दिल्ली चुनाव खत्म, एग्जिट पोल में भाजपा की जीत की आहट

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव की 70 सीटों पर 5 जनवरी को मतदान हो चुका है। चुनाव के बाद जो एग्जिट पोल हुए हैं; उसमें भाजपा सरकार बनाती हुई दिख रही है। दिल्ली चुनाव के अनुमानित नतीजों को लेकर हुए ग्यारह प्रमुख एक्जिट पोल में से 9 पर भाजपा को बहुमत मिलता दिखाया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो 1993 के बाद भाजपा सत्ता में लौटेगी। एग्जिट पोल में भाजपा को 35 से 50 सीटें मिलती बताई जा रही है। जबकि आम आदमी पार्टी को 20 से 30 सीटें मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब है और हर एक्जिट पोल में उसको जीरो से 3 सीटें मिलने का अनुमान है।

बता दें कि दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों पर बुधवार शाम 5 बजे तक 58 फीसदी वोटिंग की खबर है। आखिरी आंकड़े आने बाकी हैं। चुनाव के नतीजे 8 फरवरी को घोषित होंगे। सरकार बनाने के लिए 36 सीटों की जरूरत है। बता दें कि 2020 के विधानसभा चुनाव में 62.55 फीसदी मतदान हुआ था। फिलहाल एग्जिट पोल सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों में खुशी की लहर है।

अयोध्या में दलित युवती के साथ हैवानियत पर भड़के आकाश आनंद और चंद्रशेखर, यूपी पुलिस का नकारापन उजागर

अयोध्या, यूपी। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में दलित युवती के साथ हुई हैवानियत से दलित समाज में जबरदस्त उबाल है। दलित समाज के लोगों के साथ ही नेताओं ने भी इस घटना पर यूपी की योगी सरकार और यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती के साथ बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद ने यूपी सरकार और खासकर यूपी पुलिस पर जमकर हमला बोला है। सोशल मीडिया एक्स पर आकाश आनंद ने लिखा है-

अयोध्या के सहनवां में एक दलित बेटी 3 दिन से गायब थी। लेकिन यूपी की नाकारी पुलिस ने इसकी सूचना मिलने के बाद सही से कार्रवाई तक नहीं की। अगर सही वक़्त पर पुलिस हरकत में आ जाती तो शायद ये बेटी बच जाती। इस जघन्य हत्याकांड के आरोपियों के साथ दोषी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल वीवीआईपी सेवा में व्यस्त उत्तर प्रदेश पुलिस इतनी नकारा हो चुकी है कि अब गरीब, शोषित, वंचित समाज की जान की उसके लिए कोई कीमत ही नहीं है।

हमारे समाज की इस बेटी के साथ जो अमानवीय हरकत हुई है उसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस और यहां की भाजपा सरकार को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ अपराध में यूपी नंबर वन हो गया है और यही है यहां की भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि। भाजपा के जंगल राज ने अब समाजवादी पार्टी के जंगल राज को भी पीछे छोड़ दिया है। सूबे के मुखिया और उनका पूरा तंत्र अभी इसी में व्यस्त है कि कुंभ की मौतों का आंकड़ा कैसे छिपाया जाए। योगी जी आप और आपका प्रशासन अगर गरीब, मजलूमों, दलितों को सुरक्षा नहीं दे सकता है तो आपको तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता और अयोध्या क्षेत्र के सांसद अवधेश प्रसाद जी को घड़ियाली आंसू ना बहाकर सोचना चाहिए कि पिछले तीन दिन से वो कहां थे। संसद में महाकुंभ पर चर्चा की मांग करने वाले सांसद जी के पास इस बेटी को न्याय दिलाने का वक्त नहीं था तो अब मीडिया के सामने रोने का नाटक कर रहे हैं।

बसपा सुप्रीमों सुश्री मायावती ने भी इस घटना पर रोष जताते हुए प्रदेश सरकार से दलितों की सुरक्षा की मांग की है। उन्होंने एक्स पर लिखा- उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या के सहनवां में दलित परिवार की बेटी का शव निर्वस्त्र अवस्था में मिला है, उसकी दोनों आँखें फोड़ दी गई हैं तथा अमानवीय व्यवहार भी हुआ है, यह बेहद दुःखद व अति गम्भीर मामला है। सरकार सख्त कदम उठाये, ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति ना हो।

बता दें कि इस घटना को लेकर प्रेस कांफ्रेस करते हुए स्थानीय सपा सांसद अवधेश प्रसाद रो पड़े थे, जिसका वीडियो जमकर वायरल हुआ था।

दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मामले में यूपी सरकार को घेरा है। चंद्रशेखर ने एक्स पर लिखा-

उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या के कोतवाली क्षेत्र में 22 वर्षीय दलित युवती के साथ हुई निर्मम हत्या ने न केवल कानूनी व्यवस्था की विफलता को उजागर किया है, बल्कि यह समाज में व्याप्त असुरक्षा और अमानवीयता को भी खौ़फनाक तरीके से सामने लाया है। परिजनों के अनुसार “युवती के साथ गैंगरेप हुआ, उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे, दोनों आंखें फूटी हुई थीं, और पैर भी टूटे हुए थे। सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें थीं, और पूरे शरीर पर गहरे जख्म थे। हाथ-पांव रस्सी से बंधे हुए थे। यह घटना किसी भी सभ्य समाज के लिए घोर शर्मनाक और अविश्वसनीय है।”

बता दें कि परिजनों का आरोप है कि 30 तारीख की रात से युवती के लापता होने के बावजूद पुलिस ने मामले की गंभीरता को नज़रअंदाज़ किया और केवल खानापूर्ति करती रही। यह न सिर्फ पुलिस प्रशासन की लापरवाही है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को भी दिखाता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश की सरकार और उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ इस दलित परिवार को न्याय दिलाएंगे?

