जुबान नहीं फिसली है, असल बात जुबान पर आ गई है

मैंने लिखा था, वे गांधी-नेहरू के बाद अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे, आखिर अमित शाह ने आंबेडकर पर हमला बोल ही दिया। भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के मार्ग में तीन व्यक्तित्व हिंदू राष्ट्रवादियों के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हैं, गांधी, नेहरू और आंबेडकर। गांधी यदि हिंदू राष्ट्रवादियों के ह्रदय में कांटे की तरह चुभें हुए हैं, तो नेहरू खंजर हैं, लेकिन आंबेडकर हिंदू राष्ट्रवादियों के सीने में इस पार से उस पार तक तलवार की तरह उतरे हुए हैं।

अभी फिलहाल हिंदू राष्ट्र की परियोजना को साकार करने में लगे संगठन, संस्थाएं और व्यक्ति आंबेडकर पर सीधा हमला करने से बच रहे थे, लेकिन उन्हें हिंदू राष्ट्र के अपने स्वप्न को पूरी तरह साकार करने लिए, आंबेडकर को अपने मार्ग से हटाना ही पड़ेगा, जो हिंदुत्व का प्रतिपक्ष और संविधान का पर्याय बनकर चीन की दीवार की तरह हिंदू राष्ट्र के मार्ग में खड़े हैं। इस सच से हिंदू राष्ट्रवादी बखूबी परिचित हैं। आखिर अमित शाह ने संसद में आंबेडकर पर हमला बोलकर इसकी शुरूआत कर ही दी।

गांधी-नेहरू हिंदू राष्ट्र की परियोजना के लिए अलग-अलग मात्रा और अलग-अलग रूपों में चुनौती तो हैं, लेकिन जिस व्यक्ति ने हिंदू राष्ट्र की बुनियाद पर सबसे प्राणघातक हमला बोला है, उसकी रीढ़ को निशाना बनाया और जिस हिंदू धर्म पर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा आधारित है, उसे नेस्तनाबूद करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया, उस व्यक्ति का नाम डॉ. आंबेडकर है। वे ब्राह्मण धर्म, सनातन धर्म और हिंदू धर्म को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखते थे।

नेहरू यह समझने में पूरी तरह असफल रहे कि हिंदू धर्म का मूल तत्व वर्ण-व्यवस्था है, गांधी यह समझते थे, लेकिन वो जीवन के अंत तक वर्ण-व्यवस्था के हिमायती बने रहे। गांधी-नेहरू दोनों यह नहीं समझ पाए कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसका मूल उद्देश्य सवर्ण हिंदू मर्दों (द्विज मर्दों) के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्व को पिछड़े-दलितों और महिलाओं पर कायम रखना है। जिस व्यक्ति ने इस बात को समझा उस व्यक्ति का नाम डॉ. आंबेडकर है।

यह सच है कि हिन्दू राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण तत्व मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति घृणा है। परन्तु यह घृणा, हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा की केवल ऊपरी सतह है। सच यह है कि हिंदू राष्ट्र जितना मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा है, उससे अधिक वह हिंदू धर्म का हिस्सा कही जानी वाली महिलाओं, अति पिछड़ों और दलितों के लिए भी खतरनाक है, जिन्हें हिंदू धर्म दोयम दर्जे का ठहराता है। एक अर्थ में तो हिंदू धर्म ब्राह्मणों को छोड़कर सबको दोयम दर्जे का मानता है। इस तथ्य को रेखांकित करते हुए आंबेडकर ने लिखा कि ‘‘हिन्दू धर्म एक ऐसी राजनैतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः लोकतंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और/या नाजी विचारधारा जैसा ही है। अगर हिन्दू धर्म को खुली छूट मिल जाए – और हिन्दुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है- तो वह उन लोगों को आगे बढ़ने ही नहीं देगा जो हिन्दू नहीं हैं या हिन्दू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दलित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है” (सोर्स मटियरल ऑन डॉ. आंबेडकर, खण्ड 1, पृष्ठ 241, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)।

गांधी-नेहरू या किसी अन्य ने खुले शब्दों में हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति घृणा नहीं प्रकट किया है। आंबेडकर हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति खुलेआम घृणा प्रकट करते हैं और इस घृणा का कारण बताते हुए लिखते हैं “मैं हिंदुओं और हिंदू धर्म से इसलिए घृणा करता हूं, उसे तिरस्कृत करता हूं क्योंकि मैं आश्वस्त हूं कि वह गलत आदर्शों को पोषित करता है और गलत सामाजिक जीवन जीता है। मेरा हिंदुओं और हिंदू धर्म से मतभेद उनके सामाजिक आचार में केवल कमियों को लेकर नहीं हैं। झगड़ा ज्यादातर सिद्धांतों को लेकर, आदर्शों को लेकर है। (भीमराव आंबेडकर, जातिभेद का विनाश पृ. 112)।

डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि हिन्दू धर्म के प्रति उनकी घृणा का सबसे बड़ा कारण जाति है, उनका मानना था कि हिन्दू धर्म का प्राण-तत्त्व जाति है और इन हिन्दुओं ने अपने इस जाति के जहर को सिखों, मुसलमानों और क्रिश्चियनों में भी फैला दिया है। वे लिखते हैं कि ‘‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि जाति आधारभूत रूप से हिन्दुओं का प्राण है। लेकिन हिन्दुओं ने सारा वातावरण गन्दा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं।’’ स्पष्ट है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों और ईसाईयों के बीच जाति की उपस्थिति के लिए वे हिंदू धर्म को जिम्मेदार मानते हैं।

वे हिंदू धर्म का पालन करने वाले हिंदुओं को मानसिक तौर पर बीमार कहते थे। ‘जाति का विनाश’ किताब का उद्देश्य बताते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘‘मैं हिन्दुओं को यह अहसास कराना चाहता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं, और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरा है।’’

आंबेडकर हिंदुओं को आदिम कबिलाई मानसिकता के बर्बर लोगों की श्रेणी में रखते हैं। ‘‘हिन्दुओं की पूरी की पूरी आचार-नीति जंगली कबीलों की नीति की भांति संकुचित एवं दूषित है, जिसमें सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपने जाति बन्धु को ही मान्यता है। इनमें सद्गुणों का पक्ष लेने तथा दुर्गुणों के तिरस्कार की कोई परवाह न होकर, जाति का पक्ष लेने या उसकी अपेक्षा का प्रश्न सर्वोपरि रहता है।” डॉ. आंबेडकर को हिन्दू धर्म में अच्छाई नाम की कोई चीज नहीं दिखती थी, क्योंकि इसमें मनुष्यता या मानवता के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में उन्होंने दो टूक लिखा है कि ‘हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबन्धों की भीड़ है। हिन्दू-धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी संग्रह मात्र है। हिन्दुओं का धर्म बस आदेशों और निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है, और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धान्तों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिन्दुओं में पाया ही नहीं जाता और यदि कुछ थोड़े से सिद्धान्त पाये भी जाते हैं तो हिन्दुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती। हिन्दुओं का धर्म ‘‘आदेशों और निषेधों” का ही धर्म है। वे हिन्दुओं की पूरी व्यवस्था को ही घृणा के योग्य मानते हैं। उन्होंने लिखा कि ‘‘इस प्रकार यह पूरी व्यवस्था ही अत्यन्त घृणास्पद है, हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) एक ऐसा परजीवी कीड़ा है, जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है… ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू-समाज को बर्बाद किया है।” (जाति का विनाश)।

हिंदू राष्ट्र से आंबेडकर इस कदर घृणा करते थे कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र के निर्माण को किसी भी कीमत पर रोकने की बात की। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा, अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338) हिंदू धर्म की यह समझ डॉ. आंबेडकर को गांधी-नेहरू से गुणात्मक तौर पर भिन्न बना देती है और हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आंबेडकर को सबसे अधिक खतरनाक।

आंबेडकर वर्ण-जाति व्यवस्था के पोषक हिंदू धर्मग्रंथों को डायनामाइट से उड़ाने की तक की बात करते हैं। उन्होंने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ और ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ और ‘जाति का विनाश’ जैसी किताबें लिखकर हिंदू धर्म दर्शन, विचारधारा, ईश्वरों, देवी-देवताओं, हिंदू धर्म की किताबों, आदर्शों-मूल्यों, जीवन-पद्धति और जीवन-दृष्टि की धज्जियां उड़ा दी हैं। वेदों से लेकर आधुनिक युग तक हिंदू धर्म के पक्ष में दिए गए तर्कों और हिंदू धर्म के पैरोकारों के हर तर्क का उन्होंने ठोस और सटीक जवाब दिया है, जाति का विनाश किताब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक शब्द में कहें तो भारत के अब तक के इतिहास में सनातन धर्म और ब्राह्मण धर्म के पर्याय हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद पर इतना मर्मांतक और निर्णायक हमला किसी ने नहीं बोला है, जितना डॉ. आंबेडकर ने वोला है।

हिंदू धर्म पर दार्शनिक-वैचारिक हमले के साथ आंबेडकर ने संविधान के रूप में हिंदू राष्ट्र के मार्ग में एक पहाड़ खड़ा कर दिया है, इस पहाड़ को रास्ते से हटाए बिना हिंदू राष्ट्र स्थायी और मुकम्मल शक्ल नहीं ले सकता है और मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। क्योंकि संविधान हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार देता है। पांच साल में चुनाव और सरकार बदलने का भी उन्हें अधिकार देता है। जनता इस अधिकार का इस्तेमाल करके हिंदू राष्ट्र के पैरोकारों को सत्ता से हटा सकती है। संसद में ऐसी सरकार को बहुमत दे सकती है, जो हिंदू राष्ट्र के खिलाफ हो। इसका खतरा हमेशा हिंदुत्वादियों के सामने मंडराता रहेगा। हालांकि इस संविधान के साथ लगातार हिंदू राष्ट्रवादी छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसकी मूल भावना को रौंद रहे हैं, उसकी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं, उसका हिंदू राष्ट्रवाद की परियोजना के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और अब तो उसे बदलने की खुलेआम बातें भी करने लगे हैं। फिर भी संविधान उनके मार्ग में बड़ा रोड़ा बना हुआ है।

हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए संविधान को पूरी तरह बदलना इसलिए भी जोखिम भरा काम है, क्योंकि दलितों-पिछड़े और आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा संविधान और आंबेडकर को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखता है। संविधान से छेड़-छाड़ या संविधान बदलने की बात उसे आंबेडकर के विचारों-सपनों से छेड़-छाड़ लगती है। फिर भी हिंदू धर्म के लिए इतने खतरनाक और हिंदू राष्ट्र के मार्ग में सबसे बड़े अवरोध आंबेडकर पर हमला बोले बिना भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के स्वप्न को हिंदू राष्ट्रवादी साकार नहीं कर सकते। वे आंबेडकर पर हमला बोलेंगे, लेकिन गांधी और नेहरू को पूरी तरह निपटाने के बाद। वे अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे।

प्रश्न यह है कि हिंदू राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी बाधा आंबेडकर और उनकी वैचारिकी पर हमला करने से क्यों हिंदुत्ववादी बच रहे हैं और गांधी, नेहरू पर आक्रामक तरीके से हमलावार क्यों हैं।

इसका पहला कारण यह है कि देश में गांधी-नेहरू के समर्थक (वोटर) बहुत कम संख्या में बचे हैं। जो अपरकॉस्ट गांधी और नेहरू का मजबूत समर्थक और पैरोकार था, उसका बहुलांश हिस्सा हिंदुत्वादियों के साथ पूरी तरह खड़ा हो गया है। यह अपरकॉस्ट आजादी के दौरान गांधी और आजादी के बाद नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता, हितैषी और पैरोकार मानता था। इन दोनों ने इनके हितों की भरपूर पूर्ति भी किया।

अब अपरकॉस्ट को अपना सबसे बड़ा हितैषी हिंदुत्वादी लग रहे हैं और वह उनके साथ वह पूरी मुस्तैदी के साथ खड़ा है। अपरकॉस्ट के कुछ मुट्टीभर लोगों के बीच, विशेषकर सचेतन बुद्धिजीवियों के बीच अब गांधी-नेहरू की कद्र रह गई है, जो संख्या में बहुत कम हैं। गांधी-नेहरू कभी भी बहुजनों ( दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों) के सहज-स्वाभाविक नायक नहीं रहे हैं, भले ही विभिन्न वजहों से बहुजन उनके साथ खड़े हुए हों और नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को वोट भी देते रहे हों। आज भी पिछड़े-दलितों और आदिवासियों के सहज स्वाभाविक नायक जोतीराव फुले, शाहू जी, पेरियार, जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव, बिरसा मुंडा, तिलका मांझी और राष्ट्रव्यापी नायक के रूप में आंबेडकर हैं। आंबेडकर कभी भी द्विज पुरूषों के चहेते नहीं रहे हैं, न आज हैं, न भविष्य में कभी हो सकते हैं।

