Written By- Ravish Kumar
मैं आज क्यों लिख रहा हूं, अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद क्यों नहीं लिखा? आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला संगीन है लेकिन सिर्फ नाम भर आ जाना काफी नहीं होता है। नाम आया है तो उसकी जांच होनी चाहिए और तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। एक पुराने केस में इस तरह से गिरफ्तारी संदेह पैदा करती है। महाराष्ट्र पुलिस को कोर्ट में या पब्लिक में स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बाद भी इस केस को बंद किया गया था? क्या राजनीतिक दबाव था? तब हम जान सकेंगे कि इस बार राजनीतिक दबाव में ही सही, किसी के साथ इंसाफ़ हो रहा है। अदालतों के कई आदेश हैं। आत्महत्या के लिए उकसाने के ऐसे मामलों में इस तरह से गिरफ्तारी नहीं होती है। कानून के जानकारों ने भी यह बात कही है। इसलिए महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह के कई ठोस कारण बनते हैं। जिस कारण से पुलिस की कार्रवाई को महज़ न्याय दिलाने की कार्रवाई नहीं मानी जा सकती। भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फांसी का फंदा डालने जैसा है। झूठे मामले में फंसाने से लेकर लॉक अप में किसी को मार मार कर मार देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता वसूल लेने और किसी को भी बर्बाद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। पेशेवर जांच और काम में इसका नाम कम ही आता है। इसलिए किसी भी राज्य की पुलिस हो उसकी हर करतूत को संदेह के साथ देखा जाना चाहिए। ताकि भारत की पुलिस ऐसे दुर्गुणों से मुक्त हो सके और वह राजनीतिक दबाव या अन्य लालच के दबाव में किसी निर्दोष को आतंकवाद से लेकर दंगों के आरोप में न फंसाए।
अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। ग़लत नहीं कहा जा रहा है। क्या दिल्ली पुलिस और यूपी की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में हमारी तरह ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। मुझे कुछ होगा तो अर्णब गोस्वामी एक लाइन नहीं बोलेंगे। अगर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ही ग़लत हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर आप भी अर्णब के केस में पुलिस के बर्ताव का सख़्त परीक्षण कीजिए ताकि सिस्टम दबाव और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है। डॉ कफ़ील ख़ान पर अवैध रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा कर छह महीने बंद रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि अवैध रूप से रासुका लगाई गई है। उक्त अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अर्णब गोस्वामी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक ने इस नाइंसाफी पर कुछ नहीं कहा। भारत में किनके राज में प्रेस की स्वतंत्रता अभी खत्म होकर मिट्टी में मिल चुकी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। आपको एक लाख बार बता चुका हूं। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करने वाले मंत्रियों के प्रधानमंत्री ने आज तक एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। बिल्कुल अन्वय नाइक और कुमुद नाइक की आत्महत्या के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। अन्वय नाइक की बेटी की कहानी बेहद मार्मिक है। इस बात की जांच आराम से हो सकती है कि अर्णब गोस्वामी ने अन्वय नाइक से स्टुडियो बनाकर पैसे क्यों नहीं दिए? 80 लाख से ऊपर का काम है तो कुछ न कुछ रसीदी सबूत भी होंगे। अन्वय नाइक की बेटी का कहना सही है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए लेकिन कानून को भी मर्यादा से ऊपर नहीं होना चाहिए। जांच की निष्पक्षता की मर्यादा अहम है। तभी लगेगा कि पारदर्शिता के साथ न्याय हो रहा है। राजनीतिक दबाव में केस का खुलना और केस का बंद होना ठीक नहीं है।
