फिल्म जय भीम ने मचाई धूम, साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी

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जय भीम शब्द में कितनी ताकत है, यह एक बार फिर से सामने आ गया है। IMDB ने साल 2021 की सबसे लोकप्रिय भारतीय फिल्मों की अपनी लिस्ट जारी कर दी है। इसमें फिल्म जय भीम साल की सबसे लोकप्रिय बनी है। IMDB अपनी यह सूची पेज व्यूज के आधार पर बनाता है। इसके लिए किसी भी फिल्म या शो को 1 जनवरी से 29 नवंबर के बीच रिलीज किया जाना चाहिए और इसकी औसत IMDB उपयोगकर्ता रेटिंग 6.5 या उससे ज्यादा होनी चाहिए। और इस बार इसमें सबसे ज्यादा रेटिंग जय भीम को मिली है।

 फिल्म जय भीम ‘द शौशैंक रिडेम्प्शन’ को पछाड़कर सबसे अधिक रेटिंग वाली आईएमडीबी (IMDb) फिल्म बन गई है। ‘जय भीम’ को 10 में से 9.6 रेटिंग मिली है। आईएमडीबी (www.imdb.com) को फिल्मों, टीवी शो और मशहूर हस्तियों के बारे में जानकारी के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय स्रोत माना जाता है।

तमाम विवादों से घिरने और आलोचनाओं की मार झेलने के बावजूद तमिल फिल्म ‘जय भीम’ दर्शक वर्ग में अपनी जगह बना चुकी है। अपनी रिलीज के बाद से ही साउथ के सुपरस्टार सूर्या द्वारा अभिनित यह फिल्म लगातार सुर्खियों में बनी हुई है। साउथ के निर्देशक टीजे ग्नानवेल ने इस फिल्म का निर्देशन किया है और वही इसके लेखक भी हैं। मद्रास हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के एक चर्चित केस पर आधारित यह फिल्म तमिलनाडु की एक जनजाति के उत्पीड़न को दिखाती है। यह फिल्म 2 नवंबर 2021 को रिलीज हुई थी। फिल्म के टॉप पर रहने पर अभिनेता सूर्या ने अपनी खुशी जाहिर की है और कहा है कि फिल्म ‘जय भीम’ ऐसा ही एक अनुभव रहा है, इस फिल्म का हिस्सा बनकर मुझे बेहद गर्व है। बता दें कि फिल्म ‘जय भीम’ अमेजन के जरिए 200 से ज्यादा देशों में देखी गई है।

 यह 1993 की एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्‍म है, जो मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में वकील चन्द्रू, जो कि बाद में मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायधीश बने के द्वारा लड़े गए एक केस पर आधारित है। फिल्‍म की कहानी सिंघनी और राजकन्नू नामक ईरुला आदिवासी जोड़े के जीवन और उन पर पुलिस की ज्‍यादतियों पर आधारित है। सिंघनी अपने पति को न्याय दिलाने के लिए एक वकील चन्द्रू की सहायता लेती है।

अम्बेडकरवादी मंजुला प्रदीप की दुनिया भर में चर्चा, मिला यह सम्मान

नई दिल्ली- दुनिया भर में महिलाएं अपने तरीके से समाज और उनमें रची बसी संस्कृति को बदलने में लगी हुई हैं। इन महिलाओं में कुछ खास महिलाएं भी शामिल हैं जो दुनिया को नए सिरे से तलाशने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ऐसी ही महिलाओं को आगे लाती बीबीसी की सबसे प्रेरक और प्रभावशाली 100 महिलाओं की इस साल की सूची, जारी कर दी गई है। इन 100 प्रभावशाली महिलाओं में दो भारतीय महिलाओं को भी शामिल किया गया है। जिनमें एक हैं मंजुला प्रदीप और दूसरी हैं ऑटिज़्म-अधिकार कार्यकर्ता और नॉट दैट डिफ़रेंट की सह संस्थापिका मुग्धा कालरा। मंजुला गुजरात के एक दलित परिवार से हैं। वो जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ अपने काम के लिए जानी जाती हैं, मंजुला बलात्कार पीड़ितों को मानसिक रूप से मजबूत करने और न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें ट्रेनिंग देती हैं। वो ये मानती हैं कि मानसिक मजबूती ही किसी महिला को उस हादसे से बाहर निकालने में सहायक होती है। ये मंजुला का संघर्ष ही है कि उन्होंने 50 से ज़्यादा दलित महिलाओं को न्याय के लिए लड़ने में मदद की है और इनमें से कई मामलों में सज़ा दिलाने में कामयाब रही हैं। पिछले 30 सालों से महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही मंजुला प्रदीप ने इसी साल ‘नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन लीडर्स’ की स्थापना की है। मंजुला दलित अधिकारों के सबसे बड़े आर्गेनाइजेशन नवसर्जन ट्रस्ट की कार्यकारी निदेशक भी रही हैं। इसके अलावा, मंजुला अंतरराष्ट्रीय दलित एकजुटता नेटवर्क की मेंबर भी हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विश्व सम्मेलन में नस्लवाद के खिलाफ, दलित अधिकारों का मुद्दा उठाया है। मंजुला ने दलित दस्तक से बात की और खुद को मिले इस सम्मान के बारे में बताया। वंचितों की आवाज़ उठाने वाली मंजुला प्रदीप को बीबीसी से मिले इस सम्मान के लिए दलित दस्तक बधाई देता है और उम्मीद करता है कि वो ऐसे ही महिलाओं के हितों के लिए उनके साथ खड़ी रहें।

देश सेवा में अव्वल रहे सीडीएस बिपिन रावत का जानिए कैसा रहा सफर

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नई दिल्ली- चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत की हेलीकाप्‍टर क्रैश में हुई मौत से पूरा देश गम में डूबा हुआ है। बिपिन रावत और उनकी पत्नी समेत 14 लोगों को ले जा रहा ये हेलिकॉप्टर खराब मौसम के कारण तमिलनाडु के कुन्‍नून में नीलगिरी की पहाडि़यों में क्रैश हो गया था। रहा सुनहरा सफर बिपिन रावत पिछले 40 सालों से भारतीय सेना की सेवा कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कई बड़े फैसले लिए जो देश के लिए मील का पत्थर साबित हुए। उनका ये पूरा कार्यकाल गर्व और शौर्य की गाथाओं से भरा हुआ है। पूर्वोत्तर में भारत को उग्रवाद से मुक्ति दिलाने की बात करें या पाकिस्तान में आतंकवादियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की बात करें, बिपिन रावत हर जगह हिट रहे। विरासत में मिली देश की सेवा एक हिंदू गढ़वाली राजपूत परिवार में जन्में बिपिन रावत का जन्‍म 16 मार्च 1958 को उत्तराखंड में हुआ था। उनके परिवार के कई लोग पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय सेना की सेवा में जाते रहे हैं। उनके पिता लक्ष्मण सिंह रावत लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर रहे और उन्हें देश का पहला चीफ आफ डिफेंस स्‍टाफ नियुक्‍त किया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान दो बार भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। ऐसे हुई थी बिपिन रावत की शुरुआत बिपिन रावत ने 16 दिसंबर 1978 को 11 गोरखा राइफल्स की 5वीं बटालियन को जॉइन किया था। उन्हें हाई हाईट वाले युद्ध का और आतंकवाद विरोधी अभियानों के संचालन का बेहद अनुभव था। उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान मोर्चा संभाला और नेफा (यानी नार्थ ईस्ट फ्रॉन्टियर एजेंसी) बटालियन की कमान संभाली। साथ ही उन्होंने कांगो में संयुक्त राष्ट्र की पीसकीपिंग फोर्स की भी अगुवाई की। बने सेना प्रमुख…. रावत ने 1 सितंबर 2016 को सेना के उप-प्रमुख का पद ग्रहण किया। इसके बाद 31 दिसंबर 2016 को रावत आर्मी चीफ के पद पर काबिज हुए। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए, उन्हें भारत सरकार ने 1 जनवरी 2020 को तीनों सेना का प्रमुख यानी चीफ डिफेन्स ऑफ़ स्टाफ (सीडीएस) बना दिया। कई पदकों से नवाजा गया जनरल रावत फील्ड मार्शल सैम मानेकशा और जनरल दलबीर सिंह सुहाग के बाद गोरखा ब्रिगेड के थल सेनाध्यक्ष बनने वाले तीसरे अधिकारी थे। जनरल रावत को सेना में रहते हुए परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, युद्ध सेवा पदक, सेना पदक, विशिष्ट सेवा पदक से भी नवाजा जा चुका है। ऐसी रही शिक्षा देहरादून के कैम्ब्रियन हाल स्कूल और शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल से पढ़ाई करने वाले बिपिन रावत ने आगे की पढ़ाई के लिए एनडीए खडकवासला और भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में एडमिशन लिया। यहां उन्हें ‘स्वार्ड आफ आनर से नवाजा गया।  उन्होंने देश और विदेश दोनों जगह कई बिषयों में डिग्रियां हासिल कीं। उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से  साल 2011 में सैन्य मीडिया अध्ययन में पीएचडी भी की।

