दलित और आदिवासी समाज के हिन्दु धर्म में बनाए रखना हिन्दू धर्म को बढ़ाने में लगे संगठनों के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में प्रयागराज मे चल रहे महाकुंभ से दलितों को जोड़ने के लिए आरएसएस ने कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस) आठ हजार दलित, आदिवासी छात्रों को कुंभ दर्शन कराएगा। यह काम संघ की शिक्षा शाखा, विद्या भारती करेगी। यहां 10 वर्ष से अधिक उम्र के छात्रों को उनके माता-पिता के साथ कुंभ मेले का दौरा कराया जाएगा। विद्या भारती के अनुसार, इस यात्रा का उद्देश्य इन बच्चों को हिंदू परंपराओं, भारतीय संस्कृति और महाकुंभ के आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना है, ताकि वे धर्मांतरण के प्रयासों से प्रभावित न हों।
मीडिया रिपोर्टस में प्रकाशित खबरों के मुताबिक अवध क्षेत्र के सेवा भारती स्कूलों के प्रशिक्षक रामजी सिंह ने बताया कि इन छात्रों को संतों के आश्रम, अखाड़ों और संगम घाट पर ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा, “इस यात्रा से बच्चे भारतीय परंपराओं और महाकुंभ के आध्यात्मिक पहलुओं को समझ सकेंगे। यह उन्हें धर्मांतरण के दुष्प्रभावों से बचाने में मदद करेगा। विद्या भारती का संस्कार केंद्र, मुख्य रूप से गरीब और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करता हैं। वह इस कार्यक्रम के केंद्र में हैं। इन केंद्रों में बच्चों को न केवल नियमित स्कूली शिक्षा दी जाती है, बल्कि उन्हें भारत माता की पूजा, राष्ट्रभक्ति के गीत, और बड़ों का सम्मान करना भी सिखाया जाता है। महाकुंभ यात्रा में अवध क्षेत्र के 14 जिलों से करीब 2100 छात्र 16 से 18 जनवरी के बीच शामिल होंगे।
खास बात यह है कि कुंभ यात्रा के दौरान छात्रों को माता-पिता के साथ लेकर जाया जाएगा। उनके माता-पिता के ठहरने के लिए मेला क्षेत्र के सेक्टर 9 में एक विशेष शिविर स्थापित किया गया है। यात्रा के बाद, छात्रों के अनुभवों को साझा करने के लिए एक सत्र का आयोजन भी होगा। इसके बाद, गोरखपुर, काशी, और कानपुर क्षेत्रों से छात्रों के समूह क्रमशः 24 से 26 जनवरी और अन्य दिनों में यात्रा करेंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छात्रों के लिए भी इसी तरह की योजना पर काम हो रहा है।
दरअसल जाति के आधार पर दलितों पर हर दिन होने वाले हमले और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की विचारधारा के प्रसार के कारण दलित और आदिवासी समाज के लोग लगातार हिन्दू धर्म से विमुख हो रहे हैं। लगातार जातीय हिंसा को झेल रहे इस समाज को हिन्दू धर्म के तमाम लोग और संगठन अपनी संख्या बढ़ाने के लिए हिन्दू धर्म का हिस्सा तो मानते हैं, लेकिन उन पर होने वाले जातीय अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं। ऐसे में आर.एस.एस जैसे संगठन लगातार उन्हें हिन्दू धर्म के जोड़ने की कवायद करते रहते हैं।
यहां सवाल यह भी है कि जितनी गर्मजोशी से इन्हें महाकुंभ में ले जाने का प्लॉन बनाया जा रहा है, आरएसएस और उस जैसी संस्थाएं जातिवाद के खिलाफ लड़ाई क्यों नहीं लड़ती? P

