिरसा मुंडा ट्राइबल युनिवर्सिटी, राजपिपला का कुलपति नियुक्त किया है। यह नियुक्ति युनिवर्सिटी के निर्माण के तीन साल बाद हुई है। डॉ. पदवी का संबंध गुजरात के आदिवासी समुदाय से है। गुजरात सरकार ने तीन वर्ष पहले यानी 2017 में बिरसा मुंडा ट्राइबल युनिवर्सिटी की स्थापना की थी, तभी से यह पद खाली था।

विद्यार्थियों की बात करें तो वर्तमान में यहां स्नातक पाठ्यक्रमों के कुल 469 छात्र व छात्राएं अध्ययनरत है। अपना परिसर नहीं होने के चलते यह विश्वविद्यालय वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर के परिसर में चलाया जा रहा है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के अमरकंटक में स्थापित इंदिरा गांधी ट्राइबल युनिवर्सिटी देश का पहला केंद्रीय ट्राइबल यूनिवर्सिटी है। वर्तमान में इसके कुलपति प्रो. प्रकाश मणि त्रिपाठी हैं। राजस्थान के बांसवाड़ा में मानगढ़ आंदोलन के प्रणेता गोविंदगुरू ट्राइबल युनिवर्सिटी के कुलपति आई. वी. त्रिवेदी हैं। वहीं केंद्रीय आदिवासी विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश के कुलपति प्रो. टी. वी. कटिमनी हैं।A

एक दिन के भूख हड़ताल पर बैठेंगे ‘अन्नदाता’

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  कड़ाके की ठंड के बीच किसानों का आंदोलन 18वें दिन भी जारी है। दिल्ली के तमाम बार्डर पर किसान डटे हुए हैं। इस बीच 14 दिसंबर को किसानों ने एक दिन का भूख हड़ताल करने की घोषणा की है। सिंघु और टीकरी समेत अन्य तमाम जगहों पर प्रदर्शन अब भी जारी है। दिल्ली-जयपुर हाईवे बंद करने के लिए राजस्थान-हरियाणा बार्डर पर भारी संख्या में किसान इकट्ठा होने लगे हैं। दूसरी ओर दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी किसानों के समर्थन में आ गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज प्रेस कांफ्रेंस कर किसानों को अपना समर्थन देने का ऐलान किया। इस दौरान केजरीवाल ने भी एक दिन के अनशन में शामिल होने की घोषणा की। साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं से भी ऐसा करने की अपील की। इस बीच सरकार किसानों की एकता तोड़ने में लग गई है। उत्तराखंड के किसानों ने कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ मिलकर तीनों कृषि कानूनों को लेकर अपना समर्थन दिया। इस दौरान उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय भी मौजूद थे।

डिबेट में किसान नेता ने अर्नब की बोलती बंद की

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 किसान आंदोलन के बीच गोदी मीडिया किसानों और इस आंदोलन को बदनाम करने में जुट गई है। मनुवादी मीडिया कभी किसानों के आंदोलन को खालिस्तानियों से जोड़ रही है, कभी पाकिस्तान से तो कभी चीन से। झूठी तस्वीरें फैलाकर उसके बहाने किसानों को बदनाम करने की साजिश भी रची जा रही है। मोदी और भाजपा सरकार के प्रचार चैनल बन चुके कई चैनल तो अपनी डिबेट में सरकार पर सवाल उठाने की बजाय किसानों पर ही सवाल उठा रहे हैं और उन्हें ही घेरने में जुटे हैं। तमाम चैनल सरकारी प्रवक्ता की तरह बात कर रहे हैं। हाल ही में हवालात का चक्कर लगाकर लौटे अर्णब गोस्वामी भी इनमें से एक है। लेकिन बहस के दौरान किसान नेता राकैश टिकैत ने अर्णब को जो जवाब दिया, उससे अर्नब की बोलती बंद हो गई। यह जवाब खूब वायरल हो रहा है।