चूंकि गांधी-नेहरू के कभी अनुयायी रहा अपरकॉस्ट उनका साथ छोड़ चुका और पूरी तरह हिंदुत्वादियों के साथ खड़ा हो गया है, ऐसे में उन पर आक्रामक हमला करना हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आसान हैं। लेकिन आंबेडकर को जो समूह अपना नायक मानता है आज भी उन्हें उतने ही पुरजोर तरीके से उन्हें अपना नायक मानता है, भले ही आंबेडकर का जो रूप उसे पसंद हो। यह बात बहुजनों, उनमें विशेष तौर दलितों के बारे में पूरी तरह लागू होती है। यदि आज की तारीख में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर गांधी और नेहरू की तरह आक्रामक और निर्णायक हमला बोल दें, तो बहुजनों का एक बड़ा हिस्सा उनके खिलाफ खड़ा हो जाएगा। यहां तक कि सड़कों पर भी उतर सकता है।

ऐसी स्थिति में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर निर्णायक हमले के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। यह उचित समय उनके लिए तब होगा, जब वह बहुजनों के एक बड़े हिस्से का हिंदुत्वीकरण (कम से कम राजनीतिक तौर पर) करने में सफल हो जाएं। जिसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है। वे पहले बडे़ पैमाने पर पिछड़ों का हिंदुत्वीकरण करेंगे और कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे पिछड़ों को दलितों से अलग करने की कोशिश करेंगे। जिसमें उन्हें एक हद तक सफलता भी मिलती दिख रही है। इस प्रक्रिया में वे बहुजन अवधारणा को तोड़ेंगे। पिछड़ों से दलितों को अलग-थलग करने के बाद वे दलितों को भी अपने साथ खड़ा करने की कोशिश करेंगे। यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो, अपरकॉस्ट और पिछड़ों का गठजोड़ बनाकर वे आंबेडकर यानी दलित वैचारिकी पर निर्णायक हमला बोलेंगे। पिछड़ों को अपरकास्ट के साथ जोड़ने का प्रयोग कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ था। जिसे नरेंद्र मोदी (तथाकथित पिछड़े) के नेतृत्व में एक अलग मुकाम तक पहुंचाया जा चुका है।

अंतिम तौर पर डॉ. आंबेडकर पर हमला बोलने की हिंदू राष्ट्रवादियों की दो रणनीति दिख रही है। पहली नरेंद्र मोदी के समर्थक दलित नेताओं को अपने साथ करके दलितों को हिंदुत्व की राजनीति के लिए पूरी तरह अपने साथ कर लेना और साथ में आंबेडकर का नाम भी लेते रहना। यह भी आंबेडकर पर हमला ही होगा, लेकिन पीठ पीछे से। जिसके कुछ रूप उत्तर प्रदेश बिहार और अन्य जगहों पर दिखाई दे रहे हैं।

यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो वे अपरकॉस्ट और पिछड़ों के गठजोड़ का इस्तेमाल आंबेडकर पर निर्णायक हमला के लिए करेंगे। क्योंकि पिछड़े यदि दलितों से अलग हो जाते हैं, तो दलित वोटर एक अल्पसंख्यक वोटर बनकर रह जाएगा। दलितों के सहज-स्वाभाविक राजनीतिक दोस्त मुसमलानों को हिंदू राष्ट्रवादी पहले ही राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने के तरीके निकाल चुके हैं या निकाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे आंबेडकर पर निर्णायक हमला बोलेंगे। लेकिन यह उनका अंतिम विकल्प होगा। जिसका वे सबसे अंत में ही इस्तेमाल करेंगे। इसका क्या परिणाम होगा यह भविष्य के गर्भ में है।


डॉ. सिद्धार्थ के फेसबुक पेज से साभार

अडानी पर अमेरिका में धोखाधड़ी और रिश्वत के मामले में आरोप तय

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भारत के सबसे अमीर और दिग्गज कारोबारी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी गौतम अडानी को अमेरिका में बड़ा झटका लगा है। अडानी पर अमेरिका में धोखाधड़ी और रिश्वत के मामले में आरोप तय हो गया है। अडानी पर अमेरिका में अपनी एक कंपनी को कॉन्ट्रेक्ट दिलाने के लिए 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने और इस मामले को छिपाने का आरोप लगाया गया है। यह आपराधिक मामला कल बुधवार 20 नवंबर को न्यूयॉर्क में दायर किया गया है।

अदानी और उनकी कंपनी पर आरोप है कि अदानी और उनकी कंपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी अक्षय ऊर्जा (रिन्यूल एनर्जी) कंपनी को कॉन्ट्रेक्ट दिलाने के लिए भारतीय अधिकारियों को भुगतान करने पर सहमति जताई थी। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इस कॉन्ट्रेक्ट से कंपनी को आने वाले 20 सालों में दो अरब डॉलर से अधिक के मुनाफ़ा होने की उम्मीद थी। बीबीसी की खबर के मुताबिक अडानी और उनकी कंपनी पर आरोप है कि इसके प्रबंधकों ने क़र्ज़ और बॉन्ड्स के रूप में तीन अरब डॉलर जुटाए। इसमें कुछ धन अमेरिकी फर्म्स से भी जुटाया गया था।

आरोप है कि ये पैसे रिश्वत विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ और भ्रामक बयानों के ज़रिए जुटाए गए। ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क के अटॉर्नी ब्रियोन पीस ने आरोपों में कहा है, “अभियुक्तों ने अरबों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए भारत के सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की एक गोपनीय योजना बनाई थी और रिश्वतखोरी योजना के बारे में झूठ बोला क्योंकि वे अमेरिकी और वैश्विक निवेशकों से पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे थे।” अधिकारियों का कहना है कि रिश्वतखोरी योजना को आगे बढ़ाने के लिए कई मौक़ों पर अदानी ने ख़ुद सरकारी अधिकारियों से मुलाक़ात की। अमेरिका के अटॉर्नी ऑफिस ने इस मामले में जिन लोगों के ख़िलाफ़ आरोप लगाया है, उनमें गौतम अदानी के अलावा सात अन्य लोग, सागर आर अदानी, विनीत एस जैन, रंजित गुप्ता, रूपेश अग्रवाल, दीपक मल्होत्रा, सौरभ अग्रवाल और सिरील कैबनीज़ शामिल हैं।

बता दें कि अदानी समूह साल 2023 से ही अमेरिका में शक के घेरे में है। उस साल हिंडनबर्ग नाम की कंपनी ने अदानी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। हालांकि तब कंपनी के दावे को गौतम अदानी ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था फिलहाल ताजा आरोपों के बारे में अडानी ग्रुप ने चुप्पी साध रखी है।

मशहूर संगीतकार ए.आर. रहमान ने लिया तलाक, बयान में कही यह बात

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मनोरंजन जगत से बड़ी खबर है। 29 साल की शादी के बाद ए.आर. रहमान ने पत्नी सायरा बानू से तलाक ले लिया है। 19 नवंबर 2024 को एक संयुक्त बयान जारी कर रहमान और उनकी पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक की घोषणा की।

इसी दिन आंधी रात को रहमान ने भी इस बारे में लिखा। उन्होंने कहा, ”हमें उम्मीद थी कि शादी के शानदार 30 साल पार करेंगे लेकिन ऐसा लगता है कि सभी चीज़ों का एक अदृश्य अंत होता है। यहाँ तक कि टूटे हुए दिलों के भार से ईश्वर का सिंहासन भी हिल जाता है। फिर भी इस बिखराव में हम अपने अर्थ की तलाश करते हैं, भले ही टुकड़ों को दोबारा अपनी जगह ना मिले।”

सायरा बानू और एआर रहमान (57) की शादी 1995 में हुई थी। दोनों के तीन बच्चे हैं- बेटियां ख़ातिजा और रहीमा के अलावा एक बेटा अमीन हैं। ऑस्कर और ग्रैमी जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड से सम्मानित मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने संगीत की दुनिया में क़रीब 32 साल पूरे किए हैं। दोनों की शादी का समय भी लगभग इतना ही रहा। एआर रहमान ने 23 साल की उम्र में 1989 में इस्लाम क़बूल किया था।

बिरसा मुंडा जयंती विशेषः ऐसा महानायक योद्धा, जिससे खौफ खाते थे अंग्रेज

birsa mundaबिरसा मुंडा भारत के उस महान सपूत का नाम है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल तब फूंक दिया था, जब उनकी उम्र 25 साल भी नहीं थी। इसके बावजूद बिरसा मुंडा को लेकर अंग्रजों का खौफ ऐसा था कि उन्होंने उन पर पांच सौ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था, जो कि उस वक्त बहुत बड़ी रकम थी। उनके कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब बिहार से अलग होकर सन् 2000 में झारखंड बनना था तो बिरसा मुंडा की जयंती की तारीख़ पर ही झारखंड राज्य की स्थापना की गई।

 बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को मुंडा जनजाति में हुआ था। बिरसा मुंडा का जन्म स्थान खूंटी जिले के उलिहातु गांव में हुआ था। हालांकि तब यह रांची जिले में था। अँग्रेज़ों को कड़ी चुनौती देने वाले बिरसा सामान्य कद-काठी के व्यक्ति थे। उनका क़द केवल 5 फ़ीट 4 इंच था। बिरसा मुंडा की आरंभिक पढ़ाई सालगा में जयपाल नाग की देखरेख में हुई थी। उन्होंने एक जर्मन मिशन स्कूल में दाख़िला लेने के लिए ईसाई धर्म अपना लिया था। कहा जाता है कि उनके एक ईसाई अध्यापक ने एक बार कक्षा में मुंडा लोगों के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया। बिरसा ने विरोध में अपनी कक्षा का बहिष्कार कर दिया। उसके बाद उन्हें कक्षा में वापस नहीं लिया गया और स्कूल से भी निकाल दिया गया।

बाद में उन्होंने ईसाई धर्म का परित्याग कर दिया और अपना नया धर्म ‘बिरसैत’ शुरू किया। जल्दी ही मुंडा और उराँव जनजाति के लोग उनके धर्म को मानने लगे। अंग्रेजों द्वारा भोले-भाले आदिवासी समाज के धर्मांतरण करने के खिलाफ बिरसा मुंडा खड़े हो गए। बिरसा मुंडा ने अपने संघर्ष की शुरुआत चाईबासा से की। यहाँ उन्होंने 1886 से 1890 तक अपने जीवन के चार वर्ष बिताए। वहीं से उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आदिवासी आंदोलन की शुरुआत करते हुए नारा दिया- “अबूया राज एते जाना/ महारानी राज टुडू जाना” (यानी अब मुंडा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज ख़त्म हो गया है।)

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ते हुए बिरसा मुंडा ने अपने लोगों को आदेश दिया कि वो सरकार को कोई टैक्स न दें। वजह यह रही कि 19वीं सदी के अंत में अंग्रेज़ों की भूमि नीति ने परंपरागत आदिवासी भूमि व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया था। साहूकारों ने उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया था और आदिवासियों को जंगल के संसाधनों का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था। इसके खिलाफ मुंडा समाज ने एक आंदोलन की शुरुआत की, जिसे उन्होंने ‘उलगुलान’ का नाम दिया। उस दौरान बिरसा मुंडा अलग राज्य की स्थापना के लिए जोशीले भाषण दिया करते थे। बिरसा अपने भाषण में अपने लोगों को ललकारते हुए कहते थे- “डरो मत। मेरा साम्राज्य शुरू हो चुका है। सरकार का राज समाप्त हो चुका है। उनकी बंदूकें लकड़ी में बदल जाएंगी। जो लोग मेरे राज को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं उन्हें रास्ते से हटा दो।”

अपने लोगो को संगठित कर उन्होंने पुलिस स्टेशनों और ज़मींदारों की संपत्ति पर हमला करना शुरू कर दिया था। कई जगहों पर ब्रिटिश झंडे यूनियन जैक को उतारकर उसकी जगह मुंडा राज का प्रतीक सफ़ेद झंडा लगाया जाने लगा। बिरसा मुंडा और उनके साथियों के इस आंदोलन से अंग्रेज घबराने लगे। उन्हें लगने लगा कि अगर जल्दी ही बिरसा मुंडा के आंदोलन को कुचला नहीं गया तो देश भर में ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ विद्रोह शुरू हो जाएगा। अंग्रेज अधिकारियों ने किसी भी कीमत पर बिरसा मुंडा को पकड़ने की ठान ली। बिरसा मुंडा पर 500 रुपए का इनाम रखा था। यह रकम उस ज़माने में बड़ी रक़म हुआ करती थी।

बिरसा मुंडा के विद्रोह ने अंग्रेजी हुकूमत को झकझोर दिया। 22 अगस्त 1895 को अंग्रेजी हुकूमत ने बिरसा मुंडा को किसी भी तरह गिरफ्तार करने का निर्णय लिया। जिला अधिकारियों ने बिरसा के गिरफ्तारी के संबंध में विचार-विमर्श किया। जिला पुलिस अधीक्षक, जीआरके मेयर्स को दंड प्रक्रिया संहिता 353 और 505 के तहत बिरसा मुंडा का गिरफ्तारी वारंट का तामिला करने का आदेश दिया गया। दूसरे दिन सुबह मेयर्स, बाबु जगमोहन सिंह तथा बीस सशस्त्र पुलिस बल के साथ बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करने चल पड़े। पुलिस पार्टी 8.30 बजे सुबह बंदगांव से निकली एवं 3 बजे शाम को चालकद पहुंची। बिरसा के घर को उन्होंने चुपके से घेर लिया। एक कमरे में बिरसा मुंडा आराम से सो रहे थे। इस तरह बिरसा को पहली बार 24 अगस्त 1895 को गिरफ़्तार किया गया था।

