2021 में ऐसे बनेगा बहुजन भारत

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दलित दस्तक अपने 9वें वर्ष में है। बीते आठ वर्षों में हमने समसामयिक विषयों पर चर्चा को अधिक तव्वजो दी है। लेकिन दर्जनों अन्य स्रोतों से आ रहे खबरों के प्रवाह ने समसामयिक विषयों पर चर्चा को काफी हद तक पूरा किया है। हम भी दलित दस्तक की वेबसाइट और यू-ट्यूब चैनल के जरिए समसामयिक विषयों पर लेखों का प्रकाशन और वीडियो के जरिए चर्चा करते रहते हैं। ऐसे में नए साल में दलित दस्तक मैग्जीन आपको समसामयिक विषयों के साथ वैचारिक मासिक पत्रिका के रूप में देखने को मिलेगी।

जब हम विचार की बात करते हैं तो हमारी विचारधारा तथागत बुद्ध के ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ को समर्पित है। हमारी विचारधारा सतगुरु रविदास के बेगमपुरा की परिकल्पना को समर्पित है। हमारी विचारधारा संत कबीर के आडंबर और अंधविश्वास रहित भारत की विचारधारा है। और जब हम विचारधारा की लड़ाई में उतरते हैं तो दलित, वंचित, पिछड़ा और आदिवासी कहे जाने वाले समाज के सामने अक्सर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की चुनौती महसूस की जाती है। ऐसे में जब एक ओर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने को अमादा देश की सरकार है तो देश के मूलनिवासी समाज के सामने अपनी बहुजन-मूलनिवासी और आदिवासी पहचान को बचाए रखने की चुनौती है। आज जब अपनी मूल पहचान को भूल कर बहुसंख्यक बहुजन (दलित-पिछड़ा-आदिवासी) तबका ‘हिन्दू’ बनने को आतुर है, यह चुनौती और बढ़ जाती है।

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ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं है कि बहुजन समाज अपनी ऐतिहासिक तारीखों, अपने नायकों, अपने पर्व-त्यौहारों और बहुजन संस्कृति को स्थापित करने की दिशा में और मजबूती से बढ़े। ‘दलित दस्तक’ के जरिए हम उन तारीखों, उन त्यौहारों को एक बार फिर से बहुजन समाज को अवगत कराने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारी बहुजन विरासत को समृद्ध करने वाले हैं। इसके लिए हमें महीने दर महीने उन 12 आंदोलनों को याद करना होगा, जिसने मूलनिवासी बहुजन संस्कृति के इतिहास को समृद्ध किया है। हमें उन नायकों को याद करना होगा जिन्होंने देश में बहुजन विचारधारा की मजबूती के लिए, अपनी मूलनिवासी पहचान को बरकार रखने के लिए शहादत दी। हमें उन नायक/नायिकाओं को याद करना होगा, जिन्होंने बहुजन समाज की सामाजिक मुक्ति के लिए अपना जीवन लगा दिया।
इस कड़ी में सबसे पहले बात उन 12 बहुजन आंदोलनों की जिन्हें याद करना जरूरी है।

जनवरी (कोरेगांव की क्रांति)
01 जनवरी सन् 1818 में एक ऐसी घटना घटी थी, जिसने दलित समाज के शौर्य को दुनिया भर में स्थापित किया था। यह दिन कोरेगांव के संघर्ष के विजय का दिन है। यह लड़ाई महाराष्ट्र के पुणे स्थित भीमा-कोरेगांव में लड़ी गई थी। यह युद्ध लगातार 12 घंटे तक चला। इस महायुद्ध में पेशवा बाजीराव-II की 28 हजार सेना को ‘बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री’ के 500 ‘महार’ सैनिकों ने रौंद डाला था। इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है। इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे। 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया।
बहुजन समाज को नए साल की बधाई के साथ कोरेगांव विजय दिवस जिसे शौर्य दिवस कहा जाता है, उसकी भी बधाई देनी चाहिए। एक जनवरी को देश भर से हजारों लोग यहां पहुंच कर उन लड़ाकों को याद करते हैं।