 हुआ यह कि कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन को लेकर टीवी डिबेट के दौरान अर्नब गोस्वामी भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत से “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का जिक्र कर लगातार सवाल दागने लगे। अर्नब का आरोप था कि किसानों के आंदोलन में टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोग घुस गए हैं और किसान उन्हें बाहर नहीं निकाल रहे हैं। अर्नब लगातार सवाल दागे जा रहे थे और किसान नेता को बोलने नहीं दे रहे थे। इस पर टिकैत ने कहा, बात तो सुन लो कि किसी हकीम ने बता रखा है कि बोलते ही रहोगे? टिकैत के इस जवाब को सुनकर अर्नब एक पल को झेंप गए। राकेश टिकैत का यह जवाब खूब वायरल हो रहा है।

 दरअसल किसानों के आंदोलन को कुछ मीडिया घरानों द्वारा लगातार सांप्रदायिकता का जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। कोई इसे पाकिस्तान और चीन के समर्थन से चलने वाला आंदोलन बता रहा है तो कोई इसे शाहीन बाग पार्ट- टू कह कर बदनाम करने की साजिश रचने में जुटा है। वहीं दूसरी ओर किसान लगातार अपनी मांगों पर अड़े हैं और ठंड बढ़ने के बावजूद अपनी मांग मंगवाने तक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

हरामी व्यवस्थाः महज खाना छू लेने पर दलित युवक को पीटकर मारा डाला

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  देश के सामंती हिस्से में बुंदेलखंड का नाम भी लिया जाता है। अपने आप को तिसमार खां समझने वाले ऊंची जाति के गुंडों द्वारा यहां अक्सर सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के साथ ज्यादती की खबर आती है। कहीं कहीं पिछड़े वर्ग में भी सामंती जातियों की यह बीमारी घुसती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में बुंदेलखंड के छतरपुर के किशनगंज गांव में जातिवादी गुंडों ने एक युवक को इसलिए पीट-पीट कर मार डाला, क्योंकि उसने एक पार्टी में खाना छू दिया था। यह युवक पार्टी में साफ-सफाई के लिए गया था। आरोपियों का नाम भूरा सोनी और संतोष पाल है, जबकि पीड़ित युवक का नाम देवराज अनुरागी है। घटना के बाद से आरोपी फरार हैं। पुलिस दोनों को किसान बता रही है। दोनों के खिलाफ हत्या और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

लालू समर्थकों को फिर लगा झटका

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जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आने की राह देख रहे लालू प्रसाद यादव को फिर झटका लगा है। आज लालू प्रसाद यादव की जमानत पर होने वाली सुनवाई को फिर से छह हफ्ते के लिए टाल दिया गया है। खबर है कि सुनवाई को इसलिए टाल दिया गया क्योंकि लालू प्रसाद यादव की सजा का आधा वक्त अभी खत्म नहीं हुआ है। ऐसा होना रिहाई के लिए जरूरी शर्त है और इसमें अभी 40 दिन और बचे हैं। लालू यादव झारखंड में चारा घोटाले से जुड़े मामले में सजा काट रहे हैं। छह हफ्ते बाद यह चालीस दिन पूरे हो जाएंगे।

दरअसल लालू यादव के प्रशंसक 9 नवंबर से ही लालू यादव के जेल से रिहाई की राह देख रहे हैं, लेकिन वक्त लगातार खिंचता जा रहा है। पिछली बार सुनवाई इसलिए टली थी, क्योंकि सीबीआई ने झारखंड हाईकोर्ट में अपना पक्ष दाखिल नहीं किया था। भ्रष्टाचार के मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव चार साल की कैद की सजा काट रहे हैं। लालू को कई अन्य मामलों में जमानत मिल चुकी है और यह आखिरी मामला है, जिसमें जमानत मिलते ही वह जेल से रिहा हो जाएंगे। लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले से जुड़े चाईबासा ट्रेज़री केस में अक्टूबर में ही ज़मानत मिल गई थी, लेकिन ‘दुमका ट्रेज़री केस’ की सुनवाई पूरी नहीं होने के चलते उन्हें जेल में ही रहना पड़ा। लालू यादव भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार दिये जाने के बाद दिसंबर 2017 से ही जेल में हैं। हालांकि इसी मामले में बिहार के एक अन्य पूर्व ब्राह्मण मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को जमानत मिल गई। दूसरी ओर लालू यादव के वकील कपिल सिब्बल ने सीबीआई पर जानबूझकर जमानत अर्जी में देरी किए जाने का आरोप लगाया था।

