पटना। बिहार में भी किसानों की हालत खराब है. सोमवार को नालंदा जिला के किसानों ने सड़क पर लौकी को फेंककर सड़क जाम कर दिया. किसानों का कहना है कि इनको लाने में जितना खर्च लग रहा है उतना पैसा भी नहीं मिल पा रहा है. तस्वीरें बता रही हैं कि लौकी का उत्पादन अच्छा खासा हुआ है लेकिन उचित मूल्य ना मिलने का कारण किसान सब्जियों को फेंकने के लिए लाचार हैं.
एक रूपए किलो लौकी
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र ने तस्वीरों को फेसबुक पर शेयर कर किसानों के दर्द को बयां किया है. इनका कहना है कि ये तस्वीरें नालंदा जिले के नूर सराय की हैं. कल जब वहां के सब्जी किसानों को उनके कद्दू (उर्फ लौकी, उर्फ सजमन) की सही कीमत नहीं मिली तो उन्होंने सड़क पर कद्दू फेंक कर जाम लगा दिया. किसानों का कहना था कि पिछले दस दिनों से यही हाल है. कद्दू की कीमत एक रुपये किलो के आसपास मिल रही है. जबकि इससे डेढ़ गुना तो इन्हें बाजार तक लाने में खर्च हो जा रहा है. सरकार की तरफ से खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है, वे क्या करें.
दरअसल, नालंदा का इलाका सब्जियों की खेती के लिए मशहूर है. यहां के किसान छोटी छोटी जोत पर बम्पर उत्पादन करते हैं. मगर पिछले कुछ वक्त से इन्हें लागत के अनुरूप दाम नहीं मिल रहा. सीधे सरकार को भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि बिहार में तो अभी तक धान की सरकारी खरीद की व्यवस्था भी मुकम्मल नहीं हो पाई है, सब्जी की खरीद तो बहुत दूर की बात है.
मगर खेती का रकबा निर्धारण का काम सरकार का ही है. अगर हर साल इस मसले पर ढंग से काम हो और सरकार किसानों को सलाह दे सके कि बाजार को देखते हुए उसे किस फसल की खेती करना चाहिये तो किसानों को ऐसी परेशानी नहीं होगी. पिछले दिनों मोकामा टाल के दलहन किसानों ने भी इस मसले पर आंदोलन किया था. मगर दिक्कत यह है कि इन आंदोलनों को न सरकार नोटिस में लेती है, न मीडिया.
बता दें कि देश भर में किसानों की हालत खराब है. इसको लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं. किसान सब्जियों व दूध को फेंककर विरोध जता रहे हैं. साथ ही किसान स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने की मांग पर डटे हैं.
औरंगाबाद। खानपुर थाना क्षेत्र के गांव जाड़ौल में चोरी के शक में एक दलित युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद युवक को बेरहमी से पिटा. पुलिस की थर्ड की डिग्री के कारण युवक की हालत गंभीर बनी हुई है. दलित युवक जिंदगी व मौते से जूझ रहा है. इसके अलावा एक एक युवक हिरासत से फरार हो गया.
पुलिस ने कबूला…
जाड़ौल चौकी इंचार्ज ने खुद कबूल किया है कि गुड्डू से पूछताछ में चोरी के सबूत नहीं मिले हैं. अगर चोरी के सबूत नहीं मिले तो उन्होंने गुड्डू का चालान शांतिभंग में क्यों कर दिया, जबकि थाना इंचार्ज इस तरह की घटना में तहरीर आने की बात से इन्कार कर रहे हैं. इससे स्पष्ट है कि पुलिस घटना पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है.
किसान सभा और माकपा के जिला सचिव चंद्रपाल सिंह ने जाड़ौल चौकी प्रभारी द्वारा शराब के नशे में धुत होकर दलित युवक को पीटकर अधमरा करने की घटना की निंदा करते हुए जांच कराकर दोषी दरोगा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है.
आनन-फानन में एसएसपी केबी सिंह ने जाड़ौल चौकी प्रभारी सुखदेव सिंह चीमा का जहांगीरपुर थाने के लिये स्थानान्तरण कर दिया. हालांकि अन्य पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. मामले की जांच सीओ सिटी को सौंपी गई है. लेकिन अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि चोरी उक्त युवक ने की थी.
दरअसल, गांव जाड़ौल निवासी भगवान सिंह के घर में हुई लाखों की चोरी के मामले में गुडडू नाम के एक दलित युवक को हिरासत में लेकर चौकी प्रभारी सहित अन्य पुलिसकर्मियों ने शराब के नशे में घुत होकर पूरी रात उसे थर्ड डिग्री दी थी. हालात बिगड़ने पर उसका 151 में चालान किया था. युवक अब दिल्ली के अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है. शुक्रवार को मामला मीडिया में छाया तो बुलंदशहर से लेकर लखनऊ तक हड़कंप मच गया. वहीं प्रकरण की जांच सीओ सिटी को सौंप दी. हालांकि दूसरे लापता युवक पुष्पेन्द्र का आज तक कोई पता नहीं चल सका है. उसके परिजन का आरोप है कि युवक को लापता किया गया है. 07 जून की इस घटना को लेकर ग्रामीणों में पुलिस के प्रति कड़ा रोष बना हुआ है.
आज के दिन को भारत के सामाजिक लोकतंत्र के इतिहास के कलंकित दिन के तौर पर याद किया जाएगा. आज पहली बार भारत सरकार ने एक विज्ञापन जारी करके कहा है कि सरकारी नीति बनाने के लिए वह अफसरों की बगैर किसी परीक्षा के नियुक्ति करेगी. विज्ञापन में साफ लिखा है कि ये अफसर निजी क्षेत्र या विदेशी कंपनियों से भी हो सकते हैं. इन नियुक्तियों में SC, ST, OBC, PH आरक्षण समेत किसी संवैधानिक नियमों का पालन नहीं होगा.
यह विज्ञापन कई अखबारों में आज छपा है. टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली एडिशन में आप इसे पेज 11 पर देख सकते हैं. इसे आप सरकारी नौकरियों में आरक्षण की समाप्ति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम मान सकते हैं.यह जो हो रहा है, वह आज तक कभी नहीं हुआ.
विज्ञापन में क्या है?
विज्ञापन बता रहा है कि केंद्र सरकार नीतियां बनाने वाले पद यानी ज्वांट सेक्रेटरी के 10 पोस्ट सीधे भरेगी. इसके लिए कोई परीक्षा नहीं होगी. ये पद 10 मंत्रालयों को चलाएंगे.
