मैंने लिखा था, वे गांधी-नेहरू के बाद अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे, आखिर अमित शाह ने आंबेडकर पर हमला बोल ही दिया। भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के मार्ग में तीन व्यक्तित्व हिंदू राष्ट्रवादियों के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हैं, गांधी, नेहरू और आंबेडकर। गांधी यदि हिंदू राष्ट्रवादियों के ह्रदय में कांटे की तरह चुभें हुए हैं, तो नेहरू खंजर हैं, लेकिन आंबेडकर हिंदू राष्ट्रवादियों के सीने में इस पार से उस पार तक तलवार की तरह उतरे हुए हैं।
अभी फिलहाल हिंदू राष्ट्र की परियोजना को साकार करने में लगे संगठन, संस्थाएं और व्यक्ति आंबेडकर पर सीधा हमला करने से बच रहे थे, लेकिन उन्हें हिंदू राष्ट्र के अपने स्वप्न को पूरी तरह साकार करने लिए, आंबेडकर को अपने मार्ग से हटाना ही पड़ेगा, जो हिंदुत्व का प्रतिपक्ष और संविधान का पर्याय बनकर चीन की दीवार की तरह हिंदू राष्ट्र के मार्ग में खड़े हैं। इस सच से हिंदू राष्ट्रवादी बखूबी परिचित हैं। आखिर अमित शाह ने संसद में आंबेडकर पर हमला बोलकर इसकी शुरूआत कर ही दी।
गांधी-नेहरू हिंदू राष्ट्र की परियोजना के लिए अलग-अलग मात्रा और अलग-अलग रूपों में चुनौती तो हैं, लेकिन जिस व्यक्ति ने हिंदू राष्ट्र की बुनियाद पर सबसे प्राणघातक हमला बोला है, उसकी रीढ़ को निशाना बनाया और जिस हिंदू धर्म पर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा आधारित है, उसे नेस्तनाबूद करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया, उस व्यक्ति का नाम डॉ. आंबेडकर है। वे ब्राह्मण धर्म, सनातन धर्म और हिंदू धर्म को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखते थे।
नेहरू यह समझने में पूरी तरह असफल रहे कि हिंदू धर्म का मूल तत्व वर्ण-व्यवस्था है, गांधी यह समझते थे, लेकिन वो जीवन के अंत तक वर्ण-व्यवस्था के हिमायती बने रहे। गांधी-नेहरू दोनों यह नहीं समझ पाए कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसका मूल उद्देश्य सवर्ण हिंदू मर्दों (द्विज मर्दों) के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्व को पिछड़े-दलितों और महिलाओं पर कायम रखना है। जिस व्यक्ति ने इस बात को समझा उस व्यक्ति का नाम डॉ. आंबेडकर है।
यह सच है कि हिन्दू राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण तत्व मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति घृणा है। परन्तु यह घृणा, हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा की केवल ऊपरी सतह है। सच यह है कि हिंदू राष्ट्र जितना मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा है, उससे अधिक वह हिंदू धर्म का हिस्सा कही जानी वाली महिलाओं, अति पिछड़ों और दलितों के लिए भी खतरनाक है, जिन्हें हिंदू धर्म दोयम दर्जे का ठहराता है। एक अर्थ में तो हिंदू धर्म ब्राह्मणों को छोड़कर सबको दोयम दर्जे का मानता है। इस तथ्य को रेखांकित करते हुए आंबेडकर ने लिखा कि ‘‘हिन्दू धर्म एक ऐसी राजनैतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः लोकतंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और/या नाजी विचारधारा जैसा ही है। अगर हिन्दू धर्म को खुली छूट मिल जाए – और हिन्दुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है- तो वह उन लोगों को आगे बढ़ने ही नहीं देगा जो हिन्दू नहीं हैं या हिन्दू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दलित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है” (सोर्स मटियरल ऑन डॉ. आंबेडकर, खण्ड 1, पृष्ठ 241, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)।
