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ONGC में एससी-एसटी अधिकारियों के खिलाफ साजिश!

एससी-एसटी कर्मचारियों ने DPC Marks यानी डिपार्टमेंटल प्रोमोशन कमिटी द्वारा दिये जाने वाले 10 नंबरों को मनमाने तरीके से दिए जाने और इसके बूते एससी/एसटी कर्मचारियों को प्रोमोशन से दूर रखने का खेल रचे जाने का आरोप लगाया है।

दलितों और आदिवासी कर्मचारियों की अनदेखी के लिए तमाम संस्थाओं ने जाल बिछा रखा है। कहीं नॉट फाउंड सुटेबल के नाम पर तो कहीं किसी और नाम पर। इसका ताजा Example देश की प्रमुख महारत्न तेल-गैस कंपनी ONGC से सामने आया है। एससी-एसटी कर्मचारियों ने DPC Marks यानी डिपार्टमेंटल प्रोमोशन कमिटी द्वारा दिये जाने वाले 10 नंबरों को मनमाने तरीके से दिए जाने और इसके बूते एससी/एसटी कर्मचारियों को प्रोमोशन से दूर रखने का खेल रचे जाने का आरोप लगाया है।

खास तौर पर कंपनी के Exploration Directorate की Geology शाखा में। इसको लेकर All India SC/ST Employees Welfare Association,  Association of scientific & technical officers (ASTO) और ONGC officers Association (OOA) ओएनजीसी के Chairman & CEO को पत्र लिखकर प्रमोशन सूची की समीक्षा की मांग कर चुकी है। मामला एससी-एसटी आयोग तक में पहुंच चुका है।

दलित दस्तक के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक 29 मार्च 2025 को Geology में E4 से E5 स्तर पर कुल 38 अधिकारियों को प्रमोशन मिला। इनमें 2001-2006 बैच तक के सीनियर मोस्ट अधिकारियों को दरकिनार करते हुए 2007-2008 बैच के जूनियर अधिकारियों को तव्वजो दी गई। कुल 38 प्रोमोशन में से 33 अधिकारी 2007 और 2008 बैच के थे। जबकि 2001, 2003, 2004 और 2006 बैच से महज पांच अधिकारियों को ही प्रोमोट किया गया। यानी कुल प्रमोशन में करीब 87 फीसदी हिस्सा 2007-08 बैच का रहा। जिसमें से सबसे अधिक 71% केवल सबसे जूनियर मोस्ट 2008 के खाते में गया।

बात यही नहीं रुकी। साल 2026 के प्रोमोशन में फिर से यही खेल हुआ। इस साल हुए कुल 29 प्रोमोशन में 2001 से 2006 बैच के सिर्फ 7 लोगों को प्रोमोशन मिला, जबकि अकेले 2008 बैच के 13 लोगों को प्रोमोट किया गया, जो कि कुल सीटों का 45 फीसदी है। ऐसे में सवाल यह है कि ओएनजीसी में प्रोमोशन किस आधार पर हो रहा है? और सीनियर मोस्ट अधिकारियों की अनदेखी कर जूनियर अधिकारियों को प्रोमोट करने के पीछे आखिर क्या खेल है?

मार्च 2025 की प्रमोशन सूची को लेकर सबसे पहली आपत्ति वरिष्ठता को लेकर सामने आई। इस सन्दर्भ में अप्रैल और मई 2025 में अधिकारियों के संघ ASTO, All India SC/ST Employees Welfare Association और OOA ने  ONGC के Director HR और चेयरमैन को पत्र लिखकर प्रमोशन सूची की समीक्षा की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि कुल 38 प्रमोशन में 33 अधिकारी 2007 और 2008 बैच से कैसे हो सकते हैं, जबकि उनसे पुराने बैच के सीनियर अधिकारियों को प्रोमोशन में काफी कम जगह मिली है।

यह पूरा विवाद केवल वरिष्ठता तक सीमित नहीं है। प्रमोशन पाने वाले अधिकारियों की कैटेगरी यानी सामाजिक श्रेणी के प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

साल 2025 में हुए कुल 38 प्रमोशन में 28 अधिकारी General category से, 6 OBC से और 3 शिड्यूल ट्राइब यानी एसटी कैटेगरी से थे, जबकि शिड्यूल कॉस्ट यानी एससी कैटेगरी से सिर्फ एक अधिकारी का प्रोमोशन हुआ। यानी पूरी सूची में SC और ST को मिलाकर यह संख्या सिर्फ चार अधिकारियों की है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जब शिड्यूल ट्राइब से 3 लोगों को प्रमोशन दिया गया तो SC श्रेणी से केवल 01 को प्रमोशन किस आधार पर मिला?