ऐसा करके सरकार संविधान के कई अनुच्छेदों का सीधा उल्लंघन कर रही है. अनुच्छेद 15 (4) का यह सीधा उल्लंघन है, जिसमें प्रावधान है कि सरकार वंचितों के लिए विशेष प्रावधान करेगी. अनुच्छेद 16 (4) में लिखा है कि सरकार के किसी भी स्तर पर अगर वंचित समुदायों के लोग पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, तो उन्हें आरक्षण दिया जाएगा. ज्वांयट सेक्रेटरी लेबल पर चूंकि SC,ST, OBC के लोग पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, इसलिए उनकी नियुक्ति में आरक्षण न देने का आज का विज्ञापन 16(4) का स्पष्ट उल्लंघन है.
अनुच्छेद 15 और 16 मूल अधिकार हैं. यानी भारत सरकार नागरिकों के मूल अधिकारों के हनन की अपराधी है.
इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 315 से 323 में यह बताया गया कि केंद्रीय लोक सेवा आयोग यानी UPSC होगा, जो केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों को नियुक्त करेगा.
अनुच्छेद 320 पढ़िए – Article-320. Functions of Public Service Commissions.
It shall be the duty of the Union and the State Public Service Commissions to conduct examinations for appointments to the services of the Union and the services of the State respectively.
ऐसे में सरकार UPSC को बाइपास करके और बगैर किसी परीक्षा और आरक्षण के अफसरों को सीधे नीतिगत पदों पर नियुक्त कैसे कर सकती है?
मेरा निवेदन है कि यह मामला जटिल है. लेकिन बहुत बड़ा है. आम जनता को इसे समझाने के लिए बहुत मेहनत लगेगी, तभी वह सरकार पर दबाव डालने के लिए आगे आएगी. यह काम समाज के प्रबुद्ध यानी पढ़े-लिखे लोगों का है. कृपया संविधान को बचाइए. आरक्षण अपने आप बच जाएगा.
अगर आज सरकार ज्वायंट सेक्रेटरी की नियुक्ति बिना परीक्षा और बिना आरक्षण के कर ले गई, तो आगे चलकर क्या हो सकता है, आप इसकी कल्पना कर सकते हैं.
बीजेपी-आरएसएस आरक्षण खत्म करने की घोषणा कभी नहीं करेगी. वह ऐसे ही शातिर तरीके से आरक्षण को बेअसर कर देगी. फिर आपको भी लगेगा कि आरक्षण से कुछ होता तो है नहीं.
पटना। रालोसपा प्रमुख व केंद्रीय राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को महागठबंधन की टीम में शामिल होने के लिए न्यौता मिला है. बिहार के युवा नेता व पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने साफ तौर पर कहा है कि बीजेपी केंद्रीय राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को काबिलियत के हिसाब से तवज्जों नहीं दे रही है. पिछड़े वर्ग से होने के कारण इनको कैबिनेट में जगह नहीं मिल रही है. इन तमाम बातों को लेकर तेजस्वी यादव ने रालोसपा को महागठबंध की ओर से न्यौता दिया है.
तेजस्वी यादव ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा कि, “केंद्रीय राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को हम महागठबंधन में शामिल होने का न्यौता देते है. उन्हें विगत 4 साल से NDA में उपेक्षित किया जा रहा है. बीजेपी उनके साथ सौतेला और पराया व्यवहार कर रही है. इसी दौरान बीजेपी ने नीतीश जी के साथ मिलकर उनकी पार्टी को तोड़ने की साज़िश भी रची. उपेन्द्र कुशवाहा जी एक बड़े सामाजिक समूह का प्रतिनिधित्व करते है लेकिन उस वर्ग से किसी को भी कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया वहीं दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार मे एक जाति के एक दर्जन से ज़्यादा कैबिनेट मंत्री है। पिछड़े वर्ग से आने वाले कुशवाहा जी की क़ाबिलियत को BJP ने कभी तवज्जों नहीं दी. उपेन्द्र कुशवाहा जी सामाजिक न्याय की धारा से आते है इसलिए उन्हें गोडसे-गोलवलकर और गांधी-अंबेडकर की दो धाराओं में से एक को चुनना होगा. BJP संविधान को ख़त्म कर रही जिससे आरक्षण स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. कुशवाहा जी को संविधान और आरक्षण बचाने की लड़ाई में ससमय उचित निर्णय लेना चाहिए.”
लखनऊ। बसपा व सपा गठबंधन को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बड़ा बयान दिया है. इस बयान से बीजेपी की नींद उड़ सकती है. अखिलेश यादव ने गठबंधन को लेकर रविवार को एक कार्यक्रम में बड़ा बयान दिया है. उन्होंने मैनपुरी में जिले के जउराई गांव के पूर्व प्रधान की प्रतिमा का अनावरण करने के दौरान कहा कि 2019 में भाजपा को हरान के लिए समाजवादी पार्टी त्याग करने से कोई कमी नहीं छोड़ेगी.
अखिलेश ने कहा कि वह बीजेपी की हार देखना चाहते हैं और इसके लिए किसी के साथ भी गठबंधन को तैयार हैं. इतना ही नहीं, अखिलेश ने यह भी कहा कि वह सीटों को लेकर भी समझौता करने को तैयार हैं. साथ ही यह भी कहा, ”हमारा बीएसपी के साथ गठबंधन है और यह स्थिति में जारी रहेगा. बीजेपी को हराने के लिए अगर दो-चार सीटों का बलिदान भी करना पड़ा तो हम पीछे नहीं हटेंगे.”
उन्होंने दावा किया कि प्री-पोल गठबंधन के चलते हालिया उपचुनावों में जीत मिली है. यह गठबंधन आगे की बरकरार रहेगा. बता दें कि 2019 के गठबंधन को लेकर बसपा ने कहा था कि चालीस से कम सीटों पर गठबंधन संभव नहीं है जिसको लेकर अखिलेश ने पहले भी कहा था कि समाजवादियों का दिल बहुत बड़ा होता है. हालांकि इन बयानों से बसपा व सपा की गठबंधन मजबूत दिख रही है.
नई दिल्ली। हरियाणा के पलवल इलाके के फुलवारी गांव में दलितों के भीतर गुर्जर समुदाय का खौफ बरकरार है. घटना को दो माह बीत चुके हैं लेकिन अभी तक दलितों को डर के साए में गुजारा करना पड़ रहा है. खबरों की मानें तो अब तक दस दलित परिवार गांव छोड़कर जा चुके हैं.
