2014 में चायवाला और अब चौकीदार, मायावती ने नरेंद्र मोदी पर साधा निशाना

नई दिल्ली। आम चुनाव 2019 के लिए राजनीतिक मैदान सच चुका है. राजनेता अपने तरकश से सियासी तीरों के जरिए एद दूसरे पर निशाना साधने का एक भी मौका नहीं चूक रहे हैं. इस समय देश में चौकीदार पर चर्चा छिड़ी हुई है. पीएम नरेंद्र मोदी अपने आप को चौकीदार कहते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें चौकीदार चोर कहते हैं. इन सबके बीच कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल चौकीदार का जवाब देते हुए अपने नाम से पहले बेरोजगार जोड़ लिया. इसके साथ ही कपिल सिब्बल ने कहा रि द लाई लामा इज ऑवर चौकीदार.

इन सबके बीच बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने पीएम मोदी पर निशाना साधा है.मायावती ने कहा कि अब पीएम नरेंद्र मोदी चायवाला नहीं रह गए हैं उनकी पहचान बदल चुकी है. पिछले चुनाव तक वो चायवाला थे. लेकिन अब चौकीदार बन गए हैं. आप देख सकते हैं कि बीजेपी शासन में किस तरह से बदलाव आ रहा है.

मायावती कहती हैं कि सादा जीवन उच्च विचार के विपरीत शाही अन्दाज में जीने वाले जिस व्यक्ति ने पिछले लोकसभा आमचुनाव के समय वोट की खातिर अपने आपको चायवाला प्रचारित किया था, वे अब इस चुनाव में वोट के लिये ही बड़े तामझाम व शान के साथ अपने आपको चोकीदार chowkidar घोषित कर रहेे हैं. देश वाकई बदल रहा है?

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कांग्रेस पर इतनी हमलावर क्यों हैं मायावती

बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी एक बार फिर साफ तौर पर यह स्पष्ट कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी से हमारा किसी भी प्रकार का कोई तालमेल व गठबंधन आदि बिल्कुल भी नहीं है। हमारे लोग कांग्रेस पार्टी द्वारा आये दिन फैलाये जा रहे, इनके किस्म-किस्म के हथकण्डों के भ्रम में कतई भी ना आयें.

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में भी पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह यहाँ की सभी 80 लोकसभा की सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करके अकेले यह चुनाव लड़े. और वैसे भी हमारा यहाँ बना गठबंधन अकेले बीजेपी को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है. इसलिए कांग्रेस पार्टी जबर्दस्ती यूपी में गठबंधन हेतु 7 सीटें छोड़ने की भ्रान्ति ना फैलायें.

यह बहुजन समाज पार्ट की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती का बयान है, जो उन्होंने 18 मार्च को मीडिया को जारी किया है. मायावती ने अपने इस बयान को ट्विट भी किया था.

इससे पहले 12 मार्च को बसपा द्वारा जारी एक बयान में बसपा अध्यक्ष के हवाले से यह कहा गया था कि बीएसपी किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी चुनावी समझौता या तालमेल आदि करके यह चुनाव नहीं लड़ेगी. तमाम अखबारों और चैनलों ने बसपा प्रमुख के इस बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया.

अपने इन दो बयानों में मायावती ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है. हालांकि यूपी के अलावा उत्तराखंड और मध्यप्रदेश में गठबंधन की उसकी सहयोगी समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस को लेकर लचीला है. अखिलेश यादव कई बयानों में कांग्रेस को लेकर बात कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने हालिया बयानों से कांग्रेस से दुश्मनी नहीं दिखाई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर मायावती कांग्रेस को लेकर इतनी हमलाकर क्यों हैं और बार-बार कांग्रेस पार्टी को निशाने पर क्यों ले रही हैं?

इसकी दो वजहें हो सकती हैं… विधानसभा चुनावों के दौरान पहले गुजरात, फिर मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन को लेकर बात हुई थी. लेकिन तब कांग्रेस पार्टी बसपा को सम्मानजनक सीटें देने को तैयार नहीं हुई थी. इसको लेकर मायावती काफी नाराज थीं.

दूसरी बात यह हो सकती है कि बसपा की रणनीति के मुताबिक इस बार उसका जोड़ दलित-पिछड़े गठबंधन के अलावा मुस्लिम और ब्राह्मण वोटों पर है. बसपा पहले भी इस गठजोड़ के भरोसे चुनाव में उतर चुकी है और सफल भी रही है. कांग्रेस पार्टी भी शुरू से ही ब्राह्मण-दलित और मुस्लिम गठबंधन के सहारे दशकों तक सत्ता में रही है. संभव है कि बहनजी को डर हो कि कहीं इस समुदाय का कुछ हिस्सा केंद्र में नेतृत्व बदलने के नाम पर कांग्रेस के साथ न हो जाए.

बीच में एक खबर यह भी आई थी कि कांग्रेस और बसपा के बीच अखिल भारतीय स्तर पर गठबंधन को लेकर बात चल रही है. हालांकि किसी पार्टी ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं कि लेकिन इसको लेकर काफी चर्चा रही. फिर खबर आई कि आखिरी वक्त में यह फार्मूला सफल नहीं हो सका. इसके पीछे कांग्रेस पार्टी के अड़ियल रुख की बात कही गई. दरअसल जिन राज्यों में कांग्रेस मजबूत है, वहां वह बसपा के लिए सीटें छोड़ने को तैयार नहीं होती है. और जिस उत्तर प्रदेश में वह कमजोर है वहां वह बसपा से गठबंधन की चाहत रखती है. इसलिए यह गठबंधन नहीं हो पाता. संभव है कि कांग्रेस पार्टी के इसी अड़ियल रुख से बहनजी ने भाजपा के साथ कांग्रेस को भी लगातार निशाने पर लिया है.

अगर उत्तर प्रदेश से बाहर अन्य राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में बसपा को न सिर्फ वोट मिले हैं बल्कि वह विधानसभा सीटें जीतने में भी कामयाब रही है. यूपी से बाहर बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 11 विधायकों तक का रहा है.

हालांकि गठबंधन के सवाल पर जिस तरह से बसपा प्रमुख लगातार कांग्रेस पर हमलावर हैं, वह समझ से परे है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने कभी भी बसपा और सपा के साथ गठबंधन की कोई बात नहीं की है. प्रदेश में सब जानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन में बसपा शामिल नहीं है. इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर हमला करना संभव है मायावती की किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो.

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पर्रीकर थे ताजी हवा के झोंकों का अहसास

गोवा के मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर पैंक्रियाटिक कैंसर से एक वर्ष तक जूझने के बाद देह से विदेह हो जाना न केवल गोवा बल्कि भाजपा एवं भारतीय राजनीति के लिए दुखद एवं गहरा आघात है. उनका असमय निधन हो जाना सभी के लिए संसार की क्षणभंगुरता, नश्वरता, अनित्यता, अशाश्वता का बोधपाठ है. उनका निधन राजनीति में चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के एक युग की समाप्ति है. भाजपा के लिये एक बड़ा आघात है, अपूरणीय क्षति है. आज भाजपा जिस मुकाम पर है, उसे इस मुकाम पर पहुंचाने में जिन लोगों का योगदान है, उनमें मनोहर पर्रीकर अग्रणी है.

मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु पर्रिकर का जन्म 13 दिसम्बर, 1955 को हुआ. वे राज्य के पारा गांव के कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते थे. वे उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद थे. उन्होंने सन 1978 मे आई.आई.टी. मुम्बई से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करी. भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आई.आई.टी. से स्नातक किया. 1994 में उन्हें गोआ की द्वितीय व्यवस्थापिका के लिये चयनित किया गया था. जून 1999 से नवम्बर 1999 तक वह विरोधी पार्टी के नेता रहे. 24 अक्टूबर 2000 को वे गोआ के मुख्यमन्त्री बने किंतु उनकी सरकार 27 फरवरी 2002 तक ही चल पाई. जून 2002 में वह पुनः सभा के सदस्य बने तथा 5 जून, 2002 को पुनः गोआ के मुख्यमन्त्री पद के लिये चयनित हुए. 13 मार्च 2017 को पर्रिकर ने छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चैथी बार गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. प्लानिंग कमीशन ऑफ इन्डिया तथा इंडिया टुडे के द्वारा किय गए सर्वेक्षण के अनुसार उनके कार्यकाल में गोआ लगातार तीन साल तक भारत का सर्वश्रेष्ठ शासित प्रदेश रहा. कार्यशील तथा सिद्धांतवादी श्री पर्रीकर को गोआ में मि. क्लीन के नाम से जाना जाता है.

मनोहर पर्रीकर भारतीय राजनीति के जुझारू एवं जीवट वाले नेता थे, यह सच है कि वे गोआ के थे यह भी सच है कि वे भारतीय जनता पार्टी के थे किन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि वे राष्ट्र के थे, राष्ट्रनायक थे. देश की वर्तमान राजनीति में वे दुर्लभ व्यक्तित्व थे. टैक्नोलोजी के धनी, उच्च शिक्षा और कुशल प्रशासक के रूप में उन्होंने देश के गौरव को बढ़ाया. उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी, सरलता और इतनी सचाई ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया है. वे तो कर्मयोगी थे, अन्तिम साँस तक देश की सेवा करते रहे. पर्रीकर का निधन एक राष्ट्रवादी सोच की राजनीति का अंत है. वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की शंृखला के प्रतीक थे. उनके निधन को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, राजनीति की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा सकता है. हो सकता है ऐसे कई व्यक्ति अभी भी विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हों. पर ऐसे व्यक्ति जब भी रोशनी में आते हैं तो जगजाहिर है- शोर उठता है. पर्रीकर ने तीन दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे. घाल-मेल से दूर. भ्रष्ट राजनीति में बेदाग. विचारों में निडर. टूटते मूल्यों में अडिग. घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित. उनके जीवन से जुड़ी विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया.