जब एनडीटीवी पर छापे पड़ रहे थे और एक चैनल को डराया जा रहा था तब अर्णब का कैमरा बाहर लगा था और लिंचमैन की तरह कवर किया जा रहा था। उनके कवरेज में एक लाइन प्रेस की स्वतंत्रता पर नहीं थी। उनका रिपोर्टर डॉ. रॉय के घर की दीवार फांदने का प्रयास कर रहा था। बीजेपी के मंत्री प्रवक्ता मेरा बहिष्कार करते हैं। एन डी टी वी की सोनिया वर्मा सिंह ने ट्विट कर अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। एनडीटीवी के अन्य सहयोगियों ने अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। ये फर्क है। जब 2016 में एन डी टी वी इंडिया को बैन किया जा रहा था तब प्रेस क्लब में पत्रकार जुटे थे। आप पूछ सकते हैं कि अर्णब और उनके बचाव में उतरे मंत्री लोग क्या कर रहे थे। जब विपक्ष के नेताओं पर छापे की आड़ में हमले होते हैं अर्णब हमेशा जांच एजेंसियों की साइड लेते हैं। अर्णब ने मोदी सरकार पर क्या सवाल उठाए हैं, बेरोज़गारी से लेकर किसानों के मुद्दे कितने दिखाए गए हैं यह सब दर्शकों को पता है। उल्टा अर्णब गोस्वामी सरकार पर उठाने वालों को नक्सल से लेकर राष्ट्रविरोधी कहते हैं। भीड़ को उकसाते हैं। झूठी और अनर्गल बाते करते हैं। वे कहीं से पत्रकार नहीं हैं। उनका बचाव पत्रकारिता के संदर्भ में करना उनकी तमाम हिंसक और भ्रष्ट हरकतों को सही ठहराना हो जाएगा। अर्णब की पत्रकारिता रेडियो रवांडा का उदाहरण है जिसके उद्घोषक ने भीड़ को उकसा दिया और लाखों लोग मारे गए थे। अर्णब ने कभी भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों का पक्ष नहीं लिया। पिछले चार महीने से अपने न्यूज़ चैनल में जो वो कर रहे हैं उस पर अदालतों की कई टिप्पणियां आ चुकी हैं। तब किसी मंत्री ने क्यों नहीं कहा कि कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है? जबकि मोदी राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को जिनती बार उभारा गया है उतना किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ। हर बात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बताई और दिखाई जाती है।
एक बार अर्णब हाथरस केस में योगी की पुलिस को ललकार कर देख लेते, मुख्यमंत्री योगी को ललकार कर देख लेते जिस तरह से वे मुख्यमंत्री उद्धव को ललकारते हैं तो आपको अंतर पता चल जाता कि कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है। उद्धव ठाकरे ने प्रचुर संयम का परिचय दिया है और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने भी जिनकी एक छवि मारपीट करने वालों की भी रही है। कई हफ्तों से अर्णब बेलगाम पत्रकारिता की हत्या करते हुए हर संवैधानिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा रहे थे। पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्विट किया है कि यूपी में पत्रकारों के खिलाफ 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। क्या अर्णब में साहस है कि वे अब भी योगी सरकार को ललकार दें इस मसले पर। जो आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं वो सीमा की बात करने लगेंगे और अर्णब पर रासुका लगा दी जाएगा डॉ कफील ख़ान की तरह। गौरी लंकेश की हत्या के मामले को अर्णब ने कैसे कवर किया था? या नहीं किया था? द वायर के संस्थापक हैं सिद्धार्थ वरदराजन। अर्णब गोस्वामी सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में क्या क्या कहते रहे हैं आप रिकार्ड निकाल कर देख सकते हैं मगर सिद्धार्थ वरदराजन ने उनकी गिरफ्तारी में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। निंदा की है। उसी तरह से कई ऐसे लोगों ने की है। अर्णब के पक्ष में उतरे बीजेपी की मंत्रियों और समर्थकों की लाचारी देखिए। वे सुना रहे हैं कि