उन्हें शाम को 4 बजे रांची में डिप्टी कलेक्टर के सामने पेश किया गया। रास्ते में उनके पीछे भीड़ का सैलाब था। भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। ब्रिटिश अधिकारियों को आशंका थी कि उग्र भीड़ कोई उपद्रव न कर बैठे। लेकिन बिरसा मुंडा ने भीड़ को समझाया। बिरसा मुंडा के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। मुकदमा चलाने का स्थान रांची से बदलकर खूंटी कर दिया गया। बिरसा को राजद्रोह के लिए लोगों को उकसाने के आरोप में 50/- रुपये का जुर्माना तथा दो वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी गई।

दो साल बाद 30 नवम्बर 1897 के दिन बिरसा को रांची जेल से छोड़ दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद बिरसा मुंडा भूमिगत हो गए और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आंदोलन करने के लिए अपने समर्थकों के साथ गुप्त बैठकें करने लगे। उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे मुंडाओं का शासन लाएंगे तथा अपने लोगों में जागृति पैदा करेंगे। बिरसा मुंडा ने न केवल राजनीतिक जागृति के बारे में संकल्प लिया बल्कि अपने लोगों में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जागृति पैदा करने का भी संकल्प लिया। अपनी जाति की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी। सन् 1899 में उन्हें अपने संघर्ष को और विस्तार दे दिया था। तमाम इतिहासकारों ने इस बात पर मुहर लगाई है कि सन् 1900 आते-आते बिरसा का संघर्ष छोटानागपुर के 550 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैल चुका था। अंग्रेजों को ललकारते हुए साल 1889 में बिरसा मुंडा की सेना ने 89 ज़मीदारों के घरों में आग लगा दी थी।

आदिवासियों का विद्रोह इतना बढ़ गया था कि राँची के ज़िला कलेक्टर को सेना की मदद माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा था। आखिरकार डोम्बारी पहाड़ी पर सेना और बिरसा मुंडा और उनके साथियों की भिड़ंत हुई थी। इतिहास में दर्ज है कि इस मुठभेड़ में सैकड़ों आदिवासियों की मौत हुई थी और पहाड़ी पर शवों का ढेर लग गया था। गोलीबारी के बाद सुरक्षाबलों ने आदिवासियों के शव खाइयों में फेंक दिए थे और कई घायलों को ज़िंदा गाड़ दिया गया था। कहा जाता है कि इस गोलीबारी में क़रीब 400 आदिवासी मारे गए थे, लेकिन अंग्रेज़ पुलिस ने सिर्फ़ 11 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की थी। इस गोलीबारी के दौरान बिरसा भी वहां मौजूद थे, लेकिन वो किसी तरह वहाँ से बच निकलने में कामयाब हो गए।

बिरसा मुंडा को न पाकर अंग्रेज अधिकारी परेशान हो गए और किसी भी तरह बिरसा मुंडा के आंदोलन को खत्म करने के लिए उन्हें पकड़ने की तैयारी में जुट गए। तीन मार्च को अंग्रेज़ पुलिस ने चक्रधरपुर के पास एक गाँव को घेर लिया था। बिरसा के नज़दीकी साथियों कोमटा, भरमी और मौएना को गिरफ़्तार कर लिया गया था, लेकिन बिरसा फिर बच निकले। तभी एसपी रोश को एक झोंपड़ी दिखाई दी थी। इतिहासकारों ने लिखा है कि जब रोश ने अपने बंदूक में लगे संगीन से उस झोंपड़ी के दरवाज़े को धक्का देकर खोला था तो अंदर बिरसा मुंडा झोंपड़ी के बीचों बीच पालथी मार कर बैठे हुए थे। उन्होंने खड़े होकर बिना कोई विरोध किये हथकड़ी पहन लिया। इस तरह अंग्रेजों के हाथ में वो क्रांतिकारी वीर लग गया, जिसने अंग्रजी सरकार की नींव हिला कर रख दी थी।

जब बिरसा राँची जेल पहुंचे तो हज़ारों लोग उनकी एक झलक पाने के लिए वहाँ पहले से ही मौजूद थे। बिरसा पर लूट, दंगा करने और हत्या के 15 मामलों में आरोप तय किए गए थे। जेल में बिरसा को अकेले सबसे दूर एकांत में रखा गया। सिर्फ़ एक घंटे के लिए रोज़ उन्हें सूरज की रोशनी पाने के लिए अपनी कोठरी से बाहर निकाला जाता था। तीन महीने तक उन्हें किसी से मिलने की इजाजत नहीं दी गई। एक दिन बिरसा जब सोकर उठे तो उन्हें तेज़ बुख़ार और पूरे शरीर में भयानक दर्द था। उनका गला भी इतना ख़राब हो चुका था कि उनके लिए एक घूंट पानी पीना भी असंभव हो गया था। कुछ दिनों में उन्हें ख़ून की उल्टियां शुरू हो गई थीं और आखिरकार 9 जून, सन् 1900 को बिरसा ने सुबह 9 बजे दम तोड़ दिया। इस तरह भारत के एक क्रांतिकारी वीर सपूत के शरीर का अंत हो गया, हालांकि उनके सपने आज भी जिंदा है, जिसे पूरा करने के लिए देश में लाखों लोग लगातार आंदोलन कर रहे हैं। बिरसा मुंडा को जल, जंगल, जमीन और सम्मान के लिए चलाए गए अपने आंदोलन के कारण आदिवासी समाज में भगवान का दर्जा हासिल हासिल है।

हरियाणा में आरक्षण के बंटवारे पर मुहर, जानिये किसको कैसे मिलेगा आरक्षण

भाजपा की हरियाणा सरकार ने आरक्षण में वर्गीकरण लागू कर दिया है। वर्गीकरण के तहत अनुसूचित जाति के आरक्षण को दो हिस्सों में बांटने की बात कही गई है। हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने विधानसभा में अपने अभिभाषण में 13 नवंबर को यह घोषणा की। इसके बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी विधानसभा में इस बात को दोहराया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे लागू करने वाला हरियाणा पहला राज्य बन गया है। प्रदेश में अनुसूचित जातियों की स्थिति को पता लगाने के लिए प्रदेश सरकार ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग को नौकरियों में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी का पता लगाने का निर्देश दिया है। इस बारे में प्रदेश सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया है। इसके मुताबिक प्रदेश में अनुसूचित जाति को 20 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। अब इसको 10-10 प्रतिशत के दो हिस्सों में बांट दिया गया है। 10 प्रतिशत आरक्षण एससी समाज की उन वंचित जातियों को मिलेगा, जो पीछे छूट गई हैं। जबकि बाकी का 10 प्रतिशत आरक्षण अन्य अनुसूचित जातियों को मिलेगा।

राज्य सरकार ने एससी समाज की पीछे रह गई जातियों को DSC यानी डिप्राइव शिड्यूल कॉस्ट यानी वंचित अनुसूचित जाति कहा है, जबकि बाकी को OSC यानी अदर यानी अन्य अनुसूचित जाति कहा गया है। हालांकि इन दो हिस्सों में किस जाति को कहां रखा जाएगा, यह अभी तय नहीं है। और यह एससी कमीशन की रिपोर्ट के बाद तय हो पाएगा। आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर जो यह आशंका जताई जा रही थी कि इससे सीटें खाली रह जाएंगी जो सामान्य वर्ग को दे दिया जाएगा, सरकार ने इसको लेकर भी स्थिति साफ की है। सरकार का कहना है कि दोनों वर्गों को बराबर सीटें दी जाएगी। अगर एक वर्ग में काबिल अभ्यर्थी नहीं मिलते तो दूसरे वर्ग को इसका लाभ मिलेगा। न कि किसी अन्य से यह सीटें भरी जाएंगी।

इसी तरह पदों की संख्या विषम यानी 9 रहने पर 5 सीटें वंचित अनुसूचित जातियों को दी जाएगी, जबकि 4 सीटें अन्य अनुसूचित जाति को मिलेगी। उसी विभाग में दुबारा सीटों की संख्या विषम, यानी 9 होने पर इसका अलटा होगा। यानी 5 सीटें अन्य अनुसूचित जातियों को और 4 सीटें वंचित अनुसूचित जातियों को मिलेगी। राज्य सरकार ने साफ किया है कि पहली खाली पोस्ट में वंचित अनुसूचित जातियों को प्राथमिकता दी जाएगी। आरक्षण का यह क्राइटेरिया प्रदेश सरकार की नौकरियों, स्थानीय निकायों एवं शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले के लिए लागू होगा। इस आदेश के बारे में विस्तार से जानकारी हरियाणा के मुख्य सचिव की वेबसाइट पर दी गई है।

राज्य सरकार के इस फैसले के बाद अब सबकी नजर अनुसूचित जाति आयोग की रिपोर्ट पर रहेगी। देखना होगा कि अनुसूचित जाति आयोग की रिपोर्ट में प्रदेश में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व को लेकर क्या सामने आता है। इससे यह पता चल पाएगा कि कौन सी जाति कहां खड़ी है। यह आने वाले दिनों में अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण तो बन ही सकता है।

दलितों ने मंदिर में पूजा की तो ‘भगवान’ को ले गए मनुवादी

संकेतिक चित्रहम लाख एक भारत, श्रेष्ठ भारत कह लें, जाति का जहर न तो भारत को एक होने दे रहा है और न ही श्रेष्ठ बनने देगा। घटना कर्नाटक की है। यहां मंदिर में दलित समाज के लोग घुस गए तो मनुवादी इतने भड़क गए कि भगवान को ही मंदिर से निकाल कर ले गए। घटना 11 नवंबर की है।

प्रदेश की राजधानी बंगलुरु से महज 100 किलोमीटर दूर मंड्या जिला है। यहां के हनाकेरे गांव में कालभैरवेश्वर स्वामी नाम का एक ऐतिहासिक मंदिर है। उत्सव मूर्ति नाम से यहां एक बड़ा कार्यक्रम होता है। गांव के दलित भी इस दौरान इसमें शामिल होना चाहते थे, लेकिन मनुवादी इसकी इजाजत नहीं देते थे। महीने भर तक दलितों और सवर्णों में इस बात को लेकर रस्सा-कस्सी चली। दलित इस कार्यक्रम में और मंदिर में जाने के लिए अड़ गए। सवर्णों के विरोध के बावजूद पूर्व विधायक एम. श्रीनिवास और अधिकारियों ने दलितों को मंदिर में प्रवेश कराया। और पुलिस की सुरक्षा में दलितों ने पहली बार कालभैरवेश्वर स्वामी मंदिर में न सिर्फ प्रवेश किया, बल्कि पूजा अर्चना भी की।

मंदिर में दलितों के प्रवेश पर सवर्ण मनुवादी भड़क गए। पहले उन्होंने मंदिर में लगे नाम पट्टिका को वहां से उखाड़ लिया और फिर भगवान की मूर्ति को मंदिर से बाहर निकाल ले गए। उनका कहना था कि जब दलितों की पूजा के लिए श्री चिक्कम्मा और श्री मंचम्मा देवी का मंदिर बनवाया गया है तो अब दलित श्री कालभैरवेश्वर स्वामी मंदिर में प्रवेश करके हमारी परंपरा कैसे तोड़ सकते हैं। बता दें कि इस गांव में दलितों के लिए दो मंदिर बनाए गए हैं। दलितों को सिर्फ वहीं जाने की इजाजत है।

जातिवाद और सवर्णों द्वारा खुद को श्रेष्ठ समझने का आलम यह है कि उन्होंने साफ कर दिया है कि जब एक बार दलितों को मंदिर में प्रवेश दे दिया गया है तो अब सवर्ण उस मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगे। सोचिए, जातीय अहम कितना बड़ा है। जिस देश में आए दिन दलित उत्पीड़न के दर्जनों मामले रोज हो रहे हों, हो सकता है कि वहां अगड़ी जातियों के लिए ऐसे मामले या ऐसी खबरें आम हो, लेकिन जिस दलित समाज पर यह बीतती है, हर रोज वो किस दर्द से गुजरते हैं, यह वही जानते हैं। और ऐसी घटनाओं पर न तो एक भारत-श्रेष्ठ भारत का नारा देने वाले देश के प्रधानमंत्री कोई बड़ा कदम उठाते हैं, न ही सुप्रीम कोर्ट।

यूपी में सड़क पर हजारों छात्र, जानिये क्या है मामला

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में छात्रों ने जमकर प्रदर्शन किया। विरोध इतना पढ़ गया कि पुलिस ने युवाओं पर जमकर लाठियां चलाई। बिना यह देखे कि वह डंडा किसी लड़के पर गिर रहा है या किसी महिला अभ्यर्थी पर। युवा यूपीपीएससी, पीसीएस और आरओ-एआरओ प्रारंभिक परीक्षा दो दिन कराने का विरोध कर रहे थे। इनकी मांग है कि दो दिन की बजाय परीक्षा एक ही दिन कराई जाए। हालांकि यह विरोध प्रदर्शन पहले से तय था। प्रशासन को लगा कि कुछ छात्र आएंगे प्रदर्शन करेंगे। लेकिन भारत में बेरोजगारी का आलम यह है कि किसी भी वेकैंसी के लिए लाखों अभ्यर्थी होते हैं। लिहाजा युवाओं की भीड़ बढ़ गई और 10 हजार से ज्यादा युवा पहुंच गए।