Film “Jayanti” addresses the issue of casteism, screened in Novi, Michigan, USA

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Local Michigan Ambedkarite community came together to watch the Marathi-language feature “Jayanti” movie  (birth anniversary) which is  produced in India. This movie was screened in Novi, Michigan which is suburb of Detroit, Michigan, USA. This movie was screened at the topmost theater in Michigan which is Emagine Movies and about 45-50 members watched and maintain the covid-19 protocol.Jayanti movie addresses the issue of casteism  and celebrates the  path-breaking solutions to unite the Bahujan youth against idolatry and casteism.

“Dr Ambedkar Jayanti celebrated in almost every nook and corner of the country in India and across world including on social media with great zeal.

Jayanti Movie has English subtitles and with a running time of 124 minutes. It has been written and directed by ex-journalist and artist Shailesh Narwade. The film has been produced by Meliorist Film Studio and presented by Dashami Studioz.

 Jayanti Movie revisits the thoughts and works of anti-caste leaders and explores their relevance in contemporary Indian society. It’s the story of a young directionless chap, who unknowingly becomes part of the caste-based hatred, but later on leads a meaningful life after reading and learning about the works of great social leaders. The film is a work of fiction that attempts to unite different communities, who have been victims of the caste-divide in the Indian society since several hundred years.

Jayanti was shot in 28 days between December 2019 and February 2020 on around 40 real locations in Nagpur city in Central India. The film got its theatrical release across Maharashtra State and a few other cities in India on 12 November 2021 with ‘U’ certificate of the CBFC. The film is currently running successfully with 50-plus shows in the fourth week with increasing response from the audiences.

Some of the Indian media houses, including The Times of India, The Quint, The Free Press Journal, and News9, have published very rave reviews about the film. Jayanti has been produced by a collective of all first-time producers, including Dr Anand Bankar, Amol Dhakadey, Dr Nilima Suhas Ambade and Dr Sudhir Hajare to name a few.

Well-known music director Mangesh Dhakde has scored background music for the film while Yogesh Koli (cinematographer), Rohan Patil (editor), Ashish Shinde (sound designer), Santosh Gilbile (makeup designer) and Ruhi (music director) are among important crew.

Ruturaj Wankhede is the male actor in leading role while Titeeksha Tawde is the actress. Among prominent cast of the film also includes Milind Shinde, Kishor Kadam, Paddy Kamble, Atul Mahale, Anjali Joglekar and Amar Upadhyay.

Nitin Vaidya, Ninad Vaidya, Aparna Padgaonkar, Vaibhav Chhaya, Sameer Shinde and Suraj Bhanushali are the executive producers.

Movie local reviews at

https://youtu.be/G5qm1UBjDNQ

https://www.facebook.com/groups/875949249881067/permalink/1102991453843511/

ब्राह्मण डायरेक्टर के जातिवाद पर भड़के बहुजन

नई दिल्ली- नॉट फाउंड सुटेबल एक ऐसा शब्द है, जिसके जरिए सालों से दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के अधिकारों की हकमारी होती रही है। ताजा मामला इलाहाबाद के झूसी स्थिति जी.बी. पंत सोशल इंस्टीट्यूट का है, जहां इसी नॉट फाउंड सुटेबल का हवाला देकर ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण को दबा दिया गया है। इस संस्थान के डायरेक्टर बद्री नारायण तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने असिस्टेंट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर सिर्फ सवर्णों को नौकरी दे दी है और सवर्णों में भी ज्यादातर अपनी जाति के ब्राह्मण लोगों को। तो दूसरी ओर ओबीसी के आरक्षित पदों को नॉट फाउंड सुटेबल का हवाला देकर छोड़ दिया गया है। नॉट फाउंड सुटेबल यानी की उपर्युक्त पद के लिए कोई अभ्यर्थी योग्य नहीं है। मामला सामने आने के बाद ओबीसी समाज के बुद्धिजीवियों ने बद्री नारायण तिवारी पर ओबीसी के आरक्षण की हकमारी का आरोप लगाकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ओबीसी के बुद्धिजीवी इसे आरक्षण घोटाला कह कर बद्री नारायण तिवारी पर निशाना साध रहे हैं। इसके लिए उस सूची का हवाला दिया जा रहा है जो की जी. बी. पंत द्वारा सेलेक्श को लेकर जारी किया गया था। पंत संस्थान की ओर से नौकरी के लिए निकाले गए आवेदन में- सामान्य वर्ग के लिए- 16, EWS के लिए- 9 और OBC के लिए 16 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया। इन्हें API यानी कि एकेडमिक परफॉर्मेंस इंडेक्स के घटते क्रम में रखा गया। अब इन तीनों सूचियों को ध्यान से देखिए। सामान्य वर्ग की नियुक्ति के लिए अंक– 93 से 87 रखा गया। गरीबी के आधार पर मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण EWS के लिए यह 87 से 81 था, जबकि OBC के लिए अंक 93 से 83 निर्धारित किया गया। यानी 93 से 87 तक API के अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में शामिल किए गए। 87 के बाद 81 तक आने वाले सवर्ण अभ्यर्थी EWS में शामिल किए गए। मगर OBC की सूची में 93 से 83 तक API वालों को शामिल कर दिया गया। जबकि 87 से ऊपर API के OBC को सामान्य वर्ग में नहीं रखा गया। यानी UR यानी अन रिजर्वर्ड, जिसे अनारक्षित यानी ‘ओपन फ़ॉर ऑल’ होना चाहिए था, उसे सिर्फ सवर्णों के लिए रिज़र्व कर दिया गया। यानी 50 फीसदी आरक्षण सिर्फ सवर्णों को दे दिया गया। वरिष्ठ पत्रकार और बहुजनों के मुद्दों को उठाने वाले दिलीप मंडल ने ट्विटर पर लिखा है- नॉट फ़ाउंड सुटेबल घोटाला राष्ट्रीय समस्या है। OBC, SC, ST की लाखों नौकरियाँ लूट कर सवर्णों को दे दी जा रही हैं। इंटरव्यू का नंबर कम हो और उसका लाइव वीडियो प्रसारण हो। बहुत बेईमानी चल रही है। सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को इसके ख़िलाफ़ भारत बंद की तैयारी करनी चाहिए। #NFSScam तो वहीं बहुजन चिंतक और हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने लिखा है कि-‘बद्रीनारायण तिवारी’ एक व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति ने भारतीय अकादमिक संस्थानों में दो काम किए। पहला, UR कैटेगरी को सवर्णों के लिए आरक्षित कर दिया और दूसरा, NFS करके अनगिनत दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के ख़्वाबों की हत्या कर दी। इस प्रवृत्ति से ही लड़ना है’। मामला सामने आने के बाद बहुजन युवाओं ने जी।बी। पंत संस्थान और बद्री नारायण दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बहुजन समाज के बुद्धीजीवी इसे मेरिट के नाम पर खुला जातिवाद बता रहे हैं। साथ ही इस नियुक्ति को फ़्रॉड बताकर इसे तत्काल रद्द करने की मांग की जा रही है।