आज तक की खबरे के अनुसार दो महीने पहले फुलवारी गांव में एक 21 वर्षीय दलित छात्र की कथित तौर पर दो गुर्जरों ने बेहरमी से पिटाई कर दी थी. आरोप है कि दलित छात्र ने उनके घर का काम करने से मना कर दिया था. इसके बाद दोनों समुदायों के बीच मामला बढते चला गया था. इस मामले को लेकर एक एफआईआर दलित समुदाय की ओर से, जबकि दूसरी गुर्जर समुदाय की ओर से दर्ज कराई गई थी. एफआईआर में एक दलित ने गुर्जर समुदाय के लोगों पर हिंसा करने और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है. तो वहीं, गुर्जर समुदाय के एक सदस्य की ओर दी गई शिकायत में 15 दलितों द्वारा हिंसा करने का आरोप लगाया गया है.
पलवल पुलिस स्टेशन के SHO इंस्पेक्टर देवेंद्र ने बताया कि हमें दोनों समुदाय की ओर से शिकायत मिली है. फिलहाल इन घटनाओं की जांच की जा रही है. अभी तक इन मामलों में किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है. इस मामले की छानबीन की जा रही है.
वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि जब से ये घटनाएं हुई हैं, तब से इलाके में भय का माहौल बना है. इसके चलते दलित समुदाय के लोग इलाके से पलायन भी कर रहे हैं. पीड़ित दलित छात्र के पिता ने दावा किया है कि दलित समुदाय के करीब 10 परिवारों ने गांव छोड़ दिया है. इस मामले को लेकर 21 अप्रैल को पहली एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें कहा गया कि यह घटना उस समय हुई, जब दलित छात्र उस नर्सिंग होम जा रहा था, जहां उसकी बहन भर्ती थी. उसने बताया, ‘मेरे पिता ने पांच हजार रुपये लेकर आने को कहा था. मैंने एक पड़ोसी की मोटरसाइकिल मांगी और हॉस्पिटल को निकल गया.
इस दौरान रास्ते में उसको गुज्जर समुदाय का एक शख्स मिला और दलित छात्र को अपने घर में काम करने को कहा.’ छात्र ने बताया, ‘इसके बाद मैंने उस शख्स से कहा कि मेरी बहन अस्पताल में भर्ती है. लिहाजा मुझे जाने दो, लेकिन वो नहीं माना और मारपीट करने लगा. उसका भाई डंडा लेकर आया और मेरी पिटाई कर दी.’
नई दिल्ली । दो महीने पहले जब फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में बीजेपी के हाथों से ये दोनों सीटें निकल गईं तब मोदी इसे एक अपवाद के रूप में देखने के लिए तैयार थे. माना जा रहा था कि यह एक तुक्का था जो विपक्ष के हाथों लग गया और राजनीति में ऐसा हो जाता है. लेकिन जब बीती 31 मई को कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट बीजेपी के हाथ से निकल गई तो ये स्वाभाविक था कि मोदी की अपराजेय छवि पर सवाल उठने लगे. और मोदी के साथ कुछ दिन पहले तक अतिआत्मविश्वास से लबरेज योगी लोकप्रियता के पैमाने पर कठघरे में खड़े दिखे.
इसकी वजह ये है कि कैराना और उसके आस पास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र को बीजेपी की हिंदुत्व वाली राजनीति की लैबोरेटरी समझा जाता है. ऐसे में कैराना जैसी अहम लोकसभा सीट पर हार का मुंह देखना बीजेपी के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए एक धक्का था. इस हार से भाजपा को इतना धक्का लगा कि नतीजे के ठीक बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिल्ली तलब कर लिया, हालांकि ऐसा नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने सांप्रदायिक आधार पर जनता का ध्रुवीकरण करने में कोई कसर छोड़ी हुई है. लेकिन उनके काम में जो सबसे बड़ा रोड़ा बना है, वह सपा और बसपा का साथ आना है. यह एक ऐसा गठबंधन है, जिसके आगे भाजपा का हर दांव खाली जा रहा है. मायावती और अखिलेश के बीच का दोस्ताना हिंदुत्व के सामने मजबूती से खड़ा दिखाई दे रहा है.
तो वहीं भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने यह कह कर भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है कि बीजेपी ऊंची जातियों के समर्थन और ओबीसी-विरोधी बर्ताव कर रही है. हार के लिए सीएम योगी को जिम्मेदार ठहराते हुए राजभर ने कहा कि बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री न बनाकर पिछड़ों को धोखा दिया है. मौर्य मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उचित ओबीसी उम्मीदवार होने चाहिए थे.
ओमप्रकाश के आरोप को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता है. दरअसल पहले ओबीसी को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा ने केशव मौर्या को पार्टी का अध्यक्ष तो बनाया, और केशव मौर्या ने भी भाजपा को चुनाव में जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई… लेकिन 403 विधानसभा सीटों में से 325 सीटें मिलने के बाद भाजपा ने केशव मौर्या के मुख्यमंत्री पद के दावे को सिरे से खारिज कर दिया औऱ बीजेपी और संघ ने योगी की हिंदुत्व छवि को मौर्य की ओबीसी छवि से ज़्यादा अहमियत दी.
बीजेपी में ओबीसी तबके में ये चर्चा जारी है कि सपा और बसपा ने जिस असंभव काम को कर दिखाया है वो ये काम करने में सफल न होती अगर मुख्यमंत्री के रूप में एक ठाकुर समाज का मुख्यमंत्री न होकर ओबीसी मुख्यमंत्री होता.
फिलहाल मायावती और अखिलेश के साथ आने के बाद बीजेपी को जिस तरह हार के बाद हार मिल रही है वो मोदी के लिए चिंता का सबब बन चुका है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरा था और एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश से भारी समर्थन की जरूरत है. लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए मुश्किल होते रास्ते ने मोदी और अमित शाह को चिंता में डाल दिया है. कैराना की हार ने भाजपा को बड़े खतरे का संदेश दे दिया है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जून को पदोन्नति में आरक्षण के संबन्ध में दिया गया फैसला जहां अनुसूचित जाति/जनजाति के लाखों कर्मचारियों को राहत देनी वाली खबर है, वहीं आरक्षण के विरोधियों के लिए एक करारा झटका भी. इससे ज्यादा मुश्किलें अब केंद्र सरकार के लिए इस फैसले से खड़ी हो गयी हैं. 2012 से पदोन्नति में आरक्षण को राज्य सरकारों ने दवाब में आकर खत्म कर दिया था. यहां तक कि वर्षों से पदोन्नत होकर उच्च पदों में तक पहुचे अधिकारियों को डिमोशन का अपमान झेलना पड़ा है. इस अवधि में उनके स्वाभिमान और सम्मान को जो चोट पहुची है उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती मगर भविष्य के लिए आने वाली पीढ़ी इस अपमान का शिकार ना हो माननीय सरवोच्च न्यायालय तथा केंद्र और राज्य सरकारों को सोच समझकर इस मुद्दे को स्थायी समाधान तक ले जाना होगा. लोक सभा के चुनाव अगले वर्ष होने हैं ऐसे में मोदी सरकार को इस पर तुरन्त कार्यवाही के लिए भी दबाव बनना स्वाभाविक है. अधिकांश राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं जिसको डबल इंजन की सरकार कहा जाता है.