अब लाठी चार्ज हुई तो नेताओं के बयान तो आने ही थे। अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर भाजपा को जमकर घेरा और युवाओं के साथ होने की बात कही। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा- युवा विरोधी भाजपा का छात्राओं और छात्रों पर लाठीचार्ज बेहद निंदनीय कृत्य है। इलाहाबाद में UPPSC में धांधली को रोकने के लिए अभ्यर्थियों ने जब माँग बुलंद की तो भ्रष्ट भाजपा सरकार हिंसक हो उठी। हम फिर दोहराते हैं कि नौकरी भाजपा के एजेंडे में है ही नहीं। हम युवाओं के साथ हैं।

हालांकि पुलिस के लाठीचार्ज के दौरान प्रयागराज में अभ्यर्थियों और पुलिस के बीच जमकर झड़प हो गई। छात्रों ने पुलिस के लाठीचार्ज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। खबर है कि नाराज अभ्यर्थी यूपी लोकसेवा आयोग के ऑफिस में घुस गए। अभ्यर्थियों ने आयोग के सामने “एक दिन, एक शिफ्ट, नॉर्मलाइजेशन नहीं” की मांग रखी है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से देश में बेरोजगार युवाओं की फौज का सच सामने ला दिया है। साथ ही यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या अब देश में ऐसा वक्त आ गया है कि छात्रों का अपनी मांग को लेकर विरोध करना भी सत्ता को गंवारा नहीं है। यूपी में आने वाले दिनों में विधानसभा के उप चुनाव है। लाठी चार्ज से नाराज इन युवाओं का विरोध यूपी के उपचुनाव में भाजपा के लिए भारी पर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया में बौद्ध आंदोलन, मेलबोर्न में बौद्ध समाज ने किया शानदार कार्यक्रम

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनायाऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया। यह कार्यक्रम मेलबर्न बुद्धिस्ट सेंटर और भारतीय बौद्ध समुदाय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इस दौरान बौद्ध समाज ने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और तथागत बुद्ध के विचार को दोहराया। इस आयोजन में हर उम्र के लोग पहुंचे। इसमें बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग समान रूप से शामिल थे।

14 अक्टूबर 1956 को भारत के महाराष्ट्र राज्य के नागपुर शहर में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने पांच लाख से ज्यादा अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। इसके ठीक दो दिन बाद, 16 अक्टूबर 1956 को धम्म दीक्षा का कार्यक्रम महाराष्ट्र के ही चंद्रपुर में भी आयोजित हुआ। चंद्रपुर में यह समारोह जिस समिति ने आयोजित किया था, उसमें दिवंगत डॉ. जमनादास खोबरागड़े की प्रमुख भूमिका थी।

19 अक्टूबर के इस कार्यक्रम के लिए, दिवंगत डॉ. जमनादास खोबरागड़े के पुत्र डॉ. प्रशांत खोबरागड़े भी सिडनी से मेलबर्न पहुंचे थे। इस दौरान अपने संबोधन में उन्होंने 1956 में चंद्रपुर में हुई ऐतिहासिक घटना के बारे में अपने पिता द्वारा सुने गए किस्से को साझा किया। डॉ. संजय लोहट ने डॉ. अंबेडकर की पुस्तक “द बुद्ध एंड हिज धम्मा” को पढ़ने को लेकर अपना अनुभव साझा किया। इस दौरान मौजूद स्वरूप लांडगे ने भी डॉ. आम्बेडकर के आंदोलन में शामिल होने वाली अपने परिवार के सदस्यों के अनुभवों को साझा किया।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया

 सभा को संबोधित करने वाले प्रमुख अतिथियों में डॉ. संजय लोहट, डॉ. प्रशांत खोबरागड़े, धम्मचारी सिलदास, श्री स्वरूप लांडगे शामिल थे। बता दें कि धम्म दीक्षा दिवस या धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस भारत के बौद्धों द्वारा हर साल मनाया जाता है। जहां तक मेलबर्न बुद्धिस्ट सेंटर की बात है तो यह त्रिरत्न बौद्ध समुदाय द्वारा चलाया जाता है। इसे पहले फ्रेंड्स ऑफ द वेस्टर्न बौद्ध ऑर्डर (FWBO) के नाम से जाना जाता था। यह एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है जो बौद्ध धर्म के सिद्धांतों दुनिया भर में पहुंचाने के लिए काम करता है।

इस दौरान ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय बुद्धिस्ट समाज ने इस कार्यक्रम में सहभागिता की। आयोजकों ने दलित दस्तक को इसकी तस्वीरें साझा की है, आप खुद देखिए झलकियां- ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय के बच्चों ने केक काटकर 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवनेर्तन दिवस मनाया। इस दौरान आयोजन में शामिल महिलाएं

यूपी उप चुनाव में जानिये कहां से कौन होगा बसपा उम्मीदवार

उत्तर प्रदेश के 9 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। बसपा ने कुंदरकी सीट से रफतउल्ला उर्फ नेता छिद्दा को टिकट दिया है, जबकि मझवां से दीपू तिवारी, कटेहरी से अमित वर्मा, मीरापुर से शाह नजर, गाजियाबाद से पीएन गर्ग और करहल से अवनीश कुमार शाक्य को अपना उम्मीदवार बनाया है।

दो सीटों पर बसपा ने अपना प्रत्याशी बदल दिया है, इसमें सीसामऊ और फूलपुर सीट है। फूलपुर से पहले शिवबरन पासी को टिकट दिया गया था, लेकिन बाद में वहां से बसपा ने जितेन्द्र ठाकुर को उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह सीसामऊ से पहले रवि गुप्ता, फिर उनकी पत्नी को टिकट देने की चर्चा चली लेकिन फिर मंगलवार 22 अक्तूबर को वीरेन्द्र शुक्ला को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। अखिलेश यादव की सीट करहल विधानसभा के लिए बसपा ने अवनीश कुमार शाक्य को मैदान में उतारा है। खैर सीट पर प्रत्याशी का नाम दलित दस्तक के पास फिलहाल नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती के निर्देश पर बसपा के उम्मीदवारों ने मंगलवार 22 अक्तूबर से ही नामांकन शुरू कर दिया है।

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को सभी सीटों पर प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। चर्चा है कि आकाश आनंद को भी चुनाव प्रचार में उतारा जा सकता है। बता दें कि मिल्कीपुर सीट पर अभी चुनाव का ऐलान हीं हुआ है। नौ सीटों पर वोटिंग 13 नवंबर को होगी, जबकि नतीजे 23 नवंबर को आएंगे। जिन सीटों पर उप चुनाव होना है, इनमें मैनपुरी की करहल, कानपुर की सीसामऊ, प्रयागराज की फूलपुर, अंबेडकरनगर की कटेहरी, मिर्जापुर की मझवां, अयोध्या की मिल्कीपुर, गाजियाबाद सदर, अलीगढ़ की खैर सीट, मुजफ्फरनगर की मीरापुर और मुरादाबाद की कुंदरकी सीट शामिल है।

हसदेव अरण्य कटाई पर अनुसूचित जनजाति आयोग का बड़ा खुलासा

 रायपुर। (रिपोर्टर- जयदास मानिकपुरी) छत्तीसगढ़ की हसदेव अरण्य क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट जारी की है, जिसमें खुलासा किया गया है कि इस कटाई के लिए दी गई अनुमति फर्जी ग्राम सभाओं के आधार पर ली गई थी। आयोग ने स्वीकार किया है कि जिन ग्राम सभाओं का उल्लेख किया गया था, वे वास्तविक नहीं थीं और नियमों का उल्लंघन करते हुए अनुमति दी गई थी। यह रिपोर्ट हसदेव अरण्य के वन क्षेत्र और वहां के आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन के विरोध में लंबे समय से हसदेव बचाव संघर्ष समिति आंदोलनरत है, जिसका नेतृत्व आलोक शुक्ला जैसे पर्यावरण कार्यकर्ता कर रहे हैं। आलोक शुक्ला और समिति ने कई मुद्दों पर सवाल उठाए हैं, उन्होंने कहा हसदेव अरण्य एक समृद्ध जैव विविधता वाला क्षेत्र है, जहां कई वन्य जीव-जंतु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। खनन से इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय रहते हैं, जिनकी आजीविका जंगलों पर निर्भर है। खनन के लिए इन समुदायों की ज़मीनें छीनी जा रही हैं और उनके वन अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। आलोक शुक्ला कहना है कि खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने में वन अधिकार अधिनियम का पालन नहीं किया गया।

इस मुद्दे को लेकर संघर्ष करने वाले एक्टिविस्ट का कहना है कि राज्य के हसदेव अरण्य में बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के खनन की अनुमति दी जा रही है। हसदेव अरण्य क्षेत्र में कई जल स्रोत हैं, जो आसपास के क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराते हैं। खनन से इन जल स्रोतों पर भी खतरा मंडरा रहा है, जिससे जल संकट उत्पन्न हो सकता है। आलोक शुक्ला और उनकी समिति का कहना है कि सरकार को आर्थिक लाभ के बजाय पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

आदिवासी समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क्षेत्र न केवल उनके जीवन और आजीविका से जुड़ा है, बल्कि इस वन क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्व भी है। ग्राम सभा का कहना है कि फर्जी तरीके से सारा काम हुआ है। इस पुष्टि के बाद राज्य सरकार और प्रशासन पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। अब देखना यह होगा कि इस मुद्दे पर सरकार क्या कदम उठाती है और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है।

भाजपा नेता ने बहनजी पर की जातिवादी टिप्पणी, बसपा ने दर्ज कराया FIR, अब योगी की पुलिस पर निगाहे

भाजपा नेता रुद्र प्रताप सिंह गौर ने बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ की जातिवादी टिप्पणीभाजपा का एक नेता है। नाम है रुद्र प्रताप सिंह। इसी रुद्र प्रताप सिंह ने यूपी की चार बार की मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती पर जातिवादी टिप्पणी की है। घटना 17 अक्टूबर की है। झांसी जिले के टहरौली क्षेत्र में इस दिन दशहरा मिलन समारोह के दौरान भाजपा नेता ने पूर्व सीएम सुश्री मायावती को लेकर जातिसूचक टिप्पणी की थी। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में रुद्र प्रताप सिंह कह रहा है कि न वो मीडिया से डरता हैं, न मीडिया के पिता जी से। उसका कहना है कि हमारी आदत है बोलने की। लिख देना, जो तुम्हे लिखना हो। चैलेन्ज है हमारा। हम पर बहुत मुकदमे हैं। वह सरकार और प्रशासन से डरना तो दूर, उन्हें सीधी चुनौती देता है। मंच से कहता है कि हमने चौराहे पर दारोगा को मारा था। हमारी आदत खराब है।

वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है कि इतनी बात कहने के बाद बसपा के शासन काल के बारे में बोलते हुए पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ जातिसूचक आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहा है। इसके बाद आक्रोशित बसपा कार्यकर्ताओं ने उसके खिलाफ केस दर्ज कराया है। मुकदमा बसपा जिलाध्यक्ष अमित वर्मा की शिकायत पर केस दर्ज किया गया है। डीएम को दिए ज्ञापन में नामजद किए गए आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी करने की मांग की गई है। बसपा कार्यकर्ताओं ने ज्ञापन में कहा कि यदि नामजद किए गए व्यक्ति की जल्द गिरफ्तारी नहीं की गई तो वे सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।

अब देखना होगा कि योगी आदित्यनाथ की सरकार और पुलिस इस मामले में क्या कदम उठाते हैं। एक पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ जातिवादी टिप्पणी के मामले में उसे जेल भेजा जाता है, या फिर उसका कहना सही है कि वह किसी से नहीं डरता। क्योंकि खबर के मुताबिक इस पूरी घटना का वीडियो साक्ष्य मौजूद है। तो अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री और एक राष्ट्रीय पार्टी की अध्यक्ष के मामले में पुलिस कड़ा कदम नहीं उठाती तो समझा जा सकता है कि आम दलितों के मामले में पुलिसिया रवैया क्या रहता होगा।

हरियाणा में दलितों को बांटने की साजिश शुरू!