कहां गए संविधान की बात करने वाले। पत्रकार रोहिणी सिंह ने एक जवाब दिया है राकेश सिन्हा को। संविधान की बात करने वालों को आपने जेल भेज दिया है। कुछ को दंगों के आरोप में फंसा दिया है। इनकी समस्या ये है कि जिन्हें नक्सल कहते हैं, देशद्रोही कहते हैं उन्हीं को ऐसे वक्त में खोजते हैं। इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि कई लोगों ने एक नागरिक के तौर पर अर्णब की गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह फर्क साफ रखा है कि अर्णब पत्रकार नहीं है और न ही यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है।
न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी निंदा की है जबकि अर्णब इसके सदस्य तक नहीं है। अर्णब ने हमेशा इस संस्था का मज़ाक उड़ाया है। क्या न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन किसी ऐसे छोटे चैनल के पत्रकार की गिरफ्तारी पर बोलेगा जो उसका सदस्य नहीं है? ज़ाहिर है केंद्र सरकार अर्णब के साथ खड़ी है। अर्णब केंद्र सरकार के हिस्सा हो चुके हैं। अर्णब पत्रकार नहीं हैं। इसे लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता के हर पैमाने को ध्वस्त किया है। जिस तरह से पुलिस कमिश्नर को ललकार रहे थे वो पत्रकारिता नहीं थी। मैंने कल इस मामले पर कुछ नहीं लिखा क्योंकि प्राइम टाइम के अलावा कई काम करने पड़ते हैं। मैं लंबा लिखता हूं इसलिए भी टाइम चाहिए होता है। जब गिरफ्तारी की ख़बर आई तो मैं व्हाट्स एप पर था। फिर तुरंत कपड़े धोने चला गया। नील डालने के बाद भी बनियान में सफेदी नहीं आ रही थी। उससे जूझ रहा था तभी किसी का फोन आया कि चैनल खोलिए अर्णब गिरफ्तार हुए हैं। मैंने कहा कि उन्हीं जैसौं के कारण तो मेरे घर में न्यूज़ चैनल नहीं खुलता है। ख़ैर जब बनियान धोने के बाद पंखे की सफाई के लिए ड्राईंग रूम में आया तो चैनल खोल दिया। पंखे पर जमी धूल आंखों में गिर रही थी और मीडिया पर जमी धूल चैनल पर दिखने लगी। वैसे कुछ दिन पहले फेसबुक पर रिपब्लिक चैनल के मामले में एडिटर्स गिल्ड की प्रतिक्रिया पोस्ट की थी कि किसी एक पर आरोप है तो आप पूरे गांव पर मुकदमा नहीं कर सकते।
लेकिन मैं अर्णब का घर देखकर हैरान रह गया। रोज़ 6000 शब्द टाइप करके मैं गाज़ियाबाद के उस फ्लैट में रहता हूं जिसमें कुर्सी लगाने भर के लिए बालकनी नहीं है। अर्णब का घर कितना शानदार है। ईर्ष्या से नहीं कह रहा। मुझे किसी का भी अच्छा घर अच्छा लगता है। एक रोज़ किसी अमीर प्रशंसक ने घर आने की ज़िद कर दी और आते ही बच्चों के सामने कह दिया कि बस यही घर है आपका। हम तो सोचे कि आलीशान फ्लैट होगा। एक मोहतरमा तो रोने लगीं कि मेरा घर ले लीजिए। कोरोना के कारण जब घर से एंकरिंग करने लगा तो मेरे घर में झांकने लगे। उन्हें लगा कि रवीश कुमार शाहरूख़ ख़ान है। जल्दी उन्हें मेरे घर की दीवारों से निरशा हो गई। मैं ठीक ठाक कमाता हूं और किसी चीज़ की कमी नहीं है। मुझे अपना घर बहुत अच्छा लगता है। मेरी तेरह साल पुरानी कार को देखकर कई बार लोगों को लगा कि किसे बुला लिया अपनी महफिल में। वैसे ईश्वर ने सब कुछ दिया है। लोगों ने इतना प्यार दे दिया कि सौ फ्लैट कम पड़ जाएं उसे रखने के लिए। मैं अर्णब के शानदार घर के विजुअल के सामने असंगठित क्षेत्र के एक मज़दूर की तरह सहमा खड़ा रह गया। मैं क्या बोलता, मेरे बोले का कोई मोल है भी या नहीं। एक अदना सा पत्रकार एक चैनल के मालिक के लिए बोले, यह मालिकों का अपमान है। मैं तो बस अर्णब के घर की ख़ूबसूरती में समा गया। कल्पनाओं में खो गया। ड्राईंग रूम की लंबी चौड़ी शीशे की खिड़की के पार नीला समंदर बेहद सुंदर दिख रहा था। अरब सागर की हवाएं खिड़की को कितना थपथपाती होंगी। यहां तो क़ैदी भी कवि हो जाए। मुझे इस बात की खुशी हुई कि अर्णब के दिलो दिमाग़ में जितना भी ज़हर भरा हो घर कैसा हो, कहां हो, कैसे रहा जाए इसका टेस्ट काफी अच्छा है। उसमें सौंदर्य बोध है। बिल्कुल किसी नफ़ीस रईस की तरह जो अपने टी-पॉट की टिकोजी भी मिर्ज़ापुर के कारीगरों से बनवाता हो। मैं यकीन से कह सकता हूं कि अर्णब के अंदर सुंदरता की संभवानाएं बची हुई हैं। लेकिन सोचिए रोज़ समंदर के विशाल ह्रदय का दर्शन करने वाले एंकर का ह्रदय कितना संकुचित और नफ़रतों से भरा है।