इस शताब्दी के भारत के ‘राजनीति के महान् सपूतों’ की सूची में कुछ नाम हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हंै. मनोहर पर्रीकर का नाम प्रथम पंक्ति में होगा. पर्रीकर को अलविदा नहीं कहा जा सकता, उन्हें खुदा हाफिज़ भी नहीं कहा जा सकता, उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकती. ऐसे व्यक्ति मरते नहीं. वे हमंे अनेक मोड़ों पर राजनीति में नैतिकता का संदेश देते रहेंगे कि घाल-मेल से अलग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है. निडरता से, शुद्धता से, स्वाभिमान से. उन्हें आधुनिक गोवा का निर्माता माना जाता है, मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गोवा को एक नई पहचान दी. केन्द्र में वे नरेन्द्र मोदी सरकार में एक सशक्त एवं कद्दावर मंत्री थे. रक्षामंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान को कड़ा सन्देश दिया, कई नए अभिनव दृष्टिकोण, राजनैतिक सोच और कई योजनाओं की शुरुआत की तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सुधार किया, उनमें जीवन में आशा का संचार किया. उरी हमले के बाद पाक में आतंकियों के शिविरों को नेस्तनाबूद करने वाली सर्जिकल स्ट्राइक में पर्रिकर की अहम भूमिका रही. इसने सादगी के लिए मशहूर पर्रिकर की कुशल प्रशासक की छवि को पुख्ता किया. उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय सेना के सर्जिकल हमले का श्रेय भी संघ की शिक्षा को दिया था.

अपनी सादगी एवं सरलता से उन्होंने राजनीति को एक नया दिशाबोध दिया. आधी बाजू की कमीज और लेदर सैंडल उनकी पहचान थी. मुख्यमंत्री हो या केन्द्रीय मंत्री या अन्य उच्च पदों पर होने के बाद भी पर्रिकर ने अपने रहन-सहन में जरा भी बदलाव नहीं किया. कहा जाता है कि वे अपने राज्य की विधानसभा खुद स्कूटर चलाकर जाया करते थे. इतना ही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने घर को नहीं छोड़ा और सरकार द्वारा दिए गए घर में नहीं गए. गोवा के मुख्यमंत्री रहते हुए एक दफा उन्होंने अपने जन्मदिन पर खर्च होने वाले पैसे को चेन्नई रिलीफ फंड में भेजने की अपील की थी. वे सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों से जुड़े रहते थे और उनकी मदद करते थे. पर्रिकर ने बहुत छोटी उम्र से आरएसएस से रिश्ता जोड़ लिया था. वह स्कूल के अंतिम दिनों में आरएसएस के मुख्य शिक्षक बन गए थे. संघ के साथ अपने जुड़ाव को लेकर कभी भी किसी तरह की हिचकिचाहट उन्होंने नहीं दिखाई. आईआईटी बांबे से इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद भी संघ के लिए काम जारी रखा और पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 26 साल की उम्र में मापुसा में संघचालक बन गए. टेक्नोक्रेट पर्रिकर अक्सर संघ के गणवेश और हाथ में लाठी लिए नजर आते थे. पर्रिकर की शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेहद बीमार होने के बाद भी गोवा में 2019-20 का बजट पेश करने विधानसभा पहुंचे. इस दौरान उन्होंने बेहद आत्मविश्वास से कहा था, ‘मैं जोश में भी हूं और होश में भी हूं.’ उनके इस जोश पर सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्ष ने भी खड़े होकर अभिवादन किया.

वे गोवा के लिए अपनी आवाज उठाने और उसके हक में लड़ने वाले विशिष्ट नेताओं में से एक थे. वे भाजपा संगठन के लिए एक धरोहर थे. उन्होंने भाजपा को गोवा में मजबूत करने के लिए कठोर परिश्रम किया. वह अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे. वे युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आये और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की. भारतीय राजनीति की वास्तविकता है कि इसमें आने वाले लोग घुमावदार रास्ते से लोगों के जीवन में आते हैं वरना आसान रास्ता है- दिल तक पहुंचने का. हां, पर उस रास्ते पर नंगे पांव चलना पड़ता है. पर्रीकर इसी तरह नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले राजनेता थे, उनके दिलो-दिमाग में गोवा एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी. काश! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनके निधन से बोधपाठ लें. निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया.

पर्रीकर भाजपा के एक रत्न थे. उनका सम्पूर्ण जीवन अभ्यास की प्रयोगशाला थी. उनके मन में यह बात घर कर गयी थी कि अभ्यास, प्रयोग एवं संवेदना के बिना किसी भी काम में सफलता नहीं मिलेगी. उन्होंने अभ्यास किया, दृष्टि साफ होती गयी और विवेक जाग गया. उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने के लिए नहीं. खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं. उनके जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें. बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों. इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिनों पर छाये रहे. उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श राजनीतिक व्यक्तित्व हैं जिन्हें सेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है. उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा. यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं. आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया. यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता. आपके जीवन की खिड़कियाँ राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही. इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी.

ललित गर्ग

 

मुजफ्फरनगर में दलित किशोरी के साथ हुआ सामूहिक रेप

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मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 17 वर्षीय एक दलित किशोरी से पांच युवकों ने कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया. पुलिस ने सोमवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि आरोपियों ने घटना का एक वीडियो भी बनाया.

उन्होंने बताया कि यह घटना रविवार को रतनपुरी पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले फुलेट गांव में हुई. पीड़ित के भाई द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, किशोरी पशुओं के लिए चारा एकत्र करने खेतों में गई थी जहां आरोपियों ने उसे पकड़ लिया. शिकायत में कहा गया है कि आरोपियों ने पीड़ित को घटना की जानकारी किसी को भी देने पर वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी दी.

थाना प्रभारी कमल सिंह चौहान ने बताया कि पुलिस ने मामला दर्ज कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. शेष दो को पकड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं.

आपको बता दें कि इस महीने में यह दूसरा मामला है, इससे पहले 8 मार्च को मुजफ्फरनगर में ही एक 15 वर्षीय लड़की के गैंग रेप का मामला सामने आया था. जहां बंदूक के बल पर लड़की के साथ चार लोगों ने रेप किया था.

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चंद्रेशेखर मोदी को हराना चाहते हैं या जिताना?

पिछले कुछ दिनों से, विशेष रूप से जब से लोकसभा चुनावों की सरगर्मी तेज़ हुई है, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद को मीडिया द्वारा काफ़ी स्पेस दिया जा रहा है. कुछ दिन पहले बिना प्रशासनिक अनुमति के रैली करने के लिए उनकी गिरफ़्तारी और 15 मार्च के दिन उनकी हुंकार रैली की ख़बर को कई न्यूज़ चैनलों द्वारा दिखाया गया. अब वाराणसी से उनके चुनाव लड़ने की घोषणा को कई राष्ट्रीय समाचार-पत्रों द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. चंद्रशेखर को मीडिया में स्थान मिले यह अच्छी बात है. चंद्रशेखर ही क्यों, विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दलित-बहुजन समाज की सभी प्रमुख हस्तियों को देश की मीडिया में समुचित स्थान मिलना चाहिए, तभी मीडिया का स्वरूप लोकतांत्रिक बनेगा तथा समाज और राष्ट्र के लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में उसका यह एक महत्वपूर्ण क़दम होगा, जिसकी उससे अपेक्षा है. ऐसा करके मीडिया देश में बन रही अपनी दलित-बहुजन विरोधी छवि से भी उबर सकेगा. किंतु, मीडिया की ऐसी कोई सदिच्छा दूर-दूर तक दिखायी नहीं देती है.

दलित-बहुजनों के प्रति शोषण और अन्याय के प्रतिकार तथा न्याय के लिए उनके संघर्ष को देश के मीडिया का कोई समर्थन नहीं है. समर्थन तो दूर की बात है उनके बड़े-बड़े प्रदर्शनों, रैलियों और अन्य घटनाओं तक को भी वह अपनी ख़बरों में कोई ख़ास जगह नहीं देता है. इसके विपरीत, दलित-बहुजन विरोधी विचारों, व्यक्तियों और घटनाओं को प्रमुखता से दिखाता है. यह सब दलित-बहुजनों के प्रति देश के मीडिया की द्वेषपूर्ण और नकारात्मक सोच और उसके चरित्र को परिलक्षित करता है. इसलिए चंद्रशेखर को मीडिया द्वारा प्रमुखता दिया जाना इस दिशा में सोचने को बाध्य करता है.