फरवरी (चौरी चौरा आंदोलन)
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास चौरी चौरा के जिक्र के बिना अधूरा है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर यह घटना 4 फरवरी (कुछ जगह 5 फरवरी भी दर्ज है।) 1922 को घटी। हुआ यह कि असहयोग आंदोलन के दौरान पुलिस ने दो क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। विरोध में आंदोलनकारी थाने के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे, जिस पर पुलिस ने गोलियां चला दी, जिसमें तीन क्रांतिकारी मारे गए। इससे भड़के क्रांतिकारियों ने रमापति चमार के नेतृत्व में चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी, जिसमें थानाध्यक्ष समेत 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। भड़के अंग्रेजों ने 222 क्रांतिकारियों को आरोपी बनाया, जिसमें ज्यादातर दलित क्रांतिकारी शामिल थे। 2 जुलाई, 1923 को रमापति चमार सहित 19 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई।

मार्च (चावदार तालाब क्रांति)
चावदार तालाब नाम का यह आंदोलन बाबासाहब डॉ. आम्बेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला स्थित महाड़ में चलाया गया। उस वक्त सार्वजनिक कुओं व तालाब पर अछूतों को पानी पीने की मनाही थी, चाहे वह प्यास से मर ही क्यों न रहे हों। नगर परिषद के आदेश के बावजूद सवर्ण हिन्दु मानने को तैयार नहीं थे। तब 20 मार्च को बाबासाहब के नेतृत्व में 10 हजार से ज्यादा दलितों ने सत्याग्रह करते हुए तालाब की ओर कूच किया और पानी पी लिया। भड़के सवर्णों ने इसको पवित्र किया। इसके खिलाफ डॉ. आंबेडकर अदालत गए। लंबी लड़ाई के बाद बाम्बे हाई कोर्ट ने दलितों को पानी पीने के हक का आदेश दिया। आज उसी चावदार तालाब के बीचो बीच बाबासाहेब की प्रतिमा है।

अप्रैल (महिला मुक्ति क्रांति)
आज महिलाओं को जो भी अधिकार हासिल हैं, उसमें हिन्दू कोड बिल की बड़ी भूमिका है, जिसकी परिकल्पना डॉ. आंबेडकर ने की थी। विधवा पुनर्विवाह, पैतृक संपत्ति में हक, गोद लेने का अधिकार, मातृत्व अवकाश जैसी तमाम सुविधाएं जो महिलाओं को हासिल है, वह बाबासाहब की ही देन है। महिलाओं पर लादी गई सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने के लिए डॉ. आंबेडकर ने 11 अप्रैल 1947 को भारतीय संसद में हिन्दू कोड बिल पेश किया। लेकिन बिल संसद में पास नहीं हो सका। विरोध में डॉ. आंबेडकर ने नेहरू मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया। हालांकि 1952 में डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित बातें अमल में लाई गई और महिलाओं को वो अधिकार मिले, जिसकी परिकल्पना बाबासाहब ने की थी। इस तरह महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया।

मई (दलित पैंथर क्रांति)
वंचित समाज सदियों से साधन संपन्न और सत्ताधारी जातियों के अत्याचार का शिकार हुआ है। असहाय समाज अपने भीतर गुस्सा पाले सदियों तक इस अपमान को मजबूरी में सहता रहा। बाबासाहब डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान में मिले अधिकारों की बदौलत जब यह समाज थोड़ा उठ कर खड़ा हुआ तो अपने साथ हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगा। जाति उत्पीड़न के खिलाफ 29 मई 1972 को महाराष्ट्र में नामदेव ढसाल, जे.वी पंवार और राजा ढाले आदि युवाओं ने दलित पैंथर की स्थापना की। यह अफ्रीकी-अमरिकी संस्था ब्लैक पैंथर से प्रेरित था। इसने दलितों के खिलाफ होने वाले जुल्म का जवाब देना शुरू किया। यह एक बड़ा आंदोलन था, जिससे महाराष्ट्र प्रदेश में हलचल मच गई और दलितों पर अत्याचार करने से पहले अत्याचारी समाज डरने लगा।