विश्व पुस्तक मेला 2025 शुरू, दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन का भी स्टॉल लगा

 विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन का स्टॉलनई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला 2025 शुरू हो गया है। गणतंत्र के 75वें वर्ष में भारत के पहुंचने के कारण इस बार विश्व पुस्तक मेले की थीम रिपब्लिक@75 रखा गया है। दिल्ली के प्रगति मैदान के भारत मंडपम में पुस्तक मेला 1-9 फरवरी तक चलेगा। एक फरवरी को मेले का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस बार पुस्तक मेले में 2000 से ज्यादा प्रकाशक हिस्सा ले रहे हैं। दलित/अंबेडकरी साहित्य की बात करें तो हर बार की तरह सम्यक प्रकाशन और गौतम बुक सेंटर के अलावा दलित दस्तक और उसके प्रकाशन दास पब्लिकेशन का स्टॉल भी लगा है।

दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन की बात करें तो यह हॉल नंबर 2 में स्टॉल नंबर 40 है। इस बार हमारा प्रकाशन तीन नई किताबें लेकर आया है। इसमें से एक दिवंगत साहित्यकार सूरजपाल चौहान का कविता संग्रह ‘यह दलितों की बस्ती है’ जबकि अंबेडकरी पत्रकारिता पर ‘अंबेडकरी पत्रकारिता के 100 साल’ नाम से पुस्तक भी लाया गया है। 50 बहुजन नायक की पाठकों के बीच मांग बढ़ने से अब इस पुस्तक को अंग्रेजी में 50 Bahujan Heroes भी प्रकाशित किया गया है। इसको मिशन जय भीम से जुड़े भगवान सिंह ने ट्रांसलेट किया है। जबकि हिन्दी में 50 बहुजन नायक का 6वां संस्करण प्रकाशित हुआ है, जिसमें पुस्तक मे कुछ अन्य नायकों को जोड़कर इसे और समृद्ध बनाया गया है। एक से नौ फरवरी तक दिल्ली चलने वाले एशिया के सबसे बड़े पुस्तक मेला सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक पाठकों के लिए खुला रहेगा। दलित दस्तक – दास पब्लिकेशन अपने स्टॉल पर आपको आमंत्रित करता है।

मैं चाहता हूँ कि मनुस्मृति लागू होनी चाहिए

फाइल फोटोः प्रतीकात्मक तस्वीर अख़बार में पढ़ा था कि गत दिनों बनारस में कुछ दलित छात्रों ने मनुस्मृति को जलाने का कार्यक्रम किया था, और वे सब जेल में बंद हैं। समझ में नहीं आता कि दलित ऐसी बेवकूफियां क्यों करते हैं? वे डा. आंबेडकर का अनुसरण करते हैं, पर भूल जाते हैं कि उस दौर की परिस्थितियां अलग थीं। डा. आंबेडकर ने मनुस्मृति को हिन्दू अलगाववाद के रूप में देखा था। आज दलित उसे किस रूप में देख रहे हैं? अगर वे अपने आप को हिन्दू समझ रहे हैं तो मनुस्मृति का विरोध क्यों कर रहे हैं? दलितों को मालूम चाहिए कि मनुस्मृति में दलित जातियों अर्थात अछूतों के बारे में कुछ नहीं लिखा है। मनु ने जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे शूद्रों और स्त्रियों पर लगाए हैं, वह भी सवर्ण स्त्रियों पर। दलित क्यों बिलबिला रहे हैं।

दलितों को मालूम होना चाहिए कि मनुस्मृति का विधान हिन्दुओं के लिए है, और हिन्दुओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आते हैं। मनु ने कहा है कि पांचवां कोई वर्ण नहीं है। इसलिए, इस फोल्ड में अछूत नहीं आते, जो आज अनुसूचित जातियों के लोग हैं। फिर दलित क्यों मनुस्मृति को लेकर आपे से बाहर हो जाते हैं? मनुस्मृति के खिलाफ विद्रोह शूद्रों को करना चाहिए, जो आज ओबीसी में हैं, और वे ही आज हिन्दू राष्ट्र के सबसे बड़े समर्थक बने हुए हैं।

दलितों को तो मनुस्मृति को लागू कराने का आन्दोलन चलाना चाहिए। मनुस्मृति को एक बार लागू तो हो जाने दो, जो कभी नहीं होगी, क्योंकि आरएसएस जानता है कि मनुस्मृति को ब्राह्मण खुद स्वीकार नहीं करेंगे।

जिस मनुस्मृति की निन्दा करने पर आज हिन्दुओं की भावनाएँ आहत हो जाती हैं, और निन्दकों को जेल में डाल दिया जाता है, वह मनुस्मृति अगर हिन्दूराष्ट्र बनने के बाद फिर से लागू हो जाए, तो क्या होगा? दो बातें ज़रूर होंगी। एक, उच्च वर्ण की स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही इसके ख़िलाफ़ बग़ावत कर देंगे; और दूसरी, अगर बग़ावत को कुचल दिया गया, और मनु के विधान को बलपूर्वक लागू कर दिया गया, तो हिन्दू समाज रसातल में चला जायेगा।