अगर केंद्र सरकार पदोन्नति में आरक्षण को पुनः लागू करती है तो राज्य सरकारें भी इसको लागू करने में पीछे नहीं हट सकती हैं. लेकिन राजनीतिक नफे नुकसान के लिए राजनीतिक दल अपना एजेंडा बदल सकती हैं, लेकिन माननीय उच्चत्तम न्यायलय के फैसले का सभी को सम्मान करना चाहिए. sc/st वर्ग के साथ जो जातिगत भेदभाव अभी भी होता है उसके जख्म को कुछ कम करने का है पदोन्नति में आरक्षण. भारतीय संविधान में राष्ट्र पति देश का सर्वश्रेष्ठ पद होता है तथा देश का प्रथम नागरिक होता है, लेकिन राम नाथ कोविंद को पुष्कर मंदिर में जाने से इसलिए रोका गया था कि वे दलित हैं. बुद्धिजीवियों,राष्ट्रप्रेमियों तथा वैज्ञानिक सोच वाले लोगों को गहराई से चिंतन करना चाहिए कि जाति का पिरामिड अच्छा है या सदियों से शोषित और प्रताड़ित लोगों को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करना? अभी कोर्ट के निर्णय आन केे बाद मीडिया में इस तरह से दिखया जा रहा कि ये कोई नई चीज मिल गयी है दलितों को. इसमें आरक्षित वर्ग को भी ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है पहले तुम्हारी ही घर मे डाका डाला और तुम्हारा ही सामान अब तुमको वापस किया जा रहा है तो हैरानी की कोई बात नहीं है और न ही आभार ब्यक्त करने की जरूरत है.
अखबारों और सोशल मीडिया में लिखा जा रहा है प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ! रास्ता तो हमेशा साफ ही था सिर्फ सरकारों का मन साफ नहीं है. पहले भी गेंद सरकार के ही पाले में थी और अब भी. सरकार की मनसा वास्तव में प्रमोशन में आरक्षण को पुनः बहाल करने की होती तो बार-बार कोर्ट के चक्कर से बचा जा सकता था. 117वां संविधान संशोधन बिल राज्यसभा में पास होकर लोकसभा में पारित हो जाता तो सही नियति का पता चल जाता, क्योंकि इससे सभी राजनीतिक दलों का दलित प्रेम जाहिर हो जाता मगर हर संवेदन सील मुद्दे को कोर्ट में ले जाना वर्तमान सरकारों की परंपरा बन चुकी है. आखिर संसद किस लिए है? संसद में बहस होकर जो विधेयक पारित हो जाता है उससे लोकतंत्र की मजबूती झलकती है.
ट्रिपल तलाक की सरकार को ज्यादा चिंता थी तो कोर्ट से दिशा निर्देश मिलते ही ट्रिपल तलाक पर कानून पारित हो गया. अब देखना है कि प्रमोशन में आरक्षण के संबन्ध में सरकार जल्दी कदम उठाती है या किसी बड़े आंदोलन के माध्यम से इसको उलझाकर फिर से कोर्ट की शरण मे भेज देती है, क्योंकि आरक्षण विरोधियों का भी संघठन इसको हजम नही कर पायेगा और अभी न्यायालय की संविधान पीठ का भी जिक्र हो रहा है. अगर पुनः ये मसला कोर्ट में गया तो फिर मौका हाथ से निकल जायेगा और सरकारें फिर यही रोना रोयेंगी कि न्यायालय के फैसले का हम समान करते हैं. मगर ये दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है?
इससे पहले कि ऐसी नौबत आये आरक्षित वर्ग से चुने हुए सांसदों को शीघ्र ही प्रधानमन्त्री से मिलकर इस संबन्ध में हो रहे संशय और भम्र की स्थिति को दूर करने के लिए दबाव बनाए. आखिर आरक्षण के कारण ही ये लोग संसद तक पहुचे हैं. बहन मायावती ने ऐतिहासिक कदम उठाया राज्यसभा से त्यागपत्र देकर प्रमोशन में आरक्षण की बहाली के लिए जैसा कि डॉ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल पास न होने पर नेहरू मन्त्रिमण्डल से कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया था. सही अर्थों में अगर प्रमोशन में आरक्षण बिना विवाद के बहाल हो जाता है तो राजनीतिक रूप से पहला श्रेय मायवती को जान चाहिए.
नई दिल्ली । भारतीय टीम के खिलाड़ियों की सूची में अब फिर ‘तेंदुलकर’ उपनाम शामिल हो जाएगा क्योंकि सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन को श्रीलंका के खिलाफ दो चार दिवसीय मुकाबलों के लिए अंडर-19 टीम में शामिल किया गया है. अर्जुन तेंदुलकर पूर्व भारतीय कप्तान और मौजूदा अंडर 19 कोच और अपने पिता सचिन तेंदुलकर के साथ तमाम रिकार्ड बनाने वाले राहुल द्रविड़ को रिपोर्ट करेंगे.
हालांकि अर्जुन को टीम में शामिल होने को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं, क्योंकि पिछले दिनों हुए कूच बिहार ट्राफी में उनका परफॉर्मेंस खास नहीं था और इस ट्रॉफी में विकेट लेने वाले गेंदबाजों की सूची में वह 43वें स्थाप पर थे. हालांकि इस सवाल पर चयनकर्ताओं का अपना तर्क है. कहा जा रहा है कि ज्यादा विकेट लेने वाले तमाम गेंदबाज स्पिनर थे, जबकि अर्जुन तेज गेंदबाज हैं और उन्होंने 15 विकेट लिए. अर्जुन ऑलराउंडर भी हैं.
अर्जुन के चयन के लिए हाल ही में हुए वेस्ट और साउथ जोन के जोनल मैच में अर्जुन के शानदार प्रदर्शन का हवाला भी दिया जा रहा है. यहां एक मैच में अर्जुन ने 37 रन देकर 4 विकेट लिया था. इस बार अंडर- 19 में चयन को लेकर भी बीसीसीआई और कोच राहुल द्रविड़ ने पहले ही साफ कर दिया था कि 19 से ज्यादा उम्र वाले खिलाड़ियों का चयन नहीं होगा और वो रणजी के लिए पसीना बहाए. इस लिहाज से अर्जुन तेंदुलकर से आगे रहने वाले कई खिलाड़ी डिस्क्वालीफाई कर गए.
दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) लगातार आन्दोलनरत हैं . हम उनके आन्दोलन का समर्थन करते हैं और हर मार्च या धरने में शामिल होते हैं . सरकार केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में नया रोस्टर लागू करके आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान को कमजोर करना चाहती है . यह सरकार का सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए विश्वविद्यालय का दरवाजा बंद करने का एक तरीका है . असल में नवउदारवाद के समर्थकों द्वारा आरक्षण के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई जा रही है .अन्ना हजारे जैसे लोग बार-बार आरक्षण ख़त्म करने का आह्वान करते हैं. अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे लोग ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ की मार्फ़त आरक्षण ख़त्म करने का आंदोलन चलते रहे हैं. ऐसे माहौल में दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) का आंदोलन सामाजिक न्याय का आन्दोलन विशेष महत्व रखता है . लेकिन डूटा नेतृत्व आरक्षण और सामाजिक न्याय के विरोधी आम आदमी पार्टी के नेताओं को हमेशा डूटा के मंच पर बुला कर सारे संघर्ष को गुमराह करने की कोशिश करता है .
डूटा के निर्वाचित प्रतिनिधि कभी मनीष सिसोदिया से गुहार लगाते दिखाई पड़ते हैं कभी केजरीवाल से . जबकि केजरीवाल और मनीष सिसोदिया दोनों आरक्षण विरोधी और सवर्णवादी हैं. आम आदमी पार्टी में प्रतिक्रियावादी तत्वों की भरमार किसी से छिपी नहीं है. 2006 में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों,आईआईटी, मेडिकल कॉलेज, और प्रबंधन संस्थानों में पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के सरकार के फैसले का विरोध करने के लिए बने संगठन’यूथ फॉर इक्वलिटी, के गठन, फंडिंग और नेतृत्व में इन दोनों की संलिप्तता जगजाहिर है .
हमारा मानना है कि डूटा के आन्दोलन में विचारधाराहीनता की खुले आम बात करने वाले आम आदमी पार्टी के नेताओं को बुलाना, उनसे गुहार लगाना सामाजिक न्याय के आन्दोलन के साथ अन्याय है. इस तरह की कवायद से सामाजिक न्याय का आन्दोलन और कमजोर होगा .
वनों के विनाश की क्षतिपूर्ति के लिए एकप्राधिकरण बनाया गया था, जिसका नाम है – प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण(सीएएमपीए). बांध, खनन और कारखाने आदि परियोजनाओं की मंजूरी से पहले केंद्रीय पर्यावरणमंत्रालय इसप्रकार की परियोजना से होने वाली वन्य क्षतियों का आंकलन करके उस नुकसान का एक वर्तमान शुद्ध मौद्रिक मूल्य तय करता है और क्षतिपूर्ति के रूप में इसकी वसूली करता है. इस राशि का इस्तेमाल वैकल्पिक भूमि के वनीकरण के लिए किया जाता है. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री महेश शर्मा द्वारा संसद में जो आधिकारिक सूचना दी गई है, उसके मुताबिक केंद्रीय प्रतिपूरक वनीकरण कोष के अंतर्गत उनकेमंत्रालय ने पचास हजार करोड़ से भी ज्यादा रुपये एकत्रित कर लिये हैं. इस पैसे का इस्तेमालप्रतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम 2016 के प्रावधानों के अनुसार होना अपेक्षित है.
प्रतिपूरक वनीकरणके तहत पिछले एक दशक में इतनी बड़ी राशि का वसूलीकरण अपने आप में इस बात का सूचक है कि हमारे देश में विकास परियोजनाओं के लिए व्यापक पैमाने पर जंगलों का विनाश जारी है. यह वसूलीकरण इस बात का भी व्यंजक है कि वनों में और वनों के इर्दगिर्द रहने वाले आदिवासी और वनवासी जैसे हाशिये के समुदायों के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट भी बड़े स्तर पर चल रही है जिसे राज्य की स्वीकृति प्राप्त है. उदाहरण हेतु 2014-2017 के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 1419 विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई जिनके तहत 36575 हैक्टेयर वन भूमि को गैर वन भूमि में रूपांतरित कर दिया गया और बदले में 9700.50 करोड़ वसूले गये.प्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम अपने आप में कानून का मखौल उड़ाता है क्योंकि यह विकास परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासी और दूसरे वनवासियों के विस्थापन, दु:ख-दर्द, आजीविका के विनाश और खाद्यान्न संसाधनों की छीनत आदि को मौद्रिक मूल्य के तराजू पर तोलता है और यह मौद्रिक मूल्य भी राज्य के खजाने में क्षतिपूर्ति के रूप में जमा होता है
प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण अधिनियम और इसके तहत अभी हालिया जारी प्रावधानों के अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्र राज्य अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राज्य नियंत्रित वन प्रबंधन के जाल में ही फिर फंस गया है. निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों के वन प्रबंधन पर वह आदिवासियों और वन आधारित ग्रामवासियों की अपेक्षा ज्यादा भरोसा कर रहा है.गैर वन प्रयोजन के लिए आवंटित वन भूमि के एवज में प्रतिपूरक वनीकरण कोषके तहत क्षतिपूर्ति के नाम पर जुटाई जाने वाली राशि को इस हस्तांतरण से प्रभावित आदिवासियों और स्थानीय ग्रामवासियों के पुनर्वास आदि पर खर्च किया जाना चाहिए था किंतु इस बावत कोई बात नई वन नीति के मसौदे में नहीं रखी गई है. ध्यातव्य है कि अभी हाल में देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जमा की गई राशि के दुरुपयोग और इस्तेमाल न किये जाने पर विधायिका को फटकार लगाई है कि वह वन संरक्षण के नाम पर मूर्ख बना रही है. केंद्र और राज्य सरकारों के पास लंबित यह धन राशि कुल मिलाकर एक लाख करोड़ बताई जाती है.इस अधिनियम का आदिवासी और वनवासी विरोधी चरित्र यहीं खत्म नहीं होता अपितु प्रतिपूरक वनीकरण के नाम पर वनाधिकार कानून को ताक पर रखकर हाशिये के लोगों की जमीन हड़पी जा रही है.