गांधी-नेहरू या किसी अन्य ने खुले शब्दों में हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति घृणा नहीं प्रकट किया है। आंबेडकर हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति खुलेआम घृणा प्रकट करते हैं और इस घृणा का कारण बताते हुए लिखते हैं “मैं हिंदुओं और हिंदू धर्म से इसलिए घृणा करता हूं, उसे तिरस्कृत करता हूं क्योंकि मैं आश्वस्त हूं कि वह गलत आदर्शों को पोषित करता है और गलत सामाजिक जीवन जीता है। मेरा हिंदुओं और हिंदू धर्म से मतभेद उनके सामाजिक आचार में केवल कमियों को लेकर नहीं हैं। झगड़ा ज्यादातर सिद्धांतों को लेकर, आदर्शों को लेकर है। (भीमराव आंबेडकर, जातिभेद का विनाश पृ. 112)।
डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि हिन्दू धर्म के प्रति उनकी घृणा का सबसे बड़ा कारण जाति है, उनका मानना था कि हिन्दू धर्म का प्राण-तत्त्व जाति है और इन हिन्दुओं ने अपने इस जाति के जहर को सिखों, मुसलमानों और क्रिश्चियनों में भी फैला दिया है। वे लिखते हैं कि ‘‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि जाति आधारभूत रूप से हिन्दुओं का प्राण है। लेकिन हिन्दुओं ने सारा वातावरण गन्दा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं।’’ स्पष्ट है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों और ईसाईयों के बीच जाति की उपस्थिति के लिए वे हिंदू धर्म को जिम्मेदार मानते हैं।
वे हिंदू धर्म का पालन करने वाले हिंदुओं को मानसिक तौर पर बीमार कहते थे। ‘जाति का विनाश’ किताब का उद्देश्य बताते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘‘मैं हिन्दुओं को यह अहसास कराना चाहता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं, और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरा है।’’
आंबेडकर हिंदुओं को आदिम कबिलाई मानसिकता के बर्बर लोगों की श्रेणी में रखते हैं। ‘‘हिन्दुओं की पूरी की पूरी आचार-नीति जंगली कबीलों की नीति की भांति संकुचित एवं दूषित है, जिसमें सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपने जाति बन्धु को ही मान्यता है। इनमें सद्गुणों का पक्ष लेने तथा दुर्गुणों के तिरस्कार की कोई परवाह न होकर, जाति का पक्ष लेने या उसकी अपेक्षा का प्रश्न सर्वोपरि रहता है।” डॉ. आंबेडकर को हिन्दू धर्म में अच्छाई नाम की कोई चीज नहीं दिखती थी, क्योंकि इसमें मनुष्यता या मानवता के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में उन्होंने दो टूक लिखा है कि ‘हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबन्धों की भीड़ है। हिन्दू-धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी संग्रह मात्र है। हिन्दुओं का धर्म बस आदेशों और निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है, और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धान्तों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिन्दुओं में पाया ही नहीं जाता और यदि कुछ थोड़े से सिद्धान्त पाये भी जाते हैं तो हिन्दुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती। हिन्दुओं का धर्म ‘‘आदेशों और निषेधों” का ही धर्म है। वे हिन्दुओं की पूरी व्यवस्था को ही घृणा के योग्य मानते हैं। उन्होंने लिखा कि ‘‘इस प्रकार यह पूरी व्यवस्था ही अत्यन्त घृणास्पद है, हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) एक ऐसा परजीवी कीड़ा है, जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है… ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू-समाज को बर्बाद किया है।” (जाति का विनाश)।
हिंदू राष्ट्र से आंबेडकर इस कदर घृणा करते थे कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र के निर्माण को किसी भी कीमत पर रोकने की बात की। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा, अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338) हिंदू धर्म की यह समझ डॉ. आंबेडकर को गांधी-नेहरू से गुणात्मक तौर पर भिन्न बना देती है और हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आंबेडकर को सबसे अधिक खतरनाक।