लालू यादव के घर फिर बजेगी शहनाई, तेजस्वी करने जा रहे हैं अपनी इस दोस्त से शादी!

नई दिल्ली- शादियों का मौसम चल रहा है, सोशल मीडिया के लगभग हर प्लेटफोर्म पर शादियों की फोटोज और वीडियोज देखने को मिल रही हैं। लगता है इन्हीं सब को देखते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव का शादी करने का मन बना लिया है। जी हां, खबर है कि तेजस्वी यादव जल्द ही शादी करने वाले हैं। तेजस्वी, दिल्ली में आज या कल सगाई भी कर सकते हैं, इसलिए लिए पूरा लालू परिवार दिल्ली में मौजूद है। इस शादी में लालू परिवार के अलावा सिर्फ 50 रिश्तेदारों को शामिल किया जाएगा। लेकिन तेजस्वी यादव की शादी किससे होने वाली है इस बात को लालू परिवार छुपा रहा है. सूत्रों की माने तो वो कोई और नहीं बल्कि तेजस्वी की कोई दोस्त हैं जिनका लालू परिवार के घर आना-जाना रहा है और वो मूल रूप से हरियाणा की हैं. इस बीच एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं जिसमें तेजस्वी एक लड़की के साथ दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर में दिखाई दे रही लड़की को ही तेजस्वी यादव की भावी पत्नी बताया जा रहा है। हालाँकि लालू परिवार ने इस बारे में कुछ भी खुल कर नहीं बताया है, यानी लालू परिवार की छोटी बहु कौन होगी इस पर अभी सस्पेंस बना हुआ है। तेजस्वी यादव लालू यादव के सबसे छोटे बेटे हैं लेकिन तेजस्वी यादव लालू के राजनीतिक वारिस माने जाते हैं। तेजस्वी ने जिस तरह से अपनी पार्टी की कमान संभाली हुई है उसे देखते हुए बिहार राजनीति में उन्हें मजबूत विपक्ष की तरह भी देखा जाता है। तेजस्वी राघोपुर सीट से विधायक हैं। तेजस्वी 2015 से 2017 तक बिहार के उप मुख्यमंत्री भी रह चुकें हैं हालाँकि उनका झुकाव क्रिकेट की तरफ था। अपने राजनीतिक करियर से पहले तेजस्वी झारखंड क्रिकेट टीम का हिस्सा थे और आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स की टीम की तरफ से खेले भी थे। तेजस्वी की शादी को लेकर पिछले कई दिनों से कयास लगाए जा रहे थे। हालांकि उन्होंने कभी इस बारे में खुलकर नहीं कहा लेकिन तेजस्वी ने अक्सर मीडिया के सामने ये कहा है कि वो अपने पिता को जमानत मिलने के बाद ही शादी के बारे सोचेंगे। लेकिन लालू यादव की खराब सेहत को देखते हुए तेजस्वी यादव शादी के लिए मान गये हैं. साथ ही लालू परिवार ये भी सोच रहा है कि शादी के बहाने दोनों भाईयों, तेज प्रताप यादव और तजस्वी यादव के बीच चल रहा मनमुटाव, परिवार के साथ आने पर खत्म हो जाएं। गौरतलब है कि तेजप्रताप की शादी 2018 में चंद्रिका राय की बेटी एश्वर्या राय से हुई थी लेकिन उनकी शादी चली नहीं और कुछ महीनों के बाद ही दोनों के बीच तलाक की नौबत आ गई। काफी विवाद के बाद दोनों का अब तलाक हो चुका है।

दलित उत्पीड़न पर संसद में आए चौंकाने वाले आंकड़े

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 हाल ही में दलितों पर अत्याचार को लेकर जारी आंकड़े ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस हो या भाजपा, एससी-एसटी पर अत्याचार के मामले में दोनों की सरकारें एक जैसी है। न तो कांग्रेस, न ही भाजपा दलितों पर अत्याचार को रोकने में सफल हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचार के मामले सबसे ज्यादा यूपी, बिहार और राजस्‍थान में हुए हैं। यूपी में भाजपा, बिहार में भाजपा और जदयू गठबंधन जबकि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। संसद में यह जानकारी बसपा सांसद दानिश अली ने मांगी थी, जिसके बाद गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी है।

 भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने मंगलवार को संसद में यह जानकारी दी। केंद्र ने कहा कि 2018 से 2020 के बीच दलितों के खिलाफ अपराध के तकरीबन डेढ़ लाख मामले दर्ज हुए। गृह मंत्रालय के डेटा के मुताबिक बीते तीन सालों के दौरान सबसे ज्‍यादा 36,467 केस योगी आदित्यनाथ के शासनवाले उत्‍तर प्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद 20,973 मामले बिहार में, 18,418 मामले राजस्थान में और 16,952 मामले मध्‍य प्रदेश  में दर्ज हुए हैं। गृह मंत्रालय ने जो आंकड़ा दिया है, उसमें साफ दिख रहा है कि दलितों पर अत्याचार के मामले साल दर साल बढ़े हैं। और इसमें भाजपा से लेकर काग्रेस शासित राज्य भी शामिल हैं। पिछले तीन सालों की बात करें तो साल 2018 में दलितों पर अत्याचार के 42,793 मामले दर्ज हुए थे, जो कि 2019 में बढ़कर 45,961 हो गए। बीते साल 2020 में एससी-एसटी एक्ट के तहत 53,886 मामले दर्ज किये गए हैं।

 अमरोहा से बहुजन समाज पार्टी के सांसद कुंवर दानिश अली ने इस संबंध में सवाल पूछा था, जिसके जवाब में केंद्र सरकार की ओर से यह आंकड़ा जारी किया गया।

 हालांकि दलितों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले कुछ दलित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि मामले इससे ज्यादा हैं, क्योंकि सभी जानते हैं कि कई मामलों दर्ज ही नहीं किये जाते। अब यहां बड़ा सवाल यह है कि जब देश बढ़ रहा है तो देश के लोगों के भीतर से जाति का जहर कम क्यों नहीं हो रहा?