2006 में लागू किया गया वनाधिकार कानून वनों पर निर्भर समुदायों का वन्य संसाधनों पर अधिकार स्थापित करता है. वनों के संरक्षण और प्रकृति विषयक परंपरागत अनुभव और ज्ञान को भी इसमें स्वीकार किया गया है. इसनेवन भूमि को वनों पर आधारित समुदायों को हस्तांतरित करने का एक ऐतिहासिक अवसर मुहैया कराया था. महाराष्ट्रऔर उड़ीसा में वनाधिकार कानून ने आदिवासियों और वनों पर निर्भर ग्रामीणों के सशक्तिकरण में काफी प्रगतिशील भूमिका निभाई भी है. सामुदायिक वन संसाधन वाले इसके प्रावधान ने वनों तक पहुँच और वनों पर नियंत्रण का अधिकार वनों पर निर्भर समुदायों को दिया. किंतु एक दशक के बाद भी वनाधिकार कानून का क्रियान्वयन मोटे तौर पर अब भी लंबित है. ग्रामीण समुदायों को आज भी वन भूमि के वैधानिक अधिकार हस्तांतरित नहीं किये जा सके हैं. प्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम वनाधिकार कानून के मार्ग में अलग रोड़ा बना हुआ है. जंगलात विभाग की नौकरशाही को इकतरफा ढंग से प्रतिपूरक वनीकरण कोष का अधिकार सौंप देना और निजी या सामूहिक भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण का असीमित अधिकार दे देना वास्तव में संस्थाबद्ध रूप में वनाधिकार कानून को निष्क्रिय करने का काम है.
प्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम में नौकरशाही की मनमर्जी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रावधान रखे ही नहीं गये हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि वनाधिकार कानून के तहत जिन सघन वन क्षेत्रों में वन संसाधनों और वन भूमि पर आदिवासी लोगों और वनों पर निर्भर दूसरे लोगों ने अपने दावे किये होते हैं, उन्हीं सघन वन क्षेत्रों में वन विभाग के अफसर प्रतिपूरक वनीकरणकी परियोजनाओं का क्रियान्वयन करने लगते हैं. जहाँ वनाधिकार कानून में वनों पर निर्भर ग्रामीण समुदायों की सहमति को अनिवार्य रखा गया था, वहींप्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम में स्थानीय समुदायों से परामर्श मात्र की बात कही गई है. स्पष्ट है कि वनाधिकार कानून की अनिवार्य सहमति सेप्रतिपूरक वनीकरणअधिनियममें पीछे हटा गया है.भूमि अधिग्रहण, पुनर्स्थापना और पुनर्वास अधिनियम के अंदर भी अधिग्रहण से पूर्व सहमति की अनिवार्यता है. इसका मतलब साफ है किप्रतिपूरक वनीकरणअधिनियमभूमि अधिग्रहण कानून का भी सम्मान नहीं करता. प्रतिपूरक वनीकरणकी हर परियोजना में परामर्श का भी अनुबंध नहीं किया जाता और प्राय: प्रभावित लोगों को इस परामर्श में आमंत्रित ही नहीं किया जाता.
प्रतिपूरक वनीकरणके इस कार्यक्रम में जहाँ व्यापक भ्रष्टाचार है, वहीं विभिन्न प्रकार के पारिस्थितकीय और सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आये हैं. इसके कारण वनों के अंदर की विविधता को अपूर्णनीय क्षति पहुँची है. पहले भी हिमालय में मिलने वाले ओक के प्राकृतिक जंगलों की जगह चीड़ के पेड़ लगाये गये, मध्यभारत में साल के प्राकृतिक जंगलों की जगह सागौन लगा दिया गया, पश्चिमी घाट के सदाबहार आर्द्रता वाले जंगलों में सफेदा और बबूल लगा दिया गया. उत्पादन केंद्रित इसप्रकार केएकल वृक्षारोपण से जहाँ जैव विविधता खत्म होती है, वहीं स्थानीय लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाती है. जंगल से जिस व्यक्ति का थोड़ा भी संबंध है, वह भी जानता है कि सागौन, सफेदा और जंगली पीपड़ जैसे वाणिज्यिक महत्व के वृक्षों का रोपण प्राकृतिक जंगल का विकल्प नहीं हो सकता. इस संदर्भ में यहाँ ध्यातव्य है कि ताजा भारतीय वन सर्वेक्षण में वन गणना की पद्धति बदलते हुए निजी जमीन पर किये गये वृक्षारोपण को भी वन अंतर्गत शामिल किया गया है जबकि यह कोई छिपी बात नहीं है कि निजी जमीन पर उन्हीं वृक्षों को लगाया जाता है, जो व्यावसायिक संभानाओं की दृष्टि से लाभप्रद समझे जाते हैं. कैसी विडंबना है कि जंगलात के जिन अधिकारियों के ऊपर वैज्ञानिक ढंग से वन संरक्षण और वन गणना की जिम्मेदारी है, वही अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए वन गणना की पद्धति ही बदल देते हैं.
जंगल की जमीन पर नियंत्रण को लेकर जारी आदिवासियों के संघर्ष और तद्विषयक विद्यमान तनाव की जानबूझकरप्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम में उपेक्षा की गई है. वन विभाग एकपक्षीय ढंग से बिना स्थानीय लोगों के परामर्श के सामुदायिक वन भूमि कोप्रतिपूरक वनीकरणके लिए चिह्नित कर देता है. इसप्रकार के वृक्षारोपण का विरोध करने वाले लोगों पर राज्य द्वारा कानूनी-गैर कानूनी हिंसा की जाती है. जेलों में डालना और जबर्दस्ती भूमि छीनना आम है. पुराने विकसित वन क्षेत्रों तक को नहीं छोड़ा जाता. वास्तव में एक तरफ तो वन भूमि के गैर वन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल से पहले वन विभाग से जुड़े मंत्रालय की स्वीकृति अनिवार्य है और इस स्वीकृति के लिए प्रतिपूरक वनीकरण भी जरूरी है जबकि दूसरी तरफ इस वनीकरण के लिए अपेक्षित जमीन है ही नहीं.