इसलिए मुझे नहीं लगता कि हिन्दूराष्ट्र की सरकार कभी मनुस्मृति को लागू कर सकेगी। वह इसलिए कि मुसलमानों के खिलाफ जहर फैलाना एक अलग बात है, और मनुस्मृति के अनुसार हिन्दुओं को, खास तौर से द्विजों को हजार साल पीछे ले जाना दूसरी बात है। अगर मनुस्मृति के कानून लागू हुए तो कैथरीन मेयो की किताब ‘देवताओं के गुलाम’ के सारे पात्र जिन्दा हो जायेंगे। कोई भी हिन्दू स्त्री फिर पढ़ नहीं पायेगी। उसे 12-13 साल की उम्र में विवाह करना होगा। वह चौका-बर्तन, और बच्चे पैदा करने के सिवा कोई और काम नहीं कर सकेगी। अगर वह कम उम्र में विधवा होती है, तो उसे या तो सती होना पड़ेगा, या सिर घुटाकर आजीवन सफेद वस्त्रों में जीवन गुजारना होगा। हिन्दू धर्म के सनातन विधान में स्त्री की यही नियति है। क्या आधुनिक भारत की सवर्ण महिलाएं, जो आज पायलट हैं, जज हैं, प्रोफ़ेसर हैं, राजनेता हैं, राजनयिक हैं, कलेक्टर, पुलिस अफसर, कलाकार और पत्रकार हैं, इस नियति को स्वीकार करेंगीं? आरएसएस और भाजपा के लोग एक बार मनुस्मृति का विधान लागू करके तो देखें, सवर्ण हिन्दू तो छोड़िए, देश के ब्राह्मण ही सबसे पहले उसके ख़िलाफ़ विद्रोह करेंगे, क्योंकि कोई भी ब्राह्मण स्त्री अब अशिक्षित बनकर प्रतिबंधों की जंजीरों में बंधकर रहना नहीं चाहेगी। सनातन की आवाज़ उठाने वाले और हिन्दू-हिन्दू चिल्लाने वाले उन सवर्णों की भी, चाहें, वे जज हों, नेता हों, प्रोफ़ेसर हों, वकील हों, अक्ल ठिकाने लग जाएगी, जब लोकतंत्र के स्थान पर मनुस्मृति के विधान के साथ हिन्दू राज्य अस्तित्व में आएगा।

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत संविधान का विरोध यह कहकर करते हैं कि यह विदेशी विचारों पर बनाया गया है, इसमें भारतीय संस्कृति का कुछ भी अंश नहीं है। वह भारतीय संस्कृति की आड़ में हिन्दू संस्कृति, ख़ास तौर से ब्राह्मण-संस्कृति की बात करते हैं। लेकिन आरएसएस का सौ सालों का इतिहास बताता है कि उसने कभी भारतीय संस्कृति की बात नहीं की, हमेशा ब्राह्मण संस्कृति का ही गुणगान किया है। वह हर क्षेत्र में ब्राह्मण प्रभुत्व और ब्राह्मण-वर्चस्व को ही भारतीय संस्कृति कहता आया हैं। उसकी इस संस्कृति के आदर्श नायक श्रीराम हैं, जिन्होंने ब्राह्मण-रक्षा और ब्राह्मण-राज्य स्थापित करने लिए अवतार लिया था। उन्होंने निम्न वर्गों में फूट, विभाजन और भेदभाव पैदा करके, उन्हीं की सेना बनाकर, उन्हीं के साम्राज्य को नष्ट करके ब्राह्मण-राज्य की विजय-पताका फहराई थी। आरएसएस और भाजपा के नेता श्रीराम के ही पदचिन्हों पर चलते हुए, आज दलित-पिछड़े और आदिवासी समुदायों में फूट, विभाजन और भेदभाव पैदा करके, उनकी शिक्षा बर्बाद करके, और उन बेरोजगारों की रामभक्त सेना बनाकर, उन्हीं के हाथों में हिन्दू राष्ट्र के नाम पर, हर क्षेत्र में ब्राह्मण-प्रभुत्व और वर्चस्व कायम कर रहे हैं। यही उनका एकमात्र एजेंडा है। यही उनका सनातन धर्म है, जिसके केंद्र में मनुस्मृति है।

सनातन धर्म के केंद्र में मनुस्मृति ज़रूर है, परन्तु आरएसएस और भाजपा के नेता सिर्फ सनातन की फ़िज़ा बनाए रखने के लिए उसका समर्थन करते हैं, वे उसे लागू कभी नहीं करेंगे। इसका कारण मनु के वे विधान हैं, जिन्हें अब कोई भी हिन्दू, खास तौर से खुद ब्राह्मण स्वीकार नहीं करेंगे। उनमें से कुछ विधान यहाँ उल्लेखनीय हैं।

मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में मनु का विधान है कि ‘गुरु के आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए 36 वर्ष तक, या 18 वर्ष तक या 19 वर्ष तक तीनों वेद, या दो वेद या एक वेद पढ़े, उसके बाद ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।’ कितने हिन्दू इस नियम का पालन करने को तैयार होंगे? क्या आज यह संभव है कि कोई हिन्दू, ख़ास तौर से द्विज वर्ण का व्यक्ति 36, 18 या 19 वर्ष तक सिर्फ वेद पढ़े, और कुछ न पढ़े? क्या सिर्फ वेद पढ़ने भर से वह योग्य हो जायेगा? क्या कोई भी दर्शन, विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र, वकालत और अंग्रेज़ी पढ़े बिना राष्ट्र और समाज के विकास में योगदान दे पायेगा? आदमी को ज्ञान-विज्ञान से वंचित करने वाला यह विधान आज कौन हिन्दू स्वीकार करेगा?

मनुस्मृति के नवें अध्याय में व्यवस्था दी गई है कि ‘30 वर्ष का पुरुष 12 वर्ष की कन्या से, और 24 वर्ष का पुरुष 8 की कन्या से विवाह करे।’ यदि मनु का क़ानून लागू हो गया, तो कितने हिन्दू अपनी 8 और 12 वर्ष की कन्याओं का विवाह करने को तैयार होंगे? क्या 8 और 12 वर्ष की यौवन-पूर्व आयु में कन्याओं का विवाह उचित है? यह तो बाल-विवाह की ओर लौटना है, और उस युग की ओर लौटना है, जब लड़कियों का पढ़ना वर्जित था, और आठ साल की उम्र में उनकी शादी कर दी जाती थी। ऐसी लड़कियां कई बीमारियों से ग्रस्त होकर समय-पूर्व ही मर जाती थीं। आज स्त्रियाँ हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। क्या अपने दमन का यह विधान सवर्ण स्त्रियाँ स्वीकार करेंगी?