आंबेडकर वर्ण-जाति व्यवस्था के पोषक हिंदू धर्मग्रंथों को डायनामाइट से उड़ाने की तक की बात करते हैं। उन्होंने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ और ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ और ‘जाति का विनाश’ जैसी किताबें लिखकर हिंदू धर्म दर्शन, विचारधारा, ईश्वरों, देवी-देवताओं, हिंदू धर्म की किताबों, आदर्शों-मूल्यों, जीवन-पद्धति और जीवन-दृष्टि की धज्जियां उड़ा दी हैं। वेदों से लेकर आधुनिक युग तक हिंदू धर्म के पक्ष में दिए गए तर्कों और हिंदू धर्म के पैरोकारों के हर तर्क का उन्होंने ठोस और सटीक जवाब दिया है, जाति का विनाश किताब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक शब्द में कहें तो भारत के अब तक के इतिहास में सनातन धर्म और ब्राह्मण धर्म के पर्याय हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद पर इतना मर्मांतक और निर्णायक हमला किसी ने नहीं बोला है, जितना डॉ. आंबेडकर ने वोला है।
हिंदू धर्म पर दार्शनिक-वैचारिक हमले के साथ आंबेडकर ने संविधान के रूप में हिंदू राष्ट्र के मार्ग में एक पहाड़ खड़ा कर दिया है, इस पहाड़ को रास्ते से हटाए बिना हिंदू राष्ट्र स्थायी और मुकम्मल शक्ल नहीं ले सकता है और मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। क्योंकि संविधान हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार देता है। पांच साल में चुनाव और सरकार बदलने का भी उन्हें अधिकार देता है। जनता इस अधिकार का इस्तेमाल करके हिंदू राष्ट्र के पैरोकारों को सत्ता से हटा सकती है। संसद में ऐसी सरकार को बहुमत दे सकती है, जो हिंदू राष्ट्र के खिलाफ हो। इसका खतरा हमेशा हिंदुत्वादियों के सामने मंडराता रहेगा। हालांकि इस संविधान के साथ लगातार हिंदू राष्ट्रवादी छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसकी मूल भावना को रौंद रहे हैं, उसकी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं, उसका हिंदू राष्ट्रवाद की परियोजना के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और अब तो उसे बदलने की खुलेआम बातें भी करने लगे हैं। फिर भी संविधान उनके मार्ग में बड़ा रोड़ा बना हुआ है।
हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए संविधान को पूरी तरह बदलना इसलिए भी जोखिम भरा काम है, क्योंकि दलितों-पिछड़े और आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा संविधान और आंबेडकर को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखता है। संविधान से छेड़-छाड़ या संविधान बदलने की बात उसे आंबेडकर के विचारों-सपनों से छेड़-छाड़ लगती है। फिर भी हिंदू धर्म के लिए इतने खतरनाक और हिंदू राष्ट्र के मार्ग में सबसे बड़े अवरोध आंबेडकर पर हमला बोले बिना भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के स्वप्न को हिंदू राष्ट्रवादी साकार नहीं कर सकते। वे आंबेडकर पर हमला बोलेंगे, लेकिन गांधी और नेहरू को पूरी तरह निपटाने के बाद। वे अंतिम हमला आंबेडकर पर ही बोलेंगे।
प्रश्न यह है कि हिंदू राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी बाधा आंबेडकर और उनकी वैचारिकी पर हमला करने से क्यों हिंदुत्ववादी बच रहे हैं और गांधी, नेहरू पर आक्रामक तरीके से हमलावार क्यों हैं।
इसका पहला कारण यह है कि देश में गांधी-नेहरू के समर्थक (वोटर) बहुत कम संख्या में बचे हैं। जो अपरकॉस्ट गांधी और नेहरू का मजबूत समर्थक और पैरोकार था, उसका बहुलांश हिस्सा हिंदुत्वादियों के साथ पूरी तरह खड़ा हो गया है। यह अपरकॉस्ट आजादी के दौरान गांधी और आजादी के बाद नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता, हितैषी और पैरोकार मानता था। इन दोनों ने इनके हितों की भरपूर पूर्ति भी किया।