वनीकरण के नाम परप्रतिपूरक वनीकरणअधिनियम के तहत जो तंत्र राज्य ने खड़ा किया है, वह इतना ज्यादा भ्रष्ट और अमानवीय है कि ढाई हजार से भी ज्यादा ग्राम सभायें प्रतिपूरक वनीकरणअधिनियमका विरोध कर चुकी हैं. लेकिन खेद की बात है कि आदिवासी औरदूसरे वनवासियों के आंदोलनों को मुख्यधारा का मीडिया कोई तवज्जो ही नहीं देता. सरकार भी हाशिये के लोगों के अधिकारों की उपेक्षा करती है. प्रतिपूरक वनीकरणअधिनियमभी आदिवासियों और वनों पर आधारित दूसरे समुदायों के अस्तित्व को कुचलने वाला अन्यायी अधिनियम है. इससे पारिस्थितीकीय असंतुलन की अन्यान्य समस्याएँभी उठ खड़ी हुई हैं. जैव विविधता खत्म हो रही है. प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन के कारण वैश्विक स्तर पर जलवायु में आ रहे बदलाव आज गंभीर खतरों के व्यंजक बन चुके हैं. प्राकृतिक जंगलों की रक्षा और पुनर्स्थापना इस पर्यावरण संकट से पार पाने का एकमात्र कारगर उपाय है किंतु प्रस्तावित नई वन नीति में प्राकृतिक जंगलों के स्थान पर निजी क्षेत्र द्वारा की जाने वाली व्यावसायिक वानिकी को स्वीकृति दी गई है. और सफेद झूठ देखिए कि वन संरक्षण के क्षेत्र में पैसे की कमी का रोना रोते हुए निजी क्षेत्र से निवेश की आवश्यकता पर बल दिया गया है जबकि देश भर में प्रतिपूरक वनीकरण कोष के तहत कुल मिलाकर वसूले गये 7 अरब बिना इस्तेमाल के यों ही पड़ेहैं. आज आवश्यकता इस पैसे के माध्यम से आदिवासी और वनवासी समुदायों के सशक्तिकरण की है.आज जरूरतवनाधिकार कानून के तहत जंगलों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए इन समुदायों की ग्राम सभाओं को संवैधानिक अधिकार प्रदान करने की है, न कि प्रस्तावित नई वन नीति के तहत वनों के प्रबंधन की राज्य नियंत्रित औपनिवेशिक व्यवस्था को नवउदारीकरण के झाड़ू-पोछे से झाड़-पोंछकर फिर खड़ा करने की.
नई दिल्ली। आरपीआई के एक धड़े के अध्यक्ष प्रकाश आम्बेडकर पर एक न्यूज चैनल के संपादक को गाली देने का आरोप लगा है. इस गाली गलौच का वीडियो भी सामने आया है. खबरों के मुताबिक एक न्यूज चैनल ने कुछ समय पहले भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी. इस रिपोर्ट में हिंसा को भड़काने वालों में कांग्रेसी नेताओं के शामिल होने की बात कही गई थी. इसी रिपोर्ट के सामने आने के बाद प्रकाश आम्बेडकर इस चैनल से नाराज हो गए थे
चतरा। झारखंड स्थित चतरा के 27 वर्षीय आदिवासी एक्टिविस्ट सुरेश उरांव की गोली मारकर हत्या कर दी गई है. सुरेश की हत्या गुरुवार 7 जून की सुबह हुई. सुरेश काफी समय से खनन माफिया के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. आशंका है कि सुरेश की हत्या के पीछे उन्हीं का हाथ है. पिछले कुछ वर्षों में झारखंड में जल, ज़मीन, जंगल का मुद्दा ऊठाने वाले लोगों पर हमला बढ़ गया है.
सुरेश उराव भी हजारों आदिवासियों की तरह विस्थापन का दर्द झेल रहा था और मुवावजे की लड़ाई लड़ रहा था. विकासपरक विस्थापनों के संबंध में एक अवधारणा यह भी है कि मुख्यधारा के लोग सुरेश जैसे लोगों को विकास की राह में बाधा समझते हैं और सही बात के लिए लड़ते हुए भी इन्हें एक सिरे से नकार दिया जाता है. विकासात्मक दृष्टिकोण रखने वाले लोग आदिवासी समुदाय को हाशिये में ढकेल दिए जाने की प्रायः अनदेखी करते हैं.
छोटा नागपुर, नियामगिरी, बस्तर, सिंगरौली और अब दुद्धि (सोनभद्र) का अमवार सभी जगह प्राकृति के लिए लड़ाई लड़ने वालों की कहानी एक सी है, जबकि विस्थापितों के लिए ऐसी परियोजनाए अक्सर नकारात्मक परिणाम लाती है. उन्हें आर्थिक बदहाली और मानसिक अवरोध का सामना करना पड़ता है, जबकि यदि सरकार जमीनी स्तर पर ठोस कार्य करे तो निश्चय ही देश और विस्थापितों दोनों का ही विकास होगा.
अहमदाबाद। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गुजरात में वहां के दरबार यानि की राजपूतों ने एक दलित महिला पर हमला कर दिया. आंगनबाड़ी महिला कार्यकर्ता का कसूर बस इतना भर था कि वह पंचायत ऑफिस में कुर्सी पर बैठ गई थी. महिला पंचायत ऑफिस में आधार कार्ड बांटने के काम के लिए पहुंची थी. पीड़िता के मुताबिक आरोप है कि जब महिला कुर्सी पर बैठी तो दरबार समुदाय के लोगों ने उस पर हमला कर दिया.
इस मामले में एक चौंकाने वाली सच्चाई यह भी सामने आई है कि इस परिवार पर स्थानीय मनुवादी गुंडें पहले भी हमला कर चुके हैं. तब महिला के एक रिश्तेदार ने अपने नाम में ‘सिंह’ जोड़ लिया था. इस मामले में अहमदाबाद के कोठ पुलिस स्टेशन में 7 जून को एक एफआईआर दर्ज की गई थी. एफआईआऱ के मुताबिक जयराज सिंह वेगड़ नाम के शख्स ने पीड़िता के कुर्सी पर बैठने पर आपत्ति जताई और उसके बाद कुर्सी को धक्का दे दिया. विरोध करने पर दरबार समाज के और गुंडे वहां पहुंच गए और वहां मौजूद दलितों से मारपीट और गाली-गलौज करने लगे.
नई दिल्ली। एम्स नागपुर (AIIMS Nagpur) ने 30 पदों पर भर्तियां निकाली है. इच्छुक उम्मीदवार इन पदों पर ऑनलाइन भी आवेदन कर सकते हैं. आवेदन करने की अंतिम तारीख 18 जून है. उम्मीदवार एम्स की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर इन पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं.
पदः विभाग ने जिन पदों पर भर्तियां निकाली हैं उनमें खास तौर पर पर्सनल असिस्टेंट, लाइब्रेरियन ग्रेड तीन, टेक्निकल असिस्टेंट, टेक्निशियन, स्टोर कीपर, वार्डन, कैशियर और अन्य पद शामिल हैं. आवेदक अन्य पदों की जानकारी के लिए विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं.
योग्यताः आवेदन करने के लिए अलग-अलग पद के लिए आवेदकों का 12वीं पास और डिप्लोमा किया होना जरूरी है. हर पद के लिए विभाग ने योग्यता अलग तय की है. आवेदन करने से पहले आप आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर इसे जांच सकते हैं.
उम्र सीमा- आवेदकों की उम्र 18 से 45 साल के बीच होनी चाहिए.
पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर होगा. इन पदों पर चुने जाने वाले उम्मीदवारों को औसतन सैलरी 9,300 और 34,800 के बीच मिलेगी. पद के हिसाब से सैलरी अलग-अलग है. आवेदन करने से पूर्व दिशा-निर्देश ध्यान से पढें.
