अर्णब की गिरफ्तारी पर पढ़िए रवीश कुमार ने क्या लिखा है

Written By- Ravish Kumar

मैं आज क्यों लिख रहा हूं, अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद क्यों नहीं लिखा? आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला संगीन है लेकिन सिर्फ नाम भर आ जाना काफी नहीं होता है। नाम आया है तो उसकी जांच होनी चाहिए और तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। एक पुराने केस में इस तरह से गिरफ्तारी संदेह पैदा करती है। महाराष्ट्र पुलिस को कोर्ट में या पब्लिक में स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बाद भी इस केस को बंद किया गया था? क्या राजनीतिक दबाव था? तब हम जान सकेंगे कि इस बार राजनीतिक दबाव में ही सही, किसी के साथ इंसाफ़ हो रहा है। अदालतों के कई आदेश हैं। आत्महत्या के लिए उकसाने के ऐसे मामलों में इस तरह से गिरफ्तारी नहीं होती है। कानून के जानकारों ने भी यह बात कही है। इसलिए महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह के कई ठोस कारण बनते हैं। जिस कारण से पुलिस की कार्रवाई को महज़ न्याय दिलाने की कार्रवाई नहीं मानी जा सकती। भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फांसी का फंदा डालने जैसा है। झूठे मामले में फंसाने से लेकर लॉक अप में किसी को मार मार कर मार देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता वसूल लेने और किसी को भी बर्बाद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। पेशेवर जांच और काम में इसका नाम कम ही आता है। इसलिए किसी भी राज्य की पुलिस हो उसकी हर करतूत को संदेह के साथ देखा जाना चाहिए। ताकि भारत की पुलिस ऐसे दुर्गुणों से मुक्त हो सके और वह राजनीतिक दबाव या अन्य लालच के दबाव में किसी निर्दोष को आतंकवाद से लेकर दंगों के आरोप में न फंसाए।

अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। ग़लत नहीं कहा जा रहा है। क्या दिल्ली पुलिस और यूपी की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में हमारी तरह ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। मुझे कुछ होगा तो अर्णब गोस्वामी एक लाइन नहीं बोलेंगे। अगर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ही ग़लत हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर आप भी अर्णब के केस में पुलिस के बर्ताव का सख़्त परीक्षण कीजिए ताकि सिस्टम दबाव और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है। डॉ कफ़ील ख़ान पर अवैध रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा कर छह महीने बंद रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि अवैध रूप से रासुका लगाई गई है। उक्त अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अर्णब गोस्वामी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक ने इस नाइंसाफी पर कुछ नहीं कहा। भारत में किनके राज में प्रेस की स्वतंत्रता अभी खत्म होकर मिट्टी में मिल चुकी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। आपको एक लाख बार बता चुका हूं। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करने वाले मंत्रियों के प्रधानमंत्री ने आज तक एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। बिल्कुल अन्वय नाइक और कुमुद नाइक की आत्महत्या के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। अन्वय नाइक की बेटी की कहानी बेहद मार्मिक है। इस बात की जांच आराम से हो सकती है कि अर्णब गोस्वामी ने अन्वय नाइक से स्टुडियो बनाकर पैसे क्यों नहीं दिए? 80 लाख से ऊपर का काम है तो कुछ न कुछ रसीदी सबूत भी होंगे। अन्वय नाइक की बेटी का कहना सही है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए लेकिन कानून को भी मर्यादा से ऊपर नहीं होना चाहिए। जांच की निष्पक्षता की मर्यादा अहम है। तभी लगेगा कि पारदर्शिता के साथ न्याय हो रहा है। राजनीतिक दबाव में केस का खुलना और केस का बंद होना ठीक नहीं है।

जब एनडीटीवी पर छापे पड़ रहे थे और एक चैनल को डराया जा रहा था तब अर्णब का कैमरा बाहर लगा था और लिंचमैन की तरह कवर किया जा रहा था। उनके कवरेज में एक लाइन प्रेस की स्वतंत्रता पर नहीं थी। उनका रिपोर्टर डॉ. रॉय के घर की दीवार फांदने का प्रयास कर रहा था। बीजेपी के मंत्री प्रवक्ता मेरा बहिष्कार करते हैं। एन डी टी वी की सोनिया वर्मा सिंह ने ट्विट कर अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। एनडीटीवी के अन्य सहयोगियों ने अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। ये फर्क है। जब 2016 में एन डी टी वी इंडिया को बैन किया जा रहा था तब प्रेस क्लब में पत्रकार जुटे थे। आप पूछ सकते हैं कि अर्णब और उनके बचाव में उतरे मंत्री लोग क्या कर रहे थे। जब विपक्ष के नेताओं पर छापे की आड़ में हमले होते हैं अर्णब हमेशा जांच एजेंसियों की साइड लेते हैं। अर्णब ने मोदी सरकार पर क्या सवाल उठाए हैं, बेरोज़गारी से लेकर किसानों के मुद्दे कितने दिखाए गए हैं यह सब दर्शकों को पता है। उल्टा अर्णब गोस्वामी सरकार पर उठाने वालों को नक्सल से लेकर राष्ट्रविरोधी कहते हैं। भीड़ को उकसाते हैं। झूठी और अनर्गल बाते करते हैं। वे कहीं से पत्रकार नहीं हैं। उनका बचाव पत्रकारिता के संदर्भ में करना उनकी तमाम हिंसक और भ्रष्ट हरकतों को सही ठहराना हो जाएगा। अर्णब की पत्रकारिता रेडियो रवांडा का उदाहरण है जिसके उद्घोषक ने भीड़ को उकसा दिया और लाखों लोग मारे गए थे। अर्णब ने कभी भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों का पक्ष नहीं लिया। पिछले चार महीने से अपने न्यूज़ चैनल में जो वो कर रहे हैं उस पर अदालतों की कई टिप्पणियां आ चुकी हैं। तब किसी मंत्री ने क्यों नहीं कहा कि कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है? जबकि मोदी राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को जिनती बार उभारा गया है उतना किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ। हर बात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बताई और दिखाई जाती है।

एक बार अर्णब हाथरस केस में योगी की पुलिस को ललकार कर देख लेते, मुख्यमंत्री योगी को ललकार कर देख लेते जिस तरह से वे मुख्यमंत्री उद्धव को ललकारते हैं तो आपको अंतर पता चल जाता कि कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है। उद्धव ठाकरे ने प्रचुर संयम का परिचय दिया है और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने भी जिनकी एक छवि मारपीट करने वालों की भी रही है। कई हफ्तों से अर्णब बेलगाम पत्रकारिता की हत्या करते हुए हर संवैधानिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा रहे थे। पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्विट किया है कि यूपी में पत्रकारों के खिलाफ 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। क्या अर्णब में साहस है कि वे अब भी योगी सरकार को ललकार दें इस मसले पर। जो आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं वो सीमा की बात करने लगेंगे और अर्णब पर रासुका लगा दी जाएगा डॉ कफील ख़ान की तरह। गौरी लंकेश की हत्या के मामले को अर्णब ने कैसे कवर किया था? या नहीं किया था? द वायर के संस्थापक हैं सिद्धार्थ वरदराजन। अर्णब गोस्वामी सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में क्या क्या कहते रहे हैं आप रिकार्ड निकाल कर देख सकते हैं मगर सिद्धार्थ वरदराजन ने उनकी गिरफ्तारी में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। निंदा की है। उसी तरह से कई ऐसे लोगों ने की है। अर्णब के पक्ष में उतरे बीजेपी की मंत्रियों और समर्थकों की लाचारी देखिए। वे सुना रहे हैं कि कहां गए संविधान की बात करने वाले। पत्रकार रोहिणी सिंह ने एक जवाब दिया है राकेश सिन्हा को। संविधान की बात करने वालों को आपने जेल भेज दिया है। कुछ को दंगों के आरोप में फंसा दिया है। इनकी समस्या ये है कि जिन्हें नक्सल कहते हैं, देशद्रोही कहते हैं उन्हीं को ऐसे वक्त में खोजते हैं। इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि कई लोगों ने एक नागरिक के तौर पर अर्णब की गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह फर्क साफ रखा है कि अर्णब पत्रकार नहीं है और न ही यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है।

न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी निंदा की है जबकि अर्णब इसके सदस्य तक नहीं है। अर्णब ने हमेशा इस संस्था का मज़ाक उड़ाया है। क्या न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन किसी ऐसे छोटे चैनल के पत्रकार की गिरफ्तारी पर बोलेगा जो उसका सदस्य नहीं है? ज़ाहिर है केंद्र सरकार अर्णब के साथ खड़ी है। अर्णब केंद्र सरकार के हिस्सा हो चुके हैं। अर्णब पत्रकार नहीं हैं। इसे लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता के हर पैमाने को ध्वस्त किया है। जिस तरह से पुलिस कमिश्नर को ललकार रहे थे वो पत्रकारिता नहीं थी। मैंने कल इस मामले पर कुछ नहीं लिखा क्योंकि प्राइम टाइम के अलावा कई काम करने पड़ते हैं। मैं लंबा लिखता हूं इसलिए भी टाइम चाहिए होता है। जब गिरफ्तारी की ख़बर आई तो मैं व्हाट्स एप पर था। फिर तुरंत कपड़े धोने चला गया। नील डालने के बाद भी बनियान में सफेदी नहीं आ रही थी। उससे जूझ रहा था तभी किसी का फोन आया कि चैनल खोलिए अर्णब गिरफ्तार हुए हैं। मैंने कहा कि उन्हीं जैसौं के कारण तो मेरे घर में न्यूज़ चैनल नहीं खुलता है। ख़ैर जब बनियान धोने के बाद पंखे की सफाई के लिए ड्राईंग रूम में आया तो चैनल खोल दिया। पंखे पर जमी धूल आंखों में गिर रही थी और मीडिया पर जमी धूल चैनल पर दिखने लगी। वैसे कुछ दिन पहले फेसबुक पर रिपब्लिक चैनल के मामले में एडिटर्स गिल्ड की प्रतिक्रिया पोस्ट की थी कि किसी एक पर आरोप है तो आप पूरे गांव पर मुकदमा नहीं कर सकते।

लेकिन मैं अर्णब का घर देखकर हैरान रह गया। रोज़ 6000 शब्द टाइप करके मैं गाज़ियाबाद के उस फ्लैट में रहता हूं जिसमें कुर्सी लगाने भर के लिए बालकनी नहीं है। अर्णब का घर कितना शानदार है। ईर्ष्या से नहीं कह रहा। मुझे किसी का भी अच्छा घर अच्छा लगता है। एक रोज़ किसी अमीर प्रशंसक ने घर आने की ज़िद कर दी और आते ही बच्चों के सामने कह दिया कि बस यही घर है आपका। हम तो सोचे कि आलीशान फ्लैट होगा। एक मोहतरमा तो रोने लगीं कि मेरा घर ले लीजिए। कोरोना के कारण जब घर से एंकरिंग करने लगा तो मेरे घर में झांकने लगे। उन्हें लगा कि रवीश कुमार शाहरूख़ ख़ान है। जल्दी उन्हें मेरे घर की दीवारों से निरशा हो गई। मैं ठीक ठाक कमाता हूं और किसी चीज़ की कमी नहीं है। मुझे अपना घर बहुत अच्छा लगता है। मेरी तेरह साल पुरानी कार को देखकर कई बार लोगों को लगा कि किसे बुला लिया अपनी महफिल में। वैसे ईश्वर ने सब कुछ दिया है। लोगों ने इतना प्यार दे दिया कि सौ फ्लैट कम पड़ जाएं उसे रखने के लिए। मैं अर्णब के शानदार घर के विजुअल के सामने असंगठित क्षेत्र के एक मज़दूर की तरह सहमा खड़ा रह गया। मैं क्या बोलता, मेरे बोले का कोई मोल है भी या नहीं। एक अदना सा पत्रकार एक चैनल के मालिक के लिए बोले, यह मालिकों का अपमान है। मैं तो बस अर्णब के घर की ख़ूबसूरती में समा गया। कल्पनाओं में खो गया। ड्राईंग रूम की लंबी चौड़ी शीशे की खिड़की के पार नीला समंदर बेहद सुंदर दिख रहा था। अरब सागर की हवाएं खिड़की को कितना थपथपाती होंगी। यहां तो क़ैदी भी कवि हो जाए। मुझे इस बात की खुशी हुई कि अर्णब के दिलो दिमाग़ में जितना भी ज़हर भरा हो घर कैसा हो, कहां हो, कैसे रहा जाए इसका टेस्ट काफी अच्छा है। उसमें सौंदर्य बोध है। बिल्कुल किसी नफ़ीस रईस की तरह जो अपने टी-पॉट की टिकोजी भी मिर्ज़ापुर के कारीगरों से बनवाता हो। मैं यकीन से कह सकता हूं कि अर्णब के अंदर सुंदरता की संभवानाएं बची हुई हैं। लेकिन सोचिए रोज़ समंदर के विशाल ह्रदय का दर्शन करने वाले एंकर का ह्रदय कितना संकुचित और नफ़रतों से भरा है।

अर्णब गोस्वामी जब भी जेल से आएं, अव्वल तो पुलिस उन्हें तुरंत रिहा करे, मैं यही कहूंगा कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने इस सुंदर घर को निहारा करें। इस सुंदर घर का लुत्फ उठाएं। सातों दिन कई कई घंटे एंकरिंग करना श्रम की हर अवधारणा का अश्लील उदाहरण है। अगर इस घर का लुत्फ नहीं उठा सकते तो मुझे मेहमान के रूप में आमंत्रित करें। मैं कुछ दिन वहां रहूंगा। सुबह उनके घर की कॉफी पीऊंगा। वैसे अपने घर में चाय पीता हूं लेकिन जब आप अमीर के घर जाएं तो अपना टेस्ट बदल लें। कुछ दिन कॉफी पर शिफ्ट हो जाएं। और हां एक चीज़ और करना चाहता हूं। उनकी बालकनी में बैठकर अरब सागर से आती हवाओं को सलाम भेजना चाहता हूं और बॉर्डर फिल्म का गाना फुल वॉल्यूम में सुनना चाहता हूं। ऐ जाते हुए लम्हों, ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो….मैं भी चलता हूं… ज़रा उनसे मिलता हूं… जो इक बात दिल में है उनसे कहूं तो चलूं तो चलूं…. और हां पुलिस की हर नाइंसाफी के खिलाफ हूं। चाहें लिखू या न लिखूं।