फोर्ब्स मैगज़ीन में शामिल ओडिशा की आदिवासी आशा वर्कर के बारे में जानिए

बीबीसी हिंदी से साभार
डीडी डेस्क- मतिल्दा कुल्लु को जानी-मानी फोर्ब्स मैगज़ीन ने हाल ही में जारी की अपनी देश की सबसे ताकतवर महिलाओं की लिस्ट में शामिल किया है। यकीनन, मतिल्दा का नाम आपने पहले कभी नहीं सुना होगा क्योंकि मतिल्दा ना तो कोई सेलिब्रेटी हैं और ना वो कॉरपोरेट इंडस्ट्री से आती हैं बल्कि मतिल्दा ओडिशा के एक गाँव में रहने वाली एक आशा कार्यकर्ता हैं। मतिल्दा ने अपने आसपास के ग्रामीण लोगों में काले जादू जैसे अंधविश्वास को दूर करने और कोरोना के बीच लोगों को जागरुक करने का काम किया और इसी वजह से उन्हें फोर्ब्स की सूची में जगह दी गई है। 45 साल की मतिल्दा आदिवासी आबादी वाले सुंदरगढ़ ज़िले के गरगड़बहल गांव में रहती हैं और पिछले 15 सालों से आशा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं। मतिल्दा को सिर्फ 4500 रूपये तनख्वाह मिलती है। लेकिन इतने कम पैसों में भी वो गाँव की एक हजार की आबादी का पूरा ख्याल रखती हैं। उनके मन में कभी भी ये ख्याल नहीं आया कि वो कम पैसे पर ज्यादा काम कर रही हैं।
बीबीसी हिंदी से साभार
मतिल्दा गाँव भर में घरों की साफ़-सफाई, बीमारों को दवाएं उपलब्ध करना, प्रेंग्नेट औरतों की हेल्प करने से लेकर बच्चों की वैक्सीनेशन, गाँव में सफाई और स्वास्थ्य सम्बंधी विषयों पर सर्वें कराने जैसे कई काम एक अकेली मतिल्दा करती हैं। मतिल्दा के इन कामों की शुरुआत 15 साल पहले हुई थी जब उन्होंने आशा कार्यकर्ता के रूप में पूरे गाँव में घर घर जाकर काम करना शुरू किया। उन्होंने देखा कि गाँव में कोई भी व्यक्ति बीमार होने पर अस्पताल नहीं जाता है। बल्कि वो काले जादू का सहारा लेता है। मतिल्दा के लिए बड़ी चुनौती थी जिसे मतिल्दा ने कई सालों की जी तोड़ मेहनत के बाद पूरा किया, उन्होंने पहले ग्रामीणों को शिक्षित बनाया और फिर उन्हें अधविश्वास से दूर किया। हालाँकि उनके लिए ये सब आसान नहीं रहा उन्हें शुरुआत में लोगों के ताने, उनसे मिल रही हीनभावना का शिकार होना पड़ा। फोर्ब्स पत्रकारों तक मतिल्दा का नाम पहुँचाने का काम नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ आशा वर्कर की महासचिव वी विजयालक्ष्मी ने किया। विजयालक्ष्मी मतिल्दा के समर्पण और उनके कामों को देखकर बेहद प्रभावित हुई थीं।। वो मतिल्दा को बाकी आशा कर्मियों के लिए उदाहरण मानती हैं। बताते चले कि इस लिस्ट में भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व महाप्रंबधक अरुंधति भट्टाचार्य और बॉलीवुड अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा का नाम भी शामिल है।

बहनजी ने बताया सड़क पर उतर कर संघर्ष क्यों नहीं करतीं

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के 65वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने अपने निवास पर बाबासाहेब को श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इस दौरान बसपा प्रमुख ने मीडिया को संबोधित करते हुए कई अहम मुद्दों पर खुलकर चर्चा की और उन सवालों का जवाब दिया, जिसको लेकर उनकी आलोचना होती रहती है। बहनजी ने दावा किया कि 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा के नेतृत्व में 2007 से भी मजबूत सरकार बनेगी। साथ ही उत्तराखंड और पंजाब में भी बसपा का प्रदर्शन बेहतर होगा।

 संविधान को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने को लेकर पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि- संविधान बचाने के लिए सड़कों पर उतरने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सत्ता परिवर्तन करने से काम चलेगा। जब सत्ता परिवर्तन हो जाएगा तो संविधान बच जाएगा। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जब सत्ता में बाबा साहेब के विरोधी लोग बैठे हैं तो हम सड़कों पर उतर का क्या करेंगे? हमें सत्ता परिवर्तन करना होगा। अभी केन्द्र व राज्यों में ऐसी सरकारें बैठी हैं जो संविधान के हिसाब से नहीं चल रही हैं तो उसका एक ही रास्ता है कि उनको सत्ता से बाहर करके बी.एस.पी. को सत्ता में लाना तभी संविधान बचेगा व सही ढंग से लागू भी होगा।

 इस दौरान इशारों-इशारों में बसपा प्रमुख ने समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को भी जमकर घेरा। अखिलेश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि अभी विजय नहीं हुई है लेकिन लोग विजय यात्रा निकाल रहे हैं। भाजपा सरकार पर सवाल उठाते हुए बहनजी ने कहा कि यूपी में 75 जिले हैं। यहां कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता है जब यूपी में समाज के दबे-कुचल लोगों पर अत्याचार नहीं होता हो। ये लोग मीडिया को मैनेज कर लेते हैं, जिसकी वजह से अत्याचार आदि की खबरें बहुत कम सामने आ पाती हैं।

आरएलडी नेता जयंत चौधरी ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को दिया झटका!

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. सभी विपक्षी पार्टियाँ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने की जुगत में लगी हुई हैं. पिछले दिनों यूपी चुनाव के मद्देनजर सपा और आरएलडी गठबंधन कर साथ आ गए और अब दोनों पार्टियाँ साथ मिलकर सत्ताधारी बीजेपी पार्टी को घेरने में तैयारी में हैं. इसी के चलते पश्चिमी यूपी के मेरठ में मंगलवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आरएलडी के जयंत चौधरी की बड़ी रैली होने वाली हैं. लेकिन रैली से पहले यहां लगे कटआउट लोगों के बीच चर्चा का कारण बन गये हैं. दरअसल, जिस ग्राउंड में रैली का आयोजन किया गया है वहां समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का कट आउट छोटा लगाया गया है, जबकि उनके बगल में लगा जयंत चौधरी और उनके पार्टी नेताओं के कट आउट उनसे बड़े लगाए गये हैं. वैसे तो इस रैली के जरिए दोनों पार्टियाँ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करेंगी लेकिन ग्राउंड में लगे कट आउट को देखकर ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि रैली में आरएलडी अपने गढ़ माने जाने वाले, यूपी के इस क्षेत्र में सपा को भी अपनी ताकत का अहसास करा देना चाहती है. मेरठ की दबथुआ में होने वाली ये रैली दोनों विपक्षी दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन यहां लगे कट आउट आरएलडी के, सपा के सामने अधिक मजबूत होने का संकेत दे रहे हैं बताया जा रहा है कि पहले यहाँ सिर्फ आरएलडी रैली करने वाली थी लेकिन गठबंधन होने के बाद सपा भी इसमें शामिल हो गई. ऐसे में बहुत सम्भावना है कि आरएलडी इन कट आउट के जरिए सपा को यह संदेश देना चाहती है कि भले ही यूपी में सपा बड़ी है लेकिन पश्चिमी यूपी में आरएलडी का पलड़ा भारी है. बताते चले कि इस रैली में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी, यूपी सरकार को इस क्षेत्र में व्याप्त गन्ना किसानों की समस्या को लेकर घेरने की कोशिश करेंगे.

