एग्जिट पोल की बहस और ग्राउंड रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव

एग्जिट पोल के नतीजों की बहस के बीच मुझे पिछले दिनों चुनाव के दौरान अपनी ग्राउंड रिपोर्ट के किस्से याद आ रहे हैं. पहले दो सच्ची घटनाएं, फिर बाकी बात.

एग्जिट पोल को लेकर मुझे एक अनुभव गोरखपुर में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान हुआ. मैं एक छोटे कस्बे के बाजार पर रुका. वहां चार-पांच गांव के लोग जरूरत का सामान लेने आते हैं. उन गांवों में ज्यादातर निषाद समाज के लोगों की आबादी थी. चूंकि गोरखपुर में निषाद वोट बड़ा फैक्टर था, सो वह मेरे लिए अहम था. मैंने एक सब्जी का दुकान लगाने वाली महिला से पूछा- “अम्मा किसको वोट दोगी?” अम्मा ने बोला- “मोदी के देम” मेरे साथ मेरे बड़े भाई राजकुमार थे। जब मैं वहां से हटकर किसी और से बात कर रहा था, भाई ने उस महिला से जानना चाहा कि आखिर वो मोदी को वोट क्यों देगी? उसने कहा- “देब त हम साईकिल पर, लेकिन इ चैनल वाला सब मोदिए के हउवन ओही से मोदी के कह दिहली ह.” (दूंगी तो मैं साईकिल पर ही लेकिन ये चैनल वाले सब मोदी के आदमी हैं इसलिए उनको मोदी बोल दिया।)

दूसरी घटना भी गोरखपुर जिले के ही बांसगांव लोकसभा क्षेत्र की है. बांसगांव लोकसभा गोरखपुर के कुछ विधानसभा क्षेत्र और देवरिया के कुछ विधानसभा क्षेत्र को लेकर बनाया गया है. यहां के कौड़ीराम बाजार पर जब मैं लोगों से यह जानने की कोशिश कर रहा था कि इस लोकसभा क्षेत्र में किसकी जीत होगी, तब एक दिलचस्प वाकया हुआ. जब मैंने एक युवा से पूछा कि कौन जीत रहा है, तो उसने भाजपा का नाम लिया. तब उसके ठीक बगल में खड़े एक अधेड़ ने उसकी बात  बीच में ही काटते हुए कहा कि “नहीं-नहीं गठबंधन जीत रहा है.” उसके अपने तर्क भी थे कि गठबंधन के प्रत्याशी (सदल प्रसाद, बसपा) आखिर क्यों जीतेंगे.

यह मेरे लिए एक सुखद अहसास इसलिए भी था क्योंकि गठबंधन को सपोर्ट करने वाला व्यक्ति एक औसत व्यक्ति था जो अपने अधिकारों को लेकर जागरुक था और अब तर्क करना सीख रहा था.

इन दोनों घटनाओं का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि एग्जिट पोल करने वालों की पहुंच क्या इन लोगों तक हो पाती है? क्या सर्वे करने के दौरान ऐसा करने का दावा करने वाले लोग इन लोगों की राय जानने की कोशिश करते हैं? ऐसा होता होगा, यह संभव नहीं लगता. मैंने खुद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के तकरीबन दर्जन भर लोकसभा क्षेत्रों का सर्वे किया. इसके लिए मैं सिर्फ उन जगहों को चुन रहा था, जहां एक मिली जुली आबादी मिल जाए. जैसे शहर का प्रमुख चौराहा, बस स्टैंड और छोटे कस्बों के बाजार जहां कई गांवों के लोग हाट-बाजार करने पहुंचते हैं. जाहिर है कि इन जगहों पर हर जाति और धर्म के लोग मिल रहे थे. भारत में एक सुविधा है कि आप किसी के पूरे नाम से स्थानीयता को देखते हुए उसकी जाति के बारे में समझ सकते हैं. मैं भी यही कर रहा था. और मुझे यह साफ दिखा कि समाज जाति और धर्म के हिसाब से खानों में बंटा था.

साफ महसूस हो रहा था कि  बेसिक तौर पर दलित, पिछड़े और मुसलमान गठबंधन के साथ थे तो अगड़ी जातियां भाजपा के साथ. मैं जातियों के भीतर जाति में नहीं जा रहा, लेकिन शुरूआती सच्चाई यही देखने को मिली. ऐसे में उत्तर प्रदेश का आंकलन करने पर ज्यादातर एग्जिट पोल का आंकलन कि गठबंधन को 18-20 सीटें मिलेंगी, समझ से परे है. यह ऐसा बयान है जिसका कोई आधार समझ में नहीं आ रहा.

इसी तरह बिहार में 80 फीसदी सीटें एनडीए जीत जाएंगी यह भी बात समझ से परे है, क्योंकि 2014 में विजयी रथ पर सवार भाजपा को सबसे पहले बिहार ने ही रोका. और पिछले सालों में राष्ट्रीय जनता दल और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता बिहार में जिस तरह बढ़ी है, उसने नीतीश कुमार की सत्ता को बड़ी चुनौती दी है. कुछ एग्जिट पोल वाले तो बिहार की सभी सीटें एनडीए को दे रहे हैं. यह एक अनोखी बात है, वह भी तब जब विपक्ष राफेल, बेरोजगारी, पंद्रह लाख और महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने में कामयाब रहा है.

एग्जिट पोल को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. हर जागरूक और राजनीतिक समझ रखने वाला व्यक्ति इस बात को लेकर परेशान है कि भाजपा को आखिर इतनी सीटें आएंगी तो आएंगी कहां से? खैर 23 मई को सारी बात साफ हो जानी है, लेकिन अगर उस दिन भी नतीजे ऐसे ही रहें जैसे कि एग्जिट पोल दिखा रहे हैं तो देश में एक नई राजनैतिक बहस शुरू हो जाएगी.

 

UP Exit Poll 2019: के बाद आज का मायावती का दिल्ली दौरा रद, लखनऊ में ही रहेंगी

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 की सात चरणों की मतदान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब मतदाताओं से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों को 23 मई को होनी वाली मतगणना का बेसब्री से इंतजार है. रविवार को अंतिम चरण के बाद आए तमाम एग्जिट पोल के रुझानों ने राजनीतिक दलों की बेचैनी और बढ़ा दी है. विशेष तौर पर विपक्षी पार्टियों को 23 मई की मतगणना के दौरान किसी चमत्कार का इंतजार है.

एग्जिट पोल के रुझानों के बाद राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति बनानी भी शुरू कर दी है. वहीं कुछ दल वेट एंड वॉच की नीति अपना रहे हैं. इन सबके बीच बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती का आज दिल्ली जाने का कार्यक्रम था. कल देर शाम एग्जिट पोल आने के बाद उनका दिल्ली जाने का यह कार्यक्रम रद हो गया.

दिल्ली में आज मायावती की संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मुलाकात होनी थी. दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने एग्जिट पोल के रुझान आने के बाद सभी विपक्षी पार्टियों से एकजुट रहने की अपील की है.

बसपा प्रमुख मायावती की आज दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात होनी थी. इनके बीच मुलाकात की खबरों के बीच बसपा ने कहा है कि उनकी कोई बैठक नहीं है. पहले बताया जा रहा था कि मायावती सोमवार को राहुल और सोनिया गांधी से मुलाकात करेंगी. लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कांग्रेस पर मायावती के तीखे हमलों के बाद इस मुलाकात को काफी अहम माना जा रहा था, लेकिन बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि मायावती जी का आज दिल्ली में कोई प्रोग्राम या बैठक नहीं है. वह लखनऊ में रहेंगीं.

मायावती ने लोकसभा में प्रचार के दौरान भाजपा व कांग्रेस दोनों पर लगातार हमला बोला था. मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा है. यूपी के गठबंधन में कांग्रेस को बाहर रखने के बाद भी मायावती ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी और सोनिया गांधी की सीट रायबरेली में कांग्रेस को वोट दें. सपा-बसपा ने इन दोनों सीटों से अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे.

देश में गैर भाजपा व कांग्रेस की सरकार के गठन का प्रयास करने में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सबसे सक्रिय हैं. लखनऊ में अखिलेश यादव व मायावती से मिलने के बाद दिल्ली में राहुल गांधी व अन्य नेताओं से मिले. लखनऊ आने से पहले वह शरद पवार, सीताराम येचुरी, शरद यादव तथा अरविंद केजरीवाल से भी मिले थे. नायडू विपक्षी पार्टियों के नेताओं से मुलाकात कर विपक्ष को एक करने में प्रयास में लगे हैं. माना जा रहा है कि कांग्रेस अब तीसरे मोर्चे के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश में जुट गई है.