अर्णब गोस्वामी जब भी जेल से आएं, अव्वल तो पुलिस उन्हें तुरंत रिहा करे, मैं यही कहूंगा कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने इस सुंदर घर को निहारा करें। इस सुंदर घर का लुत्फ उठाएं। सातों दिन कई कई घंटे एंकरिंग करना श्रम की हर अवधारणा का अश्लील उदाहरण है। अगर इस घर का लुत्फ नहीं उठा सकते तो मुझे मेहमान के रूप में आमंत्रित करें। मैं कुछ दिन वहां रहूंगा। सुबह उनके घर की कॉफी पीऊंगा। वैसे अपने घर में चाय पीता हूं लेकिन जब आप अमीर के घर जाएं तो अपना टेस्ट बदल लें। कुछ दिन कॉफी पर शिफ्ट हो जाएं। और हां एक चीज़ और करना चाहता हूं। उनकी बालकनी में बैठकर अरब सागर से आती हवाओं को सलाम भेजना चाहता हूं और बॉर्डर फिल्म का गाना फुल वॉल्यूम में सुनना चाहता हूं। ऐ जाते हुए लम्हों, ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो….मैं भी चलता हूं… ज़रा उनसे मिलता हूं… जो इक बात दिल में है उनसे कहूं तो चलूं तो चलूं…. और हां पुलिस की हर नाइंसाफी के खिलाफ हूं। चाहें लिखू या न लिखूं।
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लेेखक- (कँवल भारती)
उत्तरप्रदेश की भगवा दल वाली योगी सरकार ने हाथरस कांड से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए प्रत्येक जिले में वाल्मीकि-जयंती (31 अक्टूबर) सरकारी स्तर पर मनाने का निर्णय लिया था। राज्य सरकार के मुख्य सचिव आर. के. तिवारी ने मंडल आयुक्तों और जिला अधिकारियों को जो आदेश जारी किया था, उसमें कहा गया था कि महर्षि वाल्मीकि से संबंधित स्थलों व मंदिरों आदि पर अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ दीप प्रज्वलन, दीप-दान और अनवरत आठ, बारह या चौबीस घंटे का वाल्मीकि-रामायण का पाठ तथा भजन आदि का कार्यक्रम भी कराया जाए। निश्चित रूप से यह वाल्मीकियों को लुभाने की ऐसी शातिर चाल है, जो एक तीर से दो निशाने साधती है।
योगी जी को भलीभांति मालूम है कि वाल्मीकि समुदाय की शिक्षा में क्या स्थिति है? वे यह भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी के नाम पर सिर्फ नगरपालिकाओं में सफाई कर्मचारी का पद ही उनके लिए है। झाड़ू ही उनकी नियति बना दी गई है। क्या वे इसी नियति के लिए बने हैं? क्या उन्हें उच्च शिक्षित होने का हक नहीं है? भाजपा ने उनके लिए पृथक आरक्षण का प्रावधान तो कर दिया, क्योंकि ऐसा करके उसने सफाई कर्मचारियों को बड़ी चतुराई से उन दलितों से अलग कर दिया, जो आंबेडकरवादी हैं, ताकि वे भी आंबेडकरवादी न बन जाएँ। लेकिन उनकी शिक्षा के विकास की दिशा में भाजपा सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। आखिर क्यों? जब उनके पास शिक्षा ही नहीं होगी, तो क्या पृथक आरक्षण का प्रावधान उन्हें बेवकूफ बनाना नहीं है?
इसे मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि वाल्मीकि-जयंती पर वाल्मीकि के ग्रन्थ का पाठ होना चाहिए। पर आपत्ति इस बात पर है कि मेहतर बस्तियों में ही रामायण का पाठ क्यों होना चाहिए? यह पाठ उच्च जातियों की हिन्दू बस्तियों में क्यों नहीं हो रहा है? क्या रामायण पाठ की आवश्यकता केवल मेहतर समुदाय को ही है? दलितों में तो और भी बहुत सी जातियां हैं, पर क्या कारण है कि आरएसएस और भाजपा का दलित प्रेम सफाई-कर्मचारियों पर ही प्रकट हो रहा है? क्या इसलिए कि अन्य दलित जातियां वाल्मीकि को भगवान नहीं मानतीं? या इसलिए कि वे सफाई का