मनुस्मृति के पांचवें अध्याय में कहा गया है कि ‘विधवा स्त्री मरते दम तक पुनर्विवाह नहीं करे।’ मनुस्मृति में ‘करे’ शब्द राजा के लिए आदेश है, यानी यह राज्य का दायित्व है कि उसे इस व्यवस्था में समाज को रखना ही है। मनु के ये कानून अगर लागू हो गए, तो हिन्दू समाज उसी अवस्था में पहुँच जायेगा, जहाँ से वह इन तमाम कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करके यहाँ तक आया है।

पंजाब में बाबासाहेब की प्रतिमा तोड़ने पर भड़के चंद्रशेखर

नई दिल्ली। जहाँ एक ओर देश संविधान लागू होने की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर गौरवान्वित हो रहा है ,वहीं दूसरी ओर अमृतसर में सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के पास हेरिटेज स्ट्रीट पर परम पूज्य बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने और संविधान की प्रति जलाने की घटना ने जातिवादी मानसिकता के नंगे सच को उजागर कर दिया है। यह कृत्य केवल एक प्रतीकात्मक हमला नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास है। जो समाज के दबे-कुचले वर्गों को उनके अधिकारों और सम्मान से वंचित रखने की घृणित मानसिकता को प्रदर्शित करता है। साथ ही यह घटना इस बात का प्रमाण है कि आम आदमी पार्टी की सरकार इतनी महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक जगह पर भी नागरिकों और प्रतीकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असफल रही है।

जातिवादी ताकतें, जो सदियों से अपने विशेषाधिकारों को बनाएं रखने के लिए षडयंत्र करती रही हैं, इस तरह के कायरतापूर्ण प्रयासों से यह साबित करती हैं कि वे आज भी बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा स्थापित समानता और न्याय की व्यवस्था से भयभीत हैं। संविधान, जिसने भारत को जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर एकता और बंधुत्व का संदेश दिया, उस पर इस प्रकार का हमला दर्शाता है कि कुछ ताकतें अभी भी जातिगत भेदभाव को बनाए रखना चाहती हैं।

बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा को तोड़ने और संविधान को जलाने वालों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे संविधान के मूल्यों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह मानसिकता अब भारत में टिकने वाली नहीं है। ऐसे समय में जब देश संविधान की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, यह घटना हमें याद दिलाती है कि जातिवाद केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक जिंदा चुनौती है। इस चुनौती का सामना करने के लिए समाज को संगठित होकर जातिवादी मानसिकता के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी।

@DGPPunjabPolice को चाहिए कि दोषियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करे, ताकि समाज को यह संदेश मिले कि संविधान की गरिमा और बाबा साहेब के आदर्शों के खिलाफ जाने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून के शिकंजे से बचने का अवसर नहीं मिलेगा। अब समय आ गया है जब हम बाबा साहेब के सपनों के भारत को साकार करने के लिए जातिवाद और नफरत की जड़ों को उखाड़ फेंके। संविधान की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है, और इसकी गरिमा को बनाए रखना हमारा सामूहिक दायित्व। जय भीम, जय भारत, जय संविधान।

  • सोशल मीडिया एक्स पर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर द्वारा लिखा गया पोस्ट 

इंफोसिस के सह-संस्थापक और IISc के पूर्व निदेशक पर SC-ST Act में मामला दर्ज

नई दिल्ली। इंफोसिस के सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन और भारतीय विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक बालाराम पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है। यह मामला सदाशिव नगर पुलिस स्टेशन में सिटी सिविल और सेशन कोर्ट (CCH) के निर्देशों के आधार पर दर्ज किया गया। मामला दर्ज कराने वाले दुर्गप्पा हैं जो भारतीय विज्ञान संस्थान के फैक्लटी सदस्य हैं।

दुर्गप्पा IISc के सेंटर फॉर सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी में फैकल्टी सदस्य थे। बौवी जनजाति समुदाय से आने वाले दुर्गप्पा का आरोप है कि साल 2014 में उन्हें हनी ट्रैप मामले में झूठा फंसाया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। दुर्गप्पा ने उन्हें जातिसूचक गालियां और धमकियां देने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने गोपालकृष्णन और बालाराम के अलावा 16 अन्य लोगों पर भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। इस मामले में अन्य आरोपियों में गोविंदन रंगराजन, श्रीधर वारियर, संध्या विश्वेश्वरैया, हरी केवीएस, दासप्पा, बालाराम पी, हेमलता मिषी, चट्टोपाध्याय के, प्रदीप डी सावकर और मनोहरन शामिल हैं। बता दें कि क्रिस गोपालकृष्णधन भारतीय विज्ञान संस्थान के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य हैं।

 

डॉ. आम्बेडकर की जन्मस्थली से कांग्रेस का नया अभियान शुरू, दलितों-पिछड़ों पर निशाना

