क्या जनगणना पर ओबीसी से खेल रही है मोदी सरकार ?

भारत के बहुजन समाज को यह बात गंभीरता से सोचनी चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जिसके कारण वर्तमान या पूर्वर्ती केंद्र सरकारें जाति के आधार पर ओबीसी की अखिल भारतीय स्तर पर जनगणना नहीं करना चाहती। इस पर सालों से बहस जारी है और इसको लेकर कई तरह की बातें कही जाती हैं। हमें उन बहानों की पड़ताल करना भी जरुरी है। यह कहा जाता है कि जातीय जनगणना से देश विभाजित हो जाएगा। यह बिल्कुल मिथ्या प्रचार है, क्योंकि अभी तक जाति के आधार पर कभी भी देश के बंटवारे की बात किसी ने नहीं कही है। न तो अनुसूचित जाति, न अनुसूचित जनजाति और न ही पिछड़े वर्ग के द्वारा कभी भी इस तरह की कोई बात आधिकारिक तौर पर सामने आई है।

हां, जाति के आधार पर इन वर्गों ने रिजर्वेशन की मांग जरूर की है, लेकिन अलग देश की मांग नहीं कि गई है। जहां तक कुछ वर्गों द्वारा देश के बंटवारे की बात है तो यह मांग धर्म के आधार पर किया गया है, लेकिन धर्म के आधार पर गिनती अब भी जारी है। अगर सचमुच में सरकारों को यह डर है कि जाति और धर्म की गिनती करने से देश बंट जाएगा तो सरकारों को धर्म के आधार पर गिनती बंद कर दी जानी चाहिए। आखिर सरकारों ने ऐसा क्यों नहीं किया? सन् 1980 के वक्त को याद करना चाहिए जब देश में आतंकवाद भी धर्म के आधार पर शुरू हुआ था, और वो भी अलग देश की मांग कर रहे थे। इसलिए जनगणना के आधार पर देश के बंटवारे की बात मिथ्या प्रचार है।

देश के संविधान में यह साफ है कि पिछड़ी जातियों को जाति के आधार पर राजनीति में आरक्षण नहीं मिलना है। जाति के आधार पर पिछड़े वर्ग को सिर्फ शिक्षा और नौकरियों में रिजर्वेशन मिलेगा, जो मिल रहा है। इससे साफ है कि ऊपर जो हमने बातें कहीं है, सरकार उसकी वजह से पिछड़ों की जातीय जनगणना को टाल रही है। साफ है कि सरकार द्वारा जनगणना नहीं कराने के पीछे कोई बहुत बड़ा कारण छिपा हुआ है। सरकार में डर है कि पिछड़े वर्ग की जनगणना के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। ये कारण कौन से हैं, हमें इसकी पड़ताल करनी चाहिए।

जहां तक जातीय जनगणना का सवाल है, देश का संविधान यह अधिकार केंद्र को देता है, न कि राज्यों को। तो क्या जो बिल संसद के सदनों में पास किया गया है, वह राज्यों को पिछड़ी जातियों की जन गणना कराने का अधिकार दे देगा? या फिर राज्यों को सिर्फ जाति के आधार पर लिस्ट तैयार करने की ही अनुमति होगी, यह देखना बाकी है।

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