इसी तरह साल 2026 में भी वही खेल देखने को मिला। इस साल हुए  कुल 29 प्रोमोशन में से एससी कैटेगरी से सिर्फ एक अधिकारी का प्रमोशन हुआ, जबकि ST कैटेगरी से 02 लोगों को प्रोमोशन मिला।

जातिगत भेदभाव की बातों को ONGC यह कहते हुए खारिज करता है कि यहां आरक्षण नहीं है। इसको लेकर दायर RTI के जवाब में ONGC का साफ कहना है कि E4 से E5 का प्रमोशन Group-A से Group-A प्रमोशन है और इसमें आरक्षण लागू नहीं होता। चलिए इसको मान लेते हैं। लेकिन सवाल है कि सीनियर मोस्ट अधिकारियों को अनदेखा कर यही ONGC जूनियर अधिकारियों को प्रोमोशन आखिर किस आधार पर देता है।

दलित दस्तक की पड़ताल में जो नियम सामने आएं, वह हैरान करने वाले थे। क्योंकि इससे आपको यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की भर्ती में NFS यानी नॉट फाउंड सुटेबल वाली कहानी याद आ जाएगी। फर्क यह है कि यहां NFS  की जगह DPC है। दरअसल 10 नंबर की यह DPC तय करती है कि प्रोमोशन की लिस्ट में कौन इंपैनल होगा और कौन बाहर रह जाएगा।

सबसे पहले ONGC में प्रोमोशन की प्रक्रिया को समझते हैं। RTI के जरिए सामने आई जानकारी के मुताबिक प्रमोशन के लिए अधिकारियों का मूल्यांकन कई आधारों पर किया जाता है।

  • सबसे पहला PAR- यानी Performance Appraisal Review होता है। यह सेंट्रल गवर्नमेंट के ACR- Annul Confidential Report जैसा है। यह 100 मार्क्स का होता है और प्रोमोशन के लिए निर्धारित 100 नंबरों में से इसका प्रतिशत 60 मान लिया गया है। इसमें औसतन सभी को 57-58 प्रतिशत मिलता है।
  • दूसरे नंबर पर है- Q1 Marks- यह क्वालिफिकेशन मार्क होता है। जो 15 नंबर का होता है। सभी को इसमें पूरे नंबर यानी 15-15 नंबर मिल ही जाते हैं।
  • तीसरे नंबर पर Experience Mark होता है, जोकि 5 नंबर का होता है।
  • चौथे नंबर पर ADC Score यानी Assessment development Center Score होता है। यह 10 नंबरों का होता है। इसमें भी एवरेज सभी को 7-8 नंबर मिल जाते हैं।
  • पांचवे नंबर पर आता है, सबसे इंपोर्टंट DPC Marks यानी डिपार्टमेंटल प्रोमोशन कमिटी द्वारा दिया जाने वाला नंबर। यह 10 नंबर का होता है। और इसी DPC के मार्क्स फैसला करते हैं कि किसको प्रोमोशन मिलेगा और कौन बाहर रह जाएगा।। जैसे क्रिकेट में चयन समिति। जैसे खिलाड़ी का औसत चाहे जितना बेहतर हो, उसके टीम-11 में खेलने का फैसला चयन समिति करती है।

RTI से मिले 2025 के आंकड़ों को ध्यान से देखने पर इस खेल में कई खुलासे सामने आते हैं। इस साल 104 लोगों की लिस्ट में एससी के 14 जबकि एसटी वर्ग से 06 अधिकारी प्रोमोशन की दौड़ में थे। इसमें एससी से सिर्फ एक कैंडिडेट को प्रोमोट किया गया।