हरियाणा। राजनीतिक दलों को दलित समाज को बांटने और राज करने का नया फार्मूला मिल गया है। हरियाणा में तीसरी बार सत्ता में आते ही भाजपा की सरकार ने आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला ले लिया। 18 अक्तूबर को अपनी पहली कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आरक्षण में उप-वर्गीकरण पर मुहर लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि हम इसे आज से ही लागू करते हैं। सीएम सैनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में राज्यों को अधिकार दिया था। उन्होंने कहा कि हरियाणा सरकार अब अनुसूचित जातियों की जो जातियां वंचित रह गई हैं, उनके लिए कोटा बनाकर उन्हें आरक्षण देगी।

हरियाणा सरकार के इस फैसले पर तमाम दलित एक्टिविस्ट ने सवाल उठाया है और उसे दलितों को बांटने की साजिश कहा है। इस मुद्दे पर एक अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आने के बाद से ही वर्गीकरण का पुरजोर विरोध करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे षड्यंत्र कहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बयान जारी कर कहा कि-

हरियाणा की नई भाजपा सरकार द्वारा एससी समाज के आरक्षण में वर्गीकरण को लागू करने अर्थात आरक्षण कोटे के भीतर कोटा की नई व्यवस्था लागू करने का फैसला दलितों को फिर से बांटने व उन्हें आपस में ही लड़ाते रहने का षड़यंत्र है। यह दलित विरोधी ही नहीं बल्कि घोर आरक्षण विरोधी निर्णय है। वास्तव में जातिवादी पार्टियों द्वारा एससी-एसटी व ओबीसी समाज में ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति है।

इस पूरे मामले में जिस तरह हरियाणा सरकार ने तेजी दिखाई है, वह भी कई सवाल खड़े करती है। क्योंकि वर्गीकरण के फैसले के दौरान मुख्यमंत्री ने किसी तरह के आंकड़े को पेश करने या फिर दलित समाज की जातियों के आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन का सर्वेक्षण करने का जिक्र नहीं किया है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था। सवाल यह है कि बिना अनुसूचित जातियों के आर्थिक और सामाजिक प्रगति का सर्वेक्षण किये पहली ही कैबिनेट मीटिंग में वर्गीकरण की घोषणा कर देना कितना सही है?

हरियाणा में शपथ ग्रहण के दौरान राज्यपालों को भाजपा ने बना दिया ‘राजनेता’, चंद्रशेखर ने खोला मोर्चा

शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ नायब सिंह सैनीहरियाणा में नए सरकार के शपथ ग्रहण के दौरान भाजपा ने अपनी ताकत दिखाई। प्रधानमंत्री मोदी समेत तमाम दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। लेकिन इस दौरान राज्यपालों की मौजूदगी को लेकर भाजपा कठघरे में है। सवाल उठ रहा है कि भाजपा ने राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा गिराई है। आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे पर भाजपा को जमकर घेरा है। उन्होंने एक्स पर एक लंबा पोस्ट लिख भाजपा को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने लिखा-

कल (17 अक्टूबर, 2024) चंडीगढ़ में हरियाणा प्रदेश भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री जी के शपथ ग्रहण समारोह में सरेआम संविधान की धज्जियां उड़ाकर एक बार फिर ये साबित कर दिया गया कि मौजूदा सरकार के लिए संवैधानिक पद महज कठपुतली बनकर रह गए हैं। एक तरफ भाजपा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे दूसरी तरफ आजादी के बाद पहली बार राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद को तमाशबीन बनाकर बैठा दिया गया। सोचिए संविधान निर्माता परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर होते तो क्या ये सब तमाशा देखकर उनको दुख नहीं होता कि कि हमने भारतीय राजव्यवस्था में राज्यपाल के पद का सृजन क्या इसीलिए कराया?

शपथ ग्रहण में पहली बार कई राज्यों के राज्यपाल (गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस, दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना) को बुलाया गया, इससे साफ हो गया है कि भाजपा ने संवैधानिक पदों का राजनीतिकरण महज अपनी ब्रांडिंग के लिए किया है।

संविधान में राज्यपाल का पद राज्य सरकार के ऊपर एक निष्पक्ष भूमिका के लिये राज्य के संवैधानिक मुखिया के रूप में सृजित किया गया था, लेकिन कल मुख्यमंत्री जी के शपथ ग्रहण समारोह में तमाम राज्यों के राज्यपाल और एक उपराज्यपाल को बुलाकर एक मंच पर बैठाना यह साबित करता है कि वो राज्यपाल और उपराज्यपाल बनने के बाद, आज भी भाजपा के कार्यकर्ता हैं न कि संविधान में वर्णित संवैधानिक मुखिया।

जब भी केन्द्र की भाजपा सरकार पर संविधान के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगते हैं तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी संविधान की रक्षा और उसके मूल्यों को बनाए रखने की बात करते हैं लेकिन ये सब उनकी ही मौजूदगी में हो रहा था या यह कह सकते हैं कि उनके के ही दिशा-निर्देशन में हो रहा था।

ऐसे में संविधान को माथे पर लगाने वाले यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को जवाब देना चाहिये कि संविधान की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का जिम्मेदार कौन है?

हरियाणा में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग, शपथ ग्रहण के बहाने दिखाई ताकत

हरियाणा में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साथ मंच पर मौजूद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और अन्य नेताकांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देश के वंचितों को प्रतिनिधित्व देने को एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। हरियाणा में सरकार गठन के दौरान भाजपा भी इस दबाव में साफ दिखी। हरियाणा में भाजपा ने तीसरी बार सरकार बना ली है। नायब सिंह सैनी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उन्हें पंचकूला के दशहरा मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शपथ ली। सैनी के साथ 13 अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ली। इस लिस्ट में जिन लोगों ने मंत्री के रूप में शपथ ली है, उससे साफ जाहिर है कि भाजपा ने इसमें सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है।

वर्गों के आधार पर देखें तो मंत्रिमंडल में दो जाट, दो ब्राह्मण, एक राजपूत, एक गुर्जर, दो वैश्य, दो दलित और दो यादव समाज के नेताओं को मंत्री बनाया गया है। मंत्रिमंडल में दो महिलाएं कैबिनेट मंत्री हैं। तो वहीं मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी खुद ओबीसी समाज के हैं। दलित चेहरे के रूप में कृष्ण कुमार बेदी और कृष्ण लाल पंवार ने शपथ ली।

हरियाणा की जीत भाजपा के लिए कितनी महत्पूर्ण है, यह इसी से समझा जा सकता है कि शपथ ग्रहण समारोह में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद रहे। उनके साथ गृह मंत्री अमित शाह, नितिन गडकरी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। तो इसी बहाने भाजपा ने एनडीए के रूप में भी अपनी ताकत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। एनडीए गठबंधन से आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्राबाबू नायडू, महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भूपेंद्र पटेल, ललन सिंह, चिराग पासवान मौजूद रहे।

साफ है कि हरियाणा में शपथ ग्रहण समारोह के जरिये भाजपा और एनडीए ने महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव का बिगुल भी फूंक दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा ने जिस तरह तमाम जातियों को प्रतिनिधित्व दिया है, ऐसे में राहुल गांधी और कांग्रेस इसका जवाब कैसे देते हैं।

झारखंड चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ी, हेमंत सोरेन ने गिनाई उपलब्धियां

हेमंत सोरेनआज (16 अक्टूबर) जेल से वापस लौटकर राज्य की कमान संभाले 100 दिन पूरे हुए हैं। साथ ही कल चुनाव आयोग द्वारा झारखण्ड में विधानसभा चुनाव की घोषणा भी हुई है। दिसंबर 2019 में झारखण्ड की अपनी महान जनता के आशीर्वाद से मैंने राज्य की बागडोर संभाली। मकसद एक ही था कि झारखण्ड रूपी पेड़ को सिंचित कर इसकी जड़ें मजबूत करना। इस पेड़ को भाजपा ने 20 वर्षों तक दोनों हाथों से लूटने का काम किया था। इसे सुखाने का काम किया था। इसकी जड़ों पर मट्ठा डालने का काम किया था।

 यही कारण था कि 20 वर्षों के युवा झारखण्ड में हमारे गरीब, वंचित और शोषित वर्ग के लोग सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए तरसते थे, हमारे आदिवासी, दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक खोई हुई पहचान के लिए तरसते थे, हमारे राज्य के नौनिहाल अच्छी शिक्षा के लिए तरसते थे, हमारे होनहार युवा नौकरी और रोजगार के लिए तरसते थे, हमारे मेहनतकश किसान कर्ज के बोझ तले दबे जाते थे, हमारी मातायें-बहनें मान-सम्मान और स्वाभिमान के लिए तरसतीं थी, हमारे मजदूर भाई-बहन अपनी पहचान के लिए तरसते थे, हमारे जल-जंगल-जमीन अपनी अस्मिता के लिए तरसते थे। झारखण्ड की जड़ों को सशक्त करने का महती प्रयास जो आपने और हमने मिलकर शुरू किया है, उसे अभी कई पड़ाव पार करने हैं। मार्च 2020 में पूरे देश में जब लॉकडाउन लगा, पूरे देश को जब पता चला कि लाखों-करोड़ों लोग अपने घरों से दूर, जीवन और जीविका की लड़ाई लड़ने को विवश हो चले हैं, तो आपने और हमने अपने राज्य के लाखों प्रवासी लोगों को झारखण्ड वापस लाने का बीड़ा उठाया।

सखी मंडल से जुड़ी दीदी-बहनों ने अपनी जान की परवाह किये बगैर, राज्य वापस लौट रहे लोगों को पौष्टिक खाना खिलाने के काम किया। यह आपका साथ ही था कि झारखण्ड देश के पहला राज्य था जो पहली ट्रेन, पहले प्लेन से अपने लोगों को घर पहुंचा रहा था। विरासत में मिली लचर स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ करते हुए पूरी सरकार और प्रशासन ने सुविधाओं को दुरुस्त करना शुरू किया, आपके हौसलों के बगैर यह सब कहां संभव था। यही कारण रहा कोरोना के समय पूरे देश में ऑक्सिजन सप्लाई करने वाला भी झारखण्ड पहला राज्य बना। कोरोना में जीवन के साथ-साथ जीविका बचाना भी बहुत जरूरी था, तो हमने तुरंत बिरसा हरित ग्राम योजना शुरू की, नीलांबर-पीताम्बर जल समृद्धि योजना शुरू की, पोटो हो खेल विकास योजना भी हमने तभी शुरू भी किया।

मनरेगा में काम रहे लोगों को वाजिब मजदूरी मिले इसके लिए हमने मजदूरी दर भी बढ़ाने का काम किया। गरीब, वंचित और शोषित वर्ग के लोगों की सामाजिक सुरक्षा जब तक सुनिश्चित नहीं होती, उनका रोटी-कपड़ा और मकान सुनिश्चित नहीं होता, तब तक कोई राज्य आगे नहीं बढ़ सकता है। इसलिए हमने हर वर्ष राज्य के कोने-कोने में सरकार आपके द्वार के महाअभियान के तहत लाखों-करोड़ों राज्यवासियों को सर्वजन पेंशन योजना, हरा राशन कार्ड, सोना सोबरन धोती साड़ी योजना, अबुआ आवास योजना, जैसी कई कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा। लाखों परिवारों को हमने 200 यूनिट मुफ्त बिजली और बकाया बिजली बिल माफ कर महंगाई के इस दौर में थोड़ी राहत देने का भी काम किया। राज्य के हमारे लाखों मेहनती किसानों का 2 लाख रुपए तक ऋण माफ हुआ। केसीसी, मुख्यमंत्री पशुधन योजना, बिरसा सिंचाई कूप योजना, धान खरीद, किसान पाठशाला जैसी योजनाओं से राज्य के लाखों किसानों को सशक्त करने का प्रयास शुरू हुआ।

 देश-विदेश में फंसे या मदद मांग रहे श्रमिक भाइयों और बहनों को भी संवेदनशीलता के साथ हमेशा मदद पहुंचाई गयी। राज्य की हमारी लाखों माताओं-बहनों और बेटियों के मान, सम्मान और स्वाभिमान से जोड़ने के लिए उन्हें मंईयां सम्मान योजना, हजारों करोड़ के बैंक क्रेडिट लिंकेज, फूलो झानो आशीर्वाद अभियान, सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना जैसी योजनाओं से जोड़ने का काम हुआ। दिसम्बर से 18-50 वर्ष की माताओं-बहनों को 2500 रुपए की सम्मान राशि भी मिलने लगेगी। अपने राज्य के नौनिहालों के लिए हमने सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की श्रृंखला शुरू की, जो पंचायत स्तर तक जाएगी। प्री और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की राशि दो से तीन गुना बढ़ायी गयी। गुरुजी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, मरङ्ग गोमके ओवरसीज स्कॉलरशिप, साइकिल वितरण, आदि योजनाओं के जरिए उनके सपनों को पंख देना का काम किया है, आप और हमने मिलकर।


झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा सोशल मीडिया एक्स पर लिखा गया

विपश्यना से लौटे पत्रकार यशवंत ने साझा किया शानदार अनुभव

विपश्यना सेंटर की तस्वीरें, फोटो क्रेटिड- यशवंत सिंह (भड़ास4मीडिया)मैंने हरियाणा के सोहना स्थित धम्मा सेंटर में भिक्षु के रूप में दस दिन बिताए। यहां न बोलना था, न आंखें मिलानी थी किसी से, जो मिल जाए वो खाना था। काम के नाम पर दिन भर ध्यान करना साधना करना। बाहरी दुनिया से एकदम कट कर जीना।

इन्हीं दिनों में कश्मीर और हरियाणा में चुनाव हुए, रिजल्ट आए लेकिन हम लोगों के कानों तक केवल तेज पटाखों के फटने की आवाजें आईं। जीते चाहें जो, पटाखे तो फूटने ही थे। पटाखों के फूटने से कौन जीता कौन हारा, इसका अंदाजा नहीं लगा सकते। हमें अंदाजा लगाना भी नहीं था क्योंकि हमारा दिमाग बाहर की दुनिया की गतिविधियों हलचलों से बिलकुल डिटैच कर दिया गया था। हम जब चलने को होते तो धीरे धीरे चलते क्योंकि ऐसा हमसे कहा गया था। किसी जीव की हत्या न हो जाए। ये देखना था। चींटी चूंटा टाइप कोई छोटा और विजिबल जीव हमारे कदमों के तले न दब जाए। हर कदम संभले हुए थे। हर पल हमें अपने मन की खबर थी क्योंकि हम मन को काबू में करने का खेल खेल रहे थे।