बिहार में नीतीश ने चली चाल, भाजपा का छोटा भाई बनना स्वीकार नहीं

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  बिहार विधानसभा का चुनाव भले खत्म हो गया हो, वहां राजनीतिक हलचल थमी नहीं है। इस चुनावी नतीजे के बाद सबसे ज्यादा परेशान और बेचैन नीतीश कुमार हैं। नीतीश भले ही भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन भाजपा का छोटा भाई बनना और प्रदेश में तीसरे नंबर पर चले जाना, नीतीश को लगातार खटक रहा है। इसी को देखते हुए नीतीश कुमार ने अपने पुराने साथी उपेन्द्र कुशवाहा को अपने पाले में लाने की कोशिश तेज कर दी है।

 नीतीश कुमार और रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा के बीच मुलाकात हुई है। नीतीश कुमार कुशवाहा को एनडीए में लाना चाहते हैं। ऐसा कर नीतीश कुमार अपने लव-कुश वाले फार्मूले पर वापस आना चाहते हैं। बिहार में कुर्मी समाज की आबादी 4 फीसदी है और नीतीश इसी समाज से ताल्लुक रखते हैं।

दूसरी ओर किंगमेकर बनने का सपना पाले उपेन्द्र कुशवाहा बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने के कारण हाशिये पर हैं। उन्हें भी राजनीतिक ऑक्सीजन की जरूरत है। और इस वक्त में सिर्फ नीतीश कुमार ही उन्हें नया मौका दिलवा सकते हैं। संभव है कि जल्दी ही बिहार की राजनीति में नया फेर बदल देखने को मिल सकता है। वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार चिराग पासवान को एनडीए से आउट करने के लिए भी पुरजोर ताकत लगा रहे हैं।

किसानों पर महामारी एक्ट में एफआईआर

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 तीन कृषि बिल के खिलाफ बीते 29 नवंबर से दिल्ली के सिंधु बार्डर की रेड लाइट पर धरने पर बैठे किसानों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया है। किसानों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने के लिए महामारी एक्ट सहित तमाम अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। ये किसान 29 नवंबर को लामपुर बार्डर से दिल्ली की सीमा में घुस आए थे, और तब से सिंधु बार्डर की रेड लाइट पर रोड ब्लॉक कर धरने पर बैठे हैं। वहीं दूसरी ओर किसानों ने 12 दिसंबर को दिल्ली-जयपुर हाईवे बंद करने और सभी टोल प्लाजा पर कब्जा करने का ऐलान किया है। तो 14 दिसंबर से किसानों ने देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। गौरतलब है कि नए कृषि बिल के खिलाफ पिछले कुछ महीने से देश भर के किसान आंदोलन कर रहे हैं और केंद्र सरकार से कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र का दम भरने वाली सरकार लोक की बात मानने को तैयार नहीं है। पिछले कुछ दिनों में रस्सा-कस्सी और बढ़ी है। हालांकि सरकार और किसानों के बीच अब तक पांच दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया है।

क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे?

ए क महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए। एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ। एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे। मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे। आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे।

बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है…  इत्यादि इत्यादि ..। फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं।।। उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं।

चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था। लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है?

इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं। कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है। ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता।

क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है। आइये उस उत्तर में प्रवेश करें।

कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं।

अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है।

लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है। गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं। कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है। बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है। यह एक चमत्कार है। यही बुद्ध के साथ हो रहा है। भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है। लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है।

स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया। भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है। इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को  अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है।

लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है?

मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है।

बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है। ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे। हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है। इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है। लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है। उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है। उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है। उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं। अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेखन में मिलावट की जा सके। डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें। अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें। अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे।

अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा। उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा। कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है।

हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था। इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं।

किसानों का भारत बंदः 25 राज्यों में 10 हजार जगहों पर रहा बंद

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भारत में किसानों का आंदोलन चरम पर है। कृषि बिल को लेकर 8 दिसंबर को किसानों ने बंद बुलाया था। इस बीच देश के 25 राज्यों में 10 हज़ार जगहों पर बंद की खबर है। पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना में पूर्ण बंद होने की खबर है तो कर्नाटक में 100 तालुका में पूर्ण बंद की सूचना है। जबकि भारत के तमाम अन्य हिस्सों में भी बंद का असर दिखा। महाराष्ट्र के बुलढाणा में रेल रोकी गई। खास बात यह रही कि जो सड़क पर नहीं उतरे थे, वो भी किसानों का समर्थन कर रहे थे। जहां तक किसानों की बात है तो वो अपनी मांगों पर अडिग हैं। उनकी मांग है कि सरकार तीनों कानून वापस ले और  MSP की गारंटी दे। बंद की खास बात यह भी रही कि कनाडा के शहर ब्रैम्पटन में पंजाबी समुदाय के लोगों की ओर से दिल्ली में धरने पर बैठे किसानों के समर्थन में एक रैली निकाली गई। किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किसानों को मिलने के लिए बुलाया।    

किसान आंदोलनः कृषि मंत्री की बजाय गृहमंत्री अमित शाह क्यों कर रहे हैं बात

भारत में किसानों का आंदोलन चरम पर है। कृषि बिल को लेकर 8 दिसंबर को किसानों ने बंद बुलाया था। 25 राज्यों में सफल भारत बंद की खबर है। इस बीच शाम को जब सरकार की ओर से बातचीत का न्यौता आया तो सभी चौंक गए। किसानों से बातचीत के लिए कृषि मंत्री नहीं, बल्कि बातचीत का न्यौता गृहमंत्री अमित शाह की ओर से आया। दरअसल सरकार को लग रहा था कि किसान आंदोलन दम तोड़ देगा, लेकिन जिस तरह किसानों ने सड़क पर उतर पर सरकार के खिलाफ खम ठोक दिया, उससे सरकार सकते में आ गई। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी किसान डिगने को तैयार नहीं थे। स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव भी किसानों के बंद के समर्थन में उतरे थे। उन्होंने दावा किया कि देश के 25 राज्यों में 10 हज़ार जगहों पर बंद हुआ है। पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना में पूर्ण बंद होने की खबर है तो कर्नाटक में 100 तालुका में पूर्ण बंद की सूचना है। जबकि भारत के तमाम अन्य हिस्सों में भी बंद का असर दिखा। महाराष्ट्र के बुलढाणा में रेल रोकी गई। खास बात यह रही कि जो सड़क पर नहीं उतरे थे, वो भी किसानों का समर्थन कर रहे थे। यानी कुल मिलाकर देश के आम जनता की भावना किसानों के साथ है। जहां तक किसानों की बात है तो वो अपनी मांगों पर अडिग हैं। उनकी मांग है कि सरकार तीनों कानून वापस ले और MSP की गारंटी दे। बंद की खास बात यह भी रही कि कनाडा के शहर ब्रैम्पटन में पंजाबी समुदाय के लोगों की ओर से दिल्ली में धरने पर बैठे किसानों के समर्थन में एक रैली निकाली गई। माना जा रहा है कि देश के तमाम हिस्सों की इन खबरों पर सीधे प्रधानमंत्री मोदी की ओर से गृहमंत्री अमित शाह नजर बनाए हुए थे। इसलिए किसानों को बैठक के लिए कृषि नहीं गृह मंत्री का फोन आया। इससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि मोदी सरकार में तमाम मंत्रियों की अहमियत कितनी है। प्रधानमंत्री मोदी चाहे जिसे जो जिम्मेदारी दें, उन्हें भरोसा सिर्फ अमित शाह पर ही है।