महू, मध्य प्रदेश। देश भर के दलितों को कांग्रेस के पाले में एकजुट करने के लिए कांग्रेस पार्टी और इसके नेता राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया है। गणतंत्र दिवस के एक दिन बाद 27 जनवरी को कांग्रेस ने बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मस्थली महू से इसका आगाज कर दिया। महू में जय बापू,जय भीम, जय संविधान रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार, भाजपा और आरएसएस पर जमकर निशाना साधा। राहुल गांधी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत पर हमला बोलते हुए कहा कि, वे कहते हैं कि आजादी 15 अगस्त 1947 को नहीं मिली। यह संविधान पर हमला है। भाजपा को निशाने पर लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा संविधान खत्म कर देश की संपत्ति को अडानी-अंबानी को देना चाहती है। वंचित समाज को आगाह करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि अगर संविधान खत्म हुआ तो दलित, आदिवासी, ओबीसी के लिए कुछ नहीं बचेगा। तमाम संसाधनों और संस्थानों में दलितों और आदिवासियों की गैर-मौजूदगी का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि हमारी सरकार आई तो हम दलितों और आदिवासियों को भागीदारी देंगे और जाति जनगणना करवाएंगे। हम आरक्षण के 50 प्रतिशत कोटे के नियम को बदल देंगे। राहुल गांधी का पूरा भाषण आप यहां वीडियो में सुनिये-

26 जनवरी की झांकी में बुद्ध और बाबासाहेब

नई दिल्ली। भारत के 76वें गणतंत्र दिवस के मौके पर कर्तव्य पथ पर झांकी निकली। इस दौरान भगवान बुद्ध और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की झांकी भी निकली।

गणतंत्र दिवस पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने उठाया बहुजनों का मुद्दा

सुश्री मायावतीनई दिल्ली। जब देश में 76वां गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा था, बसपा सुप्रीमों मायवती ने ऐसा मुद्दा उठाया, जिसका जिक्र अब नहीं होता। देश-विदेश में रहने वाले भारतीयों का गणतंत्र दिवस की शुभकामना देते हुए बहनजी ने कहा कि- भारत के विकास में हर भारतीय का हक है। अतः बड़े-बड़े पूंजीपतियों व धन्नासेठों की संख्या में हो रही वृद्धि से अधिक बहुजन व अन्ततः देशहित में देश की पूंजी में विकास जरूरी। सरकार की नीति आमजनहित को बढ़ावा देने वाली हो तो उचित ताकि अपार गरीबी, बेरोजगारी आदि की समस्याएं दूर हों। देखिए दलित दस्तक की वीडियो रिपोर्ट-

कर्पूरी ठाकुर के 10 फैसले, जिसने बिहार में बदल दी दलितों-पिछड़ों की जिंदगी

24 जनवरी, 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौझिया को अपने जन्म से धन्य करने वाले कर्पूरी ठाकुर वंचित बहुजन समाज में जन्मे उन दुर्लभ नेताओं में एक रहे, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में प्रभावी योगदान के साथ स्वाधीन भारत की राजनीति में भी अमिट छाप छोड़ी। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन से हुई थी।

कर्पूरी ठाकुर ने न सिर्फ सामाजिक न्याय के मोर्चे पर अद्भुत दृष्टान्त स्थापित किया, बल्कि ईमानदारी की भी दुर्लभ मिसाल कायम की। काबिले गौर है कि कर्पूरी उस नाई जाति से थे; जिस जाति का संख्या बल मतदान को प्रभावित करने की स्थिति में कभी नहीं रहा। बावजूद इसके 1952 से लेकर अपने जीवन की शेष घड़ी तक वह विधायक, एक बार सांसद, एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने।

कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का साहस दिखाया। 18 महीने बाद ही उन्हें आरक्षण लागू करने के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। उन्हें अंजाम पता था, बावजूद इसके उन्होंने वंचितों के हित में जोखिम लिया।

मंडल पूर्व युग के महानायक थे कर्पूरी ठाकुर

24 जनवरी, 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौझिया को अपने जन्म से धन्य करने वाले कर्पूरी ठाकुर वंचित बहुजन समाज में जन्मे उन दुर्लभ नेताओं में एक रहे, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में प्रभावी योगदान के साथ स्वाधीन भारत की राजनीति में भी अमिट छाप छोड़ी। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन से हुई थी। इस आन्दोलन को कुचलने के लिए जब अंग्रेजों ने दमनात्मक कार्यवाई की तब युवा कर्पूरी ने गोरिल्ला संघर्ष की नीति का अवलंबन किया। इस क्रम में उन्हें अपनी उच्च शिक्षा बी.ए तृतीय वर्ष में ही समाप्त कर देनी पड़ी। गोरिल्ला संघर्ष के दौरान उन्होंने नेपाल की सरहद से आन्दोलन चलाया। आन्दोलन शांत होने पर वो वापस  पितौझिया लौटे और शिक्षक की नौकरी करने लगे।

उनके शिक्षण कार्य के दौरान ही जब जय प्रकाश नारायण ने हजारीबाग जेल से छूटने के बाद ‘आज़ाद दस्ता ‘गठित किया, विप्लवी कर्पूरी उसके सदस्य बन गए। इस दस्ते से जुड़कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ अभियान चलाने के जुर्म में उन्हें 23 अक्तूबर, 1943 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल में उन्होंने अपनी मांगे मनवाने के लिए भूख हड़ताल कर दी, जो 27 दिनों तक चली। इससे जेल में बंद राजनीतिक बंदियों के बीच उन्होंने भारी सम्मान अर्जित कर लिया। तेरह माह बाद जब कर्पूरी ठाकुर जेल से रिहा हुए, तभी कई लोगों ने उनके भविष्य का नेता होने की घोषणा कर दी। मार्च 1946 में उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और 1947 तक वे इस पार्टी के जिला मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने यासनगर और विक्रम पट्टी के जमींदारों के खिलाफ बकारत आन्दोलन चलाकर वंचितों में 60 बीघे जमीन वितरित करवा दिया। बाद में पार्टी में उनका प्रमोशन हो गया और वे 1948 से 1953 तक सोशलिस्ट पार्टी के प्रांतीय सचिव रहकर पार्टी की विचारधारा जन-जन तक पहुंचाते रहे।