हर एक के जीवन को नियंत्रित करता है मन। मन बेकाबू और मतवाला घोड़ा होता है। वो हमें डिक्टेट करता है, हमें गाइड करता है। इसी मन को हमें काबू में करना था। सांस का आलंबन लेकर मन पर लगाम लगाना शुरू किया गया। पहले दिन सिर्फ सांस की आवाजाही पर खुद को केंद्रित करना था। ऐसे ही अलग अलग दिनों में अलग अलग टास्क। तीसरे दिन मेरी आंखों से पानी गिरा। अंदर आलोड़न हुआ। लगा सिर के सिरे से कुछ निकलने को आतुर है। कुछ मथ रहा है सिर के आर-पार होने को। पांचवें दिन मेरे बगल वाले साधक को भयानक भय लगा। वह एकदम पिन ड्राप साइलेंस के दौरान हड़बड़ाकर उठा और आचार्य के कदमों के तले बैठ गया। सन्नाटा पहले जैसा ही कायम रहा। सब डूबे हुए अपने अंदर की दुनिया में। ध्यान खत्म हुआ तो आचार्य जी ने पूछा- क्या हुआ? उसने धीरे से बोला- रीढ़ की हड्डी में ऐसी हलचल मची, ऐसी सनसनाहट हुई कि लगा जैसे कोई स्ट्रोक पड़ने वाला हो, मैं डर गया, भाग कर आपके सामने आ गया कि कहीं कुछ हुआ तो आप देख लेंगे उसे। आचार्य बोले- जाइए अपनी सीट पर, कहीं कुछ न होगा, पुराने विकार हैं जो निकल रहे हैं, बस समता भाव बनाए रखिए, सूक्ष्म संवेदना या स्थूल संवेदना, किसी भी स्थिति में आप द्रष्टा भाव बनाए रखेंगे, उसमें शरीक नहीं होंगे।

विपश्यना सेंटर में एक साथी के साथ यशवंत (चश्मे में)- फोटो क्रेटिड- यशवंत (भड़ास4मीडिया)मुझसे बहुत लोग पूछ चुके क्या हुआ। कैसे हुआ। कैसा लग रहा है। क्या चेंज पा रहे हैं। मैं उन्हें कैसे वो सब पूरा पूरा बताऊं जो मैं फील कर रहा रहूं, जो हासिल कर ले आया हूं। चलिए, थोड़ा कोशिश करता हूं बताने की।

हम सब लोग भागे जा रहे हैं। अचानक एक दिन हमारी बेकाबू स्पीड पर ब्रेक लगाया गया। रोका गया, फिर उलटी दिशा में चलने के लिए कह दिया गया। तो ये जो ब्रेक लगना था, रोकना था, वह शुरुआती दो दिन में घटित हुआ। बाहर की दुनिया और उसकी दिनचर्या से फिजिकली-मेंटली डिटैच होने में दो दिन लगे। पैर बांधकर लगातार देर तक बैठने और इसके चलते होने वाले दर्द को साधने में दो दिन लगे। फिर हमें अंदर प्रवेश कराया गया। पहले स्थूल मन को सूक्ष्म बनाने की प्रक्रिया शुरू कराई गई। ये बड़ा विकट काम है। मन बार बार सांसों से छिटक कर बाहर की दुनिया में कूद पड़े। उसे पकड़ पकड़ कर लाना पड़ता। बताया गया कि अगर एक मिनट तक लगातार सांसों पर कंसंट्रेट कर लेते हैं तो ये अच्छी प्रगति है क्योंकि मन एक मिनट तक सांसों पर रुक ही नहीं सकता, शुरुआत में। वो आपकी सारी कुंडली सारे इतिहास सारे अतीत सारे भविष्य में कूदफांद कर आपको उकसाता रहेगा कि कहां फंसे हो चक्कर में। लेकिन हमें मन के चक्कर में नहीं फंसना है बल्कि उसे अपने चक्कर में फांसना है। उसे सांसों से बांधे रखना है।

सूक्ष्म मन को स्कैनर बनाकर अगले कुछ दिन शरीर के अंग प्रत्यंग को विविध तरीके से स्कैन करने का कार्यक्रम हुआ। इसी दरमियान हर एक को अलग अलग अवस्था में कुछ खास किस्म की अनुभूतियां हुईं। हम जो कसा हुआ एकल सुगठित शरीर लेकर विपश्नयना सेंटर आए थे, वह अब अलग अलग हिस्सों में तब्दील होने लगा था। मन को समझ में आने लगा कि ये शरीर कोई एक नहीं है बल्कि ये खुद में एक ब्रह्मांड है। जगमग करते संवेदना देते एटम से निर्मित। सिर से लेकर पांव तक हर इंच पर एक धड़कन है, एक संवेदना है। लगा जैसे कोई असेंबल्ड सिस्टम है जो सांसों के सहारे चल रहा है।

हमने हरामी मन को हमेशा बाहरी दुनिया की दुनियादारी में लगाए रखा। उसे आंतरिक दुनिया में ले जाना और साध पाना बड़ा मुश्किल था। मन ही मन में मन को गरियाता रहा कि आखिर वो सांसों को छोड़ कहां कहां जाकर क्या क्या बातें याद दिलाता बताता रहता है। कभी कभी उब जाते। पैरों का दर्द, पीठ का दर्द, मन की खदबदाहट सब मिलाकर ऐसा माहौल बनाता कि हे भाई ये कहां तुम आकर फंस गए हो। पर ये समझ में आ रहा था कि आगे कुछ नई और अलग अनुभूतियां हैं, बस इस स्टेज को धैर्य से झेल लो, पार कर लो।

स्वर्गीय सत्यनारायण गोयनका के निर्देशन में ये विपश्यना शिविर चला। उनके आडियो वीडियो निर्देशों संवादों गायन उदबोधन प्रवचन के जरिए सब कुछ संचालित होता रहा। इस पूरे आयोजन के लिए एक माडरेटर की जरूरत पड़ती है जिसके लिए एक जिंदा आचार्य जी को काम पर रख लिया जाता है। हमारे बैच वाले शिविर को आचार्य कौशल भारद्वाज माडरेट किए। माडरेशन में भी काम सिर्फ इतना कि सत्यनारायण गोयनका के प्रवचन के आडियो वीडियो का बटन आन आफ करना।

हम लोग इंतजार करने लगे कि भवतु सब्ब मंगलम कब बजे और शिविर खत्म हो। क्योंकि बैठे बैठे पैर दुख जाते। सांस और देह को मन से स्कैन करते करते मन भर जाता। ज्यों भवतु सब्ब मंगलम बजने लगता, सब समझ जाते कि अब साधु साधु साधु कह कर शिविर खत्म करने का वक्त हो गया है। मन में प्रसन्नता होती।

सुबह चार बजे सायरन बजता। उसके बाद धम्म सेवक घंटी लेकर कमरे कमरे के बाहर बजाते घूमते। धम्म सेवक वो बनाए जाते जो पहले विपश्यना शिविर अटेंड कर चुके होते हैं और भविष्य के विपश्यना शिविरों में धम्म सेवक बनने के लिए लिखित रूप से लिखकर देते। हर शिविर के खात्म पर एक फीडबैक फार्म मिलता जिसमें एक कालम भविष्य के शिविरों के लिए धम्म सेवक के रूप में सेवा देने पर सहमति असहमति देने का भी होता है।

साढ़े चार बजे तक हम सबको धम्मा हाल सामूहिक साधना के लिए पहुंचना होता। साढ़े छह बजे नाश्ता के लिए सायरनधम्मा हाल में वीडियो सेशन, फोटो क्रेटिड- यशवंत (भड़ास4मीडिया) बजता। स्नान और आराम के बाद आठ बजे से फिर धम्मा हाल के लिए सायरन बज जाता। ग्यारह बजे लंच के लिए सायरन बजता। एक बजे से पांच बजे तक धम्मा हाल में साधना करते। पांच बजे डिनर के लिए सायरन बजता। पुराने साधकों को डिनर में सिर्फ नीबू पानी दिया जाता।

खाने पीने का प्रबंध गजब लाजवाब। बहुत विविधता। अनार, सेब, केला, पनीर की सब्जी, पोहा, मिठाई, हलवा, तरह तरह की सब्जियां, दूध… मतलब ये कि आप को न प्रोटीन की कमी होगी न किसी किस्म के खाने की कमी महसूस होगी। मैं सुबह शाम खाने के बाद लास्ट में एक गिलास दूध में हल्दी डालता, इसबगोल डालता, केला काट काट डालता, चीनी मिलाता और इसे खा पी जाता। ये कार्यक्रम दसों दिन चला। बड़ा आनंद आया। मेरा वजन दो से तीन किलो बढ़ गया इन दस दिनों में। दस दिन में किस किस तरह का स्वीट डिश मिला, देखिए लिस्ट- पेठा, इमरती, स्पंज वाला रसगुल्ला, खीर, हलवा, बेसन लड्डू, लौकी की देसी घी वाली मिठाई और सेवई।

सुबह से शाम तक एक एक घंटे तीन बार ऐसा ध्यान किया जाता जिसमें सबसे अपेक्षा की जाती कि वे इस एक एक घंटे में अपने शरीर को तनिक न हिलाएंगे, एकदम बुत बन जाएंगे। सब लोग ये कर नहीं पाते। मैं तीन चार बार ऐसा कर पाया। इस काम को अधिष्ठान बोला जाता है।

इन दस दिनों में दुनिया मेरे लिए म्यूट मोड पर चली गई थी। मैं सीख रहा था कि सब कुछ अनित्य है। अनिच्च! हम जीवन भर भूत काल या भविष्य काल में जीते हैं और इन दो भावों को जीते हैं- राग और द्वेष।

भारत में विपश्यना को लाने वाले आचार्य एस.एन गोयनकाराग में सारी आकांक्षाएं मोह माया बंधन शामिल है। द्वेष में समस्त घृणा गुस्सा साजिश! इन दो भावों के हम भोक्ता होते हैं। भोक्ता भाव से जीते हैं। हमे सिखाया गया कि भोक्ता भाव नहीं, द्रष्टा भाव साक्षी भाव सम भाव समता भाव में जीना है रहना है और ऐसा सांसों के जरिए मन को स्थूल से सूक्ष्म करके किया जा सकता है। इसे लगातार अभ्यास से कर लिया जाएगा तो नए पुराने संस्कार उर्फ संखारा नष्ट होने लगते हैं। हमारे मन के अनकांसस माइंड में पत्थर के लकीर की तरह दर्ज राग द्वेष की रेखाएं खत्म होने लगती हैं।

विपश्यना शिविर में नब्बे प्रतिशत प्रैक्टिकल होता है। विपश्यना शिविर में हर धर्म के लोग शामिल होते हैं। धर्म की यहां व्याख्या ये की गई कि असली धर्म व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि गुण केंद्रित होता है। विपश्यना असली धर्म है। बाकी सारे कथित धर्म सिर्फ संप्रदाय भर हैं जो व्यक्ति पूजक हैं। गौतम बुद्ध से पहले भी विपश्यना थी जो लुप्त हो गई थी। ऋग्वेद में विपश्यना का जिक्र मिलता है। गौतम बुद्ध ने विपश्यना को पुनर्जीवित किया। पांच सौ साल विपश्यना की धूम रही। फिर ये विद्या लुप्त होती गई। इस विद्या में मिलावट की जाने लगी। इस विद्या में भी विकार पैदा किए जाने लगे। बर्मा उर्फ म्यांमार में कुछ गुरुओं ने गुरु शिष्य परंपरा के जरिए इस विद्या की ओरिजनिलिटी को जिंदा रखा। उसी विद्या को म्यांमार के गुरु से सीखकर आचार्य सत्यनारायण गोयनका भारत ले आए और छा गए।

ये अदभुत विद्या है। ये मन के संसार में देह के संसार में प्रवेश कराने की अद्भुत विद्या है। ये देह और मन को नियंत्रित करने की अद्भुत विद्या है। ये विकारों को दूर कर साक्षी भाव द्रष्टा भाव डेवलप करने की अद्भुत विद्या है। कहा जाता है कि सिद्ध विपश्यना साधक अगर इस विद्या के माध्यम से बहुत गहरे उतर जाता है तो वह भूत भविष्य अपने पहले के जन्मों के दर्शन साक्षात्कार कर सकता है। मुझे भी ऐसा लगता है कि मन देह दिमाग एक पूरा ब्रह्मांड होता है। इसे समझने का एक पूरा आंतरिक विज्ञान होता होगा। विपश्यना उन्हीं में से एक है। ये प्रामाणिक है, ये पच्चीस सौ वर्षों की परंपरा लिए हुए हैं, ये किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं है, ये आपकी किसी आस्था को दरकिनार करने को नहीं कहता है। ये बस ये कहता है कि आप मुझे समझो, मुझे एक बार आजमाओ, फिर जो चाहे मन करे, करो!

