पढ़िए, वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बहुजन कैलेंडर के बारे में क्या लिखा है

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 बहुजन कैलेंडर
मेरी नज़र में काम की साधना का मतलब है उसमें डूब कर करते जाना। दलित दस्तक के अशोक दास अपने काम में साधक हैं। युवा अवस्था से ही उन्होंने अपना कुछ बनाने की चुनौती स्वीकार की है। उनके काम में प्रसार संख्या की प्रासंगिकता से मुक्त जुनून दिखता है। उनकी पत्रिका नियमित पहुँचती रहती है और साल ख़त्म होने पर कैलेंडर आ जाता है। भारत का इतिहास मुख्यधारा का इतिहास नहीं है। मुख्यधारा के चर्चित नामों के योगदान से इंकार नहीं कर रहा लेकिन इसमें एक क़िस्म का असंतुलन है।
इसे दूर करने का उपाय हर रोज़ किसी महापुरुष की याद में ट्विट करना भी नहीं है जो आज कल दिन भर झूठ बोलने वाले मंत्री करते हैं। वे सोमवार को शहीद उधम सिंह की जयंती मनाते हैं तो रविवार को अश्फ़ाक की। इसका पूरा मक़सद जताना होता है कि जानते हैं। स्मरण कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ट्विट करने वाला मंत्री इससे अधिक कुछ नहीं जानता। राजनीति भी तो यही करती है। मूर्ति बनाती है। भूल जाती है।
बहुजन समाज के नायकों और घटनाओं का पाठ करने पर आप जान पाते हैं कि मुख्यधारा की तस्वीर कितनी एकांगी है। अशोक के इस कैलेंडर से काफ़ी कुछ पता चलता है। पहले तो यही कि कैलेंडर को पंचांग की तिथियों और रंगीन तस्वीरों के अलावा भी दूसरे नज़रिये से देखा जा सकता है।
शानदार प्रयास है। आप इसे देखते हुए कितना कुछ जानते हैं। पिछले साल के कैलेंडर में नायक थे तो इस साल आंदोलन हैं। उनका महत्व है। सोचिए फ़ोन पर जो तारीख़ों का कैलेंडर होता है वो कितना सादा होता है। केवल नंबर होता है। लेकिन इस पारंपरिक कैलेंडर में कितना कुछ नया है। अपनी दीवारों पर ऐसे कैलेंडर की जगह बचा कर रखिए। अशोक दास को शुभकामनाएँ।

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक पेज से। उनके पेज पर यह पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


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