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जून (हूल दिवस क्रांति)
1857 के विद्रोह को अंग्रेजो के खिलाफ पहला विद्रोह बताया जाता है, लेकिन सच यह है कि इससे पहले 30 जून, 1855 को आदिवासी वीरों सिदो, कान्हू और चांद, भैरव ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था। इन्होंने संथाल परगना के भगनाडीह में लगभग 50 हजार आदिवासियों को इकट्ठा करके अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। उन्होंने नारा दिया- ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’। अंग्रेजों को यह रास नहीं आया और भीषण युद्ध हुआ, जिसमें 20 हजार आदिवासी क्रांतिकारी शहीद हुए। जबकि वीर सिदो, कान्हू को 26 जुलाई 1855 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। वीर शहीदों ने जिस 30 जून को क्रांति का बिगुल फूंका था, उसी दिन को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

जुलाई (महिला शिक्षा क्रांति)
भारतीय इतिहास में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को वंचित तबके की महिलाओं में शिक्षा क्रांति के लिए जाना जाता है। यूं तो ज्योतिबा फुले का महिला शिक्षा का आंदोलन 1848 में ही शुरू हो गया था, लेकिन 3 जुलाई 1851 को फुले दंपत्ति ने पुणा के बुद्धवार पेठ मुहल्ले में स्थित अन्ना साहेब वासुदेव चिपलूणकर भवन में जो स्कूल खोला उसे हम वंचित तबके की महिलाओं की शिक्षा क्रांति के आंदोलन की ठोस शुरुआत कह सकते हैं। इसके बाद ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने गरीब अछूत समाज की लड़कियों के लिए एक के बाद एक 18 विद्यालय शुरु किये, जो निस्संदेह महिला शिक्षा क्रांति आंदोलन की शुरुआत थी। महिला शिक्षा के इस आंदोलन में फातिमा शेख ने भी फुले दंपत्ति का पूरा साथ दिया।

अगस्त (मंडल आंदोलन)
पिछड़े वर्ग की स्थिति की समीक्षा के लिए 20 दिसंबर 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया। यह मंडल आयोग के नाम से चर्चित हुआ। दिसंबर 1980 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई। 1982 में यह रिपोर्ट संसद में पेश हुई और 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। सत्ता में आने पर 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रिपोर्ट लागू करते हुए ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी। सवर्णों ने इसका भारी विरोध किया, लेकिन तमाम विरोध के बावजूद 13 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की अधिसूचना जारी हो गई।

सितंबर (सत्यशोधक समाज क्रांति)
सत्यशोधक समाज का उद्देश्य शूद्रों-अतिशूद्रों को ब्राह्मणों के शोषण से मुक्ति दिलाकर समानता लाना था। इसके सदस्यों ने यह प्रण किया कि वे बिना किसी मध्यस्थ के एक विश्वनिर्माता की आराधना करेंगे। इस संस्था के तहत कुनबी, माली, कुंवर, बढ़ई सहित शूद्र जातियों के 700 परिवारों ने निर्णय लिया कि वे आध्यात्मिक और सामाजिक मसलों पर ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्ति पाएंगे। स्थापना के पहले ही वर्ष में सत्यशोधक समाज ने अपने सदस्यों को विवाह समारोहों में ब्राह्मणों की मौजूदगी की जरूरत को खत्म करने के लिए प्रोत्साहित किया। सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फुले ने 24 सितम्बर, 1873 को किया था। वह इसके प्रथम अध्यक्ष बने। इस तरह वंचितों के सामाजिक जीवन को ब्राह्मणमुक्त करने का अभियान शुरू हुआ। यह ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरुआती क्रांति थी।

अक्टूबर (धम्म क्रांति)
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर शहर में डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने पांच लाख से अधिक समर्थकों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर भारत में बौद्ध धम्म का पुर्नउत्थान किया। पहले डॉ. आंबेडकर ने कुशीनगर के भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणी द्वारा पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद अपने लाखों अनुयायियों को त्रिरत्न, पंचशील और 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाते हुए बौद्ध बनाया। ऐसा बड़ा कदम उठाकर बाबासाहब ने भारत के वंचित समाज को हिन्दू धर्म से निकालते हुए नया रास्ता दिखाया, जहां समता और बंधुत्व की बात थी। बौद्ध धम्म से जुड़ कर करोड़ों दलित, शोषित हिन्दू धर्म के भेदभाव से मुक्त हो चुके हैं। वंचित समाज के लिए यह एक बड़ी धार्मिक क्रांति थी। इसे धम्म क्रांति कहा जाता है।