बाबासाहेब पर जल्द रिलीज होगी ये वेब सीरिज, विक्रम गोखले निभाएंगे मुख्य किरदार

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बाबासाहेब के 65वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर ‘शूद्र द राइजिंग’ और ‘कोटा’ जैसी फिल्में बनाने वाले संजीव जायसवाल ने बड़ी घोषणा की है। संजीव जायसवाल बाबासाहेब आंबेडकर को लेकर एक महत्वकांक्षी वेब सीरीज बनाने जा रहे हैं। ये सीरीज ‘बाबा प्ले’ नाम के ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होगी। सिरीज का नाम होगा- ‘अम्बेडकर द लेजेंड’। खबर है कि यह सीरीज कई भाषाओं में रिलीज होगी। इस सीरीज में बाबासाहेब अंबेडकर का किरदार दिग्गज अभिनेता विक्रम गोखले निभाएंगे। विक्रम गोखले एक एक मंझे हुए अभिनेता हैं और सलमान खान और एश्वर्या राय की सुपरहिट फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ में ऐश्वर्या राय के पिता की भूमिका से वह काफी चर्चा में आ गए थे। वेब सीरीज ‘अंबेडकर- द लेजेंड’ में उनके जीवन की ऐसी घटनाओं को फिल्माया जाएगा जिन्होंने महाराष्ट्र की इस शख्सियत को देश का चेहरा बदल देने वाले नेता के रूप में विकसित होने में मदद की। निर्देशक संजीव जायसवाल ने इसकी लांचिंग की घोषणा करते हुए ट्रेलर भी लांच कर दिया है।
सीरीज के निर्माता संजीव जायसवाल कहते हैं- डॉ अंबेडकर को अक्सर भारत के संविधान के मुख्य वास्तुकार या दलित नेता के रूप में जाना जाता है लेकिन वास्तव में वह भारत में महिला सशक्तिकरण का चेहरा हैं। उनके काम ने समाज में महिलाओं के लिए समान अधिकारों में क्रांति ला दी। उन्होंने स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली चर्चाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1930 के दशक की शुरूआत में भारत की संवैधानिक स्थिति पर गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने के लिए अंग्रेजों द्वारा चुने गए दो दलित प्रतिनिधियों में से वह एक थे। तो दूसरी ओर बाबासाहेब आंबेडकर का किरदार निभाने को लेकर अभिनेता विक्रम गोखले कहते हैं, ‘भारत की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक की भूमिका निभाना सम्मान की बात है। वह मेरे व्यक्तिगत आइकन हैं और मैं अपने काम के माध्यम से उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय करने की जिम्मेदारी लेता हूं। मैं ओटीटी पर अपनी छाप छोड़ने के लिए भी उत्सुक हूं।’ संजीव का कहना है कि ‘अंबेडकर- द लेजेंड’ सिर्फ एक मनोरंजन सीरीज नहीं है, यह इस सुधारक नेता के काम की महानता के लिए एक श्रद्धांजलि है। संजीव का कहना है कि सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म बनाने का यह सही समय है। बाबासाहेब को लेकर वेब सीरीज बनने की खबर से अंबेडकरवादियों में एक उत्साह है।

जानिए कौन हैं मुस्लिम धर्म छोड़कर हिंदू धर्म अपनाने वाले वसीम रिजवी, क्यों छोड़ा इस्लाम?

नई दिल्ली- शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन और अपनी बेबाकी के चलते चर्चा में बने रहने वाले वसीम रिजवी ने धर्म परिवर्तन कर लिया है। जी हां, वसीम रिजवी ने इस्लाम धर्म छोड़कर सनातन धर्म अपना लिया है। सनातन धर्म अपनाते ही उन्होंने अपना नाम बदलकर जितेंद्र नारायण सिंह त्यागी रख लिया है। खबर है कि सोमवार की सुबह गाजियाबाद के डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती ने उनकी घर वापसी करवाई। जिसके बाद उनका नामकरण भी किया गया। सनातन धर्म को बताया सबसे अच्छा… धर्मपरिवर्तन के बाद रिजवी उर्फ़ जितेन्द्र नारायण सिंह त्यागी ने कहा- “धर्मपरिवर्तन की यहां कोई बात नहीं है, जब मुझे इस्लाम से निकाल दिया गया, तो ये मेरी मर्जी है कि मैं किस धर्म को स्वीकार करूं। सनातन धर्म दुनिया का सबसे पहला मजहब है और जितनी उसमें अच्छाईयां पाई जाती हैं वो किसी और धर्म में नहीं है। इस्लाम को हम धर्म समझते ही नहीं है”। उन्होंने ये भी कहा कि “मुझे इस्लाम से बाहर कर दिया गया है, मेरे सिर पर हर शुक्रवार को इनाम बढ़ा दिया जाता है, ऐसे में मैं सनातन धर्म अपना रहा हूं।“ अपनी वसीयत में लिखी अंतिम इच्छा हिंदू धर्म अपनाने से कुछ दिनों पहले रिजवी ने अपनी वसीयत लिखी थी, जिसमें उन्होंने अपने अंतिम संस्कार से जुड़ी इच्छा के बारे बताया था। उन्होंने बताया था कि उनके मरने के बाद उन्हें दफनाया नहीं जाए, बल्कि हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया जाए और उनकी चिता को अग्नि कोई और नहीं बल्कि यति नरसिम्हानंद दें। जब सुप्रीम कोर्ट ने लगाया जुर्माना बताते चले कि वसीम रिजवी ने कुरान की कथित रूप से ‘विवादित 26 आयतों’ को हटाने और एक नया कुरान लिखने की बात भी कह चुके हैं, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। इन आयातों को हटाने के लिए रिजवी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की थी जिसे कोर्ट ने ख़ारिज करते हुए उन पर 50 हजार रूपये का जुर्माना लगाया था। किताब से मिली धर्मगुरुओं की नाराजगी! इससे पहले रिजवी ने एक किताब ‘मोहम्मद’ लिखी थी। जिसे लेकर काफी सियासी हलचल बनी रही, इतना ही नहीं, इस किताब को लेकर मुस्लिम धर्मगुरुओं ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि इस किताब के जरिए रिजवी ने पैगंबर की शान में गुस्ताखी की है। इसी के बाद रिजवी ने कभी भी अपनी हत्या होने को लेकर बयान जारी किया था।

BR Ambedkar Death Anniversary: महापरिनिर्वाण दिवस पर अपनाएं डॉ. अम्बेडकर के अनमोल विचार