कार्य नहीं करतीं? जाहिर है कि सवर्ण हिंदुओं को मेहतरों की जरूरत है, शौचालय साफ़ कराने के लिए, सड़कें साफ़ करने के लिए, और नाले और गटर साफ़ कराने के लिए दुनिया में भारत अकेला देश है, जहां गटर की सफाई के लिए सफाई कर्मचारियों से कराई जाती है, जिस तरह वे उनमें घुसकर सफाई करते हैं, वह जान-लेवा है और अब तक कई सौ लोग गटर में घुसकर मर चुके हैं। अन्य देशों में गटर की सफाई मशीनों से होती है, पर भारत में सफाई कर्मियों से इसलिए यह काम कराया जाता है कि मशीन महंगी पड़ती है, जबकि सफाई कर्मी बहुत ही सस्ता मजदूर है, जिसकी मौत की जिम्मेदारी भी सरकार की नहीं होती है। इसलिए उच्च हिंदुओं के लिए बहुत जरूरी है मेहतर समुदाय का अशिक्षित और गरीब बने रहना, क्योंकि शिक्षित होकर वे हिन्दू फोल्ड से बाहर निकल सकते हैं।
शील, समाधि और प्रज्ञा का मार्ग है। इसलिए आज कहीं कोई व्यक्ति बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाएं, बुद्ध को गाली देवे तो गुस्सा मत करना, क्योंकि बुद्ध न बुद्ध विहारों में है, न शास्त्रों में है, न मूर्तियों में।
पहला, बीजेपी से सवर्ण नाराज नहीं थे बल्कि 2 अप्रैल के दंगों के बाद जिस तरह प्रशासन का दमन दलितों ने सहा उससे दलित बीजेपी से नाराज जरूर थे इसके 2 प्रमाण हैं। पहला ग्वालियर चंबल के अलावा बाकी मालवा, निमाड़, बघेलखण्ड क्षेत्रों में बीजेपी को हमेशा जैसे वोट मिलते रहे हैं 2018 के चुनाव में भी वैसे ही मिले, बीजेपी मात्र ग्वालियर चंबल में चुनाव हारी जहां लगभग हर सीट पर दलित 30 से 40% तक हैं।
दलित वोटों के एक मुश्त रूप से कांग्रेस के पास जाने से ग्वालियर चंबल में कांग्रेस का प्रदर्शन आश्चर्यजनक रहा। चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया इस क्षेत्र में कांग्रेस के एक मात्र सर्वमान्य नेता थे तो इसका श्रेय उन्हें दिया गया। लेकिन यह भ्रम भी इसलिए गलत है कि वही ज्योतिरादित्य सिंधिया 2019 लोकसभा के आम चुनाव में 6 महीने बाद ही अपने परिवार की स्थाई गुना संसदीय सीट पर एक छोटे से बीजेपी के कार्यकर्ता के हाथों 2 लाख के करीब वोट से चुनाव हार गए। दूसरा 2013 के मध्यप्रदेश चुनाव में भी सिंधिया के पास 2018 के चुनाव की तरह कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष का पद था, तो 2013 या 2008 के चुनाव में सिंधिया निष्प्रभावी क्यों थे। यह मनुवादी मीडिया के फैलाये भ्रम थे कि मूल दलितों के बीजेपी के प्रति आक्रोश को मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया और सिंधिया को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया जिसका परिणाम आज के मध्यप्रदेश के उपचुनाव हैं।
दूसरा, सिंधिया जो आरोप आज कांग्रेस पर लगा रहे हैं कि कांग्रेस ने कर्जमाफी की घोषणा को लागू नहीं किया, उसके प्रतिउत्तर में कम से कम 3 से 4 सभाएं तो ऐसी मुझे याद हैं जिनमें सिंधिया ने खुद किसानों को ऋणमाफी पत्र बांटे है। सिंधिया ऐसा कोई नया आरोप आज कांग्रेस पर नहीं लगा रहे जिसका जवाब कांग्रेस में रहते सिंधिया ने खुद ना दिया हो। 2018 के चुनाव में बीजेपी का मुख्य नारा था ‘माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज’, बीजेपी सिंधिया पर भूमाफिया होने का आरोप लगाती थी, उनके सामंतवाद पर, 1857 की क्रांति के प्रसंग पर बीजेपी सिंधिया को घेरती रही है और आज वही शिवराज और महाराज एक साथ हैं। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस बीजेपी के सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस के सिंधिया के भाषण ही चला दे तो कांग्रेस जो उन पर गद्दारी के आरोप लगा रही है वे सच साबित हो जाएंगे। पर कांग्रेस विपक्ष की राजनीति मध्यप्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी नहीं कर पा रही। एक ओर जहां मौजूदा उपचुनाव में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए पूरी 28 सीट जितनी है दूसरी तरफ बीजेपी को मात्र 8, तब भी आप चुनाव प्रचार से दोनों की स्थिति का आंकलन कर सकते हैं। जहां 24 दिनों में शिवराज सिंह जी ने 38 सभाएं की हैं वहीं कमलनाथ जी ने मात्र 19 सभाएं की। यहां शिवराज के साथ सिंधिया ने 25, तो नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 सभाएं की। (ये आंकड़े दिनांक 22 अक्टूबर तक के हैं।)