सवाल यह है कि चंद्रशेखर क्यों अचानक से मीडिया के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उनकी हुंकार रैली से लेकर चुनाव लड़ने की घोषणा तक मीडिया की बड़ी ख़बर बन रही है. जबकि इसके बरक्स मायावती और अखिलेश यादव जैसे बड़े बहुजन नेताओं की रैलियां, वक्तव्य और घोषणाएं कई बार मीडिया की ख़बर नहीं बन पाते हैं. केंद्र और अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी तथा उसकी सरकार की नीतियों और नेताओं के वक्तव्यों के प्रति सकारात्मक भाव पैदा करने वाली तस्वीर और समाचारों की ही मीडिया में प्रायः भरमार रहती है. ऐसे में यह प्रश्न उभरना अस्वाभाविक नहीं है कि जो मीडिया मायावती और अखिलेश यादव जैसे बड़े नेताओं को भी अपेक्षित महत्व नहीं देता और दलित-बहुजनों के प्रति प्रायः उदासीनता और उपेक्षा का भाव रखता है, वह चंद्रशेखर के प्रति इतना उदार कैसे है कि उनकी रैली और चुनाव लड़ने की घटना को इतना महत्व दे रहा है. मीडिया के इस क़दम को यदि थोड़ी देर के लिए दलित-बहुजनों के प्रति उसकी उदारता मान लिया जाए तो उसकी यह उदारता चंद्रशेखर जैसे चेहरों तक ही सीमित क्यों है, उसका विस्तार दलित-बहुजन समाज की अन्य हस्तियों की गतिविधियों और उनकी वैचारिकी तक क्यों नहीं है?

चंद्रशेखर बाहर से भले ही भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की आलोचना करें और उनके विरूद्ध बयान दें किंतु वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध उनके चुनाव लड़ने की घोषणा से वह भाजपा का मोहरा बनते दिखायी दे रहे हैं. चंद्रशेखर अभी युवा हैं और उनके अंदर युवोचित भावुकता भी है. इसके साथ ही उनके अंदर अपने समाज के लिए कुछ करने का उत्साह और जुनून भी दिखता है. समाज को ऐसे उत्साही युवाओं की बहुत आवश्यकता है. समाज को समानता के अधिकार के प्रति जागरूक बनाने और शोषण का प्रतिकार करने हेतु प्रेरित करने के लिए यह आवश्यक है कि समाज के बीच रहकर सामाजिक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी जाए. राजनीति आंदोलनधर्मी चेतना को सोख लेती है और अपनी पेचीदगियों में उलझाकर आंदोलन से अलग कर लेती है. चंद्रशेखर राजनीति की पेचीदगियाँ शायद उतनी अच्छी तरह से अभी नहीं समझते हों. उनके जैसे क्रांतिकारी और ऊर्जावान युवक को अपने अंदर की आग को मरने या बुझने नहीं देना चाहिए. उनको उन लोगों से सीखना चाहिए जो राजनीति में आने से पहले बहुत क्रांतिकारी थे, किंतु राजनीति में आने के कुछ वर्षों के अंदर ही उनकी आंदोलनधर्मिता शांत हो गयी. राजनीति में आने की जल्दबाज़ी से उनको बचना चाहिए था.

यदि चंद्रशेखर अपनी घोषणा पर अमल करते हुए वाराणसी से नरेंद्र मोदी के विरूद्ध लोक सभा का चुनाव लड़ते हैं और सपा-बसपा गठबंधन के साथ मिलकर लड़ने के बजाए भीम आर्मी के बैनर के साथ लड़ते हैं तो वह मोदी को हराने का नहीं अपितु अप्रत्यक्ष रूप से उनको जिताने का काम ही करेंगे. क्योंकि उनको दलित समाज का वही वोट मिलेगा जो सपा-बसपा गठबंधन को मिलना सम्भावित है. ऐसे समय में जब दलित-पिछड़ा वर्ग अपने हितों के प्रतिकूल काम करने वाली भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेंकने पर आमादा हैं और सपा-बसपा गठबंधन भाजपा को कड़ी चुनौती देता दिखायी दे रहा है, चंद्रशेखर ‘रावण’ द्वारा अलग से चुनाव लड़ने से उनको भले ही कुछ लाभ मिल जाए किंतु भाजपा विरोधी बहुजन समाज की चेतना को बहुत बड़ा झटका लग सकता है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मायावती की राजनीतिकि दिशा और मूल्य बिलकुल सही हैं, अपितु मायावती के नेतृत्व में सपा-बसपा गठबंधन आज के समय में बहुजन समाज की आवश्यकता और मांग है.

पिछले समय के दौरान पहले अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न निवारण एक्ट और फिर विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्थानों में 200 पवाइंट रोस्टर को समाप्त कर विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू किए जाने के बाद उस निर्णय को निरस्त कराने के लिए देश के बहुजन समाज को सड़कों पर उतरकर विशाल प्रदर्शन और आंदोलन करना पड़ा. इससे, दलित-बहुजन समाज में भारतीय जनता पार्टी की नकारात्मक छवि बनी है. भाजपा से दलित-बहुजन समाज का न केवल मोह भंग हुआ है, बल्कि दलित-बहुजन विरोधी कार्यों के लिए सबक़ सिखाने के लिए वह हर हाल में भाजपा को हराना चाहता है. निस्सन्देह, चंद्रशेखर उभरते हुए दलित नायक हैं. युवावर्ग को उनका लड़ाकू अन्दाज़ प्रभावित करता है. यद्यपि वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए वह नरेंद्र मोदी को हराने की बात कर रहे हैं, किंतु यदि सपा-बसपा गठबंधन के साथ न मिलकर उनके विरूद्ध चुनावी मैदान में उतरते हैं तो ऐसा न हो कि नायक बनते-बनते वह दलित समाज के खलनायक बन जाएं.

जयप्रकाश कर्दम

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गंगा यात्रा का आगाज कर प्रियंका गांधी करेंगी ‘बोट पे चर्चा’, छात्रों से करेंगी बात

कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा सोमवार से यूपी के प्रयागराज से गंगा यात्रा के जरिए अपने चुनावी मिशन का आगाज करेंगी. प्रियंका यहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ वाराणसी जाएंगी. अपनी पहली चुनावी यात्रा में बीजेपी को घेरने के लिए वह पीएम मोदी के ‘चाय पे चर्चा’ की तर्ज पर ‘बोट पे चर्चा’ का आगाज करेंगी. इसके जरिए वह प्रयागराज के छात्रों के शिष्टमंडल से बात करेंगी. प्रयागराज से वाराणसी तक चुनाव यात्रा को ‘सांची बात, प्रियंका के साथ’ नाम दिया है. प्रियंका रविवार शाम को ही प्रयागराज पहुंच गईं जहां उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के पैतृक आवास आनंद भवन का दौरा किया.

प्रियंका के तय कार्यक्रम के अनुसार, 18 मार्च को वह सुबह साढ़े नौ बजे मनैया पहुंचेंगी. इसके बाद वह नाव की सवारी करते हुए यात्रा की शुरुआत करेंगी. वह मनैया से सीतामढ़ी तक स्टीमर से यात्रा करेंगी और फिर सीतामढ़ी में ही रात्रि विश्राम करेंगी. संगम के पास छतनाग की बजाय अब प्रियंका मनैया से स्पेशल स्टीमर की सवारी कर यात्रा करेंगी. मनैया निषादों द्वारा बसाया गया गांव है, जो संगम से 10 किमी दूर है.

मनैया से यात्रा शुरू करने से पहले प्रियंका इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक समूह से बात करेंगी. यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के उपाध्यक्ष अखिलेश यादव ने बताया, ‘मैंने उन्हें यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था लेकिन उनके बिजी शेड्यूल की वजह से अब 15 छात्रों का समूह उनसे नाव पर बातचीत करेगा.’

मनैया से यात्रा शुरू करके प्रियंका दमदमा की ओर जाएंगी. यह गांव गंगा के बांये तट पर स्थित है. वह यहां घाट पर गांव के लोगों से मुलाकात करेंगी. 12 बजे के करीब वह सिरसा गांव के तट पर पहुंचकर गांव का दौरा करेंगी. यहां वह पुलवामा हमले में शहीद महेश कुमार के परिवार से भी मुलाकात करेंगी. इसके बाद प्रियंका अपनी यात्रा की शुरुआत करके हंडिया के लक्षागृह पहुंचेंगी जहां वह स्थानीय लोगों को संबोधित करेंगी.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, दुर्योधन ने कुंती और उनके पुत्रों को मारने की कोशिश की थी. यहां से वह मांडा की ओर जाएंगी और दो बजे वहां पहुंचकर वह स्थानीय लोगों से बातचीत के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी. इसके बाद वह सीतामढ़ी जाएंगी, यह जगह सीता से जुड़ी बताई जाती है. प्रियंका इसी जगह पर रात में विश्राम करेंगी. बता दें कि 3 दिन के दौरे पर प्रियंका प्रयागराज से मिर्जापुर, जौनपुर होते हुए वाराणसी जाएंगी. 20 मार्च को प्रियंका वाराणसी में होंगी. इस दौरान वह गंगा की बदहाली पर पीएम मोदी को घेरेंगी.

श्रोत- नवभारत टाइम्स

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पणजी में होगा पर्रिकर का अंतिम संस्कार, राजकीय सम्मान से विदाई

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पणजी। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का रविवार को निधन हो गया. वह अग्नाशय के कैंसर से जूझ रहे थे. पर्रिकर के निधन के बाद केंद्र सरकार ने 18 मार्च को राष्ट्रीय शोक का ऐलान कर दिया है. सोमवार को सुबह 11 बजे हुई कैबिनेट बैठक में पर्रिकर को श्रद्धांजलि दी गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैबिनेट की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर्रिकर को श्रद्धांजलि देने गोवा जाएंगे. वहीं, गोवा में 18 मार्च से 24 मार्च तक 7 दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया है. इस दौरान पूरे प्रदेश में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा.