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वाल्मीकि जयंती के बहाने हिन्दूवाद

लेेखक- (कँवल भारती) उत्तरप्रदेश की भगवा दल वाली योगी सरकार ने हाथरस कांड से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए प्रत्येक जिले में वाल्मीकि-जयंती (31 अक्टूबर) सरकारी स्तर पर मनाने का निर्णय लिया था। राज्य सरकार के मुख्य सचिव आर. के. तिवारी ने मंडल आयुक्तों और जिला अधिकारियों को जो आदेश जारी किया था, उसमें कहा गया था कि महर्षि वाल्मीकि से संबंधित स्थलों व मंदिरों आदि पर अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ दीप प्रज्वलन, दीप-दान और अनवरत आठ, बारह या चौबीस घंटे का वाल्मीकि-रामायण का पाठ तथा भजन आदि का कार्यक्रम भी कराया जाए। निश्चित रूप से यह वाल्मीकियों को लुभाने की ऐसी शातिर चाल है, जो एक तीर से दो निशाने साधती है।

पहला निशाना यह कि जिस आदि कवि वाल्मीकि को सफाई कर्मचारी या मेहतर समुदाय अपना भगवान मानकर पूजता है, (हालाँकि इसे भी आरएसएस द्वारा ही उन पर थोपा गया है) वह योगी सरकार के इस निर्णय से खुश हो जायेगा कि सरकार उनके भगवान को इतना मान दे रही है, जबकि इस सरकार ने वाल्मीकि-जयंती की छुट्टी तक खत्म कर दी। दूसरा निशाना यह है कि इस आयोजन के द्वारा सफाई कर्मचारियों को आरएसएस के हिंदुत्व से जोड़ने का काम किया जायेगा। रामायण के पाठ का मतलब है राम और रावण की कथा का पाठ, अर्थात, यह बताना कि स्वयं विष्णु ने राम के रूप में जन्म लेकर धर्म-विरोधी रावण और अन्य राक्षसों का वध किया था। फिर उन्हें बताया जायेगा कि स्वच्छकार समुदाय धर्म का रक्षक है, समाज का रक्षक है और राष्ट्र का रक्षक है। उन्हें यह नहीं बताया जायेगा कि स्वच्छकार समुदाय को भी डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफ़ेसर बनकर विकास की मुख्य धारा में आना चाहिए, और इसके लिए उन्हें सफाई का गंदा पेशा छोड़कर सुशिक्षित होने की जरूरत है।drAmbedkar-valmikiSamaj योगी जी को भलीभांति मालूम है कि वाल्मीकि समुदाय की शिक्षा में क्या स्थिति है? वे यह भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी के नाम पर सिर्फ नगरपालिकाओं में सफाई कर्मचारी का पद ही उनके लिए है। झाड़ू ही उनकी नियति बना दी गई है। क्या वे इसी नियति के लिए बने हैं? क्या उन्हें उच्च शिक्षित होने का हक नहीं है? भाजपा ने उनके लिए पृथक आरक्षण का प्रावधान तो कर दिया, क्योंकि ऐसा करके उसने सफाई कर्मचारियों को बड़ी चतुराई से उन दलितों से अलग कर दिया, जो आंबेडकरवादी हैं, ताकि वे भी आंबेडकरवादी न बन जाएँ। लेकिन उनकी शिक्षा के विकास की दिशा में भाजपा सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। आखिर क्यों? जब उनके पास शिक्षा ही नहीं होगी, तो क्या पृथक आरक्षण का प्रावधान उन्हें बेवकूफ बनाना नहीं है?

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रामायण का अखंड पाठ और भजन-कार्यक्रम क्या हैं? इनका क्या मतलब है? क्या यह उसी तरह का ‘लटका’ नहीं है, जैसे आज़ादी के बाद के दशकों में ब्राह्मणों ने अपने धर्म की जड़ें मजबूत करने के लिए ‘कीर्तन’ नाम का एक नया लटका निकाला था। मुझे याद है, हमारी बस्ती में भी यह कीर्तन होता था। तब मेरी उमर दस-बारह साल की थी। अशिक्षित बस्ती थी, इसलिए मुझे भी कीर्तन अच्छा लगता था। कल जगदीश के घर में, आज हमारे घर में, तो परसों रामलाल के घर में यह कीर्तन होता था। यह क्यों होता था? इसका निहितार्थ जानने की वह मेरी उमर नहीं थी। पर जब मैंने 1975 में चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की किताब ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ पढ़ी, तो मैं समझा कि ब्राह्मणों ने यह कीर्तन का लटका क्यों निकाला था? अगर दलित वर्गों के एक भी घटक में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध क्रान्ति होती है, तो ब्राह्मणवाद बेचैन हो जाता है और उसका दमन करने के लिए तुरन्त प्रतिक्रांति आरम्भ कर देता है। उस समय ब्राह्मणों को डर था कि कहीं दलित-पिछड़ी जातियों में डॉ. आंबेडकर की क्रान्ति पैदा न हो जाए, इसलिए उन्होंने कीर्तन का लटका निकालकर दलित वर्गों को हिन्दू बनाने का उपक्रम शुरू कर दिया। जिज्ञासु ने लिखा था- ‘सारे देश में कीर्तन की धूम है। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक नगर-नगर, ग्राम-ग्राम, मुहल्ले-मुहल्ले कीर्तन-मंडलियां कायम हैं। घर-घर कीर्तन और अखंड कीर्तन का रिवाज चल पड़ा है। यहाँ तक कि सरकारी रेडियो द्वारा भी कीर्तन सुनाया जाता है। ।।।।और हरे रामा हरे कृष्णा की रट लगवाकर भोलीभाली जनता को ब्राह्मणों के गुड्डे ईश्वरों का अंध-भक्त बनाकर ब्राह्मणशाही धार्मिक साम्राज्य की हिलती हुईं जड़ें मजबूत की जाती हैं।’

हालाँकि, वाल्मीकि समुदाय को हिंदुत्व से जोड़े रखने के लिए आरएसएस पोषित कई संगठन उनके बीच बराबर काम कर रहे हैं। जो आरएसएस की भावना के अनुरूप काम कर रहा है, लेकिन उनके बीच कुछ आंबेडकरवादी संगठन भी काम कर रहे हैं, जो उन्हें सफाई का गंदा पेशा छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे उन्हें यह भी शिक्षा देते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे, जो सामंती कवि थे, उनका मेहतर समाज के साथ कोई भी संबंध नहीं है। वे उन्हें समझाते हैं कि जब तक तुम वाल्मीकि को अपना भगवान मानते रहोगे, तुम्हारा कोई उत्थान नहीं होगा, अत: तुम्हें जितनी जल्दी हो, वाल्मीकि को त्यागकर आंबेडकरवादी बनो। वाल्मीकि तुम्हें शिक्षित होने को नहीं कहते, वे तुम्हें सिर्फ ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले श्रीराम के पदचिन्हों पर चलने को कहते हैं। लेकिन डॉ. आंबेडकर तुम्हें अपने अधिकारों के लिए शिक्षित होने, संघर्ष करने और संगठित होने को कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप मेहतर समुदाय में वाल्मीकि के नाम पर चलाए जा रहे तथाकथित धर्म के विरोध में एक क्रान्ति की धारा भी समानांतर चल रही है। हाथरस-कांड के बाद इस आंबेडकरवादी धारा ने भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध मेहतर समुदाय में जबर्दस्त ध्रुवीकरण किया, जिसने आरएसएस को चौकन्ना कर दिया, और वह तभी से सफाईकर्मी समुदाय को हिन्दूवाद से जोड़े रखने का उपक्रम करने में सक्रिय हो गया। 31 अक्टूबर को मेहतर बस्तियों में सरकारी खर्चे पर वाल्मीकि-जयंती मनाना और रामायण का अखंड पाठ करना उसी उपक्रम के अंतर्गत था।

इसे मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि वाल्मीकि-जयंती पर वाल्मीकि के ग्रन्थ का पाठ होना चाहिए। पर आपत्ति इस बात पर है कि मेहतर बस्तियों में ही रामायण का पाठ क्यों होना चाहिए? यह पाठ उच्च जातियों की हिन्दू बस्तियों में क्यों नहीं हो रहा है? क्या रामायण पाठ की आवश्यकता केवल मेहतर समुदाय को ही है? दलितों में तो और भी बहुत सी जातियां हैं, पर क्या कारण है कि आरएसएस और भाजपा का दलित प्रेम सफाई-कर्मचारियों पर ही प्रकट हो रहा है? क्या इसलिए कि अन्य दलित जातियां वाल्मीकि को भगवान नहीं मानतीं? या इसलिए कि वे सफाई का कार्य नहीं करतीं? जाहिर है कि सवर्ण हिंदुओं को मेहतरों की जरूरत है, शौचालय साफ़ कराने के लिए, सड़कें साफ़ करने के लिए, और नाले और गटर साफ़ कराने के लिए दुनिया में भारत अकेला देश है, जहां गटर की सफाई के लिए सफाई कर्मचारियों से कराई जाती है, जिस तरह वे उनमें घुसकर सफाई करते हैं, वह जान-लेवा है और अब तक कई सौ लोग गटर में घुसकर मर चुके हैं। अन्य देशों में गटर की सफाई मशीनों से होती है, पर भारत में सफाई कर्मियों से इसलिए यह काम कराया जाता है कि मशीन महंगी पड़ती है, जबकि सफाई कर्मी बहुत ही सस्ता मजदूर है, जिसकी मौत की जिम्मेदारी भी सरकार की नहीं होती है। इसलिए उच्च हिंदुओं के लिए बहुत जरूरी है मेहतर समुदाय का अशिक्षित और गरीब बने रहना, क्योंकि शिक्षित होकर वे हिन्दू फोल्ड से बाहर निकल सकते हैं।

हमारे वाल्मीकि समुदाय के लोगों को, खासतौर से शिक्षित लोगों के लिए यह आत्ममंथन करने का समय है। क्या रामायण का पाठ उनकी जरूरत है? क्या रामायण का पाठ सुनने से उनकी सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हल हो जाएँगी? वे कब तक अपनी समस्याओं को नजरंदाज करते रहेंगे? क्या वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सफाई मजदूर बनकर रहना चाहते हैं? अगर नहीं तो आत्मचिंतन करें कि उन्हें अपने बेहतर भविष्य के लिए क्या चाहिए—झाड़ू या शिक्षा?अगर वे अपना और अपनी भावी पीढ़ियों का बेहतर भविष्य बनाना चाहते हैं, तो झाड़ू का त्याग करें, और शिक्षा को अपनाएं। हर स्थिति में अपने बच्चों को पढ़ाएं, उन्हें गंदे पेशे में न डालें। मैं अपने दलित भाइयों से यह भी अपील करूँगा कि वे आरएसएस की शाखाओं में जाना बंद करें। यह आपका हितैषी संगठन नहीं है, बल्कि आपको और आपके भविष्य को बर्बाद करने वाला संगठन है। यह ब्राह्मणों का संगठन है, जो भारत में हिन्दू-राज्य कायम करने के लिए काम कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य वर्ण व्यवस्था पर आधारित ब्राह्मण धर्म को मजबूत करना और अपने विरोधियों का नाश करना है। इसके विरोधी ईसाई और मुसलमान हैं, जिनके खिलाफ यह दलितों में नफरत पैदा करता है। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि आरएसएस मुख्य रूप से दलित-विरोधी संगठन भी है। यह दलितों की शिक्षा, उनके आरक्षण और उनके आर्थिक उत्थान का घोर विरोधी है। वाल्मीकि समाज जब तक आरएसएस के जाल से मुक्त नहीं होगा, तब तक वह अपना स्वतंत्र विकास नहीं कर सकता।


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बुद्ध से कुछ मांगना मत, कुछ नहीं मिलेगा

बुद्ध की मूर्ति के आगे कभी कुछ मांगना मत, कुछ नहीं मिलेगा। ना पूजा करना, ना प्रार्थना। ना हाथ फैलाना, न झोली। कोई दया की भीख मांगे या सुख का आशीर्वाद, कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि बुद्ध पुरुष हमें कुछ देते नहीं हैं। बुद्ध तो मनुष्य के भीतर सोए हुए चित्त को जगाते हैं, जो छिपा हुआ है उसे जागृत करते हैं। मनुष्य को उसकी अपार क्षमता का एहसास कराते हुए सभी को बुद्ध बनने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि हर व्यक्ति बुद्ध बनें और अपनी सुख शांति के लिए किसी के आगे दया की भीख नहीं मांगे। रास्ता लंबा है लेकिन चलना तो हमें ही पड़ेगा।

बुद्ध पुरुष न धन देते हैं न पद, न मान देते हैं न प्रतिष्ठा। इसलिए कभी गौतम बुद्ध की प्रतिमा के आगे प्रार्थना मत करना। उनकी प्रशंसा के मंत्र पढ़कर खुशामदी करने व फुसलाने की कोशिश बेकार जाएगी। धूपबत्ती, माला चढ़ाकर खुश करने या चापलूसी करने की कोशिश करेंगे तो सब व्यर्थ होगा, क्योंकि गौतम बुद्ध अब इस दुनिया में नहीं हैं। तो कोई लाख कोशिश करें कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

अब तो सिर्फ उनका बताया हुआ सत्य का मार्ग हैं, मानव कल्याण का धम्म है। चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग हैं। शील, समाधि और प्रज्ञा का मार्ग है। इसलिए आज कहीं कोई व्यक्ति बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाएं, बुद्ध को गाली देवे तो गुस्सा मत करना, क्योंकि बुद्ध न बुद्ध विहारों में है, न शास्त्रों में है, न मूर्तियों में।