अब अपरकॉस्ट को अपना सबसे बड़ा हितैषी हिंदुत्वादी लग रहे हैं और वह उनके साथ वह पूरी मुस्तैदी के साथ खड़ा है। अपरकॉस्ट के कुछ मुट्टीभर लोगों के बीच, विशेषकर सचेतन बुद्धिजीवियों के बीच अब गांधी-नेहरू की कद्र रह गई है, जो संख्या में बहुत कम हैं। गांधी-नेहरू कभी भी बहुजनों ( दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों) के सहज-स्वाभाविक नायक नहीं रहे हैं, भले ही विभिन्न वजहों से बहुजन उनके साथ खड़े हुए हों और नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को वोट भी देते रहे हों। आज भी पिछड़े-दलितों और आदिवासियों के सहज स्वाभाविक नायक जोतीराव फुले, शाहू जी, पेरियार, जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव, बिरसा मुंडा, तिलका मांझी और राष्ट्रव्यापी नायक के रूप में आंबेडकर हैं। आंबेडकर कभी भी द्विज पुरूषों के चहेते नहीं रहे हैं, न आज हैं, न भविष्य में कभी हो सकते हैं।
चूंकि गांधी-नेहरू के कभी अनुयायी रहा अपरकॉस्ट उनका साथ छोड़ चुका और पूरी तरह हिंदुत्वादियों के साथ खड़ा हो गया है, ऐसे में उन पर आक्रामक हमला करना हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए आसान हैं। लेकिन आंबेडकर को जो समूह अपना नायक मानता है आज भी उन्हें उतने ही पुरजोर तरीके से उन्हें अपना नायक मानता है, भले ही आंबेडकर का जो रूप उसे पसंद हो। यह बात बहुजनों, उनमें विशेष तौर दलितों के बारे में पूरी तरह लागू होती है। यदि आज की तारीख में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर गांधी और नेहरू की तरह आक्रामक और निर्णायक हमला बोल दें, तो बहुजनों का एक बड़ा हिस्सा उनके खिलाफ खड़ा हो जाएगा। यहां तक कि सड़कों पर भी उतर सकता है।
ऐसी स्थिति में हिंदू राष्ट्रवादी आंबेडकर पर निर्णायक हमले के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। यह उचित समय उनके लिए तब होगा, जब वह बहुजनों के एक बड़े हिस्से का हिंदुत्वीकरण (कम से कम राजनीतिक तौर पर) करने में सफल हो जाएं। जिसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है। वे पहले बडे़ पैमाने पर पिछड़ों का हिंदुत्वीकरण करेंगे और कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे पिछड़ों को दलितों से अलग करने की कोशिश करेंगे। जिसमें उन्हें एक हद तक सफलता भी मिलती दिख रही है। इस प्रक्रिया में वे बहुजन अवधारणा को तोड़ेंगे। पिछड़ों से दलितों को अलग-थलग करने के बाद वे दलितों को भी अपने साथ खड़ा करने की कोशिश करेंगे। यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो, अपरकॉस्ट और पिछड़ों का गठजोड़ बनाकर वे आंबेडकर यानी दलित वैचारिकी पर निर्णायक हमला बोलेंगे। पिछड़ों को अपरकास्ट के साथ जोड़ने का प्रयोग कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ था। जिसे नरेंद्र मोदी (तथाकथित पिछड़े) के नेतृत्व में एक अलग मुकाम तक पहुंचाया जा चुका है।
अंतिम तौर पर डॉ. आंबेडकर पर हमला बोलने की हिंदू राष्ट्रवादियों की दो रणनीति दिख रही है। पहली नरेंद्र मोदी के समर्थक दलित नेताओं को अपने साथ करके दलितों को हिंदुत्व की राजनीति के लिए पूरी तरह अपने साथ कर लेना और साथ में आंबेडकर का नाम भी लेते रहना। यह भी आंबेडकर पर हमला ही होगा, लेकिन पीठ पीछे से। जिसके कुछ रूप उत्तर प्रदेश बिहार और अन्य जगहों पर दिखाई दे रहे हैं।
यदि इसमें सफलता नहीं मिली तो वे अपरकॉस्ट और पिछड़ों के गठजोड़ का इस्तेमाल आंबेडकर पर निर्णायक हमला के लिए करेंगे। क्योंकि पिछड़े यदि दलितों से अलग हो जाते हैं, तो दलित वोटर एक अल्पसंख्यक वोटर बनकर रह जाएगा। दलितों के सहज-स्वाभाविक राजनीतिक दोस्त मुसमलानों को हिंदू राष्ट्रवादी पहले ही राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने के तरीके निकाल चुके हैं या निकाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे आंबेडकर पर निर्णायक हमला बोलेंगे। लेकिन यह उनका अंतिम विकल्प होगा। जिसका वे सबसे अंत में ही इस्तेमाल करेंगे। इसका क्या परिणाम होगा यह भविष्य के गर्भ में है।
डॉ. सिद्धार्थ के फेसबुक पेज से साभार


मनोरंजन जगत से बड़ी खबर है। 29 साल की शादी के बाद ए.आर. रहमान ने पत्नी सायरा बानू से तलाक ले लिया है। 19 नवंबर 2024 को एक संयुक्त बयान जारी कर रहमान और उनकी पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक की घोषणा की।