हरामी व्यवस्थाः मोदी-शाह के गुजरात में दलित युवक से हुई बड़ी ज्यादती

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देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृहराज्य गुजरात में दलित समाज के एक युवक से ऊंची जाति के लोगों ने इसलिए मारपीट की क्योंकि उसने कथित ऊंची जाति जैसा ‘सरनेम’ रखा था। मामला गुजरात के साणंद जिले का है। 21 साल के युवक भरत जाधव गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के वेरावल तालुका के भेटड़ी गांव से ताल्लुक रखते हैं। पिछले कुछ महीनों से वो अहमदाबाद के नजदीक साणंद जीआईडीसी में एक कारखाने में काम कर रहे थे। यहीं कथित ऊंची जाति ‘दरबार’ जाति के एक जातिवादी गुंडे हर्षद ने उनके साथ मारपीट की। आरोपी जातिवादी गुंडे भरत से इसलिए भी नाराज थे, क्योंंकि वह अपनी शर्ट के बटन खोलकर रखता था। पीड़ित भरत के साथ रात को 10 बजे के करीब स्थानीय बस स्टैंड पर हर्षद और उनके साथी गुंडों ने मारपीट की। भरत की हालत देखकर बस कंडेक्टर ने भरत को घटना की रिपोर्ट लिखवाने को कहा, जिसके बाद भरत ने रिपोर्ट लिखवाई। 24 घंटे से ज्यादा समय तक मामले को टालने के बाद बड़े अधिकारियों से गुहार करने और भरत के पक्ष में आए स्थानीय लोगों के दबाव के बाद जाकर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। गौरतलब है कि भरत के पिता बाबूभाई जाधव वेरावल तालुका में एक खेतिहर मजदूर हैं, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया। भरत ने 10वीं पास करने के बाद मैकेनिकल इंजीनियरिंग का कोर्स किया और राजकोट में आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन क्लास चल रही थी, जिसके कारण वो पढ़ाई के साथ-साथ काम भी कर रहे थे, ताकि परिवार की मदद कर सकें और आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए पैसे जोड़ सकें। लेकिन हरामी जातिवादी व्यवस्था के रखवालों को यह पसंद नहीं था कि दलित समाज का एक युवा जीवन में आगे बढ़े। भारत लोकतांत्रिक देश है लेकिन यहां सरनेम और नाम भी कुछ गुंडे अपनी बपौती समझते हैं।

न्यूज सोर्स- बीबीसी, फोटो क्रेडिट- बीबीसी

किसानों के समर्थन में उतरी बसपा, बहनजी ने दिया बड़ा बयान

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किसानों के समर्थन में तमाम विपक्षी दल सामने आ गए हैं। इसी क्रम में बहुजन समाज पार्टी भी किसानों के पक्ष में उतर गई है। बसपा प्रमुख मायावती ने इस संबंध में बड़ा बयान दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने किसानों के समर्थन में ट्विट किया है। अपने ट्विट में उन्होंने लिखा- कृषि से सम्बंधित तीन नये कानूनों की वापसी को लेकर पूरे देश भर में किसान आन्दोलित हैं व उनके संगठनों ने दिनांक 8 दिसम्बर को ’’भारत बंद’’ का जो एलान किया है, बी.एस.पी उसका समर्थन करती है। साथ ही, केन्द्र से किसानों की माँगों को मानने की भी पुनः अपील। इसके अलावा सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी किसानों के समर्थन में सड़क पर उतर गए हैं। सोमवार को उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया। कांग्रेस पार्टी भी भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है।