बुद्ध से मिलना हो तो उनके मार्ग पर चलना पड़ेगा। बुद्ध तो व्यक्ति के आचरण में हैं, शीलों के पालन में झलकते है। बुद्ध के दर्शन तो ध्यान साधना द्वारा भीतर झांककर मन को निर्मल करने से होते हैं। बाहर भटकने से कुछ नहीं मिलेगा। हां! यदि ज्ञान, ध्यान और शील, समाधि व प्रज्ञा के मार्ग पर चलते हुए बुद्ध का रास्ता आनंद व सुखमय लगे, मानव कल्याण का लगे तो बुद्ध के प्रति श्रद्धा के साथ वंदन जरूर करना। कृतज्ञता जरूर प्रकट करना, कि हे! गौतम बुद्ध आप इस धरती पर आए और संपूर्ण मानव जगत का कल्याण कर गए।

प्रस्तुति: डॉ. एम. एल. परिहार, जयपुर

मध्यप्रदेश उपचुनाव: कौन बनेगा उपचुनाव का बादशाह

Written By- सम्राट बौद्ध 2018 के मध्यप्रदेश चुनाव के समय और चुनाव के बाद मीडिया ने एक बड़ा भ्रम खड़ा किया कि एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं और वे बीजेपी के खिलाफ वोट करेंगे। इस भ्रम का सबसे ज्यादा असर रहा ग्वालियर चंबल सम्भाग में जहां 2 अप्रैल 2018 को दलितों और सवर्णों के बीच कई जगह खूनी संघर्ष हुए और कई लोग मारे गए। इसी क्रम में नवम्बर 2018 में विधानसभा चुनाव होते हैं और परिणाम के रूप में ग्वालियर चंबल संभाग में बीजेपी लगभग समाप्त हो जाती है। इस बात को कुछ इस तरह समझिए कि इस चुनाव में पीएम मोदी ने ग्वालियर में सभा की जिसमें इस क्षेत्र के 22 प्रत्याशी मंच पर थे उनमें से केवल 1 प्रत्याशी मात्र 3000 वोट के अंतर से जीत हासिल कर पाया। इस परिणाम से मीडिया का फैलाया पहला भ्रम सत्य साबित होता है कि सवर्ण बीजेपी के खिलाफ हैं। इसीलिए बीजेपी इस क्षेत्र से समाप्त हो गई।

 एक और भ्रम मीडिया समानांतर रूप से चला रही थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के चुनाव प्रचार और मेहनत से ग्वालियर चंबल में कांग्रेस का इतना शानदार प्रदर्शन रहा है। कांग्रेस की जीत और कांग्रेस के सिंधिया को दिए जा रहे महत्व से यह भ्रम भी सत्य साबित ही हुआ और सिंधिया के साथ क्षेत्र में कई लोग ये मान बैठे की सिंधिया निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं पर अंत मे कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया और यहां से कांग्रेस के अंदर क्लेश की शुरुआत हुई। अंततः 2020 प्रारंभ होते ही सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस सरकार गिरा देते हैं। इन्ही सब भ्रम का परिणाम है वर्तमान मध्यप्रदेश का 28 सीट पर होने वाला उपचुनाव।

लेकिन जिन 2 भ्रम को मीडिया ने खड़ा किया उसके उलट जमीनी सच्चाई कुछ और थी।

पहला, बीजेपी से सवर्ण नाराज नहीं थे बल्कि 2 अप्रैल के दंगों के बाद जिस तरह प्रशासन का दमन दलितों ने सहा उससे दलित बीजेपी से नाराज जरूर थे इसके 2 प्रमाण हैं। पहला ग्वालियर चंबल के अलावा बाकी मालवा, निमाड़, बघेलखण्ड क्षेत्रों में बीजेपी को हमेशा जैसे वोट मिलते रहे हैं 2018 के चुनाव में भी वैसे ही मिले, बीजेपी मात्र  ग्वालियर चंबल में चुनाव हारी जहां लगभग हर सीट पर दलित 30 से 40% तक हैं।

दूसरा, ग्वालियर चंबल में बसपा बहुत बड़ा फैक्टर है, जहां की लगभग हर सीट पर बसपा पिछले 4 चुनाव में कभी ना कभी जीत चुकी है और 2018 के चुनाव में बसपा का हर सीट पर वोट घटा है जो सीधा कांग्रेस को गया। पिछली बार जहां बसपा की 4 सीट थी जिसमें से 3 ग्वालियर चंबल में ही थी। इस बार बसपा की कुल 2 ही सीट आई जिसमें से एक ही ग्वालियर चंबल से थी। इसका मुख्य कारण था की बसपा के एकदम कट्टर वोटर के मन मे भी यह बात थी कि अगर बसपा को वोट दिया तो बीजेपी जीत जाएगी ऐसे में पहला लक्ष्य बीजेपी को हराना था तो कांग्रेस ही एक मात्र विकल्प थी। इसके प्रमाण के तौर पर ग्वालियर के जिस चौहान प्याऊ पर 3 दलितों की मृत्यु हुई उस सीट (ग्वालियर पूर्व) को कठिन दिख रहे मुकाबले में कांग्रेस ने अप्रत्याशित रूप से 30000 से ज्यादा वोट से जीत लिया। दूसरा, भिंड जिले की जिस मच्छण्ड में 2 दलितों की हत्या हुई वह सीट (लहार विधानसभा) भी 50000 से ज्यादा वोट से कांग्रेस जीती, जबकि पिछले 3 चुनाव से बसपा इस सीट में दूसरे नम्बर पर रहती थी और मामूली अंतर से चुनाव हारती रही है जबकि 2018 के चुनाव में बसपा तीसरे नम्बर पर रही और बसपा प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाया। कमोबेश यही हाल मुरैना, दतिया जिले में भी रहा।

 दलित वोटों के एक मुश्त रूप से कांग्रेस के पास जाने से ग्वालियर चंबल में कांग्रेस का प्रदर्शन आश्चर्यजनक रहा।  चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया इस क्षेत्र में कांग्रेस के एक मात्र सर्वमान्य नेता थे तो इसका श्रेय उन्हें दिया गया। लेकिन यह भ्रम भी इसलिए गलत है कि वही ज्योतिरादित्य सिंधिया 2019 लोकसभा के आम चुनाव में 6 महीने बाद ही अपने परिवार की स्थाई गुना संसदीय सीट पर एक छोटे से बीजेपी के कार्यकर्ता के हाथों 2 लाख के करीब वोट से चुनाव हार गए। दूसरा 2013 के मध्यप्रदेश चुनाव में भी सिंधिया के पास 2018 के चुनाव की तरह कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष का पद था, तो 2013 या 2008 के चुनाव में सिंधिया निष्प्रभावी क्यों थे। यह मनुवादी मीडिया के फैलाये भ्रम थे कि मूल दलितों के बीजेपी के प्रति आक्रोश को मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया और सिंधिया को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया जिसका परिणाम आज के मध्यप्रदेश के उपचुनाव हैं।

अब आते हैं वर्तमान में हो रहे उपचुनाव पर

 कांग्रेस कभी एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभा ही नहीं पाई लेकिन कांग्रेस छोड़ने के बाद 21 अगस्त को पहली बार जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर आये तब एक अलग ही कांग्रेस उभर के सामने आई। वह शहर और क्षेत्र जो 300 से ज्यादा वर्ष से सिंधिया के साथ खड़ा था एकाएक सिंधिया के खिलाफ सड़कों पर उतर आया। पूरे ग्वालियर शहर में अफरा-तफरी का माहौल था। मैंने ग्वालियर में इससे बड़ा जनता का हुजूम पिछले 20 वर्ष में सड़कों पर नहीं देखा। जैसा दिल्ली में बैठे समीक्षक अंदाजा लगा रहे थे कि सिंधिया के जाने से कांग्रेस ग्वालियर चंबल में खत्म हो जाएगी उसके ठीक उलट ऐसा लग रहा था मानो कांग्रेस सिंधिया के जाने से एकदम जीवित हो उठी हो।

कमलनाथ पहली बार सिंधिया के जाने के बाद 18 सितंबर को ग्वालियर आये। पूरे ग्वालियर शहर में छह किलोमीटर से ज्यादा लम्बा जाम लगा था और महल तक गद्दार के नारे गूंज रहे थे। स्थानीय मीडिया ने इसे ग्वालियर शहर में अब तक का किसी नेता का सबसे भव्य स्वागत बताया। पूरे क्षेत्र में कांग्रेस के प्रति जबरदस्त माहौल है और कांग्रेस के लिए सिंधिया का विरोध करना बहुत आसान भी है। मसलन कांग्रेस जो गद्दारी का नारा लगा रही है वह ऐतिहासिक तौर पर कांग्रेस स्थापित कर सकती है।

 दूसरा, सिंधिया जो आरोप आज कांग्रेस पर लगा रहे हैं कि कांग्रेस ने कर्जमाफी की घोषणा को लागू नहीं किया, उसके प्रतिउत्तर में कम से कम 3 से 4 सभाएं तो ऐसी मुझे याद हैं जिनमें सिंधिया ने खुद किसानों को ऋणमाफी पत्र बांटे है। सिंधिया ऐसा कोई नया आरोप आज कांग्रेस पर नहीं लगा रहे जिसका जवाब कांग्रेस में रहते सिंधिया ने खुद ना दिया हो।  2018 के चुनाव में बीजेपी का मुख्य नारा था ‘माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज’, बीजेपी सिंधिया पर भूमाफिया होने का आरोप लगाती थी, उनके सामंतवाद पर, 1857 की क्रांति के प्रसंग पर बीजेपी सिंधिया को घेरती रही है और आज वही शिवराज और महाराज एक साथ हैं। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस बीजेपी के सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस के सिंधिया के भाषण ही चला दे तो कांग्रेस जो उन पर गद्दारी के आरोप लगा रही है वे सच साबित हो जाएंगे। पर कांग्रेस विपक्ष की राजनीति मध्यप्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी नहीं कर पा रही। एक ओर जहां मौजूदा उपचुनाव में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए पूरी 28 सीट जितनी है दूसरी तरफ बीजेपी को मात्र 8, तब भी आप चुनाव प्रचार से दोनों की स्थिति का आंकलन कर सकते हैं। जहां 24 दिनों में शिवराज सिंह जी ने 38 सभाएं की हैं वहीं कमलनाथ जी ने मात्र 19 सभाएं की। यहां शिवराज के साथ सिंधिया ने 25, तो नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 सभाएं की। (ये आंकड़े दिनांक 22 अक्टूबर तक के हैं।)

 कांग्रेस की तरफ से कमलनाथ के अलावा कोई दूसरा बड़ा प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर का नेता सक्रिय नहीं है। राहुल गांधी केरल में हैं और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में। यहां तक कि मुरैना में जहां गुर्जर वोट निर्णायक स्थिति में है, वहां वे सचिन पायलट की भी सभाएं सही से नहीं करा पा रहे हैं। जमीनी स्थिति हर सीट की ऐसी है कि बीजेपी और सिंधिया का जबरदस्त विरोध है। कांग्रेस के प्रति सहानुभूति है, दलित वोट पूरी ताकत से धोखा खाने के बाद भी भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस के साथ खड़ा है। जमीन पर जैसा माहौल है, उसको अगर कांग्रेस सही से उपयोग कर पाती तो ये बहुत बड़ी बात नहीं होती कि कांग्रेस पूरी 28 सीट बड़ी आसानी से जीत सकती है या कांग्रेस अपना हठ छोड़ के बसपा के साथ समझौता करती तो यह चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए मात्र औपचारिकता रह जाती, क्योंकि कम से कम 6 ऐसी सीट हैं इस चुनाव में जहां बसपा प्रत्याशी जीतने की स्थिति में दिख रहे हैं। इनमें मुरैना, जौरा, पोहरी, भांडेर, मेहगांव, डबरा प्रमुख हैं। अगर इन सीट पर बसपा जीतती नहीं है तो कम से कम कांग्रेस को तो हरा ही सकती है। पर कांग्रेस की निष्क्रियता और ठंडा चुनाव प्रचार उनकी हारने के प्रति ज़िद को दर्शाता दिखा। कौन कितने पानी में रहा, यह तो 10 नवंबर को चुनावी नतीजे आने के बाद साफ हो ही जाएगा।


लेखक सम्राट बौद्ध ग्वालियर के रहने वाले हैं। इन दिनों दिल्ली में रहते हैं और सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं।

किसानों के नाम रवीश कुमार का यह पत्र पढ़िए

सुना है आप सभी ने 25 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है. विरोध करना और विरोध के शांतिपूर्ण तरीके का चुनाव करना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है. मेरा काम सरकार के अलावा आपकी ग़लतियां भी बताना है. आपने 25 सितंबर को भारत बंद का दिन ग़लत चुना है. 25 सितंबर के दिन फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण बुलाई गई हैं. उनसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो नशा-सेवन के एक अतिगंभीर मामले में लंबी पूछताछ करेगा. जिन न्यूज़ चैनलों से आपने 2014 के बाद राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक घुट्टी पी है, वही चैनल अब आपको छोड़ कर दीपिका के आने-जाने से लेकर खाने-पीने का कवरेज़ करेंगे. ज़्यादा से ज़्यादा आप उन चैनलों से आग्रह कर सकते हैं कि दीपिका से ही पूछ लें कि क्या वह भारत के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती है या यूरोप के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती है. बस यही एक सवाल है जिसके बहाने 25 सितंबर को किसानों के कवरेज़ की गुज़ाइश बनती है. 25 सितंबर को किसानों से जुड़ी ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ बन सकती है. वर्ना तो नहीं.