सुबह 9.30 बजे से 10.30 बजे पणजी में स्थित भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर में पर्रिकर के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया. इसके बाद पर्रिकर के पार्थिव शरीर को कला अकादमी लाया गया, जहां पर शाम 4.00 बजे तक आम लोग अपने चहेते नेता को श्रद्धांजलि दे सकेंगे. मीरामार में शाम 5 बजे अंतिम संस्कार किया जाएगा. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह शाम को पर्रिकर के अंतिम संस्कार में शामिल होंगे.

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मनोहर पर्रिकर के दोनों बेटे राजनीति से दूर, जानिए क्या करते हैं

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नई दिल्ली। गोवा के सीएम मनोहर पर्रिकर के निधन से पूरे देश में शोक है. पर्रिकर राजनीति में अपनी सादगीपूर्ण जीवनशैली और सरल व्यवहार के लिए जाने जाते थे. सिर्फ बीजेपी ही नहीं बाकी दलों के नेता भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते. मनोहर पर्रिकर सियासत में लंबे समय से थे बल्कि गोवा की सियासत की धुरी माने जाने लगे थे. हालांकि सियासत में उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को आगे नहीं बढ़ाया. आपको जानकर एक बार आश्चर्य हो सकता है कि मनोहर पर्रिकर के दो बेटों में किसी का भी राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है.

उनके बेटों का नाम उत्पल और अभिजीत है. उत्पल अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं. जबकि, अभिजीत बिजनेसमैन हैं. उत्पल की पत्नी उमा सरदेसाई हैं. दोनों की लव मैरिज हुई थी. उमा ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पढ़ाई की है. दोनों का एक बेटा है, जिसका नाम ध्रुव है. कुछ दिनों पहले ही उत्पल ने कहा था कि राजनीतिक पद कड़ी मेहनत से मिलती है. इसे कोई भी पुश्तैनी जागीर समझकर हासिल नहीं कर सकता. दूसरे बेटे अभिजीत बिजनेसमैन हैं. उनकी शादी उनकी पुरानी दोस्त साई से 2013 में हुई. उनकी पत्नी साई फार्मासिस्ट हैं.

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“बहुजन मीडिया के कंधो पर बड़ी ज़िम्मेदारी”

 पिछले 5 सालों में जिस तरह से बहुजन मीडिया ने ज़बरदस्त प्रगति की है वो वाकई प्रशंसनीय है. असल में ये समय की मांग भी थी क्यूंकि जिस तरह से मनुवादी ताकतों ने टीवी सैटलाइट मीडिया पर कब्ज़ा कर लिया है उससे पुरे अम्बेडकरवादी आन्दोलन के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गयीं हैं. जहाँ एक तरफ बहुजन मीडिया की पहुँच बढती जा रही है वहीं अभी भी इस बात को नकारा नहीं जा सकता की विमर्श और विचार को आज भी काफी हद तक टीवी मीडिया ही निर्धारित कर रहा है. लेकिन इस बात में दो राय नहीं की बहुजन मीडिया के सशक्त होने से समाज में नई जाग्रति आई है. टीवी मीडिया दो तरह से इस बहुजन आन्दोलन का नुक्सान करता था. एक तो वह जातीय उत्पीड़न और अत्याचार की ख़बरों को पूरी तरह दरकिनार करके उन्हें राष्ट्रीय प्रशन नहीं बनने देता था वहीँ दूसरी तरफ मनुवादी ताकतों को लाभ पहुंचाने के लिए सच को झूठ और झूठ को सच बना कर पेश करता था. बहुजन मीडिया के मोर्चा संभालने के बाद से इस समाज की निर्भरता टीवी न्यूज़ चैनल पर ख़त्म हो चुकी है. अत्याचार, उत्पीड़न के मामले इन यूट्यूब और फेसबुक चैनलों की वजह से आज दबाये नहीं जा सकते और ये मुद्दे सरकार के सामने चुनौती बनकर उभरते हैं. दूसरा, बहुजन मीडिया के निरंतर प्रयासों के चलते इन वर्गों को ये समझ आ गया की टीवी किस तरह से इस बहुजन आन्दोलन को पटरी से उतारने में रात दिन लगा रहता था. समाज ने एक स्वर से इस बात का संकप लिया की टीवी न्यूज़ चैनल को बहिष्कार करने से समाज इस षड्यंत्र से बच सकता है. और ऐसा इसलिए भी होना चाहिए क्यूंकि मनुवादी मीडिया ने भी इन समाज के कार्यक्रमों, इनके मुद्दो और बहुजन राजनैतिक दलों का काफी हद तक बहिष्कार कर रखा है.

बहुजन मीडिया ने अपने कंधो पर बड़ी ज़िम्मेदारी ले रखी है. हालाकि अभी भी बहुजन मीडिया अपने शैशव काल में है और अभी असल ताकत का प्रदर्शन करना बाकी है. इस बात को नकारा नहीं जा सकता अभी भी हमारा बहुजन समाज का एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है और हर हाथ में अभी समार्टफ़ोन नहीं आया है. इन्टरनेट की उपलब्धता दूर दराज़ के इलाकों में उतनी सरल नहीं है. यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर के बारे में जानकारी का भी अभाव है. फिर भी इन सब चुनौतियों के बावजूद समाज के जागरूक और जुझारू युवाओं ने केवल अपने दम पर ये बीड़ा उठाया हुआ है. एक चैनल के संपादक के रूप में मैंआपको ये बता सकता हूँ की बहुजन मीडिया के सामने ज़बरदस्त आर्थिक चुनौतियां रहती है क्यूंकि जिनसे लोहा लेना है वो अरबो रूपये के साजोसमान और स्टूडियों में बैठकर काम करते हैं. समाज इस बात को और बहुजन मीडिया की अह्मियात को धीरे धीरे समझ रहा है.

आने वाला समय टीवी का नहीं, बल्कि स्मार्ट फ़ोन का है. अभी जैसे जैसे समय बीतता जायेगा और स्मार्ट फ़ोन हर हाथ की अनिवार्यता बनता जायेगा, इन्टरनेट और बेहतर होता जायेगा और जिस दिन 5जी अपनी असल स्पीड के साथ देश में शुरू हो जायेगा उस दिन टीवी मीडिया को पूरी टक्कर देगा बहुजन मीडिया. तब तक संगठित रहिये, शिक्षित बनिए और संघर्ष करिए. बहुजन मीडिया को समझिये और प्रत्येक बहुजन को समझाइये.

जय भीम जय भारत वैभव कुमार, मुख्य संपादक दलित न्यूज़ नेटवर्क

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Delhi University: कैंपस प्‍लेसमेंट 2 अप्रैल से शुरू, PG और ग्रेजुएशन के छात्रों का होगा चयन

नई दिल्ली। दिल्‍ली यूनिवर्स‍िटी में एक बार फिर कैंपस सेलेक्‍शन का दौर शुरू होने जा रहा है. 2 अप्रैल 2019 से दिल्‍ली यूनिवर्स‍िटी में कैंपस प्‍लेसमेंट की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. इससे पहले फरवरी में कैंपस सेलेक्‍शन हुए थे, जिसमें विप्रो और एमेजॉन ने कई छात्रों को नौकरियों के ऑफर दिए थे. विप्रो ने 69 छात्रों को नौकरी का मौका दिया, वहीं एमेजॉन ने 43 छात्रों का प्‍लेसमेंट किया.

हालांकि इस बार प्‍लेसमेंट प्रक्रिया में सिर्फ एक ही कंपनी शामिल हो रही है. पर उम्‍मीद की जा रही है कि कुछ अन्‍य कंपनियां भी इसमें हिस्‍सा ले सकती हैं. इस बार फरीदाबाद से शाही एक्‍सपोर्ट कंपनी कैंपस आ रही है.

शाही एक्‍सपोर्ट फाइनेंस और अकाउंट्स और मैनेजमेंट के लिए हायरिंग करेगी. BSc, BSc maths, BSc stat., गणित और अर्थशास्‍त्र, बिजनेस स्‍टडीज और फाइनेंशियल और इनवेस्‍टमेंट एनालिसिस के छात्रों को प्‍लेसमेंट में हिस्‍सा लेने का मौका मिलेगा. इसके अलावा MA अर्थशास्‍त्र और MA-MSc Maths के छात्र भी कैंपस प्‍लेसमेंट में हिस्‍सा ले सकेंगे.

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पुणे में ईंट भट्टा मालिक ने मजदूर को मानव मल खिलाया

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पुणे। पुलिस ने एक दलित को जबरन मानव मल खिलाने के आरोप में एक ईंट भट्टा मालिक को गिरफ्तार किया है. पीड़ित अनुसूचित जाति के मातंग समुदाय से आता है, जो ईंट भट्‌टा मालिक के यहां पिछले दो साल से काम कर रहा था. जांच में यह भी सामने आया है कि पीड़ित ने आरोपी से 50 हजार रुपए का ऋण ले रखा था.

पुलिस ने मुल्शी तालुका के जम्भे गांव से आरोपी को संदीप पवार (42) को गिरफ्तार किया है. आरोप है कि गिरफ्तार ईंट भट्टा मालिक ने छोटी सी बात के लिए पीड़ित को जबरन मानव मल खिलाया. हिंजेवाड़ी पुलिस के अनुसार, पीड़ित सुनील अनिल पावले (22) अनुसूचित जाति के मातंग सुमदाय का है. वह और उसका परिवार पिछले दो सालों से पवार के ईंट भट्टा में काम करता है और वहीं रहता आया है.