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहन मायावती का 15 जनवरी को जन्मदिन होता है। बसपा कार्यकर्ता इस दिन को जनकल्याणकारी दिवस के रूप में मना रहे हैं। इस दौरान बहनजी ने लखनऊ में हर साल की तरह मीडिया को संबोधित किया। अपने संबोधन में बहनजी ने जहां बहुजन महापुरुषों को नमन किया तो वहीं वर्तमान राजनीति पर भी खुल कर बोलीं। उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आगाह करते हुए कहा कि कुछ वर्षों से बी.एस.पी के दलित वोट बैंक को कमजोर करने व उसे तोड़ने के लिए कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी अनेक हथकंडे अपना रही हैं। इससे सावधान रहना होगा।
जातिवाद समाज के भीतर कितनी गहराई से बैठा है, यह मध्यप्रदेश में घटी एक घटना से पता चलता है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक गांव में 20 परिवारों को एक दलित व्यक्ति से प्रसाद लेने के कारण सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। परिवार का आरोप है कि यह फरमान गांव के सरपंच संतोष तिवारी ने जारी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना छतरपुर जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर अटरार गांव की है।
1779 ई. में ही भागलपुर के प्रथम कलक्टर क्लीबलैंड नियुक्त हुए थे। उनके द्वारा जनजातियों में फूट डालने की नीति के तहत पैसे, अनाज और कपड़े बांटने के कार्य किए जा रहे थे। पहाड़िया जनजाति के लोगों की 1300 सैनिकों की भर्ती 1781ई में की गई थी। उस सैनिक बल का सेनापति जबरा या जोराह (Jowrah) नामक कुख्यात पहाड़िया लूटेरे को बनाया गया था, जो जीवन भर अंग्रेज़ों के वफादार सेनापति बना रहा। ये सैनिक बल तिलका मांझी के जनजाति एवं किसान विद्रोह को कुचलने और दमन करने के लिए लगातार लड़ाई कर रहे थे। तीतापानी के समीप 1782 और 1783 में हुए दो युद्धों में अंग्रेजी सेना की बुरी तरह हार हुईं।
9 जनवरी को माता सावित्री बाई फुले की सहयोगी और पहली महिला मुस्लिम शिक्षिका फातिमा शेख की जयंती हुई थी। इस दौरान जब देश भर के लोग उन्हें श्रद्धांजली दे रहे थे, पूर्व अंबेडकरवादी और वर्तमान में भाजपा की मोदी सरकार में मीडिया एडवाइजर के पद पर काम कर रहे दिलीप मंडल ने फातिमा शेख को मिथक बता दिया। उन्होंने दावा किया कि फातिमा शेख जैसा कोई कैरेक्टर नहीं है, और उसे उन्होंने सोशल मीडिया पर क्रिएट किया। इसके बाद तमाम लोगों ने दिलीप मंडल पर फातिमा शेख के अपमान और बहुजन इतिहास पर गलतबयानी करने को लेकर हमला बोला।
इसी कड़ी में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर विक्रम हरिजन ने तमाम तथ्यों के जरिये दिलीप मंडल को झूठा साबित कर दिया। देखिए वह चर्चा-


इन आरोपों से बैकफुट पर आए मंत्री आशीष पटेल ने इसे राजनीतिक साजिश बताया है। उनका कहना है कि ऐसा आरोप लगाकर उनकी छवि को खराब करने का प्रयास किया जा रहा है। खुद को पाक-साफ साबित करने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके द्वारा लिए गए सभी फैसलों की सीबीआई जांच कराने की मांग कर डाली है।
है कि जो अनुप्रिया पटेल पिछड़ों की राजनीति कर मंत्री पद तक पहुंची हैं, क्या उनके ही पति पिछड़ों का हक मार रहे हैं। जहां तक आशीष पटेल का सवाल है तो एक तरफ उन पर पिछड़ों का हक मारने का आरोप लग रहे है तो वहीं वह योगी सरकार के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 03 जनवरी, 1831 में पश्चिमी महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। इन्होंने पति जोतीराव फुले के साथ मिलकर शिक्षा क्रांति के लिए जो काम किया, वह हर कोई जानता है। लेकिन इसके साथ ही फुले दंपति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना भी शुरू किया। खासकर स्त्री मुक्ति के लिए।