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डीडी डेस्क- दलित उत्थान की नींव रखने वाले बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर का आज महापरिनिर्वाण दिवस है। वह स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली और चर्चित शख्सियतों में से एक हैं। बाबासाहेब एक वकील, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महु नगर छावनी में हुआ था। बाबा साहेब ने दलितों की स्थिति में सुधार लाने के लिए उनके साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान छेड़ा और दलित बौद्ध आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने मजदूरों, किसानों और महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों पर विशेष जोर दिया। वर्ष 1990 में, बाबा साहेब को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।  6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया था, जिसे उनके समर्थक परिनिर्वाण दिवस के तौर पर मनाते हैं। अपने विचारों, आदर्शों और कार्यों के कारण, बाबा साहेब आंबेडकर सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व में पूजे जाते हैं। बाबा साहेब अपने अनुयायियों से सदैव कहा करते थे कि “मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें”। आज उनके महापरिनिर्वाण दिवस के मौके पर पढ़िए उनके अनमोल विचार….
  • जो कौम अपना इतिहास नही जानती है, वह कौम कभी अपना इतिहास नही बना सकती है।
  • महान प्रयासों को छोड़कर इस दुनिया में कुछ भी बहुमूल्‍य नहीं है।
  • अगर मुझे लगा कि मेरे द्वारा बनाये गए संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो सबसे पहले मैं इसे जलाऊंगा।
  • स्‍वतंत्रता का अर्थ साहस है, और साहस एक पार्टी में व्‍यक्तियों के संयोजन से पैदा होता है।
  • शिक्षा महिलाओं के लिए भी उतनी ही जरूरी है जितनी पुरुषों के लिए।
  • मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूं।
  • रात-रातभर मैं इसलिये जागता हूँ क्‍योंकि मेरा समाज सो रहा है।
  • अपने भाग्य के बजाय अपनी मजबूती पर विश्वास करो।
  • मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाइयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूँ।
  • मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता, और भाई-चारा सिखाये।
  • मनुवाद को जड़ से समाप्‍त करना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्‍य है।
  • जो धर्म जन्‍म से एक को श्रेष्‍ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षड़यंत्र है।
  • मैं तो जीवन भर कार्य कर चुका हूँ अब इसके लिए नौजवान आगे आएं।

बाबा साहेब का महापरिनिर्वाण दिवस आज, राष्ट्र निर्माता को ऐसे याद कर दें श्रद्धांजलि

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डीडी डेस्क- भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की आज 65वीं पुण्यतिथि है। जिसे पूरा राष्ट्र महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाता है। डॉ आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन जातिवाद को मिटाने, गरीबों, दलितों और  पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित किया। ये उनके द्वारा किए गये कार्य ही है जिनकी वजह से आज गरीब, दलित और पिछड़ा वर्ग, शिक्षा और नौकरी के हकदार बन पाया हैं. डॉ. भीमराव आंबेडकर एक वकील, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलितों की स्थिति में सुधार के लिए उनके सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया और दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया। उन्होंने मजदूरों और किसानों के हकों की बात की. महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों पर विशेष जोर दिया। आंबेडकर आजाद भारत के पहले कानून मंत्री, संविधान निर्माता और भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कई सालों बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और फिर 14 अक्टूबर, 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। उनके 5 लाख अनुयायियों ने भी उस दिन बौद्ध धर्म अपना लिया था। उनके अनुयायियों का मानना था कि वो अपने गुरु भगवान बुद्ध की तरह ही बेहद प्रभावशाली और सदाचारी थे और अपने कार्यों की वजह से निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं, इसलिए उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस तौर पर मनाया जाता है। 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया था, आंबेडकर का अंतिम संस्कार बौद्ध धर्म के नियमों के अनुसार मुंबई की दादर चौपाटी पर किया गया था। उस जगह को सभी चैत्य भूमि के नाम से जानते हैं और आज, आंबेडकर की पुण्यतिथि को मनाने के लिए उनके समर्थक चैत्य भूमि जाते हैं उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। ऐसा माना जाता है कि हर साल महापरिनिर्वाण दिवस के मौके पर पूरे भारत से बाबा साहेब, डॉ. भीमराव आंबेडकर के लाखों समर्थक 1 दिसंबर से मुंबई में चैत्यभूमि उनकी समाधि पर एकत्र हो जाते हैं। हर साल लगभग 25 लाख से ज्यादा लोग बाबा साहेब को याद करने, उन्हें नमन करने के लिए यहाँ इकट्ठा होते हैं। ये सभी सर्मथक चैत्यभूमि स्तूप में रखे बाबा साहेब के अस्थि कलश और प्रतिमा को श्रद्धांजलि देते हैं। ये दिन सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जोर-शोर से मनाया जाता है।

बसपा सांसद रितेश पांडेय ने की मान्यवर कांशीराम जी को भारत रत्न देने की मांग

डीडी डेस्क- बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी ने दलित समाज के उत्थान के लिए किए गये कार्य अतुलनीय हैं, उनके इन कार्यों और उनके जैसे समाजसुधारक को युगों तक याद रखने के लिए अब ये बेहद जरूरी हो गया है कि उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिया जाये. इसी सोच के साथ बसपा सांसद रितेश पांडेय ने भी लोक सभा सत्र के दौरान मान्यवर कांशीराम जी को भारत रत्न दिए जाने की मांग की है. बहुजन समाज पार्टी के सांसद रितेश पांडेय ने शनिवार को लोकसभा में मान्यवर कांशीराम को भारत रत्न दिलाने की मांग की है. आज लोक सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मान्यवर कांशीराम जी देश के करोड़ों दलितों और बहुजनों के मसीहा हैं, जिन्होंने अपने सामाजिक कार्यों से देश के सबसे वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है”। रितेश पांडेय ने क्या कहा, आप भी सुनिए….

शादी में ‘साथ बैठ कर’ खाना खाने को लेकर सवर्ण जाति के लोगों ने की दलित की हत्या

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द वायर से साभार
हमारा समाज जातिवाद की सड़ी-गली प्रथाओं, कुरीतियों और अपनी कुंठित सोच के कारण समाजिक बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। इसी समाज की देन है कि आज भी दलितों के साथ होने वाली हिंसाए और उनके साथ होने वाले भेदभाव को लोग गंभीर रूप से नहीं लेते। हम ज्यादा पुरानी बात नहीं करेंगे, बल्कि हम जिस घटना की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहते हैं वो कुछ दिन पहले की ही है। ये शर्मनाक घटना उत्तराखंड के चंपावत की है जहां एक दलित को जातिगत भेदभाव के चलते तथाकथित सवर्ण जाति के लोगों की हिंसा का शिकार होना पड़ा। द वायर के अनुसार, एक शादी समारोह के दौरान सवर्ण जाति के लोगों के बीच बैठकर, खाना खाने को लेकर 45 वर्षीय रमेश राम को बुरी तरह पीटा गया, जिसके चलते बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। मृतक, रमेश राम देवीधुरा के पास केदारथान में टेलर की दुकान चलाते थे। बीते 28 नवंबर को रमेश, दुकान मालिक के यहां शादी समारोह में गए थे, जिसके बाद वो देर शाम तक घर वापस नहीं लौटे। उनकी पत्नी तुलसी देवी को अगले दिन फोन पर जानकारी मिली कि 108 आपातकालीन सेवा ने उनके पति को लोहाघाट अस्पताल में बेहोशी की हालत में भर्ती कराया है। जिसके बाद, हालत बिगड़ती देख उनके पति को लोहाघाट अस्पताल से एसटीएच हल्द्वानी रेफर कर दिया गया था लेकिन बीते मंगलवार को रमेश राम ने सुशीला तिवारी अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।
द वायर से साभार
अपने पति की मौत से हैरान-परेशान तुलसी देवी ने पाटी थाने में सवर्ण जाति के अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ तहरीर सौंप दी, जिसमें उन्होंने कहा है कि सवर्ण जाति के व्यक्ति ने उसके पति को खाना खाने के दौरान बेदर्दी से मारा-पिटा गया, जिससे उनकी मौत हुई है। तुलसी देवी ने ये भी बताया कि मरने से पहले उनके पति ने उन्हें ये बात बताई थी। द वायर के अनुसार, इस मामले की जाँच कर रहे एसपी देवेंद्र पींचा ने बताया कि मृतक रमेश की पत्नी की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ आइपीसी की धारा 302 तथा एससी, एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। ‘देवभूमि’ कहा जाने वाला उत्तराखंड, यहाँ फैले जातिगत भेदभाव और जाति-आधारित हिंसा के कारण अपनी गरिमा खोता जा रहा है। यहां की जातीय आबादी पर नजर डाले तो यहां दलित लगभग 19% हैं, जबकि राजपूत और ब्राह्मण राज्य की आबादी का 60% हिस्सा है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, जाति-आधारित हिंसा की घटनाएं 2018 में 58 से बढ़कर 2019 में 84 हो गईं, यानी एक वर्ष में इन घटनाओं में 45% की वृद्धि हुई। दूसरे शब्दों में कहे तो यह देश में पांचवीं सबसे अधिक वृद्धि है और 7% की वृद्धि के राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। उत्तराखंड में ग्राम स्तर पर ‘सवर्ण जाति’ के शादी विवाह समारोहों में जातिगत भेदभाव देखा जाना नई बात नहीं है। इन शादियों में अगर दलितों को आमंत्रित किया जाता तो उन्हें अलग से खाना खिलाने का रिवाज बना हुआ है। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई उदहारण सामने आए हैं जहां किसी सवर्ण जाति की नजरों के सामने, अगर किसी दलित को खाना खाते हुए देखा गया है तो गुस्से में आए सवर्ण ने दलित को सबक सिखाने के लिए हिंसा का सहारा लिया है।