  स्वाधीन भारत की राजनीति में सही मायने में उन्होंने अपनी उपस्थिति 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में दर्ज कराया, जब वे ताजपुर विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के प्रार्थी के रूप में चुनाव जीतने में सफल रहे। उसके बाद तो उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कर्पूरी जी 1952 के बाद 1957 और 1962 में भी चुनाव जीतने में सफल रहे। बाद में जब लोहिया ने ‘कांग्रेस हराओ, देश बचाओं’ का नारा उछाला, तब कर्पूरी ठाकुर न सिर्फ एक बार फिर से चुनाव जीते, बल्कि बिहार के महामाया सरकार में उप मुख्यमंत्री भी बने। 1970 का मध्यावधि चुनाव जीतने बाद वह 22 दिसंबर, 1970 को बिहार के मुख्यमंत्री बनें। उनकी जाति को देखते हुए तब यह असंभव माना जाता था, लेकिन उन्होंने यह कारनामा कर दिखाया। खास बात यह रही कि वो कभी रबर स्टाम्प सीएम नहीं रहें, बल्कि जनता के लिए जो बेहतर फैसला था, खुल कर लिया।

1972 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस सत्ता पर पुनः कब्ज़ा जमाने में सफल रही। किन्तु उस प्रतिकूल राजनीतिक हालात के बावजूद कर्पूरी ठाकुर बिहार विधान सभा में पहुचने में सफल रहे। उसके बाद आया 1974 का घटना बहुल दौर। जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 18 मार्च, 1974 को बिहार में छात्र आन्दोलन की शुरुआत की। उनके आह्वान पर जिस शख्स ने सबसे पहले विधान सभा की सदस्यता का परित्याग कर उनके साथ चलने का मन बनाया; वह कर्पूरी ठाकुर रहे।

जेपी का आन्दोलन बड़ी तेजी से विस्तार लाभ करते जा रहा था, जो देश में इमरजेंसी का कारण बना। इस दौरान 26 जून को अधिकांश नेता मीसा में गिरफ्तार कर लिए गए। इस स्थिति में गोरिल्ला संघर्ष के माहिर कर्पूरी फिर नेपाल चले गए और वहां के जंगलों में रहकर आन्दोलनकारी छात्रों और आन्दोलन समर्थक दलों के कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करने लगे। जल्द ही नेपाल की पुलिस को कर्पूरी ठाकुर की भूमिगत गतिविधियों की जानकारी मिल गयी। इसकी भनक लगते ही वे 5 सितम्बर, 1975 को चेन्नई के लिए निकल गए। इस नाजुक दौर में वे तरह-तरह का वेश बदलकर मुंबई, दिल्ली, गोरखपुर, लखनऊ, बनारस इत्यादि जगहों से जेपी आन्दोलन को बल प्रदान करते रहे। आखिरकार आपातकाल का दौर ख़त्म हुआ और जेपी आन्दोलन से जुड़े बहुतों की तरह कर्पूरी ठाकुर को योग्य पुरस्कार मिला।

आपातकाल की समाप्ति के बाद 1977 में लोकसभा चुनाव हुआ जिसमें कई गैर-कांग्रेसी दलों के विलय से बनी जनता पार्टी ने चुनावी सफलता के नए प्रतिमान स्थापित किये। जून 1977 में ही बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ जिसमें जनता पार्टी लोकसभा चुनाव की भांति ही विजयी रही। मुख्यमंत्री पद की दावेदारी सत्येन्द्र बाबू और कर्पूरी ठाकुर के बीच थी, जिसमें कर्पूरी सफल रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे फुलपरास उप चुनाव में विजयी होकर एकबार फिर विधायक बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद यूँ तो उन्होंने कई बड़े काम किये, किन्तु जिस तरह उन्होंने 1978 में पिछड़ी जातियों और कमजोर वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया, वह सामाजिक न्याय के इतिहास में मील का पत्थर बन गया। उस जमाने में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण लागू कर कितने साहस का काम किया इसका अनुमान वे ही लगा सकते हैं, जिन्होंने मंडल उत्तर काल के इतिहास को चाक्षुष (आंखों से देखा) किया है।

 स्मरण रहे 7 अगस्त, 1990 को मंडलवादी आरक्षण की घोषणा के बाद जहां सदियों के परम्परागत रूप से सुविधा संपन्न व विशेषाधिकार युक्त तबके की काबिल संतानों ने आत्म-दाह से लेकर राष्ट्र के संपदा दाह का अभियान छेड़ा, वहीं वर्तमान में देश की सबसे बड़ी पार्टी की ओर से रामजन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया गया, जिसके फलस्वरूप असंख्य लोगों की प्राण हानि और राष्ट्र की कई हजार करोड़ की संपदा की हानि हुई। बाद में जब 2006 में पिछड़ों के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में आरक्षण लागू हुआ। सवर्णों की काबिल संताने सरफरोशी की तमन्ना लिए मंडल-2 के खिलाफ फिर सडकों पर उतर आयीं। उसके बाद 2013 में जब उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में त्रि-स्तरीय आरक्षण लागू हुआ, जिसे यह लेखक मंडल-3 कहता है, सवर्णों का शिक्षित युवा वर्ग फिर सड़कों पर उतर आया।