निष्क्रियता और ठंडा चुनाव प्रचार उनकी हारने के प्रति ज़िद को दर्शाता दिखा। कौन कितने पानी में रहा, यह तो 10 नवंबर को चुनावी नतीजे आने के बाद साफ हो ही जाएगा।
गोटूलमुंडा के किसानों का मुख्य उत्पादन सुगंधित धान की 9 किस्म है जिसमें चिरईनखी, विष्णुभोग, रामजीरा, बास्ताभोग, जंवाफूल, कारलगाटो, सुंदरवर्णिम, लुचई, दुबराज शामिल है। लेकिन वर्तमान में कोदो, कुटकी, रागी की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है जो छतीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में उगाए जाने वाला आदिवासियों का मुख्य फसल है। कुछ सालों तक इन्हें ग्रामीणों का आहार माना जाता था लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों और औषधीय गुणों की वजह से अब देश-विदेश से इनकी मांग आ रही है। यही कारण है कि गोटूलमुंडा के ’किसान विकास समिति’ को सरकार की तरफ से 20 मीट्रिक टन कोदो चावल उत्पादन का टारगेट दिया गया है जिसकी सप्लाई विदेशों में की जाएगी। इस संबंध में ’किसान विकास समिति’ के समन्वयक डीके भास्कर ने बताया कि शुरूआत में समिति में 200 किसान जुडे़ थे, लेकिन जैविक खेती के इस प्रयोग से होने वाले फायदे को देखकर वर्ष 2020 में अब तक 456 किसान जुड़कर हमारे साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रासायनिक पदार्थों के उपयोग से पर्यावरण को नुकसान होता है जिसका ख़ामियाज़ा किसान से लेकर मिट्टी तक को भुगतनी पड़ती है और उसके लिए जिम्मेदार भी हम ही हैं। इसलिए हमारी समिति जैविक विधि से खेती कर रही है ताकि इसका फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी मिल सके। समिति के अध्यक्ष घंसू राम टेकाम व समिति के अन्य किसान रत्नी बाई, धनीराम पद्दा, अर्जुन टेकाम, शांति बाई, मुकेश टूडो सहित सभी सदस्यों का कहना है कि हम खेती के लिए खाद, कीटनाशक, बीज निर्माण जैसे सभी काम आपस में मिलकर करते हैं, इसलिए खेती में हमारी लागत कम आती है जिसका हमें मुनाफा मिलता है।

छात्रों-युवाओं के गुस्से की वजह बेरोज़गारी के साथ-साथ एसएससी जैसी परीक्षाएँ तय समय पर न होने और नौकरियों के लिए तय समय पर नियुक्ति न होना भी है। बीते सालों में कई विभागों में सरकार ने तमाम विभागों में कई पदों को खत्म कर दिया, जिससे लाखों युवाओं की इन पदों पर नौकरी की उम्मीद खत्म हो गई। सरकार द्वारा निजीकरण के तरह अंबानी-अडाणी को फायदा पहुंचान से भी देश का मध्यम वर्ग काफी नाराज है। नाराजगी का आलम ऐसा था कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में युवाओं ने अपना मुंह काला कर मोदी का विरोध किया।
बिहार की राजनीति में बड़ा कद रखने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। रघुवंश प्रसाद सिंह के नाम का नाम हाल में राजद से इस्तीफा देने के कारण सुर्खियों में रहा। उन्होंने दिल्ली में एम्स के बिस्तर से चिट्ठी लिखकर अपना इस्तीफ़ा भेजा लेकिन लालू यादव ने उसे ख़ारिज करते हुए लिखा कि आप कहीं नहीं जा रहे। लेकिन रघुवंश जी ने लालू यादव की बात नहीं मानी। वह दुनिया छोड़ गए।
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें याद करते हुए ट्विट किया है- ‘प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया? मैनें परसों ही आपसे कहा था आप कहीं नहीं जा रहे है. लेकिन आप इतनी दूर चले गए. नि:शब्द हूं. दुःखी हूं. बहुत याद आएंगे.’