नवंबर (संविधान दिवस क्रांति)
अगर हम भारत की सबसे बड़ी क्रांति की बात करें तो यह 26 नवंबर 1949 को घटित हुई। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने भारत के संविधान को 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन में पूरा कर 26 नवम्बर 1949 को राष्ट्र को समर्पित किया। संविधान प्रारुप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आम्बेडकर ने संविधान को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंप दिया। संविधान में मिले अधिकारों की बदौलत रातों-रात भारत में राजा और रंक कानूनी रूप से समान हो गए। जिस भारत में एक विशेष वर्ग को तमाम विशेषाधिकार प्राप्त था, और जाति की वजह से जिस वर्ग को तमाम जिल्लतें सहनी पड़ती थी, वो एक जगह पर आकर खड़े हो गए। दलितों-शोषितों के मुक्ति की कहानी शुरु हुई।

दिसंबर (मनुस्मृति दहन क्रांति)
मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक ऐसा ग्रंथ है, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच असमानता की बात करता है। जो दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं को तमाम अधिकारों से वंचित करने की वकालत करता है। 25 दिसंबर, 1927 को बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर और उनके समर्थकों ने मनुस्मृति को सार्वजनिक तौर पर जलाकर इसमें लिखी अमानवीय बातों का विरोध किया। यह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दलितों के संघर्ष की अति महत्वपूर्ण घटना है। मनुस्मृति जलाने के कार्यक्रम को विफल करने के लिए सवर्णों ने कई अवरोध पैदा किया। उन्होंने पूरी कोशिश की कि हिन्दू समाज का कोई व्यक्ति उन्हें इस आयोजन के लिए जमीन न दे। तब फत्ते खां ने अपनी निजी ज़मीन उपलब्ध करायी थी। अत्याचार, शोषण और भेदभाव की पोषक मनुस्मृति को जलाने का सिलसिला आज भी जारी है।

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इन बहुजन क्रांतियों को याद रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ये आंदोलन और क्रांति हमें हमारे इतिहास और हमारे पूर्वजों के संघर्ष के बारे में बताती है। ये बताते हैं कि आज दलित-आदिवासी-पिछड़ा समाज जिस स्थिति में है, उसके लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत आंदोलन किया है। इस समाज के जितने भी लोगों को आज स्वतंत्रता और बेहतर जिंदगी मिल सकी है, वो इन्हीं संघर्ष और क्रांतियों के बूते मिली है।

बहुजन समाज के सामने एक और बड़ी दिक्कत पर्व और त्योहारों की है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को याद नहीं रखने के कारण हम अक्सर हिन्दू पर्व और त्योहारों में उलझे रहते हैं। लेकिन आप गौर से देखेंगे तो बहुजन समाज के भीतर कई ऐसे महत्वपूर्ण दिन है, जो ऐतिहासिक हैं और जिस दिन को बहुजन समाज को पर्व और उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। कुछ का जिक्र हमने ऊपर किया है, लेकिन इसके अलावा और भी तारीखे हैं। आइए एक नजर उस पर डालते हैं।

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी)
26 जनवरी के दिन साल 1950 में भारत सरकार अधिनियम (एक्ट) (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था। 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा की ओर से संविधान अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू कर दिया गया। भारत का संविधान डॉ. आम्बेडकर द्वारा बनाने की वजह से इस दिन का अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोगों में खासा महत्व है। यही वो दिन है, जिस दिन के बाद डॉ. आम्बेडकर द्वारा लिखे संविधान की बदौलत देश में वंचित समाज को न्याय मिलने की शुरूआत हुई और मनुस्मृति के दौर का अंत शुरू हो गया। यह दिन लोकतांत्रिक त्यौहार का दिन है।