इस लिस्ट में शामिल एससी कैटेगरी के तीन कैंडिडेट जो कि लिस्ट में नंबर 7, 8 और 21 पर मौजूद थे, उनके साथ खेला हो गया। नंबर 7 पर मौजूद बुद्धाद्वीप कर्माकर को शुरुआती चार कैटेगरी के मार्क्स, जिसमें  PAR, Q1 Marks, Experience Mark और ADC Score शामिल हैं, को मिलाकर 84.2 मिला। जबकि 8 नंबर के कैंडिडेट बोजा मुनेन्द्र कुमार को चारो कैटेगरी मिलाकर 87.92 मार्क्स मिले। 21 नंबर पर मौजूद गौतम कुमार राजन को इन सभी कैटेगरी में टोटल 81.72 नंबर मिले।

अब इनके प्रोमोशन का फैसला DPC Marks यानी डिपार्टमेंटल प्रोमोशन कमिटी द्वारा मिलने वाले 10 नंबरों पर टिका था। लेकिन 7 पर मौजूद बुद्धाद्वीप कर्माकर को DPC में सिर्फ 3 नंबर, 8 नंबर के कैंडिडेट बोजा मुनेन्द्र कुमार को DPC में सिर्फ 2 नंबर, जबकि 21 नंबर पर मौजूद गौतम कुमार राजन को DPC में सिर्फ 4 नंबर मिले, इस तरह यह तीनों प्रोमोशन की दौड़ से बाहर हो गए।

जबकि वहीं दूसरी ओर, 104 लोगों की इसी सूची में 48, 50, 63, 69, 70 और 71 नंबर पर मौजूद जनरल कैटेगरी के कैंडिडेट के नंबरों पर नजर डालिये।

  • 48वें क्रमांक पर मौजूद कैंडिडेट को शुरुआती चारो कैटेगरी में 14 नंबर आए हैं, जबकि DPC में दस में से 9 नंबर आए हैं। इस तरह 89.14 नंबर के साथ उसका प्रोमोशन हो गया है।
  • क्रमांक 50 पर मौजूद एक अन्य कैंडिडेट शुरुआती चारो कैटेगरी मिलाकर 86 नंबर आया, जबकि DPC में उसे 10 में से 9.5 नंबर मिल गए। इस तरह वह 89.36 नंबर के साथ प्रोमोट हो गया।
  • क्रमांक 63 के कैंडिडेट को चारो कैटेगरी में 51 नंबर मिले। उसे भी DPC में 9.5 नंबर मिल गया और 89.01 नंबरों के साथ वह भी प्रोमोट हो गया।
  • इसी तरह 69, 70 और 71 नंबर पर मौजूद कैंडिडेट्स को शुरुआती तीनों कैटेगरी में क्रमशः 14, 80.86 और 80.7 नंबर मिले। इन तीनों को भी DPC में क्रमशः 9.5, 9 और 9.5 नंबर मिल गए और उनका भी प्रोमोशन हो गया।
  • क्रमांक 94 की कैंडिडेट सुजाता रानी मिश्रा को भी DPC में 5 अंक मिले। और शुरुआती चारो कैटेगरी में 79.8 नंबर मिलने के बावजूद DPC में मिले बंपर नंबरों के बूते वह भी प्रोमोट हो गई।

यह चार्ट साफ दिखाता है कि DPC से पहले क्रमांक 7, 8 और 21 पर मौजूद एससी कैंडिडेट्स के अंक 84.20, 85.92 और 81.72 थे। जो कि क्रमांक 48, 50, 63, 69,70,71 और 94 पर मौजूद जनरल कैटेगरी के सभी कैंडिडेट्स से ज्यादा थे। DPC से पहले इन सातों में से किसी का नंबर किसी एससी कैंडिडेट्स से ज्यादा नहीं था।

यानी शेड्यूल कॉस्ट के कैंडिडेट PAR और बाकी कैटेगरी में बढ़त लेने के बाद भी DPC में मिले 2, 3 और 4 नंबरों के कारण प्रोमोट नहीं हो सके। जबकि वहीं जनरल कैटेगरी के कैंडिडेट PAR और बाकी की कैडेगरी में पिछड़ने के बावजूद DPC में मिले बंपर नंबरों के कारण आगे निकल गए।

  • ऐसे में रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट्स के साथ भेदभाव के आरोपों को बल क्यों नहीं मिलना चाहिए?
  • क्या ONGS को यह नहीं बताना चाहिए कि आखिर DPC के नंबरों का आधार क्या है?