रवीश कुमार की यह पूरी चिट्ठी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

ज्यादा मुनाफ़ा दे रहा जैविक खेती का सामूहिक प्रयास

Written By- सूर्यकांत देवांगन (भानुप्रतापपुर, कांकेर, छत्तीसगढ़)

देश में कृषि सुधार विधेयक पर जमकर घमासान मचा हुआ है। सरकार जहां इस विधेयक को ऐतिहासिक और किसानों के हक़ में बता रही है, वहीं विपक्ष इसे किसान विरोधी विधेयक बता कर इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है। हालांकि संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा चुका है, जिनकी सहमति के बाद विधेयक लागू हो जाएगा। लेकिन इसके बावजूद विपक्ष इसके खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ है। इस संवैधानिक लड़ाई से अलग देश का अन्नदाता अपनी फसल को बेहतर से बेहतर बनाने में लगा हुआ है, ताकि देश में अन्न की कमी न हो। इतना ही नहीं अब किसान अपनी फसल के लिए रासायनिक खादों की जगह सामूहिक रूप से जैविक खेती को अपनाकर न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा रहा है बल्कि लोगों की सेहत को भी बेहतर बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

इसका अनोखा प्रयास छत्तीसगढ़ में कांकेर जिले के दुर्गूकोंदल ब्लाक स्थित गोटूलमुंडा ग्राम में देखने को मिल रहा है। जहां 450 से ज्यादा किसानों ने सामूहिक ऑर्गैनिक (जैविक) खेती को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया है। क्षेत्र में 9 प्रकार के सुगंधित धान चिरईनखी, विष्णुभोग, रामजीरा, बास्ताभोग, जंवाफूल, कारलगाटो, सुंदरवर्णिम, लुचई, दुबराज के अलावा कोदो, कुटकी, रागी और दलहन-तिलहन फसलों का भी उत्पादन किया जा रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और अच्छी गुणवत्ता की फसलों के लिए ग्राम गोटूलमुंडा में वर्ष 2016-17 में कृषि विभाग के सहयोग और किसानों की ‘स्वस्थ्य उगाएंगे और स्वस्थ्य खिलाएंगे’ की सोच के साथ छह गांवों के लगभग 200 किसानों ने ’किसान विकास समिति’ का गठन किया। इसके बाद नए तरीके से क्षेत्र में खेती करने की शुरूआत हुई। आदिवासी बहुल इलाके के इन किसानों की इच्छा शक्ति को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी समिति को हरित क्रांति योजना, कृषक समृ़िद्ध योजना तथा मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना जैसे योजनाओं से जोड़कर प्रशिक्षण के साथ अन्य सुविधाएं पहुंचाई हैं।

प्रारंभ में समिति के सभी किसानों ने आपस में चर्चा करके भूमि की विशिष्टता के आधार पर अपनी-अपनी जमीन पर एक सामान फसल लगाना शुरू किया। जिसके बाद खाद्य निर्माण का कार्य भी समिति के द्वारा ही किसानों ने स्वयं किया। उन्होंने गाय के गोबर, पेड़-पौधों के हरे पत्तों तथा धान के पैरा को जलाने की बजाय उसे एक साथ मिलाकर डिकंपोज (अपघटित) पद्धति से खाद बनाया। इसी तरह कीटों से रक्षा के लिए रासायनिक कीटनाशक के बजाय जैविक कीटनाशक करंज, सीताफल, नीलगिरी, लहसून, मिर्ची जैसे पौधों का प्रयोग किया। इनकी कड़वाहट ने कीटों को फसल से दूर रखा और उसका दुष्प्रभाव पौधों व जमीन पर भी नहीं पड़ा। पानी की समस्या दूर करने के लिए गांव के नाले को पंप से जोड़ा गया तो कहीं-कहीं पर ट्यूबवेल की भी खुदाई करवाई गई। जिससे क्षेत्र में पानी की समस्या भी खत्म हो गई। फसल तैयार होने तक समिति के द्वारा प्रत्येक किसान के खेत में जाकर जांच और समय-समय पर निगरानी की जाती है ताकि किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान समिति स्तर पर किया जा सके। फसल कटने के बाद किसान उत्पादित फसल को समिति में इकठ्ठा करके बाजार में या सरकार को एक साथ बेचते हैं, जिससे मिलने वाली राशि को आपस में बांट लेते हैं। इस तरह से जैविक खेती का यह तरीका सबसे अलग है और इसमें एक दूसरे की सहायता से खेती का सारा काम आसानी से समिति के माध्यम से संपन्न कर लिया जाता है।

गोटूलमुंडा के किसानों का मुख्य उत्पादन सुगंधित धान की 9 किस्म है जिसमें चिरईनखी, विष्णुभोग, रामजीरा, बास्ताभोग, जंवाफूल, कारलगाटो, सुंदरवर्णिम, लुचई, दुबराज शामिल है। लेकिन वर्तमान में कोदो, कुटकी, रागी की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है जो छतीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में उगाए जाने वाला आदिवासियों का मुख्य फसल है। कुछ सालों तक इन्हें ग्रामीणों का आहार माना जाता था लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों और औषधीय गुणों की वजह से अब देश-विदेश से इनकी मांग आ रही है। यही कारण है कि गोटूलमुंडा के ’किसान विकास समिति’ को सरकार की तरफ से 20 मीट्रिक टन कोदो चावल उत्पादन का टारगेट दिया गया है जिसकी सप्लाई विदेशों में की जाएगी। इस संबंध में ’किसान विकास समिति’ के समन्वयक डीके भास्कर ने बताया कि शुरूआत में समिति में 200 किसान जुडे़ थे, लेकिन जैविक खेती के इस प्रयोग से होने वाले फायदे को देखकर वर्ष 2020 में अब तक 456 किसान जुड़कर हमारे साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रासायनिक पदार्थों के उपयोग से पर्यावरण को नुकसान होता है जिसका ख़ामियाज़ा किसान से लेकर मिट्टी तक को भुगतनी पड़ती है और उसके लिए जिम्मेदार भी हम ही हैं। इसलिए हमारी समिति जैविक विधि से खेती कर रही है ताकि इसका फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी मिल सके। समिति के अध्यक्ष घंसू राम टेकाम व समिति के अन्य किसान रत्नी बाई, धनीराम पद्दा, अर्जुन टेकाम, शांति बाई, मुकेश टूडो सहित सभी सदस्यों का कहना है कि हम खेती के लिए खाद, कीटनाशक, बीज निर्माण जैसे सभी काम आपस में मिलकर करते हैं, इसलिए खेती में हमारी लागत कम आती है जिसका हमें मुनाफा मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर के कृषि वैज्ञानिक बीरबल साहू का कहना है कि जैविक खेती ही प्राकृतिक खेती है जो प्राचीन समय में की जाती रही थी। जिसकी ओर हमारे किसान पुनः लौट रहे हैं। जैविक खेती को धीरे धीरे फायदे का सौदे के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है जिसमें हमारा उद्देेश्य किसानों को उनके उत्पादन की पहचान व उचित मूल्य दिलाना है। गोटूलमुंडा के किसानों के सुगंधित धान की डिमांड राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा है। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि हम उतना उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। बहरहाल, गोटूलमुंडा के किसानों को प्रति एकड़ धान की जैविक खेती में लागत लगभग 4 हजार रूपए आता है। जिसमें उत्पादन 10 से 12 क्विंटल धान का होता है, तो दूसरी ओर रासायनिक खेती में यही लागत 8 से 9 हजार के बीच है और उत्पादन 17 से 18 क्विंटल का हो रहा है। जबकि रासायनिक पद्धति से मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।

वास्तव में आज रासायनिक खेती की अपेक्षा जैविक उत्पादन की पहचान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है। जिससे किसानों को लाभ तो हो रहा है लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता है। जिससे किसान मायूस होकर फिर से रासायनिक खेती की तरफ लौटने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार को जैविक खेती की विभिन्न योजनाओं के अलावा उचित मूल्य दिलाने की दिशा में विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। (चरखा फीचर)

क्या युवाओं का विरोध भाजपा और मोदी को ले डूबेगा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 70 साल के हो चुके हैं। 17 सितंबर को उन्होंने जीवन के 71वें वर्ष में प्रवेश किया। इस मौके पर भाजपा कार्यकर्ता जब देश भर में उनके जन्मदिन के लड्डू बांट रहे थे, देश का आम युवा इस दिन को बेरोजगारी दिवस के रूप में मना रहा था। पीएम मोदी के जन्मदिन के मौके पर भारत में रात 12 बजे से ही #HappyBdayNaMo, #PrimeMinister #NarendraModiBirthday  सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने लगा। लेकिन दिन चढ़ते ही इसी के साथ दो और हैशटैग ट्विटर पर टॉप ट्रेंड में शामिल हो गया। वह था अंग्रेजी में #NationalUnemploymentDay  और हिन्दी में #राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस।

पंद्रह दिन के भीतर यह लगातार दूसरी बार है, जब पीएम मोदी की देश के युवाओं ने बैंड बजा दी है। इससे पहले मोदी के मन की बात को लाखों युवाओं ने डिसलाइक कर अपना विरोध जताया था। दरअसल पीएम मोदी को लेकर यह गुस्सा युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी और देश के बदतर होते आर्थिक हालात की वजह से है।

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आँकड़ों के अनुसार छह सितंबर वाले सप्ताह में भारत की शहरी बेरोज़गारी दर 8.32 फ़ीसदी के स्तर पर चली गई।

लॉकडाउन और आर्थिक सुस्ती की वजह से बड़ी संख्या में रोजगार ठप्प हो गए। इस दौरान लाखों लोगों की नौकरियां चली गई। सेंटर फ़ॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आकड़ों के मुताबिक़, लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोगों की नौकरी जा चुकी है। CMIE सीएमआईई के आंकलन के मुताबिक़, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां गंवा दी।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के क़रीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ या तो सरकार की उदासीनता या कोविड की वजह से गंवाई हैं। 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है। गुस्से की वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के लिए युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था भी भारी संकट का सामना कर रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार इस साल अप्रैल से जून की तिमाही में देश की जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पिछले 40 वर्षों में यह सबसे भारी गिरावट रही।

आर्थिक सुस्ती और बेरोज़गारी की ऊंची दर के बीच भारतीय युवा सरकार के प्रति अपनी नाराज़गी लगातार ज़ाहिर कर रहे हैं। इस नाराज़गी का असर भारतीय सोशल मीडिया पर साफ़ देखने को मिल रहा है।

छात्रों-युवाओं के गुस्से की वजह बेरोज़गारी के साथ-साथ एसएससी जैसी परीक्षाएँ तय समय पर न होने और नौकरियों के लिए तय समय पर नियुक्ति न होना भी है। बीते सालों में कई विभागों में सरकार ने तमाम विभागों में कई पदों को खत्म कर दिया, जिससे लाखों युवाओं की इन पदों पर नौकरी की उम्मीद खत्म हो गई। सरकार द्वारा निजीकरण के तरह अंबानी-अडाणी को फायदा पहुंचान से भी देश का मध्यम वर्ग काफी नाराज है। नाराजगी का आलम ऐसा था कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में युवाओं ने अपना मुंह काला कर मोदी का विरोध किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की मांग है कि जो वैकेंसी निकाली जाए उनकी परीक्षाएं जल्द हों और उनके परिणाम जल्दी आएं। इसके अलावा कई संस्थानों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि से भी छात्र परेशान हैं और सरकार से गुहार लगा रहे हैं। लेकिन युवाओं की इन मांगों को लेकर सरकार की उदासीनता ने मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं का गुस्सा और बढ़ा दिया है। यही वजह रही कि बीते नौ सितंबर को देश के तमाम राज्यों में युवाओं ने रात नौ बजकर नौ मिनट पर टॉर्च, मोबाइल फ़्लैश और दिए जलाकर सांकेतिक रूप से अपना विरोध ज़ाहिर किया था और रोजगार की मांग की थी।

हालाँकि भाजपा की आईटी सेल इसके पीछे काँग्रेस की साज़िश बता रहे हैं, लेकिन साफ है कि यह किसी राजनैतिक दल का विरोध नहीं, बल्कि आम देश के आम युवाओं का विरोध है, जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ ही संघ और भाजपा की धड़कन बढ़ा दी है। तो क्या नरेन्द्र मोदी की अलटी गिनती शुरू हो गई है? क्या आगामी चुनाव में मोदी और भाजपा की नौका किनारे आने से चूक जाएगी, या फिर सिर्फ राम मंदिर के बूते देश के लोगों को धर्म का अफीम चटा वह फिर से शासन में आने में सफल होगी। सवाल कई हैं, उम्मीद है कि 2024 के पहले इसी साल बिहार और फिर 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में इसका जवाब मिल जाएगा।

सामने आया मोदी सरकार का बहुजन विरोधी चेहरा

कोविड-19 के कारण मोदी सरकार ने बिना देश के लोगों को भरोसे में लिए जिस तरह अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी, देश भर में अफरा-तफरी मच गई। उस दौरान खासतौर पर रोज कमाने खाने वाले मजदूरों पर आफत आ गई थी। लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर बेघर और बिना रोजगार वाली स्थिति में आ गए थे,  कइयों को उनके घर से निकाल दिया गया। दहशत इतनी फैल गई थी कि लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल ही अपने घरों को चल पड़ें। इस दौरान ज्यादा पैदल चलने के कारण, या हार्ट अटैक के कारण या फिर रास्ते में एक्सिडेंट हो जाने जैसी वजहों से सैकड़ों लोगों की जान चली गई। कईयों की दुनिया उजड़ गई तो कई घरों से कमाने वाला बेटा चला गया। लेकिन सरकार ने इन पीड़ितों की कोई सुध नहीं ली।

संसद के मानसून सत्र में सोमवार 14 सितंबर को जब विपक्ष ने यह मुद्दा उठाया तो उस पर केंद्र की मोदी सरकार के मंत्री ने जो बयान दिया, उसने तो गरीबों के जले पर जैसे नमक डालने का काम किया। विपक्ष ने लोकसभा में मंत्रालय से पूछा कि क्या सरकार के पास अपने गृहराज्यों में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों का कोई आंकड़ा है? विपक्ष ने सवाल में यह भी पूछा था कि क्या सरकार को इस बात की जानकारी है कि इस दौरान कई मजदूरों की जान चली गई थी और क्या उनके बारे में सरकार के पास कोई डिटेल है? और क्या ऐसे परिवारों को आर्थिक सहायता या मुआवजा दिया गया है?