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रैलियों में खूब दिखी गठबंधन की एकजुटता, मायावती और अखिलेश ने की 21 साझा रैली

बसपा, सपा व रालोद गठबंधन की एका केवल उम्मीदवार उतारने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए मायावती, अखिलेश व अजित सिंह ने तपती गर्मी में खूब पसीना बहाया. यूपी में मायावती व अखिलेश ने कुल 21 साझा चुनावी रैलियां कीं. यूपी में साझा रैली की शुरुआत पश्चिमी यूपी के देवबंद सहारनपुर से शुरू हुई और समापन पूर्वांचल के चंदौली सीट से हुआ.

मायावती की नजर प्रदेश के बाहर भी रही: बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी में सपा व रालोद से गठबंधन किया. बसपा यूपी में 38 सीटों पर मैदान में उतरी. बसपा ने यूपी के बाहर अन्य प्रदेशों में भी उम्मीदवार उतारे. मायावती ने चुनावी अभियान की शुरुआत 2 अप्रैल को भुवनेश्वर ओडिसा से की थी. वह लगातार पांच दिनों तक यूपी के बाहर चुनावी सभाओं को संबोधित करती रहीं.

यूपी लौटने के बाद पहली संयुक्त साझा रैली देवबंद में हुई. पश्चिमी यूपी की यह पहली चुनावी सभा 7 अप्रैल को सहारनपुर में हुई. इसमें मायावती के साथ सपा प्रमुख अखिलेश यादव और रालोद मुखिया अजित सिंह ने उनके साथ मंच को साझा किया.

यूपी में हर दिन दो-दो सभाएं :मायावती व अखिलेश ने लोकसभा चुनाव में अगर देखा जाए तो प्रत्येक दिन अमूमन दो-दो चुनावी सभाएं की. दूसरे चरण में 16 अप्रैल को अगरा में संयुक्त रैली हुई. तीसरे चरण में बदायूं, मैनपुरी, रामपुर, फिरोजाबाद व बरेली में रैलियां हुईं.

चौथे चरण में कन्नौज व जालौन के साथ 30 अप्रैल को लखीमपुर खीरी व लखनऊ में अकेले रैलियां कर माहौल बनाया. इसके बाद के चरणों में बाराबंकी, जौनपुर, भदोही, आजमगढ़ में संयुक्त चुनावी रैलियां करके मायावती व अखिलेश ने गठबंधन के पक्ष में माहौल बनाया.

पूर्वांचल की सीटों पर खासा ध्यान :बसपा सुप्रीमो व सपा प्रमुख ने गठबंधन उम्मीदवारों के पक्ष में उम्मीदवार बनवाने के लिए पूर्वांचल पर खासा ध्यान दिया. किसी जमाने में पूर्वांचल सपा-बसपा का गढ़ हुआ करता था, लेकिन 2014 के चुनाव में आजमगढ़ को छोड़ दिया जाए तो सभी सीटों पर भाजपा जीती. इसीलिए 13 से 17 मई तक गठबंधन की साझा रैलियां अमूमन रोजाना हुईं. प्रचार बंद होने से एक दिन पहले 16 मई को गठबंधन के तीनों प्रमुख नेता मायावती, अखिलेश व अजित सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में रैली की और प्रचार समाप्त होने के अंतिम दिन यानी 17 मई को मिर्जापुर व चंदौली में गठबंधन ने रैलियां की.

आयोग के प्रतिबंध पर 48 घंटे रहीं मौन देवबंद सहारनपुर में मायावती द्वारा दिए गए एक बयान के बाद चुनाव आयोग ने 48 घंटे का प्रतिबंध भी लगाया. मायावती को इसके चलते 48 घंटे खामोश भी रहना पड़ा, लेकिन प्रतिबंध शुरू होने से पहले रात में 9 बजे पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि साजिश के तौर पर प्रतिबंध लगाया गया है.

खूब दिखा तालमेल गठबंधन के तीनों नेताओं मायावती, अखिलेश व अजित सिंह के बीच चुनावी प्रचार के दौरान खूब तालमेल दिखा. चुनाव अभियान के दौरान मायावती गठबंधन की बड़ी नेता बनकर उभरीं. मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव की सभा हो या कन्नौज में डिंपल यादव या फिर कहें अखिलेश यादव की सीट पर आजमगढ़ में हुई चुनावी सभा, मायावती सभी में अहम रोल में नजर आईं.

मायावती ने यूपी के बाहर भी माहौल बनाया 2 अप्रैल ओडिसा के भुवनेश्वर 3 अप्रैल आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा 4 अप्रैल हैदराबाद 5 अप्रैल महाराष्ट्र नागपुर 6 अप्रैल हरिद्वार व उद्धमसिंह नगर 7 अप्रैल यूपी के देवबंद सहारनपुर में पहली साझा रैली 8 अप्रैल को हापुड़ व नोएडा साझा रैली 17 मई को चंदौली में हुई आखिरी सभा

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मायावती से मिलने पहुंचे अखिलेश यादव

बसपा प्रमुख मायावती के आवास पर अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। 23 मई को मतगणना के बाद नतीजें चाहे जिसके पक्ष में आएं एक्जिट पोल ने विपक्ष की धड़कन बढ़ा दी है. विपक्षी दलों को एकजुट करने में लगे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जहां तमाम विपक्षी नेताओं से मिल रहे हैं तो इसी बीच सोमवार को लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बसपा प्रमुख मायावती से मिलने उनके आवास पर पहुंचे. दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे की मुलाकात हुई. बैठक के बाद मीडियाकर्मियों ने अखिलेश यादव से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन अखिलेश यादव ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

हालांकि जैसा कि समझा जा सकता है कि इस मुलाकात में दोनों के बीच एक्जिट पोल के बाद की स्थिति और आगामी 23 मई तक की रणनीति पर बात की गई. 21 मई को सोनिया गांधी ने भी विपक्ष की बैठक बुलाई है, खबर है कि दोनों नेताओं की बैठक में इस मुद्दे पर भी चर्चा हुई. एक्जिट पोल को लेकर दोनों नेताओं ने अब तक कोई भी अधिकारिक बयान नहीं दिया है.

इससे पहले दिल्ली में विपक्ष के नेताओं से मिलने के बाद तेदेपा अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू ने भी शनिवार शाम लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती से मुलाकात की. इससे पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी के दफ्तर में सपा प्रमुख अखिलेश यादव से भी मुलाकात की. नायडू लखनऊ एअरपोर्ट से सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मिलने उनके पार्टी ऑफिस पहुंचे थे, जहां अखिलेश यादव ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. इस मुलाकात के दौरान सपा के दफ्तर में पार्टी नेताओं की भीड़ रही.

गौरतलब है कि एग्जिट पोल में यूपी में भाजपा को सपा- बसपा- रालोद गठबंधन पर भारी पड़ता दिखाया गया है. छह सर्वे के हिसाब से देखें तो बीजेपी को औसतन 53 सीटें व गठबंधन को 25 सीटें मिलती दिख रही हैं. कांग्रेस को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं. सर्वे में सिर्फ एबीपी निल्सन ने ही गठबंधन को एनडीए से ज्यादा 56 सीटें दी है. बताते चलें कि 2014 में भाजपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश से 73 सीटें मिली थीं.

हंगामे के बीच मनुवादियों की बस्ती से लौटी दलित की बारात

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प्रतीकात्मक चित्र

श्योपुर। अनुसूचित जाति वर्ग के दूल्हे को दबंगों ने बस्ती के बाहर ही रोक दिया. श्योपुर तहसील की अड़वाड़ ग्राम पंचायत के खेड़री गांव में दलित की बारात को रास्ता देने पर विवाद हो गया. गांव के कुछ दबंग बारात को अपने मोहल्ले से गुजरने नहीं दे रहे थे. ऐसे में दोनों पक्षों के बीच विवाद हो गया.

विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस तक पहुंच गया लेकिन शिकायत करने के बाद भी ढाई घंटे तक पुलिस मौके पर नहीं पहुंची. मिली जानकारी के अनुसार रायपुरा गांव के धन्नालाल माहौर के बेटे मुकेश की शादी शनिवार को राजस्थान की सीमा से सटे खेड़ली गांव के अमरलाल माहौर की बेटी रीना के साथ होना तय की गई थी.

शादी के दिन बारात खेड़ली गांव पहुंचीं. मगर इतने में ही गुर्जर बस्ती के पास मौजूद लोगों ने बारात को रोक दिया और बारात क्षेत्र से न निकाले जाने पर कथित दबंग विवाद करते रहे. हांलाकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बारात में कुछ युवक जबरन घुस आए थे जिसके चलते विवाद हो गया. पुलिस के पहुंचने के दौरान बारात अन्य रास्ते से लड़की के घर पहुंच गई थी.

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मतदान से पहले दलितों की अंगुली में अमिट स्याही लगाने के मामले में पूर्व प्रधान गिरफ्तार

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उत्तर प्रदेश में चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र के जीवनपुर गांव के दलित बस्ती में रविवार की सुबह सीओ सदर त्रिपुरारी पांडेय मय फोर्स पहुंचकर स्याही लगे मतदाताओं को बूथ पर ले जाकर मतदान कराया. वहीं आरोपित पूर्व प्रधान छोटेलाल तिवारी के घर दबिश दी, लेकिन वह फरार हो गया. हालांकि आरोपित को जीवनपुर चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. आरोप है कि शनिवार की देर रात पूर्व प्रधान अपने समर्थकों के साथ दलित बस्ती में पैसा देकर लोगों को वोट न देने की अपील कर उंगली में स्याही लगा दिया. पुलिस जबतक मौके पर पहुंचती सभी फरार हो गये.