पावले के मुताबिक, घटना बुधवार (13 मार्च) दोपहर करीब दो बजे की है. वह और उसके पिता अनिल, मां सविता और दादा-दादी दोपहर का खाना खाने के बाद ईंट भट्टा पर बैठे थे. इसी दौरान पवार वहां पहुंचा और उनसे अपना काम शुरू करने को कहा.

इस पर पीड़ित ने कहा- “हमने बस अभी खाना खत्म किया है. कुछ देर में काम शुरू कर देंगे.

इस पर भट्टा मालिक नाराज हो गया और उसकी और उसकी पत्नी के अलावा पिता की पिटाई कर दी. आरोपी मौके पर गाली-गलौज करता रहा. यहीं नहीं रुका. उसने मानव मल मंगवाया और हथियार के बल पर जबरन खाने को मजबूर किया. जब ये सब हुआ तो भट्टा पर काम करने वाले कई मजदूर भी वहां खड़े थे. लेकिन, किसी ने मदद नहीं की.”

पावले का परिवार मूल रूप से उस्मानाबाद से संबंध रखता है. अब यह परिवार कई सालों से पुणे में रह रहा है. पीड़ित के मुताबिक, उसने भट्टा मालिक पवार से पचास हजार रुपए का ऋण लिया है. ऋण का अधिकांश हिस्सा भी चुका भी दिया है. इसके बाद भी उसने उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया. हालांकि, पवार और उसके परिवार के सदस्यों ने आरोप से इनकार किया है.

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क्राइस्टचर्च मस्जिद हमला: गुजरात के युवक की मौत, 9 भारतीय अब तक लापता

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न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमले में एक भारतीय की मौत हो गई है. मरने वाले का नाम जुनैद कारा है और वह गुजरात के नवसारी का रहने वाला था. पिछले कई साल से वह न्यूजीलैंड में अपने परिवार के साथ रह रहा था और वहां स्टोर चलाता है. शुक्रवार को वह भी मस्जिद में नमाज अदा करने गया था. इस दौरान हमलावर ने उसे गोली मार दी.

इस बीच शनिवार को आरोपी ब्रेंटन हैरिसन टारंट को कोर्ट में पेश किया गया. उसे बिना किसी दलील सुने 5 अप्रैल तक हिरासत में भेज दिया गया. बता दें, ब्रेंटन ने दो मस्जिदों पर गोलीबारी की थी और लाइव वीडियो बनाते हुए 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. ब्रेंटन हैरिसन की पहचान ऑस्ट्रेलियाई नागरिक के रूप में हुई थी.

हमले को आरोपी

हथकड़ी और सफेद जेल शर्ट पहने हुए ऑस्ट्रेलियाई मूल के पूर्व फिटनेस प्रशिक्षक ब्रेंटन हैरिसन टारंट ने जमानत की अपील नहीं की. इस कारण उसे 5 अप्रैल तक हिरासत में भेज दिया गया. शुक्रवार को क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में गोलीबारी हुई थी. इस दौरान 49 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इस घटना के लिए ब्रेंटन को जिम्मेदार बताया जा रहा है.

न्यूजीलैंड की पीएम ने इसे आतंकी हमला बताया

प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था कि इसमें प्रभावित लोग या तो प्रवासी हैं या फिर शरणार्थी हैं. यह स्पष्ट है कि इसे अब केवल आतंकवादी हमला ही करार दिया जा सकता है. हम जितना जानते हैं, ऐसा लगता है कि यह पूर्व नियोजित था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले में मारे गए लोगों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट की और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की. मोदी ने इस कठिन घड़ी में न्यूजीलैंड के मित्रवत लोगों के प्रति पूरी एकजुटता व्यक्त कीप्रधानमंत्री ने जोर दिया कि भारत आतंकवाद के हर स्वरूप और ऐसे कार्यों का समर्थन देने वालों की कड़ी निंदा करता है.

भारत, न्यूजीलैंड सरकार के साथ

शुक्रवार देर रात विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया, ‘‘हम क्राइस्टचर्च में धर्मस्थलों पर हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा करते हैं. हमारी संवेदनाएं प्रियजनों को खोने वालों के साथ हैं. हमारी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं पीड़ित परिवारों के साथ हैं. दुख की इस घड़ी में भारत न्यूजीलैंड की सरकार और जनता के साथ एकजुटता से खड़ा है’’

9 भारतीयों के लापता होने की खबर

न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त संजीव कोहली ने कहा कि ताजा आंकड़ों के मुताबिक कई सूत्रों से मिली जानकारी के बाद पता चल रहा है कि भारतीय नागरिकता/मूल के 9 व्यक्ति लापता हैं. इस बावत आधिकारिक सूचना का इंतजार है. उन्होंने कहा कि मानवता के खिलाफ ये गंभीर अपराध है. हमारी प्रार्थनाएं उन परिवार वालों के साथ हैं जिन्होंने इस हादसे में अपने परिवार वालों को खोया है.

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दक्षिण में बसपा और जन सेना पार्टी का गठबंधन तय

गठबंधन के बारे में मीडिया को संबोधित करते पवन कल्याण और मायावती (फोटो क्रेडिट- ANI)

नयी दिल्ली। 17वीं लोकसभा चुनाव को लेकर चल रही सरगर्मी के बीच बहुजन समाज पार्टी तमाम राज्यों में अलग-अलग राजनैतिक दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरने को तैयार है. दक्षिण में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य में बसपा ने जन सेना पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर साउथ के सुपरस्टार और जन सेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण और बसपा प्रमुख मायावती के बीच गठबंधन को लेकर आखिरी बात हो गई है.

मान्यवर कांशीराम जी की जयंती के मौके पर इस गठबंधन की घोषणा कर दी गई. दोनों नेताओं ने एक साथ मीडिया के सामने आकर गठबंधन का ऐलान किया. इस दौरान पवन कल्याण ने कहा कि वे बहनजी को देश का प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहेंगे. तो वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने साफ किया कि वो 3 और 4 अप्रैल को आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में रैली को संबोधित करने जा रही हैं.

चंद्रशेखर का मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान, अखिलेश पर किए कई वार

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दिल्ली के जंतर मंतर पर 15 मार्च को भीम आर्मी द्वारा आयोजित हुंकार रैली में चंद्रशेखर

नयी दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने मान्यवर कांशीराम के जन्मदिन के मौके पर दिल्ली के जंतर मंतर पर बहुजन हुंकार रैली का आयोजन किया. इस दौरान उन्होंने साफ किया कि वो संत शिरोमणि रविदास की नगरी काशी यानि बनारस से पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरेंगे. उन्होंने इशारों में बसपा-सपा गठबंधन से समर्थन देने की भी अपील की. चंद्रशेखर ने कहा कि यूपी की 79 सीटों पर भीम आर्मी गठबंधन को समर्थन दे रही है, ऐसे में उसे एक सीट पर उन्हें समर्थन देना चाहिए. हालांकि अपने पूरे भाषण के दौरान चंद्रशेखर ने एक बार भी बहुजन समाज पार्टी और उसकी अध्यक्ष मायावती का नाम नहीं लिया.

इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी पर भी हमला बोला और कहा कि मोदी को दिल्ली की गद्दी नहीं छूने देंगे. खुद को कई लोगों द्वारा एजेंट कहने से भड़के चंद्रशेखर ने कहा कि सब जानते हैं कि कौन किसका एजेंट है. उन्होंने कहा कि मैं बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम जी के सपने को पूरा करना चाहता हूं. मेरा लक्ष्य दिल्ली में लाल किले पर नीला झंडा फहराना है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से ऐलान किया कि वो बनारस में पहुंच कर उनकी मदद करें. उन्होंने बहुजन समाज से अपील किया कि वो देश भर में भाजपा को हराने वाला उम्मीदवार को वोट दें.

इस दौरान भीम आर्मी प्रमुख ने अखिलेश यादव पर जमकर निशाना साधा. आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दस प्रतिशत आरक्षण का विरोध किसी ने नहीं किया. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने संसद में रिजर्वेशन इन प्रोमोशन का बिल फरवाया. उनकी सरकार ने 58 हजार दलित कर्मचारियों का डिमोशन किया. उन्हें इस मामले में अपना रुख साफ करना चाहिए.

कार्यक्रम में मान्यवर कांशीराम जी की बड़ी बहन को भी आमंत्रित किया गया था. चंद्रशेखर ने कहा कि मान्यवर के परिवार ने बहुत कुर्बानी दी है, उनकी बड़ी बहन को संसद में भेज कर उसका कर्ज उतारना चाहिए. हालांकि अपने पूरे भाषण के दौरान चंद्रशेखर ने प्रियंका गांधी से मुलाकात का कोई जिक्र नहीं किया.

रैली में मंच पर भीम आर्मी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे दद्दू प्रसाद, बामसेफ के अध्यक्ष वामन मेश्राम, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी मौजूद थे. रैली में देश के तमाम हिस्सों से शामिल होने के लिए युवा पहुंचे थे. खास बात यह देखने को मिली की रैली में 18 से 25 साल के युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी. अगर भीड़ के लिहाज से देखें तो इस रैली में 5 से 7 हजार लोगों ने हिस्सा लिया.