सफाई कर्मचारियों को लेकर केंद्र सरकार ने संसद में दिया चौंकाने वाला जवाब

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डीडी डेस्क- इंसानी मल को ढोने को लेकर भारत में पहली बार 1993 में प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत मैला ढोने को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया लेकिन इसके बाद भी बड़ी संख्या में लोग आज भी हाथ से मैला ढो रहे हैं। इसकी पुष्टि केंद्र सरकार ने अपने संसद में दिए एक जवाब में की है। केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवले ने संसद में आरजेडी के सांसद मनोज झा द्वारा पूछे गये एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि देश में अभी भी 58,098 लोग इंसानी मल ढोने का काम कर रहे हैं। संसद में आरजेडी के सांसद मनोज झा ने मंत्रालय से पूछा था कि सिर पर मैला ढोने के काम में शामिल व्यक्तियों की जाति-आधारित अलग अलग संख्या क्या है, उन्हें आर्थिक प्रणाली में शामिल करने के लिए सरकार द्वारा क्या स्टेप लिए गए हैं और इस प्रथा पर पूरी तरह से बैन लगाने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए हैं।
सरकार ने अपने जवाब में बताया कि मैला ढोने की इस प्रथा पर 2013 में लाए गये कानून मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत बैन लगा दिया गया था लेकिन इसके बावजूद मंत्रालय द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में यह पाया गया कि देश में अभी भी 58,098 लोग इस काम को कर रहे हैं। मंत्रालय ने यह भी बताया कि कानून के अनुसार, मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में पहचान के लिए जाति के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं होगा लेकिन फिर भी उनकी पहचान करने के लिए अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही सर्वेक्षण कराए गए हैं। जिन 58,098 व्यक्तियों की मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में पहचान हुई है, उनमें से सिर्फ 43,797 व्यक्तियों के जाति से संबंधित आंकड़े उपलब्ध हैं। मंत्रालय ने लिखित जवाब देते हुए बताया है कि देश में इन 43,797 लोगों में से 42,594 अनुसूचित जातियों से हैं, जबकि 421 अनुसूचित जनजाति से हैं। कुल 431 लोग अन्य पिछड़े वर्ग से हैं, जबकि 351 अन्य श्रेणी से हैं। यानी 58,098 व्यक्तियों में 97 फीसदी लोग दलित हैं।  

दलित वोटरों को भरमाने के लिए बीजेपी ने चली नई चाल, क्या आप भी आए हैं निशाने पर?

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी दलित वोटरों को साधने के लिए नई-नई साजिशें रच रही है। बीजेपी न सिर्फ ग्राउंड लेवल पर जाकर बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी दलित वोटों के धुर्वीकरण के लिए नई नई चालें चल रही है। सोशल मीडिया के चर्चित प्लेटफार्म ट्विटर पर एक ऐसी ही चाल बीजेपी ने गुरुवार को चली जब ट्विटर पर #दलित_विरोधी_अखिलेश ट्रेंड करने लगा।

इस हैशटैग के साथ कई बीजेपी नेताओं, कार्यकर्ताओं और बीजेपी सपोर्टर्स ने ट्विट किए और अखिलेश यादव के शासनकाल को दलित विरोधी बताया। इतना ही नहीं इन ट्विटस में अखिलेश यादव द्वारा लिए गये फैसलों का उल्लेख करते हुए, अब और तब में कितना अंतर था, इसे भी बताया गया।

लेकिन क्या आपको लगता है बीजेपी ऐसा इसलिए कर रही है क्योंकि उसे यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव पर निशाना साधना है?

जी नहीं! दरअसल भाजपा का निगाहें कहीं और… और निशाना कहीं और है। असल में उत्तर प्रदेश में जो माहौल है, उसमें ऐसा होता दिख रहा है कि अगर किसी स्थिति में दलित समाज का कुछ हिस्सा बसपा को वोट नहीं करता है तो वह समाजवादी पार्टी को वोट कर सकता है। बस.. भाजपा यही नहीं चाहती, क्योंकि भाजपा को पता है कि अगर दलितों के वोटों का छोटा सा हिस्सा भी अगर समाजवादी पार्टी को जाता है, तो भाजपा की राह और मुश्किल हो सकती है। इसलिए भाजपा की यह कोशिश है कि दलित समाज के जो वोट बसपा को नहीं मिलते हैं, वो या तो भाजपा को मिले या फिर कांग्रेस में चले जाएं। ताकि न सपा जीत सके और न ही बसपा।

जहां तक प्रदेश में दलित समाज के वोटों का सवाल है तो यूपी में करीब 22 फीसदी दलित वोटर हैं जिसमें लगभग 14 फीसदी वोट जाटवों का है, जबकि गैर-जाटव वोटर 8 फीसदी है। इस वोट बैंक पर अब तक बसपा प्रमुख मायावती का एकक्षत्र राज रहा है।

पिछले दिनों राजनीतिक गलियारों में चंद्रशेखर और अखिलेश यादव के एक साथ आने की खबरें बनी रही जो कहीं न कहीं बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ने का संकेत देती हैं। चूंकि मायावती और चंदशेखर आजाद एक ही जाति से और पश्चिमी यूपी से आते हैं तो यदि अखिलेश और आजाद मिल जाते हैं तो दलितों का एक तबका सपा का समर्थन कर सकता है। भाजपा इसी अंदेशें को लेकर परेशान है। इसलिए भाजपा अखिलेश यादव को दलित विरोधी बता कर दलित वोटरों को भरमाने में लगी हुई है।

हालांकि भाजपा की कथनी और करनी में अंतर कई बार सामने आ चुका है। प्रयागराज में हाल ही में हुए दलित परिवार की हत्या का मामला हो, सहारनपुर की बेटी का मामला, बीते सालों में दलितों पर हुए अत्याचार के खिलाफ योगी सरकार का लचर रवैया देख कर यूपी के दलित पहले ही सावधानी बरत रहे हैं।

जातिगत भेदभाव को लेकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का बड़ा फैसला