जीवनपुर गांव के दलित बस्ती में देर रात पूर्व प्रधान छोटेलाल तिवारी, अमन तिवारी व कतवारू तिवारी गठबंधन को वोट न देने की अपील करते हुए पैसा देने लगे. यहीं नहीं मतदाताओं की अगुंली में स्याही भी लगा रहे थे. इसकी जानकारी होने पर सकलडीहा विधायक प्रभुनारायण यादव अपने समर्थकों के साथ अलीनगर थाना परिसर में धरना पर बैठ गये. इस दौरान उन्होंने आरोपितों की गिरफ्तारी व स्याही लगे सुदर्शन कुमार, नौरंगी देवी, बदामी देवी, बंशीधर, पनारू सहित आधा दर्जन लोगों को मतदान करने की मांग की. देर रात करीब डेढ़ बजे जिला निर्वाचन अधिकारी नवनीत सिंह चहल ने सभी को मतदान करने व आरोपित को गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया, तब जाकर मामला शांत हुआ. इस क्रम में रविवार की सुबह नौ बजे सीओ सदर त्रिपुरारी पांडेय मय फोर्स जीवनपुर गांव पहुंचकर स्याही लगे लोगों को बूथ पर ले जाकर मतदान कराया. सीओ त्रिपुरारी पांडेय ने बताया कि जिला निर्वाचन अधिकारी के निर्देश पर स्याही लगे लोगों का मतदान करा दिया गया.

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गर्मी के मौसम में लू लगने और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं से बचाती है सौंफ, जानें- इसकी खूबी

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नई दिल्ली। गर्मी के दिनों में अत्यधिक गर्म हवा के झोंकों से लू लगना , पानी की कमी या डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं होने की अधिक संभावना होती है, ऐसे मौसम में स्वास्थ्य का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी है. सौंफ में कई औषधीय गुण मौजूद होते हैं, जिनका सेवन करने से स्वास्‍थ्‍य को फायदा होता है. सौंफ हर उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद होती है. सौंफ में कैल्शियम, सोडियम, आयरन, पोटैशियम जैसे तत्व पाये जाते हैं. सौंफ का फल बीज के रूप में होता है और इसके बीज को प्रयोग किया जाता है. पेट की समस्याओं के लिए सौंफ बहुत फायदेमंद होती है. गर्मी के इस मौसम में लू लगने से बचना है तो आपको सौंफ के पानी का सेवन करना चाहिए. सौंफ को बेल के गूदे के साथ सुबह-शाम चबाने से अजीर्ण समाप्त होता है और अतिसार में फायदा होता है. डायरिया होने पर सौंफ खाना चाहिए. आइए जानते हैं सौंफ खाना स्वास्‍थ्‍य के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है.

स्मरण शक्ति बढ़ाएं अगर आप इस बात से परेशान हैं कि आपको कोई बात याद नहीं रहती तो अपनी स्‍मरणशक्ति बढ़ाने के लिए सौंफ का सेवन करें. इसके लिए सौंफ और मिश्री का समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर रख लें. खाने के बाद इस मिश्रण के दो चम्मच सुबह शाम दो महीने तक सेवन करने से स्मरणशक्ति तेज होती है.

पेट के लिए फायदेमंद सौंफ के नियमित सेवन से पेट और कब्‍ज की शिकायत नहीं होती. इसके लिए सौंफ को मिश्री के साथ पीसकर चूर्ण बना लें और लगभग 5 ग्राम चूर्ण को सोते समय गुनगुने पानी के साथ सेवन करें. इससे गैस व कब्‍ज की समस्‍या सहित पेट की सभी समस्‍या दूरी होगी.

आंखों की रोशनी बढ़ाएं सौंफ का सेवन आंखों की रोशनी को बढ़ाता है. प्रतिदिन भोजन के बाद 1 चम्‍मच सौंफ खाएं या फिर आधा चम्‍मच सौंफ का चूर्ण एक चम्‍मच मिश्री के साथ मिलाकर रात को सोते दूध के साथ लें. सौंफ का चूर्ण दूध के स्‍थान पर पानी के साथ भी लिया जा सकता है.

खांसी को करें छूमंतर 10 ग्राम सौंफ के अर्क को शहद में मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से खांसी ठीक होती है. या फिर 1 चम्‍मच सौंफ और 2 चम्‍मच अजवाइन को आधा लीटर पानी में उबाल लें और फिर इसमें 2 चम्‍मच शहद मिलाकर छान लें. इस काढ़े की 3 चम्‍मच को 1-1 घंटे के अन्‍तर पर पीने से खांसी में लाभ मिलता है. सौंफ को मुंह में रखकर चबाते रहने से सूखी खांसी शांत होती है.

त्‍वचा में चमक बढ़ाएं स्‍वास्‍थ्‍य के साथ-साथ सौंफ त्‍वचा के लिए भी बहुत फायदेमंद होती है. रोजाना सुबह-शाम केवल सौंफ खाने से खून साफ होता है जो कि त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है. इसके नियमित सेवन से त्‍वचा में चमक आती है.

दूर करें नींद की समस्‍या सौंफ अनिंद्रा की समस्‍या में भी लाभकारी है. सौंफ का काढ़ा बना कर दस पंद्रह ग्राम घी व इच्छानुसार मिश्री मिलाकर रात को सोते समय सेवन करने से नींद अच्छी आती है. इससे बहुत अधिक नींद और सुस्‍ती की समस्‍या भी दूर होती है. हर समय नींद में या सुस्ती में रहने पर सौंफ का काढ़ा बना कर थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम एक हफ्ते तक पीने से सुस्ती दूर होती है तथा जरुरत से ज्‍यादा नींद भी नहीं आती.

गर्भपात रोकने के लिए गर्भधारण करने के बाद महिला को सौंफ और गुलकन्द मिलाकर पानी के साथ पीसकर हर रोज नियमित रूप से पिलाने से गर्भपात की आशंका समाप्त हो जाती है. गर्भधारण करने के बाद से ही बच्चे के जन्म तक सौंफ को नियमित पीने से भी गर्भ सुरक्षित रहता है.

साभार- जागरण Read it also-ममता के समर्थन में उतरी मायावती

अमेरिका की ईरान को धमकी, युद्ध लड़ा तो मिट जाएगा पूरा देश

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अमेरिका और ईरान क्या अब युद्ध के अंतिम मुहाने पर पहुंच चुके हैं. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान अमेरिका के साथ युद्ध लड़ता है तो आधिकारिक तौर पर उसका अंत हो जाएगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्वीट में ईरान को धमकी देते हुए लिखा, अगर ईरान लड़ना ही चाहता है तो यह उसका आधिकारिक तौर पर अंत होगा. अमेरिका को फिर कभी धमकी मत देना.

वाशिंगटन में एक खुफिया रिपोर्ट आने के बाद दोनों देशों के बीच संभावित सैन्य टकराव को लेकर बहस छिड़ने पर ट्रंप के इस ट्वीट ने अमेरिका में इस डर को और हवा दी है कि दोनों देश एक दूसरे से युद्ध लड़ सकते हैं. अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान अमेरिका के महत्वपूर्ण संस्थानों और संपत्ति को निशाना बना कर हमला कर सकता है.

एक रिपोर्ट में अमेरिका के सुरक्षा अधिकार के हवाले से दावा किया गया है कि फारस खाड़ी में ईरानी व्यापारिक जहाजों की जो तस्वीरें आई हैं उसके देखकर लगता है कि व्यापारिक जहाज की आड़ में युद्धपोत और मिसाइल ले जाया जा रहा है. हालांकि, अमेरिकी सरकार ने अब तक इसका कोई सबूत नहीं दिया है और हथियार ले जाने के अमेरिका के दावे की पुष्टि नहीं हुई है.

इससे पहले अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की जो रिपोर्ट सामने आई थी उसमें अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया था कि जिस तरह फारस खाड़ी से बाहर ईरानी समर्थित सैन्य बलों के लिए जहाजों का मूवमेंट हो रहा है वो ईरान के पुराने परिवहन पैटर्न से मिलता-जुलता नहीं है. यह रिपोर्ट अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से उपजे खतरे के आकलन का हिस्सा था.

बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु हथियारों को लेकर तनाव बना हुआ है. बीते दिनों ईरान पर प्रतिबंध लगाते हुए अमेरिका ने कई देशों को उनसे कारोबारी रिश्ते तोड़ने को कहा था जिसमें भारत भी शामिल है. अमेरिका ने भारत के ईरान से तेल खरीदने की छूट को भी खत्म कर दिया था.