उत्तर भारत में सवर्ण वर्चस्व विरोधी बहुजन राजनीति के प्रणेता मान्यवर कांशीराम

बाबासाहब डा. अंबेडकर का मानना था कि भारत का इतिहास ब्राह्मण एवं बौद्ध संस्कृतियों के बीच संघर्ष का इतिहास है. 185 ई.पू. में ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध सम्राट बृहद्रथ की धोखे से हत्या किया तथा स्वयं राजा बन बैठा. इसने बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध भयंकर हिंसक अभियान छेड़ा. यहां तक कि बौद्ध भिक्षुओं का सिर काटकर लाने पर सोने की मुद्रायें पुरस्कार स्वरूप देने की राजज्ञा जारी किया. लेकिन केवल हिंसा और राजसत्ता पर अधिपत्य के बल पर बौद्ध संस्कृति को नष्ट करना संभव नहीं था. इसलिए ब्राह्मण धर्मग्रंथों की रचना की गयी. इन धर्मग्रंथों के माध्यम से बौद्ध संस्कृति के मूल्यों व जीवन पद्धति के विरुद्ध व्यापक प्रचार प्रसार किया गया तथा 11वीं व 12वीं सदी ई. तक आते-आते बौद्ध संस्कृति के साहित्य, इमारतें, स्तूप आदि को नष्ट कर दिया गया. लगभग 1000 वर्षों तक ब्राह्मण धर्मावलंबियों का बौद्ध भिक्षुओं तथा बौद्ध जनता के विरुद्ध रक्त रंजित अभियान चलता रहा. परिणामतः बौद्ध धर्म जिस धरती पर पैदा हुआ वहीं पर नष्ट कर दिया गया. मध्य काल में इस्लाम के आगमन एवं राजसत्ता पर इस्लाम के अनुयायियों के आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात् बौद्ध जनता को ब्राह्मणों के रक्तरंजित अभियान से थोड़ी राहत मिली लेकिन तब तक ब्राह्मणों का भारतीय समाज पर सामाजिक और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित हो चुका था और बौद्ध जनता शूद्र और अछूत के रूप में अपने स्वर्णिम अतीत को भूलकर अभिशप्त जीवन व्यतीत करने की आदी हो चुकी थी. फिर भी इस्लाम के आगमन तथा राजसत्ता पर ब्राह्मणों का आधिपत्य समाप्त होने के कारण बौद्ध संस्कृति के मूल्यों को स्थापित करने का आंदोलन प्रस्फुटित हुआ. संत रैदास तथा संत कबीर जैसे महापुरुष इसी दौर में पैदा हुए जिन्होंने ब्राह्मणों एवं ब्राह्मण धर्मग्रंथों को चुनौती दिया. इस आन्दोलन को तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने प्रभावहीन करने का भरपूर प्रयास किया. यूरोपीय पुनर्जागरण तथा अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् ब्राह्मणों की राजसत्ता पर पकड़ ढीली पड़ी लेकिन सामाजिक जीवन पर सांस्कृतिक वर्चस्व अभी भी कायम था.

आधुनिक भारत में महात्मा जोतिराव फुले ने इस तथ्य को रेखांकित किया है. गुलामगिरी की प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि ‘‘धर्म के नाम पर ब्राह्मण, शूद्र के किसी भी छोटे-बड़े काम में हस्तक्षेप करता है. घर, खेत-खलिहान या कोर्ट कचहरी कहीं भी जाये, ब्राह्मण वहां मौजूद होगा और किसी न किसी बड़े बहाने से वह अपपनी धूर्ततापूर्ण बुद्धि से उस शूद्र का जितना हो सके शोषण करेगा.’’ तथाकथित स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान डा. अंबेडकर ने ब्राह्मणों के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अछूतों के लिए विधायिका में पृथक निर्वाचक मंडल तथा दो मतों के अधिकार के साथ शिक्षा तथा सेवा क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग किया. गांधी को पृथक निर्वाचक मंडल और दो मतों का अधिकार स्वीकार्य नहीं था. इसलिए उन्होंने आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया फलस्वरूप पूना पैक्ट हुआ जिससे अछूतों की राजनीतिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाया. संविधान के मुख्य शिल्पकार होने के कारण डा. अंबेडकर, अछूतों सहित शूद्रों एवं महिलाओं को भी एक व्यक्ति एक मत तथा एक मत मूल्य दिलाने में सफल हुए. विधायिका, शिक्षा एवं सेवा क्षेत्र में अछूतों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी मिला तथा शूद्रों के लिए भविष्य में शिक्षा और सेवा क्षेत्र में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने हेतु अनुच्छेद 340 का प्रावधान किया गया. अर्थात लगभग 100 वर्षों के संघर्षों के पश्चात भारत की जनता पर 2000 वर्षों से स्थापित ब्राह्मणों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक वर्चस्व को तोड़ने का प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया. आधुनिक भारत में जोतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियाार रामास्वामी नायकर, डा. अंबेडकर के कार्यों तथा आंदोलन ने ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध धरातल तैयार किया जिसका प्रभाव भारत के पश्चिमी तथा दक्षिणी क्षेत्र में पड़ा भी लेकिन उत्तर भारत, जिसे ‘काउ बेल्ट’ कहते हैं, में ब्राह्मण वर्चस्व संविधान लागू होने के पश्चात भी जारी था. उत्तर भारत में जिस महापुरुष ने ब्राह्मण वर्चस्व को व्यवहारिक धरातल पर अर्थात् व्यवहारिक राजनीति में, सामाजिक जीवन में तथा सांस्कृतिक क्रियाकलापों में, चुनौती दी उस महापुरुष का नाम मान्यवर कांशीराम है.

मान्यवर कांशीराम ने 1984 में ‘बहुजन समाज पार्टी’ नामक राजनीतिक दल बनाकर भारतीय राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप प्रारंभ किया. इससे पूर्व कांशीराम ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति अर्थात् डी.एस.-4’ और ‘बैकवर्ड एंड माइनारिटीज कम्युनिटीज इम्प्लायज फेडरेशन अर्थात बामसेफ’ नामक सामाजिक संगठनों का सफल संचालन कर चुके थे. 15 मार्च 1934 में पंजाब प्रांत के गांव में खवासपुर में जन्मे कांशीराम ने 30 वर्ष की उम्र में 1964 में सरकारी नौकरी छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा था तथा लगभग 20 वर्षों के सक्रिय सामाजिक जीवन के पश्चात् 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने राजनीतिक दल का निर्माण किया. इन 20 वर्षों में कांशीराम ने रिपब्लिकन पार्टी से लेकर दलित पैंथर तक, लगभग सभी तरह के दलित आंदोलनों से संबंध रखा तथा समझने का प्रयास किया. उन्होंने महात्मा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज तथा डा. अंबेडकर के साहित्य का गहरा अध्ययन किया. वे पूरे देश में घूमते रहे. 1973 से ही दलित समाज के पढ़े-लिखे कर्मचारियों-अधिकारियों को जागरूक करने के उद्देश्य से उन्होंने पूरे देश में संगोष्ठियों का आयोजन किया. कहना न होगा कि 1973 से लेकर 1984 तक मान्यवर कांशीराम ने पूरे देश में एक वैचारिक आंदोलन खड़ा किया. इस आंदोलन का उद्देश्य भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति दलित तथा पिछड़े समाज को जागरूक करना था. इस लंबे वैचारिक अभियान ने न केवल सामाजिक व सांस्कृतिक जागरूकता पैदा किया बल्कि स्वयं कांशीराम भी अपनी वैचारिकी को परिपक्व और धारदार बनाने में सफल हुए. अपनी वैचारिकी एवं समझदारी को देश के सामने प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने ‘चमचा युग’ नामक पुस्तक 1982 में लिखा. इस पुस्तक में उन्होंने दलित-पिछड़ों के आंदोलन पर एक समालोचनात्मक दृष्टि डाली तथा अपने समय का मूल्यांकन किया. इस पुस्तक में उन्होंने कुछ मूलभूत तथ्यों को रेखांकित किया. जैसे-भारत की कुल जनसंख्या में 85 प्रतिशत लोग शोषित और उत्पीड़ित हैं और उनका नेता नहीं है. इस जनसंख्या में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग शामिल है. अनुसूचित जाति और जनजाति को संविधान में जो प्रतिनिधित्वव दिया गया है, संयुक्त निर्वाचक मंडल के कारण वह हिंदुओं का औजार अर्थात् चमचा बनकर रह गया है. वह अपने समाज का नेतृत्व करने में समर्थ नहीं है. अन्य पिछड़ी जातियों के लिए संविधान अनुच्छेद 340 का प्रावधान किया गया. इसके अंतर्गत काका कालेलकर आयोग तथा मंडल आयोग बनाये गये लेकिन अभी तक (1982) इन रिपोर्टों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. परिणामस्वरूपप 52 प्रतिशत जनसंख्या वाला अन्य पिछड़ा वर्ग राजनैतिक रूप से नेतृत्वविहिन है. उस समय हरियाणा विधान सभा की 90 सीटों में केवल एक विधायक अन्य पिछड़े वर्ग का था. 17 प्रतिशत से अधिक मुसलमान शासक जातियों, सवर्ण हिंदुओं की दया पर निर्भर हैं सांप्रदायिक दंगों का डर उन्हें सदैव सताता रहता है. ईसाई बेबस घिसट रहे हैं. सिक्ख सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बौद्ध तो अभी पहचान भी नहीं बना पाये हैं. यह परिस्थितियां स्वतः प्रमाणित करती है कि 85 प्रतिशत जनता राजनैतिक रूप से नेतृत्वविहिन है. राष्ट्रीय स्तर के 07 राजनैतिक दल तथा राज्य व क्षेत्रीय स्तर की अनेक पार्टियां शासक जातियों के कब्जे में है. वे नहीं चाहती कि इन 85 प्रतिशत शोषित उत्पीड़ित जनता के बीच से समर्थ और सक्षम नेतृत्व पैदा हो.