इस पर केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने प्रवासी मजदूरों की मौत पर अपने लिखित जवाब में बताया कि ऐसा कोई आंकड़ा मेंटेन नहीं किया गया है। ऐसे में मुआवजे का कोई सवाल नहीं उठता है।’

सरकार के जवाब पर विपक्ष की ओर से खूब आलोचना और हंगामा हुआ।

कांग्रेस नेता दिग्विजिय सिंह ने कहा कि यह हैरानजनक है कि श्रम मंत्रालय कह रहा है कि उसके पास प्रवासी मजदूरों की मौत पर कोई डेटा नहीं है, ऐसे में मुआवजे का कोई सवाल नहीं उठता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि या तो हम सब अंधे हैं या फिर सरकार को लगता है कि वो सबका फायदा उठा सकती है।’

तो वहीं कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी ने भी सरकार के इस बयान पर हमला बोला है। इस मुद्दे पर ट्वीट कर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा। उन्होंने लिखा-

‘मोदी सरकार नहीं जानती कि लॉकडाउन में कितने प्रवासी मज़दूर मरे और कितनी नौकरियां गईं। तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई? हां मगर दुख है सरकार पे असर ना हुई, उनका मरना देखा ज़माने ने, एक मोदी सरकार है जिसे खबर ना हुई।’

दरअसल लॉकडाउन के दौरान 1 करोड़ से ज्यादा प्रवासी मजदूर देशभर के विभिन्न हिस्सों से अपने गृह राज्य पहुंचे। ऐसे में सवाल है कि सबका साथ – सबका विकास का दावा करने वाली भाजपा की केंद्र सरकार के पास ऐसे पीड़ित मजदूरों का आंकड़ा नहीं होना क्या देश के गरीबों के साथ सरकार का धोखा नहीं है। क्या प्रधानमंत्री मोदी देश के गरीबों, बहुजनों को धोखा नहीं दे रहे हैं?

कर्पूरी ठाकुर के शागिर्द रघुवंश प्रसाद सिंह का निधन, ऐसा था व्यक्तित्व

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बिहार की राजनीति में बड़ा कद रखने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। रघुवंश प्रसाद सिंह के नाम का नाम हाल में राजद से इस्तीफा देने के कारण सुर्खियों में रहा। उन्होंने दिल्ली में एम्स के बिस्तर से चिट्ठी लिखकर अपना इस्तीफ़ा भेजा लेकिन लालू यादव ने उसे ख़ारिज करते हुए लिखा कि आप कहीं नहीं जा रहे। लेकिन रघुवंश जी ने लालू यादव की बात नहीं मानी। वह दुनिया छोड़ गए। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें याद करते हुए ट्विट किया है- ‘प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया? मैनें परसों ही आपसे कहा था आप कहीं नहीं जा रहे है. लेकिन आप इतनी दूर चले गए. नि:शब्द हूं. दुःखी हूं. बहुत याद आएंगे.’ रघुवंश बाबू बाहरी आवरण में एक गंवई नेता थे। लेकिन असल में वह एक विद्वान और सच्चे जन प्रतिनिधि थे। लालू यादव के पहले रघुवंश सिंह कर्पूरी ठाकुर के पीछे खड़े रहे। इसका जिक्र उन्होंने खुद अपने इस्तीफे में किया था। रघुवंश प्रसाद सिंह को बेहतर तरीके से बताने वाला यह लेख पढ़िए। 

भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही थी। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।

यह एक तथ्य है कि आखिरकार, हमारे पुलिस अधिकारी और कांस्टेबल समाज से आते हैं, और इसलिए पुलिस संगठन हमारे समाज की एक सच्ची प्रतिकृति हैं। यह सर्वविदित है कि हमारा समाज जाति, धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित है। इसलिए, जब व्यक्ति पुलिस बल में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने सभी पूर्वाग्रहों और द्वेष को अपने साथ ले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति जब सत्ता में आते हैं तो ये पक्षपात और मजबूत हो जाता है।

उनकी व्यक्तिगत पसंद और नापसंद, जातिगत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह उनके कार्यों को बहुत दृढ़ता से प्रभावित करते हैं। इन पूर्वाग्रहों को अक्सर उनके व्यवहार और कार्यों में उन स्थितियों में प्रदर्शित किया जाता है जहां अन्य जातियों या समुदायों के लोग शामिल होते हैं।

 1976 में जब मैं सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी), गोरखपुर के पद पर था, तब पुलिस में जातिगत भेदभाव की स्थिति मेरे सामने आई। बतौर एएसपी, मैं रिजर्व पुलिस लाइंस का प्रभारी था। एक मंगलवार, जो कि परेड दिवस था,  पुलिस मेस के निरिक्षण के दौरान मैंने पाया कि कुछ पुलिसवाले सीमेंटेड टेबल और बेंच पर भोजन कर रहे थे, जबकि कुछ भोजन करते समय जमीन पर बैठे थे। यह मुझे बहुत अजीब लगा। मैंने एक हेड कांस्टेबल को बुलाया और इस स्थिति के बारे में पूछताछ की। उसने मुझे बताया कि जो लोग बेंच पर बैठे हैं वे उच्च जाति के हैं और जो लोग जमीन पर बैठे हैं वे निम्न जाति के हैं।

पुलिस लाइन्स में जातिगत भेदभाव के इस ज़बरदस्त प्रदर्शन को देखकर मैं हैरान रह गया, और मैंने इस भेदभावपूर्ण प्रथा को समाप्त करने का फैसला किया। उस समय से, जब भी मैंने इसे देखा  तो मैंने पुलिसकर्मियों को जमीन पर बैठने के लिए डांटा और और उन्हें बेंचों पर बैठने के लिए कहा। हालाँकि मुझे अपने निर्देशों को एक से अधिक बार दोहराना पड़ा, लेकिन मैं अंततः अलग-अलग भोजन के भेदभावपूर्ण व्यवहार को बंद करने में सफल रहा।

संयोग से, उसी अवधि में, मुझे अपने बॉस द्वारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एससी और एसटी) के लिए आयुक्त द्वारा की गई टिप्पणियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया, जिन्होंने 1974 की एक रिपोर्ट में पुलिस मैसों में दलित वर्ग के लोगों को अलग बैठाने की जातिगत भेदभाव वाली प्रथा का उल्लेख किया था जोकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पुलिस लाइंस में व्याप्त था।

मैंने अपने बॉस को बताया कि यह सच था और मैंने इस प्रथा को हाल ही में समाप्त किया है। उन्होंने मुझसे कहा कि आप केवल यह उल्लेख कर दीजिये कि यह “अब प्रचलित नहीं है”। मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश  के अन्य जिलों के बारे में पता नहीं है लेकिन गोरखपुर में मैंने उस समय पुलिस के बीच जाति-आधारित अलगाव का अंत सुनिश्चित कर दिया था।

हालांकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयुक्त ने दशकों पहले इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को इंगित किया था, लेकिन यह चौंकाने वाला तथ्य है कि यह आज भी जारी है। कुछ समय पहले यह बताया गया था कि बिहार में अभी भी अलग-थलग खाने की प्रथा जारी है और बिहार पुलिस में उच्च और निम्न जाति के लोगों के लिए अलग-अलग बैरक हैं। दरअसल, पुलिस बल में,  इसकी संरचना के कारण,  उच्च-जाति के लोगों का वर्चस्व है और इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार बेरोकटोक जारी हैं।

यह केवल आरक्षण नीति के कारण है कि  निचली ’जातियों के कुछ व्यक्तियों, विशेष रूप से एससी और एसटी, को पुलिस बल में जगह मिली है। इसने बलों को अधिक धर्मनिरपेक्ष और प्रतिनिधि बना दिया है। हालांकि, अल्पसंख्यकों का अभी भी बहुत कम प्रतिनिधित्व है। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों में जाति, सांप्रदायिक और लैंगिक पक्षपात अभी भी काफी मजबूत हैं।

जैसा कि हम जानते हैं कि, यूपी में प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) के खिलाफ सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की लगातार शिकायतें मिलती रही हैं। मैंने इन शिकायतों में सचाई पाई थी जब मैं 1979 में 34 बटालियन पीएसी, वाराणसी के कमांडेंट के पद पर तैनात था। मुझे अपने लोगों को जाति एवं धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े थे. मैंने उन्हें हमेशा जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से ऊपर रहने की बात कही थी। मैं उनसे कहता था, “धर्म आपका निजी मामला है। जब आप अपनी वर्दी पहन लेते हैं, तो आप केवल पुलिसकर्मी होते हैं और कानून के अनुसार काम करने के लिए बाध्य होते हैं।”

मेरे निरंतर ब्रीफिंग और डीब्रीफिंग का उन पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा था, और मैं अपने कर्मचारियों को बहुत हद तक जाति एवं धर्म निरपेक्ष बनाने में सफल रहा था।

इस की परीक्षा 1991 में वाराणसी में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान हुयी। 1991 के आम चुनाव में, एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, श्री चंद दीक्षित, वाराणसी शहर से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। हमेशा की तरह, विहिप ने मुसलमानों को मतदान से दूर रखने के लिए एक सांप्रदायिक दंगा किया था। परिणामस्वरूप, कर्फ्यू लगा दिया गया।

अगले दिन समाचार पत्रों में समाचार दिखाई दिया कि पीएसी के लोगों ने मुस्लिम इलाके में लोगों को लूटने और पीटने का काम किया था। मैंने तुरंत जांच शुरू कर दी। अपनी जांच में मैंने पाया कि ये लोग पीएसी के नहीं थे बल्कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के थे, जिन्होंने मुस्लिम इलाके में लूटपाट, संपत्ति को नष्ट करने और बूढ़े पुरुषों और महिलाओं की बुरी तरह से पिटाई की थी। इससे पता चलता है कि सांप्रदायिक पूर्वाग्रह न केवल पीएसी में, बल्कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के बीच भी मौजूद थे। उन इलाकों से कोई शिकायत नहीं मिली जहां मेरी बटालियन के आदमी तैनात थे।

मैंने देखा है कि पुलिस के निचले रैंक का व्यवहार मुख्य रूप से उच्च रैंकिंग अधिकारियों के व्यवहार और दृष्टिकोण से प्रभावित रहता है। यदि उच्च श्रेणी के अधिकारियों में जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हैं, तो उनके अधीन कर्मचारियों के बीच में भी इसके समान रूप से होने की संभावना है। मैंने पुलिस सेवा के दौरान कई शीर्ष रैंकिंग पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अपनी जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित करते हुए देखा है।

सच्चाई यह है कि कई आईपीएस अधिकारी उच्चकोटि का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भी  निम्न ’जातियों और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं दिखाते हैं।

किसी के रवैये को बदलना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि इसमें खुद को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के लिए बहुत प्रयास करने की आवश्यकता होती है। सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को अक्सर तथाकथित  आतंकवाद के मामलों में स्पष्ट तौर से देखा जा सकता  है, जहां मुसलमानों को फर्जी तौर पर फंसाने की शिकायतें अक्सर होती रहती हैं जो वर्षों जेल में रहने के बाद उनके निर्दोष पाए जाने से सही पाई जाती हैं.

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, उच्च रैंकिंग अधिकारियों का अच्छा रोल मॉडल, निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के दृष्टिकोण और व्यवहार को बदलने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संबंध में मेरे प्रयासों को 1992 में एक बार फिर से परखने का मौका आया था जब राम मंदिर आंदोलन पूरे जोरों पर था।

एक दिन, बजरंग दल के लोगों ने वाराणसी शहर में राम मंदिर आन्दोलन के पक्ष में प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। उनका इरादा वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के परिसर में इकठ्ठा हो कर शहर में जुलुस निकलने का था। जिला प्रशासन ने इसे रोकने के लिए उनके मंदिर के गेट से बाहर आते ही उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी। उन्होंने आंदोलनकारियों को घेरने के लिए पीएसी के जवान लगा दिए थे और उन्हें बसों में भर कर ले जाना था।

सिटी एसपी और सिटी मजिस्ट्रेट मौके पर थे। जब आंदोलनकारी गेट से बाहर आए, तो ड्यूटी पर मौजूद अधिकारियों ने पीएसी के जवानों को उन्हें घेरकर बसों में बिठाने का आदेश दिया। लेकिन उनको जोरदार झटका लगा, जब पीएसी के लोग बिल्कुल नहीं हिले और आंदोलनकारी शहर की ओर बढ़ने लगे। इस पर पीएसी के दूसरे लोगों को सिटी कंट्रोल रूम से घटनास्थल पर ले जाना पड़ा। वहां पहुंचते ही उन्होंने आंदोलनकारियों को घेर लिया और बसों में डाल दिया। इस प्रकार, इन पीएसी वालों की त्वरित कार्रवाई के कारण शहर में संभावित गड़बड़ी से बचा जा सका।

 मुझे यह जानकर खुशी हुई कि पीएसी का यह बाद वाला समूह मेरी बटालियन का था। अन्य पीएसी के जिन लोगों ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था, वे दूसरी बटालियन के थे, जो अनुशासनहीनता के लिए कुख्यात थी। मेरे लोगों द्वारा इस त्वरित कार्रवाई की जिला प्रशासन द्वारा सराहना की गई और पहले वाले पीएसी के जवानों को ड्यूटी से हटा दिया गया। साफ था कि एक वर्दीधारी बल में नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है।

जैसा कि बीड़ (महाराष्ट्र) की आईपीएस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके के वीडियो से देखा जा सकता है कि यदि ऐसे अधिकारियों को अधिकार प्राप्त पद पर रखा जाता है तो उनके पक्षपातपूर्ण रूप से कार्य करने की अधिक संभावना रहती है। अतः ऐसे अधिकारियों पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। उन्हें ऐसे कर्तव्यों पर नहीं रखा जाना चाहिए जहां वे अपने पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित कर सकें।

अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की भर्ती करके पुलिस बल की संरचना को बदलना आवश्यक है ताकि इसे प्रतिनिधि और धर्मनिरपेक्ष बनाया जा सके। एससी / एसटी, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मुद्दों के बारे में उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए


लेखक एस.आर. दारापुरी एक पूर्व आईपीएस अधिकारी और आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

दयानाथ निगमः जिनका झोला ही उनके कार्यालय का पता था

– लेखक- आशाराम जागरथ

‘अम्बेडकर इन इंडिया’ के सम्पादक दयानाथ निगम अब हमारे बीच नहीं हैं। बाईपास सर्जरी करवा चुके निगम जी डायबटीज के भी मरीज थे। पिछले दिनों उनकी तबियत खराब हुई तो परिजनों ने लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भरती कराने का प्रयास किया जहाँ उनका रैपिड टेस्ट हुआ और वे कोरोना पॉजिटिव पाए गये। कहा जाता है कि मौजूद स्वास्थ्य व्यवस्था में उन्हें जगह नहीं मिल पाई और वे 04 सितम्बर, 2020 की शाम को निर्वाण को प्राप्त हो गये।

 तथागत गौतम बुद्ध की निर्वाण भूमि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर (तमकुही राज) में 10 फरवरी, 1950 को जन्मे दयानाथ निगम जी की स्कूली शिक्षा केवल मीडिल क्लास तक थी। लेकिन कम शिक्षा उनके मिशन में कोई अवरोध नहीं बन पाई। वे शोषितों-वंचितों, दलितों-पिछड़ों की आवाज बने। उन्होंने पत्रिकारिता के क्षेत्र को चुना और दलित पत्रकारिता में एक मुकाम हासिल किया। 1968 में अर्जक संघ की स्थापना की बाद निगम जी राम स्वरूप वर्मा के संपर्क में आये और उनके निकट सहयोगी बने। इसके बाद ही वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। वे अर्जक संघ के साप्ताहिक मुखपत्र में नियमित लिखते रहे। 1980 में ‘चेतना’ नाम से और 1981 में ‘क्रांति’ के नाम से निगम जी ने दस्तावेजी स्मारिकाएं निकालीं। पत्रकारिता के प्रति अपने प्रतिबद्ध सरोकारों और उसूलों के कारण वे हमेशा बेचैन रहते थे और इसी बेचैनी के तहत अंततः 14 अप्रैल 1999 ‘अम्बेडकर इन इंडिया’ मासिक पत्रिका शुरू की जो अम्बेडकरवादी मिशन की प्रमुख आवाज बनी जो बिना सरकारी विज्ञापनों के अनवरत प्रकाशित हो रही है। निगम जी ने अपने सम्पादनकाल में उसके कई विशेषांक निकाले जिनमें मुद्राराक्षस के सम्पादन में एक विशेषांक ‘ये तुम्हारा इतिहास, ये हमारा इतिहास’ काफी चर्चित रहा।

निगम जी ने कुछ दिनों तक गोरखपुर से प्रकाशित एक दैनिक में भी सांस्कृतिक गतिविधियों के संवाददाता के रूप में  काम किया। बताते चलें कि निगम जी रंगमंच के कलाकार भी थे। अर्जक संघ द्वारा आयोजित नाटकों में वे रोल अदा किया करते थे। वह एक अखबार से जुड़े थे। एक बार वह उस अखबार के सम्पादक जो एक ब्राहमण थे, के घर पर बैठे थे। संम्पादक जी हिन्दू धर्म में व्याप्त छूतछात पर ज्ञान बाँट रहे थे। पीने के लिये चाय आई। एक कांच के गिलास में, दूसरा पीतल के गिलास में। निगम जी ने जाने-अनजाने में पीतल का गिलास उठा लिया और चाय पीने लगे। सम्पादक जी के प्रवचन का स्वर बदल गया। निगम जी ने उनसे भी चाय पीने को कहा परन्तु सम्पादक महोदय ने कांच के गिलास को छुआ भी नहीं। निगम जी द्वारा चाय पीने के लिए बार-बार आग्रह करने पर सम्पादक महोदय झल्ला गये और बोले, “तुमने हमारा वाला गिलास जूठा कर दिया। अब ये गिलास मेरे किसी काम का नहीं। तुम इस गिलास को लेते जाओ।” बताते हैं कि निगम जी पीतल का गिलास तो ले आये, लेकिन संवाददाता की नौकरी वहीं छोड़ आये।

  ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका के पूर्व सम्पादक सुरेश उजाला उन्हें याद करते हुये कहते हैं कि हम दोनों को राम स्वरूप वर्मा का सानिध्य प्राप्त था। निगम जी लखनऊ के अर्जक कार्यालय में झोला टाँगे आते थे और अपने मिलनसार प्रवृत्ति तथा मृदुल स्वभाव के कारण सभी के चहेते थे। बचपन से ही समाज सेवा उनका लक्ष्य था। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नकले तो अपने तरुणाई में आरएसएस की शाखा में पहुँच गये। परन्तु रामस्वरूप वर्मा के प्रभाव में उन्होंने जान लिया कि दलित-वंचित और पिछड़े समाज के लिये आरएसएस के झोले में कुछ भी नहीं है। अत: उन्होंने अर्जक संघ का झोला टांग लिया। बाद में वे अर्जक संघ से विलग जरूर हुये किन्तु झोला अंत तक टंगा ही रहा। लोग जब उनसे पूछते थे कि अम्बेडकर इन इंडिया का कार्यालय कहाँ है तो उनका जवाब होता कि यही झोला ही पत्रिका का कार्यालय है।

 हमारी रचना, काव्य ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ में अवधी समाज की प्रतिविम्बित विसंगतियों में दयानाथ निगम जी भोगा हुआ यथार्थ भी सम्मिलित है। नीचे दी गई अवधी कवितई की कथा तो रूपांतरित है किन्तु कथा का मूल पाठ गड्ढे में परोसा भोजन है जो निगम जी के बचपन का वो सच था जिसने उन्हें समाज से भेदभाव समाप्त करने के लिए उद्देलित किया- कसि कै दाँते काटी रोटी, दुई छूत – अछूत रहे साथी हे नीम ! छाँह मा तोहरे हम, खीसा सच बइठ सुने बाटी

 ‘मितऊ’ कै बैल तुराइ गवा, ‘छुतऊ’ साथे हेरै निकरे हेरत – हेरत संझा होइगै, घर लौटे बैल दुवौ पकरे ‘मितऊ’ बोले कि रुकि जात्या, कहवाँ जाब्या यहि राती मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा

 राती जब खाना खाय क् भवा, यक बड़ा अड़ंगा बाझि गवा टुटहा ज़स्ता वाला बरतन, पिछवारे कहूँ लुकाय गवा घर-मलकिन बोलीं काव करी, बनये हम हई दाल–रोटी उप्पर से दलियौ पातर बा, केरा कै पाता ना रोकी

हम कहत रहेन कि जाइ दियौ, तोहरे सब रोकि लिह्यौ वोकां यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा चुप रहौ कतौ ना करौ फ़िकर, अब्बै जुगाड़ कुछ करिबै हम बोले बुढ़ऊ बाबा अहीर, बुद्धी मा अबहूँ बा दमख़म

 फँड़ियाय कै धोती खटिया से, उतरे लइकै लमका खुरपा तनिका वहरी से पकरि लियौ, घुसकाइब ई छोटका तख्ता खोदिन यक बित्ता गड़हा वै, मड़हा के कोने भूईं मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा 

केरा कै पाता दोहरियाय, गड़हा मा हौले से दबाय तइयार अजूबा भै बरतन, बोले अब मजे से लियौ खाय वै रहे भुखान सवेरवैं कै, भुन भुनभुनाय मन्ने बोलिन इज्ज़त-बेलज्ज़त भूलि गये, मूड़ी नवाय बस खाय लिहिन 

‘मितऊ’ बोले बहिरे निकरा , ल्या पानी पिया अँजूरी मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा भिनसारे उठिकै लगे चलै, भैं’सिया खड़ी अफनात रही पितरी के बड़े ‘पराते’ मा, बसियान खाब ऊ खात रही

फिरु नज़र परी दालानी मा, वै आँख फारि कै देखअ थैं कानी कुतिया मल्लही येक, थरिया कै बारी चाटअ थै ना दुआ-बंदगी केहू से, चुपचाप चलि गये चुप्पे मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा

 निगम जी शोषित समाज दल तथा दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा) से विधानसभा का चुनाव भी लड़े लेकिन हार गये थे। बहुजन समाज पार्टी से भी उनका जुड़ाव रहा, परन्तु पत्रिका वे अपने मित्रों-सहयोगियों के सहारे ही निकालते थे। उनका कहना था कि साधारण इच्छुक लोग पत्रिका खरीदते भी हैं और पढ़ते भी हैं परन्तु साधन संपन्न लोग न पत्रिका खरीदते हैं और न पढ़ते हैं, हाँ, कुछ लोग सहयोग अवश्य कर देते हैं।

बेरोजगारी के खिलाफ देश भर में उठती आवाजें और मोदी पर हल्ला बोल

बेरोजगारी के खिलाफ देश भर में उठती आवाजें और मोदी पर हल्ला बोलबेरोज़गारी को लेकर पूरे देश में कई हलक़ों से आवाज़ें उठती रही हैं। बुधवार यानी 9 सितंबर को इसे लेकर रात 9 बजे 9 मिनट कैंपेन चलाया गया। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों में लाखों युवाओं ने अपने घरों में अंधेरा कर और मोमबत्ती जलाकर मोदी सरकार का विरोध किया। ये युवा ऐसा कर बेरोजगारी के खिलाफ मोदी सरकार का विरोध कर रहे थे। युवाओं का गुस्सा इस बात को लेकर था कि हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा कर मोदी सरकार मुकर गई है।

बेरोजगारी के खिलाफ इस आंदोलन को कई विपक्षी दलों का भी समर्थन मिला। महत्वपूर्ण बात यह रही कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्विटर पर #9बजे9मिनट टॉप ट्रेंड में रहा। देश भर के लाखों युवाओं और कई विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे लेकर ट्वीट करना शुरू कर दिया। यह हैशटैग कंगना रनौत को पीछे छोड़ते हुए टॉप ट्रेंड पर जा पहुँचा। बुधवार रात 11 बजे तक इस हैशटैग के साथ 10 लाख से ज़्यादा ट्विट किए जा चुके थे। सोशल मीडिया पर लोग तस्वीरों और पोस्ट के साथ इस हैशटैग का इस्तेमाल कर रहे थे। हजारों सोशल मीडिया यूजर ने अपने हाथों में मोमबत्ती लेकर तस्वीरें भी शेयर की।

सपा नेता अखिलेश यादव और राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी मोमबत्ती जलाकर युवाओं का साथ दिया। बिहार में तेजस्वी यादव ने अपनी मां और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के साथ इसको समर्थन किया तो यूपी में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्नी डिंपल यादव के साथ मोमबत्ती जलाई और युवाओं का समर्थन किया। अखिलेश यादव ने इसकी तस्वीर साझा करते हुए ट्विट किया।

आज आनेवाले कल के बदलाव का इतिहास लिख दिया सियासत के आसमान पर रोशनी से इंक़लाब लिख दिया।

आज युवाओं ने भाजपा के शासनकाल की उल्टी गिनती की शुरूआत कर दी है। हमने नौजवानों की ख़ातिर मोमबत्तियाँ जलाकर हमेशा की तरह आज भी उनका साथ दिया है और देते रहेंगे।

तो वहीं बेरोजगारी के विरोध में प्रदर्शन करते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और राबड़ी देवी ने लालटेन जलाई। RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “सबसे ज्यादा युवाओं की आबादी बिहार में है लेकिन हकीकत में बिहार बेरोजगारी का केंद्र बन चुका है।”

खास बात यह रही कि देश के तमाम हिस्सों से युवाओं ने रोजगार की मांग को लेकर अपनी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इसे देखते हुए साफ है कि बेरोजगारी को लेकर देश का युवा वर्ग पीएम मोदी की गोल-मोल बातों में अब और आने वाला नहीं है। युवाओं के गुस्से को देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में भाजपा सरकार के खिलाफ यह आंदोलन और बड़ा हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में पिछले कुछ सालों के दौरान 21 मिलियन नौकरियां गई हैं। बिहार में तो राजद ने बेरोजगारी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है।

 

पितृ पक्ष और अनात्मावादी चार्वाक का तर्क

अगर ब्राह्मण को यहाँ पर खिलाया हुआ भोजन पितरों को पितृ लोक में पहुँच सकता है तो फिर एक यात्री को लम्बी यात्रा पर चलने से एक दिन पहले ब्राह्मण को बुला उतने दिनों का भोजन ठूंस ठूंस कर खिला देना चाहिए जितने दिन उसे यात्रा में लगने हैं। फिर उसे अपने साथ कोई भी राशन आदि लेकर चलने की ज़रुरत नहीं रहेगी।.. पढ़िए पितृ पक्ष के बारे में क्या कहते थे चार्वाक…


आज से पितृ पक्ष शुरू हो गया है। हिन्दू धर्म के मुताबिक इसमें पितरों यानी पूर्वजों के लिए पिंड दान किया जाता है। पितृ पक्ष के पीछे एक पौराणिक कथा है जो महाभारत में है। इस के अनुसार कर्ण जिसे महादानी कहा जाता है, के मरने पर जब उसकी आत्मा मृत्युलोक में पहुंची तो उसे वहां पर बहुत सा सोना चांदी तो मिला परन्तु कोई भोजन नहीं मिला। इसका कारण यह था कि कर्ण बहुत दानी था और उसने बहुत सोना चांदी तो दान में दिया था परन्तु कभी भी भोजनदान नहीं किया था। कथा के अनुसार उसने मृत्यु लोक के देवता यमराज से इसका कोई हल निकालने की प्रार्थना की। यमराज की कृपा से कर्ण इस पक्ष में पृथ्वी पर वापस आया। उसने भूखे लोगों को भोजन दान किया और फिर वापस पितृ लोक चला गया जहाँ उसका स्थान था। अतः अन्न दान या भोजन दान इस अनुष्ठान का मुख्य हिस्सा होता है। हिन्दू लोग इन दिनों में कठोर अनुशासन और अनुष्ठान करते हैं। इस पक्ष में लोग दाढ़ी नहीं बनाते और कोई आमोद प्रमोद नहीं करते। इस पक्ष में कोई खरीददारी नहीं की जाती और कोई धंधा शुरू नहीं किया जाता है। इसमें ब्राह्मणों को भोजन दान किया जाता है। इसके पीछे यह भी विश्वास है कि पृथ्वी पर किया गया भोजन दान पितरों तक पहुंचता है और उन की तृप्ति होती है। ऐसा विश्वास है इस पक्ष में किये गए अनुष्ठान से पूर्वजों की बिछड़ी हुयी आत्माओं को शांति मिलती है। इस के बदले में वे पिंडदान करने वालों को आशीर्वाद देती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन पितरों के लिए पिंडदान या श्राद्ध नहीं किया जाता उन्हें मृत्यु लोक में ठौर नहीं मिलता या उनकी गति नहीं होती और वे पृथ्वी पर इधर उधर भटकती रहती हैं। इस पक्ष में अपनों की बिछड़ी हुयी आत्माओं को याद किया जाता है और उनके लिए प्रार्थना की जाती है। इसीलिए इस पक्ष में कड़े अनुष्ठान और कर्म कांड का अनुपालन किया जाता है।