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नहीं बताया जा सकता जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले राज्य सभा सदस्यों का नाम

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एक हाईकोर्ट जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले और इसका समर्थन नहीं करने वाले राज्य सभा सदस्यों के नाम का खुलासा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन हो सकता है.

केंद्रीय सूचना आयोग ने यह फैसला एक आरटीआई अपील के जवाब में दिया, जिसमें राज्य सभा सचिवालय से उन सांसदों की संख्या पूछी गई थी, जिन्होंने हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे. साथ ही उन सांसदों की भी जानकारी मांगी गई थी, जो इस प्रस्ताव से हट गए थे. जस्टिस रेड्डी पिछले साल हैदराबाद हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त हुए थे. एस. मल्लेश्वर राव की इस आरटीआई को राज्य सभा सचिवालय ने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(सी) के तहत खारिज कर दिया था. इस धारा के तहत संसद या राज्य विधायिका के विशेषाधिकार का उल्लंघन करने वाली किसी भी ऐसी जानकारी को देने पर रोक लगाई गई है. राव ने राज्य सभा सचिवालय के फैसले के खिलाफ केंद्रीय सूचना आयोग में अपील दाखिल की थी. मुख्य सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव ने इस अपील पर फैसला देते हुए कहा कि संसद या एक राज्य विधायिका या उनके सदस्यों को प्रभावी ढंग से किसी भी बाधा या हस्तक्षेप के बिना अपने कार्यों को करने में सक्षम करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 105 और 194 के तहत कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं. भार्गव ने फैसले में मशहूर ब्रिटिश संविधान विशेषज्ञ थॉमस इर्स्िकन मे के एक कथन का भी हवाला दिया और अपील को खारिज कर दिया.

प्रभावित हो सकते हैं संसदीय कर्तव्य मुख्य सूचना आयुक्त ने फैसले में कहा कि महाभियोग प्रस्ताव देने वाले और जिन सदस्यों ने बाद में नाम वापस ले लिए, उनके विवरण के खुलासे से न केवल अप्रत्यक्ष रूप से सदस्यों को उनके संसदीय कर्तव्यों के निर्वहन में प्रभावित किया जा सकता है, बल्कि भविष्य के प्रदर्शन में उनकी स्वतंत्रता भी प्रभावित हो सकती है.

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चुनाव खत्म होते ही सीएम योगी ने बागी ओमप्रकाश राजभर को किया बर्खास्त, जाने पूरा मामला

लोकसभा चुनाव के नतीजों से पहले और एग्जिट पोल के बाद देश की राजनीति में हलचल मचना शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्यपाल राम नाईक से उनके मंत्रिमंडल में शामिल ओमप्रकाश राजभर को बर्खास्त करने की सिफारिश कर दी है. इस फैसले का खुद ओमप्रकाश राजभर ने स्वागत किया है.

इतना ही नहीं ओपी राजभर के जिन नेताओं को राज्य में मंत्री पद का दर्जा दिया गया था, उन्हें योगी आदित्यनाथ ने वापस लेने की सिफारिश कर दी है. ओम प्रकाश राजभर के साथ-साथ उनके बेटे अरविंद राजभर की भी निगम के अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी है. ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के अन्य सदस्य जो विभिन्न निगमों और परिषदों में अध्यक्ष व सदस्य हैं सभी को तत्काल प्रभाव से हटाया गया है.

किसको किस पद से हटाया?

  • मंत्री ओमप्रकाश राजभर के साथ 5 निगमों में भारतीय सुहेलदेव समाज पार्टी के 7 अध्यक्ष और सदस्यों को भी किया गया पद मुक्त.
  • ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर को सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग के चेयरमैन पद से हटाया गया.
  • उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम के अध्यक्ष पद से राणा अजीत सिंह को हटाया गया.
  • राष्ट्रीय एकीकरण परिषद से सुनील अर्कवंशी को हटाया गया और राधिका पटेल को हटाया गया.
  • उत्तर प्रदेश पशुधन विकास परिषद के सदस्य पद से सुदामा राजभर को हटाया गया.
  • उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग से गंगा राम राजभर और वीरेंद्र राजभर को भी हटाया गया.

ओपी राजभर योगी सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण-दिव्यांग जन कल्याण मंत्री थे. योगी ने राज्यपाल से सिफारिश कर उन्हें तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है. बीते काफी लंबे समय से वह भारतीय जनता पार्टी और खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बोलते रहे हैं, जिसकी आलोचना होती

कई बार ओपी राजभर ने ऐसे बयान भी दिए हैं जो बीजेपी के लिए मुसीबत बने हैं तो वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हक में गए हैं. ऐसे में अब जब एग्जिट पोल के नतीजे सामने हैं और चुनावी प्रक्रिया लगभग खत्म ही हो गई है तो यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने उनके खिलाफ एक्शन की बात की है.

पहले ही कर चुके थे मंत्रालय छोड़ने की सिफारिश

आपको बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले ही ओम प्रकाश राजभर ने पिछड़ा वर्ग मंत्रालय का प्रभार छोड़ने की पेशकश की थी. हालांकि, तब उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया गया था. लेकिन अब चुनाव खत्म होते ही एक्शन लिया गया है.

ओम प्रकाश राजभर राज्य सरकार के द्वारा पिछड़े वर्ग के छात्र/छात्राओं की छात्रवृत्ति, शुल्क प्रतिपूर्ति ना किए जाने पर और पिछड़ी जातियों को 27 फीसदी आरक्षण का बंटवारा सामाजिक न्याय समिति के रिपोर्ट के अनुसार ना करने पर रोष जताया था. इसी के बाद ही उन्होंने मंत्रालय छोड़ने की सिफारिश कर दी थी.

ओपी राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP के साथ आई थी. हालांकि, जब से सरकार बनी है तभी से ओम प्रकाश राजभर सरकार के खिलाफ बयान देते रहे हैं.

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की राजभर समुदाय के बीच पकड़ मजबूत है. दरअसल, ओम प्रकाश राजभर की मांग थी कि लोकसभा चुनाव में उन्हें दो से तीन सीटें दी जाएं लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

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सोनिया और राहुल गांधी से मिलने को मायावती तैयार!

PC-ndtv

नई दिल्ली। खबर है कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात करेंगी. इस मुलाकात के सोमवार 20 मई को होने की खबरें आ रही है. कुछ दिन पहले ही मायावती ने यह कहा था कि वह चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद यानि 23 मई के बात ही किसी से मिलेंगी लेकिन अब नई सूचना यह है कि उन्होंने कांग्रेस नेताओं से मिलने पर हामी भर दी है.

जाहिर है कि काउंटिंग के पहले यह मुलाकात चुनाव के नतीजों के बाद सरकार बनाने से जुड़ी हुई होगी. बातचीत में चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनने की स्थिति में इसकी रूपरेखा क्या होगी, इस पर भी चर्चा होने की खबर है. बताया जा रहा है कि इन दोनों धड़ों को मिलाने के पीछे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का बड़ा हाथ है. नायडू ने हाल ही में महागठबंधन बनाने को लेकर विपक्ष के कई नेताओं से मुलाकात की थी. नायडू ने इस दौरान शनिवार को राहुल गांधी और मायावती के साथ ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव से भी मुलाकात की थी. बताया जा रहा है कि यदि मायावती इस गठबंधन का हिस्सा बनती हैं तो यह एक बड़ी बात होगी.

क्या नरेन्द्र मोदी देश के डिवाईडर इन चीफ हैं?

टाइम दुनिया की सबसे प्रभावशाली पत्रिकाओं में से एक है. इस पत्रिका ने अपने ताजे अंक (20 मई 2019) के मुखपृष्ठ पर मोदी के पोर्ट्रेट को प्रकाशित करते हुए उन्हें ‘इंडियास डिवाईडर इन चीफ (भारत को बांटने वालों का मुखिया)’ बताया है. पत्रिका ने यह प्रश्न भी पूछा है कि क्या “दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र, मोदी राज के और पांच वर्षों में बच सकेगा?” इसके साथ ही, पत्रिका में एक और लेख भी प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है ‘मोदी द रिफॉर्मर’ (सुधारवादी मोदी). इसमें कहा गया है कि मोदी के रहते ही देश आर्थिक सुधारों की अपेक्षा कर सकता है. मुख्य लेख का शीर्षक ‘इंडियास डिवाईडर इन चीफ’ निश्चय ही मोदी राज की मुख्य ‘उपलब्धि’ का अत्यंत सारभर्गित वर्णन करता है. इस लेख में राहुल गाँधी की भी कई मुद्दों पर आलोचना की गयी है. परन्तु इसके बावजूद भी यह दिलचस्प है कि राहुल गाँधी ने इस लेख को री-ट्वीट किया है जबकि मोदी भक्त इसके लेखक आतिश तासीर पर टूट पड़े हैं.