भाजपा की हरियाणा सरकार ने आरक्षण में वर्गीकरण लागू कर दिया है। वर्गीकरण के तहत अनुसूचित जाति के आरक्षण को दो हिस्सों में बांटने की बात कही गई है। हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने विधानसभा में अपने अभिभाषण में 13 नवंबर को यह घोषणा की। इसके बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी विधानसभा में इस बात को दोहराया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे लागू करने वाला हरियाणा पहला राज्य बन गया है। प्रदेश में अनुसूचित जातियों की स्थिति को पता लगाने के लिए प्रदेश सरकार ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग को नौकरियों में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी का पता लगाने का निर्देश दिया है।
इस बारे में प्रदेश सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया है। इसके मुताबिक प्रदेश में अनुसूचित जाति को 20 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। अब इसको 10-10 प्रतिशत के दो हिस्सों में बांट दिया गया है। 10 प्रतिशत आरक्षण एससी समाज की उन वंचित जातियों को मिलेगा, जो पीछे छूट गई हैं। जबकि बाकी का 10 प्रतिशत आरक्षण अन्य अनुसूचित जातियों को मिलेगा।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय बौद्ध समुदाय ने 19 अक्टूबर 2024 को 68वां धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाया। यह कार्यक्रम मेलबर्न बुद्धिस्ट सेंटर और भारतीय बौद्ध समुदाय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इस दौरान बौद्ध समाज ने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और तथागत बुद्ध के विचार को दोहराया। इस आयोजन में हर उम्र के लोग पहुंचे। इसमें बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग समान रूप से शामिल थे।
उत्तर प्रदेश के 9 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। बसपा ने कुंदरकी सीट से रफतउल्ला उर्फ नेता छिद्दा को टिकट दिया है, जबकि मझवां से दीपू तिवारी, कटेहरी से अमित वर्मा, मीरापुर से शाह नजर, गाजियाबाद से पीएन गर्ग और करहल से अवनीश कुमार शाक्य को अपना उम्मीदवार बनाया है।
रायपुर। (रिपोर्टर- जयदास मानिकपुरी) छत्तीसगढ़ की हसदेव अरण्य क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट जारी की है, जिसमें खुलासा किया गया है कि इस कटाई के लिए दी गई अनुमति फर्जी ग्राम सभाओं के आधार पर ली गई थी। आयोग ने स्वीकार किया है कि जिन ग्राम सभाओं का उल्लेख किया गया था, वे वास्तविक नहीं थीं और नियमों का उल्लंघन करते हुए अनुमति दी गई थी। यह रिपोर्ट हसदेव अरण्य के वन क्षेत्र और वहां के आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हरियाणा। राजनीतिक दलों को दलित समाज को बांटने और राज करने का नया फार्मूला मिल गया है। हरियाणा में तीसरी बार सत्ता में आते ही भाजपा की सरकार ने आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला ले लिया। 18 अक्तूबर को अपनी पहली कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आरक्षण में उप-वर्गीकरण पर मुहर लगा दी है।
आज (16 अक्टूबर) जेल से वापस लौटकर राज्य की कमान संभाले 100 दिन पूरे हुए हैं। साथ ही कल चुनाव आयोग द्वारा झारखण्ड में विधानसभा चुनाव की घोषणा भी हुई है। दिसंबर 2019 में झारखण्ड की अपनी महान जनता के आशीर्वाद से मैंने राज्य की बागडोर संभाली। मकसद एक ही था कि झारखण्ड रूपी पेड़ को सिंचित कर इसकी जड़ें मजबूत करना। इस पेड़ को भाजपा ने 20 वर्षों तक दोनों हाथों से लूटने का काम किया था। इसे सुखाने का काम किया था। इसकी जड़ों पर मट्ठा डालने का काम किया था।
मुझसे बहुत लोग पूछ चुके क्या हुआ। कैसे हुआ। कैसा लग रहा है। क्या चेंज पा रहे हैं। मैं उन्हें कैसे वो सब पूरा पूरा बताऊं जो मैं फील कर रहा रहूं, जो हासिल कर ले आया हूं। चलिए, थोड़ा कोशिश करता हूं बताने की।