 साफ है कि सत्तर के दशक में प्रतिकूल स्थिति में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का साहस दिखाया, उससे समाज को बहुत लाभ मिला लेकिन इस दुस्साहस की उन्हें कीमत भी अदा करनी पड़ी। उनके निर्णय के विरुद्ध सवर्ण सडकों पर उतर आए और कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ जमकर जातिवादी नारे लगाएं। यहां सुनने में वो भले असभ्य लगें लेकिन उसे बताना इसलिए जरूरी है कि आरक्षण के खिलाफ सवर्ण किस तरह वंचित समाज के एक मुख्यमंत्री को खुलेआम भद्दे नारे गढ़ ललकार रहे थे। तब सवर्णों ने नारा लगाया- ‘आरक्षण कहाँ से आई – कर्पूरी की माँ बियाई’, ‘कर्पूरी कर्पूरा-छोड़ गद्दी पकड़ उस्तुरा’। हमेशा की तरह मीडिया भी आरक्षण विरोधी माहौल बनने में जुट गयी। फलस्वरूप 18 महीने बाद ही उन्हें आरक्षण लागू करने के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। ऐसा नहीं कि कर्पूरी ठाकुर इस अंजाम से नावाकिफ थे। उन्हें अंजाम पता था, बावजूद इसके उन्होंने वंचितों के हित में उस ज़माने में आरक्षण लागू करने का जोखिम लिया। यह बात उन्हें महान और जन नायक बनाती है।

कर्पूरी ठाकुर ने न सिर्फ सामाजिक न्याय के मोर्चे पर अद्भुत दृष्टान्त स्थापित किया, बल्कि ईमानदारी की भी दुर्लभ मिसाल कायम की। काबिले गौर है कि कर्पूरी उस नाई जाति से थे; जिस जाति का संख्या बल मतदान को प्रभावित करने की स्थिति में कभी नहीं रहा। बावजूद इसके 1952 से लेकर अपने जीवन की शेष घड़ी तक वह विधायक, एक बार सांसद, एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने। राजनीति की इतनी बुलन्दियाँ छूने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर का न तो कोई अपना बंगला-गाड़ी और टेलीफोन रहा और न ही बैंक बैलेंस। रहा तो बस पितौझिया (वर्तमान में कर्पूरी ग्राम) का अपना खपरैल का पुश्तैनी मकान।

 कर्पूरी ठाकुर का बेदाग़ जीवन आज के सामाजिक न्याय के नायक/नायिकाओं के लिए प्रेरणा का एक विराट विषय होना चाहिए। फुले, शाहूजी, पेरियार, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, कांशीराम, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर जैसों के प्रयास से आज बहुजन समाज में इतनी राजनीतिक चेतना आ गयी है कि उसका उपयोग कर सामाजिक न्याय के नायक/नायिका बड़ी आसानी से केंद्र की सत्ता दखल कर सामाजिक बदलाव का सपना पूरा कर सकते हैं। किन्तु वंचित जातियों के विपुल समर्थन से पुष्ट सामाजिक न्याय के नायक/नायिका घपला-घोटालों में फंसकर अपना तेज खोकर खुद करुणा के पत्र बन चुके हैं। इससे भारत में सामाजिक न्याय का संघर्ष दम तोड़ता नजर आ रहा है। काश! बहुजन समाज के नेता सामाजिक न्याय की राजनीति के पुरोधा व ईमानदारी के एवरेस्ट कर्पूरी ठाकुर का अनुसरण किये होते तो बहुजन आंदोलन आज एक अलग मुकाम पर होता।

गणतंत्र दिवस परेड के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी परिवार को भेजा न्योता

दिल्ली। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए आदिवासी परिवार को न्यौता भेजा है। जिसके बाद 22 जनवरी को यह परिवार दिल्ली पहुंच चुका है। 26 जनवरी की परेड में शामिल होने के लिए छत्तीसगढ़ के कवर्धा के बैगा आदिवासी परिवारों को राष्ट्रपति भवन की ओर से न्यौता भेजा गया था। बैगा आदिवासी सबसे पिछड़ी हुई आदिवासी जनजाति में से एक हैं। राष्ट्रपति मुर्मू की ओर से जिन तीन परिवारों को निमंत्रण भेजा गया है, इसमें से कई ऐसे हैं जो पहली बार दिल्ली आए हैं।

इस दौरान राष्ट्रपति इनसे मुलाकात करेंगी, साथ ही वो इन मेहमानों के साथ डिनर भी करेंगी। दिल्ली में इन परिवारों को चुनिंदा जगहों को दिखाने का भी प्लॉन है।

राष्ट्रपति द्वारा निमंत्रण मिलने से ये सभी काफी खुश हैं। गणतंत्र और लोकतंत्र की ताकत भी यही है कि जिन जगहों पर दलित औऱ वंचित समाज की इंट्री बैन थी, अब वहां उन्हें आमंत्रित किया जा रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू खुद आदिवासी समाज से आती हैं, ऐसे में निश्चित तौर पर उन्होंने एक उदाहरण पेश किया है।

हालांकि राष्ट्रपति ने जिन आदिवासी परिवारों को दिल्ली बुलाया है, उनसे जुड़ा एक वीडियो सामने आया है, जिसमें न उनके पास ढंग का घर दिख रहा है और न ही घरों तक सड़क ही पहुंच पाई है। ऐसे में क्या राष्ट्रपति के इस निमंत्रण का फायदा इस समाज को मिलेगा, और उनको बुनियादी सुविधाएं मिल पाएंगी? अगर ऐसा होता है तो इस निमंत्रण की सार्थकता है, वरना यह निमंत्रण एक राजनीतिक स्टंट बन कर रह जाएगा और चार दिन की दिल्ली की चांदनी से वापस लौटकर यह परिवार फिर उसी गरीबी और बदहाली में पहुंच जाएगा।