रघुवंश बाबू बाहरी आवरण में एक गंवई नेता थे। लेकिन असल में वह एक विद्वान और सच्चे जन प्रतिनिधि थे। लालू यादव के पहले रघुवंश सिंह कर्पूरी ठाकुर के पीछे खड़े रहे। इसका जिक्र उन्होंने खुद अपने इस्तीफे में किया था। रघुवंश प्रसाद सिंह को बेहतर तरीके से बताने वाला
दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही थी। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।
इस की परीक्षा 1991 में वाराणसी में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान हुयी। 1991 के आम चुनाव में, एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, श्री चंद दीक्षित, वाराणसी शहर से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। हमेशा की तरह, विहिप ने मुसलमानों को मतदान से दूर रखने के लिए एक सांप्रदायिक दंगा किया था। परिणामस्वरूप, कर्फ्यू लगा दिया गया।
धर्मनिरपेक्ष बनाया जा सके। एससी / एसटी, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मुद्दों के बारे में उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए
– लेखक- आशाराम जागरथ
निगम जी ने कुछ दिनों तक गोरखपुर से प्रकाशित एक दैनिक में भी सांस्कृतिक गतिविधियों के संवाददाता के रूप में काम किया। बताते चलें कि निगम जी रंगमंच के कलाकार भी थे। अर्जक संघ द्वारा आयोजित नाटकों में वे रोल अदा किया करते थे। वह एक अखबार से जुड़े थे। एक बार वह उस अखबार के सम्पादक जो एक ब्राहमण थे, के घर पर बैठे थे। संम्पादक जी हिन्दू धर्म में व्याप्त छूतछात पर ज्ञान बाँट रहे थे। पीने के लिये चाय आई। एक कांच के गिलास में, दूसरा पीतल के गिलास में। निगम जी ने जाने-अनजाने में पीतल का गिलास उठा लिया और चाय पीने लगे। सम्पादक जी के प्रवचन का स्वर बदल गया। निगम जी ने उनसे भी चाय पीने को कहा परन्तु सम्पादक महोदय ने कांच के गिलास को छुआ भी नहीं। निगम जी द्वारा चाय पीने के लिए बार-बार आग्रह करने पर सम्पादक महोदय झल्ला गये और बोले, “तुमने हमारा वाला गिलास जूठा कर दिया। अब ये गिलास मेरे किसी काम का नहीं। तुम इस गिलास को लेते जाओ।” बताते हैं कि निगम जी पीतल का गिलास तो ले आये, लेकिन संवाददाता की नौकरी वहीं छोड़ आये।
बेरोजगारी के खिलाफ देश भर में उठती आवाजें और मोदी पर हल्ला बोलबेरोज़गारी को लेकर पूरे देश में कई हलक़ों से आवाज़ें उठती रही हैं। बुधवार यानी 9 सितंबर को इसे लेकर रात 9 बजे 9 मिनट कैंपेन चलाया गया। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों में लाखों युवाओं ने अपने घरों में अंधेरा कर और मोमबत्ती जलाकर मोदी सरकार का विरोध किया। ये युवा ऐसा कर बेरोजगारी के खिलाफ मोदी सरकार का विरोध कर रहे थे। युवाओं का गुस्सा इस बात को लेकर था कि हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा कर मोदी सरकार मुकर गई है।
सपा नेता अखिलेश यादव और राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी मोमबत्ती जलाकर युवाओं का साथ दिया। बिहार में तेजस्वी यादव ने अपनी मां और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के साथ इसको समर्थन किया तो यूपी में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्नी डिंपल यादव के साथ मोमबत्ती जलाई और युवाओं का समर्थन किया। अखिलेश यादव ने इसकी तस्वीर साझा करते हुए ट्विट किया।
तो वहीं बेरोजगारी के विरोध में प्रदर्शन करते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और राबड़ी देवी ने लालटेन जलाई। RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “सबसे ज्यादा युवाओं की आबादी बिहार में है लेकिन हकीकत में बिहार बेरोजगारी का केंद्र बन चुका है।”

श्राद्ध और पिंडदान के बारे में शुरू से ही बहुत अलग अलग विचार रहे हैं। कुछ लोग इसे पितरों की तृप्ति के लिए आवश्यक मानते हैं और कुछ इसे ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बहाना मात्र। इस सम्बन्ध में चार्वाक जो कि अनात्मवादी थे, द्वारा की गयी आलोचना बहुत सशक्त है। चार्वाक जिसे ब्राह्मणों ने भोगवादी कह कर निन्दित किया था ने कहा है:
“मरने के बाद सब कुछ ख़त्म हो जाता है और कुछ भी शेष नहीं बचता। पिंडदान और श्राद्ध ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बनाया गया ढकोसला है।” चार्वाक ने आगे कहा,” अगर ब्राह्मण को यहाँ पर खिलाया हुआ भोजन पितरों को पितृ लोक में पहुँच सकता है तो फिर एक यात्री को लम्बी यात्रा पर चलने से एक दिन पहले ब्राह्मण को बुला उतने दिनों का भोजन ठूंस ठूंस कर खिला देना चाहिए जितने दिन उसे यात्रा में लगने हैं। फिर उसे अपने साथ कोई भी राशन आदि लेकर चलने की ज़रुरत नहीं रहेगी। रास्ते में जब उसे भूख लगे तो उस ब्राह्मण को याद कर ले जिससे उस को खिलाया गया भोजन उस यात्री के पेट में स्वतः आ जायेगा।”
लेखकः एस.आर दारापुरी आइपीएस (से.नि.)