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा का कहना है कि तासीर पाकिस्तानी हैं और उनसे इसके अलावा और क्या अपेक्षा की जा सकती थी. यह बयान भाजपा की पाकिस्तान को भारत का शत्रु इन चीफ निरुपित करने की नीति के अनुरूप है. भाजपा की साइबर टीम ने तासीर के विकिपीडिया पेज पर हल्ला बोल दिया और उसमें यह जोड़ दिया कि वे “कांग्रेस के पीआर मैनेजर हैं”. यह परिवर्तन, तासीर के विकिपीडिया पेज के ‘करियर’ वाले खंड में किया गया है. सच यह है कि तासीर अमरीकी नागरिक हैं. उनकी मां भारत की जानीमानी स्तंभ लेखक तवलीन सिंह हैं. उनके पिता, पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर हैं, जिन पर आसिया बीबी नामक ईसाई महिला का समर्थन करने के लिए ईशनिंदा कानून के अंतर्गत मुक़दमा दायर किया गया था और जिन्हें उनके ही अंगरक्षक ने गोलियों से भून दिया था.

पात्रा ने यह भी दावा किया कि टाइम ने पहले भी मोदी विरोधी लेख प्रकाशित किये थे. सच यह है कि इसके पहले टाइम ने जो लेख प्रकाशित किये थे, उनका मूल भाव यह था कि मोदी भारत के लिए एक आशा की किरण बनकर उभरे हैं. उदाहरण के लिए, पत्रिका में वर्ष 2015 में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक था ‘व्हाई मोदी मैटर्स (मोदी क्यों महत्वपूर्ण हैं)’. बल्कि ताज़ा अंक के दूसरे महत्वपूर्ण लेख (जिसे पत्रकारिता की भाषा में सेकंड लीड कहा जाता है) में मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो देश में आर्थिक सुधार लाने में सबसे अधिक सक्षम हैं. इस प्रख्यात पत्रिका ने मोदी को ‘डिवाईडर इन चीफ’ क्यों बताया और क्यों यह प्रश्न उठाया कि अगर मोदी फिर से प्रधानमंत्री बने तो देश में प्रजातंत्र का बचना संदेहास्पद हो जायेगा?

तासीर किसी जटिल प्रक्रिया से इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं. वे बताते हैं कि किस प्रकार गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों को पीट-पीट कर मार डालने का क्रम शुरू हुआ और किस तरह बाद में, दलितों को भी निशाना बनाया जाने लगा. यह एक ओर मुसलमानों के दमन का प्रयास था तो दूसरी ओर ऊना जैसी घटनाओं के ज़रिये, दलितों को कुचलने का.

पिछले पांच सालों में ऐसी कई चीज़ें हुईं हैं, जिनसे लगता है कि देश में प्रजातंत्र खतरे में हैं. सरकार मोदी की मुट्ठी में है. शक्तियों का किस कदर केन्द्रीयकरण हो चुका है, इसका प्रमाण मोदी का यह दावा है कि उन्होंने जानकारों की राय को दरकिनार करते हुए, बालाकोट में हवाई हमले करने का आदेश दिया. उनका स्वयं का कहना है कि सम्बंधित सैन्य अधिकारी और विशेषज्ञ चाहते थे कि बारिश और बादलों के चलते हमले को स्थगित कर दिया जाए. परन्तु मोदी ने अपनी पैनी बुद्धि का उपयोग करते हुए यह आदेश दिया कि हमला उसी समय किया जाए क्योंकि बादलों के कारण पाकिस्तानी राडार, भारतीय विमानों को पकड़ नहीं पाएगीं!

यह सर्वज्ञात है कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय मोदी स्वयं लेते हैं. नोटबंदी के निर्णय के बारे में वित्त मंत्रालय और केबिनेट को कुछ भी पता नहीं था. स्वायत्त संस्थाओं को मोदी कुचल रहे हैं और उन पर अपना नियंत्रण कायम कर रहे हैं. प्रजातान्त्रिक संस्थाओं को भी योजनाबद्ध तरीके से कमज़ोर किया जा रहा है.

इसके साथ ही, वे विभिन्न धार्मिक समुदायों को भी विभाजित कर रहे हैं. वे खून के प्यासे कथित गौरक्षकों पर कोई रोक नहीं लगा रहे हैं. उन्हें अपने उन मंत्रियों से कोई परेशानी नहीं है जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं, जो लिंचिंग के आरोपियों के शवों को तिरंगे में लपेटते हैं और जो ज़मानत पर रिहा, लिंचिंग के दोषियों का अभिनन्दन करते हैं. जाहिर है कि इससे हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडे को लागू करने के लिए बेक़रार अपराधियों को प्रोत्साहन मिलता है. उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया और आतंकी हमले के प्रकरण में आरोपी प्रज्ञा ठाकुर, जो कि स्वास्थ्य कारणों से ज़मानत पर रिहा हैं, को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाया. मोदी धर्मनिरपेक्ष, प्रजातान्त्रिक भारत पर हिंदुत्व को थोपना चाहते हैं.

भारतीय संविधान, देश की एकता का प्रतीक है परन्तु मोदी के केबिनेट सहयोगी अनंत कुमार उसे बदल डालना चाहते हैं. मोदी सरकार में भाजपा का पितृ संगठन आरएसएस दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा है. विश्वविद्यालयों और अन्य सरकारी संस्थाओं में भगवा विचारधारा वालों को भर्ती किया जा रहा है. कई स्तंभकारों का मानना है कि भारत का मीडिया भी मोदी की उतनी आलोचना नहीं कर रहा है जितनी कि उसे करनी चाहिए. यह कुछ हद तक सही भी है. मीडिया का एक हिस्सा और कुछ लेखक-पत्रकार मोदी और शाह के खिलाफ मुद्दे उठा रहे हैं परन्तु मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भाजपा सरकार के दबाव में दण्डवत हो गया है. यह दबाव किस तरह का है उसकी एक बानगी भाजपा के उभरते हुए सितारे तेजस्वी सूर्या का यह कथन है कि “अगर आप मोदी के साथ नहीं हैं तो आप भारत-विरोधी शक्तियों को मज़बूत कर रहे हैं”. सरकार की आलोचना को राष्ट्रद्रोह का पर्यायवाची बना दिया गया है.

‘डिवाईडर इन चीफ’ की उपाधि, मोदी के व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा से एकदम मेल खाती है. यह पहली बार है जब देश पर कोई हिन्दू राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री लोकसभा में पूर्ण बहुमत के साथ राज कर रहा है. इसके पहले भी देश में भाजपा सरकारें थीं परन्तु चूँकि वे अपने अस्तित्व के लिए अन्य पार्टियों पर निर्भर थीं, इसलिए वे खुलकर हिन्दुत्ववादी एजेंडा लागू नहीं कर सकीं. टाइम ने देश में व्याप्त वर्तमान माहौल को ‘ज़हरीला धार्मिक राष्ट्रवाद’ बताया है.

गाँधी, जिन्हें हिन्दू राष्ट्रवादी हत्यारे ने मौत के घाट उतार दिया था ‘इंडियास यूनीफायर इन चीफ (भारत को एक करने वालों के मुखिया)’ थे. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान प्रधानमंत्री ने अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने के लिए वह भूमिका निभायी जो राष्ट्रपिता की भूमिका के ठीक विपरीत थी. टाइम का लेख, हमें याद दिलाता है कि किस तरह देश को धार्मिक आधार पर बांटा जा रहा है और प्रजातंत्र को कमज़ोर किया जा रहा है.

राम पुनियानी (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) Read it also-मायावती ने फिर किया पलटवार

कैसा चुनावी राष्टवाद और ये कैसी गोडसे भक्ति??

अब जब लगभग 2019 के आम चुनावों का शोरगुल थमने वाला है. 23 मई को मतगणना शुरू हो जाएगी. देश के करोड़ों मतदातावों के मन की बात ईवीएम के बटन के माध्यम से अपने सांसद को चुना होगा. हर चुनावों की भांति इस बार का चुनाव भी मतदाताओं के लिए अपनी उम्मीदों को कायम रखने और भविष्य में नई सरकार के प्रति सपनों को संजोए रखने का सिलसिला जारी रहा. किसी को रोजगार के सपने, किसी को बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के सपने, किसी को भूख मिटाने के सपने,किसी को भ्र्ष्टाचार से मुक्ति के सपने, और किसी को असमानता, भेदभाव, शोषण से मुक्ति के सपने देखे होंगे और किसी ने भयमुक्त, अपराधमुक्त, और किसी ने हिंसा और नफरत मुक्त भारत के सपने सँजोये होंगे.