एक बार आपको भी विपश्यना में जाना चाहिए। vipassana 10-day course registration गूगल पर लिखेंगे तो एक वेबसाइट आएगी, उसके जरिए आप अप्लाई कर सकते हैं। देश भर में इनके सेंटर हैं। मैं सोहना (हरियाणा) सेंटर में गया था। मुझे बहुत मजा आया। मैं पहले से ही देश दुनिया से थोड़ा डिटैच किस्म का आदमी रहा हूं। आंतरिक यात्रा को महसूस करता रहा हूं। तो विपश्यना ने मेरी आंतरिक यात्रा की गति को बढ़ा दिया है। भविष्य में फिर विपश्यना करने जाऊंगा। एक बार धम्म सेवक बनकर जाऊंगा। एक बार पचास दिन वाला कोर्स करूंगा। जब आंतरिक यात्रा पर निकल ही लिए हैं, तो ठीक से आगे बढ़ा जाए। वैसे भी, ये जो शिविर करने का मौका मिला है, वो कोई इत्तफाक नहीं हो सकता। शायद प्रकृति का कुछ बड़ा संकेत है इसके पीछे।

आखिरी दिन सुबह साढ़े छह बजे पूड़ी तरकारी खीर खिलाकर विदा किया गया। उसके पहले दो घंटे तक चले ध्यान और प्रवचन में सत्यनारायण गोयनका ने आगाह किया कि अगर बाहर निकल कर रोजाना सुबह शाम एक एक घंटे ये इसी विद्या से ध्यान नहीं किया तो फिर ये सब छूट जाएगा, भूल जाएगा और मन फिर बाहरी दुनिया के राग द्वेष में भोक्ता भाव से रम जाएगा। फिर करते रहिए हाय हाय। मैं हर सुबह शाम एक एक घंटे विपश्यना करता हूं। कैसे करता हूं, ये मैं आपको बता नहीं सकता और न ही बताया जा सकता है। इसके लिए आपको विपश्यना सेंटर जाना ही पड़ेगा। वहां आपको भिक्षु बनना पड़ेगा। उनका दिया हुआ भोजन करना होगा। मौन रखना होगा। झूठ नहीं बोलना होगा। जीव हत्या न करेंगे। और सबसे बड़ी बात, आप समता भाव से, राग द्वेष से परे रहकर, शरीर की सूक्ष्म और स्थूल संवेदनाओं को महसूस करने का अभ्यास करते रहेंगे। ये करना आंतरिक यात्रा का क ख ग घ सीखना है। साक्षर बनना है। फिर जब लिखना आ जाएगा तो फिर आप अदभत लिखेंगे, अद्भुत रचेंगे, अद्भुत महसूसेंगे, अद्भुत देखेंगे।


भड़ास4मीडिया वेबसाइट पर यह आलेख यशवंत ने लिखा है। वहां से साभार। आप भड़ास पर भी यह खबर पढ़ सकते हैं।

झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव की घोषणा, जानिये एससी-एसटी के लिए कितनी सीटें रिजर्व

झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों का ऐलान हो गया है। महाराष्ट्र की 288 सीटों पर 20 नवंबर को चुनाव होंगे, जबकि झारखंड की 81 सीटों पर 13 और 20 नवंबर को दो चरणों में चुनाव होंगे। दोनों राज्यों में मतगणना 23 नवंबर को होगी। यानी 23 नवंबर को साफ हो जाएगा कि महाराष्ट्र और झारखंड में बाजी किसके हाथ में रही।

महाराष्ट्र की 288 सीटों की बात करें तो इसमें 234 सामान्य सीटे हैं जबकि एससी के लिए 29 और एसटी के लिए 25 सीटें रिजर्व हैं। प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या 9.63 करोड़ है। तो वहीं झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में एससी के लिए 9 जबकि एसटी के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं। प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या 2.6 करोड़ हैं।

झारखंड में अभी हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार है। जबकि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार है। चुनाव की घोषणा होते ही सभी दलों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं। इस बीच बसपा सुप्रीमों मायावती ने अपनी स्थिति साफ कर दी है। उन्होंने ट्विट कर कहा है कि बीएसपी इन दोनों राज्यों में अकेले ही चुनाव लड़ेगी और यह प्रयास करेगी कि उसके लोग इधर-उधर न भटकें बल्कि पूरी तरह बीएसपी से जुड़कर परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान कारवाँ के सारथी बनकर शासक वर्ग बनने का अपना मिशनरी प्रयास जारी रखें।

चुनाव के तारीखों की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने दोनों राज्यों में चुनाव को लेकर की गई तैयारियों के बारे में विस्तार से बताया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि हाल में आयोग ने दोनों राज्यों का दौरा किया था। सारी तैयारियां बेहतर मिली है। दोनों राज्यों में प्रत्येक मतदान केंद्र पर मतदाताओं के लिए सभी तरह की सुविधाएं जुटाई गई है। लोगों को लंबी लाइनों में न लगने पड़े इसके लिए विशेष व्यवस्था और लाइनों के बीच में कुर्सी या बैठने के लिए बेंच आदि की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए है। दोनों ही राज्यों के चुनाव करीब महीने भर में खत्म हो जाएंगे।’

प्रो. जीएन साईबाबा को हैदराबाद में अंतिम विदाई, एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों ने किया याद

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हैदराबाद में क्रांतिकारी साथी प्रो. जीएन साईंबाबा को अंतिम विदाई देते साथी दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा का को 14 अक्टूबर 2024 को देश भर से पहुंचे एक्टिविस्टों और उनके चाहने वालें के बीच दी गई। इसके बाद उनकी इच्छा के मुताबिक उनके शरीर को अस्पताल को दान दे दिया गया। साईंबाबा का बीते शनिवार 12 अक्टूबर की शाम को हैदराबाद के निज़ाम इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (निम्स) अस्पताल में निधन हो गया। 57 साल के साईबाबा का गॉल ब्लैडर का ऑपरेशन हुआ था लेकिन इसके बाद उन्हें दिक्कत होने लगी और उनकी जान नहीं बच सकी।

दिल्ली युनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर साईंबाबा शारीरिक तौर पर 90 फीसदी तक विकलांग थे। साल 2014 में वह तब चर्चा में आए जब उनको माओवादी संगठनों से संबंध रखने के आरोप में गैरक़ानूनी गतिविधियां रोकथाम क़ानून (यूएपीए) के तहत साल गिरफ़्तार किया गया था। उन्हें अदालत ने उम्रक़ैद की सज़ा दी थी। उन्हें सात महीने पहले ही मार्च में उनको रिहा कर दिया था। तब वह नागपुर सेंट्रल जेल में बंद थे।

उनकी मृत्यु के बाद उन्हें देश भर के सोशल एक्टिविस्ट विदाई देते हुए याद कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ रामू जो साईंबाबा को अंतिम विदाई देने के लिए 14 अक्तूबर को खुद हैदराबाद में मौजूद थे, ने अपने इस क्रांतिकारी साथी को श्रद्धांजलि देते हुए जीएन साईबाबा को 21वीं सदी का भारत का महान शहीद कहा। उन्होंने लिखा-

जब इतिहास 21 सदी के भारत का मूल्यांकन करेगा, तो जीएन साईबाबा इतिहास के उन महान शहीदों में स्थान पाएंगे, जो भारतीय राजसत्ता के खिलाफ आदिवासियों, दलितों, मेहनतकशों, किसानों के पक्ष में खड़े होकर आजीवन संघर्ष करते रहे। आखिर भारतीय राजसत्ता ने उन्हें मौत के मुंह में ढ़केल दिया। भूमिहीन श्रमिक और दलित परिवार में जन्मा यह महान क्रांतिकारी शारीरिक तौर विकलांग होने पर भारतीय राजसत्ता के बड़ी चुनौती था। ऐतिहासिक चुनौती।

दिल्ली युनिवर्सिटी में ही एडहॉक पर एक दशक से ज्यादा समय तक असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने वाले डॉ. लक्ष्मण यादव ने भी साईंबाबा को याद किया है। उन्होंने फेसबुक पर लिखा-

दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले डेढ़ दो दशक के अपने करियर में मैने जिन प्रोफेसरों की सबसे ज्यादा चर्चा सुनी, उनमें से एक शानदार प्रोफेसर थे जी.एन. साईबाबा। वह हमें अलविदा कह गए। प्रो. साईबाबा एक शानदार प्रोफेसर के साथ-साथ एक सोशल एक्टिविस्ट भी थे। वैसे तो वे शारीरिक रूप से 90% विकलांग थे, मगर देश के हुक्मरान उनसे इतना डरते थे कि उन्हें जेल में रखे हुए थे। जी हां, एक प्रोफेसर जेल में रहा। वह उन आरोपों की सजा काट रहे थे, जो कायदे से सिद्ध भी नहीं हो सके। आखिरी दिनों में भी उनके तेवर बरकरार थे। रीढ़ विहीन, चापलूस और दरबारी प्रोफेसरों की भीड़ के बीच एक रीढ़ वाला प्रोफेसर विदा हो गया। अलविदा प्रोफेसर!

वहीं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने भी जी.एन. साईबाबा को याद किया। उन्होंने लिखा कि, प्रो. जी.एन साईंबाबा से कभी मिलना न हो सका, लेकिन पिछले कुछ सालों से उनके बारे में अक्सर कुछ न कुछ सुनने को मिलता रहा.. अद्भुत व्यक्तित्व, शरीर से लाचार पर चमत्कृत करने वाली प्रखरता! दमन और यातना का भयावह सिलसिला पर कैसा अटूट संकल्प, कितना मजबूत विचार और कैसी फौलादी प्रतिबद्घता! लगातार यातना सहने के कारण पहले से लाचार शरीर और बेहाल हुआ। पर विचार और प्रतिबद्घता पर आंच नहीं! आपके संघर्ष और शहादत को सलाम।

BBC को दिये जीएन साईंबाबा के इस इंटरव्यू को भी जरूर सुना जाना चाहिए  

14 अक्टूबर, जब 1956 में बाबासाहेब ने अपनाया था बौद्ध धर्म

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर (दीक्षा भूमि) में बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर और सविता ताई आम्बेडकरभारत के इतिहास में 14 अक्टूबर 1956 का दिन एक क्रांति के रूप में दर्ज है। इस दिन भारत में वह क्रांति हुई, जिसके बारे में किसी ने भी सोचा नहीं होगा। अछूत समाज पर हिन्दू समाज के लगातार अत्याचार और इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं देखते हुए दुनिया के श्रेष्ठ विद्वानों में से एक बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 (अशोक विजयादशमी) को एक बड़ा फैसला किया। उन्होंने प्राचीन मूलनिवासी नागवंशियों की भूमि नागपुर की दीक्षाभूमि के मैदान में 5 लाख से अधिक महिलाओं और पुरुषों के साथ ब्राह्मणवादी (तथाकथित हिन्दू) धर्म को छोड़कर मानवतावादी, समतावादी और लोकतांत्रिक मूल्यों से ओत-प्रोत बौद्ध धम्म को अंगीकार किया था।

बौद्ध धम्म की दीक्षा लेते समय बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर ने पहले खुद और फिर सभी को इस दौरान 22 प्रतिज्ञाएं लीं थीं, जिसके तहत बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म से बिल्कुल अलग करने की बात कही गई थी। साथ ही हिन्दू धर्म के संकेतों और देवताओं को नाकार दिया गया था। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिस बौद्ध धम्म के कारण महान सम्राट अशोक के शासन काल में भारत विश्व गुरु बना था, उस बौद्ध धम्म को बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर ने स्वीकार कर न सिर्फ पुनर्जीवित किया, बल्कि लोकतांत्रिक भारत के नवनिर्माण के लिए उसके विस्तार को आवश्यक बताया।

इस दौरान उन्होंने विषमतावादी, जातिवादी, अमानवीय एवं अवैज्ञानिक ब्राह्मणवादी-हिन्दू धर्म को छोड़कर 13 अक्टूबर, 1935 ई. के येवला की सभा में लिए गए अपने उस संकल्प को पूरा किया था, जिसमें उन्होंने घोषणा की थी कि- “मैं एक हिन्दू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था। लेकिन मैं एक हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं, यह मेरे वश में है।”

बहुजन समाज के लोगों के चतुर्दिक विकास के लिए उन्होंने वैज्ञानिक एवं समतामूलक विचारों पर आधारित बौद्ध धम्म को ग्रहण करने एवं भारत में सामाजिक- सांस्कृतिक परिवर्तन करने का आह्वान किया था। आधुनिक भारत के विकास के लिए उनका यह कदम महान क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी था, जिसपर आज हमें चलने के लिए संकल्प लेने की जरूरत है। नमो बुद्धाय! जय सम्राट अशोक!! जय भीम!!!