इसी पुस्तक में मान्यवर कांशीराम ने अनुसुचित जाति एवं जनजाति में एक छोटा ही सही लेकिन संभ्रांत वर्ग के उदय को रेखांकित किया है. राजनैतिक आरक्षण तथा नौकरियों में आरक्षण से कुछ लोगों की आर्थिक हैसियत सम्मानजनक जीवन जीने लायक हो गयी है लेकिन जाति के कारण उनको वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं. परिणामतः वे घुट-घुट कर जीवन जीने पर मजबूर हैं. उनमें कुछ लोग अभिजात्य व्यवसायिकता के शिकार भी हो चुके हैं. इनकी संख्या 20 लाख से अधिक हैं. इन्हीं पढ़े-लिखे लोगों पर डा. अंबेडकर ने अपने आंदोन का दायित्व सौंपा था लेकिन आज वे खुद अपने समाज से कटे हुए हैं. शेष समाज अपने जीवन यापन के लिए जमींदारों पर बहुत अधिक निर्भर है. उनके लिए उत्पीड़न से लड़ना संभव नहीं है, क्योंकि इसका विकल्प भुखमरी है. स्वतंत्रता के लिए थोड़ा सा आग्रह भी उन्हें बेरोजगार कर सकता है; जिससे वे डरते हैं. केवल शोषणकारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव ही उन्हें मुक्त कर सकता है. शासक जाति की सरकारों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. उत्पीड़ित ग्रामवासी अपने बूते पर बदलाव नहीं कर सकता तथा जो उत्पीड़ित संभ्रांत वर्ग कुछ करने की स्थिति में है व अधिसंख्य लोगों से अलग हो गया है. शहरी इलाकों की मलीन बस्तियां गांव में सामंत जमींदारों के सताये हुए लोग आकर रह रहे हैं यहां भी ये शोषण और उत्पीड़न के शिकार है.

इन 85 प्रतिशत शोषित पीड़ित जनता के बरक्स 15 प्रतिशत शासक जातियों की स्थिति की तुलना करने पर मामला और स्पष्ट होता है. कांशीराम का स्पष्ट मानना है कि अंग्रेजों के जाने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों को तो उनका हिस्सा मिला लेकिन अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों का हिस्सा सवर्णों ने विशेषकर ब्राह्मणों ने हड़प लिया. कांशीराम रेखांकित करते हैं कि ‘‘मंडल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल आबादी में अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिशत 52 है. दूसरी ओर ब्राह्मणों और क्षत्रियों की संख्या 8 व 9 प्रतिशत है. किन्तु वर्तमान संसद में, इन 8 से 9 प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व 52 प्रतिशत सांसद करते हैं, जबकि 52 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व 8 से 9 सांसद करते हैं. एक संसदीय लोकतंत्र में इस तरह के प्रतिनिधित्व से भारी अंतर पड़ता है. ब्राह्मणों की नौकरशाही पर कब्जे का जिक्र भी कांशीराम इस पुस्तक में करते हैं. उस समय केन्द्रीय कैबिनेट में 53 प्रतिशत ब्राह्मण, आई.ए.एस. अधिकारियों में 61 प्रतिशत ब्राह्मण भरे पड़े थे.

समकालीन परिस्थितियों के विश्लेषण के पश्चात कांशीराम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भले ही भारत 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्र हो गया तथा 26 जनवरी 1950 से लोकतांत्रिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, गणतांत्रिक राज्य के रूप में स्थापित हो गया है लेकिन अभी भी राज्य मशीनरी पर सवर्ण जातियों विशेषकर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित है. इन सवर्ण जातियों का हित अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों के शोषण एवं उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. अतः शासक जातियां कभी नहीं चाहती कि शोषित जातियों के अंदर से आत्मनिर्भर एवं प्रभावकारी राजनैतिक नेतृत्व उभरे. शोषित जातियों को अपने बीच से समर्थ एवं सक्षम नेतृत्व स्वयं पैदा करना होगा. एक ऐसा नेतृत्व जो अत्यधिक सक्षम, कल्पनाशील, रुचिशील, परिश्रमी और ज्ञानी हो तथा साथ ही साथ उसमें दूरदृष्टि धैर्य और लगन भी होनी चाहिए. यही नहीं, नेतृत्व को समझदार भी होना चाहिए उसमें उचित समझ का बोध और इस बड़े कार्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य सभी प्रासंगिक बोध भी होने चाहिए.

कांशीराम का मानना था कि सक्षम समाज ही सक्षम नेतृत्व पैदा कर सकता है. इसलिए उन्होंने बहुजन समाज बनाने की अवधारणा प्रस्तुत किया. यह समाज केवल अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों एवं अल्पसंख्यक समुदायों का गठबंधन भर नहीं होगा. बल्कि यह बहुजन चेतना से लैस होगा. ऐसा करने के लिए कांशीराम ने बाबासाहब अंबेडकर के तीन मंत्रों ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो एवं संघर्ष करो’ का सहारा लिया. उन्होंने कहा कि बहुजन समाज को अपने अधिकारों के प्रति व्यापक रूप से जागरूक करना पड़ेगा. इसी जागरूकता के क्रम में समाज को संगठित करने एवं संघर्ष के लिए तैयार का भी कार्य करना पड़ेगा. इस कार्य की जिम्मेदारी उन्होंने बहुजन समाज के शिक्षित एवं नौकरी पेशा वाले लोगों पर डाली और बामसेफ का निर्माण किया. उन्होंने कहा कि नौकरीपेशा वर्ग अपने उत्पीड़ित और शोषित समाज का कर्जदार है अब समय आ गया है कि यह वर्ग समाज को कर्ज चुकाये. उन्होंने पे बैक टू सोसायटी का नारा दिया. सक्षम और समर्थ नेतृत्व के लिए नेतृत्वकारी विचारधारा का होना भी आवश्यक था. इसके लिए मान्यवर कांशीराम ने महात्मा फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार रामास्वमी नायकर, नारायणा गुरु और डा. अंबेडकर के विचारों और कार्यों को आधार बनाया. उन्होंने फुले के सिद्धांत, ‘आर्य बाहर से भारत में आये और यहां के मूलनिवासियों को गुलाम बनाया’ को सामाजिक विश्लेषण का आधार बनाया. वे मानते हैं कि आर्यों के वंशज आज भी मूल निवासियों पर शासर कर रहे हैं. इस देश में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में जिसके मत ज्यादा होते हैं उसकी सरकार होती है. बहुजन समाज का 85 प्रतिशत मत है 85 प्रतिशत पर 15 प्रतिशत आर्य पुत्र शासन कर रहे हैं. इस आधार पर उन्होंने अपनी वैचारिकी विकसित की. इस वैचारिकी का मूल उद्देश्य बहुजन समाज की राजनीतिक चेतना बढ़ाना था.

कांशीराम का उद्देश्य मात्र राजनैतिक सत्ता की चाभी पर बहुजन समाज का कब्जा नहीं था. राजनैतिक सत्ता तो सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र है. मूल उद्देश्य सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन है जिससे भारत में संविधान के अनुरूप नये समाज का निर्माण हो सके. वे कहते हैं कि ‘हम सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए राजनैतिक शक्ति का इस्तेमाल करेंगे और परंपराओं, संस्कृतियों, व्यवसायों, धर्मों, जातियों तथा भाषाओं की विविधता को आत्मसात करते हुए हम सभी नागरिकों के प्रति आदर और सम्मान के आधार पर समाज को संगठित करेंगे.’ यह तभी संभव होगा जब राजसत्ता की चाभी बहुजन समाज के हाथ में हो. कांशीराम की सूझबूझ व नेतृत्व क्षमता के कारण ‘बहुजन समाज पार्टी’ को आंशिक सफलता मिली लेकिन इसका प्रभाव व्यापक था. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस और भाजपा लम्बे समय तक सत्ता से बाहर हो गये. प्रशासन तथा शासन में सवर्णों का वर्चस्व भी कुछ हद तक कमजोर पड़ा. लेकिन जल्दी ही बसपा ने अपने मूल एजेंडे ‘बहुजन समाज का निर्माण’ छोड़ दिया. परिणामस्वरूप 14 वर्षों के पश्चात उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा की वापसी हो गयी. मान्यवर कांशीराम अब हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनके कार्य और विचार धरोहर के रूप में हमारे पास हैं. यदि हम उनकी धरोहर को बचा पाये तो भविष्य में सवर्णों का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वर्चस्व टूट सकता है तथा भारत में सच्चे अर्थों में लोकतंत्र स्थापित हो सकता है.

डॉ. अलख निरंजन Read it also-लोकसभा चुनाव 2019: PM मोदी के खिलाफ खुद ताल ठोकेंगे भीम आर्मी के चंद्रशेखर!  