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भारतीय जब विदेशों में पहुंचे तो अपने साथ अपने जनेऊ और जाति को लेकर भी गए। नौकरी हो या शिक्षण संस्थान, जहां भी ये जातिवादी पहुंचे, जाति को साथ लेकर चलते रहे। इस तरह जाति दुनिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक अमेरिका के हार्वर्ड युनिवर्सिटी भी पहुंच गई। और खासतौर पर यहां पढ़ने वाले दक्षिण एशियाई छात्रों को इसका सामना करना पड़ा। जाति आधारित यह भेदभाव 80 के दशक से ही शुरू हो गया था, जो लगातार बढ़ता गया।

आखिरकार दक्षिण एशियाई स्नातक छात्रों ने इस भेदभाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हार्वर्ड युनिवर्सिटी से जातिवाद के खिलाफ सुरक्षा देने की मांग की। मार्च 2021 में यह मांग जोर पकड़ने लगी और आखिरकार नौ महीनों की लंबी लड़ाई के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने दक्षिण एशियाई छात्रों को जातिगत भेदभाव से सुरक्षा देने का अहम फैसला किया है।

एनबीसी न्यूज़ के अनुसार, दक्षिण एशियाई स्नातक छात्र कार्यकर्ता अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को लेकर मार्च से यूनिवर्सिटी से मांग कर रहे थे। जिन्हें अब यूनिवर्सिटी ने मानते हुए जातिगत भेदभाव का सामना कर रहे छात्रों को सुरक्षा देने के लिए उपाय करने शुरू किए हैं। खबर के मुताबिक हाल ही में यूनिवर्सिटी ने स्नातक छात्र संघ के साथ कॉन्ट्रैक्ट होने की पुष्टि की है और जाति को नई संरक्षित श्रेणी के रूप में शामिल किया गया है। इसके लिए छात्र संगठन मार्च से लगातार जोर दे रहे थे। संघ और प्रशासन के बीच 9 महीने की चर्चा के बाद दलित नागरिक अधिकार संगठन, इक्वेलिटी लैब्स के समर्थन से ये निर्णय लिया गया।

दरअसल 1980 के दशक के बाद से दक्षिण एशिया से इमीग्रेशन बढ़ने के बाद से पूरे संयुक्त राज्य के परिसरों में हिंदूओं और भारतीय व्यवस्था के खून तक में समा चुकी जाति प्रथा की बीमारी दिखने लगी। इक्वेलिटी लैब्स के एक अध्ययन के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में 25% दलितों ने मौखिक या शारीरिक हमले का सामना किया है, जबकि तीन में से एक छात्र का कहना था कि उन्हें पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ा जिसकी वजह से उनकी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

इक्वेलिटी लैब्स की रिपोर्ट के अनुसार,  तीन में से दो दलित छात्रों ने कहा कि उनके साथ काम के दौरान गलत व्यवहार किया गया और 60%  ने जाति-आधारित अपमानजनक जोक्स और टिप्पणियों का सामना करने की बात कही। इतना ही नहीं, रिपोर्ट ये भी बताती है कि लगभग 40% दलित और 14% ओबीसी छात्रों को उनकी जाति के कारण उनके पूजा स्थल यानी मंदिरों पर अनवांटेड फील कराया गया।

 हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट की छात्रा और स्नातक छात्र संघ की सदस्य अपर्णा गोपालन के मुताबिक- कई श्वेत प्रशासकों को जाति की कोई मूलभूत समझ नहीं थी। तो वहीं इक्वेलिटी लैब्स के कार्यकारी निदेशक थेनमोझी सुंदरराजन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के फैसले के बारे में कहा कि ये इस बात की याद दिलाता है कि जाति समानता श्रमिकों और छात्रों के अधिकारों का मामला है।

यह पहली बार है जब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी या किसी अन्य आइवी लीग संस्थान ने जाति को संरक्षित श्रेणी के रूप में शामिल करने का फैसला लिया है। निश्चित तौर पर इस फैसले से जहां दक्षिण एशिया के वंचित समूह के छात्रों को मदद मिलेगी, तो वहीं अमेरिका के दूसरे संस्थानों एवं दुनिया के अन्य हिस्सों में भी दलितों-वंचितों के साथ होने वाले जातिवाद के खिलाफ कानून बनने का रास्ता साफ होगा।

भारत पहुंचा कोरोना का नया ‘ओमिक्रॉन वैरिएंट’, कर्नाटक में मिले पॉजिटिव मामले

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डीडी डेस्क- कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ‘ओमिक्रॉन’ ने भारत में दस्तक दे दी है. मिल रही खबरों के अनुसार भारत के कर्नाटक राज्य में दो लोग पॉजिटिव मिले हैं. हालांकि भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जानकारी देते हुए कहा है कि नए वैरिएंट का संक्रमित लोगों पर कोई खास असर नहीं दिख रहा है.
ओमिक्रॉन वैरिएंट से संक्रमित देशों में अब भारत भी शामिल हो गया है. अब तक 29 देशों में इस नए वैरिएंट की दहशत देखने को मिल रही थी और अब भारत में भी इसके शामिल हैं.
डर को बढ़ाया! कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ‘ओमिक्रॉन’ ने दुनियाभर में संक्रमण के डर को बढ़ा दिया है. ओमिक्रॉन वैरिएंट दूसरी लहर के ‘डेल्टा वेरिएंट’ से कहीं ज्यादा संक्रामक बताया जा रहा है. बताया जा रहा है कि ये डेल्टा की तुलना में पांच गुना ज्यादा तेजी से फैलता है. इस वैरिएंट की पहचान दक्षिण अफ्रीका के शोधकर्ताओं द्वारा की गई थी.
डब्लूएचओ ने चेताया इस नए वैरिएंट को लेकर वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्लूएचओ) ने भी चेताया है. डब्लूएचओ ने इसे हाई रिस्क वैरिएंट बताया है और लोगों को खासी सावधानी बरतने को कहा है. साथ ही, डब्लूएचओ ने इस वेरिएंट ऑफ कंसर्न की कैटेगरी में रखा है ओमिक्रॉन वैरिएंट की जानकरी मिलते ही दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों की हवाई यात्राओं पर रोक लगा दी गई है. भारत में भी 15 दिसंबर से शुरू होने वाली हवाई यात्राओं को फ़िलहाल टाल दिया गया है.
यहां से हुई पहचान इसकी पहचान तब हुई अब दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़े टेस्टिंग लैब की हेड रकील वियाना कोरोना वायरस के 8 सैंपल्स की जीन सिक्वेंसिंग कर ही रही थी कि अचानक उन्होंने टेस्ट किए गए सैंपल में बड़ी संख्या में म्यूटेशन होते देखा. खास कर स्पाइक प्रोटीन पर जिसका इस्तेमाल कर ही कोरोना वायरस मानव शरीर में दाखिल हुआ था.
डॉक्टर्स ने किया सावधान! नए वैरिएंट को लेकर भारतीय डॉक्टर्स ने सावधान करते हुए कहा है कि ये वैरिएंट कई गुना तेजी से फ़ैल सकता है. उन्होंने मीडिया को बताया कि ओमिक्रॉन वैरिएंट से संक्रमित व्यक्ति एक बार में 18 से 20 लोगों तक इस वायरस को फ़ैलाने में सक्षम है. इस बीच, सरकार ने लोगों से अपील करते हुए कहा है कि इससे घबराने की जरूरत नहीं है, जागरुकता बनाएं रखें. लोग फिजिकल डिस्टेंसिंग जारी रखें, मास्क का इस्तेमाल करें और भीड़भाड़ से बचें.