मगर उस बात से हैरानी है कि सात चरणों में से 6 चरणों की वोटिंग हो चुकी है, मगर उपरोक्त सपनो के ऊपर राजनीतिक दलों का कोई फोकस रहा ही नहीं. गौरतलब ये भी है कि मीडिया, जो समाज का आँख और कान समझा जाता है इन जन सरोकारों को उठाने में कंजूसी कर गया जो लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं कहे जा सकते क्योंकि मीडिया या प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है. मीडिया (टीवी) और मोदी ने इन इस चुनाव को भारत बनाम विपक्ष बना दिया एक तरफ ऐसा दरसाने की कोशिश की गई कि मोदी ही असली राष्ट्रभक्त हैं और मोदी ही असली भारत है बाकी पार्टियां चाहे आजादी के आंदोलन की मुखिया कांग्रेस हो या अन्य लेफ्ट पार्टियां और गठबंधन सबको गोदी टीवी मीडिया और मोदी ने राष्ट्र भक्ति में फेल साबित करने की भरपूर कोशिश की. और भी हैरान करने वाली बातें इस आम चुनाव में भाजपा, और नरेंद्र मोदी ने की, ऐसा प्रतीत हो रहा था चुनाव भारत की राजनैतिक पार्टियों के मध्य हो रहा है या भारत और पाकिस्तान के मध्य? ऋग्वेद में सबसे अधिक बार सिंधु नदी का नाम आया है उसी प्रकार इस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान का नाम सबसे अधिक बार लिया. न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, बुलेट ट्रेन ,स्किल इंडिया, रोजगार, स्वच्छ भारत, स्मार्टसिटी, काला धन, अच्छे दिन, सब चुनावी राष्ट्रवाद की बाढ़ में बहा दिए गए सायद इनकी अब जरूरत ही नहीं देश को!

इस आम चुनाव में कुछ नया इतिहास भी बना और कुछ इतिहास के पन्नों को या तो भुला दिया गया या फाड़ दिया गया. राष्टपिता महात्मा गाँधी को बीजीपी की प्रज्ञा ठाकुर ने पुनः मार दिया. जब उन्होंने गोडसे को असली राष्ट्र भक्त कहा अगर राष्ट्र पिता का दर्जा प्राप्त फकीर को गोली मारने वाला व्यकि भाजपा की नजरों में असली राष्ट्र भक्त है तो इससे ज्यादा क्या प्रमाण चाहिए कि आरएसएस पोषित भाजपा कैसा राष्ट्रवाद लाना चाहती है? जब जातियों से, धर्म से, हिंदुत्व से, राम-हनुमान से नैया पार होती नहीं दिखी तो अंततः भारत माता को ही चुनाव में ला खड़ा कर दिया. गाय माता को दोहते-दोहते, श्री राम -श्री राम जपते-जपते दिल्ली दूर नजर आने लगी तो राष्टवाद को ही चुनावी नारों में सामिल कर आरएसएस ने आगे के लिए कुछ छोड़ा नहीं ऐसा प्रतीत होता है.जब देश में ट्रेनों का जाल बिछ चुका था तभी नरेंद्र मोदी ने बुलेट ट्रेन की बात कही.जब देश में कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फोन, ब्राडबैंड , ईमेल, फेक्स, सब पहले से मौजूद थे तब मोदी ने डिजिटल इंडिया की बात कही होगी. जब देश मे 15 अगस्त 1969 को इसरो अस्तित्व में आ चुका था और 19 अप्रैल 1975 को आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष मे भेजा चुका था तब 2017 में मोदी अंतरिक्ष मे भारत ने ताकत दिखाई कहते है. जब 90 वर्ष पहले देश मे रेडियो प्रसारण हो चुका था तभी 2014 से नरेंद्र मोदी आकाशवाणी से मन की बात कह सके होंगे.

एक फ़्रेन्च कहावत है कि“Rome wasn’t built in a day.

हाँ कुछ बातों के लिए मोदी सरकार बधाई की पात्र भी है कि उसने देश मे कुछ पहले से चली आ रही योजनाओं का नाम बदलकर आगे बढ़ाया जिनमे निर्मल भारत को स्वच्छ भारत नाम देकर आगे बढ़ाया, 15 मार्च 1950 में गठित योजना आयोग को भंग कर नीति आयोग बना दिया.एफडीआई और जीएसटी को और कठोर बना कर आगे बढ़ाया, डीजल और पेट्रोल के दामों को पिछली सरकार जहाँ छोड़कर गयी थी उसको और आगे तक पहुँचाया.पीछे छूटा तो सिर्फ और सिर्फ विकास, रोजगार, सहिष्णुता, भाईचारा और जनतन्त्र में जनों की आवाज. हर्ष का विषय ये भी है कि हमारा देश 21वीं सदी में भूखा प्यासा रहकर भी देश भक्ति तथा राष्ट्रवाद के लिए वोट देने के लिए ही नहीं अपितु मर मिटने को भी तैयार है. ऐसे में 23 मई 2019 के बाद आने वाली नई सरकार के लिए कुछ ज्वलन्त मुद्दों पर चिंता करने की जरूरत नहीं होगी,

मसलन बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, भरष्टाचार, गरीबी, निरक्षरत आदि पर नीति बनाने की आवश्यक्ता ही महसूस नहीं होनी चाहिए क्योंकि भारत की संस्कृति” जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” की भावना से ओतप्रोत है. नव राष्टवाद के जनक न गांधी को मानते हैं, न नेहरू को और न ही डॉ0 आंबेडकर को और न ही भारतीय संविधान को. चुनावी और दिखावटी राष्टवाद से ही अगर युवाओं का जीवन, बेरोजगारों का जीवन, किसानों का जीवन, वंचित और पिछड़ों का जीवन, बीमारों ,भुखमरों, शोषितो, महिलाओं और आदिवासियों का जीवन सुखमय और खुशहाल हो जाता है तो मैं ऐसी सरकार को बार-बार देश के लिए दिल्ली में विराजमान होने की वकालत करुँगा.

आई0 पी0 ह्यूमन स्वतन्त्र स्तम्भकार इसे भी पढ़ें-उत्तर प्रदेश में दलित दूल्हे को मंदिर जाने से रोका

‘गिरफ्तार होने का डर नहीं, हर धर्म में होते हैं आतंकवादी’

अभिनेता से नेता बने कमल हासन पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान दिए एक बयान को लेकर विवादों के घेरे में हैं. कमल ने कहा था कि आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम था नाथूराम गोडसे. अब इस बयान को लेकर उन्होंने सफाई दी है और कहा है कि हर धर्म के आतंकवादी पाए जाते हैं और कोई धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी और धर्म से बेहतर है. बयान को लेकर हो रहे विरोध पर हासन ने कहा कि वह गिरफ्तार होने से डरते नहीं हैं. बता दें कि कमल के बयान के बाद उनकी रैलियों में पत्थर और अंडे फेंके जाने की घटनाएं सामने आई हैं.

‘हर धर्म में होते हैं आतंकवादी’ पत्रकारों से बात करते हुए कमल ने कहा, ‘आतंकवादी हर धर्म में होते हैं. इतिहास में ऐसे कई लोगों को कई धर्मों में देख सकते हैं. मैंने यही कहा था कि हर धर्म के अपने आतंकवादी होते हैं. कोई यह दावा नहीं कर सकता कि हम दूसरे धर्म से बेहतर हैं और हमने ऐसा कभी नहीं किया. इतिहास गवाह है कि हर धर्म में चरमपंथ होता है. मैं उस दिन सौहार्द्र के बारे में बात कर रहा था.’

‘गिरफ्तार होने का डर नहीं, गिर रहा राजनीति का स्तर’ इस बयान के बाद मिल रहीं धमकियों और त्रिची में पत्थर फेंके जाने की घटना के बारे में हासन ने कहा कि उन्हें डर नहीं लग रहा. उन्होंने कहा कि राजनीति का स्तर नीचे जा रहा है और वह कीचड़ उछालने में शामिल नहीं होंगे. वह गिरफ्तार होने से डरते नहीं हैं. अगर उन्हें गिरफ्तार किया गया तो और भी परेशानी होगी. कमल ने आगे कहा कि यह चेतावनी नहीं, सलाह है.

‘हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, कर किसी तक पहुंचने की कोशिश’ जब उनसे यह सवाल किया गया कि यह खासकर मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने की कोशिश थी तो उन्होंने जवाब दिया कि वह मुस्लिम, ईसाई या हिंदू, हर समुदाय तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. गौरतलब है कि हासन ने तमिलनाडु के करुर जिले की अरिवाकुरिची विधानसभा सीट उपचुनाव के लिए प्रचार के दौरान कहा था, ‘आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था. मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि यहां पर कई सारे मुस्लिम मौजूद हैं. मैं महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने खड़े होकर यह कह रहा हूं.’