सतगुरु रविदास जयंती (27 फरवरी)
मध्यकालीन संतों में सतगुरू रविदास का स्थान श्रेष्ठ है। इसी कारण उनको संत शिरोमणि भी कहा जाता है। सतगुरु रविदास का जन्म संवत 1433 (1376 ईं.स) में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। यह जिस दिन और तारीख को होता है, उसी दिन दुनिया भर में रविदास जयंती मनाई जाती है। साल 2021 में यह तारीख 27 फरवरी को है। सतगुरु का जन्म बनारस के नजदीक मांडुर गढ़ (महुआडीह) नामक स्थान पर हुआ था। ये चमार जाति में पैदा हुए। गुरुग्रंथ साहिब में संकलित रविदास के पदों में उनकी जाति चमार होने का उल्लेख बार-बार आया है।
सतगुरु रविदास राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु भी थे। सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत और दूसरे लेखन (41 पद) शामिल हैं। पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव ने इसका संकलिन किया था। सतगुरु रविदास के ज्ञान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने विद्वता के लिए प्रख्यात काशी (वाराणसी) के पंडों को ज्ञान की परीक्षा में पराजित कर दिया था। जिसके बाद शर्त के मुताबिक काशी के पंडों ने उन्हें पालकी में बैठाकर उसे अपने कंधों पर ढोकर पूरे शहर में घुमाया था। इस दिन को पूरे दलित-वंचित समाज को त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए। इस दिन सतगुरु की जन्मभूमि वाराणसी में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें दुनिया भर से उनके अनुयायी शामिल होते हैं। आप भी इस दिन अपने परिवार क साथ वाराणसी जा सकते हैं।

11 अप्रैल ज्योतिबा फुले जयंती एवं 14 अप्रैल बाबासाहेब अम्बेडकर जयंती
बहुजन समाज के लिए यह एक साकारात्मक संयोग है कि इसके दो महापुरुषों की जयंती महज चार दिन के बीच आती है। इसमें एक हैं महामना ज्योतिबा राव फुले और दूसरे हैं राष्ट्रनिर्माता बाबासाहब आंबेडकर। बाबासाहब आंबेडकर ने अपने जीवन में वंचित समाज की मुक्ति की जो मुहिम चलाई थी, उसकी नींव काफी पहले ज्योतिबा राव फुले डाल चुके थे। ये दोनों महापुरुष बहुजन समाज की मुक्ति के सूत्रधार बने थे। इनकी जयंती बहुजन समाज के लिए एक बड़ा दिन है। इसे उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। आप अपनी सुविधानुसार इसे संयुक्त रूप से भी मना सकते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा (26 मई)
बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने बहुजन समाज को हिन्दू धर्म से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म की राह दिखाई थी। बाबासाहब ने खुद अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। तब से लेकर आज तक वंचित समाज के लाखों लोग अपने जीवन में बौद्ध बन चुके हैं। या फिर बौद्ध धर्म के प्रभाव में हिन्दु धर्म की रुढ़ियों और अंधविश्वास से बाहर निकल चुके हैं। साल 2021 में बुद्ध पूर्णिमा 26 मई को है। यह बहुजनों का एक बड़ा त्यौहार है।

संत कबीर जयंती (24 जून)
रविदास जयंती की तरह कबीर जयंती भी तिथि के हिसाब से अलग-अलग तारीख को आती है। लेकिन यह अमूमन जून महीने में ही आती है। साल 2021 में कबीर जयंती 24 जून को है। कबीर 15वीं शताब्दी के एक विशिष्ठ कवि थे। कबीर का जन्म 1440 में जेठ महीने में पूरनमासी को हुआ बताया जाता है, जबकि उनका जन्म स्थान काशी माना जाता है। कबीर; सन्त कवि और समाज सुधारक थे। संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। कबीर की वाणी को हिंदी साहित्य में बहुत ही सम्मान के साथ रखा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में भी कबीर की वाणी को शामिल किया गया है। कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ (Bijak) नाम से है। वंचित समाज को ब्राह्मणवाद और आडंबर से बाहर निकालने के लिए संत कबीर अपने जीवन के आखिरी वक्त में मगहर चले गए थे, क्योंकि वह स्वर्ग-नरक और मोक्ष के उस मिथ्या प्रचार को झुठलाना चाहते थे, जिसमें ब्राह्मणवादी यह प्रचार करते थे कि काशी में मृत्यु होने पर लोगों को मोक्ष मिलता है। काशी और मगहर दोनों जगह संत कबीर से जुड़े स्थल है। काशी में कबीर मठ लोकप्रिय है तो मगहर में कबीर का मजर और मंदिर दोनों है। मगहर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पास है। अब इसे संतकबीर नगर के नाम से जाना जाता है। इस दिन बहुजन समाज को इन स्थलों पर जाकर त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए।