मैं उत्तर प्रदेश का 1972 बैच का आइपीएस अधिकारी हूं। 2003 में आई.जी. (पुलिस) के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं मानवाधिकार, दलित अधिकार, आरटीआई, वन अधिकार अधिनियम, भोजन और शिक्षा का अधिकार आदि मुद्दों पर सक्रिय रहा हूं। मैं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, उत्तर प्रदेश का उपाध्यक्ष हूँ। मैं पूर्व में राष्ट्रीय अनुसूचि4 और 2019 में रॉबर्ट्सगंज (यूपी) निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा है। हमारा मुख्य काम उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जिलों के दलितों, आदिवासियों, किसानों और ठेका मजदूरों के बीच है। एक पार्टी के रूप में हमने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएएत जाति आयोग का सलाहकार रहा हूं। वर्तमान में मैं आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का राष्ट्रीय प्रवक्ता हूं। मैंने 201) का विरोध किया। हम मानते हैं कि वे भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के खिलाफ हैं। हमने 19 दिसंबर 2019 को लखनऊ में सीएए का शांतिपूर्ण विरोध करने का फैसला किया था।
21 दिसंबर को, मुझे हज़रतगंज थाने में शाम 5.30 बजे तक हिरासत में रखा गया और जेल की वैन में जेल ले जाया गया। मुझे शाम 7 बजे के आसपास रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मैंने पिछले मैजिस्ट्रेट को जो बताया था उसे दोहराया। लेकिन इस सज्जन ने कोई ध्यान नहीं दिया और मेरे 14 दिनों के जेल रिमांड पर हस्ताक्षर कर दिए।
उन्होंने कृपापूर्वक मुझसे कहा, “आपने खुद पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। निश्चित रूप से आप जानते होंगे कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है।” मैं लगभग 09.30 बजे जेल की बैरक में पहुँच गया।
आप देख सकते हैं कि 19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था लेकिन फिर भी मेरे खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के कारण मुझे फंसाया गया है। जैसा कि आपने सुना होगा कि योगी सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए हमारे नाम और पते और क्षति पूर्ती के लिए हमारे पोस्टर / होर्डिंग्स लगा दिए थे। इसने हमें न केवल बदनाम करने, बल्कि व्यक्तिगत हमलों के लिए भी प्रचारित किया है। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने योगी सरकार को अवैध रूप से लगाए गए होर्डिंग्स को हटाने का निर्देश दिया, लेकिन राज्य ने उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ कोई स्टे प्राप्त न हुए बिना भी इसका पालन करने से इनकार कर दिया। मार्च में मुझे रुo 64 लाख की रिकवरी का नोटिस दिया गया जबकि अब तक मेरा अपराध किसी भी अदालत में साबित नहीं हुआ है। मैंने मार्च के महीने में वसूली नोटिस के स्टे के लिए इलाहाबाद की लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर की थी लेकिन कई तारीखों के बाद भी अब तक कोई आदेश नहीं दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि तहसीलदार सदर, लखनऊ द्वारा जारी किया गया रिकवरी नोटिस अवैध है क्योंकि यह जिस धारा 143 (3) के तहत जारी किया गया है वह यूपी राजस्व संहिता में मौजूद ही नहीं है। इस बीच, राजस्व अधिकारी मेरे घर पर छापा मार रहे हैं, मेरी गिरफ्तारी और मेरी घर की संपत्ति को जब्त करने की धमकी दे रहे हैं।
Written By- Shailesh Narwade
“There is a huge gap of this kind of content. Only a few filmmaker are making such films. We met several people, who liked the projectbut not all of them are capable of funding it. We need support from like-minded people in India and abroad,” Shailesh added.
Veteran filmmaker Shyam Benegal’s ‘Manthan’ was the best example of crowdfunded film in India. Bollywood filmmaker Rajat Kapoor has also crowdfunded for his next film on Crowdera recently. Filmmaker Jyoti Nisha successfully raised over Rs 20 lakh for her documentary ‘Ambedkar: Then and Now’ on another crowdfunding platform.