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देश की जनता से माफी मांगती हूं, मेरा बयान गलत, मैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान करती हूं : प्रज्ञा ठाकुर

साध्वी प्रज्ञा (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने वाले बयान पर प्रज्ञा ठाकुर ने माफी मांग ली है. रात को 1 बजे किए गए ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘मैं नाथूराम गोडसे के बारे में दिये गए मेरे बयान के लिये देश की जनता से माफ़ी मांगती हूं. मेरा बयान बिलकुल ग़लत था. मैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान करती हूं.’ गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर  चुनाव प्रचार में जुटी हुई हैं. आगर मालवा शहर में रोड शो के दौरान NDTV के सहयोगी ज़फर मुल्तानी से बात करते वक्त उनसे नाथूराम गोडसे को लेकर एक सवाल पूछा, जिस पर उनका जवाब आया कि वह देश भक्त थे, हैं और रहेंगे. बता दें, यह सवाल इसलिए पूछा गया, क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का उल्लेख करते हुए कमल हासन ने रविवार को कहा था कि ‘आजाद भारत का पहला उग्रवादी एक हिंदू था.’

 

रोड शो के दौरान प्रज्ञा ठाकुर से इस मसले पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ”नाथूराम गोडसे देश भक्त थे, है और रहेंगे. उनको आतंकवादी कहने वाले लोग स्वयं की गिरेबान में झांक कर देखें, ऐसा बोलने वालो को इस चुनाव में जवाब दे दिया जाएगा.” इसके बाद एनडीटीवी के सहयोगी ज़फर मुल्तानी ने पूछा, क्या आप नाथू राम गोडसे का समर्थन करती हैं. इस पर उन्होंने नजरअंदाज कर अपना रोड शो जारी रखा. हालांकि कि नाथूराम गोडसे वाले बयान पर बीजेपी प्रज्ञा ठाकुर सहमत नहीं है. प्रज्ञा ने प्रदेश अध्यक्ष से माफी मांगी और उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया.

बता दें, प्रज्ञा ने कहा था आतंकवादी विरोधी दस्ते (एटीएस) प्रमुख करकरे ने मालेगांव विस्फोट मामले की जांच के दौरान उन्हें यातनाएं दी थीं और उनके शाप की वजह से ही करकरे की 26/11 आतंकवादी हमले में मौत हुई थी. इसके अलावा उन्होंने एक बयान दिया था कि 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में शामिल होने के लिये उन्हें अपने ऊपर गर्व है. इस मसले पर चुनाव आयोग से प्रज्ञा ने दिवंगत आईपीएस अधिकारी के खिलाफ अपने बयान के लिए माफी मांगी थी.

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यूपी: वाराणसी में लोगों को धमकी दी जा रही है, चुनाव निष्पक्ष कैसे होंगे- मायावती

नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने पीएम नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा, मायानती ने ट्वीट कर लिखा, ” पीएम श्री नरेन्द्र मोदी को वाराणसी में हर हाल में जितवाने की कोशिश में वहां के हर गली-कूचे व घर-घर में जो बाहरी लोगों के माध्यम से पहले लालच और फिर धमकी आदि दी जा रही है उससे वहाम मतदान स्वतंत्र व निष्पक्ष कैसे हो पाएगा? चुनाव आयोग की, बंगाल की तरह, वाराणसी पर नजर क्यों नहीं है?

मायावती ने गुरुवार को कहा था कि देश में जब से लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई है तबसे खासकर बंगाल में आए दिन कोई ना कोई खबर जरूर सुर्खियों में रहती है जिसके लिए वहां पूरे तौर से बीजेपी और आरएसएस के लोग ही जिम्मेदार है.

मायावती ने कहा ‘खासकर इस चुनाव में जहां तक बंगाल में आये दिन चुनावी हिंसा व बवाल आदि होने का सवाल है तो ऐसा साफ तौर से लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व इनके चेले अमित शाह के नेतृत्व में उनकी पूरी पार्टी व सरकार ने सोची-समझी रणनीति के तहत ही ममता बनर्जी सरकार को निशाने पर लिया हुआ है. चुनाव में इनको षड्यन्त्र के तहत निशाना बनाया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘इतना ही नहीं बल्कि अब तो वहां ये दोनों गुरु व चेले जिस प्रकार से हाथ धोकर ममता बनर्जी व उनकी पार्टी के पीछे पड़े हैं वह एक खतरनाक प्रवृत्ति है जो कतई भी उचित व न्यायसंगत नहीं है.’

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अब चूरू में दलित युवक से मारपीट, चप्पल चटवाई, VIDEO किया वायरल

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प्रदेश में एक के बाद एक शर्मनाक वारदातें सामने आ रही हैं. अलवर गैंगरेप के बाद अब चूरू के सादुलपुर में एक दलित को मारपीट कर चप्पल चटवाने का मामला सामने आया है. मानवता को शर्मसार कर देने वाली इस घटना का आरोपियों ने न केवल वीडियो बनाया, बल्कि बाद में उसे वायरल भी कर दिया. वीडियो वायरल होने के बाद समाज के लोग आक्रोशित हैं. इस संबंध में पीड़ित ने चार नामजद लोगों समेत अन्य के खिलाफ मामला दर्ज कराया है.

जानकारी के अनुसार, मामला सादुलपुर कस्बे से जुड़ा है और करीब दस दिन पुराना बताया जा रहा है. वहां टैम्पो चालक युवक गत 5 मई की रात को अपने घर जा रहा था. इसी दौरान कुछ दबंग उसके ऑटो में बैठे. बाद में किराए को लेकर पीड़ित की उनसे कहासुनी हो गई. इस पर दबंगों ने उसके साथ गाली गलौच की और उसे जबरन पकड़कर एक मकान में ले गए.

वहां दबंगों ने युवक की जमकर पिटाई की. बाद में उसे चप्पल चटवाई गई और उसका वीडियो बना लिया. मारपीट के दौरान दबंग युवक पर चोरी का आरोप लगाते हुए सुनाई दे रहे हैं. बदमाशों ने बाद में युवक को छोड़ दिया, लेकिन साथ ही घटना के बारे में किसी को बताने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली.

बदमाश यहीं नहीं रुके और बाद में उन्होंने घटना का वीडियो वायरल कर दिया. वीडियो वायरल होने पर घटना सामने आई तो दलित समाज के लोगों में आक्रोश फैल गया. गुरुवार को पीड़ित और समाज के लोग थाने पहुंचे और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. पीड़ित पक्ष ने इस संबंध में अंकित, सुखवीर, बलवान और सुमित सहित अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है.

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नरेंद्र मोदी की जाति के विवाद का अंत

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नरेंद्र मोदी की ओबीसी जाति को लेकर मायावती, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल के आरोप सामने आए हैं. चारों ने ये कहा है कि मोदी असली ओबीसी नहीं है. बाद में कागज के खेल से ओबीसी बन गए हैं.

नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली ने इसका जवाब अपने तरीके से दिया है,

पत्रकारिता का दायित्व है कि ऐसे मौके पर सच का पता लगाए और तथ्य सामने रखे. ये देखे बगैर की इसमें किसका लाभ और किसका नुकसान है. पूरी ईमानदारी से. दस्तावेजी सच. क्योंकि दो तरह के दावे हैं, तो पब्लिक को सच जानने का अधिकार है.

चूंकि टीवी और अखबार वाले दूसरे जरूरी कामों में बिजी हैं, इसलिए ये काम मुझे करना पड़ रहा है.

इस मामले में फैक्ट इस प्रकार हैं.

1. मोदी जी की मोढ घांची या मोध घांची जाति शुरुआत में ओबीसी की लिस्ट मे नहीं थी. राज्य की पिछड़ी जाति की लिस्ट में ये जाति 1994 में लाई जाती है.

2. ओबीसी या अदर बैकवर्ड क्लासेस की लिस्ट केंद्र सरकार की होती है. ये लिस्ट मंडल कमीशन ने बनाई थी. इस रिपोर्ट के अंत में पिछड़ी जातियों की जो लिस्ट है, उसमें मोढ घांची जाति नहीं है. इसकी पुष्टि आप किसी भी विश्वविद्यालय या संस्थान की लाइब्रेरी में रखी मंडल कमीशन की रिपोर्ट से कर सकते हैं.

3. इसलिए नरेंद्र मोदी ये बात तो गलत कह रहे हैं कि वे पिछड़ी मां की संतान हैं. जब उनका जन्म हुआ तो उनकी जाति न गुजरात में पिछड़ी जाति में थी, न केंद्र में ओबीसी लिस्ट में.

4. केंद्र की ओबीसी लिस्ट में इस जाति को नोटिफिकेशन संख्या – 12011/68/98-BCC dt 27/10/1999 के जरिए लाया जाता है. उसके गजट नोटिफिकेशन का लिंक आप इस पोस्ट के कमेंट बॉक्स में जाकर देख सकते हैं. यानी नरेंद्र मोदी पहले ओबीसी नहीं थे. लेकिन अब हैं.

5. इस नोटिफिकेशन के जरिए 27 अक्टूबर 1999 को नरेंद्र मोदी की जाति ओबीसी लिस्ट में शामिल की जाती है. उस समय गुजरात और केंद्र दोनों जगह बीजेपी की सरकार थी. केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे.