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धम्मचक्क पवत्तन दिवस (14 अक्टूबर)
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर शहर में डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर ने स्वयं और अपने लाखों समर्थकों के साथ त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। तब से हर वर्ष इस दिन को धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया जाता है। भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान इसी दिन से शुरू हुआ था। यह दिन भी बहुजन समाज के लिए महत्वपूर्ण है। इसे बड़े त्यौहार के रूप में मनाना चाहिए।

बिरसा मुंडा जयंती (15 नवंबर)
बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के भगवान हैं। आदिवासी समाज के हित और आजादी के लिए उन्होंने पूरे जीवन लड़ाईयां लड़ी। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को चालकद ग्राम में हुआ। बिरसा मुंडा को अपनी भूमि और संस्कृति से गहरा लगाव था। उन्होंने न केवल राजनीतिक जागृति के बारे में संकल्प लिया बल्कि अपने लोगों में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जागृति पैदा करने का भी संकल्प लिया। उन्होंने गांव-गांव घुमकर लोगों को अपना संकल्प बताया। उन्होंने ‘अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज (हमारे देश में हमार शासन) का बिगुल फूंका। बिरसा द्वारा शुरू किया गया वह आंदोलन आज तक चल रहा है।

उन तमाम बहुजन नायकों की जयंती को भी विशेष दिन के रूप में मनाने का रिवाज बहुजन समाज के बीच चल ही पड़ा है, जिन्होंने देश की बहुत बड़ी आबादी को अपने-अपने वक्त में प्रभावित किया। इसमें सावित्री बाई फुले जयंती (3 जनवरी), बाबू मंगूराम जयंती (14 जनवरी), कर्पूरी ठाकुर जयंती (24 जनवरी), जोगेन्द्र नाथ मंडल जयंती (29 जनवरी), बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा जयंती (2 फरवरी), संत गाडगे जयंती (23 फरवरी), मान्यवर कांशीराम जयंती (15 मार्च), स्वामी अछूतानंद जयंती (6 मई), छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती (26 जून), साहित्यकार अन्नाभाऊ साठे जयंती (1 अगस्त), नारायणा गुरु जयंती (20 अगस्त), राम स्वरूप वर्मा (22 अगस्त), अय्यनकाली जयंती (28 अगस्त), ललई सिंह यादव जयंती (1 सितंबर), पेरियार जयंती (17 सितंबर), मदारी पासी जयंती (24 अक्टूबर), उदा देवी शहादत दिवस (16 नवंबर), झलकारी बाई जयंती (22 नवंबर), क्रांतिकारी मातादीन जयंती (29 नवंबर), गुरु घासीदास जयंती (18 दिसंबर), और ऊधम सिंह जयंती (26 दिसंबर) शामिल है। इसके अलावा और भी बहुत से नाम हैं, जिन्होंने दलित-वंचित-आदिवासी और पिछड़े समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। स्थानीय स्तर पर ऐसे सैकड़ों नाम हैं। बहुजन समाज को उनकी जयंती पर उन्हें जरूर याद करना चाहिए।

ये दिन दलित-वंचित समाज के असली त्यौहार के दिन हैं। किसी दूसरे के धर्म के दिन जश्न में डूबने से अच्छा है कि बहुजन समाज इन दिनों को जश्न के रूप में मनाए और इस दिन को स्थापित करने में भागीदारी निभाए। हालांकि भारत का बहुजन तबका इन दिनों को विशेष पर्व के रूप में कमोबश याद करना शुरू कर चुका है, लेकिन इसको और अधिक प्रचारित करने की जरूरत है। ऐसा कर के ही एक नए बहुजन भारत का निर्माण हो सकेगा।

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