दिल्ली चुनाव में दलितों को रिझाने की भाजपा-कांग्रेस की नई रणनीति

दिल्ली। भारत की राजधानी दिल्ली का विधानसभा चुनाव हमेशा से रोचक रहा है। भले ही दिल्ली सरकार के पास ज्यादा ताकत न हो, लेकिन दिल्ली तमाम दलों के लिए नाक की लड़ाई है। ऐसे में इस बार भी तमाम दल दिल्ली वालों का दिल जीतने निकल पड़े हैं। सबसे अपने वादे और अपने दावे हैं लेकिन दिल्ली की राजनीति के केंद्र में दलित समाज के वोटर हैं। यह प्रदेश की 70 विधानसभा सीटों में से 12 आरक्षित सीटों के अलावा तकरीबन 25 सीटों पर हार-जीत का फैसला करते हैं। उनको लुभाने के लिए तमाम दल तमाम तिकड़म कर रहे हैं। देखिए यह रिपोर्ट-

पानी का मटका छूने पर दलित को पीटा, किडनैप कर फिरौती के डेढ़ लाख भी वसूले

झुंझुनू, राजस्थान। दलित समाज के एक व्यक्ति के पानी का मटका छूने पर उसकी बेहरमी से पिटाई की गई। और जब पिटाई से भी मन नहीं भरा तो उसे अगवा कर छोड़ने के लिए डेढ़ लाख रुपये मांगे गए। मामला राजस्थान के झूंझुनू जिले की है। यहां के पचेरी कलां थाना क्षेत्र में 18 जनवरी को घटी।

ट्रैक्टर चालक चिमनलाल मेघवाल एक ईंट भट्ठा पर ईंट लेने गया था। उस दौरान प्यास लगने पर चिमनलाल घड़े से पानी पीने लगा। यह देखकर ईंट भट्ठा मालिक विनोद यादव भड़क उठा और जातिवादी गाली देते हुए उसे लात मार दी। इसके बाद विनोद और दो अन्य लोग उसे कार से हरियाणा के रेवाड़ी ले गए, जहां उसकी जमकर पिटाई की गई। जब घर वालों को पता लगा और उन्होंने चिमनलाल मेघवाल को छोड़ने की गुहार लगाई तो विनोद यादव और उसके साथियों ने चिमनलाल को छोड़ने के लिए परिवार से डेढ़ लाख रुपये मांगे। जब पीड़ित के भाई ने पैसे दिए, तब उसे छोड़ा गया। कैद से छूटने के बाद पीड़ित और परिवार ने रविवार 19 जनवरी को मामला दर्ज कराया। पुलिस ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

बता दें कि यहां ईट भट्ठा मालिक यादव समाज यानी पिछड़े समाज से है। यानी साफ है कि दलित समाज सिर्फ सवर्णों के अत्याचार का शिकार ही नहीं है, बल्कि पिछड़े समाज के कई तबके दलित उत्पीड़न के मामले में ज्यादा उग्र दिखाई देते हैं। अगर चिमनलाल मेघवाल दलित जाति का न होता तो क्या उसे पानी का मटका छूने के लिए इतना प्रताड़ित किया जाता ? जवाब है बिल्कुल नहीं। अगर चिमनलाल ‘मेघवाल’ न होकर ऊंची या पिछड़ी जाति का होता और उसे प्यास लगती और मटका छू जाता तो भी क्या ईंट भट्ठा चालक विनोद यादव उसके साथ इतनी क्रूरता करता? जवाब है बिल्कुल नहीं। इसलिए हम कहते हैं… कास्ट मैटर्स

संविधान सुरक्षा सम्मेलन में पटना पहुंचे राहुल गांधी, भाजपा-आरएसएस पर किया जोरदार हमला

देश भर में एक के बाद एक सम्मेलन कर रहे राहुल गांधी संविधान सुरक्षा सम्मेलन के तहत शनिवार 18 जनवरी को पटना में पहुंचें। इस दौरान उन्होंने बिहार को क्रांतिकारी धरती बताया। राहुल गांधी ने कहा कि बिहार एक क्रांतिकारी प्रदेश है। देश में जब भी बदलाव आता है, बिहार से आता है। अगला चुनाव बिहार में है और ये विचारधारा की लड़ाई है। आप सभी कांग्रेस के बब्बर शेर हो, RSS-BJP की विचारधारा को हमें हराना है। इंडिया गठबंधन BJP-RSS को हराएगा। राहुल गांधी के पूरे भाषण का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

दलित सरपंच को मंदिर में जाने से रोका, भाजपा नेता पर आरोप

महिला दलित सरपंच से बात करते मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारीमध्य प्रदेश। आरएसएस दलित और आदिवासी समाज के बच्चों को महाकुंभ ले जाने की कवायद में जुटी है। इसी बीच मध्य प्रदेश के देवास जिले में एक दलित महिला सरपंच को मंदिर जाने से रोकने का मामला सामने आया है। जिले के हाथलोई पंचायत की एक दलित महिला सरपंच ने आरोप लगाया है कि भाजपा के नेताओं ने उन्हें मंदिर जाने से रोका। घटना की सूचना मिलते ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने महिला को मंदिर ले जाकर दर्शन करवाया। पटवारी ने इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है।

दलित सरपंच रामदीन का आरोप है कि उन्हें कहा जाता है कि तुम हिन्दू नहीं हो इसलिए मंदिर में मत आओ। इस मामले में जिस तरह भाजपा नेताओं का नाम सामने आ रहा है, वह भी कई सवाल उठाता है। जिस तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री लगातार महाकुंभ को लेकर सक्रिय हैं और देश-दुनिया में इसको लेकर प्रचार कर रहे हैं। जबकि भाजपा की ही दूसरे राज्यों के सरकारों में पार्टी के नेता ही दलितों को मंदिरों में जाने से रोक रहे हैं। यह भाजपा नेताओं का दोहरा चेहरा नहीं तो फिर क्या है?