पटना। लड़की की प्रेम कहानी का खात्मा करने के लिए घरवालों ने शादी का रास्ता निकाला लेकिन लड़की ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. बिहार के शाहपुर थाना क्षेत्र में एक छात्रा ने फांसी लगाई है. युवती की आत्महत्या की वजह प्रेम प्रसंग बताई जा रही है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. फिलहाल शव को पोस्टमार्टम के लिए दानापुर अनुमंडल अस्पताल भेजा गया है.
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार युवती प्रेम करती थी. वह अपने प्रेमी से शादी करना चाहती थी. लेकिन युवती के परिवार ने उसकी बात ना मानकर जबरन किसी दुसरे लड़के के साथ शादी तय कर दी. आगामी 23 जून को उसकी शादी भी थी. जब युवती को इस बारे में पता चला तो उसने शादी से इनकार किया तो परिजनों ने मारापीटा भी. ऐसे में युवती ने परिजनों के आगे हारकर खुदकुशी कर ली.
नई दिल्ली। हर साल होने वाले इफ्तार के आयोजन को राष्ट्रपति ने बंद करवा दिया है. ऐसा कहा जा रहा है कि करीब एक दशक बाद इस तरह का फैसला लिया है. इससे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हर साल इफ्तार पार्टी का आयोजन कराते थे. लेकिन अब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस साल राष्ट्रपति भवन में इफ्तार पार्टी की मेजबानी नहीं करेंगे.
यह जानकारी राष्ट्रपति भवन की ओर से दी गई है. राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अशोक मलिक ने बताया कि पदभार ग्रहण करने के बाद राष्ट्रपति ने फैसला लिया था कि करदाताओं के पैसे से राष्ट्रपति भवन में कोई भी धार्मिक आयोजन नहीं होगा. इसके अनुसार दीपावली, होली, गुरुपर्व और क्रिसमस का भी आयोजन नहीं होगा. राष्ट्रपति भवन पूरे देश के लिए धर्मनिरपेक्ष भाव रखता है, इसी को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति हर बड़े धार्मिक त्योहार पर देशवासियों को अपनी शुभकामना देते हैं. हालांति एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यकाल के दौरान ऐसा नहीं हुआ. कलाम 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति रहे थे.
पटना। ऐसा लग रहा है कि कर्नाटक के साथ ही बीजेपी के बुरे दिन शुरू हो गए हैं. एक के बाद एक बीजेपी को झटका लगता दिख रहा है. खबर आ रही है कि जदयू सीट बंटवारे को लेकर अड़ गई है. तो दुसरी ओर रालोसपा के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने आज पटना में आयोजित राजग के भोज में शामिल नहीं होने का फैसला लिया है. मतलब कि अमित शाह के कार्यक्रम में उपेंद्र कुशवाहा शामिल नहीं होंगे.
उप चुनावों में मिली करारी हार के बाद एनडीए गठबंधन दलों को मनाने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गुरूवार को पटना आ रहे हैं. वहीं रालोसपा के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा राजग के भोज में शामिल नहीं होंगे. भोज से पहले ही भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा ने झटका दे दिया है. तो वहीं जेडीयू के नेशनल जनरल सेक्रेटरी श्याम रजक ने गुरुवार को कहा कि नीतीश कुमार बिहार में महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं. हमने 25 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था और 2019 के लोकसभा चुनाव में इससे कम सीटों पर चुनाव लड़ने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर एनडीए नीतीश कुमार की छवि का फायदा उठाना चाहता हैं तो उसे जेडीयू के साथ न्याय करना होगा. ऐसे में जदयू व रालोसपा की नाराजगी साफ दिख रही है.
बता दें कि उप चुनाव में मिली हार के बाद जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने भी बीजेपी पर भड़ास निकाली थी. तो वहीं पीडीपी भी कश्मीर में मुंह फूलाकर बैठी है. शिवसेना ने तो साफ तौर पर बीजेपी को नकार दिया है. ऐसे मेें बीजेपी की मुश्किल बढ़ती दिख रही है. भोज में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा नेता व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, केंद्रीय मंत्री व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान हिस्सा लेंगे.
नई दिल्ली। देश की राजधानी में गुरूवार को उत्तम नगर इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. जब दो कार सवार ने दोपहर में दिनदहाड़े बीच सड़क पर गोलियां चलानी शुरू की. इससे इलाके में दहशत फैल गई. हालांकि पुलिस पहुंचकर मामले को कंट्रोल करने में जुटी. साथ ही घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया.
प्राप्त खबरों के अनुसार दो कार में सवार लोगों की किसी बात को लेकर बहस और फिर अचानक दोनों ओर से गोलियां चलने लगी. ऐसा बताया जा रहा है कि सात से आठ राउंड फायरिंग की गई. इस घटना में कार सवार एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया. पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है. जानकारी के अनुसार नजफगढ़ रोड पर उत्तम नगर के पास गुरुवार दोपहर दो करों में सवार लोगों के बीच बीच सड़क पर जमकर फायरिंग हुई. शुरुआती जांच में ये घटना गैंगवार की लग रही है.
नई दिल्ली। ब्राह्मणों के अत्याचार के परेशान होकर हरियाणा के हिसार जिला के करीब 300 दलित परिवारों ने हिंदू धर्म छोड़ने की ठान ली है. इनका आरोप है कि गांव के ब्राह्मणों व पुलिस ने जीना हराम कर रखा है. मुख्यमंत्री तक फरियाद लेकर गए लेकिन कोई मदद नहीं मिली है. इनका कहना है कि ब्राह्मणों ने गांव में पानी तक पर कब्जा जमा रखा है. आए दिन मारपीट करते रहते हैं.
प्राप्त जानकारी के अनुसार जींद के बाद अब हिसार के भाटला गांव के 300 दलित परिवारों ने धर्म परिवर्तन करने का फैसला लिया है. दलित समुदाय के लोगों का आरोप है कि दबंग ब्राह्मण समुदाय के लोग अत्याचार कर रहे हैं सरकार से भी किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिल रहा है. पीड़ित परिवार का कहना है कि जिस धर्म में उनको मान-सम्मान नहीं मिल रहा है उसके साथ जुड़ने से क्या औचित्य है. इसलिए 29 July को बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय लिया है.
बता दें कि इससे पहले जींद के दलितों ने बौध्द धर्म अपनाकर हिंदू धर्म का बहिष्कार कर दिया है. इतना ही नहीं हरियाणा में दलितों पर अत्याचार के कई मामले हालही में सामने आए हैं. लेकिन इनको लेकर सरकार कुछ खास कदम नहीं उठा रही है.