आखिर क्या वजह रही कि SC के 14 उम्मीदवारों को DPC में मिले अंकों का औसत दस में से सिर्फ 4.64 रहा। जबकि हमने तुलनात्मक रूप से चयनित जिन जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों का जिक्र किया है, उनका औसत DPC नंबर 9.36 रहा। यही नहीं, जिसका भी प्रोमोशन हुआ उसे DPC में 10 में से 8 से लेकर 9.5 नंबर तक दिये गए। यहां तक की एससी कैटेगरी के क्रमांक 103 पर मौजूद एकमात्र कैंडिडेट अनिल बैरेड्डी का प्रोमोशन हुआ, DPC से पहले उनका नंबर अन्य शुरुआती चार कैटेगरी में बाकी तीन कैंडिडेट से कम 80.57 था। लेकिन उसे DPC में 9.5 अंक मिला, जिसके बूते वह प्रोमोशन के जादू को हासिल करने में कामयाब रहा।

क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है? ONGC को इसका जवाब देना चाहिए।

इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यवस्था के तहत प्रमोशन का फैसला किया गया, वह कितनी पारदर्शी है और उसमें अलग-अलग कर्मचारियों का मूल्यांकन किस तरह किया गया। वरिष्ठ अधिकारियों और SC अधिकारी जो वरिष्ठता सूची में शीर्ष पर थे और भारत सरकार के नियमानुसार, रोस्टर प्रणाली और दूसरे नियमों से Zone of Consideration की श्रेणी में आते थे उनको छोड़कर Junior Most और General कैटेगरी के कैंडिडेट को प्रमोशन कैसे दे दिया गया? सवाल उठता है कि क्या DPC को हथियार बनाकर ONGC अपने गुड बुक में शामिल कर्मचारियों को ही प्रमोट कर रही है?

ONGC में SC/ST कर्मचारियों के प्रमोशन और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। जुलाई 2023 में National Commission for Scheduled Castes यानी NCSC ने ONGC के साथ SC आरक्षण, खाली पदों, कर्मचारियों के कल्याण और शिकायतों से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की थी। उस दौरान SC कर्मचारियों के संगठन ने corporate-level promotions में SC/ST आरक्षण लागू करने की मांग भी उठाई थी। संसदीय समिति भी समय-समय पर SC ST के उचित प्रतिनिधित्व के लिए समीक्षा और उचित निर्देश देती रही है, लेकिन यह आज तक जमीन पर नहीं उतर सका है।

प्रोमोशन की इस पूरी प्रक्रिया में एक बात और ध्यान खिंचती है कि SC कैंडिडेट में केवल Junior Most को ही क्यों प्रोमोट किया जाता है, और इसी कैटेगरी के Senior अधिकारियों की अनदेखी क्यों की जाती है? ओएनजीसी के नियमों से बंधे होने के कारण नाम को सामने नहीं लाने की शर्त पर शिड्यूल कॉस्ट के अधिकारियों का कहना है कि- ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि उसे आगे प्रमोशन में उचित अवसर नहीं मिल पाए। क्योंकि E5 की Seniority में वह सबसे नीचे रहेगा जिसकी वजह से वह कभी भी निर्यायक पदों तक नहीं पहुंच पाएगा। उनका आरोप है कि ऐसा कर शेड्यूल कॉस्ट के लोगों को आगे बढ़ने से रोकने की साजिश की जाती है।

साफ है कि DPC के नंबरों के जरिये ONGC में दलितों के प्रोमोशन को रोकने का खेल सालों से चल रहा है। सवाल यह है कि यह कब तक चलता रहेगा?

हाल ही में भारत सरकार ने समुद्र के भीतर तेल और गैस के नए भंडार खोजने के लिए ‘समुद्र मंथन’ नाम से 84,084 करोड़ रुपये की बड़ी योजना शुरू की है। तो वहीं Geology जो इस पूरे exploration अभियान की तकनीकी रीढ़ हैं वहां सीनियर और काबिल अधिकारियों को पीछे छोड़कर DPC के जरिये ओएनजीसी का के समुद्र मंथन का अमृत सिर्फ कुछ खास लोगों में ही क्यों बांटा जा रहा है? भेदभाव के इन तमाम सवालों का जवाब ओएनजीसी और संबंधित मंत्रालय को देना चाहिए?

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