6. फैक्ट ये हुआ कि जब बीजेपी की सरकार थी, तब नरेंद्र मोदी की जाति को ओबीसी की लिस्ट में शामिल किया गया. इसके लिए गुजरात की ओबीसी लिस्ट में 23 नंबर की एंट्री में संशोधन किया गया. इस नंबर पर पहले सिर्फ घांसी (मुस्लिम) का जिक्र था. 1999 में इसमें मोढ घांची को शामिल किया गया.

7. नई जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल किया जाता रहा है.

8. ये रिसर्च का विषय है कि मोढ घांची जाति में पिछड़ेपन के किन लक्षणों के आधार पर राज्य सरकार ने उसे ओबीसी बनाने की सिफारिश की और केंद्र सरकार ने उसे किस आधार पर ओबीसी में शामिल कर लिया.

9. नरेंद्र मोदी जब कहते हैं कि वे ओबीसी हैं तो वो गलत नहीं है. कानूनी स्थिति यही है कि उनकी जाति अब ओबीसी है.

10. लेकिन जब वे कहते हैं कि वे पिछड़ी मां के बेटे हैं तो वे झूठ बोलते हैं.

दिलीप मंडल के फेसबुक पेज से Read it also-ममता के समर्थन में उतरी मायावती

अखिलेश यादव का बदला और बहुजन नेताओं का राजनैतिक एका

फाइल फोटो

“जब उन्होंने हमारे जाने के बाद मुख्यमंत्री आवास को गंगा जल से धोया था तब हमने भी तय कर लिया था कि हम उनको पूड़ी खिलाएंगे.”

यह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का ट्विट है. चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में यह ट्विट कर अखिलेश यादव ने अपने मन की पीड़ा बयान की है. अखिलेश यादव ने जो ट्विट किया है, वह महज एक ट्विट भर नहीं है, बल्कि यह उनके भीतर का दर्द है, जो उन्हें तब महसूस हुआ जब उनके मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वहां रहने से पहले वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसे गंगा जल और गौ मूत्र से पवित्र करवाया था. योगी मुख्यमंत्री आवास को एक ‘शूद्र समाज’ के व्यक्ति के रहने से अपवित्र हुआ मान रहे थे, जिसके कारण उन्हें उस आवास को पवित्र करने की जरूरत महसूस हुई. तभी से अखिलेश यादव ने उस अपमान को अपने भीतर पाल रखा था. जैसा कि उन्होंने इस ट्विट में कहा भी है. पहले भी कई मौकों पर वह इस घटना का जिक्र कर चुके हैं.

अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़ने के बाद मैं लगातार एक बार पढ़ता-सुनता आ रहा हूं जिसमें कहा जाता है कि “गुलामों को उनकी गुलामी का अहसास करा दो वो विद्रोह कर देगा.” अखिलेश यादव का “उनको पूड़ी खिलाने” का प्रण ऐसा ही है. योगी आदित्यनाथ के उस जातिवादी कदम ने अखिलेश यादव को इतना अपमानित महसूस कराया कि वो किसी भी तरह भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए जुट गए. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ बने इस गठबंधन को बनाने में सबसे ज्यादा किसी ने मेहनत की तो वो अखिलेश यादव ही हैं. उसका परिणाम भी दिख रहा है. चुनाव परिणाम इस बात को और पुख्ता करेंगे कि अखिलेश का प्रण कितना कामयाब होगा.

सीएम बनने के बाद मुख्यमंत्री योगी के गृहप्रवेश के पहले शुद्धिकरण (फाइल फोटो)

यूपी में बना महागठबंधन खासकर यादवों, जाटवों, मुसलमानों और कुछ अन्य दलित-पिछड़ी जातियों का गठबंधन है, जिसमें राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह के भरोसे जाट वोटरों से भी इसमें जुड़ने की अपील की जा रही है. इस महागठबंधन को बनाने में अखिलेश यादव ने जहां काफी मेहनत की तो बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने भी एक परिपक्व और समझदार राजनीतिज्ञ की तरह अखिलेश यादव को तवज्जो दिया. यह बहनजी की दूरदर्शिता ही थी, जिसकी वजह से यह गठबंधन बन पाया. सवाल है कि जब उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज की दो प्रमुख राजनैतिक ताकतें एक साथ आ गई हैं तो क्या बहुजन समाज का आम इंसान यह सपना देख सकता है कि एक दिन तमाम प्रदेशों में मौजूद बहुजन समाज के नेतृत्व वाले राजनैतिक दल एक साथ आएं? या फिर कम से कम एक-दूसरे के साथ मिलकर न सिर्फ दलितों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के लिए बल्कि समाज के हर व्यक्ति के लिए बेहतर सरकार की कल्पना पर बात करें. जैसे बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बिहार में राजनीति करने के बावजूद यूपी में अखिलेश यादव और मायावती जी के साथ दिखते हैं.

सोचिए, जब दिल्ली में उदित राज और वाल्मीकि समाज का कोई नेता प्रदेश को नेतृत्व दे, महाराष्ट्र में बहुजनों का नेतृत्व रामदास अठावले और प्रकाश आम्बेडकर मिलकर करें और इसमें समान विचारधारा वाले अन्य नेताओं को भी शामिल करें. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी उभर कर आए. बिहार के बहुजन नेताओं में बनी एकता जारी रहे तो वह दृश्य कैसा होगा. जाहिर है कि बड़े नेताओं का अहम उन्हें साथ आने से रोकता रहा है लेकिन अगर एक पल वो अहम को किनारे रख देने को तैयार हो जाएं तो इसमें सिर्फ समाज का नहीं, बल्कि उन नेताओं का भी फायदा होगा. और अगर ऐसा संभव होगा तो इसमें सबसे बड़ी भूमिका बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती जी को निभानी होगी. अम्बेडकरवादी विचारधारा वाले बहुजन समाज के सक्रिय और प्रभावी राजनेताओं में मायावती सबसे आगे खड़ी दिखती हैं. अगर वो पहल करें तो देश की राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है. अखिलेश यादव ने जिस अपमान का घूंट पिया, तमाम दलित-पिछड़े राजनेता भी अपने जीवन में वही अपमान महसूस कर चुके हैं. आज के वक्त में उनका राजनैतिक एका ही पूरे समाज को न्याय दिला सकता है और भेदभाव रहित एक बेहतर भारत बना सकता है.

जंगल में भटकने के बाद रोने लगा चीनी नागरिक, इस सब इंस्पेक्टर ने सुरक्षित घर पहुंचाया

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नोएडा के एक पुलिसकर्मी ने जंगल में भटक गए एक चीनी नागरिक को सुरक्षित वहां से ढूंढ़ निकाला. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जंगल में भटकने के बाद चीन का यह नागरिक रोने लगा. इस दौरान पुलिसकर्मी ने चीन के नागरिक को ग्रेटर नोएडा में उसके घर वापस पहुंचाने में मदद की. पुलिस के मुताबिक चीनी नागरिक की पहचान शिंग फू के तौर पर हुई है, जो यहां मोबाइल उत्पादन कंपनी में काम के सिलसिले से आया था लेकिन उसका फोन और पर्स कहीं खो गया था.

पुलिस ने बताया कि हिंदी या अंग्रेजी नहीं समझने वाला शिंग फू मंगलवार को अपने साथियों से भी बिछड़ गया था और जंगल में भटक गया था. कासना पुलिस थाना क्षेत्र के तहत आने वाली एक पुलिस चौकी के प्रभारी सब इंस्पेक्टर कोमल सिंह मंगलवार को रात करीब साढ़े नौ बजे गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के पास के इलाके में गश्त पर थे, जब उन्होंने जंगल के पास वाली सड़क पर कुछ संदिग्ध गतिविधि देखी.

पीटीआई के अनुसार कोमल ने बताया, ‘मैंने वाहन रोक कर इस बारे में जानना चाहा और वहां झाड़ियों के पास मुझे एक व्यक्ति नजर आया. मैंने उससे पूछा कि वह कौन है और वह बस इतना कह सका ‘प्लीज हेल्प’.’

उन्होंने बताया कि वह अंग्रेजी के बस यही दो शब्द जानता था और उसे हिंदी भी नहीं आती थी. लेकिन वह काफी परेशान लग रहा था. सिंह ने बताया कि उन्होंने उसे अपने कार में आने का इशारा किया और अपने एक पहचान वाले को फोन किया जो एक निजी एजेंसी में अनुवादक के तौर पर काम करता है.

कोमल के अनुसार किस्मत से उसे चीनी भाषा आती थी और इस तरह से पता चला कि शिंग ग्रीनवुड सोसाइटी के फेज टू में रहता है. यह जगह वहां से कुछ छह-सात किलोमीटर दूर थी, जहां वह खो गया था. सिंह ने बताया कि उसे भूख भी लगी थी और उसने आईसक्रीम का एक ठेला देख कर आईसक्रीम खाने की इच्छा जताई.

सिंह ने बताया कि अपने समूह के साथ फिर से मिलने के बाद वह बहुत भावुक हो गया था. उसने टूटी-फूटी हिंदी में धन्यवाद किया और पुलिस एवं भारत को महान बताया.

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