श्राद्ध और पिंडदान के बारे में शुरू से ही बहुत अलग अलग विचार रहे हैं। कुछ लोग इसे पितरों की तृप्ति के लिए आवश्यक मानते हैं और कुछ इसे ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बहाना मात्र। इस सम्बन्ध में चार्वाक जो कि अनात्मवादी थे, द्वारा की गयी आलोचना बहुत सशक्त है। चार्वाक जिसे ब्राह्मणों ने भोगवादी कह कर निन्दित किया था ने कहा है: “मरने के बाद सब कुछ ख़त्म हो जाता है और कुछ भी शेष नहीं बचता। पिंडदान और श्राद्ध ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बनाया गया ढकोसला है।” चार्वाक ने आगे कहा,” अगर ब्राह्मण को यहाँ पर खिलाया हुआ भोजन पितरों को पितृ लोक में पहुँच सकता है तो फिर एक यात्री को लम्बी यात्रा पर चलने से एक दिन पहले ब्राह्मण को बुला उतने दिनों का भोजन ठूंस ठूंस कर खिला देना चाहिए जितने दिन उसे यात्रा में लगने हैं। फिर उसे अपने साथ कोई भी राशन आदि लेकर चलने की ज़रुरत नहीं रहेगी। रास्ते में जब उसे भूख लगे तो उस ब्राह्मण को याद कर ले जिससे उस को खिलाया गया भोजन उस यात्री के पेट में स्वतः आ जायेगा।”

यह ज्ञातव्य है कि प्राचीन काल में सभी यात्राएं पैदल ही होती थीं और लोग अपना राशन पानी सर पर लेकर चलते थे और रास्ते में रुक कर अपना भोजन खुद बनाते थे क्योंकि दूसरों के हाथ का बना भोजन खाने से ‘जात’ (जाति) जाने का डर रहता था। नेपाल में तो जहाँ तक था कि अगर किसी उच्च जाति हिन्दू को बाहर जाकर अपनी जात से नीची जात वाले के हाथ का भोजन खाना पड़ जाये तो उस की जात चली जाती थी और वह अपने घर सीधा नहीं जा सकता था क्योंकि उसकी पत्नी उसे चौके में नहीं चढ़ने देती थी। इसलिए उसे घर जाने से पहले पुलिस के पास जाना पड़ता था और वहां पर जात जाने के कारण अर्थ दंड जमा करना पड़ता था और उस का प्रमाण पत्र लेकर ही वह अपने घर में जा सकता था। अब जहाँ तक अपने पूर्वजों को याद करने की बात है इस में कुछ भी आपतिजनक नहीं है परन्तु पितरों के नाम पर केवल ब्राह्मणों को ही खिलाना बहुत अर्थपूर्ण नहीं लगता। हाँ, अगर उन लोगों को खिलाया जाये जो भूखे नंगे हैं और अपना जीवनयापन खुद नहीं कर सकते हैं तो यह कल्याणकारी है। बुद्ध ने दान को बहुत महत्व दिया है क्योंकि संसार में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो अपनी आजीवका खुद नहीं कमा सकते। अतः जो सक्षम हैं उन्हें अपनी कमाई में से उन लोगों के लिए मानवीय आधार पर दान अवश्य देना चाहिए। दान के सम्बन्ध में बुद्ध ने आगे स्पष्ट किया है कि दान केवल सुपात्र को देना चाहिए कुपात्र को नहीं अर्थात दान उसे ही देना चाहिए जिसे उसकी ज़रुरत है। परन्तु देखा गया है कि अधिकतर दान अंध श्रद्धावश कुपात्रों को दिया जाता है सुपात्रों को नहीं। यह दान की मूल भावना के विपरीत है। क्या श्राद्ध और पिंडदान में कुछ ऐसा ही तो नहीं है?

दयानाथ निगम जी के साथ अम्बेडकरी आंदोलन का एक हिस्सा चला गया

पिछले महीने ही हमारी बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि माननीय राम स्वरूप वर्मा जी से इनका काफी नाता रहा है। अगस्त महीने में ही वर्मा जी की जयंती और परिनिर्वाण दोनो आता है। मैंने आग्रह किया कि आप एक लेख लिख दीजिये। उन्होंने लिखा, दलित दस्तक में छपा। 01 अगस्त को फोन आया कि लेख पढ़ कर बहुत फोन आ रहा है। मुझे भी पत्रिका भेज दीजिये। मैंने आज ही पत्रिका पोस्ट किया उनको और शाम को सूचना मिली कि दयानाथ निगम जी (संपादक, अम्बेडकर इन इंडिया) नहीं रहे। बड़ा झटका लगा। 31 जनवरी 2020 को दिल्ली में “मूकनायक के 100 साल: अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल” कार्यक्रम में हमने दयानाथ निगम जी को “मान्यवर कांशीराम पत्रकारिता सम्मान” से सम्मानित किया था। (नीचे लगी तस्वीर उसी कार्यक्रम की है।) इतना बुजुर्ग होने के बावजूद वो अक्सर दिल्ली में आयोजित तमाम कार्यक्रमों में मिल जाते थे। “कैसे हैं संपादक जी,” ऐसे ही संबोधित करते। मैं कहता, “आप बड़े हैं, सिर्फ अशोक बोला करिये।” हँस कर कहते अरे आप बड़े संपादक हैं। हमने आज एक जिंदादिल इंसान, बाबासाहेब का सच्चा सिपाही खो दिया। वो बहुत कम पढ़े थे, लेकिन बाबासाहेब के मिशन को लोगों तक पहुंचाने के लिए पत्रकारिता की राह चुनी। और आखिरी दम तक इस काम को करते रहे।

निगम जी का परिनिर्वाण कोरोना से हुआ बताया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिद्धार्थ रामू ने अपने फेसबुक पोस्ट पर इसकी सूचना दी है। डॉ. सिद्धार्थ ने लिखा है-

शांति स्वरूप बौद्ध के बाद एक और महान आंबेडकरवादी सरकारी दुर्व्यवस्था का शिकार हो कोरोना की बलि चढ़ गया।  पूर्व मंडालायुक्त और सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता हरिशचंद्र जी से यह मर्माहत करने वाली सूचना मिली कि अंबेडकर इन इंडिया के संपादक दयानाथ निगम हमेशा-हमेशा के लिए हम सब को छोड़कर चले गए। वे लखनऊ में रहते रह रहे थे। यह स्वाभाविक मौत नहीं हुई है। वे उत्तर प्रदेश की बदत्तर स्वास्थ्य व्यवस्था और योगी आदित्यनाथ की सरकार की लापरवाही के शिकार हुए हैं। कल शाम से ही उनकी स्थिति खराब होने लगी थी। परिजनों ने अस्पताल में भर्ती कराने के लिए प्रयास किया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि पहले कोरोना टेस्ट कराइए, फिर भर्ती लेंगे। पूरी रात परिजन भर्ती के लिए प्रयास करते रहे, लेकिन किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हो पाए। लखनऊ में रह रहे पूर्व मंडालायुक्त हरिशचंद्र जी ने एडीएम से भी बात किया, लेकिन फिर भी उन्हें भर्ती के लिए अस्पताल में जगह नहीं मिल पाई। हरिशचंद्र जी के प्रयासों से आज उनका रैपिड़ टेस्ट हुआ, जिसमें कोरोना पाजटिव पाए गए। उसके बाद भी उन्हें किसी अस्पताल में जगह नहीं मिली। रात से ही उनका आक्सीजन लेबल गिरता जा रहा था। आखिरकार कुछ घंटों पहले (4 अगस्त की शाम) असमय वे हम लोगों को छोड़ हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।

वे पिछले 20 से अधिक वर्षों से निरंतर अंबेडकर इन इंडिया निकाल रहे थे। दयानाथ निगम जी एक प्रतिबद्ध आंबेडकरवादी मिशनरी थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दलित-बहुजनों के लिए समर्पित कर दिया था। चुपचाप निरंतर प्रसिद्धि की ख्वाहिश से दूर दयानाथ निगम जी बहुजन नवजागरण के लिए कार्य करते रहे। प्रसिद्ध आंबेडकरवादी शांतिस्वरूप बौद्ध के बाद दयानाथ निगम जी का जाना आंबेडकरवादी आंदोलन और मिशन की अपूरणीय क्षति है।

निगम जी को याद करके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। वे मेरे शिक्षक और गार्जियन दोनों थे। वे उन लोगों में थे, जिन्होंने मुझे असीम प्यार और स्नेह दिया। गाहे-बगाहे सुख-दुख पूछते रहते थे। निगम जी मैं अंतिम समय भी आपके किसी काम नहीं आ सका, इसका दर्द सताता रहेगा। लेकिन जिस व्यवस्था और योगी सरकार की लापरवाही के आप शिकार हुए, उसकी कब्र खोदने में मैं कोेई कसर नहीं छोडूंगा।

मैंने जिस पुलिस में नौकरी की और जिस पुलिस से मेरा सामना हुआ

लेखकः एस.आर दारापुरी आइपीएस (से.नि.) मैं उत्तर प्रदेश का 1972 बैच का आइपीएस अधिकारी हूं। 2003 में आई.जी. (पुलिस) के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं मानवाधिकार, दलित अधिकार, आरटीआई, वन अधिकार अधिनियम, भोजन और शिक्षा का अधिकार आदि मुद्दों पर सक्रिय रहा हूं। मैं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, उत्तर प्रदेश का उपाध्यक्ष हूँ। मैं पूर्व में राष्ट्रीय अनुसूचि4 और 2019 में रॉबर्ट्सगंज (यूपी) निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा है। हमारा मुख्य काम उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जिलों के दलितों, आदिवासियों, किसानों और ठेका मजदूरों के बीच है। एक पार्टी के रूप में हमने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएएत जाति आयोग का सलाहकार रहा हूं। वर्तमान में मैं आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का राष्ट्रीय प्रवक्ता हूं। मैंने 201) का विरोध किया। हम मानते हैं कि वे भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के खिलाफ हैं। हमने 19 दिसंबर 2019 को लखनऊ में सीएए का शांतिपूर्ण विरोध करने का फैसला किया था।

पिछले साल 19 दिसंबर की सुबह, जब मैं अपने घर से पार्क जाने के लिए निकला था, मैंने एक पुलिसवाले को गेट के बाहर खड़ा देखा। उसने मुझे बताया कि उसकी डयूटी मेरे घर पर मेरे पर नज़र रखना था। इसके तुरंत बाद एक पुलिस वाहन कई पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचा। दो घंटे के बाद, पुलिस जीप चली गई लेकिन पुलिसकर्मी शाम 5 बजे तक रहे। मैं बिना किसी कारण घर में नजरबंद था। मैंने घर पर दोपहर में अपने निरुद्ध किये जाने के बारे में एक फेसबुक पोस्ट डाला, जब मुझे पता चला कि विरोध स्थल पर हिंसा हुई है, तो मैंने पोस्ट को अपडेट किया और हिंसा की निंदा की। अगली सुबह 20 दिसंबर को दोपहर से कुछ देर पहले, सर्किल ऑफिसर गाजीपुर दीपक कुमार सिंह और इंस्पेक्टर विजय सिंह कई पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचे और मुझे अपने साथ गाजीपुर पुलिस स्टेशन चलने को कहा। मैंने उससे पूछा कि क्या वह मुझे गिरफ्तार कर रहा है। उसने जवाब दिया कि मुझे पुलिस स्टेशन ले जाना है। मैंने सोचा कि यह 151 Cr.P.C के तहत निवारक गिरफ्तारी होगी और मैं शाम को मुक्त हो जाऊंगा

पुलिस स्टेशन में मुझे किसी से मिलने या बात करने की अनुमति नहीं थी। जब मेरी पत्नी ने फोन किया, तो उसे बताया गया कि मैं वहां नहीं था। उसने घबराकर लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को व्हाट्सएप संदेश भेजे और एक फेसबुक पोस्ट डालते हुए कहा कि वर्दी में कुछ लोग मुझे उठा कर ले गए थे, लेकिन मेरे ठिकाने का पता नहीं था। शाम लगभग 5.30 बजे मुझे जीप से हजरतगंज पुलिस स्टेशन ले जाया गया। मैंने इंस्पेक्टर धीरेंद्र प्रताप से पूछा कि क्या मेरी गिरफ्तारी हुई है। उन्होंने मुझे चिढ़ाते हुए कहा, “हाँ, अब तक 39 को गिरफ्तार कर लिया गया है और आप 40वें हैं।”