जानिये असोक धम्मविजय दशमी का पूरा इतिहास

सम्राट असोकसम्राट असोक ने धरती पर समता और शांति का साम्राज्य स्थापित करने हेतु बौद्ध धम्म को अपना कर तलवार के विकल्प के रूप में धम्म को चुना। उन्होंने ईसा पूर्व 266 में विधिवत आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी के दिन बौद्ध धम्म ग्रहण किया था । सम्राट असोक ने बौद्ध धम्म में दीक्षित होने और शस्त्र त्याग करने की ऐतिहासिक घटना को धम्म का सबसे बड़ा विजय माना था। ‘प्रियदर्शी असोक अनुसार शस्त्रों की विजय सबसे बड़ी विजय नहीं है, सबसे बड़ी विजय धम्म की विजय है। यदि धम्म के सदाचार और भाईचारा सत्ता की बुनियाद को मजबूत करता है तो फिर शस्त्र की क्या आवश्यकता?’ चूंकि असोक ने युद्ध (शस्त्र) द्वारा राज्य विजय का मार्ग छोड़कर धम्म द्वारा विजय का संकल्प लिया था इसीलिए उनके द्वारा बौद्ध धम्म ग्रहण करने की तिथि को ‘धम्म-विजय दिवस’ कहा जाता है। उस दिन हिन्दी तिथि के अनुसार आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी पड़ता था इसीलिए इसे ‘असोक विजयादशमी’ कहा जाता है। अतः सम्राट असोक के बौद्ध धम्म में धर्मान्तरण की तिथि को असोक धम्मविजय दशमी कहा जाता है जो आगे चल कर एक महोत्सव के रूप में में स्थापित हो गया। आश्विन शुक्ल पक्ष अष्टमी को सम्राट असोक विशाल बौद्ध-जुलूस निकालते थे और उसमें में भाग लेते थे। असोक द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के 2222 सौ साल तथा महामानव बुद्ध के जन्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को अपने पांच लाख से ज्यादा अनुयायियों के साथ नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। यह दिन भी आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी था। बाबासाहेब ने बौद्ध धम्म ग्रहण कर अपने पूर्वजों की मंगलकारी श्रमण परम्परा की जड़ों में पानी डाल कर उसे पुष्पित और पल्लवित कर दिया।

सम्राट असोक (ईसा पूर्व 304 से ईसा पूर्व 232) विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। असोक बौद्ध धर्म के सबसे प्रतापी राजा थे। सम्राट असोक का पूरा नाम देवानांप्रिय असोक था। उनका राजकाल ईसा पूर्व सम्राट अशोक269 से, 232 प्राचीन भारत में था। मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट असोक राज्य का मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था। सम्राट असोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है। चक्रवर्ती सम्राट असोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं। सम्राट असोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट हैं। सम्राट असोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट असोक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है – ‘सम्राटों के सम्राट’ और यह स्थान भारत में केवल सम्राट असोक को मिला है। सम्राट असोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है।

 सम्राट असोक के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार ‘महान’ शब्द लगाते हैं। सम्राट असोक का राज चिन्ह ‘असोक चक्र’ भारतीय अपने ध्वज में लगाते हैं एवं सम्राट असोक का राज चिन्ह ‘चारमुखी शेर’ को भारतीय ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ मानकर सरकार चलाया जाता हैं और साथ ही ‘सत्यमेव जयते’ को भी अपनाया है। भारत देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान, सम्राट असोक के नाम पर, ‘असोक चक्र’ दिया जाता है। सम्राट असोक से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ जिसने ‘अखंड भारत ‘ (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो।

सम्राट असोक के ही समय में ’23 विश्वविद्यालयों’ की स्थापना की गई। जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार, आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से छात्र उच्च शिक्षा पाने भारत आया करते थे। सम्राट असोक के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार, भारतीय इतिहास का सबसे ‘स्वर्णिम काल’ मानते हैं। सम्राट असोक के शासन काल में भारत ‘विश्व गुरु’ था। ‘सोने की चिड़िया ́था। जनता खुशहाल और भेदभाव-रहित थी। उनके शासन काल में, सबसे प्रख्यात महामार्ग ‘ग्रेड ट्रंक रोड’ जैसे कई हाईवे बने। 2,000 किलोमीटर लंबी पूरी ‘सड़क’ पर दोनों ओर पेड़ लगाये गए। ‘सरायें’ बनायीं गईं। मानव तो मानव, पशुओं के लिए भी, प्रथम बार ‘चिकित्सा घर’ (हॉस्पिटल) खोले गए। पशुओं को मारना बंद करा दिया गया।

असोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और साम्राज्य के सभी साधनों को जनता के कल्याण हेतु लगा दिया। असोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित साधन अपनाये-

(क) धर्मयात्राओं का प्रारम्भ, (ख) धर्म महापात्रों की नियुक्त, (ग) धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था, (घ) धर्मलिपियों का खुदवाना, (च) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्त, (छ) दिव्य रूपों का प्रदर्शन, (ज) लोकाचारिता के कार्य, (झ) विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजना आदि।

प्रियदर्शी मौर्य सम्राट असोक के द्वारा तथागत गौतम बुद्ध व इनके धम्म को विश्व में लोकगुरू स्थापित करने का योगदान

हालांकि सम्राट असोक अपने साम्राज्य के लिए शासन प्रशासन और नीतियों के लिए बहुत ही काबिल व्यक्ति रहा परंतु साथ ही साथ में भारतवर्ष में जब हम बौद्ध धर्म के प्रसार और स्थायित्व की बात करते हैं तो सबसे पहले मौर्य सम्राट असोक का नाम स्वगर्णिम अक्षरों से लिया जाता है। दीपवंश और महावंश के अनुसार असोक अपने शासन के चौथे वर्ष ही बौद्ध धम्म में दीक्षित हो गया था। उसने 84 हजार स्तूपों का निर्माण किया। साँची के लघु स्तम्भ लेख से पता चलता है कि बौद्ध संघ में फूट डालने वाले 60,000 भिक्खुओं को संघ से निष्कासित कर दिया और उनके लिए नियम था वे श्वेत वस्त्र पहनकर किसी अयोग्य स्थान पर रहेंगे। तीसरी बौद्ध संगीति पाटलीपुत्र (पटना) में असोक द्वारा कराई गयी। इस संगीति की अध्यक्षता मोग्गिलिपुत्त तिष्य ने की थी उसके बाद ही बौद्ध धम्म के अंदर त्रिपिटक स्थापित हुआ जिसमें ( सूत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक)। सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में असोक एक मात्र ऐसा उदाहरण था कि जिसने अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा का उनके भरपूर यौवन काल में राज्य एवं सुख-सम्पत्ति या वैभव से न जोड़कर राजपाट छुड़वाकर धम्मविजय एवं धम्मप्रसार के लिए संसार के कोने-कोने में भेजा। आज हम प्रमाण के साथ कह सकते हैं कि विश्व मे कई बुद्धिस्ट देश हैं तो उसमें सम्राट असोक का ही योगदान है। प्रियदर्शी सम्राट असोक ने ही भगवान बुद्ध को लोक गुरु / विश्व गुरु में स्थापित कर चुके हैं।

सम्राट असोक द्वारा प्रवर्तित कुल 33 अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिन्हें असोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफाओं की दीवारों में अपने 269 ईसापूर्व से 231 ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाए। ये आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्गानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं।

इन शिलालेखों के अनुसार असोक के बौद्ध धर्म फैलाने के प्रयास भूमध्य सागर के क्षेत्र तक सक्रिय थे और सम्राट मिस्र और यूनान तक की राजनैतिक परिस्थितियों से भलीभाँति परिचित थे। इनमें बौद्ध धर्म की बारीकियों पर जोर कम और मनुष्यों को आदर्श जीवन जीने की सीखें अधिक मिलती हैं। पूर्वी क्षेत्रों में यह आदेश प्राचीन मगधी भाषा में पाली भाषा के प्रयोग से लिखे गए थे। पश्चिमी क्षेत्रों के शिलालेखों में भाषा संस्कृत से मिलती-जुलती है और खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया गया। एक शिलालेख में यूनानी भाषा प्रयोग की गई है, जबकि एक अन्य में यूनानी और अरामाई भाषा में द्विभाषीय आदेश दर्ज है। इन शिलालेखों में सम्राट अपने आप को ‘प्रियदर्शी’ (प्राकृत में ‘पियदस्सी’ ) और देवानाम्प्रिय (यानि देवों को प्रिय, प्राकृत में ‘देवानम्पिय’) की उपाधि से बुलाते हैं।

असोक के बारे में जानने का प्रामाणिक स्रोत उनके ही लिखवाए अभिलेख हैं। ये अभिलेख शिलाओं पर कहीं स्तंभों पर और कहीं गुफाओं में लिखवाए गए हैं। असोक का शायद ही कोई अभिलेख हो, जिनमें धम्म शब्द का प्रयोग न हो। वहां दान भी धम्म दान है, यात्रा भी धम्म यात्रा है, मंगल भी धम्म मंगल है, लिपि भी धम्म लिपि है, विजय भी धम्म विजय है। असोक – राज में सत्ता के केंद्र में धम्म था । धम्म से गृह-नीति संचालित थी और धम्म से ही विदेश नीति भी संचालित थी। पड़ोसी देशों के साथ असोक ने जो मैत्री, शांति और सह-अस्तित्व की नीति अपनाई थी, उसके केंद्र में धम्म था। भारी फौज के बावजूद भी असोक ने पड़ोसी देशों में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की बात कभी नहीं सोची। वे धम्म विजय के हिमायती थे। इसीलिए उन्होंने पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण- पूर्व यूरोप से लेकर दक्षिण के राज्यों तक में धम्म के सिद्धांत और कल्याणकारी कार्यक्रम फैलाए। असोक धम्म-मार्ग के राही थे । गौतम बुध के वचनों में उनकी आस्था थी । असोक के अभिलेख गौतम बुद्ध के काल से सर्वाधिक निकट हैं और शिलाओं पर अंकित होने के कारण उनमें मिलावट भी संभव नहीं है। भानु के लघु शिलालेख में असोक ने लिखवाए हैं कि बुद्ध, धम्म और संघ में मेरी आस्था है। तब बौद्ध गया का नाम संबोधि था। देवान पियेन का अर्थ है- बुद्धप्रिय । बुद्ध हों प्रिय जिसके, वह है देवान पियेन । देव यहां बुद्ध का प्रतीक है। पियदसिन का अर्थ है- प्रियदर्शी। प्रिय दिखने वाला पियदसिन है। दसिन से ही दास संबंधित है। अशोक चक्र को कर्तव्य का पहिया भी कहा जाता है. ये 24 तीलियाँ मनुष्य के 24 गुणों को दर्शाती हैं। दूसरे शब्दों में इन्हें मनुष्य के लिए बनाये गए 24 धर्म मार्ग भी कहा जा सकता है। अशोक चक्र में बताये गए सभी धर्म मार्ग किसी भी देश को उन्नति के पथ पर पहुंचा देंगे। शायद यही कारण है कि हमारे राष्ट्र ध्वज के निर्माताओं ने जब इसका अंतिम रूप फाइनल किया तो उन्होंने झंडे के बीच में चरखे को हटाकर इस अशोक चक्र को रखा था।

आइये अब अशोक चक्र में दी गयी सभी तीलियों का मतलब (चक्र के क्रमानुसार) जानते हैं-

  1. पहली तीली:- संयम (संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देती है), 2. दूसरी तीली:- आरोग्य (निरोगी जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है), 3. तीसरी तीली:- शांति (देश में शांति व्यवस्था कायम रखने की सलाह), 4. चौथी तीली:- त्याग (देश एवं समाज के लिए त्याग की भावना का विकास), 5. पांचवीं तीली:- शील (व्यक्तिगत स्वभाव में शीलता की शिक्षा), 6. छठवीं तीली:- सेवा (देश एवं समाज की सेवा की शिक्षा), 7. सातवीं तीली:- क्षमा (मनुष्य एवं प्राणियों के प्रति क्षमा की भावना) 8. आठवीं तीली:– प्रेम (देश एवं समाज के प्रति प्रेम की भावना), 9. नौवीं तीली:- मैत्री (समाज में मैत्री की भावना), 10. दसवीं तीली:- बन्धुत्व (देश प्रेम एवं बंधुत्व को बढ़ावा देना), 11. ग्यारहवीं तीली:- संगठन (राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत रखना), 12. बारहवीं तीली:- कल्याण (देश व समाज के लिये कल्याणकारी कार्यों में भाग लेना), 13. तेरहवीं तीली:- समृद्धि (देश एवं समाज की समृद्धि में योगदान देना), 14. चौदहवीं तीली:- उद्योग (देश की औद्योगिक प्रगति में सहायता करना), 15. पंद्रहवीं तीली:- सुरक्षा (देश की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहना), 16. सौलहवीं तीली:- नियम (निजी जिंदगी में नियम संयम से बर्ताव करना), 17. सत्रहवीं तीली:- समता (समता मूलक समाज की स्थापना करना), 18. अठारहवी तीली:- अर्थ (धन का सदुपयोग करना), 19. उन्नीसवीं तीली:- नीति (देश की नीति के प्रति निष्ठा रखना), 20. बीसवीं तीली:- न्याय (सभी के लिए न्याय की बात करना), 21. इक्कीसवीं तीली:- सहकार्य (आपस में मिलजुल कार्य करना), 22. बाईसवीं तीली:- कर्तव्य (अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना), 23. तेईसवी तीली:- अधिकार (अधिकारों का दुरूपयोग न करना), 24. चौबीसवीं तीली:- बुद्धिमत्ता (देश की समृधि के लिए स्वयं का बौद्धिक विकास करना)
    यह आलेख गौतम बुद्ध कल्चरल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, ग्रेटर नोएडा द्वारा असोक विजयदशमी के इतिहास पर तैयार करवाया गया है।