भीम आर्मी की आज दिल्ली में हुंकार रैली, शामिल होंगी कांशीराम की बहन

नई दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद शुक्रवार दिल्ली के बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती पर जंतर-मंतर से हुंकार भरेंगे. गुरुवार को मेरठ के आनंद हास्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद चंद्रशेखर दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. वो आज दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली में शिरकत करेंगे.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलित युवाओं के बीच तेजी से अपनी पहचान बनाने वाले भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुंकार भरेंगे. शुक्रवार को बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती है. बताया जा रहा है कि इस रैली में कांशीराम की बहन भी शामिल हो सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो चंद्रशेखर और मायावती के बीच दलितों की राजनीति करने के मुद्दे पर खींचतान बढ़ सकती है. बता दें कि मायावती कांशीराम की राजनीतिक को आगे बढ़ाने का दावा करती रही हैं.

गुरुवार को मेरठ के आनंद हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद चंद्रशेखर दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. भीम आर्मी प्रमुख ने गुरुवार को ही मेरठ से ऐलान कर दिया था कि वो शुक्रवार को दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली में हर हाल में शामिल होंगे. संगठन का दावा है कि उनकी अभी तक की सबसे बड़ी रैली शुक्रवार होगी. चंद्रशेखर के जेल से छूटने के बाद यह पहली बड़ी रैली हो रही है.

बता दें कि भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने सोमवार को बहुजन हुंकार रैली की शुरुआत की थी. ये यात्रा रविदास छात्रावास से शुरू होने वाली थी, लेकिन आचार संहिता लागू होने के कारण यात्रा की अनुमति नहीं दी गई. इसके बावजूद भी भीम आर्मी ने बहुजन हुंकार रैली की शुरुआत की लेकिन मंगलवार को देवबंद में प्रशासन ने उनकी रैली को रोक दिया.

यात्रा को रोकने जाने के बाद हुए हंगामे के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी.

प्रशासन ने चुनावी आचार संहिता उल्लघंन के चलते चंद्रशेखर को हिरासत में ले लिया था. लेकिन बाद तबियत बिगड़ जाने के चलते उन्हें को मेरठ के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने बुधवार को जाकर मुलाकात की थी.

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बसपा प्रत्याशियों की सूची तैयार, बसपा संस्थापक की जयंती पर ऐलान संभव

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश के शीर्ष पदाधिकारियों की गुरुवार को महत्वपूर्ण बैठक हुई. इस बैठक में पार्टी ने प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप दे दिया है. इस दौरान बसपा-सपा गठबंधन के जमीनी हकीकत की भी चर्चा की गई. कल 15 मार्च को बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जयंती और फिर 14 अप्रैल को बाबासाहेब आम्बेडकर की जयंती को लेकर भी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को निर्देश जारी किया गया है.

चुनाव को ध्यान में रखते हुए बसपा प्रमुख ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को दोनों महापुरुषों की जयंतियों को शालीनता से घर पर ही मनाये जाने का निर्देश दिया गया. बैठक के बाद जारी बयान में बसपा प्रमुख की ओर से कहा गया है कि फिलहाल तन, मन, धन से चुनाव जीतने की तैयारी जरूरी है, ताकि उनकी चाह के अनुसार सत्ता की मास्टर चाबी प्राप्त की जा सके.

अपने बयान में भाजपा पर निशाना साधते हुए बसपा प्रमुख ने कहा है कि बीजेपी की वर्तमान केन्द्र सरकार वास्तव में झूठे वायदों व वादाखिलाफी की सरताज निकली. इन्होंने हर प्रकार से केवल अपने ही अच्छे दिन लाने के प्रयास किये जबकि देश की 130 करोड़ आमजनता ज़बर्दस्त महंगाई, ग़रीबी, बढ़ती बेरोज़गारी आदि की मार से बुरी तरह से जुझती रही है.

बैठक में सुश्री मायावती ने पार्टी सदस्यों को सावधान किया कि सत्ताधारी बीजेपी केवल जातिवादी, साम्प्रदायिक व गरीब, मजदूर व किसान विरोधी पार्टी ही नहीं है बल्कि साम, दाम, दण्ड, भेद आदि अनेकों हथकण्डों आदि का इस्तेमाल करके चुनाव जीतने में विश्वास रखती है. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को सावधान रहने के निर्देश दिए. बसपा प्रमुख ने ई.वी.एम. पर भी खास ध्यान रखने की बात कही.

फिलहाल बहुजन समाज पार्टी चुनावी तैयारियों के अपने आखिरी चरण में है. और प्रत्याशियों की सूची जारी होते ही बसपा भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार है.

मायावती और अखिलेश यादव की साझा रैली का प्लॉन तैयार

नयी दिल्ली। लोकसभा चुनाव को लेकर कमर कस चुकी पार्टियां अब रैलियों का कार्यक्रम बनाने में जुट गई हैं. उत्तर प्रदेश में ढाई दशक के बाद एक फिर साथ आए बसपा और सपा में भी रैलियों को लेकर कार्यक्रम लगभग तय है. खबर है कि दोनों पार्टी के प्रमुख यानि की अखिलेश यादव और मायावती साझा रैली करने पर सहमत हो गए हैं. बुधवार 13 मार्च को बहनजी और अखिलेश यादव की बैठक में इस बात की चर्चा होने की भी खबर है.

 खबर है कि दोनों नेता जल्दी ही साझा रैली के लिए मैदान में होंगे. इस अभियान की शुरुआत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होगी. दोनों नेताओं के बीच तय हुआ है कि जमीन पर अपने कैडर को संकेत देने के लिए दोनों साथ में रैलियां करेंगे. अभी तक प्रेस कांफ्रेंस के अलावा दोनों नेता मंच पर साथ नहीं दिखे हैं. इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में अभी सरगर्मी नहीं दिख रही है. ऐसे में कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए दोंनों शीर्ष नेताओं ने यह फैसला किया है. साझा रैली होने की स्थिति में 1993 के बाद फिर से इतिहास दोहराया जाएगा. इससे पहले कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने साथ में रैलियां की थीं.

रैलियों के कार्यक्रम को लेकर जो बात सामने आ रही है, उसके मुताबिक सात चरणों में होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में दोनों नेता हर चरण दो-दो साझा रैलियां करेंगे. यानि कुल 14 साझा रैलियां देखने को मिल सकती हैं. हालांकि हर दौर के चुनाव के बाद स्थिति की समीक्षा होगी और जरूरत पड़ने पर जरूरत के मुताबिक और ज्यादा साझा रैलियों को लेकर सहमति बन सकती है.

BSP का अमेठी व रायबरेली से भी गठबंधन प्रत्याशी उतारने का मूड

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती कल मेरठ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की मेरठ में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर से मुलाकात पर नाराज हैं. अब वह इस मामले में बड़ा कदम उठाने के मूड में हैं. इस प्रकरण पर कल उन्होंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भेंट की.

मायावती अब रायबरेली और अमेठी संसदीय सीट पर भी सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार को उतारना चाहती हैैं. इस संबंध में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को अपने बंगले पर बुलाकर मायावती ने उनसे टिकटों पर पुनर्विचार करने को कहा है. कल उनके आवास पर लगभग डेढ़ घंटे की मुलाकात में होली के बाद संयुक्त चुनावी रैलियां करने पर भी विचार किया गया.

अब बदलती परिस्थितियों को देखते अमेठी और रायबरेली के अलावा कुछ अन्य सीटों पर भी सपा-बसपा प्रत्याशियों में बदलाव करने पर भी गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया. मुलाकात में कांग्रेस के प्रत्याशियों के उतारने से गठबंधन को होने वाले नुकसान पर भी चर्चा की गई. गठबंधन के प्रत्याशियों की सूची एक साथ जारी करने पर भी विचार किया गया. इस विचार विमर्श में राज्यसभा सांसद संजय सेठ भी थे. सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के रवैये से नाराज बसपा सुप्रीमो मायावती के प्रस्ताव से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहमत नहीं हैैं. उनका कहना था, ऐसा करने से गलत संदेश जाएगा और जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा.

गौरतलब है कि खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित युवाओं में चंद्र शेखर की पकड़ मानी जा रही है. ऐसे में दलित वोट बैैंक के बंटने से बसपा को होने वाले नुकसान की आंशका के मद्देनजर मायावती पहले ही चंद्र शेखर से किनारा कर चुकी हैैं.

संयुक्त प्रचार अभियान की रणनीति बनेगी

संयुक्त प्रचार अभियान चलाने की रणनीति के तहत होली पर्व के बाद दोनों दलों की जिलेवार साझा बैठक करने का भी फैसला लिया गया. उल्लेखनीय है कि सपा 11 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर चुकी हैं लेकिन बसपा गुरुवार को पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ बैठक के बाद अपनी सूची जारी कर सकती है. हालांकि, सोशल मीडिया पर बसपा की एक सूची वायरल है. जिसका बसपा ने न खंडन किया है और न ही पुष्टि की. यह भी माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच कुछ सीटों की अदला-बदली पर भी चर्चा हुई.

सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने बताया कि मुलाकात आगामी लोकसभा चुनाव के लिए होने वाली रैलियों, सभाओं और बैठकों के सिलसिले में थी. उन्होंने बताया कि चुनाव करीब आ रहे हैं. होली के बाद चुनाव प्रचार की पूर्णतया शुरूआत कर दी जाएगी. चौधरी ने बताया गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए दो सीटें छोडी हैं और ईमानदारी से पूरा समर्थन किया जाएगा. सपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका की भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर के साथ मुलाकात बसपा सुप्रीमो मायावती के फैसले की प्रतिक्रिया है.

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