बजता। स्नान और आराम के बाद आठ बजे से फिर धम्मा हाल के लिए सायरन बज जाता। ग्यारह बजे लंच के लिए सायरन बजता। एक बजे से पांच बजे तक धम्मा हाल में साधना करते। पांच बजे डिनर के लिए सायरन बजता। पुराने साधकों को डिनर में सिर्फ नीबू पानी दिया जाता।
राग में सारी आकांक्षाएं मोह माया बंधन शामिल है। द्वेष में समस्त घृणा गुस्सा साजिश! इन दो भावों के हम भोक्ता होते हैं। भोक्ता भाव से जीते हैं। हमे सिखाया गया कि भोक्ता भाव नहीं, द्रष्टा भाव साक्षी भाव सम भाव समता भाव में जीना है रहना है और ऐसा सांसों के जरिए मन को स्थूल से सूक्ष्म करके किया जा सकता है। इसे लगातार अभ्यास से कर लिया जाएगा तो नए पुराने संस्कार उर्फ संखारा नष्ट होने लगते हैं। हमारे मन के अनकांसस माइंड में पत्थर के लकीर की तरह दर्ज राग द्वेष की रेखाएं खत्म होने लगती हैं।
झझारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों का ऐलान हो गया है। महाराष्ट्र की 288 सीटों पर 20 नवंबर को चुनाव होंगे, जबकि झारखंड की 81 सीटों पर 13 और 20 नवंबर को दो चरणों में चुनाव होंगे। दोनों राज्यों में मतगणना 23 नवंबर को होगी। यानी 23 नवंबर को साफ हो जाएगा कि महाराष्ट्र और झारखंड में बाजी किसके हाथ में रही।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व 

सम्राट असोक ने धरती पर समता और शांति का साम्राज्य स्थापित करने हेतु बौद्ध धम्म को अपना कर तलवार के विकल्प के रूप में धम्म को चुना। उन्होंने ईसा पूर्व 266 में विधिवत आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी के दिन बौद्ध धम्म ग्रहण किया था । सम्राट असोक ने बौद्ध धम्म में दीक्षित होने और शस्त्र त्याग करने की ऐतिहासिक घटना को धम्म का सबसे बड़ा विजय माना था। ‘प्रियदर्शी असोक अनुसार शस्त्रों की विजय सबसे बड़ी विजय नहीं है, सबसे बड़ी विजय धम्म की विजय है। यदि धम्म के सदाचार और भाईचारा सत्ता की बुनियाद को मजबूत करता है तो फिर शस्त्र की क्या आवश्यकता?’ चूंकि असोक ने युद्ध (शस्त्र) द्वारा राज्य विजय का मार्ग छोड़कर धम्म द्वारा विजय का संकल्प लिया था इसीलिए उनके द्वारा बौद्ध धम्म ग्रहण करने की तिथि को ‘धम्म-विजय दिवस’ कहा जाता है। उस दिन हिन्दी तिथि के अनुसार आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी पड़ता था इसीलिए इसे ‘असोक विजयादशमी’ कहा जाता है। अतः सम्राट असोक के बौद्ध धम्म में धर्मान्तरण की तिथि को असोक धम्मविजय दशमी कहा जाता है जो आगे चल कर एक महोत्सव के रूप में में स्थापित हो गया। आश्विन शुक्ल पक्ष अष्टमी को सम्राट असोक विशाल बौद्ध-जुलूस निकालते थे और उसमें में भाग लेते थे। असोक द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के 2222 सौ साल तथा महामानव बुद्ध के जन्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को अपने पांच लाख से ज्यादा अनुयायियों के साथ नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। यह दिन भी आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी था। बाबासाहेब ने बौद्ध धम्म ग्रहण कर अपने पूर्वजों की मंगलकारी श्रमण परम्परा की जड़ों में पानी डाल कर उसे पुष्पित और पल्लवित कर दिया।
269 से, 232 प्राचीन भारत में था। मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट असोक राज्य का मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था। सम्राट असोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है। चक्रवर्ती सम्राट असोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं। सम्राट असोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट हैं। सम्राट असोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट असोक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है – ‘सम्राटों के सम्राट’ और यह स्थान भारत में केवल सम्राट असोक को मिला है। सम्राट असोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है।