लगभग 8 बजे एक सब-इंस्पेक्टर ने मुझे सूचित किया कि मुझे रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना है। मैंने तब मांग की कि मुझे अपने वकील को बुलाने की अनुमति दी जाए। लेकिन मेरे वकील को बुलाने की अनुमति से इनकार कर दिया गया और मुझे रिमांड मजिस्ट्रेट के रिवर बैंक कॉलोनी में निवास पर ले जाया गया। मुझे बाहर इंतजार करने के लिए कहा गया था, लेकिन मैं रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने जबरन पेश हो गया और उन्हें सूचित किया कि पिछले दिन की हिंसा के दिन, मैं सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक अवैध रूप से घर में नजरबंद था और मैं अपने घर से बाहर नहीं गया था। मुझे आज सुबह 11.45 बजे घर से उठाया गया था और रात 8 बजे के बाद पेश किया जा रहा था।

रिमांड मजिस्ट्रेट द्वारा मेरे खिलाफ लगाए गए आरोप के बारे में पूछे जाने पर, एसआई ने जवाब दिया कि मुझ पर धारा 120 बी आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए थे। हम दोनों को सुनने के बाद, मजिस्ट्रेट ने जेल रिमांड देने से इनकार कर दिया, एसआई को फटकार लगाई और कहा कि वह निर्दोष लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए उसकी रिपोर्ट करेगा। उन्होंने कागज की एक शीट पर लिखना शुरू किया और कुछ समय बाद मुझे बाहर इंतजार करने के लिए कहा गया। इसके तुरंत बाद इंस्पेक्टर हजरतगंज, धीरेन्द्र प्रताप कुशवाहा पहुंचे और मजिस्ट्रेट से बात करने के लिए अंदर गए। वह लंबे समय तक वहां थे लेकिन जाहिर तौर पर मुझे जेल भेजने के लिए मजिस्ट्रेट को मनाने में सफल नहीं हुए।

आधी रात के करीब थी जब हम हजरतगंज थाने लौटे। मेरे हैरानी की कोई हद न रही जब मैंने देखा कि केस डायरी में उन्होंने दर्ज किया था कि रिमांड मजिस्ट्रेट अस्वस्थ होने के कारण घर पर उपलब्ध नहीं था और इसलिए जेल रिमांड नहीं प्राप्त किया जा सका। केस डायरी में यह भी गलत उल्लेख किया गया है कि मुझे शाम 5.40 बजे महानगर के एक पार्क से गिरफ्तार किया गया था, जबकि मुझे सुबह 11.45 बजे मेरे घर से ले जाया गया था। सर्द रात थी। लखनऊ में दिसंबर में कड़ाके की ठंड पड़ती है। लेकिन जब मैंने एक कंबल मांगा, तो पुलिसकर्मियों ने मुझे बताया कि उन्हें लखनऊ एसएसपी कलानिधि नैथानी और इंस्पेक्टर हजरतगंज के निर्देश थे कि मुझे कोई कंबल नहीं दिया जाना चाहिए। हालाँकि मैंने मुंशी से मोबाइल को लेकर घर पर फोन किया था, अपने बेटे को मैंने जैकेट, कंबल और टोपी लाने के लिए कहा। लगभग 2 बजे मेरा बेटा आया और उसने कबूल किया कि जब वह दिन में थाने में आया था तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार करने की धमकी दी थी। 21 दिसंबर को, मुझे हज़रतगंज थाने में शाम 5.30 बजे तक हिरासत में रखा गया और जेल की वैन में जेल ले जाया गया। मुझे शाम 7 बजे के आसपास रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मैंने पिछले मैजिस्ट्रेट को जो बताया था उसे दोहराया। लेकिन इस सज्जन ने कोई ध्यान नहीं दिया और मेरे 14 दिनों के जेल रिमांड पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने कृपापूर्वक मुझसे कहा, “आपने खुद पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। निश्चित रूप से आप जानते होंगे कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है।” मैं लगभग 09.30 बजे जेल की बैरक में पहुँच गया।

मैंने अपना नाश्ता तब नहीं किया था जब पुलिस ने मुझे 20 दिसंबर को घर से उठाया था, लेकिन जेल में पहुंचने तक मुझे पुलिस द्वारा कोई खाना नहीं दिया गया था। जेल में भी मुझे 21 दिसंबर की रात को कोई खाना नहीं मिला, क्योंकि देर हो चुकी थी। हैरानी की बात यह है कि जांचकर्ता सब-इंस्पेक्टर, हजरतगंज ने मेरा बयान धारा 161 सीआरपीसी में किसी भी स्तर पर दर्ज नहीं किया, लेकिन इसे खुद ही अपने मन से लिख लिया।

मैंने 19 दिसंबर, 2019 को अपने घर से बाहर कदम नहीं रखा था, लेकिन तब भी हजरतगंज पुलिस स्टेशन के केस नंबर 600/2019 में आरोप लगाया गया है, जो कि 147/148/9/152/307/323/504/506/332, 188/435/436/120 बी, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम -7 दिनांक 19/12/19 का है। मेरा नाम एफआईआर में नहीं था, लेकिन फिर भी मुझे झूठा फंसाया गया, गिरफ्तार किया गया और 3 सप्ताह के लिए जेल भेज दिया गया। चूंकि मैं पूरी तरह से निर्दोष था और पुलिस मेरे खिलाफ अदालत में कोई सबूत पेश करने में विफल रही, इसलिए मुझे 7/1/2020 को जमानत पर रिहा कर दिया गया। अब अदालत में एक आरोप पत्र दायर किया गया है जिसमें मुझे हिंसा भड़काने की साजिश का मास्टर माइंड बताया गया है।

आप देख सकते हैं कि 19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था लेकिन फिर भी मेरे खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के कारण मुझे फंसाया गया है। जैसा कि आपने सुना होगा कि योगी सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए हमारे नाम और पते और क्षति पूर्ती के लिए हमारे पोस्टर / होर्डिंग्स लगा दिए थे। इसने हमें न केवल बदनाम करने, बल्कि व्यक्तिगत हमलों के लिए भी प्रचारित किया है। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने योगी सरकार को अवैध रूप से लगाए गए होर्डिंग्स को हटाने का निर्देश दिया, लेकिन राज्य ने उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ कोई स्टे प्राप्त न हुए बिना भी इसका पालन करने से इनकार कर दिया। मार्च में मुझे रुo 64 लाख की रिकवरी का नोटिस दिया गया जबकि अब तक मेरा अपराध किसी भी अदालत में साबित नहीं हुआ है। मैंने मार्च के महीने में वसूली नोटिस के स्टे के लिए इलाहाबाद की लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर की थी लेकिन कई तारीखों के बाद भी अब तक कोई आदेश नहीं दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि तहसीलदार सदर, लखनऊ द्वारा जारी किया गया रिकवरी नोटिस अवैध है क्योंकि यह जिस धारा 143 (3) के तहत जारी किया गया है वह यूपी राजस्व संहिता में मौजूद ही नहीं है। इस बीच, राजस्व अधिकारी मेरे घर पर छापा मार रहे हैं, मेरी गिरफ्तारी और मेरी घर की संपत्ति को जब्त करने की धमकी दे रहे हैं।

राज्य की इस उदंडता और गैरकानूनी कार्रवाई ने न केवल मुझे बल्कि मेरे परिवार को भी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी है। 74 साल की मेरी पत्नी कई बीमारियों (लिवर सिरोसिस, हार्ट प्रॉब्लम, अस्थमा और डायबिटीज) से पीड़ित है और बिस्तर पर पड़ी है। जब मैं जेल में था तब प्रियंका गांधी ने उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करने के लिए मेरे घर आने के लिए बहुत परेशानी झेली। इस दया के इस कार्य के लिए मैं उनका आभारी हूं। मेरा पोता और पोती जो सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं, बहुत परेशान हो चुके हैं। लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा पूरा परिवार चट्टान की तरह मेरे पीछे खड़ा है। जैसा कि मुझे लगता है कि मैं इस तरह के उतार-चढ़ाव के लिए पहले से ही बहुत अधिक मज़बूत हूं और मैंने पूरी ताकत के साथ काम करना जारी रखा है।

ऊपरोक्त उदाहरण से आप देख सकते हैं कि अगर पुलिस 32 साल तक भारतीय पुलिस सेवा में रहे किसी व्यक्ति के साथ ऐसी ज्यादती और अवैधता में लिप्त हो सकती है, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि वे एक सामान्य व्यक्ति के साथ क्या कर सकते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत अब एक पुलिस राज्य है जिसमें अंधाधुंध और मनमाने ढंग से गिरफ्तारियां और हिरासत में रखा जा रहा है। पुलिस जो कहती है वह ही कानून है। तथ्य अब मायने नहीं रखते। यह एक फासीवादी राज्य का पूर्वभास है जो भाजपा के शासन में तेजी से उभर रहा है।

Film on Phule-Ambedkar thoughts goes for crowdfunding

Written By- Shailesh Narwade

Jayanti – a film on the anti-caste ideas of Jotiba Phule, Chhatrapati Shahu Maharaj and Dr B R Ambedkar – has started crowdfunding on Crowdera to seek people’s support for its completion. The film is about a youth’s reformation journey. It’s shooting and editing has been completed and the makers are going to start its post-production in September 2020.

Jayanti’s writer-director Shailesh Narwade said,”It is difficultfor an independent filmmaker to find a producer for such kind of films. And it becomes tougher especially when the film talks about caste.”

The project was rolled out in October 2019 after a few like-minded friends decided to fund it. This two-hour feature film in Marathi, with English subtitles, was slated to release in April 2020 but late funding had delayed its shooting early this year. And then the lockdown brought the work to a complete halt. The team is now gearing up to take the project to its completion.

“There is a huge gap of this kind of content. Only a few filmmaker are making such films. We met several people, who liked the projectbut not all of them are capable of funding it. We need support from like-minded people in India and abroad,” Shailesh added.

To its advantage, the film is not on paper. A team of experts and celebrities is involved with this ambitious film. Internationally acclaimed music director Mangesh Dhakde, lyricist Guru Thakur, singer Javed Ali, cinematographer Yogesh Koli, sound recordist Ashish Shinde and makeup designer Santosh Gilbile are part of this project. Well-known actors such as Milind Shinde, Kishor Kadam, Paddy Kamble, Anjali Joglekar and Amar Upadhyay have played the lead roles.

“Half of the journey has already been completed. Now we want to reach the destination,” said Shailesh, who is a former media professional. He is also a playwright, whose recent Hindi play ‘Maseeha’ was invited to IPTA’s national festival in October 2018. His another Marathi film ‘Roommates’ – a crime thriller – will soon be available on an OTT platform.

Veteran filmmaker Shyam Benegal’s ‘Manthan’ was the best example of crowdfunded film in India. Bollywood filmmaker Rajat Kapoor has also crowdfunded for his next film on Crowdera recently. Filmmaker Jyoti Nisha successfully raised over Rs 20 lakh for her documentary ‘Ambedkar: Then and Now’ on another crowdfunding platform.

Very few filmmakers in India have explored this way of raising funds, though it is a popular platform in the western countries. In India, people are gradually getting accustomed to this platformalso as some of the creative projectshave successfully raised funds.

The makers of Jayantiare crowdfunding for Rs 1.5 crore. They immediately need Rs 60 lakh to complete post-production and to pay for the expenses already incurred on production. Remaining funds will be used for distribution. The campaign on gocrowdera.comhas so far raised around Rs 9.5 lakh.

“We should support the films that wereally want to see. People are contributing forJayanti because of its content, while some are finding it as an opportunity to Payback to Society. We are hopeful that more people will come forward to make this film a reality,” Shailesh concluded.

You can contribute to this film on: www.gocrowdera.com/jayantiafilm

You can write to film’s writer-director Shailesh Narwade on sbnarwade@gmail.com

जनहित में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रिटायर कर दिया जाना चाहिए

Written by- डॉ. सिद्धार्थ
केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि अकुशल केंद्रीय कर्मचारियों को 50-55 साल में या 30 साल का सेवाकाल पूरा होने पर जनहित में रिटायर किया जा सकता है। यहां सवाल यह है कि यदि केंद्रीय कर्मचारियों को अकुशल होने पर रिटायर किया जा सकता है, तो प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी चौतरफा अकुशलता के चलते क्यों न रिटायर कर दिया जाए।
नरेंद्र मोदी सभी बुनियादी मुद्दों पर अकुशल साबित हुए हैं, जो निम्न हैं-
1. किसी अर्थव्यवस्था उस देश की रीढ़ होती,क्योंकि उसी से जीवन चलता है यानि उसी से रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, देश की आंतरिक-बाह्य सुरक्षा और अन्य संसाधनों के लिए धन जुटाया जाता है। पिछले वर्षों में मोदी जी अकुशलता के चलते देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो गई है, आम आदमी की कौन कहे, मध्य वर्ग, उच्च मध्यवर्ग और छोटे-मझोले व्यापारियों भी कंगाली और दिवालिएपन की ओर बढ़ रहे हैं। आर्थिक विकास दर नकारात्मक हो गई है, बेरोजागारी सारे आंकड़े रिकार्ड तोड़ रही है। लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं।
आर्थिक मामलों में मोदी जी अकुशलता के साथ सनक का भी परिचय देते रहे हैं, नोटबंदी एक सनक थी, जिसने देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी यानि मोदी जी अर्थव्यवस्था के मामले में अकुशलता के साथ सनकी भी साबित हुए हैं।
2. मोदी कोविड-19 से निपटने के मामले में दुनिया में सबसे बदत्तर साबित हुए हैं, पड़ोसी देश बाग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान भी बेहतर साबित हुए हैं।
3. मोदी जी की विदेश नीति पूरी तरह असफल रही है, चीन ने देश के एक हिस्से पर नियंत्रण कर लिया है, नेपाल से रिश्ते खराब हो चुके हैं, बाग्लादेश भी चीन की तरफ जा रहा है,पाकिस्तान से पहले ही ताना-तानी है।
4. मोदी जी ने देश का सामाजिक-तानाबाना छिन्न-भिन्न कर दिया है, देश को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करके बांट दिया है और चारो तरफ वैमनस्व का बीज बोया है।
तो क्या यह सही नहीं होगा कि यदि अकुशलता के आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों को रिटायर किया जा सकता है, तो देश चलाने के मामले में पूरी तरह अकुशल साबित हुए नरेंद्र मोदी को क्यों न रिटायर कर दिया जाए?